तामिलनाडु में जातिवाद को खत्म करने की शुरुआत, स्टॉलिन सरकार का बड़ा फैसला

पेरियार को आदर्श मानने वाली एम.के. स्टॉलिन सरकार ने तमिलनाडु में जातिवाद को जड़ से खत्म करने के लिए नया फार्मूला तैयार किया है। इसके तहत राज्य में स्कूल परिसर में धार्मिक कलाई बैंड, अंगूठियां और माथे पर तिलक जैसे चिन्हों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस के. चंदू की अध्यक्षता में जातिवाद को रोकने के लिए एक कमेटी बनाई थी। कमेटी ने मुख्यमंत्री स्टालिन को 610 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी है, जिसने कई सिफारिश की गई है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कूल के नाम से जाति संबंधी नाम हटाए जाएं। शिक्षकों का समय-समय पर ट्रांसफर हो ताकि वे उन इलाकों में ज्यादा नहीं रहे, जहां उनकी जाति का प्रभाव है। इसके अलावा जातिवाद को रोकने के लिए जो अन्य सिफारिश की गई है, उसमें,
  • सरकारी और निजी दोनों स्कूलों से जाति को संबोधित करने वाले उपनाम हटाए जाने की सिफारिश की गई है।
  • साथ ही यह भी कहा गया है कि,अटेंडेंस रजिस्टर में भी विद्यार्थियों की जाति नहीं लिखी जाए।
  • क्लास रूम में बैठने की व्यवस्था वर्णमाला के आधार पर हो।
  • क्लास 6 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए जातिगत भेदभाव, हिंसा, यौन उत्पीड़न तथा एससी-एसटी एक्ट जैसे कानूनों पर अनिवार्य रूप से कार्यक्रम हो।

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि 500 से ज्यादा छात्रों वाले हर माध्यमिक विद्यालय में एक स्कूल कल्याण अधिकारी होना चाहिए। निश्चित तौर पर एम.के. स्टॉलिन सरकार की जातिवाद को रोकने के लिए की गई यह कोशिश शानदार है। हालांकि तमिलनाडु के भाजपा अध्यक्ष धार्मिक प्रतीकों के उपयोग को बैन किये जाने का विरोध कर रहे हैं। लेकिन विरोध करने वाले यही लोग जातिवाद की घटनाओं पर चुप्पी साध लेते हैं। दरअसल पिछले साल तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में कथित तौर पर दो दलित भाई-बहनों से ऊंची जाति के कुछ छात्रों ने मारपीट की थी। इस मामले ने काफी तूल पकड़ा था।

साल 2023 में आई नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 से 2023 के चार सालों के दौरान दलित उत्पीड़न की एक लाख 90 हजार घटनाएं दर्ज की गई थी। इन चार सालों में तमिलनाडु में दलित उत्पीड़न के 5208 मामले दर्ज किए गए। जातिवाद के ऐसे मामले रोकने के लिए स्टॉलिन सरकार जिस तरह के कदम उठाने की तैयारी में है, उससे जातिवाद पर करारी चोट लगेगी। ऐसे उपाय अपनाने के लिए दूसरे राज्यों को भी सोचना चाहिए, ताकि देश भर में जातिवाद खत्म हो सके।

मोदी सरकार में हुए दो दर्जन पेपर लीक, जानिये, कब, कौन सा पेपर हुआ लीक

मोदी सरकार पेपर लीक सरकार है। यह आरोप है कांग्रेस पार्टी का। दरअसल पेपर लीक मामले में मोदी सरकार बुरी तरह घिर गई है। कांग्रेस पार्टी ने इसको बड़ा मुद्दा बनाते हुए अपने ट्विटर हैंडल से 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से अभी तक हुए पेपर लीक की सूची जारी कर सरकार पर करारा हमला बोला है। जानिये मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में कितने पेपर लीक हुए हैं-

अगस्त 2014- आर्मी रिक्रूटमेंट एग्जाम जून 2015- AIPMT परीक्षा मार्च 2016- SSC CPO (SI/ASI) लिखित परीक्षा जून 2016- BA फर्स्ट इयर इंग्लिश का पेपर (दिल्ली युनिवर्सिटी) जुलाई 2016- NEET 2 पेपर लीक फरवरी 2017- आर्मी रिक्रूमटमेंट पेपर लीक मई 2017- SSC MTS पेपर लीक मई 2017- NEET पेपर लीक

2018- कंबाइंड ग्रेजुएशन लेवल एग्जाम मार्च 2018- क्लास 10th का गणित और 12th का इकोनॉमिक्स पेपर लीक दिसंबर 2018- गुजरात पुलिस कॉन्स्टेबल रिक्रूटमेंट पेपर लीक

मार्च 2019- इग्नू का MCA और BCA के थर्ड सेमेस्टर का पेपर मार्च 2019- महाराष्ट्र बोर्ड 10वीं कक्षा के दो पेपर लीक

फरवरी 2020- यूपी बोर्ड का 12वीं का इंग्लिश का पेपर सितंबर 2020- नेशनल लॉ एडमिशन टेस्ट का पेपर लीक फरवरी 2020- मणिपुर का 11th बोर्ड का पेपर लीक

नवंबर 2021- UPTET पेपर लीक दिसंबर 2021- GSSSB का पेपर लीक

मई 2022- BPSC कंबाइंड प्रिलिम्स पेपर लीक मार्च 2023- तेलंगाना SPSC असिस्टेंट इंजीनियर पेपर लीक मार्च 2023- असम में HSLC पेपर लीक

फरवरी 2024- यूपी पुलिस कॉन्सटेबल भर्ती परीक्षा फरवरी 2024- RO/ARO पेपर लीक मई 2024- NEET पेपर लीक जून 2024- UGC NET पेपर लीक

इन 25 पेपर लीक में जिन परीक्षाओं का जिक्र किया गया है वह बेहद महत्वपूर्ण परीक्षाएं हैं। साफ है कि बीते 10 सालों में केंद्र में बैठी मोदी सरकार और तमाम राज्य सरकारों के नाक के नीचे, एक के बाद एक 25 परीक्षाओं में पेपर लीक हुए। इसने हजारों युवाओं की जिंदगी खराब कर दी। कहां तो सरकार को ऐसी घटनाओं पर नकेल कसनी चाहिए थी, लेकिन इन दस सालों में इस पर गंभीर चर्चा तक नहीं हो सकी। हालांकि अब विपक्ष ने साफ कर दिया है कि वह देश के करोड़ों युवाओं से जुड़े इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठेगी। विपक्ष के इस तेवर से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार बैकफुट पर है।

आदिवासी समाज के कितने होंगे ओडिशा के आदिवासी मुख्यमंत्री मोहन माझी

ओडिशा के नए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझीनवीन पटनायक के 24 साल की बादशाहत को खत्म कर मोहन चरण माझी ओडिसा के मुख्यमंत्री बन गए हैं। बुधवार को भुवनेश्वर के जनता मैदान में शाम पांच बजे उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। भाजपा ने दो उपमुख्यमंत्री भी बनाया हैं। इसमें लगातार छठी बार विधायक बने बलांगीर के राज परिवार से ताल्लुक रखने वाले कनक वर्धन सिंहदेव हैं। तो दूसरी डिप्टी सीएम पहली बार विधायक बनी प्रभाती परिड़ा बनाई गई हैं। परिड़ा राज्य भाजपा के महिला मोर्चा की अध्यक्ष रह चुकी हैं। 12 जून को मोहन चरण माझी के शपथ ग्रहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह सहित तमाम दिग्गज नेता मौजूद थे।

लेकिन सवाल है कि भाजपा ने आखिर आदिवासी समाज के मोहन माझी को ही क्यों चुना? क्या इसके पीछे लोकसभा के चुनावी नतीजे हैं, जिसमें भाजपा को 2019 के मुकाबले 26 रिजर्व सीटों पर मात खानी पड़ी है। और इसी बेचैनी में भाजपा आदिवासी बहुलता के हिसाब से तीसरे नंबर के राज्य ओडिसा में आदिवासी समाज के नेता को मुख्यमंत्री की कमान सौंप दी है।

पहले बात करते हैं नए सीएम मोहन चरण माझी की। माझी लंबे समय से भाजपा से जुड़े रहे हैं और उत्तरी ओडिशा के केऊंझर जो कि अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित सीट है, वहां से चौथी बार विधायक बने हैं। माझी के नाम पर मुहर लगा कर भाजपा ने छत्तीसगढ़ और राजस्थान की तरह ही एक बार फिर से सबको चौंका दिया है। ओडिसा में आदिवासी समाज की आबादी करीब 23 प्रतिशत है। ओडिसा की कुल आबादी 4 करोड़ है, जिसमें आदिवासी समाज की आबादी एक करोड़ है। जबकि देश की कुल आदिवासी आबादी की 9.20 फीसदी आबादी ओडिशा में है। यानी ओडिसा के जरिये भाजपा देश भर के आदिवासी समाज को एक मैसेज दिया है।

ओडिशा के मुख्यमंत्री के तौर पर मोहन चरण माझी के नाम पर मुहर लगाते राजनाथ सिंहदरअसल लोकसभा चुनाव में आरक्षित सीटों पर करारी हार के बाद भाजपा में बेचैनी है। साथ ही जिस तरह से 400 पार का नारा देने के बावजूद भाजपा खुद अपने बूते सरकार भी नहीं बना सकी, और एनडीए गठबंधन पर निर्भर हो गई है, उसने भाजपा को डरा दिया है। ऐसे में भाजपा ने जिस तरह छत्तीसगढ़ के बाद ओडिसा में आदिवासी समाज के नेतृत्व दिया है, वह वंचित समाज के बीच यह संदेश देना चाहती है कि सिर्फ भाजपा की दलितों और आदिवासियों को प्रतिनिधित्व दे सकती है। यही वजह है कि भाजपा ने छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज के विष्णु देव साय के बाद ओडिसा में मोहन माझी को सत्ता की कमान दे दी है।

अगर इसको प्रतिनिधित्व के लिहाज से देखें तो आदिवासी बहुल राज्यों के लिए एक बड़ा कदम है। क्योंकि आदिवासियों की बहुलता वाले प्रदेश में इसी समाज का मुख्यमंत्री इस समाज की असली भलाई सोच और कर कर सकता है। जैसा कि झारखंड के मामले में वकालत की जाती है। लेकिन बात बस इतनी सी नहीं है, बल्कि इसके कई और भी फैक्टर है।

ओडिशा के उत्तर में झारखंड और पश्चिम बंगाल, पश्चिम में छत्तीसगढ़ और दक्षिण में आंध्र प्रदेश राज्य है। इसमें झारखंड और पश्चिम बंगाल दोनों राज्यों में भाजपा सत्ता से दूर है। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल की सत्ता को हासिल करना भाजपा का एक बड़ा सपना है। तो झारखंड में भी भाजपा दुबारा सत्ता में वापसी नहीं कर पाई है। साल के आखिर में झारखंड में विधानसभा चुनाव भी है। ऐसे में भाजपा झारखंड के आदिवासी समाज को संदेश देना चाहती है कि वह उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बैठाएगा, जैसा कि उसने पिछली बार नहीं किया था।

मंदिर परिसर में ओडिशा के नए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझीहालांकि इन सबके बावजूद छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय और अब ओडिशा में मोहन चरण माझी के रूप में भाजपा ने उन्हीं नेताओं को मौका दिया है, जो भाजपा और संघ की विचारधारा से निकले और उसमें रचे-बसे हुए हैं। मोहन माझी ने 90 के दशक में सरस्वती शिशु मंदिर में शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी। 1997 में वो सरपंच बने और 2000 में भाजपा के टिकट पर केऊंझर से पहली बार विधायक बने। 24 साल तक नवीन पटनायक ने जिस तरह ओडिशा में अजेय राज किया, माझी उनके खिलाफ मुखर रहे। इसने उन्हें आदिवासी समाज के साथ-साथ भाजपा के भीतर भी लोकप्रिय किया। और इन सबके बाद जिस तरह मुख्यमंत्री बनते ही अपने पहले फैसले में उन्होंने जगन्नाथ पुरी मंदिर के सभी चारों दरवाजे खोलने और मंदिर के रखरखाव के लिए 500 करोड़ का कोष स्थापित करने का आदेश दिया है, वह उसे भाजपा के सबसे बड़े एजेंडे ‘धर्म’ से भी जोड़ता है। देखना होगा कि भाजपा ने जिस तरह छत्तीसगढ़ के बाद अब ओडिशा में आदिवासी समाज का मुख्यमंत्री दिया है, वो भाजपा के एजेंडे को पूरा करने के अलावा आदिवासी समाज का कितना भला करते हैं।

AANA announce annual award, Mr. J.V Pawar get Dr. Ambedkar International Award

The Ambedkar Association of North America (AANA) is happy to share that our annual retreat was a big success. We had over 150 participants from all over USA attend the retreat. The retreat was held from May 24, 2024 until May 27, 2024 in Keezeltown, VA, USA. Dr. Rajratna Ambedkar was the chief guest who joined us all the way from India. We also distributed our annual awards for this year as follows:

Dr. Ambedkar International Award for Mr. J.V Pawar Savitrimai Phule International Award for Ms. Nirmala Grace Mooknayak Excellency in Journalism Award to The News Beak Social Media Channel

We had several community building events, games and activities for children and adults. We had several close discussions with Dr. Rajratna Ambedkar and other members on how to take Babasaheb’s caravan forward. Additionally, we also had a ceremony to honor and remember Mata Ramabai Ambedkar on her death anniversary with a member of her family, Dr. Rajratna Ambedkar present, which made this ceremony special.

With our goal to bring our community together holistically, our annual retreat has become an event that our members look forward to, throughout the year.

Press Release by AANA

मध्यप्रदेश के सागर में मनुवाद का नंगा नाच, दस महीने में एक दलित परिवार में तीन हत्याएं

पहले उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया, जब भाई ने आवाज उठाई तो उसकी हत्या कर दी गई। मामले में चाचा राजेन्द्र गवाह थे, तो 25 मई को उनकी भी हत्या कर दी गई और जब चाचा का शव लेने के लिए पीड़िता अंजना एंबुलेंस से गई तो एंबुलेंस से संदिग्ध हालात में गिरने पर उसकी भी मौत हो गई है। इस घटना को लेकर दुनिया भर के दलितों में रोष है। कुछ लोग इसे हत्या बता रहे हैं तो पुलिस जांच की बात कह रही है। मध्य प्रदेश के सागर में घटी इस घटना ने समाज का घिनौना चेहरा एक बार फिर उजागर कर दिया है। यह सारा घटनाक्रम अगस्त 2023 में शुरू हुआ, जब 18 वर्षीय युवक नितिन अहिरवार की जातिवादी गुंडो ने पीट-पीट कर हत्या कर दी। क्योंकि उसने बहन के साथ हुई यौन उत्पीड़न का विरोध किया था। इस मामले में ऊंची जाति के जातिवादी गुंडे उस पर समझौते के लिए दबाव डाल रहे थे। भाई की हत्या के बाद पीड़िता अंजना ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई। लालू की हत्या के तीन गवाह थे। चाचा राजेन्द्र, दूसरी खुद अंजना और तीसरी उसकी माँ। तब से ऊंची जाति के जातिवादी गुंडे लगातार परिवार पर बयान बदलने के लिए दबाव बना रहे थे, लेकिन परिवार न्याय के लिए लड़ रहा था। इस मामले में अब एक के बाद तीन मौत हो चुकी है।

 पिछले साल अगस्त महीने में जब यह घटना घटी, उसी दौरान सागर में सतगुरु रविदास जी का मंदिर बनाने के लिए 101 करोड़ की लागत से 11.21 एकड़ भूमि में रविदास मंदिर बनाने की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रखी थी। दलितों को लुभाने के लिए नेता ऐसा ही करते हैं। लेकिन जमीन पर दलितों के साथ हो रहे अत्याचार पर खामोश हो जाते हैं। जब यह घटना घटी उस समय भी मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे। इस मामले में शुरू से ही पीड़िता द्वारा अंकित ठाकुर का नाम लिया जा रहा था, लेकिन उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई। आरोप है कि उसे राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है। अंजना इस मामले में ज्यादा मुखर थी। वह एक पढ़ी-लिखी लड़की थी जो अपने अधिकारों को लेकर जागरूक थी।

घटना के बाद जब हंगामा मचा है तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव बुधवार 29 मई को पीड़ित परिवार से मिलने उसके गांव बड़ोदिया नोनागिर पहुंचे और पुलिस चौकी खोलने का आश्वासन दिया। साथ ही मृतक राजेन्द्र अहिरवार के परिवार को 8 लाख 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। हालांकि अब मुख्यमंत्री मोहन यादव चाहे तो वादे करें, भाजपा सरकार और स्थानीय प्रशासन की भूमिका इस पूरे मामले में शुरू से ही संदिग्ध रही है। ‘दलित दस्तक’ को कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के हवाले से यह खबर मिली है कि परिवार के सदस्यों का आरोप है कि उन्हें प्रशासन ने जो सुरक्षा दी थी और जो कैमरे लगाए गए थे, उसे हाल ही में हटा दिया गया। इस पूरे मामले में एक ही परिवार के दो सदस्यों की हत्या और अंजना की संदिग्ध हालत में हुई मौत तमाम सवाल खड़े करते हैं।

अभिजात वर्गीय चरित्र से आज़ाद होता हिंदी सिनेमा

सिनेमा परिभाषित रूप से समाज का आईना है, पर साथ ही साथ ये मनोरंजन का साधन और एक व्यवसाय भी है। भारतीय सिनेमा इन तीनो अवधारणाओं के बीच कहीं झूलता रहा है। एक तरफ जब सिनेमा समाज को प्रस्तुत करता है तब वह कई बार मनोरंजक नहीं रह जाता। साथ में व्यवसायिक रूप से सफल भी नहीं होता। इसी पसोपेश में भारतीय सिनेमा लंबे समय तक आर्थिक लाभ को ज्यादा महत्व देता रहा है। इसके चलते करण जौहर, सूरज बड़जात्या की अलग आलीशान अभिजात वर्ग की दुनिया की कहानी सिनेमा के माध्यम से परोसी जाती रही।

ये मनोरंजक होने के साथ व्यवसायिक रूप से सफल भी थीं, पर भारत के किसी छोटे शहर- कस्बे में रहने वाला व्यक्ति इनसे खुद को जोड़ नहीं पाता था। उदाहरण के लिए करण जौहर की कभी खुशी कभी गम, कुछ कुछ होता है, कभी अलविदा ना कहना, ये सिनेमा मनोरंजक तो थे; पर हीरो का जीवन, उसका घर, स्कूल, कॉलेज का भारत के किसी भी स्कूल, कॉलेज या घर से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था। इससे भारत का बहुसंख्यक मध्यमवर्ग बॉस की डांट और आर्थिक मजबूरियों से उपजे अपने दिन भर की थकान को कुछ समय के लिए भूल कर एक आभासी दुनिया में खो जाता था। लेकिन वह खुद को उस सिनेमा और उसके हीरो से जोड़ नहीं पाता था।

दूसरा 90 के दशक में एक अलग ही सिनेमा चल रहा था जहां फ़िल्म में बहुत ज्यादा गाने होते थे, महिला को उसके शरीर से ऑब्जेक्टिफाई किया जाता था और यही चलन विकसित हो कर 2005 के बाद कि फिल्मों में ‘आइटम सोंग’ के रूप में सामने आता है। हीरो हीरोइन के संबंध में एक रटी रटाई स्क्रिप्ट लगभग हर फिल्म में फॉलो की जाती थी कि पहले हीरो हीरोइन को छेड़ेगा, उसका पीछा करेगा, उसके लिए कुछ गुंडों से लड़ेगा फिर एक गाना होगा अंत में हीरोइन को हीरो से प्यार हो जाएगा।

समान कहानी होने के बाद भी इस तरह का सिनेमा व्यवसायिक तौर पर भारत में बहुत सफल रहा। इस बीच कुछ गम्भीर सामाजिक विमर्श से जुड़ी फिल्में भी आईं पर वे इस चकाचौंध भरे सिनेमा के सामने नहीं टिक पाईं। जिसके कारण तिग्मांशु धूलिया, अनुराग कश्यप, शेखर कपूर, गुलज़ार जैसे गम्भीर सिनेमा बनाने वाले निर्देशक बॉलीवुड में कहीं नेपथ्य में रहे।

भारतीय सिनेमा का ये दौर गैंग्स ऑफ वासेपुर के आने तक चलता रहा पर जैसे ही ये फ़िल्म आई भारतीय सिनेमा हमेशा के लिए बदल गया। इस फ़िल्म में पात्रों की भाषा, कपड़े, घर, स्कूल, कॉलेज, जीवन की समस्याएं सब कुछ बहुसंख्यक मध्यमवर्गीय लोगों की तरह थे। इस मूवी में फैजल खान नाम का किरदार बदलते भारत की कहानी बयां करता है। इस फ़िल्म ने ना सिर्फ भारतीय सिनेमा को उसके ‘अभिजातवर्गीय चरित्र’ से आज़ाद कराया बल्कि सिनेमा में खूबसूरत गुलदस्ते की तरह उपयोग होने वाली हीरोइन को भी स्वतंत्रता दिलाई।

इस फ़िल्म की सफलता के बाद छोटे शहरों- कस्बों से निकलने वाली कहानियों की ओर भारतीय सिनेमा मुड़ गया जिसमें मशान, मांझी द माउंटेन मैन, नील वटे सन्नाटा प्रमुख हैं। जब सिनेमा में यह मध्यमवर्गीय क्रांति चल रही थी उसी समय ओटीटी प्लेटफार्म भी आते हैं जिसने भारतीय सिनेमा का सम्पूर्ण स्वरूप ही बदल दिया मिर्जापुर, गुल्लक, पंचायत, कोटा फैक्ट्री, ये मेरी फैमिली है जैसी वेब सीरीज के गुड्डू पंडित, बबलू पंडित, मुन्ना भैया, दीपक जैसे पात्र आम भारतीय से पहनावा, रहनसहन, सोच व भाषाई स्तर पर बहुत नजदीक थे। इन में से हर पात्र को हमने अपने छोटे शहर, कस्बे, गांव में देखा हुआ है ये पात्र 90 के दशक के राहुल और राज की तरह काल्पनिक नहीं लग रहे थे।

हाल ही में आई लापता लेडीज भारतीय सिनेमा के विकास का चरम है। एक सरल और सहज कहानी। घूंघट के कारण बदल गई दुल्हनों की कहानी के जरिये जिस तरह अलग-अलग किरदारों की कहानी कहती औरतों की दुनिया को नए तरीके से दिखाया गया है, वह लाजवाब है। एक औरत का आत्मनिर्भर होना कितना जरूरी है, यह फिल्म बड़ी सहजता से कह जाती है। फिल्म में हर पात्र का कहा गया एक-एक वाक्य गम्भीर सामाजिक विमर्श की गुंजाइश रखता है। एक सीन में दीपक की माँ अपनी सास से कहती है कि “अम्मा हम महिलाएं सास, बहु, देवरानी तो बन जाती हैं पर कभी सहेली क्यों नहीं बन पाती”। यह डायलाग भारत के संयुक्त परिवारों की ऐसी सच्चाई बताती है जिस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया।

 कहानी में प्रेम भी है पर वो फिल्मी नहीं, पवित्र और मीठा है। इसमें इंतज़ार है, चिंता है, अनिष्ट का भय है और अटूट विश्वास है। फ़िल्म देखते समय कई बार हम कहानी को बिना संवाद के भी महसूस कर सकते हैं। आखिर में जब फूल और दीपक मिलते हैं तो दर्शकों की आंखों गिली कर जाते हैं।

 फ़िल्म में हर पात्र की वेशभूषा, भाषा, रहन-सहन एकदम साधारण है। किरण राव के निर्देशन में फिल्म ने हर फ्रेम में बिना विवाद के कई गम्भीर मुद्दों को छुआ है। ये फ़िल्म भारत में ना केवल महिलावादी आंदोलन को आगे ले जाएगा बल्कि भारतीय सिनेमा को भी नई दिशा देगी। अब कहानीकार, निर्देशक और फ़िल्म निर्माता फ़िल्म की व्यवसायिक सफलता, असफलता की चिंता के परे सिनेमा को उसके परिभाषित अवधारणा “सिनेमा समाज का आईना है” के तौर पर दिखा रहे हैं।


लेखक बुद्ध प्रिय सम्राट रिसर्च स्कॉलर हैं। अस्तित्वहीन आस्था एवं भगवान और उदुम्बरा नाम से दो किताबें भी लिख चुके हैं।

सोशल मीडिया में मोदी से आगे राहुल गांधी, देखिए चौंकाने वाला सर्वे

लोकसभा चुनाव में एक लड़ाई जमीन पर राजनीतिक सभाओं और रैलियों के रूप में चल रही थी तो एक लड़ाई सोशल मीडिया में भी लड़ी जा रही थी। चाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हों, या राहुल गांधी या फिर अखिलेश, तेजस्वी या फिर दक्षिण के नेता, हर कोई अपनी बात हर तरीके से जनता तक पहुंचाने की होड़ में शामिल था।

दैनिक भास्कर ने सोशल मीडिया की इस लड़ाई का 50 दिन का लेखा जोखा निकाला है। और भास्कर के मुताबिक सोशल मीडिया की लड़ाई जीती है, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने। सोशल मीडिया पर नरेन्द्र मोदी के मुकाबले जनता ने राहुल गांधी को ज्यादा पसंद किया है। और राहुल गांधी पीएम मोदी पर काफी भारी पड़े हैं। आंकड़ों की बात करें तो राहुल गांधी को पीएम मोदी के मुकाबले 21 करोड़ ज्यादा लोगों ने देखा है। साथ ही राहुल गांधी को मोदी के मुकाबले दोगुने लाइक्स मिले हैं। राहुल गांधी की पोस्ट मोदी के मुकाबले तीन गुना ज्यादा शेयर किए गए हैं।

राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी से इतर हिन्दी पट्टी के नेताओं को देखें तो तेजस्वी यादव भी सोशल मीडिया पर खासे एक्टिव रहे हैं और उनके हर वीडियो को लाखों लोगों ने लगातार देखा है। कन्हैया कुमार के भाषण और वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब पसंद किये गए।

जहां तक भास्कर द्वारा नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी को लेकर जारी इस आंकड़े को लोगों की पसंद माना जाए तो साफ है कि नेता के तौर पर नरेन्द्र मोदी कहीं न कहीं अब युवा वर्ग को पहले जैसा इंप्रेस नहीं कर पा रहे हैं। तो वहीं जनता को राहुल गांधी की एनर्जी पसंद आ रही है। साफ है कि अगर सोशल मीडिया की यह पसंद वोटों के रूप में ईवीएम में बंद हुए होंगे तो लोकसभा चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले होंगे।

सारनाथ और श्रावस्ती में धूमधाम से मनी बुद्ध पूर्णिमा, देखिए शानदार तस्वीरें

बौद्ध धर्म में श्रावस्ती का काफी महत्व है। श्रावस्ती का जेतवन वह स्थान है जहां तथागत बुद्ध ने अपने जीवन के 18 वर्षावास बिताया था। यहीं उन्होंने अंगुलीमाल डाकू से लोगों की रक्षा की थी और उसे धम्म के रास्ते पर लेकर आए थे। तो सारनाथ वह स्थान है, जहां तथागत बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्खुओं को ज्ञान प्राप्ति के बाद पहला उपदेश दिया था। इन दोनों प्रमुख बौद्ध स्थलों को लेकर लोगों का उत्साह बढ़ता जा रहा है। वैसे तो आए दिन यहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है, लेकिन बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर यहां खास आयोजन होता है।

इस साल भी 23 मई को 2568वीं त्रिविध पावनी बैशाख पूर्णिमा यानी बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर यहां पूरे दिन बौद्ध धर्म के अनुयायियों का तांता लगा रहा। जेतवन में पूरे दिन भंडारा चलता रहा तो शाम को जेतवन को 2568 दीपक प्रज्वलित किया गया। महाविहार गंधकुटी, जहां तथागत बुद्ध वर्षावास के दौरान रहा करते थे, उसे गुलाब की पंखुड़ियों से सजाया गया। इस मौके पर हजारों बौद्ध अनुयायियों ने प्रसाद ग्रहण किया। श्रावस्ती स्थित जेतवन पर यह शानदार आयोजन भंते देवेन्द्र के निर्देशन में उपासक विजय बौद्ध के सहयोग से हुआ।

दूसरी ओर तथागत बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ में तथागत बुद्ध के अवशेष को दर्शन के लिए रखा गया। तथागत बुद्ध की पवित्र अस्थि धातु को प्रथम उपदेश स्थल पर मुलगंधकुटी विहार में उपासकों के दर्शन के लिए रखा गया। इस मौके पर देश-विदेश से 50 हजार से अधिक बौद्ध भिक्षु और अनुयायियों ने तथागत बुद्ध के पवित्र अस्थि के दर्शन किये। वैसे तो सारनाथ में अलग-अलग देशों के तमाम बुद्ध विहार हैं, लेकिन भारतीय बौद्धों का एकमात्र बुद्ध विहार धम्मा लर्निंग सेंटर हैं।

सारनाथ में आयोजित प्रमुख कार्यक्रम धम्मा लर्निंग सेंटर के प्रमुख भंते चंन्दिमा के निर्देशन में और सेंटर से जुड़े तमाम उपासकों के सहयोग से कार्यक्रम हुआ। इस मौके पर सुबह 10 बजे से रात को 10 बजे तक भिक्खु संघ एवं उपासकों को सामूहिक भोजन दान दिया गया। बता दें कि दिनों-दिनों बौद्ध धर्म का कारवां बढ़ता जा रहा है। बैसाख पूर्णिमा के मौके पर यह साफ तौर पर देखा गया।

बुद्ध पूर्णिमा पर भारत में बना इतिहास, पूरा हुआ 2300 साल पुराना सपना

श्रीलंका के बोमालुआ टेंपल अनुराधापुरा के प्रमुख 26 मार्च को भारतीय उपासक विजय बौद्ध को बोधि वृक्ष का प्रतिरूप सौंपते हुएबुद्ध पूर्णिमा के मौके पर दुनिया भर के बौद्ध समाज में जश्न का माहौल रहा। लेकिन भारत के लिए इस बार की बुद्ध पूर्णिमा खास रही। दरअसल इस बार श्रीलंका से उस बोधि वृक्ष के प्रतिरूप को भारत लाया गया, जिसे महान सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा 2300 साल पहले प्रतिरूप के रूप में बोधगया से श्रीलंका लेकर गई थीं।

भारत के लार्ड बुद्ध वेलफेयर फाउंडेशन के सचिव दीवाकर पटेल की कोशिश और भंते देवेन्द्र की पहल पर यह हो पाया। इसे अमलीजामा पहनाया लखनऊ के व्यवसायी और विजय एनर्जी इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के मालिक बौद्ध उपासक विजय बौद्ध ने। इसके लिए 2500 अमेरिकी डालर यानी तकरीबन दो लाख रुपये की फीस भी जमा की गई।

यह पहली बार था जब इस बोधि वृक्ष के प्रतिरूप को आधिकारिक तौर पर भारत लाया गया है। यह काम मार्च महीने में हुआ। बोधि वृक्ष के इस प्रतिरूप को भारत लाने के लिए उपासक विजय बौद्ध श्रीलंका गए थे, जहां बोमालुआ टेंपल अनुराधापुरा के प्रमुख ने बीते 26 मार्च को विजय बौद्ध को बोधि वृक्ष का प्रतिरूप सौंपा।

इस बोधि बृक्ष की कहानी बौद्ध परंपरा का इतिहास बताती है, साथ ही यह भी बताती है कि भारत के बाहर बौद्ध धर्म कैसे पहुंचा। करीब 2300 साल पहले महान सम्राट असोक के पुत्र महेन्द्र धम्म का प्रसार करने श्रीलंका पहुंचे थे। वहां के राजा और उपासको ने उनसे कहा कि आपके जाने बाद क्या होगा? तब भंते महेंद्र ने अपने पिता सम्राट असोक से आग्रह कर बहन संघमित्रा से बोध गया से महाबोधि वृक्ष का सपलिंग यानी प्रतिरूप श्रीलंका लाने को कहा। अब उसी विशाल बोधिवृक्ष के प्रतिरूप को वापस भारत लाया गया।

इस बोधि वृक्ष को उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में, जहां तथागत बुद्ध घूम-घूम कर धम्म का उपदेश देते थे, वहां के बलरामपुर के लालनगर गांव में 31 मार्च को रोपित किया गया। दरअसल 31 मार्च को यहां बौद्ध भिक्खुओं का द्वितीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ, जिसमें देश-विदेश के बौद्ध भिक्षुओं का जमावड़ा लगा था। इसी दौरान श्रीलंका से लाए बोधिवृक्ष को रोपित किया गया। इस मौके पर लाल नगर गांव में 84 फीट ऊंचे अशोक स्तंभ का निर्माण भी कराया जा रहा है।

निर्माण कार्य पूरा होने के बाद यह स्तंभ महान गौतम बुद्ध के 84 हजार उपदेशों का संदेश देगा। 31 मार्च को अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन के दौरान धम्म स्थल पर पांच देशों के पौधे रोपित किये गए। इस दौरान सारनाथ की तरह चार मुख वाले शेरो की प्रतिमा के सामने पांच तीर्थ स्थलों का पौधा बोधि वृक्ष पीपल लगाया जाएगा। पहले मुख के सामने नेपाल, दूसरे मुख के सामने तथागत की जन्म स्थली लुम्बिनी, तीसरे मुख के सामने ज्ञान स्थली बोधगया और चौथे मुख के सामने महा परिनिर्वाण स्थली कुशीनगर से लाए गए पौधे रोपित होंगे। उपासक विजय बौद्ध द्वारा श्रीलंका से लाए गए पौधे को बीच में रोपित किया गया है।

पूर्व दलित आईपीएस अधिकारी प्रेम प्रकाश भाजपा में शामिल

भाजपा ज्वाइन करते पूर्व आईपीएस प्रेम प्रकाशखुद को सबसे बड़ा अंबेडकरवादी होने का दावा करने वाले तमाम बड़े अधिकारियों में भाजपा ज्वाइन करने की होड़ लगी है। बृजलाल,असीम अरुण और विजय कुमार के बाद अब पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रेम प्रकाश ने भाजपा ज्वाइन कर लिया है। प्रेम प्रकाश ने 21 मई को यूपी के उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक के सामने भाजपा की सदस्यता ली। प्रेम प्रकाश डीआईजी के पद पर रहे हैं। प्रेम प्रकाश की गिनती उन अफसरों में होती है जो दलितों के अधिकार और अंबेडकरवादी मिशन के लिए समर्पित रहे हैं। ऐसे में उनका भाजपा ज्वाइन करना अंबेडरवादी समाज को हजम नहीं हो रहा है।

दिल्ली के रहने वाले प्रेम प्रकाश साल 1993 बैच के अफसर हैं। वह आगरा, मुरादाबाद में पुलिस अधीक्षक रह चुके हैं। साल 2009 में प्रेम प्रकाश को राजधानी लखनऊ में DIG का जिम्मा संभाला था। वह काफी चर्चित आईपीएस अधिकारी रहे हैं। वह प्रयागराज जोन के डीजीपी भी रह चुके हैं। नौकरी के फ्रंट की बात करें तो उन्हें काबिल, ईमानदार और धाकड़ पुलिस अधिकारी की रही है। माना जाता रहा है कि प्रेम प्रकाश खांटी अंबेडकरवादी अफसर हैं। एक समय में वह बसपा के भी करीब रह चुके हैं। प्रेम प्रकाश की बेटी बहुजन समाज पार्टी से विधानसभा चुनाव भी लड़ चुकी है।

पिछले कुछ दिनों से ही प्रेम प्रकाश के भाजपा में शामिल होने की खबरें आ रही थी। जब भाजपा पर संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने का आरोप विपक्ष द्वारा लगाया जा रहा है, ऐसे में प्रेम प्रकाश जैसे चेहरों को शामिल कर भाजपा ने एक बड़ा दांव चला है। लेकिन देखना यह होगा कि सजग अंबेडकरवादी भाजपा के खेमे में जाने वाले प्रेम प्रकाश और उनकी बातों पर कितना भरोसा जताता है।

यहां सवाल यह भी है कि सालों तक खुद को अंबेडकरवादी होने का दम भरने वाले तमाम अधिकारी रिटायरमेंट के बाद समाज के बीच जाकर काम करने और उन्हें जागरूक करने की बजाय, सत्ताधारी दलों का रुख ही क्यों कर रहे हैं? वह भी ऐसे दल की जिसकी विचारधारा के वह आलोचक रहे हैं। अंबेडकरी विचारधारा के लिए निश्चित तौर पर यह चिंता की बात है।

भगवान बुद्ध ने घर क्यों छोड़ा, जानिये सही जवाब

23 मई को बुद्ध पूर्णिमा यानी तथागत बुद्ध की जयंती है। इस अवसर पर आइए हम जानें और समझें कि सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) ने अपना गृह त्याग क्यों किया था। सिद्धार्थ गौतम कपिलवस्तु और शाक्य गणराज्य को अपनी 29 वर्ष की आयु में त्याग कर प्रव्रजित हो गये थे। 534 ईसा पूर्व में सिद्धार्थ द्वारा इस गृह त्याग की घटना को ‘महाभिनिष्क्रमण’ कहा गया है।

उनके द्वारा गृह- त्याग के क्या कारण थे इस बारे में कई बातें प्रचलित हैं। ब्राह्मणवादी लेखकों और साहित्यकारों ने कहा है कि सिद्धार्थ गौतम आधी रात को अपनी खूबसूरत पत्नी यशोधरा और अपने सुन्दर बालक राहुल को छोड़कर चुपचाप घर से बाहर निकल गए थे। इस सम्बन्ध में बौद्ध धर्म-ग्रंथों में भी कई तरह की भिन्न- भिन्न बातें वर्णित हैं। बौद्ध ग्रंथ दीघनिकाय, निदान कथा, ललित विस्तर और बुद्ध चरित में गृह त्याग के प्रसंग में काफी सरस एवं विस्तार से चर्चा की गई है। बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक भगवान बुद्ध और उनका धर्म (दि बुद्ध एण्ड हिज धम्म) में भी अभिनिष्क्रमण पर विस्तार से गंभीर चर्चा की है।

राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के गृह त्याग सम्बन्ध में बौद्ध ग्रंथों में आए विवरणों से तीन कारणों का पता चलता है- 1. सिद्धार्थ ने अपने महल से उद्यान और खेतों की ओर जाने के समय बारी- बारी से बुढ़े व्यक्ति, रोग ग्रस्त व्यक्ति और शव-यात्रा में मृत व्यक्ति को देखा तो उनके मन में अपने गृहस्थ जीवन एवं मानव जीवन में आने वाले दुखों के प्रति घोर निराशा एवं उपेक्षा की भावना पैदा हो गई। सुत्तनिपात के पब्बज्या सुत्त में कहा गया है कि उसके बाद सिद्धार्थ को गृहस्थाश्रम अड़चनों एवं कूड़े- कचरे की जगह प्रतीत होने लगी और तब उन्होंने परिव्राजक होने का निर्णय लिया था।

2.जातक अट्टकथाओं में वर्णित है कि अपने राजमहल से उद्यान भूमि की ओर जाते समय सिद्धार्थ गौतम ने एक परिव्राजक (श्रमण संत) को देखा। तब उन्होंने अपने सारथी से पूछा कि यह कौन है। तो सारथी ने परिव्राजक के गृह-त्याग करने और उसके गुणों की चर्चा की। ऐसा सुनकर सिद्धार्थ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और परिव्राजक बनने का भाव उनमें पैदा हुआ।

3. जातक अट्टकथा में ऐसा विवरण है कि सिद्धार्थ गौतम के सगे-संबंधियों अर्थात शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के जल बंटवारे को लेकर एक- दूसरे से लड़ने तथा युद्ध के लिए शस्त्र धारण किए जाने एवं खून-खराबे होने की संभावना से वे चिंतित एवं भयभीत हुए। इस कारण से वे शाक्य संघ की बैठक में कोलियों के विरुद्ध युद्ध करने के निर्णय के खिलाफ में खड़े हो गए और अंततः उन्हें राज्य छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा और गृह त्याग करना पड़ा।

इन उपर्युक्त कारणों पर गंभीरता से विचार करते हुए बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने कहा है कि परम्परागत उत्तर है कि सिद्धार्थ गौतम ने प्रव्रज्या इसलिए ग्रहण की थी क्योंकि उन्होंने एक वृद्ध पुरुष, एक रोगी व्यक्ति तथा एक मुर्दे की लाश को देखा था। यह उत्तर गले के नीचे उतरने वाला नहीं है। प्रव्रज्या लेकर गृह-त्याग करने के समय उनकी आयु 29 वर्ष की थी। क्या इसके पहले उन्होंने कभी भी किसी बुढ़े, किसी रोगी और किसी मृत व्यक्ति को नहीं देखा था जबकि जीवन की ऐसी घटनाएं प्रति दिन सैकड़ों-हजारों में घटती रहती हैं। इसलिए यह कारण तर्क की कसौटी पर सत्य प्रतीत नहीं होती है।

दूसरा, परम्परागत उत्तर है कि 29 वर्ष की आयु में ही पहली बार सिद्धार्थ गौतम ने रास्ते में आते हुए परिव्राजक यानी गृहत्यागी मुनि को देखकर और उनके गुणों को अपने सारथी से जानकर गृह त्याग करने का निर्णय लिया था। यह कारण भी तर्क और तथ्य के आधार पर सही प्रतीत नहीं होती है, क्योंकि सिद्धार्थ बचपन से ही प्रायः अपने पिता के साथ खेतों और उद्यान भूमि की ओर जाया करते थे। इसके अलावा वे आठ वर्ष की आयु से ही कपिलवस्तु में स्थित परिव्राजक भारद्वाज के आश्रम में जाकर विचारों की एकाग्रता, योग और समाधि की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। ऐसा संभव ही नहीं है कि उन्हें 29 वर्ष की आयु में पहली बार परिव्राजक का दर्शन हुए थे और उनके गुणों की जानकारी उन्हें मिली थी।

बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने गृह त्याग के तीसरे कारण को सत्य मानते हुए उसकी विस्तार से चर्चा की है। सिद्धार्थ गौतम ने 20 वर्ष की आयु में 543 ईसा पूर्व में शाक्य गणराज्य के संघ में दीक्षा ली थी, क्योंकि वहां बीस वर्ष की आयु में प्रत्येक शाक्य युवा को संघ की सदस्यता की दीक्षा लेना एक अनिवार्य नियम था। आठवें साल तक उन्होंने एक ईमानदार और वफादार सदस्य के रूप में संघ की बैठकों और कार्यवाहियों में हिस्सा लिया। किन्तु सदस्यता के आठवें वर्ष में शाक्य और पड़ोसी कोलिय गणराज्य के बीच में विवाद खड़ा हो गया।

रोहिणी नदी दोनों राज्यों के बीच विभाजक- रेखा थी। दोनों ही राज्य उसके पानी से अपने- अपने खेत की सिंचाई करते थे। हर साल फसलों के समय में जल के बंटवारे और उपयोग को लेकर दोनों के बीच विवाद, झगड़े और लड़ाईयां हो जाते थे। 534ई पूर्व में भी दोनों राज्यों के नौकरों के बीच मार- पीट हो गई और दोनों पक्षों के लोगों को चोटें लगीं। इस पर शाक्यों को गहरा आक्रोश हुआ और वे युद्ध करने के लिए तैयार हो गए। गणराज्य के संघ की बैठक बुलाई गई जिसमें सेनापति ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध करने का प्रस्ताव सामने रखते हुए सदस्यों से समर्थन करने की मांग की। संघ के सभी सदस्य चुपचाप बैठे रहे, किन्तु सिद्धार्थ गौतम ने अपनी असहमति जताते हुए कहा कि- “मैं इस प्रस्ताव का विरोध करता हूं। युद्ध से कभी किसी समस्या का समाधान नहीं होता है। युद्ध छेड़ देने से हमारे लक्ष्य की पूर्ति नहीं होगी। इससे एक दूसरे युद्ध का बीजारोपण हो जायेगा। जो किसी की हत्या करता है, उसे कोई दूसरा हत्या करने वाला मिल जाता है। जो किसी को जीत लेता है उसे कोई दूसरा जीतने वाला मिल जाता है, जो किसी को लूटता है उसे कोई दूसरा लूटेरा लूट लेता है।”

सिद्धार्थ ने युद्ध को टालने और समस्याओं के समाधान के लिए अपना एक प्रस्ताव दिया कि- दोनों पक्षों से दो-दो पंच चुने जाएं और वे चारों पंच मिल कर पांचवें पंच का चुनाव कर लें और तब वे झगड़े के निपटारे के लिए जो भी सुझाव दें दोनों राज्य उसे मान लें। किन्तु संघ के बहुसंख्यक सदस्यों ने इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया और युद्ध करने के सेनापति के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।

दूसरे दिन सेनापति ने फिर से संघ की बैठक बुलाई जिसमें उसने अनिवार्य सैनिक भर्ती का प्रस्ताव रखा। उसने प्रस्ताव दिया कि 20 वर्ष से 25 वर्ष की आयु के सभी शाक्य कोलियों के विरुद्ध युद्ध में शामिल होने के लिए सेना में अनिवार्य रूप से भर्ती हों। अब युद्ध का विरोध करने वाले सिद्धार्थ सहित सभी अल्पसंख्यक शाक्य सदस्यों के सामने मुश्किल खड़ी हो गई। जब सिद्धार्थ ने देखा कि उसके समर्थक बहुमत के सामने मौन हैं तो उन्होंने खड़े होकर कहा कि “मित्रों,आप जो चाहें कर सकते हैं, क्योंकि आपके साथ बहुमत है। मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि मैं सेना में भर्ती नहीं होऊंगा और न युद्ध में भाग लूंगा।”

सेनापति ने उन्हें दीक्षा के समय लिए गए शपथ की याद दिलाई, किन्तु सिद्धार्थ पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। सेनापति ने कहा कि संघ के फैसले का विरोध करने के कारण कोशल के राजा की अनुमति के बिना तुम्हें फांसी या देश से निष्कासन की सजा तो हम नहीं दे सकते, किन्तु संंघ तुम्हारे परिवार का सामाजिक बहिष्कार करने एवं परिवार के खेतों को जब्त कर लेने की सजा दे सकता है। इसके लिए हमें कोशल के राजा की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।

ऐसी विषम परिस्थिति में सिद्धार्थ गौतम ने एक दृढ़ फैसला लिया कि वे युद्ध में भाग नहीं लेंगे और न ही परिवार का बहिष्कार होने तथा उनकी खेतों को जब्त कर लेने की सजा देने देंगे। उन्होंने संघ से कहा कि संघ की नजर में वे स्वयं दोषी हैं इसलिए उन्हें ही या तो फांसी की सजा दी जाए या देश से निष्कासित कर दिया जाए। वे या उनके परिवार के लोग कोशल नरेश से इस सम्बन्ध में कोई शिकायत नहीं करेंगे। इस पर सेनापति ने कहा कि चाहे तुम या तुम्हारे परिवार के सदस्य कोशल नरेश से कोई शिकायत न भी करें तब भी फांसी या देश से निकल जाने की सूचना उन्हें मिल ही जायेंगी और तब कोशल के राजा शाक्य गणराज्य के विरुद्ध दण्डात्मक कार्रवाई अवश्य करेंगे। उसके बाद सिद्धार्थ गौतम ने परिव्राजक बन कर देश से बाहर चले जाने की बातें संघ के सामने रखा और कहा कि इसके लिए वे अपने माता-पिता और पत्नी की अनुमति प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। उन्होंने संघ को यह भी विश्वास दिलाया कि चाहे परिवार के लोगों की अनुमति उन्हें मिले या न मिले, फिर भी वे परिव्राजक बन कर शाक्य गणराज्य से बाहर चले जाएंगे। संघ ने उनकी बातों को स्वीकार कर लिया।

जब सिद्धार्थ महल में गए तो माता-पिता, पत्नी सहित सभी काफी दुख में डुबे हुए थे। किन्तु अनेक वाद-विवाद के बाद सभी अंततः राजी हो गए कि सिद्धार्थ प्रव्रज्या ग्रहण करेंगे। पत्नी यशोधरा ने सिद्धार्थ से कहा कि “हमें वीरतापूर्वक इस परिस्थिति का मुकाबला करना चाहिए और वह केवल इतना चाहती है कि आप किसी ऐसे नये मार्ग का आविष्कार करें जो शान्ति और मानवता के लिए कल्याणकारी हों।” उसके बाद दूसरे दिन सिद्धार्थ गौतम ने निकट के भारद्वाज आश्रम में जाकर उनसे प्रव्रज्या ग्रहण की जहां हजारों की संख्या में स्त्री- पुरुष पहले से जमा हो गए थे । अनुनय के साथ सभी लोगों को घर वापस भेज कर परिव्राजक सिद्धार्थ गौतम अपने सारथी छन्न के साथ कन्थक घोड़े पर सवार होकर अनोमा नदी के किनारे पहुंचे और फिर उन्हें वापस भेज कर स्वयं राजगृह की ओर प्रस्थान कर गए।

हिंसा, युद्ध और अशांति के विरुद्ध अहिंसा,मानवता एवं शांति की खोज के लिए सिद्धार्थ गौतम ने अपने सारे स्वार्थों को त्यागकर गृह त्याग किए थे, इसलिए इस गृह- त्याग की घटना को महाभिनिष्क्रमण (महान उद्देश्य के लिए किया गया गृह त्याग) कहा गया है।

छपरा में लालू की बेटी और राजीव प्रताप रुढ़ी के समर्थकों में बवाल, एक की मौत

बिहार के छपरा में मंगलवार को हंगामा हो गया। यहां भाजपा नेता राजीव प्रताप रुड़ी और राजद की प्रत्याशी और लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य के समर्थकों के बीच जमकर मारपीट हुई और हंगामा हो गया। इस दौरान गोली भी चली, जिसमें दो लोग गंभीर रूप से घायल हो गए जबकि एक शख्स की मौत हो गई। घटना के बाद प्रशासन की ओर से छपरा में दो दिनों के लिए इंटरनेट बंद कर दिया गया है।

20 मई को पांचवे चरण में बिहार के छपरा में चुनाव हुआ है। इस दौरान बूथ संख्या 118 पर मतदान के वक्त तनाव बढ़ गया। दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। हालांकि तब मामला शांत हो गया। लेकिन चुनाव के बाद दूसरे दिन मंगलवार 21 मई की सुबह कुछ लोग भिखारी ठाकुर चौक पर चाय पी रहे थे। इसी दौरान दूसरे पक्ष के लोग आएं और विवाद को बढ़ा दिया और गोलीबारी हो गई। जिसमें बड़ा तेलपा मोहल्ले के चंदन राय को गली लगने से मौत हो गई। जबकि बड़ा तेलपा निवासी गुड्डू राय और मनोज राय जख्मी हो गया। इस मामले में पुलिस ने भाजपा नेता रमाकांत सिंह सोलंकी को हिरासत में लिया है। एसपी गौरव मंगला ने मामले की पुष्टि की है।

 

हिन्दुस्तान की खबर के मुताबिक सोमवार को जब रोहिणी आचार्य बूथ पर पहुंची तो कुछ लोग उन्हें चिल्ला-चिल्ला कर अभद्र बातें बोल रहे थे। गाली-गलौज करने वालों को भाजपा समर्थक बताया जा रहा है। इसके बाद मामला बढ़ गया। कहा जा रहा है कि लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य के सारण सीट पर चुनाव लड़ने से भाजपा के वर्तमान सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी को कड़ी टक्कर मिल रही है, जिससे भाजपा समर्थक बौखलाए हुए हैं।

मुस्कान राजभर बनी 10वीं में टॉपर, राजभर समाज का नाम किया ऊंचा

बीते 13 मई को जब उत्तर प्रदेश में 10वीं के परिणाम घोषित हुए तो अंबेडकर नगर के अकबरपुर में कुंवर बहादुर राजभर और रीना राजभर के घर पर ढोल-नगारे बजने लगे। उनकी बेटी मुस्कान राजभर ने 97.02 प्रतिशत अंक लाकर अपने परिवार और राजभर समाज का नाम रौशन कर दिया। मु्स्कान को मिले अंकों की बात करें तो मुस्कान ने अंग्रेजी में 96, हिन्दी में 97, मैथ में 99, साइंस में 96, सोशल साइंस में 98 और कंप्यूटर एप्लीकेशन में 98 नंबर हासिल किया है। साथ ही सभी विषयों में उसे A 1 ग्रेड मिला है।

मुस्कान राजभर लखनऊ के इंदिरा नगर में स्थित रानी लक्ष्मीबाई हाई स्कूल की छात्रा हैं। लखनऊ में टॉपर का प्रतिशत 98 परसेंट रहा है और मुस्कान बस उससे कुछ ही कदम दूर रह गई हैं।

सबसे नीचे की लाइन में चौथे नंबर पर मुस्कान राजभरहालांकि मुस्कान की सफलता उस सपने के पूरा होने जैसा भी है, जिसे भारत के संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर और तमाम अन्य सामाजिक न्याय के पक्षधर नेताओं ने देखा था। मुस्कान अपने परिवार की दूसरी पीढ़ी हैं, जिसे पढ़ने का मौका मिला है। मुस्कान राजभऱ अंबेडकर नगर जिले के अकबरपुर स्थित गांव नासिरपुर वरवां की रहने वाली है। उसके दादा मुरली राजभर एक किसान थे, जबकि दादी रामरती राजभर घर संभालने और किसानी में पति का हाथ बंटाने वाली एक सामान्य महिला।

कुंवर बहादुर राजभर और रीना राजभर की बेटी मुस्कान राजभर की मार्क शीटमुस्कान राजभर के पिता कुंवर बहादुर राजभर परिवार में शिक्षा हासिल करने वाले पहली पीढ़ी के लोग थे और मुस्कान दूसरी पीढ़ी हैं। इस बीच मुस्कान के साथ-साथ देश के तमाम हिस्सों से वंचित तबकों के बच्चों के दसवीं और 12वी की परीक्षा में टॉपर बनने की खबरें आ रही है। वंचित समाज के बच्चों की यह सफलता बताती है कि बराबरी का मौका मिले तो वंचित समाज सफलता का इतिहास लिखने में पीछे नहीं हटेगा। मुस्कान और ऐसे तमाम टॉपर बच्चों को दलित दस्तक की ओर से बधाई।

बुजुर्ग दलित दंपत्ति को खंभे से बांधा, जूतों की माला पहनाई

भारत का कानून क्या कहता है? अगर कोई दोषी हो तो उसके मां-बाप को सजा दी जाए? बिल्कुल नहीं। लेकिन मध्य प्रदेश में ऐसा ही हुआ है। बेटे पर छेड़खानी का आरोप था, लेकिन जातिवादियों ने उसके बुजुर्ग माता-पिता को सजा दे दी। पहले उन्हें पीटा गया, फिर जबरन जूतों की माला पहना कर उनकी सार्वजनिक तौर पर बेइज्जती की गई। घटना मध्य प्रदेश के अशोक नगर जिले की है। आरोप है कि दंपत्ति के बेटे ने एक शख्स की पत्नी के साथ छेड़खानी की थी। इसके बाद इस परिवार को दबाव और मजबूरी में गांव छोड़कर जाना पड़ा था। हाल ही में वह परिवार वापस गांव आया था। जिसके बाद शुक्रवार 17 मई 2024 को यह घटना घटी। युवक के 65 साल के पिता और 60 साल की मां को एक खंभे से बांध दिया गया। इसके बाद उनकी पिटाई की गई और उन्हें जूतों की माला पहनने के लिए मजबूर किया गया।

 

घटना से आहत पीड़ित महिला ने पुलिस से शिकायत की, जिसके बाद पुलिस ने 10 लोगों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। आरोपियों पर आईपीसी की धारा 147, 149, 323, 294 और 506 के तहत और एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ है।

शोषक और शोषितों का रिश्ता

संत रैदास के बारे में कहानी है कि एक ब्राह्मण उनसे जूते बनवाता है, रैदास उससे पैसे नहीं लेते हैं। तब वो ब्राह्मण उनसे साथ में गंगा स्नान हेतु चलने का आग्रह करता है। रैदास कहते हैं समय नहीं है आप ही जाइए और गंगा को मेरी तरफ से ये एक सुपारी भेंट कर आइयेगा। ब्राह्मण जाता है और अनमने ढंग से सुपारी गंगा में उछालकर फेंकता है। तब गंगा स्वयं प्रगट होती हैं और ब्राह्मण को बदले में एक रत्नजडित कंगन देती हैं। ये कहानी आग की तरह काशी भर में फ़ैल जाती है और रैदास का प्रताप चारों तरफ फैलने लगता है।

गुस्साए ब्राह्मण रैदास को विवश करते हैं कि अगर तुम्हारी भक्ति सच है तो दुसरा कंगन लाकर दिखाओ। तब रैदास जूता बनाने के स्थान पर ही भजन गाने बैठ जाते हैं और उनकी जूते बनाने वाले बर्तन के पानी में गंगा प्रगट होती हैं और उन्हें दुसरा कंगन दे कर चली जाती हैं। ये देखकर ब्राह्मण रैदास से माफ़ी मांगते हैं उन्हें प्रणाम करते हैं।

इस कहानी का मतलब क्या है? ऐसी सैकड़ों कहानियां हैं। और इनसे हुआ क्या? क्या बदल गया? दलितों की जिंदगी और भारत के समाज में क्या बदलाव हो गया? इसके बाद से आज तक ब्राह्मण और रैदास के भक्त दोनों के एक-दूसरे के प्रति व्यवहार में क्या बदलाव हुआ? ये दोनों एक-दूसरे के साथ क्या कर रहे हैं? क्या उस दिन गलती मान लेने और माफ़ी मांग लेने के बाद ब्राह्मणों ने दलितों से रोटी बेटी का रिश्ता शुरू कर दिया ? क्या मंदिरों में दलित पुजारी बैठ सके?

शोषक और शोषित का रिश्ता ऐसे ही चल रहा है। फिर भी दलित और शूद्र मंदिर, जगराते, पंडालों, कथाओं में जा रहे हैं और अपमानित हो रहे हैं। जिस धर्म में उन्हें इंसान नहीं समझा जाता वहीं वे बार-बार याचना और मदद की गुहार लेकर पहुँच जाते हैं। ये कब तक चलेगा? डॉ. अंबेडकर की बात दलितों और ओबीसी (शूद्र) को कब समझ आयेगी? ये लोग बौद्ध धर्म की महाक्रान्ति को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?

भक्ति और संत परम्परा ने जो कुछ किया वो फिर से ब्राह्मणवाद द्वारा चबाकर पचा लिया गया है। किसी भी ज्ञात सन्त या गुरु को उसकी महानता, चमत्कार या योगदान सहित “उसकी सही जगह” पर ठिकाने लगाया जा चुका है। कबीर, रैदास और दूसरे सन्तों की यही हालत हो चुकी है। भक्ति या सामाजिक चेतना के विमर्श में वे कितने ही श्रेष्ठ बताए जाते हों, लेकिन उनसे जुड़ जाने भर ही से ब्राह्मणवाद से बच जाने की कोई विशेष संभावना नहीं है। लेकिन तथागत बुद्ध का मामला कुछ और ही है। बुद्ध के मार्ग पर आते ही ब्राह्मणवाद का जाल कटने लगता है। लोगों के व्यक्तिगत पारिवारिक और सामाजिक जीवन में गज़ब का बदलाव होता है।

मैंने कई राज्यों में जनजातीय समाज के मित्रों को ईसाई धर्म ग्रहण के बाद देखा है। उनमें एक पीढ़ी के बाद अंतर साफ नजर आता है। वे गुलाम, मजदूर की मानसिकता से निकलकर अधिकारचेता नागरिक बन जाते हैं। अनुसूचित जाति और ओबीसी के लोगों को बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद भी यही फर्क आता है। बल्कि ये फर्क पहले उदाहरण से बड़ा फर्क होता है, ज्यादा गहरा फर्क होता है। अचानक पूरे भारत का भूगोल, इतिहास और परम्परा पर उन्हें एक अधिकार महसूस होने लगता है। वे पहली बार भारतीय बनते हैं। वे पहली बार अपनी जड़ों से जुड़ते हैं और उन्हें आत्मसम्मान महसूस होता है।

टॉपर बनी दलित बेटी, तामिलनाडु के 10वीं बोर्ड में 500 में से 400 अंक किया हासिल

डी. काविया, जिसने तामिलनाडु 10वीं बोर्ड परीक्षा में 500 में से 499 अंक लाकर टॉप कियाखबर के साथ लगी इस तस्वीर को देखिए। गर्मी में झुलसा मुस्कुराता हुआ यह चेहरा दलित समाज की बेटी डी. काविया जानी का है। 10 मई 2024 को घोषित तामिलनाडु स्टेट बोर्ड के 10वीं के नतीजों में काविया 500 में से 499 अंक लेकर टॉपर बनी हैं। काविया की यह सफलता खास है क्योंकि यह सफलता उन्होंने उस परिस्थिति में हासिल किया है, जब ज्यादातर लोगों के सपने दम तोड़ देते हैं। काविया के पिता डी. धर्मराज एक वेल्डर हैं, कोयंबटूर में कांट्रक्ट पर वेल्डिंग का काम करते हैं, जबकि मां डी. वासंती एक ग्रोसरी की दुकान में काम करती हैं। दोनों मिलकर महीने का 13 हजार रुपये कमा पाते हैं। पर उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई रुकने नहीं दी। लेकिन अगर मां-बाप को बेटी को पढ़ाने का जिद थी, तो बेटी काविया को भी पढ़ने का जुनून था। स्कूल पहुंचने के लिए वह हर रोज पब्लिक ट्रांसपोर्ट से 15 किलोमीटर का सफर तय करती थी। नतीजे बता रहे हैं कि तीनों की मेहनत रंग लाई और नतीजा सामने है।

काविया की इस सफलता के पीछे उसके माता-पिता का जुनून और संघर्ष दोनों रहा है। आर्थिक दिक्कतों के बावजूद उन्होंने अपनी दोनों बेटियों, टॉपर बनी काविया और उसकी बहन अक्षया की पढ़ाई नहीं रुकने दी। काविया का सपना आईएएस अधिकारी बनने का है। दरअसल यह परिवार तामिलनाडु राज्य के कामुथी के पास रामनाथपुरम जिले के जिस पेराईयुर गांव का रहने वाला है, वहां लोग लड़कियों को एक उम्र के बाद स्कूल भेजने से कतराते हैं। यह क्षेत्र अब भी बाल विवाह के चुंगल से पूरी तरह निकल नहीं पाया है। इन सामाजिक बुराईयों ने काविया के मन को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। काविया की मां ने बताया कि वह बड़ी अधिकारी बनकर तमाम सामाजिक बुराईयों को दूर कर सकती है। और जब काविया तीसरी क्लास में थी, तभी उसने आईएएस ऑफिसर बनने का सपना देखा, ताकि वह समाज को सुधार सके। 10वीं के नतीजों से उत्साहित काविया आईएएस बनने के अपने सपने को पूरा करने की राह पर चल पड़ी हैं। उसने 12वीं के लिए कामर्स और हिस्ट्री जैसे विषय चुने हैं। काविया के माता-पिता को उम्मीद है कि उनकी बेटी का सपना पूरा होगा। उन्होंने तामिलनाडु की सरकार से बेटी की पढ़ाई में मदद के लिए गुहार भी लगाई है। देखना होगा के.स्टॉलीन की सरकार क्या मदद करती है।

 

एक बात और, काविया जैसी बेटियां दलित समाज का रोल मॉडल होनी चाहिए। निश्चित तौर पर ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और बाबासाहेब आंबेडकर जैसे महानायक ऐसे ही नई पीढ़ी की कल्पना करते थे। दलित दस्तक की ओर से काविया को बधाई और उसके सपनों के लिए मंगलकामनाएं।

कनाडा की संसद में गूंजा ‘जय भीम’

canadian-ambedkarite-celebrate-ambedkar-jayanti

बीते 6 मई को कनाडा की संसद में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की जयंती को डॉ. आंबेडकर इक्वालिटी डे यानी समानता दिवस के रूप में मनाया गया। इस मौके पर कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका के दो सौ से ज्यादा प्रतिनिधि मौजूद थे। 6 और 7 मई को दो दिवसीय यह कार्यक्रम कनाडा के ओटावा के पार्लियामेंट हिल में हुआ। कार्यक्रम के पहले दिन 6 मई को सरि सेंटर से एमपी रंदीप सराय (MP Randeep Sarai Surrey Center)ने हाउस ऑफ कॉमन्स में कार्यक्रम का जिक्र किया और वहां मौजूद अंबेडकरवादियों का अभिवादन किया।

जबकि वैंकुअर किंग्सवे के मेजबान एमपी एमपी डॉन डेविस ने कनाडा की संसद में डॉ. आंबेडकर के द्वारा किये गए कामों का जिक्र करते हुए उनकी महानता बताई। उन्होंने अपने संबोधन के आखिर में जय भीम कहा।

कार्यक्रम का आयोजन कनाडा में अंबेडकवरादियों के संगठन चेतना एसोसिएशन ऑफ कनाडा और आंबेडकराइट इंटरनेशनल कोआर्डिनेशन सोसाइटी यानी AICS ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम का उद्घाटन बौद्ध भिक्षु भंते सरनपाल ने किया। इस दौरान कार्लटन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जंगम ने कनाडा में जाति के आंदोलन पर अपना प्रेजेंटेशन दिया। उन्होंने डॉ. आंबेडकर को नोबेल पुरस्कार देने की मांग भी की। इस मौके पर संसद सदस्य डेविस और मनदीप सराय सहित पूर्व सांसद फ्रैंक बेलीस, एमपी चंद्र आर्य, एमपी सुख धालीवाल, एमपी परम बैंस सहित मनोज भंगू और बिल बसरा को सम्मानित किया गया।

बता दें कि चेतना एसोसिएशन और आंबेडकराइट इंटरनेशनल को-आर्डिनेशन सोसाइटी यानी AICS लंबे समय से कनाडा में बाबासाहेब आंबेडकर के मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। ये दोनों संगठन कनाडा में अंबेडकरवादी समाज के लोगों के साथ होने वाले गैर बराबरी और जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को लेकर लगातार आवाज उठाते हैं।

साल 2023 में दोनों संगठनों ने वैंकुअर में बाबासाहेब की जयंती के मौके पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजि भी किया था, जिसकी दुनिया भर में चर्चा हुई थी। विषय था- Dr. Ambedkar International Symposium on Emancipation and Equality Day Celebrations.

इस मौके पर भारत, कनाडा और अमेरिका सहित अन्य देशों से अंबेडकरवादी एवं समानता के समर्थक बड़ी संख्या में शामिल हुए थे। इस बार कनाडा के अंबेडकरवादियों की यह मुहिम कनाडा की संसद तक पहुंच गया है। निश्चित तौर पर कनाडा की संसद में डॉ. आंबेडकर को याद किया जाना और इस दिन को इक्वालिटी डे के रूप में मान्यता मिलना अंबडकरी आंदोलन के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। चेतना एसोसिएशन और AICS और इसके तमाम साथी इसके लिए बधाई के पात्र हैं। भारत से दलित दस्तक उनको जय भीम कहता है

केजरीवाल को जमानत, आदिवासी नेता हेमंत सोरेन को क्यों नहीं?

 हेमंत सोरेन एवं उनकी पत्नीसुप्रीम कोर्ट में आज दो महत्वपूर्ण सुनवाई थी। एक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तो दूसरी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की। इसमें अरविंद केजरीवाल को जमानत मिल गई है, लेकिन हेमंत सोरेन को मिली तारीख। हेमंत सोरेन के बारे में अब सुप्रीम कोर्ट 13 मई को सुनवाई करेगा। इसके बाद यह बहस तेज हो गई है कि अगर अरविंद केजरीवाल को जमानत मिल सकती है तो आदिवासी समाज के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को क्यों नहीं?

दरअसल अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन दोनों ने लोकसभा चुनाव में  प्रचार करने को लेकर जमानत मांगी थी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल को एक जून तक जमानत दे दी है, जबकि हेमंत सोरेन को फिलहाल जमानत नहीं मिल सकी है। केजरीवाल को कथित शराब घोटेले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में 21 मार्च को ईडी ने गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद भी अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र नहीं दिया, न ही पार्टी के संयोजक पद से इस्तीफा दिया। जबकि दूसरी ओर कथित जमीन घोटाले में नाम आने के बाद हेमंत सोरेन ने नैतिकता दिखाते हुए राजभवन जाकर इस्तीफा दे दिया था। हेमंत सोरेन 31 जनवरी से जेल में हैं।

अब सवाल उठता है कि देश का कानून का ज्यादा पालन किसने किया, या फिर नैतिकता किसने दिखाई। घोटाले में नाम आने के बाद सीएम पद से इस्तीफा दे देने वाले हेमंत सोरेन ने या फिर घोटाले में नाम आने के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी को पकड़ कर बैठे अरविंद केजरीवाल ने? निश्चित तौर पर इसका जवाब हेमंत सोरेन है। ऐसे में दूसरा सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट से अरविंद केजरीवाल को जमानत मिल सकती है तो फिर आदिवासी समाज के हेमंत सोरेन को क्यों नहीं?

In Parliament of Canada, dr ambedkar jayanti recognized as “Dr Ambedkar Equality Day”

Canadian Ambedkarite celebrated ambedkar jayanti as Equality Day at the Parliament Hill ottawa by Chetna Association and AICS of Canada.

Ottawa: A sense of gratitude and pride was felt by more than two hundred delegates from across Canada and the United States of America who participated in the Dr. Ambedkar Equality Day and the Jayanti Celebration hosted by MP Don Davies (Vancouver-Kingsway) and MP Randeep Sarai (Surrey Center) on May 6 and 7 at Parliament Hill in Ottawa. For many delegates, it was their first time to visit Canada’s Parliament and participate in the educational sessions and celebrations of the many accomplishments of Baba Saheb Dr. Ambedkar.

On the opening day of celebrations, MP Sarai acknowledged the event and all delegates in his statement in the House of Commons and set a stage for the educational session and the celebration on the Parliament Hill. Sarai delivered a one-minute statement on Dr. Ambedkar’s contributions.

Canadian Ambedkarite celebrated ambedkar jayanti as Equality Day at the Parliament Hill by Canadian Ambedkarite celebrate ambedkar jayanti as Equality Day at the Parliament Hill by Chetna Association and AICS of Canada.A day after the event, on May 7, MP Davies read his statement in the House of Commons and described Dr. Ambedkar as a towering personality. Davies concluded his statement with the salutation, “Jai Bheem”, a history making moment to hear the salutation in the parliament outside of India for the first time!

The event, planned and organized by Chetna Association of Canada and AICS Canada (Ambedkarite International Coordination Society), was inaugurated by Venerable Bhante Saranpala, Urban Buddhist Monk. Bhante Saranpala, along with four of his colleagues, recited Buddhist prayers. Land acknowledgment and gratitude were expressed on behalf of the organizers by Jasmine Balley.Members of Chetna Association and AICS Canadian on the occasion of ambedkar jayanti celebration as Equality Day at the Parliament Hill Ottawa Canada.

The event included greetings by dignitaries and community leaders; a presentation on the caste movement across Canada by Professor Jangam of Carleton University; the host Members of Parliament MP Davies and MP Sarai; former member of parliament Frank Baylis: MP Chandra Arya (Nepean): MP Sukh Dhaliwal (Surrey Newton), and MP Param Bains (Steveston- Richmond East). Manoj Bhangu, and Bill Basra were presented with recognition awards for their services.

Manjit Bains, co-chair for the event representing Chetna Association of Canada described the purpose for hosting the event while Anand Balley described the history and contributions of AICS Canada. “We are pleased to see the action planning was a key component of the celebration”, says Bains.

Team members of chetna association and AICS on the occasion of ambedkar jayanti celebration as Equality Day at the Parliament Hill canada.“We applaud MP Davies and MP Sarai for their tremendous support in hosting the celebration and sharing their interest in working across the party lines to consider adding caste as a stand-alone category”, says Jai Birdi, executive director of Chetna Association of Canada and a director for steering the planning of the celebration.

Surjit Bains, a treasurer for the event, along with a prominent researcher Dr. Smita Pakhale, welcomed the delegates to the celebration.

Harjit Sohpaul (president of Shri Guru Ravidass Sabha, Vancouver), Ratan Jakhu (President, Shri Guru Ravidass Sabha Montreal), Kuldeep Kailey (General Secretary, Shri Guru Ravidass Sabha Ontario), Makhan Tut/Deo (Mamta Foundation Canada), Roop Lal Chetna association general secretary Jai Birdi with MP Don Davies (Vancouver Kingsway)Gaddu (ex-president, AISRO), Rashpaul Bhardwaj (president, AISRO), Prof. Arun Gautam (AIM Canada, Toronto), Gopal Lohia (of Shri 108 Sant Sarwan Dass Charitable Trust Western Canada and Punjabi Mela) represented their organizations and shared their greetings for the occasion.

Rajesh Angral, who contested in the Alberta Provincial Elections for the NDP, was also present and took notes of the proceedings. Dr. Paramjit Chumber and Dr. Harjinder Kumar of USA shared their poems.

Santokh Jassi, a journalist based in Montreal, explained the prominence of Baba Sahib Dr. Ambedkar and why he should be nominated for the Nobel prize. Ratan Jakhu also included this sentiment in his message.Canadian Ambedkarite celebrated ambedkar jayanti as Equality Day at the Parliament Hill ottawa by Chetna Association and AICS of Canada.

High Commissioner of India, His Excellency Shri Sanjay Kumar Verma, was expected to be present and grace the occasion.

“However, I started receiving calls from some of the dignitaries in this room that they will not be able to attend the event if the High Commissioner is present. I spoke to His Excellency Shri Sanjay Kumar Verma in this regard. Considering the significance of this event, His Excellency agreed not to join us. However, he sends his best wishes for the success of the occasion and pays his tribute to the father of Indian Constitution Dr. Bhim Rao Ambedkar”, announced Birdi.Canadian Ambedkarite celebrated ambedkar jayanti as Equality Day at the Parliament Hill ottawa by Chetna Association and AICS of Canada.

“As the High Commissioner Verma was not present, the organizers presented the recognition award to his delegate for his ‘outstanding leadership’ on the following day,” continued Birdi. Several other dignitaries, including an MP of Bloc Quebecoise, participated and networked with the participants and organizers.Canadian Ambedkarite celebrated ambedkar jayanti as Equality Day at the Parliament Hill by chetna foundation and AICS.


Press Release Issued by Chetna Association of Canada and AICS Canada

आकाश आनंद पर मायावती का कड़ा एक्शन, नेशनल को-आर्डिनेटर से हटाया, उत्तराधिकार भी होल्ड पर

बसपा सुप्रीमों मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के नेशनल को-आर्डिनेटर और अपने उत्तराधिकारी पद से हटा दिया है। सीतापुर में आकाश आनंद के उत्तेजक भाषण और कुछ अन्य मामलों में दिये उनके बयानों के बाद पिछले दिनों उनकी रैलियों पर रोक लगा दी गई थी। लेकिन उसके बाद 7 मई की रात को 9.38 बजे सोशल मीडिया एक्स पर एक बयान जारी करते हुए बहनजी ने आकाश को दोनों जिम्मादारियों से मुक्त कर दिया।