असली ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान की कहानी

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भारत में 19वीं सदी में जिन ठगों से अंग्रेज़ों का पाला पड़ा था, वे इतने मामूली लोग नहीं थे. ठगों के बारे में सबसे दिलचस्प और पुख़्ता जानकारी 1839 में छपी किताब ‘कनफ़ेशंस ऑफ़ ए ठग’ से मिलती है. किताब के लेखक पुलिस सुपरिटेंडेंट फ़िलिप मीडो टेलर थे लेकिन उन्होंने ‘इसे सिर्फ़ कलमबंद किया है.’ दरअसल, साढ़े पांच सौ पन्नों की किताब ठगों के एक सरदार आमिर अली खां का ‘कनफ़ेशन’ यानी इक़बालिया बयान है. फ़िलिप मीडो टेलर ने आमिर अली से जेल में कई दिनों तक बात की और सब कुछ लिखते गए. टेलर के मुताबिक, “ठगों के सरदार ने जो कुछ बताया, उसे मैं तकरीबन शब्दश: लिखता गया, यहां तक कि उसे टोकने या पूछने की ज़रूरत भी कम ही पड़ती थी.”

अब हम आपको बताते हैं कि आखिर कैसे थे असली ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान’.

टेलर ने लिखा है, “अवध से लेकर दक्कन तक ठगों का जाल फैला था, उन्हें पकड़ना इसलिए बहुत मुश्किल था क्योंकि वे बहुत ख़ुफ़िया तरीके से काम करते थे. उन्हें आम लोगों से अलग करने का कोई तरीका ही समझ नहीं आता था. वे अपना काम योजना बनाकर और बेहद चालाकी से करते थे ताकि किसी को शक न हो.”

उनके अपने रीति-रिवाज़, विश्वास, मान्यताएं, परंपराएं, उसूल और तौर-तरीक़े थे जिनका वे बहुत पाबंदी से धर्म की तरह पालन करते थे. उनकी अपनी एक अलग ख़ुफ़िया भाषा थी जिसमें वे आपस में बात करते थे. इस भाषा को रमासी कहा जाता था. गिरोह में हिन्दू और मुस्लिम दोनों होते थे.

चाहे हिंदू हों या मुसलमान, ठग शुभ मूहूर्त देखकर, विधि-विधान से पूजा-पाठ करके अपने काम पर निकलते थे, जिसे ‘जिताई पर जाना’ कहा जाता था. ठगी का मौसम आम तौर पर दुर्गापूजा से लेकर होली के बीच होता था. तेज़ गर्मी और बारिश में रास्तों पर मुसाफ़िर भी कम मिलते थे और काम करना मुश्किल होता था. जिताई पर जाने से सात दिन पहले से ‘साता’ शुरू जाता था. इस दौरान ठग और उनके परिवार के सदस्य खाने-पीने, सोने-उठने और नहाने-हज़ामत बनाने वगैरह के मामले में कड़े नियमों का पालन करते थे.

साता के दौरान बाहर के लोगों से मेल-जोल, किसी और को बुलाना या उसके घर जाना नहीं होता था. इस दौरान कोई दान नहीं दिया जाता था, यहां तक कि कुत्ते-बिल्ली जैसे जानवरों को भी खाना नहीं दिया जाता था. जिताई से सफल होकर लौटने के बाद पूजा-पाठ और दान-पुण्य जैसे काम होते थे. ठगी और लूटपाट के लिए हत्याएं भी की जाती थीं। इसके लिए भी कुछ नियम थे। पहला नियम यह था कि क़त्ल में एक बूंद भी खून नहीं बहना चाहिए, दूसरे किसी औरत या बच्चे को किसी हाल में नहीं मारा जाना चाहिए, तीसरे जब तक माल मिलने की उम्मीद न हो, हत्या बिल्कुल नहीं होनी चाहिए.

कैसे होती थी रास्ते पर ठगी: ——————– जिताई पर निकलने वाले ठगों का गिरोह 20 से 50 तक का होता था. वे आम तौर पर तीन दस्तों में चलते थे, एक पीछे, एक बीच में और एक आगे. इन तीनों दस्तों के बीच तालमेल के लिए हर टोली में एक-दो लोग होते थे जो एक कड़ी का काम करते थे. वे अपनी चाल तेज़ या धीमी करके अलग होते या साथ आ सकते थे. रास्ते में कई बार वो जरूरत के हिसाब से अपना रूप बदलते रहते थे। ठगों के सरदार आमतौर पर पढ़े लिखे इज़्ज़तदार आदमी की तरह दिखने-बोलने वाले लोग होते थे।

आमिर अली के मुताबिक ठगों के काम बंटे हुए थे. ‘सोठा’ गिरोह के सदस्य सबसे समझदार, लोगों को बातों में फंसाने वाले लोग थे जो शिकार की ताक में सरायों के आसपास मंडराते थे. वे आने-जाने वालों की टोह लेते थे, फिर उनके माल-असबाब और हैसियत का अंदाज़ा लगाकर उसे अपने चंगुल में फंसाते थे. शिकार की पहचान करने के बाद कुछ लोग उसके पीछे, कुछ आगे और कुछ सबसे आगे चलते. रास्ते भर धीरे-धीरे करके ठगों की तादाद बढ़ती जाती लेकिन वे ऐसा दिखाते जैसे एक-दूसरे को बिल्कुल भी नहीं जानते. अपने ही लोगों को जत्थे में शामिल होने से रोकने का नाटक करते थे ताकि शक न हो. हड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं थी.

आखिरी हमला —————— सबसे आगे चलने वाले दस्ते में ‘बेल’ यानी कब्र तैयार करने वाले लोग होते थे. उन्हें बीच वाले दस्ते में से कड़ी का काम करने वाला बता देता था कि कितने लोगों के लिए कब्र बनानी है. पीछे वाला दस्ता नज़र रखता था कि कोई ख़तरा उनकी तरफ़ तो नहीं आ रहा. आख़िर में तीनों बहुत पास-पास आ जाते लेकिन इसकी ख़बर शिकार को नहीं होती थी.

कई दिन गुज़र जाने के बाद जब शिकार चौकन्ना नहीं होता था और जगह माकूल होती थी तब गिरोह को कार्रवाई के लिए सतर्क करने के लिए, बातचीत में पहले से तय एक नाम लिया जाता था. यह पहला इशारा था कि अब कार्रवाई होने वाली है. इसके बाद ठगों में सबसे ‘इज्ज़तदार’ लोगों की बारी आती थी जिन्हें ‘भतौट’ या ‘भतौटी’ कहा जाता था. इनका काम बिना खून बहाए रुमाल में सिक्का बांधकर बनाई गई गांठ से शिकार का गला घोंटना होता था. हर एक शिकार के पीछे एक भतौट होता था, पूरा काम एक-साथ दो-तीन मिनट में होता था. इसके लिए मुस्तैद ठग अपने सरगना की ‘झिरनी’ यानी आखिरी इशारे का इंतज़ार करते थे.

इशारा मिलते ही पलक झपकते भतौट शिकार के गले में फंदा डाल देते थे और दो-तीन मिनट में आदमी तड़पकर ठंडा हो जाता था. इसके बाद लाशों से कीमती सामान हटाकर उन्हें पहले से खुदी हुई कब्रों में ‘एक के सिर की तरफ़ दूसरे का पैर’ वाली तरकीब से कब्रों में डाल दिया जाता ताकि कम-से-कम जगह में ज्यादा लाशें आ सकें. इसके बाद जगह को समतल करके उसके ऊपर कांटेदार झाड़ियां जो पहले से तैयार रखी होती थीं, लगा दी जाती थीं ताकि जंगली जानवर कब्र को खोदने की कोशिश न करें. इस तरह पूरा का पूरा चलता-फिरता काफ़िला हमेशा के लिए ग़ायब हो जाता था और ठग भी.

बीबीसी हिन्दी में प्रकाशित राजेश प्रियदर्शी के लेख का अंश साभार प्रकाशित

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मृत्यु भोज नहीं करने को लिया शपथ

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अजमेर। चूरू जिले के अंबेडकर नगर, गांव न्यारा के मेघवाल समाज के लोगों ने एक राय होकर मृत्यु भोज जैसी सामाजिक कुरीति को त्यागने ने का संकल्प 7 नवंबर, 2018 दीपावली को लिया। लोगों का तर्क था कि किसी की मृत्यु पर भोज का आयोजन करना गलत परंपरा है। किसी के मरने पर मिठाई खाना कैसी परंपरा है। यह भी तय हुआ कि जो मृत्यु भोज करता हो उसके यहाँ कोई भी भोजन नहीं करेगा।

दरअसल समाज के भीतर काफी लंबे वक्त से मृत्यु भोज को लेकर बहस चली आ रही है। अम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े लोग अक्सर इसका विरोध करते हैं। इसको खत्म करने के लिए कई स्तरों पर लगातार जागरूकता अभियान चलाया जाता है। जिसके बाद ऐसा देखने को मिल रहा है।

डाॅ गुलाब चन्द जिन्दल ‘मेघ’

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संविधान दिवस के उपलक्ष्य में बरेली में भव्य आयोजन

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बरेली। संविधान दिवस के उपलक्ष्य में 11 नवम्बर को बरेली में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. लार्ड बुद्धा इण्टरनेशनल धम्म ट्रस्ट द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम सुबह 10 बजे से होगा. एकदिवसीय बहुजन मैत्री एवं सामाजिक चिन्तन महासम्मेलन का विषय वर्तमान सामाजिक परिवेश में बुद्धिजीवीयों की भूमिका और समस्याओं के निदान में उनका योगदान होगा.

इस कार्यक्रम के मुख्य मार्गदर्शक के रुप में पूज्य भन्ते करुणाकर महाथेरा, सुमित रत्न थेरा और बोधिपिया तिस्सा जी उपस्थित रहेंगे. इसकी अध्यक्षता मा. धर्मप्रकाश भारतिय जी, पूर्व एम.एल.सी. बसापा, और इस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डॉ. इन्दु चौधरी (प्रोफेसर बी.एच.यू.) होंगी.

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इस हिन्दू राष्ट्र में दलितों की यही नियति है!

भगवा झंडों वाला जो हिन्दू राष्ट्र आरएसएस बीजेपी निर्मित करने की फ़िराक में हैं, उसमें दलितों की क्या भूमिका होगी, कोई भूमिका होगी भी या नहीं अथवा उनके लिए कोई जगह भी नहीं होगी, उनको छिप छिप कर जीना पड़ेगा, इसके संकेत मिलने लगे है.

यह उन दलित युवाओं के लिए एक सबक भी है, जो बहुत उछल उछल कर हिन्दू संगठनों में हिस्सेदारी करते है, संघ की शाखाओं में जाते हैं, बजरंग दल के नारे लगाते है, भगवा पट्टा बांध कर अकड़ अकड़ कर घूमते है, विश्व हिंदू परिषद व अन्य हिंदूवादी संगठनों के मोहरे बनकर दंगे फसाद फैलाते है. इनकी औकात इस बहुचर्चित व बहुप्रतीक्षित हिन्दुराष्ट्र में क्या होगी, इसकी झलक भी अब मिलने लगी है.

भाजपा शासित राजस्थान में दक्षिणपंथी समूहों की प्रयोगशाला है भीलवाड़ा, इसके रायला थाना क्षेत्र के भैरु खेड़ा (सुरास) गांव में 14 लोगों का एक ‘हिदू युवा संगठन’ बनाया गया, जिसमें दो दलित युवा भी शामिल किए गए, इन दोनों दलित युवाओं से सदस्यता व गांव में लगाने के लिए बैनर बनवाने हेतु पैसा लिया गया, पर जैसे ही बैनर बन कर आया, गांव के गैरदलित हिंदुओं ने आपत्ति जता दी कि – ये ब्लाईट हिन्दू संगठन में क्या कर रहे हैं, अब इनके फ़ोटो लगेंगे गांव में? हमको इनके चेहरे देखने पड़ेंगे रोज?

अन्ततः जब गांव की शुद्र (ओबीसी) जातियों का विरोध बहुत मुखर हो गया तो रास्ता निकाला गया कि दोनों दलित युवाओं के फोटोओं पर टेप चिपका कर उन्हें छिपा दिया जाए, ताकि गांव के कथित ऊंची जाति के लोगों को इनकी शक्ल नहीं देखनी पड़े. हिन्दू युवा संगठन ने दलित युवाओं के फोटो हाईड करके जैसे ही पोस्टर चिपकाया, खबर दलित मोहल्ले तक भी पहुंची. दलित युवाओं के हिलोरें मारता नया नया हिन्दू जोश ठंडा पड़ गया, उसकी जगह आक्रोश ने ले ली.

8 नवम्बर 2018 की सुबह दलित युवा रामस्वरूप बलाई तथा गोरधन बलाई ने गांव में पहुंचकर इस बात पर आपत्ति जताई कि जब उन्हें हिदू युवा संगठन से जोड़ा गया और बैनर बनवाने के लिए पैसा लिया गया तो अब बैनर से उन्हें क्यों हाईड किया गया? केवल दलित युवाओं के चेहरों पर टेप क्यों चिपकाया गया, यह तो हमारा अपमान है.

दलित युवाओं की आपत्ति हिंदुत्व के नए रक्षक शूद्रों को अत्यंत नागवार गुजरी, उन्होंने दोनों दलित युवाओं को पहले तो जमकर जातिगत गालियां दी, उनको उनकी असली औकात बताई और बाद में हरफूल लौहार, नारायण गुर्जर, मुकेश लौहार व महावीर गुर्जर ने मिलकर इन दलित युवाओं के साथ मारपीट की, नारायण गुर्जर ने तो पथराव तक किया, जान से मारने की धमकी तक दे डाली.

जब इस मारपीट की खबर गांव के दलित मोहल्ले तक पहुंची तो नगजीराम बलाई नामक एक दलित युवा ने हिम्मत करके उपरोक्त बैनर को नीचे उतार दिया, एक दलित की ऐसी हिमाकत हिदू वीर कैसे सहन करते, पूरा गांव दलितों के खिलाफ एक जुट हो गया, दलितों के साथ गाली गलौज व धक्कामुक्की की गई तथा गांव छुड़वा देने की धमकी तक दे दी गयी.

पीड़ित दलित परिवारों ने बताया कि गांव में पूरी तरह हिदू आतंक व्याप्त है, यही स्थिति रही तो हमें गांव छोड़ना पड़ेगा.

इस घटनाक्रम परेशान दलितों ने रायला थाने में रिपोर्ट लिखवाई, लेकिन वहां से कार्यवाही के बजाय समझाईश की नसीहत देकर मामला रफा दफा करने की कोशिश की जा रही है, घटनाक्रम के तीन दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक मुकदमा दर्ज नहीं हो पाया है.

हिदू राष्ट्र के इस पोस्टर कांड के बाद से भैरु खेड़ा( सुरास) के दलित भय, दशहत व आतंक के साये तले जीने को विवश है, वहीं हिन्दू युवा संगठन का भगवा ध्वज शान से लहर लहर लहरा रहा है और दूसरे कोने पर मौजूद बजरंग बली अत्यंत गुस्से में दिख रहे है, यह बजरंगी आक्रोश दलितों को कितना नुकसानदायक होगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता है.

भैरु खेड़ा (सुरास) जैसे लाखों गांव इस देश मे हैं, जहाँ पर दलित, आदिवासी व घुमन्तू समुदायों के करोड़ों युवाओं को जबरन हिन्दुराष्ट्र की भट्टी में झोंका जा रहा है, उनका जातिगत उत्पीड़न भी जारी है और धर्म की अफीम भी पिलाई जा रही है, शायद यही हिन्दू राष्ट्र में दलितों की नियति है. इस हिन्दू राष्ट्र में दलित, आदिवासी व घुमन्तुओं के लिए कोई जगह नहीं हैं.

भंवर मेघवंशी

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पीएम के लिए मायावती को मिला एक और बड़े नेता का समर्थन

नई दिल्ली। पीएम पद की रेस में बसपा अध्यक्ष मायावती को एक और बड़े नेता का समर्थन मिल गया है. छतीसगढ़ में बसपा के नए सहयोगी और जनता कांग्रेस के प्रमुख अजीत जोगी ने कहा है कि वो 2019 में मायावती को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं. छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस, मायावती की बीएसपी और वामदल मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं.

अजीत जोगी ने अपने एक बयान में कहा, ‘हमने बहुजन समाज पार्टी और लेफ्ट के साथ गठबंधन किया है, गठबंधन की जीत होती है तो मैं मुख्यमंत्री बनूंगा, वहीं 2019 में पीएम पद के लिए मायावती एक बेहतर उम्मीदवार हैं. जोगी ने कहा मेरा भरोसा है कि एक गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई गठबंधन 2019 में बहुमत में आएगा. इसी से यह निश्चित होगा कि 2019 में कौन पीएम बनेगा, मेरी राय में चार बार सीएम रहीं मायावती इस पद के लिए बेहतर उम्मीदवार हैं.

जोगी ने बसपा के साथ अपनी पार्टी के गठबंधन को दो दिलों का मिलन कहा है. जोगी के मायावती को लेकर दिए बयान से 2019 में बसपा प्रमुख के पीएम बनने की उम्मीद को और बल मिला है. जोगी 5वे बड़े नेता हैं जिन्होंने पीएम पद के लिए मायावती के नाम का सीधा समर्थन किया है. इससे पहले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी, पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और इंडियन नैशनल लोक दल के मुखिया ओम प्रकाश चौटाला भी 2019 में मायावती को प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार बता चुके हैं.

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“व्हाट इज इन ए नेम”, अर्थात नाम में क्या रखा है

महान विद्वान सेक्सपियर ने लिखा है, “व्हाट इज इन ए नेम”, अर्थात नाम में क्या रखा है. बच्चा जब पैदा होता तब उसका नामकरण संस्कार किया जाता है. उसको एक नाम दिया जाता वही नाम उसकी पहचान बन जाती है यहाँ तक कि मरने के उपरांत भी व्यक्ति का नाम जिंदा रहता है. इतिहास गवाह है कि नाम और इज्जत के खातिर बड़ी बड़ी जंग लड़ी गयी है और किसी को अपने नाम को चमकाने की और किसी को दूसरे के नाम को मिटाने की प्रवृति लंबे समय से चली आ रही है. भारत में नाम एकसमान, काम एक समान होते हुए भी व्यक्ति की पहचान का पैमाना जाति और धर्म भी अहम हो जाता है. कुछ लोग इतिहास में दर्ज इसलिए हो जाते हैं कि ओ लिखने लायक कुछ काम कर गए होते है. एक अंग्रेजी की सूक्ति है कि there is nothing good or bad, but thinking makes it so” इस दुनिया मे ऐसे शासक हुए हैं उन्होंने जो सोचा ओ जनता पर थोप डाला. लेकिन भारत का प्राचीन इतिहास गौरव और शौर्य से भरा पड़ा है. विश्व की महानतम प्राचीन सभ्यताओं में मेसापोटामिया की सभ्यता के बाद भारत की सिंधुघाटी सभ्यता का अपना विशेष नाम है. इसको हड़प्पा की सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है.

अब तार्किक प्रश्न ये खड़ा होता है कि जिस सिंधु नदी के नाम पर इस सभ्यता का नाम इंदुस वैली civilisation पड़ा ओ सिंधु नदी पाकिस्तान में है. और ओ पाकिस्तान कभी भारत का अभिन्न अंग हुवा करता था. लेकिन आज भारत पाकिस्तान एक दूसरे के विलोम शब्द बन चुके हैं जैसे कि दिन का रात. जिस तरह से आजकल भारत में संस्थाओं,ऐतिहासिक धरोहरों, के नाम परिवर्तन का दौर चला है उसे देखकर लगता हमने सब कुछ हासिल कर लिया, सब कुछ पैदा कर लिया, हमने बेरोजगारी पर जीत पा ली, हमने भरस्टाचार पर जीत पा ली, हमने कुपोषण, भुखमरी पर जीत पा ली, हमने शत प्रतिशत साक्षरता हांसिल कर ली, हमने महिलाओं पर हो रहे जुल्म और शोषण पर जीत पा ली और सबसे अहम हमने हजारो वर्षों के कलंक जातिवाद जो कि आरक्षण की जननी कही जाती है उस जाति के बंधन से मुक्त हो गए है और अब सिर्फ नए सिरे से नामकरण की ही रश्म जैसे अब शेष रह गयी हो. इस नव युग के दो अवतार मोदी और योगी सिर्फ नामकरण की ही रस्म पूरी करने में लगे हों? हम देखते है नामों में बड़ी रोचकता भी और हैरानी करने वाले तथ्य भी छुपे हैं. जैसे किसी व्यक्ति का नाम अमर हो और ओ क्या अमर रहता है? सुखी राम से ज्यादा सुखी सायद दुखी राम रहता हो. बदलने का ही शौक है तो समाज की सोच बदली जाए.

अंधविस्वास और पाखण्ड को बदल जाये, पुरानी रूढ़ियों, पुरानी सड़ी गली मानसिकता को बदला जाए, किन कारणों से देश गुलाम हुवा उन कारणों को बदला जाए. महिलाओ के प्रति पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता और धरणाओं को बदल कर आधुनिकता की ओर सबको समान अवसर प्रदान करने की सोच विकसित की जाए. हैरानी होती है एक तरफ हम मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं और शोषण के लिए काफी चिंतित और उत्सुक प्रतीत हो रहे हैं तीन तलाक, की समस्या से उनको स्वतन्त्रता दिलाने में संसद से लेकर न्यायालय तक लड़ाई लड़ रहे है. लेकिन जिस न्यू इंडिया और सबका साथ सबका विकास की बात कर रहे है उस न्यू इंडिया, डिजिटल इंडिया, में आज भी हिन्दू महिलाओ और हिन्दू दलितों के लिए मन्दिरों में प्रवेश करना मंगल ग्रह में प्रवेश करने से भी कठिन हो रहा है. आज भारती समाज को पुनर्जागरण की जरूरत महसूस होने लगी है. जिस प्रकार 19वीं सदी में कई कुप्रथाओ का अंत हुआ उसी प्रकार पुनः नवजागरण की आवस्यकता है. इतिहास को बदलकर हम अपने भविष्य को नहीँ बदल सकते है बेसक ऐतिहासिक गलतियों से अवश्य ही सबक लिया जाना चाहिए.

भविष्य की मजबूत इमारत वर्तमान की ज्वलन्त समस्यों पर विजय प्राप्त कर ही खड़ी की जा सकती है. नाम तो बहुत बदले गए है शहरों के, संस्थानों के, योजनाओ के, मगर उनकी कार्यशैली और स्वरूप नहीं बदला, नरेगा को मनरेगा करने से रोजगार में कोई क्रांतिकारी बदलाव अभी तक देखने को नहीं मिले है. किसान नरेगा में भी आत्महत्या कर रहे थे मनरेगा में भी, किसान इंडिया में भी उसी हाल में था जिस हाल में नई इंडिया में जी रहा है, दलित के लिए अछूतपन, भेदभाव वैदिक भारत मे भी था, आर्यव्रत में भी था, हिंदुस्तान में भी था,भारत में भी था और अब जब से न्यू इंडिया बनी है तब भी दलित शोषित और उपेक्षित ही है. इतना ही नहि गांधी ने दलितों को एक नया नाम दिया हरिजन लेकिन उस नामकरण से दलितों को अपने लिए गन्दी गाली समान लगने लग गयी और उस शब्द को असंवैधानिक करार दिया गया. उत्तराखंड राज्य गठन जब हुवा तब उत्तरांचल राज्य के नाम से हुआ इसका बाद में नाम उत्तराखंड कर दिया मगर हालत जो उत्तरांचल राज्य के थे वही हालात उत्तराखंड राज्य का भी है. पलायन, बेरोजगारी, उत्तरांचल राज्य में भी प्रमुख समस्या थी, उत्तराखंड राज्य में भी प्रमुख समस्या है. राजनीति से सत्ता तो परिवर्तित होती है मगर समाज को जगाने के लिए समाजसुधारकों की जरूरत होती है जो इस बक्त दिखता नहीं. सत्ता की भूख के आगे करोड़ो भूखे पेट तड़प रहे है. देश को 21वीं सदी के लिए तैयार करना है तो ध्यान, ज्ञान और विज्ञान के रास्ते पर चलना होगा  ताकि हम तकनीक और यंत्रों के समुन्द्र पार के देशों पर निर्भर न रहे.

लेखक:- आई0 पी0 ह्यूमन, (हल्द्वानी) नैनीताल, स्वतन्त्र स्तम्भकार, PGD, JMC Read it also- छत्तीसगढ़ चुनाव में कहां खड़ी है बसपा

यूपी में 2500 साल पुरानी बुद्ध मूर्ति मिली

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सिद्धार्थनगर शहर के बीचों बीच छठ घाट की साफ सफाई के दौरान जमुआर नदी से तथागत भगवान बुद्ध की प्राचीन मूर्ति मिली  है. मूर्ति के ढाई हजार साल पुरानी होने का अनुमान है. अष्टधातु की इस मूर्ति की कीमत लगभग 10 करोड़ आंकी गई है.

रविवार दोपहर नगरपालिका अध्यक्ष मो. जमील सिदृदीकी जमुआर नदी पर बने छठ घाट की सफाई करवा रहे थे. बताया जाता है कि मजदूर जब नदी में घुस कर उनके किनारों को साफ करने लगे तो उन्हें यह मूर्ति मिली. मौके पर मौजूद अध्यक्ष जमील सिदृदीकी ने मूर्ति देखा तो वह चौंक पड़े. वह बुद्ध की दो फीट उंची मूर्ति थी और काफी वजनी थी. उन्हें मूति की प्राचीनता और महत्व का अहसास हुआ तो फौरन इसकी खबर प्रशासन को दी गई. प्रशासनिक अमला आनन फानन में घाट पर पहुंच गया.अनुमान है कि उक्त मूर्ति नदी में बह कर आई होगी.

यह नदी गौतम बुद्ध के पिता की राजधानी प्राचीन कपिलवस्तु नदी से जुड़ी है.कपिलवस्तु बजहासागर के पास है. बजहा सागर का पानी जमुआर नदी में गिरता है. इसलिए संभव है कि बुद्ध के पुरातात्विक क्षेत्र से मूति नदी में बह कर यहां तक चली आई हो.

फिलहाल पुलिस विभाग ने इसे अष्टधातु की मूर्ति बताते हुए इसकी कीमत दस करोड़ आंका है और इसके ढाई हजार साल तक पुरानी होने की संभावना बताई जा रही है. मूर्ति को देखने के लिए मौके पर हजारों की भीड़ थी. समाचार लिखे जाने तक मूर्ति को प्रशासनिक संरक्षण में लेने की कार्रवाई चल रही थी.

इस बारे में नगरपालिका अध्यक्ष मो. जीमल सिदृदीकी ने कहा है कि प्रतिमा महत्वपूर्ण है. उसकी कलात्मकता देख कर बौद्ध काल के स्वर्णिम युग का इतिहास ताजा हो गया है.

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Thugs Of Hindostan बनी सबसे ज्यादा एडवांस बुकिंग वाली फिल्म

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नई दिल्ली। आमिर खान, अमिताभ बच्चन, फातिमा सना शेख और कैटरीना कैफ की फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां’ रिलीज हो गई है. फिल्म को भले ही अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला, लेकिन फिल्म की पहले दिन की कमाई ने सबको चौंका कर रख दिया है. फिल्म ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श की रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म ने पहले दिन ने 52.25 करोड़ की कमाई कर ली है.

फिल्म के पहले दिन की कमाई के साथ फिल्म ने एक बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है. दरअसल, सभी हिन्दी फिल्मों के पहले दिन के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को अगर देखें तो अब तक सबसे ज्यादा पहले दिन कमाने वाली फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां’ है. ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां’ के बाद दूसरे नंबर पर शाहरुख खान की फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर है’. ‘हैप्पी न्यू ईयर’ ने पहले दिन 44.97 करोड़ रूपए की थी. तो वहीं तीसरे नंबर पर 41 करोड़ रूपए के साथ ‘बाहुबली 2’ है. वैसे बता दें कि फिल्म ने रिलीज के साथ ही कई बड़े रिकॉर्ड अपने नाम किए थे जिस वजह से भी फिल्म की कमाई इतनी ज्यादा हो पाई है.

सबसे ज्यादा स्क्रीन्स पर रिलीज

जी हां, इस फिल्म को ग्लोबली करीब 7000 स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया है. बता दें कि इससे पहले बाहुबली 2 को दुनियाभर में 6500 स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया था. इतनी ज्यादा स्क्रीन्स पर रिलीज होने की वजह से भी फिल्म की कमाई इतनी ज्यादा हो पाई है.

सबसे ज्यादा एडवांस बुकिंग वाली फिल्म

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘ठग्स ऑफ हिंदोस्तान के 2 लाख टिकट पहले दिन के लिए एडंवास बुक हुए थे. ये अब तक की किसी बॉलीवुड फिल्म के लिए सबसे बड़ी एडवांस बुकिंग बताई जा रही है.

ये हैं 10 बॉलीवुड फिल्मों की पहले दिन की कमाई ठग्स ऑफ हिन्दोस्तां         : 52.25 करोड़ हैप्पी न्यू ईयर                 : 44.97 करोड़ बाहुबली 2                     : 41 करोड़ प्रेम रतन धन पायो           : 40.35 करोड़ सुल्तान                        : 36.54 करोड़ धूम 3                         : 36.22 करोड़ संजू                            : 34.75 करोड़ टाइगर जिंदा है               : 34.10 करोड़ चेन्नई एक्सेप्रेस              : 33.12 करोड़ एक था टाइगर               : 32.93 करोड़. Read it also-दलित और महादलित वर्ग को ठगने का काम कर रही सरकार: मांझी

दलित बस्ती में घुसकर 5 हुड़दंगियों ने की मारपीट, खुखरी और तलवारें लहराईं

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सुंदरनगर। सुंदरनगर में कुछ हुड़दंगियों ने चमुखा पंचायत की दलित बस्ती में घुसकर हमला कर 3 लोगों से मारपीट की और सरेआम खुखरी और तलवारें लहराईं. इस दौरान बस्ती की डेढ़ दर्जन महिलाओं सहित ग्रामीणों ने उनका बचाव किया. मामले को लेकर सुंदरनगर एस.डी.एम. और सुंदरनगर पुलिस को शिकायत पत्र सौंपकर ग्रामीणों ने न्याय की गुहार लगाई है. चमुखा पंचायत के सिहली के मंगलवाणा निवासी हेम राज पुत्र रघु राम, राम लाल पुत्र रघु राम और टेक चंद पुत्र लोहारू राम ने कहा कि 5 नशेड़ी हुड़दंगियों ने अचानक उनके गांव मंगलवाणा में घुसकर कर हमला कर दिया. उन्होंने कहा कि पांचों हुड़दंगी तलसाई के रहने वाले हैं और उच्च जाति से संबंधित हैं. उन्होंने कहा कि दलित बस्ती मंगलवाणा में घुसकर पांचों ने जातिसूचक गालियां निकालीं और 3 लोगों से मारपीट करने लगे.

इस दौरान उन्होंने तीनों को जान से मारने की धमकी दी और खुखरी व तलवारें भी निकाल लीं लेकिन तब तक बस्ती की महिलाएं भी बचाव में भाग कर आ गईं, जिसे देख कर पांचों भाग कर कुछ दूरी पर एक मकान में घुस गए जबकि खुखरी और तलवार की म्यान वहीं गिर कर छूट गई. उन्होंने कहा कि मंगलवाणा बस्ती के ग्रामीणों ने मंगलवाणा की नाकाबंदी कर दी और रास्ते में काफी देर तक पहरा देते रहे, जिसे देख कर पांचों हुड़दंगी भागने में सफल हो गए. वहीं सुंदरनगर के तहसीलदार उमेश शर्मा ने बताया कि स्थानीय लोगों की शिकायत पर कार्रवाई कर मामले की जांच के पुलिस को आदेश दिए गए हैं. इस तरह की किसी भी हरकत को क्षेत्र में कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

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बसपा सुप्रीमो ने केंद्र सरकार की आलोचना की

मायावती (फाइल फोटो)

नई दिल्ली। नोटबंदी के दो साल पूरे होने के मौके पर कांग्रेस पार्टी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने में जुटी हुई है. वहीं, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने भी केंद्र सरकार की आलोचना की है.

मायावती ने कहा कि मोदी सरकार ने जो फायदे 125 करोड़ जनता को गिनाए थे, उनमें से किसी को भी अब तक पूरा नहीं किया जा सका है. उन्‍होंने बीजेपी की अगुवाई की केंद्र सरकार को जनता से मांफी मांगने की नसीहत दी. मायावती ने कहा, ” नोटबंदी से जनता को जबरदस्त आर्थिक नुकसान हुआ है और आर्थिक इमरजेंसी जैसी स्थिति पैदा हो गई है, इससे ज्यादा जनता को कुछ भी नहीं मिला है. यह जनता के साथ धोखा है. इसके लिए केंद्र सरकार को जनता से माफी मांगने चाहिए.”

मायावती ने बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि लोगों को अच्छे दिन लाने का सुनहरा सपना दिखाकर वोटों के स्वार्थ की राजनीति करती है.सरकार कोई भी वादा पूरा नहीं कर सकी है. मायावती ने कहा कि नोटबंदी एक व्यक्ति की अपनी मनमानी और अहंकार का नतीजा थी. उन्‍होंने कहा कि यह सच अब देश और दुनिया के सामने है. इसलिए बेहतर होगा कि सरकार अपना अहंकार त्यागकर जनता से माफी मांगे. इसके अलावा बसपा सुप्रीमो ने केंद्र सरकार को नसीहत देते हुए कहा कि अलग-अलग संवैधानिक और स्वतंत्र संस्थाओं में अनावश्यक टकराव कराने की स्थिति पैदा करने से परहेज करने की जरूरत है.

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संत शिरोमणी गुरू रविदास महाराज जी

दोहाः-  चैदाह सौ तैंतीस की माघ सूदी प्रन्द्रास. दुखियों के कल्याण हेतू प्रकटे श्री गुरू रविदास.
उनका जन्म भारत के प्रसिद्ध शहर वाराणसी के नजदीक 15 पूर्णिमा (1433) सन 1377 में हुआ. पिता श्री संतोख दास, माता पूज्यनीय कलसा देवी जी की पावन खोक से गांव सीर गोवर्धनपुर में दुखियों का कल्याण करने के लिए आगमन हुआ. दादा जी श्रीमान कालू राम जस्सल, दादी जी श्रीमति लखपती जी, पुत्र श्री विजय दास जी, पत्नी श्रीमति लोना देवी जी.
भारतीय हिन्दू विश्वाविद्यालय वाराणसी के निकट शूद्रों की बस्ती में जिसे सीर करै हिया कहते हैं. यहीं ईमली का पेड़ है जिसके नीचे बैठकर सत्संग किया करते थे. श्री गुरू ग्रंथ साहिब में भी गुरू जी का नाम श्री गुरू रविदास है.
शिक्षा- शिक्षा से वंचित रहे क्योंकि शुद्रों को शिक्षा देना जुर्म समझते थे तथा शिक्षा प्राप्त करने वाले की आंखे तक निकाल देते थे. गुरू जी स्वयं ही शिक्षित हुए, उनकी वाणियों तथा पदों से जो वर्णन मिलता है वह एक बहुत ही अच्छे संगीतकार थे. उनका शब्द कोष बहुत विशाल था. उनकी वाणियां पंजाबी, राजस्थानी, मराठी, खड़ी बोली, हिन्दी, अरबी तथा फारसी में पाई जाती है. उन्होंने एशिया के सभी देशों की यात्राएं की तथा अपने प्रभावशाली विचारों से लोगों को निम्नलिखित वाणी/विचारों से प्रभावित किया.
नाना खियान पुरान वेद विधि चऊतीस अक्षर माही..1..
विआस विचारि कहिओ परमारथ राम नाम सरि नही..2..
सहज समाधि उपाधि रहत फुनि बड़ै भागि लिव लागी..
कह रविदास प्रगास रिदै धरि जन्म मरन सै भागि..3..
गुरू जी की उक्त वाणी में चऊतीस अक्षरों की गुरूमुखी लिपि उनके मुख से उजागर हुई है. इस बारे लाहौर में मुकदमा दायर किया गया और 11.03.1931 को फैसला आया कि गुरूमुखी लिपि का निर्माण गुरू रविदास जी ने ही किया था.
‘माधो अविदिया हित लीन. विवके दीप मलीन‘.
गुरू रविदास जी ने विवेक के दीप को जलाने के लिए गुरूमुखी के चैतीस अक्षरों की रचना की, जिससे समाज में जागृती आई और ज्ञानवान बनने की किरण फूटी. “गुरू रविदास जी का तेज, प्रताप तथा यश सूर्य की भांति फैल गया“. (लेखक तथा इतिहासकार मैकालिया) लेखक ज्ञानी गुरूबचन सिहं वैद ने भी इस प़क्ष की पूरी पुष्टि की. वास्तव में अक्षर चैतीस ही है परंतु पंड़ितों ने इसे कठिन बनाने के लिए बावन अक्षर बना दिए.
अछुत वर्ग तथा स्त्री (किसी भी जाति की हो) को संस्कृत भाषा पढ़ना व पढ़ाना पर  बिल्कुल प्रतिबंध था. इसको पूरा करने के लिए गुरू जी ने अक्षर बनाये ताकि अछुत वर्ग तथा स्त्री को पढ़ने का मौका मिले और मनुबाद की पराधीनता से मुक्त होकर सम्मानित जीवन जी सके और उन्नति करें.
स्त्री वर्ग का कल्याण-
मनुवाद ने अछूत तथा सभी वर्गाे्र की स्त्रियों को ताड़न के अधिकारी बताया गया. परंतु गुरू जी ने सारे हिन्दूस्तान में उपदेश दिए तथा उनके धार्मिक व्यक्तित्व से प्रभावित होकर समाज के प्रत्येक लोग तथा स्त्री मीराबाई, झाला रानी समेत सभी ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया. उस समय नारी को शिष्य बनने का अधिकार नहीं था परंतु गुरू जी ने उनको दीक्षा प्रदान करते हुए उनको भव सागर से पार किया.
गुरू नानक देव जी का सच्चा सौदा तथा गुरू रविदास जी-
गुरू नानक देव जी कुछ साधुओें की टोली साथ गुरू रविदास जी की अगुवाई में चुहड़काने (पाकिस्तान) में सच्चा सौदा किया. गुरू रविदास जी सच्चे सौदे से संतुष्ट हुए और गुरू नानक का माथा दायें अंगुठे से गुरू जी ने छुआ और दीक्षा प्रदान की. गुरू नानक देव जी को एकदम तीनों लोक का ज्ञान प्राप्त हुआ. उनके मुख से वाह गुरू निकला जो आज “वाहेगुरू“ बोला जाता है. उस समय गुरू रविदास जी के लगभग 52 राजा तथा रानी शिष्य बनें. जो सभी राजपूत ही थे. यदि उस समय कानून होता तो अछुतो के हितों को गुरू जी कलम बंद करवा सकते थे.
गुरू रविदास जी के उपदेश तथा वाणी सभी वर्गाें के लिए है-
गुरू रविदास जी जी की वाणी तथा उपदेश केवल शुद्रों के लिए नहीं बल्कि सभी वर्गों के लिए है. सुप्रसिद्ध लेखिका गेल ओम्वेट ने अपनी पुस्तक “सीकिंग वेगमपुरा“ में संत गुरू रविदास जी का संपूर्ण भारतीय इतिहास में प्रथम व्यक्ति माना है जिन्होंने आदर्श भारतीय इतिहास का माडल पेश किया है. “सीकिंग वेगमपुरा“ का मतलब है कि बिना गमों का शहर जो जाति विहिन, वर्ग विहीन आधुनिक समाज है.
1. “पराधीनता पाप है, जानले रे मीत.
रविदास प्राधीन सो कोनर करे है प्रीत“..
अर्थ- गुरू रविदास जी ने दूसरों की गुंलामी को पाप बताया.
2. ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सबन को अन्न.
छोट बढे सब सम बसे, रविदास रहे प्रसन्न..
अर्थ- इतिहास में गुरू जी ने सबसे पहले खादय सुरक्षा की बात उठाई.
3. रविदास मनुष्य करि वसन कूं,
सुखकर है दुई ढांव एक सुख है स्वराज यहि दूसरा मरघट गांव..
अर्थ- इतिहास में गुरू जी न सबसे पहले शांतिपुूर्वक जीने के लिए दो ही स्थान बताए. एक स्वयंराज दूसरा शमशान घाट अर्थात मृत्यू.
4. सत विद्यया को पढ़े, प्राप्त करे सदा ज्ञान.
रविदास कह बिन विद्यया नर को ज्ञान अज्ञान..
अर्थ- रविदास जी कहते है कि केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त करना महत्वपूर्ण नहीं है अपितु सही ज्ञान सतविद्यया प्राप्त करने के बाद मनुष्य समाज कल्याण हेतू प्रयास करता है. वही असली ज्ञानी है अन्यथा उसे अज्ञानी ही मानना चाहिए.
5. पांडे रे विच अंतर डाढा. मुड मुडावे सेवा पूजा, भ्रम का बन्धन गाढ़ा..
अर्थ- हरे पांडे तुझमें और भगवान में बहुत अंतर है. तुमने तो पाखंडवाद फैला रखा है जिसमें तुम लोगों के सिर मुडवाकर तरह तरह से पूजा करवाते हों. भ्रम का गहरा झाल फैलाये बैठे हो. जब मनुष्य और प्रकृतिक रूप भगवान का संबंध अति सहज है.
6. रविदास जन्म के कारण होत न कोई नीच.
नर कूं करि नीच डारि है औछे कर्म की कीच..
अर्थ- नर जन्म के आधार पर नीच नहीं है. मनुष्य को नीच उसका औछा व्यवहार बनाता है.
7. जात पात में जात है ज्यो केलन में पात.
रविदास न मनुष्य जुड़ सके जो लों जात ना पात..
अर्थ-जैसे केले के पेड़ के तने में एक के बाद एक परत छुपि रहती है. परंतु वहां पर कोई ठोस पदार्थ नहीं होता. इसी प्रकार मनुष्य में भी जात में जात छुपी रहती है लेकिन उनको भी बांटने का कोई ठोस आधार नहीं होता.
8. “चारों वेद किया खंडोति. जन रविदास करै दण्डोति..“
अर्थ-गुरू रविदास जी ने चारों वेदों को खंडन किया है जो हमार समाज के लिए व्यर्थ घोषित किया है. ऐसे व्यक्ति को जन समुदाय दंडवत प्रणाम करता है.
संपूर्ण समाज के लए आर्दश समाज का माटल “बेगम पुरा“
“बेगमपुरा शहर को नाऊ. दुःख उन्दोहु नही तिही ठाऊ“..
ना तसवीस खिराजु न माल. खौफन खता तरसुना जवालु..
अत माही खूब वतन रह पाई. वहां खैरी सदा मेरे भाई..
काईमु दाइसु सदा पातसाही. दोम न सोम एक सो आहि..
आबा दानु सदा यतसहुर. वहां गनी वसी मामूर..
तिऊ तिऊ सैल करहि जिऊ भानै. मरहम महम न को अठकाले..
कहि रविदास खलास चमार. जो हम सहरी तु मीत हमारा..
अर्थ- बेगमपुरा बिना गमों का शहर वहां कोई चिंता, टैक्स, खौफ, धोखा, लाचारी अभाव नहीें है. वहां मनुष्य का सदा ही भला होता है. वहां सही विचारों की हकुमत है. वहां कोई दुसरा, तीसरा दर्जा नहीं है. सभी समान है. वहां कोई धर्म, जाति, लिंग, भाषा, स्थान का भेदभाव नहीं है. वहां कानून के अनुसार आचरण करते है. वहां सभी कहीं भी घूम सकते हैं. वहां राजा या उसके कर्मचारी किसी को रोकते नहीं है. किसी की आजादी का हलन नहीं करते है. जो इन विचारो के समर्थन है वह मेरे साथी है.
गुरू रविदास जी के कोई गुरू नहीं थे-
जब गुरू रविदास जी का जन्म (25.01.1377) में हुआ तो उस समय शुद्रों को कोई शिष्य नहीं बनाता था. पंडितों ने आरम्भ से ही लोगों को भ्रम में डाल रखा है कि वह स्वामी रामनन्द के शिष्य थे. जो बिल्कुल गलत है. रामनन्द का जन्म 1423 में हुआ था. वह गुरू जी से 10 वर्ष बढ़े थे. गुरू रामनन्द के पिता ने उन्हें अनेक स्कूल तथा वेदांे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए 15-16 वर्ष तक बाहर भेजा.
1. वह 15,16 वर्षों तक वेदाचार्यों के पाठ ज्ञान अर्जित करते रहे. तो वह वैसे गुरू रविदास जी को दीक्षा दे सकते थे.
2. वह गुरू रविदास जी शुद्र थे. शुद्रों को दीक्षा पर प्रतिबंध था. दीक्षा देने वाले को भी ब्राहाण समाज में सजा देने का प्रवाधान था.
3. यह ठीक है कि गुरू रामानन्द, सन्त कबीर साहेब के गुरू थे. कबिर साहेब ने भी गुरू रामानन्द को धोखा देकर गुरू बनाया था. जब गुरू रामानन्द सवेरे गंगा स्नान करते थे उसी पोड़ी पर कबीर साहेब अन्धेरे में लेट गये. जब रामानन्द जी आये तो कबीर साहेब की ठोकर लग गई तो रामानन्द जी घबराये देखा कोई पोड़ी पर सो रहा है. तो गुरू रामानन्द ने उस के सिर पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया. कबीर साहेब खुश हुए और     अपने आप को गुरू रामानन्द के शिष्य कहने लगे. जब सभी ब्राहणों ने पता चला कि गुरू रामानन्द के शुद्र को कैसे दीक्षा दे दी. ब्रहाण समाज ने बुरू रामानन्द के सामने बवाल रच दिया. गुरू रामानन्द ने कहा मैं कभी भी शुद्र को दीक्षा नहीं देता. परन्तु कबीर साहेब कह रहें है कि मैने दीक्षा गुरू रामानन्द से ली है, वह मेरे गुरू है. ब्रह्यणों ने कबीर साहेब को रामानन्द के पास बुलाया गया और संत कबीर साहेब फिर दोहराया कि मैंने दीक्षा गुरू रामानन्द से ली है.
उन्होने गुरू रामानन्द को वह सवेरे गंगा घाट की पोड़ी वाली घटना की याद दिलाई कि रामानन्द ने कहा उन्हे दीक्षा मैने ही दी है, पर धोखे से. उनके दूसरे शिष्य है, सुखानन्द, सरेशानन्द, अननानन्द इत्यादि थे. यदि वह कबीर साहेब को दीक्षा देते तो कबीर साहेब भी कबीरनन्द होते. इस प्रकार गुरू रविदास उनके चेले होते तो वह भी रविदास की बजाये रविनन्द होते.
इसीलिए गुरू रविदास जी का कोई गुरू नही था. गुरू जी ने तो स्वयं भी ज्ञान अर्जित किया. असल में गुरू रविदास जी तो जन्म से परमात्मा रूप थे उन्होने गुरू ही आवश्यकता ही नही थी. यहां यह कहना भी आवश्यक है कि गुरू रविदास के जन्म के पांच या छह दिन बाद गुरू रामानन्द गुरू रविदास को शुद्रों की बस्ती में दर्शन आये.
श्री खुरालगढ़ साहेब दर्शनः
ईसवी 1515 में गांव खुरालगढ़ तहसील गढ़संकर जिला होशियापुर में गुरू रविदास जी लुधियाना से होते हुए फगवाडा(चक हकीम नगर ) जहां गुरू जी कुछ दिनो के लिए जहां आज सुंदर साहेब गुरूद्वारा है उस समय वहां राजा बैन सिंह थे. राजा बैन संत मीराबाई के रिश्ते में मौसा थे (मीरा की माता के बहनोई). गुरू जी शुद्रो की बस्ती में बाबा धन्ना तथा देविया के घर सत्संग करते थे. वहां मीराबाई भी गुरू जी के दर्शन करने पहुंच गई. मीरा जी की खबर राजा बैन को मिल गई कि मीराबाई खुरालगढ़ सत्संग में पहुच गई है. राजा बैन ने तुरन्त शुद्रो की बस्ती में सिपाही भेजकर गुरू रविदास जी को अपनी कचहैरी में बुलवा लिया. गुरू जी के साथ धन्ना तथा दैविया भी आ गये. राजा बैन ने गुरू जी को शुद्र होते हुए सत्संग करने का दोषी करार कर दिया. सजा में गुरू जी को चक्की (जो बैलों से चलती थी) से आटा पिसने के आदेश दे दिये. गुरू जी ने प्रभु को याद किया थोडी देर में चक्की अपने आप ही चलने लगी. राजा बैन को इस घटना की सूचना दी तो राजा बैन गुरू जी के पास जेल में आ पहुॅुचे और गुरू जी से क्षमा मांगी गुरू जी ने उन्हे क्षमा कर दिया फिर राजा ने अपनी सम्सयाएॅं गुरू जी के सामने रखी.
1 अनाज की अकाल.
2 पानी की समस्या.
अनाज की समस्या बारे गुरू जी ने शुद्रो की बस्ती में एक गुरूमुखी राम दासी जो बहुत गरीब और गुरू जी का सत्संग करती थी. उसके घर से एक मण गेहूॅं मगवाई, राजा ने नौकरो को भेजा तथा गेहूॅं लाने के आदेश दिए. नौकर रामदासी के घर पहुंचे और गेहूॅं की मांग करी परन्तु गेहू तो उसके पास थी नही. फिर नौकरो ने गुरू जी के बारे बताया गया. रामदासी जी ने कहा देख लो कहीं होगी तो ले जाना. उसकी कोठी से एक मण गेहू मिल गयी और वह गेहू गुरू जी को दे दी तथा रामदासी भी साथ चली आई. गुरू जी ने नौकरो को कहा इस गेहॅंू को इस चक्की में डालो और परदे लगवा दिए. चक्की खूब चली, जब तक चले तो इसको रोकना नही. आटे के ढेर के ढेर लग गये और सारी जनता आटे को घर ले गई इस तरह अनाज की समस्या हल हो गई. चक्की लगातार चलती रही.
पानी की समस्या बारे गुरू जी ने कहा जेल से दो किलोमीटर तक मेरे साथ चलो. खुरालगढ का पहाडी ऐरिया होने के कारण से वहां बडे बडे पत्थर पडे थे उनमें से एक पत्थर को गुरू जी ने कहा क् िइस पत्थर को उठाओ. पत्थर को स्वयं राजा ने तथा नौकरो ने भी उठाया परन्तु भारी होने के कारण वह नही हिला. फिर गुरू जी ने अपने दाएं पैर के अगूठे से छुआ तो पत्थर दूर पडा और पत्थर के नीचे से पानी ऊपर की ओर आया. वहां आज भी एक अमृत कुण्ड है तथा गुरू जी का मंदिर भी है और उसे “चरण छूं गंगा“ के नाम से पुकारते है. वहां के पानी से सारी समस्याएं हल हो गई उस दिन से जेल को गुरद्वारे में बदल दिया. उसी गुरूद्वारे में गुरू जी चार वर्ष दो महीने ग्यारह दिन तक रहे तथा वहां तप भी किया. इसी स्थान पर तप स्थान श्री गुरू रविदास खुरालगढ साहेब (रजि. 305) स्थित है. यहां रात दिन संगत आती जाती है और श्री गुरू स्थान के दशर्नो का लाभ उठाती है तथा अटूट लंगर चलता रहता है.
संवत 1584 (06.03.1528) को 151 वर्ष 1 महिना 10 दिन की आयु के बाद चितौड़गढ़ में गम्भीर नदी के तट पर श्री गुरू रविदास जी ब्रह्यलीन हुए.
श्री गुरू ग्रंथ साहेब तथा गुरू रविदास जी-
श्री गुरू ग्रंथ साहेब सारी दुनिया मं अति पवित्र ग्रंथ के रूप में पूजा होती है. श्री गुरू ग्रंथ साहेब में सारे मानवतावादी गुरूओं की वाणियों को संजोया गया है तथा मनुवादी विचारों से परहेज रखते हुए दूर ही रख गया है. देवी, देवताओं, माता मसाणियों, ब्रह्यणवाद तथा सभी आडम्बरों को कहीं भी गुरू ग्रन्थ साहेब ने मान्यता नहीं दी गई. श्री गुरू रविदास जी की चालिस वाणियों तथा एक श्लोक को गुरू ग्रंथ साहेब में संजोया गया है.
सारी दुनिया श्री गुरूद्वारों में गुरू रविदास की वाणियां तथा आरती गाई जाती है. गुरू रविदास जी की आरती पाखण्ड रहित तथा सहज है. गुरू जी के बारे में जितना भी लिखे उतना ही थोड़ा है अर्थात इसका कोई अन्त नहीं है.
यू. एन. ओ. की टोरांटो में हुए सम्मेलन में ऐलान किया गया था कि विश्व सरकार का संविधान का आधार श्री ग्रंथ साहेब होगा और उसकी प्रस्तावना सतगुरू रविदास जी के शब्द बेगमपुरा पर आधारित होगी. इसी तरह मानवता कि मशीहा डा0 बी. आर. अम्बेडकर जी ने भारतीय संविधान की नींव प्रस्तावना और संविधान की रूप रेखा का सृजन सतगुरू रविदास जी के “बेगमपुरा“ शब्द के आधार पर किया गया है.
शेर सिहं डांडे

सरदार वल्लभ भाई पटेल डा. अम्बेडकर के धुर विरोधी थे

सरदार वल्लभ भाई पटेल और अंबेडकर, दोनों को ही भारतीय राजनीति के सबसे मजबूत स्तंभों में गिना जाता है| दोनों के बीच की बहस और मतभेद उन सवालों पर रोशनी डालते हैं, जो आज के राजनीतिक परिदृश्य में भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने उस समय थे. सरदार वल्लभ भाई पटेल व डॉ. भीमराव अंबेडकर के रिश्ते पर एक नजर डालें तो दोनों की विरासत को लेकर आज भी तमाम धड़ों में प्रतियोगिता होती रहती है. राजनीतिक दल दोनों की विरासतों को अपने सांचे में ढालकर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं/कर रहे हैं. दोनों को ही इन दिनों किसी न किसी प्रकार से सम्मानित किया जा रहा है. डा. बाबा साहेब अम्बेडकर की याद में दिल्ली में मेमोरियल बनाया गया है, तो सरदार वल्लभ भाई पटेल की याद में दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है. ज्ञात हो कि महाराष्ट्र सरकार ने भी बाबा साहेब अम्बेडकर की सरदार पटेल की ही तर्ज पर मूर्ति/प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा की है. सुना है कि उस परियोजना पर काम भी शुरू हो गया है.

क्या आप जानते हैं कि जाति और आरक्षण को लेकर सरदार पटेल और डॉक्टर अंबेडकर की सोच बिलकुल अलग थी. संविधान सभाओं में इस विषय पर उन दोनों के बीच अच्छी खासी बहस होती थी. शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण की मदद से अंबेडकर दलित अधिकारों को सुरक्षित करना चाहते थे किंतु पटेल को आरक्षण ‘राष्ट्र-विरोधी’ लगता था. उन्होंने कहा था, “जो अब अछूत नहीं हैं, उन्हें भूल जाना चाहिए कि वे कभी अछूत थे. हम सबको साथ खड़े होना होगा.” यहाँ सवाल ये उठता है कि क्या आजादी के इतने सालों बाद भी पटेल की बात पर विश्वास किया जा सकता है. उनका ये कहना कि अछूतों को ये भूल जाना चाहिए कि वे कभी अछूत थे, कितना सार्थक है. क्या ये सवाल आज वाजिब नहीं? उन्होंने अछूतों को समझाने की कोशिश की किंतु ब्राह्मणवादी सोच को बदलने के लिए सवर्णों को कोई हिदायत अथवा सीख नहीं दी, फिर कैसे मान लिया जाए कि पटेल की विचारधारा मनुवादी नहीं थी? हां! ये जरूर है कि गृहमंत्री रहते हुए उन्होंने भारत के रजवाड़ों का सरकारीकरण करके भौगोलिक स्तर पर भारत को एक करने का काम किया किंतु समाज में व्याप्त भेदभाव और कुरीतियों के निस्तारण के लिए कोई काम नहीं किया. समाज में व्याप्त जातिप्रथा और कुरीतियों के खिलाफम जो भी काम हुआ, वो केवल और केवल बाबा साहेब अम्बेडकर ने ही किया और किसी ने नहीं. यही अंतर था बाबा साहेब अम्बेडकर और पटेल जी की सोच में.

अंबेडकर संविधान सभा के सभापति थे. पर उनका एक निश्चित लक्ष्य भी था. उन्हें लंबे समय से शोषण का शिकार दलितों के हित भी सुरक्षित करने थे, चाहे उन्हें जिद्दी और आक्रामक रणनीति ही क्यों न अपनानी पड़े. उन्हें यकीन था कि ऐसा सिर्फ दलितों के राजनीतिक और आर्थिक अधिकार सुरक्षित करके ही किया जा सकता है, जो सरकारी शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के जरिए ही हो सकता था. इसलिए उन्होंने प्रस्ताव रखा कि सरकार शिक्षा और नौकरियों में कुछ फीसदी सीटें दलित और पिछड़े वर्ग के लिए सुरक्षित रखे.

सरदार पटेल, केएम मुंशी, ठाकुर दास भार्गव और कुछ अन्य ऊंची जाति के कांग्रेस नेताओं ने इसका पुरजोर विरोध किया. पटेल का कहना था कि दलित हिंदू धर्म का एक हिस्सा हैं और उनके लिए अलग व्यवस्था उन्हें हिंदुओं से हमेशा के लिए अलग कर देगी…. अब इन लोगों से कोई ये पूछे कि दलितों को हिन्दू तो माना गया किंतु वे व्यवस्था का हिस्सा कब थे? उन्हें सवर्णों ने अपना हिस्सा माना और उनके साथ कब मानवीय व्यवहार किया जाता था? दलितों के साथ सवर्णों का आज भी वही व्यवहार है. हां! कुछ विवशताओं के चलते दलितों की सामाजिक/ आर्थिक/ राजनीतिक स्थिति जो बदलाव आया है वो सवर्णों की सोच में बदलाव का परिणाम न होकर शिक्षा के प्रचार-प्रसार का परिणाम है और कुछ नहीं.

स्मरण रहे कि वह पटेल जी ही थे जिन्होंने संविधान निर्माण के दौरान बाबा साहेब से संविधान में आरक्षण का प्रावधान करने का विरोध किया था, जिस पर डॉ आंबेडकर ने संविधान समिति से पटेल जी को अपना स्तीफा सौंप दिया था किंतु पटेल जी ने भविष्य को देखते हुए बाबा साहेब का स्तीफा फाड़ दिया और कहा कि अम्बेडकर मैं जिद्दी जरूर हूं किन्तु मूर्ख नहीं… औऱ इस तरह संविधान में एस सी/एस टी को नौकरियों में आरक्षण प्रदान हो सका…..और आरक्षण विरोधी भाजपा उसी पटेल का गुणगान करने में लगी है…दोनों की मानसिकता एक सी जो है. यह भी सुनने को मिलता है कि पटेल जी ने कहा था कि यदि मैं प्रधान मंत्री होता तो अम्बेडकर को कभी भी संविधान निर्माण समिति में न आने देता.

हैरत की बात तो ये कि जिस सरदार पटेल ने गृह मंत्री रहते हुए आर एस एस पर प्रतिबन्ध लगाया था, उस आर एस एस से जन्मी भाजपा सरदार पटेल ही नहीं, न जाने और कितने ही आर एस एस विरोधी कांग्रेसी नेताओं को सिर माथे बिठाती जा रही है, जिनका विरोध करते – करते आर एस एस के नेताओं का गला भर्राने लगता था किंतु भाजपा की पैत्रिक संस्था आर एस एस आज आँख बन्द करके भाजपा की कारस्तानी देखने को मजबूर है अथवा वो भाजपा के सामने बौनी हो गई है, कुछ पता नहीं. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि आर एस एस ने मान लिया है कि सरदार पटेल ने गृहमंत्री रहते हुए जो आर एस एस को प्रतिबन्धित किया था, वह सही था. यानी कि आर एस एस की गतिविधियां राष्ट्र विरोधी ही थीं…. और आज भी हैं किंतु सत्ता में बने रहने के लिए वो जरूरी मान बैठी है कि समाज विरोधी अपने रवैये को ढकने के लिए समाज के हित में काम करने वाला चाहे जो भी रहा हो, उसे अपने पाले में खींचना जरूरी है.

जब से भाजपा सत्ता में आई है, उसने नारा लगाया है कि भाजपा भारत को कांग्रेस मुक्त भारत बनाना चाहती है. किंतु देखा यह जा रहा है कि जो भी नेता कांग्रेस पार्टी का दामन छोड़ देता है, भाजपा उसे अपने घर में मेहमान बनाकर भरपूर आदर-सत्कार करती है और भाजपा में शामिल कर लेती है. इस प्रकार तो ये लगता है कि भारत कभी भी इसलिए कांग्रेस मुक्त नहीं होगा क्योंकि भाजपा ही कांग्रेस युक्त होती जा रही है.

उल्लेखनीय है कि भाजपा ने 2014 के चुनाव-प्रचार के दिनों से पहले ही प्रतीकों की जंग शुरू करदी थी. अब 2019 के आम चुनावों के मद्देनजर यह और भी तेज हो गई है. सुभाष चंद्र बोस के नाम पर दिल्ली से लेकर अंडमान तक कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं, ये आयोजन इस ओर ही इशारा कर रहे हैं. इन कार्यक्रमों के पीछे बीजेपी और मोदी सरकार के राजनीतिक निहतार्थ ही हैं. भाजपा सरकार ने 2019 के आम चुनावों के मद्देनजर ही आजाद हिंद फौज की स्थापना की इस साल 75वीं वर्षगांठ मनाई है. मोदी सरकार और बीजेपी का दावा है कि आजाद भारत में नेताजी के नाम पर अब से पहले कभी भी कोई आयोजन नहीं किया गया, जैसा इस दौरान किया जाएगा. यह पहला मौका है जब लाल किले पर 15 अगस्त की बजाय प्रधानमंत्री की ओर से किसी दूसरे दिन तिरंगा फहराया गया. पिछले कुछ सालों में मोदी सरकार ने नेताजी को भी अपने पाले में खींचने की पुरजोर कोशिश की है. खबरों के हिसाब से नेताजी परिवार के कुछ सदस्य पहले से ही बीजेपी में हैं. लेकिन यहाँ यह सवाल भी उठता है कि मोदी जी ऐसे आयोजनों के जरिए आर एस एस और अन्य हिन्दूवादी शक्तियों द्वारा नेताजी के समय में किए गए विरोध की आग को बुझा सकेंगे.

इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 31 अक्टूबर को गुजरात में सरदार पटेल की सबसे ऊंची मूर्ति का अनावरण किया गया. यह उनकी सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल है जिसकी शुरुआत 2013 में ही उन्होंने बतौर गुजरात के सीएम रहते हुए की थी. इस कार्यक्रम को पीएम मोदी अति प्रमुखता से ले रहे हैं. दिलचस्प बात है कि नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की विरासत को कांग्रेस से छीनकर अपनी राजनीति के साथ सफलतापूर्वक जोड़ लिया है.

इस प्रकार प्रधानमंत्री मोदी शुरू से ही सरदार पटेल को एक प्रतीक की तरह इस्तेमाल करके कांग्रेस की वंशवादी राजनीति पर कड़ाई से हमला करते रहे हैं. इससे वह दोहरा निशाना लगाते हैं. एक तरफ वह कांग्रेस पर एक ही परिवार को संरक्षण देने का आरोप लगाते रहते हैं तो इसकी एवज में वह सरदार पटेल जैसे नायकों की उपेक्षा का भी आरोप लगाकर अपने पाले में खींचने का उपक्रम करते रहे हैं. 31 अक्तूबर को ही सरदार पटेल की जयंती के साथ इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि भी होती है. ऐसे में मोदी जी ने सरदार पटेल की मूर्ति का अनावरण करने के बहाने इन्दिरा गान्धी के कद को अदना करने का प्रयास भी किया है. इसके साथ ही कांग्रेस इस मूर्ति को बनाने में चीन के बने प्रॉडक्ट का इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर इसे मेक इन इंडिया और सरदार पटेल का अपमान बता रही है. कांग्रेस ही नहीं अपितु भाजपा के वरिष्ठ सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने यह कहकर विरोध किया कि सरदार पटेल और शिवाजी की मूर्तियां स्थापित करने जिस अकूत धनराशि का अपव्य्य किया गया है , इस धनराशि से यदि अस्पतालों की स्थापना की जाती तो कम से कम 100 AIIMS अस्पतालों की स्थापना हो सकती थी किंतु सरकार ने जनता के हितों की अनदेखी कर राजनीति को प्रमुखता देने का प्रयास किया है और कुछ नहीं.

आज का सच ये है कि सरदार पटेल की विशालकाय प्रतिमा लगाकर भाजपा बेशक अपनी पीठ खुद ही थपथपाकर खुश हो रही हो किंतु विश्वपटल भाजपा सरकार खूब खिल्ली उडाई जा रही है. स्टैचू ऑफ यूनिटी’ को लेकर ब्रिटेन ने भारत सरकार की करनी और कथनी की जो पोल खोली है, वह समूचे भारत के लिए शर्म की बात है. ब्रिटेन ने दावा किया है कि जिस बीच भारत यह मूर्ति बना रहा था, उस बीच ब्रिटेन ने भारत को करीब एक अरब पाउंड की आर्थिक मदद दी थी. बजरिए पंजाब केसरी, ब्रिटेन द्वारा बताई जा रही यह रकम पटेल की मूर्ति पर आए खर्च से कहीं ज्यादा है. खबर में एक सांसद यह भी कहा है कि ब्रिटेन को अब भारत की मदद नहीं करनी चाहिए. ब्रिटेन ने कहा कि अगर भारत ये पैसा मूर्ति बनाने में खर्च नहीं करता तो अपने प्रॉजेक्ट्स का खर्च खुद ही उठा सकता था.

विदित हो कि सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी एक के बाद एक कांग्रेस के प्रतीक और नेहरू की विरासत को छीनने की कोशिश करते रहे हैं. इसमें सिर्फ नेताजी या सरदार पटेल ही नहीं हैं. उनकी लिस्ट में इनके अलावा कई और नाम भी शामिल हैं. पीएम मोदी की आक्रामक राजनीति का यह अहम हिस्सा रहा है. पीएम मोदी ने दलित वोट पर निशाना साधते हुए डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर भी एक के बाद एक कई आयोजन और कार्यक्रम चलाए. बिहार चुनाव से ठीक पहले पीएम मोदी ने रामधारी सिंह दिनकर को तरजीह देते हुए उनकी जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया था.

चलते-चलते बताते चलें कि मायावती के द्वारा बनाए गए स्मारकों की न जाने किस-किस प्रकार से खिलाफत की गई थी किंतु आज चाहे पटेल की प्रतिमा स्थापित करने की बात हो या फिर वीर शिवाजी की, भारत में इस पर कहीं कोई भी चर्चा नहीं हो रही. … क्यों? कमाल की बात यह भी है कि जो भाजपा सरकार आम जनता से जिस चीन के सामान की खरीद-फरोक्त के लिए मना करती है, उसके द्वारा उसी चीन से सरदार की प्रतिमा बनवाई गई है…. मायावती ने तो ऐसा भी नहीं किया था.

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मंदिर और मूर्तियों में रुचि रखने वाले शूद्रों(पिछड़ों) और आम महिलाओं से एक विनम्र सवाल!

क्या आपने ‘संघ-विहिप-भाजपा’ से कोई एमओयू (MoU) करा ली है कि अयोध्या के भावी भव्य मंदिर से लेकर केरल के शबरीमला मंदिर तक, सारा धरम-करम अब लोकतांत्रिक ढंग से होगा? जाति, उम्र और लिंग का भेदभाव नहीं होगा? किसी भी जाति का व्यक्ति पुजारी हो सकता है और पूजा करने कोई भी व्यक्ति, १० से ५० वर्ष की महिला सहित, मंदिर के अंदर जा सकता है?

क्या संघ-परिवार से संचालित मौजूदा केंद्र सरकार अयोध्या में मंदिर-निर्माण के कथित अध्यादेश से पहले पूरे भारत के अधिसंख्य मंदिरों के संचालन-प्रबंधन और उपासना के अधिकार से सम्बंधित इस आशय का कानून संसद से पारित कराएगी? आप क्यों नहीं यह सवाल उनसे पूछते हैं?

अगर आपने ऐसा कोई MoU उनके साथ नहीं किया है या मंदिर-प्रबंधन व उपासना के अधिकार सम्बन्धी जरुरी सवाल का जवाब उनसे नहीं लिया है तो यकीनन आप मंदिरों और भगवानों को कुछ गिने-चुने चितपावन या कुलीन ब्राह्मण पुरुषों के हवाले कर रहे हैं!

आखिर ये कैसा धर्म है, जिसके अधिसंख्य उपासना-गृहों(मंदिरों) पर सिर्फ एक खास जाति के कुछ पुरुषों का ही ‘राज’ कायम रहता है? शूद्रों और महिलाओं को अपने इस धर्म और इसके अधिसंख्य उपासना-गृहों(मंदिरों) के बारे में जरूर सोचना चाहिए!

अच्छी स्थिति दलितों और दक्षिण भारत (खासकर तमिलनाडु) के ज्यादातर शूद्रों की है, उनका बड़ा हिस्सा इस धर्म, इसकी उपासना पद्धति और मंदिरों की असलियत से काफी पहले ही वाकिफ हो गया था!

उर्मिलेश

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दलित दस्तक मैग्जीन का नवम्बर 2018 अंक ऑन लाइन पढ़िए

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दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2018 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए सांतवें साल का छठा अंक लेकर आए हैं. इस अंक के साथ ही दलित दस्तक ने एक नया बदलाव किया है. इसके तहत अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

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छत्तीसगढ़ चुनाव में कहां खड़ी है बसपा

नई दिल्ली। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव में महागठबंधन के बाद छत्तीसगढ़ का चुनाव सबसे ज्यादा दिलचस्प हो गया है. इस चुनाव में छजकां-बसपा और सीपीआई का महागठबंधन नए सियासी समीकरण बनाने के लिए चुनावी मैदान में ताल ठोक रहा है. यह महागठबंधन राज्य में दो मुख्य विरोधी दलों भाजपा और कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकता है. इन तीनों राज्यों में जिस राजनैतिक दल पर सबकी निगाहें टिकी थी वो बहुजन समाज पार्टी है. अब जब साफ है कि बसपा छत्तीसगढ़ में महागठबंधन का सबसे अहम हिस्सा है तो सवाल उठता है कि प्रदेश के विधानसभा के चुनाव में बसपा कहाँ खड़ी है.

सूबे में राजनीतिक समीकरण बहुत तेजी के साथ बन और बिगड़ रहे हैं. कांग्रेस से बगावत कर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अपनी नई राजनीतिक पार्टी छत्‍तीसगढ़ जनता कांग्रेस बनाई थी. इस विधानसभा चुनाव में अजीत जोगी ने बसपा और सीपीआई के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है. महागठबंधन के बीच सीटों के बंटवारे में छजकांं को 55, बसपा को 33 और सीपीआई को 2 सीटें मिली हैं. सभी दलों ने अपने प्रत्याशियों ने नाम की घोषणा कर दी है.

चुनाव विशेषज्ञों का मानना है कि महागठबंधन सूबे में करीब 30 से 35 विधानसभा सीटों पर सीधा असर डाल सकता है. इसकी अपनी वजह भी है. सूबे में सामान्य वर्ग की 51 सीटें, अनुसूचित जनजाति के लिए 29 सीटें और अनुसूचित जाति के लिए 10 सीटें आरक्षित हैं. एसएसी और एसटी वर्ग के लिए आरक्षित सीटों पर महागठबंधन का प्रभाव साफ तौर पर देखा जा सकता है.

एक खास बात प्रदेश में बसपा प्रमुख की बढ़ती सक्रियता भी है. 04 नवंबर को प्रदेश में रैली करने के बाद मायावती 16 और 17 नवंबर को भी प्रदेश प्रवास पर रहेंगी, इस दौरान वे जांजगीर और रायपुर में पार्टी प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार करेंगी. अजीत जोगी से गठबंधन के बाद बसपा की उम्मीदें भी बढ़ी है और वह प्रदेश में तीसरी ताकत बनने को बेताब है. यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रदेश के चुनाव में महागठबंधन कितना असर दिखा पाता है. फिलहाल महागठबंधन ने भाजपा और कांग्रेस की धड़कन को तो बढ़ा ही दिया है.

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गांधी को गोद लेने वाले व्यवसायी

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पूंजीपतियों के साथ एक समस्या होती है कि वे या तो स्वयं ही अपनी प्राथमिक छवि और वृत्ति से मुक्त नहीं हो पाते. और कई बार समाज ही अनजाने में उन्हें जीवनपर्यंत उसी नज़र से देखता रह जाता है. एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जमनालाल बजाज का स्वतंत्र चित्रण न हो पाने की वजह शायद यही रही होगी. आज के पूंजीपतियों की मानसिकता और जीवन-चर्या को देखते हुए हमारे लिए कल्पना करना भी मुश्किल हो सकता है कि भारत में जमनालाल बजाज जैसे वैरागी पूंजीपति भी हुए हैं जिसने त्याग और ट्रस्टीशिप का ऐसा उदाहरण पेश किया कि गांधी और विनोबा जैसे लोग उनके साथ पारिवारिक सदस्य के रूप में घुल-मिल गए. युवा जमनालाल के भीतर आध्यात्मिक खोजयात्रा की छटपटाहट थी और वह किसी सच्चे कर्मयोगी गुरु की तलाश में भटक रहे थे. इस क्रम में पहले वह मदन मोहन मालवीय से मिले. कुछ समय तक वे रबीन्द्रनाथ टैगोर के साथ भी रहे. अन्य कई साधुओं और धर्मगुरुओं से भी वह जाकर मिले. 1906 में जब बाल गंगाधर तिलक ने अपनी मराठी पत्रिका ‘केसरी’ का हिंदी संस्करण नागपुर से निकालने के लिए इश्तहार दिया, तो युवा जमनालाल ने एक रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मिलनेवाले जेबखर्च से जमा किए गए सौ रुपये तिलक को जाकर दिया. जमनालाल ने लिखा है कि देशसेवा के लिए दान में दिए गए उस सौ रुपये से जो खुशी उन्हें तब मिली थी, वैसी बाद में लाखों दान करने पर भी नहीं मिली. लेकिन तिलक को भी वे अपना गुरु नहीं मान सके. इस बीच वह महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में किए जा रहे सत्याग्रह की खबरों को पढ़ते रहे और उनसे बहुत प्रभावित होते रहे. 1915 में भारत वापस लौटने के बाद जब गांधीजी ने साबरमती में अपना आश्रम बनाया तो जमनालाल कई बार कुछ दिन वहां रहकर गांधीजी की कार्यप्रणाली और उनके व्यक्तित्व को समझने की कोशिश करते रहे. गांधीजी में उन्हें संत रामदास के उस वचन की झलक मिली कि ‘उसी को अपना गुरु मानकर शीश नवाओ जिसकी कथनी और करनी एक हो.’ जमनालाल को अपना गुरु मिल चुका था. उन्होंने पूरी तरह से गांधीजी को अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया. 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के दौरान जमनालाल ने गांधीजी से अनुरोध किया कि मैं आपका ‘पांचवां बेटा’ बनना चाहता हूं और आपको अपने पिता के रूप में ‘गोद लेना’ चाहता हूं. पहले पहल तो इस अजीब प्रस्ताव को सुनकर गांधीजी को आश्चर्य हुआ, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इसपर अपनी स्वीकृति दे दी. 16 मार्च, 1922 को एक विचाराधीन कैदी के रूप में गांधीजी ने साबरमती जेल से जमनालाल को एक चिट्ठी में लिखा था— ‘तुम पांचवें पुत्र तो बने ही हो, किन्तु मैं योग्य पिता बनने का प्रयत्न कर रहा हूं. दत्तक लेनेवाले का दायित्व कोई साधारण नहीं है. ईश्वर मेरी सहायता करे और मैं इसी जन्म में इसके योग्य बन सकूं.’ जमनालाल ने सामाजिक सुधारों की शुरुआत सबसे पहले अपने घर से ही की. असहयोग आंदोलन के दौरान जब विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार शुरू हुआ तो उन्होंने सबसे पहले अपने घर के तमाम कीमती और रेशमी वस्त्रों को बैलगाड़ी पर लदवाकर शहर के बीचोंबीच उसकी होली जलवाई. उनकी पत्नी जानकीदेवी ने भी सोने और चांदी जड़े हुए अपने वस्त्रों को आग के हवाले कर दिया और आजीवन खादी पहनने का व्रत ले लिया. अंग्रेज सरकार द्वारा अपनी ओर से दिए गए ‘राय-बहादुर’ की पदवी उन्होंने त्याग दी. बंदूक और रिवॉल्वर जमा कराते हुए उन्होंने अपनी लाइसेंस भी वापस कर दी. अदालतों का बहिष्कार करते हुए अपने सारे मुकदमें वापस ले लिए. मध्यस्थता के जरिए विवादों को निपटाने के लिए अपने साथी व्यवसायियों को मनाया. जिन वकीलों ने आज़ादी की लड़ाई के लिए अपनी वकालत छोड़ दी उनके निर्वाह के लिए उन्होंने कांग्रेस को 1 लाख रुपये का अलग से दान दिया. सनातनियों के घोर विरोध के बावजूद वर्धा स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर में दलितों के प्रवेश कराने में उन्होंने विनोबा के नेतृत्व में अद्भुत सफलता हासिल की. अपने घर के प्रांगण, खेतों और बगीचों में स्थित कुओं को उन्होंने दलितों के लिए खोल दिया. असहयोग आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ तीखा भाषण देने और सत्याग्रहियों का नेतृत्व करने के लिए 18 जून, 1921 को जमनालाल को गिरफ़्तार कर लिया गया. उनके साथ-साथ विनोबा को भी गिरफ़्तार कर लिया गया. विनोबा को तो एक ही महीने की सजा हुई, लेकिन जमनालाल को डेढ़ साल के सश्रम कारावास की कठोर सजा और 3000 रुपये का जुर्माना भी हुआ. 11 फरवरी, 1942 को अकस्मात् ही जमनालालजी का देहांत हो गया. उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी जानकीदेवी ने स्वयं को देशसेवा में समर्पित कर दिया. विनोबा के भूदान आंदोलन में भी वह उनके साथ रहीं. जमनालाल जी ने गांधीजी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को वास्तविक जीवन में जीकर दिखाया. उन्होंने प्रसिद्ध संत तुकाराम के इस पद को अपने जीवन का सूत्र माना था- ‘जोडोनियां धन उत्तम वेव्हारें. उदास विचारें वेच करी..’ यानी धन शुद्ध साधनों से और ईमानदारी से अर्जित करो और खर्च करो दूसरों की भलाई के लिए उदारतापूर्वक और विवेकपूर्वक. आज के दौर में कम से कम भारत में ऐसे पूंजीपतियों के उदाहरण तो ढूंढने पर भी बिरले ही मिलेंगे. Read it also-झूठ की फैक्टरी का सामना झूठ की फैक्टरी खड़ी करके जीत हासिल की जा सकती है?

मनोज तिवारी और अमानतुल्ला में कौन गलत?

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‘मैंने सारी कुंडली निकाल ली है, इन्हें बताऊंगा कि पुलिस होती क्या है’ ये घमंड से भरे शब्द हैं दिल्ली से बीजेपी सांसद मनोज तिवारी के. तिवारी जी कुछ समर्थकों के साथ सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन पर पहुंचे थे. उनके तेवर ऐसे थे कि उन्हीं की सरकार द्वारा संचालित दिल्ली पुलिस ने रास्ता रोक दिया. तमतमाए बिलबिलाए मनोज तिवारी ने इस दौरान पुलिसवाले को थप्पड़ भी मार दिया.

इससे पहले जब वो मंच पर चढ़े थे तो उन्हें सीएम केजरीवाल के बिगड़ैल लाड़ले अमानतुल्लाह ने धक्का मार दिया. पुलिसवाले ना होते तो तिवारी साहब एकाध हड्डी तुड़वा कर घर लौटते. हैरत इस बात पर है कि बीजेपी के मुकाबले विनम्र दिखने वाली पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल भी इस तमाशे को देखते रहे.

पार्टी और रुझान से ऊपर उठकर देखने पर अहसास होता है कि भारतीय राजनीति का चेहरा कितना बदल गया है. अब एक-दूसरे का विरोध शाब्दिक नहीं होता, पहलवानी से हो रहा है. पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता निजी खुन्नस में बदल गई हैं. ये हमारे वोटों से चुने हुए नेता हैं जिनका सार्वजनिक व्यवहार हमारे घर के शैतान बच्चों से भी ज़्यादा बचपने भरा है. इनमें से एक वो मनोज तिवारी हैं जो कला के क्षेत्र में देश ही नहीं विदेश तक में जाने जाते हैं, सांसद के तौर पर देश की राजधानी से चुने गए हैं और जिस शहर से देश चल रहा है वहां से अपनी पार्टी के मुखिया हैं, दूसरी तरफ वो अमानतुल्लाह हैं जो देश की राजधानी का प्रशासन देखने वाली पार्टी की तरफ से विधायक हैं. इससे पहले वो रामविलास पासवान की पार्टी से भी चुनाव लड़े थे.

दिल्ली के लोग इन ‘सियासी पहलवानों’ की वो फुटेज बार-बार देखें जिसमें ये अपने शारीरिक बल का शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं. कम से कम एक नागरिक होने के नाते मैं चाहूंगा कि आगामी चुनाव में इन दोनों हिंसक और जामे से बाहर नेताओं को हराकर किसी और को मौका देना चाहिए. किसी ऐसे को जिताया जाए जो कम से कम सार्वजनिक तौर पर बात करना और व्यवहार करना जानता हो. उसे लोकतंत्र में विरोध करने का सलीका सिखाना ना पड़े. जैसा बर्ताव आप अपने बच्चों से अपेक्षित नहीं रखते वैसा व्यवहार करनेवाले लोगों को भविष्य सौंप देना सिर्फ आपकी अपरिपक्वता दिखाएगा. ऐसे सारे नेताओं को झाड़ू से बुहारकर संसदों और विधानसभाओं से बाहर निकाल फेंकना चाहिए.

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हरियाणा कर्मचारी आंदोलन दशा और दिशा 

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पिछले 16 अक्टूबर से रोड़वेज कर्मचारी हड़ताल पर थे. ये हड़ताल 18 दिन रही जो एक ऐतिहासिक कर्मचारी आंदोलन रहा. 2 नवंबर कोमाननीय हरियाणा एन्ड पंजाब उच्च न्ययालयके आश्वाशन पर की 12 अक्टूबर को सरकार और कर्मचारी प्रतिनिधियों को आमने-सामने बैठाकर बातचीत के माध्यम से सही फैसला कोर्ट करेगा. इस आश्वाशन पर रोड़वेज कर्मचारी यूनियनों ने हड़ताल समाप्त कर दी. ये कर्मचारियों की जीत है या सरकार की जीत है. ये सोचने का विषय है. मुझे तो ये सरकार की जीत लग रही है. जो काम सरकार करना चाहती थी वो कोर्ट ने कर दिया.

लेकिन बहुमत कर्मचारियों ने जिस एकता और बहादुरी से लड़ने का परिचय दिया, फासीवादी सत्ता का बहादुरी से सामना किया,उसने आम जनता का दिल जीत लिया. इसलिए आंदोलन को देखे तो ये कर्मचारियों की बहुत बड़ी जीत है. जो एकता कर्मचारियों में देखने को मिली शायद ऐसा पहली बार हुआ. ये एकता भविष्य में रंग लाएगी. ]

हरियाणा में परिवहन की लाइफ लाइन हरियाणा रोड़वेज है. हड़ताल होने के कारण आम जनता जो हजारो की तादात में रोजाना सफर करती है वो खासी परेशानी में थी. हरियाणा सरकार जो तानाशाही में विश्वास रखती है. इस हड़ताल को कुचलने के लिए प्रत्येक हथकंडा अपनाया गया. सरकार और भाजपा द्वारा हड़ताल को तोड़ने के लिए झूठा प्रचार से लेकर दमनात्मक कार्यवाही की गई. हरियाणा सरकार न्यूज पत्रों में बड़े-बड़े विज्ञापनदेकर कर्मचारियों और इस हड़ताल को बदनाम कियागया. हरियाणा सरकार कह रही है कि कर्मचारियों की लड़ाई तनख्वा को बढ़वाने के लिए है. सरकार ने इनको मिल रही सारी सुविधाएं उस विज्ञापन में छपवाई. लेकिन रोड़वेज कर्मचारी अपनी इस हड़ताल करने की वजह सरकार द्वारा रोड़वेज के निजीकरण करने की योजना जिसके तहत हरियाणा सरकार 720 निजी बसे ला रही है.

आंदोलन की दशा

कर्मचारी यूनियन जो 3-4 यूनियनों का सांझा गठजोड़ करके मजबूती से खड़े थे. सभी सरकारी विभागों के कर्मचारी भी इनके समर्थन में 2 दिन की सामूहिक हड़ताल करके समर्थन दे चुके थे. अध्यापक 100 बस सरकारी बेड़े में अपनी तनख्वा से देने की पेशकश सरकार को कर चुके थे.सैंकड़ो कर्मचारियों को बर्खास्त किया जा चुका था तो हजारो पर मुकद्दमे दर्ज हुए थे,गिरफ्तारियां हुई थी. ये कर्मचारी आंदोलन इतिहास में एक मजबूत आंदोलन के तौर पर याद किया जाएगा.

मैं मेरे छात्र जीवन से ही कर्मचारी आंदोलन को समर्थन करता रहा हूँ. बहुत बार कर्मचारी आंदोलन में लाठियां भी खाई है. मुझे याद है 2006-07 में हरियाणा सरकार हिसार से दिल्ली व चंडीगढ़ के लिए वॉल्वो बस चला रही थी. हम रात 12 बजे ही कर्मचारियों के साथ रोड़वेज हिसार में वॉल्वो बस न चले इसके विरोध में रुक गए. सुबह 6 बजे बस चलनी थी विरोध हुआ. सरकार ने लाठी चार्ज किया. कर्मचारी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. लाठी चार्ज और वॉल्वो बस के खिलाफ पूरे हरियाणा में रोड़वेज ने चक्का जाम कर दिया. हड़ताल 2 दिन चली उसके बाद सरकार और कर्मचारी यूनियनों का समझौता हो गया. यूनियन ने ऐलान किया कि सरकार झुक गयी और हमारी सब मांगे मान ली गयी है.

लेकिन वॉल्वो बस उसके बाद भी चलती रही अब सवाल ये पैदा हुआ कि कौनसी मांग मानी ली गयी. क्योंकिविरोध और चक्का जाम तो वॉल्वो बस के खिलाफ था. लेकिन वो तो अब भी चल रही थी. मैने अलग-अलग विभागों की दर्जनों हड़तालें देखी है उनमें गया भी हूँ यूनियन नेताओं के निजीकरण के खिलाफ जोशभरे भाषण भी सुने है लेकिन फिर भी सरकारे निजीकरण करने में कामयाब रही है. लेकिन प्रत्येक आंदोनल के बाद यूनियन बोलती रही है कि सरकार झुक गयी और जीत हमारी हुई है अगर ऐसा हुआ है तो फिर निजीकरण क्यों हुआ है. जिस जीत का दावा यूनियनें करती रही आखिर वोकौनसी जीत थी, किन मुद्दों पर जीत हासिल की गई.

हरियाणा ही नही पूरे देश का प्रगतिशील बुद्विजीवी, लेखक, कलाकार, वामपन्थी आज भी इस हड़ताल को मजबूती से समर्थन कर रहा है. लेकिन क्याइन कर्मचारी यूनियनों के अवसरवादी, सुधारवादी, समझौतावादी कार्यक्रम के आधार पर निजीकरण को रोका जा सकता है?

हड़ताल के दौरान सरकार और कर्मचारियों के प्रतिनिधियों की बातचीत का वीडियो देखा. सरकार जहां निजी बसों के पक्ष में मजबूती से खड़ी दिखी तो वही कर्मचारी नेता बातचीत में सरकारी बस लाने की और इसके लिए 1 महीने का वेतन देने की बात करते हुए दिखे लेकिन साथ ही सरकार परये आरोप लगाते मिले की ये बस महंगी हैऔर इनके टेंडर बंटवारे में बहुत बड़ा घोटाला हुआ है. इन बसों के सिर्फ कुछ मालिक है.

कर्मचारियों का ये पक्ष क्या साबित करता है? यूनियन पक्ष के अनुसार अगर बस सस्ती और टेंडरबंटवारा सरकार ईमानदारी से करती तो क्या कर्मचारी यूनियन को कोई दिक्कत नही है?

इस हड़ताल को इनेलो नेता अभय चौटाला और कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी समर्थन दिया है. लेकिन क्या वो ईमानदारी से समर्थन में है. जब इनेलो और कॉग्रेस की सरकार सत्ता में थी तो उस समय ये खुद भी निजीकरण कर रहे थे साथ में ही कर्मचारी आंदोलन का दमन भी कर रहे थे. दोनों विपक्षी पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं को आंदोलन के पक्ष में उतारने की बजाए सिर्फ ब्यान देकर ही फसल काटने की फिराक में है.

हरियाणा में सर्व कर्मचारी संघ सी.पी.एम. समर्थित और हरियाणा कर्मचारी महासंघ सीपीआई समर्थित यूनियनें है जिनका लगभग सभी विभागों में मजबूत प्रभाव है. हरियाणा का कर्मचारी आंदोलन ही नही पूरे देश का कर्मचारी आंदोलन जहां सी.पी.एम. या सीपीआई की या दूसरी अवसरवादी यूनियनें है. जिनका कोई क्रांतिकारी कार्यक्रम नही है वहाँ सब जगह बड़ी बुरी दशा है. इन कर्मचारी यूनियन में व्यक्तिवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद और अवसरवाद हावी होता है. कर्मचारी जो यूनियन का नेता बन गया वो ड्यूटी कभी करता ही नही होता.  एक रोड़वेज डिप्पु की कर्मचारी यूनियन यूनिट का प्रधान तो ऐसा था जो खुद निजी बस में हिस्सेदार था. क्या ऐसे नेता लड़ेंगे निजी बसों के खिलाफ लड़ाई.

इस पूरी लड़ाई में हरियाणा का नागरिक क्या सोचता है और वो किस तरफ खड़ा है.ये जरूर देखना चाहिए. 

जनता क्यो है खिलाफ

कर्मचारियों की ये लड़ाई रोड़वेज को बचाने की लड़ाई हैताकि रोजगार बचाया जा सके.सरकार पूंजीपतियों के फायदे के लिए सरकारी विभागों को निजी हाथों में सौंप कर रोजगार खत्म करना चाहती है. इसलिए कर्मचारी सरकार के खिलाफ व रोजगार के लिए लड़ रहे है.

हरियाणा की जनता कि पहली पसन्द सरकारी नौकरी है. इसके बाद भी क्या कारण है कि जनता रोड़वेज के समर्थन में मजबूती से क्यों नहीं आई. इसके विपरीत जैसे ही सरकार ने सिर्फ 3 महीने के लिए भर्ती करने के लिए बेरोजगारों को बुलाया हजारोंकी तादात में 10 वीं से लेकर एम. फील.किये हुए नौजवानोने नौकरी के लिए अप्लाई कर दिया. दूसरे विभागों के कर्मचारियों ने टिकट काटने व बस चलाने की जिम्मेदारी उठाई.

एक कर्मचारी दूसरे कर्मचारी के खिलाफ क्यों, नौजवानो द्वारा ये गद्दारी क्यों –

इसका सीधा कारण जनता व कर्मचारियों मेंवर्गीय चेतना का न होना है. कुछ साल पहले कर्मचारियों की हड़ताल का समर्थन कर रहे किसान सभा वालो पर एक गांव में हमला तक कर दिया गया था. इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार खुद कर्मचारी है या कर्मचारियों की अवसरवादी यूनियनें है. सरकारी कर्मचारी वोचाहे किसी भी विभाग से और किसी भी पोस्ट से सम्बंध रखता हो. उसका व्यवहार आम जनता के प्रति बहुत ही घटिया स्तर का हो गया है. वो अपने आपको जनता का नौकरनही मालिक समझने लगता है उसी समझ के अनुसार वो जनता से घटिया व्यवहार करता है. कर्मचारियों की तनख्वा 30 हजार से लाख रुपये तक है लेकिन फिर भी बहुमत कर्मचारी की नजर जनता की जेब पररहती है. किसी भी विभाग में बिना रुपये लिए कोई काम नही होता है. अच्छी तनख्वा और अच्छी सुविधाएं लेने के बावजूद कर्मचारी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी नही निभाताहै. सफाई कर्मचारी सफाई नही करता, बिजली कर्मचारीबिना रुपये लिए तार भी नही जोड़ता, सरकारी स्कूलों और हस्पतालों के जो हालात है वो सबके सामने ही है. बाकी विभागों के हालात भी बहुत बुरे है. अगर कर्मचारी यूनियनों का कार्यक्रम क्रांतिकारी कार्यक्रम होता तो उनके मार्फ़त सभी विभागों के कर्मचारियों को सत्ता की जन विरोधी नीतियों, उदारीकरण, भूमंडलीकरण व निजीकरण के खिलाफ वर्गीय राजनीतिक चेतना से लैस किया जा सकता था. अगर कर्मचारियों में ये चेतना आती तो जनता में भी आती और उनके व्यवहार में ये सब दिखता और जनता कभी खिलाफ नही जाती.

वर्गीय राजनीतिक चेतना न होने के कारण अवसरवाद 

वर्तमान में वर्गीय राजनीतिक चेतना न होने के कारण कर्मचारी कितना अवसरवादी है इसका अंदाजा यही से लगाया जा सकता है कि हरियाणा में कर्मचारी यूनियनों का गठन सी.पी.एम. और सीपीआई की बदौलत हुआ. आज तकजितने भी कर्मचारी आंदोलन हुए उनमे लाठी खाने से जेल जाने तक इन दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता शामिल रहे. लेकिन ये भी सच्चाई है कि कभी भी कर्मचारियों ने सी.पी.एम. और सीपीआई को वोट नही दिया. वोट देने के समय उन्ही पार्टियों को चुना जो निजीकरण करना चाहती थी. कर्मचारियों ने कभी भी अपने गांव या कालोनियों में नौजवानो, मजदूरों, किसानों और महिलाओं के जन संगठन बनाने में कभी भी साथ नही दिया. विरोध जरूर किया.

आंदोलन की दिशा क्या हो 

1. अगर ईमादारी से निजीकरण रोकना है तो सबसे पहले कर्मचारियों में क्रांतिकारी विचार से लैसकर्मचारी यूनियन बनाने की जरूरत है.जो साम्राज्यवादी नीतियों को पहचान ले और सुधारवाद, अवसरवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद और करप्शन के खिलाफ मजबूती से लड़ सके. 2. कर्मचारियों को यूनियन के मार्फ़त मेहनतकश आवाम के पक्ष में वर्गीय राजनीतिक चेतना से लैस किया जाना सबसे पहली जरूरत है. 3. कर्मचारी जिस भी जगह रहता है उस जगह अपने आस-पास जनवादी संगठनो का निर्माण करने में मद्दत करे. ताकि सरकार की जनविरोधी और निजीकरण विरोधी नीतियों के खिलाफ जनता का एक मजबूत मोर्चा बनाया जा सके. 4. जनता के साथ कर्मचारियों का व्यवहार सुधारा जाए. क्योंकि कर्मचारी की तनख्वा जनता की जेब से ही आती है. 5. कर्मचारी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाये ताकि जनता को विश्वास हो सके कि कर्मचारी काम चोर नही है. 6. दुश्मन और दोस्त को पहचाना जाए.

ये लड़ाई सिर्फ निजीकरण के खिलाफ नही है, सिर्फ लड़ाई रोजगार के लिए नही है. ये लड़ाई साम्रज्यवाद की उदारीकरण,निजीकरण और भूमंडलीकरण (LPG)नीतियों के खिलाफ है जो मेहनतकश आवाम को गुलाम बनाती है. अगर आने वाले समय मे आंदोलन की सही दिशा नही पकड़ी तो सरकार को निजीकरण करने से रोकना नामुमकिनहै.

UDay Che

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दलित गुमराह तो नहीं है

भारत में वर्ण-व्यवस्था सदियों से चलता चला आ रहा है. कालान्तर में जातियों ने वर्ण-व्यवस्था का स्थान ले लिया; लेकिन जातियों ने वर्ण-व्यवस्था के अंतर्गत ही अपना विकास सुनिश्चित किया. अब जातियां ही वर्ण-व्यवस्था का अस्तित्व हैं. जातियां ख़त्म हो गईं तो वर्ण-व्यवस्था टूट जाएगी.

सर्वप्रथम जातियों के अस्तित्व पर ज्योतिबा फुले ने प्रहार किया. रामा स्वामी नायकर और पेरियार ने भी जाति पर प्रहार किया. 1936 में डा.आम्बेडकर ने “जातिप्रथा उन्मूलन” पुस्तक की रचना की और ताउम्र जातिप्रथा तोड़ने की कोशिश करते रहे. जब जातिप्रथा उन्हें अभेद्य दीवार की तरह प्रतीत हुई तो वे जातिप्रथा की नींव कमजोर करने व अनुसूचित-जातियों, जनजातियों को बौद्ध-धर्म स्वीकार करने की सलाह देते हुए खुद भी 14 अक्टूवर 1956 को दीक्षा-भूमि नागपुर में लाखों अनुयाइयों के साथ बौद्ध-धर्म स्वीकार कर लिया. इसके बाद भी वे भारत से जातिप्रथा ख़त्म किए जाने के लिए प्रयास करते रहे. उन्हें पता था कि सभी दलित जातियां बौद्ध-धर्म नहीं स्वीकार करेंगी. यदि सम्पूर्ण दलित जातियां बौद्ध-धर्म स्वीकार भी कर लें तो भी अन्य वर्णों एवं ओबीसी की जातियाँ तो अस्तित्व में रहेंगी ही. ऐसी स्थिति में भारत से जातिप्रथा ख़त्म नहीं होंगी. अतः उनका प्रयास था कि संविधान में समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की स्थापना कर दिया जाय. उनका मत था कि संवैधानिक प्रक्रिया में यदि एक व्यक्ति का एक मूल्य स्थापित हो जाय तो देर-सबेर भावी पीढियां इस प्रश्न को हल कर लेंगी. इसीलिए उन्होंने 15 मार्च 1947 को “राज्य और अल्पसंख्यक” लिखकर संविधान सभा के समक्ष अपने द्वारा लिखित संविधान को अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया था. उसमें इन्होंने बहुत ही साफ शब्दों में लिख है कि लोकहित में लोकतंत्र को राजकीय समाजवाद की स्थापना अपने संविधान में करना ही होगा. दुर्भाग्यवश, राजकीय समाजवाद कौन कहे डा.आम्बेडकर साहब के “राज्य और अल्पसंख्यक” की कोई भी पंक्ति स्वीकार नहीं की गई. परंतु, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि बाबा साहब डा.भीमराव आम्बेडकर जातिप्रथा उन्मूलन से एक अंगुल भी टस से मस हुए.

1980 के दसक में मान्यवर कांशीराम का उदय हुआ. इन्होंने कहा कि जातिप्रथा को तोडा नहीं जा सकता है बल्कि जातियों का ध्रुवीकरण करके उनके वोट के द्वारा सत्ता में आया जा सकता है. इस तरह जाति भले न टूटे, जाति भले न ख़त्म हो किन्तु जातियों को मजबूत तो किया जा सकता है. उन्होंने बसपा के द्वारा दलित जातियों को अवसरवाद सिखाया और डा.आम्बेडकर के जातिप्रथा उन्मूलन का उद्देश्य दलित जातियों के मस्तिष्क में उलट दिया.

डा.आम्बेडकर ने भातीय मार्क्सवादियों से मार्क्सवाद सीखा और उसका प्रभाव उन पर बहुत प्रभावकरी नहीं बन पड़ा, बल्कि उन्होंने यह कह दिया कि कम्युनिज्म सूअरों का दर्शन है. हलाकि, अपने इस बात के खण्डन में उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा मैं कार्लाइल से प्रभावित होने के कारण कह और लिख दिया था जबकि श्रमिकों को टोस्ट और मक्खन कौन कहे, उन्हें तो एक जून की रोटी तक नहीं नसीब है. डा.आम्बेडकर ने लिखा है कि भारत में श्रमिकों के दो दुश्मन हैं-1) ब्राह्मणवाद तथा 2) पूँजीवाद. इन व्यवस्थाओं के निदान के भी दो ही रास्ते हैं-1) बुद्धवाद तथा 2) मार्क्सवाद. मुझे बुद्ध का रास्ता अधिक श्रेष्ठकर लगा. मैंने इसे धारण कर लिया है. कालान्तर में यदि तुम्हें बुद्धवाद से समस्या का निदान न ठीक लगे, तो तुम्हें बेशक मार्क्सवाद को ही अपना लेना होगा, और तीसरा कोई भी रास्ता नहीं है.

किन्तु, डा.आम्बेडकर की एक पूर्वोक्ति को दलित भी दोहराता रहता है और मान्यवर कांशीराम साहब ने कम्युनिस्ट पार्टियों में बचे-खुचे दलितों को बसपा से जोड़ने के लिए कम्युनिस्टों को “हरी घास का हरा साँप” कहकर दलितों के मन-मस्तिष्क में मार्क्सवाद का विरोध भर दिया. दलित दो जगहों के क्रांतिकारी सिद्धांत (डा.आम्बेडकर का जातिप्रथा उन्मूलन और मार्क्स का वर्ग-संघर्ष) से महरूम हो गया.

इधर बसपा अपने स्वक्छन्दातावादी प्रकृति से मान्यवर कांशीराम के दलित सशक्तिकरण के दर्शन से भी महरूम हो गई. बसपा की नैय्या डूबती नजर आ रही है. कुछ पूर्व से ही बामसेफ के नए संस्करण के साथ मान्यवर बामन मेश्राम साहब के सूर्य रूप में उदित होने लगे हैं. मेश्राम साहब ने बामसेफ का एक अनुसांगिक राजनैतिक पार्टी बीएमपी को राजनैतिक रूप प्रदान कर दिया.

कांशीराम साहब ने बहुजन का नारा दिया था और जय भीम उनका मूल मन्त्र था. मेश्राम साहब ने बहुजन के स्थान पर मूलनिवासी शब्द को प्रचारित किया तथा “जय भीम” के स्थान पर “जय मूलनिवासी” को अभिवादन के बतौर पेश किया. इनका नारा है-बोल पचासी-मूलनिवासी”.

डा.आम्बेडकर ने अपनी पुस्तक “शूद्र कौन थे” में लिखा है कि आर्य कोई प्रजाति नहीं है. आर्य एक भाषा है. यह भाषा भारत और उसके इर्द-गिर्द बोली जाती थी. इसके बोलने वालों को आर्य कहा जाने लगा. इस तरह दलित व ब्राह्मण दोनों ही आर्य हैं. बाबा साहब ने तिलक के सिद्धान्त को गलत साबित किया कि आर्य यूरेशिया व काकेशिया से भारत में आए हैं. बाबा साहब ने लिखा है कि शूद्रों की तरह ब्राह्मण भी भारत के मूलनिवासी हैं. डा.आम्बेडकर के इस सिद्धांत के विरूद्ध बामन मेश्राम साहब ने अमेरिका के साल्टलेक सिटी, उटाह विश्वविद्यालय के मानवीय आनुवंशिक एकलिस संस्थान के विद्वान बामसाद ने भारत के ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्यों के DNA का मिलान यूरेशिया के लोगों से किया जो क्रमशः 99.9, 99.88 और 99.86 प्रतिशत मिलता है. अर्थात भारत के ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य युरेशियन है. यही नहीं बामन मेश्राम साहब ने उद्घोषणा किया है कि अब हमें दूसरी आजादी की लड़ाई लड़नी पड़ेगी. जिस तरह भारत से अंग्रेजों को खदेड़कर आजादी प्राप्त की गई है, ठीक वैसे ही युरेशियन ब्राह्मणों को भारत से निष्कासित कर दलितों (उनके शब्दों में मूलनिवासियों को) को आजादी दिलाना बामसेफ और बीएमपी-मेश्राम का उद्देश्य है. क्या यहाँ यह बात अजीब और हास्यास्पद नहीं लगता है कि जो ब्राह्मण 8-10 हजार वर्षों से भारत में रह रहा हो, जिसकी न जाने कितनी पीढियां इस देश के नागरिक हैं, ज़र-जमीनें स्थाई हैं और डा.आम्बेडकर के तर्कों और सिद्धान्तों के आधार पर ब्राह्मण भारत का मूलनिवासी है-उसे खदेड़ने की बात कर रहे हैं. ओबीसी वर्ग के शासक ने 70 हजार दलितों को नौकरियों में उनके पदों से रिवर्ट कर निम्न पदों पर पुनर्स्थापित करने का ऐतिहासिक पाप किया है. यही वर्ग है जो दलितों की पिटाई में सबसे अग्रणी रहता है. उसे शूद्र मानता है और उससे शूद्र मनवाने के चक्कर में दलित उसे मूलनिवासी मानता हुआ दोस्त मानता रहता है. यह भी हास्यास्पद लगता है कि सछूत वर्ग अछूत की श्रेणी में आकर अपने को पतित जाति में क्यों शामिल करेगा?

डा,आम्बेडकर के दर्शन को मान्यवर कांशीराम ने उलट दिया. कांशीराम को सुश्री मायावती जी ने उलट दिया. और अब मेश्राम साहब में सब की ऐसी की तैसी करते हुए जातिप्रथा उन्मूलन, जाति सशक्तिकरण, जाति ध्रुवीकरण व सत्ता ग्रहण का एनकेन प्रकारेण का तरीका ही उलट दिया है और दलित जातियों को एक नए भंवरजाल में डाल दिया है.

दलित न जातिप्रथा उन्मूलन के लिए कन्विंस है, न जाति ध्रुवीकरण के लिए ही, न बौद्ध धर्म के लिए और न मूलनिवासी के दूसरी आजादी के लिए ही तैयार है. दलित ब्राह्मणों पर जातिवाद का आरोप लगता है किन्तु खुद आरक्षण के भँवर में इस तरह उलझा है कि स्वयं ही जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर सिद्ध करता रहता है कि हे ब्राह्मण देवता! मैं ही चमार हूँ, मैं ही कोरी हूँ, मैं ही पासी हूँ, मैं ही धोबी हूँ, मैं ही भंगी हूँ. ब्राह्मण कहाँ कह रहा है कि तुम चमार न रहो, कोरी न रहो, पासी न रहो. जैसा वह चाहता है सम्भ्रांत दलितों की एक लालच पूरी दलित जातियों को शूद्र-चमार बनाए रखने में मदद करती है. एक बहुत ही विचारणीय बिंदु पर मैं चर्चा को ले चल रहा हूँ. डा.आम्बेडकर ने एक हद तक मार्क्सवाद को अभिशापित किया. कांशीराम ने तो बहुत ही सजगता के साथ कम्युनिस्टों को हरी घास का हरा सांप कहा. बामन मेश्राम भी मार्क्सवाद को मूलनिवासियों के रास्ते का रोड़ा मानते हैं. और भी बहुत सारे दलित नस्लवादी संगठन हैं जो मार्क्सवाद को दलितों के हाथ का झुनझुमा मानते हैं. अब गौर करिए कि आरएसएस, बीजेपी, शिवसेना, बजरंग दल तथा अन्य अनेक अनुसांगिक संगठन मार्क्सवाद के धुर विरोधी हैं. कम्युनिस्ट ही वह वर्ग है जिससे आरएसएस व इसके अनिसंगिक संगठन डरते हैं और इन्हें दुश्मन, आतंकवादी, नक्सलवादी व माओवादी कहकर बदनाम भी करते हैं.

यहाँ मैं कम्युनिस्ट की बात कर रहा हूँ. मैं नक्सलाइट और माओवादियों की पक्षधरता की बात नहीं कर रहा हूँ और न मैं उन्हें कम्युनिस्ट ही मनाता हूँ. आप सोचिए दलित और आरएसएस में कौन सा ऐसा कॉमन तत्व है जो दोनों को कम्युनिस्ट ही दुश्मन नजर आ रहे हैं. मेरा मनना है कि मार्क्सवाद आंबेडकरवाद का दोस्त है. दलित वर्ग को मार्क्सवाद के निश्चित दोस्ती करनी चाहिए. दर्शन का पूरा हिस्सा आम्बेडकर के रास्ते का सहयोगी है. मार्क्सवाद में न भाग्य है, न भगवान है, न तंत्र-मन्त्र है, न जादू-टोना है, भूत-प्रेत का कांसेप्ट है. मार्क्सवाद का मूल मन्त्र है कि यदि सब को शिक्षा सब को काम उपलब्ध कराया जाय तथा निजी संपत्ति का उन्मूलन कर दिया जाय. खेती, ज़मीन, संसाधन, बीमा बैंक का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाय तो जातिवाद तो आधा अपने आप ख़त्म हो जाएगा. बाकी राज्य, मसीनरी, शासन, प्रशासन और मिडिया के माध्यम से अनेक संस्कृति कार्यक्रमों के द्वारा कुछ पीढ़ियों के अंतराल में जाति और धर्म को राजनीति और मानव में हस्तक्षेप का करना बंद करा सकने में सक्षम हुआ जा सकता है. लेकिन, सच यह है कि दलितों को गुमराह करने के लिए पूँजीवादी शक्तियां और आरएसएस के घुसपैठिए दलितों को वर्ग-संघर्ष से रोकते हैं. मार्क्सवाद को दलितों का दुश्मन सिद्ध कर रखे हैं.

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आज दलित और आरएसएस दोनों मूल रूप से नस्लवाद की बात करते हैं. आरएसएस यदि हिंदुत्व को एक नस्ल मानता है तो दलित तथाकथित मूलनिवादियों को एक नस्ल मानता है. दोनों नहीं चाहते हैं कि उनकी नस्ल ख़त्म हो. हाँ, यह जरूर चाहते हैं कि हमारी नस्ल स्थापित रूप से शासन करे और अपने सिद्धांत, मान्यताएं, रीति-रिवाज, संस्कृति, पूजा-पद्धति, धर्म और ईश्वर को स्वीकार करे. दलित अंनिश्वरवादी है, लेकिन दलितों की बहुसंख्यक जातियां हिन्दू धर्म और ईश्वर को ही मानती हैं, भले ही वे बुद्ध और आम्बेडकर में विश्वास रखते हों.

मार्क्स ने पूँजी के खण्ड-3 पृष्ठ 601 पर लिखा है कि “शासक वर्ग शासित वर्ग की अग्रतम मेधाओं को आत्मसात करने में जितना अधिक समर्थ होता है, उसका शासन भी उतना ही अधिक स्थिर और घातक होता है.” भारत और दलित के परिप्रेक्ष्य में उक्त युक्ति डा.आम्बेडकर को संविधान निर्माता बनाकर, कांशीराम को दलितों का चाणक्य बनाकर, सुश्री मायावती को दलितों की देवी बनाकर तथा पुनः बामन मेश्राम को क्राँति का दूत बनाकर औपनिवेशिक सत्ता और शासक वर्ग ने दलितों के अग्रतम मेधाओं को अपने अनुसार दलितों का नेता और मशीहा साबित कराकर सिद्ध कर दिया है कि वे दलितों को वास्तविक क्राँति व् वर्ग-संघर्ष से दूर कर अधिक स्थिर और घातक शासन कर रहे हैं.

यहाँ दलितों को समझना है कि यदि ब्राहण और दलित दो राष्ट्र की तरह आमने-सामने हैं, दोनों के उद्देश्य एक दूसरे के विपरीत हैं तो दोनों के एक ही धरती पर मार्क्सवाद दुश्मन कैसे है?

दलितों के संगठन मार्क्सवाद को भारत में लागू न होने वाला संगठन मानते हैं. तर्क के लिए कहते हैं कि मार्क्स यदि भारत में पैदा हुए होते तो सर्वप्रथम वे जाति को तोड़ने की बात करते, किन्तु वे फ़्रांस में पैदा हुए, भला क्या जाने की जातिवाद क्या होता है. यहाँ दलितों का दोगलापन स्पष्ट दिखता है कि एक तरह मार्क्सवाद के बहाने तो जातिवाद को तोड़ने की बात करते हैं किन्तु जब भारतीय पृष्ठभूमि पर राजनैतिक रूप से मैदान में दलितों को देखते हैं तो एकदम नंगा नस्लवादी राजनीति का हिमायती है.

यहाँ शंका होना स्वाभाविक है कि दलितों के अग्रतम मेधाओं पर ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद अपनी तीसरी दृष्टि हमेशा लगाए रखती है. ब्राह्मणों सहित अन्य जातियों के गरीब वर्ग से दलितों की एकता तोड़ देते है तथा इन्हें आपस में जातियों और धर्मों के भेद-भाव में उलझाए रखते हैं. दलित सर्वहारा वर्ग है. क्रांतिकारी वर्ग है. इसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है, पाने के लिए संसार है. इसलिए, प्रभु वर्ग (पूँजीवाद) डरता है कि कहीं कोई असली सर्वहारा वर्ग का नेता मार्क्सवाद के सिद्धांत पर भारत में वर्गीय एकता स्थापित करते हुए क्राँति का सूत्रपात न कर दे. इसलिए दलित वर्ग को एक फॉल्स गॉड फादर देकर उसी में हमेशा फसाए रखता है तथा स्वयं सुरक्षित-निश्चिन्त स्थिर व घातक शासन करता रहता है.

आर डी आनंद

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डाइवर्सिटी डे :2018

स्वाधीनोत्तर भारत के दलित आंदोलनों के इतिहास में भोपाल सम्मलेन (12-13 जनवरी,2002) का एक अलग महत्व है,जिसमें 250 से अधिक शीर्षस्थ दलित बुद्धिजीवियों ने शिरकत किया था.उसमें दो दिनों के गहन विचार मंथन के बाद 21 सूत्रीय ‘भोपाल घोषणापत्र’ जारी हुआ था जिसमें अमेरिका की डाइवर्सिटी नीति का अनुसरण करते हुए वहां के अश्वेतों की भांति ही भारत के दलितों(एससी-एसटी)को सप्लायर,डीलर,ठेकेदार इत्यादि बनाने का सपना दिखाया गया था.किन्तु किसी को भी यकीन नहीं था कि डाइवर्सिटी नीति भारत में लागू भी हो सकती है.पर, भोपाल घोषणापत्र जारी करते समय किये गए वादे के मुताबिक, एक अंतराल के बाद 27 अगस्त 2002 को, दिग्विजय सिंह ने अपने राज्य के छात्रावासों और आश्रमों के लिए स्टेशनरी,बिजली का सामान,चादर,दरी,पलंग,टाटपट्टी ,खेलकूद का सामान इत्यादि का नौ लाख उन्नीस हज़ार का क्रय आदेश भोपाल और होशंगाबाद के एससी/एसटी के 34 उद्यमियों के मध्य वितरित कर भारत में ‘सप्लायर डाइवर्सिटी’ की शुरुवात कर दी थी.

दिग्विजय सिंह की उस छोटी सी शुरुआत से दलितों में यह विश्वास पनपा था कि यदि सरकारें चाहें तो सदियों से उद्योग-व्यापार से बहिष्कृत किये गए एससी/एसटी को उद्योगपति-व्यापारी बनाया जा सकता है.फिर क्या था ! देखते ही देखते डाइवर्सिटी लागू करवाने के लिए ढेरों संगठन वजूद में आ गए जिनमें आरके चौधरी का बीएस-4 भी था.बाद में इसी उद्देश्य से उत्तर भारत के दलित लेखकों ने 15 मार्च,2007 को ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’(बीडीएम) संगठन की स्थापना किया,जिसका संस्थापक अध्यक्ष बने लेखक एच.एल. दुसाध.

जिन दिनों बीडीएम के निर्माण के लिए लेखकों से विचार-विमर्श की प्रक्रिया चल रही थी उन्ही दिनों डॉ. संजय पासवान ने डाइवर्सिटी पर एक बड़ा सम्मलेन आयोजित करने का मन बनाया.उसके लिए दलित आंदोलनों की कई महत्त्वपूर्ण तिथियों की उपेक्षा कर उस दिन को चुना, जिस दिन मध्य प्रदेश में लागू हुई थी ‘सप्लायर डाइवर्सिटी’. 2006 के 27 अगस्त को उस सम्मलेन का आयोजन ‘वंचित प्रतिष्ठान’ और ‘एमेटी दलित सिनर्जी फोरम’ द्वारा दिल्ली के ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ में हुआ जिसमें दिग्विजय सिंह और भारत में डाइवर्सिटी के सूत्रपात्री चंद्रभान प्रसाद सहित पदमश्री डॉ.जगदीश प्रसाद,प्रो.वीरभारत तलवार,पत्रकार अभय कुमार दुबे,चर्चित दलित साहित्यकार डॉ.जय प्रकाश कर्दम ,एमेटी विवि के एके चौहान और मैनेजमेंट गुरु अरिंदम चौधरी जैसे जाने-माने बुद्धिजीवियों ने शिरकत किया था. उस आयोजन का नाम दिया गया था ‘डाइवर्सिटी डे’. बाद में जब 15 मार्च,2007 को बीडीएम की स्थापना हुई, बहुजन डाइवर्सिटी मिशन से जुड़े लेखकों ने मध्य प्रदेश में लागू हुई सप्लायर डाइवर्सिटी से प्रेरणा लेने के लिए भविष्य में भी ‘डाइवर्सिटी डे’ मनाते रहने का निर्णय लिया.इस तरह बीडीएम के जन्मकाल से ही हर वर्ष 27 अगस्त को देश के जाने-माने बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में डाइवर्सिटी डे मनाने को जो सिलसिला शुरू हुआ ,वह आजतक अटूट है.इस बीच डाइवर्सिटी के वैचारिक आन्दोलन के फलस्वरूप उतर प्रदेश , बिहार ,उत्तराखंड इत्यादि में नौकरियों से आगे बढ़कर उद्योग-व्यापार में हिस्सेदारी का दृष्टान्त स्थापित हो चुका है.

विगत कुछ वर्षों से कुछ अत्याज्य कारणों से डाइवर्सिटी डे का आयोजन नियत तिथि पर नहीं हो पा रहा है. इस बार भी नियत तिथि पर न होकर 13वें ‘डाइवर्सिटी डे’ का आयोजन 4 नवम्बर, 2018, को नगरपालिका कम्युनिटी हॉल ,मऊ, उत्तर प्रदेश में होने जा रहा है . इस बार भी इसमें हमेशा की तरह देश के विभिन्न अंचलों के जाने-माने प्रमुख लेखक, पत्रकार और शिक्षाविद शिरकत रहे हैं. इस बार एच.एल दुसाध सहित जो हस्तियाँ शिरकत कर रही हैं, वे हैं- बुद्ध शरण हंस, डॉ.लाल रत्नाकर, महेंद्र नारायण सिंह यादव, के.नाथ, फ्रैंक हुजुर, विद्या गौतम, डॉ.राम बिलास भारती, अरसद सिराज मक्की, सत्येन्द्र पीएस,भंवर मेघवंशी( सामाजिक कार्यकर्त्ता , भीलवाड़ा,राजस्थान ), गोरख पासवान, चंद्रभूषण सिंह यादव,विद्यानंद आजाद, आरके यादव, शिवचंद राम,के.सी.भारती, डॉ. जी.सिंह कश्यप, उमेश कुमार रवि , डॉ. अमरनाथ पासवान, डॉ. राजबहादुर मौर्य,डॉ.राहुल राज, डॉ. कौलेश्वर “प्रियदर्शी”,डॉ. नानटून पासवान, अनूप श्रमिक, निर्देश सिंह,ज्ञानवती पासवान, डॉ.सीपी आर्या, राजवंशी जे.ए.आंबेडकर , मन्नु पासवान, इकबाल अंसारी,गणेष रवि,रामाश्रय बौद्ध(गढ़वा, झारखण्ड), कपिलेश प्रसाद , अरमा कुमारी.

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