अब यूपी के बहुजन सहयोगियों ने उड़ाई मोदी की नींद

लखनऊ। 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा की छटपटाहट साफ दिख रही है. तो इस बीच एनडीए के बहुजन नेताओं ने भाजपा की मुश्किल बढ़ा दी है. शनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पूर्वांचल के महत्वपूर्ण जिले गाजीपुर में होने वाली रैली में शामिल नहीं होकर स्थानीय दिग्गज और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल ने साफ कर दिया कि भले ही केंद्र में मोदी का राज हो पूर्वांचल में उनका सिक्का चलता है. तो वहीं पीएम मोदी की रैली में शामिल नहीं होकर उन्होंने भाजपा और पीएम मोदी को असहज भी कर दिया.

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज के दो महत्वपूर्ण नेताओं के इस विद्रोह से यूपी में पहले ही मुश्किल में फंसी भाजपा अब और घिर गई है. एनडीए में शामिल इन दोनों नेताओं की बात करें तो ओमप्रकाश राजभर उत्तर प्रदेश में योगी सरकार में मंत्री हैं, जबकि अनुप्रिया पटेल केंद्र सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं. अनुप्रिया पटेल की पार्टी के अध्यक्ष आशीष पटेल ने कुछ दिन पहले ही प्रदेश सरकार द्वारा अपना दल के नेताओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाया था, जबकि ओमप्रकाश राजभर तमाम मुद्दों को लेकर लगातार मोदी से लेकर योगी तक पर निशाना साधते रहे हैं.

बिहार में बहुजन नेताओं की गोलबंदी के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी बहुजन नेताओं के आंख तरेरने के क्या मायने हैं. इस पर राजनीतिक विश्लेषक और समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार का कहना है कि यह बहुजन नेताओं की हुंकार है. दलित और पिछड़े नेता अब राजनीति में अपनी हिस्सेदारी को छोड़ना नहीं चाहते, बल्कि वह अपने प्रतिनिधित्व की मांग को जोर-शोर से उठा रहे हैं. दोनों नेताओं के विरोध को इसी रूप में देखना होगा.”

जाहिर है कि उत्तर प्रदेश के अपने दो सहयोगियों की बगावत से भाजपा बौखलाई हुई है. इससे पहले ही बिहार में मुसीबत में फंसी भाजपा यूपी में भी बहुजन नेताओं के चक्रव्यूह में उलझती दिख रही है. देखना होगा कि इस राजनीतिक चक्रव्यूह में विजय किसकी होती है.

क्या भाजपा की चाल है, फिल्म ‘ The Accidental Prime Minister’

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर बनी फिल्म ‘The Accidental Prime Minister’ का ट्रेलर रिलीज हो गया है. रिलीज होने के बाद ही फिल्म विवादों में है. कांग्रेस पार्टी के कुछ नेता जहां फिल्म को लेकर आपत्ति जता रहे हैं वहीं भारतीय जनता पार्टी फिल्म को प्रोमोट करने में जुट गई है. भाजपा के उत्साह का आलम यह है कि उसने इस फिल्म के ट्रेलर को अपनी पार्टी के ट्विटर हैंडल से ट्विट भी किया है.

यह फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की लिखी किताब ‘The Accidental Prime Minister’ पर आधारित है. संजय बारू मई 2004 से अगस्त 2008 तक प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे थे. यहां से इस्तीफा देने के बाद 2014 में उन्होंने यह किताब लिखी थी. इस किताब के सामने आने के वक्त भी हंगामा हुआ था, जो कि फिल्म की रिलीज के बाद एक बार फिर उभर आया है.

हालांकि पहले यह किताब आने और अब 2019 चुनाव के ठीक पहले इस पर बनी फिल्म के रिलीज होने पर सवाल उठना लाजिमी है. दरअसल ट्रेलर में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि मनमोहन सिंह गांधी परिवार की कठपुतली थे. ऐसे में यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि फिल्म के जरिए गांधी परिवार खासकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी को निशाना बनाया गया है.

यहां एक तथ्य यह भी है कि सिर्फ मनमोहन सिंह ही नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में कई अन्य भी ‘Accidental Prime Minister’ हुए हैं. इसमें चौधरी चरण सिंह, इंद्रकुमार गुजराल, चंद्रशेखर और एच.डी देवेगौड़ा का नाम लिया जा सकता है. चौधरी चरण सिंह की बात करें तो वो 28 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री बने. उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 20 अगस्त तक का टाइम दिया गया था लेकिन कांग्रेस ने 19 अगस्त को उनसे समर्थन वापस ले लिया और उनकी सरकार गिर गई.

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी एक अनोखे घटनाक्रम में साल 1990 में प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे. चंद्रशेखर 10 नवंबर 1990 को देश के प्रधानमंत्री बने और उन्हें 21 जून 1991 को इस्तीफा देना पड़ा. वह सिर्फ छह महीने ही प्रधानंत्री के पद पर रह पाएं. इंद्र कुमार गुजराल के बारे में तो कहा जाता है कि उन्हें सुबह जगाकर बताया गया कि उन्हें भारत का प्रधानमंत्री बनना है. ऐसे में सिर्फ डॉ. मनमोहन सिंह को एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर कहना गलत है.

यह फिल्म 11 जनवरी 2019 को रिलीज होगी. इस फिल्म में डॉ. मनमोहन सिंह की भूमिका निभाने वाले अभिनेता अनुपम खेर की बात करें तो उनके बयान और प्रतिबद्धता भारतीय जनता पार्टी के करीब दिखती है. उनकी पत्नी किरण खेर भी भाजपा की सांसद हैं. ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या इस फिल्म को सबने साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी और इसके प्रमुख नेता सोनिया एवं राहुल गांधी को घेरने के लिए बनाया है? ताकि 2019 के चुनाव में भाजपा और मोदी को इसका लाभ मिल सके.

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अदालतें संवैधानिक नैतिकता के नाम पर सरकार की कार्रवाई को  असंवैधानिक  न ठहराएं.: रविशंकर प्रसाद

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली 25.12.2018) के हवाले से,  अगर संवैधानिक नैतिकता सरकार की कार्रवाई की कसौटी है तो इसे एकदम स्पष्ट परिभाषित किये जाने की जरूरत है, यह अलग-अलग न्यायाधीशों के लिए भिन्न नहीं हो सकतीं. इसमें हर हाल में सहमति और समरूपता होनी चाहिए. यह भी कि संवैधानिक नैतिकता स्पष्ट होनी चाहिए.
यह बात कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संविधान दिवस के मौके पर विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में बोलते हुए कही. कानून मंत्री यह टिप्पणी इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि कई बार अदालतें संवैधानिक नैतिकता के नाम पर सरकार की कार्रवाई को असंवैधानिक ठहरा देती हैं. ऐसे में कानून मंत्री का संवैधानिक नैतिकता को स्पष्ट परिभाषित किये जाने और उसके न्यायिक मानक तय किये जाने की जरूरत पर बल देने के मायने निकलते हैं. कानून मंत्री के इस बयान में क्या यह अंतरनिहित नहीं लगता कि अदालतो को सरकार कैसे ही भी काम हों — नैतिक अथवा अनैतिक, उन पर सवाल खड़े किए जाने चाहिएं.
संवैधानिक नैतिकता को परिभाषित करने की जरूरत पर बल देते हुए कानून मंत्री ने कहा कि हमने संवैधानिक नैतिकता के बारे में काफी सुना है. मै सम्मान के साथ कहना चाहता हूं कि इसे बहुत बारीकी से स्पष्ट किये जाने की जरूरत है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब सरकार की कार्रवाई को संवैधानिक नैतिकता के आधार पर संविधान की खिलाफत करने वाला बताया जाता है तो फिर उसके बारे में हर हाल में न्यायिक मानक तय होने चाहिए जिनके आधार पर उसका निर्धारण हो. जैसे अनुच्छेद 14 ‘समानता’ और अनुच्छेद 21 ‘स्वतंत्रता’ के अधिकार का मुद्दा.
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि  संविधान की सलाह नहीं मानना अव्यवस्था की ओर ले जाएगा. उन्होंने संविधान की खासियतों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मुश्किल समय में मार्ग दर्शन करता है. हमारे लिए हितकारी है कि हम इसकी सलाह पर ध्यान दें. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो हमारे हठ का नतीजा तेजी से अवसान और अव्यवस्था की ओर ले जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि संविधान दिवस सिर्फ समारोह मनाने का मौका नहीं है बल्कि हमे भविष्य का रोडमैप तैयार करना चाहिए. जस्टिस गोगोई ने कहा कि शुरूआत में हमारे संविधान को जटिल और बड़ा बताकर आलोचना की गई थी लेकिन पिछले सात दशकों ने साबित कर दिया कि यह कितना अच्छा है.
इस आयोजन के के राम मन्दिर का मुद्दा उठाते हुए न्यायधीश/शों  के सामने रविशंकर जी ने कहा कि  फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुना जाए मंदिर केस. यह भी कि कानून मंत्री ने इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था का सवाल बताते हुए मंदिर विवाद को जल्द सुलझाने का अनुरोध किया.  …. सनझ नहीं आया कि ये उनका जस्टिस गोगोई को कोई सुझाव है अथवा कुछ और…. मुझे तो लगता है कि उनका सुझावे अपरोक्ष रूप से अदालत पर राजनीतिक द्वाब बनाने का एक राजनीतिक तरीका है. हैरत की बात तो ये रही कि केंद्रीय मंत्री की बात सुनते ही दर्शक दीर्घा में बैठे अधिवक्ता ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने लगे.
अफसोस तो ये रहा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को नंदलाल बोस द्वारा लिखी गई संविधान की ‘मूल प्रति’ भेंट की. किताब के प्रथम पन्ने का जिक्र करते हुए कानून मंत्री ने कहा कि मौजूदा संविधान से पहले ही पश्चिम बंगाल के नंदलाल बोस ने इस संविधान को लिख दिया था. इस पर महात्मा गांधी से लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद तक के हस्ताक्षर हैं. मेरे मतानुसार रविशंकर जी का ये बयान एकदम तथ्यों से मेल नहीं खाता क्योंकि में  26 लोगों की संविधान कमैटी में न तो नन्दलाल बोस का नाम ही शामिल है. संदर्भ हेतु मैं उन 26 लोगों के नाम भी यहाँ देदे रहा हूँ.
पंडित जवाहर लाल नेहरू (सबसे पहले प्रधान मंत्री), सरदार वल्लभ भाई पटेल, आचार्य जे बी कृपलानी, सरोजिनी नायडू, गोविंद वल्लभ पंत, बाबा साहेब डॉं. बी आर अंबेडकर (ये संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष थे. इन्हें संविधान का निर्माता माना जाता है.), शरत चंद्र बोस, सी राजगोपालाचारी (इन्हें राजाजी के नाम से जाना जाता है), डॉं. सच्चिदानंद सिन्हा (संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष थे.), ए कृष्णास्वामी अय्यर- (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), बी पट्टाभि सीतारमैया- (संविधान सभा में हाउस कमेटी के अध्यक्ष थे.), के एम मुंशी, जी वी मावलंकर- (संविधान सभा की कार्रवाई समिति के अध्यक्ष  व लोकसभा के पहले अध्यक्ष थे.), एच सी मुखर्जी- (संविधान सभा में अल्पसंख्यकों की उपसमिति के अध्यक्ष थे.), गोपीनाथ बारदोलोई, ए वी ठक्कर- (संविधान सभा में असम को छोड़कर अन्य क्षेत्रों की उपसमिति के अध्यक्ष थे.),   बी एल मित्तर-( ये संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), सैयद मोहम्मद सादुह- (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), डी पी खैतान-( ये संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), बी एन राव- (संविधान सभा के सलाहकार थे.), माधव राव- (बी एल मित्तर के इस्तीफे के बाद इन्हें संविधान की मसौदा निर्माण समिति का सदस्य नियुक्त किया गया था.), टी टी कृष्णमाचारी- (डी पी खैतान के निधन के बाद इन्हें ही संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति में जगह दी गयी थी.), एन गोपालस्वामी अयंगर- (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), श्री हरे कृष्ण महताब- (यह संविधान सभा के सदस्य थे), एम आसफ अली- (यह संविधान सभा के सदस्य थे.) तथा भारत की जनता- संविधान के निर्माण में, उसके अनुपालन में और उसके प्रति आस्था की अभिव्यक्ति में भारतीय जनता का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि यह पूरा संविधान हम भारत के लोगों के द्वारा ही अंगीकृत और आत्मार्पित है.
ये बात सही है कि आजादी मिलने से पहले ही स्वतंत्रता सेनानियों के बीच संविधान निर्माण की बात होने लगी थी. तब उन्होंने एक संविधान सभा का गठन किया. संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में हुई. संविधान सभा के कुल 389 सदस्य थे, लेकिन उस दिन 200 से कुछ अधिक सदस्य ही बैठक में उपस्थिति हुए. हालांकि 1947 में देश के विभाजन और कुछ रियासतों के संविधान सभा में हिस्सा ना लेने के कारण सभा के सदस्यों की संख्या घटकर 299 हो गयी.
दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र के लिये संविधान निर्माण कोई आसान काम नहीं था, तभी इसके निर्माण में 2 साल 11 महीने और 17 दिन लगे. इस दौरान 165 दिनों के कुल 11 सत्र बुलाये गये. देश की आजादी के कुछ दिन बाद 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने संविधान का मसौदा तैयार करने के लिये डॉं. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन किया. 26 नवंबर 1949 को हमारा संविधान स्वीकार किया गया और इसके कुछ अर्टिकिल लागू भी कर दिए किंतु पूर्ण रूप 24 जनवरी 1950 को 284 सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर करने 26 जनवरी 1950 को हमारा सिंवधान लागू किया गया तो उसके साथ ही संविधान सभा भंग कर दी गयी.
यथोक्त के आलोक में पता नहीं रवि शंकर जी कहते है कि नन्दलाल बोस ने जो संविधान लिखा वर्तमान संविधान से पहले लिखा गया था जिस पर गान्धी जी और डा. राजेन्द्र प्रसाद जी के हस्ताक्षर भी है. भला नन्दलाल बोस ने किस अधिकार के चलते ऐसा किया गया होगा, इसके उल्लेख भी नहीं किया गया है. दूसरे यह कि संविधान को 26 लोगों की अधिकारिक टीम को सविधान  बनाने में 2 साल 11 महीने और 17 दिन लगे, अब नन्दलाल बोस जी को कि तथाकथित संविधान को बनाने में कितना समय लगा होगा. वैसे भी नन्दलाल जी के पास इतने संशाधन ही न थे जिससे वो इस प्रकार का कोई काम कर सकते. बता दें कि नन्दलाल बोस का जन्म दिसंबर 1882 में बिहार के मुंगेर नगर में हुआ. उनके पिता पूर्णचंद्र बोस ऑर्किटेक्ट तथा महाराजा दरभंगा की रियासत के मैनेजर थे. 16 अप्रैल 1966 कोलकाता में उनका देहांत हुआ. उन्होंने 1905 से 1910 के बीच कलकत्ता गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ आर्ट में अबनीन्द्ननाथ ठाकुर से कला की शिक्षा ली, इंडियन स्कूल ऑफ़ ओरियंटल आर्ट में अध्यापन किया और 1922 से 1951 तक शान्तिनिकेतन के कलाभवन के प्रधानाध्यापक रहे.
अब देखने की बात ये है कि जो नन्दलाल बोस जी 1922 से 1951 तक शान्तिनिकेतन के कलाभवन के प्रधानाध्यापक रहे. अब ये कैसे माना जा सकता है कि नन्दलाल् बोस ने अपने स्तर पर किसी संविधान की रचना की होगी. हाँ! ये सच है कि एक केन्द्रीय मंत्री के प्रस्ताव पर विख्यात चित्रकार नंदलाल बोस को भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी चित्रों से सजाने का मौका दिया गया था. नंदलाल बोस की मुलाकात पं. नेहरू से शांति निकेतन में हुई और वहीं नेहरू जी ने नंदलाल को इस बात का आमंत्रण दिया कि वे भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी चित्रकारी से सजाएं. 221 पेज के इस दस्तावेज के हर पन्नों पर तो चित्र बनाना संभव नहीं था. लिहाजा, नंदलाल जी ने संविधान के हर भाग की शुरुआत में 8-13 इंच के चित्र बनाए. संविधान में कुल 22 भाग हैं. इस तरह उन्हें भारतीय संविधान की इस मूल प्रति को अपने 22 चित्रों से सजाने का मौका मिला. इन 22 चित्रों को बनाने में चार साल लगे. इस काम के लिए उन्हें 21,000 मेहनताना दिया गया. नंदलाल बोस के बनाए इन चित्रों का भारतीय संविधान या उसके निर्माण प्रक्रिया से कोई ताल्लुक नहीं है. वास्तव में ये चित्र भारतीय इतिहास की विकास यात्रा हैं. सुनहरे बार्डर और लाल-पीले रंग की अधिकता लिए हुए इन चित्रों की शुरुआत होती है भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक की लाट से. अगले भाग में भारतीय संविधान की प्रस्तावना है, जिसे सुनहरे बार्डर से घेरा गया है. मैं समझता हूँ कि नन्दलाल बोस जी द्वारा बनाए गए अन्य चित्रों का उल्लेख करता विषय संगत नहीं है.
चर्चा तो ये भी है कि राफेल केस के चलते हमारे कानून मंत्री और प्रधान सेवक ने नवनियुक्त चीफ जस्टिस गोगोई से उनके घर पर नहीं अपितु गोगोई जी के कार्यालय/ कोर्ट परिसर में मिले थे. इस फोटो के नीचे लिखा हुआ है, “अब जरा सोचिए इतिहास में पहली बार कोई पीएम प्रोटोकॉल तोड़कर किसी न्यायाधीश से मिलने उसके घर पहुंच जाए. उसके बाद तो क्लीनचिट मिलनी ही है.”
इसी बीच जब राफेल के मामले में सुप्रीम कोटे राफेल मामले क्लीन चिट दे दी जाती है तो लोगों का ये कयास लगाना शायद गलग नहीं होगा कि हो सकता कोर्ट का ये निष्कर्ष राजनीतिक दवाब में लिया गया फैसला है. … इसलिए भी कि जब विपक्ष और अन्य बुद्धीजीवियों द्वारा इस प्रकरण को जनता के बीच जोरों से उछाल दिया तो सरकार सुप्रीम कोर्टे में तथ्यात्मक सुधार करने के लिए याचिका दायर कर दी है जिससे सिद्ध होता है कि सरकार के द्वारा कोर्टे में गलत जानकारियां दी गई हैं. खैर! अब मूल मुद्दे पर आते है कि कानून मंत्री द्वारा दिए गए बयान से एक तीर से तीन शिकार करने जैसा है. पहला – अदालतों की कार्यप्रक्रिया पर अपरोक्ष रूप से सरकार के दवाब मानवाना कि सरकार के द्वारा किए गए किसी भी काम को संवैधानिक ढांचे में ढालें, दूसरे – राम मन्दिर का मुद्दा उठाकर सरकार ने अदालत को जैसे चुनौती ही है कि राममन्दिर का फैसला जल्दी जल्दी किया जाए. रविशंकर 2019 के चुनावों की चिंता भी सता रहा है तभी तो राममन्दिर के निर्माण का मुद्दा उठाकर वो रामभक्तों को ये संदेश देना चाहते हैं कि प्रयासों में को कमी नहीं रही है.  और तीसरे – नन्दलाल बोस को अधिकारिक संविधान से पहले की रचना का श्रेय देकर वो अधिकारिक संविधान समिति के सदस्यों और डा. अम्बेडकर के संविधान निर्माण के काम को नकार कर समिति के सदस्यों का अपमान भी करते हैं….. मूल रूप से मंत्री जी यहाँ बाबा साहेब अम्बेडकर की छवि को धूमिल करने का प्रयास करते दिखते हैं.

सरकारी योजनाओं से गरीबी उन्मूलन संभव नहीं

आजादी के बाद से ही गरीबों की दशा सुधारने के लिए सरकार कल्याणकारी योजनाएं चलाती रही है. आज स्वतंत्रता के 71 साल बीत जाने के बाद भी गरीबों की दशा नहीं सुधरी है, बल्कि गरीबी बढ़ी ही है. इसके पीछे कारण यह है कि एक तो सरकारी योजनाओं की पहुंच पात्र जरूरतमंदों तक शत-प्रतिशत नहीं है, दूसरा  इन योजनाओं के मॉडल में गरीबी उन्मूलन का मंत्र नहीं है. गरीबों के लिए ये वेलफेयर योजनाएं पेन किलर की तरह हैं, जो दर्द से कुछ पल के लिए राहत देती हैं, लेकिन दर्द का स्थाई इलाज नहीं करती हैं. इस बात की तस्दीक कोसी क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति जानने के लिए किया गया कोसी प्रतिष्ठान का ग्राउंड सर्वे भी करता है. कोसी क्षेत्र के किसानों के जीवन, उनके सामाजिक-आर्थिक हालात, उनकी खेती-किसानी की स्थिति, कृषि पैदावार, पशुपालन, शिक्षा व स्वास्थ्य, लोगों को मिल रही सरकारी सुविधाएं और यहां की लोक कलाओं की दशा को समझने के लिए कोसी प्रतिष्ठान के इस सर्वेक्षण में सरकारी योजनाओं पर आए नतीजे में उपरोक्त दोनों बातें पुष्ट हुई हैं.
दरअसल, देश के अन्य हिस्सों की तरह कोसी क्षेत्र में भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), अंत्योदय, वृद्धा पेंशन, मनरेगा, इंदिरा आवास (अब इसका नाम प्रधानमंत्री आवास हो गया है), मिड-डे मील, किसान क्रेडिट कार्ड जैसी सरकारी योजनाएं चल रही हैं और 2014 में नई सरकार आने के बाद जनधन खाता, शौचालय, गैस कनेक्शन देने के लिए उज्ज्वला जैसी योजनाएं शुरू हुई हैं. कुल मिलाकर इस वक्त गरीबों के लिए 10 से अधिक सरकारी योजनाएं चल रही हैं, जिसमें पीडीएस के तहत राशन का अनाज, अंत्योदय के तहत मुफ्त अनाज, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मुफ्त घर, मनरेगा के तहत साल में सौ दिन रोजगार, पक्का शौचालय के लिए बारह हजार रुपये मदद, मुफ्त गैस कनेक्शन के लिए उज्ज्वला स्कीम, रियायती बिजली, सामाजिक पेंशन, जनधन खाता, द्वार तक पक्की सड़क, खेती-पशुपालन व व्यवसाय के लिए रियायती कर्ज और किसान क्रेडिट कार्ड व फसल बीमा जैसी योजनाएं शामिल हैं, लेकिन इनकी पहुंच पात्र लाभार्थी तक पर्याप्त नहीं है. कोसी प्रतिष्ठान के दो गांव- कालिकापुर और लक्ष्मीनियां के 811 परिवार के सैंपल के आधार पर सरकारी सुविधाओं और उनकी पहुंच पर किए गए सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले आए हैं.
इन दोनों गांव में दस सबसे गरीब परिवार जिनकी सालाना आय 18 से 40 हजार रुपये के बीच है, उन्हें राशन का अनाज नहीं मिल रहा है और 15 अमीर परिवार जिनकी सालाना आय चार से नौ लाख के बीच है, उन्हें राशन का अनाज मिल रहा है. कुछेक जमींदार परिवार ऐसे भी हैं जिन्हें अंत्योदय योजना के तहत मुफ्त राशन मिल रहा है. दोनों गांव में 88.40 प्रतिशत परिवार राशन का अनाज ले रहे हैं. मात्र 28.11 फीसदी परिवार ही गैस चूल्हा का प्रयोग कर रहे हैं. पक्का शौचालय केवल 30.45 फीसदी परिवार के पास है, जबकि लक्ष्मीनियां पंचायत पूर्ण ओडीएफ मुक्त घोषित है. ये दोनों गांव इसी पंचायत में आते हैं. शौचालय के लिए केवल 16.40 फीसदी लोगों को ही सरकारी योजना के तहत पैसे मिले हैं. शौचालय के लिए सरकारी मदद पाने के लिए 35.26 फीसदी लोगों को कमीशन देना पड़ा है. प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ केवल 37.23 प्रतिशत परिवार को ही मिला है. मनरेगा का फायदा केवल 22.19 फीसदी लोगों को ही मिल रहा है. पक्की सड़क 29.46 फीसदी परिवार के दरवाजे तक है. सरकारी कर्ज में से कृषि कर्ज का लाभ केवल 1.84 फीसदी परिवारों ने लिया, पशुपालन के लिए कर्ज लेने वाले केवल 0.24 प्रतिशत हैं तो व्यवसाय के लिए किसी ने भी कर्ज नहीं लिया है.
सामाजिक पेंशन, किसान क्रेडिट कार्ड व फसल बीमा पर सर्वे चुप है. हां, जनधन खाता 87.05 फीसदी के पास है और बिजली का प्रयोग 94.57 फीसदी लोग कर रहे हैं. ये आंकड़े बता रहे हैं कि सुशासन बाबू मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दावों के विपरीत सरकारी योजनाओं की पहुंच की स्थिति दयनीय है. केवल जनधन व बिजली को छोड़ दिया जाय तो अन्य किसी भी सरकारी योजनाओं की पहुंच संतोषजनक नहीं है.
यूं तो कहने के लिए यह हालत दो गांवों की है, लेकिन समग्रता में देखा जाय तो यही हालत पंचायत की है, अंचल की है, जिला की है, राज्य की है और देश की है. आपको जानकर हैरानी होगी कि बिहार सरकार के अपने आंकड़े के मुताबिक करीब 60 से 65 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं. 2010 में बिहार सरकार ने डाटा जारी किया था कि 1.40 करोड़ परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं. हर परिवार में औसत चार लोग भी मान लें तो लगभग साढ़े पांच से छह करोड़ लोग बीपीएल में हैं, जबकि जनसंख्या दस करोड़ है. यानी बिहार की आधी से अधिक आबादी गरीब. विश्व बैंक के मुताबिक भी समूचे देश के 29 राज्यों में से बिहार सबसे कम आय वाला राज्य है. विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2005 से साल दर साल बिहार में गरीबों की संख्या में वृद्धि हुई है. रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक भी बिहार देश का सबसे निर्धन राज्य है. बिहार के 41. 4 फीसदी लोग बीपीएल श्रेणी में हैं. ध्यान देने वाली बात है कि 2005 से सुशासन बाबू नीतीश कुमार लगातार बिहार में विकास होने का दावा कर रहे हैं. इस दावे के बावजूद हर साल करीब 44 लाख लोग गरीबी के चलते जीविका के लिए बिहार से पलायन कर रहे हैं. बड़ा सवाल है आखिर कई सरकारी योजनाओं व सुविधाओं के बावजूद बिहार क्यों गरीबी से बाहर नहीं आ रहा है, यहां क्यों लगातार गरीबों की संख्या बढ़ रही है? इसका मतलब है कि इन सरकारी योजनाओं में खामियां हैं, वे गरीबी दूर करने के अपने मकसद में सफल नहीं हो पा रही हैं, या यूं कहें कि इन सरकारी योजनाओं के बूते गरीबी दूर करना संभव ही नहीं है, क्योंकि इनमें गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने की अवधारणा ही नहीं है. यह जरूर कहा जा सकता है कि ये सरकारी योजनाएं लोगों को गरीब बनाए रखने के लिए हैं. सपाट शब्दों में कहें तो मनरेगा, पीडीएस, अंत्योदय, सामाजिक पेंशन, पीएम आवास जैसी तमाम वेल्फेयर स्कीमें लोगों को गरीब बनाए रखने का सरकारी प्रपंच मात्र है और यह देशभर में किया जा रहा है. इस प्रपंच को उदाहरण से समझा जा सकता है. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक पात्र को घर बनाने के लिए सवा लाख रुपये की सहायता दी जाती है. भ्रष्टाचार का हिस्सा कटने के बाद लाभार्थी को करीब एक लाख रुपये मिलता है. इतने कम पैसे में कैसा घर बनेगा और कितने दिन टिकेगा, सहज अनुमान लगाया जा सकता है. लेकिन सरकारी आंकड़े में दर्ज हो जाएगा कि अमुक व्यक्ति को आवास मिल गया.
देश में गरीबों के नाम पर सरकारी योजनाओं का प्रपंच पहली पंचवर्षीय योजना से चल रहा है. आठवीं पंचवर्षीय योजना तक सरकार के प्रशासनिक व्यय के बाद आम बजट का सबसे अधिक हिस्सा गरीबी उन्मूलन के नाम से सामाजिक योजनाओं पर खर्च किया गया. 90 के दशक के बाद नवउदारवादी आर्थिक नीति अपनाने के पश्चात सरकार योजनाओं पर खर्च कम करने के उपायों पर चर्चा जरूर की, लेकिन वोट बैंक दरकने के डर से व्यापक पैमाने पर बजट घटाने की हिम्मत नहीं जुटा सकी. अभी 71 साल पर नजर डालें तो गरीबी उन्मूलन के लिए पचास से अधिक नामों से योजनाएं चलाई गर्इं, इसके लिए लाखों करोड़ रुपये खर्च किए गए, तीन लाख करोड़ रुपये से ज्यादा तो केवल मनरेगा पर खर्च किया जा चुका है. हर पंचवर्षीय योजना में गरीबी उन्मूलन का बजट बढ़ता गया है. आज के रुपये के मूल्य के हिसाब से देखें तो अब तक औसतन 70 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा गरीबी उन्मूलन पर खर्च किया जा चुका है, लेकिन गरीबी नहीं हटी, गरीबी कम भी नहीं हुई. हां, शहर में 32 रुपये और गांव में 26 रुपये रोजाना खर्चने वाले को अमीर ठहरा कर आंकड़ों में गरीबी कम करने की बेशर्मी जरूर दिखाई गई.
किसी की नीयत ही नहीं
दरअसल किसी भी सरकार की मंशा ही नहीं है कि गरीबी हटे? सबकी इच्छा इस नासूर को बनाए रखने की है. वजह भी है. गरीब नहीं रहेंगे तो योजनाएं किसके लिए बनेंगी, भ्रष्टाचार की मलाई कैसे मिलेगी, वोट बैंक कैसे तैयार होगा? गरीबों के नाम पर चल रही योजनाओं में किस कदर भ्रष्टाचार है, यह किसी छिपा नहीं है. एक रुपये में 15 से 20 पैसे ही पात्र लाभार्थी को मिल पाते हैं. लोगों ने कोसी बाढ़ के बाद सरकारी मुआवजे में भ्रष्टाचार का दैत्य चेहरा देखा है. आपको पता है कि संविधान का लक्ष्य ही लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है, जिसमें सरकार का दायित्व है कि वह हर जनता को रोटी, रोजी, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और सूचना उपलब्ध करवाए, लेकिन 68 साल के गणतंत्र में सरकारें संविधान के लक्ष्य हासिल करने में विफल रही हैं. सरकारों ने केवल जनकल्याण के नाम पर खैराती सुविधाओं की डुगडुगी थाम रखी है. आज जनकल्याण के नाम पर जितनी भी सरकारी योजनाएं हैं, उनमें गरीबी दूर करने की दृष्टि नहीं है, उनमें गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने का सूत्र नहीं है, बल्कि यह कहने में हर्ज नहीं कि ये तमाम योजनाएं गरीबों को गरीब बनाए रखने के लिए ही हैं. देश में गरीबी बनाए रखने की सरकारी साजिश में सभी सरकारें शामिल हैं. बिहार ही नहीं देश के सभी राज्यों में गरीबी की दारूण स्थिति है.
देश के बड़े हिस्से में गरीब भूख, कुपोषण व बीमारी का सामना कर रहे हैं. उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार, न्याय नसीब नहीं हो रहे हैं. बड़ा सवाल है कि एक राज्य की दशा सुधारने के लिए एक सरकार को कितना वक्त चाहिए? 10 साल, 15 साल, 20 साल या 30 साल? हमारे देश में किसी एक दल की सरकार को 34 साल तक का वक्त मिला है. किसी एक नेता को 10 से 23 साल तक शासन का वक्त मिला है, लेकिन गरीबों की दशा नहीं सुधरी है. ज्योति बसु, करुणानिधि, पवन चामलिंग, माणिक सरकार, लालू यादव, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, शीला दीक्षित, तरुण गोगोई, चंद्रबाबू नायडू, प्रकाश सिंह बादल, मुलायम सिंह यादव, मायावती, जयललिता, एनटी रामाराव जैसे नेता 10 से 23 साल तक मुख्यमंत्री रहे हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि देश के सभी बड़े नेता को पर्याप्त समय तक शासन का अवसर मिला है और सभी प्रमुख राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों को भरपूर समय तक सत्ता मिली है. सभी प्रमुख राजनीतिक विचारधारा-वामपंथ, समाजवादी, मध्यमार्ग, मिश्रित पूंजीवादी, राष्ट्रवादी-दक्षिणपंथ को साबित करने का समय मिला है. लेकिन आजादी के 71 साल बाद आज कोई भी ऐसा राज्य नहीं है, जहां गरीबी नहीं है और वहां पीडीएस-अंत्योदय-मनरेगा जैसे पेटभरू कार्यक्रम नहीं चल रहे हैं, भूख से मौतें नहीं हो रही हैं व लोग सतत गरीबी के दरिद्रता चक्र में नहीं फंसे हुए हैं. मजेदार यह है कि आजादी से लेकर अब तक के हर चुनाव में गरीबी दूर करने का वादा रहा है, लेकिन गरीबी दूर नहीं हो सकी है. विश्व बैंक की 2015 में आई गरीबी मापने की नई विधि मोडिफाइड मिक्स्ड रिफरेंस पीरियड के मुताबिक भी भारत में अमेरिका के बराबर की आबादी करीब 27 करोड़ बीपीएल श्रेणी में हैं. विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक मई 2016 में 27 करोड़ लोग भारत में गरीबी रेखा के नीचे थे. एशियन विकास बैंक के मुताबिक भारत में 22 फीसदी आबादी निहायत गरीब है, जबकि भूटान में 8.2 फीसदी व श्रीलंका में 4.1 फीसदी आबादी गरीब हैं. सरकार के नवीनतम आंकड़े के मुताबिक भी करीब 20 फीसदी यानी लगभग 26 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं. आजादी के बाद देश ने जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, चौधरी चरण सिंह, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह व नरेंद्र मोदी जैसे दूरदर्शी-विशेषज्ञ नेता-विचारक को भी देखा है. इसके बावजूद गरीबी कम नहीं हो पाई. इसलिए यह कहने में गुरेज नहीं कि गरीबी उन्मूलन के नाम पर चलाई गईं सरकारी योजनाएं फेल रहीं, हमारी नीतियां विफल रहीं, हमारी राजनीति विफल रही, हमारे नेता विफल रहे. आगे उम्मीद भी नहीं दिखाई देती, क्योंकि इन्हीं में से अधिकांश दल व चेहरे देश व राज्यों के सत्ता परिदृश्य में रहेंगे.
क्या है विकल्प
संविधान निर्माता और अर्थशास्त्री डा. भीमराव अंबेडकर ने गरीबी उन्मूलन के लिए आमदनी के स्थायी स्रोत के निर्माण की अवधारणा रखी थी. इसके लिए उन्होंने ‘स्टेट सोशलिज्म’ का सिद्धांत दिया था, जिसमें राज्य द्वारा हर परिवार को बिना भेदभाव स्थाई आजीविका उपलब्ध कराने की बात है. यह संभव है, लेकिन अब तक किसी सरकार ने व नेता ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है. स्टेट सोशलिज्म का लक्ष्य ही बिना भेदभाव सभी नागरिकों का सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक उत्थान कर उनको आत्मनिर्भर बनाना है. मौजूदा व्यवस्था में भी अगर सभी सरकारी वेल्फेयर योजनाओं को मिलकर केवल रोजगार सृजन योजना ही चलाई जाय तो भी कुछेक साल में गरीबी उन्मूलन हो जाएगा. लेकिन सच पूछिए तो सरकारों की रुचि खैरात बांटने में है, जनता को परजीवी बना कर रखने में है, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में नहीं है.
शंभू भद्रा

संकट में बहुजन राजनीति

हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों ने बहुजन राजनीति को असमंजस में डाल दिया है. एक ओर तो संविधान विरोधी RSS-BJP का सफाया होने से ST, SC, OBC और अल्पसंख्यकों ने राहत की साँस ली है, वहीं कांग्रेस की जीत ने “बहुजन समाज” के अपने राजनीतिक दलों की भूमिका पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

बाबासाहब अम्बेडकर ने १९३६ में Independent Labour Party(स्वतंत्र मज़दूर पार्टी) की स्थापना कर महाराष्ट्र से राजनीति में कदम रखा था. लेकिन ६ दिसंबर, १९५६ को उनके महापरिनिर्वाण के बाद, उनका अपने समाज को देश का हुक्मरान बनाने का सपना, उनके अनुयायी पूरा न कर सके. खुद बाबासाहब ने आगरा के ऐतिहासिक भाषण में इस बात पर दुःख जताया था कि मुझे ऐसा कोई भी नज़र नहीं आता, जो मेरे बाद इस कारवाँ को आगे ले जा सके. उनकी यह बात सच साबित हुई.

१९६० के दशक में साहब कांशी राम पूना के DRDO में नौकरी कर रहे थे. उनके अनुसार, उन्होंने बाबासाहब की मूवमेंट(आंदोलन) को खुद अपनी आँखों से खत्म होते देखा. उन्होंने कई बार इसके बारे में बताया कि वो तो फुले-शाहू-अम्बेडकर की विचारधारा से प्रभावित होते जा रहे थे, लेकिन इसको चलाने वाले लोग एक-एक कर इसे छोड़ इधर-उधर भाग रहे थे, जिनमें ज़्यादा संख्या कांग्रेस में जाने वालों की थी. जब वो उनसे पूछते थे कि भई आप लोग बाबा के मिशन को छोड़कर क्यों जा रहे हैं ? उनका जवाब होता था कि “बाबा की विचारधारा तो चांगली(अच्छी) है, लेकिन होउ शकत नाही(हो नहीं सकता). इस विचारधारा पर चलकर हम राजनीति में MLA-MP नहीं बन सकते. जब हम MLA-MP नहीं बनते हैं, तो हमारा समाज भी हमारी कदर नहीं करता, इसलिए हम बाबा को छोड़कर बापू के चरणों में जा रहे हैं.

साहब इस नतीजे पर पहुँचे कि अगर हमें इस विचारधारा को राजनीति में आगे बढ़ाना है, तो फिर अपने लोगों को MLA-MP बनाकर विधानसभा और लोकसभा में भेजना ही होगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर इतिहास अपने को दोहराएगा. जिस तरह से RPI को छोड़कर बाबा के लेफ्टिनेंट(अनुयायी) बापू के चरणों में गए; ठीक उसी तरह आज के हमारे नेता भी इस मूवमेंट को छोड़कर भाग खड़े होंगे.

१४ अप्रैल १९८४ को बहुजन समाज पार्टी बनाने के शुरुआती दिनों से ही उनका पूरा ज़ोर चुनावी रिजल्ट(नतीजों) पर था. उन्होंने नारा दिया कि पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा हराने के लिए और तीसरा जीतने के लिए लड़ा जायेगा. लेकिन वो इससे भी एक कदम आगे निकल गए. १९८५ में लड़े पहले पंजाब विधान सभा चुनावों में उन्होंने कांग्रेस को हरवा डाला और १९८९ को लड़े दूसरे चुनाव में उन्होंने ३ सांसद और उत्तर प्रदेश में १३ विधायक जितवा लिए.

इसके बाद तो उन्होंने पुरे उत्तर भारत की राजनीति में तूफान ला दिया. जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़(उस वक्त मध्य प्रदेश का हिस्सा), बिहार जैसे राज्यों में फुले-शाहू-अम्बेडकर का कारवां, एक बार फिर सही पटरी पर आ अपनी मंज़िल को और तेजी से बढ़ने लगा.

१९९९ के लोक सभा चुनावों में वो बसपा को देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बना चुके थे. अब उनका निशाना अगले साल २००४ में होने वाले लोक सभा चुनावों में इसे पहले नंबर की पार्टी बना, बहुजन समाज को देश का हुक्मरान बनाना था. लेकिन १५ सितम्बर २००३ को ट्रेन में चंद्रपुर, महाराष्ट्र से हैदराबाद जाते वक्त सख्त बीमार पड़ गए और फिर अपने परिनिर्वाण तक राजनीति में वापसी न कर सके.

यहीं से बहुजन राजनीति की दिशा बदली और वो लगातार ऊपर जाने की बजाय नीचे फिसलना शुरू हुई. साहब का सपना अधूरा रह गया और चुनावी असफलताओं का दौर शुरू हुआ. २०१४ में १९८९ के बाद पहली बार बसपा अपना एक भी सांसद लोकसभा में नहीं भेज पायी.

अभी हुए पांचों राज्यों के चुनाव में से तीन – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान न सिर्फ उत्तर प्रदेश से सटे हुए हैं बल्कि किसी समय वहाँ बसपा का एक मज़बूत आधार होता था. मध्य प्रदेश तो किसी समय उत्तर प्रदेश के बाद बसपा का दूसरा अहम सूबा हुआ करता था, लेकिन वहाँ उसकी सीटें ४ से घटकर सिर्फ २ रह गयी. छत्तीसगढ़ में अजित जोगी के साथ समझौता कर तीसरा मोर्चा बनाने का प्रयोग भी विफल हुआ, कांग्रेस वहाँ भारी बहुमत से जीती और बसपा यहां भी सिर्फ २ सीटें ही जीत पायी. राजस्थान में उसे २०० में से सिर्फ ६ सीटें मिली और वो सरकार बनाने में कोई भूमिका नहीं निभा पाई.

इस सबका रोष सोशल मीडिया पर दिखा और बहुत सारे बहुजन युवाओं ने इस पर अपनी प्रतिक्रियायें दी. कुछ ने इसके लिए बहनजी के नेतृत्व पर सवाल उठाया तो कुछ ने इसके लिए उत्तर प्रदेश से सभी राज्यों में भेजे जाने वाले प्रभारियों को कोसा. कुछ ने “बहुजन हिताये, बहुजन सुखाये” की जगह किये गए “सर्वजन सुखाये, सर्वजन हिताये” और “हाथी नहीं गणेश है; ब्रह्मा, विष्णु, महेश है” की विचारधारा को जिम्मेवार ठहराया तो कुछ ने और कारण बताये.

तो क्या हम साहब कांशी राम के दिखाए रास्ते से भटक गए हैं ? क्या बहन मायावती के नेतृत्व में कमी है या फिर उत्तर प्रदेश से लगातार दूसरे राज्यों में भेजे जा रहे प्रभारी बाबासाहब अम्बेडकर और साहब कांशी राम के “मिशन” को “कमीशन” में बदल चुके हैं ? ऐसे कई और सवाल पूरे बहुजन समाज को घेरे हुए हैं.

आज बहुजन राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां से वो अब किस ओर जाये, इस उलझन में है. ऐसा लगता है कि बाबासाहब के वचन, “जाओं अपनी दीवारों पर लिख लो की एक दिन हम इस देश के हुक्मरान होंगे” कहीं सिर्फ दीवारों पर ही न लिखे रह जाये.

बर्तानिया के मशहूर नेता और प्रधानमंत्री रहे, सर विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि “However beautiful the strategy, you should occasionally look at the results.”(रणनीति कितनी भी सुंदर क्यों न हो, आपको नतीजों को भी देखते रहना चाहिए)

साहब कांशी राम ने भी हमें चेताया था कि, “मैं तो असलीयत से कभी मुँह नहीं मोड़ता हूँ, अगर असलीयत से हम मुँह मोड़ ले, तो हर मोड़ पर असलीयत हमारे सामने आ जाएगी. मुँह मोड़ कर कहा जायेंगे ?” उम्मीद है पूरा बहुजन समाज अब इस असलीयत से और मुँह नहीं मोड़ेगा और एक दूसरे की टांग-खिचाई करने की जगह पूरी हिम्मत से इन सवालों का सामना करते हुए सही रास्ते ढूंढने में लग जायेगा.

सतविंदर मदारा

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अपने फ़ार्म हाउस पर काटा सलमान ख़ान ने बर्थडे का केक

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मुंबई। बॉलीवुड के दबंग और बॉक्स ऑफिस के सुल्तान और भारत की शान सलमान ख़ान आज 53 साल के हो गए. बुधवार देर रात सलमान अपने दोस्तों और परिवार के साथ अपने फ़ार्म हाउस पर पहुंचे और केक काटकर अपना जन्मदिन मनाया.

इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं सलमान अपने फेवरेट कलर ब्लैक में ही नज़र आ रहे हैं. उनके आस-पास बस कुछ चुनिंदा दोस्त और परिजन ही नज़र आ रहे हैं. इस तस्वीर में उनके पीछे आप उनके ख़ास बॉडीगार्ड शेरा को देख सकते हैं. सलमान इस मौके पर बेहद खुश नज़र आ रहे हैं. दिसंबर का महीना सलमान और उनके परिवार के लिए बहुत ही ख़ास होता है. इस महीने उनके परिवार में कई सदस्यों का बर्थडे होता है. आप कह सकते हैं कि यह महीने ख़ान परिवार के लिए जश्न का महीना है.

सलमान ख़ान आज देश के सबसे बड़े सुपरस्टार हैं. बड़े ही नहीं छोटे पर्दे पर भी उनका धाक रहता है. दस का दम से लेकर बिग बॉस उन्हीं के दम पर चलती है. बहरहाल, सलमान ने इस मौके पर हाथ जोड़कर सबका आभार जताया.

सलमान ख़ान को यारों का यार कहा जाता है. उनका जिस पर दिल आ गया कहते हैं उसकी लाइफ सेट हो गयी. इसके अलावा भी वो दिल खोलकर सामाजिक कार्यों में भी शामिल रहते हैं.

इस मौके पर सलमान के भाई अरबाज़ ख़ान अपनी गर्लफ्रेंड जॉर्जिया के साथ पहुंचे. उनके अलावा सोहैल ख़ान, बहनोई आयुष शर्मा, अभिनेत्री दीया मिर्ज़ा, कृति सनोन, फ़िल्मकार संजय लीला भंसाली, सतीश कौशिक, अमृता अरोड़ा, अनिल कपूर, सोनू सूद आदि भी नज़र आये.

सलमान की ग़ज़ब की फैन फॉलोविंग हैं. बच्चे भी उन्हें बहुत पसंद करते हैं. उनकी आखिरी रिलीज़ फ़िल्म रेस 3 कुछ ख़ास कमाल नहीं कर पायी लेकिन, उनकी आने वाली फ़िल्म भारत से उन्हें और उनके फैंस को बहुत उम्मीदें हैं.

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4 माह की निगरानी के बाद NIA ने आतंक के बड़े गठजोड़ का किया भंडाफोड़, 20 से 30 साल के 10 आरोपी अरेस्ट

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राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने बुधवार को दिल्ली व यूपी में 17 स्थानों पर छापेमारी कर आतंक के बड़े गठजोड़ का भंडाफोड़ किया है. एनआईए के प्रवक्ता आलोक मित्तल ने बताया कि 10 संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है. छह अन्य लोगों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है. फिदायीन हमलों की तैयारी कर रहे थे : मित्तल ने बताया कि गिरफ्तार सभी लोग आतंकी संगठन आईएसआईएस से प्रेरित ‘हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम’ से जुड़े थे. ये लोग फिदायीन हमलों से देश की प्रमुख हस्तियों, नेताओं, सुरक्षा प्रतिष्ठानों और दिल्ली के बड़े बाजारों को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे थे.

सिलसिलेवार बम धमाके करने की साजिश थी: एनआईए प्रवक्ता ने कहा, जिस स्तर की तैयारी थी उससे लगता है कि वे जल्द हमले को अंजाम दे सकते थे. वे रिमोट कंट्रोल बम बना रहे थे और फिदायीन दस्ता तैयार कर रहे थे. देश के महत्वपूर्ण स्थलों पर सिलसिलेवार बम धमाकों की इनकी योजना थी. गोला बारूद बरामद : संदिग्धों के पास से 112 अलार्म घड़ी, 150 राउंड गोला-बारूद, 12 पिस्टल, करीब 25 किलोग्राम बम बनाने की सामग्री , पोटैशियम नाइट्रेट, पोटैशियम क्लोरेट, सल्फर बरामद हुआ. स्टील पाइप मिले हैं, जिसका पाइप बम बनाने में प्रयोग होता है. आरोपी बुलेट प्रूफ सुसाइड वेस्ट भी बना रहे थे जिससे फिदायीन हमले कर सकें. इनके पास से देश में बना रॉकेट लांचर भी बरामद हुआ है.

सोना चोरी कर हथियार खरीदे: पकड़ में आया मॉडयूल अपने पैसों पर चलाया जा रहा था. सोना चोरी करके हथियार खरीदे गए थे.

विदेशी आका के संपर्क में थे

गिरोह का सरगना मुफ्ती सुहेल अमरोहा का रहने वाला है. वहां एक मदरसे में बतौर मुफ्ती काम कर रहा था. इस समय वह दिल्ली के जाफराबाद में रह रहा था. एनआईए की पूछताछ में पता चला कि एक विदेशी आका के सहारे वह पूरा नेटवर्क संचालित करता था. गिरफ्तार सभी आरोपी 20 से 30 साल की उम्र के हैं. इनमें नोएडा के निजी विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियरिंग का एक छात्र व डीयू में बीए तृतीय वर्ष का एक छात्र भी शामिल है. ज्यादातर आरोपी मध्यमवर्गीय परिवारों से हैं. दो के अलावा बाकी ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं.

यहां से गिरफ्तारी

दिल्ली के जाफराबाद और सीलमपुर में छह स्थानों पर छापेमारी की गई. उत्तरप्रदेश के 11 स्थानों पर छापा मारा गया. इनमें से छह स्थान अमरोहा में, दो लखनऊ, दो हापुड़ और एक स्थान मेरठ का है. पांच लोगों को अमरोहा जिले से पकड़ा गया है जबकि पांच को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया.

एटीएस के साथ कार्रवाई

यूपी के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के आईजी असीम अरुण ने बताया कि एनआईए ने एटीएस के साथ संयुक्त अभियान में कार्रवाई को अंजाम दिया. अधिकारियों के मुताबिक, संदेहास्पद गतिविधियों की सूचना मिलने के बाद पिछले कुछ समय से एनआईए इस समूह पर नजर रख रही थी.

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UP: नोएडा में नमाज के बाद अब ग्रेटर नोएडा में श्रीमद्भागवत कथा पर रोक, मचा हंगामा

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नोएडा। दिल्ली से सटा यूपी का गौतमबुद्धनगर जिला इन दिनों सार्वजनिक स्थानों पर नियमों के खिलाफ धार्मिक आयोजनों के लिए चर्चित हो रहा है. कुछ दिन पहले जहां नोएडा में सरकारी पार्क पर नमाज पढ़ने की पाबंदी लगाई गई, वहीं अब ग्रेटर नोएडा में सरकारी जमीन पर होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा को रोक दिया गया है. इसको लेकर विशेष समुदाय में खासा रोष है.

ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, ग्रेटर नोएडा के आवासीय सेक्टर-37 में 26 दिसंबर (बुधवार) से नौ दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा की शुरुआत होनी थी. यह जमीन प्राधिकरण की है. ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने बिना अनुमति हो रही श्रीमद्भागवत कथा की बात बताई और बुधवार सुबह ही इस भूखंड से तंबू, मंच और लाउडस्पीकर हटवा दिए. प्राधिकरण की इस कार्रवाई का आयोजकों ने जमकर विरोध किया. कुछ महिलाओं ने तो धरना प्रदर्शन तक किया.

प्राधिकरण के विशेष कार्याधिकारी सचिन सिंह की मानें तो उन्हें कार्यक्रम के लिए अनुमति नहीं दी गई. यदि वे इसे फिर भी करते हैं तो यह गैर कानूनी होगा.

ग्रेटर नोएडा (प्रथम) के क्षेत्राधिकारी निशंक शर्मा ने बताया कि प्राधिकरण द्वारा की गई इस कार्रवाई से उसका कोई लेना-देना नहीं है. यह कार्रवाई प्राधिकरण अधिकारियों तथा प्राधिकरण से संबद्ध पुलिसकर्मियों ने की है.

यह है पूरा मामला

ग्रेटर नोएडा सेक्टर-37 में बुधवार को उस वक्त तनाव की स्थिति पैदा हो गई, जब ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अतिक्रमणकारी दस्ते ने मंदिर के लिए अवैध रूप से कब्जा की गई जमीन पर बने टेंट को हटा दिया. देखते ही देखते सैकड़ों सेक्टरवासी मौके पर जमा हो गए. इस दौरान विवाद काफी विवाद बढ़ गया.

प्राधिकरण अधिकारियों के मुताबिक करीब दो वर्ष पहले से ही मंदिर के नाम पर सेक्टर की जमीन पर अवैध कब्जे की कोशिश की जा रही थी. इसी क्रम में स्थानीय लोगों ने भगवान की मूर्तियां भी स्थापित कर दी थीं, लेकिन गाहे-बगाहे सेक्टरवासी प्राधिकरण से मंदिर के लिए जमीन की मांग भी कर रहे थे.

कुछ लोगों ने श्रीमद्भागवत कथा के बहाने विधिवत मूर्ति स्थापित करने की योजना बनाई. इसके तहत सेक्टर में पंडाल लगाया गया था. इसकी जानकारी मिलते ही ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के वरिष्ठ प्रबंधक यशपाल सिंह के निर्देश पर बुधवार सुबह अतिक्रमण हटाओ दस्ता सेक्टर में पहुंचा और भागवत कथा के लिए लगा टेंट हटा दिया. मामले की जानकारी मिलते ही मौके पर सैकड़ों सेक्टरवासी जमा हो गए और प्राधिकरण की कार्रवाई का विरोध करने लगे. हालांकि, विवाद बढ़ने पर स्थानीय लोगों ने बीच बचाव किया और मामले को शांत किया.

नमाज को लेकर भी उठ चुका है विवाद

गौरतलब है कि पिछले दिनों बिना इजाजत नोएडा सेक्टर-58 स्थित कुछ कंपनियों के कर्मचारियों द्वारा एक पार्क में जुमे की नमाज पढ़े जाने को लेकर नोएडा पुलिस ने नोटिस भेजा था, इसको लेकर हंगामा मचा हुआ है. स्थानीय लोगों की शिकायत पर 23 कंपनियों को भेजे गए नोटिस में कहा गया है कि पार्क जैसे सार्वजनिक स्थल का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता. कंपनियां अपने कर्मचारियों को नहीं रोकतीं, तो इसके लिए उन्हें जिम्मेदार माना जाएगा और उनके खिलाफ कार्रवाई होगी. पार्क में किसी तरह के धार्मिक आयोजन के लिए प्रशासन की इजाजत लेनी होगी.

वहीं, नोटिस को लेकर कंपनी के कर्मचारियों में बढ़ते गुस्से के बाद मंगलवार को नोएडा के जिलाधिकारी बीएन सिंह और एसएसपी डॉ. अजय पाल ने साफ किया कि नोटिस भेजने का मकसद किसी विशेष धर्म को मानने वालों की भावनाएं आहत करना नहीं है. अभी प्रशासन से कार्यक्रम की इजाजत नहीं मिली है, इसलिए नोटिस भेजा गया है.

गौरतलब है कि सेक्टर-58 स्थित एक पार्क में फरवरी 2013 से प्रत्येक शुक्रवार को नमाज पढ़ी जा रही थी. पहले इसमें शामिल होने वालों की संख्या कम थी, जो बीते कुछ दिनों से काफी बढ़ चुकी है. कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर पंकज राय ने बताया कि सात दिसंबर को स्थानीय लोगों ने इसकी शिकायत की. इसमें कहा गया कि हर हफ्ते होने वाले इस धार्मिक आयोजन से उन्हें परेशानी हो रही है.

पुलिस ने आयोजकों से कहा कि प्रशासन की अनुमति के बिना धार्मिक आयोजन नहीं कर सकते. कुछ लोगों ने सिटी मजिस्ट्रेट से अनुमति के लिए आवेदन किया है, जो अभी तक मिली नहीं है. इसके बावजूद 14 दिसंबर को लोग पार्क में नमाज पढ़ने के लिए जुटे. सूचना पर पहुंची पुलिस ने मुफ्ती नोमान अख्तर और आयोजक आदिल रशीद को शांति भंग की आशंका में गिरफ्तार कर लिया था, जिन्हें बाद में जमानत मिल गई. इसके बाद 23 कंपनियों के प्रबंधन को नोटिस जारी कर प्राधिकरण के पार्क में धार्मिक कार्यक्रम की अनुमति की इजाजत नहीं मिलने की जानकारी दी.

सभी कंपनियों के लिए है यह सूचना

एसएसपी अजयपाल शर्मा के मुताबिक, नोएडा सेक्टर 58 में खुले स्थानों पर धार्मिक कार्यक्रमों पर रोक लगाई गई है. इस नोटिस के संबंध में एसएसपी अजय पाल शर्मा का कहना है कि सेक्टर 58 में नोएडा प्राधिकरण का पार्क है. इस पार्क में धार्मिक आयोजन के लिए कुछ लोगों द्वारा इजाजत मांगी गई थी, लेकिन इसकी इजाजत अभी तक सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा जारी नहीं की गई है. इजाजत नहीं मिलने के बावजूद वहां भारी संख्या में लोग जुटे, ऐसे में उन्हें बताया गया कि आयोजन की इजाजत अभी भी नहीं हुई है. यही सूचना सभी कंपनियों को भी दी गई है.

यह है असली समस्या

पुलिस की मानें तो सेक्टर 58 के इस पार्क में पहले से ही कुछ लोग शुक्रवार को नमाज पढ़ने जा रहे थे. देखा गया है कि पिछले कुछ हफ्तों से नमाज पढ़ने वालों की संख्या तेजी से इजाफा हुआ है. ऐसे में इस तरह की गतिविधि पर कुछ लोगों ने एतराज जताया है. इस बाबत सेक्टर 58 के एसएचओ पंकज के अनुसार ये निर्देश सभी के लिए हैं.

9 विभाग गहलोत ने अपने पास रखे, पायलट को ग्रामीण विकास, किसे क्या मिला, पूरी सूची देखें

खास बातें-
राजस्थान में विभागों का बंटवारा, वित्त और गृह समेत 9 विभाग अशोक गहलोत के पास.
सचिन पायलट को सार्वजनिक निर्माण, ग्रामीण विकास समेत पांच विभाग मिले.
गहलोत और पायलट के कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात के बाद हुआ फैसला.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ घंटों बातचीत के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंत्रियों के विभागों का बंटवारा कर दिया है. अब सीएम गहलोत ने गृह, वित्त सहित 9 मंत्रालय अपने पास रखे हैं. वहीं उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के पास ग्रामीण विकास, पंचायती राज सहित पांच मंत्रालय हैं. बात दें कि मंत्रियों के विभाग के बंटवारे को लेकर दो दिनों से रस्साकशी चल रही थी. जिसका हल निकालने के लिए गहलोट और पायलट बुधवार शाम को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के पास पहुंचे थे.
राजस्थान के मंत्रियों कि पूरी सूची
अशोक गहलोत
  वित्त विभाग
  आबकारी विभाग
  आयोजना विभाग
  नीति आयोजना विभाग
  कार्मिक विभाग
  सामान्य प्रशासन विभाग
  राजस्थान राज्य अन्वेषण ब्यूरो
  सूचना प्रौद्यौगिकी एवं संचार विभाग
  गृह मामलात एवं न्याय विभाग
सचिन पायलट
  सार्वजानिक निर्माण विभाग
  ग्रामीण विकास विभाग
  पंचायती राज विभाग
  विज्ञानं एवं प्रौद्यौगिकी विभाग
  सांख्यिकी विभाग
बुलाकी दास कल्ला
  ऊर्जा विभाग
  जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग
  भू-जल विभाग
  कला, साहित्य, सांस्कृतिक और पुरातत्व विभाग
शांति कुमार धारीवाल
 स्वायत्त शासन , नगरीय विकास और आवासन विभाग
  विधि एवं विधिक कार्य विभाग और विधि परामर्शी विभाग
  संसदीय मामलात विभाग
परसादीलाल मीणा उद्योग विभाग
  राजकीय उपक्रम विभाग
मास्टर भंवरलाल मेघवाल
 सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता
  आपदा प्रबंधन एवं सहायता विभाग
लालचंद कटारिया कृषि विभाग
  पशुपालन विभाग
  मत्स्य विभाग
डॉ. रघु शर्मा
   चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग
  आयुर्वेद एवं भारतीत चिकित्सा विभाग
  चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग (ईएसआईसी)
  सूचना एवं जनसंपर्क
प्रमोद जैनभाया
  खान विभाग
  गौपालन विभाग
विश्वेन्द्र सिंह
पर्यटन विभाग
  देवस्थान विभाग
डॉ. हरीश चौधरी
 राजस्व विभाग
  उपनिवेशन विभाग
  कृषि सिंचित क्षेत्रीय विकास एवं जल उपयोगिता विभाग
रमेश चंद्र मीणा
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग
  उपभोक्ता मामले विभाग
उदयलाल आंजना सहकारिता विभाग
  इंदिरा गांधी नहर परियोजना विभाग
प्रताप सिंह खाचरियावास
   परिवहन विभाग
  सैनिक कल्याण विभाग
सालेह मोहम्मद
अल्पसंख्यक मामलात विभाग
  वक्फ विभाग
  जन अभियोग निराकरण विभाग
राज्यमंत्री
गोविंदसिंह डोटासरा
शिक्षा विभाग (प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा) (स्वतंत्र प्रभार)
  पर्यटन विभाग
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महिला एवं बाल विकास विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
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  अल्पसंख्यक मामलात विभाग
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जनजातीय क्षेत्रीय विकास विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
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उच्च शिक्षा विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
  राजस्व विभाग
  उपनिवेशन विभाग
  कृषि सिंचित क्षेत्रीय विकास एवं जल उपयोगिता विभाग
सुखराम बिश्नोई
  वन विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
  पर्यावरण विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
  खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग
  उपभोक्ता मामले विभाग
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   युवा मामले एवं खेल विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
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  आयुर्वेद एवं भारतीय चिकित्सा विभाग
  चिकत्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं (ईएसआईसी)
  सूचना एवं जनसंपर्क विभाग
चुनाव परिणाम से लेकर कुछ इस तरह रही राजस्थान में हलचल
11 दिसंबर: चुनाव परिणाम घोषित.
16 दिसंबर: अशोक गहलोत और सचिन पायलट दिल्ली में राहुल गांधी से मिलने पहुंचे. यहां से निर्देश मिलने के बाद 17 दिसंबर को शपथ ग्रहण की. इसी बीच 108 आईएएस के तबादले हो गए. 17 आईपीएस भी बदले गए.
17 दिसंबर: दिल्ली से चेहरा तय होने के बाद सीएम-डिप्टी सीएम ने शपथ ली.
18 दिसंबर: 40 आईएएस, 8 आरएएस बदले, तीन आईएफएस के तबादले, सीएमओ में अदला-बदली की.
20 दिसंबर: 17 आईपीएस बदले गए.
21 दिसंबर: सीएम के आर्थिक सलाहकार एवं सलाहकार नियुक्त किए गए.
23 दिसंबर: मंत्रियों की सूची फाइनल करने के लिए अशोक गहलोत और सचिन पायलट दिल्ली पहुंचे. वहां के निर्देशन में 24 दिसंबर को 13 कैबिनेट और 10 राज्य मंत्रियों को शपथ ग्रहण कराई गई.
24 दिसंबर: 23 मंत्रियों ने शपथ ली.
25 दिसंबर: 33 में 30 कलेक्टर बदले.
गहलोत और पायलट के शपथ लेने के बाद 13 कैबिनेट और 10 राज्य मंत्रियों ने भी 72 घंटे पहले शपथ ले ली थी लेकिन मंत्रियों के विभागों का बंटवारा नहीं हो पाया था. इसकी असली वजह ये थी कि टिकट बंटवारे से लेकर सीएम की नियुक्ति, कैबिनेट चुनने और उनके विभागों के बंटवारे सहित तमाम मसले दिल्ली से ही तय हुए हैं. वहीं, ब्यूरोक्रेसी में बदलाव की तेजी देखें तो पिछले आठ दिन में ही 140 से ज्यादा अफसरों को इधर-उधर किया जा चुका है.
श्रोतः- अमर उजाला

मध्य प्रदेश : कैबिनेट में जगह नहीं मिलने से नाराज हैं सपा-बसपा व निर्दलीय विधायक

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने से तीन निर्दलियों समेत बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के विधायक खासे नाराज हैं. तीनों निर्दलियों ने सपा-बसपा विधायकों के साथ बैठक भी की है.

स्पीकर के चुनाव में कांग्रेस को भारी पड़ सकता है गुस्सा

बता दें कि मध्य प्रदेश में 15 साल बाद कांग्रेस की सरकार बनी जरूर है, मगर बसपा, सपा और निर्दलियों के समर्थन के बाद. कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं. बहुमत 116 से दो सीटें कम. बसपा (दो) और सपा (एक) ने बिना शर्त समर्थन कर दिया और चार निर्दलीय भी कांग्रेस के साथ हो गए. इससे कांग्रेस का आंकड़ा 114 से बढ़कर 121 हो गया. लेकिन कमलनाथ ने सिर्फ एक निर्दलीय को मंत्रिमंडल में जगह दी. बाकी इंतजार ही करते रह गए.

खास बात यह है कि बसपा के दो विधायकों में से एक भिंड के संजू कुशवाह का भाजपा के साथ भी गहरा संबंध है. उनके पिता डॉ. रामलखन सिंह भाजपा के सांसद रहे हैं. दरअसल, कमलनाथ ने पहली बार चुने गए चेहरों को कैबिनेट में शामिल नहीं करने का फार्मूला लागू किया है. निर्दलीय प्रदीप जायसवाल चूंकि तीन बार के विधायक हैं, लिहाजा वो जगह बनाने में कामयाब रहे. लेकिन तीन अन्य निर्दलियों और सपा-बसपा विधायकों का तर्क है कि पहली बार का फार्मूला कांग्रेस सदस्यों पर लागू होता है, उन पर नहीं. कांग्रेस के 55 विधायक पहली बार चुने गए हैं.

सूत्रों का कहना है कि शपथग्रहण समारोह के पहले कमलनाथ और बुरहानपुर से निर्दलीय ठाकुर सुरेंद्र सिंह उर्फ शेरा भैया के बीच गर्मागर्म बहस भी हुई थी. शेरा वादाखिलाफी से खिन्न थे. चुनाव नतीजे आने के बाद दो निर्दलियों प्रदीप जायसवाल और सुरेंद्र सिंह उर्फ शेरा भैया को कैबिनेट में लेने का वादा किया गया था. मगर ऐन वक्त पर शेरा भैया का नाम ड्रॉप कर दिया गया.

सूत्रों का कहना है कि सपा- बसपा के तीन विधायकों के मामले में भी कांग्रेस की तरफ से कोई पहल नहीं की गई. सरकार में शामिल करने के सवाल पर कमलनाथ ने वेट एंड वॉच की नीति अपनाई. क्योंकि दोनों ही दलों ने बिना शर्त समर्थन दिया है. आगे अगर दबाव आएगा या आग्रह होगा तो सपा-बसपा को सरकार में समायोजित करने की गुंजाइश रखी गई है. कैबिनेट में पांच जगह रिक्त हैं, संसदीय सचिव का विकल्प है और किसी बडे़ सरकारी उपक्रम में स्थान दिया जा सकता है.

हालांकि कांग्रेस निर्दलियों और सपा-बसपा की नाराजगी या असंतोष को हल्के में नहीं ले रही है. इसका बड़ा कारण विधानसभा के स्पीकर का निर्वाचन है, जिसमें बहुमत की परीक्षा होना है. भाजपा ने यदि अपना उम्मीदवार उतारा तो सपा-बसपा और निर्दलियों का कथित गुस्सा या असंतोष कांग्रेस को भारी भी पड़ सकता है.

 

लोस चुनाव की तैयारी में लगें बसपा कार्यकर्ता

नावाबाजार। नावाबाजार प्रखंड क्षेत्र के रजहारा कोठी में बहुजन समाज पार्टी पंचायत कमेटी गठित करने को लेकर कार्यकर्ताओं की बैठक हुई. इसकी अध्यक्षता शम्सुद्दीन शाह व संचालन बसपा जिलाध्यक्ष संतोष कुमार गुप्ता ने किया. इसमें मुख्य रूप से बसपा के झारखंड प्रदेश प्रभारी सह पलामू जिला लोकसभा प्रभारी विनोद कुमार बागड़ी मुख्य रूप से उपस्थित थे. मौके पर मुख्य अतिथि बागड़ी ने कहा कि देश में मायावती एक नेता हैं जो देश के गरीब, दलित, बहुजन समाज के साथ-साथ सर्वजन समाज का भला कर सकती है. आने वाले चुनाव में मोदी बनाम मायावती होगा. उन्होंने बसपा कार्यकर्ताओं को लोकसभा चुनाव के लिए कमर कसकर तैयार रहने का आहवान किया. बैठक में सर्वसम्मति से पंचायत कमेटी गठित की गई. इसमें कुतुबुद्दीन अंसारी को अध्यक्ष, सुनिल कुमार को महासचिव, ब्रजकिशोर प्रसाद को उपाध्यक्ष व हरिवंश ठाकुर को प्रभारी बनाया गया. सुरेश प्रसाद साव को कोषाध्यक्ष, राजधानी राम को सचिव बनाया गया. इसके साथ 17 सदस्यीय कमेटी बनाई गई. मौके पर रघुराई राम, अरुण राम, अशर्फी चंद्रवंशी, विस क्षेत्र प्रभारी राजन मेहता, बीरेंद्र राम, विनय राम, नंदू दास, नईमुद्दीन अंसारी, नंदू चंद्रवंशी समेत दर्जनों लोग उपस्थित थे.

गैर-BJP, गैर-कांग्रेसी मोर्चे की कवायद को झटका, अखिलेश ने KCR से मुलाकात टाली, माया ने साधी चुप्पी

नई दिल्ली। 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले गैर कांग्रेस, गैर बीजेपी गठबंधन बनाने के कवायद में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव इन दिनों विभिन्न पार्टियों के आलाकमानों से मुलाकात कर रहे हैं. इसी कड़ी में केसीआर आज समाजवादी पार्टी के चीफ अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती से मुलाकात करने वाले थे. लेकिन उनकी यह कोशिश मूर्त रूप लेती नजर नहीं आई. अखिलेश यादव के साथ केसीआर की मुलाकात फिलहाल टल गई है और मायावती के साथ बैठक के बारे में फाइनल फैसला नहीं हो पाया है.

अखिलेश यादव ने बुधवार को लखनऊ में कहा कि वह छह जनवरी के बाद हैदराबाद में राव से मुलाकात करेंगे वहीं मायावती ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री को मिलने का वक्त अभी नहीं दिया है. यादव ने कहा कि गठबंधन बनाने के राव के प्रयासों की वह तारीफ करते हैं लेकिन वह उनसे दिल्ली में नहीं मिल सकेंगे. इससे पहले सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव के आवास पर दोनों के बीच बैठक प्रस्तावित थी.

मायावती रविवार से ही दिल्ली में हैं लेकिन उन्होंने प्रस्तावित बैठक के समय की पुष्टि नहीं की है. मायावती की अगुवाई वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उतरप्रदेश में मुख्य क्षेत्रीय दल हैं. सपा ने कहा है कि मोर्चे में उन्हें शामिल किए बगैर गैर बीजेपी गठबंधन कामयाब नहीं होगा.

टीआरएस प्रमुख सोमवार की रात को दिल्ली पहुंचे और यहां बृहस्पतिवार तक रूकेंगे. क्षेत्रीय दलों के संघीय मोर्चे की वकालत करते हुए राव ने सोमवार को तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की थी. बैठक के बाद उन्होंने संवाददाताओं से कहा था कि उन्होंने ”परस्पर हित के मामलों” और ”राष्ट्रीय राजनीति” पर चर्चा की. उन्होंने कहा, हमारी वार्ता जारी रहेगी और जल्द ही हम ठोस योजना के साथ सामने आएंगे.” बनर्जी ने कुछ नहीं बोला. उन्होंने रविवार को ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को फोन कर वैकल्पिक मोर्चे पर चर्चा की थी.

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पुलिस कस्टडी में दलित युवक की मौत, 11 पुलिसकर्मी निलंबित

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उत्तर प्रदेश में अमरोहा के धनौरा क्षेत्र में पुलिस की हिरासत में एक दलित युवक की मृत्यु हो जाने से आक्रोशित ग्रामीणों ने बुधवार को मंडी धनौरा मे बंदायू-पानीपत स्टेट हाईवे-51 सडक मार्ग जाम लगा दिया.

पुलिस सूत्रों ने यहां बताया कि अमरोहा के मंडी धनौरा क्षेत्र के बसी शेरपुर निवासी बालकिशन (3०) को गत रविवार को चोरी के वाहन खरीदने के आरोप में पूछताछ के लिए थाने लाकर हवालात में बंद कर दिया था. बुधवार को की रात में युवक की तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया जहां चिकित्सकों ने युवक को मृत घोषित कर दिया. पुलिस ने मृतक के परिजनों को बुधवार नौ बजे सूचित किया.

इस मामले में अपर पुलिस अधीक्षक बृजेश कुमार ने धनौरा थाना के प्रभारी निरीक्षक अरविन्द शर्मा समेत 11 पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया है. इसमें चार होमगार्ड के निलंबित के लिये जिला कमांडेंट को पत्र लिखा गया है.

वहीँ दूसरी ओर मृतक की पत्नी कुंती ने आरोप लगाया है कि पिछले चार दिनों से बालकिशन को बिना किसी आरोप के हवालात में बंद कर पूछताछ की गयी. पुलिस द्वारा की गयी पिटायी के दौरान उसकी मृत्यु हुई. पुलिस उसे छोड़ने के लिये रूपयों की मांग कर रही थी. मृतक युवक के छोटे छोटे चार बच्चे हैं.

सूत्रों ने बताया कि पुलिस हिरासत में युवक की मृत्यु की सूचना मिलते ही ग्रामीणों ने हाईवे पर सुबह दस बजे से जाम लगा है. वाहनों की लंबी लंबी कतार लग गई हैं. मौके पर कई थानों की पुलिस तथा पीएसी तैनात की गयी है. भीड़ ने उपजिलाधिकारी के वाहन में तोडफ़ोड़ कर दी.

उपजिलाधिकारी(एसडीएम) संजीव बंसल तथा पुलिसक्षेत्राधिकारी मोनिका यादव द्वारा आक्रोशित भीड़ को बताया गया कि दोषी पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है. उन्होंने ग्रामीणों से जाम खोलने की अपील की है. ग्रामीणों ने दोषीं पुलिसकर्मियों के विरुद्ध हत्या का मुकदमा दर्ज कर मृतकाश्रित परिवार को बीस लाख रुपये और सरकारी नौकरी देने की मांग की है.

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स्टिंग ऑपरेशन: देश के इन बड़े मंदिरों में नहीं मिलती दलितों को एंट्री

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कहने को तो हम 21वीं सदी में प्रवेश कर गए हैं लेकिन भक्तों की जाति से जुड़ी शुद्धता और अपवित्रता की पुरातन पंथी सोच अभी भी देश के कुछ प्रमुख मंदिरों में अंदर तक घर की हुई है, जहां देवी-देवताओं की पवित्रता को बचाए रखने के लिए दलितों का प्रवेश वर्जित है. इंडिया टुडे ने देश के ऐसे ही कुछ प्रमुख मंदिरों की तहकीकात की है जहां अभी भी प्राचीन मान्यताओं के अनुसार दलितों के प्रवेश पर रोक है.

काल भैरव मंदिर, वाराणसी

मंदिरों और आस्था की नगरी वाराणसी के काल भैरव मंदिर के पुजारी ने बताया कि यहां दलितों के भगवान के छूने पर रोक है. पुजारी कहा, ‘ देखिए मैं ऐसा कुछ नहीं करुंगा जो धर्म के खिलाफ हो. यह अलग बात है कि मेरी जानकारी के बगैर कोई (निम्न जाति) आ जाता है. लेकिन यदि हमें पता हो और हम उन्हें पूजा करने की इजाजत देते हैं तो मुझे डर है.’ उन्होंने आगे कहा, ‘एक प्रार्थना है जिसमें भगवान के पैर छुए जाते हैं. मैं उन्हें (निम्न जाति) छूने की इजाजत नहीं देता. मैं ऐसा होने नहीं दूंगा. दूसरी जाति के भक्तों को ऐसा करने की इजाजत है, लेकिन वे (दलित) जो खाते हैं वो अपवित्र है. यह सबसे बड़ी मुश्किल है कि वे जो खाते हैं हम उसे देखना भी पसंद नहीं करते.’

लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर

संविधान द्वारा धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार के बावजूद हमारे धर्म में प्रचलित प्रथा की भेदभावपूर्ण व्याख्या अभी भी जारी है. ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में 11वीं सदी के प्रतिष्ठित लिंगराज मंदिर में भी दलित भक्त ऐसी ही पाबंदियों का सामना कर रहे हैं. साल 2012 में शिवरात्रि के दिन भगवान शिव में आस्था रखने वाले 2 लाख भक्त इस मंदिर दर्शन के लिए आए थे. पारम्परिक तौर पर इस मंदिर में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर रोक है, लेकिन इंडिया टुडे की टीम ने पाया कि इस मंदिर के गर्भगृह में दलितों के प्रवेश को साल में एक बार सिर्फ शिवरात्रि के दिन ही इजाजत है. लिंगराज मंदिर में दो दशक से पुजारी मानस ने खुलासा किया कि शिवरात्रि में दलितों के प्रवेश के बाद प्रवित्र वेदी को स्नान कराके पवित्र किया जाता है.

मानस ने इस विशेष स्नान की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि सर्वप्रथम भगवान को सफेद पाउडर लगाया जाता है, जिसके बाद पवित्र गंगा जल का से स्नान कराया जाता है. मंदिर की रसोई को भी सजाया जाता है.

जागेश्वर धाम, अल्मोड़ा

उत्तराखंड की पहाड़ों पर स्थित जागेश्वर मंदिर, भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है, जहां दलितों का प्रवेश वर्जित है. यहां के वरिष्ठ पुजारी हीरा वल्लभ भट्ट और केशव दत्त भट्ट ने इंडिया टुडे टीम के कैमरे पर खुलासा किया कि निचली जाति के लोगों को प्रांगण के बाहर से प्रार्थना करने का अधिकार है. वे अंदर नहीं आ सकते. पहले तो दलित जाति के लोग इतना नजदीक भी नहीं आ सकते थे.

बैजनाथ मंदिर, बागेश्वर

उत्तराखंड के ही बागेश्वर जिले का बैजनाथ मंदिर उन कुछ मंदिरों में एक है जहां देवी पार्वती को उनके पति भगवान शिव के साथ दर्शाया गया है. हमारी पड़ताल में खुलासा हुआ कि यहां भी निचली जाति के लोगों के प्रवेश पर रोक है. हमारे अंडरकवर रिपोर्टर ने जब यहां के वरिष्ठ पुरोहित पूरन गिरी से पूछा कि क्या यहां दलितों को प्रवेश की इजाजत है तो उन्होंने कहा ‘नहीं’, लेकिन ब्राह्मण और क्षत्रीय प्रवेश कर करते हैं.

भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद ने आरोप लगाया कि कथित मंदिरों में कथित जातिगत भेदभाव ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचाराधारा’ में सन्निहित है. उन्होंने कहा कि इसीलिए वे बहुजन हित की बात करते हैं. मंदिरों को भी संविधान के दायरे में लाना चाहिए. सभी जाति के लोगों को मंदिर प्रशासन में हिस्सा लेने का अवसर मिलना चाहिए.

वहीं भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता नरेंद्र तनेजा ने इस खुलासे को सामाजिक और धार्मिक मामला बताया. उन्होंने कहा कि मैं इस आक्रोश और निराशा को समझता हूं. सत्ता में आने पर हमने अनुसूचित जातियों के लिए सबसे ज्यादा किया. यह सामाजिक और धार्मिक मामला है. एक समाज के तौर पर हमें भेदवाव को दूर करने का प्रयास करना चाहिए. इस तरह के छुआछूत की प्रथा का कोई स्थान नहीं है.

लेखक और चिंतक कांचा इलैया ने मंदिरों में पूर्वाग्रह का वर्णन किया को आधात्मिक मुद्दा बताया. उनका कहना है कि यह सवाल हिंदू धर्म और मंदिरों में आध्यात्मिक लोकतंत्र लाने का है. वहीं संघ विचारधारा से संबंध रखने वाले संगीत रागी ने कहा कि संघ जमीनी स्तर पर निचली जातियों के उत्थान के लिए काम करता है. आजाद के आरोपों को भावनात्मक बताने हुए उन्होंने खारिज किया और कहा कि यह भारत की सदियों पुरानी जाति व्यवस्था की गलत अवधारणा है.

श्रोतः- आजतक इसे भी पढ़ें-हनुमान को दलित कहे जाने पर दलितों को ही आपत्ति क्यों?

नमाज पर सियासत में कूदी मायावती, यूपी सरकार को घेरा

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mayawatiनोएडा। राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में नमाज को लेकर डीएम के आदेश के बाद राजनीति गरमा गई है. इस मुद्दे पर चल रही बहस के बीच बसपा प्रमुख मायावती भी सामने आई हैं. उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर एक बयान जारी कर सरकारी फरमान को अनुचित व एकतरफा बताया है.

दरअसल नोएडा के सेक्टर-58 स्थित प्राधिकरण के सार्वजनिक पार्क में पूर्व अनुमति के बग़ैर जुमा की साप्ताहिक नमाज़ पढ़ने पर प्रशासन द्वारा पाबंदी लगा दी गई है. साथ ही ऐसा होने पर वहाँ की निजी कम्पनियों पर भी कार्रवाई करने की धमकी दी है। इस फैसले को लेकर तमाम नेताओं और राजनीतिक दलों ने अपना विरोध दर्ज कराया है। इसी क्रम में बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने एक बयान जारी कर कहा है कि “अगर उत्तर प्रदेश बीजेपी सरकार के द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक गतिविधियों पर पाबन्दी लगाने की कोई नीति है तो वह सभी धर्मों के लोगों पर एक समान तौर पर तथा पूरे प्रदेश के हर जिले में व हर जगह सख्ती से बिना किसी भेदभाव के क्यों नहीं लागू की जा रही है?”

सुश्री मायावती जी ने अपने बयान में कहा है कि “उस स्थल पर अगर फरवरी 2013 से ही जुमे की नमाज लगातार हो रही है तो अब चुनाव के समय उसपर पाबन्दी लगाने का क्या मतलब है? यह कार्यवाही पहले ही क्यों नहीं की गयी तथा अब लोकसभा आमचुनाव से पहले इस प्रकार की कार्रवाई क्यों की जा रही है? इससे बीजेपी सरकार की नीयत व नीति दोनों पर ही उंगली उठना व धार्मिक भेदभाव का आरोप लगना स्वाभाविक है.”

मायावती ने भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाया कि इस कदम से यह आशंका भी प्रबल होती है कि चुनाव के समय में इस प्रकार के धार्मिक विवादों को पैदा करके बीजेपी की सरकार अपनी कमियों व विफलताओं पर से लोगों का ध्यान बांटना चाहती है.”

दरअसल जुमे की नमाज के सम्बन्ध में नोएडा सेक्टर-58 स्थित 23 निजी कम्पनियों को पुलिस नोटिस जारी करके उनपर कार्रवाई की धमकी देने की बात कही गई है. बसपा प्रमुख ने इसे पूरी तरह से गलत व अति-गैरजिम्मेदाराना कदम बताया है. भाजपा के इस कदम को हालिया चुनावी नतीजों से जोड़ते हुए बसपा प्रमुख ने कहा है कि बीजेपी सरकार की ऐसी कार्रवाईयों से यह साफ है कि हाल में पाँच राज्यों में हुये विधानसभा आम चुनावों में हुई करारी हार से बीजेपी के वरिष्ठ नेतागण कितना घबराये हुये हैं तथा उसी हताशा व निराशा से गलत व विसंगतिपूर्ण फैसले ले रहे हैं.

यूपी: नोएडा में खुले में नमाज पढ़ने पर रोक, एसएसपी ने जारी किया आदेश

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उत्तर प्रदेश की नोएडा पुलिस ने सेक्टर 58 औद्योगिक क्षेत्र स्थित कंपनियों को चिठ्ठी लिखकर कर्मचारियों से खुले में नमाज पढ़ने से बचने की सलाह दी है. जारी आदेश में कहा गया है कि मुस्लिम कर्मचारी जुमे की नमाज पार्क जैसे खुले एरिया में न पढ़ें.

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नोएडा पुलिस द्वारा जारी नोटिस में कहा गया है कि यदि किसी औद्योगिक संस्थान के कर्मचारी निर्देश का उल्लंघन करते हुए पाए जाते हैं तो इसके लिए संबंधित कंपनियों को उत्तरदायी ठहराया जाएगा.

क्षेत्र की कंपनियों ने मामले पर स्पष्टीकरण के लिए नोएडा के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक की मांग की है. जानकारी के अनुसार, जारी नोटिस में कहा गया है सेक्टर 58 स्थित अथॉरिटी के पार्क में किसी प्रकार की धार्मिक गतिविधियां जिसमें शुक्रवार को पढ़े जाने वाली नमाज की अनुमति नहीं है.

पुलिस ने पत्र में लिखा कि, प्राय: यह देखने में आया है कि आपके कंपनी के मुस्लिम कर्मचारी पार्क में एकत्रित होकर नमाज पढने के लिए आते हैं, जिनको पार्क में सामूहिक रूप से मुझ एचएलओ द्वारा मना किया गया है एवं इनके द्वारा दिए गए नगर मजिस्ट्रेट महोदय के प्रार्थनापत्र पर किसी भी प्रकार की कोई अनुमति नहीं दी है.’

‘अत: आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप अपने स्तर से अपने समस्त मुस्लिम कर्मचारियों को अवगत कराएं कि वो नमाज पढ़ने के लिए पार्क में न जाएं. यदि आपकी कंपनी के कर्मचारी पार्क में आते हैं तो ये समझा जाएगा कि आपने उनको अवगत नहीं कराया है. ये व्यक्तिगत कंपनी की जिम्मेदारी होगी.’

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इंडोनेशिया में सुनामी से मरने वालों की संख्या बढ़कर हुई 429 : आपदा प्रबंधन एजेंसी

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इंडोनेशिया में शनिवार को आई सुनामी से मरने वालों की संख्या बढ़कर 429 हो गई है और 1,400 से अधिक घायल हुए हैं. देश की राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी के प्रवक्ता स्तुपो पूर्वो नुग्रोहो ने कहा कि मरने वालों की संख्या मंगलवार को बढ़कर 429 हो गई और कम से कम 128 अन्य लापता हैं.

शवों की खोज में लगे सैनिकों, सरकारी कर्मियों और स्वयंसेवियों को तटों पर फैले मलबे में शव मिले और रोते-बिलखते परिजनों ने शवों की पहचान की. पश्चिमी जावा और दक्षिणी सुमात्रा में तटों को तोड़कर आगे बढ़ी लहरों ने मकानों को नष्ट कर दिया जिससे हजारों लोग बेघर हुए हैं.

बता दें कि अनाक क्राकाटोआ ज्वालामुखी के फटने के बाद शनिवार को स्थानीय समयानुसार रात साढ़े नौ बजे दक्षिणी सुमात्रा और पश्चिमी जावा के पास समुद्र की ऊंची लहरें तटों को पार कर आगे बढ़ीं. इससे सैकड़ों मकान नष्ट हो गए. इस भयावह सुनामी ने चारों तरफ तबाही मचायी, जिसमें जान-माल की काफी क्षति हुई है.

देश की मौसम विज्ञान एवं भूभौतिकी एजेंसी के वैज्ञानिकों ने कहा कि अनाक क्राकाटोआ ज्वालामुखी के फटने के बाद समुद्र के नीचे मची तीव्र हलचल सुनामी की वजह हो सकती है. इंडोनेशिया की भूगर्भीय एजेंसी के मुताबिक, अनाक क्राकाटोआ ज्वालामुखी में बीते कुछ दिनों से राख उड़ने की वजह से कुछ हरकत होने के संकेत मिल रहे थे.

यह विशाल द्वीपसमूह देश पृथ्वी पर सबसे अधिक आपदा संभावित देशों में से एक है, क्योंकि इसकी अवस्थिति प्रशांत अग्नि वलय के दायरे में है, जहां टेक्टोनिक प्लेट आपस में टकराती हैं. इससे पहले सितंबर में सुलावेसी द्वीप पर पालू शहर में आए भूकंप और सुनामी में हजारों लोगों की जान गई थी.

श्रोत:-अमर उजाला Read it also-5वीं की दलित छात्रा का अपहरण कर रेप

अंडमान निकोबार के तीन द्वीपों के नाम बदलेगी मोदी सरकार

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नई दिल्ली। केंद्र की मोदी सरकार अंडमान निकोबार के तीन द्वीपों के नाम बदलने जा रही है. इन तीन द्वीपों के नाम रॉस, नील और हैवलॉक हैं.

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक रॉस द्वीप का नाम ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’, नील द्वीप का नाम ‘शहीद’ और हैवलॉक द्वीप का नाम बदलकर ‘स्वराज’ रखा जाएगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 दिसंबर को पोर्ट ब्लेयर की अपनी यात्रा पर इन द्वीपों के नाम बदलने की औपचारिक घोषणा करेंगे. गृह मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि नाम बदलने को लेकर सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, 1943 में आज़ाद हिंद फौज के गठन की 75वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ पोर्ट ब्लेयर में 150 मीटर ऊंचा राष्ट्रीय ध्वज लहराएंगे.

एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक 30 दिसंबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर में भारतीय झंडा फहराया था. माना जाता है कि पोर्ट ब्लेयर पहला क्षेत्र था जो ब्रिटिश शासन से मुक्त हुआ था.

मार्च 2017 में भाजपा नेता एलए गणेशन ने राज्यसभा में पर्यटक स्थल हैवलॉक द्वीप का नाम बदलने की मांग की थी. गणेशन ने कहा था कि एक जगह का नाम ऐसे व्यक्ति के नाम पर रखा जाना जो 1857 में भारतीय देशभक्तों के ख़िलाफ़ था, शर्म की बात है.

मालूम हो कि हैवलॉक द्वीप का नाम ब्रिटिश अधिकारी सर हेनरी हैवलॉक के नाम पर रखा गया था. यह इस केंद्र शासित प्रदेश का सबसे बड़ा द्वीप है.

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10 लाख कर्मचारी हड़ताल पर, हफ्ते भर में एक ही बार खुल पाए बैंक

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नई दिल्ली। पिछले करीब एक हफ्ते में देश की बैंकिंग सेवा काफी प्रभावित रही है. 5 दिनों में से एक बार बैंक खुलने के बाद आज फिर देश के बैंक बंद रहेंगे. कुल नौ बैंक यूनियन ने आज हड़ताल बुलाई है, ऐसे में इस हड़ताल से आम लोगों को काफी परेशानी का सामना कर पड़ सकता है. बता दें कि 21 से 23 दिसंबर को भी बैंकों ने हड़ताल की थी, उसके बाद 24 दिसंबर को बैंक खुले थे. फिर 25 और 26 को छुट्टी के कारण बैंक बंद रहे थे. देश के करीब 10 लाख बैंक कर्मचारी आज हड़ताल पर रहेंगे.

गौरतलब है कि नए साल से ठीक पहले अगर इतने दिन बैंक बंद होने के कारण लोगों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. हड़ताल, महीने का दूसरा शनिवार, क्रिसमस और फिर एक बार फिर हड़ताल से बैंकों का काम पूरी तरह से ठप हो गया है.

आपको बता दें कि युनाइटेड फॉरम ऑफ बैंक यूनियंस के मीडिया प्रभारी अनिल तिवारी के अनुसार, बैंक कर्मचारियों व अधिकारियों के संगठन आयबॉक ने वेतनवृद्धि और बैंकों के विलय के विरोध में बैंकों की हड़ताल की घोषणा की थी. देश में करीब 3.2 लाख से अधिक बैंक अधिकारी पहले भी हड़ताल पर रहे थे, इस बीच कुछ क्षेत्रों में एटीएम में भी काफी दिक्कतें आई थीं.

बैंक कर्मचारियों के अनुसार, मई 2017 को जमा हमारी मांगों के चार्टर के आधार पर 11वें द्विपक्षीय वेतन संशोधन वार्ता के लिए बिना शर्त आदेश पत्र जारी करने की मांग कर रही है. वेतन पुनरीक्षण पर बातचीत शुरू होने के 19 महीने बीत जाने के बाद भी इस प्रक्रिया में अभी तक कोई कदम नहीं उठाया गया है.

गौरतलब है कि युनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) ने सार्वजनिक क्षेत्र के तीन बैंकों के विलय के विरोध में 26 दिसंबर को हड़ताल का आह्वान किया है, यूएफबीयू शीर्ष नौ बैंक संघों की एक ईकाई है.

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तीसरे मोर्चे के लिए दिल्ली पहुंचे केसीआर, अखिलेश और मायावती से करेंगे मुलाकात

नई दिल्ली। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर थर्ड फ्रंट के गठन को लेकर केसीआर ने सोमवार को कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तथा रविवार को उड़ीसा के मुख्यमंत्री एवं बीजू जनता दल के अध्यक्ष नवीन पटनायक से मुलाकात कर चुके हैं. राव ने कहा इस मुलाकात के परिणामों को लेकर वह खासे उत्साहित हैं.

टीआरएस के दिल्ली कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक सोमवार रात को राव दिल्ली आ गए थे, 25 दिसंबर को पूरा दिन केसीआर ने अपने घर पर लगातार बैठकें करके गुजारा. बुधवार को उनकी मुलाकात सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती से हो सकती है. मंगलवार को पूरी दिन राव की अखिलेश और मायावती से मुलाकात को लेकर अटकलें लगती रहीं. लेकिन देर शाम तक मुलाकात नहीं हो सकी.

अखिलेश लखनऊ में थे और मायावती के कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक अब तक दोनों की मुलाकात के लिए समय तय नहीं है. बसपा के वरिष्ठ नेता ने बताया कि बहनजी दिल्ली में ही हैं लेकिन अब तक राव की ओर से मुलाकात के लिए कोई जानकारी नहीं आई है. समाजवादी पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा अखिलेश यादव के कई कार्यक्रम लखनऊ में लगे हैं और उनका फिलहाल दिल्ली आने का कोई प्रोग्राम नहीं है. तेलंगाना में विधानसभा चुनाव में टीआरएस की शानदार जीत के बाद उत्साह से लवरेज राव दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार दिल्ली आए हैं और बुधवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से औपचारिक मुलाकात का कार्यक्रम है.

गुजरे कल राव ने ममता बनर्जी से मुलाकात के बाद कहा था कि वह गैर भाजपा और गैर कांग्रेस गठबंधन के लिए विभिन्न दलों के साथ बातचीत का दौर जारी रखेंगे. राव ने कहा था कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए जल्द ही वह एक ठोस कार्ययोजना का ऐलान करेंगे.

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