ओमिक्रॉन से चाहते हैं बचाव? तो सुन लिजिए एक्सपर्ट्स की राय….

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नई दिल्ली- कोरोना वायरस पिछले दो साल से काल बनकर पूरी दुनिया पर छाया हुआ है। इन दो सालों में ये कई प्रचंड रूपों में हमारे सामने आया है। इसमें अब तक डेल्टा वैरिएंट सबसे ज्यादा भयानक रहा है। लेकिन अब एक नया वैरिएंट सामने आया है जिसे पूरी दुनिया में ओमिक्रॉन के नाम से जाना जा रहा है। हालांकि इसे लेकर अभी तक कुछ साफ नहीं हो पाया है कि ये किस तरह दुनिया को प्रभावित करने वाला है। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये डेल्टा से 5 से 7 गुना ज्यादा प्रभावित करेगा। भारत में अब तक ओमिक्रॉन के कुल 64 केस दर्ज किए गए हैं और इसमें सबसे पहला केस केरल से आया था, जहां ये प्रचंड रुप अपनाए हुए है। इसके अलावा दिल्ली और महाराष्ट्र में इसके अब तक 8-8 मामले सामने आ चुके हैं। इसी तरह ओमिक्रॉन ने देश के कुल 8 राज्यों में अपनी घुसपैठ कर ली है। अब बात करें इसकी गंभीरता, ट्रांसमिशन रेट और लक्षणों की, जिसको लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन का दावा है कि नया ओमिक्रॉन वैरिएंट पहले संक्रमित हो चुके लोगों को भी आसानी से अपनी चपेट में ले सकता है। इसके अलावा, वैक्सीन के दोनों डोज ले चुके लोग भी ओमिक्रॉन के खिलाफ सुरक्षित नहीं हैं। आपको बता दें ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के रीसर्चर्स की भी तरफ से ये बात सामने आई है कि ये उन लोगों को भी संक्रमित कर सकता है जिन्होंने वेक्सीन की दोनों डोज ले ली है। लेकिन इसके साथ ही एक राहत की बात यह है कि आमिक्रॉन के खिलाफ वैक्सीन की बूस्टर डोज प्रभावी साबित हो रही है इसलिए तीसरा डोज भी लगवाएं।
वहीं बात करें बायोएनटेक और फाईजर की तो, बीते हफ्ते कंपनी की तरफ से बयान सामने आया जिसमें कहा गया है कि उनके वैक्सीन की तीन डोज नए वैरिएंट ओमिक्रॉन से लड़ने में कामयाब साबित हो रही है। हालांकि मॉडर्ना की तरफ से अभी तक कोई डेटा सामने नहीं आया है और जॉनसन एंड जॉनसन ने भी इस मामले में किसी भी तरह का कमेन्ट करने से इन्कार कर दिया है। इसके लक्षण की बात करें तो एक्सपर्ट्स का मानना है कि ओमिक्रॉन से संक्रमित मरीजों को रात में पसीना आने की शिकायत हो सकती है। कई बार मरीज को इतना ज्यादा पसीना आता है कि उसके कपड़े या बिस्तर तक गीले हो सकते हैं, संक्रमित को ठंडी जगह में रहने पर भी पसीना आ सकता है। इसके अलावा मरीज को शरीर में दर्द की शिकायत भी हो सकती है।

यूपी विधानसभा चुनाव से पहले काशी के पंडों ने उड़ाई भाजपा की नींद

नई दिल्ली- जिस काशी और अयोध्या के बूते भाजपा यूपी की सत्ता में दुबारा आने की राह तैयार करने में जुटी है, उसी काशी के साधुओं ने प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के सपनों पर पानी फेरने का ऐलान कर दिया है। 14 दिसंबर को एबीपी न्यूज में दिखाई गई एक चर्चा में साधुओं ने धर्म की राजनीति करने पर मोदी और भाजपा को न सिर्फ घेरा, बल्कि बेरोजगारी और महंगाई की बात कर सबको चौंका दिया। साधुओं ने जब एक के बाद एक मुद्दे गिनाने शुरू किये तो चैनल के दफ्तर में बैठी एंकर भी तिलमिला गई, और एजेंडा सेट न होता देख साधुओं का वीडियो बंद कर दिया गया। वीडियो में साफ दिख रहा है कि जब चैनल का रिपोर्टर साधुओं से धर्म को लेकर बात करना चाहता है, साधु बेरोजगारी और महंगाई का मुद्दा उठा देते हैं। साथ ही धर्म की राजनीति को लेकर पीएम की आलोचना से भी नहीं चूकते। ऐसे में पहले तो चैनल की एंकर और रिपोर्टर द्वारा साधुओं को अपने धर्म के एजेंडे पर लाने की कोशिश की जाती है और जब साधु लगातार भाजपा पर धर्म की राजनीति को लेकर सवाल उठाते हैं तो उनका वीडियो बंद कर दिया जाता है। यहां एक सवाल तो यह उठ रहा है कि न्यूज चैनलों पर जिस तरह भाजपा का एजेंडा सेट करने का आरोप लगता रहा है, भाजपा के विरोध में बोलने वाले साधुओं का वीडियो बंद कर देने से क्या वो आरोप साबित नहीं होते? क्योंकि चैनल भाजपा और मोदी पर सवाल उठाने वालों का वीडियो तक चलाना नहीं चाहते हैं। और दूसरा सवाल यह है कि मीडिया को अपने खेमे में कर के देश की जनता पर अपने मुद्दे थोपने की कोशिश में लगी भाजपा क्या ऐसा करने में फेल हो गई है? क्योंकि पीएम मोदी से लेकर सीएम योगी तक, जिस धर्म के नाम पर यूपी और तमाम प्रदेशों सहित केंद्र की सियासत जीतने की तैयारी में लगे हैं, वैसा होता तो नहीं दिख रहा। क्योंकि जब धर्म का आवरण ओढे साधु ही धर्म की राजनीति पर सवाल उठा दें और बेरोजगारी और महंगाई को मुद्दा बताने लगे तो फिर साफ है कि भाजपा के लिए यूपी और अन्य प्रदेशों में चुनावी जीत की राह मुश्किल है।

हर साल लाखों लोग आखिर क्यों छोड़ रहे हैं भारत की नागरिकता?

नई दिल्ली- भारत में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी को लेकर अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। जबकि 10 जनवरी 2020 से ही नागरिकता संशोधन विधेयक यानी सीएए लागू कर दिया गया है।  इस बिल के तहत भारत की नागरिकता पाने के लिए पात्र आवेदन कर सकते हैं। लेकिन हम बात यहां भारत की नागरिकता को छोड़ने को लेकर करने जा रहे हैं। लोकसभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक सवाल का जवाब देते हुए, लिखित में बताया है कि साल 2015 से 2019 के बीच 6।76 लाख से ज्यादा लोगों ने भारत की नागरिकता छोड़ दी है। विदेश मंत्रालय से मिली जानकारी की माने तो तकरीबन 1,24,99,395 भारतीय नागरिक दूसरे देशों में रह रहे हैं। टाइम ऑफ़ इंडिया के अनुसार, अमेरिका में सबसे ज्यादा भारतीय रहते हैं। इनमें से औसतन 44% भारतीय लोग भारत की नागरिकता छोड़ देते हैं। इसके बाद भारतीय सबसे ज्यादा कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में हैं जहां रहते हुए करीब 33% भारतीय नागरिकता छोड़ देते हैं। दूसरे देशों की बात करें तो ब्रिटेन, सऊदी अरब, कुवैत, यूएई, कतर, सिंगापुर आदि देशों में भी भारतीय बड़ी संख्या में जा बसते हैं। गृह मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, विदेश में रह रहे 1।25 करोड़ भारतीय नागरिकों में से 37 लाख लोग ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया कार्डधारक हैं फिर भी इन्हें अभी वोट देने, चुनाव लड़ने, एग्रीकल्चर प्रॉपर्टी खरीदने का या सरकारी कार्यालयों में काम कर पाने का अधिकार प्राप्त नहीं है। अब सवाल ये हैं कि आखिर क्यों हर साल भारतीय देश को छोड़ बाहर बस रहे हैं और अपनी नागरिकता त्याग रहे हैं। जानकारों की माने तो बाहर जाकर बसने वाले लोग अपनी पढ़ाई, अच्छे करियर, फाइनेंसियल स्टेटस और अपने फ्यूचर को बेहतर बनाने के उद्देश से विदेश जाते हैं और वहीँ बस कर रह जाते हैं। ये देखा गया है कि विदेशों में पढ़ाई के लिए हर साल जाता युवा वर्ग वहीँ सेटल होने के बारे में सोचता हैं और ऐसा करते हुए लगभग हर साल विदेश पढ़ाई के लिए जाने वाला 80% युवा वहीँ का हो कर रह जाता है। युवाओं की बात करें तो उनके सामने कई बड़ी कंपनियों के भारतीय मूल के अधिकारियों के उदहारण सामने हैं जिन्हें अपना आदर्श मान कर युवा विदेश का रुख कर रहे हैं। इन अधिकारियों में सीईओ सुंदर पिचाई, सत्य नडेला, अरविंद कृष्णा, पराग अग्रवाल का नाम मुख्यता से लिया जाता है। इसके साथ ही युवाओं का मानना है कि भारत में अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी उन्हें बेहतर अवसर नहीं मिल पाते हैं इसलिए वो विदेश में जाकर फ्यूचर बनाने की सोचते हैं।

दलितों के लिए शिक्षा बनी संघर्ष, पक्षपात और यातनाएं सहने को मजबूर हैं छात्र

नई दिल्ली- हमारे समाज को जातीयता का कीड़ा सदियों से खाता चला आ रहा है। इस दानव रूपी कीड़े को जड़ से खत्म करने के लिए डॉ भीमराव आंबेडकर ने कड़ा संघर्ष किया लेकिन आज जब हम उनके किए गये कार्यों के बावजूद समाज को जातिवाद की बेड़ियों में जकड़ा हुआ देखते हैं तो खुद को असहाय पाते है। आंबेडकर इस जातीयता को मिटाने का सबसे बड़ा हथियार शिक्षा को मानते थे और आज शिक्षा के क्षेत्र में ही सबसे ज्यादा जातिवाद देखा जा रहा है। इसके हालिया उदहारणों में जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी से वायवा स्कैम, इलाहाबाद के झूसी स्थिति जी.बी. पंत सोशल इंस्टीट्यूट में नॉट फाउंड सुटेबल और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का दो साल पुराने मामले में कोर्ट द्वारा पक्षपात के साक्ष्य मांगने को लेकर देखे गये हैं। भारत में आज भी अपने मूल अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे दलितों की आबादी लगभग 20 करोड़ है। इस बारे में दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जेनी रोवेना कहती हैं कि “यूनिवर्सिटी कैम्पस में जातिगत उत्पीड़न होना आम बात है। यूनिवर्सिटी की कक्षाएं दलित छात्रों के लिए भयानक जगह बन चुकी हैं इसलिए शर्मिंदगी और यातनाओं से बचने के लिए बहुत से दलित छात्र कक्षाओं में जाते ही नहीं हैं।” सरकार के हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट के आंकड़े बताते हैं कि 18 से 23 साल के दलित या अन्य पिछड़ी जातियों के बच्चों की संख्या केवल 14.7% है जबकि उन्हें कई सब्जेक्ट्स में 15% आरक्षण हासिल है, इसके बावजूद दलित छात्र कक्षाओं में ना जाने को मजबूर हैं।
डीडब्लू से साभार
ऐसा ही भेदभाव जब कोट्टायम की दीपा पी मोहनन के साथ हुआ तब उन्होंने इसके खिलाफ लड़ने का फैसला लिया। 11 दिनों की भूख हड़ताल के बाद दीपा ने अपनी लड़ाई जीती और हजारों दलित छात्रों के लिए मिसाल खड़ी की। दीपा नैनोमेडिसन पर रिसर्च कर रही हैं। उन्होंने देखा कि उन्हें स्टाफ लगातार परेशान करता था और यूनिवर्सिटी लैब में घूसने तक नहीं दिया जाता था, यहाँ तक कि उन्हें बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं मिलती थी। अपने साथ होते इस अपमानजनक व्यवहार के बाद उनकी कई बार हिम्मत टूटी और कई बार उनके मन में आया कि वो अपनी रिसर्च छोड़ दें लेकिन फिर दीपा ने लड़ने का फैसला किया। दीपा ने अपने ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ 11 दिन की भूख हड़ताल की और उनकी शिकायतों पर महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी के नैनोसाइंस और नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर के अध्यक्ष को बर्खास्त कर दिया गया। उनकी शिकायत के बाद ही यूनिवर्सिटी ने वाइस चांसलर की अध्यक्षता में एक कमिटी भी स्थापित की है, जो दलित विद्यार्थियों के साथ कैंपस में हो रहे दुर्व्यवहार और शोषण के आरोपों की जांच करेगी। समाज में दलितों के साथ इस तरह की घटनाएं होना आम बात है लेकिन हमारा समाज इसे मानने को तैयार नहीं है। समाज यही कहता है कि वो बदल गया है जबकि सच तो ये हैं कि समाज की समझ में जातिगत भेदभाव रचा बसा है बस उसे दर्शाने के तरीकों में बदलाव आया है।

बहुजन बुलेटिनः 14 दिसंबर की खबरें

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1- पंजाब में होने वाले चुनाव के मद्देनजर अकाली दल ने बीएसपी के साथ गठबंधन किया है। इसी बीच बसपा प्रमुख मायावती ने एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि पंजाब (Punjab)में अकाली दल और बसपा का गठबंधन पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएगा

2- झारखंड में कार्यकर्ताओं ने एक केंद्रीय कानून को लागू करने और राज्य में डायन-शिकार की प्रथा को रोकने के लिए ‘ओझा’ और आदिवासी सरदारों को जवाबदेह ठहराने की मांग की है। गैर-सरकारी संगठन फ्री लीगल एड कमेटी के अध्यक्ष प्रेमजी ने कहा कि झारखंड में हर साल डायन-शिकार के नाम पर लगभग 40-50 लोगों में ज्यादातर महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है और मार दिया जाता है।

3- नागालैंड के मोन जिले में सेना के विशेष बलों द्वारा किए गए एक असफल अभियान के दौरान 14 युवाओं की मौत के एक हफ्ते बाद, इस क्षेत्र के एक शीर्ष आदिवासी निकाय ने सशस्त्र बलों के खिलाफ “पूर्ण असहयोग आंदोलन” की घोषणा की है।

4- अभिनेता प्रकाश राज ने हाल ही में एक ऐसा काम किया, जिससे उनकी खूब वाहावाही हो रही है। प्रकाश राज ने दलित समाज की एक गरीब लड़की को ब्रिटेन में शिक्षा दिलाने में मदद की। प्रकाश राज के आर्थिक मदद के चलते दलित समाज की मेधावी लड़की ब्रिटेन जा पाई। इस काम को लेकर तमिल फिल्म इंडस्ट्रीज में प्रकाश राज की खूब सराहना हो रही है।

5-प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा काशी विश्वनाथ धाम का उद्घाटन करने के एक दिन बाद, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने भाजपा पर हमला बोला है। यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि विधानससभा चुनावके ठीक पहले भाजपा द्वारा बैक-टू-बैक घोषणाएं, नई परियोजनाओं का शिलान्यास और केंद्र द्वारा अधूरी परियोजनाओं का उद्घाटन करना भाजपा को अपना मतदाता आधार बढ़ाने में मदद नहीं करने वाला है।

 6- जेएनयू में पीएचडी दाखिले में एससी, एसटी और ओबीसी को वायवा में कम नंबर देने का मामला गरमाता जा रहा है। पीएचडी एडमिशन का रिजल्ट आने के बाद से ही लगातार इस वर्ग के युवा और बुद्धिजीवी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। सोमवार को भी विरोध प्रदर्शन जारी रहा और जेएनयू के तमाम छात्र संगठनों ने इस जातिवाद के खिलाफ मोर्चा निकाला। छात्रों की मांग है कि वायवा का नंबर कम किया जाए।

7- लखनऊ में डॉ. अम्बेडकर स्टूडेन्ट फ्रंट ऑफ इंडिया के द्वारा दिये गए गौरी लंकेश पत्रकारिता सम्मान लखनऊ के पत्रकार सतीश संगम को भी मिला है।

मिस यूनिवर्स की बदल जाती है जिंदगी, मिलती हैं यह सुविधाएं

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आस्था/डीडी डेस्क- दुनिया को अपनी मिस यूनिवर्स 2021 मिल गई है। इस साल सौंदर्य प्रतियोगिता के इस प्रतिष्ठित खिताब को भारत की 21 वर्षीय हरनाज कौर संधू ने अपने नाम किया है। इजरायल में आयोजित इस समारोह में मिस यूनिवर्स 2021 के ऐलान के बाद मिस यूनिवर्स 2020 एंड्रिया मेजा ने हरनाज के सिर पर हीरे का खूबसूरत ताज सजाया।

मगर क्या आप जानते हैं कि इस ताज में बने डिजाइन का क्या मतलब है? और  क्या आप जानते हैं मिस यूनिवर्स को क्या-क्या सुख-सुविधाएं मिलती हैं? हम आपको ये सारी बातें बताएंगे लेकिन उससे पहले हम आपको बता दें कि इस ताज में कौन-कौन से रत्न जड़े होते हैं।

  • 37 करोड़ रुपये से भी महंगे इस बेशकीमती और खूबसूरत ताज में 18 कैरेट गोल्ड और 1770 डायमंड्स होते हैं।
  • साथ ही इसके सेंटरपीस में 62.83 कैरेट का शील्ड-कट गोल्डन कैनरी डायमंड लगा होता है। इस तरह इन सबको मिलाकर तैयार होता है मिस यूनिवर्स का ताज।

अब हम आपको बताते हैं कि इस ताज की क्या खासियत है और इसके डिजाइन का क्या मतलब है? मिस यूनिवर्स का ये बेशकीमती ताज प्रकृति, ताकत, खूबसूरती, नारीत्व और एकता से प्रेरित है। इस ताज में पत्तियों, पंखुड़ियों और लताओं के डिजाइंस, सात महाद्वीपों के सुमदायों को रिप्रेजेंट करती है। और यही वजह है कि इस ताज के सिर पर सजने के बाद कोई भी महिला विश्व सुंदरी कहलाती है।

अब आपको बताते हैं कि मिस यूनिवर्स को क्या- क्या सुविधाएं मिलती हैं और मिस यूनिवर्स बनने के बाद किसी की जिंदगी कैसे बदल जाती है।

  • मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन कभी भी मिस यूनिवर्स की प्राइज मनी का खुलासा नहीं करता है, पर बताया जाता है कि मिस यूनिवर्स को एक भारी भरकम राशि दी जाती है।
  • मिस यूनिवर्स को न्यूयॉर्क स्थित मिस यूनिवर्स अपार्टमेंट में एक साल तक रहने की इजाजत होती है, जहां उन्हें ग्रॉसरी से लेकर ट्रांसपोर्ट तक सबकुछ फ्री मिलता है। साथ ही असिस्टेंट्स और मेकअप आर्टिस्ट्स की एक टीम दी जाती है।
  • मिस यूनिवर्स के लिए एक साल तक मेकअप, हेयर प्रोडक्ट्स, शूज, कपड़े, जूलरी, स्किन केयर आदि सभी सुविधाएं फ्री होती है। इसके अलावा बेस्ट फोटोग्राफर्स, प्रोफेशनल स्टाइलिस्ट, न्यूट्रिशन, डर्मटोलॉजी और डेंटल सर्विस दिए जाते हैं।
  • मिस यूनिवर्स को इवेंट्स, पार्टीज, प्रीमियर, स्क्रीनिंग, कास्टिंग्स में एंट्री, ट्रैवलिंग प्रीविलेज और होटल में रहने-खाने का पूरा खर्च दिया जाता है।
  • मिस यूनिवर्स को पूरी दुनिया घूमने का मौका मिलता है।

हालांकि मिस यूनिवर्स को ये सारी लग्जरी मिलने के साथ उनपर बड़ी जिम्मेदारी भी होती है। उन्हें इवेंट्स, पार्टीज, चैरिटी, प्रेस कॉन्फ्रेंस में मिस यूनिवर्स ऑर्गेनाइजेशन की ओर से बतौर चीफ अंबेसडर जाना पड़ता है। जहां उन्हें खुद को बेहतर तरीके से पेश करना होता है, क्योंकि दुनिया भर की नजर मिस यूनिवर्स पर होती है।

विजय दिवस मानते हुए किसानों ने दिल्ली सीमाओं को कहा अलविदा…

नई दिल्ली- दिल्ली की सीमाओं पर पिछले एक साल से ज्यादा समय तक धरने पर बैठे किसान अब घर लौट रहे हैं। मोदी सरकार द्वारा नए कृषि कानून वापस लेने के बाद किसान आंदोलन को स्थगित कर दिया गया है। आंदोलन स्थगित होने या कहें कि खत्म होने के बाद किसान खुश हैं और अपनी इस बड़ी जीत का जश्न मना रहे हैं। शनिवार को दिल्ली के सिंघु और गाजीपुर बॉर्डर सहित तमाम जगहों पर किसानों ने अपनी जीत को विजय दिवस के रूप में मनाया। दलित दस्तक की टीम भी इस दौरान किसानों के बीच पहुंची। गाजीपुर बॉर्डर पर किसान वापसी की तैयारी में लगे हुए थे। किसानों ने अपना सामान बांधकर ट्रकों पर लादना शुरू कर दिया था, लगभग आधे से ज्यादा टेंट उखड़ चुके थे। किसान मंच पर संघर्ष के गीत गाये जा रहे थे। कहीं कहीं पानी, मिठाई के टेंट लगे थे और लोग लंगर खा रहे थे। महिलाएं और युवा लड़के सब्जियां और रोटियां बनाने में लगे थे तो वहीँ दूसरी तरफ कुछ लंगर खिला रहे थे। इन सीमाओं पर बैठे किसान दुखी मन से अपनी जगहों से विदाई ले रहे हैं। उनका दुःख उनकी आँखों में, उनकी बातों में सुनने को मिल जाएगा। एक साल से ज्यादा का समय इन जगहों पर, घर की तरह बिताने के बाद, अब जाना उन्हें भावुक कर रहा है। किसान आंदोलन के खत्म होने के बाद भी किसानों का जोश खत्म नहीं हुआ है। उनका कहना था कि अब आगे, कभी भी जब किसानों के साथ अन्याय होगा तब हम सभी किसान एक आवाज़ पर एक साथ, साथ आयेंगे और यही हमने इस आंदोलन से अर्जित किया है। किसानों ने ये भी कहा कि हमने सिर्फ ये आंदोलन ही नहीं जीता बल्कि हमने लोगों का दिल जीता है, भाईचारा जीता है, एक दूसरे का विश्वास, एक दूसरे के लिए बलिदान होना, साथ खड़ा होना और एक दूसरे का साथ पाया है। बता दें, शनिवार सुबह 8।30 बजे किसान नेता राकेश टिकैत ने किसानों के एक बड़े जत्थे को बिजनौर के लिए रवाना करते हुए, किसानों की घर वापसी को हरी झड़ी दिखाई। यहां से जब किसान हट जाएंगे तब 13 दिसंबर को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में माथा टेक कर अपने घरों को लौट जाएंगे।

पंचतत्व में विलीन हुए सीडीएस बिपिन रावत, दोनों बेटियों ने दी मुखाग्नि

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डीडी डेस्क- कुन्नूर के पास हुई हेलीकॉप्टर दुर्घटना में सीडीएस जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी की मौत हो गई थी. शुक्रवार को और सीडीएस जनरल बिपिन रावत का पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। उनके सम्मान में 17 तोपों की सलामी भी दी गई। इस दौरान वहां 800 जवान मौजूद रहे। सीडीएस बिपिन रावत और उनकी पत्नी मधुलिका रावत को उनकी दोनों बेटियों कृतिका और तारिणी ने मुखाग्नि दी। इससे पहले बिपिन रावत को राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सीजेआई एनवी रमन्ना, तीनों सेनाओं के प्रमुख, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत सभी बड़े नेताओं ने श्रद्धांजलि दी।   इतना ही नहीं, बरार स्क्वायर श्मशान घाट पहुंचकर कई देशों के रक्षा बलों के शीर्ष अधिकारियों ने सीडीएस जनरल बिपिन रावत और उनकी पत्नी मधुलिका रावत के पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके अंतिम दर्शन के लिए श्रीलंका, भूटान, नेपाल और बांग्लादेश की सेनाओं के कमांडर भी पहुंचे। बता दें, बिपिन रावत का पार्थिव शरीर शुक्रवार दोपहर करीब 3.45 बजे, बरार स्क्वायर के श्मशान घाट पहुंचा था। उनके काफिले के साथ सैकड़ों लोग उन्हें श्रद्धां सुमन अर्पित करने और उनके सम्मान में रास्ते भर दौड़ते रहे। यहां लोगों ने उन्हें याद करते, जब तक सूरज-चांद रहेगा, बिपिन जी का नाम रहेगा, जैसे नारे भी लगाए।

यूपी पुलिस ने फिर किया योगी सरकार को शर्मसार

डीडी डेस्क- लगता है यूपी पुलिस इंसानियत भूल चुकी है। आए दिन यूपी पुलिस का ऐसा रुप देखने को मिल रहा है, जिससे न सिर्फ उस पर उंगली उठ रही है, बल्कि यूपी सरकार भी अपनी पुलिस की करतूत से बैकफुट पर आती जा रही है। ऐसी ही एक तस्वीर कानपुर देहात के अकबरपुर थाना क्षेत्र से सामने आई है, जिसमें एक बार फिर यूपी पुलिस का अमानवीय चेहरा देखने को मिल रहा है। बच्चे को गोद में लिए शख्स पर लाठी भांजती ये जुनूनी अकबरपुर की पुलिस यह भी भूल गई कि जिस व्यक्ति पर वह लाठियां बरसा रही है, उसकी गोद में एक छोटा सा बच्चा भी है। इस पुलिस को बच्चे की चीख भी सुनाई नहीं दे रही,  आप खुद अंदाजा लगाईए कि इस पुलिस को कानून का रखवाला कैसे कहा जा सकता है। भारत का सर्वोच्य न्यायालय और बाल विकास आयोग अक्सर पुलिस को ये खास हिदायत देता रहा है कि वो बच्चों के सामने किसी तरह की हिंसक कार्यवाई ना करें लेकिन पुलिस इस बात को हमेशा ही नजरंदाज करती आई है ख़ास कर यूपी पुलिस। तभी तो शख्स की गोद में लगे इस मासूम बच्चे के कोमल मन पर इस हिंसा का क्या प्रभाव पड़ेगा ये पुलिस ने नहीं सोचा। इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जब वायरल हुआ और यूपी पुलिस की जब किरकिरी होना शुरू हुई तब आननफानन में पुलिस ने एक्शन लिया और पिटाई करने वाले इंस्पेक्टर विनोद मिश्रा को तुरंत सस्पेंड कर दिया। इस मामले में पुलिस अधीक्षक घनश्याम चौरसिया संज्ञान लेते हुए कहा, आज जिला अस्पताल में एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी रजनीश शुक्ला द्वारा 100-150 लोगों के साथ अराजकता फैलाते हुए ओपीडी को बंद कर दिया गया था। अस्पताल कर्मी मरीजों के साथ अभद्र व्यवहार करना शुरू कर दिया था। ऐसी स्थिति में सीएमओ, डीएम और पुलिस को सूचना दी गई। सूचना के बाद पुलिस द्वारा समझाने पर भी रजनीश शुक्ला और उसके साथी नहीं माने। उन्होंने चौकी इंचार्ज और उसके साथी को ही एक कमरे में बंद कर अभद्रता करनी शुरू कर दी।’ उन्होंने आगे कहा, ”इस मौके पर पुलिस ने शुक्ला और उसके साथियों को समझाने की कोशिश की। लेकिन रजनीश शुक्ला और उग्र हो गया और थानाध्यक्ष का अंगूठा काट लिया। पूरे अस्पताल में अराजकता बन गई है.. ऐसी स्थिति में हल्का बल प्रयोग किया गया और अस्पताल की व्यवस्था को सुचारू कराया गया। वीडियो में दिख रहा शख्स रजनीश शुक्ला का भाई है जो भीड़ में जाकर लोगों को उकसाने का काम कर रहा था। मना करने पर अभद्रता कर रहा था। फिर भी इस मामले की जांच कराई जा रही है जिसके बाद कार्रवाई की जाएगी।’ यूपी पुलिस की इस हरकत को पुलिस महकमा लाख जस्टिफाई करने की कोशिश करें लेकिन यूपी पुलिस की बर्बरता वायरल वीडियो में साफ़ देखी जा रही है। जो भी इस वीडियो को देख रहा है उसके मन में यही सवाल कौंध रहा है कि जनता की रक्षक ये पुलिस, परेशानी में फंसे लोगों को उनके बच्चों के सामने ही कैसे बेरहमी से पीट सकती है?

फिल्म जय भीम ने मचाई धूम, साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म बनी

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जय भीम शब्द में कितनी ताकत है, यह एक बार फिर से सामने आ गया है। IMDB ने साल 2021 की सबसे लोकप्रिय भारतीय फिल्मों की अपनी लिस्ट जारी कर दी है। इसमें फिल्म जय भीम साल की सबसे लोकप्रिय बनी है। IMDB अपनी यह सूची पेज व्यूज के आधार पर बनाता है। इसके लिए किसी भी फिल्म या शो को 1 जनवरी से 29 नवंबर के बीच रिलीज किया जाना चाहिए और इसकी औसत IMDB उपयोगकर्ता रेटिंग 6.5 या उससे ज्यादा होनी चाहिए। और इस बार इसमें सबसे ज्यादा रेटिंग जय भीम को मिली है।

 फिल्म जय भीम ‘द शौशैंक रिडेम्प्शन’ को पछाड़कर सबसे अधिक रेटिंग वाली आईएमडीबी (IMDb) फिल्म बन गई है। ‘जय भीम’ को 10 में से 9.6 रेटिंग मिली है। आईएमडीबी (www.imdb.com) को फिल्मों, टीवी शो और मशहूर हस्तियों के बारे में जानकारी के लिए दुनिया का सबसे लोकप्रिय स्रोत माना जाता है।

तमाम विवादों से घिरने और आलोचनाओं की मार झेलने के बावजूद तमिल फिल्म ‘जय भीम’ दर्शक वर्ग में अपनी जगह बना चुकी है। अपनी रिलीज के बाद से ही साउथ के सुपरस्टार सूर्या द्वारा अभिनित यह फिल्म लगातार सुर्खियों में बनी हुई है। साउथ के निर्देशक टीजे ग्नानवेल ने इस फिल्म का निर्देशन किया है और वही इसके लेखक भी हैं। मद्रास हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस चंद्रा के एक चर्चित केस पर आधारित यह फिल्म तमिलनाडु की एक जनजाति के उत्पीड़न को दिखाती है। यह फिल्म 2 नवंबर 2021 को रिलीज हुई थी। फिल्म के टॉप पर रहने पर अभिनेता सूर्या ने अपनी खुशी जाहिर की है और कहा है कि फिल्म ‘जय भीम’ ऐसा ही एक अनुभव रहा है, इस फिल्म का हिस्सा बनकर मुझे बेहद गर्व है। बता दें कि फिल्म ‘जय भीम’ अमेजन के जरिए 200 से ज्यादा देशों में देखी गई है।

 यह 1993 की एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्‍म है, जो मद्रास उच्‍च न्‍यायालय में वकील चन्द्रू, जो कि बाद में मद्रास उच्‍च न्‍यायालय में न्‍यायधीश बने के द्वारा लड़े गए एक केस पर आधारित है। फिल्‍म की कहानी सिंघनी और राजकन्नू नामक ईरुला आदिवासी जोड़े के जीवन और उन पर पुलिस की ज्‍यादतियों पर आधारित है। सिंघनी अपने पति को न्याय दिलाने के लिए एक वकील चन्द्रू की सहायता लेती है।

अम्बेडकरवादी मंजुला प्रदीप की दुनिया भर में चर्चा, मिला यह सम्मान

नई दिल्ली- दुनिया भर में महिलाएं अपने तरीके से समाज और उनमें रची बसी संस्कृति को बदलने में लगी हुई हैं। इन महिलाओं में कुछ खास महिलाएं भी शामिल हैं जो दुनिया को नए सिरे से तलाशने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। ऐसी ही महिलाओं को आगे लाती बीबीसी की सबसे प्रेरक और प्रभावशाली 100 महिलाओं की इस साल की सूची, जारी कर दी गई है। इन 100 प्रभावशाली महिलाओं में दो भारतीय महिलाओं को भी शामिल किया गया है। जिनमें एक हैं मंजुला प्रदीप और दूसरी हैं ऑटिज़्म-अधिकार कार्यकर्ता और नॉट दैट डिफ़रेंट की सह संस्थापिका मुग्धा कालरा। मंजुला गुजरात के एक दलित परिवार से हैं। वो जातिगत और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ अपने काम के लिए जानी जाती हैं, मंजुला बलात्कार पीड़ितों को मानसिक रूप से मजबूत करने और न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए उन्हें ट्रेनिंग देती हैं। वो ये मानती हैं कि मानसिक मजबूती ही किसी महिला को उस हादसे से बाहर निकालने में सहायक होती है। ये मंजुला का संघर्ष ही है कि उन्होंने 50 से ज़्यादा दलित महिलाओं को न्याय के लिए लड़ने में मदद की है और इनमें से कई मामलों में सज़ा दिलाने में कामयाब रही हैं। पिछले 30 सालों से महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर रही मंजुला प्रदीप ने इसी साल ‘नेशनल काउंसिल ऑफ वीमेन लीडर्स’ की स्थापना की है। मंजुला दलित अधिकारों के सबसे बड़े आर्गेनाइजेशन नवसर्जन ट्रस्ट की कार्यकारी निदेशक भी रही हैं। इसके अलावा, मंजुला अंतरराष्ट्रीय दलित एकजुटता नेटवर्क की मेंबर भी हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के विश्व सम्मेलन में नस्लवाद के खिलाफ, दलित अधिकारों का मुद्दा उठाया है। मंजुला ने दलित दस्तक से बात की और खुद को मिले इस सम्मान के बारे में बताया। वंचितों की आवाज़ उठाने वाली मंजुला प्रदीप को बीबीसी से मिले इस सम्मान के लिए दलित दस्तक बधाई देता है और उम्मीद करता है कि वो ऐसे ही महिलाओं के हितों के लिए उनके साथ खड़ी रहें।

देश सेवा में अव्वल रहे सीडीएस बिपिन रावत का जानिए कैसा रहा सफर

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नई दिल्ली- चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बिपिन रावत की हेलीकाप्‍टर क्रैश में हुई मौत से पूरा देश गम में डूबा हुआ है। बिपिन रावत और उनकी पत्नी समेत 14 लोगों को ले जा रहा ये हेलिकॉप्टर खराब मौसम के कारण तमिलनाडु के कुन्‍नून में नीलगिरी की पहाडि़यों में क्रैश हो गया था। रहा सुनहरा सफर बिपिन रावत पिछले 40 सालों से भारतीय सेना की सेवा कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कई बड़े फैसले लिए जो देश के लिए मील का पत्थर साबित हुए। उनका ये पूरा कार्यकाल गर्व और शौर्य की गाथाओं से भरा हुआ है। पूर्वोत्तर में भारत को उग्रवाद से मुक्ति दिलाने की बात करें या पाकिस्तान में आतंकवादियों के ठिकानों को नेस्तनाबूद करने की बात करें, बिपिन रावत हर जगह हिट रहे। विरासत में मिली देश की सेवा एक हिंदू गढ़वाली राजपूत परिवार में जन्में बिपिन रावत का जन्‍म 16 मार्च 1958 को उत्तराखंड में हुआ था। उनके परिवार के कई लोग पीढ़ी दर पीढ़ी भारतीय सेना की सेवा में जाते रहे हैं। उनके पिता लक्ष्मण सिंह रावत लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर रहे और उन्हें देश का पहला चीफ आफ डिफेंस स्‍टाफ नियुक्‍त किया गया था। उनके कार्यकाल के दौरान दो बार भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया था। ऐसे हुई थी बिपिन रावत की शुरुआत बिपिन रावत ने 16 दिसंबर 1978 को 11 गोरखा राइफल्स की 5वीं बटालियन को जॉइन किया था। उन्हें हाई हाईट वाले युद्ध का और आतंकवाद विरोधी अभियानों के संचालन का बेहद अनुभव था। उन्होंने भारत-चीन युद्ध के दौरान मोर्चा संभाला और नेफा (यानी नार्थ ईस्ट फ्रॉन्टियर एजेंसी) बटालियन की कमान संभाली। साथ ही उन्होंने कांगो में संयुक्त राष्ट्र की पीसकीपिंग फोर्स की भी अगुवाई की। बने सेना प्रमुख…. रावत ने 1 सितंबर 2016 को सेना के उप-प्रमुख का पद ग्रहण किया। इसके बाद 31 दिसंबर 2016 को रावत आर्मी चीफ के पद पर काबिज हुए। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए, उन्हें भारत सरकार ने 1 जनवरी 2020 को तीनों सेना का प्रमुख यानी चीफ डिफेन्स ऑफ़ स्टाफ (सीडीएस) बना दिया। कई पदकों से नवाजा गया जनरल रावत फील्ड मार्शल सैम मानेकशा और जनरल दलबीर सिंह सुहाग के बाद गोरखा ब्रिगेड के थल सेनाध्यक्ष बनने वाले तीसरे अधिकारी थे। जनरल रावत को सेना में रहते हुए परम विशिष्ट सेवा पदक, उत्तम युद्ध सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक, युद्ध सेवा पदक, सेना पदक, विशिष्ट सेवा पदक से भी नवाजा जा चुका है। ऐसी रही शिक्षा देहरादून के कैम्ब्रियन हाल स्कूल और शिमला के सेंट एडवर्ड स्कूल से पढ़ाई करने वाले बिपिन रावत ने आगे की पढ़ाई के लिए एनडीए खडकवासला और भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में एडमिशन लिया। यहां उन्हें ‘स्वार्ड आफ आनर से नवाजा गया।  उन्होंने देश और विदेश दोनों जगह कई बिषयों में डिग्रियां हासिल कीं। उन्होंने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से  साल 2011 में सैन्य मीडिया अध्ययन में पीएचडी भी की।

Film “Jayanti” addresses the issue of casteism, screened in Novi, Michigan, USA

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Local Michigan Ambedkarite community came together to watch the Marathi-language feature “Jayanti” movie  (birth anniversary) which is  produced in India. This movie was screened in Novi, Michigan which is suburb of Detroit, Michigan, USA. This movie was screened at the topmost theater in Michigan which is Emagine Movies and about 45-50 members watched and maintain the covid-19 protocol.Jayanti movie addresses the issue of casteism  and celebrates the  path-breaking solutions to unite the Bahujan youth against idolatry and casteism.

“Dr Ambedkar Jayanti celebrated in almost every nook and corner of the country in India and across world including on social media with great zeal.

Jayanti Movie has English subtitles and with a running time of 124 minutes. It has been written and directed by ex-journalist and artist Shailesh Narwade. The film has been produced by Meliorist Film Studio and presented by Dashami Studioz.

 Jayanti Movie revisits the thoughts and works of anti-caste leaders and explores their relevance in contemporary Indian society. It’s the story of a young directionless chap, who unknowingly becomes part of the caste-based hatred, but later on leads a meaningful life after reading and learning about the works of great social leaders. The film is a work of fiction that attempts to unite different communities, who have been victims of the caste-divide in the Indian society since several hundred years.

Jayanti was shot in 28 days between December 2019 and February 2020 on around 40 real locations in Nagpur city in Central India. The film got its theatrical release across Maharashtra State and a few other cities in India on 12 November 2021 with ‘U’ certificate of the CBFC. The film is currently running successfully with 50-plus shows in the fourth week with increasing response from the audiences.

Some of the Indian media houses, including The Times of India, The Quint, The Free Press Journal, and News9, have published very rave reviews about the film. Jayanti has been produced by a collective of all first-time producers, including Dr Anand Bankar, Amol Dhakadey, Dr Nilima Suhas Ambade and Dr Sudhir Hajare to name a few.

Well-known music director Mangesh Dhakde has scored background music for the film while Yogesh Koli (cinematographer), Rohan Patil (editor), Ashish Shinde (sound designer), Santosh Gilbile (makeup designer) and Ruhi (music director) are among important crew.

Ruturaj Wankhede is the male actor in leading role while Titeeksha Tawde is the actress. Among prominent cast of the film also includes Milind Shinde, Kishor Kadam, Paddy Kamble, Atul Mahale, Anjali Joglekar and Amar Upadhyay.

Nitin Vaidya, Ninad Vaidya, Aparna Padgaonkar, Vaibhav Chhaya, Sameer Shinde and Suraj Bhanushali are the executive producers.

Movie local reviews at

https://youtu.be/G5qm1UBjDNQ

https://www.facebook.com/groups/875949249881067/permalink/1102991453843511/

ब्राह्मण डायरेक्टर के जातिवाद पर भड़के बहुजन

नई दिल्ली- नॉट फाउंड सुटेबल एक ऐसा शब्द है, जिसके जरिए सालों से दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के अधिकारों की हकमारी होती रही है। ताजा मामला इलाहाबाद के झूसी स्थिति जी.बी. पंत सोशल इंस्टीट्यूट का है, जहां इसी नॉट फाउंड सुटेबल का हवाला देकर ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण को दबा दिया गया है। इस संस्थान के डायरेक्टर बद्री नारायण तिवारी पर आरोप है कि उन्होंने असिस्टेंट प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर सिर्फ सवर्णों को नौकरी दे दी है और सवर्णों में भी ज्यादातर अपनी जाति के ब्राह्मण लोगों को। तो दूसरी ओर ओबीसी के आरक्षित पदों को नॉट फाउंड सुटेबल का हवाला देकर छोड़ दिया गया है। नॉट फाउंड सुटेबल यानी की उपर्युक्त पद के लिए कोई अभ्यर्थी योग्य नहीं है। मामला सामने आने के बाद ओबीसी समाज के बुद्धिजीवियों ने बद्री नारायण तिवारी पर ओबीसी के आरक्षण की हकमारी का आरोप लगाकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ओबीसी के बुद्धिजीवी इसे आरक्षण घोटाला कह कर बद्री नारायण तिवारी पर निशाना साध रहे हैं। इसके लिए उस सूची का हवाला दिया जा रहा है जो की जी. बी. पंत द्वारा सेलेक्श को लेकर जारी किया गया था। पंत संस्थान की ओर से नौकरी के लिए निकाले गए आवेदन में- सामान्य वर्ग के लिए- 16, EWS के लिए- 9 और OBC के लिए 16 अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया। इन्हें API यानी कि एकेडमिक परफॉर्मेंस इंडेक्स के घटते क्रम में रखा गया। अब इन तीनों सूचियों को ध्यान से देखिए। सामान्य वर्ग की नियुक्ति के लिए अंक– 93 से 87 रखा गया। गरीबी के आधार पर मिलने वाले 10 प्रतिशत आरक्षण EWS के लिए यह 87 से 81 था, जबकि OBC के लिए अंक 93 से 83 निर्धारित किया गया। यानी 93 से 87 तक API के अभ्यर्थी सामान्य वर्ग में शामिल किए गए। 87 के बाद 81 तक आने वाले सवर्ण अभ्यर्थी EWS में शामिल किए गए। मगर OBC की सूची में 93 से 83 तक API वालों को शामिल कर दिया गया। जबकि 87 से ऊपर API के OBC को सामान्य वर्ग में नहीं रखा गया। यानी UR यानी अन रिजर्वर्ड, जिसे अनारक्षित यानी ‘ओपन फ़ॉर ऑल’ होना चाहिए था, उसे सिर्फ सवर्णों के लिए रिज़र्व कर दिया गया। यानी 50 फीसदी आरक्षण सिर्फ सवर्णों को दे दिया गया। वरिष्ठ पत्रकार और बहुजनों के मुद्दों को उठाने वाले दिलीप मंडल ने ट्विटर पर लिखा है- नॉट फ़ाउंड सुटेबल घोटाला राष्ट्रीय समस्या है। OBC, SC, ST की लाखों नौकरियाँ लूट कर सवर्णों को दे दी जा रही हैं। इंटरव्यू का नंबर कम हो और उसका लाइव वीडियो प्रसारण हो। बहुत बेईमानी चल रही है। सामाजिक और राजनीतिक संगठनों को इसके ख़िलाफ़ भारत बंद की तैयारी करनी चाहिए। #NFSScam तो वहीं बहुजन चिंतक और हिन्दी के प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मण यादव ने लिखा है कि-‘बद्रीनारायण तिवारी’ एक व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति है। इस प्रवृत्ति ने भारतीय अकादमिक संस्थानों में दो काम किए। पहला, UR कैटेगरी को सवर्णों के लिए आरक्षित कर दिया और दूसरा, NFS करके अनगिनत दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के ख़्वाबों की हत्या कर दी। इस प्रवृत्ति से ही लड़ना है’। मामला सामने आने के बाद बहुजन युवाओं ने जी।बी। पंत संस्थान और बद्री नारायण दोनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बहुजन समाज के बुद्धीजीवी इसे मेरिट के नाम पर खुला जातिवाद बता रहे हैं। साथ ही इस नियुक्ति को फ़्रॉड बताकर इसे तत्काल रद्द करने की मांग की जा रही है।

लालू यादव के घर फिर बजेगी शहनाई, तेजस्वी करने जा रहे हैं अपनी इस दोस्त से शादी!

नई दिल्ली- शादियों का मौसम चल रहा है, सोशल मीडिया के लगभग हर प्लेटफोर्म पर शादियों की फोटोज और वीडियोज देखने को मिल रही हैं। लगता है इन्हीं सब को देखते हुए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव का शादी करने का मन बना लिया है। जी हां, खबर है कि तेजस्वी यादव जल्द ही शादी करने वाले हैं। तेजस्वी, दिल्ली में आज या कल सगाई भी कर सकते हैं, इसलिए लिए पूरा लालू परिवार दिल्ली में मौजूद है। इस शादी में लालू परिवार के अलावा सिर्फ 50 रिश्तेदारों को शामिल किया जाएगा। लेकिन तेजस्वी यादव की शादी किससे होने वाली है इस बात को लालू परिवार छुपा रहा है. सूत्रों की माने तो वो कोई और नहीं बल्कि तेजस्वी की कोई दोस्त हैं जिनका लालू परिवार के घर आना-जाना रहा है और वो मूल रूप से हरियाणा की हैं. इस बीच एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं जिसमें तेजस्वी एक लड़की के साथ दिखाई दे रहे हैं। इस तस्वीर में दिखाई दे रही लड़की को ही तेजस्वी यादव की भावी पत्नी बताया जा रहा है। हालाँकि लालू परिवार ने इस बारे में कुछ भी खुल कर नहीं बताया है, यानी लालू परिवार की छोटी बहु कौन होगी इस पर अभी सस्पेंस बना हुआ है। तेजस्वी यादव लालू यादव के सबसे छोटे बेटे हैं लेकिन तेजस्वी यादव लालू के राजनीतिक वारिस माने जाते हैं। तेजस्वी ने जिस तरह से अपनी पार्टी की कमान संभाली हुई है उसे देखते हुए बिहार राजनीति में उन्हें मजबूत विपक्ष की तरह भी देखा जाता है। तेजस्वी राघोपुर सीट से विधायक हैं। तेजस्वी 2015 से 2017 तक बिहार के उप मुख्यमंत्री भी रह चुकें हैं हालाँकि उनका झुकाव क्रिकेट की तरफ था। अपने राजनीतिक करियर से पहले तेजस्वी झारखंड क्रिकेट टीम का हिस्सा थे और आईपीएल में दिल्ली डेयरडेविल्स की टीम की तरफ से खेले भी थे। तेजस्वी की शादी को लेकर पिछले कई दिनों से कयास लगाए जा रहे थे। हालांकि उन्होंने कभी इस बारे में खुलकर नहीं कहा लेकिन तेजस्वी ने अक्सर मीडिया के सामने ये कहा है कि वो अपने पिता को जमानत मिलने के बाद ही शादी के बारे सोचेंगे। लेकिन लालू यादव की खराब सेहत को देखते हुए तेजस्वी यादव शादी के लिए मान गये हैं. साथ ही लालू परिवार ये भी सोच रहा है कि शादी के बहाने दोनों भाईयों, तेज प्रताप यादव और तजस्वी यादव के बीच चल रहा मनमुटाव, परिवार के साथ आने पर खत्म हो जाएं। गौरतलब है कि तेजप्रताप की शादी 2018 में चंद्रिका राय की बेटी एश्वर्या राय से हुई थी लेकिन उनकी शादी चली नहीं और कुछ महीनों के बाद ही दोनों के बीच तलाक की नौबत आ गई। काफी विवाद के बाद दोनों का अब तलाक हो चुका है।

दलित उत्पीड़न पर संसद में आए चौंकाने वाले आंकड़े

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 हाल ही में दलितों पर अत्याचार को लेकर जारी आंकड़े ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस हो या भाजपा, एससी-एसटी पर अत्याचार के मामले में दोनों की सरकारें एक जैसी है। न तो कांग्रेस, न ही भाजपा दलितों पर अत्याचार को रोकने में सफल हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दलितों पर अत्याचार के मामले सबसे ज्यादा यूपी, बिहार और राजस्‍थान में हुए हैं। यूपी में भाजपा, बिहार में भाजपा और जदयू गठबंधन जबकि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है। संसद में यह जानकारी बसपा सांसद दानिश अली ने मांगी थी, जिसके बाद गृह मंत्रालय ने यह जानकारी दी है।

 भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने मंगलवार को संसद में यह जानकारी दी। केंद्र ने कहा कि 2018 से 2020 के बीच दलितों के खिलाफ अपराध के तकरीबन डेढ़ लाख मामले दर्ज हुए। गृह मंत्रालय के डेटा के मुताबिक बीते तीन सालों के दौरान सबसे ज्‍यादा 36,467 केस योगी आदित्यनाथ के शासनवाले उत्‍तर प्रदेश में दर्ज हुए। इसके बाद 20,973 मामले बिहार में, 18,418 मामले राजस्थान में और 16,952 मामले मध्‍य प्रदेश  में दर्ज हुए हैं। गृह मंत्रालय ने जो आंकड़ा दिया है, उसमें साफ दिख रहा है कि दलितों पर अत्याचार के मामले साल दर साल बढ़े हैं। और इसमें भाजपा से लेकर काग्रेस शासित राज्य भी शामिल हैं। पिछले तीन सालों की बात करें तो साल 2018 में दलितों पर अत्याचार के 42,793 मामले दर्ज हुए थे, जो कि 2019 में बढ़कर 45,961 हो गए। बीते साल 2020 में एससी-एसटी एक्ट के तहत 53,886 मामले दर्ज किये गए हैं।

 अमरोहा से बहुजन समाज पार्टी के सांसद कुंवर दानिश अली ने इस संबंध में सवाल पूछा था, जिसके जवाब में केंद्र सरकार की ओर से यह आंकड़ा जारी किया गया।

 हालांकि दलितों से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले कुछ दलित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि मामले इससे ज्यादा हैं, क्योंकि सभी जानते हैं कि कई मामलों दर्ज ही नहीं किये जाते। अब यहां बड़ा सवाल यह है कि जब देश बढ़ रहा है तो देश के लोगों के भीतर से जाति का जहर कम क्यों नहीं हो रहा?

फोर्ब्स मैगज़ीन में शामिल ओडिशा की आदिवासी आशा वर्कर के बारे में जानिए

बीबीसी हिंदी से साभार
डीडी डेस्क- मतिल्दा कुल्लु को जानी-मानी फोर्ब्स मैगज़ीन ने हाल ही में जारी की अपनी देश की सबसे ताकतवर महिलाओं की लिस्ट में शामिल किया है। यकीनन, मतिल्दा का नाम आपने पहले कभी नहीं सुना होगा क्योंकि मतिल्दा ना तो कोई सेलिब्रेटी हैं और ना वो कॉरपोरेट इंडस्ट्री से आती हैं बल्कि मतिल्दा ओडिशा के एक गाँव में रहने वाली एक आशा कार्यकर्ता हैं। मतिल्दा ने अपने आसपास के ग्रामीण लोगों में काले जादू जैसे अंधविश्वास को दूर करने और कोरोना के बीच लोगों को जागरुक करने का काम किया और इसी वजह से उन्हें फोर्ब्स की सूची में जगह दी गई है। 45 साल की मतिल्दा आदिवासी आबादी वाले सुंदरगढ़ ज़िले के गरगड़बहल गांव में रहती हैं और पिछले 15 सालों से आशा कार्यकर्ता के रूप में काम कर रही हैं। मतिल्दा को सिर्फ 4500 रूपये तनख्वाह मिलती है। लेकिन इतने कम पैसों में भी वो गाँव की एक हजार की आबादी का पूरा ख्याल रखती हैं। उनके मन में कभी भी ये ख्याल नहीं आया कि वो कम पैसे पर ज्यादा काम कर रही हैं।
बीबीसी हिंदी से साभार
मतिल्दा गाँव भर में घरों की साफ़-सफाई, बीमारों को दवाएं उपलब्ध करना, प्रेंग्नेट औरतों की हेल्प करने से लेकर बच्चों की वैक्सीनेशन, गाँव में सफाई और स्वास्थ्य सम्बंधी विषयों पर सर्वें कराने जैसे कई काम एक अकेली मतिल्दा करती हैं। मतिल्दा के इन कामों की शुरुआत 15 साल पहले हुई थी जब उन्होंने आशा कार्यकर्ता के रूप में पूरे गाँव में घर घर जाकर काम करना शुरू किया। उन्होंने देखा कि गाँव में कोई भी व्यक्ति बीमार होने पर अस्पताल नहीं जाता है। बल्कि वो काले जादू का सहारा लेता है। मतिल्दा के लिए बड़ी चुनौती थी जिसे मतिल्दा ने कई सालों की जी तोड़ मेहनत के बाद पूरा किया, उन्होंने पहले ग्रामीणों को शिक्षित बनाया और फिर उन्हें अधविश्वास से दूर किया। हालाँकि उनके लिए ये सब आसान नहीं रहा उन्हें शुरुआत में लोगों के ताने, उनसे मिल रही हीनभावना का शिकार होना पड़ा। फोर्ब्स पत्रकारों तक मतिल्दा का नाम पहुँचाने का काम नेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ आशा वर्कर की महासचिव वी विजयालक्ष्मी ने किया। विजयालक्ष्मी मतिल्दा के समर्पण और उनके कामों को देखकर बेहद प्रभावित हुई थीं।। वो मतिल्दा को बाकी आशा कर्मियों के लिए उदाहरण मानती हैं। बताते चले कि इस लिस्ट में भारतीय स्टेट बैंक की पूर्व महाप्रंबधक अरुंधति भट्टाचार्य और बॉलीवुड अभिनेत्री सान्या मल्होत्रा का नाम भी शामिल है।

बहनजी ने बताया सड़क पर उतर कर संघर्ष क्यों नहीं करतीं

बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के 65वें परिनिर्वाण दिवस के मौके पर बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने अपने निवास पर बाबासाहेब को श्रद्धा सुमन अर्पित किया। इस दौरान बसपा प्रमुख ने मीडिया को संबोधित करते हुए कई अहम मुद्दों पर खुलकर चर्चा की और उन सवालों का जवाब दिया, जिसको लेकर उनकी आलोचना होती रहती है। बहनजी ने दावा किया कि 2022 के आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा के नेतृत्व में 2007 से भी मजबूत सरकार बनेगी। साथ ही उत्तराखंड और पंजाब में भी बसपा का प्रदर्शन बेहतर होगा।

 संविधान को बचाने के लिए सड़कों पर उतरने को लेकर पत्रकारों के सवाल का जवाब देते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि- संविधान बचाने के लिए सड़कों पर उतरने से काम नहीं चलेगा, बल्कि सत्ता परिवर्तन करने से काम चलेगा। जब सत्ता परिवर्तन हो जाएगा तो संविधान बच जाएगा। यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जब सत्ता में बाबा साहेब के विरोधी लोग बैठे हैं तो हम सड़कों पर उतर का क्या करेंगे? हमें सत्ता परिवर्तन करना होगा। अभी केन्द्र व राज्यों में ऐसी सरकारें बैठी हैं जो संविधान के हिसाब से नहीं चल रही हैं तो उसका एक ही रास्ता है कि उनको सत्ता से बाहर करके बी.एस.पी. को सत्ता में लाना तभी संविधान बचेगा व सही ढंग से लागू भी होगा।

 इस दौरान इशारों-इशारों में बसपा प्रमुख ने समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव को भी जमकर घेरा। अखिलेश पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि अभी विजय नहीं हुई है लेकिन लोग विजय यात्रा निकाल रहे हैं। भाजपा सरकार पर सवाल उठाते हुए बहनजी ने कहा कि यूपी में 75 जिले हैं। यहां कोई भी ऐसा दिन नहीं जाता है जब यूपी में समाज के दबे-कुचल लोगों पर अत्याचार नहीं होता हो। ये लोग मीडिया को मैनेज कर लेते हैं, जिसकी वजह से अत्याचार आदि की खबरें बहुत कम सामने आ पाती हैं।

आरएलडी नेता जयंत चौधरी ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को दिया झटका!

नई दिल्ली- उत्तर प्रदेश में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. सभी विपक्षी पार्टियाँ अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करने की जुगत में लगी हुई हैं. पिछले दिनों यूपी चुनाव के मद्देनजर सपा और आरएलडी गठबंधन कर साथ आ गए और अब दोनों पार्टियाँ साथ मिलकर सत्ताधारी बीजेपी पार्टी को घेरने में तैयारी में हैं. इसी के चलते पश्चिमी यूपी के मेरठ में मंगलवार को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और आरएलडी के जयंत चौधरी की बड़ी रैली होने वाली हैं. लेकिन रैली से पहले यहां लगे कटआउट लोगों के बीच चर्चा का कारण बन गये हैं. दरअसल, जिस ग्राउंड में रैली का आयोजन किया गया है वहां समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का कट आउट छोटा लगाया गया है, जबकि उनके बगल में लगा जयंत चौधरी और उनके पार्टी नेताओं के कट आउट उनसे बड़े लगाए गये हैं. वैसे तो इस रैली के जरिए दोनों पार्टियाँ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी ताकत दिखाने की कोशिश करेंगी लेकिन ग्राउंड में लगे कट आउट को देखकर ये अंदाजा लगाया जा रहा है कि रैली में आरएलडी अपने गढ़ माने जाने वाले, यूपी के इस क्षेत्र में सपा को भी अपनी ताकत का अहसास करा देना चाहती है. मेरठ की दबथुआ में होने वाली ये रैली दोनों विपक्षी दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन यहां लगे कट आउट आरएलडी के, सपा के सामने अधिक मजबूत होने का संकेत दे रहे हैं बताया जा रहा है कि पहले यहाँ सिर्फ आरएलडी रैली करने वाली थी लेकिन गठबंधन होने के बाद सपा भी इसमें शामिल हो गई. ऐसे में बहुत सम्भावना है कि आरएलडी इन कट आउट के जरिए सपा को यह संदेश देना चाहती है कि भले ही यूपी में सपा बड़ी है लेकिन पश्चिमी यूपी में आरएलडी का पलड़ा भारी है. बताते चले कि इस रैली में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी, यूपी सरकार को इस क्षेत्र में व्याप्त गन्ना किसानों की समस्या को लेकर घेरने की कोशिश करेंगे.

बाबासाहेब पर जल्द रिलीज होगी ये वेब सीरिज, विक्रम गोखले निभाएंगे मुख्य किरदार

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बाबासाहेब के 65वें परिनिर्वाण दिवस के मौके पर ‘शूद्र द राइजिंग’ और ‘कोटा’ जैसी फिल्में बनाने वाले संजीव जायसवाल ने बड़ी घोषणा की है। संजीव जायसवाल बाबासाहेब आंबेडकर को लेकर एक महत्वकांक्षी वेब सीरीज बनाने जा रहे हैं। ये सीरीज ‘बाबा प्ले’ नाम के ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज होगी। सिरीज का नाम होगा- ‘अम्बेडकर द लेजेंड’। खबर है कि यह सीरीज कई भाषाओं में रिलीज होगी। इस सीरीज में बाबासाहेब अंबेडकर का किरदार दिग्गज अभिनेता विक्रम गोखले निभाएंगे। विक्रम गोखले एक एक मंझे हुए अभिनेता हैं और सलमान खान और एश्वर्या राय की सुपरहिट फिल्म ‘हम दिल दे चुके सनम’ में ऐश्वर्या राय के पिता की भूमिका से वह काफी चर्चा में आ गए थे। वेब सीरीज ‘अंबेडकर- द लेजेंड’ में उनके जीवन की ऐसी घटनाओं को फिल्माया जाएगा जिन्होंने महाराष्ट्र की इस शख्सियत को देश का चेहरा बदल देने वाले नेता के रूप में विकसित होने में मदद की। निर्देशक संजीव जायसवाल ने इसकी लांचिंग की घोषणा करते हुए ट्रेलर भी लांच कर दिया है।
सीरीज के निर्माता संजीव जायसवाल कहते हैं- डॉ अंबेडकर को अक्सर भारत के संविधान के मुख्य वास्तुकार या दलित नेता के रूप में जाना जाता है लेकिन वास्तव में वह भारत में महिला सशक्तिकरण का चेहरा हैं। उनके काम ने समाज में महिलाओं के लिए समान अधिकारों में क्रांति ला दी। उन्होंने स्वतंत्रता की ओर ले जाने वाली चर्चाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1930 के दशक की शुरूआत में भारत की संवैधानिक स्थिति पर गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने के लिए अंग्रेजों द्वारा चुने गए दो दलित प्रतिनिधियों में से वह एक थे। तो दूसरी ओर बाबासाहेब आंबेडकर का किरदार निभाने को लेकर अभिनेता विक्रम गोखले कहते हैं, ‘भारत की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक की भूमिका निभाना सम्मान की बात है। वह मेरे व्यक्तिगत आइकन हैं और मैं अपने काम के माध्यम से उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय करने की जिम्मेदारी लेता हूं। मैं ओटीटी पर अपनी छाप छोड़ने के लिए भी उत्सुक हूं।’ संजीव का कहना है कि ‘अंबेडकर- द लेजेंड’ सिर्फ एक मनोरंजन सीरीज नहीं है, यह इस सुधारक नेता के काम की महानता के लिए एक श्रद्धांजलि है। संजीव का कहना है कि सामाजिक रूप से प्रासंगिक फिल्म बनाने का यह सही समय है। बाबासाहेब को लेकर वेब सीरीज बनने की खबर से अंबेडकरवादियों में एक उत्साह है।