बसपा प्रमुख का राहुल गांधी को मुंहतोड़ जवाब

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राजीव गांधी ने बसपा को बदनाम व कमजोर करने के लिए मान्यवर कांशीराम जी को सीआईए का एजेंट तक बता दिया था। और अब उनके ही पदचिन्हों पर चलकर उनके बेटे राहुल गांधी भी गलतबयानी कर रहे हैं। ये बातें बसपा प्रमुख मायावती ने अपने बयान में कही हैं।

बसपा प्रमुख का यह बयान कल राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब के रूप में सामने आया है। बसपा प्रमुख ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि आए दिन, बीजेपी के साथ मिलने का यह कहकर गलत आरोप लगाते रहते हैं कि बसपा की मुखिया बीजेपी की सीबीआई, ईडी व इनकम टैक्स आदि से डरती हैं। इसलिए वह बीजेपी के खिलाफ काफी नरम रहती हैं। इसमें रत्ती भर भी सच्चाई नही है ,जबकि इनको यह मालूम होना चाहिये कि इन सब से जुड़े मामले हमने केंद्र में रही किसी भी पार्टी की सरकार की मदद से नही, बल्कि सभी सरकारों के खिलाफ जाकर माननीय सुप्रीम कोर्ट में जीते हैं।

बसपा प्रमुख ने कहा कि राहुल गांधी बयानों से कांग्रेस पार्टी की विशेषकर दलितों व अन्य उपेक्षित वर्गां के साथ-साथ बसपा के प्रति भी हीन व जातिवादी मानसिकता तथा द्वेष की भावना भी साफ झलकती है। उन्होंने कहा कि यूपी विधानसभा आम चुनाव में बसपा के साथ गठबंधन करने व मुझे सीएम बनाने के ऑफर पर मैंने उन्हें न कोई जवाब दिया और ना ही इस बारे में उनसे कोई बात की, यह बात पूर्णतयाः तथ्यहीन है। राहुल गांधी के बयान में बसपा के प्रति जबरदस्त बौखलाहट व नफरत नज़र आती है।

इतिहास का उल्लेख करते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि कांग्रेस ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ भी राजनीतिक षड्यंत्र किया और विश्वासघात किया। अब उनके मार्ग पर चलनेवाली पार्टी बसपा के साथ भी कांग्रेस वही कर रही है। इससे साफ है कि कांग्रेस भरोसे के लायक नहीं है।

आगे बसपा प्रमुख ने कहा है कि बीजेपी के विरूद्ध राजनीतिक लड़ाई लड़ने में कांग्रेस का अपना रिकार्ड हमेशा ही काफी लचर व ढुलमुल ही रहा है। कांग्रेस पार्टी सत्ता में रहते हुए व सत्ता से बाहर हो जाने के लम्बे समय बाद अब तक बीजेपी व आरएसएस एण्ड कम्पनी से जी-जान से लड़ते हुए कहीं भी नहीं दिखती है, जबकि बीजेपी एण्ड कम्पनी साम, दाम, दण्ड, भेद आदि अनेकों हथकण्डे अपनाकर भारत को कांग्रेस-मुक्त ही नहीं बल्कि विपक्ष-विहीन बनाकर पंचायत से संसद तक चीन जैसा ही एक पार्टी का  सिस्टम बनाकर देश के लोकतंत्र व इसके संविधान को ही खत्म करने पर आतुर है।

बसपा प्रमुख ने सवाल पूछते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी ने पिछला यूपी विधान सभा का चुनाव समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ मिलकर लड़ा था तब यह पार्टी यहां बीजेपी को सत्ता में आने से नहीं रोक पाई थी, ऐसा क्यों हुआ था? इसका भी जवाब जनता को इनको ज़रूर देना चाहिये। कांग्रेस हो या अन्य कोई भी पार्टी हो इनको दूसरी पार्टियों पर कुछ भी कहने से पहले खुद भी अपने गिरेबान में ज़रूर झांककर देख लेना चाहिए।

मोदी सरकार की नजर में डॉ. आंबेडकर की अहमियत गांधी से कम

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मामला अहमियत का है। यह सभी जानते हैं कि नये भारत के निर्माण में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की भूमिका कितनी अहम है। लेकिन नरेंद्र मोदी हुकूमत की नजर में गांधी अहम हैं। यही वजह है कि भारत सरकार ने एक बार फिर डॉ. आंबेडकर की जयंती के मौके पर घोषित राष्ट्रीय अवकाश की सूची से अलग इसे क्लोज्ड ‘होली डे’ करार दे दिया है।  इससे संबंधित एक कार्यालय ज्ञापांक बीते 4 अप्रैल, 2022 को भारत सरकार के कार्मिक मंत्रालय (डीओपीटी) द्वारा जारी किया गया। इस ज्ञापांक में कहा गया है कि मंत्रालय ने निगोशिएबुल इंस्ट्रूमेंट एक्ट-1881 के तहत निहित प्रावधानों के अनुसार यह निर्णय लिया है कि अब डॉ. आंबेडकर जयंती के मौके पर अवकाश राष्ट्रीय महत्व का अवकाश न होकर ‘क्लोज्ड होली डे’ होगा।
बताते चलें कि भारत सरकार का कार्मिक मंत्रालय तीन तरह के अवकाशों को मान्यता देता है। इनमें से एक राष्ट्रीय पर्व के अवकाश हैं। इस श्रेणी के तहत स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त), गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) और गांधी जयंती (2 अक्टूबर) के मौके पर घोषित अवकाश हैं। दूसरी श्रेणी के तहत पर्व-त्यौहारों के मौके पर दिये जानेवाले अवकाश शामिल हैं। हालांकि इनमें ही कुछ अन्य महापुरुषों की जयंतियों को भी शामिल किया गया है। तीसरी श्रेणी के तहत ‘क्लोज्ड होली डे’ है। इसी श्रेणी के तहत डॉ. आंबेडकर की जयंती के मौके पर घोषित किया जानेवाला अवकाश भी है। पहली बार इसकी घोषणा 8 अप्रैल, 2020 को की गई थी। तब से हर साल केंद्र सरकार इसकी समीक्षा करती रही है तथा इसकी घोषणा करती रही है। उल्लेखनीय है कि ‘क्लोज्ड होली डे’ के रूप में डॉ. आंबेडकर की जयंती के अवकाश को शामिल किये जाने संबंधी अधिसूचना सभी केंद्रीय मंत्रालयों व संस्थानों को जारी किया गया है। क्लोज्ड होली डे व राष्ट्रीय पर्व के मौके पर अवकाश के बीच अंतर के सवाल पर वह बताते हैं कि क्लोज्ड होली के मौके पर जिन मंत्रालयों, संस्थाओं में लोगों को काम करना पड़ता है, उनके अलग से भत्ता नहीं दिया जाता है, जैसे 15 अगस्त या 26 जनवरी या 2 अक्टूबर के मौके पर दिया जाता है। 

राहुल गांधी के बिगड़े बोल, बसपा प्रमुख को भी कोसा

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आज एक बार फिर अपनी अपरिपक्वता का सबूत दिया। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखित संविधान ही हिंदुस्तान का हथियार है। साथ ही उन्होंने यह भी कि संस्थाओं के बिना संविधान का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने कहा कि हम यहां संविधान लिए घूम रहे हैं, आप और हम कह रहे हैं कि संविधान की रक्षा करनी है, लेकिन संविधान की रक्षा संस्थाओं के जरिए की जाती है। आज सभी संस्थाएं आरएसएस के हाथ में हैं।

दरअसल, राहुल गांधी दिल्ली जवाहर भवन में भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी और कांग्रेस नेता के. राजू की पुस्तक ‘द दलित ट्रूथ: द बैटल्स फॉर रियलाइजिंग आंबेडकर्स विजन’ के विमोचन समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस मौके पर उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने दलित समाज के बारे में सोचना शुरू किया और यह भी बताया कैसे वह सत्ता के बीच में पैदा होने के बाद भी राजनीति में दिलचस्पी नहीं रखते। उन्होंने यह भी कहा कि दलितों के साथ भेदभाव का उल्लेख करते हुए कहा, ‘दलित और उनके साथ होने वाले व्यवहार से सबंधित विषय मेरे दिल से जुड़ा हुआ है। यह उस वक्त से है जब मैं राजनीति में नहीं था।’

अपने संबोधन में राहुल गांधी ने बसपा प्रमुख पर आरोप लगाया कि “वह इस बार चुनाव नहीं लड़ीं और भाजपा को खुला मैदान दे दिया। हमने उनसे गठबंधन करने को लेकर बात भी की और कहा कि मुख्यमंत्री बनिए लेकिन उन्होंने बात तक नहीं की। कांशीराम जी थे जिन्होंने दलितों की आवाज उठाई। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं, भले ही उन्होंने कांग्रेस को उस वक्त नुकसान पहुंचाया लेकिन उन्होंने दलितों की आवाज उठाई। आज उन्हीं के खून पसीने से बनाई पार्टी की मायावती कहती हैं कि मैं चुनाव ही नहीं लड़ूंगी क्यों… क्योंकि इस बार उनके पीछे ईडी, सीबीआई और पेगासस सब थे।”

इसके अलावा राहुल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी पर भी निशाना साध और।कहा कि संविधान पर यह आक्रमण उस समय शुरू हुआ था जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सीने पर तीन गोलियां मारी गईं थीं।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बीच इलेक्शन बांड को लेकर बसपा प्रमुख ने दिया बड़ा बयान

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देश में चुनाव लड़ना दिन-ब-दिन महंगा होता जा रहा है। इसका सबसे अधिक शिकार वे पार्टियां हो रही हैं, जो गरीबों का प्रतिनिधित्व करती हैं। जबकि वे पार्टियां जिनके पास चुनावी चंदा अकूत मात्रा में प्राप्त होता है, वे अर्थ बल का जमकर उपयोग करती हैं। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट में इलेक्शन बांड को लेकर सुनवाई शुरू हुई है। इस संबंध बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने सुप्रीम कोर्ट से सकारात्मक हस्तक्षेप की अपेक्षा की है।

दरअसल, देश में पार्टियां चंदे से चलती हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आज तमाम कारपोरेट जगत देश की लगभग सभी पार्टियेां को इलेक्शन बांड के रूप में करोड़ों रुपए का चंदा देती हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर)  ने अपनी रपट में बताया है कि पिछले पांच वर्षो में इलेक्शन बांड के जरिए जो धन विभिन्न राजनीतिक दलों को प्राप्त हुए हैं, उनमें सबसे पहले नंबर पर भाजपा है, जिसे करीब 85 फीसदी दान प्राप्त हुए हैं। इसकी वैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गयी थी, जिसकी सुनवाई को लेकर उसने अपनी सहमति दे दी है।

इसी संबंध में बसपा प्रमुख मायावती ने कहा है कि कारपोरेट जगत व धन्नासेठों के धनबल के प्रभाव ने देश में चुनावी संघर्षों में गहरी अनैतिकता व असमानता की खाई तथा ’लेवल प्लेइंग फील्ड’ खत्म करके यहाँ लोकतंत्र एवं लोगों का बहुत उपहास बनाया हुआ है। गुप्त ’चुनावी बाण्ड स्कीम’ से इस धनबल के खेल को और भी ज्यादा हवा मिल रही है।

उन्होंने यह भी कहा है कि अब काफी समय बाद मा. सुप्रीम कोर्ट चुनावी बाण्ड से सम्बन्धित याचिका पर सुनवाई शुरू करेगी, उम्मीद की जानी चाहिए कि धनबल पर आधारित देश की चुनावी व्यवस्था में आगे चलकर कुछ बेहतरी हो व चुनिन्दा पार्टियों के बजाय गरीब-समर्थक पार्टियों को खर्चीले चुनावों की मार से कुछ राहत मिले।

मध्य प्रदेश में पत्रकारों को रखा 18 घंटे तक हाजत में, अधनंगा कर थाने में घुमाया

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भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले पहले भी होते रहे हैं। खासकर दलित-बहुजन पत्रकारों पर। लेकिन मध्य प्रदेश में एक ऐसी घटना सामने आयी है, जो अलग हटकर है। दरअसल पुलिस महकमे ने एक पत्रकार और उसके अन्य पत्रकार साथियों को न केवल 18 घंटे तक हाजत में बंद रखा, बल्कि उन्हें अधनंगा कर थाना परिसर में घुमाया। बाद में उन्हें इस हिदायत के साथ छोड़ा गया कि यदि अगली बार भाजपा विधायक केदारनाथ शुक्ल के खिलाफ कोई खबर लिखोगे तो पूरे शहर में नंगा करके घुमाया जाएगा।

गौर तलब है कि दलित-बहुजन पत्रकारों के उत्पीड़न की खबरें आए दिन आती रहती हैं। लेकिन जो सवर्ण पत्रकार मोदी के नाम का राग अलापते रहते हैं उनके साथ ऐसे सुलूक से सभी सकते में हैं। इस तरह की घटना को नये परिदृश्य में भी देखा जा रहा है। हालांकि इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि पत्रकार चाहे किसी भी जाति अथवा मजहब का हो, उसकी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखी जानी चाहिए और यदि इसका उल्लंघन हो तो इसका कड़ा प्रतिवाद आवश्यक है।

लेकिन मध्य प्रदेश के लिहाज से देखें तो यह अलग तरह की घटना है। दरअसल, कनिष्क तिवारी मध्य प्रदेश के सीधी जिले में खबरिया यूट्यवूब चैनल चलाते हैं। बीते दिनों उन्होंने एक स्थानीय भाजपा विधायक केदारनाथ शुक्ल के खिलाफ कुछ खबरें अपने यूट्यूब चैनल पर चला दीं। फिर स्थानीय पुलिस थाने के मुखिया ने दल-बल के साथ कनिष्क तिवारी के दफ्तर पर धावा बोला और उन्हें व उनके सभी साथियों को थाना लाकर हाजत में बंद कर दिया।

कनिष्क ने बताया है कि पुलिस ने उनके साथ मारपीट की। इसके अलावा उन्हें अधनंगा कर थाने में घुमाया गया। इतना ही नहीं, पुलिस थाने के प्रमुख ने अपने मोबाइल से सभी द्विज पत्रकारों की अधनंगी फोटो खींची और स्थानीय विधायक को भेज दी। कनिष्क के मुताबिक यह इसलिए किया गया ताकि विधायक को यह विश्वास हो कि उनके कहने पर पुलिस ने अपनी कार्रवाई को अंजाम दिया है। कनिष्क ने यह भी बताया कि उन्हें इस  शर्त के साथ छोड़ा गया है कि अब वे केदारनाथ शुक्ल के खिलाफ कोई रिपोर्टिंग नहीं करेंगे।

गंगा के बहाने अखिलेश ने मोदी पर साधा निशाना, कह दी यह अटपटी बात

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आपने वे तस्वीरें अवश्य देखी होंगी जब काशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गंगा स्थान कर रहे थे। लेकिन क्या आपको पता है कि गंगा के जिस पानी में वह स्नान करते दीख रहे हैं, वह एक खास तरह का शोधित पानी है जो कि खास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए गंगा में केवल उस घाट पर छोड़ा गया था, जहां उन्हें स्नान करना था? अब इसकी पोल खोली है समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने।

उन्होंने जो कुछ अपने ट्वीट में बताया है, उसके मुताबिक बनारस के रविदास घाट पर गंगा का पानी इतना गंदा है है कि यदि कोई व्यक्ति, जिसकी रोगों से लड़ने की क्षमता औसत से कम है तो वह स्किन कैंसर का शिकार हो सकता है।

दरअसल, अखिलेश यादव ने यह संदेश प्रत्यक्ष रूप से जारी नहीं किया है। लेकिन उन्होंने विश्वमभर नाथ मिश्रा जो कि बनारस के ही रहनेवाले हैं और नदियों के जल की गुणवत्ता पर काम करते हैं, के हवाले से कहा है कि बनारस के रविदास घाट पर गंगा के पानी गुणवत्ता बेहद खराब है।

तकनीकी स्तर पर बात करें तो रविदास घाट पर गंगा के पानी में फीकल कोलिफोम की मात्रा दो करोड़ चालीस लाख के करीब दर्ज किया गया है। जल वैज्ञानिकों के मुताबिक पानी में यदि फीकल कोलिफोम की मात्रा 500 रहे तभी स्नान के योग्य है। स्वच्छ पेयजल में इसकी मात्रा 75 से अधिक नहीं होनी चाहिए।

रविदास घाट, बनारस में गंगा के पानी का हाल

बहरहाल, अखिलेश यादव ने गंगा के पानी की गुणवत्ता को सामने लाकर केंद्र सरकार के नमामि गंगे योजना के क्रियान्वयन और खासकर बनारस में गंगा के नाम पर मचायी गयी लूट को सार्वजनिक कर दिया है। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है कि जो लोग इतने अंधविश्वासी हैं कि इतने गंदे पानी में भी स्नान करने को धार्मिक कर्मकांड मानते हैं, वे उन रैदास की बानी को कब समझेंगे कि मन चंगा तो कठौती में गंगा?

संगठन  बिन सब सून

भारतीय राजनीति में हालांकि यह पहली बार नहीं है और ना ही यह अकेले केवल उत्तर प्रदेश का मामला है। चूंकि उत्तर प्रदेश की अहमियत देश में अधिक रही है और यहां हाल ही में चुनाव संपन्न हुए हैं, लिहाजा उदाहरण के लिए यह देखना बेहतर है। मामला है कि आज की राजनीति किस दिशा में जा रही है और किस तरह से इसका विकेंद्रीकरण और गैरलोकतांत्रिकरण हो रहा है। सवाल यह भी है कि आखिर क्या वजह है कि राजनीति में आगे आनेवाले युवा अब पहले के नेताओं की तरह जनता के बीच पहचाने नहीं जाते?

पहले कुछ आंकड़ों को देखते हैं। एडीआर की हालिया रपट कहती है कि इस बार यूपी विधानसभा में जो नये सदस्य निर्वाचित होकर आए हैं, उनमें से पांच ने यह घोषित किया है कि उनके उपर हत्या का मामला विभिन्न मामलों में लंबित है। वहीं हत्या का प्रयास के मामलों को घोषित करनेवाले विधायकों की संख्या 29 है। इसके अलावा महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के मामलों की घोषणा 6 नये विधायकों ने की है। इनमें से एक के उपर बलात्कार का आरोप है। तीन के उपर पाक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज है।

दलवार बात करें तो भाजपा के कुल 255 में से 111 नये विधायकों ने यह घोषित किया है कि उनके गंभीर आरोप अदालतों में लंबित हैं। मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के नये सदस्यों की कुल संख्या 111 है और इनमें 71 ने खुद के उपर गंभीर मामले होने की घोषणा की है। राष्ट्रीय लोकदल के कुल 8 में से 7 और ओमप्रकाश राजभर की पार्टी के 6 में से 4 ने भी इसी तरह घोषणा अपने शपथ पत्र में की है। जनसत्ता लोकतांत्रिक दल और कांग्रेस के दो-दो विधायक हैं। इन सभी ने अपने बारे में यही घोषणा की है।

अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि साफ छवि के लोग राजनीति में नहीं आ रहे हैं। इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि यूपी में इस बार जो मतदान हुए, वह पहले की तुलना में कम था। इस बार तो औसतन 52-55 फीसदी ही मतदान हुए। मतलब यह कि इस बार जिसे जनादेश कहा जा रहा है, उसमें करीब-करीब आधे मतदाताओं ने मतदान में भाग ही नहीं लिया। यानी यह जनादेश आधा-अधूरा जनादेश है। चूंकि भारतीय संविधान में वर्णित प्रावधानों के हिसाब से ऐसा होना विधानसभा के गठन में कोई अड़चन पैदा नहीं करता है तो इस लिहाज से कोई समस्या नहीं है। परंतु, सवाल तो यही है कि आखिर क्या वजह है कि लोग मतदान के लिए इच्छुक नहीं दीखते। साथ ही, वे ना तो सियासत में भागीदारी करना चाहते हैं?

दरअसल, इन सब सवालों का जवाब भारतीय राजनीति के अतीत में ही छिपा है। एक समय था जब देश आजाद हुआ था और लगभग सभी पार्टियों के पास एक ऐसा संगठन होता था जो चुनावी राजनीति में प्रत्यक्ष तौर पर तो भाग नहीं लेता था, लेकिन उसकी भूमिका बहुत खास होती थी। ठीक वैसे ही जैसे आज के समय में आरएसएस को देखा जा सकता है। यह संगठन स्वयं को गैर-राजनीतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भाजपा को मिलनेवाली जीत का श्रेय सबसे अधिक इसी संगठन को जाता है। 

ठीक ऐसे ही कभी कांग्रेस के पास एक संगठन हुआ करता था– कांग्रेस सेवा दल। कागजी तौर पर यह संगठन आज भी है। एक समय यह वह दल था, जिससे अंग्रेजी हुक्मरान डरते थे। तब इसे फ़ौजी अनुशासन और जज़्बे के लिए जाना जाता है था। कभी कांग्रेस में शामिल होने से पहले सेवादल की ट्रेनिंग ज़रूरी होती थी। यहां तक कि इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी की कांग्रेस में प्रवेश सेवादल के माध्यम से ही कराई थी। 

ऐसे ही लोहिया ने एक संगठन बनाया था– समजावादी युवजन महासभा। यह संगठन भी एक सेतु और प्रशिक्षक संगठन भूमिका का निर्वाह करता था। और कौन भूल सकता है जयप्रकाश नारायण का संगठन छात्र संघर्ष वाहिनी, जिसने 1974 के आंदोलन में केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार के साथ जमकर लोहा लिया था? और कौन भूल सकता है 1977 का वह चुनाव, जिसमें बड़ी संख्या में युवा पहली बार निर्वाचित होकर संसद और विधानसभाओं में आए थे?

फिर वह समय आया जब मान्यवर कांशीराम ने डीएस-4 और बामसेफ जैसे संगठन बनाए और हिंदी प्रदेशों में दलित राजनीति का नया अध्याय शुरू किया। बहुजन समाज पार्टी का गठन का आधार भी ये संगठन ही थे। इन संगठनों का असर यह हुआ कि बसपा न केवल यूपी में बल्कि पंजाब सहित अनेक राज्यों में सशक्त हस्तक्षेप करने की स्थिति में आ सकी। लेकिन यह अतीत की बात है। कांशीराम ने ही डीएस-4 और बामसेफ जैसे संगठनों को छोड़ बसपा पर अपना ध्यान केंद्रित किया। नतीजतन बसपा रोज-ब-रोज कमजोर होती चली गयी। कहना अतिश्योक्ति नहीं कि आज विधानसभा में बसपा की भागीदारी न्यूनतम हो चुकी है। 

दरअसल, 20वीं सदी में पार्टियों के पास एक संविधान होता था, जिसे नियमावली की संज्ञा भी दी जा सकती है। इस नियमावली में पार्टियों ने यह तय कर रखा था कि कोई कैसे पार्टी की सदस्यता पा सकता है और उसे किस तरह पार्टी के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना है। यह एक तरह की प्रक्रिया थी जो नये सदस्यों को सियासत के गुर सिखाती थी। इससे एक फायदा यह भी होता था कि युवा बड़े उत्साह से ऐसे संगठनों में भाग लेते थे।

लेकिन अब यह केवल आरएसएस के अंदर ही है, जिसका लाभ भाजपा को बखूबी मिल रहा है। परंतु, विपक्ष के पास ऐसे संगठन केवल कागज पर हैं। यहां तक कि वामपंथी दलों के संगठन मसलन एआईएसएफ और आइसा जैसे भी पहले की तरह सक्रिय नजर नहीं आते हैं। ऐसे में युवाओं को सियासत से जोड़ने वाली प्रक्रिया बाधित की जा रही है और प्रवेश केवल उन्हें मिल रहा है, जिनके पास विरासत और पैसा है। 

बहरहाल, उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में जो चुनाव परिणाम सामने आए हैं, वे न केवल पराजित विपक्षी दलों के लिए बल्कि पूरे देश के लिए एक सबक हैं, जो यह बताते हैं कि राजनीति केवल उनके सहारे नहीं छोड़ी जा सकती है जो पहले से इसके मंजे हुए खिलाड़ी रहे हैं। आज देश और पूरा विश्व नये तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसके लिए बेहतर यही है कि सभी राजनीतिक तमाम क्षेत्रों के युवाओं को राजनीति में जोड़ने के लिए पहल करें ताकि राजनीति रचनात्मक हो सके। यदि ऐसा नहीं होता है तो निश्चत तौर पर यह देश के लिए घातक साबित होगा।

यूपी में हिन्दू राष्ट्र की शुरुआत, योगी सरकार का बड़ा फैसला

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उत्तर प्रदेश से हिन्दू राष्ट्र की आधारशिला रखने की शुरुआत हो गई है। इस कड़ी में सबसे पहले शहरों के नाम बदलने की कवायद की जा रही है। शहरों के नए प्रस्तावित नाम ऐसे हैं कि आप खुद को रामायण और महाभारत काल में पाएँगे।

खबर है कि यूपी सरकार करीब 12 जिलों के नाम बदलने की तैयारी में है। शुरुआत फिलहाल 6 जिलों से होने वाली है। जिन छह जिलों के नाम शुरुआत में बदलने की तैयारी हो रही है, उसमें अलीगढ़, फर्रुखाबाद, सुल्तानपुर, बदायूं, फिरोजाबाद और शाहजहांपुर का नाम शामिल है।

अलीगढ़ को हरिगढ़ या आर्यगढ़, फर्रुखाबाद को पांचाल नगर, सुल्तानपुर को कुशभवनपुर, बदायूं को वेद मऊ, फिरोजाबाद चंद्र नगर और शाहजहांपुर को शाजीपुर किये जाने की योजना है।

योगी आदित्यनाथ के दुबारा सीएम बनने के बाद इस मामले में तेजी आ गई है। गोरखपुर का सांसद रहने के दौरान योगी आदित्यनाथ ने शहर के कई इलाकों के नामों को बदलवा दिया था। इसमें उर्दू बाजार को हिंदी बाजार, हुमायूंपुर को हनुमान नगर, मीना बाजार को माया बाजार और अलीनगर को आर्य नगर कर दिया गया था।

योगी के पिछले कार्यकाल में मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम पं. दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर किया गया, तो इलाहाबाद को प्रयागराज और फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया गया। सूत्रों के मुताबिक करीब 6 जिले ऐसे हैं, जिन पर अंदरखाने सहमति बन चुकी है और मुहर लग चुकी है। साथ ही, और ठोस ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ प्रपोजल आगामी विधानसभा सत्र में पेश करने की तैयारी है।

दूसरे चरण में जिन जिलों के नाम बदलने की सुगबुगाहट हो रही है, उसमें मैनपुरी, संभल, देवबंद, गाजीपुर, कानपुर और आगरा का नाम लिया जा रहा है।

जहां तक शहरों के नाम बदलने की प्रक्रिया है तो कैबिनेट की मंजूरी के बाद प्रस्ताव को विधानसभा के पटल पर रखा जाता है। यहां से प्रस्ताव पारित होने के बाद राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता है। राज्यपाल की मुहर के बाद नोटिफिकेशन के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास भेजा जाता है।

हालांकि केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास अधिकार है कि वह इसे स्वीकार या खारिज कर सकता है। लेकिन फिलहाल प्रदेश से लेकर केंद्र तक में तमाम पदों पर भाजपा के लोग बैठे हैं, उसमें इन नामों का बदलना तय माना जा रहा है।

यूपी में चुनाव बाद हिंसा, प्रयागराज में ओबीसी समुदाय के दारोगा पुत्र की दिनदहाड़े हत्या, जौनपुर के दलित बस्ती में गांजा पीने से रोकने पर चला दी गोलियां

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उत्तर प्रदेश में चुनाव खत्म होने के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार की वापसी के साथ ही अपराधियों के हौसले बुलंद हो गए हैं। चुनाव बाद की हिंसाओं में सबसे अधिक शिकार दलित और पिछड़े वर्ग के लोग हो रहे हैं। बीते 3 अप्रैल को इसी तरह की एक घटना सामने आयी, जिसमें अपराधियों ने प्रयागराज में एक नौजवान की दिनदहाड़े हत्या कर दी। मृतक का नाम आशीष यादव है और उसके पिता बाबूचंद यादव लखनऊ के एक थाने में दारोगा के पद पर कार्यरत हैं।

स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार करीब 22 साल का आशीष सामाजिक कार्यों में दिलचस्पी लेता था और समाजवादी पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता था। उसकी हत्या के पीछे चुनावी रंजिश बतायी जा रही है।

वहीं स्थानीय पुलिस के मुताबिक आशीष के उपर तमंचे से जानवेला हमला तब हुआ जब वह इनायरसराय इलाके के पालीकरनपुर चौराहे पर खड़ा था। वह स्वयं भी पालीकरनपुर गांव का रहनेवाला था। मोटरसाइकिल पर सवार दो अज्ञात अपराधियों ने तमंचे से गोलियां चला दी। गोली लगते ही आशीष गिर पड़ा और उसे मरा समझ अपराधी मोटरसाइकिल से भाग निकले। वहीं स्थानीय लोगों ने आशीष को अस्पताल पहुंचाया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

इस संबंध में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा है कि भाजपा के दूसरे कार्यकाल में अपराध की रफ़्तार दुगुनी हो गयी है। बैंक लूट, लॉकर चोरी, बलात्कार, गोली कांड और हत्या की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं और अपराधियों की दबंगई चरम पर है। उन्होंने यह भी कहा है कि सूबे में अपराध की बुलेट ट्रेन दौड़ रही है।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश में सामंती लोगों का हौसला किस कदर बढ़ गया है, इसकी पुष्टि जौनपुर में परसों हुई एक घटना से भी होती है। मिली जानकारी के अनुसार जौनपुर के एक दलित बहुल गांव के मंदिर में बैठकर गांजा पी रहे दबंगों को जब लोगों ने टोका, दबंगों ने लोगों पर गोलियां चला दी। इस घटना में आधा दर्जन लोग घायल हो गए। उनका इलाज स्थानीय अस्पताल में चल रहा है। इनमें चार की हालत गंभीर बतायी जा रही है।

अनुसूचित जाति अधिकारी कर्मचारियों ने दिखाया बड़ा दिल, जितेंद्र कुमार मेघवाल के परिजनों को दिया सवा तीन लाख का सहयोग

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राजस्थान में दलित कर्मचारियों ने बड़ी एकजुटता दिखायी है। अनुसूचित जाति अधिकारी कर्मचारी एसोसियेशन ( अजाक) की ओर से पाली जिले में बीते 23 मार्च, 2022 को मारे गए जितेंद्र मेघवाल के परिजनों को तीन लाख, 31 हजार रुपए की राशि दी गयी। जाहिर तौर पर यह सहायता मृतक के परिजनों के लिए बड़ी सहायता है और यह इस बात का परिचायक है कि वे पीड़ित परिवार के साथ हैं।

दरअसल, जितेंद्र मेघवाल की हत्या उसके बारवां गांव के ही दो पुरोहित समुदाय के लोगों ने केवल इसी कारण से कर दी कि वह दलित था और उनके सामने झुकने को तैयार नहीं था। यह घटना बीते 23 मार्च, 2022 को तब घटित हुई थी जब वह अपने घर जा रहा था। हत्यारों ने उसे चाकू से गोद-गोदकर उसकी हत्या कर दी थी।

हालांकि राजस्थान सरकार की ओर से भी जितेंद्र कुमार मेघवाल के परिजनों को पांच लाख रुपए दिए जाने की सूचना है। लेकिन राजस्थान के दलित संगठन राज्य सरकार से मांग कर रहे हैं कि जितेंद्र मेघवाल के परिजनों को कम से कम एक करोड़ रुपए और एक आश्रित को सरकारी नौकरी दी जाय।

इसी आशय की मांग अनुसूचित जाति अधिकारी कर्मचारी एसोसियेशन ( अजाक) ने भी की है। इसके साथ ही इस संगठन ने अपनी ओर से आर्थिक सहायता दी। इसके लिए संगठन के सदस्यों ने 3,31,000 रुपए का चेक चेक जितेंद्र के भाई ओमप्रकाश जी मेघवाल तथा चाचाजी भला राम जी मेघवाल को सौंपा। इस मौक़े पर अजाक पाली के पदाधिकारीगण लच्छा राम जी वाघेला,अविनाश जी पंवार, बसंत कुमार जी रॉयल, दौला राम जी मेघवाल , बाबू लाल जी चौहान, मोहन जी कुर्डिया, सुख देव जी देपन, राजेश्वर जी पुनड,प्रदीप जी वर्मा, खीमा राम जी पारगी आदि उपस्थित थे।

राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आरएसएस की बड़ी तैयारी, हिमांशु कुमार ने किया खुलासा

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mohan bhagwat

यूपी सहित देश के पांच राज्यों में हुए एक पंजाब को छोड़कर शेष में सरकार बनाने वाली भाजपा इन दिनों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सक्रिय हो गई है। इसमें उसका आरएसएस खुलेआम दे रहा है। यह सब इसलिए है क्योंकि इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार है। ये दोनों ओबीसी वर्ग से आते हैं।

बताते चलें कि छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अगले साल के दिसंबर में चुनाव होने हैं और आरएसएस ने अभी से दोनों राज्यों में अपनी गतिविधियां तेज कर दी है। इस आशय की जानकारी प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने फेसबुक पर जारी अपने एक पोस्ट में दी है।

वे लिखते हैं कि उन्हें राजस्थान से सामाजिक कार्यकर्ताओं ने फोन किया है। उन्हें बताया गया है कि करौली दंगे की तैयारी हिंदुत्ववादी संगठन लंबे समय से कर रहे थे। इन संगठनों के पीछे आरएसएस और बीजेपी का हाथ है। इन लोगों का मकसद राजस्थान में सांप्रदायिकता को भड़का कर हिंदुओं के वोटों को एक साथ लाना है।

हिमांश कुमार बताते हैं कि आरएसएस का लक्ष्य आने वाले विधानसभा चुनाव में राजस्थान में कांग्रेस की सरकार हटाकर भाजपा की सरकार बनाना है। दंगा उसी मकसद से किया गया है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी आरएसएस के बड़े पदाधिकारी बस्तर और अन्य इलाकों में लगातार दौरे कर रहे हैं और सांप्रदायिकता भड़का रहे हैं।

हिमांशु कुमार मानते हैं कि वहां भी कांग्रेस की सरकार को हटाकर भाजपा अपनी सरकार बनाने की फिराक में है। उन्होंने आरोप लगाया है कि भाजपा को दंगे करा कर सत्ता में पहुंचने का रास्ता ही मालूम है। इनसे और किसी अच्छे तरीके की उम्मीद नहीं की जा सकती।

भिक्षु चंदिमा के नेतृत्व में बौद्ध धर्मावलंबियों ने योगी सरकार से जीती बड़ी लड़ाई

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क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी हिंदू को किसी मंदिर में जाने के लिए सरकार से लिखित अनुमति लेनी पड़ी हो? या फिर कभी आपने सुना है कि किसी इस्लाम धर्मावलंबी को किसी मस्जिद में नमाज अदा करने के लिए सरकार से लिखित लेने के लिए कहा गया हो?

यकीनन आपने न तो ऐसा सुना होगा और ना ही कहीं पढ़ा होगा। क्योंकि भारतीय संविधान में हर किसी को अपने-अपने धर्म के हिसाब से संबंधित पूजा स्थलों व तीर्थ स्थानों पर पूजा करने का अधिकार है। लेकिन यह पहली बार हुआ कि बौद्ध धर्मावलंबियों सारनाथ में पूजा करने से न केवल रोका गया, बल्कि 15 दिन पहले लिखित रूप से अनुमति लेने की बात कही गयी।

सनद रहे कि सारनाथ, बनारस से करीब 10 किलोमीटर पूर्वोत्तर में स्थित प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थल है। बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था, जिसे “धर्म चक्र प्रवर्तन” भी कहा जाता है। इसे बौद्ध मत के प्रचार-प्रसार का आरंभ कहा जाता है। इसी स्थल पर योगी सरकार के राज में बौद्ध धर्मावलंबियों को पूजा करने से रोका गया।

आपको जानकर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि ऐसा असंवैधानिक आदेश योगी सरकार के राज में सरकारी अधिकारियों ने दिया। लेकिन यह लड़ाई बौद्ध धर्मावलंबियों ने केवल दस दिनों के भीतर ही जीत ली और परिणाम यह कि बहुमत के नशे में चूर सरकार को झूकना पड़ा।

मामला 23 मार्च, 2022 की है। धम्म शिक्षण संस्थान के संस्थापक भिक्षु चंदिमा हैदराबाद के संदीप कामले, वर्षा कामले, इंदू  भिक्षु धर्म रश्मि, आनंद मौर्य और भैयालाल पाल के साथ सारनाथ के धमेख स्तूप पहुंचे। लेकिन उन्हें स्तूप के दरवाजे पर ही रोक दिया गया। जब उन्होंने सवाल उठाया तो मौके पर मौजूद अधिकारियों ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी के अनुसार स्तूप स्थल पर पूजा-अर्चना की अनुमति नहीं है। इस संबंध में भिक्षु चंदिमा ने प्रतिवाद किया और सवाल पूछा कि यह कहां लिखा है कि बौद्ध धर्मावलंबी धमेख स्तूप स्थल पर पूजा नहीं कर सकते।

उनके सवाल का जवाब देने के बजाय प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें कहा कि यदि वे पूजा करना चाहते हैं तो उन्हें 15 दिन पहले आवेदन करना होगा और अनुमति भी तभी मिलेगी जब उनका आवेदन स्वीकार किया जाएगा।

इस घटना के विरोध में भिक्षु चंदिमा और उनके साथी वहीं स्तूप के मुख्य द्वार के बाहर धरने पर बैठ गए। बाद में उन्होंने इसके खिलाफ और धमेख स्तूप स्थल पर पूजा अर्चना का अधिकार हासिल करने के लिए अभियान चलाया। इस क्रम में उन्होंने बिहार के बोधगया के भिक्षु संघ से मुलाकात की तथा उन्हें यूपी सरकार के द्वारा किये गये दुर्व्यवहार व अवैधानिक आदेश के बारे में जानकारी दी। इसके अलावा भिक्षु चंदिमा ने सोशल मीडिया के जरिए लोगों को संदेश दिया कि इस तरह के असंवैधानिक आदेशों की वापसी के लिए सहयोग करें।

फिर क्या था, उनका अभियान रंग लाने लगा और बीते 3 अप्रैल, 2022 को भिक्षु चंदिमा के नेतृत्व में हजारों की संख्या में बौद्ध धर्मावलंबियों ने धमेख स्तूप स्थल पर जाकर पूजा अर्चना की। इसके पहले एक रैली भी निकाली गयी।

2 अप्रैल की चौथी वर्षगांठ पर बड़ा सवाल

बात बहुत खास है। ठीक चार साल पहले का दृश्य यही था। पूरे देश में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोग सड़कों पर थे। देश के विभिन्न शहरों में प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया जा चुका था। कइयों के खिलाफ यूएपीए जैसे काले कानून के तहत मुकदमा दर्ज तक कर लिया गया था। वहीं दूसरी ओर द्विजवादी न्यूज चैनलों पर डेली सोप के जैसे चलनेवाली बहसें चलायी जा रही थीं। गोया देश में कहीं कुछ भी नहीं हुआ था। जबकि इस देश के 85 फीसदी लोगों से जुड़ा हुआ था यह मामला।

वैसे यह कोई पहला मौका नहीं था जब द्विजवादी मीडिया का चरित्र सामने आया था। लेकिन 2 अप्रैल, 2018 का वह भारत बंद बेहद खास था। वजह यह कि देश भर में हुए इस आंदोलन को किसी राजनीतिक दल ने खड़ा नहीं किया था। इस आंदोलन के मामले में ऐसा पहली बार हुआ था कि सामाजिक न्याय में विश्वास रखनेवाली पार्टियों ने आम जनता का अनुसरण किया था।

तो मामला यही था कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट में कई अहम बदलाव करने की बात कह दी थी। ये बदलाव ऐसे थे कि यदि लागू हो जाते तो देश भर के दलित-आदिवासी जो कि पहले से ही सामंती ताकतों के अत्याचार के शिकार होते रहते हैं, और अधिक असुरक्षित हो जाते और सामंती ताकतों का मनोबल इतना बढ़ जाता कि वे कहीं भी किसी दलित और आदिवासी को जातिसूचक गाली दे सकते थे, जातिगत भेदभाव की वजह से हिंसा कर सकते थे, दलित-आदिवासी बेटियों के साथ छेड़खानी कर सकते थे और तब भी मामला एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज कराना आसान न होता।

चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने बदलाव ही ऐसे कर दिए थे कि पहले पुलिस उन मामलों की जांच करती और और जांच करने की जिम्मेदारी डीएसपी रैंक के अधिकारी होती। यदि वह जांच अधिकारी मामले को सही पाता तब कहीं जाकर मामला दर्ज होता। कार्रवाई की बात तो बाद की बात होती।

तो कुल मिलाकर होना यही था कि एससी-एसटी एक्ट का खात्मा कर दिया जाता।

लेकिन इस देश के हुक्मरान भूल गए कि फुले-आंबेडकरवादी चेतना का किस प्रकार पूरे देश में प्रसार हुआ है और अब वे लोग भी लड़ना चुके हैं, जिन्हें हजारों वर्षों से सताकर और पैरों से रौंदकर रखा गया। ज्ञान से दूर रखा गया। जबरदस्ती सिर पर मैला ढोने के लिए, मरे हुए जानवरों की लाश ढोने और ऐसे ही घृणास्पद सारे कामों को करने के लिए मजबूर किया गया।

इस देश के हुक्मरानों को एससी-एसटी वर्ग को लोगों ने करारा जवाब दिया और उनका साथ अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों ने दिया। इसका असर हुआ यह कि केंद्र की आरएसएस की सरकार बैकफुट पर गयी और उसने आनन-फानन में संविधान संशोधन विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के संशोधनों को निष्प्रभावी बना दिया।

तो यह दूसरा ऐतिहासिक मौका था जब एससी-एसटी-ओबीसी एक साथ आंदोलनरत थे। इसके पहले 1990 के दशक में जब मंडल कमीशन की अनुशंसाएं लागू हुईं और सवर्ण अनुशंसाओं को वापस कराने के लिए अपने देह पर पेट्रोल छिड़ककर जलने-मरने लगे तब एससी-एसटी-ओबीसी वर्ग के लोग एक साथ सड़क पर उतरे थे। कौन भूला सकता है मान्यवर कांशीराम, रामविलास पासवान, लालू प्रसाद सरीखे नेताओं को, जिन्होंने इस देश की राजनीति ही बदल दी।

खैर, इस देश ने मंडल कमीशन के समय एससी-एसटी-ओबीसी की एकता को देखा और फिर करीब 27 साल के बाद वर्ष 2018 में ऐसा नजारा दिखा था। अब सवाल यह है कि अब ऐसी एकजुटता कब फिर कब होगी? क्या ये वर्ग इस बात का इंतजार करेंगे कि द्विज आरक्षण खत्म कर दें, तब देखा जाएगा?

सीबीआई की स्थापना दिवस के मौके पर सीजेआई ने नरेंद्र मोदी हुकूमत पर उठाए सवाल

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हम भारतीय अपनी स्वतंत्रता से प्यार करते हैं। जब भी हमारी स्वतंत्रता को छीनने का प्रयास किया गया है, हमारे सतर्क नागरिकों ने निरंकुश लोगों से सत्ताा वापस लेने में संकोच नहीं किया। ये बातें किसी राजनेता ने नहीं, बल्कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमण ने कही हैं और वह भी नई दिल्ली में सीबीआई की स्थापना दिवस के समारोह के मौके पर।

गौर तलब है कि सीबीआई को लेकर तमाम विपक्षी पार्टियां आए दिन आरोप लगाती रहती हैं कि केंद्र में सत्तासीन नरेंद्र मोदी सरकार सीबीआई का उपयोग राजनीतिक मंसूबों को अमलीजामा पहनाने के लिए करती है। ऐसे अनेक आरोप कांग्रेस सहित तमाम राजनीतिक दल, फिर चाहे वह लालू प्रसाद की पार्टी राजद हो या ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस या फिर उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना द्वारा लगाए जाते रहे हैं। लेकिन यह पहली बार है जब सीबीआई के राजनीतिक इस्तेमाल किए जाने संबंधी बात परोक्ष रूप से सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमण के द्वारा कही गयी है।

हम आपको बताते हैं कि पूरा माजरा क्या है। दरअसल, बीते 1 अप्रैल, 2022 को उन्होंने सीबीआई की स्थापना दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित किया। विषय था– “लोकतंत्र : जांच एजेंसियों की भूमिका और जिम्मेदारी”। चीफ जस्टिस ने कहा कि लोकतंत्र के साथ हमारे अबतक के अनुभव को देखते हुए यह संदेह से परे साबित होता है कि लोकतंत्र हमारे जैसे बहुलवादी समाज के लिए सबसे उपयुक्त है।

नहीं चलेगी तानाशाही

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि तानाशाही शासन के माध्यम से हमारे समृद्ध विविधता को कायम नहीं रखा जा सकता है। लोकतंत्र के माध्यम से ही हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, विविधता और बाहुल्यवाद को कायम और मजबूत रखा जा सकता है। लोकतंत्र को मजबूत करने में हमारा निहित स्वार्थ है क्योंकि हम अनिवार्य रूप से जीने के लोकतांत्रिक तरीके में विश्वास रखते हैं।

सीबीआई को दी नसीहत

उन्होंने कहा कि हम भारतीय अपनी स्वतंत्रता से प्यार करते हैं। जब भी हमारी स्वतंत्रता को छीनने का प्रयास किया गया है, हमारे सतर्क नागरिकों ने निरंकुश लोगों से सत्ताा वापस लेने में संकोच नहीं किया। इसीलिए यह आवश्यक है कि पुलिस और जांच निकायों सहित सभी संस्थान लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखें और उन्हें मजबूत करें। उन्हें किसी भी सत्तावादी प्रवृत्ति को पनपने नहीं देना चाहिए। उन्हें संविधान के तहत निर्धारित लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर काम करने की जरूरत है। कोई भी विचलन संस्थानों को नुकसान पहुंचाएगा और हमारे लोकतंत्र को कमजोर करेगा।

अब सवाल यह है कि आखिर मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमण को ऐसा क्यों कहना पड़ रहा है? क्या उन्हें भी यही लगता है कि सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों का उपयोग हमारे देश की हुकूमत अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए कर रही है और इससे लोकतंत्र रोज-ब-रोज कमजोर हो रहा है?

2 अप्रैल, 2018, देश भर के दलित-बहुजनों ने कहा था– अब नहीं सहेंगे अत्याचार

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– रवि संबरवाल

ठीक चार साल पहले आज के दिन ही देश भर के दलितों और आदिवासियों ने भारत बंद किया था। यह एक नायाब एकजुटता थी, जिसमें सभी बहुजनों ने स्वत: स्फूर्त तरीके से भाग लिया था। यह ऐतिहासिक एकजुटता के पीछे उनका आक्रोश था, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधन किये जाने के बाद उत्पन्न हुआ था। इस संशोधन से देशभर के दलित और आदिवासी आ्रकोशत हो गए थे और सड़कों पर ‘ हम अंबेडकरवादी हैं संघर्षों के आदि हैं’ नारे के साथ उतर पड़े थे। इस संघर्ष का सकारात्मक परिणाम परिणाम भी सामने आया सरकार को संशोधन विधेयक के जरिए सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को खत्म किया गया।

बताते चलें कि एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा पारित किया गया था। एससी/एसटी एक्ट की धारा- 3(2)(v) के तहत जब कोई व्यक्ति किसी एससी या एसटी समुदाय के सदस्य के खिलाफ अपराध करता है तो उस अपराधी को आईपीसी के तहत 10 साल या उससे अधिक की जेल की सजा के साथ दंडित किया जाता है। साथ् ही, यह भी प्रावधान है कि ऐसे मामलों में जुर्माने के साथ सजा को आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार एक मजबूत कानून बनाया गया था ताकि देश के दलित और आदिवासियों पर अत्याचार करनेवालों को सजा मिल सके।

हालांकि इसके पहले 1955 में ‘प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट’ में कुछ इसी तरह के प्रावधान किए गए थे। लेकिन इसमें दलित और आदिवासी का उल्लेख स्पष्ट रूप से नहीं था। इसके कारण दलितों और आदिवासियों की रक्षा नहीं हाे सकती थी।

लेकिन 1989 में जो कानून बनाया गया, उसमें सख्त प्रावधान किये गये। इसके तहत दर्ज मामलों में सीधे कार्रवाई किये जाने की बात थी। परंतु, सुप्रीम कोर्ट ने इसमें नया प्रावधान यह किया था कि एससी-एसटी के खिलाफ जातिसूचक टिप्पणी या कोई और शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा और ना ही तुरंत गिरफ्तारी होगी। डीएसपी रैंक के अधिकारी पहले मामले की जांच करंगे, इसमें ये देखा जाएगा कि कोई मामला बनता है या फिर झूठा आरोप है। मामला सही पाए जाने पर ही मुकदमा दर्ज होगा और आरोपी की गिरफ्तारी होगी।

खैर, एससी–एसटी एक्ट को कमजोर किये जाने के प्रयासों को वापस लेना पड़ा। यह दलित-बहुजन संघर्ष के कारण ही संभव हुआ। यह विशुद्ध रूप से गैर राजनीतिक आंदोलन था और लोगों ने खुद इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। इस तरह इस आंदोलन ने साबित कर दिया था कि इस देश के दलित-बहुजन अत्याचार सहने को तैयार नहीं हैं।

आइए जानें, हरियाणवी लोक साहित्य में अंबेडकरवाद के प्रवर्तक महाशय छज्जूलाल सिलाणा को

दीपक मेवाती

मानव जीवन के हर काल में सामाजिक कुरीतियों को दूर करनेआमजन को इन कुरीतियों के प्रति जागृत करने का बीड़ा जिस भी शख्स ने उठाया आज उनकी गिनती महान व्यक्तित्व के रूप में होती है| संत कबीर दास, संत रविदास, बिरसा मुंडा, शियाजी राव गायकवाड, ज्योति राव फूले, सावित्रीबाई फूले, बीबी फातिमा शेख, डॉ. भीमराव अंबेडकर, मान्यवर कांशीराम आदि ऐसे ही व्यक्ति हुए जिन्होंने समाज में शोषितदलितपीड़ित जनता की आवाज उठाई एवं स्वयं के जीवन को भी इनके उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। समय-समय पर देश के कोने-कोने में ऐसे अन्य व्यक्ति भी जन्म लेते रहे जिन्होंने भले ही समाज को जागृत करने की कोई नई बात नहीं बताई हो, केवल ऊपर वर्णित महान लोगों के विचारों का ही प्रचार प्रसार किया। 

 हरियाणा के झज्जर जिले के छोटे से गांव सिलाणा में 14 अप्रैल, 1922 को एक ऐसे ही महान व्यक्ति छज्जूलाल का जन्म हुआ। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज की बुराइयों पर लिखते हुए आमजन के बीच बदलाव की बात करते हुए एवं अंबेडकरवाद का प्रचार-प्रसार करते हुए व्यतीत किया। छज्जूलाल जी के पिता का नाम महंत रिछपाल और माता का नाम दाखां देवी था। इनके पिता हिंदी, संस्कृत व उर्दू भाषाओं के भी अच्छे जानकार थे। समाज में इनके परिवार की गिनती शिक्षित परिवारों में होती थी। इनकी पत्नी का नाम नथिया देवी था। इनके चाचा मान्य धूलाराम उत्कृष्ट सारंगी वादक थे। महाशय जी कुशाग्र बुद्धि के बालक थे। छज्जू लाल ने मास्टर प्यारेलाल के सहयोग से उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत और हिंदी भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। महाशय जी ने 15 वर्ष की अल्पायु में ही कविता लिखना शुरू कर दिया था। इनकी कविताओं पर हरियाणा के एकमात्र राष्ट्र कवि महाशय दयाचंद मायना की शब्दावली का भी प्रभाव पड़ा। छज्जूलाल जी ने महाशय दयाचंद जी को अपना गुरु माना। 

 वह 1942 तक ब्रिटिश आर्मी में रहे हैं किंतु इनका ध्यान संगीत की तरफ था, इन्होंने आर्मी से त्यागपत्र देकर घर पर ही अपनी संगीत मंडली तैयार कर ली और निकृष्टतम जीवन जीने वाले समाज को जागृत करने के काम में लग गए। उन्होंने ऐसी लोक रागणियों की रचना की जो व्यवस्था परिवर्तन और समाज सुधार की बात  करती हो। महाशय जी 1988 के दौरान आकाशवाणी रोहतक के ग्रुप के गायक रहे यहां पर उन्होंने लगातार 12 वर्ष गायन कार्य किया। महाशय जी का देहांत 16 दिसम्बर 2005 को हुआ। महाशय छज्जू लाल सिलाणा एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी लोक कवि थे। उन्होंने अपने जीवन काल में 21 किस्सों  और एक सौ से अधिक फुटकल रागणियों की रचना की। इनके किस्सों में डॉ. भीमराव अम्बेडकर, वेदवती-रतन सिंह, धर्मपाल-शांति, राजा हरिश्चंद्र, ध्रुव भगत, नौटंकी, सरवर-नीर, बालावंती, विद्यावती, बणदेवी चंद्रकिरण, राजा कर्णरैदास भक्त शीला-हीरालाल जुलाहा, शहीद भूप सिंह, एकलव्य आदि किस्सों की रचना की। महाशय जी ने सामाजिक बुराइयों जैसे दहेज प्रथा, जनसंख्या, अशिक्षा, महिला-उत्पीड़न, जाति-प्रथा, नशाखोरी, भ्रूण हत्या आदि पर भी रागणियों की रचना की।

 महाशय जी को जिस ऐतिहासिक किस्से के लिए याद किया जाता है वह डॉ. भीमराव अंबेडकर का किस्सा है। इस किस्से के द्वारा इन्होंने हरियाणा के उस जनमानस तक अपनी बात पहुंचाई जो देश-दुनिया की चकाचौंध से दूर था और जिसके पास जानकारी का एकमात्र साधन आपसी चर्चा और रागणियां ही थी। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने आजीवन संघर्ष किया जिस कारण ही करोड़ों भारतीयों के जीवन में खुशियाँ आई। महाशय जी ने बाबा साहेब के जन्म से लेकर उनके अंतिम क्षणों तक को काव्य बद्ध किया। बाबा साहेब के जीवन को इन्होंने 31 रागनियों में समाहित किया। इन रागणियों को ये समाज को जागृत करने के लिए गाया करते थे। वे रागनीयांबहुत अधिक ह्रदय स्पर्शी हैं, जिनमें बाबा साहेब के बचपन में जातिगत उत्पीड़न को दर्शाया गया है। जब इन रागणियों को सांग के माध्यम से दिखाया जाता है तब दर्शक की आंखों से आंसू बहने लगते हैं। 

भीमराव के बचपन की घटना को महाशय जी लिखते हैं जब महारों के बच्चों को स्वयं नल खोल कर पानी पीने की इजाजत नहीं थी तो भीमराव अंबेडकर प्यास से व्याकुल हो उठते हैं, उसका चित्रण महाशय जी अपने शब्दों में करते हैं :-

बहोत दे लिए बोल मनै कौए पाणी ना प्याता

घणा हो लिया कायल इब ना और सह्या जाता।

म्हारै संग पशुवां ते बुरा व्यवहार गरीब की ना सुणता कौए पुकार

ढएं कितने अत्याचार सुणेगा कद म्हारी दाता।

विद्यालय में जिस समय भीमराव पढ़ते थे तो अध्यापक उनकी कॉपी नहीं जांचता था, अध्यापक भी उनसे जातिगत भेदभाव करता था। इस वाकये को सिलाणा जी लिखते हैं :- 

हो मास्टर जी मेरी तख्ती जरूर देख ले

लिख राखे सै साफ सबक पढ़के भरपूर देख ले…..

एक बार भीमराव बाल कटाने नाई के पास जाता है तो नाई उसके बाल काटने से मना कर देता है और कहता है :-

एक बात पूछता हूं अरे ओ नादान अछूत

मेरे पास बाल कटाने आया कहां से ऊत

चला जा बदमाश बता क्यूं रोजी मारे नाई की 

करें जात ते बाहर सजा मिले तेरे बाल कटाई की|

इस घटना में नाई भी इसीलिए बाल काटने से मना करता है क्योंकि उसे समाज की अन्य जातियों का डर है।

भीमराव अपने साथ घटित इस घटना को अपनी बहन तुलसी को बताते हैं :-

इस वर्ण व्यवस्था के चक्कर में मुलजिम बिना कसूर हुए 

बेरा ना कद लिकड़ा ज्यागा सब तरिया मजबूर हुए|

एक बार भीम सार्वजनिक कुएं से स्वयं पानी खींचकर पी लेता है स्वर्ण हिंदू इससे नाराज होकर भीम को सजा देते हैं उसका चित्रण महाशय जी करते हैं:-

लिखी थी या मार भीम के भाग म्ह

भीड़ भरी थी घणी आग म्ह

ज्यूं कुम्हलावे जहर नाग म्ह ना गौण कुएं पै…..

करा ना बालक का भी ख्याल पीट-पीटकर करया बुरा हाल|

 बाबा साहेब के जीवन के अंतिम दिनों की दो महत्पूर्ण घटनाओं का उन्होंने बड़े सुंदर ढंग से वर्णन किया है। 14 अक्तूबर 1956 को जब बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने नागपुर में बौद्ध धर्म स्वीकार किया। उस समय दलित जनता जिस प्रकार के जोश से लबालब होकर नागपुर की ओर बढ़ रही थी, उसका चित्रण महाशय जी करते हैं-

लाखों की तादाद चली बन भीमराव की अनुगामी

बुद्धम शरणम गच्छामि, धम्मम शरणम गच्छामि 

संघम शरणम गच्छामि…..

जो बतलाया भीमराव ने सबने उसपे गौर किया 

बुद्ध धर्म ग्रहण करेंगे संकल्प कठोर किया 

कूच नागपुर की ओर किया निश्चय लेकर आयामी 

बुद्धं शरणम्……

6 दिसम्बर 1956 जिस दिन महामानव भीमराव अम्बेडकर की मृत्यु हुई। उसदिन बाबा साहेब के निजि सचिव नानक चंद रत्तू जी रोते-रोते जो कुछ कहते हैं उसको सिलाणा जी लिखते हैं –

आशाओं के दीप जला, आज बाबा हमको छोड़ चले

दीन दुखी का करके भला, आज बाबा हमको छोड़ चले…

पीड़ित और पतित जनों के तुम ही एक सहारे थे 

च्यारूं कूट म्ह मातम छा गया, दलितों के घने प्यारे थे 

नम आखों से अश्रु ढला, आज बाबा हमको छोड़ चले|

इस प्रकार महाशय छज्जूलाल सिलाणा ने बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के पूरे जीवन को हरियाणवी लोक साहित्य की विधा रागनी में काव्य बद्ध किया। जिससे आमजन को भी बाबा साहब के विचारों से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ। महाशयजी का हरियाणवी लोक साहित्य के लिए भी ये अतुलनीय योगदान है। अंत में कहा जा सकता है कि महाशय छज्जूलाल सिलाणा हरियाणवी लोक साहित्य में अम्बेडकरवाद के प्रवर्तक हैं। 

संदर्भित पुस्तक:- महाशय छज्जूलाल सिलाणा ग्रन्थावली (2013), सं. डॉ. राजेन्द्र बड़गूजर,गौतम बुक सैंटर दिल्ली।

शीर्ष नेतृत्व की हठधर्मिता से खत्म होता बहुजनों का राजनैतिक आंदोलन

सवाल यह है कि बसपा क्यों हार गई? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि बसपा इतनी बुरी तरह से क्यों हार गई? नतीजे बता रहे हैं कि बसपा पार्टियों में सबसे नीचे खड़ी है। ओमप्रकाश राजभर की पार्टी, अनुप्रिया पटेल की पार्टी, कांग्रेस पार्टी, जयंत चौधरी की लोकदल पार्टी और यहां तक की निषाद पार्टी तक बहुजन समाज पार्टी से आगे हैं। बसपा सिर्फ एक सीट जीत सकी है। और जो लोग बलिया की राजनीति को जानते हैं, उन्हें पता है कि जिस रसड़ा सीट से बसपा के टिकट पर उमाशंकर सिंह जीते हैं, वह उनकी अपनी निजी लोकप्रियता की जीत है, बहुजन समाज पार्टी की नहीं। यानी 2014 के लोकसभा चुनाव में शून्य पर पहुंचने का रिकार्ड बना चुकी बसपा 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी कमोबेश उसी स्थिति में खड़ी है।

लेकिन बसपा की हार की वजह क्या है? क्या सिर्फ बहनजी?

जी नहीं। बसपा की हार की वजह इस पार्टी के नेता हैं, जो इतने रीढ़विहीन हैं कि पार्टी से निकाले जाने के डर से अपनी आवाज तक को गिरवी रख चुके हैं। बसपा की हार की वजह उसके समर्थक भी हैं, जो पार्टी की कमियों पर बात नहीं करना चाहते, जो अपनी नेता की कमियों पर बात नहीं करना चाहते। यही नहीं, कमियों को सुनना भी नहीं चाहते। बल्कि जो लोग उन कमियों को सामने लाते हैं, उस पर बात करते हैं, उनको गालियां तक देने को तैयार रहते हैं। छूटते ही उन्हें किसी दूसरे दल का एजेंट, दलाल या बिका हुआ बता दिया जाता है। दूसरे मीडिया हाउस को मनुवादी और गोदी मीडिया बताने वाले यही लोग अपने समाज के लेखकों और पत्रकारों से जमीनी हकीकत सुनने की बजाय सिर्फ बसपा की जय-जयकार सुनने की उम्मीद करते हैं।

और शायद बसपा का शीर्ष नेतृत्व भी यही चाहता है। वह नहीं चाहता कि उससे सवाल पूछे जाएं। वह सवाल पूछने और उठाने वालों को बेइज्जत कर बाहर का रास्ता दिखा देता है। और उसके ज्यादातर समर्थक बिना सच्चाई जाने आवाज उठाने वालों की फजीहत करने पर उतारु हो जाते हैं। कुल मिलाकर बसपा का शीर्ष नेतृत्व पार्टी के साथ ही अपने समर्थकों का भी हुक्मरान बना बैठा है। बसपा के समर्थक शीर्ष नेतृत्व के आगे समर्पण की मुद्रा में दिख रहे हैं। और जब समर्थक समर्पण कर देता है तो नेतृत्व करने वाले को अपनी मनमर्जी करने का हक मिल जाता है। उसी मनमर्जी की वजह से बसपा इस हाल में पहुंच गई है।

उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे बसपा की राजनैतिक हार भर नहीं है। यह एक बड़े समाज का सपना टूट कर चकनाचूर हो जाने जैसा है। वह एक बड़े विजनरी मसीहा मान्यवर कांशीराम के संघर्ष के खत्म हो जाने जैसा है। वह दलितों के उस हुजूम के साथ धोखा है, जो हर हार के बाद भी रैलियों में इस उम्मीद के साथ उमड़ती है कि शायद इस बार कुछ बेहतर होगा। वह समाज के आखिरी छोड़ पर खड़े उस व्यक्ति के साथ बड़ा छल है, जिसने अपनी झोपड़ी पर इस उम्मीद में नीला झंडा टांग रखा है कि एक दिन हुकुमत के शीर्ष पर उसके समाज का नेता बैठेगा, जो उसे उसका हक दिलाएगा।

लेकिन ईमानदारी से देखें तो बसपा का चुनाव पिछले कुछ सालों से हार और जीत से इतर कहीं न कहीं समझौते और राजनीतिक दबाव का चुनाव दिखने लगा है। वह पार्टी की बजाय एक व्यक्ति का अपना अकेले का चुनाव दिखने लगा है। ऐसी नेत्री का चुनाव जिसने अपने जीवन में बहुत कुछ कुर्बान कर बहुजन समाज की नेत्री से बढ़कर देवी तक का दर्जा हासिल किया, जिसे बहुजन समाज ने सर माथे पर बैठाया, लेकिन जो अब हठी और आत्म केंद्रित हो गई हैं। इतनी आत्म केंद्रित कि बहुजन नायकों का सपना उनके अपने एजेंडे पर भारी हो चुका है।

अक्सर कहा जाता है कि बहुजन समाज पार्टी राजनीतिक दल के साथ साथ सामाजिक आंदोलन भी है। शायद इसीलिए यूपी में बसपा की इस हार का मातम देश ही नहीं दुनिया भर के अंबेडकरवादियों द्वारा मनाया जा रहा है। इसीलिए सोशल मीडिया से लेकर दलित बस्तियों में चौपाल तक से प्रतिक्रियाएं आ रही है। बसपा को बनाना किसी एक आदमी के बूते की बात नहीं थी। मान्यवर कांशीराम ने सपना जरूर देखा लेकिन उस सपने को साकार किया अधनंगे, आधे पेट खाकर नीला झंडा ढोने वाले दलित-पिछड़े समाज के लोगों ने। उस सपने को साकार बनाया चंद हजार रुपये कमाने वाले उन हजारों सरकारी कर्मचारियों ने; जो सालों तक अपने तनख्वाह के पैसे का एक हिस्सा निकाल कर इस आंदोलन के नाम पर मान्यवर कांशीराम के हाथ पर धड़ते रहें। 

गरीब समाज के आंखों में सपना था कि बसपा के टिकट पर उसका आदमी विधायक और सांसद बनकर उसके हित की बात करेगा। उसका आदमी मुख्यमंत्री बनेगा, फिर प्रधानमंत्री बनेगा और ऐसी नीति बनाएगा जिससे उसका जीवन बदलेगा। बसपा ने वह सपना दिखाया भी और सत्ता में आने पर उसे पूरा भी किया। लेकिन जिस उत्तर प्रदेश से यह सपना शुरू हुआ था, उसी प्रदेश की जमीन पर यह सपना सिमटता दिख रहा है। चुनावी नतीजों के बाद जिस कदर दलित और अति पिछड़े समाज में बेचैनी थी, उसकी बातों से वह छटपटाहट साफ दिख रही थी। यहां तक की दलित-पिछड़े समाज के ऐसे नेता जो कभी बसपा में रहे थे, वह भी बसपा की इस हार से परेशान है। लेकिन दुख इस बात का है कि बसपा समर्थक और नेता आपस में तो बात कर रहे हैं, लेकिन कोई बदलाव के लिए आगे नहीं आ रहा। न पार्टी दफ्तर के बाहर कार्यकर्ताओं और समर्थकों का प्रदर्शन होता दिखा, न ही शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ किसी बड़े नेता ने आवाज उठाई और न ही पार्टी की कार्यप्रणाली के खिलाफ नेताओं के इस्तीफे का दौर चला।

कहीं न कहीं इसी बात का फायदा बहुजन समाज पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उठा रहा है। दिकक्त यह भी है कि जैसे ही आप सवाल उठाना शुरू करते हैं, लोग भड़क जाते हैं। मेरा सवाल है कि आखिर क्यों उस पार्टी की मुखिया के खिलाफ सवाल नहीं उठाना चाहिए, जिनकी निजी महत्वकांक्षा और बिना सिर पैर के फैसलों से एक बड़ा आंदोलन जमींदोज होता दिख रहा है। मैंने छोटी सी गलती पर या कहें कि गलतफहमी पर सालों तक पार्टी को जीवन देने वाले नेताओं को एक झटके में बसपा से बाहर होते देखा है। किसी दूसरी पार्टी का दामन थामते हुए अपनी गाड़ी से नीला झंडा उतारते हुए, उसे रोते हुए देखा है। ऐसा दर्जनों नेताओं के साथ हुआ है। यह ठीक नहीं है। 

बहुजन समाज का हर एक व्यक्ति बहनजी के त्याग और समर्पण को स्वीकार करता है। उन्होंने मान्यवर कांशीरामजी के साथ मिलकर जो क्रांतिकारी काम किया, निश्चित तौर पर वह उतने कम वक्त में कोई दूसरा नहीं कर सकता था। सबने उसकी सराहना की, पूरा समाज इसीलिए उनको आज भी तमाम खामियों के बावजूद आदर देता है। लेकिन जब बहनजी अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी का इकलौता राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना देती हैं, जो मंच से एक भाषण तक नहीं दे सकते, न ही उनका व्यक्तित्व ऐसा है कि वह लोगों को खिंच सके, तो इस पर बात क्यों नहीं होनी चाहिए। अपना घर बार छोड़कर सालों तक बसपा के मिशन को अपना खून पसीना देने वाले बड़े-बड़े अनुभवी नेताओं को दरकिनार कर बहनजी जब एक कम अनुभवी भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का इकलौता नेशनल को-आर्डिनेटर घोषित करती हैं, तो उस पर बात क्यों नहीं होनी चाहिए? बात भाई-भतीजावाद की नहीं है। बात योग्यता की है। क्या आनंद कुमार के अलावा भारत के किसी भी राजनीतिक दल का कोई राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ऐसा है, जिसने सार्वजनिक मंच से एक भाषण तक न दिया हो? 

क्या किसी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की हमेशा के लिए इसीलिए सराहना करती रहनी चाहिए कि उसने एक वक्त में बहुत महान काम कर दिया है। क्या इस वजह से उसे भविष्य में हर तरह के फैसले लेने की आजादी होनी चाहिए? आलोचना और सवाल उठाने पर भड़कने वाले लोग खुद से पूछें कि क्या बसपा में 10-20 ऐसे राष्ट्रीय नेता नहीं होने चाहिए, जिनको देखने और सुनने के लिए भीड़ उमड़े। क्या बसपा के भीतर 10 ऐसे प्रवक्ता नहीं होने चाहिए जो विषयों के विशेषज्ञ हों और देश-दुनिया के मुद्दों पर खुल कर अपनी पार्टी और अपने समाज की बात रख सकें? क्या बसपा के भीतर हर राज्य में ऐसे दर्जनों नेता नहीं होने चाहिए, जिसमें वहां के स्थानीय कार्यकर्ता और जनता भावी मुख्यमंत्री देखें? क्या हर राज्य की कमान वहां के स्थानीय लोगों के पास नहीं होनी चाहिए? क्या बसपा के भीतर दूसरे दलों की तरह यूथ विंग, महिला मोर्चा और किसान मोर्चा नहीं होने चाहिए? क्या बसपा को ऐसा मीडिया नहीं खड़ा चाहिए, जो उसके विचारों को प्रचारित-प्रसारित करे? अगर ऐसा होना चाहिए तो आखिर बसपा का शीर्ष नेतृत्व ऐसा क्यों नहीं कर रहा है? बस, इसी सवाल का जवाब ढूंढ़ना है। इसी सवाल के जवाब में पूरी कहानी छुपी है। शीर्ष नेता जो कहेगा, वही सच है, शीर्ष नेतृत्व जो करेगा, वही ठीक है, इस धारणा से निकलना होगा। एक वक्त विशेष में किसी व्यक्ति ने बहुत महान काम किया है, लेकिन अगर बाद में वह रास्ते से भटक जाता है, तो उससे सवाल पूछा जाना चाहिए। उस पर सवाल उठाया जाना चाहिए। महानता की कसौटी यह है कि व्यक्ति आजीवन अपने सिद्धांतों से न डिगे। अंबेडकरवादी समाज को यह समझना होगा।

आखिर में जिस मार्च महीने में यूपी चुनाव के नतीजे आए हैं, वह महीना मान्यवर कांशीराम की जयंती का महीना होता है। बसपा का शीर्ष नेतृत्व पार्टी के संस्थापक मान्यर कांशीराम की जयंती पर उन्हें उपहार तो न दे सका, अच्छा हो कम से कम वह शपथ ले कि मान्यवर के देश का हुक्मरान बनने के सपने को वह मरने नहीं देगा।

आरएसएस काे मुंहतोड़ जवाब हैं ये पांच किताबें

ये पांच किताबें, जो आरएसएस की विचारधारा ( हिंदूवादी) के महल को पूरी तरह ध्वस्त कर सकती हैं-

1- गुलामगिरी- जोतिराव फुले

 2- जाति का विनाश- डॉ. आंबेडकर

 3- सच्ची रामायण- ई. वी. रामासामी पेरियार

 4- हिंदू धर्म की पहेलियां- डॉ. आंबेडकर

 5- हिंदू संस्कृति और स्त्री- आ. हा. सालुंखे

आरएसएस की विचारधारा को पूरी तरह ध्वस्त किए बिना समता, स्वतंत्रता और भाईचारे पर आधारित भारत को न बचाया ( जिनता भी है, जैसा भी है)  जा सकता है और न बनाया जा सकता है।

आरएसएस की विचारधारा हिंदू धर्म- दर्शन ( वेद, पुराण, स्मृतियां, वाल्मीकि रामायण और गीता जिसका आधार हैं), ईश्वर के विभिन्न अवतारों और हिंदू धर्म के धार्मिक सांस्कृतिक नायकों ( मूलत: दशरथ पुत्र राम), वर्ण-जाति व्यवस्था और जातिवादी पितृसत्ता के आदर्शों-मूल्यों  पर टिकी हुई है।

ये पांच किताबें आरएसएस की विचाराधारा की धज्जियां उड़ा देती हैं और आसएसएस को पराजित करने के लिए सबसे कारगर हथियार हैं।

जहां  जोतिराव फुले की गुलामगिरी विष्णु के विभिन्न अवतारों के निकृष्ट और ब्राह्मणवादी चरित्र को विस्तार से उजागर करती है। इसमें विष्णु के एक अवतार परशुराम का हिंसक और घिनौना चरित्र भी शामिल हैं।

दशरथ पुत्र राम आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सबसे बड़े महानायक हैं। उनके नाम पर चलाए गए राम मंदिर आंदोलन ने आरएसएस-भाजपा को भारतीय समाज और राजसत्ता पर वर्चस्व कायम करने का अवसर मुहैया कराया। आज जै श्रीराम नारा का हिंदुत्व की राजनीति का सबसे मुख्य नारा है।

पेरियार की सच्ची रामायण और  आंबेडकर की किताब हिंदू धर्म की पहेलियां दशरथ पुत्र राम का चरित्र  कितना निकृष्ट था, इसको वाल्मीकि रामायण के तथ्यों के आधार ही उजागर कर देती हैं। राम किसी तरह से आदर्श और अनुकरणीय चरित्र नहीं हैं पेरियार ने सच्ची रामायण में और आंबेडकर ने हिंदू धर्म की पहेलियां ( राम की पहेली) में तथ्यों और तर्कों के साथ यह साबित कर दिया है।

ब्रह्मा, विष्णु और महेश ( त्रिदेव) हिंदू धर्म की त्रिमूर्ति हैं। इन्हीं पर हिंदू धर्म टिका हुआ है। आंबेडकर ने हिंदू धर्म की पहेलियां ( त्रिमूर्ति की पहेली) में इनके  असली चरित्र को हिंदू पौराणिक ग्रंथों के आधार पर चित्रित किया। जिसमें इन्हें सती अनसूया के साथ सामूहिक बलात्कार का अपराधी भी ठहराया गया है।

हिंदू धर्म की देवियों की असली चरित्र को भी डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्म की पहेलियों में उजागर किया है।

वेद, पुराण,  वाल्मीकि रामायण और गीता हिंदू धर्म के आधार ग्रंथ हैं। इनकी इन ग्रंथो की असल हकीकत क्या है? डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्म की पहेलियों में उजागर किया है।

वर्ण-जाति व्यवस्था हिंदू धर्म का प्राण है। डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब जाति के विनाश में वर्ण-जाति व्यवस्था के पक्ष में वेदों से लेकर आधुनिक युग में दयाननंद सरस्वती और गांधी द्वारा दिए तर्कों की धज्जियां उड़ा दी है और बताया है कि वर्ण-जाति व्यवस्था मानव इतिहास की सबसे निकृष्ट व्यवस्था थी और है। इसी किताब में डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्मग्रंथों के मनुष्य विरोधी चरित्र को भी उजागर किया है और हिंदू धर्म ग्रंथों को डायनामाइट से उड़ा देने जोरदार पैरवी की है।

हिंदू धर्म महिलाओं को भी शूद्रों की श्रेणी में रखता है। वेदों- स्मृतियो से लेकर महाभारत और वाल्मीकि रामायण तक हिंदू धर्म  महिलाओं के प्रति कितनी घिनौनी राय रखता है और कितना क्रूर है। और महिलाओं पुरूषों की दासी बनाए रखने के लिए क्या-क्या प्रावधान करता है। इसको विस्तार से उजागर आ. ह. सालुंखे ने अपनी किताब हिंदू संस्कृति और स्त्री में किया है।

इन पांच किताबों में से चार किताबों को अन्तर्वस्तु और साज-सज्जा दोनों मामलों में सबसे बेहतर तरीके से फारवर्ड प्रेस ने हिंदी प्रकाशित किया है। पांचवी किताब संवाद प्रकाशन ( आलोक श्रीवास्तव) ने प्रकाशित की है।

इन किताबों को आरएसएस-भाजपा को चुनौती देने की चाहत रखने वाले उदारवादी, वामपंथी और बहुजन-दलित आंदोलन के लोग क्यों कारगर तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। इस विषय पर फिर कभी।

(डॉ. सिद्धार्थ के फेसबुक से साभार)

यूपी में जब फिर हुए पेपर लीक तब मायावती-अखिलेश ने योगी से पूछे सवाल

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एक बार फिर उत्तर प्रदेश में परीक्षा के पेपर लीक हुए हैं। 30 मार्च को यूपी बोर्ड द्वारा इंटर की परीक्षा के दौरान अंग्रेजी विषय का पेपर लीक हो गया। इसके बाद यूपी बोर्ड को सूबे के 24 जिलों में परीक्षा रद्द करनी पड़ी है। इस मामले में राज्य के दो बड़े नेताओं बसपा प्रमुख मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया है।

बताते चलें कि यह पहला मौका नहीं है जब सूबे में परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं। इन परीक्षाओं में यूपी बोर्ड के द्वारा ली जानेवाली परीक्षाओं के अलावा यूपीपपीएससी की परीक्षाएं भी शामिल हैं। पेपर लीक होने के कारण परीक्षार्थियों को परेशानी झेलनी पड़ती है।

इस मामले में बुधवार को बसपा प्रमुख मायावती ने अपने बयान में कहा है कि “यूपी बोर्ड परीक्षाओं में पेपर लीक होने का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। आज दोपहर इण्टर की अंग्रेजी विषय की परीक्षा होने से पहले पेपर लीक होने के बाद गोरखपुर व वाराणसी सहित प्रदेश के 24 जिलों में परीक्षा रद्द करनी पड़ी है। छात्रों के जीवन से बार-बार ऐसा खिलवाड़ क्या उचित?”

बसपा प्रमुख ने आगे कहा कि “उत्तर प्रदेश में बार-बार पेपर लीक होने से ऐसा लगता है कि नकल माफिया सरकार की पकड़ व सख्ती से बाहर हैं, किन्तु इस प्रकार की गंभीर घटनाओं से प्रदेश की पूरे देश में होने वाली बदनामी आदि के लिए असली कसूरवार व जवाबदेह कौन?”

बसपा प्रमुख ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की माँग की है। वहीं सपा प्रमुख और विपक्ष के नेता अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर वार करते हुए कहा है कि “उप्र भाजपा सरकार की दूसरी पारी में भी पेपर लीक करवाने का व्यवसाय बदस्तूर जारी है। युवा कह रहे हैं कि रोज़गार देने में नाकाम भाजपा सरकार जानबूझकर किसी परीक्षा को पूर्ण नहीं होने देना चाहती है।”

अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर तंज कसते हुए कहा है कि भाजपा सरकार अपने इन पेपर माफ़ियाओं पर दिखाने के लिए सही, काग़ज़ का ही बुलडोज़र चलवा दे।

कहां गया बसपा से छिटका वोट?

उत्तर प्रदेश में जब से 2022 के विधानसभा चुनावों का परिणाम आया है तब से मुख्यधारा का मीडिया, यूट्यूब मीडिया, और उसमें बैठे हुए तथाकथित बुद्धिजीवी- सोशलिस्ट बुद्धिजीवी, प्रगतिशील बुद्धिजीवी, और यहां तक अमेरिका में बैठे बुद्धिजीवी (जिन्होंने तो भारत की जमी पर कदम तक नहीं रखा और केवल फोन से वार्ता कर अपनी मन:स्थिति को निर्मित किया) एक सुर में कहते हुए जरा भी लज्जित नहीं होते की बहुजन समाज पार्टी ने अपना वोट बीजेपी को ट्रांसफर करा दिया और इसलिए भाजपा की जीत हुई है। कुछ तथाकथित राजनैतिक जानकर यहां तक कह रहे हैं कि बसपा ने जानबूझकर ऐसे प्रत्याशी खड़े किए जिससे कि समाजवादी पार्टी को नुकसान हुआ अन्यथा वह पूर्ण बहुमत में आ जाती। यद्यपि यही बात गोवा में ममता बनर्जी के लिए नहीं कही जा रही है जबकि ममता बनर्जी के खिलाफ हमारे पास तथ्यात्मक आंकड़े हैं, जिनसे यह बात प्रमाणित होती है कि उनकी वजह से कांग्रेस सीधे-सीधे हारी है और भाजपा ने अपनी सरकार बना ली है। 

सभी जानते हैं कि ममता बनर्जी ने गोवा में पहली बार चुनाव लड़ कर 5.2 प्रतिशत वोट लिया था।  ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 4 सीटों- बिनौलिम, नवेलिम, पोरवोरिम और तिविम सीटों पर कांग्रेस को सीधे-सीधे नुकसान पहुंचा कर बीजेपी की सरकार बनवा दी। लेकिन उससे कोई भी प्रश्न नहीं पूछ रहा है कि आपने गोवा जा कर चुनाव क्यों नहीं लड़ा? ना ही कोई अनर्गल प्रलाप कर रहा है कि ममता बनर्जी भाजपा की बी टीम है? यह जाति पक्षपात का रवैय्या है। चूँकि ममता बनर्जी सवर्ण/ब्राह्मण है उस पर कोई नकारात्मक आरोप नहीं लगाया जायेगा। 

अब हम आते हैं कि बसपा का वोट वास्तविकता में किस पार्टी को गया। भारतीय चुनाव आयोग नई दिल्ली द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश के 2022 के विधान सभा के चुनावों में भाजपा को 3 करोड़ 80 लाख 51721 वोट मिले अर्थात 2017 में हुए विधान सभा चुनावों की तुलना में उसके 36 लाख, 48 हजार, 242 वोट बढे। परंतु कांग्रेस को 2022 में केवल 21 लाख 51 हजार 234 वोट मिले हैं। यद्यपि उसे 2017 में 54 लाख 16 हजार 2 सौ चालीस वोट मिले थे। इसका मतलब यह हुआ कि 2017 की तुलना में कांग्रेस को 32 लाख 65 हजार 306 वोट कम मिले। इसी कड़ी में शिवसेना ने 2017 में उत्तर प्रदेश के चुनाव लड़े थे और उसे 88,595 वोट मिले थे। परंतु शिवसेना ने 2022 में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। अब आप ही कल्पना कीजिए कि कांग्रेस और शिवसेना का वोट कहां स्थानांतरित हुआ होगा? मेरा आंकलन है कि यह वोट सीधे-सीधे भाजपा तरफ गया है, क्योंकि सवर्ण समाज बीजेपी का प्राकृतिक सहयोगी माना जाता है, और शिवसेना ने तो उसके साथ हमेशा गठबंधन किया है। इसलिए यह तोहमत/ आरोप लगाना कि बहुजन समाज पार्टी का वोट और वह भी दलित वोट भाजपा की तरफ चला गया है झूठ एवं मिथ्या से ज्यादा और कुछ नहीं है। 

तालिका-1 : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 2017 एवं 2022 विभिन्न दलों को प्राप्त वोटों का तुलनात्मक अध्ययन           

स्रोत: भारतीय चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित आंकड़े

1 राजनैतिक दल / नोटा 2022 वोटो की संख्या 2017 वोटो की संख्या वोटो की संख्या 22और 17 में अंतर
2 भारतीय जनता पार्टी 38051721 34403299 +3648422
3 समाजवादी पार्टी 29543934 18923769 +10262594
4 बहुजन समाज पार्टी 11873137 19281340 – 7408202
5 कांग्रेस पार्टी 2151234 5416540 – 3265306
6 आर एल  डी 2630168 1545811 + 1084357
7 AIMIM 450929 204142 + 246777
8 शिव सेना चुनाव नहीं लड़ा 88595 यह वोट सीधेसीधे भाजपा को ही गया होगा ऐसा
8 निर्दलीय उम्मीदवार 6213262 2229453 + 4083809
9 नोटा 637304 757643 + 120339

“बसपा ने अपना वोट भाजपा को स्थानांतरित करा दिया और इसकी वजह से भाजपा की जीत हुई” एक बार फिर यह नकारात्मक कथानक बहुजन समाज पार्टी के खिलाफ गढ़ना सवर्ण मानसिकता के तथाकथित बुद्धिजीवियों की एक सोची-समझी रणनीति लगती है। यह जातिवादी मानसिकता से ज्यादा कुछ नहीं लगती। क्योंकि वंचित, शोषित, गरीबी रेखा के नीचे ग्रामीण अंचल में रहने वालों के राजनीतिक दल को बिना ठोस प्रमाण के आधार पर लांछित करना जातिवाद नहीं तो और क्या कहलायेगा? दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि दलित समाज के लोग 5 किलो आनाज पर बिक गए और उन्होंने अपना वोट भाजपा को दे दिया। इस तथ्य में विरोधाभास निहित है। एक ओर तो कह रहे हैं कि बसपा की सुप्रीमो ने बसपा का वोट ट्रांसफर करा दिया और दूसरी तरफ वे ही लोग कह रहे हैं कि बसपा के गरीब और दलित समाज के लोगों ने 5 किलो अन्न की लालच में अपना वोट भाजापा को दे दिया। अगर दलितों ने 5 किलो आनाज की लालच में अपना वोट दे दिया तो फिर बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो ने अपने वोट को भाजपा की तरफ कैसे ट्रांसफर कर दिया? यह बात कैसे प्रमाणित की जाएगी। दूसरी तरफ यह बात भी सत्य है कि दलितों को यह कहते सुना गया कि उनके पास अभी तक कोई भी सरकारी योजना का लाभ नहीं पहुंचा। साथ ही साथ उन्हें यह भी कहते हुए सुना गया कि मोदी और योगी जो राशन दे रहे हैं वह हमारे ऊपर एहसान नहीं कर रहे हैं। लेकिन हां अगर उनको कुछ मिला भी है तो मिलने के बाद भी वोट अपना बसपा को ही देंगे। इससे यह बात प्रमाणित हो जाती है कि बहुजन समाज पार्टी का वोट जो कि एक वैचारिक वोट है, वह किसी भी लालच में भाजपा में नहीं गया है। क्योंकि बसपा का कैडर वोट, एक विचारधारा के साथ भी जुड़ा है, और विचारधारा… खासकर अंबेडकरी विचारधारा से जुड़ा कोई व्यक्ति भाजपा को वोट बिल्कुल नहीं कर सकता, इसके कई प्रमाण सामने आ चुके हैं।

अब आते हैं कि अगर बसपा का वोट भाजपा में नहीं गया तो क्या वह वोट सपा और रालोद के गठबंधन को गया है? 2022 में समाजवादी पार्टी को 29543934 (दो करोड़ पंचानवे लाख तैतालिस हजार नौ सौ चौतीस) वोट मिले यद्यपि उसे 2017 में मात्र 18923769 (एक करोड़  नवासी  लाख तेईस हजार सात सौ उनहत्तर) वोट ही मिले थे । इसका मतलब यह हुआ कि सपा को 2017 की तुलना में 2022 में 10262594 (एक करोड़ छब्बीस लाख दो हजार पांच सौ चौरान्नवे) वोट ज्यादा मिले। इसी कड़ी में रालोद जिसका सपा से गठबंधन था उसको 2022 में 2630168 (छब्बीस लाख तीस हजार एक सौ अठसठ ) वोट मिले जबकि उसे 2017 में मात्र 1545811 (पंद्रह लाख पैतालीस हजार आठ सौ ग्यारह) वोट मिले थे जोकि 2017 की तुलना में 1084357 (दस लाख चौरासी हजार तीन सौ सत्तावन) वोट ज्यादा है। इसी प्रकार एआईएमआईएम (AIMIM) को 2022 में 450929 वोट मिले जबकि उसे 2017 में केवल 204142 वोट मिले थे। इसका मतलब यह हुआ कि उसे भी 2022 में 2017 की तुलना में उसे 246777 वोटों का फायदा हुआ। अब प्रश्न उठता है कि सपा, आरएलडी, एवं एआईएमआईएम के वोटों में इजाफा/ बढ़ोत्तरी कहां से हुई। 

इसी संदर्भ में यहां यह तथ्य रेखांकित करना अति आवश्यक है कि बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश के 2022 के चुनाव में केवल 11873117 (एक करोड़ अट्ठारह लाख तिहत्तर हजार एक सौ सैंतीस) वोट मिले जबकि 2017 में उसे 19281340 (एक करोड़ बानववे लाख इक्क्यासी हजार तीन सौ चालीस) मिले थे। इसका तात्पर्य यह हुआ कि 2017 की तुलना में 2022 में उसके वोटों में 7406203 (चौहत्तर लाख आठ हजार दो सौ तीन) वोटों की कमी आई। प्रश्न उठता है कि यह वोट किस पार्टी को गए होंगे? एक तथ्य जो सामने आया है वह यह है कि 2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समाज ने एकमुश्त संगठित होकर केवल और केवल समाजवादी पार्टी और रालोद के गठबंधन को वोट किया। इसका मतलब यह हुआ कि बहुजन समाज पार्टी के जितने भी मुस्लिम मतदाता थे उन्होंने सपा और रालोद के गठबंधन को अपना वोट शिफ्ट करा दिया। बहुत से रिजर्व सीट के अंदर दलितों को यह कहते सुना गया है कि क्योंकि बहुजन समाज पार्टी अकेले चुनाव लड़ रही है और रिजर्व सीट पर केवल और केवल दलित समाज भाजपा के विरुद्ध जीत नहीं पाएगा इसलिए वह इस बार सपा एवं रालोद के गठबंधन को सपोर्ट करेंगे। और इस कारण भी मुस्लिमों के साथ दलितों ने भी कई सीटों पर अपना वोट सपा और रालोद के गठबंधन को ट्रांसफर कर दिया। बसपा से छिटके और सपा से नाराज मुस्लिम समाज ने अपना वोट बसपा के बजाय एआईएमआईएम को भी दे दिया। क्योंकि साफ है कि एआईएमआईएम को इस चुनाव में गैर मुस्लिमों का वोट तो नहीं ही मिला होगा।

एक दूसरा प्रश्न उठता है कि ओबीसी और सवर्ण समाज का वोट बहुजन समाज पार्टी को क्यों नहीं मिला? इसका उत्तर भी साफ है कि जब मीडिया ने उत्तर प्रदेश में इस भ्रांति को फैला दिया कि मुकाबला केवल भारतीय जनता पार्टी एवं समाजवादी पार्टी में है तो उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो गया। मीडिया ने इतना अधिक प्रचार कर दिया कि जैसे अब सपा जितने ही वाली हैं क्योंकि मुस्लिम उसकी तरफ एकमुश्त होकर वोट कर रहे हैं। इससे प्रेरित होकर भाजपा की नीतियों से सहमति नहीं रखने वाले सवर्ण समाज एवं ओबीसी ने सोचा कि बसपा अब तो जीतने वाली है नहीं, इसलिए क्यों ना हम भाजपा को हराने के लिए सपा को ही वोट डाल दें। और इसलिए बहुजन समाज पार्टी का सवर्ण एवं ओबीसी वोट भी सपा को ट्रांसफर हो गया। 

अब बसपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि क्या 2024 में वह अपने खोए हुए आधार को प्राप्त कर सकती है या नहीं? बसपा का इन चुनौतियों से उबरना केवल दलित, ओबीसी, एवं अल्पसंख्यकों के लिए ही नहीं आवश्यक है बल्कि यह पूरे लोकतंत्र के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। याद कीजिए जब 2007 में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी तो लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस को 22 सीटें मिली थी और उसने केंद्र में सरकार बनाई थी। परंतु जब सपा की सरकार 2012 में आई तो 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 74 सीटें प्राप्त कर केंद्र में सरकार बना ली, इसका मतलब यह हुआ कि बसपा की सरकार भाजपा की प्रगति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। जितनी जल्दी यह तथ्य समझ ले उतना ही अच्छा।