कांग्रेस पार्टी ने मुंबई के धारावी विधानसभा सीट से चार बार की विधायक प्रोफेसर वर्षा एकनाथ गायकवाड़ को मुंबई कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया है। महाराष्ट्र सरकार में वह स्कूल एजुकेशन मिनिस्टर रह चुकी हैं। आगामी निकाय चुनाव और लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी के इस फैसले से प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई है। वर्षा पहली ऐसी महिला नेता हैं, जिसे कांग्रेस पार्टी ने यह पद दिया है।
वर्षा गायकवाड़ अंबेडकरवादी मूवमेंट से जुड़ी नेता हैं। वह सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ आर्ट्स में लेक्चरर हैं और उनके पास बीएड और मैथमेटिक्स की मास्टर डिग्री है। कांग्रेस के इस फैसले से साफ है कि कांग्रेस दलितों को पार्टी के भीतर ज्यादा तव्वजो देने की रणनीति पर काम कर रही है। मुंबई में काफी संख्या में अंबेडकरी-बुद्धिस्ट समाज के वोटर्स हैं, कांग्रेस पार्टी वर्षा के जरिये उन्हें जोड़ने का काम करेगी। वर्षा गायकवाड़ ने इसके लिए पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी को धन्यवाद दिया है। बता दें कि वर्षा के पिता एकनाथ गायकवाड़ भी साल 2017 से 2020 तक मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं।
I want to thank Congress President Shri @kharge ji , Smt. Sonia Gandhi ji, Shri @RahulGandhi ji, Smt. @priyankagandhi ji and the entire Congress parivar for making an ordinary Congress worker's daughter, a Dalit woman the president of the Mumbai Congress. This can only happen in…
— Prof. Varsha Eknath Gaikwad (@VarshaEGaikwad) June 9, 2023
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर भी दलित समाज की महिला को अध्यक्ष बनाने से साफ है कि कांग्रेस पार्टी तमाम राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर दलित मतदाताओं को केंद्र में रखने की रणनीति पर काम कर रही है। साथ ही वह देश भर के दलित मतदाताओं को भी मैसेज देना चाहती है कि कांग्रेस पार्टी दलित समाज के मतदाताओं को पार्टी में प्रतिनिधित्व देने के लिए तैयार हैं। वर्षा गायकवाड़ दलित वर्ग से होने के साथ-साथ एक पढ़ी-लिखी महिला भी हैं। वर्षा सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहती हैं और ट्विटर पर उनके करीब पांच लाख फॉलोवर हैं।
यानी साफ दिख रहा है कि कांग्रेस पार्टी चुनावों को लेकर अपनी रणनीति कैसे काफी सोच-समझ कर बना रही है। संभव है कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी इसी तरह का कोई फैसला लेकर सबको चौंका भी सकती है।
भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर शिकंजा कस गया है। इस मामले में एक अंतरराष्ट्रीय कुश्ती रेफरी जगबीर सिंह समेत चार लोगों के बृज भूषण सिंह के खिलाफ गवाही के बाद बृजभूषण बुरी तरह घिर गए हैं। तो दूसरी ओर महिला पहलवानों के समर्थन में लगातार आम लोगों और खाप की गुटबंदी के बाद अब सरकार भी बृजभूषण के पीछे से हाथ खिंचती दिख रही है। यही वजह है कि दिल्ली पुलिस और एसआईटी ने बृजभूषण के खिलाफ जांच में तेजी कर दी है।
इस मामले में एसआईटी ने 200 से ज्यादा लोगों से सवाल-जवाब किया है। जिसमें रोज नई बातें निकल कर सामने आ रही हैं। इंटरनेशनल रेफरी जगबीर सिंह ने बृजभूषण का महिला पहलवानों के साथ गलत व्यवहार के मामले में भी गवाही दी है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि बृजभूषण ने नशे की हालत में महिला पहलवान के साथ अभद्र व्यवहार किया था।उस दिन कुछ तो गलत हुआ था। बृजभूषण और महिला पहलवान बगल में खड़े थे। वह असहज दिख रही थी। उसने धक्का भी दिया। कुछ बोली और फिर वहां से निकल गई। बृजभूषण पहलवानों को हाथ से छूकर बोल रहे थे कि इधर आ जा, यहां खड़ी हो जा।
इंटरनेशनल रेफरी जगबीर सिंह के मुताबिक, ‘उन्होंने पहली बार 2013 में बृजभूषण को महिला खिलाड़ियों के साथ गलत व्यवहार करते देखा था।‘ जगबीर के मुताबिक, ‘ये थाइलैंड का टूर था, जहां उन्होंने बृजभूषण को महिला के पीछे खड़े देखा। बृजभूषण ने महिला पहलवान को अभद्र तरीके से छुआ था।‘
जगबीर सिंह के अलावा एक राज्य स्तरीय कोच और कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक विजेता रेसलर ने भी बृजभूषण के खिलाफ बयान दिया है। इन लोगों ने तीन महिला पहलवानों के आरोपों की पुष्टि की है।
इन तमाम आरोपों के बाद दिल्ली पुलिस द्वारा क्राइम सीन रिक्रिएट करने के लिए महिला पहलवान संगीता फोगाट को लेकर भारतीय कुश्ती महासंघ के दफ्तर और बृजभूषण सिंह के घर पहुंचने की खबर है। बता दें कि बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ छह महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई है। इस मामले में पुलिस की जांच लगभग पूरी हो गई है। और 15 जून को पुलिस अपनी रिपोर्ट जारी करेगी।
किसी भी स्वतंत्र देश की आवाम के गरिमामयी जीवन और विकास का मूल आधार उस देश का संविधान होता है। संविधान में वर्णित नियमावली से एक देश का कार्यान्वयन और संचालन होता है। दुनियाँ के विभिन्न देशों की भांति हमारे देश को भी चलाने वाला दस्तावेज ‘भारत का संविधान’ है। जो भले ही 2 वर्ष 11 माह 18 दिन मे बना, लेकिन असलियत में इस संविधान की नींव तब डल गई थी, जब भारतीय समाज ने ब्रिटिश दासता और सदियों से चले आ रहे शोषण, अपराध, गुलामी की मुखालफत का आगाज किया था। वहीं, ब्रिटिश दासता की चरम सीमा ने देश की आवाम को अपने प्राकृतिक अधिकारों और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए खड़ा कर दिया। ऐसे में, 1947 का वह वक्त भी आ गया, जब राष्ट्र आजाद हो गया। इसके उपरांत एक महान देश के निर्माण के लिए संविधान निर्मित किया गया। ऐसे में, सदियों से भारतीय समाज जिन स्वतंत्रता, समानता जैसे अन्य प्राकृतिक अधिकारों की मांग करता आ रहा था। उन प्राकृतिक अधिकारों को संविधान निर्माताओं ने, संविधान की प्रस्तावना में, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुता, व्यक्ति की गरिमा जैसे अन्य संवैधानिक मूल्यों के रूप में दर्ज किया। वहीं, भारतीय संविधान जब समग्रता से एक दस्तावेज़ के रूप में आया। तब सम्पूर्ण संविधान का मूल संविधान की प्रस्तावना में नजर आया। ऐसे में, संविधान निर्माता डॉ भीमराव आंबेडकर ने प्रस्तावना के बारे में कहा कि, ‘‘यह वास्तव में जीवन का एक तरीका था, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में पहचानता है और जिसे एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है,,
वास्तव में, संविधान में दर्ज, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुता, व्यक्ति की गरिमा जैसे अन्य संवैधानिक मूल्य हमारे जीवन जीने का आधार है। लेकिन, ध्यातव्य है कि, आजाद भारत के 75 वर्ष बाद हम संवैधानिक मूल्यों को कितना स्वीकार पाए? और संवैधानिक मूल्यों के प्रति कितनी जागरूकता कर पाए? शायद! अपरिहार्यता से कम।
आज के दौर में विकास की चमक काफी गहरने के बाद भी हमें देश में, ये सुनने और देखने मिलता है कि, किसी दलित की शादी समारोह में घोड़ी पर रास नहीं फेरने दी जाती। ऐसी स्थिति में, कई बार तो तगड़ी मार-धाड़ भी हो जाती है। जिससे लोगों के न्याय और बंधुता जैसे संवैधानिक मूल्यों पर संकट पैदा होता है।
संवैधानिक मूल्यों के हनन को लेकर कुछ ऐसे ही अनुभव हमने सागर जिले के वंचित समुदाय के लोगों से जानने की कोशिश की।
तब अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले सागर के मकुंदी बंसल बताते है कि, हम आजाद जरूर हो गए है, लेकिन हमारे साथ गाँव में ऊंची जाति वाले ऐसे पेशाते की हमने लगता है की हम गुलाम की जंजीरों में जकड़े है। वह हमारे दूल्हे को घोड़े पर नहीं बैठने देते, अच्छे कपड़े पहनने पर, ऊंची जाति वालों से राम-राम ना करने पर, उनके सामने जमीन पर ना बैठने पर ऊंची जाति वाले खफा हो जाते है। सामाजिक नियमों को नहीं मानने पर हमें गालियां सुननी पड़ती है। यहाँ सोचनीय है कि, मकुंदी जैसे लोगों के व्यक्ति की गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता है?
फिर, बंडा विधानसभा क्षेत्र के बिहारी आदिवासी जो मुहजुबानी ऐसे पेश करते हैं, “अपने आप को ऊंचा समझने वाले लोगों के यहाँ, समारोह जब हम लोग कहना खाने जाते है तब हमें आदरपूर्वक खाना नहीं खिलाया जाता। हमारे साथ बंधुतापूर्ण व्योहार नहीं किया जाता।,,
वहीं, “जब बड़े लोग हमें मजदूरी पर बुलाते हैं और हमारी जाने की इच्छा नहीं होती तो हमें गालियां सुननी पड़ती है। ऐसे में, कभी-कभी तो हमें मार भी पड़ जाती है।,, क्या यहाँ सामाजिक न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य का उल्लंघन नहीं होता?
आगे हमने अरबिन्द बंसल से बातचीत की। तब वे कहते हैं कि, सामाजिक असमानताएँ ग्रामीण अंचलों में इस तरह हावी है कि, सेन समाज का नाई अनुसूचित जाति के लोगों के सिर के बाल नहीं काटता। ऐसे हम लोग बंडा तहसील में सिर के बाल कटवाने जाते है। याकि स्वयं घर पर अपने सिर के बाल काटते है। पूछने पर अरबिन्द बताते है कि, नाई हमारे बाल इसलिए नहीं काटता, क्योंकि नाई के ऊपर ऊंची जाति के लोगों का दबाब रहता है। अनुसूचित जाति के लोगों के बाल काटने पर ऊंची समाज नाई और अनुसूचित जाति के लोगों पर सामाजिक प्रतिबंध लाद देता है। अनुसूचित जाति के लोगों के सिर के बाल ना काटने के हालात बंडा क्षेत्र के कई गाँव में बनी हुए है। अरबिन्द की मुहजुबनी यह याद दिलाती है की हम समानता जैसे संवैधानिक मूल्य का कब पालन करेंगे?
आगे हमारी मुलाकात बरा गाँव की राजकुमारी बाल्मीकि से हुयी। राजकुमारी प्रधानमंत्री आवास योजना होने बाद भी कच्चे मकान में रहने को मजबूर है। राजकुमारी हमें बताती हैं कि, “गाँव में हम नीची जाति है, इसलिए हमें कोई अच्छा रोजगार नहीं देता। आज भी हमारा रोजगार सड़क पर झाड़ू लगाना, टोकरी बनाना, छोटे-छोटे घरेलू समान बनाने तक सीमित है। यदि हम बाजार में खान-पान कि, कोई अच्छी दुकान खोलते है तब हमारा सामाजिक बहिष्कार किया जाता है।,,
आगे हम रूबरू होते हैं करेवना गाँव के शालकराम चौधरी से। वह कहते है कि, हमारे गाँव में हम नीची जाति वालों को चाय की टपरी पर चाय तक पीने नहीं देते है, ना ही बैठने देते है। आज भी आजाद भारत में समाज में बराबरी का हक नहीं है।
हमारे सामने सागर संभाग के छतरपुर जिले से एक ताज़ा घटना भी सामने आयी। यह घटना एक दलित की घोड़े से राज फेरने के दौरान ऊंची जाति के लोगों द्वारा पत्थर मारने की है। दरअसल, शादी समारोह में दलित दूल्हे की राज पुलिस की अगुआई में फेरी जा रही थी। लेकिन ऊंची जाति के लोगों को यह पसंद नहीं आया। ऐसे में उन्होंने शादी वाले पक्ष पर पथराव कर दिया, जिसमें तीन पुलिस वाले घायल हो गए। पुलिस ने मामले को अपने संज्ञान में लिया है। ऐसी घटनाएं क्या इस ओर संकेत नहीं करती कि, लोगों का स्वतंत्रता जैसा संवैधानिक मूल्य खतरे में है?
विचारणीय है कि, एक तरफ हमारे संविधान के स्वतंत्रता, समानता, न्याय जैसे विभिन्न संवैधानिक मूल्य है, जो लोगों को कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनाकर, उनके अधिकारों और कर्तव्यों के संरक्षण का बोध कराते हैं। वहीं, दूसरी ओर वे सामाजिक मूल्य हैं, जो इंसान को इंसान बनने में रोड़ा उत्पन्न करते हैं। जैसे, जातिवाद, छुआछूत, सामाजिक भेदभाव, कुप्रथाएं गैर जरूरी परंम्पराएं और रीतिरिवाज जैसे अन्य समाजिक मूल्य। बसुधैव कुटुबंकम की भावना का संचार करना है, तब हमें स्वतंत्रता, समानता, न्याय जैसे अन्य संवैधानिक मूल्यों की दृढ़ता बढ़ावा देना होगा, तब कई मायनों में देश समाजिक, आर्थिक शैक्षणिक अन्य विकास की ओर अग्रसर हो पायेगा।
जून के पहले हफ्ते में महाराष्ट्र के नांदेड़ से खबर आई थी कि बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर जयंती मनाने के कारण 24 साल के दलित युवक की हत्या कर दी गई। अभी दलित समाज इस दर्द से उबरा भी नहीं था कि गुजरात के पाटन जिले में दलित समाज के एक बच्चे ने गेंद छू लिया तो उसके बाद शुरु हुए विवाद में बच्चे के परिवार के साथ न सिर्फ मारपीट की गई, बल्कि चाचा का अंगूठा काट लिया। एक मामूली बात को लेकर मारपीट और अंगूठा काटने की यह घटना रविवार 4 जून की है।
दरअसल गुजरात के पाटन जिले मे कुछ युवक क्रिकेट खेल रहे थे। बाल बच्चे के पास गई तो बच्चे ने गेंद को उठा लिया। इत्तेफाक से लड़का दलित समाज से ताल्लुक रखता था। इसके बाद क्रिकेट खेल रहे जातिवादी समाज के गुंडे युवक भड़क गए और उसको गालियां देने लगे और जमकर उत्पात मचाया। बच्चे के चाचा धीरज परमार ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई तो मामला शांत हो गया। लेकिन इसके बाद क्रिकेट खेलने वाले जातिवादी युवाओं का समूह हथियारों से लैस होकर बच्चे के घर पहुंच गए और बॉल उठाने वाले बच्चे के चाचा धीरज परमार और उनके भाई कीर्ति पर हमला कर दिया। मारपीट करने के अलावा इन लोगों ने चाचा धीरज परमार का हाथ का अंगूठा काट दिया। इसके बाद दलित समाज के लोग इंसाफ के लिए सड़कों पर उतर गए।
सोचता हूँ की दलितों पर बिना वजह या मामूली बात को लेकर अत्याचार करने वाले समाज के लोग अपने समाज के जातिवादी गुंडों की गुंडई पर शर्मिंदा होते होंगे क्या??
– अंबेडकर जयंती मनाने पर दलित युवक की हत्या। – बॉल छू लेने पर बच्चे के चाचा का अंगूठा काटा।
इसके बाद आरोपियों पर आईपीसी की धारा 326 (खतरनाक हथियारों से जानबूझ कर चोट पहुंचाना), 506 (आपराधिक धमकी) और एससी-एसटी एक्ट में मामला दर्ज कर लिया गया है। लेकिन एक बड़ा सवाल यह कि इतनी छोटी घटनाओं के बाद दलित समाज पर इस तरह से अत्याचार करने की वजह क्या है? दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने ट्विटर पर इस मुद्दे को पोस्ट किया है, जिसमें उनका कहना है कि सवाल यह भी है कि दलितों पर बिना वजह या मामूली बात को लेकर अत्याचार करने वाले समाज के लोग अपने समाज के जातिवादी गुंडों की गुंडई पर शर्मिंदा होते होंगे क्या??
भारत देश और हर भारतीय के लिए गर्व की खबर सामने आई है। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सुरीनाम देश के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया गया है। राष्ट्रपति मुर्मू को “ग्रैंड आर्डर ऑफ द चेन ऑफ द यलो स्टार” सम्मान से सम्मानित किया गया है। इसकी जानकारी राष्ट्रपति भवन ने ट्विटर के जरिये दी। इस खबर के सामने आने के बाद हर कोई इसे गौरव का पल बता रहा है।
वहीं दूसरी ओर इस सम्मान के मिलने पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि यह सम्मान सिर्फ मेरे लिए नहीं, बल्कि भारत के उन सभी 1.4 अरब लोगों के लिए भी अत्यधिक महत्व रखती है जिनका मैं प्रतिनिधित्व करता हूं। राष्ट्रपति मुर्मू ने यह सम्मान भारतीय-सूरीनाम समुदाय की आने वाली पीढ़ियों को समर्पित करते हुए कहा कि उन्होंने हमारे दोनों देशों के बीच भ्रातृत्व संबंधों को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राष्ट्रपति जी ने कहा कि सूरीनाम में भारतीय आगमन की 150वीं वर्षगांठ के ऐतिहासिक मौके पर यह सम्मान प्राप्त करना इसे और विशेष बनाता है। अगर यह सम्मान हमारे दोनों देशों में महिलाओं के सशक्तिकरण और प्रोत्साहन के प्रकाश स्तंभ के रूप में काम करता है तो यह और भी सार्थक हो जाता है।
इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सूरीनाम में मामा शरणन स्मारक पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। यह स्मारक मामा सरनन, या मदर सूरीनाम का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें उनके पांच बच्चे हैं, पांच जातीयताएं जो सूरीनाम में देखभाल और स्नेह के साथ निवास करती हैं। यह स्मारक सूरीनाम में कदम रखने वाले पहले भारतीय पुरुष और महिला का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व था। इस मौके पर सूरीनाम पहुंचे 34,000 भारतीयों के बलिदान और संघर्ष को भी याद किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सूरीनाम में भारतीयों के आगमन के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में डाक टिकटों के विशेष आवरण भेंट किए गए। जबकि राष्ट्रपति की ओर से सूरीनाम के राष्ट्रपति को सांकेतिक रूप से दवाओं का डिब्बा भेंट किया। दरअसल भारत ने सूरीनाम को आपातकालीन दवाओं से मदद की है। इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उम्मीद जताई कि आने वाले दिनों में भारतीय समुदाय और सुरीनाम के बीच संबंध और बेहतर होंगे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस दौरान सुरीनाम की जनता को भारत आने और उसके विकास को देखने के लिए आमंत्रित किया।
फिदेल कास्त्रो ने 1992 में कहा था, “एक महत्वपूर्ण जैविक प्रजाति– मानव जाति – के सामने अपने प्राकृतिक वास-स्थान के तीव्र और क्रमशः बढ़ते विनाश के कारण विलुप्त होने का खतरा है… मानव जाति के सामने आज एक अनिश्चित भविष्य मुंह बाये खड़ा है, जिसके बारे में यदि हम समय रहते ठोस और प्रभावी कदम उठाने में असफल रहते हैं, तो धनी और विकसित देशों की जनता भी, दुनिया की गरीब जनता के साथ मिलकर एक ही जमीन पर खड़ी, अपने अस्तित्व के खतरे और अंधकारमय भविष्य से जूझ रही होगी।”
फिदेल कास्त्रो (1992)
“अगर हम ऐसा नहीं करते ( अकूत मुनाफे की लालच और उपभोक्तावादी जीवन-शैली नहीं छोड़ते) तो संसार की सबसे अद्भुत रचना मानव जाति गायब हो जाएगी…इस धरती को मानवता की समाधि न बनायें, इसमें हम समर्थ हैं।आइए इस धरती को स्वर्ग बनाएं, जीवन का, शान्ति का स्वर्ग,सम्पूर्ण मानवता के लिए, शांति और भाईचारा के लिए । इसके लिए हमें अपनी स्वार्थपरता छोड़नी पड़ेगी।”
ह्यूगो शावेज ( 2009)
मानव सहित सभी प्रजातियों तथा स्वयं धरती का अस्तित्व खतरे में है। शायद ही कोई तथ्यों से अवगत व्यक्ति इससे इंकार करे। तमाम आनाकानी के बावजूद चीखते तथ्यों तथा भयावह प्राकृतिक आपदाओं एंव विध्वंसों ने दुनिया को तथ्य को स्वीकार करने के लिए इस कदर बाध्य कर दिया है कि वे इस हकीकत से इंकार न कर सके। इस स्थिति से निपटने के लिए, कई अंंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और संधि-समझौते हो चुके हैं। ये सम्मेलन या कार्य-योजनाएं दुनिया भर के पर्यावरणविदों तथा मनुष्य एवं धरती को प्यार करने वाले लोगों की उम्मीदों का केन्द्र रहे हैं, क्योंकि इस सम्मेलन की सफलता या असफलता पर ही मानव जाति के अस्तित्व का दारोमदार टिका हुआ था। इसी से यह तय होना था कि आने वाले वर्षों या सदियों में कौन से देश का अस्तित्व बचेगा या कौन सा देश समुद्र में समा जायेगा या किस देश का कितना हिस्सा समुद्र में डूब जायेगा, कितने देश या क्षेत्र ऐसे होगें, जिनका नामो-निशान ही नहीं बचेगा। कितनी प्रजातियां कब विलुप्त हो जाएंगी। मानव प्रजाति का अस्तित्व कितने दिनों तक कायम रहेगा। समुद्री तूफान,सुनामी या अतिशय बारिश किन क्षेत्रों को तबाह कर देगी, किस पैमाने पर जान-माल की क्षति होगी। कितने इलाके रेगिस्तान में बदल जाएंगे। बाढ़, सूखा या असमय बारिश कितने लोगों पर किस कदर कहर ढायेगी।
हमें प्रकृति के प्रति अपने नजरिये में बदलाव लाना होगा तथा उपभोक्तावादी जीवन शैली का परित्याग करना होगा। इसी चीज को रेखांकित करते हुए कोपनहेगन सम्मेलन(2009 में ह्यूगो शावेज ने कहा था कि अगर हम ऐसा नहीं करते तो संसार की सबसे अद्भुत रचना मानव जाति गायब हो जाएगी…इस धरती को मानवता की समाधि न बनायें, इसमें हम समर्थ हैं।आइए इस धरती को स्वर्ग बनाएं, जीवन का, शान्ति का स्वर्ग,सम्पूर्ण मानवता के लिए, शांति और भाईचारा के लिए । इसके लिए हमें अपनी स्वार्थपरता छोड़नी पड़ेगी। इसी बात को वर्षों पहले फिदेल कास्त्रो ने कहा था कि स्वार्थपरता बहुत हो चुकी। दुनिया पर वर्चस्व कायम करने के मंसूबे बहुत हुए। असंवेदनशीलता, गैरजिम्मेदारी और फरेब की हद हो चुकी। जिसे हमें बहुत पहले करना चाहिए था, उसे करने के लिए बहुत देर हो चुकी है। कोचाबाम्बा मसविदा दस्तावेज से शब्द उधार लेकर कहें तो एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना बेहद जरूरी है जो प्रकृति के साथ और मानवजाति के बीच आपसी तालमेल के लिए फिर से बहस करे।
बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने तीन लोगों को अपना गुरु माना था। ये थे, गौतम बुद्ध, कबीर और जोतिराव फुले को अपना गुरु माना। ये तीनों भारत के तीन युगों की सबसे क्रांतिकारी और प्रगतिशील वैचारिकी का प्रतिनिधित्व करते हैं और उसके मूर्त रूप हैं। जिसे बहुजन-श्रमण वैचारिकी कहते हैं। गौतम बुद्ध प्राचीन भारत, कबीर मध्यकालीन भारत और जोतिराव फुले आधुनिक भारत की सबसे मानवीय और उन्नत वैचारिकी के प्रतिनिधि हैं।
इन तीनों की संवेदना और वैचारिकी में वेदों और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के लिए कोई जगह नहीं। कबीर और जोतीराव फुले ने वेदों- ब्राह्मणों की श्रेष्ठता खुली चुनौती दी है और वर्ण-व्यवस्था को खारिज किया। इनमें कोई ब्राह्मण या द्विज नहीं था। जहां कबीर और जोतिराव फुले वर्ण-व्यवस्था के क्रम में कहे जाने वाले शूद्र समुदाय में जन्म लिए हैं। वहीं गौतम बुद्ध शाक्य कबीले में पैदा हुए थे। जिसमें वर्ण-व्यवस्था नहीं थी। वे न क्षत्रिय थे, न ब्राह्मण और न ही शूद्र।
ये तीनों उत्पादक-श्रमशील समाज में पैदा हुए थे। गौतम बुद्ध, कबीर और जोतीराव फुले को तीनों युगों के प्रतिनिधि के रूप में रेखांकित करके आंबेडकर ने भारत की क्रांतिकारी-प्रगतिशील परंपरा की निरंतरता को रेखांकित किया। इन तीनों को गुरु मानकर आंबेडकर ने पुरजोर तरीके यह रेखांकित किया कि इन तीनों के विचारों और व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर ही आधुनिक भारत का निर्माण किया जा सकता है। ऐसा भारत जिसके केंद्र में समता, स्वतंत्रता, बंधुता और सबके लिए न्याय हो।
आधुनिक भारत में एक मात्र आंबेडकर थे, जिन्होंने भारत की देशज क्रांतिकारी-प्रगतिशील परंपरा की पूरी यात्रा को इन तीनों के माध्यम से रेखांकित किया। भारत का कोई दूसरा नायक या विचारक इसको ठोस और मुकम्मल रूप में रेखांकित नहीं कर पाया और न समझ पाया। भारत में पैदा हुए इतिहासकार प्रोफेशन के अर्थों में भले इतिहासकार रहें हों, लेकिन प्राचीन भारत से आधुनिक भारत की तक की यात्रा को समझने की उनके पास इतिहास दृष्टि नहीं थी।
यह इतिहास दृष्टि सिर्फ और सिर्फ आंबेडकर के पास थी। गौतम बुद्ध, कबीर और फुले को भारत के तीन युगों के प्रतिनिधि के रूप में रेखांकित करना इसी इतिहास दृष्टि का परिणाम था। जैसे मार्क्स के पहले बहुतेरे इतिहासकार दुनिया में हुए थे, लेकिन उनके पास मानव जाति की यात्रा को समझने के लिए मुकम्मल इतिहास दृष्टि नहीं थी। दुनिया को मुकम्मल इतिहास दृष्टि मार्क्स ने दी। उसी तरह आंबेडकर से पहले भारत की ऐतिहासिक यात्रा को समझने की मुकम्मल इतिहास दृष्टि से सिर्फ और सिर्फ आंबेडकर पास थी। जिसकी सबसे सूत्रवत अभिव्यक्ति उन्होंने अपनी किताब ‘ प्राचीन भारत में क्रांति औ प्रतिक्रांति’ में की है।
मार्क्स की शब्दावली का इस्तेमाल करें तो,अब तक का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास रहा है। भारत का इतिहास भी वर्ग-संघर्ष का इतिहास रहा है। यहां वर्ग ने खुद वर्ण-जाति के रूप में अभिव्यक्त किया। वर्ग-संघर्ष में हमेशा एक प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी वर्ग होता है। परजीवी और शोषक वर्ग प्रतिक्रियावादी वर्ग होता है। उत्पादक और मेहनकश वर्ग प्रगतिशील वर्ग होता है। भारत में ब्राह्मण, श्रत्रिय और वैश्य (द्विज) परजीवी और शोषक वर्ण (वर्ग) रहे हैं। जिन्हें शूद्र और अतिशूद्र कहा जाता है, वे उत्पादक और प्रगतिशील वर्ग रहे हैं।
गौतम बुद्ध, कबीर और जोतिराव फुले भारत के वर्ग-संघर्ष (वर्ण संघर्ष) के क्रांतिकारी विरासत के मूर्त रूप हैं। आंबेडकर ने इन्हें अपना गुरु मानकर इसे पुरजोर तरीके से रेखांकित किया। कबीर भारत के मध्यकाल के सबसे क्रांतिकारी-प्रगतिशील और महान व्यक्तित्व हैं। उन्हें सादर स्मरण करते हुए।
28 मई को विनायक दामोदर सावरकर की 140वीं जयंती के मौके पर फिल्म स्वातंत्र्य वीर सावरकर का टीजर रिलीज हुआ। लेकिन इसमें जो कुछ भी कहा गया, उसको लेकर जबरदस्त विवाद शुरू हो गया है। फिल्म के टीजर में कहा गया है कि सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और खुदीराम बोस ने सावरकर से प्रेरणा ली थी। इसी बात को लेकर रणदीप हुड़्डा की जमकर आलोचना हो रही है। जिन लोगों ने भी इन तीनों महानायकों को पढ़ा है वह फिल्म मेकर्स की इस बात से खासे हैरान हैं।
यहां तक की सुभाष चंद्र बोस के परिवार ने भी इसका मजबूती से विरोध किया है। नेताजी के पड़पोते चंद्र कुमार बोस ने फिल्म मेकर्स और रणदीप हुड्डा के दावे को खारिज करते हुए कहा कि, सुभाष चंद्र बोस ने पूरी जिंदगी हर जगह अपने भाषणों और लेखों में जिन दो नायकों से प्रभावित होने की बात कही, उनमें एक स्वामी विवेकानंद थे और दूसरे उनके राजनीतिक गुरु देशबंधु चितरंजन दास। यही नहीं रणदीप हुड्डा और अन्य फिल्म मेकर्स जिस सुभाष चंद्र बोस को सावरकर से प्रभावित बता रहे हैं, उन्होंने खुद अपनी एक किताब में सावरकर की पोल खोली है। नेताजी ने द इंडियन स्ट्रगल 1920-42 में लिखा है कि ‘दूसरे विश्व युद्ध से पहले मैंने जिन्ना व सावरकर से आजादी के लिए संघर्ष की बात की। जिन्ना अंग्रेजों की मदद से पाकिस्तान बनाना चाहते थे। सावरकर सोच रहे थे कि सेना में घुसकर हिन्दू कैसे सैनिक ट्रेनिंग लें। मैं नाउम्मीद हो गया।’
तो वहीं दूसरी ओर भगत सिंह को पढ़ने से साफ जाहिर होता है कि उन्होंने हमेशा सांप्रदायिक शक्तियों की निंदा की। उन्होंने हमेशा से धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों को अपने लेखों में आड़े हाथों लिया। इसी मुद्दे पर एक्ट्रेस स्वास्तिका मुखर्जी ने भी सवाल उठाया। स्वास्तिका ने खुदीराम बोस का जिक्र करते हुए ट्विटर पर सवाल उठाया कि जिस खुदीराम बोस का 18 साल की उम्र में निधन हो गया था, क्या इस उम्र के पहले भी उन्हें किसी ने स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया था?
उन्होंने सवाल उठाया कि ये प्रेरक कहानियां कहां से आ रही हैं? मैं फिल्मों की इस बिकाऊ पिच से सहमत नहीं हूं। चुने हुए लोगों को ऊंचे आसन पर बिठाना आवश्यक है। साफ है कि एक एजेंडे के तहत कुछ खास नायकों को लोगों के दिमाग में स्थापित किया जा रहा है। ऐसा कर खासकर उन युवाओं को टारगेट किया जा रहा है जिनकी उम्र 30 साल के नीचे है और जो फिलहाल किताबें पढ़ने की बजाय सोशल मीडिया और फिल्में देखकर अपनी राय कायम कर रहे हैं।
जेल जाने के बाद अंग्रेजों से गिड़गिड़ा कर माफी मांगने वाले हिन्दू राष्ट्र के समर्थक विनय दामोदर सावरकर की जयंती के मौके पर सवारकर को अपना नायक मानने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता और फिलहाल 2024 तक के लिए भारत के प्रधानमंत्री का काम-काज देख रहे नरेन्द्र मोदी ने आज 28 मई को भारत के नए संसद भवन का उद्घाटन कर दिया। भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के समर्थक कई नेताओं के मुखिया नरेन्द्र मोदी ने यह काम दर्जन भर से ज्यादा हिन्दू पुरोहितों की मौजूदगी में की।
इस दौरान संसद भवन से कुछ ही फर्लांग की दूरी पर इसी भारत के लिए दुनिया के सबसे बड़े खेल महोत्सव ओलंपिक में पदक जीतकर भारत के हर एक व्यक्ति की छाती चौड़ी करने वाले खिलाड़ियों के इंसाफ के आंदोलन को कुचल दिया गया। भाजपा नेता और कुश्ती फेडरेशन के बृजभूषण सिंह पर शोषण का आरोप लगाने के बाद ये खिलाड़ी करीब महीने भर से आंदोलन कर रहे थे। न तो भारत सरकार, न ही उसकी पुलिस उन्हें न्याय दिला सकी, उल्टे जब सरकार नए संसद भवन का जश्न मना रही थी, जंतर-मंतर पर पुलिस खिलाड़ियों के टेंट उखाड़ने के बाद उनको घसीट रही थी।
दिल्ली के आस-पास से इन महिला पहलवानों के समर्थन में जंतर-मंतर पहुंचने वाले लोगों को बसों में भरकर जेलों में डाल रही थी। जो लोग सोशल मीडिया पर इसका विरोध कर रहे थे, सरकारी ट्रोलर उनके साथ गाली-गलौच कर रहे थे।
लेकिन दूसरी ओर नए संसद के जश्न से विपक्ष का बड़ा हिस्सा गायब था। संसद के आस-पास एक भी विरोधी को पहुंचने नहीं दिया गया। राजा और उसके कारिदों की छाती फुली थी कि विरोध की हर आवाज को दबा दिया गया है। राजा, मंत्री, संतरी, और कारिंदे सब खुश थे। नए भवन को देखकर इठला रहे थे।
लेकिन सवाल बस एक है कि जिस संसद भवन के उद्घाटन के दौरान थोड़ी दूर पर हजारों लोग सरकार का विरोध करने के लिए इकट्ठा थे। विपक्ष गायब था। उसको कैसे मुकम्मल माना जाए। जिस नए संसद भवन के उद्घाटन के वक्त उसके आस-पास उत्साहित जनता का हुजूम होना चाहिए था, वहां पुलिस का पहरा इसलिए लगाना पड़ा कि कोई विरोध का झंडा लेकर न पहुंच जाए। यह पहरा बताता है कि देश का हुक्मरान डरा हुआ है।
भारत के 20 राजनीतिक दल 28 मई को नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का विरोध कर रहे हैं। इसमें देश के तकरीबन सभी प्रमुख राजनीतिक दल शामिल हैं। मुद्दा भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को इस दौरान आमंत्रित नहीं करने का है। विपक्ष का आरोप है कि ऐसा कर राष्ट्रपति पद की गरिमा का अपमान किया गया। साथ ही विपक्ष की यह भी मांग है कि नए संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बजाय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को करना चाहिए क्योंकि वह भारतीय संघ की प्रमुख हैं।
इस विवाद के साथ दो और विवाद भी जुड़ गए हैं। दरअसल 28 मई की जिस तारीख को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नए संसद भवन का उद्घाटन करने की तैयारी में हैं, वह दिन विनायक दामोदर सावरकर की जयंती है। सावरकर हिन्दू राष्ट्र के समर्थक थे। भाजपा और आरएसएस उन्हें अपना नायक मानती है। वहीं दुसरी ओर संसद भवन के उद्घाटन के मौके पर संसद के भीतर जिस सेंगोल की स्थापना की जाएगी, उसको लेकर भी बवाल मचा है। दरअसल, संगोल एक राजदंड है, जिसे सत्ता हस्थांतरण के तौर पर एक शासक से दूसरे शासक को सौंपा जाता है।
लेकिन जब हम सेंगोल का इतिहास टटोलेंगे और उसकी बनावट को देंखेंगे तो यह सवाल सामने आता है कि क्या भारत में इसके जरिये हिन्दू साम्राज्य को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है? जिसके पक्षधर सावरकर से लेकर मोहन भागवत सहित आरएसएस और भाजपा के तमाम नेता हैं? और कभी दबी जुबान से तो कभी खुलकर जिसकी वकालत नरेन्द्र मोदी से लेकर भारतीय जनता पार्टी से जुड़े तमाम मंत्री और मुख्यमंत्री भी करते हैं।
दरअसल सेंगोल का संबंध चोल राजवंश से है। चोल राजवंश प्राचीन भारत का एक राजवंश था। भारत के दक्षिणी हिस्से सहित पास के अन्य देशों में तमिल चोल शासकों ने 9वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के बीच एक अत्यंत शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य का निर्माण किया था। इसी राजवंश में सेंगोल सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में जाना जाता था। इस राजवंश की भाषाएं तमिल और संस्कृत थी, जबकि धार्मिक समूह हिन्दू था। ऐसे में क्या यह नहीं माना जाए कि वर्तमान सरकार चोल राजवंश और उससे जुड़े प्रतीक सेंगोल के जरिये हिन्दू राष्ट्र की आहट का संकेत दे रही है।
सेंगोल की बनावट की बात करें तो इसके ऊपर गाय की आकृति है। भले ही गायें सड़कों पर कूड़ा खाती दिखे या फिर गंगा साल दर साल और ज्यादा मैली होती जा रही हो, वर्तमान सत्ता के हिन्दू धर्म में गाय, गोबर और गंगा का महत्व सबसे अधिक है। जबकि दूसरी ओर भारत का संविधान कुछ और कहता है। वह भारत को धर्म निरपेक्ष देश के तौर पर मान्यता देता है। भारतीय शासन का चिन्ह अशोक स्तंभ है, जिसके ऊपर एक-दूसरे से पीठ लगाए चार मुंह वाले शेर हैं। लेकिन इन शेरों की शक्ल बिगाड़ कर सरकार ने पहले ही अपनी मंशा जाहिर कर दी है। भले ही सीधे तौर पर सरकार अशोक स्तंभ के चिन्हों को हटाने और मिटाने की हिम्मत न कर पा रही हो, सांकेतिक रूप से सेंगोल और 28 अक्टूबर की तारीख के इतिहास को सामने लाकर वह अपनी मंशा जाहिर कर चुकी है।
संविधान से लेकर संवैधानिक चिन्हों में इसी छेड़छाड़ के कारण तमाम जागरूक भारतीयों को वर्तमान सरकार के हाथों में देश सुरक्षित नहीं दिखता और इसलिए तमाम अमन पसंद और भारतीय संविधान में आस्था रखने वाले लोग, 2024 में इस सरकार को दुबारा सत्ता में लाने के पक्ष में नहीं हैं।…. अगर सरकार ईमानदार है तो यह सवाल उठता है कि भारत में सरकार के कितने प्रतीक चिन्ह होंगे? राजकीय प्रतीक चिन्ह क्या एक ही नहीं होना चाहिए?
पहले आदिवासी समाज के राष्ट्रपति की अनदेखी, फिर हिन्दू राम्राज्य के समर्थक चोल राजवंश के प्रतीक सेंगोल को लेना, फिर संसद भवन के उद्घाटन के लिए हिन्दू राष्ट्र के समर्थक सावरकर की जयंती की तारीख को चुनना क्या मोदी सरकार के असली चेहरे को बेनकाब करने के लिए काफी नहीं है?
क्या कांग्रेस पार्टी कर्नाटक में आरएसएस और बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। यह सवाल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे के बयान के बाद उठने लगा है। कर्नाटक में मंत्री पद की शपथ लेने वाले प्रियांक खड़गे ने आरएसएस और बजरंग दल सरीखे संगठनों को लेकर बड़ा बयान दिया है। खड़गे ने इन दोनों संगठनों को प्रतिबंधित करने को लेकर बयान दिया है। उनका कहना है कि “जो भी दल या संगठन राज्य की शांति भंग करने का साहस या प्रयास करेंगे उन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। उन्होंने आरएसएस और बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने के मामले पर कांग्रेस के रुख को स्पष्ट करते हुए कहा, “धार्मिक, राजनीतिक या सामाजिक कोई भी संगठन, जो असंतोष और वैमनस्य के बीज बोने काम करेगा, कर्नाटक में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम कानूनी और संवैधानिक रूप से उनसे निपटेंगे, चाहे वह बजरंग दल, पीएफआई (PFI) या कोई अन्य संगठन ही क्यों ना हो। हम उन्हें प्रतिबंधित करने में संकोच नहीं करेंगे, यदि वे कर्नाटक में कानून और व्यवस्था के लिए खतरा बनने जा रहे हैं।”
बता दें कि अभी कर्नाटक में किसी को भी विभागों का बंटवारा नहीं हुआ है, लेकिन प्रियांक खड़गे के बयान के मतलब निकाले जाने लगे हैं। दरअसल प्रियांक खड़गे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे हैं। कर्नाटक चुनाव में जीतने वाले जिन विधायकों ने कर्नाटक में मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के साथ मंत्री पद की शपथ ली है, प्रियांक भी उनमें से एक हैं। ऐसे में आरएसएस और बजरंग दल को लेकर उनके बयान को अहम माना जा रहा है।
प्रियांक खड़ने यहीं नहीं रुके, उन्होंने भाजपा द्वारा शासित पिछली सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों की समीक्षा करने की भी बात कही। उन्होंने कहा कि जिनकी समीक्षा होनी है, उसमें पाठ्यपुस्तक संशोधन, धर्मांतरण विरोधी कानून, गौहत्या विरोधी कानून और भाजपा द्वारा पेश किये गए अन्य सभी कानून शामिल है।
पीलीभीत, यूपी। भारत में सिस्टम में बैठे हुए तमाम अधिकारी इतने घटिया और अमानवीय हैं कि उन्हें सजा के तौर पर नौकरी से निकाल कर सालों जेल में यातना दी जानी चाहिए। मामला पीलीभीत का है जहां दलित समाज की एक 14 वर्षीय लड़की का रेप कर दिया गया। पीड़ित बच्ची के पिता आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज करने की गुहार लगा रहे थे, लेकिन पुलिस वाले समझौता करवाना चाहते थे, जिससे तंग आकर और बेटी को न्याय न दिलाने की कसक के साथ पिता ने 17 मई को अपनी जान दे दी।
घटना 9 मई की है और मामला उत्तम प्रदेश और राम राज्य वाले उत्तर प्रदेश का है। पीलीभीत जिले के अमरिया थाना क्षेत्र के एक गांव में तीन लड़कों ने दलित समाज की 14 साल की एक लड़की को खेत से जबरन उठा लिया। फिर उसे ले जाकर अपने साथी को सौंप दिया, जिसने उसके साथ रेप किया। जब मामला सामने आया और पीड़िता ने जब पूरी बात पुलिस और घरवालों को बताई तो मामला थाने पहुंचा। पीड़ित लड़की के पिता चारों दोषियों के खिलाफ केस दर्ज करवाने की मांग कर रहे थे। लेकिन अमरिया थाना क्षेत्र की पुलिस मामला दर्ज करने की बजाय मामले में समझौता करवाने पर अड़ी रही। इससे परेशान होकर पीड़ित लड़की के पिता ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी।
दैनिक भास्कर की वेबसाइट पर 23 मई को प्रकाशित खबर में कहा गया है कि पिता के आत्महत्या के बाद राहुल, होति, शेखर और मनोज नाम के युवक के खिलाफ मामला दर्ज हो गया है, लेकिन मुख्य आरोपी बताए जा रहे हरेन्द्र का नाम शामिल नहीं किया गया है। पीड़ित परिवार का कहना है कि आरोपियों की प्रशासन में पहुंच है। वो धमका रहे थे कि समझौता कर लो नहीं तो मार दिये जाओगे। पीड़ित के पिता ने थक हार कर मौत का रास्ता चुन लिया। हालांकि मामला के तूल पकड़ने के बाद 18 मई को सीओ ने अमरिया थाने के एसओ मुकेश शुक्ला को सस्पेंड कर दिया है,लेकिन इससे मामला खत्म नहीं हो जाता।
पीड़ित लड़की के भाई के बयान को समझना होगा और भारत में दलितों को इंसाफ पाना कितना मुश्किल है, यह भी समझना होगा। पीड़िता के भाई का कहना है कि जब हम और हमारे पिताजी थाने गए तो हम चाहते थे कि इस मामले में कार्रवाई हो, लेकिन पुलिस ने हमारी एक न सुनी। अमरिया थाने के एसओ मुकेश शुक्ला ने हम लोगों को गाली देकर भगा दिया। उन्होंने कहा कि भाग जाओ वरना जेल में डाल दूंगा। जिसके बाद अपनी बेटी के बलात्कार के बाद शर्म से दबे लड़की के पिता ने अपनी जान दे दी। ऐसे मामलों को अक्सर समय बीतने के साथ दबा दिया जाता है।
लेकिन इस मामले में मानवाधिकार आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, महिला आयोग और यूपी के मुख्यमंत्री क्या कार्रवाई करते हैं और पीड़ित परिवार को क्या न्याय दिलाते हैं, यह देखना होगा। सवाल उठता है कि अगर पीड़ित बच्ची किसी राजपूत और ब्राह्मण की बेटी होती तो क्या एसओ मुकेश शुक्ला पीड़िता के पिता और भाई को गाली देकर भगा पाता, क्या वह समझौता करने का दबाव बनाता, क्या वह कहता कि भाग जाओ नहीं तो जेल में डाल दूंगा।
नए संसद भवन का उद्घाटन वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से कराए जाने को मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस पार्टी ने भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। साथ ही संसद भवन के उद्घाटन समारोह में राष्ट्रपति को निमंत्रण तक नहीं देने को भी कांग्रेस पार्टी ने बड़ा मुद्दा बना दिया है।
दरअसल पीएम मोदी ने 10 दिसंबर 2020 को नए संसद भवन का शिलान्यास किया था। तब तात्कालिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को निमंत्रण नहीं दिया गया था। अब जब 28 मई को नए संसद भवन का लोकार्पण हो रहा है, मोदी सरकार ने वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी निमंत्रण नहीं भेजा है। इसको लेकर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पीएम मोदी और आरएसएस पर तीखा हमला बोला है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा-आरएसएस के दलित और आदिवासी प्रेम को महज दिखावा ठहराया है।
शिलान्यास में तत्कालिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और उद्धाटन समारोह में वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को नहीं बुलाए जाने को मुद्दा बनाते हुए खड़गे ने एक के बाद एक चार ट्विट कर सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा नए संसद भवन का उद्घाटन वर्तमान राष्ट्रपति से कराने की मांग का समर्थन करते हुए कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार दलित और जनजातीय समुदायों को राष्ट्रपति केवल चुनावी वजहों से बनाती है।
मल्लिकार्जुन खड़गे का तर्क है कि संसद भारत गणराज्य की सर्वोच्च लेजिस्लेटिव बॉडी है और राष्ट्रपति इसका सबसे बड़ा संवैधानिक अथॉरिटी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु देश की प्रथम नागरिक हैं। वह सरकार और विपक्ष के साथ ही देश की हर नागरिक का प्रतिनिधित्व करती हैं। अगर नए संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति करतीं तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सरकार के कमिटमेंट का प्रतीक होता। ये तमाम आरोप लगाते हुए कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह इसे बड़ा मुद्दा बनाने जा रही हैं।
बता दें कि 28 मई की जिस तारीख को भाजपा सरकार ने नए संसद भवन के उद्घाटन के लिए चुना है, उसको लेकर भी कांग्रेस ने विरोध दर्ज कराया है। दरअसल इस दिन विनायक दामोदर सावरकर की जयंती होती है। सावरकर हिन्दू राष्ट्र के समर्थक थे और सावरकर को भाजपा अपना नायक मानती है। कांग्रेस ने इसे भी मुद्दा बनाते हुए इसे देश के नायकों का अपमान बताया है। नया संसद भवन 28 महीने में बनकर तैयार हो चुका है। नए चार मंजिला नए संसद भवन में लोकसभा के 888 और राज्यसभा के 384 सदस्य बैठ सकेंगे।
जाहिर है कि कांग्रेस के तमाम विरोध के बावजूद 28 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही इसका उद्घाटन करेंगे, क्योंकि राजनीति में पत्थर पर नाम लिखवाना सबसे नेताओं का प्रिय शौक होता है। वर्तमान सरकार को देश का नया इतिहास ही लिखना चाहती है। लेकिन राष्ट्रपति को इस कार्यक्रम से दूर रखकर भाजपा खुद ही एक्सपोज हो गई है। और यह साफ हो गया है कि उसका दलित और आदिवासी प्रेम महज एक दिखावा है। देखना होगा कि कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को 2024 चुनावों से पहले कितना बड़ा बना पाती है। अगर कांग्रेस पार्टी के साथ ही वंचित समाज को केंद्र में रखकर राजनीति करने वाली बहुजन समाज पार्टी ने भी इसे बड़ा मुद्दा बना दिया तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है।
8 नवम्बर की रात 12 से उठी नोटबंदी की सुनामी के तीन के तीन सप्ताह गुजर चुके हैं और इसकी चपेट में आने से देश का शायद एक भी नागरिक बच नहीं पाया है.विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक़ इससे राष्ट्र का जीवन जिस तरह प्रभावित हुआ,वैसा भारत-चीन या भारत-पाक के मध्य हुई लड़ाइयों में भी नहीं देखा गया.भारी आर्थिक क्षति के साथ ही इसमें 80 से अधिक लोग शहीद भी हो चुके हैं.इससे हुई हानि पर अपना कर्तव्य स्थिर करने में विपक्षी दलों ने कोई कमी नहीं की.इस मुद्दे पर एकबद्ध विपक्ष सड़क से संसद तक आक्रामक तरीके से मुखर रहा.वह जनता तक यह बात भी पहुंचा दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी के जरिये आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला अंजाम दिया है.वह अपनी पार्टी,मित्रों तथा कुछ खास–खास उद्योगपतियों का पैसा ठिकाने लगाने में व्यस्त रहने के कारण बिना पूरी तैयारी के नोटबंदी का फैसला ले लिए,जिस कारण ही जनता को इतनी मुसीबतों का सामना करना पड़ा है.बहरहाल नोटबंदी से हुई दिक्कतों में अवाम का पूरा साथ देने और इस पर मोदी सरकार को बुरी तरह एक्सपोज करने के बाद विपक्ष को पूरा भरोसा हो चला था कि जनता मोदी से क्षुब्ध हो गयी है.इस विश्वास के कारण ही विपक्ष के बहुत से नेता मोदी सरकार को चुनाव में उतरने के लिए ललकारने लगे .किन्तु नोटबंदी के फैसले के दो सप्ताह बाद मोदी सरकार ने जो सर्वे कराया ,वह विपक्ष की उम्मीदों के विपरीत:कुछ हद तक चौकाने वाला रहा.सर्वे में पाया गया कि 92 प्रतिशत लोगों को भ्रष्टाचार से लड़ने का नोटबंदी का कदम पसंद आया है तथा उन्हें यह विशवास है कि इससे कालेधन,भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर लगाम लगेगी.विभिन्न सर्वेक्षणों के अतिरक्त सात राज्यों के लोकसभा व विधानसभा सीटों के उपचुनाव के बाद ही महाराष्ट्र और गुजरात में जो स्थानीय निकायों के उपचुनाव हुए, उनमें भी जनता को नोटबंदी के पक्ष खड़ा पाया गया.
किन्तु तमाम सर्वेक्षणों और उपचुनाव परिणामों से विपक्ष अप्रभावित नजर आया.उसे आज भी लग रहा है कि नोटबंदी के बाद जनता को जो तकलीफ उठानी पड़ी है उसकी कीमत मोदी को आने वाले चुनावों में अदा करनी पड़ेगी,इसलिए वह नोटबंदी के खिलाफ विरोध की नई-नई मंजिलें तय करते जा रहा है.लेकिन वह समझ नहीं पा रहा है कि ऐसा करने के क्रम में उसकी स्थिति उस तत्कालीन विपक्ष जैसी होती जा रही है जिसने 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवीपर्स के खात्मे का विरोध किया था.
वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी ने जो नोटबंदी का फैसला लिया है भारत में उसकी तुलना सिर्फ इंदिरा गाँधी के 1969 के फैसले से ही हो सकती है.किन्तु 1969 और 2016 के साहसिक फैसलों में काफी साम्यता होने के बावजूद दो बड़े फर्क हैं.1969 में इंदिरा गाँधी ने अपनी छवि एक प्रगतिशील प्रधानमंत्री रूप स्थापित करने के लिए जो कठोर फैसले लिए उससे अवाम का जीवन आज जैसा नरक नहीं बना था,इसलिए उन्हें जनता के बीच रोने की नौबत नहीं आई थी. दूसरा बड़ा फर्क यह था कि बैंकों का राष्ट्रीकरण और प्रिवीपर्स का खात्मा सचमुच में भारी जोखिम भरा फैसला था .ऐसा करके इंदिरा गांधी ने राजे-महाराजे और धन्ना सेठों को सीधी चुनौती दी थी,जिसका राष्ट्र को चिरस्थाई लाभ मिला.इस लिहाज से नोटबंदी का फैसला कहीं से भी साहसिक और जोखिम भरा नहीं नजर आ रहा.इसमें जो भी तकलीफ हुई है साधारण और मध्यम वर्ग की जनता को हुई है,काले धन के लिए जो सचमुच में जिम्मेवार हैं,उन्हें कहीं से भी चुनौती मिली ही नहीं है.
नोटबंदी के फैसले को खुद मोदी द्वारा मना किये जाने के बावजूद उनके दल के साथ कुछ नोटबंदी समर्थक बुद्धिजीवि भी अतिउत्साह में इसे काले धन पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ बताये जा है.किन्तु वास्तव में यह काले धन की आड़ में विपक्षी दलों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ है .इसके जरिये निर्ममता से विपक्षी दलों को आर्थिक रूप से पंगु बनाने का कार्य अंजाम दिया है.शायद नोटबंदी का मुख्य लक्ष्य विपक्ष को पंगु बनाना ही था क्योंकि प्रधानमंत्री इस बात से अनजान नहीं होंगे कि नकदी का योगदान कुल काले धन की मात्रा में ऊंट के मुंह में जीरे से अधिक नहीं है,लिहाजा नोटबंदी के जरिये काले धन और भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं किया जा सकता.हां ,इसके जरिये यह सन्देश जरुर दिया जा सकता था कि भले ही वह विदेशों से काला धन लाने में पूरी तरह विफल रहे ,किन्तु काले धन के खिलाफ कठोर हैं.हालांकि जिस तरह मोदी सरकार काला धन रखने वालों को आयकर कानून संशोधन विधेयक -2016 के जरिये आधा देकर काला धन सफ़ेद करने का अवसर मुहैया कराई है,उससे उसकी काला धन विरोधी छवि को काफी आघात लगा है.शायद इसीलिए उनके समर्थक काले धन के खात्मे के बजाय कैश्लेश लेस इकॉनमी का गुणगान करने लगे हैं. किन्तु एक दिसंबर से देश के संगठित व असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोग वेतन लेने के लिए भटकते रहने के बावजूद जिस तरह सोत्साह नोटबंदी का समर्थन करते दिख रहे हैं ,उससे तय है कि प्रधानमंत्री मोदी राजग के सहयोगियों तथा संघ के तीन दर्जन संगठनों और मीडिया के जरिये 2017 के चुनाव में नोटबंदी को विपक्ष के खिलाफ सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करने में सफल हो जायेंगे.
हालही में एक विद्वान ने लिखा है-‘भारतीय राजनीति की एक विशेषता यह बनती जा रही है कि जब परिस्थितियां सत्ताधारी दल के प्रतिकूल जाने लगे तो एक विवादास्पद निर्णय लेकर विमर्श की पूरी धारा को एक ही दिशा में प्रवाहित कर दो.’सत्ता में आने के पूर्व विदेशों से कालाधन ला कर प्रत्येक के खाते में 15-15 लाख जमा कराने तथा हर वर्ष दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने जैसे भारी भरकम वादों को पूरा करने में बुरी तरह व्यर्थ प्रधानमंत्री के लिए विमर्श को उस काले धन ,जो नकदी के रूप में कुल काले धन का सिर्फ 5-6 %प्रतिशत है एवं कई विद्वानों के मुताबिक जिस पर वर्तमान सरकार का एक्शन मक्खी पर तोप चलाने जैसा है,पर केन्द्रित करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था.उन्हें इस बात का भलीभांति इल्म था कालेधन का मुद्दा ऐसा है जिस पर अवाम का भावनात्मक दोहन बड़ी आसानी से किया जा सकता है.इस कारण ही जन लोकपाल के जरिये कभी काला धन और भ्रष्टाचार के खात्मे का सब्ज बाग़ दिखाकर अन्ना-केजरी जैसे साधारण लोग सुपर हीरो बन गये थे .शायद उनकी सुपर छवि को दृष्टिगत रखकर ही मोदी ने अपनी सारी विफलता को ढकने के लिए विमर्श की पूरी धारा को काले धन पर केन्द्रित कर दिया है और पूरा विपक्ष इसके भंवर में फँस गया है.
सारी स्थिति देखते हुए यह बात जोर गले से कही जा सकती है मोदी ने नोटबंदी के जरिये यूपी चुनाव के लिए काले धन की पिच तैयार कर दी है और इस पर खेलने पर विपक्ष की स्थिति कोहली सेना के सामने टॉस हारी विदेशी टीमों जैसी होना तय है.ऐसे में आर्थिक रूप से लुंज-पुंज हो चुका विपक्ष यदि भारी पॉलिटिकल माइलेज ले चुके मोदी को मात देना चाहता है तो उसे मौजूदा विमर्श के भंवर से निकलना होगा.इसके लिए खुद मंडल के दिनों की भाजपा से प्रेरणा लेने से श्रेयष्कर कुछ हो ही नहीं सकता.
स्मरण रहे 7 अगस्त,1990 को जब मंडल रिपोर्ट के जरिये पिछड़ों को आरक्षण मिला तथा वर्ण-व्यवस्था के वंचित(दलित,आदिवासी ,पिछड़े और उनसे धर्मान्तरित ) हिन्दू धर्म द्वारा खड़ी की गयी घृणा और शत्रुता की प्राचीर तोड़कर भ्रातृ भाव लिए एक दूसरे के निकट आने लगे,तब भाजपाइ अडवाणी ने यह कह कर राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन छेड़ दिया कि मंडल से समाज टूट रहा है.उसके बाद सारा विमर्श राम मंदिर पर केन्द्रित होने के साथ भाजपा के सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त हो गया .आज विपक्ष यदि एक बड़े तानाशाह के रूप में उभर रहे मोदी को मात देना चाहता है तो राम जन्मभूमि आन्दोलन से प्रेरणा लेते उसे विमर्श को सामाजिक न्याय की राजनीति पर केन्द्रित करने का सफल उपक्रम चलाना होगा.इसके लिए आर्थिक,राजनैतिक,न्यायिक,शैक्षिक,धार्मिक इत्यादि समस्त क्षेत्रों के अवसरों के बंटवारे में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने का मुद्दा खड़ा करना शायद बेहतर होगा।
सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों के बीच सेलिब्रिटी बन चुकी आईएएस टॉपर रहीं और फिलहाल राजस्थान के जैसलमेर की कलेक्टर टीना डाबी फिर से चर्चा में हैं। दरअसल टीना डाबी ने पाकिस्तान से भारत आए लोगों को लेकर जो फैसला लिया है, उससे वह सरकार के निशाने पर हैं। हुआ यह है कि जैसलमेर की कलेक्टर टीना डाबी ने पाकिस्तान से आए पचास से ज्यादा परिवारों को घर उजार दिये। जिसके बाद गहलोत सरकार में मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने टीना डॉबी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। लेकिन वहीं दूसरी ओर जिन लोगों के घर उजारे गए हैं, वह टीना डाबी को दुआएं दे रहे हैं।
दरअसल पाकिस्तान से भारत के राजस्थान के जैसलमेर में 50 से ज्यादा विस्थापित परिवार प्राइम लैंड और केचमेंट एरिया के साथ ही अलॉटमेंट लैंड पर काबिज हो गए थे। जिला प्रशासन ने उन्हें अप्रैल में ही हट जाने का आदेश दिया था। लेकिन विस्थापितों ने प्रशासन की बात नहीं मानी। इस पर प्रशासन ने कलेक्टर टीना डाबी के आदेश पर विस्थापितों के अवैध मकानों को ढहा दिया।
टीना डाबी का कहना था कि, केचमेंट का यह एरिया प्राइम लोकेशन है और इसकी कीमत भी बहुत ज्यादा है, साथ ही यहां पर अतिक्रमण करने से तालाब के पानी के लिए भी ठीक नहीं होने की बात सामने आने पर हमने विस्थापितो को हटाया है। क्योंकि ऐसी आशंका थी कि इसमे भू-माफियाओं की भी भूमिका हो सकती थी।
हालांकि विस्थापितों को हटाने के बाद ही मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया। हालांकि जिन विस्थापितों को टीना डाबी ने हटाया था और उनके घरों को प्रशासन ने जमींदोज कर दिया था, वही अब कलेक्टर मैडम की तारीफों के पुल बांध रहे हैं। जो विस्थापित पाकिस्तान से भारत आए थे, उनमें बड़ी आबादी वंचित समाज के लोगों की है। ज्यादातर लोग भील समाज के हैं।
पाकिस्तान के रहिमियार खान से भारत आए अजीत राम का कहना है कि, भारत आए तीन महीने हो गए हैं। हमारे पास जो भी था, बेच कर भारत आ गए। यूआईटी ने कच्चे मकान तोड़ दिये तो जैलसमेर प्रशासन जिला कलेक्टर टीना डाबी ने हमारी पुकार सुनी है। उन्होंने रहने को जगह दी है और खाने-पीने की व्यवस्था भी की है। हम खुश हैं।
एक अन्य विस्थापित कुर्बान राम का कहना था कि जिला कलेक्टर टीना डाबी ने हमारे भील समुदाय पर दया दिखाते हुए मानवता की मिसाल पेश की है। कुर्बान राम ने टीना डाबी का धन्यवाद भी किया।
बता दें कि टीना डाबी ने जिस तरह इस मामले को सुलझाया, उससे उनकी चारो ओर तारीफ हो रही है। उन्होंने विस्थापित पाकिस्तानी परिवारों की मदद के लिए प्लॉन बनाया है। जल्दी ही जमीन की तलाश कर इन परिवारों को वहां बसाया जाएगा। फिलहाल उन्हें रैन-बसेरे में शरण दी गई है।
भारतीय समाज एक सूखा जंगल है और जो भी चाहे धर्म और आग के गोले को फेंक कर आग लगा दे। ताजा उदाहरण मणिपुर का लिया जा सकता है। इम्फाल वैली में कभी भी इस तरह का नही हुआ कि एक विशेष वर्ग – कुकी को निशाना बनाया गया हो। 2001 में ग्रेटर नागा बनाने पर भी ऐसा नही हुआ जबकि सीएम हाउस और विधान सभा को जला दिया गया। झगड़ा मेइती और कुकी के बीच कराया गया। 15 वीं शताब्दी के अंत में हिंदू धर्म ने मैतेई साम्राज्य में प्रवेश किया। वैष्णव भिक्षुओं और बंगाल के अनुयायियों ने इनका हिंदूकरण किया। कहा जा रहा है कि मणिपुर में आरएसएस व बजरंग दल ने असली पहचान छुपाकर दो संगठन – अरंबाई तेंगगोल और दूसरा मेइती लीपुन खड़े किए। ये काले कपड़े में बंदूकों के साथ बाइक पर सैकड़ों के समूह में चर्चों को जलाए और आदिवासियों को लूटा। वहां के निवासी हैरान हैं कि ये लोग कहां से आए और इतना क्रूर और संगठित कैसे बन सके? ज़ाहिर सी बात है कि धार्मिक कट्टरता किसी ने तो पैदा की। बीजेपी की सरकार हो तो कौन सा मुश्किल है। आरोप लग रहा है कि आरएसएस ने वहां कि रणनीति बहुत पहले बनाई थी और अपना पारंपरिक भेष भूसा या चोला न धारण कर, उसका प्रकार बदल कर कट्टरता पैदा किया। वर्षो पहले से तैयारी चल रही थी और अब जाकर कामयाबी मिली। नॉर्थ ईस्ट राज्यों में ईसाइयत का प्रभाव है । बजरंग दल और आरएसएस ने वहां के हिसाब से रणनीति बनाकर उनसे घुले मिले और हिन्दुत्व का एजेंडा तैयार कर दिया। केंद्र में जिसकी सत्ता होती है उत्तर पूर्वी राज्य उनके साथ प्रायः हो जाते हैं और 2014 के बाद शासन और प्रशासन में इनकी पकड़ बन गई तो अपने उद्देश्य में कामयाब हो गए।
हरियाणा में जब जाटों ने आरक्षण के लिए आंदोलन किए तो कुछ तोड़ फोड़ भी हुआ। अवसर का फायदा उठाकर बीजेपी में प्रचारित किया कि जाट सभी जातियों के साथ अन्याय करते हैं और इसकी दशा ही बदल दिया। छत्तीस जाति बनाम जाट कर दिया और आराम से चुनाव जीत गए। जाति आग का गोला है और एक दूसरे के विरूद्ध खड़ा करने की क्षमता या षड्यंत्र करना आता है तो जाति वर्षों साथ लगी रहती । धर्म से कहीं ज्यादा जाति की भावना मज़बूत है बशर्ते खिलाड़ी चालाक हो। शोषित जातियां सम्मान और अधिकार के लिए एक जुट तो होती हैं लेकिन ज्यादातर का हश्र व्यक्ति पूजा तक सीमित हो जाता है। कुछ मामलों में सशक्तिकरण भी हुआ है। जाति व्यवस्था एक बीमा कंपनी की तरह है जो बिना किस्त चुकाए बहुत सारे लाभ पक्के हैं। शादी – विवाह, लेन – देन, मुसीबत में काम आ जाना, बिना कुछ लौटाए वोट पक्का, काम धंधा में मदद आदि। इतने लाभ बिना किस्त के कहां मिलता है। जो जातिवाद नही करते उनको भी जाति का लाभ मिलता है। उनका व्यवहार भले जातिवादी नही हैं और कथित उच्च जाति से आते हैं लेकिन वो क्षति पहुंचाते हैं। कुछ कथित सवर्ण जाति के लोग महसूस करते हैं और जान-बूझकर जंतर-मंतर पर पहलवान न्याय के लिए धरना दे रहे हैं लेकिन सरकार पर असर नही पड़ा। सुप्रीम कोर्ट के दखल से कुछ कार्यवाही हो सकी। जाहिर सी बात है पहलवानों के जाति के लोग भावनात्मक रूप से चोटिल हुए और खाप पंचायत का प्रचंड समर्थन मिला। दूसरे तरह संदेश दिया गया कि ये तो एक विशेष जाति के लोग का मामला है। आरोपी का जनाधार खुद के जाति में अच्छा खासा है और अब पहलवानों के दबाव में कार्यवाही कर भी दिया जाय उनकी जाति के वोट का घाटा होगा। ऐसी स्थिति में पूरे आंदोलन को एक जाति का बताकर वोट को सुरक्षित करने का प्रयास हो रहा है।
भाजपा बिना मुसलमानों का भय दिखाए खड़ी नही रह सकती। भारतीय मुसलमान और पाकिस्तान न हो तो ये पार्टी अस्तित्व में ही नही आ सकती। 2019 के लोकसभा के ठीक दौरान पुलवामा की घटना हुई और बड़ी संख्या में हिंदू एक हो गए|
कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म जनता के लिए अफीम है। भारत में तो दो अफीम हैं – जाति और धर्म। दोनो को जब भी फेंक दो आग लग जाती है। कुछ कारीगरी करना पड़ता है कि इन बारूदों को किस अनुपात में मिश्रण किया जाय। परिस्थिति पर भी निर्भर करता है और लोग किस प्रकार के हैं जहां एक गोला कामयाब होगा। चूंकि स्वतंत्रता आंदोलन किए लड़ाई लड़ने वाले बलिदानी थे और बड़ी कुर्बानी के साथ आजादी दी थी | इसलिए राज्य की बुनियाद धर्मनिरपेक्ष थी और उसका असर दशकों तक था। अब वो बुनियाद दरक रही और इसे केवल एक दल या विपक्ष ही नही बच सकते बल्कि देश की जनता को उठाना पड़ेगा। जब तक जाति के सवाल को नही महत्व दिया जाएगा, स्थिति ऐसे बनी रहेगी। जाति में बंटे भारत पर विदेशियों का कब्जा रहा है और आज भी राष्ट्र के अन्दर कितने जातियों के राष्ट्र कायम हैं। बिना वैज्ञानिक सोच के धर्मांधता को नही लड़ा जा सकता और न ही विकसित देश बन सकता है। सिंगापुर, कोरिया, चीन , अमेरिका, जापान आदि देशों को जब भी याद करते हैं तो उनके विकास के कारण। विश्व गुरु शिक्षा, विज्ञान, मजबूत अर्थव्यवस्था से बना जा सकता है। इस दोनों चुनौतियों से देश अभी भी लड़ने के लिया तैयार नहीं है तो इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भविष्य कैसा होगा।
आज स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, पसमांदा विकलांगों का विर्मश अश्वेत साहित्य आदि के साहित्यिक राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आदि मसविदे विश्लेषित विमर्श में दलित एवं गैर दलित के शोषणों में समानता होने के बावजूद उनमें कुछ भिन्नता होने के कारण दलित स्त्रियों की कुछ समस्यायें छूट जा रही हैं, जिन्हें साथ लेकर चलना जरूरी है। गैर दलित स्त्री की अपेक्षा दलित स्त्री को एक नये दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है, क्योंकि जिस स्तर से गैर दलित स्त्रियाँ अपने अधिकारों के लिए पित्रसत्तात्मक समाज से लड़ रहीं हैं । उस स्तर से अपने अधिकारों की मांग कर रही हैं , उस स्तर से दलित स्त्रियों की कुछ समस्यायें छूट रहीं हैं । हालांकि यह भी कि कुछ पढ़ी-लिखी दलित स्त्रियाँ सम्पूर्ण दलित स्त्रियों का प्रतिनिधित्व तो कर रहीं हैं, उनकी संख्या गैर दलित स्त्रियों की अपेक्षा बहुत कम है । इसका मूल कारण दलितस्त्रियों में उच्च शिक्षा का अभाव और दलित स्त्री का सीमित दायरे में आन्दोलन हो सकता है।
जब एक चेतनाशील नारी स्वयं यह कहती रही है कि एक स्त्री ही अपने भोगे हुए यथार्थ को ज्यादा मार्मिकता के साथ व्यक्त कर सकती है । पुरुष तो पढ़कर, सुनकर अथवा अपने समय के समाज के आधार पर ही सहानुभूति दिखाकर स्त्री अधिकारों की बात करता है । सवाल यह है कि जब पुरुष स्त्री के शोषण को व्यक्त कर पाने में असमर्थ है, तो एक गैर दलित स्त्री एक दलित स्त्री की वास्तविक संवेदना को क्या बखूबी बयां कर सकती है? और यदि कर सकती है तो दलित स्त्रियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में हिचकिचाती क्यों है ?दलित स्त्री के मुद्दों पर बहुतायत फ़ॉर्मेल्टी क्यों अदा करती है ? गैर दलित स्त्रियों द्वारा दलित स्त्रियों पर कितनी किताबें लिखीं गईं । यही थोड़ा समझने की जरूरत है।
अधिकांशतः जब एक दलित स्त्री स्वतंत्र रूप जैसे ही विचरण करने की कोशिश करती है। किसी आततायी के स्पर्श पड़ने से केंचुए की तरह उसे सिमटना पड़ता है। वह केंचुआ बनाना नहीं चाहती लेकिन बनने पर मजबूर है। आततायी यदि सवर्ण हुआ तो लड़की के घरवाले उस दरिन्दे के खिलाफ कुछ नहीं बोलते स्वयं अपनी बेटी को ही चुप करा देते हैं। यदि वे कानून का सहारा लेते भी हैं या उसकी पुत्री ही स्वयं कानून की दहलीज पर अपना दुखड़ा रोती है, तो बीच में पूंजीवादी और मानुवाद की ऐसी दीवार घड़ी हो जाती है, जिसे तोड़ने की कोशिश में वह स्वयं टूट जाती रही है। इस सन्दर्भ में ओम प्रकाश वाल्मीकि की चंद पंक्तियाँ मुझे याद आती हैं – “कौन हूँ मैं ?/ मेरा अस्तिव है क्या?/ मैं धीरे धीरे क्या खाक हो जाऊँगी ? ” प्रो० विमल थोरात का मानना है कि स्त्री तिहरे शोषण का शिकार है जाति के आधार पर, महिला होने के आधार पर और गरीब होने के आधार पर । चूँकि जाति के आधार पर मुद्दा छुआ-छूत और कर्म काण्ड का आता है। एक अछूत स्त्री से एक सवर्ण पुरुष का देह से किस प्रकार संबंध रहता है। इसको जानने के लिये कन्नड़ साहित्यकार यू०आर०अनन्तमूर्ति के उपन्यास ‘संस्कार’ को अवश्य पढ़ना चाहिए । भले ही कहानी झूठी हो लेकिन यह भी सत्य है कि साहित्य में कोई भी यूँ ही कल्पना थोड़ी नहीं होती वह समाज से ही पनपती है। ‘संस्कार’ उपन्यास में श्री पति और बेल्ली के शारीरिक संबंधों को एक दृश्य देखिए जिसमें श्रीपति एक ब्राहमण पुरूष और बेल्ली एक अछूत स्त्री है, “जानते हो, क्या हुआ था, आज पिल्य और उसकी बीबी मर गए, जैसेराक्षस उन पर टूट पड़ा हो ।”श्रीपति को इस घड़ी बातों के लिए समय नहीं था। बेल्ली नग्न खड़ी थी। उसने उसे जमीन पर खींच लिया। …… क्योंकि दोनों इसतरह मर गये थे, हमने उनके शवों को वहीं झोपड़ी में ही आग लगाकर जला दिया किसी प्रकार का ज्वर आया था, चल बसे। आखें ऐसे बन्द कीं कि फिर खोल भी न सके।” श्रीपति अधीर हो रहा था। वह कुछ कह रही है, कुछ खोई-खोई सी है। मैं काम-लिप्सा की इतनी उतावली में आया हूँ , यह किसी की मौत की बात ले बैठी है। श्रीपति ने धोती बांधी। अंगवस्त्र पहना। जेब से कंघी निकाल कर बाल संवारे टार्च जलाकर देखा और फिर जल्दी से भाग निकला। बेल्ली केवल साथ सोने के लिए ही ठीक थी, बातें करने के लिए नहीं ।”
उर्पयुक्त प्रसंग सम्पूर्ण दलित स्त्रियों और सवर्ण पुरूषों के बीच संबंधों की पहचान करा सकता है यानि सर्वण पुरूष एक दलित स्त्री को एक भोजन की थाली ही समझता है। वह भी छिपकर समाज में तो वह किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा ।यदि दलित स्त्री चाहेकि वह समाज में अपने शारीरिक शोषण का बखान कर उसे अपने जीवनसाथी बनाने की मांग करे तो सवर्ण समाज उससे पीछा छुड़ाने के लिए उसकी हत्या भी कर सकता है। इस तरह की कई घटनाएँ भी हो चुकी हैं। एक गैर दलित स्त्री का शोषण तो मात्र स्त्री होने के कारण है. लेकिन यहाँ एक दलित स्त्री स्त्री होने का शोषण झेल ही रही है। साथ ही दलित स्त्री होने का भी । राजी सेठ भी दलित और गैर दलित स्त्रियों में अंतर को अपनी कविता(औरत –औरत में भी अंतर है ) के माध्यम से स्पष्ट करने की कोशिश करती हैं – “ औरत-औरत होने में / जुदा – जुदा फर्क नहीं है क्या ?/ एक भंगी तो दूसरी बामणी । / एक डोम तो दूसरी ठकुरानी / दोनों सुबह से शाम तक खटकती हैं ।… एक सताई जाती है स्त्री होने के कारण/ दूसरी सताई जाती है स्त्री और दलित होने पर । ” अक्सर यह भी देखने को मिलता है कि एक स्त्री ही ननद और सास के रूप में एक स्त्री (बहू) का शमन करती है, लेकिन यह परिस्थितियाँ 60 के दशक के बाद से बदलने लगी हैं। संयुक्त परिवार एकल परिवार में परिवर्तित हो रहे हैं। संयुक्त परिवार जब बँटकर एकल परिवार में परिवर्तित होते हैं तो लड़के के हिस्से में दहेज व हिस्से में आई पिता की संपत्ति होती है । लेकिन दलितों में तो बहुतायत गरीबी ही रहती है। हिस्से में कभी-कभी खाने के बर्तन तो दूर रहने की जगह भी कम पड़ जाती है । ऐसी स्थिति में एक नई नवेली बहू को गृहस्ती बनाने में काफी मुसीबत का सामना करता पड़ता है। लड़का सारा गुस्सा अपनी पत्नी पर ही उतारता है। फिर धीरे धीरे शोषण के प्रकार और बढ़ने लगते हैं। उस अर्पयाप्त ग्रहस्थी को पूर्ण करने के लिए उस नई-नवेली दुल्हन को मजदूरी करने के लिए बाध्य होना पढ़ता है, फिर काम पर जाते वक्त यदि किसी ने पूछ भी दिया कि कहाँ जा रही हो? तुम क्या फला की पतोहू हो? इस प्रकार की वार्तालाप में यदि परिवारों वालों ने देख लिया तो समझो उस पर कयामत आना तय है। हमारे भारतीय समाज में लोग गरीब की स्त्री को भौजाई ही समझते हैं, फिर उस नई नवेली बहू को ये हमारा समाज कैसे छोड़ सकता है। यदि लड़के में नशा पत्ती करने के गुण हैं तो वह जरूर अपनी पत्नी को मर्दानगी दिखायेगा ही । ऐसी इस्थितियों में उसका (बहू) जीवन शोषण से लबालब बरसात में पोखर की तरह भरने लगता है जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेता । वह अपना जीवन सिसकियों में गुजारने परमजबूर हो जाती है ।
श्री वीर भारत तलवार ने स्त्री प्रश्न पर लिखे अपने एक लेख का शीर्षक ही दिया, “बातें जो कही नहीं जाती”। इस लेख के आरम्भ में उन्होंने वर्षों पहले सुनी एक गजल को लिखा था जो स्त्री की अभिव्यक्ति को परिभाषित करने की कोशिश करती है:- “उनको ये शिकायत है हम कुछ नहीं कहते, / अपनी तो ये आदत है हम कुछ नहीं कहते/ कुछ कहने से तूफान उठा लेती है दुनिया,/ और उसपे ये कयामत है कि हम कुछ नहीं कहते, /कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते,/ दुनिया की इनायत है कि हम कुछ नहीं कहते।”
डॉ० कृपाकिन्जल्कम् जी (हिन्दुस्तानी त्रैमासिक पत्रिका-जुलाई-सितम्बर 2016) में ‘स्त्री-विमर्श और दलित स्त्री प्रश्न’ शीर्षक लेख में लिखते हैं कि, “हिन्दी साहित्य में अस्मितावादी विमशों के अन्तर्गत दलित – विमर्श एवं स्त्री-विमर्श के अंतर्गत दलित/गैर दलित स्त्री की विशिष्टता पर कई महत्वपूर्ण बहसें संचालित हुयी हैं। जिनकी केन्द्रीय नुक्ता पारिवारिक जीवन के भीतर पुरुष के पक्ष में झुके शक्ति सम्बन्धों एवं उच्चवर्णों के द्वारा दलित स्त्रियों के शोषण के साथ-साथ पारिवारिक दायरे के भीतर भी उनका शोषण है।”
कौशल्या बैसंत्री की आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ में लेखिका अपने वैवाहिक जीवन के चार दशकों में निष्क्रिय रहीं और अपने पति से अलग होकर बड़ी उम्र से सक्रिय हुई हैं। दलित नारी के सामाजिक यर्थाथ को बड़ी सादगी लेकिन प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। ‘दोहरा अभिशाप’ में लेखिका ने अपने परिवार तथा माँ- बाबा द्वारा समझदारी से चलने के कारण जीवन में आने वाली प्रत्येक मुसीबत, बीमारी, संघर्ष और परेशानी का डटकर मुकाबला करने के मार्मिक चित्र अंकित किये हैं। वे अपनी आत्मकथा में लिखती हैं कि, “कभी मैं गोबर उठाती, तो बहन इधर-उधर देखती, कोई आता दिखता तो मुझे झट इशारा करती थी। मैं गोबर उठाना छोड़कर खड़ी हो जाती थी। गोबर उठाने में शर्म लगती थी परंतु उपले बन जाने से कुछ घर के काम में मदद होगी, यह भवना मन में रहती थी।” कौशल्या बैसंत्री जी ने अपने पति (देवेन्द्र कुमार) द्वारा किये गये शोषण को बड़ी ही मार्मिकता के साथ चित्रित किया है, जो यह बताता है कि एक पढ़ी-लिखी दलित स्त्री का भी शोषण दलित समाज में सामंजस्य के अभाव में होता है। वे अपनी आत्मकथा में लिखती हैं कि, “देवेन्द्र कुमार (लेखिका के पति) को पत्नी सिर्फ खाना बनाने और शारीरिक भूख मिटाने के लिए चाहिए थी। पैसे आलमारी में ताले में बन्द रखता था और रोज दूध सब्जी के लिए पैसा देता था। ..मेरे कोई बात पूछने पर 10 मिनट तक कोई उत्तर न देता था। मेरे कपड़े, चप्पल की सिलाई के लिए पैसे लेने के लिए बहुत ही पीछे पढ़ना पड़ता, तब पैसे देने की बात आती तब कुछ न कुछ कारण निकालकर झगड़ा करता, मारने दौड़ता ।”
गैर दलित और दलित स्त्रियों में कभी-कभी यह भी देखने को मिलता है कि वे अपने पति को छोड़कर किसी दूसरे पुरुष के साथ चली जाती हैं। यह दशा दलित स्त्रियों में गैर दलित स्त्रियों की अपेक्षा अधिक देखने को मिलती है । स्त्री सोचती है कि यह पुरुष हम पर इतना मर रहा है तो यह हमको जरूर सुखी रखेगा । अतएव वे अपने पहले पति के शोषण से छुटकारा पाने के लिए उस गैर पुरूष के साथ चली जाती हैं, लेकिन शोषण का नया रूप तब सामने आता है जब वह उसे जी भर उपभोग करने के बाद किसी अनबन पर यह ताने मारता है कि “ जब तू अपने पहले पति की न हुई तो मेरी कैसी हो सकती है। ” गांव, मोहल्ले की औरतें तो इस मामले में चूकती ही नहीं। जरा सी बात पर यहाँ तक कि हँसी-मजाक में भी भगोडी, कलमुँही और न जाने कौन-कौन शब्दों से उसे अलंकृत कर अपनी जिह्वा में धार लगाया करती हैं। यहाँ उसका जीना और मुश्किल हो जाता है । कहावत है, “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का । ” हालांकि स्त्रियों का दूसरे पुरुषों के साथ जाने के और भी कारण हो सकते हैं, कभी-कभी जीवन सुखी भी बीतता है। पहले पति की अपेक्षा लेकिन यह बहुतायत कम ही देखने को मिलता है ।
श्योराज सिंह बेचैन अपनी आत्मकथा मेरा ‘बचपन मेरे कंधोंपर’ में अपनी माँ पर किये गये उस शोषण को लिखते हैं, जो उनके पिता द्वारा किया जाता है। वे लिखते हैं कि, “मुखी ( बेचैन की माता) के पति की मौत के बाद अपार दुःखों का सिलसिला शुरू हो जाता है। रामलाल यानि दूसरे पति के यहाँ / कुछ ठीक था लेकिन भिखारी यानि तीसरे पति ने तो जिन्दगी नरक ही बना दी। सबसे दुःखद यह है कि भिखारी अम्मा को लाठी डण्डे, कलाबू या पुरहे से मारा पीटा करता था।” अक्सर यह देखा जाता है कि जब एक दलित स्त्री अपनी ग्रहस्थी अच्छे से चलाने के लिए मजदूरी या छोटा-मोटा धंधा-पानी का काम शुरू कर देती है। बाहर काम में लेट-लपेट तो स्वाभाविक ही है। पुरुष घर में देर से आने पर खफा हो जाता है और उसे अपनी स्त्री पर शक करने की आदत हो जाती है । फलस्वरूप वह अपनी स्त्री को मारना पीटना शुरू कर देता है। मराठी में दलित लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ की आत्मकथा ‘उचक्का’ में इस प्रकार का प्रसंग आया है। लेखक (लक्ष्मण गायकवाड़) की माँ जब दूध बेचने जाती थी तो कभी-कभी देर हो जाती थी, तब लेखक के पिता उसे पीटते थे और भी बहुत प्रकार से उसका शोषण करते थे। लक्ष्मण गायकवाड़ लिखते हैं कि, “दूध बेचकर अगर किसी दिन माँ देर से आती, तो बाबा कहता, “क्यों आज अपने यार के यहाँ गई थी क्या?” और फिर पीटता । “सरू (मेरी बड़ी बहन) मेरी नहीं है, ” ऐसा भी कहता। ”
हालाँकि शक करने के और भी कई कारण हो सकते हैं। इस सन्दर्भ में मराठी दलित साहित्यकार दयापवार अपनी आत्मकथा ‘अछूत’ (जो पहली मराठी दलित आत्म कथा मानी जाती है) में एक जगह महारवाड़ा में बबन की छोटी बेटी का किस प्रकार से उसका पति सन्देह के कारण शोषण करता है कि एक प्रसंग देखिए जिसे दया पवार ने खुले मन से लिखा है:-
“बबन सभी लड़कियों को मन से चाहता। उसके मन में एक बात हमेशा खटकती रहती कि एक भी लड़की की शादी वह ठीक स नहीं कर पाया। उसकी छोटी बेटी वेणू के दुखान्त के समय का मैं स्वयं गवाह था। वेणू की शादी गांव में खूब धूम-धड़ाके से हुई थी । वेणू बहुत सुन्दर थी। नक्षत्रों सी। माँ बाप से उजली थी। उसे जो घर मिला वह धनवान लड़के के पिताजी बम्बई के किसी कम्पनी में फोरमैने थे। लड़का दिखने में बड़ा ऊँचा-पूरा । घर में खेती-बाड़ी देखता । वेणू को पति द्वारा बहुत अधिक तकलीफ दिया जाना शुरू होता है। पति रात-रात उसे सोने न देता। उस पर सन्देह भी करता । बाहर खेतों में जाता तो चाबी ताले में बन्द कर देता। स्कूल में जब था, तब मैंने भी एक-दो बार उसका छल कम करने की कोशिश की। पति छोटे-मोटे कारणों पर ही चिढ़ जाता। बैल-ढोरों सा पीटता । “
उधर जब वेणु के पिता बबन को जब अपनी बेटी के शोषण के बारे में पता चलता है, तो वह बहुत टूट जाता है । टूटना तो स्वाभाविक है । वह अपनी बेटी को उस जाहिल दामाद के चंगुल से आजाद कराकर अपने घर लाता है और मजबूरन अपनी बेटी वेणू का हाँथ काफी उम्रदराज पुरुष को थमाता है। वेणु भी पिता के इस फैसले को बिना किसी विचार के मंजूर कर लेती है । अब वेणु का पति छल – बल से वेणु को अपनाने का खूब प्रयास करता है, लेकिन सब व्यर्थ चला जाता है । इस संदर्भ में दया पवार जी स्वयं प्रश्न करते हैं कि, “ इतना वैभव छोड़कर वेणु क्यों आई ? बूढ़ा पति क्यों अपनाया ? दुख – तकलीफों का कँटीला रास्ता उसने क्यों अपनाया ,यह सवाल आज भी मुझे निरुत्तर कर देता है । ”
दयापवार जी का आत्ममंथन स्त्री – विमर्श की दृष्टि से काफी मायने रखता है । चेतनशील मनुष्य के मन में इस तरह के प्रश्नों का उठना वाजिब है । दया (पवार) ने जिस मुखरता के साथ दूसरों की कहानी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी ठीक उसी प्रकार अपनी और अपने परिवार की कहानी बेझिझक बयां की है । दयापवार जी अपने पिता के बारे में भी लिखतें हैं, जो उनके और माँ के बीच झगड़े का मुख्य कारण रहा करता था । इस शक की बीमारी में आकर उन्होंने ने भी अपनी पत्नी पर कई प्रकार के आक्षेप लगाने शुरू किये लेकिन गलीमत यह हुई कि स्त्री के प्रति स्वयं की स्त्री का भी अगाध प्रेम और उस मुसलमान लड़के जो महबूब नाम का था उसने रोते हुए कुरआन की कसम भी खाई कि “वो मेरी बहन है……..” फिर भी उसे मुम्बई छोड़कर अपने गाँव जाना ही पड़ा । दया पवार लिखते हैं कि, “उसके बाद वह कहीं नहीं मिला।” इस प्रकार शक की जड़े तुरंत उखड़ जाने के कारण वे अपनी पत्नी को प्रताड़ना न दे सके नहीं तो अंजाम कुछ भी हो सकता था। इसके मार्मिक उदाहरण भरे पड़े हैं।
आगे दया पवार जी ने अपनी आत्मकथा ‘बलूत’ में स्त्रियों के शोषण को दिखाया कि किस प्रकार वे घर के अन्दर और बाहर काम पर जाने पर शोषण झेलती हैं– “पुरूष हमाली (मजदूरी) करते। किसी मिल या कारखाने में जाते। स्त्रियों को कोई भी परदे में न रखता। उल्टे पुरूषों की अपेक्षा वे ही अधिक खटती थीं। शराबी पति उन्हें कितना भी पीटें वे उनकी सेवा करतीं । उनका शौक पूरा करतीं । सड़कों पर पड़ी चिन्दियाँ, कागज, काँच के टुकड़े, लोहा-लंगर, बोतलें बीनकर लाना उन्हें छाँट-छाँट कर अलग करना और सुबह बाजार में ले जाकर बेचना यही उनका धन्धा था। वहीं पास ही मंगलदास मार्केट में कपडे का व्यापार चलता था। उन दुकानों से फेंके गये कागज आदि ये औरतें इकट्ठा करती सबकी अपनी-अपनी दुकानें तय थीं । कचरा उठाने के लिए झगड़े होते वहाँ की दुकानों के नौकरों को छोटी-मोटी रिश्वत भी दी जाती। कुछ औरतें मास के ही वेश्यालय में वेश्याओं की साड़ियाँ धोतीं । कीमा-पाव से ऊबी वेश्याओं के लिए कुछ औरतें बाजरे की रोटियाँ और रायता पहुँचातीं । शौकीन ग्राहक इन आयाओं की ही माँग कर बैठता। ऐसे समय काँच -सी इज्जत बचाने के लिए वे सिर पर पैर रखकर भागतीं।”
और यही नहीं दलित स्त्रियाँ जाति के दंश में फँसकर किन हालातों से गुजरती हैं यह दया पवार जी के शब्दों में ही देखिए- “पानी लेने के लिए आते-जाते महार स्त्रियों की छाया हनुमान पर पड़ती। भगवान अपवित्र हो जाता है, इसलिए गांव वालों ने एक बार रास्ता बंद कर दिया। कुएँ पर यदि दूसरे रास्ते से जाना हो तो तालाब के किनारे-किनारे कीचड़ से लथपथ होकर जाना पड़ता, एक मील तक ।”
शोषणकारियों ने दलितों में कुछ ऐसी जातियाँ भी बनाई जिनको समाज में सम्मान तो बहुत दूर की बात एक गाली के रूप में आज भी जी रहीं हैं। इन जतियों में स्त्रियाँ ऐसे शोषण के जाल में फँसी हैं जो घर से लगाकर बाहर तक कदम-कदम पर या यूँ कहें कि हर वक्त शोषण का शिकार रहती हैं । ऐसी स्त्रियों माँ तो बनती हैं लेकिन पत्नी का दर्जा नहीं पा सकती। संतान तो जनती हैं लेकिन संतान को पिता का सुख तो दूर उसे पिता के नाम की मुहर लगवाने का भी हक नहीं मिल पाता । माँ ऐसे हालातों से गुजरती कि जिसके कारण अपने बच्चे को ममता का सुख भी नहीं परोस सकती। बच्चों को शिक्षा भी नहीं नसीब हो पाती। समाज में मानवता का झूठा ढिंढोरा पीटने वाले समाज में उच्च सम्मान पाने वाले राजनेता तक रंगरेलियाँ मनाने के लिए ऐसी स्त्रियों के पास आते हैं और कहते हैं कि मैं तुम्हें हर सुख दूंगा, पत्नी की तरह रखूंगा, लेकिन वे पत्नी बनाकर रखूँगा नहीं कहते । ऐसे लोग उस स्त्री की देह से जी भर खेल लेने के बाद, उसेगर्भवती करके ऐसे छोड़ देते हैं जैसे, ढोर किलनी छोडता है ।
किशोर शांताबाई काले की ‘छोरा कोल्हाटी का’ एक ऐसी ही मराठी दलित आत्मकथा है, जिसमें इस तरह की शोषित महिलाओं और उनके प्रताड़ित बच्चों का वर्णन है । इसमें कोल्हाटी जाति के एक बच्चे (लेखक) और उसकी माँ की एक ऐसी संघर्षगाथा है, जो नाचने वाली का धंधा छोड़कर गृहस्थ स्त्री का जीवन जीना चाहती है। इस आकांक्षा में उसने कहने भर की सफलता तो पाई , परंतु उसे अपने बड़े बेटे को अपने से दूर रखना पड़ा । माँ के होते हुए भी वह बच्चा माँ का प्यार नहीं पा सका । तमाम अवर्णीय कष्टों को झेलकर आज वह बच्चा डॉक्टर बन चुका है. लेकिन समाज ने उसे नाजायज औलाद का ठप्पा लगा दिया । वह लड़का (किशोर शांताबाई काले ) एक कांग्रेस विधायक का बेटा है, जो उसकी माँ का ‘चिरा’ उतारने के बाद उसके शरीर का भरपूर आनंद लेने के बाद उसे छोड़कर चला गया । इस सन्दर्भ में आत्मकथाकार कहता है- “एम०एल०ए० साहब ने ‘माँ का ‘चिरा’ उतारा। चीरा उतारने की रस्म शादी-ब्याह जैसी ही होती है। नाचने वाली के जीवन में जो भी पहला आदमी आता है, उसे नाचने वाली के परिवार द्वारा मांगी गई रकम अदा करनी पड़ती है। अदायगी सोना, जमीन, जायदाद या रूपयों के माध्यम से भी हो सकती है। पहली रात नाचनेवाली को सुहागन की तरह सजाया जाता है। भगवान की पूजा होती है। उसे सब रिश्तेदारों के पैर छूने पड़ते हैं। गले में मंगलसूत्र और पांव में बिछुए पहनाये जाते हैं। सोने के जेवर हों तो वे भी पहनाए जाते हैं। सुहागरात का कमरा फूलों से सजाया जाता है । ‘चिरा’ उतारने वाले को नाचनेवाली के जीवन में पति का स्थान मिल जाता है। फिर वह ‘चिरा’ उसकी मर्जी से उतारा गया हो या किसी और की मर्जी से। जब तक वह व्यक्ति उसकी देखभाल करता है. नाचनेवाली किसी और से यौन – संबंध नहीं रखती । नाचनेवाली के साथ यौन संबंध रखने वाले को उसका मालिक कहा जाता है, कोल्हाटी समाज में उसे कब्जा कहते हैं।”
ऐसी हैं हमारे भारत के कुछ सम्मानित व्यक्तियों की करतूतें। इनकी दृष्टि में स्त्री केवल शारीरिक भूख से बढ़कर कुछ नहीं। यानि इन स्त्रियों का जीवन पशु से भी बदतर है। इन्हें समाज से न कोई शिकायत है न कोई गिला वाणी होते हुए भी मूक रहकर पुरुषों की कलेवा बनकर, शोषणकारियों द्वारा बनाये गये जाल को परम्परा मानकर एक कठौते की तरह बस जी भर रही हैं। इस बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए इसी आत्मकथा के कुछ एक उद्धरण और देना आवश्यक है।
दो बच्चों की माँ होने के बाद शांताबाई के जीवन में कृष्णराव वडकर (नाना) नाम का व्यक्ति आता है। वह शांताबाई से सम्बन्ध बनाने के लिए मनुहार करता है, लेकिन शांताबाई तो पहले धोखा खा चुकी होती है और आगे की हकीकत का अनुमान लगाकर कृष्णराव की बातों में फँसना नहीं चाहती । दूध का जला छाछ भी फूँक –फूँक कर पीता है । इसलिए वह मना कर देती है । जब बार-बार मना करती है तो नाना के दोस्त भी उसे फुसलाते , फिर भी शांताबाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, तब उसकी ही पार्टी की अन्य औरतें भी उसे नाना के साथ जाने के लिए समझाती हैं, लेकिन उसी पार्टी में सुमित्रा मौसी जो शब्द नाना से कहती हैं वह कोल्हाटी जाति की समस्त स्त्रियों की आकांक्षाएँ और उनके यथार्थ का वर्णन अभिव्यक्त हो जाता है- “साहूकार, यूं अपने होश न खोइए। यह नाच गाना क्या हमें अच्छा लगता है? क्या यह सब हम अपनी मर्जी से करती हैं ? हमें भी लगता है कि हमारा पति हो। घर गृहस्थी हो, लेकिन यह सब शायद हमारी किस्मत में नहीं है। हमारे परिवार वाले हमें किसी के साथ भेजकर खुश नहीं हैं। आप जैसे लोग नये-नवेले रिश्ते का जादू खत्म होते ही हमें छोड़ देते हैं। फूल में जब तक खुशबू है, उसे सब सूंघते रहते हैं, जब वह सूखने लगता है, उसे फेंक दिया जाता है। उस सूरत में नाचनेवालियाँ क्या करें? जो अपना घर-परिवार छोड़कर आपके पास ठहरती हैं, उसे आप आसानी से बेदखल कर देते हैं। नाचने वाली की उम्र हो जाये तो उसे आप क्या उसके सगे-सम्बन्धी भी नहीं पूछते। यह कई नाचनेवालियों के साथ हो चुका है, कि बहला-फुसलाकर, ब्याह का वचन देकर, रूपये-पैसे का लालच दिखाकर उससे संबंध जोड़ जाते हैं और वह अपने घरवालों की नाराजगी मोल लेकर आपके साथ चल पड़ती है। लेकिन जैसे ही जवानी ढलने लगती है, उसे छोड़ दिया जाता है। जिस नाचने वाली के बच्चे होते हैं, वह फिर भी अच्छी स्थिति में रह सकती हैं। लेकिन बच्चे न हों तो सड़कों पर आकर भीख माँगने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकती, या फिर वह अपनी जान दे देती है। समाज उसे स्वीकार नहीं करता ।”
इसमें संदेह नहीं कि यह आत्मकथा नारी की अति दयनीय दशा को दिखाकर कठोर हृदय को भी पिघलाकर रख देती है।
इस प्रकार भिन्न-भिन्न दलित जातियों में भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार की कुरीतियों के प्रचलन एवं जातीय व्यवस्था के दंश से स्त्रियों का शोषण देखा जा सकता है। हमें इन सारे शोषणों की जड़ों को खत्म करने के लिए व्यापक स्तर पर एकजुट होकर भारतीय समाज को जागरूक कर शोषित दलित स्त्रियों को शिक्षित कराने और उनको समाज में बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए वृहत स्तर पर काम करना चाहिए ।
बौद्ध धर्म के पतन के बारे में बहुत स्पष्ट जानकारी नहीं है. लेकिन आधुनिक रिसर्च से आजकल कुछ बात स्पष्ट हो रही है. इस विषय को ठीक से देखें तो भारत में बौद्ध धर्म का पतन का और स्वयं भारत के एतिहासिक पतन और पराजय का कारण अब साफ़ होने लगा है.
इस प्रश्न का सीधा संबंध वैज्ञानिक दृष्टि और अंधविश्वास के बीच में हुए लंबे संघर्ष से जुड़ता है. इस बात को समझना अब संभव हो रहा है. आज के भारत में शोषण दमन और अंधविश्वास से लड़ने वाले लोगों को ये बात समझनी बहुत जरुरी है. आइये इसमें प्रवेश करें.
भारत सहित दुनिया भर में इंसानी समाज के शोषण की जो इबारत बनी है उसमे आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की बात ही मुख्य रूप से जमीन बनती आई है. किसी भी तरह के संगठित धर्म द्वारा रचा गया शोषण हो उसके आधार में उसकी मूल प्रेरणा की तरह आत्मा परमात्मा या पुनर्जन्म में से कोई एक या दो या तीनों तत्व अवश्य मिलेंगे. किसी भी धर्म को उठाकर देख लीजिये.
यहाँ तक कि खुद बौद्ध धर्म में भी जब खुलकर पुनर्जन्म की वेदान्तिक अर्थ वाली व्याख्या प्रचलित हो गयी और इस व्याख्या के आधार पर जब राजसत्ता और राजनीति को सुरक्षा देने का षड्यंत्र रचा गया तब बौद्ध धर्म भी गरीबों और स्त्रीयों के शोषण का हथियार बन गया. इस बात को समझना जरूरी है. इसे दलाई लामा और तिब्बत के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है.
इसे एक नियम मानकर चाहिए कि अदृश्य, अव्यक्त, अगम्य, अगोचर और अस्पृश्य आदि के आधार पर दिव्यता की जो परिभाषाएं रची गयी हैं वे ही शोषण और पाखण्ड को जन्म देती हैं. जब तक बौद्ध धर्म में चार तत्वों या चार मूल-भूतों के आधार पर भौतिकवादी अर्थ की धर्मदृष्टि बनी हुई थी तब तक बौद्ध धर्म से गरीबों और स्त्रीयों सहित अन्यों को लाभ मिलता रहा.
लेकिन जैसे ही बौद्ध धर्म में भी वेदांती अर्थ के पुनर्जन्म का व्यापार शुरू होता है वैसे ही बौद्ध धर्म बुद्ध की मूल शिक्षाओं से दूर हो जाता है और सामंतवादी राजसत्ताओं का साथी बन जाता है. इतिहास में इस बात के काफी प्रमाण मौजूद हैं कि अदृश्य अव्यक्त आदि की चर्चा को बुद्ध ने हमेशा नकारा है और जो कुछ तर्कबुद्धि से और आँखों से नजर आता है उसी की बात की जाए.
इसीलिये बुद्ध का जोर भौतिक जगत, इस लोक के जीवन और इस लोक की सच्चाइयों पर अधिक है. इसीलिये अनात्मा के सिद्धांत की वे प्रतिष्ठा कर सके. उनके अनात्मा के सिद्धांत का सीधा सीधा अर्थ यही बनता है कि कोई आत्मा या स्व नहीं होता आत्मा या स्व या असल में एक “सोशल कंसट्रक्ट” है उसका स्वयं में कोई आत्यंतिक मूल्य नहीं है बल्कि वो देश काल परिस्थिति के अनुसार जन्मता और नष्ट होता है.
इसीलिये एक स्व या आत्मा के एक गर्भ से दुसरे गर्भ में जाने का प्रश्न ही नहीं उठाता, हर व्यक्ति दुनिया में पहली और आखिरी बार पैदा होता है. उसका न उससे पहले कोई जन्म है न उसके बाद कोई जन्म है. बुद्ध के लिए अनात्मा का बहुत सामान्य शब्दों में यही अर्थ है.
लेकिन बुद्ध के बाद स्वयं बौद्ध आचार्यों ने और बौद्ध धर्म से सामाजिक आर्थिक राजनीतिक लाभ उठाने वालों ने बौद्ध धर्म में अदृश्य अव्यक्त अगम्य और पारलौकिक की ब्राह्मणवादी बातें आरंभ कीं. ये बुद्ध की मूल शिक्षा के खिलाफ एक षड्यंत्र था जो खुद बौद्ध धर्म में घुस आये अवसरवादियों और सत्तालोलुपों ने आरंभ किया था.
बुद्ध ने अपने जीते जी इस संभावना को देख लिया था इसलिए उन्होंने चालीस से अधिक अव्याख्य प्रश्न बना छोड़े थे जिनमे ये साफ़ सन्देश था कि पारलौकिक से जुडी किसी बात को वो पसंद नहीं करते हैं और उनके शिष्यों को भी ऐसे पारलौकिक की चर्चा से दूर रहना चाहिए. लेकिन बुद्ध की सलाह के बावजूद ये खेल क्यों शुरू हुआ इसे समझना जरुरी है. इसका एक महत्वपूर्ण एतिहासिक और राजनीतिक कारण है. इस कारण को दलितों बहुजनों, आदिवासियों और स्त्रीयों को समझ लेना चाहिए.
पिछले चालीस सालों में प्राचीन बौद्ध धर्म पर जो गहराई से रिसर्च हुई है उसमे बहुत नई तरह की बातें सामने आयीं हैं. उसमे न सिर्फ बौद्ध धर्म के पतन और ब्राह्मणवाद के उभार के कारणों की जानकारी मिलती है बल्कि यह भी पता चलता है कि ब्राह्मणवाद की सफलता से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म में अंधविश्वास और पुनर्जन्म का प्रचार भी भटके हुए बौद्धों ने आरंभ किया था. ये एक जटिल वक्तव्य है इसे कदम दर कदम समझना होगा.
बौद्ध धर्म या बुद्ध की शिक्षाएं मूल रूप से अनात्मा और अनीश्वरवाद पर आधारित थीं. इसके विपरीत ब्राह्मणों का ईश्वरवादी धर्म इश्वर और आत्मा सहित पुनर्जन्म के सिद्धांत पर खड़ा था. इतिहास में ये दोनों धर्म एक साथ बराबरी से चल रहे थे. प्राचीन समय में पश्चिमी भारत में पाकिस्तान, सिंध, वर्तमान दिल्ली से होते हुए गंगा जमुना के संगम तक इस ब्राह्मणी विचार का धीरे धीरे प्रवेश होता है.
इसके विपरीत श्रमण धर्मों (बौद्ध, जैन और आजीवक) का विस्तार मुख्य रूप से पूर्वी भारत में अर्थात आज के उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड उत्कल बंगाल उत्तरपूर्व सहित दक्षिण में भी था. इसके ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण अब मिल चुके हैं.
भारत पर सिकंदर के आक्रमण के दौरान भी पश्चिमी भारत तक श्रमण दर्शन को मानने वाली फैलीं थीं. उनके बीच से रास्ता बनाते हुए ब्राह्मण आगे बढ़ रहे थे. सिकंदर की टक्कर श्रमण राजाओं से ही हुई थी. सिकंदर की मृत्यु के बाद उसके सेनापतियों से इन राजाओं ने जो संधियाँ कीं उसके कारण इस इलाके में फैले ब्राह्मणी धर्म के लिए और उसपर आधारित शुरुआती राज्यों के लिए एक भयानक संकट पैदा हो गया था. उस दौर के ब्राह्मणी धर्म में यज्ञ, हवन, कर्मकांड, मांसाहार और पशुबलि भयानक रूप से फ़ैली थी.
लेकिन इन सबका स्वरूप कुछ अलग था, उस समय इनका स्वरूप समाज या राज्य को सम्मोहित करने के लिए नहीं बनाया गया था बल्कि ये छोटे छोटे समूहों में एकांत में किये जाने वाले कर्मकांड थे जिनका लक्ष्य ब्राह्मणवादी धर्म को मानने वाले कबीलों को संगठित रखना था.
लेकिन सिकंदर और श्रमणों की संधि के बाद इस इलाके में ब्राह्मणी अस्तित्व को निर्णायक खतरा पैदा हो गया. ऐसी स्थिति में उनके लिए जीवन मरण का प्रश्न खड़ा हो गया. इस दशा में उन्होंने खुद को बचाने के लिए एक भयानक निर्णय लिया, उन्होंने पूर्व की तरफ आगे बढ़ते हुए अदृश्य, अगम्य पर आधारित परलोक का जाल फैलाना शुरू किया. उन्होंने जनता में अंधविश्वास और अदृश्य के भय को फैलाते हुए अपने तन्त्र-मन्त्र और यज्ञ हवन आदि की दिव्यता का जहर फैलाना शुरू किया.
अपने आप को अनुशासित करते हुए व्यक्तिगत जीवन में जैनों और बौद्धों की शुचिता और शाकाहार सहित कठोर तप और आत्मपीडन के श्रमण-योगिक व्यवहार को अपनाकर उसमे अपनी महारथ सिद्ध करके दिखाई और जनता को प्रभावित करना शुरू किया.
उन्होंने ये जतलाना शुरू किया की वे जैनों और बौद्धों से अधिक शाकाहारी और तपस्वी या सदाचारी हैं. जैनों और बौद्धों के इस व्यवहार को सीखकर उसका प्रदर्शन करने के साथ ही उन्होंने अपने मूल कर्मकांडी विचारों को जादू की तरह पेश किया और श्रमण बौद्ध सदाचार और तप के साथ ब्राह्मणी अंधविश्वास का एक भयानक गठजोड़ बनाया. इससे आम जनता तेजी से प्रभावित होने लगी. असल में ये गठजोड़ जनता के मनोविज्ञान को जकड़ने और राजनीति सत्ता हथियाने के लिए ही बुना गया था.
इस काम में सफल होने के बाद ब्राह्मणी तकनीक ने एक करवट और ली, उन्होंने बाद की शताब्दियों में श्रमण धर्मों के सदाचार को गौण बनाते हुए कर्मकांड और अंधविश्वास को अधिक से अधिक मूल्य देना शुरू किया.
बाद में राजसत्ता और राज्य के उदय ने एक अन्य एतिहासिक भूमिका निभायी जिसने बौद्ध धर्म को भारत में पूरी तरह से खत्म कर दिया. ब्राह्मणों के पूर्व की तरफ बढने के दौर में भारत और अन्य पडौसी समाजों में अन्य ऐतिहासिक विकास भी हो रहा था. बड़े और संगठित राज्यों का उदय हो रहा था जो व्यापार और युद्ध पर आधारित थे. पूर्वी भारत के श्रमण धर्म जिस खेती आधारित और जनजातीय प्रष्ठभूमि में पैदा हुए थे वे गणों और गणतन्त्र पर आधारित थे.
इन श्रमण राज्यों के विपरीत पश्चिम की तरफ से आक्रमण करने वाली शक्तियों की राजनीति मूलतः राजा के दैवीय वैधता के सिद्धांत पर और पिता से पुत्र तक आने वाली राजसत्ता के सिद्धांत पर आधारित थी जो कि सामंतवाद के प्राचीन रूपों से शक्ति प्राप्त करती थी. ये सामंती और दैवीय सिद्धांत पर खडी राजसत्ता अपनी जनता को अन्धविश्वासी बनाकर ताकत हासिल करती थी. स्वाभाविक रूप से ये सत्ताएं पूर्व में बसे श्रमण राज्यों और उनकी गण आधारित राजनीति से अधिक ताकतवर सिद्ध हुई. इस तरह श्रमण धर्मों पर आधारित राज्यों का पतन होने लगा.
इसका भी मूल कारण वही था कि आम जनता को राज्यसत्ता और राजा की दिव्यता से सम्मोहित करने का श्रमणों के पास कोई तरीका नहीं था. वे सोच भी नहीं सकते थे कि धर्म या तप या सदाचार से जुडी बातों को राजनीति या राज्य या राजा के पक्ष में षड्यंत्र की तरह कैसे इस्तेमाल करें. ये षड्यंत्र ब्राह्मणों का नया और खतरनाक आविष्कार था.
उन्होंने अपने आप को बचाने के लिए ऐसे-ऐसे सिद्धांत और कर्मकांड रचे जिन्हें देखकर आम जनता इश्वर और अदृश्य से भयभीत हो जाती थी और इसके बाद राजाओं और राज्य ने ये समझ लिया कि ब्राह्मणों का ये हुनर आम जनता को बड़ी आसानी से काबू कर लेता है और इस तकनीक का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जा सकता है.
धीरे धीरे ये बात तय हो गयी कि राज सत्ता को मजबूत करने या फैलाने की दृष्टी से श्रमण धर्म के आचार्यों और गुरुओं से कोई लाभ नहीं होने वाला है. साथ ही उन्होंने ये भी समझ लिया कि ब्राह्मणों की ये परलोकवादी कर्मकांडीय तकनीक जनता को अधिक प्रभावित करने लगी है, तब तत्कालीन राजसत्ताओं ने ब्राह्मण गुरुओं को मौक़ा दिया कि वे जनता में इश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म आदि का भय फैलाकर राज्य और राजसत्ता को अतिरिक्त वैधता देते हुए राजाओं की मदद करें.
यही ब्राह्मण चाहते थे, इसके बाद ब्राह्मणों ने राजा और इश्वर के लिए जो सिद्धांत रचे और जिस तरह से राजा को इश्वर का प्रतिनिधि बताना आरंभ किया वह स्वयं में एक इतिहास है. ये तकनीक बहुत सफल रही. इसके जवाब में बौद्धों, जैनों और आजीवकों के पास कोई तरीका नहीं था. अंधविश्वास के खिलाफ लिए गये उनके पुराने निर्णय उभरती हुई नई राजसत्ताओं के दौर में उन्ही पर भारी पड़ गये और अंधविश्वास को अपना गुरुमंत्र बना चुके ब्राह्मणवाद की जीत शुरू हो गयी.
बाद के इतिहास में साफ़ नजर आता है कि राजाओं ने ब्राह्मणी तकनीकों के आधार पर सफलता से आम जनता को काबू में रखा और लंबे समय तक राज करने में सफलता पायी. इसी सफलता के दौर में वर्ण और जाति सहित जातिगत व्यवसाय की प्रस्तावनाएँ रचीं गयी जिससे राजा और इश्वर की सम्मिलित सत्ता को चुनौती न दी जा सके. इस पूरे फ्रेमवर्क में राजा और इश्वर दोनों को एकसमान महत्त्व दिया गया.
इतना ही नहीं इश्वर को भी सम्राट की तरह ही चित्रित किया गया. ये बातें राजाओं को बहुत पसंद आयीं. इससे प्रसन्न होकर उन्होंने ब्राह्मणों को राजगुरु की तरह प्रचारित और इस्तेमाल किया. इस तरह ‘राजा, इश्वर और ब्राह्मण’ का ये गठजोड़ अपने अंधविश्वास के ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर बौद्ध जैन और आजीवक धर्म से जीत गया.
इस हार के बाद जैन और आजीवक भारत में ही या तो समाप्त हो गये या ब्राह्मणी सत्ता से समझौते करके उनके साथ जीने लगे. लेकिन बौद्धों के कई आचार्यों ने दूसरे देशों में पलायन किया. लेकिन इस हार की स्मृति उनके दिमाग में हमेशा जीवित रही. वे समझ गये कि अंधविश्वास के बिना जनता और राजसत्ता को प्रभावित करना मुश्किल है.
इसलिए उन्होंने दूसरे देशों में और भारत में (जिन इलाकों में अभी भी उनका प्रभाव था) ब्राह्मणों की सफलता को दोहराते हुए खुद अपने दर्शन में अंधविश्वास परलोक और पुनर्जन्म आदि का आविष्कार किया. चीन में जिस तरह का महायान उन्होंने विकसित किया वो इसी अनुभव और ज्ञान पर आधारित था.
चीन के राजवंशों ने भी इस बात को धीरे धीरे समझ लिया कि ये तकनीक उनकी खुद की राजसत्ता के लिए कितनी काम की साबित हो सकती है. इसीलिये इन चीनी राजाओं ने बाद के बौद्ध आचार्यों को खूब सम्मान से आमंत्रित करना शुरू किया. इसी क्रम में आचार्य पद्मसंभव ने एक बड़ा प्रयोग किया और तिब्बत में पुनर्जन्म को प्रचारित किया. उस विचार की शक्ति को भांपते हुए दलाई लामा नाम की एक संस्था उभरी.
दलाई लामा के नाम से राज करने वाले राजाओं ने ब्राह्मणी अंधविश्वास को अपने राज्य और सत्ता को वैधता देने का मुख्य उपकरण बना लिया और तन्त्र मन्त्र सहित न जाने कैसे कैसे अंधविश्वासों के आधार पर पूरी जनता के मनोविज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर लिया. भयभीत और प्रभावित जनता ने इसके बाद कभी गरीबी, शोषण और दमन के खिलाफ आवाज नहीं उठाई. सैकड़ों साल तक ये तकनीक काम करती रही, इससे तिब्बत गरीब से गरीब और अंधविश्वासी होता गया ठीक उसी तरह जैसे भारत गरीब कमजोर और नाध्विश्वासी होता गया.
ब्राह्मणी अंधविश्वास के आधार पर जनता को भयभीत बनाये रखते हुए राजसत्ताओं ने खूब धन बटोरा, राज्य विस्तार किया और लंबे समय तक राज किया लेकिन इसकी वजह से आम जनता में ज्ञान विज्ञान, तर्क, बुद्धि, साहस, उद्यम, तकनीक और सामूहिक प्रयास सहित राष्ट्र की अवधारणा का कोई विकास नहीं हो सका. एक तरफ तिब्बत में बौद्ध राजा ब्राह्मणी अंधविश्वास का सफल प्रयोग कर रहे थे और दूसरी तरफ भारत में भी इसका बड़े पैमाने पर प्रयोग हो रहा था.
फिर जैसा कि होना ही था, जनता और पूरा देश राजनीतिक, सामाजिक चेतना से दूर होता गया और सभ्य और शिक्षित और समर्थ न हो सका. बाद में जब मुस्लिमों, ब्रिटिशों के आक्रमण आरंभ हुए तो भारत उनके सामने नहीं टिक सका. उधर साम्यवादी क्रान्ति के बाद उभरे नये चीन के सामने तिब्बत ने जिस बेचारगी और लाचारी का प्रदर्शन किया वो भी भारत की पराजय का ही एक अन्य रूप है.
इन दो मुल्कों के उदाहरण से साफ़ नजर आता है कि राजाओं और राजसत्ता ने अंधविश्वास से भरे ब्राह्मणी प्रचारतंत्र के आधार पर सफलता हासिल की. उसी सफलता को वे आज और अगले दौर में भी दोहराना चाहते हैं. इसके विपरीत श्रमण दर्शनों – बौद्धों जैनों आजीवकों – ने अंधविश्वास को सामाजिक नियंत्रण के उपकरण की तरह कभी इस्तेमाल नहीं किया.
इससे ये साफ़ पता चलता है कि आधुनिक दौर की लोकतांत्रिक और तर्कबुद्धि से संचालित राजनीति या जीवनशैली के लिए श्रमण दर्शन अधिक उपयोगी सिद्ध होंगे. अब विज्ञान और तकनीक के दौर में जनता को अशिक्षित और अंधविश्वास से भयभीत बनाते हुए एकजुट करने की जरूरत नहीं है.
इसके विपरीत आज के और भविष्य के लोकतान्त्रिक समाज में जनता को सुशिक्षित और जागरूक बनाकर अधिक आसानी से और अधिक सृजनात्मक ढंग से संगठित किया जा सकता है. यूरोप ने पुनर्जागरण के बाद जिस तरह की राजनीति और समाज दर्शन बनाया है उसमे अंधविश्वास से भयभीत जनता को नहीं बल्कि वैज्ञानिक बोध से जागी हुई जनता को आधार बनाया गया है.
इसके विपरीत अरब, मध्यपूर्व, और भारत सहित दक्षिण एशिया के अन्य देशों में अभी भी राजसत्ता और धर्मसत्ता के गठजोड़ का अन्धविश्वासी ब्राह्मणी माडल चल रहा है.
अगर ये देर तक चलता रहा तो ये मुल्क प्राचीन भारत और तिब्बत की तरह फिर से कमजोर होकर गुलाम होंगे. यूरोप ने जिस तरह से अपने समाज को अपनी राजनीति, अर्थव्यवस्था, विज्ञान तकनीक आदि को विकसित किया है उसका मुकाबला कोई भी “राजा-इश्वर-ब्राह्मणवाद” की त्रिमूर्ति और अंधविश्वास पर खड़ा समाज या देश नहीं कर सकता.
आज के दलितों, बहुजनों, आदिवासियों और स्त्रीयों को इस बात से शिक्षा लेते हुए ये ध्यान रखना चाहिए कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में अंधविश्वास को घुसने न दिया जाए. इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म – ये तीन ऐसे जहरीले हथियार हैं जिनमें से कोई एक भी आपको और पूरे मुल्क को हजारों साल के लिए बीमार कर सकता है.
इनसे बचकर रहना जरुरी है और वर्तमान ब्राह्मणवादियों सहित दलाई लामा जैसे पुनर्जन्म के अंधविश्वास पर जीने वाले राजनेताओं से सावधान रहना चाहिए. दलाई लामाओं ने बहुत होशियारी से पुनर्जन्म के अन्धविश्वास के आधार पर निष्कंटक राज किया है इसी से उनकी सभ्यता संस्कृति और देश बर्बाद हुआ. दुर्भाग्य की बात है कि अपने देश और संस्कृति को बर्बाद करने वाले इन महोदय को दुनिया भर में ज्ञान के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है.
हालाँकि इसका अपना राजनीतिक कारण है. यूरोप अमेरिका के देश इन महोदय को चीन के खिलाफ अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. इन सज्जन से पूछा जाना चाहिए कि आपका दिव्य ज्ञान आपके अपने लोगों देश और संस्कृति को अगर बर्बाद कर चुका है तो आपको जगत में ज्ञान बांटने का क्या अधिकार है? इस बात को भारत के दलितों को भी समझना जरुरी है. आजकल बहुत सारे दलित, बहुजन भाई बहन बौद्ध धर्म के गुरु के रूप में दलाई लामा से बहुत प्रभावित हो रहे हैं. ये एक खतरनाक बात है.
अंतिम रूप से मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि भारत के गरीबों दलितों बहुजनों और विशेष रूप से स्त्रीयों को वैज्ञानिक विश्लेषण पर खड़े श्रमण दर्शनों औ प्राचीन भारतीय भौतिकवाद का अध्ययन करना चाहिए. हालाँकि एसा करते हुए यह नहीं माना जा सकता कि प्राचीन बौद्ध धर्म अगर लौट आयेगा तो भारत में या भारत के शोषितों और स्त्रीयों के जीवन में खुशहाली आ जायेगी.
एक बात हजार बार नोट कर लेनी चाहिए कि अतीत के सभी धर्म अब हमारे किसी काम के नहीं हैं. सबका अपना हिंसक, पाखंडी और अन्धविश्वासी इतिहास रहा है.
हमें अपने भविष्य के लिए अतीत से आने वाले या अतीत के किसी स्वर्णयुग की प्रशंसा करते हुए किसी भी धर्म को आधार नहीं बनाना है. बल्कि हमें भविष्य की तरफ देखती हुयी लोकतांत्रिक चेतना और तर्कबुद्धि का सहारा लेना है.
अब चूँकि इस आशय से तुलनात्मक रूप से बुद्ध सबसे वैज्ञानिक नजर आते हैं इसलिए मैं बुद्ध की प्रशंसा कर रहा हूँ. प्राचीन बौद्ध धर्म और महायान का इतिहास भी दलितों के लिए बहुत उत्साहवर्धक या आश्वासन देने वाला नहीं कहा जा सकता.
लेकिन इतना जरुर कहा जा सकता है कि बुद्ध की मूल अनात्म्वादी और अनीश्वरवादी शिक्षाएं भविष्य के भारत के लिए उपयोगी सिद्ध होंगी. ये बात याद रखी जानी चाहिए कि तर्कबुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टि इसलिए महान नहीं हैं क्योंकि उन्हें बुद्ध ने प्रचारित किया है, बल्कि बुद्ध इसलिए महान हैं क्योंकि उन्होंने तर्कबुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टि का प्रचार किया है.
जो लोग बुद्ध या बौद्ध धर्म में आश्वासन खोज रहे हैं उन्हें अपने नजरिये में एक बात और जोड़ लेनी चाहिए कि बुद्ध या बौद्ध धर्म अगर उन्हें अधिक तर्कशील या वैज्ञानिक नहीं बना रहा है तो उनकी बुद्ध की शिक्षाओं की समझ में कुछ कमी है और इस कमी का फायदा उठाकर अन्धविश्वासी ताकतें उन्हें फिर से गड्ढे में गिरा सकती हैं.
इसीलिये डॉ. अंबेडकर ने प्राचीन या ज्ञात बौद्ध धर्म को नहीं चुना बल्कि उन्होंने वैज्ञानिक और लोकतान्त्रिक चेतना दृष्टि पर आधारित बौद्ध धर्म का आविष्कार किया है.
ये नया धर्म या नवयान सफल होगा या नहीं ये बात महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन ये बात अधिक महत्वपूर्ण है कि शोषितों दलितों की मुक्ति के लिए डॉ. अंबेडकर ने किस तरह के बुद्ध या बौद्ध धर्म को चुना या निर्मित किया है. इसका मतलब साफ़ है. हमें अतीत से आने वाले रेडीमेड बौद्ध धर्म में नहीं बल्कि ज़िंदा और भविष्य की फ़िक्र करने वाली “बुद्ध-दृष्टि” की आवश्यकता है.
ये बात बहुत बहुत महत्वपूर्ण है. इस प्रकार बुद्ध और बुद्ध की शिक्षाओं में आश्वासन खोजने वाले लोगों के कंधों पर अपने भविष्य के हित लिए ही नहीं बल्कि भारत के भविष्य के हित लिए भी एक बड़ी जिम्मेदार आन पड़ी है.
गुजरात के मेहसाणा जिले में बीते रविवार (14 मई) को एक धार्मिक आयोजित था। इसमें शामिल दलित समाज के लोगों का आरोप है कि वहां उनसे जातिगत भेदभाव किया गया। अनुसूचित जाति के लोगों का कहना है कि धार्मिक आयोजन में दावत के दौरान उन्हें पाटीदार समाज के लोगों ने अलग बैठाकर खाना खिलाया।
इस मामले में भटरिया गांव के दलित समाज के लोगों का कहना है कि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के अवसर पर पाटीदार समाज ने रात्रिभोज का आयोजन किया दलित समाज के लोगों को सबके साथ नहीं खिलाकर, उनके लिए मंदिर से कुछ दूरी पर गांव के एक स्कूल में खाने की व्यवस्था की गई थी। दलित समाज के लोगों का कहना है कि इससे उन्हें अपमान महसूस हुआ और उन्होंने खाने से मना कर दिया। यहीं नहीं इस गांव की मुखिया विजयाबेन परमार जो कि दलित समाज से हैं, उन्होंने भी आरोप लगाया कि ग्राम पंचायत का प्रधान होने के बावजूद उन्हें दावत के दौरान अन्य ग्रामीणों से अलग बैठने के लिए कहा गया। उन्होंने कहा कि हम इस अपमान को बर्दास्त नहीं करेंगे। इस घटना के बाद दलित समाज के लोगों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर इस भेदभाव के दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की मांग की है।
हालांकि मामला तूल पकड़ने के बाद अब पाटीदार समाज के लोग इन आरोपों को गलत बताते हुए लीपापोती कर रहे हैं और मामले में सुलह की कोशिशें तेज हो गई है। हालांकि इस घटना ने दलितों के साथ होने वाले भेदभाव के कई अन्य मामलों को भी उजागर कर दिया है। कुछ स्थानीय दलितों, जिनमें कांतिभाई नादिया शामिल हैं, उनका आरोप है कि भटरिया गांव में दलितों के साथ अछूतों की तरह व्यवहार होता है। हमारे समाज की महिला सदस्यों को आंगनबाड़ी केंद्रों में खाना बनाने की अनुमति नहीं है। कुछ मामलों में तो नाई भी बाल काटने से इंकार कर देते हैं। उन्होंने कहा कि आखिर हमें इस तरह के अन्याय और अपमान को कब तक सहना पड़ेगा।
साफ है कि देश के तमाम हिस्सों में जिस तरह दलितों के साथ भेदभाव की खबरें हर रोज सामने आती हैं, वह भारत के गांव-गांव में मनुवदियों के दिमाग में भरे हुए जातीय सड़ांध की पोल खोलता है।
कर्नाटक का मुख्यमंत्री कौन होगा, इसको लेकर लगातार मंथन जारी है। इस पर किसी भी वक्त फैसला आ सकता है कि कर्नाटक का ताज या तो डी के शिवकुमार को मिलेगा या फिर सिद्धारमैया को। इस बीच में कर्नाटक में कांग्रेस की शानदार जीत के बाद जो तमाम आंकड़े सामने आ रहे हैं, उसने साफ कर दिया है कि प्रदेश में दलित और आदिवासी समाज ने भाजपा को नकार दिया है और कांग्रेस को भर-भर कर वोट दिया है। यह तब हुआ है जब भाजपा ने वादा किया था कि कर्नाटक में सत्ता में आने पर वह इनका रिजर्वेशन बढ़ाएगी।
बावजूद इसके अगर समाज के इन दो महत्वपूर्ण हिस्सों ने भाजपा को खारिज कर दिया तो इसकी वजह क्या है? क्या यह भाजपा के लिए कर्नाटक के साथ-साथ केंद्र और तमाम दूसरे राज्यों के लिए भी खतरे की घंटी है? दरअसल कर्नाटक में दलितों और आदिवासियों ने किस तरह भाजपा के पसीने छुड़ा दिये हैं, उसे समझना जरूरी है।
कर्नाटक में अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासी समाज के लिए 15 सीटें रिजर्व हैं। 2018 के चुनाव में भाजपा ने इसमें से 7 सीटें जीती थी। लेकिन इस बार वह एक भी सीट नहीं जीत सकी है। इसी तरह पिछले चुनाव में भाजपा ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 36 सीटों में 16 पर जीत दर्ज की थी, जो कि इस बार 12 पर रुक गई। यानी भाजपा को दलित और आदिवासी समाज ने जोरदार झटका दिया है।.
भाजपा को मिला यही झटका कांग्रेस के लिए संजीवनी बन गया। 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने 7 एसटी सीट जबकि 12 एससी सीट जीती थी। जबकि इस बार कांग्रेस को अन्य समाजों के साथ दलित और आदिवासी समाज का भरपूर समर्थन मिला है। कांग्रेस पार्टी ने अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व 36 सीटों में से 21 पर जीत हासिल की है। जबकि जनजाति के लिए रिजर्व 15 सीटों में से 14 जीत ली है। एक सीट जनता दल सेकुलर के हिस्से आई है। यानी इन दोनों समाजों ने कांग्रेस की झोली में 35 सीटें डाली है।
अगर प्रदेश में जातीय समीकण को देखें तो आज तक की एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक की सियासत में सबसे मजबूत लिंगायत समाज का प्रभाव 67 सीटों पर है। जबकि वोक्कालिगा का 48 सीटों पर प्रभाव माना जाता है। इसके अलावा मुस्लिम समाज का प्रभाव 50 सीटों पर है, जबकि दलित समाज 36 सीटों पर प्रभाव रखता है। ब्राह्मणों की बात करें तो इस समाज का प्रभाव 15 सीटों पर है जबकि कोरबा का 10 और ओबीसी का 24 सीटों पर प्रभाव है।
ऐसे में दलितों और आदिवासियों का भाजपा से मोहभंग भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ी खबर है। कर्नाटक के नतीजे कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए सबसे अहम है। क्योंकि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और खड़गे के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद यह पहला बड़ा चुनाव था। तो क्या यह माना जाए कि भाजपा की केंद्र से उल्टी गिनती शुरू हो गई है?