काले धन के विमर्श के भंवर से निकलने की जरुरत

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8 नवम्बर की रात 12 से उठी नोटबंदी की सुनामी के तीन के तीन सप्ताह गुजर चुके हैं और इसकी चपेट में आने से देश का शायद एक भी नागरिक बच नहीं पाया है.विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक़ इससे राष्ट्र का जीवन जिस तरह प्रभावित हुआ,वैसा भारत-चीन या भारत-पाक के मध्य हुई लड़ाइयों में भी नहीं देखा गया.भारी आर्थिक क्षति के साथ ही इसमें 80 से अधिक लोग शहीद भी हो चुके हैं.इससे हुई हानि पर अपना कर्तव्य स्थिर करने में विपक्षी दलों ने कोई कमी नहीं की.इस मुद्दे पर एकबद्ध विपक्ष सड़क से संसद तक आक्रामक तरीके से मुखर रहा.वह जनता तक यह बात भी पहुंचा दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी के जरिये आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला अंजाम दिया है.वह अपनी पार्टी,मित्रों तथा कुछ खास–खास उद्योगपतियों का पैसा ठिकाने लगाने में व्यस्त रहने के कारण बिना पूरी तैयारी के नोटबंदी का फैसला ले लिए,जिस कारण ही जनता को इतनी मुसीबतों का सामना करना पड़ा है.बहरहाल नोटबंदी से हुई दिक्कतों में अवाम का पूरा साथ देने और इस पर मोदी सरकार को बुरी तरह एक्सपोज करने के बाद विपक्ष को पूरा भरोसा हो चला था कि जनता मोदी से क्षुब्ध हो गयी है.इस विश्वास के कारण ही विपक्ष के बहुत से नेता मोदी सरकार को चुनाव में उतरने के लिए ललकारने लगे .किन्तु नोटबंदी के फैसले के दो सप्ताह बाद मोदी सरकार ने जो सर्वे कराया ,वह विपक्ष की उम्मीदों के विपरीत:कुछ हद तक चौकाने वाला रहा.सर्वे में पाया गया कि 92 प्रतिशत लोगों को भ्रष्टाचार से लड़ने का नोटबंदी का कदम पसंद आया है तथा उन्हें यह विशवास है कि इससे कालेधन,भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर लगाम लगेगी.विभिन्न सर्वेक्षणों के अतिरक्त सात राज्यों के लोकसभा व विधानसभा सीटों के उपचुनाव के बाद ही महाराष्ट्र और गुजरात में जो स्थानीय निकायों के उपचुनाव हुए, उनमें भी जनता को नोटबंदी के पक्ष खड़ा पाया गया.

किन्तु तमाम सर्वेक्षणों और उपचुनाव परिणामों से विपक्ष अप्रभावित नजर आया.उसे आज भी लग रहा है कि नोटबंदी के बाद जनता को जो तकलीफ उठानी पड़ी है उसकी कीमत मोदी को आने वाले चुनावों में अदा करनी पड़ेगी,इसलिए वह नोटबंदी के खिलाफ विरोध की नई-नई मंजिलें तय करते जा रहा है.लेकिन वह समझ नहीं पा रहा है कि ऐसा करने के क्रम में उसकी स्थिति उस तत्कालीन विपक्ष जैसी होती जा रही है जिसने 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवीपर्स के खात्मे का विरोध किया था.

वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी ने जो नोटबंदी का फैसला लिया है भारत में उसकी तुलना सिर्फ इंदिरा गाँधी के 1969 के फैसले से ही हो सकती है.किन्तु 1969 और 2016 के साहसिक फैसलों में काफी साम्यता होने के बावजूद दो बड़े फर्क हैं.1969 में इंदिरा गाँधी ने अपनी छवि एक प्रगतिशील प्रधानमंत्री रूप स्थापित करने के लिए जो कठोर फैसले लिए उससे अवाम का जीवन आज जैसा नरक नहीं बना था,इसलिए उन्हें जनता के बीच रोने की नौबत नहीं आई थी. दूसरा बड़ा फर्क यह था कि बैंकों का राष्ट्रीकरण और प्रिवीपर्स का खात्मा सचमुच में भारी जोखिम भरा फैसला था .ऐसा करके इंदिरा गांधी ने राजे-महाराजे और धन्ना सेठों को सीधी चुनौती दी थी,जिसका राष्ट्र को चिरस्थाई लाभ मिला.इस लिहाज से नोटबंदी का फैसला कहीं से भी साहसिक और जोखिम भरा नहीं नजर आ रहा.इसमें जो भी तकलीफ हुई है साधारण और मध्यम वर्ग की जनता को हुई है,काले धन के लिए जो सचमुच में जिम्मेवार हैं,उन्हें कहीं से भी चुनौती मिली ही नहीं है.

नोटबंदी के फैसले को खुद मोदी द्वारा मना किये जाने के बावजूद उनके दल के साथ कुछ नोटबंदी समर्थक बुद्धिजीवि भी अतिउत्साह में इसे काले धन पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ बताये जा है.किन्तु वास्तव में यह काले धन की आड़ में विपक्षी दलों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ है .इसके जरिये निर्ममता से विपक्षी दलों को आर्थिक रूप से पंगु बनाने का कार्य अंजाम दिया है.शायद नोटबंदी का मुख्य लक्ष्य विपक्ष को पंगु बनाना ही था क्योंकि प्रधानमंत्री इस बात से अनजान नहीं होंगे कि नकदी का योगदान कुल काले धन की मात्रा में ऊंट के मुंह में जीरे से अधिक नहीं है,लिहाजा नोटबंदी के जरिये काले धन और भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं किया जा सकता.हां ,इसके जरिये यह सन्देश जरुर दिया जा सकता था कि भले ही वह विदेशों से काला धन लाने में पूरी तरह विफल रहे ,किन्तु काले धन के खिलाफ कठोर हैं.हालांकि जिस तरह मोदी सरकार काला धन रखने वालों को आयकर कानून संशोधन विधेयक -2016 के जरिये आधा देकर काला धन सफ़ेद करने का अवसर मुहैया कराई है,उससे उसकी काला धन विरोधी छवि को काफी आघात लगा है.शायद इसीलिए उनके समर्थक काले धन के खात्मे के बजाय कैश्लेश लेस इकॉनमी का गुणगान करने लगे हैं. किन्तु एक दिसंबर से देश के संगठित व असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोग वेतन लेने के लिए भटकते रहने के बावजूद जिस तरह सोत्साह नोटबंदी का समर्थन करते दिख रहे हैं ,उससे तय है कि प्रधानमंत्री मोदी राजग के सहयोगियों तथा संघ के तीन दर्जन संगठनों और मीडिया के जरिये 2017 के चुनाव में नोटबंदी को विपक्ष के खिलाफ सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करने में सफल हो जायेंगे.

हालही में एक विद्वान ने लिखा है-‘भारतीय राजनीति की एक विशेषता यह बनती जा रही है कि जब परिस्थितियां सत्ताधारी दल के प्रतिकूल जाने लगे तो एक विवादास्पद निर्णय लेकर विमर्श की पूरी धारा को एक ही दिशा में प्रवाहित कर दो.’सत्ता में आने के पूर्व विदेशों से कालाधन ला कर प्रत्येक के खाते में 15-15 लाख जमा कराने तथा हर वर्ष दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने जैसे भारी भरकम वादों को पूरा करने में बुरी तरह व्यर्थ प्रधानमंत्री के लिए विमर्श को उस काले धन ,जो नकदी के रूप में कुल काले धन का सिर्फ 5-6 %प्रतिशत है एवं कई विद्वानों के मुताबिक जिस पर वर्तमान सरकार का एक्शन मक्खी पर तोप चलाने जैसा है,पर केन्द्रित करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था.उन्हें इस बात का भलीभांति इल्म था कालेधन का मुद्दा ऐसा है जिस पर अवाम का भावनात्मक दोहन बड़ी आसानी से किया जा सकता है.इस कारण ही जन लोकपाल के जरिये कभी काला धन और भ्रष्टाचार के खात्मे का सब्ज बाग़ दिखाकर अन्ना-केजरी जैसे साधारण लोग सुपर हीरो बन गये थे .शायद उनकी सुपर छवि को दृष्टिगत रखकर ही मोदी ने अपनी सारी विफलता को ढकने के लिए विमर्श की पूरी धारा को काले धन पर केन्द्रित कर दिया है और पूरा विपक्ष इसके भंवर में फँस गया है.

सारी स्थिति देखते हुए यह बात जोर गले से कही जा सकती है मोदी ने नोटबंदी के जरिये यूपी चुनाव के लिए काले धन की पिच तैयार कर दी है और इस पर खेलने पर विपक्ष की स्थिति कोहली सेना के सामने टॉस हारी विदेशी टीमों जैसी होना तय है.ऐसे में आर्थिक रूप से लुंज-पुंज हो चुका विपक्ष यदि भारी पॉलिटिकल माइलेज ले चुके मोदी को मात देना चाहता है तो उसे मौजूदा विमर्श के भंवर से निकलना होगा.इसके लिए खुद मंडल के दिनों की भाजपा से प्रेरणा लेने से श्रेयष्कर कुछ हो ही नहीं सकता.

स्मरण रहे 7 अगस्त,1990 को जब मंडल रिपोर्ट के जरिये पिछड़ों को आरक्षण मिला तथा वर्ण-व्यवस्था के वंचित(दलित,आदिवासी ,पिछड़े और उनसे धर्मान्तरित ) हिन्दू धर्म द्वारा खड़ी की गयी घृणा और शत्रुता की प्राचीर तोड़कर भ्रातृ भाव लिए एक दूसरे के निकट आने लगे,तब भाजपाइ अडवाणी ने यह कह कर राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन छेड़ दिया कि मंडल से समाज टूट रहा है.उसके बाद सारा विमर्श राम मंदिर पर केन्द्रित होने के साथ भाजपा के सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त हो गया .आज विपक्ष यदि एक बड़े तानाशाह के रूप में उभर रहे मोदी को मात देना चाहता है तो राम जन्मभूमि आन्दोलन से प्रेरणा लेते उसे विमर्श को सामाजिक न्याय की राजनीति पर केन्द्रित करने का सफल उपक्रम चलाना होगा.इसके लिए आर्थिक,राजनैतिक,न्यायिक,शैक्षिक,धार्मिक इत्यादि समस्त क्षेत्रों के अवसरों के बंटवारे में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने का मुद्दा खड़ा करना शायद बेहतर होगा।

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