उम्मीद है कि राजस्थान में इंद्र मेघवाल का मुद्दा दलित समाज के लोग भूले नहीं होंगे, जहां एक सवर्ण शिक्षक का मटका छूने के कारण इंद्र मेघवाल को शिक्षक ने ऐसा पीटा कि कुछ दिनों बाद इस बच्चे की मौत हो गई थी।
ऐसा ही एक और शर्मनाक मामला फिर से राजस्थान के ही भरतपुर से सामने आया है। जिले के भीमनगर स्थित राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक ने 7वीं कक्षा के दलित छात्र को बेरहमी से महज इसलिए पीट दिया कि छात्र ने टंकी में पानी नहीं होने पर स्कूल में स्टॉफ के लिए रखे वॉटर कैंपर से पानी पी लिया। पीड़ित छात्र के भाई रनसिंह ने शिक्षक के खिलाफ मामला दर्ज कराया है।
भीमनगर पहरिया अंबेडकर कॉलोनी निवासी पीड़ित छात्र रविंद्र जाटव ने बताया कि वह भीमनगर के सरकारी स्कूल में 7वीं कक्षा का छात्र है। शुक्रवार 8 सितंबर को रोजाना की तरह उसने और अन्य बच्चों ने कक्षा कक्ष की सफाई की थी। प्रार्थना के बाद पानी पीने के कैंपर आ गए थे। प्यास लगने पर वह टंकी पर गया, लेकिन उसमें पानी नहीं था।
इस पर उसने दो अन्य छात्रों को देखकर स्कूल स्टॉफ के लिए रखे कैंपर से बोतल में पानी भरकर पी लिया। स्कूल के सर गंगाराम गुर्जर नाराज हो गए। उन्होंने कक्षा में तीनों बच्चों को खड़ा कर दिया। लेकिन सर ने अपने सजातीय दोनों बच्चों को तो बिठा दिया और उसकी डंडे और घूंसों से पिटाई कर दी।
इस घटना के बाद दलित समाज के स्थानीय लोगों ने हाईवे रोक दिया और इंसाफ कि मांग की। हालांकि स्कूल प्रशासन अब अपने बचाव में मामले की लीपापोती में जुटा है। आए दिन दलित समाज के छात्रों के साथ स्कूल में हो रहे इस तरह के जातिवाद समाज की जातिवादी सोच की कलई खोलने के लिए काफी है।
दलितों और आदिवासियों को छोड़कर देश के तमाम मंदिरों के दरवाजे आम तौर पर हिन्दू समाज के सभी लोगों के लिए हर दिन खुले रहते हैं। लेकिन अयोध्या में बन रहे राम मंदिर में प्रवेश और आरती के लिए हर दिन अलग-अलग जातियों के लोगों के लिए आरक्षित करने की एक दिलचस्प मांग सामने आई है। इसमें दो दिन दलितों के लिए भी आरक्षित करने की मांग की गई है। यह मांग है जगतगुरु परमहंस आचार्य की।
नए साल 2024 में मकर संक्रांति के बाद अयोध्या के राम मंदिर के गर्भ गृह में राम लला कि प्राण प्रतिष्ठा होनी है। इसके बाद से राम मंदिर के दरवाजे आम जनता के लिए खुलने हैं। इसको देखते हुए जगतगुरु परमहंस आचार्य ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को एक पत्र भेजा है। इसमें उन्होंने अलग-अलग दिन अलग-अलग जाति और वर्ग के लोगों द्वारा राम लला की आरती कराए जाने की मांग की है।
परमहंस आचार्य ने राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को एक पत्र भेजा है। इसमें एक साप्ताहिक कैलेंडर चार्ट दिया गया है और बताया गया है कि राम लला मंदिर में हर दिन किस जाति और क्षेत्र के लोगों के लिए आरक्षित हो।
चार्ट के मुताबिक जगतगुरु परमहंस आचार्य का कहना है कि राम मंदिर में रविवार के दिन क्षत्रिय समाज के लोग पूजा और आरती करें। सोमवार का दिन पिछड़े समाज के लिए आरक्षित हो, मंगलवार के दिन राममंदिर में ऐसे लोगों को पूजा और आरती करने दिया जाए जो पराक्रमी हैं और जिन्होंने गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है। बुधवार के दिन अंतरिक्ष वैज्ञानिक, और बड़े लेखक, साहित्यकार, कवि आदि साहित्यिक दुनिया के लोग आरती करें। बृहस्पतिवार का दिन जगतगुरु, शंकराचार्य समेत धर्माचार्य और साधु-संतों एवं ब्राह्मणों के लिए आरक्षित हो। जबकि शुक्रवार और शनिवार को दलित समाज द्वारा आरती कराई जाए।
जगतगुरु का तर्क है कि ऐसा करने से छुआछूत का भाव खत्म होगा। उनका कहना है कि उनकी मांग नहीं मानी गई तो वह अन्न-जल त्याग देंगे और बड़ा आंदोलन करेंगे।
हालांकि राम मंदिर ट्रस्ट ने फिलहाल ऐसे किसी पत्र के मिलने से इंकार किया है। लेकिन जगतगुरु परमहंस आचार्य की अजीबो गरीब मांग से बहस शुरू हो गई है कि आखिर ऐसी मांग से समाज में छूआछूत का भाव कैसे खत्म हो जाएगा? अगर कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति जैसे लेखक, साहित्यकार, गोल्ड मेडेलिस्ट खिलाड़ी दलित या पिछड़े समाज का होगा, तो उसे दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षित दिन पर जाना होगा या फिर प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए आरक्षित दिन पर? बाबा रामदेव को ये लोग शूद्र मानेंगे या फिर संत? राष्ट्रपति को प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाएगा या आदिवासी समाज का व्यक्ति?
दरअसल इस तरह के तमाम धर्माचार्य असल में हिन्दू धर्म की बुराईयों को दूर करने के चाहे जो दावे करें, जमीन पर वह हिन्दू धर्म में फैली कुरितियों और छूआछूत पर वो कुछ भी कहने से परहेज करते हैं। आए दिन दलितों पर जाति के कारण होने वाले तमाम अत्याचार पर ये कभी भी खुल कर नहीं बोलते। दलितों को मंदिरों में जाने पर मारने-पीटने जैसी घटना पर भी ऐसे संतों ने कभी भी आंदोलन करने या फिर अनशन करने की धमकी नहीं दी। इसी तरह दलित समाज से संबंध रखने वाले पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ ओडिशा के जगन्नाथपुरी मंदिर में जब धक्का-मुक्की की गई थी, तब हिन्दू धर्म के धर्माचार्यों ने इसकी कड़ी निंदा नहीं की, न ही इसे गलत बताते हुए इसके खिलाफ आंदोलन करने को कहा।
ऐसे में राम मंदिर मामले में इस तरह का शिगूफा छोड़ना समझ से परे है। बेहतर यह होता कि जगतगुरु परमहंस आचार्य और उन जैसे अन्य धर्माचार्य जाति के कारण हर दिन दलितों पर हो रहे अत्याचार को लेकर ऊंची जाति और अन्य मजबूत जातियों के खिलाफ आवाज उठाते और अनशन और आंदोलन की घोषणा करते, तब शायद बेहतर संदेश जाता।
सात सीटों पर हुए उपचुनाव में तीन पर भाजपा जीती जबकि चार पर इंडिया गठबंधन के दल। इस उप चुनाव में जिस सीट की सबसे अधिक चर्चा हो रही है, वह है उत्तर प्रदेश की घोसी सीट। जहां समाजवादी पार्टी के सुधाकर सिंह ने भाजपा के दारा सिंह चौहान को 42,759 वोटों से हराया।
यहां भाजपा की ओर से दारा सिंह चौहान मैदान में थे, जबकि समाजवादी पार्टी की ओर से सुधाकर सिंह। दारा सिंह चौहान इसी सीट से सपा के विधायक थे और 22 हजार वोटों से जीते थे, लेकिन मंत्री पद की लालच में वह भाजपा में चले गए। फिर घोसी के विधायक पद से इस्तीफा देकर उप चुनाव की स्थिति पैदा की। भाजपा के टिकट पर घोसी से चुनाव लड़े।
भाजपा के लिए यह प्रतिष्ठा की सीट थी। भाजपा इसे किसी भी कीमत पर जीत कर 2024 लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष पर मनो वैज्ञानिक बढ़त बनाना चाहती थी। दारा सिंह चौहान के लिए प्रचार करने के लिए दर्जन भर से ज्यादा मंत्रियों ने घोसी में चुनाव प्रचार किया। इसके अलावा यूपी के दोनों उप मुख्यमंत्री और खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी दारा सिंह चौहान के पक्ष में प्रचार करने गए। बावजूद इसके भाजपा यह सीट हार गई।
यह तब हुआ जबकि ओमप्रकाश राजभर और संजय निषाद ने भाजपा की ओर से यहां प्रचार किया था, जिनके वोट इस सीट पर निर्णायक थे। घोसी में 55 हजार राजभर, 19 हजार निषाद, 8 हजार ब्राह्मण और 15 हजार ठाकुर मतदाता थे, जो भाजपा के वोट बैंक माने जाते है। बावजूद इसके दारा सिंह चौहान की करारी हार ने उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण से लेकर भाजपा के वर्चस्व को तोड़ दिया है।
समाजवादी पार्टी की बड़ी जीत ने भाजपा को चारो खाने चित्त कर दिया है। इसे लोकसभा चुनाव के पहले जनता का मूड कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह साफ है कि जनता किसी पार्टी को आंख मूंद कर सपोर्ट करने की बजाए उम्मीदवारों को भी तरजीह दे रही है। यह आने वाले राजनीति के लिए अच्छा संकेत है।
बीते कुछ दिनों में दलितों के ऊपर मुस्लिम समाज के द्वारा अत्याचार की खबरें सुर्खियों में आनी शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश में देवरिया जिले और महाराज गंज से आने वाली खबर चौंकाने वाली है। यूपी के देवरिया में बीते शनिवार दो सितंबर को दलित समाज के शिक्षक परशुराम भारती को महज इसलिए पीट कर मार डाला गया क्योंकि उन्होंने रास्ता रोके जाने का विरोध किया था।
घटना देवरिया जिले के थाना गौरी बाजार के नगरौली गांव की है। परशुराम भारती रात को बाजार से अपने घर लौट रहे थे। इम्तियाज और उसका परिवार घर के सामने रास्ते में चारपाई और कुर्सी लगाकर बैठा था। इस बात पर परशुराम भारती ने विरोध किया। जिस पर इम्तियाज के घरवालों ने हमला कर दिया। परशुराम को इतना पीटा गया कि उसकी मौत हो गई।
दूसरी घटना में दलित समाज की एक युवती ने भाजपा नेता पर रेप और पिता की हत्या का आरोप लगाया है। प्रदेश के महाराजगंज जिले में भाजपा नेता पर दलित किशोरी के साथ दुष्कर्म के बाद उसके पिता की हत्या करने का आरोप लगा है। पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर कर आरोपी नेता को हिरासत में ले लिया है। आरोपी का नाम राही मासूम रजा है और वह भाजपा के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ का जिलाध्यक्ष है।
9 और 10 सितंबर को राजधानी दिल्ली में जी-20 समिट के आयोजन के लिए छपे निमंत्रण पत्र के सामने आने के बाद बवाल मच गया है। दरअसल राष्ट्रपति की ओर से डिनर के लिए भेजे गए निमंत्रण पत्र पर प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया की जगह प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखा है, जिस पर नाराजगी जताते हुए कांग्रेस पार्टी ने इसे देश के संघीय ढांचे पर हमला बोला है। साथ ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
डिनर इंविटेशन के लिए छपे इस कार्ड के बाद कई तरह की चर्चा शुरू हो गई है। एक कयास यह लगाया जा रहा है कि क्या केंद्र सरकार देश का नाम जिसे अंग्रेजी में इंडिया और हिन्दी में भारत लिखा जाता है, में से इंडिया हटाने जा रही है।
चर्चा यह भी शुरू हो गई है कि 18-22 सितंबर तक संसद के विशेष सत्र के दौरान सरकार भारतीय संविधान से इंडिया शब्द हटाने से जुड़े बिल को पेश कर सकती है। ऐसे में देश का नाम सिर्फ भारत बुलाये जाने को लेकर बहस तेज हो गई है।
विपक्षी दल कांग्रेस का आरोप है कि जब से विपक्ष ने अपने गठबंधन का नाम इंडिया रखा है, तभी से भाजपा में खलबली है। भाजपा वाले किसी भी हाल में इंडिया कहने से बचने लगे हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने इस मुद्दे को उठाते हुए पीएम मोदी पर चुटकी ली है और अपने अंदाज में घेरा है।
दरअसल भारतीय संविधान के अनुच्छेद-1 में भारत को लेकर दी गई परिभाषा में साफ तौर पर ‘इंडिया दैट इज भारत’ लिखा हुआ है। लंबे समय से देश का नाम सिर्फ भारत रखने को लेकर चर्चा होती रहती है। इंडिया हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की गई थी लेकिन सर्वोच्च न्यायलय ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि पहले से ही संविधान में भारत नाम कहा गया है। ऐसे में यह चर्चा बेमानी हो जाती है। एक सवाल वक्त को लेकर भी उठ रहा है, कहा जा रहा है कि भाजपा वाले ऐसा सिर्फ इसलिए करना चाहते हैं क्योंकि विपक्षी गठबंधन ने अपना नाम इंडिया रख लिया है। फिहलाल इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। देखना होगा कि सरकार की मंशा आखिर है क्या?
उदय निधि स्टालिन ने बयान (2 सितंबर, 2023) दिया है कि “सनातन धर्म का केवल विरोध नहीं, बल्कि उसका उन्मूलन करना है, खत्म करना है।” इस पर भाजपा,आर एस एस, बजरंग दल, हिन्दू महासभा आदि सहित सभी ब्राह्मणवादी संगठनों से जुड़े संत और नेता बौखला गए हैं और तरह तरह से बिलबिला रहे हैं। भारत में सबसे प्राचीन या सनातन धर्म तो श्रमण धम्म और संस्कृति है। ब्राह्मणवादियों का आर्य- ब्राह्मण धर्म तो केवल 1750 ईसापूर्व में भारत पर आर्य ब्राह्मणों के आक्रमण के बाद आया है और अभी तक केवल लगभग 3500 वर्ष पुराना है, जबकि श्रमण धम्म और संस्कृति लगभग 5500 वर्ष पुराना है।
ब्राह्मणवादी सनातन धर्म (तथाकथित हिन्दू धर्म) का सामाजिक एवं सांस्कृतिक आधार ही हैं- ऊंच-नीच पर आधारित वर्ण-व्यवस्था एवं जाति व्यवस्था, लिंग- विभेद पर आधारित परिवार एवं समाज व्यवस्था और ब्राह्मण पुरुषों की पवित्रता -श्रेष्ठता एवं अन्य लोगों की अपवित्रता-हीनता, छुआछूत, अन्धविश्वास और अवैज्ञानिक विचारों पर आधारित देवी- देवताओं के लिए जीवन भर चलने वाले कर्मकांड एवं पूजा- पाठ, हिंसा और नफरत आदि।
लेकिन सनातन श्रमण धम्म एवं संस्कृति का आधार ही है- मानवता, बराबरी, स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय। श्रमण धम्म एवं संस्कृति के शील, नैतिकता और विचार ही भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वर्णित हैं।
उदय निधि स्टालिन एवं अन्य लोगों ने ब्राह्मणवादी, अमानवीय और असंवैधानिक ब्राह्मणवादी सनातन धर्म को उन्मूलन करने की बातें कही हैं, क्योंकि यह धर्म मानवता, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हैं। ये बातें तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13(1) में भी अन्तर्निहित हैं कि संविधान लागू होने के पहले भारत में प्रवृत्त (चल रही) विधियां उस मात्रा तक शून्य होंगी जो संविधान के भाग- 3 में नागरिकों के मौलिक अधिकारों से असंगत होगी यानी जो धार्मिक नियम, परंपरा, प्रथाएं और रुढ़ियां समानता स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय के विरुद्ध हैं वे शून्य (खत्म) किए जाते हैं।
वास्तव में अगर हम संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करते हैं और भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाने के लिए संकल्प लिए हैं तो हमें ब्राह्मणवादी सनातन धर्म, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था को खत्म कर समानता, भाईचारा और न्याय को स्थापित करना ही होगा।
ब्रिटेन के मीडिया संस्थान Financial Times और The Guardian ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मित्र कारोबारी गौतम अडानी को लेकर एक बड़ा धमाका किया है। इस मीडिया संस्थान में अडानी समूह के फ्रॉडगिरी पर दो बड़ी रिपोर्ट आई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अडानी ग्रुप ने गुपचुप तरीके से खुद अपने शेयर खरीदकर स्टॉक एक्सचेंज में लाखों डॉलर का निवेश किया। यह रिपोर्ट ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) की रिपोर्ट के आधार पर किया गया है।
रिपोर्ट मे अडानी ग्रुप के मॉरीशस में किये गए ट्रांजैक्शंस की डीटेल का पहली बार खुलासा करने का दावा किया गया है। कहा गया है कि ग्रुप की कंपनियों ने 2013 से 2018 तक गुपचुप तरीके से अपने शेयरों को खरीदा। जांच में सामने आया है कि कम से कम दो मामले ऐसे हैं जहां निवेशकों ने विदेशी कंपनियों के जरिये अडानी ग्रुप के शेयर खरीदे और बेचे हैं।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अडानी ग्रुप के शेयर तेजी से नीचे गिरे हैं। हिंडेनबर्ग रिपोर्ट के बाद अडानी 2.0 कि यह फाइल चीख-चीख कर बता रही है कि मॉरीशस में फर्जी शेल कंपनियां चला रहे Chang Ching Ling और दुबई के Nasser Ali Shaban Ahil साल 2013 से अपना ब्लैक मनी और हवाला का पैसा अपनी कंपनियों में लगा रहे हैं। अडानी बंधुओं यानी गौतम अडानी और विनोद अडानी के जरिये मॉरीशस, the British Virgin Islands, UAE देशों में शेल कंपनियाँ बनाईं गईं। ये शेल कंपनियाँ Adani की कंपनियों से लिंक थीं। क्योंकि ये दोनों ही चीनी (ताइवानी) और UAE के एजेंट Adani से जुड़ी कंपनियों में डायरेक्टर रहे हैं।
इसे लिखते समय पत्रकारों ने अदानी समूह के काले कारनामों की तमाम फाइलें खोज निकाली। यहां तक कि अदानी समूह की आंतरिक ईमेल तक। सारे दस्तावेजी सबूत भारत के बिके हुए दलाल गोदी मीडिया को नहीं, बल्कि ब्रिटेन के द गार्जियन और फाइनेंशियल टाइम्स को दिए गए। OCCRP की रिपोर्ट कहती है कि अदानी के 75% शेयर्स मॉरीशस में बैठे इन दो लोगों के हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक दूसरे शब्दों में कहें तो गौतम अदानी की दौलत का 75% काला धन है।
हालांकि अडानी समूह ने एक बयान जारी कर इन तमाम आरोपों से इंकार किया है।
बसपा प्रमुख मायावती ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह न तो एनडीए में जाएंगी और न ही इंडिया गठबंधन में। इसके बाद अब दो सवाल सामने है। पहला, बहनजी के इस फैसले से दोनों गठबंधनों में से किसे फायदा होगा और किसे नुकसान। दूसरा, बसपा का यह फैसला कितना सही है।
दरअसल बसपा प्रमुख मायावती ने कभी नहीं कहा कि वो किसी गठबंधन के साथ जाएंगी। लेकिन पिछले कुछ दिनों से मीडिया का एक तबका यह खबर चला रहा था कि मायावती इंडिया गठबंधन में जा सकती हैं और उनकी बातचीत हो रही है। और उन्होंने 40 सीटों की अपनी शर्त रख दी है। जिसके बाद बहनजी को एक बार फिर सामने आकर साफ शब्दों में इससे इंकार करना पड़ा। और साफ करना पड़ा कि बसपा चार राज्यों के विधानसभा और फिर 2024 में लोकसभा चुनाव मैदान में अकेले ही जाएंगी।
लेकिन यहां एक सवाल यह भी है कि क्या इंडिया गठबंधन यह चाहता था कि मायावती गठबंधन में शामिल हों? क्योंकि जब गठबंधन को लेकर पहली बैठक आयोजित की गई तो उसमें बहुजन समाज पार्टी को न्यौता तक नहीं दिया गया। यानी साफ है कि इंडिया गठबंधन में शामिल पार्टियां और नेता भी बसपा को गठबंधन में नहीं रखना चाहते थे। ऐसे में यह कहना कि मायावती और बसपा गठबंधन में शामिल नहीं हो रहे हैं, अपने आप में बेतुका सवाल है।
अब सवाल है कि बहनजी के अकेले चुनाव मैदान में जाने से किसे फायदा होगा और किसे नुकसान? यह साफ है कि बसपा और बहनजी के समर्थक किसी भी हालत में भाजपा को वोट नहीं देते हैं। यानी अगर बहनजी को शुरुआत से ही इंडिया गठबंधन में शामिल करने की कोशिश की जाती और बसपा प्रमुख इसके लिए हामी भरती, तो निश्चित तौर पर इंडिया गठबंधन को बसपा के वोट मिलते। यूपी के अलावा यह वोट कमोबेश पूरे देश में मिलते।
यानी बसपा का कोर वोटर बहनजी के साथ रहेगा। वह इंडिया गठबंधन में नहीं जाएगा तो राजनैतिक रुप से भारतीय जनता पार्टी को बसपा की वहज से होने वाला नुकसान नहीं होगा और इंडिया गठबंधन को फायदा नहीं मिलेगा। इसी को आधार बनाकर तमाम विरोधी बसपा को भाजपा की बी-टीम होने का आरोप लगाते रहते हैं।
अपने आज के ट्विट में बहनजी ने इसका भी जवाब दिया है। बसपा प्रमुख मायावती का कहना है कि, वैसे तो बीएसपी से गठबंधन के लिए यहाँ सभी आतुर हैं, किन्तु ऐसा न करने पर विपक्षी द्वारा खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे की तरह भाजपा से मिलीभगत का आरोप लगाते हैं। इनसे मिल जाएं तो सेक्युलर न मिलें तो भाजपाई। यह घोर अनुचित तथा अंगूर मिल जाए तो ठीक वरना अंगूर खट्टे हैं, की कहावत जैसी है।
यह तो रही दोनों पक्षों की स्थिति। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल यह है कि बसपा का फायदा किसमें है, गठबंधन में, या फिर अकेले रहने में।
निश्चित तौर पर बसपा देश की एक कद्दावर राजनीतिक दल है और देश के कई राज्यों में पार्टी ने अपना दम भी दिखाया है। लोकतंत्र में 20-25 प्रतिशत का वोट बैंक रखने वाली पार्टी को कम कर के नहीं आंका जा सकता है। लेकिन बीते एक दशक में बसपा का ग्राफ लगातार नीचे गया है। इस बीच में सिर्फ बीते लोकसभा चुनाव 2019 में पार्टी तब थोड़ा बेहतर प्रदर्शन कर पाई थी, जब यूपी में सपा और बसपा ने लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ा था। इस एक मौके को छोड़ दें तो बसपा का ग्राफ लगातार गिरा है।
बसपा की राजनीति की बात करें तो वह चुनाव के बाद गठबंधन में यकीन करने वाली पार्टी है। लेकिन 2017 के यूपी चुनाव में 19 सीट जीतने और 22 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली बसपा 2022 में एक सीट और 13 प्रतिशत वोट तक नीचे गिर चुकी है।
यानी बसपा का कोर वोटर कहीं न कहीं उससे छिटक रहा है। खास कर गैर जाटव दलित वोटर। चिंता की बात यह है कि आकाश आनंद को युवा चेहरे के रुप में सामने लाने और तेलंगाना बसपा की कमान पूर्व आईपीएस अधिकारी आर.एस. प्रवीण को देने के अलावा मायावती ने बीते सालों में पार्टी को मजबूत करने के लिए कोई खास कदम उठाया हो, ऐसा नहीं दिखता। पार्टी के तमाम पुराने साथी भी बसपा छोड़ चुके हैं या फिर निकाले जा चुके हैं।
ऐसे में बसपा के गठबंधन में शामिल होने या न होने से भले जिसे भी फायदा या नुकसान हो, खुद बसपा के लिए 2024 का चुनाव अस्तित्व की लड़ाई वाला होगा। अगर मायावती इस चुनाव में अपनी घोषणा के मुताबिक अकेले चुनाव लड़ती हैं तो उनके पास संभवतः यह आखिरी मौका होगा; जब वो बसपा को एक बार फिर राजनीतिक के मैदान में खड़ा कर सकें। यह सालों तक बसपा और मायावती के लिए तमाम विपरीत परिस्थियों में लड़ने वाले बसपा समर्थकों के लिए भी जरूरी है।
राजनीति में जब नेता को सत्ता से बाहर जाने का डर सताने लगे तो वह सबसे पहले देश की जनता को लालच देना शुरू कर देता है। और जब चुनाव पास हो तो वह समय सत्ता रुपी ऊंट का जनता रुपी पहाड़ के नीचे आने का होता है। भाजपा की सरकार ने यही किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एलपीजी की कीमत को 200 रुपये कम करने की घोषणा की है। देश के तमाम समाचार पत्रों में करोड़ो रुपये खर्च कर इसे रक्षाबंधन से पहले बहनों को दिया जाने वाला गिफ्ट बताया गया है। लेकिन सवाल यह है कि बीते साढ़े नौ सालों में मोदी सरकार ने उन्हीं बहनों से जो वसूल किया है उसका क्या? क्या तब पीएम मोदी को अपनी बहनें याद नहीं आई?
कांग्रेस पार्टी इसे इंडिया गठबंधन का डर बता रही है। कांग्रेस नेता और प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि जहां कांग्रेस पार्टी की सरकार है, वहां वह 500 रुपये में गैस सिलेंडर दे रही है, जिसकी वजह से भाजपा डर गई है। सुरजेवाला ने एलपीजी को परिभाषित करते हुए L-लूटों, P- प्रॉफिट कमाओ और G-गिफ़्ट देने का नाटक करो! कहा है।
पक्ष और विपक्ष के आरोपों के बीच इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि गैस सिलेंडर और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने देश की 90 फीसदी आबादी को प्रभावित किया है। मोदी सरकार में गैस की कीमते साल दर साल बेतहाशा बढ़ी है। पिछले तीन सालों में तो इसने सभी रिकार्ड को तोड़ दिया।
जो गैस सिलेंडर 01 मार्च 2014 को कांग्रेस-यूपीए की सरकार में सिर्फ 410 रुपये था, भाजपा-एनडीए की सरकार में वह साल दर साल बढ़ता गया। मोदी सरकार के आते ही 01 मई 2014 को यह कीमत 616 रुपये हो गई थी, जो 01 मई 2021 को 809 रुपये, 01 मई 2022 को 949 रुपये और 01 मई 2023 को 1103 रुपये हो गया है।
अब सवाल यह है कि बीते साढ़े नौ सालों के भीतर तमाम राज्यों के साथ-साथ एक बार लोकसभा का चुनाव भी हो चुका है, तब भाजपा ने कभी पेट्रोल से लेकर गैस सिलेंडर की कीमतों में कोई भारी कटौती नहीं की, बल्कि मूल्य लगातार बढ़ता ही गया। ऐसे में अब राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2024 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले गैस सिलेंडर के दामों में 200 रुपये की कटौती बहुत कुछ कहती है। 2024 में सरकार चाहे जिसकी आए, यह साफ है कि मोदी सरकार डरी हुई है।
एक बहन को इस तरह भाई के शव पर चीखते सुनकर किसी का भी कलेजा फट जाएगा। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की चमड़ी इतनी मोटी होती है कि उन पर जू तक नहीं रेंगती।
घटना मध्यप्रदेश के सागर जिले की है। सागर जिले में खुरई देहात थाना क्षेत्र के बरौदिया-नौनागिर से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। यहां दलित युवती से छेड़छाड़ के पुराने मामले में समझौता न करने पर युवती के 18 साल के भाई को मार डाला गया। मृतक की बहन के मुताबिक BJP मंत्री के गुंडों ने पीड़िता के 18 साल के उसके भाई की हत्या कर दी। यही नहीं, बेटे को बचाने आई मां को निर्वस्त्र कर मारपीट की गई। उनका मकान तोड़ दिया।
घटना बीते गुरुवार 24 अगस्त की है। घटना के बाद पुलिस ने शिकायत पर 9 नामजद और चार अन्य आरोपियों के खिलाफ हत्या समेत अन्य धाराओं में केस दर्ज कर लिया है। हालांकि कुछ आरोपी अब भी फरार है। उसमें एक आरोपी सरपंच पति भी फरार है।
मृतक की बहन ने बताया कि गांव के विक्रम सिंह, कोमल सिंह और आजाद सिंह घर पर आए थे। माँ से कहने लगे कि राजीनामा कर लो। माँ ने कहा कि जब पेशी होगी तो उसी दिन राजीनामा कर लेंगे। इस पर माँ से बोला कि बच्चों की जान प्यारी नहीं है क्या? ऐसी धमकी देकर वो चले गए। छोटा भाई बस स्टैंड के पास सब्जी लेने गया था। वहां से वापस घर आ रहा था, तभी रास्ते में आरोपी उसके साथ मारपीट करने लगे। मम्मी जब बचाने पहुंची तो मम्मी को भी पीटा और उनको 70 लोगों के सामने बेपर्दा कर दिया। मैंने हाथ-पांव जोड़े लेकिन मेरे भाई को नहीं छोड़ा। मेरा रेप करने की धमकी दी। मैंने जंगल में भाग कर अपनी जान बचाई।
पीड़ित परिवार का कहना है कि तमाम आरोपी भाजपा के एक मंत्री के गुंडे हैं।
इस घटना ने मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लेकर दिल्ली तक को हिला कर रख दिया है। बसपा सुप्रीमो मायावती सहित कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने भी इस मामले में मध्य प्रदेश की सरकार को जमकर घेरा है।
बता दें कि हाल ही में मध्यप्रदेश के सागर जिले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 100 करोड़ रुपये की लागत से रविदास मंदिर की नींव रखी। उसी जिले में दलित युवक को भाजपा के एक मंत्री के गुंडों ने ही मार डाला। साफ है कि दलितों के वोट के लिए तमाम दल और नेता बाबासाहेब आंबेडकर और सतगुरु रविदास सहित तमाम बहुजन महापुरुषों की प्रतिमाएं तो बनाने का ढोंग करती है, लेकिन दलितों पर अत्याचार रोकने के मामले में हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में आए दिन दलितों पर होने वाले अत्याचार की रिपोर्ट इसकी कहानी आप कहते हैं।
अमेरिका के अंबेडकरवादियों ने आखिरकार जाति की वह जंग जीत ली है, जिसको लेकर वह बीते कई महीनों से लड़ाई लड़ रहे थे। केलिफोर्निया में कॉस्ट डिस्क्रिमिनेशन के खिलाफ कानून SB 403 को कैलिफोर्निया एसेंबली ने पास कर दिया। आधी रात को जब भारत सो रहा था, यह खबर सामने आई। इसके बाद दुनिया भर के अंबेडकरवादियों में खासा उत्साह है। खास बात यह रही कि जातिवाद के खिलाफ इस लड़ाई को रिपब्लिक और डेमोक्रेट दोनों दलों का भारी समर्थन मिला। इसके पक्ष में 50 वोट जबकि विरोध में तीन वोट पड़े। यानी अब कैलिफोर्निया में कोई किसी को जाति के आधार पर प्रताड़ित करेगा या जातिगट टिप्पणी करेगा तो अब उसकी खैर नहीं है।
The stunning vote count! A mark in history as no matter where folks stood the California legislature acknowledged caste discrimination and helped us turn pain into power!! pic.twitter.com/lLv5BNCFGT
इस खबर के सामने आने के बाद अमेरिका के तमाम हिस्सों से अंबेडकरवादियों के जश्न की खबरें आ रही है। इस पूरी लड़ाई में कैलिफोर्निया में सीनेटर आयशा बहाव का बड़ा योगदान है। आयशा बहाव सदन में हेवर्ड और फ्रीमोंट इलाके का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस इलाके में दक्षिण एशिया के लोगों की खासी संख्या है। तो दूसरी ओर इस पूरी लड़ाई में भारतीय-अमेरिकी तेनमोई सुंदरराजन की भी भूमिका काफी अहम रही है। तेनमोई जाति के प्रश्न पर चले कई आंदोलनों और मुकदमों से जुड़ी रही हैं और मानवाधिकार के लिए काम करती हैं।
Immediate Press Release Ambedkar Association of North America welcomes the passed bill SB403 with a 50-3 vote in favor in the California Assembly, which has added caste as a protected category. Congratulations. pic.twitter.com/zUF474aLhU
— AANA – Ambedkar Association of North America (@aanausa) August 29, 2023
उनके नेतृत्व में इक्वैलिटी लैब ने अमेरिका में 1500 लोगों पर एक सर्वे किया था, जिसमें अमेरिका में 67 प्रतिशत दलितों को भेदभाव का सामना करने की बात सामने आई थी। इससे भी अमेरिका में जाति विरोधी आंदोलन को मजबूती मिली थी। फिलहाल SB-403 के कैलिफोर्निया में पास होने के बाद अब अमेरिका में राष्ट्रीय स्तर पर जातिवाद के खिलाफ कानून की बहस तेज हो गई है।
तेलंगाना में बसपा के अध्यक्ष औऱ पूर्व आईपीएस अधिकारी डॉ. आर.एस. प्रवीण भी अमेरिका में ही मौजूद हैं। जब यह खबर सामने आई तो उन्होंने भी इस पर खुशी जाहिर की। उन्होंने इसे ऐतिहासिक वोट बताया, जिसे पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा। आर.एस. प्रवीण ने ट्विट कर कहा कि, यह ऐतिहासिक क्षण पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा। कैलिफोर्निया राज्य की विधानसभा, यूएसए ने बिल एसबी 403 को 50-3 बहुमत के साथ मंजूरी दे दी है, यह एक अभूतपूर्व कानून है जो जाति-आधारित भेदभाव पर प्रतिबंध लगाता है, जो न्यायसंगत और न्यायपूर्ण की दिशा में एक महत्वपूर्ण छलांग है। सभी मनुष्य समान पैदा होते हैं। शाबाश, अमेरिका के अम्बेडकरवादियों! एकता हमारी ताकत है।
In a historic vote that will be remembered for generations, the California State Assembly, #USA has approved Bill SB 403 with a 50-3 majority, in a groundbreaking legislation that bans caste-based discrimination, marking a significant leap towards an equitable and just society.…
आर.एस प्रवीण जिस एकता की बात कह रहे हैं, इस पूरी मुहिम में वह साफ तौर पर दिखी है। इस लड़ाई में अमेरिका के तमाम अम्बेडकरवादी संगठनों और रविदासिया समाज के संगठनों ने अहम भूमिका निभाई है। निश्चित तौर पर इसकी गूंज दुनिया के बाकी देशों में जल्दी सुनने को मिलेगी।
भारतीय जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा ने दुनिया के सामने भारत का सीना चौड़ा कर दिया है। नीरज ने 88.17 मीटर थ्रो के साथ विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीत कर इतिसाह रच दिया है। नीरज एथलेटिक्स वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने वाले पहले भारतीय बन गए हैं।
तोक्यो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर भारत की छाती चौड़ी करने वाले नीरज का प्रदर्शन उतार-चढ़ाव भरा रहा। उनका पहला थ्रो फाउल रहा, जबकि उनके प्रतिद्वंदी जर्मनी के जूलियन वेबर 85.79 मीटर थ्रो के साथ टॉप पर पहुंच गए। लेकिन नीरज ने दूसरे अटेम्पट में जैसे सबको चौंका दिया। भारतीय स्टार ने दूसरी बार 88.17 मीटर का थ्रो किया, जिसके बाद साफ हो गया कि गोल्ड नीरज की झोली में आ गया है। दूसरा कोई भी खिलाड़ी नीरज के इस थ्रो के आस-पास भी नहीं पहुंच सका।
नीरज के इस शानदार प्रदर्शन से देश भर में उल्लास है और सोशल मीडिया नीरज को बधाइयों से पटा हुआ है। हर कोई नीरज को बधाई दे रहा है।
बहुजन समाज पार्टी इंडिया गठबंधन में शामिल हो सकती है। इसको लेकर इंडिया गठबंधन के गुटों द्वारा बहनजी से संपर्क साधा गया है। खबर है कि बहनजी ने भी इसको लेकर साकारात्मक संकेत दिया है, लेकिन साथ ही गठबंधन में शामिल होने को लेकर अपनी एक शर्त रख दी है। अब 31 अगस्त और एक सितंबर को मुंबई में होने वाली इंडिया गठबंधन की बैठक में इस पर चर्चा होने की खबर आ रही है। अगर इंडिया गठबंधन के लोग बसपा की इस मांग को पूरा करने को तैयार हो जाएंगे, तो बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती गठबंधन में शामिल होने को लेकर अपनी मुहर लगा देंगी।
दरअसल तमाम दल और मीडिया बसपा को चाहे जितना भी कमजोर बताए, विपक्षी दलों से लेकर भाजपा तक को पता है कि उत्तर प्रदेश में बसपा अब भी एक बड़ी ताकत है। विपक्ष को पता है कि अगर इंडिया गठबंधन में बसपा के 20-22 प्रतिशत परंपरागत वोट शामिल हो जाते हैं तो उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को कमजोर किया जा सकता है। और विपक्षी दल उलट फेर करने में कामयाब हो सकते हैं। वहीं दूसरी ओर बसपा के समर्थक देश के हर जिले में है। यूपी के अलावा मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार आदि करीब दर्जन भर राज्य ऐसे हैं जहां बसपा ने अपनी ताकत दिखाई है। इंडिया गठबंधन को इसका फायदा भी मिलेगा।
मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो इंडिया गठबंधन की ओर से जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला ने मायावती से बात की है, इसी दौरान मायावती ने पार्टी का रुख उनके सामने रखा और अपनी डिमांड भी बता दी है। दरअसल बहनजी उत्तर प्रदेश में बसपा के लिए 40 सीटें चाहती हैं। अगर इंडिया गठबंधन बसपा को 40 सीटें देने के लिए तैयार हो जाता है, तो बसपा गठबंधन में आ सकती है।
हालांकि बहनजी कई मौकों पर किसी भी पार्टी से गठबंधन की संभवना से इंकार कर चुकी है, लेकिन देश में 2024 लोकसभा चुनाव के पहले जिस इंडिया और एनडीए के बीच की लड़ाई तेज हो गई है, उससे खासकर उत्तर भारत के राजनीतिक दलों का बचना मुश्किल लग रहा है। बहुजन समाज पार्टी के भीतर से भी तमाम नेता गठबंधन के पक्ष में है। ऐसे में पार्टी को एकजुट रखने और नेताओं को साथ रखने के लिए बसपा प्रमुख मायावती पर भी अंदरुनी दबाव बढ़ता जा रहा है। लेकिन बसपा अपनी ताकत जानती है, बहनजी ने इशारा कर दिया है कि वह गठबंधन में आ तो सकती हैं, लेकिन अपनी शर्तों पर। अब देखना होगा कि मुंबई में 31 अगस्त और एक सितंबर को होने वाली बैठक में क्या फैसला होता है। अगर बहुजन समाज पार्टी इंडिया गठबंधन में शामिल हो जाती है तो निश्चित तौर पर गठबंधन को इसका फायदा देश भर में होगा।
बीते कुछ दिनों से जिस खबर की धूम है, वह खबर है चंद्रयान-3 का चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना। देश भर में इसको लेकर खुशी की लहर है। इस पर चर्चा करते टीवी वाले पत्रकार लोग स्क्रीन से बाहर आने को बेताब हैं। मैंने भी फेसबुक और ट्विटर पर अपना प्रोफाइल फोटो बदल दिया है। लेकिन इसी बीच मुझे मेरे मित्र और गुरु भाई गौरव पठानिया, जो कि अभी अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में रहते हैं और वहीं इस्टर्न मेनोनाइट युनिवर्सिटी में सोसियोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, उनकी एक कविता ‘चांद मेनहोल सा लगता है’ याद आ गई और इस हर्ष की बेला में मेरा मन थोड़ा उदास हो गया।
पहले उस कविता की कुछ लाइनों का जिक्र, फिर खबर पर, क्योंकि दोनों जुड़े हुए हैं। अपनी कविता में हमारे कवि मित्र एक गंभीर सवाल उठाते हैं। कहते हैं-
ब्लैक होल… एक ऐसी जगह
जहां गुरुत्वाकर्षण इतना खौफनाक
कि वो विशालकाय सितारों और ग्रहों को भी निगल जाए।
हर सुबह, हजारों लोग, कांधे पर एक रस्सी लटकाए
और हाथ में एक डंडी लिए, निकल पड़ते हैं
अंतरिक्ष यात्री की तरह उतर जाते हैं, इस ब्लैक होल से भी ज्यादा खतरनाक
उस मैन होल में…
और बाहर निकलते ही, या तो एक खबर बन कर
या एक रिपोर्ट बनकर
कि मैन होल में सफाई करते हुए हर साल
दो हजार से भी ज्यादा लोग दम तोड़ देते हैं
सदियों से जाति के इस गुरुत्वाकर्षण ने
ज्ञान रूपी प्रकाश की गति इतनी धीमी कर दी है
कि हम अपने ही घर और मुहल्लों के नीचे का
खगोल शास्त्र नहीं पढ़ पा रहे हैं
ब्लैक होल में अपना भविष्य खुरच रहे एक चचा से मैंने पूछा,
कि चचा सुने हो
दुनिया चंद्रयान से चांद पर जा चुकी है
पर आप अभी तक यहां हो
चचा बोले, बेटा- इस नर्क में रहते-रहते
जीवन एक अमावस सा लगता है
मैं यहां से ऊपर देखता हूं, तो चांद मैन होल सा लगता है
मेनहोल के भीतर से आसमान की ओर देखते ये लोग
वर्षों से इंतजार कर रहे हैं कि कोई मसीहा आएगा
उन्हें खिंच निकालेगा, इस नर्क से बाहर… लेकिन… लेकिन… (कविता समाप्त)
कविता की लाइने समाप्त, लेकिन चंद्रयान के बाद ब्लैक होल और मैन होल की बात सुनकर, उस खूबसूरत चांद पर चहल कदमी करते चंद्रयान के बाद बदबूदार गटर में गले तक डूबे लोगों की तस्वीरें याद कर के अगर आपका मन बजबजा गया होगा, तो उसके लिए माफी। लेकिन सवाल तो बनता है न। भारत चांद पर चला गया, लेकिन अपने लोगों को गटर से नहीं निकाल पाया।
मित्र गौरव पठानिया ने इस कविता को अपने मेंटर और गुरु जेएनयू में प्रोफेसर विवेक कुमार और सफाई कर्मचारी आंदोलन के अगुवा और मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित बेजवाड़ा विल्सन को समर्पित किया है।
जब चंद्रयान चांद पर उतरा और देश का संभ्रांत तबका अपनी छाती ठोक रहा था, बेजवाड़ा विल्सन अपनी छाती पीट रहे थे। जब सारा देश वैज्ञानिकों को और इसरो को बधाईयां दे रहा था, तब सीवर में हो रही मौतों के खिलाफ स्टॉप किलिंग अस के बैनर तले देश भर की यात्रा पर निकले बेजवाड़ा विल्सन तेलंगाना के वरंगल से सवाल उठा रहे थे। उनका कहना था कि, आज हम चाँद तक तो अपनी पहुँच बना चुके हैं, लेकिन धरती पर हमें अब भी उस तकनीक के अमल का इंतज़ार है जिससे गटर की ज़हरीली गैस से जाती जानों को बचाया जा सके।
आज हम चाँद तक तो अपनी पहुँच बना चुके हैं, लेकिन धरती पर हमें अब भी उस तकनीक के अमल का इंतज़ार है जिससे गटर की ज़हरीली गैस से जाती जानों को बचाया जा सके | सीवर-सेप्टिक टैंकों में हमारी हत्याओं के ख़िलाफ़ #Action2023 अभियान तेलंगाना के #वरंगल में |#StopKillingUs#DalitLivesMatterpic.twitter.com/zplR3ZU7C2
आप फिर कह सकते हैं कि चांद की बाते करो, क्या गंदगी लेकर बैठ गए। लेकिन जरा ठहरिये, सोचिए कि क्या बेजवाड़ा विल्सन के सवाल पर बात नहीं होनी चाहिए। वो भी तब जब हर साल हजारों लोग सिर्फ इसलिए मौत का शिकार हो जाते हैं, क्योंकि सरकारें उन्हें सुविधाएं नहीं दे रही है।
सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्यमंत्री रामदास अठावले ने 5 अप्रैल 2023 को भारत की संसद में बताया था कि पांच सालों में सीवर साफ करते हुए 308 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई है। यानी हर सप्ताह एक सफाई कर्मचारी की मौत। लेकिन सरकार झूठ बोल रही है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन पिछले एक साल से ज्यादा समय से सीवर में मौतों के खिलाफ एक अभियान चला रहा है। अभियान का नाम है Stop Killing Us. इसके अगुवा बेजवाड़ा विल्सन का कहना है कि मई 2022 में इस अभियान के शुरू होने से लेकर मई 2023 तक, एक साल में सीवर में 100 से ज्यादा मौतें हुई हैं। यानी सरकार पांच साल में 308 मौत बता रही है जबकि विल्सन का दावा है कि उन्होंने पिछले एक ही साल में 100 से ज्यादा मौत दर्ज की हैं। उनका कहना है कि 1993 से लेकर अब तक सीवर में 2000 से ज्यादा मौते हो चुकी है। सवाल यह है कि उसका जिम्मेदार कौन है?
ब्लैक होल में अपना भविष्य खुरच चुके चचा के बच्चों का भविष्य कब सुरक्षित होगा? क्योंकि जिस दिन चचा और उन जैसों के बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा और बेजवाड़ा विल्सन को Stop Killing Us की यात्रा निकालने की जरूरत नहीं होगी, उसी दिन चंद्रयान जैसे मिशन सार्थक होंगे।
हमेशा आसमान की ओर देखना जरूरी नहीं होता, कभी-कभी जमीन पर भी देख लेना चाहिए। सच्चाई का अहसास होता है।
2024 लोकसभा चुनाव में पार्टियों को हराने और जीताने का खेल शुरू हो गया है। इस खेल को खेलने वाली सर्वे कंपनियां अपने-अपने दावों के साथ बाजार में उतर गई हैं। कोई किसी को हरा रहा है तो कोई किसी को जीता रहा है।
हमेशा की तरह सबकी निगाहें इस बार भी उत्तर प्रदेश पर लगी हुई है। ऐसे में इस बात के सर्वे आने शुरू हो गए हैं कि अगर आज उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए तो प्रदेश में सीटों की स्थिति क्या होगी, इसको लेकर इंडिया टुडे और सी वोटर्स ने मिलकर एक सर्वें किया है। इसके जो आंकड़े सामने आए हैं, वो चौंकाने वाले हैं। खासतौर पर बहुजन समाज पार्टी के लिए।
इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वे के मुताबिक उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से एनडीए को 72 सीटें, समाजवादी पार्टी को 7 सीटें जबकि कांग्रेस को 1 सीट मिलने की बात कही गई है। वहीं इस बार सबसे बड़ा झटका बसपा को लगने का जिक्र है। सर्वे के मुताबिक बसपा को एक भी सीट नहीं मिलेगी।
लेकिन जिस सर्वे में 2024 के चुनाव में बसपा को यूपी में एक भी सीट नहीं मिलने की बात कही जा रही है, जरा उस सर्वे की सच्चाई जान लिजिए। इंडिया टुडे-सी वोटर ने ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे में 543 लोकसभा सीटों पर जाकर आनन-फानन में 25951 सैंपल इकट्ठे किए। अगर सर्वे में ईमनादारी से हर सीट पर एक ही संख्या में लोगों की राय ली गई होगी तो एक सीट पर करीब 47-50 लोगों की राय पूछी गई होगी।
अब जरा उत्तर प्रदेश के लोकसभा क्षेत्रों को समझिए। प्रदेश के ज्यादातर लोकसभा क्षेत्रों में 4-6 के बीच विधानसभा सीटें होती है। यहां वोटरों की संख्या लाखों में होती है। अब यहां सवाल यह है कि जिस उत्तर प्रदेश के लिए इंडिया टुडे का सी-वोटर सर्वे बसपा को जीरो सीटें मिलने का दावा कर रहा है, उसे बताना चाहिए कि आखिर प्रति लोकसभा में उसने जिन 50 या मान लिया कि 100 लोगों का सैंपल लिया है, वो किस क्षेत्र में लिया है। क्योंकि बसपा के ज्यादातर वोटर तो ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं।
एक बात और चौंकाने वाली है। जिस सर्वे का हवाला देकर बसपा को जीरो, कांग्रेस को एक और समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में 7 सीटें मिलने का दावा किया जा रहा है, उसे महज 15 जुलाई से लेकर 14 अगस्त सिर्फ एक महीने में पूरा कर लिया गया है।
ऐसे में अगर सर्वे के तरीके और लिये गए सैंपल के नंबर पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि ऐसे सर्वे बेमानी हैं। सर्वे एजेंसिया अगर ईमानदार हैं, तो उन्हें बताना चाहिए कि उनके द्वारा लिये गए सैंपल का सामाजिक समीकरण क्या है, और वो किस गांव और शहर में गए थे। वैसे भी सर्वे एजेंसिया अक्सर बहुजन समाज के नेतृत्व वाले दलों को लेकर ऐसे नतीजे देती रही हैं। जहां तक बसपा का सवाल है तो अपनी स्थापना से लेकर अब तक बहुजन समाज पार्टी ने कई मौकों पर सर्वे एजेंसियों और देश को चौंकाया है। इंतजार करिये।
आरएसएस और भाजपा के कार्य कलाप उनके एजेंडे में पहले से ही रहते हैं। चाहे ओबीसी के आरक्षण का विरोध हो, बाबरी मस्जिद का विध्वंश हो, राम मंदिर हो, ज्ञानवापी, या मथुरा की मस्जिद हो, धारा तीन सौ सत्तर हो, या संविधान बदलने का मुद्दा हो, वो सब उनके एजेंडे में पहले से ही है। उनके कार्य करने का भी एक अलग तरीका है। उन्हें जिस काम को करना होता है, उसके बारे में वे सालों पहले से वातावरण बनाना शुरू कर देते हैं। और खासियत यह भी है कि वे अपने एजेंडे के कार्यान्वयन में पिछड़ी जातियों के नेताओं का ही ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। उनकी किसी भी विध्वंसक घटना का अध्ययन कर लीजिए, आप पाएंगे कि उसके पक्ष में उन्माद तैयार करने से लेकर उसे अंजाम तक पहुंचाने का सारा काम पिछड़ी जातियों द्वारा किया गया था। फिलहाल ज्ञानवापी और मथुरा मुद्दे भाजपा और आरएसएस के एजेंडे के मुताबिक अदालतों में चल रहे हैं, और परिणाम वही आना है, जो बाबरी मस्जिद बनाम रामलला मामले में आया था।
भारतीय संविधान का विरोध और सत्ता में आने पर उसे हटाने का मुद्दा भी आरएसएस के एजेंडे में 1949 से ही है, जब संविधान सभा द्वारा उसे पारित किया गया था। उस समय के अखबारों में छपे आरएसएस-नेताओं के बयान देखे जा सकते हैं, जिनमें कहा गया था कि “भारतीय संविधान में भारतीय जैसा कुछ भी नहीं है।“ आरएसएस के मुख पत्र ‘दि आर्गेनाइजर’ के 30 नवम्बर 1949 के अंक में संविधान के विरोध में जो सम्पादकीय छपा था, उसमें कहा गया था कि “भारत के नए संविधान के बारे में सबसे खास बात यह है कि इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे भारतीय कहा जाए। इसमें न भारतीय कानून हैं, न भारतीय संस्थाएं हैं, न शब्दावली और पदावली है। इसमें प्राचीन भारत के मनु के कानूनों का उल्लेख नहीं है, जिन्होंने दुनिया को प्रेरित किया है। किन्तु हमारे संवैधानिक पंडितों (आंबेडकर और नेहरू) के लिए उनका कोई अर्थ नहीं है।” यह विरोध लिखने और बोलने तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उसके विरोध में आरएसएस ने प्रदर्शन भी किये थे, और दिल्ली में आंबेडकर का पुतला भी फूंका था।
इससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि आरएसएस की मुख्य चिंता मनुस्मृति है, जिसका कोई कानून, कोई संस्था और कोई शब्दावली भारतीय संविधान में नहीं ली गई है। 1950 के बाद के दशकों में ही नहीं, बल्कि नई सदी के दशकों में भी आरएसएस और भाजपा के नेताओं के स्वर भारतीय संविधान के समर्थन में कभी नहीं रहे। उन्होंने हर अवसर पर इसका विरोध किया। दशवें दशक में जब मंदिर का उन्माद जोरों पर वातावरण में फैला हुआ था, और बाबरी मस्जिद तोड़ी जा चुकी थी, तब 29 जनवरी 1993 को भाजपा के ओबीसी नेता कल्याण सिंह ने फ़ैजाबाद में कहा था, “मैं ललकार कर कहता हूँ कि मुझे ढांचे के टूटने का कोई पछतावा नहीं है। हम केन्द्र में आयेंगे, तो संविधान भी बदलेंगे।“
भाजपा सरकार ने संविधान और बुद्ध के प्रति अपनी सोच अपनी दो घटनाओं से प्रकट कर दी थी। वह 1992 में अयोध्या में अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर बाबरी मस्जिद गिराकर संविधान में अपनी अनास्था प्रकट कर चुकी थी और 1998 में बुद्ध जयंती के दिन पोखरन में परमाणु विस्फोट करके यह स्पष्ट कर चुकी थी कि बुद्ध की अहिंसा में उसका विश्वास नहीं है।
और वास्तव में जब 1998 में केन्द्र में पहली बार भाजपा की सरकार कायम हुई, तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पहला काम भारतीय संविधान को बदलने के लिए एक समीक्षा समिति बनाने का ही किया। पर साल भर पहले से आरएसएस ने अपने लोगों को संविधान के खिलाफ मुहिम चलाने पर लगा दिया था। इनमें एक थे अरुण शौरी और दूसरे थे हिंदी के गैर-ब्राह्मण लेखक शैलेश मटियानी।
अरुण शौरी मुसलमानों के बरेलवी संप्रदाय के खिलाफ “The World of Fatwas” लिखकर हिंदू-मुस्लिम दंगा पहले ही करा चुके थे। उसके बाद आंबेडकर और संविधान के खिलाफ लेखमाला चलाई, जो हिंदी में दैनिक जागरण में छपी, और बाद में अंग्रेजी में “Worshipping False Gods : Ambedkar” नाम से किताब छपी। अरुण शौरी के खिलाफ दलितों का रोष-प्रदर्शन देश भर में हुआ, और पूना में विरोधियों द्वारा उनके मुंह पर कालिख भी पोती गई थी। अरुण शौरी के संविधान-विरोध की आलोचना मैं अपनी छोटी सी किताब “आंबेडकर को नकारे जाने की साजिश” में कर चुका हूँ, जो 1996 में प्रकाशित हुई थी।
शैलेश मटियानी के संविधान-विरोधी विचारों का खंडन मैंने अपने नियमित स्तंभ में किया था, जो उन दिनों मैं कई पत्रों के लिए लिखा करता था। शैलेश मटियानी ने वही कहा था, जो अभी मौजूदा सरकार में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकर समिति के अध्यक्ष बिबेक देबराय ने कहा है कि “संविधान एक औपनिवेशिक रचना है।” मटियानी संविधान को भारतीय संस्कृति, असल में हिंदू संस्कृति का विरोधी मानते थे, और उसके मौजूदा स्वरूप पर पुनर्विचार चाहते थे। और यह अद्भुत संयोग था, कि जिस दिन शैलेश मटियानी का लेख छपा, उसके ठीक पन्द्रह दिन बाद, वही बात, भाजपा नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने 22 फ़रवरी 1997 को दिल्ली में आरएसएस के पूर्व मुखिया गोलवरकर की स्मृति-व्याख्यान में बोलते हुए कहा कि “संविधान को बनाने में काफी हड़बड़ी दिखाई गई। गहराई से सोचे-समझे बगैर ब्रिटेन की नकल करके जो संसदीय प्रणाली जनता पर थोपी गई, वह भ्रष्टाचार में मददगार साबित हो रही है।”
अध्यक्षीय प्रणाली की वकालत वर्तमान भाजपा सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई अवसरों पर कर चुके हैं। और तो और, हमारे एक अंग्रेजी दलित चिंतक और डिक्की के मेंटर चन्द्रभान प्रसाद भी इस बात को जोर देकर कह चुके हैं कि आंबेडकर भी अमेरिका की अध्यक्षीय प्रणाली के पक्ष में थे। और यह उन्हीं दिनों की बात है, जब केन्द्र में भाजपा की सरकार थी।
अटल बिहारी वाजपेयी ने, 1998 में, प्रधानमंत्री बनने के बाद, जो संविधान-समीक्षा आयोग गठित किया था, उसमें ग्यारह सदस्य थे। और गौरतलब बात यह है कि उन ग्यारह सदस्यों में एक भी सदस्य दलित वर्ग से नहीं था। उस वक्त मैंने अपने नियमित स्तंभ में लिखा था कि यह आयोग अभिजात और सवर्ण वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है, और सरकार की ओर से रिपोर्ट को लोकतंत्र-विहीन बनाने का संकेत देता है। सरकार ने संविधान की समीक्षा के लिए आयोग को अपना जो एजेंडा सौंपा था, उसमें संविधान के मूल ढांचे “धर्मनिरपेक्षता” को ही खत्म करने का सुझाव था। एक अवकाश प्राप्त न्यायाधीश का बयान अख़बारों में छपा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें भी आयोग में शामिल किया गया था, पर, वह सरकार के एजेंडे से सहमत नहीं थे, इसलिए उसमे शामिल नहीं हुए थे।
आयोग के अध्यक्ष वेंकट चलैया थे, जिनके हिंदू-आग्रह सर्वविदित थे। हालाँकि उस आयोग ने क्या समीक्षा की, और क्या रिपोर्ट दी, उसका पता नहीं चल सका। शायद सरकार ने ही समय को अपने अनुकूल न समझकर उसे रोक दिया हो। लेकिन यह उल्लेखनीय है कि आयोग का गठन होते ही, जहाँ आरएसएस ने अपने तमाम लेखकों, पत्रकारों, विश्लेषकों और संत-महात्माओं को संविधान का विरोध करने के काम पर लगा दिया था, वहाँ भाजपा ने अपने नेताओं को मैदान में उतार दिया था। उस फ़ौज के सामने अरुण शौरी और शैलेश मटियानी तो कुछ भी नहीं थे।
उनकी कुछ बानगी देखिए: इलाहाबाद के माघ मेले में शंकराचार्य अखिलेश्वर नन्द ने संविधान को हिंदूविरोधी बताया और मनुस्मृति को लागू करने पर जोर दिया। इसी अवसर पर स्वामी वेदान्ती ने धर्मनिरपेक्षता का विरोध करते हुए धर्मविहीन राजनीति को विधवा के समान बताया और कहा कि भारत में धर्म का शासन होना चाहिए, जैसे रामराज्य में वशिष्ट का और चन्द्रगुप्त के राज्य में चाणक्य का था। दूसरे शब्दों में उन्होंने ब्राह्मण-राज्य का खुलकर समर्थन किया। पत्रकार राजीव चतुर्वेदी ने लिखा कि संविधान में मौलिक कुछ भी नहीं है। उसमें दूसरे देशों के संविधानों से लिए गए टुकड़ों के पैबंद लगाए गए हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि संविधान जातीय समानता की बात करता है, पर जाति के नाम पर आरक्षण देने का जातीय भेदभाव भी करता है। संघ के हिंदूवादी लेखक बनवारी ने लिखा, ‘संविधान न अपना है, न ऊँचा है। यह एक ही व्यक्ति आंबेडकर का बनाया हुआ है, जिन्हें भारतीय समाज और भारतीय ज्ञान-परम्परा की कोई समझ नहीं थी।‘ असल में इन्हें मूल परेशानी आंबेडकर से थी।
अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार अगर संविधान-समीक्षा के मुद्दे पर कामयाब नहीं हुई, तो उसके दो कारण थे; पहला यह कि उस दौर में आज की तरह सारा प्रचार माध्यम और तंत्र सरकार के नियंत्रण में नहीं था, और सरकार फासीवाद की ओर अग्रसर तो थी, पर पूरी तरह फासीवादी नहीं हुई थी। और दूसरा कारण यह था कि दलित-पिछड़ों का आज की तरह हिंदूकरण नहीं हुआ था, पर प्रक्रिया जारी थी। यही कारण था कि वर्ष 2000 में देश भर में दलित संगठनों द्वारा आंबेडकर-जयंती ‘संविधान-बचाओ’ दिवस के रूप में मनाई गई थी, और इससे भाजपा के राजनीतिक अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी बज गई थी।
लेकिन आज की परिस्थितियां एक दम भिन्न हैं। आज भारत के मुख्यधारा के प्रचार माध्यमों और तंत्र पर नरेन्द्र मोदी का नियंत्रण है; आरएसएस का आईटी सेल सरकार के पक्ष में पूरी मजबूती से सक्रिय भूमिका में है, जो पहले नहीं था; सत्ता पूरी तरह फासीवादी स्वरूप में विरोधियों को कुचलने में जिस तरह आज काम कर रही है, पहले नहीं थी; और सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि दलित-पिछड़ी जातियों का हिंदूकरण हो गया है, जो सरकार के विरोध में जाने की स्थिति में नहीं हैं।
इसलिए आज संविधान-विरोध के मुद्दे को फिर से उभारा जा सकता है। आज आरएसएस और भाजपा दोनों ही समय को अपने अनुकूल देख रहे हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष बिबेक देबराय ने कुछ नया नहीं कहा है, बल्कि वही कहा है, जो पिछले सत्तर सालों से आरएसएस और भाजपा के नेता बोलते आ रहे हैं। देबराय का लेख “There is a case for the people to embrace a new constitution” शीर्षक से एक आर्थिक पत्रिका में छपा है। इसका अर्थ है, लोगों को एक नए संविधान को अपनाने की जरूरत है। इस लेख को मैं नहीं देख सका हूँ। पर हिंदी ‘अमर उजाला’ में कुछ पंक्तियों में उसका जो विवरण छपा है, उसमें देबराय ने “मौजूदा संविधान को औपनिवेशिक विरासत करार दिया है।” “यह पूछा जाना चाहिए कि संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक, न्याय, स्वतंत्रता, और समानता जैसे शब्दों का अब क्या मतलब है? हमें खुद को एक नया संविधान देना होगा।”
यह चिंता बिबेक देबराय की नहीं है, बल्कि यह चिंता आरएसएस और भाजपा की है। समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, न्याय, स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांत आरएसएस और भाजपा की आँखों में चुभते हैं, क्योंकि उनके अनुसार इन सिद्धांतों में भारतीयता यानी हिंदुत्व नहीं है। वे सही कहते हैं, क्योंकि भारत में मुस्लिम शासन से पहले तक राजतन्त्र ही थे, जो धर्म के राज्य थे। उनमें न समाजवाद था, न समानता थी, न लोकतंत्र था, और न न्याय था। मैं शाक्य और लिच्छवियों के गणराज्य को लोकतंत्र नहीं मानता, क्योंकि उनमें समाज के सभी वर्गों और खास तौर से निम्न वर्गों को मतदान का अधिकार नहीं था। उनमें भी न्याय, स्वतंत्रता और समानता नहीं थी। हिंदू राजतंत्रों में तो मनु का कानून लागू ही था, जो स्वतंत्रता और समानता पर आधारित नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव पर आधारित थे।
भारत को पहली बार समाजवाद, न्याय, स्वतंत्रता और लोकतंत्र के सिद्धांत पश्चिम के राजनीतिक दर्शन ने ही दिए, जिन्हें भारत की हिन्दुत्ववादी सरकार अपने साम्प्रदायिक बहुमत के बल पर खत्म करना चाहती है। आरएसएस का मकसद सामाजिक समानता को खत्म करके जाति-विभाजन पर आधारित सामाजिक समरसता का सिद्धांत लागू करना है। हमारा मौजूदा संविधान अपने मौलिक अधिकारों को पाने के लिए और सामाजिक-आर्थिक दमन के खिलाफ संघर्ष करने का जो कानूनी शक्ति देता है, वह सामाजिक समरसता के लागू होते ही खत्म हो जायेगा।
इसलिए मैं देबराय के लेख को संविधान बदलने के पक्ष में एक साम्प्रदायिक बहुमत के लिए वातावरण बनाने की एक ‘पहल’ के रूप में देख रहा हूँ। हो सकता है, मीडिया और अख़बार भी इस पर एक उन्मादी बहस चला दें।
अंत में मैं अपने दलित-बहुजन बुद्धिजीवियों से भी एक आग्रह करना चाहता हूँ कि वे संविधान-विरोध को आंबेडकर-विरोध का मुद्दा न बनायें, हालाँकि आरएसएस और भाजपा का मुख्य विरोध आंबेडकर से ही है। पर, यह राष्ट्रीय लोकतंत्र का मुद्दा है, और इसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए।
15 अगस्त 2023 को जब भारत अपनी आजादी के 77वें वर्ष का जश्न मनाने की तैयारी में था, उससे ठीक एक दिन पहले 14 अगस्त को भारत का संविधान बदलने को लेकर एक शिगूफा फिर से छोड़ दिया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय ने हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के अखबार लाइव मिंट में लेख लिखकर संविधान बदलने की वकालत की।
उनका तर्क था कि हमारा मौजूदा संविधान काफी हद तक 1935 के भारत सरकार अधिनियम पर आधारित है। अपने इसी तर्क के आधार पर वह संविधान बदलने की बात कर रहे थे। कुछ संशोधन नहीं, आधा नहीं, बल्कि पूरा का पूरा संविधान।
पीएम मोदी के सलाहकार ने लेख में आगे कहा कि हमें पहले सिद्धांतों से शुरुआत करनी चाहिए जैसा कि संविधान सभा
Bibek Debroy
की बहस में हुआ था। 2047 के लिए भारत को किस संविधान की जरूरत है? देबरॉय का कहना है कि कुछ संशोधनों से काम नहीं चलेगा। हमें ड्राइंग बोर्ड पर वापस जाना चाहिए और पहले सिद्धांतों से शुरू करना चाहिए, यह पूछना चाहिए कि प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे शब्दों का अब क्या मतलब है। हम लोगों को खुद को एक नया संविधान देना होगा।
उन्होंने यह भी लिखा कि 2002 में संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए गठित एक आयोग द्वारा एक रिपोर्ट आई थी, लेकिन यह आधा-अधूरा प्रयास था।
साफ है कि देश के प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष ने जब यह बात छेड़ी तो इसका सीधा कनेक्शन सरकार और प्रधानमंत्री मोदी से समझा गया। बहस छिड़नी थी, बहस छिड़ी, तमाम लोगों ने बिबेक देबरॉय की लानत-मलानत की। लेकिन सवाल यह रह जाता है कि देश चलाने में प्रधानमंत्री को सलाह देने वाले बिबेक देबरॉय जैसा अहम शख्स देश का संविधान बदलने की बात करता है, तो क्या वह ऐसे ही है?
एक शब्द होता है, लिटमस टेस्ट। राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने उसी की ओर इशारा किया। मनोज झा का कहना है कि यह सारी बातें बिबेक देबरॉय की जुबान से बुलवाया गया है। ठहरे हुए पानी में कंकड़ डालो और अगर लहर पैदा कर रही तो और डालो और फिर कहो कि अरे ये मांग उठने लगी है।
लेकिन बिबेक देबरॉय के साथ उल्टा हो गया। लहर पैदा नहीं हो पाई। उल्टे उनकी फजीहत हो गई। भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की वकालत करने वाले और संविधान को लेकर अक्सर गलत बयानी करने वाले दिग्गजों का साथ भी बिबेक देबरॉय को नहीं मिला। खुद को घिरता देख और लहर उठता नहीं देख उन्होंने मांफी मांग ली।
आंबेडकरवादियों ने धर दबोचा तो @bibekdebroy कह रहे हैं वह तो मेरे निजी विचार थे। एकदम शुद्ध पर्सनल मैटर था जी!
तो लेख में प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार वाला परिचय क्या …….. के लिए दिया था?
सब कुछ संशोधन करने की इतनी बड़ी सुविधा संविधान निर्माताओं ने खुद अनुच्छेद 368 में दी… pic.twitter.com/mkRcsW6a5A
लेकिन क्या यह पहला मौका था जब संविधान बदलने की मांग की गई? जी नहीं।
सितंबर 2017 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने एक बयान में कहा था कि भारतीय संविधान में बदलाव कर उसे भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों के अनुरूप किया जाना चाहिए। हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि संविधान के बहुत सारे हिस्से विदेशी सोच पर आधारित हैं और इसे बदले जाने की ज़रूरत है। मोहन भागवत के मुताबिक आज़ादी के 70 साल बाद इस पर ग़ौर किया जाना चाहिए।
इसके तीन महीने बाद ही 28 दिसंबर, 2017 को भाजपा के तात्कालिन केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने कहा था कि वो सत्ता में संविधान बदलने के लिए हैं। We are here to change Constitution.
फरवरी 2023 में यही बुखार तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव को चढ़ा। केसीआर ने भी देश के लिए एक नए संविधान की आवश्यकता पर जोर दिया था।
इसके अलावे कुछ छुटभैये नेता और कथावाचक अक्सर संविधान बदलने की मांग करते ही रहते हैं। लेकिन केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े से लेकर पीएम मोदी के सलाहकार बिबेक देबरॉय तक जिसने भी संविधान बदलने की मांग की, ऐसा विरोध हुआ कि उन्हें मांफी मांगनी पड़ी।
लेकिन जिस तरह बार-बार संविधान में बदलाव की वकालत की जाती है, सवाल उठता है कि क्या यह संभव है? और अगर संभव है भी तो कितना?
दरअसल आरएसएस जिस तरह के बदलावों की बात कर रहा है। या उसकी विचारधारा के नेता जैसा संविधान बनाना चाहते हैं, वो दरअसल सेक्यूलर संविधान को ख़त्म करके हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। लेकिन यह संभव ही नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फ़ैसलों में कहा है कि धर्मनिरपेक्षता भारत के संविधान का मूल आधार है और इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता। चाहे किसी चुनी हुई सरकार के पास दो तिहाई बहुमत ही क्यों ना हो, संविधान को इस तरह से नहीं बदला जा सकता कि उसके मूल आधार ही ख़त्म हो जाएं।
1. आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन बिबेक देबरॉय द्वारा अपने लेख में देश में नए संविधान की वकालत करना उनके अधिकार क्षेत्र का खुला उल्लंघन है जिसका केन्द्र सरकार को तुरन्त संज्ञान लेकर जरूर कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि आगे कोई ऐसी अनर्गल बात करने का दुस्साहस न कर सके। (1/2)
मोहन भागवत के संविधान बदलने वाले बयान के बाद 15 सितंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने बीबीसी हिन्दी पर इस बारे में एक आर्टिकल लिखा था। उनका कहना था कि, संविधान बदलने की प्रक्रिया की बात करें तो संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा में संविधान में संशोधन का प्रस्ताव दो-तिहाई बहुमत से पारित करना होता है। लेकिन धर्मनिरपेक्षता, लोगों में बराबरी, अभिव्यक्ति और असहमति के हक़ जैसी बुनियादी बातों में बदलाव नहीं किया जा सकता। कई संशोधनों में राज्यों की सहमति की भी ज़रूरत होती है। प्रशांत भूषण का कहना था कि आरएसएस भारतीय संविधान के मूल आधार को ही बदल देना चाहता है। वो हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। लेकिन उनको 100 प्रतिशत बहुमत मिले, तब भी वो ऐसा बदलाव नहीं कर सकते।
यानी साफ है कि संविधान को पूरी तरह बदल डालना फिलहाल मुमकिन नहीं है। वैसे भी मुट्ठी भर लोग संविधान बदलने की वकालत करते हैं जबकि करोड़ों लोग भारतीय संविधान को बचाने के लिए खड़े हैं। जिनकी हुंकार हमेशा संविधान बदलने की बात कहने वालों को मांफी मांगने को मजबूर कर देती है।
चुप रहने से, ख़ामोश बैठे रहने से, सब कुछ सहते रहने से बदलाव नहीं आता… जब राजा निरंकुश हो जाये, जब ग़रीबों, वंचितों पर अत्याचार चरम पर हो, रोज़गार के मौक़े बढ़ने के बजाय कम हो गए हो… और राजा चैन की नींद सो रहा हो तो परिवर्तन ज़रूरी हो जाता है…
इस हुंकार के साथ बहुजन समाज पार्टी के नेशनल को-आर्डिनेटर आकाश आनंद ने राजस्थान में चुनावी बिगुल फूंक दिया है। आकाश आनंद ने राजस्थान में 16 अगस्त को 14 दिनों की लंबी यात्रा का ऐलान करते हुए धौलपुर से इसकी शुरूआत कर दी। बसपा ने इस यात्रा को ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय संकल्प यात्रा’ का नाम दिया है।
यह पूरी यात्रा साढ़े तीन हजार किलोमीटर की होगी, जो प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से होकर गुजरेगी। इसमें आकाश आनंद बसपा कार्यकर्ताओं के साथ चलेंगे। यात्रा के शुरुआत के समय बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता अशोक सिद्धार्थ और रामजी गौतम भी मौजूद थे। आकाश आनंद का कहना है कि वह राजस्थान की सोई सरकार को नींद से जगाने निकले हैं। इस दौरान उन्होंने समर्थकों से साथ आने का आवाह्न भी किया। यात्रा का समापन 29 अगस्त को जयपुर में बड़ी रैली के साथ होगा।
दरअसल राजस्थान में बहुजन समाज पार्टी के सामने अशोक गहलोत से हिसाब भी चुकता करने की चुनौती होगी। 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने छह विधानसभा सीटें जीती थीं और उसे चार प्रतिशत वोट मिले थे। लेकिन चुनाव बाद कांग्रेस पार्टी ने सभी को अपने में मिला लिया था। साफ है कि 2023 के चुनाव में आकाश आनंद उस अपमान और धोखे का बदला भी कांग्रेस पार्टी से जरूर लेना चाहेंगे। देखना यह होगा कि इस यात्रा में आकाश आनंद को समर्थकों का कितना समर्थन मिलता है। क्योंकि इस यात्रा के जरिये आकाश आनंद जिन समर्थकों को जगाने निकले हैं, उसे कितना जगा पाते हैं, वह प्रदेश के चुनाव में बसपा का भविष्य तय करेगी।
मध्यप्रदेश के सागर जिले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में 100 करोड़ लगाकर सतगुरु रविदास जी की प्रतिमा का शिलान्यास किया, उसके चंद दिन बाद ही समाज में दलितों को लेकर सोच सामने आ गई। मध्य प्रदेश के विदिशा में एक दलित समाज से ताल्लुक रखने वाले सरपंच ने आरोप लगाया है कि उनकी जाति की वजह से उन्हें 15 अगस्त को झंडा नहीं फहराने दिया गया। घटना विदिशा जिले के सिरोंज में भगवंतपुर ग्राम पंचायत की है।
ग्राम पंचायत के सरपंच बारेलाल अहिरवार का आरोप है कि स्कूल की प्रिंसिपल उनके अनुसूचित जाति का होने के कारण चिढ़ती हैं। सरपंच का आरोप है कि प्रिंसिपल कहती हैं कि तुम दलित हो, तुम क्या जानो। दलित समाज के सरपंच ने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस पर मुझे स्कूल में नहीं बुलाया और किसी और से तिरंगा झंडा फहरवा दिया गया। इस घटना से आहत सरपंच बारेलाल ने कहा कि यह मेरे पद और जाति का अपमान है। उन्होंने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में ऐसा आम हो गया है, जब दलितों के साथ अन्याय होता है। उनको उनका हक नहीं मिल पा रहा है।
मामले के तूल पकड़ने के बाद स्थानीय एसडीएम हर्षल चौधरी ने मामले की जांच करवाने और कार्रवाई करने की बात कही है। जबकि स्कूल की प्रिंसिपल ने सफाई देते हुए कहा कि मैंने आपको फोन किया था, लेकिन आपने फोन नहीं उठाया।
दरअसल पंचायती राज अधिनियम के मुताबिक सरपंच को स्कूलों में झंडा फहराने का अधिकार दिया गया है। लेकिन अक्सर हर साल स्वतंत्रता दिवस के दूसरे दिन देश के किसी न किसी हिस्से से दलित समाज के सरपंच को तिरंगा फहराने से रोकने की घटना सामने आ ही जाती है।
भारत अपनी आजादी के 77 साल का जश्न मना रहा है। इस मौके पर जहां देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिला पर तिरंगा फहराया तो तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने प्रदेश में तिरंगा फहरा कर आजादी का जश्न मना रहे हैं। लेकिन आजादी के साल-दर-साल बीतने के बावजूद देश के सामने अब भी तमाम ऐसे सवाल खड़े हैं, जिनका जवाब अब तक नहीं मिल पाया है। वह सवाल देश की आम जनता से जुड़े हुए हैं।
देश की कद्दावर नेता और बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उन्हीं सवालों को उठाया है।
उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री रहीं बहन मायावती ने इस मौके पर कहा कि, देश व दुनिया भर में रहने वाले सभी भारतीय भाई-बहनों को आज 77वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। आज हर कोई पेट पालने तथा अपना व अपने परिवार का जीवन बेहतर बनाने में व्यस्त है। ऐसे में यह सरकार का दायित्व है कि वह उन्हें शान्ति, सदभाव, तनावमुक्त व सुविधायुक्त जीवन दे।
संविधान निर्माता और राष्ट्रनिर्माता भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को इस मौके पर याद करते हुए मायावती ने कहा कि, भारत खासकर परमपूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अति मानवतावादी संविधान को लेकर दुनिया में आज भी एक आदर्श मिसाल है, किन्तु अपार गरीबी, बेरोजगारी, पिछड़ापन, अमीर-गरीब के बीच आय की जबरदस्त खाई व रुपए के अवमूल्यण आदि के अभिशप्त जीवन से लोगों की मुक्ति अब बहुत जरूरी हो गई है।
3. देश की लगभग 140 करोड़ गरीब व मेहनतकश जनता के लिए स्वतंत्रता की सही स्थापना तथा उसका समुचित लाभ तभी संभव जब संविधान की पवित्र मंशा के अनुसार देश में केवल राजनीतिक लोकतंत्र ही नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी जमीनी स्तर पर कायम हो, जैसाकि बाबा साहेब की असली मंशा थी।
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश की आम जनता का जिक्र करते हुए बहनजी ने कहा कि, देश की लगभग 140 करोड़ गरीब व मेहनतकश जनता के लिए स्वतंत्रता की सही स्थापना तथा उसका समुचित लाभ तभी संभव है, जब संविधान की पवित्र मंशा के अनुसार देश में केवल राजनीतिक लोकतंत्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी जमीनी स्तर पर कायम हो, जैसाकि बाबा साहेब की असली मंशा थी।
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जब देश के प्रधानमंत्री से लेकर तमाम प्रदेशों के मुख्यमंत्री बड़ी-बड़ी घोषणाएं करने में व्यस्त हैं, बसपा सुप्रीमों मायावती ने जिस तरह भारत की असली तस्वीर पेश करते हुए आम जनता से जुड़े मसलों को उठाया है, साफ है कि उन मसलों को हल किये बिना देश को असली स्वतंत्रता नहीं मिलेगी।