बसपा प्रमुख मायावती पर उदित राज की विवादित टिप्पणी से हंगामा

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती पर टिप्पणी देकर कांग्रेस नेता उदित राज बुरी तरह घिर गए हैं। उदित राज के बयान के बाद जहां बसपा ने उदित राज के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है तो आकाश आनंद ने यूपी पुलिस को 24 घंटे के अंदर उदित राज को गिरफ्तार करने का अल्टीमेटम दे दिया है। 17 फरवरी को लखनऊ में एक प्रेस कांफ्रेंस में उदित राज ने विवादित बयान दिया। हिन्दुत्व पर प्रहार करने वाले और खुद को बु्द्धिस्ट कहने वाले उदित राज ने महाभारत का उदाहरण देते हुए बहनजी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि, कृष्ण ने कहा था कि कोई सगा-संबंधी नहीं है। न्याय के लिए लड़ो और जरूरत पड़े तो अपने सगे-संबंधियों को भी मार दो। हमारे कृष्ण ने कह दिया है कि सबसे पहले जो अपना दुश्मन है, उसी को मार दो और जो सामाजिक न्याय का दुश्मन है उसे आप जानते हैं। सुश्री मायावती ने जो सामाजिक आंदोलन का गला घोंटा, अब उनका गला घोंटने का समय आ गया है।

पूर्व भाजपाई और वर्तमान कांग्रेसी उदित राज के इस बयान के बाद बसपा के नेशनल को-आर्डिनेटर आकाश आनंद ने उदित राज के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सोशल मीडिया एक्स पर आकाश आनंद ने लिखा- लखनऊ में कभी भाजपा कभी कांग्रेसी चमचे उदित राज ने साहेब के मिशन पर लंबा चौड़ा ज्ञान दिया है। जबकि उदित राज अपने स्वार्थ के लिए दूसरे दलों में मौका तलाशने के लिए कुख्यात है। उसे बहुजन मूवमेंट की चिंता सिर्फ इसलिए है ताकि वो किसी दल की चमचागिरी कर के सांसद या विधायक बन सके। इसका बहुजन समाज के उत्थान से कोई लेना देना नहीं है।

मैं बहुजन मिशन का युवा सिपाही हूँ लेकिन बाबा साहेब और मान्यवर साहेब के मिशन को इससे ज़्यादा समझता हूँ। आज इसकी भाषा में जिस तरह की धमकी है वो हम बहुजन मिशन के करोड़ो सिपाहियों को कतई बर्दाश्त नहीं है। अपने स्वार्थ में मान्यवर साहेब के मिशन को भूलकर ये चमचा आज देश के करोडों दलित,शोषित,वंचित गरीबों को राजनैतिक ताक़त के साथ सामाजिक और आर्थिक मुक्ति दिलाने वाली हमारी परमपूज्य आदरणीय बहन कु. मायावती जी को “गला घोंटना” की धमकी दे रहा है।

मैं @uppolice से साफ़ कहना चाहता हूँ की 24 घंटे में इन अपराधियों को गिरफ्तार कर क़ानून के तहत कड़ी से कड़ी कार्यवाही करें नहीं तो देश का बहुजन युवा चुप बैठने वाला नहीं है, इनको सबक सिखाना मुझे अच्छे से आता है।

आकाश आनंद के तेवर से साफ है कि उन्होंने बहनजी के अपमान पर उदित राज से दो-दो हाथ करने की ठान ली है। अब देखना होगा कि 18 फरवरी को रात 11 बजे 24 घंटे के अल्टीमेटम के पहले क्या यूपी पुलिस उदित राज को गिरफ्तार करती है? अगर नहीं, तो ऐसे में आकाश आनंद का कदम क्या होगा?

निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद और बेटे प्रवीण निषाद पर आरोप लगा पार्टी कार्यकर्ता ने दी जान

संजय निषाद (फाइल फोटो)मैं अपनी जिंदगी की लड़ाई हार गया। यह आखिरी संदेश है।
आज बहुत कुछ सोचने समझने के बाद मैंने यह फैसला लिया है कि यह दुनियां मेरे किसी काम की नहीं है। मैंने अपनी क्षमता के हिसाब से जितना लोगों की मदद कर सकता था उतना मदद करने का प्रयास किया और कई बार तो अपनी क्षमता के ऊपर भी जाकर लोगों का मदद किया। जिसके कारण मेरे हजारों राजनैतिक और सामाजिक दुश्मन बनें फिर भी मैंने समाज के शोषित, वंचित, और निर्बलों की आवाज को बुलंद करने का काम लगातार जारी रखा। इस बीच मुझे कई बार फर्जी मुकदमे भी झेलने पड़े और कई बार जेल भी जाना पड़ा फिर भी मैंने अपने कदम को रुकने नहीं दिया और लगातार लोगों की मदद करता है।
अब आते हैं मुख्य बिंदु पर की आखिर मुझे यह फैसला क्यों लेना पड़ा तो आप सबको अवगत कराना चाहता हूँ कि मैं लगभग पिछले 10 वर्ष से डॉ. संजय कुमार निषाद कैबिनेट मंत्री (मत्स्य विभाग) उत्तर प्रदेश सरकार के साथ सामाजिक और राजनैतिक संगठन जैसे कि राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद् और निषाद पार्टी के विभिन्न पदों पर रहते हुए कार्य कर रहा था। जिसमें पिछले 10 वर्ष से मैंने कभी अपने परिवार को समय नहीं दिया जितना कि मैंने डॉ. संजय कुमार निषाद और उनके परिवार के लोगों के साथ-साथ समाज को समय दिया।
इस बीच मैंने उत्तर प्रदेश के लगभग 40-50 जिलों में संगठन और पार्टी के लिए कार्य किया जिसके वजह से निषादपोस्ट लिखकर जान देने वाले धर्मातमा निषाद समाज के युवाओं के साथ-साथ अन्य वर्ग के भी युवाओं में मेरी लोकप्रियता बढ़ती गई। जिसके कारण डॉ. संजय कुमार निषाद और उनके बेटों की बेचैनी बढ़ने लगी कि आखिर यह एक साधारण सा लड़का इतना ज्यादा चर्चित और लोकप्रिय कैसे होता जा रहा है। इसी बात को लेकर पिछले दो सालों से डॉ. संजय कुमार निषाद और उनके बेटों ने मेरे खिलाफ सामाजिक और राजनैतिक रूप से षड्यंत्र करते हुए मुझे पहले तो कमजोर करने का प्रयास किया फिर मेरे ही साथ के युवा साथियों को भड़काने व मेरे खिलाफ खड़ा करने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन देने के साथ-साथ मुझे और मेरे टीम के साथियों को फर्जी मुकदमे में फंसाने का तरह-तरह का प्रयास करने लगे।
इसी बीच मनीष निषाद नाम के एक लड़के को मेरे खिलाफ भड़काकर मुझसे मारपीट करने के लिए उकसाया गया जिसके कारण मुझे मनीष निषाद को मारना पड़ा था और उसको मैंने ऑन कैमरा मारा था क्योंकि उसने मेरे दुश्मनों के साथ मिलकर मेरे घर पर आकर मेरी मां और बहन के साथ गाली-गलौज और मारपीट किया था। जिसमें मेरे एक बहुत करीबी हरामखोर मित्र जय प्रकाश निषाद का हाथ था क्योंकि यही हरामखोर मनीष निषाद को अपने हिसाब से चलाता था और वही षड्यंत्र करके डॉ. संजय कुमार निषाद के नाम से और तत्कालीन सांसद प्रवीण कुमार निषाद के नाम से फोन करके मेरे खिलाफ फर्जी लूटपाट का मुकदमा दर्ज करवाया था जिसके बारे उस हरामखोर को जब लाईव आकर मैंने मारने का धमकी दिया था तब वह हरामखोर अपने दोस्त सोहन गुप्ता जो खजनी विधानसभा के निवासी हैं उनके जरिए मेरे पास फोन करके गोरखपुर मिलकर पूरी बात बताई थी। जिसमें सोहन गुप्ता और जय प्रकाश निषाद, प्रदीप साहनी और विष्णु चौरसिया भी थे जो जय प्रकाश निषाद के ही मित्र हैं। इन सबके सामने जय प्रकाश निषाद ने कबूल किया था कि डॉ. संजय कुमार निषाद और उनके बेटों प्रवीण कुमार निषाद और श्रवण कुमार निषाद इन लोगों के कहने पर मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया था।
प्रवीण निषादयह सारी बातें सुनकर मुझे बहुत गहरा चोट पहुंचा मगर फिर भी मैंने खुद को शांत रखा और किसी को यह एहसास नहीं होने दिया कि मैं इन सब बातों को जान चुका हूँ। मैं चाहता तो जय प्रकाश निषाद को तत्काल जान से मार सकता था मगर मैं अपने आपको खूनी नहीं बनाना चाहता था। मैंने समाज के लिए छोटे-मोटे झगड़े विवाद किए हैं मगर कभी किसी का हत्या करूंगा ऐसा ख्याल कभी मन में आया भी नहीं है। अब इतना कुछ होने के बाद भी मैं समाज की लड़ाई लगातार लड़ता रहा है। इसी बीच पनियरा थाने के अंतर्गत आने वाले बैदा गाँव निवासी गुलशन निषाद की हत्या कर दी जाती है और पुलिस उस मामले को कुछ राजनेताओं के दबाव में आकर दुर्घटना दिखाकर मामले को दबाने का प्रयास करती है। इस बात की सूचना कई पत्रकार बंधुओं और सामाजिक लोगों द्वारा मुझे दी जाती है तब मैं मौके पर जाता हूँ और एडीशनल एसपी को मौके पर बुलाकर पीड़ित परिवार के तरफ से हत्या का तहरीर एडीशनल एसपी को दिलवाता हूँ। इस मामले में भी मेरे खिलाफ डॉ. संजय कुमार निषाद और उनके बेटों द्वारा चक्का जाम ईत्यादि का फर्जी मुकदमा दर्ज करवाकर मुझे जेल भेजवाया जाता है। जब मै जेल से छुटकर बाहर आता हूँ तो फिर लोकसभा चुनाव में मेरा समर्थन पाने के लिए डॉ. संजय कुमार निषाद और उनके बेटों ने मुझसे बातचीत करना और मिलना-जुलना शुरू कर दिया। इस बीच मेरे आवास पर डॉ. संजय कुमार निषाद के छोटे सुपुत्र ई. श्रवण कुमार निषाद आते हैं और माफी मांगते हैं और कहते हैं कि मेरे खिलाफ उनके परिवार के किसी सदस्य ने पैरवी नहीं किया था जो भी किया था वह जय प्रकाश निषाद ने किया था फिर मैं जय प्रकाश निषाद से पूछताछ करता हूँ तो वह भी कसम खाता और कहता उसने जो भी षड्यंत्र मेरे खिलाफ किया है वह सब डॉ. संजय कुमार निषाद और प्रवीण कुमार निषाद और ई. श्रवण कुमार निषाद के कहने पर किया था।
मैं इन सब बातों को जानकर रोज घुट-घुट कर मर रहा था और सारी बातें जानना चाहता था कि कौन-कौन मेरे खिलाफ षड्यंत्र किया है इसकी भी जानकारी करना बहुत जरूरी हो गया था। अब लगभग सभी चेहरों से नकाब हट चुके हैं और उन सब चेहरों की पहचान भी हो चुकी है। पहले तो मेरे मन में ख्याल आया कि मैं उन सब हरामखोरो को जान से मार दूँ जिन्होंने मेरे खिलाफ षड्यंत्र किया है फिर दिल ने कहा कि नहीं यार ऐसा करके मुझे तो संतुष्टि मिल जायेगी मगर मैं हत्यारा बन जाऊँगा। इसलिए मैंने बहुत कुछ सोचने के बाद यह निर्णय लिया है कि इस बेरहम और एहसान फरामोश दुनियाँ से दूरी बना लेना चाहिए। मैं अपने साथ चलने वाले सभी क्रान्तिकारी साथियों से निवेदन करना चाहूँगा कि आप लोग कभी भी किसी भी साथी के साथ गद्दारी मत करिएगा और जहाँ तक हो सके समाज के दबे कुचले लोगों की आवाज को बुलंद करने का प्रयास करते रहिएगा। मैं अपनी माँ और बहनों एवं भैया से हाथ जोड़कर क्षमा माँग रहा हूँ कि समाज के लोगों की मदद करते हुए मैंने अपनी जिंदगी निकाल दी मगर आप लोगों को कभी समय नहीं दे पाया और न ही आप लोगों के लिए कुछ कर पाया मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे अगले जन्म में भी इस परिवार का हिस्सा बनाकर भेजना ताकी मैं अपनी माँ और बहनों एवं भैया का सेवा कर सकूं।
अब मैं अपनी पत्नी से भी क्षमा चाहता हूँ कि उसको भी मैंने समय नहीं दिया और जो थोड़ा बहुत समय दिया उसमें मेरी एक फूल जैसी बेटी का जन्म हुआ और उस फूल जैसी बेटी को भी मैं समय नहीं दे पाया। मैं अपनी पत्नी से भी क्षमा चाहता हूँ कि मैं उसे ऐसे मोड़ पर छोड़कर जा रहा हूँ हो सके तो मुझे माफ कर देना अंजली। अब मैं उन क्रान्तिकारी साथियों से भी क्षमा चाहता हूँ जिन्होंने मेरे साथ संघर्ष करते हुए समाज के दबे, कुचले लोगों को न्याय दिलाने हेतु मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। मैं अपने निषाद समाज के सभी समाजसेवियों और राजनेताओं से एक आखिरी निवेदन करना चाहता हूँ कि आप लोग निषाद समाज के युवाओं के भविष्य को बचाने के लिए ठोस कदम उठाने के साथ-साथ डॉ. संजय कुमार निषाद जैसे धूर्त व्यक्ति से समाज को छुटकारा दिलाने के लिए कार्य करें क्योंकि जितना नुकसान निषाद समाज का अन्य दलों ने नहीं किया है उससे कहीं ज्यादा नुकसान डॉ. संजय कुमार निषाद और उसके बेटों ने किया है। मैंने इनके साथ रहकर सारी चीजें बहुत करीब से देखी हैं इन्होंने निषाद समाज को जगाने का काम किया है मगर उसमें मुझ जैसे सैकड़ों क्रान्तिकारी साथियों की अग्रणी भूमिका रही है। कोई भी टीम अगर मैच जीतती है तो वह सिर्फ कप्तान के बदौलत नहीं बल्कि पूरी टीम की एकजुटता के शानदार प्रदर्शन के बदौलत जीतती है। वह अलग बात है कि ट्राफी उठाने का और मंच पर बात रखने का मौका कप्तान को मिलता है जिसकी वजह से कप्तान को प्रसिद्धि मिल जाती है। इसी तरह से निषाद समाज को जगाने में और उनके हक अधिकारों की लड़ाई लड़ने में मुझ जैसे सैकड़ों क्रान्तिकारी साथियों का अहम योगदान रहा है मगर डॉ. संजय कुमार निषाद ने उसे भुनाते हुए खुद को स्वघोषित महामना, पॉलिटिकल गॉड फॉदर ऑफ फिशरमैन बना लिया।
मैं एक ही बात जानता हूँ कि अगर क्षेत्र में कही किसी लड़की की इज्जत लूटी जा रही हो और थानेदार वहां पहुंचकर लड़की की इज्जत बचाकर थाने में लाकर खुद बलात्कार करे तो उस थानेदार और बलात्कारी में कोई अंतर रह जाएगा। ठीक इसी तरह अगर डॉ. संजय कुमार निषाद अगर दावा करते हैं कि निषाद समाज को अन्य दलों के चंगुल से बाहर निकालकर उनका सम्मान बढ़ाए हैं तो फिर अपनी पार्टी में लाकर उनका और निषाद समाज दोनों का शोषण कर रहे हैं तो उनमें और अन्य दलों में क्या अंतर है। जब वह मुझ जैसे एक वफादार सिपाही का नहीं हुए जो कि मैने अपने 10 वर्ष डॉ. संजय कुमार निषाद और उनके बेटों को दे दिया तो अन्य किसी का वह क्या होंगे। वह सिर्फ उसी के हो सकते हैं जो उनका तलवा चाटने का काम करते रहे और जो उनको अपना इज्जत, आबरू लुटाकर उनको खुश रखे बस वही लोग उनके चहेते रह सकते हैं। लिखने के तो सैकड़ों मामले हैं जो लिखने लगूं तो कई घंटे लग जायेंगे क्योंकि मैंने जहां- जहां समाज की लड़ाई लड़ी है। वहां मेरी लोकप्रियता कम करने के लिए मेरे विरुद्ध पैरवी करने में डॉ. संजय कुमार निषाद और उनके बेटों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है पता नहीं उन सबको मुझसे इतनी जलन क्यों रहती है। खैर छोड़िए वो सब अब अपना राजनीति करें और उनसे दूरी बनाने के लिए मैं दुनियां को ही छोड़ दे रहा हूँ। बस एक आखिरी बात मैं अपने निषाद समाज से कहना चाहूंगा कि आज तक मैंने निषाद समाज के लिए जो भी हो सका है वह मदद मैने किया है अब मैं समाज से अपने परिवार की सुरक्षा और उनके भविष्य की जिम्मेदारी आप सब पर सौंप के जा रहा हूँ।
अगर आप लोग मेरे परिवार का ख्याल रख लेंगे तो मेरी आत्मा को शान्ति मिलेगी और मैं अपने आप को गौरवान्वित महसूस करूंगा कि मैंने जो मदद समाज का किया था उसका फल मेरे परिवार को मिल रहा है। मैं अगर दुनियां छोड़कर जा रहा हूँ तो इसका सबसे बड़ा कारण डॉ. संजय कुमार निषाद और उनके बेटों प्रवीण कुमार निषाद और ई श्रवण कुमार निषाद और हरामखोर गद्दार दोस्त जय प्रकाश निषाद है। मैं फिर कह रहा हूँ कि अगर मैं मारना चाहता तो इन गद्दारों को कभी भी मार सकता था मगर मैं हत्यारा नहीं बनना चाहता था। मेरे सामाजिक और राजनैतिक जीवन में अगर जाने-अनजाने में किसी के साथ मुझसे कोई भूल या गलती हो गई हो तो आप लोग क्षमा करियेगा और मेरे परिवार का ख्याल रखियेगा।
मुझे माफ करना माँ, अंजली, भैया, दीदी।
यह पोस्ट लिखकर जान देने वाले धर्मातमा निषाद के फेसबुक पेज से साभार प्रकाशित

बसपा में फिर बढ़ी हलचल

नई दिल्ली। आकाश आनंद के ससुर और पुराने बसपाई अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निकाले जाने के बाद बहुजन समाज पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। बसपा मुखिया बहन मायावती के आज के सोशल मीडिया पोस्ट से यही लग रहा है। इस पोस्ट में साफ नजर आ रहा है कि बसपा प्रमुख मायावती के दिल और दिमाग में काफी हलचल है। इस पोस्ट में अशोक सिद्धार्थ को चेतावनी है तो आकाश आनंद के लिए भी बड़ा मैसेज है।

12 फरवरी को अशोक सिद्धार्थ को बसपा से बाहर किये जाने के फरमान के बाद 16 फरवरी को एक के बाद अपने 5 एक्स पोस्ट में बसपा प्रमुख की बेचैनी साफ दिखी। बहनजी ने इशारों-इशारों में नसीहत देते हुए लिखा कि-

बीएसपी, देश में बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के मानवतावादी आत्म-सम्मान व स्वाभिमान के कारवाँ को सत्ता तक पहुँचाने हेतु, मान्यवर श्री कांशीराम जी द्वारा सब कुछ त्यागकर स्थापित की गई पार्टी व मूवमेन्ट, जिसमें स्वार्थ, रिश्ते-नाते आदि महत्वहीन अर्थात बहुजन-हित सर्वोपरि है।

इसी क्रम में मान्यवर श्री कांशीराम जी की शिष्या व उत्तराधिकारी होने के नाते उनके पदचिन्हों पर चलते हुए मैं भी अपनी आखिरी सांस तक हर कुर्बानी देकर संघर्ष जारी रखूंगी ताकि बहुजन समाज के लोग राजनीतिक गुलामी व सामाजिक लाचारी के जीवन से मुक्त होकर अपने पैरों पर खड़े हो सकें।

इसके बाद बहनजी ने जो पोस्ट लिखा वो भतीजे आकाश आनंद को चेतावनी की तरह है। बहनजी ने लिखा-

मान्यवर श्री कांशीराम जी की तरह ही मेरे जीतेजी भी पार्टी व मूवमेन्ट का कोई भी वास्तविक उत्तराधिकारी तभी जब वह भी, श्री कांशीराम जी के अन्तिम सांस तक उनकी शिष्या की तरह, पार्टी व मूवमेन्ट को हर दुःख-तकलीफ उठाकर, उसे आगे बढ़ाने में पूरे जी-जान से लगातार लगा रहे।

साथ ही, देश भर में बीएसपी के छोटे-बड़े सभी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को भी पार्टी प्रमुख द्वारा निर्देश, निर्धारित अनुशासन एवं दायित्व के प्रति पूरी निष्ठा व ईमानदारी से जवाबदेह होकर पूरे तन, मन, धन से लगातार काम करते रहना ज़रूरी है।

बहनजी के एक्स पोस्ट से साफ है कि उन्होंने यह संदेश दे दिया है कि कोई बसपा का उत्तराधिकारी तभी बना रह सकता है जब वो उनके हर निर्देश का पालन करे। बता दें कि जिस तरह से बहनजी ने आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ को बाहर का रास्ता दिखाया है, उससे पार्टी के भीतर नई बहस शुरू हो गई है। कहा जा रहा है कि आकाश आनंद भी इस फैसले से खुश नहीं हैं। आकाश आनंद बहनजी के हर पोस्ट को रि-पोस्ट करते हैं, लेकिन 12 फरवरी को अशोक सिद्धार्थ को निकाले जाने की खबर पर उनकी चुप्पी साफ दिखी। उन्होंने बसपा मुखिया के इस पोस्ट को रि-पोस्ट भी नहीं किया। और अब जिस तरह इस उठा पटक के चौथे दिन बहनजी ने पार्टी के उत्तराधिकारी की योग्यता को लेकर जो बयान जारी किया है, उससे हलचल और बढ़ गई है।

पानी की हर बू्ंद के लिए संघर्ष करने वाली महिलाओं की कहानी

झांसी। झांसी के बबीना ब्लॉक का सिमरावारी गांव, जहां पानी की हर बूंद के लिए संघर्ष करना लोगों की नियति बन चुकी थी। बारिश के दिनों में भी घूरारी नदी सूखी ही रहती, और गर्मियों में हालात और भी बदतर हो जाते। पीने के पानी से लेकर खेतों की सिंचाई तक, हर चीज के लिए लोग तरसते थे। गांव की महिलाओं को रोज़ कई किलोमीटर दूर पैदल चलकर पानी लाना पड़ता था। यह मुश्किल सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि पूरे बुंदेलखंड की थी, जहां जल संकट आम बात थी। गांव की कुछ जागरूक महिलाओं ने तय किया कि वे इस समस्या को यूं ही नहीं छोड़ेंगी। उन्होंने मिलकर एक स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाया और खुद को “जल सहेलियां” नाम दिया।

जल सहेलियों ने जल संरक्षण और नदी पुनर्जीवन का संकल्प लिया, लेकिन यह सफर आसान नहीं था। जब उन्होंने गांव के लोगों को इस मुहिम से जुड़ने के लिए कहा, तो कई लोगों ने इसे असंभव बताया। कुछ ने कहा, “जो नदी सालों से सूखी पड़ी है, उसे हम जैसे साधारण लोग कैसे जिंदा कर सकते हैं?” लेकिन जल सहेलियां हार मानने वालों में से नहीं थीं।

जल सहेलियों ने बिना किसी सरकारी या बाहरी सहायता के अपने बलबूते पर काम शुरू किया। उन्होंने बालू भरी बोरियों का इस्तेमाल करके छोटे-छोटे “चेकडैम” (अस्थायी बांध) बनाए ताकि बारिश का पानी नदी में ठहर सके। दिन-रात की मेहनत के बाद छह दिनों में उन्होंने एक ऐसा जलाशय तैयार कर दिया, जिसने सूखी पड़ी घूरारी नदी को फिर से जीवन दे दिया। गांव के बुजुर्गों ने जब नदी में पानी देखा, तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। बच्चों ने पहली बार नदी में नहाने का आनंद लिया, और किसानों को अपनी फसलें उगाने की उम्मीद दिखी। लेकिन जल सहेलियों का संघर्ष सिर्फ नदी पुनर्जीवन तक सीमित नहीं था। उन्होंने पानी बचाने के लिए पूरे क्षेत्र में एक “जल यात्रा” निकाली। वे गांव-गांव जाकर लोगों को जल संकट और जल संरक्षण के उपायों के बारे में जागरूक करने लगीं।

उन्होंने समझाया कि सिर्फ एक नदी को पुनर्जीवित करने से समस्या हल नहीं होगी, जब तक कि हर व्यक्ति पानी की बचत के लिए प्रयास न करे। उन्होंने रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, तालाबों की सफाई, और जल संरक्षण तकनीकों पर लोगों को प्रशिक्षित किया। यह सिर्फ एक नदी पुनर्जीवित करने की कहानी नहीं थी, बल्कि यह नारी शक्ति और सामूहिक प्रयासों की ताकत का प्रमाण थी। आज जल सहेलियां केवल झांसी तक सीमित नहीं हैं। वे पूरे बुंदेलखंड और उत्तर प्रदेश के अन्य जल संकटग्रस्त क्षेत्रों में जाकर जल संरक्षण के प्रति जागरूकता फैला रही हैं। उनकी मुहिम अब एक आंदोलन बन चुकी है। झांसी की जल सहेलियों ने यह साबित कर दिया कि अगर संकल्प दृढ़ हो, तो किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है। यह कहानी सिर्फ झांसी की महिलाओं की नहीं, बल्कि पूरे देश की महिलाओं के लिए प्रेरणा है कि यदि हम एकजुट होकर कुछ करने की ठान लें, तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। उनकी मेहनत और दृढ़ संकल्प का ही परिणाम है कि उनकी सफलता के किस्सों की चर्चा दुनिया भर में होने लगी है।


ट्राइबल आर्मी के एक्स पेज से साभार प्रकाशित

बुलेट चलाने पर दलित युवक का हाथ काटा

Image: Social Mediaतमिलनाडु। उत्तर भारत में जातिवाद की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों में भी जातिवाद चरम पर है। तमिलनाडु में मनुवादी जातिवादी समाज के कुछ लड़कों ने एक दलित युवक पर इसलिए हमला कर दिया क्योंकि वह महंगी बुलेट चला रहा था। घटना 12 फरवरी की तमिलनाडु के शिवगंगा जिले के मेलपीडावुर की है। इस हमले में दलित युवक के हाथ पर हमला किया गया, जिससे उसका हाथ बुरी तरह कट गया। दलित युवक इय्यासामी थर्ड ईयर का छात्र है।

पिछले साल युवक के चाचा ने रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकिल खरीदी थी। युवक उसी से जा रहा था। दलित युवक का महंगा बुलेट चलाना जातिवादी गुंडों को रास नहीं आया और उन्होंने उस पर हमला कर दिया। हमले में युवक का हाथ काटने की कोशिश की गई। गनीमत यह रही कि युवक का हाथ अलग नहीं हुआ। गंभीर हालत में युवक को गांव से 45 किलोमीटर दूर अस्पताल में ले जाया गया।

खबर है कि जब इय्यासामी के घरवाले उसे लेकर अस्पताल जा रहे थे तो आरोपियों ने उसके घर पर भी हमला किया। दलित समाज के युवक पर हमला करने वाले युवक भी उसी के उम्र के थे। हमला करने वाले तीनों आरोपियों में 21 साल का के.आर. विनोथ कुमार, 22 साल का के. ए. अथीश्वरन औऱ 21 साल का के. एम वेल्लारसु शामिल है। पुलिस ने विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज करने के बाद तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर उन्हें जेल भेज दिया है।

दिल्ली में कांग्रेस से क्यों दूर रहे दलित और मुस्लिम

दिल्ली। दिल्ली चुनाव के नतीजे सबके सामने हैं। आम आदमी पार्टी और उसके दिग्गज नेताओं की हार और भाजपा की बंपर जीत के बाद अब किसने किसको और क्यों वोट दिया, इसके विश्लेषण का दौर है। इस बारे में लोकनीति और सीएसडीएस ने आंकड़ा जारी कर दिया है, जिसको इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित किया है। रिपोर्ट में साफ है कि सवर्ण जातियों ने इस बार भाजपा को बंपर वोट किया है। तो वहीं, आम आदमी पार्टी मुस्लिम समुदाय और दलित समाज का समर्थन हासिल करने में कामयाब रही है। रिपोर्ट में हर जाति का अलग से जिक्र किया गया है। इसमें एक बड़ा सवाल कांग्रेस के लिए है कि

इसके मुताबिक 66 प्रतिशत ब्राह्मण वोटरों ने भाजपा को वोट दिया। जबकि 26 प्रतिशत ने आम आदमी को तो 5 प्रतिशत ने कांग्रेस को वोट किया है। बनिया वर्ग की बात करें तो बाह्मणों की तरह ही 66 प्रतिशत बनिया वर्ग ने भाजपा को वोट किया। इस समुदाय का 25 प्रतिशत वोट आम आदमी पार्टी को और 7 प्रतिशत वोट कांग्रेस को मिला है।

दिल्ली चुनाव में पंजाबी वर्ग भी महत्वपूर्ण भूमिका में रहता है। इनको रिझाने के लिए आम आदमी पार्टी ने पंजाब के अपने मुख्यमंत्री भगवंत मान को दिल्ली चुनाव प्रचार में उतारा। हालांकि आप को इसका फायदा नहीं मिला है। पंजाबी बनियों में सिर्फ 26 प्रतिशत ने आप को समर्थन दिया, जबकि 67 प्रतिशत ने भाजपा और 5 प्रतिशत ने कांग्रेस को चुना। इसी तरह 60 प्रतिशत ठाकुरों ने भाजपा को वोट दिया, इसके तकरीबन आधे 33 प्रतिशत ने आम आदमी पार्टी को और 4 प्रतिशत ने कांग्रेस को वोट किया।

जिस तरह सवर्णों ने भाजपा को जमकर वोट किया तो मुस्लिम और दलित वोटरों का साथ आम आदमी पार्टी को मिला है। 65 फीसदी मुसलमानों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया जबकि 16 प्रतिशत ने कांग्रेस को। हालांकि भारतीय जनता पार्टी इस वर्ग का 15 प्रतिशत वोट हासिल करने में कामयाब रही जो कि उसके लिए बोनस बन गया।

दलितों में जाटव और वाल्मीकि दो प्रमुख जातियां हैं। जाटव वोटरों की बात करें तो आंकड़ों के मुताबिक 58 प्रतिशत जाटवों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया, 34 प्रतिशत ने भाजपा को वोट दिया जबकि 4 प्रतिशत ने कांग्रेस को वोट दिया। दलितों की वाल्मीकि जाति में 67 प्रतिशत वोट आम आदमी पार्टी को मिले हैं, जबकि 25 प्रतिशत ने भाजपा को और 9 प्रतिशत ने कांग्रेस को वोट दिया। इन दोनों प्रमुख दलित जातियों के अलावा अन्य दलित जातियों में 53 प्रतिशत ने आम आदमी पार्टी को, 41 प्रतिशत ने भाजपा को और 3 प्रतिशत ने कांग्रेस को वोट किया।

जाट मतदाताओं में 45 प्रतिशत ने भाजपा को, 44 प्रतिशत ने आम आदमी पार्टी और 5 प्रतिशत ने कांग्रेस को, जबकि गुर्जरों में 49 प्रतिशत ने भाजपा, 44 प्रतिशत ने आम आदमी पार्टी को 5 प्रतिशत ने कांग्रेस को वोट दिया। यादवों समुदाय आप और भाजपा दोनों के बीच आधी-आधी बंटी दिखी। अन्य पिछड़ी जातियों ने भाजपा का साथ अधिक दिया। जबकि सिख समाज के वोट तीनों दलों में बंटे। 45 प्रतिशत ने आम आदमी पार्टी को, 43 प्रतिशत ने भाजपा को जबकि 10 प्रतिशत ने कांग्रेस को वोट दिया।

इन आंकड़े से साफ है कि अगर आम आदमी पार्टी की इज्जत बच पाई है तो मुस्लिम और दलित वोटों की वजह से। हालांकि यहां एक बड़ा सवाल यह भी है कि राहुल गांधी के तमाम संविधान बचाओ सम्मेलनों के बावजूद दलितों और मुसलमानों ने कांग्रेस को समर्थन क्यों नहीं दिया। जाहिर है कांग्रेस पार्टी को इन सवालों का जवाब तलाशना होगा।

दलित किशोर को इस्लाम अपनाने को किया मजबूर, चंद्रशेखर आजाद ने किया विरोध

आजमगढ़। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के रहने वाले दलित समाज के एक किशोर का बाराबंकी में जबरन धर्म परिवर्तन कराने का मामला सामने आया है। आरोप है कि पीड़ित को जबरन इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया। इसके लिए उसे न सिर्फ बंधक बनाया गया बल्कि टार्चर भी किया गया। इस घटना को लेकर आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने विरोध जताया है। 

चंद्रशेखर आजाद ने इसका विरोध करते हुए इस घटना को अत्यंत गंभीर, निंदनीय और अमानवीय कहा। उन्होंने कहा कि यह संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है और इस्लाम की शिक्षा के भी बिल्कुल विपरीत है। नगीना सांसद ने बाराबंकी पुलिस से इस पूरे प्रकरण की गहन जांच कर दोषियों को शीघ्र गिरफ्तार कर कड़ी से कड़ी सजा दिये जाने की मांग की है, ताकि भविष्य में ऐसी किसी घटना की पुनरावृत्ति न हो।

बता दें कि पीड़ित किशोर ने अपने बयान में कहा है कि उसे लगातार टॉर्चर किया गया, बंधक बनाकर रखा गया और भोजन तक नहीं दिया गया। चंद्रशेखर आजाद का कहना था कि यह दर्शाता है कि इस कृत्य के पीछे कितनी घिनौनी मानसिकता कार्यरत है।

डॉ. अशोक सिद्धार्थ बसपा से निष्कासित, बसपा सुप्रीमों मायावती ने जारी किया फरमान

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी में आज बड़ी हलचल मच गई। बसपा से पूर्व राज्यसभा सांसद और कई प्रदेशों के प्रभारी रहे डॉ. अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है। यह फरमान बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने खुद जारी किया। उन पर गुटबाजी का आरोप लगाया गया है। अशोक सिद्धार्थ के साथ मेरठ के बसपा नेता नितिन सिंह पर भी गाज गिरी है। बता दें कि अशोक सिद्धार्थ बसपा के नेशनल को-आर्डिनेटर आकाश आनंद के ससुर हैं। बसपा सुप्रीमों मायावती के इस सख्त कदम से बसपा में हलचल बढ़ गई है।

बसपा सुप्रीमों ने सोशल मीडिया में इस संबंध में जानकारी साझा करते हुए लिखा कि दक्षिणी राज्यों के प्रभारी रहे डॉ. अशोक सिद्धार्थ और नितिन सिंह को चेतावनी के बावजूद भी गुटबाजी करने और पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण पार्टी के हित में तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित किया जाता है।

बसपा सुप्रीमों के इस फैसले के बाद मिली जुली प्रतिक्रिया सामने आ रही है। बसपा सुप्रीमों के इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कई बसपा कार्यकर्ता यह कह रहे हैं कि बहनजी ने साफ कर दिया है पार्टी का हित परिवार से ऊपर है। जबकि कईयों ने इस कदम को बसपा के लिए नुकसान वाला बताया है। हालांकि यह साफ है कि बसपा प्रमुख मायावती कोई भी कड़ा फैसला लेने से नहीं हिचकती। बसपा सुप्रीमो ने आकाश आनंद को भी नेशनल को-आर्डिनेटर और उत्तराधिकारी के पद से हटा दिया था, हालांकि बाद में उनकी वापसी भी करा दी थी। अब देखना होगा कि बसपा प्रमुख मायावती के इस कदम का आने वाले दिनों में पार्टी पर क्या प्रभाव पड़ता है।

सतगुरु रैदासः महान संत के महान विचार, जो आज भी प्रासंगिक है

रेल मंत्रालय में साल दर साल फ़रवरी के महीने में वाराणसी जाने के लिए स्पेशल ट्रेन बुक कराने के प्रार्थना पत्र आते हैं। इनमे से ज़्यादातर प्रार्थना पत्र पंजाब, हरियाणा और राजस्थान से आते हैं, और गंतव्य स्टेशन होता हैं मंडुवाडीह। प्रार्थना पत्र नवम्बर में ही आने शुरू हो जाते हैं और दिसम्बर- जनवरी तक आते ही रहते हैं। बुक कराने वाले पूरा किराया तो देते ही हैं, स्पेशल ट्रेन का एक्सट्रा चार्ज भी देते हैं। अवसर होता है संत शिरोमणि गुरु रविदास की जयंती का, जो हर साल माघ पुर्णिमा को मनाई जाती है। संत रविदास का जन्म सन 1398 माघ पूर्णिमा को वाराणसी उत्तर प्रदेश के निकट मण्डुवाडीह में हुआ था। गुरू रविदास ने अपने पदो के माध्यम से समाज में फैले मिथ्याचार आडंबर और रूढ़िवादिता पर प्रहार किया।

गुरू रविदास का अधिकांश समय भारत के विभिन्न प्रदेशों के भ्रमण में बीता। संबंधित प्रदेशों की बोली भाषा के अनुरूप इन्हें विभिन्न नामों से ख्याति प्राप्त हुई जैसे- पंजाब में रैदास, बंगाल में रूईदास, महाराष्ट्र में रोहिदास, राजस्थान में रायदास, गुजरात में रोहिदास अथवा रोहितास, मध्य प्रदेश में रविदास।

गुरू ग्रंथ साहिब में रविदास के उल्लिखित चालीस पदों में अधिकांशतया ”रैदास” नाम का ही वर्णन आया है। संत रविदास गुजरात, उत्तरी भारत, पूर्वी भारत, पश्चिमी भारत और मध्य भारत के एक सर्वमान्य संत थे। उन्होंने सार्वजनीन भ्रातृत्व की बात की और सभी के प्रति प्रेम व स्नेह व्यक्त किया। उन्होंने श्रमण अथवा अपनी आजीविका स्वयं अर्जित करने का संदेश प्रचारित किया।

गुरू रविदास महान सामाजिक व धार्मिक क्रातिकारी थे। उन्होंने अपने कार्यों द्वारा तत्कालीन भारत में सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया। उस समय ये माना जाता था कि सन्यासी जीवन 75 वर्ष की उम्र पार करने के बाद बिताया जाता है। लेकिन गुरू रविदास ने दुनिया को यह दिखा दिया कि गृहस्थ जीवन में भी मोक्ष संभव है। उनकी पत्नी लोना देवी भी अध्यात्त्मिक रुप से उच्च अवस्था को प्राप्त थीं। गुरू रविदास ने आत्म-सम्मान, आत्मबल और आत्म-सहायता पर जोर दिया। सतगुरू रविदास ने न सिर्फ जातीय वर्चस्व को चुनौती दी बल्कि समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व व न्याय उनके सामाजिक परिवर्तन के मुख्य स्तंभ थे। गुरू रविदास भारतवर्ष के कोने-कोने में गये और समानता, भ्रातृत्व व सार्वजनीन एकात्मता का संदेश फैलाने के लिए कार्य किया। वे समतावादी समाज की बात करते थे। उनकी दृष्टि एक ऐसे समाज के निर्माण की थी, जहां भूख, गरीबी और दरिद्रता न हो।

गुरू रविदास कहते हैं:

ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न। छोट बड़त सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।

मैं ऐसा शासन चाहता हू¡ जिसमें सबको भर पेट भोजन मिले। मुझे तभी खुशी होगी, जब उच्च या निम्न जाति को भुलाकर सबके साथ समानता का व्यवहार किया जाए।

संत् रविदास ने एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की थी जहां कोई भूखा और गरीब नहीं होगा, रोगी और दु:खी नहीं होगा, असमानता और शोषण का अभाव होगा और लोगों में प्रेम और सौहार्द की भावना होगी। ऐसे राष्ट्र  को संत रविदास ने बेगमपुरा नाम दिया था।

संत् रविदास ने जाति, रंग या नस्ल पर आधारित लोगों के अत्याचारों का विरोध किया।  समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, समानता व भ्रातृत्व का संदेश फैलाकर संत रविदास ने कहा कि किसी मानव की पहचान उसके जन्म से नहीं बल्कि कर्म से होती है।

गुरू रविदास कहते हैं:

रविदास सुकरमन करन सो नीच ऊँच हो जाये, करही कुकर्म ऊँच भी, तो महा नीच कहलाय ।

अच्छे कर्म करके निम्न जाति में जन्मा व्यक्ति भी उच्च हो जाता है। गलत काम करके उच्च जाति में जन्मा व्यक्ति भी निंदनीय अथवा निम्न हो जाता है।

रविदास जनम के कारने, होत न कोई नीच, नर कू नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच ।

जन्म से कोई ऊँचा-नीचा नहीं होता, केवल बुरे कर्म अर्थात् गलत कार्य ही मानव को ऊँचा-नीचा बनाते हैं।

संत रविदास के समय के भारत में महिलाओं को सामान्यतया दीक्षा नहीं दी जाती थी। संत रविदास ने उस परंपरा को तोड़ा और अनेकों महिलाओं को दीक्षा देकर महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक क्रातिकारी काम किया। उनकी प्रमुख महिला शिष्यों में मीराबाई व चित्तौड़ की रानी झालीबाई सहित अनेक राजकुमारियां शामिल थी।

मीराबाई ने अपने पदों में कहा है कि ‘गुरू मिल्या रविदास जी’।

मीराबाई पहले अनेकों संतों के पास गई थी लेकिन किसी ने परंपरा को तोड़कर एक महिला को दीक्षा देने की हिम्मत नहीं जुटाई। लेकिन संत रविदास ने केवल मीराबाई को ही दीक्षा नहीं दी, बल्कि अनेकों महिलाओं को दीक्षा देकर ये सिद्ध किया कि अघ्यात्म के मार्ग पर चलने का अधिकार महिलाओं का भी उतना ही जितना कि पुरूषों का।

संत रविदास ने इस बात पर जोर दिया कि पुत्री भी पुत्र के समान होती है और महिलाएं किसी भी तरीके से पुरूषों से कम नहीं होती हैं। आज जब देश के कई भागों में महिलाओं पर जघन्य अपराध हो रहा है ऐसे में संत रविदास की शिक्षाएं और भी प्रासंगकि हो जाती हैं। गुरू रविदास समानता, भ्रातृत्व, प्रेम व स्नेह को मानते थे और उसी का प्रचार-प्रसार करते थे। इसलिए गुरू रविदास को श्रमण परंपरा का अग्रवाहक माना जाता है।

गुरू रविदास कहते हैं: मन ही पूजा मन ही धूप, मन ही सेवा सहज सरूप। पूजा अर्चना ना जानू तोरी, कह रविदास कौन गति मोरी।

आज जब देश के बिभिन्न भागों में जात- पांत के नाम पर हिंसक घटनाएं हो रही हैं संत रविदास की शिक्षाएं और भी प्रासंगकि हो जाती है

श्रावस्ती में जेतवन विहार में एक कुंए का नाम उनकी पत्नी लोना माई के नाम पर है। ऐसा प्रतीत होता है कि संत रविदास और उनकी पत्नी लोना देवी को आध्यात्मिक शक्तियां और रिद्धियां-सिद्धियां प्राप्त रही होंगी जिससे स्थानीय लोग प्रभावित हुए होंगे और इसीलिए कुएं का नाम लोना माई के नाम पर रखा गया होगा। जेतवन में उनके नाम पर कुएं का मौजूद होना यह सिद्ध करता है कि वे श्रावस्ती जैसे बौद्ध स्थलों पर अनेक बार गए होंगे।

रैदास की सबसे बड़ी विशेषता भक्ति साधना के साथ-साथ श्रम साधना भी है। संत रैदास के पदों से और विभिन्न जनश्रुतियों से पता चलता है कि अपनी प्रशिद्धि के चरम  दिनों में भी संत रैदास जूते बनाने का अपना व्यवसाय किया करते थे और एक जोड़ी जूता प्रतिदिन दान में दिया करते थे। रैदास ने श्रम को ईश्वर कहा है।

संत रैदास का जीवन अत्यंत सादगी से भरा और किसी भी प्रकार के लोभ, मोह, भय आदि से मुक्त था। उनकी पंक्तियों में काम, क्रोध्, मद, लोभ, मोह आदि कुसंस्कारों के त्याग का आग्रह है। व्यक्तिगत गुणों से परिपूर्ण संत रैदास की मुक्ति मार्गी भूमिका उन्हें अस्मिता बोध् आंदोलनों के एक बड़े प्रणेता और प्रेरक के रूप में प्रस्तुत करती है। उनके व्यक्तित्व की महानता का प्रतीक उनके मार्ग का व्यापक प्रसार भी है और सदियों तक उन्हें कालजयी भी बनाता है।

संत रविदास की लोकप्रियता का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि उनकी जन्म-जयंती माघ पूर्णिमा के दिन देश-विदेश से लाखों लोग उनकी जन्मस्थली मडुआडीह पहुंचते है और संत रविदास के प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर उनके जीवन से प्रेरणा लेते हैं।

संत रैदास की बेगमपुर की अवधारणा की वर्तमान प्रासंगिकता

संत रैदास जी की वाणी में से कुछ महत्वपूर्ण निम्नलिखित हैं-

 ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिलै सबन को अन्न। छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।।

जात-जात में जात हैं, जों केलन के पात। रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जात न जात।।

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं। तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा। दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।

रैदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच। नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।।

बेगमपुरा सहर को नाउ, दुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ। ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफुन खता न तरसु जुवालु। अब मोहि खूब बतन गह पाई, ऊहां खैरि सदा मेरे भाई। काइमु-दाइमु सदा पातिसाही, दोम न सोम एक सो आही। आबादानु सदा मसहूर, ऊहाँ गनी बसहि मामूर। तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै, महरम महल न को अटकावै। कह ‘रविदास’ खलास चमारा, जो हम सहरी सु मीतु हमारा।

बेगमपुरा पद के बारे में दलित लेखक कंवल भारती लिखते हैं कि ‘यह पद डेरा सच्चखंड बल्लां, जालंधर के संत सुरिंदर दास द्वारा संग्रहित ‘अमृतवाणी सतगुरु रविदास महाराज जी’ से लिया गया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि असल नाम ‘रैदास’ है, ‘रविदास’ नहीं है। यह नामान्तर गुरु ग्रन्थ साहेब में संकलन के दौरान हुआ। जिज्ञासु जी ने इस संबंध में लिखा है, ‘यह पता नहीं चल सका कि गुरु ग्रन्थ साहेब में संत रैदास जी के जो 40 पद मिलते हैं, वे किसके द्वारा पहुंचे और उनमें रैदास को रविदास किसने किया? यह बात विचारणीय इसलिए है, क्योंकि ‘रैदास’ का ‘रविदास’ किया जाना संत प्रवर रैदास जी का ब्राह्मणीकरण है; जो रैदास-भक्तों में सूर्या उपासना का प्रचार है। अन्य संग्रहों में रैदास साहेब का यह पद कुछ पाठान्तर के साथ मिलता है और उसमें ‘रैदास’ छाप ही मिलती है। जिज्ञासु जी के संग्रह में इस पद के आरंभ में यह पंक्ति आई है- ‘अब हम खूब वतन घर पाया, ऊँचा खैर सदा मन भाया।‘

इस पद में रैदास साहेब ने अपने समय की व्यवस्था से मुक्ति की तलाश करते हुए जिस दुःख विहीन समाज की कल्पना की है; उसी का नाम बेगमपुरा या बेगमपुर शहर है। रैदास साहेब इस पद के द्वारा बताना चाहते हैं कि उनका आदर्श देश बेगमपुर है, जिसमें ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और छूत-छात का भेद नहीं है। जहां कोई टैक्स देना नहीं पड़ता है; जहां कोई संपत्ति का मालिक नहीं है। कोई अन्याय, कोई चिंता, कोई आतंक और कोई यातना नहीं है। रैदास साहेब अपने शिष्यों से कहते हैं- ‘ऐ मेरे भाइयो! मैंने ऐसा घर खोज लिया है यानी उस व्यवस्था को पा लिया है, जो हालांकि अभी दूर है; पर उसमें सब कुछ न्यायोचित है। उसमें कोई भी दूसरे-तीसरे दर्जे का नागरिक नहीं है; बल्कि, सब एक समान हैं। वह देश सदा आबाद रहता है। वहां लोग अपनी इच्छा से जहां चाहें जाते हैं। जो चाहे कर्म (व्यवसाय) करते हैं। उन पर जाति, धर्म या रंग के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है। उस देश में महल (सामंत) किसी के भी विकास में बाधा नहीं डालते हैं। रैदास चमार कहते हैं कि जो भी हमारे इस बेगमपुरा के विचार का समर्थक है, वही हमारा मित्र है।’)

‘ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिलै सबन को अन्न। छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।।’

रैदास जी जन साधारण के राज की बात करते हैं। एक ऐसे लोकतांत्रिक गणराज्य की जिसमें जनता की भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सभी जरूरतें पूरी हों। यह रचना लगभग छः सौ साल पहले की है। फिर भी उन्होंने किसी राजा-रानी, नवाब या बादशाह के राज की वकालत नहीं की है, यहां तक कि उन्होंने किसी राम राज्य की बात भी नहीं की है। बहुत मुश्किल से दुनिया के इतिहास में किसी संत कवियों की रचना में इस तरह के लोक कल्याणकारी राज्य के विचार मिलते हैं। यहां तक कि राजनीतिक इतिहास में भी यह दुर्लभ है।

रैदास की बेगमपुरा रचना प्लेटो, थामस मूर के विचार की तरह यूटोपियन नहीं है, यह ठोस व व्यावहारिक है तथा लोगों की आवश्यकता के अनुरूप है। यह रचना उदात्त है और छोटी होते हुए भी जनराजनीति के राज्य का आज भी एक प्रामाणिक दस्तावेज है। यह एक पुख्ता प्रमाण है कि हमारे संविधान की प्रस्तावना की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय की संकल्पना किसी पश्चिम की नकल नहीं है, यह भारतीय भूमि की ही पैदाइश है जो विभिन्न रूपों में संघर्ष की धारा के बतौर आज भी मौजूद है।

बेगमपुरा में किसी मूर्ति-मंदिर की राजनीतिक संस्कृति कहीं भी नहीं दिखती है। आजकल कुछ लोग भारतीय संस्कृति को एकांगी बनाकर दलितों, आदिवासियों और आम नागरिकों के सहज मानव प्रेम, मानव मुक्ति की भावना को नष्ट करने में लगे हुए है। यही नहीं हिन्दू परम्परा में भी जो ग्राहय है उसको भी वे नष्ट करने पर तुले हुए हैं। आखिर स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती जैसे बड़े संतों ने भी सदैव मूर्ति-मंदिर की राजनीतिक संस्कृति का विरोध ही किया, उनसे बड़ा वैदिक धर्म का ज्ञानी हिन्दुत्व की वकालत करने वाले लोगों में कौन है? गोलवरकर जो हिटलर को अपना आदर्श मानते थे या मोदी सरकार, जो जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई से खड़ी हुई जनसम्पत्ति को देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हाथ कौड़ी के मोल बेच रही है, विदेशी ताकतों की सेवा में दिन रात लगी हुई है।

बहुलता को कमजोरी और धर्म निरपेक्षता को जो लोग विदेशी मानते हैं, वे भारतीय संस्कृति को वास्तविक अर्थों में ना जानते हैं, न मानते हैं। भारत ने विश्व को बहुत कुछ दिया है, और विश्व से बहुत कुछ लिया भी है। हमने यूनान, मिस्र, अरब, चीन जैसी सभ्यताओं को दिया भी और लिया भी।

शर्म आनी चाहिये उन लोगों को, जिनके श्लाघा पुरुष हिटलर, मुसोलिनी, तोजो जैसे तानाशाह हैं। शर्म आरएसएस करे, भाजपा करे जो हमारे सांस्कृतिक जीवन में रचे – बसे बहुलता व धर्म निरपेक्षता को खारिज करने में लगे हैं। धर्मनिरपेक्षता के विचार के विदेशी होने के तर्क को यदि मान भी लें तो भी क्या ? सत्य – शिव – सुंदर तो मानव जाति की आत्मा है, अगर कहीं भी सत्य है, तो वह ग्राह्य है ।

रैदास सामाजिक सच्चाइयों से भी रूबरु हो कर ही कहते हैं:

छोट बड़ो सब सम बसे, रैदास रहे प्रसन्न।

समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय की भावना कितनी गहरी है उनके अंदर यह उनके इसी पद से समझ सकते हैं। वर्ण व्यवस्था और जाति के जंजाल के भार से दबी मानवता की मुक्ति की भावना, जो बाद में जोतिबा फुले, पेरियार और डाक्टर अंबेडकर के संघर्षों में दिखती है उसकी जमीन रैदास जी जैसे संत कवि ही बनाते हैं।

समता की यही संकल्पना, आधुनिक भारत के संविधान की संकल्पना है और न्याय की चाह है।

राहुल गांधी ने एक बड़ी बाधा पार कर ली है, क्या दो अन्य बाधाओं को तोड़ पाएंगे?

आरएसएस-भाजपा के चंगुल से भारतीय लोकतंत्र को निकालने के मार्ग की एक पहली बाधा राहुल गांधी पार करते हुए दिख रहे हैं। पहली चीज यह समझनी और कहनी थी कि आरएसएस-भाजपा से संघर्ष सामान्य राजनीतिक संघर्ष नहीं है, जिसमें एक पार्टी सत्ता में आती है और दूसरी पार्टी उसे चुनावों में सत्ता से बेदखल कर देती है। कमोबेश जैसी राजनीति नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के केंद्रीय सत्ता पर कब्जा करने से पहले थी, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के सत्ता पर कब्जा करने के बाद स्थिति गुणात्मक तौर पर बदल गई थी। यह पिछले 10 सालों में और साफ हो गया है।

भाजपा ने सरकार नहीं बनाई है, बल्कि भारत की सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर आरएसएस-भाजपा ने कब्जा कर लिया है। इन संस्थाओं में न्यायपालिका, स्थायी कार्यपालिका (नौकरशाही), मीडिया और राज्य की अन्य संस्थाएं शामिल हैं। इसमें वौद्धिक विचार-विर्मश के केंद्र उच्च शिक्षा-संस्थाएं और इस तरह की अन्य संस्थाएं भी शामिल हैं। सीबीआई, ईडी आदि की बात छोड़ दीजिए। सेना और अर्द्धसैनिक और पुलिस व्यवस्था तक का काफी हद तक हिंदुत्वादीकरण कर दिया गया है।

राजनीतिक लोकतंत्र निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र चुनावों पर निर्भर करता है। जिसकी पूरी जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर होती है। चुनाव आयोग भाजपा की कठपुतली बन चुका है। कार्पोरेट के धन, द्विज-सवर्ण कार्पोरेट मीडिया और चुनाव आयोग ने चुनाव को भाजपा के पक्ष में करीब-करीब मोड़ दिया है। कार्पोरेट धन से सरकारे गिराई और बनाई जा रही हैं और बनाई जा सकती हैं। इस स्थिति में आरएसएस-भाजपा के चंगुल से भारतीय लोकतंत्र को निकालने की तीन शर्तें थीं- 1- इनके खिलाफ वैचारिका संघर्ष शुरू करना और इस संघर्ष में दोस्त-दुश्मन शक्तियों की पहचान करना। 2- कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे को इस वैचारिक संघर्ष के अनुकूल बनाना। 3- इस देश के लोकतंत्र और संविधान की दुश्मन शक्तियों के खिलाफ व्यापक जन गोलबंदी करना,सिर्फ वोट के लिए नहीं, बल्कि बड़े पैमाने के जन-संघर्ष के लिए। राहुल गांधी ने आरएसएस-भाजपा और उसके वैचारिक संगठन और उनके साथ मुट्ठी भर कार्पोरेट का गठजोड़ इस देश के संविधान, लोकतंत्र और व्यापक जन का दुश्मन है, इसे काफी हद चिन्हित कर लिया है। वे इसे बार-बार सीधे, साफ लफ्जों में साहस के साथ कह रहे हैं। संघर्ष मनुवाद और संविधान के बीच है, यह बोल रहे हैं।

इसके साथ ही उन्होंने यह ठीक से पहचान लिया है कि इस देश के दलित,आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक (देश की बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी) संविधान और लोकतंत्र के साथ हैं। राहुल गांधी ने इसे चिन्हित भी कर लिया है। संविधान, जाति आधारित आर्थिक-सामाजिक जनगणना और आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी जैसे शब्दों में इसे अभिव्यक्त कर चुके हैं।

इस तरह उन्होंने आरएसएस-भाजपा की वैचारिकी और उसके मनुवाद और कार्पोरेट परस्त एजेंडे को संविधान, लोकतंत्र और व्यापक जनता के लिए सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं, जो सच है। वे साफ शब्दों में कह रहे हैं और सही कह रहे हैं कि आज का संघर्ष वैचारिक संघर्ष हैं यह सिर्फ सरकार के बदलाव का संघर्ष नहीं है, यहां तक वे यह भी कह रहे हैं कि यह इंडियन स्टेट के खिलाफ संघर्ष है। इंडियन स्टेट से उनका साफ मतलब है, भारतीय राज्य की संस्थाएं, जो आरएसएस-भाजपा चंगुल में चली गई हैं। अब राहुल गांधी के सामने दो बड़ी चुनौतियां है- 1-पहला यह है कि द्विज-सवर्णों और कार्पोरेट के स्वार्थों और हितों के पूर्ति के लिए बने कांग्रेस के संगठन को दलितों, आदिवासियों, पिछड़े और पसमांदा मुसलमानों के लिए हितों के लिए काम करने वाले संगठन में बदलना, यह तभी संभव है, जब ऊपर से नीचे तक कांग्रेस के संगठन में नेतृत्व मुख्य रूप में इस बहुसंख्यक समूहों के हाथ में हो। 2- इस कांग्रेस को बदलने से काम नहीं चलेगा, देश व्यापक जनमानस को संघर्ष और बदलाव के लिए तैयार करना पड़ेगा। इसके लिए संविधान, लोकतंत्र और जाति जनगणना के मुद्दे के साथ ही जनता के अन्य बुनियादी मुद्दों पर व्यापक जन गोलबंदी करनी पड़ेगी। इन मुद्दों में लोकतांत्रिक-संवैधानिक मुद्दों के साथ और समान रूप ही आर्थिक सवालों को उठाना पड़ेगा। विभिन्न सवालों पर किसान आंदोलन जैसे बड़े आंदोलन की जरूरत है। सही यह है कि देश की दूसरी आजादी का आंदोलन होगा, तभी लोकतंत्र-संविधान की रक्षा की जा सकती है और व्यापक जनता ही हित में देश को चलाने के बारे सोचा जा सकता है।

दिल्ली चुनाव खत्म, एग्जिट पोल में भाजपा की जीत की आहट

नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव की 70 सीटों पर 5 जनवरी को मतदान हो चुका है। चुनाव के बाद जो एग्जिट पोल हुए हैं; उसमें भाजपा सरकार बनाती हुई दिख रही है। दिल्ली चुनाव के अनुमानित नतीजों को लेकर हुए ग्यारह प्रमुख एक्जिट पोल में से 9 पर भाजपा को बहुमत मिलता दिखाया जा रहा है। अगर ऐसा होता है तो 1993 के बाद भाजपा सत्ता में लौटेगी। एग्जिट पोल में भाजपा को 35 से 50 सीटें मिलती बताई जा रही है। जबकि आम आदमी पार्टी को 20 से 30 सीटें मिलने का अनुमान जताया जा रहा है। कांग्रेस की स्थिति बेहद खराब है और हर एक्जिट पोल में उसको जीरो से 3 सीटें मिलने का अनुमान है।

बता दें कि दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों पर बुधवार शाम 5 बजे तक 58 फीसदी वोटिंग की खबर है। आखिरी आंकड़े आने बाकी हैं। चुनाव के नतीजे 8 फरवरी को घोषित होंगे। सरकार बनाने के लिए 36 सीटों की जरूरत है। बता दें कि 2020 के विधानसभा चुनाव में 62.55 फीसदी मतदान हुआ था। फिलहाल एग्जिट पोल सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों में खुशी की लहर है।

अयोध्या में दलित युवती के साथ हैवानियत पर भड़के आकाश आनंद और चंद्रशेखर, यूपी पुलिस का नकारापन उजागर

अयोध्या, यूपी। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में दलित युवती के साथ हुई हैवानियत से दलित समाज में जबरदस्त उबाल है। दलित समाज के लोगों के साथ ही नेताओं ने भी इस घटना पर यूपी की योगी सरकार और यूपी पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। बसपा अध्यक्ष सुश्री मायावती के साथ बसपा के नेशनल को-आर्डिनेटर आकाश आनंद ने यूपी सरकार और खासकर यूपी पुलिस पर जमकर हमला बोला है। सोशल मीडिया एक्स पर आकाश आनंद ने लिखा है-

अयोध्या के सहनवां में एक दलित बेटी 3 दिन से गायब थी। लेकिन यूपी की नाकारी पुलिस ने इसकी सूचना मिलने के बाद सही से कार्रवाई तक नहीं की। अगर सही वक़्त पर पुलिस हरकत में आ जाती तो शायद ये बेटी बच जाती। इस जघन्य हत्याकांड के आरोपियों के साथ दोषी पुलिसवालों के ख़िलाफ़ भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। दरअसल वीवीआईपी सेवा में व्यस्त उत्तर प्रदेश पुलिस इतनी नकारा हो चुकी है कि अब गरीब, शोषित, वंचित समाज की जान की उसके लिए कोई कीमत ही नहीं है।

हमारे समाज की इस बेटी के साथ जो अमानवीय हरकत हुई है उसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस और यहां की भाजपा सरकार को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। महिलाओं के खिलाफ अपराध में यूपी नंबर वन हो गया है और यही है यहां की भाजपा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि। भाजपा के जंगल राज ने अब समाजवादी पार्टी के जंगल राज को भी पीछे छोड़ दिया है। सूबे के मुखिया और उनका पूरा तंत्र अभी इसी में व्यस्त है कि कुंभ की मौतों का आंकड़ा कैसे छिपाया जाए। योगी जी आप और आपका प्रशासन अगर गरीब, मजलूमों, दलितों को सुरक्षा नहीं दे सकता है तो आपको तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। साथ ही समाजवादी पार्टी के नेता और अयोध्या क्षेत्र के सांसद अवधेश प्रसाद जी को घड़ियाली आंसू ना बहाकर सोचना चाहिए कि पिछले तीन दिन से वो कहां थे। संसद में महाकुंभ पर चर्चा की मांग करने वाले सांसद जी के पास इस बेटी को न्याय दिलाने का वक्त नहीं था तो अब मीडिया के सामने रोने का नाटक कर रहे हैं।

बसपा सुप्रीमों सुश्री मायावती ने भी इस घटना पर रोष जताते हुए प्रदेश सरकार से दलितों की सुरक्षा की मांग की है। उन्होंने एक्स पर लिखा- उत्तर प्रदेश के जिला अयोध्या के सहनवां में दलित परिवार की बेटी का शव निर्वस्त्र अवस्था में मिला है, उसकी दोनों आँखें फोड़ दी गई हैं तथा अमानवीय व्यवहार भी हुआ है, यह बेहद दुःखद व अति गम्भीर मामला है। सरकार सख्त कदम उठाये, ताकि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति ना हो।

बता दें कि इस घटना को लेकर प्रेस कांफ्रेस करते हुए स्थानीय सपा सांसद अवधेश प्रसाद रो पड़े थे, जिसका वीडियो जमकर वायरल हुआ था।

दूसरी ओर आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी इस मामले में यूपी सरकार को घेरा है। चंद्रशेखर ने एक्स पर लिखा-

उत्तर प्रदेश के जिला अयोध्या के कोतवाली क्षेत्र में 22 वर्षीय दलित युवती के साथ हुई निर्मम हत्या ने न केवल कानूनी व्यवस्था की विफलता को उजागर किया है, बल्कि यह समाज में व्याप्त असुरक्षा और अमानवीयता को भी खौ़फनाक तरीके से सामने लाया है। परिजनों के अनुसार “युवती के साथ गैंगरेप हुआ, उसके शरीर पर कपड़े नहीं थे, दोनों आंखें फूटी हुई थीं, और पैर भी टूटे हुए थे। सिर और चेहरे पर गंभीर चोटें थीं, और पूरे शरीर पर गहरे जख्म थे। हाथ-पांव रस्सी से बंधे हुए थे। यह घटना किसी भी सभ्य समाज के लिए घोर शर्मनाक और अविश्वसनीय है।”

बता दें कि परिजनों का आरोप है कि 30 तारीख की रात से युवती के लापता होने के बावजूद पुलिस ने मामले की गंभीरता को नज़रअंदाज़ किया और केवल खानापूर्ति करती रही। यह न सिर्फ पुलिस प्रशासन की लापरवाही है, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता को भी दिखाता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश की सरकार और उसके मुखिया योगी आदित्यनाथ इस दलित परिवार को न्याय दिलाएंगे?

विश्व पुस्तक मेला 2025 शुरू, दलित दस्तक-दास पब्लिकेशन का भी स्टॉल लगा

 विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में दलित दस्तक-दास पब्लिकेशन का स्टॉलनई दिल्ली। विश्व पुस्तक मेला 2025 शुरू हो गया है। गणतंत्र के 75वें वर्ष में भारत के पहुंचने के कारण इस बार विश्व पुस्तक मेले की थीम रिपब्लिक@75 रखा गया है। दिल्ली के प्रगति मैदान के भारत मंडपम में पुस्तक मेला 1-9 फरवरी तक चलेगा। एक फरवरी को मेले का उद्घाटन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया। इस बार पुस्तक मेले में 2000 से ज्यादा प्रकाशक हिस्सा ले रहे हैं। दलित/अंबेडकरी साहित्य की बात करें तो हर बार की तरह सम्यक प्रकाशन और गौतम बुक सेंटर के अलावा दलित दस्तक और उसके प्रकाशन दास पब्लिकेशन का स्टॉल भी लगा है।

दलित दस्तक-दास पब्लिकेशन की बात करें तो यह हॉल नंबर 2 में स्टॉल नंबर 40 है। इस बार हमारा प्रकाशन तीन नई किताबें लेकर आया है। इसमें से एक दिवंगत साहित्यकार सूरजपाल चौहान का कविता संग्रह ‘यह दलितों की बस्ती है’ जबकि अंबेडकरी पत्रकारिता पर ‘अंबेडकरी पत्रकारिता के 100 साल’ नाम से पुस्तक भी लाया गया है। 50 बहुजन नायक की पाठकों के बीच मांग बढ़ने से अब इस पुस्तक को अंग्रेजी में 50 Bahujan Heroes भी प्रकाशित किया गया है। इसको मिशन जय भीम से जुड़े भगवान सिंह ने ट्रांसलेट किया है। जबकि हिन्दी में 50 बहुजन नायक का 6वां संस्करण प्रकाशित हुआ है, जिसमें पुस्तक मे कुछ अन्य नायकों को जोड़कर इसे और समृद्ध बनाया गया है। एक से नौ फरवरी तक दिल्ली चलने वाले एशिया के सबसे बड़े पुस्तक मेला सुबह 11 बजे से शाम 8 बजे तक पाठकों के लिए खुला रहेगा। दलित दस्तक – दास पब्लिकेशन अपने स्टॉल पर आपको आमंत्रित करता है।

मैं चाहता हूँ कि मनुस्मृति लागू होनी चाहिए

फाइल फोटोः प्रतीकात्मक तस्वीर अख़बार में पढ़ा था कि गत दिनों बनारस में कुछ दलित छात्रों ने मनुस्मृति को जलाने का कार्यक्रम किया था, और वे सब जेल में बंद हैं। समझ में नहीं आता कि दलित ऐसी बेवकूफियां क्यों करते हैं? वे डा. आंबेडकर का अनुसरण करते हैं, पर भूल जाते हैं कि उस दौर की परिस्थितियां अलग थीं। डा. आंबेडकर ने मनुस्मृति को हिन्दू अलगाववाद के रूप में देखा था। आज दलित उसे किस रूप में देख रहे हैं? अगर वे अपने आप को हिन्दू समझ रहे हैं तो मनुस्मृति का विरोध क्यों कर रहे हैं? दलितों को मालूम चाहिए कि मनुस्मृति में दलित जातियों अर्थात अछूतों के बारे में कुछ नहीं लिखा है। मनु ने जो प्रतिबंध लगाए हैं, वे शूद्रों और स्त्रियों पर लगाए हैं, वह भी सवर्ण स्त्रियों पर। दलित क्यों बिलबिला रहे हैं।

दलितों को मालूम होना चाहिए कि मनुस्मृति का विधान हिन्दुओं के लिए है, और हिन्दुओं में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आते हैं। मनु ने कहा है कि पांचवां कोई वर्ण नहीं है। इसलिए, इस फोल्ड में अछूत नहीं आते, जो आज अनुसूचित जातियों के लोग हैं। फिर दलित क्यों मनुस्मृति को लेकर आपे से बाहर हो जाते हैं? मनुस्मृति के खिलाफ विद्रोह शूद्रों को करना चाहिए, जो आज ओबीसी में हैं, और वे ही आज हिन्दू राष्ट्र के सबसे बड़े समर्थक बने हुए हैं।

दलितों को तो मनुस्मृति को लागू कराने का आन्दोलन चलाना चाहिए। मनुस्मृति को एक बार लागू तो हो जाने दो, जो कभी नहीं होगी, क्योंकि आरएसएस जानता है कि मनुस्मृति को ब्राह्मण खुद स्वीकार नहीं करेंगे।

जिस मनुस्मृति की निन्दा करने पर आज हिन्दुओं की भावनाएँ आहत हो जाती हैं, और निन्दकों को जेल में डाल दिया जाता है, वह मनुस्मृति अगर हिन्दूराष्ट्र बनने के बाद फिर से लागू हो जाए, तो क्या होगा? दो बातें ज़रूर होंगी। एक, उच्च वर्ण की स्त्रियाँ और पुरुष दोनों ही इसके ख़िलाफ़ बग़ावत कर देंगे; और दूसरी, अगर बग़ावत को कुचल दिया गया, और मनु के विधान को बलपूर्वक लागू कर दिया गया, तो हिन्दू समाज रसातल में चला जायेगा।

इसलिए मुझे नहीं लगता कि हिन्दूराष्ट्र की सरकार कभी मनुस्मृति को लागू कर सकेगी। वह इसलिए कि मुसलमानों के खिलाफ जहर फैलाना एक अलग बात है, और मनुस्मृति के अनुसार हिन्दुओं को, खास तौर से द्विजों को हजार साल पीछे ले जाना दूसरी बात है। अगर मनुस्मृति के कानून लागू हुए तो कैथरीन मेयो की किताब ‘देवताओं के गुलाम’ के सारे पात्र जिन्दा हो जायेंगे। कोई भी हिन्दू स्त्री फिर पढ़ नहीं पायेगी। उसे 12-13 साल की उम्र में विवाह करना होगा। वह चौका-बर्तन, और बच्चे पैदा करने के सिवा कोई और काम नहीं कर सकेगी। अगर वह कम उम्र में विधवा होती है, तो उसे या तो सती होना पड़ेगा, या सिर घुटाकर आजीवन सफेद वस्त्रों में जीवन गुजारना होगा। हिन्दू धर्म के सनातन विधान में स्त्री की यही नियति है। क्या आधुनिक भारत की सवर्ण महिलाएं, जो आज पायलट हैं, जज हैं, प्रोफ़ेसर हैं, राजनेता हैं, राजनयिक हैं, कलेक्टर, पुलिस अफसर, कलाकार और पत्रकार हैं, इस नियति को स्वीकार करेंगीं? आरएसएस और भाजपा के लोग एक बार मनुस्मृति का विधान लागू करके तो देखें, सवर्ण हिन्दू तो छोड़िए, देश के ब्राह्मण ही सबसे पहले उसके ख़िलाफ़ विद्रोह करेंगे, क्योंकि कोई भी ब्राह्मण स्त्री अब अशिक्षित बनकर प्रतिबंधों की जंजीरों में बंधकर रहना नहीं चाहेगी। सनातन की आवाज़ उठाने वाले और हिन्दू-हिन्दू चिल्लाने वाले उन सवर्णों की भी, चाहें, वे जज हों, नेता हों, प्रोफ़ेसर हों, वकील हों, अक्ल ठिकाने लग जाएगी, जब लोकतंत्र के स्थान पर मनुस्मृति के विधान के साथ हिन्दू राज्य अस्तित्व में आएगा।

आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत संविधान का विरोध यह कहकर करते हैं कि यह विदेशी विचारों पर बनाया गया है, इसमें भारतीय संस्कृति का कुछ भी अंश नहीं है। वह भारतीय संस्कृति की आड़ में हिन्दू संस्कृति, ख़ास तौर से ब्राह्मण-संस्कृति की बात करते हैं। लेकिन आरएसएस का सौ सालों का इतिहास बताता है कि उसने कभी भारतीय संस्कृति की बात नहीं की, हमेशा ब्राह्मण संस्कृति का ही गुणगान किया है। वह हर क्षेत्र में ब्राह्मण प्रभुत्व और ब्राह्मण-वर्चस्व को ही भारतीय संस्कृति कहता आया हैं। उसकी इस संस्कृति के आदर्श नायक श्रीराम हैं, जिन्होंने ब्राह्मण-रक्षा और ब्राह्मण-राज्य स्थापित करने लिए अवतार लिया था। उन्होंने निम्न वर्गों में फूट, विभाजन और भेदभाव पैदा करके, उन्हीं की सेना बनाकर, उन्हीं के साम्राज्य को नष्ट करके ब्राह्मण-राज्य की विजय-पताका फहराई थी। आरएसएस और भाजपा के नेता श्रीराम के ही पदचिन्हों पर चलते हुए, आज दलित-पिछड़े और आदिवासी समुदायों में फूट, विभाजन और भेदभाव पैदा करके, उनकी शिक्षा बर्बाद करके, और उन बेरोजगारों की रामभक्त सेना बनाकर, उन्हीं के हाथों में हिन्दू राष्ट्र के नाम पर, हर क्षेत्र में ब्राह्मण-प्रभुत्व और वर्चस्व कायम कर रहे हैं। यही उनका एकमात्र एजेंडा है। यही उनका सनातन धर्म है, जिसके केंद्र में मनुस्मृति है।

सनातन धर्म के केंद्र में मनुस्मृति ज़रूर है, परन्तु आरएसएस और भाजपा के नेता सिर्फ सनातन की फ़िज़ा बनाए रखने के लिए उसका समर्थन करते हैं, वे उसे लागू कभी नहीं करेंगे। इसका कारण मनु के वे विधान हैं, जिन्हें अब कोई भी हिन्दू, खास तौर से खुद ब्राह्मण स्वीकार नहीं करेंगे। उनमें से कुछ विधान यहाँ उल्लेखनीय हैं।

मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में मनु का विधान है कि ‘गुरु के आश्रम में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए 36 वर्ष तक, या 18 वर्ष तक या 19 वर्ष तक तीनों वेद, या दो वेद या एक वेद पढ़े, उसके बाद ही गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे।’ कितने हिन्दू इस नियम का पालन करने को तैयार होंगे? क्या आज यह संभव है कि कोई हिन्दू, ख़ास तौर से द्विज वर्ण का व्यक्ति 36, 18 या 19 वर्ष तक सिर्फ वेद पढ़े, और कुछ न पढ़े? क्या सिर्फ वेद पढ़ने भर से वह योग्य हो जायेगा? क्या कोई भी दर्शन, विज्ञान, राजनीति, अर्थशास्त्र, वकालत और अंग्रेज़ी पढ़े बिना राष्ट्र और समाज के विकास में योगदान दे पायेगा? आदमी को ज्ञान-विज्ञान से वंचित करने वाला यह विधान आज कौन हिन्दू स्वीकार करेगा?

मनुस्मृति के नवें अध्याय में व्यवस्था दी गई है कि ‘30 वर्ष का पुरुष 12 वर्ष की कन्या से, और 24 वर्ष का पुरुष 8 की कन्या से विवाह करे।’ यदि मनु का क़ानून लागू हो गया, तो कितने हिन्दू अपनी 8 और 12 वर्ष की कन्याओं का विवाह करने को तैयार होंगे? क्या 8 और 12 वर्ष की यौवन-पूर्व आयु में कन्याओं का विवाह उचित है? यह तो बाल-विवाह की ओर लौटना है, और उस युग की ओर लौटना है, जब लड़कियों का पढ़ना वर्जित था, और आठ साल की उम्र में उनकी शादी कर दी जाती थी। ऐसी लड़कियां कई बीमारियों से ग्रस्त होकर समय-पूर्व ही मर जाती थीं। आज स्त्रियाँ हर क्षेत्र में काम कर रही हैं। क्या अपने दमन का यह विधान सवर्ण स्त्रियाँ स्वीकार करेंगी?

मनुस्मृति के पांचवें अध्याय में कहा गया है कि ‘विधवा स्त्री मरते दम तक पुनर्विवाह नहीं करे।’ मनुस्मृति में ‘करे’ शब्द राजा के लिए आदेश है, यानी यह राज्य का दायित्व है कि उसे इस व्यवस्था में समाज को रखना ही है। मनु के ये कानून अगर लागू हो गए, तो हिन्दू समाज उसी अवस्था में पहुँच जायेगा, जहाँ से वह इन तमाम कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष करके यहाँ तक आया है।

पंजाब में बाबासाहेब की प्रतिमा तोड़ने पर भड़के चंद्रशेखर

नई दिल्ली। जहाँ एक ओर देश संविधान लागू होने की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर गौरवान्वित हो रहा है ,वहीं दूसरी ओर अमृतसर में सचखंड श्री हरमंदिर साहिब के पास हेरिटेज स्ट्रीट पर परम पूज्य बाबा साहेब अंबेडकर की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने और संविधान की प्रति जलाने की घटना ने जातिवादी मानसिकता के नंगे सच को उजागर कर दिया है। यह कृत्य केवल एक प्रतीकात्मक हमला नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित प्रयास है। जो समाज के दबे-कुचले वर्गों को उनके अधिकारों और सम्मान से वंचित रखने की घृणित मानसिकता को प्रदर्शित करता है। साथ ही यह घटना इस बात का प्रमाण है कि आम आदमी पार्टी की सरकार इतनी महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक जगह पर भी नागरिकों और प्रतीकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में असफल रही है।

जातिवादी ताकतें, जो सदियों से अपने विशेषाधिकारों को बनाएं रखने के लिए षडयंत्र करती रही हैं, इस तरह के कायरतापूर्ण प्रयासों से यह साबित करती हैं कि वे आज भी बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा स्थापित समानता और न्याय की व्यवस्था से भयभीत हैं। संविधान, जिसने भारत को जाति, धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर एकता और बंधुत्व का संदेश दिया, उस पर इस प्रकार का हमला दर्शाता है कि कुछ ताकतें अभी भी जातिगत भेदभाव को बनाए रखना चाहती हैं।

बाबा साहेब अंबेडकर की प्रतिमा को तोड़ने और संविधान को जलाने वालों ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे संविधान के मूल्यों को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि यह मानसिकता अब भारत में टिकने वाली नहीं है। ऐसे समय में जब देश संविधान की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है, यह घटना हमें याद दिलाती है कि जातिवाद केवल इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक जिंदा चुनौती है। इस चुनौती का सामना करने के लिए समाज को संगठित होकर जातिवादी मानसिकता के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी।

@DGPPunjabPolice को चाहिए कि दोषियों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई करे, ताकि समाज को यह संदेश मिले कि संविधान की गरिमा और बाबा साहेब के आदर्शों के खिलाफ जाने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून के शिकंजे से बचने का अवसर नहीं मिलेगा। अब समय आ गया है जब हम बाबा साहेब के सपनों के भारत को साकार करने के लिए जातिवाद और नफरत की जड़ों को उखाड़ फेंके। संविधान की रक्षा हर नागरिक का कर्तव्य है, और इसकी गरिमा को बनाए रखना हमारा सामूहिक दायित्व। जय भीम, जय भारत, जय संविधान।

  • सोशल मीडिया एक्स पर आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और नगीना सांसद चंद्रशेखर द्वारा लिखा गया पोस्ट 

इंफोसिस के सह-संस्थापक और IISc के पूर्व निदेशक पर SC-ST Act में मामला दर्ज

नई दिल्ली। इंफोसिस के सह-संस्थापक क्रिस गोपालकृष्णन और भारतीय विज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक बालाराम पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ है। यह मामला सदाशिव नगर पुलिस स्टेशन में सिटी सिविल और सेशन कोर्ट (CCH) के निर्देशों के आधार पर दर्ज किया गया। मामला दर्ज कराने वाले दुर्गप्पा हैं जो भारतीय विज्ञान संस्थान के फैक्लटी सदस्य हैं।

दुर्गप्पा IISc के सेंटर फॉर सस्टेनेबल टेक्नोलॉजी में फैकल्टी सदस्य थे। बौवी जनजाति समुदाय से आने वाले दुर्गप्पा का आरोप है कि साल 2014 में उन्हें हनी ट्रैप मामले में झूठा फंसाया गया और बाद में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। दुर्गप्पा ने उन्हें जातिसूचक गालियां और धमकियां देने का भी आरोप लगाया है। उन्होंने गोपालकृष्णन और बालाराम के अलावा 16 अन्य लोगों पर भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। इस मामले में अन्य आरोपियों में गोविंदन रंगराजन, श्रीधर वारियर, संध्या विश्वेश्वरैया, हरी केवीएस, दासप्पा, बालाराम पी, हेमलता मिषी, चट्टोपाध्याय के, प्रदीप डी सावकर और मनोहरन शामिल हैं। बता दें कि क्रिस गोपालकृष्णधन भारतीय विज्ञान संस्थान के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के सदस्य हैं।

 

डॉ. आम्बेडकर की जन्मस्थली से कांग्रेस का नया अभियान शुरू, दलितों-पिछड़ों पर निशाना

महू, मध्य प्रदेश। देश भर के दलितों को कांग्रेस के पाले में एकजुट करने के लिए कांग्रेस पार्टी और इसके नेता राहुल गांधी ने पूरा जोर लगा दिया है। गणतंत्र दिवस के एक दिन बाद 27 जनवरी को कांग्रेस ने बाबासाहेब आम्बेडकर की जन्मस्थली महू से इसका आगाज कर दिया। महू में जय बापू,जय भीम, जय संविधान रैली को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने केंद्र सरकार, भाजपा और आरएसएस पर जमकर निशाना साधा। राहुल गांधी ने संघ प्रमुख मोहन भागवत पर हमला बोलते हुए कहा कि, वे कहते हैं कि आजादी 15 अगस्त 1947 को नहीं मिली। यह संविधान पर हमला है। भाजपा को निशाने पर लेते हुए राहुल गांधी ने कहा कि भाजपा संविधान खत्म कर देश की संपत्ति को अडानी-अंबानी को देना चाहती है। वंचित समाज को आगाह करते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि अगर संविधान खत्म हुआ तो दलित, आदिवासी, ओबीसी के लिए कुछ नहीं बचेगा। तमाम संसाधनों और संस्थानों में दलितों और आदिवासियों की गैर-मौजूदगी का जिक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि हमारी सरकार आई तो हम दलितों और आदिवासियों को भागीदारी देंगे और जाति जनगणना करवाएंगे। हम आरक्षण के 50 प्रतिशत कोटे के नियम को बदल देंगे। राहुल गांधी का पूरा भाषण आप यहां वीडियो में सुनिये-

26 जनवरी की झांकी में बुद्ध और बाबासाहेब

नई दिल्ली। भारत के 76वें गणतंत्र दिवस के मौके पर कर्तव्य पथ पर झांकी निकली। इस दौरान भगवान बुद्ध और बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की झांकी भी निकली।