यादव मुख्यमंत्री के प्रदेश में दलितों पर यादवों की गुंडागिरी!

– निशांंत गौतम भारतीय समाज के भीतर जाति की संचरना इस कदर बुनी गई है कि सफल और संपन्न दलित हर किसी की आंखों में चुभता है। मध्य प्रदेश के दतिया से ऐसी ही एक घटना सामने आई है।

घटना के मुताबिक, बीते कल 27 मई 2025 को ग्राम नादिया थाना पण्डोखर तहसील भांडेर जिला दतिया मध्यप्रदेश में 18- 20 जातिवादी गुंडों (यादव जाति) ने दलित समाज के परिवार के सदस्यों पर लाठी, डंडों, कुल्हाड़ी व अन्य धारदार हथियारों से हमला कर दिया। जिसमें एक व्यक्ति के आंख और माथे पर कुल्हाड़ी से वार किया गया, उसकी हालत गंभीर है, उसे पहले भांडेर अस्पताल ले जाया गया, उसके बाद उसे जिला अस्पताल दतिया ले जाया गया और वहां से देर रात ग्वालियर रेफर किया गया है, उपचार जारी है किंतु हालत गंभीर बनी हुई है। इसी परिवार के अन्य सदस्यों को भी गंभीर चोटें आई है, जिनका दतिया के जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है।

विवाद का जो मुद्दा है वो यह है कि देश के अधिकांश गांवों की तरह ग्राम नदिया में भी अनुसूचित जाति के सभी घर गांव के दूसरे छोर पर हैं। गांव के बीचों-बीच यादव जाति के 6-7 परिवार रहते हैं। गांव में कोई सवर्ण परिवार नहीं है। केवल OBC और SC जाति के ही लोग रहते हैं। जिसमें पाल समाज की आबादी सबसे अधिक है। गांव की कुल आबादी 500 के करीब है।

गांव की शुरुआत में दलित समाज की जमीन है, जिसपर इस परिवार के एक सदस्य ने पिछले साल मकान बना लिया है और वहां रहने लगे। इसी दलित परिवार के अन्य सदस्य भी उक्त जमीन को खलियान के तौर पर फसल रखने, सुखाने आदि कार्य हेतु लंबे समय से उपयोग करते आए हैं। और हमारे परिवार के कुछ लोग उक्त जमीन पर घर बनाने का सोच रहे हैं।

यादव जाति के मनुवादी मानसिकता से पीड़ित लोगों को यह बात बर्दाश्त नहीं हो पा रही हैं कि अनुसूचित तबके के लोग, गांव के शुरुआत में मकान बना कर कैसे रह सकते हैं। इसीलिए उन्होंने 2-3 दिन पहले उस जमीन पर अतिक्रमण करने की मंशा से कब्जा करने के लिए तार फिनिशिंग करने की योजना बना रहे थे। जब दलित समाज के लोगों को इस बात की जानकारी लगी तो वो अपने परिवार सहित (महिलाएं भी) दिनांक 27/05/2025 को उक्त स्थल पर पहुंचकर विरोध दर्ज कराया तो जातिवादी गुंडे भाग गए। करीब एक घंटे बाद जब दलित समाज के कुछ सदस्य भांडेर तहसील में आवेदन देने के लिए निकल गए तब जातिवादी गुंडे घरों में मौजूद दलित जाति के सदस्यों पर (जिसमें महिलाएं भी शामिल थी) टूट पड़े। इस दौरान 18-20 जातिवादी गुंडों द्वारा जातिसूचक गालियां देते हुए लाठी, डंडे व कुल्हाड़ियों से हमला कर दिया।उनके द्वारा किया गया ये हमला सुनियोजित था। उनके द्वारा हमले के दौरान न तो जमीन पर अतिक्रमण की कोई बात, न अपने अधिकार जमाने की बात, यह सीधा हमला था तो जातीय वर्चस्व को स्थापित करने और अनुसूचित जाति वर्ग में भय पैदा करने के उद्देश्य से किया गया हमला भी मालूम पड़ता है।

दलित परिवार के लोग निहत्थे थे सो अपनी रक्षा भी ठीक ढंग से न कर सके। इस घटना में कई लोगों को चोट आई। जब जातिवादी हमला कर रहे थे तब एक हमलावर ने एक बुजुर्ग महिला के सर पर डंडा मारने की कोशिश की जिसे रविंद्र नाम के युवक ने पकड़ लिया तभी एक अन्य हमलावर ने उस के सर और आंख पर कुल्हाड़ी से वार कर दिया। हमले में घालय होकर वह घंटों तक तड़पता रहा। करीब दो घंटे तक न पुलिस पहुंची न ही एम्बुलेंस। जबकि पुलिस और एम्बुलेंस को तुरंत फोन कर दिया गया था। हमले के दौरान रविंद्र का मोबाइल भी छीन लिया गया, जिसमें घटना के दौरान के कुछ फोटोज व वीडियोस थे।

घटना को अंजाम देने का दूसरा कारण ये भी है कि दलित समाज के पास 40 बीघा के करीब जमीन है, और परिवार के अन्य सदस्यों को मिलकर करीब 150 बीघा जमीन है, जिसमें कुछ जमीन ऐसी भी जिस पर पहुंचने के लिए यादव जाति के लोगों के 1-2 खेतों से निकलना पड़ता है। जिस पर यादवों के द्वारा दलितों के निकलने पर विवाद किया जाता है। जबकि उनके लोगों के कुछ खेत हमारे खेतों के बाद पड़ते हैं किंतु हमने कभी उनके ट्रैक्टर आदि निकलने का कभी विरोध नहीं किया, क्योंकि शासन के सुखाधिकार के नियम के तहत आप किसी को खेती करने के लिए रास्ता देने से मना नहीं कर सकते। इस आशय का एक प्रकरण भी तहसीलदार महोदय, भांडेर के यहां भी लंबित है।

साल 2017 में जब लोकसेवा आयोग के द्वारा चयनित होकर दलितों के बीच से एक युवक संघप्रिय गौतम असिस्टेंट प्रोफेसर बना और साल 2018 में उसी की बहन नायब तहसीलदार बनी तो यह बात जातिवादियों को चुभने लगी। हालांकि भाई-बहन की सफलता से यह बदला कि दलित समाज के अन्य लोगों में भी आत्मविश्वास जगा और उन्होंने भी अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के माध्यम से उन्नति करने का रास्ता चुना, जो इन जातिवादी गुंडों को रास नहीं आ रहा है। उन्हें दलितों की तरक्की बर्दाश्त नहीं रही। दलितों की शिकायत है कि पिछले साल भी इसी जाति के एक व्यक्ति ने दलित युवक के साथ मारपीट की थी, जिस पर पुलिस प्रशासन के ढुलमुल रवैए के चलते मामला दर्ज नहीं हो पाया था। जिससे ऐसे जातिवादी तत्वों का मनोबल बढ़ा हुआ है, और उनमें कानून का कोई खौफ नजर नहीं आता।

वर्तमान की घटना के बाद थाना प्रभारी पण्डोखर तहसील भांडेर जिला दतिया द्वारा वरिष्ठ अधिकारों के हस्तक्षेप के बाद 9 लोगों के विरुद्ध SCST एक्ट व अन्य धाराओं में मामला पंजीबद्ध हुआ है। किंतु धारदार हथियार से हमला करने संबंधित गंभीर धाराएं अभी भी नहीं जोड़ी गईं है। SDOP, भांडेर ने Final Medical Report (MLC) आने के बाद धारा बड़ाये जाने का आश्वासन दिया है। अभी तक किसी की  गिरफ्तारी नहीं हुई है।

इतने बड़े पैमाने पर जातीय वैमनस्यता फैलाने एवं आतंकित करने वाली घटना हुई किन्तु क्षेत्रीय विधायक माननीय फूलसिंह बरैया जो खुद अनुसूचित जाति से हैं, और वंचित वर्गों के हिमायती होने का दावा करते हैं अभी तक न ही पीड़ितों से मिलने आए न ही कोई आधिकारिक बयान जारी किया। गांव में तनावपूर्ण स्थिति है, फिर भी कोई पुलिस बल तैनात नहीं किया गया है, प्रकरण दर्ज होने के बाद भी आरोपियों के हौसले बुलंद है। दोबारा किसी घटना के घटित होने का खतरा अभी भी बना हुआ है।

इस मामले में दर्ज एफआईआर की कॉपी आप नीचे देख सकते हैं-    

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में बाबासाहेब की प्रतिमा लगने के विवाद में कूदी बहनजी, जातिवादी वकीलों को लगाई फटकार

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के ग्वालियर खंडपीठ में बाबासाहेब की प्रतिमा लगाने के मुद्दे पर बहनजी सामने आई हैं। इस मुद्दे को उठाते हुए बसपा सुप्रीमों और यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने मध्य प्रदेश के राज्यपाल, माननीय उच्च न्यायालय तथा मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप कर बाबासाहेब की प्रतिमा को स्थापित करवाने की मांग की है। अपने बयान में बहनजी ने प्रतिमा लगाने का विरोध करने वाले वकीलों को जमकर फटकार लगाई है। बहनजी के इस मुद्दे पर आवाज उठाने से मामला गरमा गया है।

सोशल मीडिया एक्स पर इस मुद्दे को उठाते हुए बहनजी ने लिखा- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट खण्डपीठ ग्वालियर में अधिवक्ताओं की माँग व उन्हीं के आर्थिक सहयोग से परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति लगाने की अनुमति माननीय कोर्ट द्वारा दी गई तथा कोर्ट के निर्देशन में ही स्थान का चयन एवं चबूतरा बनाया गया व मूर्ति भी बनकर तैयार हुई।

बहनजी ने प्रतिमा लगाने का विरोध करने वाले जातिवादी वकीलों को लताड़ लगाते हुए कहा कि- कुछ जातिवादी सोच से ग्रसित अधिवक्ताओं द्वारा मूर्ति स्थापना का विरोध किया जा रहा है। बाबा साहेब के विरोधियों को यह समझना होगा कि सदियों से उपेक्षित बहुजन समाज अब अपना सम्मान पाना चाहता है।

मध्य प्रदेश सरकार को घेरते हुए बहनजी ने कहा कि- सोशल मीडिया पर भड़काऊ वक्तव्यों के बावजूद इन पर कार्रवाई नहीं की गई। यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने मध्य प्रदेश के राज्यपाल, उच्च न्यायालय तथा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से मांग किया कि मूर्ति लगाने में आ रही बाधाओं को दूर करके, तत्काल उच्च न्यायालय खण्डपीठ ग्वालियर में संविधान निर्माता, भारत रत्न बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति को सम्मानपूर्वक स्थापित कराएं।

साफ है कि देश की दिग्गज नेता के इस विवाद में सामने आने के बाद प्रतिमा लगाने के समर्थक वकीलों में उत्साह है तो मध्य प्रदेश सरकार दबाव में आ चुकी है।

बोधगया महाविहार मुक्ति का आंदोलन और हिन्दू संगठनों की साजिश

बोधगया महाविहार को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया है। सुप्रीम कोर्ट ने बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 को रद्द करने से संबंधित याचिका की अंतिम सुनवाई 29 जुलाई 2025 को निर्धारित कर दी है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने 12 साल की देरी के लिए सरकारी वकीलों को जमकर फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अब कोई और स्थगन नहीं दिया जाएगा। निश्चित तौर पर यह उस बौद्ध समाज के लिए बड़ी खबर है, जो सालों से इसके लिए संघर्ष कर रहा है।

हाल ही में 12 मई 2025 को बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर महाबोधि महाविहार में जो हुआ, उसके बाद तो यह और ज्यादा जरूरी हो गया है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन महाबोधि महाविहार के गर्भ गृह में भगवान बुद्ध की प्राचीन प्रतिमा के ठीक सामने पंडों द्वारा मंत्रोचार के साथ बुद्ध की प्रतिमा को शिवलिंग बना कर राज्यपाल आरिफ मुहमद खान से वैदिक कर्मकांड कराया। गया के जिलाधिकारी, जो बोधगया महाविहार बी०टी०एम०सी का अध्यक्ष भी होता है, उसने अपने खेमे के दो भिक्खुओं (वो नकली भी हो सकते हैं, या फिर ब्राह्मण समाज के चिवरधारी भिक्खु) को लेकर राज्यपाल के साथ वैदिक कर्मकांड किया और कराया। बुद्ध की मुख्य प्रतिमा के सामने देश-विदेश के लोग आकर वंदना करते हैं। उसकी तरफ पीठ करके राज्यपाल ने न केवल भगवान बुद्ध बल्कि संविधान का भारी अपमान किया। क्या राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान विष्णुपद मंदिर में शिवरात्रि या अन्य किसी दिन जाकर ऐसी पूजा कर सकते हैं और पंडे उनको पूजा करा सकते हैं।

 विगत तीन महीने से देश-विदेश में बुद्ध धर्म के अनुयायी महाबोधि महाविहार की मुक्ति के लिए आंदोलन कर रहे हैं। इसके बावजूद बौद्धों की भावनाओं को आहत करने का यह दुःसाहस भाजपा के राज्यपाल आरिफ मुहमद खान और उसके महंत की मिली भगत से हो रही है। इसके विरुद्ध बौद्धों का आक्रोश उमड़ पड़ा और वे देशभर में प्रदर्शन और मांग पत्र दे रहे हैं।

इस बीच यह बड़ा सवाल है कि क्या कारण है कि बोधगया, जहां से बुद्ध को ज्ञान मिला उस नगरी पर हिंदुत्ववादियों और आरएसएस ने कब्जा कर लिया है। कुछ तो बकायदा चीवर धारण कर उनके नाम पर हिंदुत्ववाद को फैलाने में लगे हैं। बुद्ध भारत में पैदा हुए थे लेकिन कालांतर में भारत में ही उनकी जड़ें काट दी गई। वे भारत के बाहर विकसित हुए। बोधगया एक धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी है। इसी नगरी से गौतम बुद्ध को सम्यक ज्ञान और दृष्टि मिली थी। यह वही स्थान है जहाँ से बुद्ध के ज्ञान का प्रकाश सारे विश्व में फैला था। यही वह समय था जब भारत को विश्व गुरू कहा गया। बुद्ध के कारण ही भारत को विश्वगुरू कहा गया। यह शहर भारत को विश्व में विशिष्ठता प्रदान करती है।

 जिस प्रकार गोरखपुर के नाथ संप्रदाय ने जाति वर्ण को ठुकराकर उसके विरुद्ध संघर्ष किया, लोगों की चेतना को जगाया और उन्हें एकजुट किया। नाथ संप्रदाय ने ब्राह्मणवाद तथा हिंदुत्व के विरुद्ध एक अलख जगाई थी। उसकी ताकत को देखकर अगड़ी जाति के एक व्यक्ति ने नाथ संप्रदाय का रूप धारण कर उसपर कब्जा कर लिया। और वहां से हिंदुत्व की लौ जलाने लगा। वैसी ही स्थिति हिन्दुत्वादियों द्वारा बोधगया की भी बनाई जा रही है और बुद्ध के वास्तविक अनुयायी असहाय बने हुए हैं।

विश्व भर से बड़ी संख्या में लोग खासकर बौद्ध मत के अनुयायी बोधगया आते हैं। बोधगया ने मानव मुक्ति का संदेश दिया। पीड़ितों को संघर्ष करने का संदेश दिया। प्रबुद्ध लोगों को मानवता की बेहतरी के लिए कार्य करने का आह्वान किया। बुद्ध ने पीड़ित मानवता के उद्धार की आवाज उठाई। उन्होंने जाति और वर्ण को अस्वीकार किया। इसके विरुद्ध लड़ाई लड़ी। इसी बुद्ध को हिंदुत्वादी संगठन विष्णु और कृष्ण का अवतार बना कर बोधगया में प्रचारित प्रसारित करते हैं। सार्वजनिक स्थलों पर होर्डिंग लगाते हैं। इसपर बौद्ध संगठनों की चुप्पी आश्चर्य में डालती है। बाबासाहेब आंबेडकर ने बौद्ध धम्म स्वीकार करते समय बौद्धों को 22 प्रतिज्ञाएं दिलवाई थी।

 “बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाएँ “भीम-प्रतिज्ञा” के नाम से जानी जाती हैं। वास्तव में 22 प्रतिज्ञाएँ बाबासाहेब के सम्पूर्ण बौद्ध दर्शन का आइना है। एक भारतीय बौद्ध की पहचान बनाए रखने के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ अति अनिवार्य है। इन 22 प्रतिज्ञाओं में से क्रमांक एक से आठ तक की प्रतिज्ञाएँ व्यक्ति को अंधविश्वास अवैज्ञानिकता की कालिमा से निकाल कर तार्किकता वैज्ञानिकता स्वाभिमान और स्वावलम्बन के प्रकाश की ओर ले जाने के लिए हैं। शेष 9 से 22 तक की 14 प्रतिज्ञाएँ मानव जीवन को परस्पर प्रेम बंधुत्व और समानता का भाव पैदा करने के लिए तथा गृहस्थ जीवन सुखमय बनाने के लिए है।

 डॉ. आंबेडकर ने ‘बुद्ध और उनका धम्म’ नामक पुस्तक लिखी। बोधगया में जहाँ इतने प्रबुद्ध बौद्ध रहते हैं, वहाँ बाबासाहेब की 22 प्रतिज्ञाएं कहीं नजर नहीं आती है। जबकि वहाँ बुद्ध को विकृत करते हुए हिंदुत्ववादियों के पोस्टर जगह-जगह दिखाई पड़ते हैं। यह छोटी बात नहीं है। यह गौतम बुद्ध का भारी अपमान है। यह सब देख सुन कर भी वहाँ चुप्पी वाली शांति छाई हुई है और इसपर बौद्धजन मूकदर्शक बने हुए हैं। बिहार बी० टी० 1949 एक्ट के तहत बोधगया महाबोधि बुद्धविहार पर हिन्दुत्ववादियों का वर्चस्व बनाए रखने के लिए विभिन्न तरह के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। कभी बुद्ध को विष्णु का अवतार कभी कृष्ण कभी शिव और कभी कुछ देवी देवताओं का नाम देकर वहां उनकी मूर्तियां स्थापित की जा रही हैं। बुद्ध को विकृत करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है।

बाहर से आने वाले बौद्ध अनुयाइयों को भी बुद्ध विहार में विभिन्न तरह से परेशान किया जाता है। इसके खिलाफ बौद्धजन असंवैधानिक बिहार बी०टी० एक्ट 1949 को समाप्त करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। महाबोधि बुद्धविहार को ब्राह्मणों और हिन्दुत्ववादियों के नियंत्रण से मुक्त करने, इसका नियंत्रण बौद्धों को देने की मांग के लिए बौद्ध अनुयायियों द्वारा फरवरी 2025 से ही व्यापक स्तर पर संघर्ष किया जा रहा है। इस बारे में सरकार को मांग पत्र देने के साथ धरना और प्रदर्शन करने के बावजूद सरकार की चुप्पी बनी हुई है। हालांकि 1950 में लागू भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 के अनुसार इस तरह के कानून स्वतः निरस्त हो जाते हैं लेकिन सरकार और ब्रह्मणवादियों की मिलीभगत और बौद्धों की निष्क्रियता के कारण इस पर अमल नहीं किया गया। अब बौद्धों में चेतना जगी है और वे इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं और न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा रहे हैं।

इस आंदोलन को देखकर जगह-जगह कुछ ब्राह्मणवादी लोग स्वयं चीवर पहनकर बौद्ध बनकर घूमते हैं। वे बौद्ध विरासत को विकृत करने और हिन्दुत्ववादियों के निहित स्वार्थ के कार्य करने में लगे हुए हैं। वे बौद्धों के आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। आज बौद्धों में अभूतपूर्व उत्साह है। वे बोधगया महाबोधि बुद्ध विहार पर अपने अधिकार के लिए हर कुर्बानी देने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हैं। क्या भारत के किसी हिंदू मंदिर में बुद्धिस्टों का आधा दखल है? क्या किसी हिंदू मंदिर के प्रबंधन में आधे संख्या में बौद्ध हैं? यदि नहीं तो फिर बुद्धविहार में हिंदुत्ववादियों का कब्जा क्यों  रहेगा, यह बात देश विदेश में चर्चित हुआ। अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध संगठन भी इस मांग के समर्थन में आ चुका है। यह उनके आंदोलन में मील का पत्थर है।

लोकतंत्र की प्रणाली भी बौद्ध संघ की है। इसमें समता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व ही आदर्श समाज है। प्रत्येक व्यक्ति में अंतर्निहित शक्तियों का सम्पूर्ण विकास हो जिसमें शोषण न हो उसके विकास के मार्ग में कोई अवरोध न हो। समाज की समृद्धि इससे ही होगी। यही हमारे संविधान का आदर्श वाक्य भी है। भगवान बुद्ध जन्मना जातीय और वर्ण भावना से टकराए। बुद्ध ने बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का नारा दिया। उन्होंने चिन्तन वाणी आचरण की पवित्रता और एकरूपता को किसी के बड़प्पन का आधार माना। चिन्तन वाणी और आचरण यानी कार्य की पवित्रता और एकरूपता को आंबेडकर और गांधी ने भी दुहराया।

 भारत की जाति व्यवस्था आज एक भयंकर कोढ़ की तरह है, जो खत्म होने की बजाय तेजी से फैल रही है। हिंदू धर्म के नाम पर ही लोग दलित और अछूत बनाए गए हैं। जिस समाज का भगवान सुअर का अवतार ले सकता है, वही समाज आदमी से इतनी घृणा करे कि उसे अछूत बना दे। यह कैसा समाज है? यह कैसा धर्म है, यह कैसा हिंदुत्व है, यह कैसी विडंबना है? जाति व्यवस्था ने अकेले जितना भारत का नुकसान किया है वह अन्य सभी नुकसानों को मिलाकर भी बड़ा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और जमीन की समस्या दलितों की सबसे बड़ी समस्या है। समस्याओं के निदान के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन स्थिति नौ दिन चले अढाई कोस वाली बनी रहती है।

 बुद्ध ने ब्राह्मणवाद यानी हिंदू धर्म के जातीय भेदभाव को चुनौती दी थी। उनके पाखंडों को समाप्त किया था, समाज को बदल दिया था। बुद्ध के कई सौ वर्षों के बाद ब्राह्मणवादियों ने बौद्धों का भारत से उन्मूलन कर दिया। बाबासाहेब आंबेडकर ने बौद्ध धर्म का भारत में उद्धार का प्रयास किया, उनको पाखंडों से मुक्त करने के लिए 22 प्रतिज्ञाएं निर्धारित की। ब्राह्मणवादियों के चंगुल से बौद्धों को छुड़ाने की कोशिश की। अब फिर ब्राह्मणवादी विभिन्न प्रकार के तिकड़मों से बुद्ध को उदरस्त करने में लगे हैं। आज बौद्धों के समक्ष एक चुनौती है कि किस प्रकार तथागत बुद्ध के सपनों का एक समतावादी और लोकतांत्रिक समाज बनाया जा सके। राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए आधुनिक समाज का निर्माण करने के लिए बुद्ध के सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है। इसके लिए वर्ण व्यवस्था और जातिवाद दोनों को मिटाना होगा। इससे जाति आधारित भेदभाव और अस्पृश्यता का भी अंत हो जाएगा। यही बुद्ध ने चाहा था। यही बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था। क्या देश के प्रबुद्ध लोग बोधगया को हिंदुत्ववादियों से मुक्त कराएंगे और बुद्ध के उपदेशों को अमल में लाने का प्रयास करेंगे? यह उनके लिए आज एक बड़ी चुनौती है।

एक फ्रेम में जस्टिस बी.आर. गवई और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, लोकतंत्र में क्या है इस तस्वीर के मायने

18 साल पहले 14 जनवरी 2007 की तारीख भारतीय इतिहास में दर्ज हो गई थी, जब जस्टिस के.जी. बालकृष्णन ने भारत के 37वें मुख्य न्यायाधीश के पद की शपथ ली। जस्टिस के. जी. बालकृष्णन की यह नियुक्ति भारतीय न्यायपालिका में एक ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि यह पहली बार था जब दलित समुदाय से आने वाले किसी व्यक्ति ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च पद को संभाला।

इस ऐतिहासिक क्षण के 18 साल बाद एक बार फिर ऐसा ही वक्त आया, जब भारतीय लोकतंत्र और मजबूत होता दिखा। तारीख भी 14 ही है, हालांकि महीना मई का है। 14 मई 2025 को जस्टिस बी.आर. गवई यानी जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 52वें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली। यह शपथ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राष्ट्रपति भवन में दिलाई।

यह मौका देश के अन्य मुख्य न्यायाधीशों की तरह एक और मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति जैसा सामान्य मौका नहीं था, बल्कि यह उससे अलग और अनोखा था। जस्टिस गवई को मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिलाई। राष्ट्रपति मुर्मू और नए चीफ जस्टिस बी.आर. गवई दोनों भारत के उस समुदाय से आते हैं जो सदियों से वंचित, शोषित और पीड़ित रहा है। इन दोनों का एक फ्रेम में आना भारतीय इतिहास की बड़ी घटना है। इस शपथ ग्रहण समारोह में दोनों मुख्य भूमिका में थे और बाकी सभी दर्शक।

यह घटना बेहद खास है। क्योंकि यह उस देश की घटना है, जहां हर दिन जातीय उत्पीड़न होता है। यह उस देश की घटना है, जहां यूपी के बाराबंकी जिले से हाल ही में यह खबर आई थी कि निजामपुर गांव की दलित बस्ती में आजादी के 78 सालों बाद एक किशोर ने पहली बार 10वीं की परीक्षा पास की। यह उस देश की घटना है, जहां हाल ही में घोड़ी पर बैठकर बारात निकाल रहे दलित समाज के एक युवक पर कथित ऊंची जाति की एक महिला ने पत्थर बरसा डाले। उसे गालियां दी कि वह उनके घर के सामने से घोड़ी पर बैठकर कैसे जा सकता है। यह उस देश की घटना है, जहां देश के पहले कानून मंत्री, भारत रत्न और संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्मान में ‘जय भीम’ कहने पर बोधगया में हाल ही में एक स्थानीय दुकानदार ने अंबेडकरवादी बौद्ध समाज के लोगों को अपमानित करने की कोशिश की। तो जय भीम का गाना बजाने, टैटू बनवाने और गाड़ी पर ‘जय भीम’ लिखने पर दलित समाज के युवाओं के साथ मारपीट की जाती है।

उसी समाज के व्यक्ति ने आज देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद की शपथ ली है। जस्टिस गवई की यह नियुक्ति भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद, जस्टिस गवई ने सार्वजनिक रूप से अपनी मां के पैर छूकर आशीर्वाद लिया, इसने दिलों को जीत लिया।

यह एक ऐसी घटना है, जो लोगों के दिलों में सालों तक बसी रहेगी और जिसकी चर्चा भविष्य में लंबे समय तक होती रहेगी। यही भारतीय लोकतंत्र की ताकत है। यही भारतीय संविधान की ताकत है। यही बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के संघर्षों का परिणाम है।

दलितों के बौद्ध धर्म में धर्मांतरण का उनकी मुक्ति में योगदान

 डॉ. बी.आर. अंबेडकर के मार्गदर्शन में दलितों का बौद्ध धर्म में धर्मांतरण, जिसकी परिणति 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में सामूहिक धर्मांतरण कार्यक्रम में हुई, उनकी मुक्ति में एक महत्वपूर्ण क्षण था। इस आंदोलन को अक्सर अंबेडकरवादी या नव-बौद्ध आंदोलन कहा जाता है, जिसने दलितों को हिंदू धर्म में व्याप्त दमनकारी जाति व्यवस्था से मुक्त होने का मार्ग प्रदान किया, जिससे उन्हें सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक मुक्ति मिली। यहाँ बताया गया है कि इसने उनकी मुक्ति में कैसे योगदान दिया:

  1. जाति-आधारित उत्पीड़न की अस्वीकृति

 हिंदू धर्म, जैसा कि बाबासाहेब अंबेडकर ने देखा, मनुस्मृति जैसे ग्रंथों के माध्यम से अस्पृश्यता और जाति पदानुक्रम को संस्थागत रूप से मंजूरी देता है। बौद्ध धर्म में धर्मांतरण करके – एक ऐसा धर्म जिसे वे समतावादी, तर्कसंगत और जाति से रहित मानते थे – दलित अपनी अधीनता के धार्मिक आधार को अस्वीकार कर सकते थे। धर्मांतरण का यह कार्य उस व्यवस्था का प्रतीकात्मक और व्यावहारिक त्याग था जो उन्हें “अशुद्ध” मानती थी, जिससे उन्हें हिंदू धर्म के बाहर अपनी पहचान को फिर से परिभाषित करने का अधिकार मिला।

  1. गरिमा और आत्म-सम्मान की बहाली

अंबेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि मुक्ति केवल भौतिक उत्थान के बारे में नहीं थी, बल्कि गरिमा के बारे में भी थी। समानता (सभी प्राणी ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं) और नैतिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करने वाले बौद्ध धर्म ने दलितों को आत्म-मूल्य की एक नई भावना दी। धर्मांतरण के दौरान उन्होंने जो 22 प्रतिज्ञाएँ दिलाईं – जैसे हिंदू देवताओं और अनुष्ठानों को अस्वीकार करना – वे जानबूझकर एजेंसी का दावा थे, जिससे दलितों को सदियों से चले आ रहे भेदभाव द्वारा लगाए गए आंतरिक हीनता को दूर करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

  1. सांस्कृतिक और सामाजिक विकल्प

धर्मांतरण ने दलितों को करुणा, ज्ञान और समुदाय (संघ) जैसे बौद्ध मूल्यों में निहित एक अलग सांस्कृतिक पहचान प्रदान की। इसने हिंदू समाज में उनके द्वारा सामना किए जाने वाले बहिष्कार का मुकाबला किया, जहाँ उन्हें मंदिरों और सामाजिक स्थानों से वंचित रखा गया था। बौद्ध धर्म को अपनाकर, उन्होंने अपने स्वयं के समुदाय, अनुष्ठान और स्थान बनाए – जैसे विहार – एकजुटता और गौरव को बढ़ावा देते हुए। समय के साथ, इसने एक उपसंस्कृति बनाई जिसने उच्च जाति के मानदंडों के प्रभुत्व को चुनौती दी।

  1. राजनीतिक चेतना और लामबंदी

धर्मांतरण आंदोलन केवल आध्यात्मिक नहीं था; यह गहराई से राजनीतिक था। अंबेडकर ने इसे जातिगत अत्याचार के खिलाफ विद्रोह के रूप में प्रस्तुत किया, दलितों को एक सामूहिक शक्ति में बदल दिया। इससे उनकी राजनीतिक जागरूकता बढ़ी और अधिकारों और प्रतिनिधित्व की मांग करने का उनका संकल्प मजबूत हुआ। नव-बौद्ध पहचान दलित सक्रियता के लिए एक रैली बिंदु बन गई, जिसने अनुसूचित जाति संघ जैसे संगठनों के माध्यम से अंबेडकर के व्यापक प्रयासों को मजबूत किया।

  1. शिक्षा और सशक्तिकरण

अंबेडकर ने बौद्ध धर्म को एक तर्कसंगत, वैज्ञानिक विश्वास के रूप में देखा जो जांच और शिक्षा को दलित उत्थान के लिए प्रमुख उपकरण के तौर पर प्रोत्साहित करता था। इसे अपनाने से, कई दलितों को सीखने की प्रेरणा मिली, जैसा कि अंबेडकर ने खुद आग्रह किया था (“शिक्षित हो, संघर्ष करो, संगठित हो”) । इस बदलाव ने जाति द्वारा कायम रखे गए निरक्षरता और गरीबी के चक्र को तोड़ने में मदद की, जिससे सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा मिला।

  1. जातिगत गतिशीलता पर दीर्घकालिक प्रभाव

बड़े पैमाने पर धर्मांतरण – जिसमें शुरू में 500,000 से अधिक दलित शामिल थे और बाद के दशकों में यह संख्या लाखों तक पहुँच गई – ने भारतीय समाज को एक शक्तिशाली संदेश दिया। इसने राज्य और उच्च जातियों पर अस्पृश्यता के अन्याय का सामना करने, सुधारों में तेज़ी लाने और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को लागू करने का दबाव डाला। इसने दलितों की भावी पीढ़ियों को जातिगत उत्पीड़न का विरोध करने के लिए भी प्रेरित किया, चाहे वह बौद्ध धर्म के माध्यम से हो या अन्य माध्यमों से।

व्यावहारिक परिणाम

महाराष्ट्र में, जहाँ इस आंदोलन ने सबसे मजबूती से जड़ें जमाईं, नव-बौद्धों (अक्सर महार जाति से, अंबेडकर के अपने समुदाय से) ने शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी में क्रमिक सुधार देखा, जिसमें आरक्षण और उनकी नई मुखरता ने मदद की। हालाँकि सभी सामाजिक-आर्थिक संकट मिट नहीं गए थे – गरीबी और भेदभाव कायम रहे – धर्मांतरण ने दलितों को उनके हाशिए पर होने को अधिक प्रभावी ढंग से चुनौती देने के लिए एक रूपरेखा दी।

संक्षेप में, दलितों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित करने में अंबेडकर का नेतृत्व मुक्ति का एक क्रांतिकारी कार्य था, जिसने उन्हें जाति से आध्यात्मिक मुक्ति, आत्म-पुष्टि के लिए एक मंच और दीर्घकालिक सशक्तीकरण के लिए एक उपकरण प्रदान किया। इसने उनके सभी संघर्षों को समाप्त नहीं किया, लेकिन इसने असमानता के खिलाफ एक सतत लड़ाई के बीज बोए, भारतीय समाज में उनके स्थान को नया रूप दिया।

मोची का बेटा बना जज तो दूसरे जजों ने ही फंसा दिया

बरनाला के प्रेम कुमार 26 अप्रैल 2014 को एडीजे बने। उनकी नियुक्ति अमृतसर जिला कोर्ट में हुई। वह अपने काम में व्यस्त हो गए और मामलों को सुनने लगे। मामलों को सुनने, फैसला देने और मामलों को का निपटारा करने में वह शानदार जज थे। इसी बीच दुष्कर्म के एक आरोपी ने हाई कोर्ट में शिकायत दी कि प्रेम कुमार ने वकालत करते वक्त दुष्कर्म पीड़िता की ओर से समझौते के लिए संपर्क किया और पीड़िता को 1.5 लाख रुपये दिलवाए। आरोप लगने के बाद हाई कोर्ट ने प्रेम कुमार के खिलाफ विजिलेंस जांच शुरू की। इसके आधार पर जज की एसीआर में ‘ईमानदारी संदिग्ध’ दर्ज कर दी गई। मामला चलता रहा और फिर साल 2022 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की फुल बेंच ने शिकायत के आधार पर प्रेम कुमार को बर्खास्त कर दिया।

प्रेम कुमार ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में फैसले को चुनौती दी। तारीखें बढ़ती गईं और आखिरकार जनवरी 2025 में सबूतों की कमी की बात कहते हुए प्रेम कुमार की बर्खास्तगी रद्द कर दी। फिर हाई कोर्ट ने ही इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। और सु्प्रीम कोर्ट ने इस मामले में जो कहा, वह न्यायपालिका के भीतर बैठे कुछ जजों के जातिवादी चेहरे को बेनकाब करने वाला था। साथ ही सच्चाई के पक्ष में एक नजीर बन गया।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए ओपन कोर्ट में कहा कि- यह जज परिस्थितियों और जातिगत पक्षपात का शिकार हुआ। सब पहले से फिक्स था। ऊंचे समुदाय के लोग बर्दाश्त ही नहीं कर पा रहे थे कि उपेक्षित समुदाय के व्यक्ति का लड़का कम उम्र में जज बन गया और उनके बीच आ गया।’ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जज की बर्खास्तगी गलत थी। उनको बहाल किया जाए। साथ ही सभी लाभ दिये जाएं।

यह उस प्रेम कुमार की कहानी है, जिन्होंने जज के पद पर होने के बावजूद व्यवस्था का अन्याय झेला। वह उस प्रेम कुमार की कहानी है, जिनके पिता मोची थे और माँ मजदूर। प्रेम मोची समाज से ताल्लुक रखते थे। समाज और आर्थिक, दोनों छोड़ पर हाशिये पर पड़े इस परिवार के बेटे प्रेम कुमार ने अपने माता-पिता और खुद को इस परिस्थिति से निकालने के लिए खुद को झोंक दिया। जमकर पढ़ाई की। और अपनी मेहनत से जज की सम्मानित कुर्सी हासिल की। लेकिन यही बात कुछ जातिवादियों को खटक गई। उन्हें यह बात खटक गई कि आखिर कल तक चौराहे पर जूते गांठने वाले का बेटा हमारे बीच कैसे पहुंच गया।

यहीं से शुरु हुई प्रेम कुमार को फंसाने की साजिश। और पूरी कहानी आपके सामने है। यहां हम आपसे एक सवाल पूछना चाहते हैं। खासकर सवर्ण समाज के लोगों से। हम यह पूछना चाहते हैं कि क्या दलित, वंचित समाज के व्यक्ति को अपनी मेहनत के बूते अपना मुस्तकबिल खुद लिखने का हक नहीं है? किसी भी दलित और वंचित ने आपका क्या बिगाड़ा है कि आप उसके बढ़ते हुए कदम को खींचना चाहते हो। जज प्रेम कुमार का मामला बस एक मामला भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज के भीतर फैले जाति व्यवस्था की एक और सच्चाई है। यह कथित ऊंची जाति के जातिवादियों के चेहरों को उजागर करने वाला मामला है।

एक ठाकुर का प्रायश्चित

राम सिहासन प्रेम जी को बुके देकर सम्मानित करते यशवंत सिंह (लेखकः यशवंत) राम सिहासन प्रेम भइया रिटायर हो गए। वे मेरे गाँव के उन कुछ विशिष्ट लोगों में शामिल हैं, जो पढ़ लिखकर प्रशासनिक अफसर बने। आईएएस अफसर के पद से सेवानिवृत्ति ली। रेवन्यू बोर्ड में लंबे समय से थे। उसके पहले मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) पद पर थे। योगी राज में जाने क्या इनके ख़िलाफ़ प्रपंच हुआ कि डीएम की कुर्सी नहीं मिली। ठाकुरों के राज में एक दलित प्रशासनिक अफसर को वो सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था!

स्वभाव से बेहद सरल और सहज राम सिंहासन भइया के पिताजी रामराज जी सूबेदार थे। उनके छत्रछाया में राम सिंहासन भइया का निर्माण हुआ। लखनऊ में अपने आवास के प्रवेश द्वार पर पिताजी का नाम लिखा रखा है। जिस रूम में हम लोग बैठे थे वहाँ माता पिता की तस्वीर के साथ साथ ढेर सारी किताबें थीं। महात्मा बुद्ध और बाबा साहेब अंबेडकर के चित्र और इनका प्रचुर साहित्य दिखा।

मैंने भइया को बुके देकर नौकरी से आज़ादी और आगे के जीवन के लिए शुभकामनाएं दी! चलते-चलते मैंने इनका चरण स्पर्श किया। जब तक ये जॉब में थे, मिलने पर केवल हाथ जोड़कर प्रणाम करता था। अब जब वो जॉब से मुक्त हो चुके हैं, मेरे लिए ज़्यादा सम्माननीय हो चुके हैं। मेरा चरण स्पर्श दरअसल एक प्रायश्चित भी है, सदियों से दलित समाज पर किए गए तरह तरह के अत्याचार, शोषण और प्रताड़ना के लिए।

राम सिंहासन भइया की दो बेटियां हैं। दोनों पढ़ लिख कर काबिल बनने की राह में हैं। आगे के जीवन के लिए राम सिंहासन भइया के पास कई योजनाएं हैं। दलित-वंचित तबके के सामाजिक-बौद्धिक उत्थान के लिए भी कुछ ठोस करने का इरादा है। उनके हर प्रयास में मैं साथ हूँ! बहुत बहुत शुभकामनाएँ भइया।


लेखक पिछले तीन दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। भड़ास4मीडिया के संस्थापक हैं। 

भारतीय सेना ने लिया पहलगाम का बदला, आतंकियों के आका पाकिस्तान में दहशत

वक्त मंगलवार और बुधवार के बीच आधी रात का था। भारत से लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी और पाकिस्तान में तबाही मचा दी। पहलगाम हमले के 14 दिन बाद भारत ने पाकिस्तान पर बम बरसाते हुए कई ठिकानों को तबाह कर दिया। इससे वहां भगदड़ मच गई। इस हमले को ऑपरेशन सिंदूर का नाम दिया गया। इसके तहत भारतीय लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में कई ठिकानों को निशाना बनाया। हमले में 9 आतंकी ठिकानों पर हमला किया गया, जिसमें 3 मौतें हुईं, जबकि  12 लोग घायल हो गए।

भारतीय एयरफोर्स ने जिन नौ ठिकानों को टारगेट किया है, उसमें, बहावलपुर, मरीदके, गुलपुर, सवाई, बिलाल, कोटली, बरनाला, सरजाल और महमूना शामिल हैं। आपरेशन सिंदूर को लेकर भारत सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इस कार्रवाई का मकसद आतंकी ढांचे पर वार करना है।

इस हमले से पाकिस्तान में भगदड़ मच गई है। हमले का एक केंद्र मुजफ्फराबाद भी था। भारतीय हमले के बाद यहां के मस्जिदों से इलाके को तुरंत खाली करने का ऐलान होने लगा। लोगों की भागते हुए तस्वीरें सामने आई है।

हालांकि पाकिस्तान ने पांच जगहों को निशाना बनाए जाने की पुष्टि की है। उसका कहना है कि वह इसका बदला लेगा। हालांकि भारत पूरी तरह तैयार है। आपरेशन सिंदूर के बाद आज 7 मई को सरकार ने नागरिकों की सुरक्षा के लिए और आपात स्थिति से उन्हें बचाने के लिए मॉक ड्रिल किया है। साफ है कि हमारा देश हर स्थिति से निपटने के लिए तैयार है।

इस बीच भारतीय सेना की ओर से कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर’ 22 अप्रैल को पहलगाम हमले में हुए वीभत्स आतंकवादी हमले के शिकार मासूम नागरिकों और उनके परिवारों को न्याय देने के लिए लॉन्च किया गया था। इस कार्रवाई में 9 आतंकी कैंप्स को टारगेट कर पूरी तरह से बर्बाद किया गया।

UPSC की परीक्षा में गड़रिया समाज के बिरदेव की सफलता ने जाति पर छेड़ी नई बहस

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक तस्वीर जमकर वायरल हो रही है। यह तस्वीर महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के यमगे नाम के गांव कि है। यमगे गांव, जहां के बिरदेव धोने ने यूपीएससी परीक्षा पास कर ली है। गड़रिया समाज से आने वाले युवा बिरदेव ने यूपीएससी में 551वीं रैंक हासिल की है। जब नतीजों की घोषणा हुई थी, बिरदेव अपने चाचा के साथ भेड़-बकरियां चरा रहे थे। नतीजों के बाद उसको बधाई देने वालों का तांता लगा है। बिरदेव पारंपरिक गड़रिया समाज से आते हैं, जिसे धनगड़ भी कहा जाता है। बचपन में बिरदेव पत्थर और मिट्टी ढोने का काम भी कर चुके हैं। बिरदेव की मां खेतों में मजदूरी करती थी। वह गन्ने काट कर रोज के सिर्फ 25 रुपये कमा पाती थी। बिरदेव ने भी घरवालों के साथ लगातार मजदूरी की और साथ ही पढ़ाई भी जारी रखी। तमाम मुश्किलों से जूझते हुए बिरदेव ने पढ़ाई जारी रखी। कहा जा रहा है कि इसके पीछे बचपन की एक घटना है। एक दिन बिरदेव का मोबाइल गुम हो गया। वह यह सोच कर पुलिस थाने गया कि मदद मिलेगी। लेकिन उसकी मदद तो दूर, उसकी बात तक नहीं सुनी गई। तभी बिरदेव ने यह ठाना कि वह भी बड़ा अधिकारी बनेगा। और आखिरकार तीसरे प्रयास में उन्हें सफलता मिल गई है। बिरदेव के जहन में अब भी वो याद है। सफलता के बाद बिरदेव के बयान से तो यही लगता है। उनका कहना है- आम आदमी बस यह चाहता है कि उसकी बातों को, उनकी परेशानियों को कोई सुने। समस्या सुलझाना तो छोड़िए, पहले वह सुनवाई चाहता है। अब जब मैं नौकरशाही का हिस्सा बनने वाला हूं तो मैं यही चाहता हूं कि मुझे लोगों की सेवा के लिए ताकत और क्षमता मिले। मैं कान बनना चाहता हूं, जो लोगों की बातों को सुने। बिरदेव ने क्या हासिल कर लिया है, उसके घर वाले यह नहीं समझते। लेकिन जिस तरह उनको बधाई देने वालों का तातां लगा है, वह इतना तो समझ रहे हैं कि उनका बेटा बड़ा आदमी बन गया है। जब बिरदेव को सफलता मिली तो उनके घरवालों और संबंधियों ने पीली पगड़ी बांध कर उनका सम्मान किया। सोशल मीडिया पर सबसे पहले यही तस्वीर वायरल हुई। खास बात यह है कि बिरदेव ने यह सफलता बिना किसी महंगी कोचिंग और बिना किसी कलचरल कैपिटल के हासिल किया है। आज जब जाति जनगणना की बात हो रही है और दलितों और वंचितों को लगातार जाति की वजह से ताने मिलते हैं, ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अगर बिरदेव के पास कल्चरल कैपिटल होता, तो क्या उनकी सफलता और बड़ी नहीं होती? नीचे लिंक पर जाकर देखिए वीडियो स्टोरी

आतंकवाद और जातिवाद एक जैसा, बताने पर शिक्षक को कारण बताओ नोटिस

आतंकवाद और जातिवाद को पीड़ितों के लिए एक जैसा ठहराने वाले एक पोस्ट के कारण एक शिक्षक को बेसिक शिक्षा अधिकारी ने कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। मामला उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले का है। बात यहीं नहीं रूकी, बल्कि शिक्षक को ब्राह्मण समाज के लोगों द्वारा लगातार धमकियां भी दी जा रही है। और उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराया जा चुका है।

 22 अप्रैल को जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला होने के बाद आतंकवाद और जातिवाद को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इसी क्रम में बस्ती जिले के रामापुर प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक विजय कुमार पटेल ने शिक्षकों के एक व्हाट्सएप ग्रुप में लिखा कि- “आतंकी धर्म पूछते हैं ब्राह्मणवाद जाति पूछते हैं। दोनों में कोई अंतर नहीं है। इंसानियत के लिए बहुत जरूरी है कि दोनो को उखाड़ फेंको।” उनके इस पोस्ट को आधार बनाते हुए जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी अनूप कुमार ने विजय पटेल को 24 अप्रैल को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया।

नोटिस में कहा गया है कि- “आपके पोस्ट से ब्राह्मण समाज के प्रति गलत संदेश गया है। आप का उक्त कृत्य शिक्षक आचरण नियमावली के विरूद्ध है। आतंकवाद संपूर्ण विश्व, देश और समाज, सबके लिए विष के समान एवं घातक तथा अमानवीय है, जिसकी तुलना आप द्वारा ब्राह्मणवाद से किया गया है।”

शिक्षक विजय पटेल पर आरोप लगाया गया है कि- “आप द्वारा एक जाति समुदाय को अपमानित करने का कार्य किया गया है, जिससे ब्राह्मण समाज में अपकी टिप्पणी के प्रति रोष है एवं आप के विरुद्ध कार्यवाही की मांग की जा रही है।”

हालांकि इस नोटिस में बेसिक शिक्षा अधिकारी ने विजय पटेल द्वारा उठाए गए जाति के सवाल का कोई जिक्र नहीं किया है, जैसे यह समाज के भीतर की कोई समस्या ही न हो। शिक्षक को नोटिस का जवाब देने के लिए दो दिनों का समय दिया गया। दलित दस्तक ने जब इस संबंध में विजय पटेल से संपर्क किया तो उनका कहना था कि “मैंने नोटिस का जवाब दे दिया है। मैंने ब्राह्मणवादी विचारधारा के खिलाफ कहा है, न कि किसी जाति विशेष के खिलाफ।”

इस बीच स्थानीय ब्राह्मण समाज के लोगों द्वारा विजय पटेल को धमकी दी जा रही है। और उनके खिलाफ धारा 353 (2) और 66 (D) के तहत मामला भी दर्ज कर लिया गया है। विजय पटेल ने दलित दस्तक को बताया कि- “मुझे मेरे फोन पर लगातार धमकियां दी जा रही है। मुझ पर एफआईआर हो चुकी है। एक जाति विशेष मुझ पर जो भी आरोप लगाए, मैंने किसी जाति विशेष के बारे में कुछ नहीं कहा, बल्कि उस विचारधारा के खिलाफ कहा, जिसको मानने वाले लोग दलितों और पिछड़ों को लगातार प्रताड़ित कर रहे हैं।”

इस बीच इस बीच अर्जक संघ, सरदार सेना, भीम आर्मी और भारत मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन शिक्षक विजय कुमार पटेल के समर्थन में उतर गए हैं। ये तमाम संगठन शिक्षक विजय कुमार पटेल पर हो रहे हमले के खिलाफ उतर गए हैं। उन्होंने शिक्षक को मिल रही धमकियां की निंदा की और एफआईआर वापस लेने की मांग की।