– निशांंत गौतम
भारतीय समाज के भीतर जाति की संचरना इस कदर बुनी गई है कि सफल और संपन्न दलित हर किसी की आंखों में चुभता है। मध्य प्रदेश के दतिया से ऐसी ही एक घटना सामने आई है।
घटना के मुताबिक, बीते कल 27 मई 2025 को ग्राम नादिया थाना पण्डोखर तहसील भांडेर जिला दतिया मध्यप्रदेश में 18- 20 जातिवादी गुंडों (यादव जाति) ने दलित समाज के परिवार के सदस्यों पर लाठी, डंडों, कुल्हाड़ी व अन्य धारदार हथियारों से हमला कर दिया। जिसमें एक व्यक्ति के आंख और माथे पर कुल्हाड़ी से वार किया गया, उसकी हालत गंभीर है, उसे पहले भांडेर अस्पताल ले जाया गया, उसके बाद उसे जिला अस्पताल दतिया ले जाया गया और वहां से देर रात ग्वालियर रेफर किया गया है, उपचार जारी है किंतु हालत गंभीर बनी हुई है। इसी परिवार के अन्य सदस्यों को भी गंभीर चोटें आई है, जिनका दतिया के जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है।
विवाद का जो मुद्दा है वो यह है कि देश के अधिकांश गांवों की तरह ग्राम नदिया में भी अनुसूचित जाति के सभी घर
गांव के दूसरे छोर पर हैं। गांव के बीचों-बीच यादव जाति के 6-7 परिवार रहते हैं। गांव में कोई सवर्ण परिवार नहीं है। केवल OBC और SC जाति के ही लोग रहते हैं। जिसमें पाल समाज की आबादी सबसे अधिक है। गांव की कुल आबादी 500 के करीब है।
गांव की शुरुआत में दलित समाज की जमीन है, जिसपर इस परिवार के एक सदस्य ने पिछले साल मकान बना लिया है और वहां रहने लगे। इसी दलित परिवार के अन्य सदस्य भी उक्त जमीन को खलियान के तौर पर फसल रखने, सुखाने आदि कार्य हेतु लंबे समय से उपयोग करते आए हैं। और हमारे परिवार के कुछ लोग उक्त जमीन पर घर बनाने का सोच रहे हैं।
यादव जाति के मनुवादी मानसिकता से पीड़ित लोगों को यह बात बर्दाश्त नहीं हो पा रही हैं कि अनुसूचित तबके के लोग, गांव के शुरुआत में मकान बना कर कैसे रह सकते हैं। इसीलिए उन्होंने 2-3 दिन पहले उस जमीन पर अतिक्रमण करने की मंशा से कब्जा करने के लिए तार फिनिशिंग करने की योजना बना रहे थे। जब दलित समाज के लोगों को इस बात की जानकारी लगी तो वो अपने परिवार सहित (महिलाएं भी) दिनांक 27/05/2025 को उक्त स्थल पर पहुंचकर विरोध दर्ज कराया तो जातिवादी गुंडे भाग गए। करीब एक घंटे बाद जब दलित समाज के कुछ सदस्य भांडेर तहसील में आवेदन देने के लिए निकल गए तब जातिवादी गुंडे घरों में मौजूद दलित जाति के सदस्यों पर (जिसमें महिलाएं भी शामिल थी) टूट पड़े। इस दौरान 18-20 जातिवादी गुंडों द्वारा जातिसूचक गालियां देते हुए लाठी, डंडे व कुल्हाड़ियों से हमला कर दिया।उनके द्वारा किया गया ये हमला सुनियोजित था। उनके द्वारा हमले के दौरान न तो जमीन पर अतिक्रमण की कोई बात, न अपने अधिकार जमाने की बात, यह सीधा हमला था तो जातीय वर्चस्व को स्थापित करने और अनुसूचित जाति वर्ग में भय पैदा करने के उद्देश्य से किया गया हमला भी मालूम पड़ता है।
दलित परिवार के लोग निहत्थे थे सो अपनी रक्षा भी ठीक ढंग से न कर सके। इस घटना में कई लोगों को चोट आई। जब जातिवादी हमला कर रहे थे तब एक हमलावर ने एक बुजुर्ग महिला के सर पर डंडा मारने की कोशिश की जिसे रविंद्र नाम के युवक ने पकड़ लिया तभी एक अन्य हमलावर ने उस के सर और आंख पर कुल्हाड़ी से वार कर दिया। हमले में घालय होकर वह घंटों तक तड़पता रहा। करीब दो घंटे तक न पुलिस पहुंची न ही एम्बुलेंस। जबकि पुलिस और एम्बुलेंस को तुरंत फोन कर दिया गया था। हमले के दौरान रविंद्र का मोबाइल भी छीन लिया गया, जिसमें घटना के दौरान के कुछ फोटोज व वीडियोस थे।
घटना को अंजाम देने का दूसरा कारण ये भी है कि दलित समाज के पास 40 बीघा के करीब जमीन है, और परिवार के अन्य सदस्यों को मिलकर करीब 150 बीघा जमीन है, जिसमें कुछ जमीन ऐसी भी जिस पर पहुंचने के लिए यादव जाति के लोगों के 1-2 खेतों से निकलना पड़ता है। जिस पर यादवों के द्वारा दलितों के निकलने पर विवाद किया जाता है। जबकि उनके लोगों के कुछ खेत हमारे खेतों के बाद पड़ते हैं किंतु हमने कभी उनके ट्रैक्टर आदि निकलने का कभी विरोध नहीं किया, क्योंकि शासन के सुखाधिकार के नियम के तहत आप किसी को खेती करने के लिए रास्ता देने से मना नहीं कर सकते। इस आशय का एक प्रकरण भी तहसीलदार महोदय, भांडेर के यहां भी लंबित है।
साल 2017 में जब लोकसेवा आयोग के द्वारा चयनित होकर दलितों के बीच से एक युवक संघप्रिय गौतम असिस्टेंट प्रोफेसर बना और साल 2018 में उसी की बहन नायब तहसीलदार बनी तो यह बात जातिवादियों को चुभने लगी। हालांकि भाई-बहन की सफलता से यह बदला कि दलित समाज के अन्य लोगों में भी आत्मविश्वास जगा और उन्होंने भी अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के माध्यम से उन्नति करने का रास्ता चुना, जो इन जातिवादी गुंडों को रास नहीं आ रहा है। उन्हें दलितों की तरक्की बर्दाश्त नहीं रही। दलितों की शिकायत है कि पिछले साल भी इसी जाति के एक व्यक्ति ने दलित युवक के साथ मारपीट की थी, जिस पर पुलिस प्रशासन के ढुलमुल रवैए के चलते मामला दर्ज नहीं हो पाया था। जिससे ऐसे जातिवादी तत्वों का मनोबल बढ़ा हुआ है, और उनमें कानून का कोई खौफ नजर नहीं आता।
वर्तमान की घटना के बाद थाना प्रभारी पण्डोखर तहसील भांडेर जिला दतिया द्वारा वरिष्ठ अधिकारों के हस्तक्षेप के बाद 9 लोगों के विरुद्ध SCST एक्ट व अन्य धाराओं में मामला पंजीबद्ध हुआ है। किंतु धारदार हथियार से हमला करने संबंधित गंभीर धाराएं अभी भी नहीं जोड़ी गईं है। SDOP, भांडेर ने Final Medical Report (MLC) आने के बाद धारा बड़ाये जाने का आश्वासन दिया है। अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
इतने बड़े पैमाने पर जातीय वैमनस्यता फैलाने एवं आतंकित करने वाली घटना हुई किन्तु क्षेत्रीय विधायक माननीय फूलसिंह बरैया जो खुद अनुसूचित जाति से हैं, और वंचित वर्गों के हिमायती होने का दावा करते हैं अभी तक न ही पीड़ितों से मिलने आए न ही कोई आधिकारिक बयान जारी किया। गांव में तनावपूर्ण स्थिति है, फिर भी कोई पुलिस बल तैनात नहीं किया गया है, प्रकरण दर्ज होने के बाद भी आरोपियों के हौसले बुलंद है। दोबारा किसी घटना के घटित होने का खतरा अभी भी बना हुआ है।
इस मामले में दर्ज एफआईआर की कॉपी आप नीचे देख सकते हैं-



बोधगया महाविहार को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया है। सुप्रीम कोर्ट ने बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 को रद्द करने से संबंधित याचिका की अंतिम सुनवाई 29 जुलाई 2025 को निर्धारित कर दी है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने 12 साल की देरी के लिए सरकारी वकीलों को जमकर फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अब कोई और स्थगन नहीं दिया जाएगा। निश्चित तौर पर यह उस बौद्ध समाज के लिए बड़ी खबर है, जो सालों से इसके लिए संघर्ष कर रहा है।
आरएसएस ने कब्जा कर लिया है। कुछ तो बकायदा चीवर धारण कर उनके नाम पर हिंदुत्ववाद को फैलाने में लगे हैं। बुद्ध भारत में पैदा हुए थे लेकिन कालांतर में भारत में ही उनकी जड़ें काट दी गई। वे भारत के बाहर विकसित हुए। बोधगया एक धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी है। इसी नगरी से गौतम बुद्ध को सम्यक ज्ञान और दृष्टि मिली थी। यह वही स्थान है जहाँ से बुद्ध के ज्ञान का प्रकाश सारे विश्व में फैला था। यही वह समय था जब भारत को विश्व गुरू कहा गया। बुद्ध के कारण ही भारत को विश्वगुरू कहा गया। यह शहर भारत को विश्व में विशिष्ठता प्रदान करती है।
डॉ. आंबेडकर ने ‘बुद्ध और उनका धम्म’ नामक पुस्तक लिखी। बोधगया में जहाँ इतने प्रबुद्ध बौद्ध रहते हैं, वहाँ बाबासाहेब की 22 प्रतिज्ञाएं कहीं नजर नहीं आती है। जबकि वहाँ बुद्ध को विकृत करते हुए हिंदुत्ववादियों के पोस्टर जगह-जगह दिखाई पड़ते हैं। यह छोटी बात नहीं है। यह गौतम बुद्ध का भारी अपमान है। यह सब देख सुन कर भी वहाँ चुप्पी वाली शांति छाई हुई है और इसपर बौद्धजन मूकदर्शक बने हुए हैं। बिहार बी० टी० 1949 एक्ट के तहत बोधगया महाबोधि बुद्धविहार पर हिन्दुत्ववादियों का वर्चस्व बनाए रखने के लिए विभिन्न तरह के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। कभी बुद्ध को विष्णु का अवतार कभी कृष्ण कभी शिव और कभी कुछ देवी देवताओं का नाम देकर वहां उनकी मूर्तियां स्थापित की जा रही हैं। बुद्ध को विकृत करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है।
लोकतंत्र की प्रणाली भी बौद्ध संघ की है। इसमें समता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व ही आदर्श समाज है। प्रत्येक व्यक्ति में अंतर्निहित शक्तियों का सम्पूर्ण विकास हो जिसमें शोषण न हो उसके विकास के मार्ग में कोई अवरोध न हो। समाज की समृद्धि इससे ही होगी। यही हमारे संविधान का आदर्श वाक्य भी है। भगवान बुद्ध जन्मना जातीय और वर्ण भावना से टकराए। बुद्ध ने बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का नारा दिया। उन्होंने चिन्तन वाणी आचरण की पवित्रता और एकरूपता को किसी के बड़प्पन का आधार माना। चिन्तन वाणी और आचरण यानी कार्य की पवित्रता और एकरूपता को आंबेडकर और गांधी ने भी दुहराया।
18 साल पहले 14 जनवरी 2007 की तारीख भारतीय इतिहास में दर्ज हो गई थी, जब जस्टिस के.जी. बालकृष्णन ने भारत के 37वें मुख्य न्यायाधीश के पद की शपथ ली। जस्टिस के. जी. बालकृष्णन की यह नियुक्ति भारतीय न्यायपालिका में एक ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि यह पहली बार था जब दलित समुदाय से आने वाले किसी व्यक्ति ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च पद को संभाला।
बल्कि यह उससे अलग और अनोखा था। जस्टिस गवई को मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिलाई। राष्ट्रपति मुर्मू और नए चीफ जस्टिस बी.आर. गवई दोनों भारत के उस समुदाय से आते हैं जो सदियों से वंचित, शोषित और पीड़ित रहा है। इन दोनों का एक फ्रेम में आना भारतीय इतिहास की बड़ी घटना है। इस शपथ ग्रहण समारोह में दोनों मुख्य भूमिका में थे और बाकी सभी दर्शक।
बरनाला के प्रेम कुमार 26 अप्रैल 2014 को एडीजे बने। उनकी नियुक्ति अमृतसर जिला कोर्ट में हुई। वह अपने काम में व्यस्त हो गए और मामलों को सुनने लगे। मामलों को सुनने, फैसला देने और मामलों को का निपटारा करने में वह शानदार जज थे। इसी बीच दुष्कर्म के एक आरोपी ने हाई कोर्ट में शिकायत दी कि प्रेम कुमार ने वकालत करते वक्त दुष्कर्म पीड़िता की ओर से समझौते के लिए संपर्क किया और पीड़िता को 1.5 लाख रुपये दिलवाए। आरोप लगने के बाद हाई कोर्ट ने प्रेम कुमार के खिलाफ विजिलेंस जांच शुरू की। इसके आधार पर जज की एसीआर में ‘ईमानदारी संदिग्ध’ दर्ज कर दी गई। मामला चलता रहा और फिर साल 2022 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की फुल बेंच ने शिकायत के आधार पर प्रेम कुमार को बर्खास्त कर दिया।
(लेखकः यशवंत) राम सिहासन प्रेम भइया रिटायर हो गए। वे मेरे गाँव के उन कुछ विशिष्ट लोगों में शामिल हैं, जो पढ़ लिखकर प्रशासनिक अफसर बने। आईएएस अफसर के पद से सेवानिवृत्ति ली। रेवन्यू बोर्ड में लंबे समय से थे। उसके पहले मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) पद पर थे। योगी राज में जाने क्या इनके ख़िलाफ़ प्रपंच हुआ कि डीएम की कुर्सी नहीं मिली। ठाकुरों के राज में एक दलित प्रशासनिक अफसर को वो सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था!
वक्त मंगलवार और बुधवार के बीच आधी रात का था। भारत से लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी और पाकिस्तान में तबाही मचा दी। पहलगाम हमले के 14 दिन बाद भारत ने पाकिस्तान पर बम बरसाते हुए कई ठिकानों को तबाह कर दिया। इससे वहां भगदड़ मच गई। इस हमले को ऑपरेशन सिंदूर का नाम दिया गया। इसके तहत भारतीय लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में कई ठिकानों को निशाना बनाया। हमले में 9 आतंकी ठिकानों पर हमला किया गया, जिसमें 3 मौतें हुईं, जबकि 12 लोग घायल हो गए।
सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक तस्वीर जमकर वायरल हो रही है। यह तस्वीर महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के यमगे नाम के गांव कि है। यमगे गांव, जहां के बिरदेव धोने ने यूपीएससी परीक्षा पास कर ली है। गड़रिया समाज से आने वाले युवा बिरदेव ने यूपीएससी में 551वीं रैंक हासिल की है। जब नतीजों की घोषणा हुई थी, बिरदेव अपने चाचा के साथ भेड़-बकरियां चरा रहे थे।
नतीजों के बाद उसको बधाई देने वालों का तांता लगा है। बिरदेव पारंपरिक गड़रिया समाज से आते हैं, जिसे धनगड़ भी कहा जाता है। बचपन में बिरदेव पत्थर और मिट्टी ढोने का काम भी कर चुके हैं। बिरदेव की मां खेतों में मजदूरी करती थी। वह गन्ने काट कर रोज के सिर्फ 25 रुपये कमा पाती थी। बिरदेव ने भी घरवालों के साथ लगातार मजदूरी की और साथ ही पढ़ाई भी जारी रखी।
तमाम मुश्किलों से जूझते हुए बिरदेव ने पढ़ाई जारी रखी। कहा जा रहा है कि इसके पीछे बचपन की एक घटना है। एक दिन बिरदेव का मोबाइल गुम हो गया। वह यह सोच कर पुलिस थाने गया कि मदद मिलेगी। लेकिन उसकी मदद तो दूर, उसकी बात तक नहीं सुनी गई। तभी बिरदेव ने यह ठाना कि वह भी बड़ा अधिकारी बनेगा। और आखिरकार तीसरे प्रयास में उन्हें सफलता मिल गई है।
बिरदेव के जहन में अब भी वो याद है। सफलता के बाद बिरदेव के बयान से तो यही लगता है। उनका कहना है- आम आदमी बस यह चाहता है कि उसकी बातों को, उनकी परेशानियों को कोई सुने। समस्या सुलझाना तो छोड़िए, पहले वह सुनवाई चाहता है। अब जब मैं नौकरशाही का हिस्सा बनने वाला हूं तो मैं यही चाहता हूं कि मुझे लोगों की सेवा के लिए ताकत और क्षमता मिले। मैं कान बनना चाहता हूं, जो लोगों की बातों को सुने।
बिरदेव ने क्या हासिल कर लिया है, उसके घर वाले यह नहीं समझते। लेकिन जिस तरह उनको बधाई देने वालों का तातां लगा है, वह इतना तो समझ रहे हैं कि उनका बेटा बड़ा आदमी बन गया है। जब बिरदेव को सफलता मिली तो उनके घरवालों और संबंधियों ने पीली पगड़ी बांध कर उनका सम्मान किया। सोशल मीडिया पर सबसे पहले यही तस्वीर वायरल हुई।
खास बात यह है कि बिरदेव ने यह सफलता बिना किसी महंगी कोचिंग और बिना किसी कलचरल कैपिटल के हासिल किया है। आज जब जाति जनगणना की बात हो रही है और दलितों और वंचितों को लगातार जाति की वजह से ताने मिलते हैं, ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अगर बिरदेव के पास कल्चरल कैपिटल होता, तो क्या उनकी सफलता और बड़ी नहीं होती?
आतंकवाद और जातिवाद को पीड़ितों के लिए एक जैसा ठहराने वाले एक पोस्ट के कारण एक शिक्षक को बेसिक शिक्षा अधिकारी ने कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। मामला उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले का है। बात यहीं नहीं रूकी, बल्कि शिक्षक को ब्राह्मण समाज के लोगों द्वारा लगातार धमकियां भी दी जा रही है। और उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराया जा चुका है।