लखनऊ। जातीय घृणा का चौंका देने वाला एक मामला सामने आया है. मामला उत्तर प्रदेश के बलरामपुर के गैसड़ी कोतवाली के मनकापुर गांव की है. यहां एक प्रतिभाशाली दलित युवक को सिविल सेवा (IAS) के इंटरव्यू में जाने से रोकने के लिए उस पर जानलेवा हमला किया गया. यही नहीं, जातिवादी गुंडों ने उसके आंख और मुंह में बालू भर दिया गया, ताकि वह बोल न सके. घटना शनिवार देर रात की है और आज 10 अप्रैल को युवक का दिल्ली में इंटरव्यू है.
हालांकि इतना होने के बावजूद छात्र ने हिम्मत नहीं हारी और स्थानीय मेमोरियल अस्पताल में इलाज के बाद वह दिल्ली के लिए रवाना हो गया. मनकापुर निवासी 22 साल के महेश कुमार भारती (पुत्र- गंगा शरण) बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एमए (भूगोल) प्रथम वर्ष का छात्र है. उसने वर्ष 2016 की आईएएस मेन्स परीक्षा उत्तीर्ण की है, जिसका साक्षात्कार सोमवार को दिल्ली में होना है.
वह शुक्रवार को वाराणसी से मनकापुर गांव अपने घर आया था. वह शनिवार रात करीब नौ बजे गांव के बाहर शौच के लिए जा रहा था. महेश के मुताबिक पहले से धात लगाए दो बाइक सवार छह लोगों ने उसे डंडे से पीटना शुरू कर दिया. एक हमलावर ने उस पर चाकू से भी हमला किया. हमलावरों ने उसके मुंह व आंख में रेत भर दी. उसका गला भी दबाया. तभी किसी बाइक सवार राहगीर के आने पर हमलावर भाग निकले और रमेश की जान बच पाई.
फोटो साभारः हिन्दुस्तान ऑनलाइन
पीड़ित का परिवार गरीब और सीधा-साधा है और उसकी किसी से कोई रंजिश नहीं है. पीड़ित के भाई का कहना है कि यह काम ऐसे लोगों का है जो उसके भाई को आईएएस बनता नहीं देखना चाहते. ऐसे ही लोगों ने उसे साक्षात्कार में जाने से रोकने के लिए हमला किया है. IAS का इंटरव्यू था, जातिवादियों ने मुंह और आंख में बालू भर दिया
लखनऊ। जातीय घृणा का चौंका देने वाला एक मामला सामने आया है. मामला उत्तर प्रदेश के बलरामपुर के गैसड़ी कोतवाली के मनकापुर गांव की है. यहां एक प्रतिभाशाली दलित युवक को सिविल सेवा (IAS) के इंटरव्यू में जाने से रोकने के लिए उस पर जानलेवा हमला किया गया. यही नहीं, जातिवादी गुंडों ने उसके आंख और मुंह में बालू भर दिया गया, ताकि वह बोल न सके. घटना शनिवार देर रात की है और आज 10 अप्रैल को युवक का दिल्ली में इंटरव्यू है.
हालांकि इतना होने के बावजूद छात्र ने हिम्मत नहीं हारी और स्थानीय मेमोरियल अस्पताल में इलाज के बाद वह दिल्ली के लिए रवाना हो गया. मनकापुर निवासी 22 साल के महेश कुमार भारती (पुत्र- गंगा शरण) बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एमए (भूगोल) प्रथम वर्ष का छात्र है. उसने वर्ष 2016 की आईएएस मेन्स परीक्षा उत्तीर्ण की है, जिसका साक्षात्कार सोमवार को दिल्ली में होना है.
वह शुक्रवार को वाराणसी से मनकापुर गांव अपने घर आया था. वह शनिवार रात करीब नौ बजे गांव के बाहर शौच के लिए जा रहा था. महेश के मुताबिक पहले से धात लगाए दो बाइक सवार छह लोगों ने उसे डंडे से पीटना शुरू कर दिया. एक हमलावर ने उस पर चाकू से भी हमला किया. हमलावरों ने उसके मुंह व आंख में रेत भर दी. उसका गला भी दबाया. तभी किसी बाइक सवार राहगीर के आने पर हमलावर भाग निकले और रमेश की जान बच पाई.
फोटो साभारः हिन्दुस्तान ऑनलाइन
पीड़ित का परिवार गरीब और सीधा-साधा है और उसकी किसी से कोई रंजिश नहीं है. पीड़ित के भाई का कहना है कि यह काम ऐसे लोगों का है जो उसके भाई को आईएएस बनता नहीं देखना चाहते. ऐसे ही लोगों ने उसे साक्षात्कार में जाने से रोकने के लिए हमला किया है. सम्राट अशोक जयंती विशेषः अशोक महान एवं बाबासाहेब अम्बेडकर
सम्राट अशोक का जन्म वर्ष 304 ई.पू. हुआ था. यदि आज सम्राटों के सम्राट, चक्रवर्ती सम्राट अशोक जीवित होते तो वे यह घोषणा अवश्य ही करते कि मेरे सातवीं पीढ़ी के पौत्र वृहदर्थ मौर्य (अंतिम मौर्य सम्राट) की षडयंत्रापूर्ण हत्या ई.पू. 85 में की गई थी. उसके पश्चात मानवीय मूल्यों के विरोध में प्रतिक्रांति का ऐसा विनाश लीला का चक्र घूमा कि इस देश से अस्तित्व के सभी प्रमाणों के साथ हमारा नाम तक भी मिटाने की कोशिश की गई. यहां की जनता, जिसे बलात निरक्षर और अज्ञानी बना दिया गया था, के दिलो-दिमाग से मेरा नाम भुलवा दिया गया था.‘मुझे विस्मृति के गर्भ से बाहर निकालते हुए मेरे प्रतीक चिन्हों को भारतीय संविधान में विधि-सम्मत तरीके से सम्मिलित करवाने का काम यदि किसी ने संभव कर दिखाया तो वे हैं- बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर.
यदि आज सम्राट अशोक जीवित होते तो वे निश्चय ही कह उठते कि जिन्होंने मेरे द्वारा सारनाथ में मेरे स्तंभ पर स्थापित चार शेरों वाली प्रतिमा को राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में स्वीकार कराया और इन शेरों के चरणों में बने 24 तिली वाले ‘धम्मचक्र’ को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में स्थापित करवा कर बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने मेरा खूब मान बढ़ाया. भारत की राजमुद्रा; एवं कोट-पेपर्स में चार शेरों वाली प्रतिमा स्थापित करा कर भारत में मेरी स्मृति को बहाल कराने में डॉ. अम्बेडकर ने अपनी जिस प्रतिभा और क्षमता का परिचय दिया, उसकी वजह से मैं डॉ. अम्बेडकर से अत्यंत प्रसन्न हूं.
यह बात बहुत महत्वपूर्ण है तथा इस देश के मूलनिवासियों के लिए महान गौरव का विषय है कि उनके ये दोनों ही पुरखे-महापुरुष ‘काल्पनिक’ नहीं-अपितु ऐतिहासिक हैं. इन दोनों महापुरुषों में एक महान विसंगति भी है. वह यह कि सम्राट अशोक का जन्म तो तत्कालीन भारत के सबसे शक्तिशाली एवं महान राजा ‘बिन्दुसार’ के महल में एक राजकुमार के रूप में हुआ था. जहां सुख-सुविधा के सभी साधन सहज ही उपलब्ध थे, मगर डॉ. अम्बेडकर का जन्म सम्राट अशोक से 2195 वर्ष पश्चात एक ऐसे परिवार में हुआ, जो सामाजिक दृष्टि से सबसे दीन-हीन समझा जाता था. शोषित-अछूत कुलोत्पन्न, दरिद्रता में पले, अस्पृश्यता के अभिशाप के भुक्त-भोगी थे डॉ. अम्बेडकर.
उन्होंने अपने बुद्धि बल के आधार पर भारतीय समाज और राजनीतिक क्षेत्र में स्वयं को इतना मजबूत बना लिया था, जिससे वे भारतीय जनमानस के सबसे पसंदीदा नायक बन गए. यह तथ्य भदंत आनंद कौसल्यायन के कथन से भलीभांति प्रमाणित होता है, जब वे कहते हैं-‘लोग गांधी को भुला देना चाहते हैं, पर सरकार उन्हें भूलने नहीं देती और सरकार बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को भुला देना चाहती है, पर लोग उन्हें नहीं भूलने देते.’
सम्राट अशोक और डॉ. अम्बेडकर के समय के सामाजिक एवं धार्मिक परिवेश में भी काफी विसंगति नजर आती है. सम्राट अशोक के समय में भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के अनुरूप अपने जीवन का निर्धारण करने वालों अर्थात बौद्धों का प्राबल्य था. बौद्धों के अतिरिक्त जैन धर्मावलंबी भी अस्तित्वमान थे. इनके अतिरिक्त 62 ऐसे संप्रदाय भी थे, जिनमें आजीवक (अचेलक) लोग भी थे, जो नंगे रहते थे और इनकी मान्यताएं बहुत विचित्र थीं. इन सभी को मिथ्या-दृष्टि का वाहक माना गया था. इन 62 संप्रदायों का विशद वर्णन ‘कथा-वत्थु’ नामक तिपिटक ग्रंथ में सविस्तार मिलता है. सम्राट अशोक के समय में हिन्दू धर्म, ईसाई रिलीजन, मुसलमान मजहब और सिख पंथ आदि का अस्तित्व ही नहीं था. हिन्दू धर्म तो बहुत बाद में बौद्ध धर्म से ही निकला था.
जबकि डॉ. अम्बेडकर के समय में भारत में बहुत सारे धर्म अस्तित्व में थे. हिन्दू, ईसाईयत, इस्लाम, यहूदी, पारसी, सिख आदि धर्मों की भीड़-भाड़ के बीच डॉ. अम्बेडकर का प्रादुर्भाव हुआ था. दोनों महापुरुषों के समय में सामाजिक धार्मिक परिवेश में भी भारी अंतर होने के बावजूद ये दोनों महापुरुष प्रबल मानवतावादी थे. उदार थे, जात्याधारित व्यवहार अथवा चातुर्वणीय व्यवस्था उन्हें मान्य नहीं थी. ये दोनों ही अपने-अपने समय में सभी जाति-धर्म-संप्रदाय के लोगों को समान अधिकार एवं न्याय देने के पक्षधर थे. सम्राट अशोक के कल्याणकारी एवं मंगलकारी कार्यों का ब्यौरा ऐतिहासिक सनद के रूप में उनके शिलालेखों एवं स्तंभ लेखों के रूप में सुरक्षित है.
मगर दूसरी ओर बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा का परिचय प्राप्त करने की किसी बंधु को जिज्ञासा हो तो वह भारत के संविधान का संज्ञान ले सकता है. विद्यमान, समता, स्वतंत्रता एवं बंधुता के सिद्धांत बाबासाहेब ने बुद्ध और अशोक की शिक्षाओं से ही ग्रहण करके भारतीय संविधान में निरूपित किए थे.
अशोक और अम्बेडकर दोनों ही ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ के समर्थक थे. दोनों महापुरुष अंधश्रद्धा के स्थान पर वैज्ञानिक एवं तर्कशील बुद्धिवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे. इतना होने पर भी हम पाते हैं कि बाबासाहेब ने 25 मई, 1950 को कोलंबो में आयोजित विश्व बौद्ध धम्म सम्मेलन के समक्ष ‘भारत में बौद्ध धम्म का उत्थान और पतन’ विषय पर अपने भाषण के माध्यम से सम्राट अशोक से यह विनम्र शिकायत भी की थी कि सम्राट अशोक हद से ज्यादा उदार सम्राट थे. षडयंत्रकारियों ने उनकी इस विशेषता का अनुचित लाभ उठाते हुए बौद्ध धम्म के प्रति लामबंद होने का षडयंत्र रच डाला था.
यही कारण था कि उन्होंने 14 अक्टूबर को नागपुर की पवित्र भूमि पर बौद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण करके जब अपने 10 लाख अनुयायियों को बौद्ध धम्म की स्वयं ही दीक्षा प्रदान की तो उन्होंने उन्हें 22 प्रतिज्ञाएं भी ग्रहण कराई थीं. एक प्रकार से बाबासाहेब ने सम्राट अशोक के महान कार्यों से प्रेरणा लेकर ही वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बौद्ध धम्म के सुरक्षा कवच के रूप में 22 प्रतिज्ञा का प्रावधान किया था. धार्मिक आतंकवाद और सांप्रदायिक उन्माद के कारण लगता है कि आज दुनिया ने वैज्ञानिक आविष्कारों का दुरुपयोग करके अपने विनाश का साधन बना लिया. आज यदि संसार का भविष्य सुरक्षित रखना है तो दुनिया के कर्णधारों को महान अशोक और बाबासाहेब की विचारधारा का वरण करना होगा. आज ही के दिन हुई थी बाबासाहेब और रमाबाई की शादी, पढ़िए उनकी कहानी
प्रत्येक महापुरुष के पीछे उसकी जीवन-संगिनी का बड़ा हाथ होता है. जीवन साथी का त्याग और सहयोग अगर न हो तो व्यक्ति का महापुरुष बनना आसान नहीं है. रमाताई अम्बेडकर इसी त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति थीं. आज ही के दिन यानि 4 अप्रैल सन् 1906 में रामी का विवाह भीमराव अम्बेडकर से हुआ. डॉ. अम्बेडकर रमा को ””रामू”” कह कर पुकारा करते थे जबकि रमा ताई बाबा साहब को ”साहब” कहती थी. बाबासाहेब से रमाई की जब शादी हुई थी, तो वे महज नौ साल की थीं. एक समर्पित पत्नी की जिम्मेदारी उन्होंने भलीभांति निभाई.
शादी के पहले रमा बिलकुल अनपढ़ थी, लेकिन अम्बेडकर ने उन्हें साधारण लिखना-पढ़ना सिखा दिया था. वह अपने हस्ताक्षर कर लेती थी. बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर जब अमेरिका में थे, उस समय रमाबाई ने बहुत कठिन दिन व्यतीत किये. पति विदेश में हो और खर्च भी सीमित हों, ऐसी स्थिति में कठिनाईयां पेश आनी एक साधारण सी बात थी. रमाबाई ने यह कठिन समय भी बिना किसी शिकवा-शिकायत के बड़ी वीरता से हंसते हंसते काट लिया.
एक समय जब बाबासाहेब पढ़ाई के लिए इंग्लैंड में थे तो धनाभाव के कारण रमाबाई को उपले बेचकर गुजारा करना पड़ा था. लेकिन यह बात लोगों को शायद ही मालूम हो कि उनकी पढ़ाई-लिखाई के लिए अपना पेट काटकर, गोबर के उपले बनाकर और घर-घर बेचकर मनीआर्डर विदेश भेजा करती थीं.
वंचित समाज के उद्धार के लिए डॉ. अम्बेकर हमेशा ज्ञानार्जन में रत रहते थे. ज्ञानार्जन की तड़प उन में इतनी थी कि उन्हें घर और परिवार का जरा भी ध्यान नहीं रहता था. रमाबाई इस बात का ध्यान रखती थीं कि पति के काम में कोई बाधा न हो. वह संतोष, सहयोग और सहनशीलता की मूर्ति थीं. डॉ. अम्बेडकर प्राय: घर से बाहर रहते थे. वे जो कुछ कमाते थे, उसे वे पत्नी रमा को सौंप देते और जब आवश्यकता होती, उतना मांग लेते थे. रमाताई घर का खर्च चला कर कुछ पैसा जमा भी करती थी. त्यागमूर्ति रमाबाई ने संघर्ष का ऐसा दौर भी देखा, जब उचित पालन-पोषण और चिकित्सा के अभाव में पांच में से चार बच्चों की मौत हो गई. महज 38 साल की उम्र में ही उनती मृत्यु हो गई.
दिसंबर 1940 में बाबासाहेब अम्बेडकर ने “थॉट्स ऑफ पाकिस्तान” नाम की पुस्तक को अपनी पत्नी रमाबाई को ही भेंट किया. भेंट के शब्द इस प्रकार थे.. “रमो को उसके मन की सात्विकता, मानसिक सदवृत्ति, सदाचार की पवित्रता और मेरे साथ दुःख झेलने में, अभाव व परेशानी के दिनों में जब कि हमारा कोई सहायक न था, अतीव सहनशीलता और सहमति दिखाने की प्रशंसा स्वरुप भेंट करता हूं…” इन शब्दों से स्पष्ट है कि माता रमाई ने बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर का किस प्रकार संकटों के दिनों में साथ दिया और बाबासाहेब के दिल में उनके लिए कितना सत्कार और प्रेम था. दलित जज और सुप्रीम कोर्ट के बीच 49 मिनट तक बहस
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के बीस जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप लगाने के बाद प्रताड़ित किए जा रहे कोलकाता हाईकोर्ट के दलित जज जस्टिस कर्णन अपना पक्ष रखने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ और जस्टिस कर्णन के बीच 49 मिनट तक बहस चली. सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह पहला अवसर था जब कोई जज कठघरे में खड़ा होकर सवालों के जवाब दे रहा था.
इस दौरान सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने जस्टिस कर्णन को कहा कि चार हफ्तों में हलफनामे के जरिए जवाब दें कि क्या वे बीस जजों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही मानने को तैयार हैं या वे शिकायत वापस लेने और कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगने को तैयार हैं. CJI ने जस्टिस करनन के जवाबों पर यहां तक कह दिया कि अगर वह मानसिक रूप से बीमार हैं तो कोर्ट में मेडिकल सर्टिफिकेट दाखिल करें. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों कर्णन के खिलाफ जारी जमानती वारंट की बात करते हुए कहा कि हमने आपको आपका पक्ष जानने के लिए जमानती वारंट जारी किया लेकिन आप कोर्ट नहीं आए.
इस दौरान जस्टिस करनन ने कोर्ट में कहा कि अगर मेरा काम फिर से नहीं दिया गया तो वे कोर्ट में हाजिर नहीं होंगे. चाहे कोई भी सजा दो भुगतने को तैयार हैं. वे जेल जाने को भी तैयार हैं. कोर्ट ने उनके खिलाफ अंसवैधानिक फैसला लिया है. वे कोई आतंकवादी या असामाजिक तत्व नहीं हैं. उन्होंने जजों के खिलाफ शिकायत की वे कानून के दायरे में हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनका काम छीन लिया जिससे मेरा मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया. अगर मेरा काम वापस दिया जाएगा तो मैं जवाब दूंगा. कोर्ट के इस कदम की वजह से मेरा सामाजिक बहिष्कार हो गया है. यहां तक कि मेरा प्रतिष्ठा भी चली गई है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस करनन के न्यायिक और प्रशासनिक कामों पर लगी रोक को हटाने से इनकार किया है.
उल्लेखनीय है कि जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था. साथ ही CBI को जांच के आदेश भी दिए थे. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने इसे अदालत की अवमानना बताया, जिसके बाद सात जजों की खंडपीठ ने जस्टिस करनन के ख़िलाफ़ कोर्ट के आदेश की अवमानना की कार्रवाई शुरू की. इस पर जस्टिस कर्णन ने कहा था कि आरोपों की जांच करने की बजाय मुझे परेशान किया जा रहा है. उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें दलित होने की वजह से परेशान किया जा रहा है. दलित साहित्य एक काल-खण्ड है
जब वस्तुपरिस्थियों का सही उद्घाटन न किया गया हो तो वे अपने अति के कारण अस्तित्व में आने को व्याकुल हो जाती हैं. इसे ही समय की अनिवार्यता कहा जाता है. भक्ति काल को किसी ने प्रायोजित नहीं किया था. रीतिकाल को किसी ने प्रायोजित नहीं किया था. वीरगाथा काल की वस्तुपरिस्थियां पहले उत्पन्न हुईं. छायावाद की अपनी परिस्थितियां थीं. शुक्ल युग, द्विवेदी युग, वर्तमान काल अनायास नहीं उत्पन्न हुआ. सबके कारण थे.
ठीक ऐसे ही दलित की अपनी वस्तुस्थितियां थी, किन्तु विद्वान सहित्यकारों ने दलितों (अतिशूद्रों) पर अपनी कलम नहीं चलाई, नहीं तो उनकी कलम गन्दी हो जाती. शूद्रों को कभी मनुष्य का दर्ज नहीं दिया. अधिकतर साहित्यकार ब्राह्मण थे, सवर्ण थे. भला वो दलितों को मनुष्य मानकर उनके दुःख के बारे में क्यों लिखते? उनके कल्याण के लिए ब्राह्मण वर्ग द्वारा तिरस्कार के खिलाफ क्यों लिखते? शूद्र जातियाँ सेवक जातियाँ थीं. आखिर, सेवक किसने बनाया था? आप कहेंगे ईश्वर वेदों में लिख गए हैं. आप कहेंगे शूद्र को प्रभु ब्रह्मा ने अपने पैरों से पैदा किया था. ब्राह्मण को मुख से पैदा हुए किए थे. इस पर भी पेट नहीं भरा तो गीता लिख डाली. फिर भी पेट नहीं भरा. लगा अभी भी नियंत्रण नहीं किया जा सकता है तो मनुस्मृति लिखकर पक्का कर दिया कि शूद्र और स्त्री को शिक्षा दिया ही नहीं जाना चाहिए.
यदि किसी भी तरह ज्ञान आँख-कान-जबान-दिमाग तक आ जाय तो उसी प्रकार का कठोरतम दण्ड का भी प्रावधान कर लिया. खाने के लिए साँवाँ-कोदो, ओढ़ने बिछाने को गंदे-मैले-कुचैले-झिलगहीं कथरी उनके नशीब में ठोक दिया. खेत छीन लिया. अच्छे कपड़े जुट भी जाय तो पहनने नहीं दिया. खटिया पर बैठने नहीं दिया. अपने आने पर उठ जाने को संस्कार बना दिया. स्त्रियों को अपनी मिलकियत समझा. जब चाहा मचला-कुचला, जब चाहा तिरस्कार किया. खेत-खलिहान में वे तुम्हारी रखैल थीं. सेक्स का खुल्लम-खुल्ला खेल खेला. हरवाहिन पर तो आप का पूर्ण अधिकार था. जब चाहते जैसे चाहते इंज्वॉय करते. जो वर्ण संकर पैदा हुए क्या उन्हें अपने पुत्र-पुत्री का अधिकार दिया. नहीं न?
फिर तो बड़ी ज्यादती की आपने. देश आज़ाद हुआ. संविधान बना. आरक्षण मिला. दलित पढ़े-लिखे-समझे. वेद-पुराण-श्रुतियाँ-स्मृतियाँ-गीता-मनुस्मृति पढ़े-समझे. अपनी कहानियां लिखनी शुरू की. कविताएँ लिखी. आत्मकथा लिखी. आप ने सवाल उठाया कि इसमें शुद्धता नहीं है, कला नहीं है. दलितों ने कहा यह हमारी स्वानुभूति है. यह हमारा भोगा हुआ यथार्थ है. तुम्हारे मानने न मानने से हमारा सच तो नहीं बदल जाता है. जो सत्य है हम अपनी टूटी-फूटी भाषा में लिखेंगे, हमारे लोग पढ़ेंगे, जग पढ़ेगा. तुम्हारा पढ़ना जरूरी नहीं. तुम्हारे मूल्यांकन से हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. जब तुमने ज्यादे दबाव बनाया तब हमने “दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र” लिखा, जिसमें हमने अपने गलीज जिंदगी का सौंदर्य लिखा. तुम्हारी गिरी हरकतों को साहित्य में दर्ज किया.
एक काल-खण्ड को दर्ज़ किया. जैसे तुमने अन्य कालखंडों को मान्यता प्रदान की थी, ठीक वैसे ही दलित साहित्य को समाज ने मान्यता प्रदान कर दी है. बहुत विमर्श हो चुके हैं. अब आप के कहने से यह कालखंड आप की धारा के साहित्य से अलग अस्तित्व ग्रहण करते हुए मुख्य धारा के साहित्य से जुड़ गया है. आप के कहने से कुछ भी होने वाला नहीं है. आप को इस विमर्श में उतरना ही पड़ेगा, तभी आप को अपनी गलतियों से छुटकारा मिलेगा. दलित साहित्य मानव हित का साहित्य है. यह मानव को केंद्र में रखता है. जाति-उन्मूलन करके समता-स्वतंत्रता-बंधुत्व को स्थापित करना दलित साहित्य का मूल उद्देश्य है.
भूमंडलीकरण के दौर में पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध दलित साहित्य हर उन क्रांतिकारियों के साथ है जो पूर्ण ईमानदारी से पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंककर शोषण-विहीन व्यवस्था को स्थापित करना चाहते हैं. दलित साहित्य आज ब्रह्मनवाद, सामंतवाद, पूँजीवाद, साम्प्रदायिकता, आतंकवाद, जातिवाद, धर्मवाद और फासीवाद से लड़ता हुआ अपने को विश्व साहित्य के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है और हर उस व्यक्ति, समाज, व्यवस्था का विरोध करता है जो मनुष्य का किसी भी स्तर पर शोषण, अन्याय, छूत-अछूत, ऊँच-नीच का भेद-भाव करते हैं.
मैं कहता हूँ कि संगठन (बीएसपी) में ब्राह्मण को लिया होता तो कोई बात नहीं, ब्राह्मण के नाम पर गुंडों, माफियाओं और बाहुबलियों को लिया गया है. मेरा इस तरह कहना, ब्राह्मण के प्रति दुर्व्यवहार नहीं है. मैंने तो यह भी लिखा है कि अपने को (दलितों के नए संगठनों को) बाड़ में मत रखना अर्थात जाति के घेरे में मत रखना. फिर लिखा कि अपना मूल्यांकन करो, अपनी आलोचना भी करो जिससे समता-स्वतंत्रता और बंधुत्व स्थापित हो. हाँ जातिवाद का खुल्लमखुल्ला विरोध है चाहे दलित जातिवाद करे चाहे ब्राह्मण.
मैं ब्राह्मणवाद और जातिवाद का विरोधी हूँ. किसी जाति के व्यक्ति का नहीं. ब्राह्मण और सवर्ण कहने से उसकी जाति की बात करता हूँ उसके व्यक्ति होने पर कोई प्रहार नहीं है. प्रहार है तो जाति के अहम् पर है.
मैं अलगाववाद की बात नहीं करा रहा हूँ. मैं एकलता की बात करता हूँ जिस एकता को ब्राह्मणवाद और जातिवाद ने तोड़ रखा है. जातिवाद की वजह से जो समाज में विभिन्नता है, अलगाववाद है, वैमनष्य है, उसे आप क्यों नहीं देखना चाहते? उसकी रक्षा में आप का मस्तिष्क क्यों सक्रिय हो जाता है?
क्या आप नहीं चाहते कि पूँजीवाद के साथ ब्राह्मणवाद भी ख़त्म हो. ब्राह्मणवाद से मेरा अभिप्राय ऊँच-नीच, छुआ-छूत, गैर-बराबरी की भावना से है. क्या आप नहीं चाहते कि न ब्राहण हों, न ठाकुर हो, न वैश्य हो और न शूद्र-चमार हों. सभी मनुष्य हों. सब का एक मूल्य हो. मैं ऐसा ही समाज चाहता हूँ, जहाँ समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व हो, जहां मनुष्य के द्वारा मनुष्य का किसी भी तरह किसी भी स्तर पर शोषण न हो. यदि यह बुरा है तो मैं बुराई के पक्ष में हूँ.
कौन समानता की बात कर रहा है और कैसे? क्या बिना जातियों को ख़त्म किए बिना समानता लाई जा सकती है. छोड़ने से आप का काम चल सकता है क्योंकि आप सवर्ण हो सकते हैं. आप की समाज में मुफ़्त की इज्जत, पैलगी, बाबू साहब नमस्ते, जय राम बाबू साहब करने वाले अनेक लोग होंगे लेकिन दलितों के पास आज भी पढ़े-लिखे-नौकरीयाफ्ता होने के बाद भी बहुसंख्यक सवर्ण इज्जत देने वाला नहीं है. गाँव छोड़िए, शहर में प्रगतिशील ब्राह्मण-क्षत्रियों के घनिष्ट मित्रों को छोड़ अगल-बगल वाले घृणा करते हैं. आज तक पड़ोसियों ने न चाय पी है न चाय पिलाई है. यहाँ तक कि मोहल्ले में कई सवर्ण हैं जिन्होंने दलित होने के नाते पिछले बीस वर्षों में भी निमंत्रण नहीं दिया, जबकि सवर्ण समाज विकसित हुआ है. सभी सवर्ण ऐसे नहीं हैं. लेकिन जातियों की जो बहुसंखयक मानसिकता है वह दलित होने के नाते घृणा करते हैं.
आरक्षण का विरोध करते है, प्रतिभा का सवाल उठाते रहते हैं. नौकरियों और प्रमोशनों में भेदभाव करते हैं. दलितों से कार्यालयों में अधिक काम लिया जाता है. अनेक सवाल है जिनसे लड़ना पड़ेगा. आप नहीं लड़ोगे तो दलित तो लड़ेगा ही, क्योकि वह भुक्तभोगी है. वह यथार्थ को भोग रहा है. भंगियों की सामाजिक स्थिति ब्राह्मणवाद के चलते सुधर नहीं रही है. वह भंगी का भंगी रह गया है. आज वैज्ञानिक युग में भी वह टट्टी साफ कर रहा है.
यह ईर्ष्या नहीं है. आप हमारे अच्छे मित्र हैं. समझदार हैं. आप को जातिप्रथा उन्मूलन में हमारा साथ देना पड़ेगा. हम एक निर्मल समाज का निर्माण करना चाहते हैं. कृपया हमारा तहेफिल से साथ दें.
साथी, इसी को कहते हैं पूर्वाग्रह. मिलजुलकर जातिप्रथा को तोड़ने के लिए आप तैयार नहीं हो पा रहे हैं. आप ब्राह्मणवाद को तोड़ना नहीं चाहते, यही है सवर्णवाद, यही है जातिवाद, यही है वर्चस्ववाद. सोचो जरा, बिना जाति का समाज कितना सुन्दर लगेगा.
जब सवर्ण साहित्यकार बागों में बहार है, फूलों पर निखार है-लिख रहा था, प्रकृति का गुणगान कर रहा था, राजाओं-महाराजाओं का स्वागत गान रच रहा था, खुशहाली और सुखहाली के गीत, कविता, कहानी, नाटक और ललित निबंध लिख रहा था उसी समय शूद्र तालाब का पानी नहीं पी सकता था, चारपाई पर नहीं बैठ सकता था, सर उठाकर नहीं चल सकता था, खेत नहीं, खलिहान नहीं, बैल नहीं, मकान नहीं, दुकान नहीं, तन पर कपड़ा नहीं, बेगारी करता था, खेत मजदूर भी नहीं बंधुआ मजदूर था, स्त्रियाँ नया कपड़ा नहीं पहन सकती थीं, सुन्दर कपड़ा नहीं पहन सकती थीं, स्तन खुला रखना पड़ता था, किसी पंडित जी या बाबू साहब की हरवाहिन होती थी, बलात्कार उनका हक़ था, देह समर्पण स्त्री की सेवा थी-मजबूरी थी, शिक्षा का अधिकार नहीं था.
बहुत ऐसी न जाने कितनी शूद्रों की हालात थी जिसको इन चाटुकार-भाँट-अन्यायी-दुराचारी साहित्यकारों को दिखाई ही नहीं पड़ता था. क्या सारे के सारे साहित्यकार अंधे थे? किसी साहित्यकार ने क्या इन हालातों पर कलम चलाई? ये सारे सत्य साहित्य के किन पन्नों पर अंकित हैं? रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, श्याम सुन्दर दास, प्रताप नारायण मिश्र, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, अज्ञेय, दिनकर, नीरज, माखनलाल चतुर्वेदी इत्यादि नामवर साहित्यकार क्या ब्राह्मणवाद के पोषक नहीं थे? क्या इनकी बुद्धि को लकवा मार गया था?
क्या इस साहित्य को समाज का दर्पण कहा जा सकता है? आज भी साहित्य को समाज का दर्पण कह कर साहित्य की शुरुआत करने वाले क्या वाकिफ़ हो पाए कि सत्य क्या है? इसी आक्रोश में शूद्रों के पढ़े-लिखे वर्ग ने अपने लिखे को दलित साहित्य कहा, और इसे ही भोगा हुआ यथार्थ कहा, इसे ही स्वानुभूति का साहित्य कहा. सहानभूति के साहित्य को दलित ने इंकार तो नहीं किया किन्तु उसे दलित साहित्य से जुड़ने का कड़ा विरोध किया. परानुभूति और सहानुभूति लिखकर सवर्ण दलितों के साहित्य के ऊपर तो लिख सकता है किन्तु दलित साहित्य दलित भोक्ता ही लिखेगा.
निराला और प्रेमचंद ने जहमत उठाई तो हम उन्हें उतनी इज्जत देने के लिए सहर्ष तैयार भी हैं. राहुल सांकृत्यायन एक ऐसे ब्राह्मण जाति से साहित्यकार हुए जिसने सत्य लिखा ही नहीं, समाज बदलने के तरीके भी बताए. उनको नमन. क्या सुप्रीम कोर्ट दलित विरोधी है
कोलकाता हाईकोर्ट के जज जस्टिस एस.सी. कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया है. 8 फरवरी, 2016 को अवमानना नोटिस जारी होने के पश्चात सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को लिखे गए पत्र में जस्टिस कर्णन ने कहा कि मुझे सिर्फ इसलिए प्रताड़ित किया जा रहा है क्योंकि मैं दलित हूं. अपने आरोप के समर्थन में उन्होंने कई प्रक्रियागत तकनीकी पहलुओं का साक्ष्य दिया है. जैसे-अवमानना की कार्रवाई हाईकोर्ट के कार्यरत जज के खिलाफ नहीं की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट को इसका अधिकार ही नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट का 8 फरवरी का आदेश कानून सम्मत नहीं है. अगर सुप्रीम कोर्ट को कोई शिकायत है तो वह मामला संसद में भेज सकता है. जस्टिस कर्णन ने यह भी कहा है कि सारी कार्रवाई से सुप्रीम कोर्ट की दलित विरोधी मानसिकता का पता लगता है. उन्होंने यह भी कहा है कि अपरकास्ट जज कानून हाथ में ले रहे हैं और अपनी न्यायिक शक्ति का प्रयोग Mala fide Intension से कर रहे हैं.
वैसे यह पहली बार नहीं है जब भारतीय राजव्यवस्था के किसी उच्च पदस्थ दलित अधिकारी ने अपने से उच्च सवर्ण अधिकारी पर दलित विरोधी मानसिकता से ग्रस्त होने या दलित होने के कारण प्रताड़ित किये जाने का आरोप लगाया हो. हां, हाईकोर्ट के किसी दलित जज ने सुप्रीम कोर्ट पर दलित विरोधी मानसिकता से ग्रस्त होकर कार्रवाई करने का आरोप पहली बार अवश्य लगाया है. चूंकि आरोप स्वयं सुप्रीम कोर्ट पर है जिसे संविधान ने नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी है, इसलिए आम आदमी की नजर में यह मामला महत्वपूर्ण अवश्य हैं, लेकिन एक समाज-वैज्ञानिक के लिए यह मामला उसी तरह का है, जैसे किसी दलित चपरासी का अपने से उच्च सवर्ण अधिकारी पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाना या किसी दलित नौकरशाह का अपने प्रमुख सचिव या मुख्यमंत्री पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाना. क्योंकि सवर्णों के अन्दर दलितों के प्रति घृणा व बहिष्कार का स्थाई भाव समान रूप से व्याप्त है.
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सवर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त है या अनपढ़ है. अमीर है या गरीब है. प्राइमरी स्कूल में है या विश्वविद्यालय में, लोअर कोर्ट में है या सुप्रीम कोर्ट में. इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं है. कुछ घटनाएं जो सामान्य तौर पर अखबारों की सुर्खियां बनती हैं, केवल उन पर नज़र डालने से मामला समझ में आ सकता है. अनपढ़ सवर्ण द्वारा दलितों को मंदिर या सार्वजनिक कुओं पर जाने से रोका जाना, पढ़े-लिखे सवर्णों द्वारा शिक्षण संस्थाओं व नौकरियों में दलितों के प्रवेश को रोकने हेतु आन्दोलन चलाना व आत्महत्या जैसी चरमपंथी कार्रवाई करना, जैसी घटनाएं स्वतः प्रमाण हैं. खैरलांजी, झज्जर, लक्ष्मणपुर बाथे, बथानी टोला जैसी दलित जनसंहार की घटनाएं, पिछले वर्ष गुजरात में दलितों की बर्बर पिटाई, रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या आदि सैकड़ों घटनाएं सवर्णों के दिल में दलितों के प्रति घृणा व बहिष्कार के भाव को ही व्यक्त करती है.
कुछ भद्र सवर्ण मेरी उपरोक्त प्रस्थापना को अति सरलीकरण कह सकते हैं. ऐसे लोगों को लगता है कि न्यापालिका में कार्यरत सवर्णों की मानसिकता साधारण सवर्णों के समान नहीं हो सकती है. लेकिन यह सच नहीं है. इसे प्रमाणित करने के लिए महज कुछ आंकड़े ही काफी हैं. मसलन, 2010 में न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन की सेवानिवृत्ति के पश्चात वर्तमान तक अर्थात पिछले 6 वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में कोई जज दलित समुदाय से नियुक्त नहीं किया गया. उच्च न्यायालयों में भी दलित जजों की संख्या गिनती की ही है, जबकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास ही है. इससे स्पष्ट है कि उच्च न्यायपालिका में दलितों का प्रवेश वर्जित है. प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट में कोई भी जज अन्य पिछड़े वर्ग या आदिवासी समुदाय से भी नहीं है. प्रश्न उठता है कि क्या संविधान लागू होने के 67 वर्षों बाद भी दलितों, आदिवासियों व अन्य पिछड़े वर्गों में से ऐसे लोग नहीं मिल रहे हैं जिसे उच्च न्यायपालिका में जज बनाया जा सके.
आइये अब कुछ ऐसे मुकदमों का उल्लेख करते हैं जो दलितों पर अत्याचार से सम्बन्धित थे तथा जिसमें न्यायालयों ने दलितों के विरोध में निर्णय दिया. बथानी टोला नरसंहार के अभियुक्तों को पटना उच्च न्यायालय ने इसलिए छोड़ दिया कि एफ.आई.आर 24 घण्टे के बाद दर्ज कराई गई थी. राजस्थान की भंवरी देवी सामूहिक बलात्कार में सभी अभियुक्तों को जयपुर उच्च न्यायालय ने यह कहकर मुक्त कर दिया कि अभियुक्त सवर्ण हैं, जो दलितों को छूते तक नहीं, तो वे अछूत महिला का बलात्कार कैसे कर सकते हैं.
आरक्षण नीति पर न्यायालय सदैव हमलावर रहा है. ‘मेरिट’ की रक्षा के नाम पर समानता व सामाजिक न्याय जैसे लोकतान्त्रिक मूल्यों की अवमानना करता रहा है. संविधान लागू होने के तुरन्त बाद उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण को ही असंवैधानिक घोषित कर दिया था. जिसे 1951 में बाबा साहेब अम्बेडकर के कानून मंत्री रहते ही प्रथम संविधान संशोधन के द्वारा पुनर्स्थापित किया गया. 1992 में मण्डल कमीशन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दलितों व आदिवासियों के आरक्षण पर भी दिशा-निर्देश जारी किया, जिससे दलितों, आदिवासियों को मिलने वाली फीस से छूट, प्राप्तांक में छूट आदि समाप्त हो गयी थी. संविधान संशोधन द्वारा इसे पुनर्स्थापित किया गया. रोस्टर प्रणाली, जिसके आधार पर भर्ती योग्य रिक्त पदों की गणना होती है उसे 1997 में परिवर्तित कर दिया गया.
विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में रोस्टर प्रणाली जो अभी हाल ही में लागू की गयी है उससे दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए रिक्त पदों की संख्या शून्य हो गयी है. सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु, सिद्धार्थनगर (उत्तर प्रदेश) में विज्ञापित शिक्षकों के 84 पदों में से मात्र एक पद अन्य पिछड़े वर्ग को मिलेगा. 84 पदों में से अनुसूचित जाति/जनजाति के खाते में शून्य पद आया है, जबकि उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए 21 प्रतिशत व अन्य पिछड़े वर्ग लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है. यह रोस्टर प्रणाली सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संवैधानिक घोषित की गयी है जिसमें दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए शून्य पद प्राप्त हो रहे हैं.
प्रोन्नति में आरक्षण पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की भावना के विरूद्ध निर्णय दिया, जिसके कारण उत्तर प्रदेश के हजारों दलित और आदिवासी कर्मचारी-अधिकारी पदावनत किये गये. रिजनल फूड कार्पोरेशन में कार्यरत एक महिला दलित कर्मचारी को पांच स्टेप पदावनत करके बड़ा बाबू बना दिया गया. दो से तीन स्टेप तो हजारों दलित कर्मचारियों-अधिकारियों को पदावनत किया गया. इस तरह किसी समुदाय के सामूहिक अपमान का उदाहरण विश्व में शायद ही कहीं मिले. जस्टिस कर्णन का सुप्रीम कोर्ट पर लगाया गया आरोप मात्र एक दलित जज का आरोप नहीं है बल्कि सम्पूर्ण दलित समुदाय की भावना की अभिव्यक्ति है. दलित समुदाय न्यायपालिका द्वारा ठगा हुआ महसूस कर रहा है. इस अनुभव को जितनी जल्दी सवर्ण समुदाय स्वीकार लेगा, भारतीय लोकतन्त्र के लिए उतना ही अच्छा होगा. आप पुरानी व्यवस्था से चुनाव कराने की बात कह रही हैं उसी प्रकार बसपा को अपने पुराने रूप में आना चाहिए (समर्थक का दर्द, पार्ट-3)
माननीय बहनजी .
सादर जयभीम
ई वी एम मशीन से बहुजन के वोटों को हैक किया गया है कि नही, यह एक जाँच का विषय है जिस पर सरकार तैयार नहीं होगी क्योकि कथित तौर पर जिसने हैक किया है उसी की केंद्र में सरकार है. लेकिन बहुजन समाज जरूर हैक हो गया है. मान्यवर साहब ने सामाजिक मूवमेंट के द्वारा बहुजन समाज को जोड़ने का कार्य किया था जिसमे काफी हद तक कामयावी मिली थी लेकिन राजनीतिक मूवमेंट के कारण सामाजिक मूवमेंट कमजोर होता चला गया. 2 जून, 1995 की घटना ने इसे और कमजोर करने का काम किया. वह एक अप्रत्याशित घटना थी जिसके कारण भाजपा से राजनीतिक समझौता करना पड़ा था.
उसके बाद तो सामाजिक मूवमेंट लगातर कमजोर होता चला गया. मान्यवर साहब ने बामसेफ के द्वारा दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य पिछड़े वर्गों को जोड़ने का जो कार्य किया था, वह समाप्त हो गया. इसके पीछे का कारण बामसेफ के लोगों द्वारा मान्यवर साहब को छोड़ कर चले जाना रहा है. उन्होंने दलितों के साथ-साथ शाक्य, सैनी, मौर्य, कुशवाहा, बिंद, निषाद, राजभर, नाऊ, कहार, केवट, पाल, प्रजापति, कुर्मी, पटेल और परिवर्तित मुस्लिम समाज को जगाने का कार्य किया था. इनमें नेतृत्व का निर्माण किया. लेकिन विशुद्ध रूप से राजनीति के कारण और सामाजिक मूवमेंट पर ध्यान न देने के कारण इन पर अन्य पार्टियों ने डोरा डालना शुरु कर दिया, जिसके कारण बहुजन समाज के बहुत से पुराने सामाजिक मूवमेंट के कार्यकर्ता बहुजन समाज पार्टी को छोड़ कर चले गए. क्योंकि जब राजनीति ही करनी रह गयी तो ये लोग भी दूसरे के बहकावे में आ गए और लालच या स्वार्थवश दूसरे पार्टियों में चले गए.
दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी में भी जिनको दलितों की जिम्मेदारी दी वे भी अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभाए. बसपा के को-आर्डिनेटर आपसे डरते हैं और नीचे के पदाधिकारी को-कॉर्डिनेटर से डरते हैं. पहले बहुजन समाज पार्टी को चलाने के लिए चन्दा लिया जाता था लेकिन अब ऐसा नही है. कोई सदस्यता अभियान नहीं चलाया जाता है, इसलिये कोई पदाधिकारी किसी के पास नहीं जाता है. वह जानता है कि पार्टी चलाने और चुनाव लड़ने की व्यवस्था बहनजी तो करेगी ही. इससे दलित समाज के साथ-साथ बहुजन समाज के साथ भी बहुजन समाज पार्टी की पकड़ काफी कमजोर हुई है.
मेरे विचार से जिस प्रकार आप पुरानी व्यवस्था से चुनाव कराने की बात कह रही हैं उसी प्रकार बहुजन समाज पार्टी को अपने पुराने रूप में आना चाहिए. आपने अपना विशाल ह्रदय किया लेकिन भारत के जातिवादी लोग आज भी आपको उस रूप में नहीं स्वीकार कर रहें हैं जैसा कि आप चाहती हैं. एक तरफ देश का प्रधानमंत्री खुले आम मुसलमानों को सत्ता में भागीदारी न देकर प्रचंड बहुमत हासिल करते हैं, और वही दूसरी तरफ आपने सर्व समाज को भागीदारी देकर अपना अस्तित्व संकट में डाल लिया है. आज भी समाज को आपसे बड़ी उम्मीद है. आपका आर आर एस जैसा कोई गैर-राजनीतिक संगठन नहीं है जो मिशन का प्रचार-प्रसार करे और बहुजन समाज को जोड़ने का कार्य करे. मेरा विश्वास है कि आप इस पर जरूर विचार करेंगी.
बी आर गौतम
इलाहाबाद कांशीरामजी की साझी लड़ाई के सूत्र से सत्ता में पहुंची है भाजपा
आज उत्तर प्रदेश में नई सरकार ने शपथ ले ली. मंच की भीड़ साझी लड़ाई की कहानी बयां कर रही थी. ऐसी कहानी कांग्रेस ने भी गढ़ी थी, लेकिन वहां मुख्यधारा से दलित और पिछड़े गायब थे. थे भी तो ज्यादातर वक्त मजह औपचारिक खानापूर्ति के. दलितों और पिछड़ों को केंद्र में रखकर ऐसी कहानी सबसे पहली बार बहुजन राजनीति के सूत्रधार मान्यवर कांशीराम ने गढ़ी थी. मान्यवर के उसी सूत्र को पकड़ कर भारतीय जनता पार्टी आज उस उत्तर प्रदेश की सत्ता पर कब्जा जमाए बैठी है, जिसे मान्यवर कांशीराम राजनीतिक शब्दावली में शरीर का ‘गर्दन’ कहा करते थे. और उन्हीं की पैदा की हुई बहुजन समाज पार्टी बाहर दूर खड़ी तमाशबीन बनी है.
मंच की भीड़ कोई आम भीड़ नहीं थी. वहां बैठे सबके सब एक-दूसरे से बढ़कर दिग्गज थे. और यूपी जीतने की लड़ाई सबने समान रूप से एकसाथ लड़ा था. इसमें हर किस्म के चेहरे थे. कट्टर, उदारवादी, पिछड़े, दलित और वो सब जो आज की राजनीति में जीतने का माद्दा रखते हैं. और सबसे दीगर बात यह कि इस भीड़ में वो कुछ खास चेहरे भी थे जो कभी मन से अम्बेडकरवाद का नीला झंडा बुलंद किया करते थे. स्वामी प्रसाद मौर्या और सोनेलाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल ऐसे ही चेहरे हैं.
एक समय बसपा के मंच पर भी ऐसी ही भीड़ दिखती थी. तब कमान कांशीरामजी के हाथों में थी. फिर नेता बदला और मंच की भीड़ भी सिमटती गई. और आज तो मंच इतना सिमट गया है कि वो दर्जन भर कौन कहे दो लोगों के लिए भी अपने दिल में जगह नहीं बना पाता है. भारतीय राजनीति में बहुजन समाज पार्टी इकलौती ऐसी पार्टी है, जिसका हर मंच भव्य है लेकिन वहां लोग नदारद हैं. जिस दिन बहुजन समाज पार्टी के मंच पर आज के शपथग्रहण जितनी भीड़ होगी, उस दिन उत्तर प्रदेश की विधानसभा में उसे 350 से ज्यादा सीटें जीतने से कोई नहीं रोक सकेगा और वह जीत स्थायी होगी, जिसे सालों तक कोई दूसरी पार्टी बदल नहीं पाएगी. पूर्व बसपा नेता गंगाराम अम्बेडकर का दर्द
बहनजी ड्राइवर के कहने पर पूरी पार्टी चला रही हैं, जबकि उस ड्राइवर को हमारे और बहनजी के मिशन से कोई मतलब नहीं है. उनको रास्ते पर लाने के लिए इस्तीफा दिया है. शायद बसपा परिवार के छोटे सदस्य की बातें समझ में आएंगी तो पार्टी बच जाएगी. बता दें, बहनजी ने सतीशचंद्र मिश्रा के भरोसे पूरी पार्टी सौंप दी है. हमारा इस्तीफा बहन जी को अलर्ट करने के लिए है.
कभी-कभी ड्राइवर की बात माननी पड़ती है, लेकिन बहनजी अब उस ड्राइवर के ही कहने पर चलने लगी हैं. ड्राइवर शॉर्ट कट रास्ता दिखाता तो बहनजी उधर ही चल देती हैं. ऐसे रास्ते और ऐसे लोगों से बच निकलने की जरूरत है. हां, कभी-कभी रास्ता दिखाने वालों पर ध्यान देने की आवश्यकता है. बहनजी को ये भी सोचना चाहिए कि रास्ता कौन सा है और कौन रास्ता दिखा रहा है.
हमारा इस्तीफा किसी खास मकसद या लालच से नहीं है, वरना विधानसभा चुनावों के पहले करते. इस वक्त करने का मकसद बहनजी को ये बताना है कि अब भी वक्त है हम 2019 जीत सकते हैं. मैं बसपा परिवार का अपने को छोटा बच्चा मानता हूं. हो सकता है कि मेरे इस्तीफे से बहन जी की आंखे खुल जाएं. बड़े जिम्मेदारों से सवाल पूछना चाहिए कि कमी कहां रही और क्या समस्या हुई कि लोग छोड़कर जा रहे हैं.
बहनजी के यहां 2 लोग हैं जो हम जैसे छोटे कार्यकर्ताओं को उनसे मिलने ही नहीं देते हैं. उन्हीं के लोगों ने पूरे बंगले में बहनजी के आस-पास पूरी तरह से घेरा बना लिया है. ये दो-तीन लोग पूरी तरह से मायावती को भ्रमित कर रहे हैं. वो किसी दलित-पिछड़े व्यक्ति को राजनीति में नहीं लाना चाहते हैं.
बहनजी के यहां छोटे लोगों को टारगेट किया जा रहा है. हमें बहनजी से मिलने के लिए हफ्तों का समय लगता है, उसपर भी कई बार मिल नहीं पाते. हो सकता है घर के छोटे बर्तन की आवाज से बहन जी हमारी तरफ भी ध्यान देंगी. शायद इससे उन्हें याद आएगा कि हमारा मिशन क्या था और किसके कहने पर चल रहे हैं. पेड़ पर जब ज्यादा बगुले बैठने लगते हैं, तो बाग का माली पूड़ों की छंटाई करता है, या फिर बगुलों का हटाता है. अब बहनजी को तय करना है कि बाग की छंटाई करनी है या बगुलों को हटाना है, क्योंकि ये बगुले बस मलाई चाटते हैं, जमीन पर काम हम करते हैं. फिलहाल बसपा में बगुलों की मौज है.
– गंगाराम अम्बेडकर पिछले काफी सालों से बसपा से जुड़े हुए हैं. बसपा प्रमुख मायावती के ओएसडी रह चुके हैं. 05 पैसे नहीं होने से मान्यवर कांशीराम को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ा था
सन् 1972 में हमने पूना में अपना छोटा सा कार्यालय खोला. शायद बहुजन समाज मूवमेंट (सभी धर्मों के OBC SC ST) का वो पहला कार्यालय था. मैं उस समय रेलवे में नौकरी करता था. नौकरी के लिए मुझे रोज पूना से मुंबई जाना पड़ता था. साहब जी मेरे साथ मुबंई आना-जाना करते थे. उस वक्त रेल के डिब्बे में ही हम योजनाएं बनाते थे कि किस तरह से हमें मनुवादियों/ ब्राह्मणवादियों द्वारा 6,743 जातियों में बांटे गए मूलनिवासी बहुजन समाज (85% OBC SC ST) को एक सूत्र में पिरोना है और उन्हें उनके हक़ दिलाने हैं.
साहब जी के पास पूना से मुंबई का रेलवे पास था. हम अपनी साइकिलों पर पूना स्टेशन जाते थे और फिर मुंबई से आकर साइकिलों से कार्यालय पहुंचते थे. हम स्टेशन के पास छोटे से ढाबे पर थोड़ा बहुत पेट भरने लायक खा लेते थे. आज भी मैं उस दिन को याद करता हूं जब मैं और साहब मुंबई से पूना आये और साइकिल उठाकर चल पड़े. हमारा सस्ता ढाबा आ गया. उस दिन मेरे पास तो पैसे नहीं थे इसीलिए मैंने सोचा साहब जी खाना खिला देंगे मगर साहब भी नहीं बोले. मैंने सोचा कि आज शायद साहब का दूसरे ढाबे में खाना खाने का मूड है. दूसरा ढाबा भी आ गया. हम दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और आगे चल पड़े क्योंकि पैसे किसी के भी पास नहीं थे.
कुछ न मिल पाने की स्थिति में हम दोनों रात को पानी पीकर सो गये. अगले दिन मेरी छुट्टी थी मगर साहब को मीटिंग के लिए जाना था. साहब सुबह उठे और नहा धोकर अटैची उठाकर निकलने लगे. थोड़ी देर बाद वापिस आये और बोले…
””यार मनोहर कुछ पैसे हैं क्या तुम्हारे पास?”” मैंने कहा नहीं है साहब. तो साहब ने कहा देख कुछ तो होंगे? मैंने कहा कुछ भी नहीं है साहब. होते तो रात खांना जरूर खिलाता आपको.
””मनोहर, यार 05 पैसे तो होंगे?””
अब मैं भी अपने बैग को खंगालने लगा मगर एकदम खाली. मैंने पूछा क्या काम था साहब? यार साइकिल पंक्चर हो गयी है और ट्रेन का भी समय हो गया है. अगर समय से स्टेशन न पहुंच पाया तो ट्रेन छूट जायेगी और हजारों लोग जो मुझे सुनने आएंगे, मेरे न पहुंच पाने की स्थिति में निराश होकर वापस चले जायेंगे. बड़ी मेहनत के बाद मैं इस मिशन को यहां तक लेकर आया हूं. मैंने कहा तो क्या हुआ साहब, आप मेरी साइकिल ले जाओ? साहब ने कहा अरे भाई देख ली; तेरे वाली भी खराब है.
फिर अचानक ये क्या ????
05 पैसे ना होने के कारण साहब पैदल ही कई किलोमीटर दूर स्टेशन के लिए दौड़ पड़े… और पहली बार जब मैंने कांशीराम साहब को हेलीकॉप्टर से उतरते देखा तो आँखों से आसूं निकल गये जो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे और मेरे मुंह से निकला ””वाह साब जी वाह, कमाल कर दिया..”” पुरानी टूटी सी साइकिल द्वारा बामसेफ, DS4, बहुजन समाज पार्टी से होते हुए सीधे हेलीकॉप्टर… क्या बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर भी चुरा लिए जायेंगे?
एक महत्वपूर्ण कबीरपंथी सज्जन से मुलाक़ात का किस्सा सुनिए. एक गाँव में किसी काम से गया था, उसी सिलसिले में मालवा के दलितों के बीच फैले कबीरपंथ से परिचय हुआ. एक घर के बड़े से आँगन में कबीर पर गाने वाले और कबीर पर बोलने वाले एक सज्जन बैठे थे और आसपास बैठे गरीब दलित सुन रहे थे. मैं और मेरे एक मित्र कबीर की वाणी में सामाजिक क्रान्ति के सूत्र खोजने के मन से उन सज्जन से प्रश्न पूछ रहे थे.
आसपास बैठे दलित गरीब चुपचाप सुन रहे थे. बात निकली तो लोगों ने शेयर किया कि सब पञ्च तत्व के बने हैं, सब एक ही परमात्मा की संतान हैं और सबमे एक ही खुदा का नूर है आत्मा परमात्मा की ही औलाद है और भेदभाव सब इंसान के बनाये हुए हैं, सबका खून लाल है, सबको मरकर वहीं जाना है… इत्यादि इत्यादि … फिर कुछ जागरूक लोगों ने बताया कि भाई जब तक ये प्रवचन चलता है तब तक सभी यह मानते हैं … उसके बाद आश्रम या सत्संग घर से निकलते ही दीवार के ठीक एक फुट दूर ही एकदूसरे के हाथ का छुआ खाना-पीना बंद हो जाता है और सब वापस कबीरपंथ या राधास्वामी या साहेब या सतनाम या बंदगी छोड़कर वर्णाश्रम के खोल में वापस लौट आते हैं.
चर्चा के दौरान लोग आते जाते हुए प्रवचनकार सज्जन के पैर छूते रहे और कबीर की वाणी में आये गुरु गोविंग दोउ खड़े काके लागु पांय, मैं तो राम की लुगइया, रस गगन गुफा में अजर झरे, सुन्न महल, कुण्डलिनी और षड्चक्र और न जाने क्या क्या चल रहा था. लेकिन बार बार पूछने पर भी ये बात कोई नहीं करना चाहता कि आप लोगों के इलाके में हैण्ड पम्प क्यों नहीं है? आपके बच्चों को स्कूल में पढने क्यों नहीं दिया जाता? आपके युवाओं को रोजगार क्यों नहीं दिया जाता? आपके बर्तनों को कुवें से लात मारकर क्यों फेंक दिया जाता है? आपकी स्त्रीयों को आसान शिकार क्यों समझा जाता है? इन प्रश्नों पर कबीर की तरफ से उत्तर दिए गये हैं लेकिन वे उत्तर कबीरपंथ से गायब हैं. कबीरपंथियों ने जिस कबीर को रचा है वह सिर्फ आत्मा परमात्मा और मोक्ष की बात करता है. ठीक उसी तरह जैसे भारतीय ध्यानियों ने जिस बुद्ध को रचा है वह सिर्फ ध्यान समाधि और निर्वाण की बात करता है समाज की कोई बात नहीं करता.
क्या इन कबीरपंथियों ने कबीर को गलत समझा है? या ये सिलेक्टिव ढंग से कबीर को जिस तरह से रख रहे हैं उसमे कोई गलती है? या क्या यह कहा जा सकता है कि कबीर ने खुद ही कुछ गलती की है? ये बड़े प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढना बड़ा मुश्किल है लेकिन एक सावधान नजर से देखें तो इनका उत्तर मिलता है. आइये उस उत्तर में प्रवेश करें. कबीर हो या बुद्ध हों, उनकी वाणी में कोई भी बात हो या कैसी भी समझाइश दी गयी हो, उसका अनुवाद या भावार्थ सीधे सीधे क्या जनता तक पहुँच रहा है? क्या उनके साहित्य में मिलावट करने वालों ने मिलावट के बाद उसकी व्याख्या का अधिकार दूसरों को दिया है? या यह एकाधिकार खुद ही अपने पास सुरक्षित रख लिया है? कबीर के बारे में दावे से कहा जा सकता है कि उनके काव्य को जिस तरह से अनुदित किया गया है और उनके चुने गये प्रतीकों और बिंबों में जिस तरह से वेदान्तिक अर्थ डाले गये हैं उससे कबीर अपने ही लोगों के लिए खतरनाक बना दिए गये हैं.
अगर कबीरपंथी अपनी रविवारीय बैठक में आत्मा परमात्मा और बंकनाल, सुन्न महल और राम की भक्ति जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं तो वे शिक्षा, स्वास्थय, रोजगार और राजनीति पर कब बात करेंगे? अपने शोषण के मुद्दों पर या अपने जीवन के जरुरी मुद्दों पर कब बात करेंगे? हफ्ते भर जी तोड़ मेहनत करने के बाद एक दिन या एक शाम मिलती है जिसमे समाज के असल मुद्दों पर कोई सार्थक बात की जा सकती है. लेकिन उसमे भी आत्मा परमात्मा का भूत छाया रहता है. गाँव के युवा इन बातों को अव्वल तो सुनते ही नहीं या सुनते भी हैं तो वे भक्त बनकर बैठते हैं, हाथ जोड़कर गर्दन हिलाते हुए हुंकारा देते रहते हैं. कबीर के साथ भी समाज में बदलाव की कोई बात नहीं हो रही है. बल्कि समाज में बदलाव की बात को अध्यात्म के जहर में दबाया जा रहा है. यह एक चमत्कार है.
यही बुद्ध के साथ हो रहा है. भारतीय पंडितों और बाबाओं ने जिस तरह से बुद्ध को “अनुभव” “ध्यान” और “निर्वाण” जैसी बातों में लपेटा है उससे बुद्ध की क्रान्ति लगभग खत्म सी हो गयी है. लोग भूल ही गये हैं कि बुद्ध ने जहर की त्रिमूर्ति – आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारकर एक नयी भौतिकवादी जीवन दृष्टि दी है जो परलोक को खत्म करके समतामूलक और वैज्ञानिक समाज को संभव बनाता है. स्वयं बुद्ध की परम्परा में घुसे वेदान्तियों ने जैसा महायान खड़ा किया उसने बुद्ध को और बौद्ध धर्म को इस देश से उखाड़ फेंका और फिर से परलोकी अन्धविश्वास का धर्म यहाँ फ़ैल गया. भारत के बाहर भी जो बौद्ध धर्म है वह महायानी अंधविश्वास और स्थानीय समझौतों की खिचडी से बना हुआ है. इस तरह के परलोक्वादी और समझौतावादी बौद्ध धर्म को अंबेडकर ने सिरे से खारिज किया है.
लेकिन अब सवाल ये है कि क्या अंबेडकर को भी कबीर और बुद्ध की तरह खत्म कर दिया जाएगा? जिस तरह कबीर और बुद्ध की धारा को परलोक और मोक्ष की चादर में लपेटकर खत्म किया गया है, क्या उसी तरह अंबेडकर को खत्म करना संभव है? मेरा उत्तर है कि अंबेडकर को पचाना और उन्हें नष्ट करना असंभव है. बुद्ध और कबीर का साहित्य नष्ट कर दिया गया, उनके नाम पर झूठे सूत्र और साखियाँ लिखकर उनके मूल सन्देश को समाप्त कर दिया गया है. ब्रिटिश खोजियों और राहुल सांस्कृत्यायन की खोज के पहले लोग बुद्ध को और उनके साहित्य को जानते भी नहीं थे. हजारों साल तक बुद्ध और उनका साहित्य लुप्त रहा, जो मिला है उसमे भी वेदांती मिलावट है. इस मिलावट का महिमामंडन करने के लिए ओशो रजनीश और अन्य वेदांती बाबाओं ने बुद्ध को प्रच्छन्न वेदांती बनाकर पेश किया है.
लेकिन अंबेडकर का पूरा नहीं तो लगभग अधिकाँश साहित्य हमारे पास है. उनकी जीवनी और उनका कर्तृत्व हमारे पास सुरक्षित है. उनके द्वारा महायान और हीनयान दोनों को अस्वीकार करते हुए “नवयान” की रचना करना और हिन्दू धर्म को त्यागने का निर्णय हमारे पास है. उनकी बाईस प्रतिज्ञाएँ हमारे पास हैं. अब हमें कोई डर नहीं कि अंबेडकर की वाणी में या उनके लेकहं में मिलावट की जा सके. डर सिर्फ इस बात का है कि हमारे ही लोग उन्हें पढ़ना समझना बंद करके उनकी पूजा न करने लगें. अंबेडकर के दुश्मन यही चाहते हैं कि हम अंबेडकर को पढ़ना छोड़ दें और उन्हें पूजना शुरू कर दें. अगर यह होता है तो अंबेडकर भी हमसे छीन लिए जायेंगे.
अगर हम बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर को खोने नहीं देना चाहते हो हमें अंबेडकर को घर घर तक उनके मूल साहित्य और विश्लेषण के साथ पहुंचाना होगा. उनकी लिखी बाईस प्रतिज्ञाओं को सबसे पहले लोगों को समझाना होगा. कम से कम भारत के गरीबों को समझाना होगा कि अंबेडकर ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी गणेश, राम कृष्ण, आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म और इश्वर सहित आत्मा तक को नकारा है और इनसे तथा पूजा पाठ और भक्ति आदि से दूर रहने की सलाह दी है. हमारे युवाओं को इस बात पर ध्यान देना चाहिए, आज हम उसी दौर में जी रहे हैं जिस तरह के दौर में अतीत में बुद्ध और कबीर को षड्यंत्रकारियों ने खत्म किया था. इस षड्यंत्र में हम अंबेडकर को नहीं फंसने देंगे, आइए यह संकल्प लें और अंबेडकर को खुद समझते हुए दूसरों को भी समझाएं. बसपा समर्थक की पीड़ा, पार्ट- 2
मैंने फेसबुक पर बसपा की हार के कारणों को जानने के लिए अपने विचार दिये बहुत सारे लोगों ने मुझसे सहमति दिखाई लेकिन ऐसे भी लोग मिले जिन्होंने मुझे बसपा विरोधी के रूप में देखा। हद हो गई सारा जीवन मैंने बसपा को वोट दिया और अब यदि बसपा की हार के कारणों पर अपने विचार दे दिए वो भी बसपा के हित में तो मैं बसपा विरोधी हो गया।
ऐसे लोगों से मैं कहना चाहता हूं कि आप पहले तो बाबा साहब अंबेडकर की उस चेतावनी को याद करिए जो उन्होंने hero worship के विरोध में 25 नवंबर 1949 के दिन संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में दी थी। एक बार सोचिए कि क्या आपको नहीं लगता है कि अब बहुजन समाज पार्टी को अपनी पुरानी बहुजन राजनीति की ओर लौटना चाहिए ?
याद करिए बहुजन समाज पार्टी के उस दौर को बहुजन समाज पार्टी में सोने लाल पटेल जी, जंग बहादुर पटेल जी, बलिहारी चौधरी जी, राजबहादुर प्रसाद जी, आरके चौधरी जी, श्यामलाल यादव जी, स्वामी प्रसाद मौर्य जी, सुखदेव राजभर जी, युगल किशोर जी, दारा सिंह चौहान जी, श्रीनाथ प्रसाद जी, रमाशंकर राजभर जी आदि जैसे लोग थे जो एक ओर बसपा की धुरी थे तो अपनी-अपनी जाति के मजबूत छत्रप भी थे।
इन नेताओं की बदौलत इनकी जाति अपना वजूद देखती थी बसपा में । मेरा अभी भी यह मानना है कि यदि बसपा अपने इस पुराने दौर में लौट गए और बहन जी इसी प्रकार के नए सिपहसालार बहुजन समाज के विभिन्न जातीय समूह से विकसित करें तो पूरे बहुजन समाज का भला होगा ।
मेरा आज भी यह मानना है कि बहुजन समाज पार्टी के अलावा अभी हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है बस हमें बहन जी पर दबाव डालना है कि वह बसपा को पुराने स्वरूप में लेकर आएं। काम कठिन है लेकिन असंभव नहीं। आखिर कोशिश करने में क्या नुकसान है? मैं बसपा के समझदार कैडरों, कार्यकर्ताओं और शुभेच्छुओं से उम्मीद करता हूँ कि वे बसपा को उसके मूल चरित्र को अपनाने हेतु बाध्य करेंगे। बसपा समर्थक की पीड़ा, पार्ट- 1
बहनजी सड़क पर उतर कर संघर्ष क्यों नहीं करती, रैली मे 6 लाख इकठ्ठा होते हैं, तो देशभर से कितने लोग बहनजी को सपोर्ट करने जायेंगे। जरा सोचो देशभर से 25 लाख लोग बहनजी के साथ लखनऊ के सड़क पर मार्च करेंगे, तो लखनऊ में सरकार को पैरामिलिटरी फोर्स लगानी पडे़गी और तब देश में ही नहीं विदेश में भी ईवीएम के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन होगा, जिसे राष्ट्रपति ही नहीं बल्कि माननीय सुप्रीम कोर्ट भी नजरअंदाज नहीं कर सकेगा। अगर बहनजी केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मुद्दा उठायेगी तो ये टाईमपास के अलावा कुछ नहीं होगा।
ममता बेनर्जी को देखो, अपनी बात स्पष्टता से रखने के लिये मीडिया से ज्यादा सड़क पर अपने लोगों के साथ आंदोलन खड़ा करती हैं। सतीश मिश्रा बहनजी को केवल सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के लिए बोलेगा और बहनजी फिर इस पर विश्वास कर बहुजन आंदोलन को नहीं छेड़ पायेगी। बहनजी को ये ब्राह्मण लोग गुमराह कर रहे हैं। बहनजी कि संघर्ष शक्ति नष्ट होती जा रही है।
सारे नेता अपना संबोधन लोगों के सम्मुख रखते हैं। मगर बहनजी वही कागज लेकर मिडिया और लोगों को संबोधित करती हैं। पार्लियामेंट में बहनजी सीधी बात करती हैं मगर अपने लोगों के बीच ऐसा क्यों नहीं करती।
बहनजी को सभी पुराने नेता, कैडर और कार्यकर्ता जो देशभर में बसपा को छोड़ गये उन्हें पार्टी में ससम्मान वापस बुलाना चाहिये और मुव्हमेंट को सर्वजन से बहुजन कि तरफ मोड़कर सतीश मिश्रा सहित सभी बामनो को बाहर का रास्ता दिखाना चाहिये, वरना द एंड।
बिना समय गवाये, बहनजी तुरंत लखनऊ कि सड़क पर उतर आये वरना दो दिन बाद, ये मसला शांत होगा। कोई अर्थ नहीं फेसबुक और व्हाट्स एप पर लड़ाई लड़ने का। जिला लेवल पर प्रदर्शन करने से कुछ होने वाला नहीं है। बड़ी नेता है बहनजी तो बड़ा आंदोलन करना होगा, लिगल और ईलिगल….. लेखक लखनऊ में एम. टेक के छात्र हैं सरकार में होने के बावजूद लाल बत्ती गाड़ी पर नहीं बैठे थे मान्यवर कांशीराम, जानिए क्यों?
मान्यवर कांशीराम जी के सहयोगी रहे श्री आर के चौधरी अस्वस्थ्य थे तो मैं भी उन्हें डॉ राम मनोहर लोहिया हास्पिटल लखनऊ में देखने गया था। चौधरी साहब अपने पुराने दिनों को याद करते हुए अपना एक संस्मरण बता रहे थे जो कुछ इस प्रकार था।
कांशीराम साहब VVIP गेस्ट हाउस में रुके हुए थे, सपा बसपा की गठबंधन की सरकार थी और साहब को दिल्ली जाना था और दोनों लोग गेस्ट हाउस से बाहर लखनऊ एयरपोर्ट के लिए निकलते हैं।
मान्यवर, चौधरी जी से कहते हैं कि एयर पोर्ट चलने के लिए गाड़ी कहाँ है?
चौधरी जी- साहब ये पोटिको में खड़ी लालबत्ती लगी एम्बेसडर आपके लिये ही है।
मान्यवर- लेकिन मैं तो मंत्री नही हूं, तो यह लाल बत्ती एम्बेसडर मेरे लिए कैसे हो सकती है?
चौधरी- नहीं साहब यह सब आपका ही है, यह भले ही मुझको एलाट की गई है, साहब यह सब तो आपकी ही देंन है।
मान्यवर- नहीं नहीं, वो पीछे दूर खड़ी पुरानी सफ़ेद कार किसकी है।
चौधरी- साहब वो मेरी गाड़ी है, जब मै मंत्री नहीं था तो उसी पुरानी गाड़ी से ही चलता था।
मान्यवर- तो ठीक है, ड्राइवर को बोलो हम तुम्हारी गाड़ी ही लेकर एयर पोर्ट चले, हम तो तुम्हारी इसी गाड़ी से एयरपोर्ट चलेंगे।
चौधरी- साहब की जैसी इच्छा। (साहब और चौधरी जी उसी पुरानी गाड़ी से एयर पोर्ट के लिए रवाना होते हैं, और लखनऊ कैंट एरिया मे प्रवेश करते हैं और चौधरी जी से पूछते हैं)
मान्यवर- चौधरी ये बताओ वो चौहान और निषाद दोनों मंत्री कहाँ है? (मुझे उस निषाद और चौहान मंत्री का नाम याद नहीं है)
चौधरी- साहब वो दोनों ही पीछे वाली गाड़ी मे बैठे हैं और पीछे पीछे आ रहे हैं।
मान्यवर- तो वो दोनों लाल बत्ती वाली गाड़ी से ही तो आ रहे है न?
चौधरी- हाँ साहब ,वो दोनों लाल बत्ती वाली गाड़ी से ही आ रहे हैं। (इतना सुनकर, मान्यवर साहब ने चौधरी की तरफ देखते हुए कहा)
मान्यवर- चौधरी, आज मेरा सपना पूरा हो गया, मैं यही चाहता था जो समाज मजदूरी कर रहा है, जो उत्पीड़ित हो रहा है, वह समाज शासक बने, लाल बत्ती वाली गाड़ी से चले। इतना कहते कहते मान्यवर साहब का गला रुध गया और वो फफक-फफक कर रोने लगे। चौधरी जी भी रोने लगे।
मित्रो मैं तो यह कहानी सुनकर हतप्रभ और निःशब्द हो गया, मेरा भी गला भर आया और आँखों में आंसू तैरने लगे। धन्य हो ऐसे महामानव तुम्हें कोटिशः प्रणाम। मित्रों यह बातें मैंने वही लिखी हैं, जो मैंने चौधरी साहब से सुनी थी। यूपी चुनाव 2017: सपा-बसपा और वोटबैंक
मणिपुर मे इरोम की हार का किसे दुख नहीं होगा… लेकिन सिर्फ काम और बिना माहौल बनाए राजनीतिक सफलता किसी को नहीं मिलती. इरोम ने पार्टी बनायी किंतु कोई राजनीतिक माहौल बनाने में नाकामयाब रहीं. अनशन के दिनों में भी मणिपुर में उन्हें ले कर कोई उत्तेजना नहीं थी. खैर! इरोम की हार से यह तो समझा ही जा सकता है कि कोई भी सामाजिक आन्दोलन का पक्षधर केवल और केवल अपने काम और समाज के प्रति चिंता के बल पर राजानीतिक प्रहरी नहीं बन सकता. अगर ऐसा हो सकता तो इरोम को अफनी सीट पर अपार बहुमत मिलना चाहिए था. किंतु उनके मौन संघर्ष और वर्षों के अनशन की कद्र नहीं हुई.
इस बार बी.एस.पी. ही नहीं अपितु कांग्रेस और सपा गठबंधन भी कुछ खास नहीं कर पाया. कांग्रेस केवल 7 सीटों पर सिमट कर रह गई और बसपा केवल 19 सीटों पर. ना राहुल चैन से रहे और न ही प्रियंका को आराम करने दिया. उनका दलित-कार्ड भी बेकार गया. उनका यह अभियान न केवल चर्चा का विषय बनकर रह गया बल्कि उनकी छवि के विपरीत ही गया. बीजेपी ने अपने तमाम शीर्ष नेताओं के जरिए न केवल वायदों के खूब गोले दागे अपितु नोटबन्दी को अमीरों के खिलाफ की गई कार्यवाही बताकर, गरीबों के हक में की गई एक सघन लड़ाई की संज्ञा देकर, गरीबों को अपने हक करने में सफलता प्राप्त कर ली. गरीबों ने ये सोचने की कवायद ही नहीं की कि नोटबन्दी यदि अमीरों के खिलाफ उठाया गया कदम है तो गरीबों को इसका क्या लाभ मिलेगा? यहाँ मुझे अपना ही एक शेर याद आ रहा है…
देखकर वादों की मणिका मालिकों के हाथ में, भुखमरी की मांग में सिन्दुर सा भर जाता है.
दिनांक 12.03.2017 को फेसबुक पर डा. विवेक कुमार लिखते हैं, “.एक्सिस माई इंडिया द्वारा चुनाव उपरांत किए गए सर्वे के अनुसार 2017 में उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभाई चुनावों में 62% ब्राह्मणों, 64% बनियों, 62% ठाकुरों, 55% कायस्थों ने भाजपा को वोट दिया है. इतना ही नहीं, सर्वे में यह भी उल्लिखित किया गया कि 57% कुर्मियों, 63% लोधियों, 60% अन्य पिछड़ा वर्ग वालों तथा 32% गैर-जाटव दलितों और 9% जाटवों ने भी भाजपा को वोट किया. इस प्रकार भाजपा मुसलमानों को एक भी टिकट न देने के बाद भी सर्वजन समाज का इन्द्रधनुषी गठबंधन बनाने में कामयाब हो गई.” तो क्या यह कहना न होगा कि न केवल तथाकथित उच्च जातियां दलितों और पिछड़ों की राजनीति के खिलाफ एक षड्यंत्र के तहत लामबन्द हुईं अपितु दलितों और पिछड़ों के एक अच्छे खासे वर्ग ने भाजपा को वोट किया. जिसका कारण बीएसपी सुप्रीमो मायावती का दलितों में केवल जाटवों और मुसलमानों के वोटों तथा सपा से केवल यादवों और मुसलमानों के वोटों पर ही ध्यान केंद्रित किया गया. इस प्रकार ज़ाटवों के इतर अन्य दलित जातियां और यादवों के इतर अन्य पिछड़ी जातियां भाजपा की झोली में जा पड़ीं.
इतना ही नहीं, बीएसपी की हार क्या हुई कि कुछेक दलित चिंतकों का कहना है कि मायावती ने अपनी यह स्थिति अपने आप पैदा की है. मुसलमानों को सौ टिकट देकर एक तरह से उन्होंने भाजपा की झोली में ही सौ सीटें डाल दी थीं. रही-सही कसर उन्होंने चुनाव रैलियों में पूरी कर दी, जिनमें उनका सारा फोकस मुसलमानों को ही अपनी ओर मोड़ने में लगा रहा था. उन्होंने जनहित के किसी मुद्दे पर कभी कोई फोकस नहीं किया. कुछ ने ये भी कहा कि तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह आज तक जननेता नहीं बन सकीं. आज भी वह लिखा हुआ भाषण ही पढ़ती हैं. इस संबन्ध में जहाँ मुझे याद आता कि बाबा साहेब अम्बेडकर का कहना था कि जहां तक हो सके लिखित भाषण को ही प्राथमिकता देनी चाहिए. इन लोगों को ये जान लेना चाहिए. यह भी एक स्वभाविक तथ्य है कि जीत के साथ अपने और पराए सब साथ खड़े हो जाते हैं और हार के साथ गैरों की तो बात क्या अपने भी विरोध में खड़े हो जाते हैं. ऐसे लोगों को ये नहीं भूलना नहीं चाहिए कि उत्तर प्रदेश में 2017 के विधान सभा चुनावों में सरकार विरोधी मत ही नहीं अपितु दलित विरोधी मत ज्यादा पड़े.
खैर! जो भी हो, बी.एस.पी. के शासन काल में खासा काम हुआ, किंतु संकीर्ण विचारधारा के चलते गैर-दलितों ने तो उन कामों की अनदेखी की ही, परंतु बी.एस.पी. भी अपने कार्यकाल में जनता से लगभग दूर ही रही. हाँ! जनता के हक में प्रशासन पर खूब डंडे बरसाए. दौरे पर दौरे किए. प्रशासन को आराम की नींद नहीं सोने दिया. यह पक्ष भी बी.एस.पी. के पक्ष में नहीं गया. बी.एस.पी. की सरकार आने के बाद जाति-भेद के दंश को झेलने से परेशान दलितों में चेतना का भाव भी आया था.
यू.पी. में बी.एस.पी. की हार का सबसे बड़ा कारण यह रहा कि इस बार सरकार विरोधी मत नहीं बल्कि दलित/पिछड़ों के विरोध में मत विभाजन हुआ. उदाहरण के तौर देखें तो पता चलता है कि बी.एस.पी. की हार केवल दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर ही नहीं हुई, अपितु मुसलमानों को आवंटित सीटों पर भी खासी पराजय का मुँह देखना पड़ा. मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के पाले में चला गया. न केवल इतना बल्कि दलित समाज की अन्य उपजातियों का लगभग शत प्रतिशत वोट भी भाजपा को गया है.
2017 के चुनावों में, दलित वोटों का तो बिखराव हुआ ही… मुसलमानों और गैर द्लितों के वोट भी बी.एस.पी. के खाते में नहीं आए. गैरदलित उम्मीदवार भी हार गए. क्या यह किसी सोची-समझी साजिश का हिस्सा है? प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि आरक्षित सीटों पर समाज विरोधी दलितों ने अन्य दलों के जाल में फंसकर बी.एस.पी. के खिलाफ काम किया. इस बार दलित मतदाताओं की बी.एस.पी. के साथ प्रतिबद्धता देखने को नहीं मिली और बीएसपी को मिलने वाला दलित वोट टुकड़ा-टुकड़ा हो गया.
इस चुनाव में बी.एस.पी. को केवल 19 सीटें मिली हैं. यदि अन्य दलों के खातों में गए दलित-मत भी बी.एस.पी. को मिल जाते तो उनकी संख्या कम से कम 100 तक हो सकती थी. यदि गैर-दलितों के मत भी बसपा को मिल जाते तो यह आँकड़ा 100 से ऊपर भी जा सकता था. बी.एस.पी. के आलाकमान को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बी.एस.पी. का जमीनी कार्यकर्त्ता नेतागिरी करने में ज्यादा लगा रहा, काम करने में कम. यहां तक कि वोटरों के घरों तक वोटर-पर्चियां तक नहीं पहुंचा पाए. और न ही चुनावों से पूर्व अपने मतदाताओं से मिलने की कवायद ही की. नतीजा ये हुआ कि बी.एस.पी. के वोटरों का लगभग 10-12 प्रतिशत वोट ही नहीं डाल पाया. यहां तक कि ज्यादातर वोटरों को अपने पोलिंग बूथ का ही पता नहीं था. इलाकाई कार्यकर्त्ताओं से पूछने पर भी कोई सकारात्मक उत्तर नहीं मिला. मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि यहां तक कि चुनाव की तारीख से दो दिन पहले तक उनमें से ज्यादातर के पास वोटर-लिस्ट भी उपलब्ध नहीं थी.
एक और भी दिक्कत है कि दलितों में शामिल कुछेक जातियां अपने आपको दलित मानने को ही तैयार नहीं हैं. संविधान के आर्टिकल 16.4 के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग भी दलितों में आता है. किंतु अफसोस कि वो अपने आप को ब्राह्मण ही मानने पर उतारू है जिसके चलते समूचे वंचित समाज का अनहित हो रहा है. मेरा मानना है कि यदि बी.एस.पी. और स.पा आपस में एक हो जाएं तो इनके हाथों में न केवल राज्यों की सता होगी अपितु केंद्रीय-सता भी इनके हाथों में ही होगी. पर इन्हें समझाए कौन? जरूरत है तो केवल निजित्व की भावना से उबरकर सामाजिक हितों की साधना हेतु काम करने की. गौरतलब है कि बीजेपी को इन चुनावों में लगभग 41.4 प्रतिशत वोट मिले हैं, बीएसपी को 22.2 प्रतिशत और सपा को 21.5 प्रतिशत मत मिले हैं. स्पष्ट है कि यदि बीएसपी और एसपी मिलकर चुनाव लड़ते तो उनका मत प्रतिशत लगभग 44 प्रतिशत होता. जो बीजेपी के मत प्रतिशत से अधिक होता. बीएसपी के लिए यह भी श्रेयकर होगा कि वो अपनी प्राथमिक संस्थाओं BAMCEF, BMM, BMP को साथ लेकर पुन: जनआंदोलन करें जिससे बीएसपी के साथ-साथ बहुजन समाज और लोकतंत्र दोनो की रक्षा को बल मिलेगा. कहीं सोची समझी रणनीति तो नहीं थी बसपा के पक्ष में मुस्लिम धर्मगुरुओं की अपील!
दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना अहमद बुखारी, प्रमुख शिया धर्मगुर और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य मौलाना कल्बे जव्वाद और पूर्वांचल के कुछ इलाकों में प्रभावशाली मानी जाने वाली राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल समेत कई मुस्लिम संगठनों तथा धर्मगुरुओं ने चुनाव में बसपा को समर्थन का ऐलान करते हुए मुसलमानों से इस पार्टी को वोट देने की अपील की थी.
इनके इस जुबानी समर्थन से बाग-बाग बहुजन समाज पार्टी अपनी जीत को बस अपने से कुछ कदम दूर मान रही थी. इस समर्थन के बाद पार्टी प्ररदेश के मुस्लिम बहुल जिलों में रामपुर, सहारनपुर, मुरादाबाद, अमरोहा, बरेली, आजमगढ़, मउ, शाहजहांपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ तथा अलीगढ़ की 77 सीटों पर उम्मीद लगाए बैठी थी. पार्टी को पूरा भरोसा था कि अगर इन सभी सीटों पर उसे दलितों और मुस्लिमों का वोट मिल जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में अपने बूते सरकार बनाने में सफल हो जाएगी. हालांकि चुनाव नतीजों में इस सीटों में से कुल चार सीटों पर ही बसपा को जीत मिल पाई.
चुनावी नतीजों के बाद बसपा हैरत में है. अब एक सवाल यह भी उठने लगा है कि तमाम मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा बसपा के पक्ष में अपील करना कहीं सोची समझी साजिश तो नहीं थी, जो बसपा के हार का कारण बनी. लोगों का मानना है कि इससे यूपी का चुनाव हिन्दू बनाम मुस्लिम हो गया. साथ ही दलित और ओबीसी समाज के हिन्दूवादी लोग भी भाजपा के साथ आ गए. और वहीं दूसरी ओर मुस्लिमों का वोट बसपा को नहीं मिलने से स्थिति और बिगड़ गई और पार्टी 19 सीटों पर पहुंच गई.
यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है कि जिन धर्मगुरुओं ने बसपा को समर्थन देने का ऐलान किया था उनकी राजनैतिक प्रतिबद्धता समय-समय अलग-अलग रही है. वह अपने फायदे के लिए अक्सर ऐसे ऐलान करते रहते हैं. यह भी माना जा रहा है कि इसमें कहीं न कहीं भाजपा का भी हाथ हो सकता है. कुलदीप नैयर सम्मान के दौरान रवीश कुमार का भाषण
पत्रकारिता जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार को एक बार फिर सम्मानित किया गया भाषाई पत्रकारिता के लिए स्थापित पहला कुलदीप नैयर सम्मान संजीदा पत्रकार रवीश कुमार को 19 मार्च को दिया गया। रवीश कुमार को कुलदीप नैयर सम्मान मिलने के बाद ओम थानवी जी ने उनके वक्तव्य को साझा किया है।
यहां पढ़ सकते हैं-
“एक ऐसे वक्त में जब राजनीति तमाम मर्यादाओं को ध्वस्त कर रही है, सहनशीलता को कुचल रही है, अपमान का संस्कार स्थापित कर रही है, उसी वक्त में ख़ुद को सम्मानित होते देखना उस घड़ी को देखना है जो अभी भी टिक-टिक करती है। दशकों पहले दीवारों पर टिक टिक करने वाली घड़ियां ख़ामोश हो गई। हमने आहट से वक्त को पहचानना छोड़ दिया। इसलिए पता नहीं चलता कि कब कौन सा वक्त बगल में आकर बैठ गया है। हम सब आंधियों के उपभोक्ता है। लोग अब आंधियों से मुकाबला नहीं करते हैं। उनका उपभोग करते हैं। आंधियां बैरोमीटर हैं, जिससे पता चलता है कि सिस्टम और समाज में यथास्थिति बरकरार है। …
असली डिग्री बनाम फ़र्ज़ी डिग्री के इस दौर में थर्ड डिग्री नए नए रूपों में वापस आ गई है। न्यूज़ एकंर हमारे समय का थानेदार है। टीवी की हर शाम एक लॉक अप की शाम है। एंकर हाजत में लोगों को बंद कर धुलाई करता है। एंकर हमारे समय का गुंडा है। बाहुबली है। हुज़ूर के ख़िलाफ़ बोलने वाला बाग़ी है। हुज़ूर ही धर्म हैं, हुज़ूर ही राष्ट्र हैं, हुज़ूर ही विकास हैं। प्राइम टाइम के लॉक अप में विपक्ष होना अपराध है। विकल्प होना घोर अपराध है। तथ्य होना दुराचार है। सत्य होना पाप है। इसके बाद भी आप सभी ने एक न्यूज़ एंकर को पहले पुरस्कार के लिए चुना है यह इस बात का प्रमाण है कि दुनिया में (पुरस्कार देने का) जोखिम उठाने वाले अब भी बचे हुए हैं। हम आपके आभारी हैं। …
गांधीवादी, अंबेडकरवादी, समाजवादी और वामपंथी। आंधियां जब भी आती हैं तब इन्हीं के पेड़ जड़ से क्यों उखड़ जाते हैं। बोन्साई का बाग़ीचा बनने से बचिये। आप सभी के राजनीतिक दलों को छोड़कर बाहर आने से राजनीतिक दलों का ज़्यादा पतन हुआ है। वहां परिवारवाद हावी हुआ है। वहां कोरपोरेटवाद हावी हुआ है। उनमें सांप्रदायिकता से लड़ने की शक्ति न पहले थी न अब है। फिर उनके लिए अफसोस क्यों हैं। अगर ख़ुद के लिए है तो सभी को यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। मैंने राजनीति को कभी अपना रास्ता नहीं माना लेकिन जो लोग इस रास्ते पर आते हैं उनसे यही कहता हूं कि राजनीतिक दलों की तरफ लौटिये। सेमिनारों और सम्मेलनों से बाहर निकलना चाहिए। सेमिनार अकादमिक विमर्श की जगह है। राजनीतिक विकल्प की जगह नहीं है। राजनीतिक दलों में फिर से प्रवेश का आंदोलन होना चाहिए। …
न्यूज़ रूम रिपोर्टरों से ख़ाली हैं। न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट में अच्छे पत्रकारों को भर्ती करने की जंग छिड़ी है जो वाशिंगटन के तहखानों से सरकार के ख़िलाफ़ ख़बरों को खोज लाएं। मैं न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट की बदमाशियों से भी अवगत हूं, लेकिन उसी ख़राबे में यह भी देखने को मिल रहा है। भारत के न्यूज़ रूम में पत्रकार विदा हो रहे हैं। सूचना की आमद के रास्ते बंद है। ज़ाहिर है धारणा ही हमारे समय की सबसे बड़ी सूचना है। एंकर पार्टी प्रवक्ता में ढलने और बदलने के लिए अभिशप्त है। वो पत्रकार नहीं है। सरकार का सेल्समैन है। .. प्रेस रिलीज तो पहले भी छाप रहे थे। फर्क यही आया है कि अब छाप ही नहीं रहे हैं बल्कि गा भी रहे हैं। यह कोई मुंबई वाला ही कर सकता है। चाटुकारिता का भी इंडियन आइडल होना चाहिए। पत्रकारों को बुलाना चाहिए कि कौन किस हुकूमत के बारे में सबसे बढ़िया गा सकता है। …
न्यूज़ चैनल और अख़बार राजनीतिक दल की नई शाखाएं हैं। एंकर किसी राजनीतिक दल में उसके महासचिव से ज़्यादा प्रभावशाली है। राजनीतिक विकल्प बनाने के लिए इन नए राजनीतिक दलों से भी लड़ना पड़ेगा। नहीं लड़ सकते तो कोई बात नहीं। जनता की भी ऐसी ट्रेनिंग हो गई है कि कई लोग कहने आ जाते हैं कि आप सवाल क्यों करते हैं। स्याही फेंकने वाले प्रवक्ता बन रहे हैं और स्याही से लिखने वाले प्रोपेगैंडा कर रहे हैं। पत्रकारिता का वर्तमान प्रोपेगैंडा का वर्तमान है। …” बसपा प्रमुख को चिट्ठी
आदरणीय मायावती जी,
सादर जय भीम।
उत्तर प्रदेश में बसपा हार गई है. हारी ही नहीं बल्कि बुरी तरह हार गई है. इतनी बुरी तरह; जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी. जल्दी ही यह भी साफ हो जाएगा कि वह कहां कितने वोटों से हारी और कहां किस नंबर पर रही. लेकिन बसपा का इस तरह हार जाना भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में बसे लाखों-करोड़ों अम्बेडकरवादियों तक को निराश कर गया है. हालांकि इस हार के बाद आपने ईवीएम की गड़बड़ी की तरफ इशारा करते हुए यह मांग की है कि पुरानी बैलेट प्रणाली के तहत चुनाव कराया जाए. मैं इसको लेकर आपका समर्थन करता हूं. संभव है कि बहुजन समाज पार्टी के विरोधी इस बात के लिए आप पर तंज कसें लेकिन उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि पूर्व में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी ऐसी ही मांग कर चुके हैं.
लेकिन आपके द्वारा ईवीएम में गड़बड़ी से इतर अगर यूपी चुनाव में बसपा की हार की समीक्षा की जाए तो एकबारगी समझ में नहीं आता कि चूक कहां हुई, क्योंकि जिस तरह की ग्राउंड रिपोर्ट थी उसमें बसपा की इतनी करारी हार की संभावना बिल्कुल नहीं थी. हां, आपको इस बारे में जरूर जानकारी होगी. इस हार के बाद क्या आपको नहीं लगता कि अब समय आ गया है कि बहुजन समाज पार्टी को भी अपनी चुनावी रणनीति बदलनी चाहिए. सीधी सी बात यह है कि वक्त बदल रहा है. इस बदलते वक्त में वोटर भी बदल रहा है और मुद्दे भी. क्या ऐसे में बसपा को भी चुनाव लड़ने का अपना तरीका नहीं बदलना चाहिए?
बहुजन समाज पार्टी जिस अम्बेडकरवादी विचारधारा की उपज है, आज भी समाज का एक बड़ा हिस्सा उससे अंजान है. यूपी के वोटरों में भी बहुसंख्यक लोगों को जो अनुसूचित जाति वर्ग से ताल्लुक नहीं रखते हैं इस विचारधारा से बहुत लगाव नहीं है. ऐसे में विचारधारा से इतर किन मुद्दों को सामने रखकर वोटरों को जोड़ा जाए बसपा को इस बारे में सोचना होगा. मीडिया के जिस रूख को लेकर आप और आपकी पार्टी के समर्थक लगातार मीडिया पर आरोप मढ़ते रहते हैं, पार्टी को उस बारे में भी सोचना चाहिए. मसलन यूपी जितने बड़े चुनाव के दौरान भी मीडिया से दूर रहना और अखबारों और चैनलों को इंटरव्यू नहीं देने से पार्टी को कितना नुकसान हुआ, आपको इस बारे में भी सोचना चाहिए. क्योंकि आज के वक्त में मीडिया की ताकत को नकारा नहीं जा सकता. ऐसा क्यों नहीं हो पाता कि आप मीडिया के सवालों का खुलकर सामना करें और अपना पक्ष रखें. एक सहज सवाल जनता के बीच से यह भी उठता है कि कई बार सत्ता में रहने के बावजूद बसपा आखिरकार अपना मीडिया खड़ा क्यों नहीं करती है और उसे किसने रोका है? जबकि बाबासाहेब से लेकर कांशीराम जी ने तमाम अभाव के बावजूद समाचार पत्रों (मीडिया) के महत्व को स्वीकार किया और उसे चलाया भी.
उत्तर प्रदेश में जब सभी पार्टी के नेता लगातार रोड शो कर जनता से ज्यादा से ज्यादा जुड़ने की कोशिश में जुटे थे आखिर आप इससे दूर क्यों रहीं? संभव है कि बहुजन समाज पार्टी में आस्था रखने वाले लोग अपने नेता यानि आपसे भी ऐसी उम्मीद कर रहे होंगे कि आप भी सड़क पर उतरें और ऐसा नहीं होने से उन्हें निराशा हुई होगी. जब यह दिख रहा था कि बाकी तमाम दल और नेता चुनाव में जीत हासिल करने के लिए अपना सबकुछ झोंक रहे हैं तब आप महज परंपरागत चुनावी रैलियों तक ही सीमित क्यों रही?
पता नहीं आप सोशल मीडिया को कितना देखती हैं, लेकिन आपसे एक बात कहना चाहूंगा कि वहां पर अम्बेडकरवादी विचारधारा में विश्वास रखने वाले लाखों युवा आपके लिए पागल हैं. क्या आपने इन युवाओं के लिए पार्टी में कोई जगह तलाशने की कोशिश की? जब तमाम पार्टियां युवा मोर्चा के बल पर अपनी पार्टी की जीत का आधार और भविष्य का नेता तैयार कर रही हैं, ऐसे में बहुजन समाज पार्टी में इन युवाओं के लिए जगह क्यों नहीं है? मैं इस बात से वाकिफ हूं कि तमाम युवा पार्टी में विभिन्न पदों पर सक्रिय हैं लेकिन 18 साल से 30 साल के वे युवा एक वोटर के अलावा पार्टी से खुद को कैसे जोड़े रखें और संवाद करें आपने इसकी गुंजाइश क्यों नहीं रखी. क्या युवा मोर्चा और इसी तरह के अन्य मोर्चों का सीधे तौर पर गठन करने में देर नहीं हो रही है?
क्या पता आपकी पार्टी को बहुजन बुद्धिजीवियों से क्या दिक्कत है, कोई दिखता ही नहीं है? न राज्यसभा में, न विधान परिषद में और न ही पार्टी संगठन में. न तो बतौर प्रवक्ता, न बतौर संगठनकर्ता और न ही बतौर रणनीतिकार. हालांकि मेरा यह मतलब नहीं है कि बाकी के लोग विद्वान नहीं हैं, लेकिन जिस तरह तमाम दलों ने चुनावी कार्यकर्ताओं से इतर विभिन्न क्षेत्रों मसलन मीडिया, विश्वविद्यालय, रंगकर्मी, लेखन आदि में सक्रिय लोगों को पार्टी से जोड़ कर रखा है, आप ऐसा करने में क्यों हिचकती हैं यह पार्टी से सहानुभूति रखने वाले हर व्यक्ति के लिए अबूझ पहेली बना हुआ है. उत्तर प्रदेश की चुनावी बेला में जब आप लगातार प्रेस रिलीज जारी कर अपनी बात रख रही थीं, कई बार ऐसा हुआ कि आपकी प्रतिक्रिया तब आई जब वो मुद्दा ठंडा हो चुका था. मुख्यमंत्री रहते आपने जो काम किए थे वह बेमिसाल थे, लेकिन आपके नेता और आपकी पार्टी मजबूती से इसे भी जनता को नहीं बता पाएं. अगर आपने कुछ बुद्धिजीवियों को पार्टी से जोड़ा होता तो आपको अपनी बात कहने में जरूर मदद मिली होती.
राजनीति भाषणों का खेल है. आप काम करें ना करें, आप कितना अच्छा बोलते हैं यह राजनीति की पहली शर्त है. इस कसौटी पर बहुजन समाज पार्टी काफी पीछे दिखती है. बसपा के नेता न तो टीवी पर अपनी बात रखते दिखते हैं और न ही समाचार पत्रों में कॉलम लिखते हैं. इस पर काम करने की बहुत जरूरत है. और हां, “मीडिया हमारी बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है” ऐसे तर्क अब पुराने हो चुके हैं. इसलिए ये सब कहने से अब काम नहीं चलने वाला है.
एक आखिरी बात. जब मान्यवर कांशीराम थे, एक वक्त ऐसा था जब बसपा दिल्ली, उत्तराखंड, पंजाब, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान आदि राज्यों में भी बढ़ती हुई दिख रही थी और अंदाजा लगाया जा रहा था कि आने वाले एक-दो दशकों में बसपा इन राज्यों में परचम लहरा सकती है. आज इन राज्यों में बसपा बढ़ना तो दूर खत्म होने के कगार पर है. और जिस उत्तर प्रदेश के लिए आपने इन सारे राज्यों को परे धकेल दिया था वह भी आपके हाथ से निकल गया है. क्या आप ईमानदारी से आत्मचिंतन करने और खुद में एवं पार्टी में बदलाव को तैयार हैं या फिर सिर्फ ईवीएम को कोस कर अपना दायित्व पूरा कर लेंगी??
सादर
अशोक दास
संपादक
(दलित दस्तक) क्या सुप्रीम कोर्ट दलित विरोधी है?
कोलकाता हाईकोर्ट के जज जस्टिस एस.सी. कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया है 8 फरवरी, 2016 को अवमानना नोटिस जारी होने के पश्चात सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को लिखे गए पत्र में जस्टिस कर्णन ने कहा कि मुझे सिर्फ इसलिए प्रताड़ित किया जा रहा है क्योंकि मैं दलित हूं. अपने आरोप के समर्थन में उन्होंने कई प्रक्रियागत तकनीकी पहलुओं का साक्ष्य दिया है.
जैसे-अवमानना की कार्रवाई हाईकोर्ट के कार्यरत जज के खिलाफ नहीं की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट को इसका अधिकार ही नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट का 8 फरवरी का आदेश कानून सम्मत नहीं है. अगर सुप्रीम कोर्ट को कोई शिकायत है तो वह मामला संसद में भेज सकता है. जस्टिस कर्णन ने यह भी कहा है कि सारी कार्रवाई से सुप्रीम कोर्ट की दलित विरोधी मानसिकता का पता लगता है. उन्होंने यह भी कहा है कि अपरकास्ट जज कानून हाथ में ले रहे हैं और अपनी न्यायिक शक्ति का प्रयोग Mala fide Intension से कर रहे हैं.
वैसे यह पहली बार नहीं है जब भारतीय राजव्यवस्था के किसी उच्च पदस्थ दलित अधिकारी ने अपने से उच्च सवर्ण अधिकारी पर दलित विरोधी मानसिकता से ग्रस्त होने या दलित होने के कारण प्रताड़ित किये जाने का आरोप लगाया हो. हां, हाईकोर्ट के किसी दलित जज ने सुप्रीम कोर्ट पर दलित विरोधी मानसिकता से ग्रस्त होकर कार्रवाई करने का आरोप पहली बार अवश्य लगाया है.
चूंकि आरोप स्वयं सुप्रीम कोर्ट पर है जिसे संविधान ने नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी है, इसलिए आम आदमी की नजर में यह मामला महत्वपूर्ण अवश्य हैं, लेकिन एक समाज-वैज्ञानिक के लिए यह मामला उसी तरह का है, जैसे किसी दलित चपरासी का अपने से उच्च सवर्ण अधिकारी पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाना या किसी दलित नौकरशाह का अपने प्रमुख सचिव या मुख्यमंत्री पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाना. क्योंकि सवर्णों के अन्दर दलितों के प्रति घृणा व बहिष्कार का स्थाई भाव समान रूप से व्याप्त है.
इसे प्रमाणित करने के लिए महज कुछ आंकड़े ही काफी हैं. मसलन, 2010 में न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन की सेवानिवृत्ति के पश्चात वर्तमान तक अर्थात पिछले 6 वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में कोई जज दलित समुदाय से नियुक्त नहीं किया गया. उच्च न्यायालयों में भी दलित जजों की संख्या गिनती की ही है, जबकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास ही है. इससे स्पष्ट है कि उच्च न्यायपालिका में दलितों का प्रवेश वर्जित है. प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट में कोई भी जज अन्य पिछड़े वर्ग या आदिवासी समुदाय से भी नहीं है. प्रश्न उठता है कि क्या संविधान लागू होने के 67 वर्षों बाद भी दलितों, आदिवासियों व अन्य पिछड़े वर्गों में से ऐसे लोग नहीं मिल रहे हैं जिसे उच्च न्यायपालिका में जज बनाया जा सके.
आइये अब कुछ ऐसे मुकदमों का उल्लेख करते हैं जो दलितों पर अत्याचार से सम्बन्धित थे तथा जिसमें न्यायालयों ने दलितों के विरोध में निर्णय दिया. बथानी टोला नरसंहार के अभियुक्तों को पटना उच्च न्यायालय ने इसलिए छोड़ दिया कि एफ.आई.आर 24 घण्टे के बाद दर्ज कराई गई थी. राजस्थान की भंवरी देवी सामूहिक बलात्कार में सभी अभियुक्तों को जयपुर उच्च न्यायालय ने यह कहकर मुक्त कर दिया कि अभियुक्त सवर्ण हैं, जो दलितों को छूते तक नहीं, तो वे अछूत महिला का बलात्कार कैसे कर सकते हैं.
आरक्षण नीति पर न्यायालय सदैव हमलावर रहा है. ‘मेरिट’ की रक्षा के नाम पर समानता व सामाजिक न्याय जैसे लोकतान्त्रिक मूल्यों की अवमानना करता रहा है. संविधान लागू होने के तुरन्त बाद उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण को ही असंवैधानिक घोषित कर दिया था. जिसे 1951 में बाबा साहेब अम्बेडकर के कानून मंत्री रहते ही प्रथम संविधान संशोधन के द्वारा पुनर्स्थापित किया गया.
जस्टिस कर्णन का सुप्रीम कोर्ट पर लगाया गया आरोप मात्र एक दलित जज का आरोप नहीं है बल्कि सम्पूर्ण दलित समुदाय की भावना की अभिव्यक्ति है. दलित समुदाय न्यायपालिका द्वारा ठगा हुआ महसूस कर रहा है. इस अनुभव को जितनी जल्दी सवर्ण समुदाय स्वीकार लेगा, भारतीय लोकतन्त्र के लिए उतना ही अच्छा होगा. 
