उरी में घुसपैठ की कोशिश नाकाम, जैश-ए-मोहम्मद के 5 आतंकी ढेर

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सेना दिवस मना रहे भारतीय जवानों ने जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए जैश-ए-मोहम्मद के 5 दहशतगर्दों को ढेर कर दिया है. आतंकियों की सुचना मिलते ही जम्मू-कश्मीर पुलिस और सीआरपीएफ ने संयुक्त अभियान चलाया. 5 फिदायीनों की मारे जाने की पुष्टि जम्मू कश्मीर पुलिस के डीजीपी एस पी वैद ने की है.

कश्मीर के आईजीपी ने बताया की, आतंकियों का एक गुट रात को उरी सेक्टर के दुलांजा छेत्र में घुसपैठ की कोशिश कर रहा था. सुरक्षाबलों ने उन्हें रुकने की चेतावनी भी दी लेकिन वो नहीं माने जिसके बाद सुरक्षाबलों ने उनकी घेराबंदी कर ली. अपने आप को घिरा देख आंतकवादियों ने सुरक्षाबलों पर फायरिंग करनी शुरू कर दी. मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने 5 आतंकीयों को मार गिराया. अभी भी वहां कुछ आतंकियों के छुप्पे होने की आशंका है जिनसे मुठभेड़ जारी है.

एसपी वैद ने इस कामयाबी के लिए सुरक्षा बलों को को बधाई दी है. जानकारी के मुताबिक अब तक छः में से कुल पांच आतंकियों के शव को बरामद कर लिया गया है. जबकि अन्य की तलाश जारी है. गृहमंत्री ने सुरक्षा बलों को इस कामयाबी के लिए बधाई दी है.

सुरक्षा बल अभी इस इलाके में खोजी अभियान चला रहे हैं. इस ऑपरेशन में भारतीय सुरक्षा बलों को किसी तरह के नुकसान की खबर नहीं है.

 

गन्धर्व गुलाटी

 

पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुनाथ झा का दिल्ली में निधन

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पटना: लंबे समय तक शिवहर जिले के अंबा गांव से विधायक और पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके रघुनाथ झा का दिल्ली में निधन हो गया है. उनके निधन से शिवहर सहित पूरे बिहार में शोक की लहर दौड़ गई है. उनका निधन किडनी की बीमारी के चलते हुआ. उनका पार्थिव  शरीर आज दोपहर 2.30 बजे दिल्ली से पटना लाया जाएगा , जहां उनके जिले शिवहर में अंतिम संस्कार किया जाएगा. 82 साल के रघुनाथ झा लालू प्रसाद यादव के करीबी माने जाते थे. उन्होने शिवहर में कई विकास कार्य किए जिसके कारण उन्हे शिवहर जिले का निर्माता कहा जाता था. उनके लिए कहा जाता है कि वे न केवल एक कुशल नेता बल्कि एक कर्मठ समाजसेवी भी थे. अपने कार्यकाल के दौरान वे गोपालगंज एवं बेतिया से सांसद भी चुने गए थे. रघुनाथ झा के निधन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पूर्र्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव एंव श्रीमती मीसा भारती ने पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुनाथ झा के निधन पर गहरा शोक वयक्त किया. उनके निधन पर तेजस्वी प्रसाद यादव ने कहा कि ईश्वर दिवंगत आत्मा की चिर शान्ति तथा उनके परिजनों अनुयायियों एवं प्रशंसकों को दुख की इस घड़ी में धैर्य धारण करने की शक्ति प्रदान करे.   पीयूष शर्मा

जन्मदिन विशेषः मायावती और वो 136 दिन का पहला शासन

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती (फाइल फोटो)

15 जनवरी को बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का जन्मदिन है. इस मौके पर दलित दस्तक आपके लिए उन 136 दिनों का इतिहास लेकर आया है, जब मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं.

जब प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने सुना कि मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन गईं, तब उनकी प्रतिक्रिया थी, यह लोकतंत्र में चमत्कार है. मायावती ने मुख्यमंत्री के रूप में जो सबसे पहला भाषण दिया, उसे सुनने के लिए दर्शकों के गलियारे में उनके निर्माता कांशीराम उपस्थित थे. बसपा नेता की उस समय की एक तस्वीर है, जब लखनऊ पहुंच कर देर से बधाई देते हुए उन्होंने अपनी आश्रिता को फूलों का गुलदस्ता भेंट किया था. उन दोनों के चेहरों पर दिखायी दे रहे भाव एक-दूसरे के प्रति उनकी भावनाओं की गहराई की दास्तान कह रहे थे.

मायावती के पहले सिर्फ तीन दलित मुख्यमंत्री बने थे. आंध्र प्रदेश में डी. संजीवैया, बिहार में राम सुंदर दास औऱ राजस्थान में जगन्नाथ पहाड़िया. इनमें से किसी एक में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे उस ऊंची जाति-व्यवस्था का विरोध कर सकें. अपने लिए इस मौके को मायावती ने दोनों हाथों से जकड़ लिया.

सुश्री मायावती और कांशीराम जी

नयी मुख्यमंत्री ने अपने अभियान की शुरुआत नये सिरे से नाम रखने के बड़े अनुष्ठान से की. दलित बहुजन समाज से नाम चुन कर उत्तर प्रदेश में चारों तरफ संस्थाओं, जिलों और इमारतो पर चिपका दिए गये. मायावती का सबसे महत्वकांक्षी और साहसिक काम था, राज्य की राजधानी के बीचों-बीच दलित बहुजन नेताओं के सम्मान में 28 एकड़ का एक विशाल अम्बेडकर पार्क और परिवर्तन चौक बनवाना.

यह सिर्फ एक किस्म की जिद का नतीजा नहीं था, बल्कि यह दलितों को इस बात का विश्वास दिलाने की सोच-समझ कर की गई चेष्टा थी कि भारतीय समाज की नीची श्रेणियों के लिए ऊंचे वर्ग को सबक सिखाना भी मुमकिन था. इससे दलितों के लिए एक बात साफ हो गई कि वे पहली बार शासन प्रणाली में हिस्सेदार थे. उदाहरण के लिए अनुसूचित जाति के अफसरों को आधे जिलों में मजिस्ट्रेट के पद पर बैठाने से और उत्तर प्रदेश में एक चौथाई से ज्यादा पुलिस चौकियों का चार्ज देने के फैसले ने राज्य के दलितों को एक ऐसी सुरक्षा का अहसास कराया. जो उन्होंने कभी पहले कभी महसूस नहीं किया था.

1990 में बसपा के समर्थन से सत्ता में आने पर मुलायम सिंह ने अम्बेडकर ग्रामीण योजना शुरू की थी, वह योजना निर्जीव पड़ी थी. मायावती ने उसी निर्जीव योजना को फिर से चालू किया. उन गांवों में जिनमें अनुसूचित जातियों की जनसंख्या तीस प्रतिशत या ऐसे इलाके जिनमें इससे भी कम यानी बाईस प्रतिशत थी, उन्होंने ढेर सारे सरकारी संसाधन भेजे. इससे दलित प्रधान गांव जो अब तक सबसे खराब हालत में थे, एकदम से सबसे ज्यादा सुविधा प्राप्त इलाके हो गए. जो इलाके परंपरा से धनराशि के लिए तरसते थे, वहां अचानक पक्की सड़कें, हैण्ड पम्प, दवाखाने औऱ पक्के घर दिखायी देने लगे. काफी जगह तो सड़कें उन्हीं हिस्सों में पक्की की गयीं जो दलितों के गांवों से गुजर रहीं थी, और जहां दूसरी जातियों के लोग रहते थे, वहां ऊबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते छोड़ दिए गए. आश्चर्य नहीं कि ऊंची और मध्यवर्ती जातियों ने बहुत शोरगुल मचाया. मगर यह शोर-गुल अपने आप में उस समुदाय के लिए एक सुरीले गीत सरीखा था, जिसे सदियों से सुखों से वंचित रखा गया था.

अनुसूचित जातियों की उपजाति वाल्मीकि समाज के बच्चों को उदारतापूर्वक शैक्षिक अनुदान दिये गए. साथ ही एक पुनर्वास योजना की घोषणा की गयी, जिसके माध्यम से उनके पुश्तैनी व्यवसाय से अलग उन्हें अन्य रोजगारों के लिए प्रशिक्षण दिया जाना था. नाविकों और कुम्हार समुदायों के लिए विशेष ढंग के काम किए गये जिनसे उन्हें अपने व्यवसाय और कला में लाभ मिले. मायावती ने मुस्लिम बच्चों को वे सारे शैक्षिक अनुदान देने का प्रस्ताव किया जो उन्होंने अनुसूचित जातियों को दिए थे.

मुसलमानों ने मायावती सरकार के इन भावों की सराहना तो की ही, परंतु जिस बात ने वास्तव में उनका दिल जीत लिया था वह थी, सितंबर 1995 में विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यक्रम को मायावती द्वारा रोक दिया जाना.

मथुरा में विश्व हिन्दू परिषद एक कृष्ण मंदिर के साथ जुड़ी मस्जिद को हटाने के लिए आंदोलन कर रही थी. लखनऊ में मायावती की सरकार को भाजपा समर्थन दे रही थी, जिस कारण उसे यकीन था कि कृष्ण जन्मोत्सव के दिन हिन्दुओं की उग्र भीड़ मस्जिद वाली जगह पर कब्जा कर लेगी. स्थिति भयानक हो चुकी थी, वहां अयोध्या की बाबरी मस्जिद जैसा माहौल बन जाने का डर दिखायी पर रहा था. लेकिन मायावती ने आगे बढ़ कर उस स्थिति को संभाला.

अपनी सरकार की भाजपा के समर्थन पर निर्भरता के बावजूद सबसे पहले उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद की धमकियों के सामने डर कर झुकने से इंकार कर दिया. और विश्व हिन्दू परिषद को विवादग्रस्त स्थल से तीन किलोमीटर पीछे रह कर कृष्ण जन्मोत्सव को मनाने को मजबूर कर दिया. लेकिन इसी मथुरा कांड ने मुख्यमंत्री के रूप में मायावती के शासन का अंत होने की पटकथा लिख दी. स्थानीय भाजपा नेता कल्याण सिंह शुरू से ही मायावती के विरोधी थे. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी अब ऐसे नेता और पार्टी का समर्थन नहीं करेगी जो खुले आम संघ परिवार के हित की विरोधी हो. तो दूसरी ओर गुजरात के भाजपा नेता शंकर सिंह वघेला ने भाजपा द्वारा मायावती सरकार को समर्थन देने का विरोध कर दिया. पार्टी के शीर्ष नेता पार्टी के अंदर के इस विरोध को अनदेखा नहीं कर पाएं और 18 अक्टूबर 1995 को जब मायावती ने सत्ता में अपने 136 दिन पूरे कर लिए थे, भाजपा ने समर्थन वापसी की घोषणा कर दी.

  • तमाम तथ्य अजय बोस जी की पुस्तक ‘बहन जी’ से भी.

सोशल मीडिया में उबाल, क्या जस्टिस कर्णन को दलित होने की सजा मिली थी

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में जजों के साथ हो रहे भेदभाव को लेकर इसके चार जजों के सामने आने के बाद जहां देश में बड़ी बहस छिड़ गई है तो वहीं, न्यायपालिका में दलित औऱ पिछड़े समाज के न्यायधीशों की गैरमौजूदगी और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने पर दलित समाज से आने वाले जस्टिस कर्णन को जेल भेजे जाने पर बहस छिड़ गई है. खासकर देश के चीफ जस्टिस के विरोध में सामने आए चार में से दो जजों के यह कहने पर कि वो जस्टिस कर्णन पर दिए फैसले में नियुक्ति फैसले को फिर से देखने के पक्ष में थे, जस्टिस कर्णन को मिली सजा पर विवाद शुरू हो गया है. इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर भी न्यायपालिका और जस्टिस कर्णन को मिली सजा पर बहस छिड़ गई है.

संजय कुमार ने जस्टिस कर्णन की एक फोटो शेयर करते हुए लिखा है- जस्टिस कर्णन अपनी बेदाग कमीज दिखाते हुए. लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना इन्हें भारी पड़ा और छः महीने की सजा भुगतनी पड़ी और कमीज को दाग लगाने की कोशिश हुई. सुना कि कल जस्टिस कर्णन प्रेस कांफ्रेंस देखकर मुस्करा रहे थे क्योंकि उनके खिलाफ निर्णय लेने में ये 4 जस्टिस महोदय भी थे.

तो लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर काली चरण स्नेही ने लिखा है- जस्टिस कर्णन को क्या दलित होकर न्याय की बात कहने की सजा मिली थी? क्या दलितों की बात कहीं भी नहीं सुनी जाएगी?

न्यायपालिका में जजों की भर्ती और जस्टिस कर्णन और फिर लालू प्रसाद यादव को लेकर दिए गए फैसले पर लगातार टिप्पणी करने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने न्यायपालिका में जातिवाद का मुद्दा उठाते हुए लिखा है-

जस्टिस दीपक मिश्रा ने जस्टिस अरुण मिश्रा से कहा कि लालू यादव का फ़ैसला आप कीजिए. मिश्रा जी ने मिश्रा जी के मन का फ़ैसला दे दिया. हर केस की अलग अलग सुनवाई और 9 महीने में केस निपटाने का आदेश. नीचे की अदालत ने सुप्रीम कोर्ट का मूड भांप लिया. अब नीचे के मनचाहे फ़ैसले आने लगे. इस तरह भारत में हो रहा है न्याय. बीजेपी को दीपक मिश्रा पसंद है.

देशभर में छुआछूत के आंकड़े आए सामने

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नई दिल्ली: दशकों पहले कानूनी तौर पर आपराधिक धोषित की जा चुकी छुआछूत की प्रथा के आकड़े देखकर आप दंग रह जाएंगे. हाल ही में सोशल एटिट्यूड रिसर्च ऑफ इंडिया द्वार किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार शहरी राजस्थान में 50%, शहरी उत्तर प्रदेश में 48% और दिल्ली में 39% तक छुआछूत का चलन है. इसके अलावा राजस्थान और उत्तर प्रदेश के दो तिहाई हिस्सों में यह कुप्रथा आज भी कायम है. यह सर्वे यूनिवर्सिटी ऑफ टैक्सेस और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी द्वारा किया गया था. इस दौरान फोन के ज़रिए दिल्ली, मुंबई, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के लगभग 8,065 लोगो का इंटरव्यू लिया गया, जिसमे छुआछूत, दलित उत्पीड़न, और अंतरजातीय विवाह पर सवाल किये गये. जिसके बाद इसकी रिपोर्ट इकोनॉमिक एंड़ पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित की गई. सर्वेक्षण करने वाले अमित थोराट का कहना है कि यह प्रवृत्ति देश के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए बड़ी चुनौती है और इससे समाज की मानसिकता और भी बदतर होती दिख रही है. बरहाल, इस सर्वेक्षण से जो आंकड़े सामने आए हैं वह शर्मनाक है. आज भी ऐसी कुरीतियां हमारे समाज को जकड़े हुई हैं. और हम विकसित देश बनने का सपना देख रहे हैं. समझ में यह नहीं आता कि जब संविधान छुआछूत जैसी कुप्रथा को आपराधिक करार देता हैं तो ये लोग जो इन कुरीतेयों को बढ़ावा देते हैं उनके उपर ज़मीनी स्तर पर आखिर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की जाती.   पीयूष शर्मा

आदिवासी समाज के संघर्ष से झुकी छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार

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छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की मुहिम आखिरकार रंग लाई है. संगठित आदिवासियों के भाजपा सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने के फैसले से घबराई रमन सिंह सरकार ने आखिरकार भू-राजस्व संशोधन विधेयक को वापस लेने का फैसला लिया है. इस संशोधन विधेयक के जरिए राज्य सरकार ने आदिवासियों की जमीन विकास कार्यों के लिए अधिग्रहित और खरीद फरोख्त करने का फैसला लिया था. जिसके बाद आदिवासी समाज ने इसे भारतीय संविधान का उल्लंघन करार देते हुए विरोध शुरू कर दिया था.

इस बिल में संसोधन को लेकर राज्य के आदिवासी मंत्रियों समेत प्रदेश के कई कद्दावर मंत्रियों ने आदिवासी समाज को समझाने की कोशिश की, लेकिन सर्व आदिवासी समुदाय ने राज्य सरकार के तमाम दावों को खारिज कर आंदोलन का रुख अख्तियार करने का फैसला कर लिया था.

राज्य में इस संशोधन के भारी विरोध के बीच आखिरकार मजबूरी में छत्तीसगढ़ सरकार ने गुरुवार 11 जनवरी को कैबिनेट की बैठक बुलाकर इसे वापस ले लिया. भू- राजस्व संहिता संशोधन विधेयक में आदिवासियों की जमीन लिये जाने का कानून पिछले शीतकालीन सत्र में पारित किया गया था. इसके बाद से ही आदिवासी समुदाय लगातार इस कानून का विरोध कर रहा था.

आदिवासी समाज के साथ-साथ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी सरकार के खिलाफ लामबंद हो गई थी, तो वहीं बीजेपी के कई नेता भी इस बिल का लगातार विरोध कर रहे थे. कांग्रेस ने तो इसे आदिवासियों के लिए काला कानून तक करार दे दिया था. छत्तीसगढ़ में इस साल के अंत में ही चुनाव होने हैं, ऐसे में राज्य की बीजेपी सरकार कोई भी जोखिम लेने को तैयार नहीं है. तो वहीं सरकार के पास आदिवासियों की एकजुटता के आगे झुकने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं था.

 इस बिल की वापसी से प्रदेश में आदिवासी समाज ने जहां एक बार फिर अपनी ताकत का अहसास करा दिया है तो यह भी साफ संदेश दे दिया है कि आदिवासी समाज के खिलाफ जाकर कोई भी राजनीतिक दल छत्तीसगढ़ की राजनीति में सफल नहीं हो सकती.

Dalit Dastak

यहां लगी है बलात्कार पीड़िताओं के कपड़ों की प्रदर्शनी

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अकसर देखा जाता है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़ित महिलाओं पर ही आरोप लगा दिए जाते हैं. कह दिया जाता है कि अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के लिए वो खुद भी ज़िम्मेदार हैं. बलात्कार या यौन हिंसा के पीछे कई बार उनके ‘भड़काऊ’ कपड़ों को वजह बता दिया जाता है. इस धारणा को तोड़ने के लिए बेल्जियम में एक अनोखी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया. यहां वे कपड़े प्रदर्शित किए गए जो बलात्कार के वक़्त पीड़िताओं ने पहन रखे थे.

ब्रसेल्स के मोलेनबीक ज़िले में लगाई गई इस प्रदर्शनी को ‘इज़ इट माय फॉल्ट?’ यानी ‘क्या ये मेरी गलती थी?’ नाम दिया गया है. इन कपड़ों में कई ट्रैकसूट बॉटम, पजामे और ड्रेस शामिल थीं, जो पीड़िताओं ने आयोजकों को दी थीं. इस प्रदर्शनी का आयोजन पीड़ित सहायता समूह सीएडब्ल्यू ईस्ट ब्राबेंट की ओर से किया गया था. इस प्रदर्शनी में साफ देखा जा रहा है कि वो कपड़े बहुत हीसाधारण है, और उसे हर कोई पहनता है.

रिपोर्ट के मुताबिक बेल्जियम में होने वाले बलात्कारों के केवल 10 फीसदी मामले ही पुलिस में रिपोर्ट किए जाते हैं और 10 में से एक में ही आरोपी को सज़ा होती है. सीएडब्ल्यू की लिसवेथ केन्स का कहना है कि हमारा समाज ही पीड़िताओं को अपने साथ हुए ग़लत बर्ताव को बताने से रोकता है. केन्स कहती हैं, “पीड़िताओं पर ही उत्तेजक कपड़े पहनने, फ्लर्ट करने या देर रात घर आने का आरोप लगा दिया जाता है, जबकि उस अपराध का ज़िम्मेदार सिर्फ वो अपराधी होता है.” फिलहाल ये अनोखी प्रदर्शनी बलात्कार पीड़िताओं के दर्द की कहानी बयां कर रहा है.

Dalit Dastak

दिल्ली मेट्रो : महिला कूपे में चढ़ने पर कटा 9000 पुरुषों का चालान

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नई दिल्ली  दिल्ली में ज़्यादा तर लोग दफतर या कॉलेज जाने के लिए मेट्रो का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन यात्रियों के लिए दिल्ली मैट्रो के नियम और कानून काफी सख्त हैं. हालहीं में नियम और कानून का उलंघन करने वाले यात्रियों से मोटी रकम वसूली गई है. बता दें कि ये रकम जुर्माने के तौर पर वसूली गई है.

दरअसल, दिल्ली मेट्रो के महिला कोच में जाने-अनजाने पुरुष घुस जाते हैं, जिनका उन्हें भारी जुरमाना देना पड़ता है. दिल्ली पुलिस के मुताबिक साल 2017 के अंत तक 9000 चालान काटे गए हैं. ये चालान राष्ट्रीय राजधानी में 153 मेट्रो स्टेशनों पर काटे गए.

एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली मैट्रो में रोज़ाना सफर करने वाले यात्रियों की संख्या 27 लाख के आस-पास है. अपकी जानकारी के लिए बता दें कि पिछले दिनों मैट्रो किराये में हुई भारी बढ़ोतरी के बाद रोज़ाना सफर करने वालों कि संख्या में कमी देखी गई है. लेकिन अब भी तकरीबन 24 लाख लोग रोज मैट्रो का सफर करते हैं.

दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, महिला डिब्बों में यात्रा करने वाले 9003 लोगों का चालान काटा गया और मेट्रो में नशे की हालत में यात्रा करने पर 2,399 लोगों के खिलाफ मामला चलाया गया. ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए मेट्रो पुलिस के लिए आठ नए पुलिस स्टेशन भी बनाए गए हैं.

गंधर्व गुलाटी

पश्चिम बंगाल, गुजरात के बाद अब यूपी में बीजेपी को मिला झटका

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उत्तर प्रदेश:गुजरात में मेहसाणा नगरपालिका सीट और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की पूर्व विधायक मंजू बसु का विशवास हारने के बाद अब उत्तर प्रदेश में भाजपा को भारी झटका लगा है. गोरखपुर से सटे कुशीनगर जिले के बीजेपी के दो पूर्व विधायकों ने आज समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है.
इसमें यूपी के सेवरही विधान सभा क्षेत्र के पूर्व विधायक नंद किशोर मिश्र और नौरंगिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे शंभू चौधरी, बीजेपी छोड़कर सपा में शामिल हो चुके हैं. इन दोनों नेताओं को खुद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी की सदस्यता दिलाई. वहीं बसपा के पूर्व विधायक ताहिर हुसैन की भी सपा में जुड़ने की खबर है. इसके अलावा 2017 में बीजेपी से विधानसभा चुनाव लड़ने वाले आरके चौधरी, जिन्होने अखिलेश यादव की मौजूदगी में अपनी पार्टी डीएस-4 बनाई थी, सपा में विलय कर चुके हैं. इस सबके बीच उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि यूपी में अपराध बड़ता जा रहा है, लोगों पर अत्याचार हो रहे हैं और पुलिस कुछ नहीं कर रही है. ऐसे में उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो उथल पुथल हुई है 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है.   पीयूष शर्मा

लालू की सिफारिश करने वाले कलैक्टर पर सीएम योगी की नज़र

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नई दिल्‍ली : जेल होने के बाद भी लालू प्रसाद यादव पर राजनीति खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. लालू के बाद अब निशाना लालू को बचाने वालों पर है. इसमें सबसे पहला नाम उत्‍तर प्रदेश के जालौन के कलैक्टर  डा. मन्नान अख्तर का है. जिन्होने लालू प्रसाद यादव का केस देख रहे सीबीआइ के स्‍पेशल जज शिवपाल सिंह को फोन किया था. शिवपाल सिंह के मुताबिक डीएम डा. मन्नान अख्तर ने उन्हे फोन करके कहा था कि  ‘आप लालू का केस देख रहे हैं, जरा देख लीजिएगा.’ इस मामले में मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने जांच  के आदेश दे दिए हैं और जल्‍द से जल्‍द रिपोर्ट सौंपने को कहा है. शिवपाल सिंह खुद उत्तर प्रदेश स्थित जालौन जिले के शेखपुर खुर्द गांव से हैं. इससे पहले गांव में ज़मीनी विवाद के चलते जज ने डीएम से मदद मांगी थी, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला था. इतना ही नहीं 12 दिसंबर, 2017 को डीएम और एसपी से शिकायत करने पर डीएम ने कहा, ‘आप झारखंड में जज हैं न, आप कानून पढ़कर आएं. उन्होंने यह भी कहा कि वे एसडीएम के आदेश को नहीं मानेंगे.’ बरहाल, जालौन के डीएम डा. मन्नान अख्तर ने जज से लालू प्रसाद यादव की सिफारिश करने की बात से साफ इंकार कर दिया है. उन्होने यह भी बताया कि जिस तारीख पर फोन करने का जिक्र किया गया है, वे उस वक्‍त छुट्टी पर थे. मीडिया को संबोधित करते हुए मन्नान अख्तर ने साफ किया उन्होंने किसी की सिफारिश नहीं की है.   पीयूष शर्मा

प्‍लास्टिक का राष्ट्रीय झंडे किया इस्‍तेमाल तो हो सकती है जेल

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नई दिल्ली देश में प्लास्टिक से बनाए जाने वाले राष्ट्रीय झंडे का इस्तेमाल, खरीद या बिक्री कि तो आपको कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा सकता है और आपको जेल भी हो सकती है. गृहमंत्रालय ने इस संबंध में सभी राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों को फ्लैग कोड का कड़ाई से पालन करने का आदेश दिया है.

गृहमंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘‘हम जल्दी ही प्लास्टिक से बने राष्ट्रीय ध्वजों पर प्रतिबंध का आदेश जारी करेंगे’’. मंत्रालय ने सभी लोगों से आग्रह भी किया कि वह प्लास्टिक के बने राष्ट्रीय झंडे का उपयोग न करें. इतना ही नहीं एडवाजरी भी जारी की है राष्ट्रीय ध्वज देश के लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को दर्शाता है और इसलिए इसे सम्मान प्राप्त होना चाहिए.

मंत्रालय ने ध्यान दिलाते हुए कहा के महत्वपूर्ण अवसरों पर कागज के तिरंगे की बजाय प्लास्टिक के तिरंगे का इस्तेमाल किया जा रहा है. परामर्श के मुताबिक, चूंकि प्लास्टिक से बने झंडे लंबे समय तक नष्ट नहीं होते हैं और ये वातावरण के लिए हानिकारक होते हैं. प्लास्टिक से बने राष्ट्रीय झंडों का सम्मानपूर्वक उचित निपटान सुनिश्चित करना एक समस्या है. इसके अलावा, गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के बाद अक्सर प्लास्टिक से बने ध्वजों के सड़कों और गटरों पर पड़े पाए जाने की शिकायतें आती हैं.

ऐसे में झंडों का निपटारा उनकी मर्यादा के अनुरूप एकांत में किया जाए. प्लास्टिक से बने झंडे का उपयोग ना करने के बारे में व्यापक प्रचार इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के साथ किया जाए.

 

गंधर्व गुलाटी

   

अब सिनेमा घरों में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं  

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नई दिल्ली। 30 नवंबर 2016 को मध्य प्रदेश के रहने वाले श्याम नारायण चौकसे की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमाहॉल में फिल्म से पहले राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था ‘राष्ट्रगान को लोगों में देशभक्ति जगाने का एक अहम ज़रिया है’. लेकिन कल 09 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बदलाव किया है, जिसके तहत अगर हॉल मालिक चाहें तो राष्ट्रगान बजा सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने रुख में बदलाव करते हुए ये भी कहा, “लोगों में देशभक्ति जगाना कोर्ट का काम नहीं है. सरकार अगर हमारे आदेश को सही मानती है तो खुद नियम बनाए. कोर्ट के कंधे का इस्तेमाल न करे.”

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड की तीन सदस्यीय बेंच ने उस हलफनामे को स्वीकार किया जिसमे केंद्र सरकार ने राष्ट्रगान से जुड़े सभी पहलुओं को देखने के लिए 12 सदस्यों की कमिटी का गठन करने को कहा है. कमिटी में कई मंत्रालयों के आला अधिकारी शामिल हैं. ये कमेटी छह महीने में राष्ट्रगान को लेकर नियमों में बदलाव पर रिपोर्ट देगी.

केंद्र की तरफ से एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सुझाव दिया कि इस दौरान हॉल में राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को खत्म कर दे. इस सुझाव को स्वीकार कोर्ट ने कहा, “थिएटर चलाने वाले चाहें तो फ़िल्म से पहले राष्ट्रगान चला सकते हैं. अगर वो ऐसा करते हैं तो हॉल में मौजूद लोगों को उस दौरान खड़ा होना होगा. दिव्यांग लोगों को इससे छूट हासिल होगी.”

कोर्ट ने ये भी कहा कि वो मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई बंद कर रहा है. इससे साफ है कि अब ये सरकार को ही तय करना है कि भविष्य में सिनेमा हॉल या दूसरी जगहों में राष्ट्रगान अनिवार्य होगा या नहीं.

गंधर्व गुलाटी

   

विश्व पुस्तक मेले में अम्बेडकरी आवाज

विश्व पुस्तक मेले में दलित दस्तक का स्टॉल, हॉल नं-12, स्टॉल- 97

नई दिल्ली। दिल्ली के प्रगति मैदान में किताबों की दुनिया सजी है. दिल्ली के प्रगति मैदान में विचारों की दुनिया सजी है. तरह-तरह के लोग, अलग-अलग विचारों के लोग यहां मौजूद हैं. पुस्तक मेले में बीते एक दशक में तेजी से फैले अम्बेडकरी आंदोलन का भी खासा जोर है. हॉल नंबर 12 में स्टॉल नंबर 97 पर भी खासी हलचल है. यहां हर साल की तरह दलित दस्तक भी अपनी मैगजीन और किताबों के साथ विश्व पुस्तक मेले में दस्तक दे रहा है. जहां देश के तमाम हिस्सों से लोग पहुंच रहे हैं.

राकेश कबीर के काव्य संग्रह नदियां बहती रहेंगी का विमोचन दलित दस्तक के स्टॉल पर हुआ.

अम्बेडकरी आंदोलन के प्रमुख प्रकाशन सम्यक प्रकाशन औऱ गौतम बुक सेंटर का स्टॉल भी हॉल नंबर 12 में ही सजा है, जहां अम्बेकरवादियों का तांता लगा हुआ है. तमाम स्टॉल पर पाठकों की भीड़ है. तो साहित्य के दिग्गज भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं. दलित दस्तक के स्टॉल पर लोग पत्रिका की वार्षिक सदस्यता भी ले रहे हैं, ताकि उन्हें दलित दस्तक पूरे साल घर बैठे मिल सके. दलित दस्तक के स्टॉल पर दलित साहित्य की चर्चा भी जोरो पर है.

दलित दस्तक के स्टॉल पर वरिष्ठ साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय, अनिता भारती, एच.एल. दुसाध, कौशल पंवार, शांति स्वरूप बौद्ध, हीरालाल राजस्थानी, डॉ. पूरन सिंह, राकेश कबीर और चित्रकार लाल रत्नाकर जैसे साहित्यकार अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं. विश्व पुस्तक मेला लेखकों के लिए भी एक खास मौका होता है. इस दौरान तमाम नई किताबों का विमोचन होता हैं. उभरते कवि राकेश कबीर भी इनमें से एक हैं. दलित दस्तक के स्टॉल पर उनके पहले कविता संग्रह ‘नदियां बहती रहेंगी’ का विमोचन हुआ. युवा लेखिका कौशल पंवार की पुस्तक जोहड़ी का विमोचन भी इसी पुस्तक मेले में हुआ. खास यह है कि स्त्री विमर्श के इस कहानी संग्रह का प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया. इसका विमोचन अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले के उद्घाटन के दिन खुद एनबीटी ने ही किया.

दलित दस्तक के प्रकाशन ‘दास पब्लिकेशन’ की नई पुस्तक ‘करिश्माई कांशीराम’ के साथ दलित दस्तक के संपादक अशोक दास

हालांकि इस बीच अम्बेडकरी साहित्य छापने वालों पर एक खास वर्ग की नजर टेढ़ी है. अम्बेडकरी साहित्य के बढ़ते प्रभाव के कारण लोग आडंबर और अंधविश्वास से बाहर आ रहे हैं. हिन्दुवादी विचारधारा के वाहकों को यह खटकने लगा है. और उन्हें धमकियां मिलने लगी है. कुल मिलाकर विश्व पुस्तक मेले में वैचारिक बहस जारी है. और हॉल नंबर 12 में दलित दस्तक का स्टॉल नंबर 97 भी इस बहस के केंद्र का एक हिस्सा है, जहां पाठक पहुंच रहे हैं. पुस्तक मेला 6 जनवरी से शुरू है और 14 जनवरी तक चलेगा.

बौद्ध धर्म अपनाएंगे उना के पीड़ित

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Una Dalit Victimनई दिल्ली। गुजरात के उना तहसील में गौरक्षकों द्वारा पीटे जाने वाले दलित परिवारों ने बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला किया है. उना के मोटा समधियाला गांव के सात दलितों को मरी हुई गाय की खाल उतारने के बाद उन्मादी गौ-रक्षकों ने काफी बर्बरता से पीटाई की थी. खास तौर पर चार दलितों को शहर ले जाकर उन्हें गाड़ी से बांध कर पीटा गया था.

गोरक्षकों के समूह ने जिन चार लोगों की पिटाई की थी, उसमें तीन भाई थे. उनमें से सबसे बड़े भाई वशराम सरवैया ने बौद्ध धर्म अपनाने के बारे में फैसला किया है. सरवैया का कहना है कि मरे पशुओं की खाल उतारने के पेशे की वजह से हमें काफी भेदभाव का सामना करना पड़ा है. न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के जरिए आई खबर के हवाले से सरवैया ने इस संबंध में घोषणा की है. हालांकि उन्होंने धर्म परिवर्तन की तारीख तय नहीं की है लेकिन समुदाय के सदस्यों के साथ आने के बाद बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म अपनाने को कहा है.

सरवैया ने आरोप लगाया कि सरकार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल द्वारा किये गए वादे के अनुरूप मुकदमा चलाने के लिये विशेष अदालत का गठन नहीं किया. राज्य सरकार ने पीडि़तों को नौकरी और जमीन का एक टुकड़ा देने का अपना वादा भी पूरा नहीं किया. आरोपी जमानत पर रिहा होने के बाद खुला घूम रहे हैं और मामला खिंच रहा है. सरवैया ने कहा कि ज्यादातर आरोपियों के जमानत पर बाहर होने की वजह से परिवार के सदस्यों को अपने घर से बाहर निकलने में डर लगता है.

घटना 11 जुलाई 2016 की है. मामला तब सामने आया था जब गोरक्षकों द्वारा कोड़े से कथित तौर पर इन लोगों की पिटाई किये जाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था. इसमें इन तीन भाइयों के साथ उनके पिता की पिटाई की थी गई.

दिल्ली में मेवाणी ने की हुंकार रैली

दिल्ली में जिग्नेश मेवाणी की हुंकार रैली

नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस की मनाही के बावजूद गुजरात के वडगांव के विधायक जिग्नेश मेवाणी ने मंगलवार को दिल्ली में रैली की. हुंकार रैली के नाम से की गई यह रैली दिल्ली के संसद मार्ग पर हुई. इस दौरान मेवाणी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर बरसे. उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी सरीखे असल मुद्दे केंद्र सरकार ने दबा दिए औऱ घर वापसी, लव जिहाद और गाय जैसे मसलों को जगह दी गई. मेवाणी ने कहा कि वे इसके खिलाफ हैं.

पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए मेवाणी ने कहा कि “हम पर भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया क्योंकि हम चुनाव लड़े और जीते. मेवाणी की रैली को लेकर पुलिस काफी सजग दिखी. सुरक्षा के लिहाज से आयोजन स्थल के आसपास भारी पुलिस तैनात किया गया था. अधिकारी अंतिम वक्त तक बोलते रहे कि मेवाणी को रैली करने के लिए अनुमति नहीं मिली थी. हालांकि, उन्होंने परमिशन के बिना रैली की. हालांकि रैली में उतनी भीड़ नहीं जुट सकी, जैसी मेवाणी उम्मीद कर रहे थे.

दलित डॉक्टर से मंगवाते थे चाय, करवाते थे चौकीदारी, आत्महत्या की कोशिश

पीड़ित डॉक्टर मरिराज

अहमदाबाद। किसी भी युवा के लिए डॉक्टर बन जाना, उसके सपने के साकार होने जैसा होता है. कोई भी युवा ऐसे ही अचानक डाक्टर नहीं बन जाता. वह दिन-रात पढ़ता है. प्रतियोगी परीक्षा में बैठता है, उसे पास करता है, तब जाकर डॉक्टर बनता है. लेकिन क्या हो जब डॉक्टर बन जाने के बावजूद उसे उसका काम न करने दिया जाए. उसे चाय लाने को कहा जाए, ऑपरेशन थियेटर के बाहर वॉचमैन की तरह खड़ा कर दिया जाए.

मामला देश के प्रधानमंत्री मोदी और देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के राज्य गुजरात का है. गुजरात के अहमदाबाद के बीजे मेडिकल कॉलेज के पोस्टग्रेजुएट मेडिकल छात्र डॉ. मरिराज ने अपने साथ हो रहे बर्ताव से दुखी होकर 5 जनवरी को आत्महत्या करने की कोशिश की. तमिलनाडु के तिरुनेलवेली के रहने वाले मरिराज ने खुद के साथ जातिगत भेदभाव होने का आरोप लगाया है. मरिराज का कहना है- ‘वे लोग मुझसे चाय सर्व करवाते हैं. मुझे सर्जरी नहीं करने दी जाती. वे लोग मुझे रोज ही टॉर्चर करते हैं. वे लोग मुझे वार्ड से बाहर कर देते हैं. आपरेशन थियेटर के बाहर वॉचमैन की तरह खड़ा रखते हैं. जिस दिन से मैं यहां आया, उसी दिन से मुझे जाति संबंधी भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है. वे लोग मेरी डिग्री जांचते रहते हैं, उन्हें लगता है कि मेरी डिग्री फेक है. मुझे गुजराती में भला-बुरा कहा जाता है. हर किसी के सामने मेरी बेइज्जती की जाती है.”

इस बारे में मरिराज ने विभाग के एचओडी को भी सूचना दी, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही. उसकी मां इंदिरा ने पिछले साल सितंबर में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के राष्ट्रीय आयोग (एनसीएससी) में इस बात की शिकायत भी की थी, बावजूद इसके मरिराज के साथ भेदभाव बंद नहीं हुआ. इससे परेशान मरिराज ने 5 जनवरी को नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की.

हालांकि मरिराज बच गया और अब खतरे से बाहर है. उसने एक वीडियो जारी कर पूरी आपबीती सुनाई है. हालांकि अब मामला बढ़ने के बाद कॉलेज प्रशासन पूरे मामले से पल्ला झाड़ रहा है. लेकिन मरिराज का वीडियो वायरल होने के बाद विजय रूपाणी सरकार के सामाजिक न्याय विभाग के मंत्री ईश्वर पटेल ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं. हालांकि इस घटना ने समाज के एलीट क्लास के भीतर के जातिवाद को एक बार फिर उजागर कर दिया है. सवाल यह है कि क्या सिर्फ दलित होने की वजह से एक मेडिकल कॉलेज को अपने छात्र के साथ ऐसा भेदभाव करना चाहिए था.

अनंतनाग में सुरक्षाबलों ने मार गिराए 2 आतंकी , मुठभेड़ जारी

मंगलवार सुबह से ही जम्मू कश्मीर के अनंतनाग मे सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठबेड़ जारी है. कोकरनाग के लारनू इलाके में आतंकियों के छिप्पे होने की सुचना मिलते ही सुरक्षाबलों ने इलाके मे कासो चलाया. सर्च ऑपरेशन के दौरान आतंकियों ने पुलिस पार्टी पर फायरिंग की और जंगल की ओर भाग गए. सुरक्षाबलों ने आतंकियों का पिछा कर उन्हें घेर लिया और 2 आतंकियों को मार गिराया. सेना ने मुठभेड़ में मारे गए एक आतंकी के शव को बरामद कर लिया है.

सेना के एक अधिकारी ने इस खबर की पुष्टी करते हुए बताया, ‘अनंतनाग जिले में कोकेरनाग के लारनू इलाके में आतंकवाद रोधी अभियान में अभी तक दो आतंकवादी मारे गए हैं.

मारे गए आतंकी की पहचान मोहम्मद फरहान वानी के तौर पर हुई है. बताया जा रहा है के मारा गया आतंकी हिजबुल मुजाहिद्दीन संगठन का है. आतंकी के पास से 1 एके 47 बरामद हुई है और इससे C कैटेगरी का आतंकी बताय जा रहा है. इस ऑपरेशन को आर्मी, CRPF और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (जम्मू और कश्मीर) द्वारा अंजाम दिया जा रहा है. आपको बता दें कि पिछले 24 घंटों में यह दूसरा एनकाउंटर है. फिलहाल सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ जारी है.

गन्धर्व गुलाटी

गुजरात में भाजपा को झटका

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पाला बदल भाजपा में शामिल हुए कांग्रेस के दस पार्षदों ने छोड़ा साथ

गुजरात: गुजरात में मेहसाणा नगरपालिका सीट पर हार ने सत्‍तारूढ़ भाजपा का धमंड चूर-चूर कर दिया है. पिछले साल भाजपा, कांग्रेस के दस पार्षदों को पर्टी में शामिल कर मेहसाणा नगरपालिका पर कब्‍जा जमाने में सफल रही थी. इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस के रायबेन पटेल को अध्‍यक्ष भी बनाया था लेकिन अब पश्चिम बंगाल और मेहसाणा में  हुई बीजेपी की किरकिरी के बाद इन पार्षदों ने भी पार्टी का दामन छोड़ दिया है.

इससे पहले पश्चिम बंगाल के नोआपाड़ा उपचुनाव में जीत हासिल करने के लिए भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस की पूर्व विधायक मंजू बसु के सामने अपना उम्‍मीदवार बनने का प्रस्ताव रखा था. लेकिन उन्होने यह कहते हुए प्रस्‍ताव ठुकरा दिया कि वह अभी भी ममता बनर्जी की सिपाही हैं. हलांकि इस पर भाजपा का कहना है कि मंजू ने खुद सदस्‍यता के लिए पार्टी के टॉल फ्री नंबर पर मिस कॉल दिया था. बरहाल मंजू बसु ने निजी फैसला बताते हुए भाजपा का प्रस्‍ताव ठुकरा दिया.

मेहसाणा में मिली इस हार से भाजपा को करारा झटका लगा है क्योकि मेहसाणा नगरपालिका का गुजरात की राजनीति में खासा महत्व है. इसे भाजपा विधायक और राज्‍य के उपमुख्‍यमंत्री नितिन पटेल का गड़ माना जाता है. इस हार के बाद भाजपा में शामिल हुए कांग्रेस के दस पार्षद तो वापस कांग्रेस में चले गए हैं लेकिन मामला टालने के लिए गुजरात के उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने कहा है कि कांग्रेस के पार्षद भाजपा में कभी शामिल ही नहीं हुए थे.

पीयूष शर्मा

सीएम केजरीवाल ने लॉन्च किया कॉमन मोबिलिटी कार्ड, मेट्रो और बस का सफर होगा आसान

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दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने सोमवार (08 जनवरी, 2018) को दिया दिल्ली वालों को ‘कॉमन मोबिलिटी कार्ड’ (CMC) का तोहफा. इसे शहर के परिवहन क्षेत्र में एक बड़ा कदम बताया जा रहा है. इस कार्ड का इस्तेमाल दिल्ली मेट्रो के इलावा राज्य की 200 दीटीसी और 50 क्लस्टर बसों में किया जायेगा. इस सुविधा का लाभ अभी दिल्ली के कुछी छेत्रों में उठाया जा सकता है जिसमे दिल्ली परिवहन निगम के राजघाट डिपो-1 और रोहिणी डिपो-1 की बसें और कलस्टर बस सेवा के बीबीएम डिपो-2 शामिल हैं.

इस अवसर पर डीटीसी की एक बस में थोड़ी दूर का सफर करने के बाद केजरीवाल ने कहा, ‘‘परिवहन क्षेत्र में यह एक बड़ा कदम है जिससे दिल्ली में लोगों को सहज यात्रा की सुविधा मिल सकेगी.’’ इस कार्ड का इस्तेमाल एक अप्रैल से सभी डीटीसी और क्लस्टर बसों में डेबिट कार्ड की तरह किया जा सकेगा.

राजधानी दिल्ली में इस समय करीब 3,900 डीटीसी और 1,600 क्लस्टर बसें हैं. इससे दिल्ली सरकार और डीएमआरसी बसों में किराये के भुगतान की खातिर मेट्रो स्मार्ट कार्ड को कॉमन मॉबिलिटी कार्ड के रूप में इस्तेमाल के लिए अधिकृत करने पर सहमत हो गए थे. स्मार्ट कार्ड दिल्ली मेट्रो के किसी भी स्टेशन से खरीदे जा सकते हैं.

दिल्ली सरकार ने बताया की कार्ड के लिए डीएमआरसी के साथ मेमरैन्डम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) साइन हो चुका है. कॉमन मॉबिलिटी कार्ड सभी अंतरराज्यीय बस टर्मिनल, रेलवे स्टेशनों और दिल्ली परिवहन विभाग के पर्यटक सूचना केंद्रों में आने वाले महीनों में उपलब्ध कराए जाएंगे. इस परियोजना की शुरूआत के मौके पर परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत और दिल्ली सरकार एवं दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) के शीर्ष अधिकारी भी मौजूद थे.

गन्धर्व गुलाटी

मेरठ में दलित और ठाकुर छात्र भिड़े

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मेरठ: कोरेगांव हिंसा पर विरोध प्रदर्शन कर रहे   कैंपस में दलित और ठाकुर छात्रों के बीच मुतभेड़ हो गई, जिसके चलते दो छात्रों के सिर फूट गए हैं. दरअसल विश्वविध्यालय के डेमोक्रेटिक स्‍टूडेंट फ्रंट  के छात्र डॉ.सुशील गौतम के नेतृत्‍व में शांतिपूर्वक जुलूस निकाल रहे थे. इस मार्च के दौरान डीएसएफ के छात्र सेंट्रल लाइब्रेरी पहुंचे जहां कुछ ठाकुर छात्रों ने अंबेडकर पर टिप्‍पणी कर दी. इस पर गुस्साए दलित छात्रों ने आरोपीयों की पिटाई कर दी.

इस मामले में अपना पक्ष रखते हुए ठाकुर छात्रों ने कहा कि हम लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ रहे थे. इस दौरान कुछ छात्र हमें जबरन मार्च में ले जाने लगे और जैसे ही हमने उनको रोकने की कोशिश की, डीएसएफ कार्यकर्ताओं ने हमसे मारपीट शुरू कर दी, उन्होने सरिया से हमारी पिटाई की और बदला लेने के लिए नारेबाज़ी करते रहे.

वहीं डेमोक्रेटिक स्‍टूडेंट फ्रंट के लीडर डॉ.सुशील गौतम ने इस मामले में ठाकुर छात्रों पर अंबेडकर पर टिप्‍पणी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि ठाकुर समझते हैं कि योगी राज में उनकी ही चलेगी लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे. दलित छात्र अब चुप नहीं बैठेंगे.

पीयूष शर्मा