मेरठ में दलित और ठाकुर छात्र भिड़े

0
मेरठ: कोरेगांव हिंसा पर विरोध प्रदर्शन कर रहे   कैंपस में दलित और ठाकुर छात्रों के बीच मुतभेड़ हो गई, जिसके चलते दो छात्रों के सिर फूट गए हैं. दरअसल विश्वविध्यालय के डेमोक्रेटिक स्‍टूडेंट फ्रंट  के छात्र डॉ.सुशील गौतम के नेतृत्‍व में शांतिपूर्वक जुलूस निकाल रहे थे. इस मार्च के दौरान डीएसएफ के छात्र सेंट्रल लाइब्रेरी पहुंचे जहां कुछ ठाकुर छात्रों ने अंबेडकर पर टिप्‍पणी कर दी. इस पर गुस्साए दलित छात्रों ने आरोपीयों की पिटाई कर दी.

इस मामले में अपना पक्ष रखते हुए ठाकुर छात्रों ने कहा कि हम लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ रहे थे. इस दौरान कुछ छात्र हमें जबरन मार्च में ले जाने लगे और जैसे ही हमने उनको रोकने की कोशिश की, डीएसएफ कार्यकर्ताओं ने हमसे मारपीट शुरू कर दी, उन्होने सरिया से हमारी पिटाई की और बदला लेने के लिए नारेबाज़ी करते रहे.

वहीं डेमोक्रेटिक स्‍टूडेंट फ्रंट के लीडर डॉ.सुशील गौतम ने इस मामले में ठाकुर छात्रों पर अंबेडकर पर टिप्‍पणी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि ठाकुर समझते हैं कि योगी राज में उनकी ही चलेगी लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे. दलित छात्र अब चुप नहीं बैठेंगे.

पीयूष शर्मा

कोरेगांव को लेकर अब पूरा हुआ डॉ अम्बेडकर का सपना

भीमा-कोरेगांव आज ऐसा नाम है, जिसे हर कोई जान गया है. देश में आज हर कोई यह जान गया है कि भीमा-कोरेगांव की लड़ाई क्या थी, और इसमें क्या हुआ था. खासकर दलित-बहुजन तबका जो आज तक अपने इस इतिहास से अंजान था, आज इस पर फख्र कर रहा है. वह अब इस बात को जान गया है कि जिस मूलनिवासी तबके को भारत में लगातार दबाने की कोशिश की गई थी, उसी के 500 पुरखों ने 28 हजार अत्याचारियों को रौंद डाला था. 1 जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगांव की 200वीं बरसी पर जो भी हुआ, इस घटना के बाद बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर का वह सपना पूरा हो गया, जो उन्होंने 1927 में इस जगह को देखने के बाद देखा था.

असल में बाबासाहेब इस स्तंभ को दलितों के स्वाभिमान के रूप में स्थापित करना चाहते थे. महारों ने पेशवाओं के ख़िलाफ़ लड़ाई 1818 में की थी. महार रेजीमेंट ने इस लड़ाई में जमकर बहादुरी दिखाई थी. भीमा-कोरेगांव में जो विजय स्तंभ है उस पर इस रेजीमेंट के लोगों के नाम हैं. बाबा साहेब अम्बेडकर जब 1927 में भीमा-कोरेगांव गए तो उन्होंने ये सारी चीज़ें वहां देखीं. उन्होंने देखा कि 1818 के बाद का जो इतिहास है उसमें दलितों के लिए भीमा-कोरेगांव एक प्रतीक बन सकता है. यही वजह रही कि उन्होंने इस लड़ाई को प्रतीक बनाने के लिए प्रयास शुरू किया.

बाबासाहेब देश के वंचित तबके के मन में स्वाभिमान और अस्मिता की भावना पैदा करना चाहते थे. बाबासाहेब जानते थे कि देश के दलितों के लिए इस लड़ाई का महत्व क्या है. वो यह जानते थे कि अगर इस लड़ाई के इतिहास के बारे में दलित समाज को पता चल जाए तो फिर उनमें आत्मविश्वास आ जाएगा. इस इतिहास के बूते वो आगे की लड़ाई लड़ने के लिए खुद को तैयार कर पाएंगे.

डॉ. अम्बेडकर की मेहनत का नजीता यह हुआ कि पूरे महाराष्ट्र के लोगों को इस युद्ध के इतिहास की जानकारी हो गई. लेकिन चूंकि प्रचार के माध्यम सवर्णों के हाथ में थे औऱ इतिहास के लेखक भी सवर्ण थे, इसलिए यह इतिहास देश भर में नहीं पहुंच सका. देश के मूलनिवासियों के इस इतिहास की लगातार अनदेखी हुई. हालांकि आखिरकार स्थिति ऐसी बन गई कि उसी प्रचार तंत्र को पूरे देश में इस इतिहास का प्रचार करना पड़ा. हालांकि उन्होंने महारों को अंग्रेजों के पाले में खड़ा कर इस युद्ध के महत्व को कम करने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सके.

1 जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगांव के 200 साल पूरा होने पर वहां मौजूद देश के बहुजनों पर पत्थरबाजी की जो घटना हुई, वह अचानक नहीं थी. वह एक सुनियोजित चाल थी. हालांकि इस घटना से उतना नुकसान नहीं हुआ, जितना इस घटना के साजिशकर्ताओं ने सोचा होगा. हां, इससे एक फायदा यह जरूर हुआ कि इसकी आग इतनी भड़की कि देश भर की मीडिया को इसका संज्ञान लेना पड़ा. और बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर जिस भीमा-कोरेगांव के विजय स्तंभ को देश के मूलनिवासियों के स्वाभिमान के रूप में स्थापित करना चाहते थे, वह हो चुका है.

 

‘पद्मावत’ 25 जनवरी को रिलीज पक्की, अक्षय की ‘पैडमैन’ से होगी टक्कर’

0

संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ (पहले नाम पद्मावती था) काफी समय से विवादों में बनी हुई थी जिससे ‘करनी सेना’ रिलीज़ नहीं होने देना चाहती थी,आज उससे हरी झंडी मिल गयी है।  ट्रेड एनलिस्‍ट तरण आदर्श ने आज ट्वीट कर बताया की ‘पद्मावत’ 25 जनवरी 2018 को रिलीज़ होगी। इसकी भिड़ंत अक्षय कुमार की ‘पैड मैन’ के साथ होगी और साथ ही साथ 26 जनवरी, 2018 जनवरी को सिद्धार्थ मल्होत्रा और मनोज वाजपेयी की फिल्म ‘अय्यारी’ भी रिलीज होगी .

अक्षय कुमार ने मीडिया से बात करते हुए कहा, ‘यह स्पर्धा की बात नहीं है, यह बड़ा दिन है, बड़ा सप्ताह है, इसलिए सभी फिल्में साथ में रिलीज हो सकती हैं. दोनों फिल्में उस दिन रिलीज हो सकती हैं.’ पिछले लंबे समय से विवाद और सेंसर बोर्ड में अटकी ‘पद्मावत’ को सेंसर बोर्ड की अनुमति मिल गयी है.

सेंसर बोर्ड ने फिल्म को पांच कट्स के साथ यू/ए सर्टिफिकेट दिया है। सेंसर बोर्ड ने मेकर्स को फिल्म का नाम बदलने की हिदायत भी दी थी और अब इसका नाम ‘पद्मावत’ कर दिया गया है।  साथ ही साथ निर्माताओं को एक डिस्क्लेमर जोड़ने के लिए कहा है।

भले ही फिल्म को ‘पद्मावत’ को हरी झंडी दे दी हो, लेकिन इस फिल्म के साथ जुड़ा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. इस फिल्म का शुरू से ही विरोध कर रही करणी सेना ने फिर से चेतावनी देते हुए कहा है कि “अगर फिल्म को प्रदर्शित किया गया तो वह पूरे देश में धरने-प्रदर्शन करेगी। करणी सेना ने फिल्म में लगे पैसे की भी जांच कराने की मांग की है.”

गन्धर्व गुलाटी

दिल्ली में ठंड ने तोड़ी 44 लोगों की सांसों की डोर

0

नई दिल्ली। उत्तर भारत में ठंड ने तो काफी समय पहले ही दस्तक दे दी थी लेकिन अब सर्द, ठंडी हवाएं सांसों की डोर को काट रही है. दिल्ली पुलिस ने गृहमंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी जिसके मुताबिक, राजधानी दिल्ली में ठंड के कारण करीब 44 बेघर लोगों की मौत हुई है. सबसे बड़ी बात मौत के ये वो आंकड़े है जिसमें दिल्ली पुलिस ने शवों को सड़क के किनारे से उठाया हैं और सभी मौतें ठंड की वजह से बताई जा रही है. मगर इन मासूमों की चिता पर भी राजनीतिक पार्टियां अपनी रोटियां सेंकने से बाज़ नहीं आरही हैं.

दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी ने ट्विटर पर वीडियो जारी कर आम आदमी पार्टी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधा और कहा “सड़क से आंदोलन की शुरुआत करने वाले महलों में सो गए हैं और सड़क पर लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं”.

 

इसके जवाब में, हाल ही में राज्यसभा के लिए नामांकन करने वाले आप नेता संजय सिंह ने कहा है कि “दिल्ली सरकार बेघरों के लिए शेल्टर होम का इंतजाम कर रही है. इस बीच ठंड से किसी की भी मौत होना बेहद दुखद है. संजय सिंह यह भी बोले कि बीजेपी अपने राज्यों की चिंता करे, जहां पर बच्ची भात-भात कहकर मर जाती है.”

ये आंकड़े सीएचडी सेंटर फॉर होलिस्टिक डिवेलपमेंट संस्था ने जारी किए थे. सीएचडी के सुनील अलीदा ने बताया कि जोनल पुलिस रात में सड़क से शवों को उठाती है और अब तक केवल जनवरी में 44 बेघरों के शव को उठाया गया है, जिसके आंकड़े पब्लिक डोमेन में जारी हैं. मौसम विभाग की मानें तो फिलहाल हाड़ कंपाती सर्दी से निजात के आसार नहीं है. अगले कुछ दिनों तक सर्दी का सितम जारी रहेगा.

गन्धर्व गुलाटी    

आधार लीक रिपोर्ट करने वाली पात्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज: पत्रकारों ने जताया विरोध

0

प्रतिष्ठित अखबार ‘दि ट्रिब्यून’ की पत्रकार रचना खैरा के खिलाफ यूनीक आईडेन्टिफिकेशन अथौरिटी ऑफ इंडिया ने दिल्ली क्रईम ब्रांच में विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर दी है. उनके ऊपर आरोप है कि उन्होने मीडिया का इस्तेमाल कर सरकार के खिलाफ लोगों तक गलत संदेश पहुचाया है.

दरअसल, ‘दि ट्रिब्यून’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार केवल 500 रूपये में 10 मिनट के अंदर एक ऐजेन्ट ने इस पत्रकार को आधार डेटाबेस में ल़गइन करने के लिए लॉगइन आईडी और पासवर्ड देने की बात कही है, जिससे कोई भी आधार नंबर अंकित करने पर उस व्यक्ति का नाम, पता, पोस्टल कोड, फोटो, फोन नंबर निकाला जा सकता है. हलांकि यूआईडीएआई ने आधार डेटाबेस में किसी तरह के सेध लगाए जाने की ख़बरों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि आधार कार्ड से जुड़ा बायोमेट्रिक डेटा पूरी तरह सुरक्षित है.

रचना खैरा के खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद से कई बड़े पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, फ़ाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफ़ेशनल समेत कई संगठनों ने यूआईडीएआई की इस कार्यवाही की निंदा की . एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने अपने बयान में कहा है कि यह अनुचित और अन्यायपूर्ण क़दम है, यह मीडिया की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है. यूआईडीएआई को रिपोर्ट के ख़िलाफ़ केस करने की बजाय खुद पर लगे आरोपों की जांच करनी चाहिए.” आधार को लेकर पिछले एक साल में यह चौथा मामला है जब अभिव्यक्ति को दबाने की कोशिश की जा रही है.” पीयूष शर्मा

हिज्बुल मुजाहिदीन में शामिल हुआ AMU का छात्र

0

अलीगढ़। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के पीएचडी के एक रिसर्च स्कॉलर मनान बशीर वानी की आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन में शामिल होने की खबर सामने आई है. वानी की तस्वीर एके-47 राइफल के साथ सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. वानी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एप्लाइड जियोलॉजी (Applied Geology) में पीएचडी कर रहा था, लेकिन उसने कुछ दिन पहले यूनिवर्सिटी छोड़ दी थी.

26 साल का मनान वानी कुपवाड़ा जिले के लोलाब का रहने वाला है , वह तीन दिन पहले घर आने वाला था लेकिन उसने घर पर कोई खबर नहीं दी. स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो वानी पिछले पांच साल से एएमयू में रह रहा था. वहां उसने एमफिल की डिग्री भी ली. पुलिस ने रविवार को उसके पिता की तहरीर पर लापता होने का मामला दर्ज किया था. मामला सामने आने के बाद पुलिस ने इसकी जांच शुरू कर दी है. जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कहा है कि अभी वानी के आतंकी बनने की पुष्टि नहीं की जा सकती है. जो तस्वीर वायरल हो रही है, वह फोटोशॉप भी हो सकती है. पुलिस ने ये भी कहा कि स्कॉलर 3 जनवरी से लापता था, उसकी आखिरी लोकेशन दिल्ली पता चल पाई है.

बता दें की वानी एक अच्छे परिवार से राबता रखता है. सूत्रों ने बताया कि मनान के पिता लेक्चरार है और उसका भाई जूनियर इंजीनियर है. वानी ने क्लास 10 तक जवाहर नवोदय विद्यालय से पढ़ाई की है.

गन्धर्व गुलाटी

 

लालू की सज़ा पर गरमाई सियासत

रांची। 3 जनवरी से टलते टलते आखिरकार 6 जनवरी को चारा घोटाला मामले पर लालू प्रसाद यादव को सज़ा सुनाई गई. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को बतौर सजा साढ़े तीन साल की जेल औऱ 5 लाख का ज़ुर्माना भुगतना होगा. सज़ा के सदमें से अब तक लालू बाहर नहीं आ पाए थे कि अगले दिन ही उन्हे इकलौती बड़ी बहन गंगोत्री देवी के निधन की सूचना मिली, जिसे सुनकर निराश लालू अपने आँसू नहीं रोक पाए. माना जा रहा है कि बहन की मौत के बाद लालू को पेरौल पर जेल से बाहर आने की इजाज़त मिल सकती है.

लालू प्रसाद यादव की सज़ा के ऐलान के बाद से ही देशभर में बयानबाज़ी शुरू हो गई है. एक तरफ जहां विपक्ष ने मौके का फायेदा उठाते हुए लालू पर जमकर निशाना साधा वहीं दूसरी तरफ कई हस्तियाँ लालू का समर्थन करती नज़र आईं. इस मामले में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना है कि बीजेपी ने उनके साथ अन्याय किया है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार भी लालू के समर्थन में सामने आए और कहा कि चारा घोटाला मामले में राजद प्रमुख लालू प्रसाद के खिलाफ निचली अदालत का फैसला अंतिम नहीं है और वह जमानत के हकदार है. लालू के जन सेवा के लम्बे रिकार्ड को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

इतना ही नहीं कांग्रेस ने साफ किया कि लालू के जेल जाने से गठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा. कांग्रेस नेता आरपीएन सिंह का कहना है कि र्टी ने हमेशा भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई है। जहां तक गठबंधन का सवाल है, वह आरजेडी के साथ है, किसी व्यक्ति के साथ नहीं। इस सब से जाहिर है कि लालू जेल में ही क्यों न हों, बिहार की राजनीति और पार्टी में उनका दबदबा अभी भी कायम है.

पीयूष शर्मा

 

दिल्ली पहुंचे जिग्नेश मेवाणी ने बोला पीएम मोदी पर हमला

0

भीमा-कोरेगांव हिंसा में मामला दर्ज होने के बाद शुक्रवार को जिग्नेश मेवाणी दिल्ली पहुंचे. इस दौरान मेवाणी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से महाराष्ट्र हिंसा पर बयान देने की मांग की. दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए मेवाणी ने कहा कि खुद को अंबेडकर का भक्त बताने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आखिर महाराष्ट्र हिंसा पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं?

एफआईआर दर्ज किए जाने के बाद मेवाणी ने साफ किया कि मैं ना ही कभी भीमा-कोरेगांव गया और न ही मैंने कोई भड़काऊ भाषण दिया. मुझ पर इस तरह के आरोप लगाकर भाजपा मुझसे गुजरात में हुई हार का बदला ले रही है. साफ है कि कहीं न कहीं 2019 में उनको मुझसे खतरा दिख रहा है. यही वजह है कि मुझ पर जानबूझकर इस तरह के इल्ज़ाम लगाए जा रहे हैं.

खुद को राष्ट्रीय दलित नेता के तौर पर स्थापित करने जुटे जिग्नेश मेवाणी ने 9 जनवरी को दिल्ली में युवा हुंकार रैली का आयोजन करने की भी बात कही. उन्होंने कहा कि इस रैली के बाद वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने जाएंगे.

शादी करने जा रही हैं सोनम कपूर

0

मुंबई। हाल ही में हुई विराट और अनुष्का की चर्चित शादी के बाद अब सोनम कपूर ने भी शादी के बंधन में बंधने का फैसला ले लिया है. सोनम इस साल बॉयफ्रैंड आंनद अहूजा से शादी कर सकती हैं. लंबे समय से एक-दूसरे को डेट कर रहे सोनम और आनंद कई बार साथ में अपनी तस्वीरें शेयर कर चुके हैं. हाल ही में सोनम ने बॉयफ्रैंड आंनद अहूजा के साथ पैरिस में नया साल मनाया था जिसकी तस्वीरें और विडियो उन्होंने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया था.

मुंबई मिरर के मुताबिक सोनम कपूर इस साल अप्रेल में जोधपुर में शादी कर सकती हैं. शादी को प्राईवेट रखा जाएगा और आयोजन में सिर्फ खास रिश्तेदारों के ही शामिल होने की खबर है. इससे पहले एक इंटरव्यू के दौरान शादी के प्लॉन्स के बारे में पूछे जाने पर सोनम ने कहा था कि उन्हे शादी की तैयारियां करना और दुल्हन के लिबाज़ में सजना बेहद पसंद है और वह अपने पेरेंट्स को आइडल कपल मानती हैं.

  • पीयूष शर्मा

भीमा-कोरेगांव पर ब्राह्मण औऱ दलित डायरेक्टर में ट्वीटर वार

विवेक अग्निहोत्री और नीरज धेवान

नई दिल्ली। भीमा कोरेगांव को लेकर चल रही बहस अब फिल्म जगत तक पहुंच गई है. घटना के बाद दलित उभार को लेकर चल रही बहस के बीच फिल्मी दुनिया के दो जाने माने डायरेक्टर आपस में उलझ गए हैं. ‘हेट स्टोरी’ और ‘चॉकलेट’ समेत कई फ़िल्मों के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री के एक हालिया ट्वीट पर बहस छिड़ गई है.

विवेक अग्निहोत्री ने 3 जनवरी को ट्विटर पर लिखा था कि ”कुछ वक्त पहले मैंने फ्लाइट में एक दलित नेता के पोते को बिजनेस क्लास में सफर करते हुए देखा था. तब मैंने लिखा था- एक निचली जाति के नेता के साथ सफर कर रहा हूं. लेकिन आज की तारीख़ में अगड़ी जाति कौन है? वो व्यक्ति जो बिजनेस क्लास में बैठा हुआ है और उसे ग्राउंड स्टाफ अटेंड कर रहा है. या वो जो फ्लाइट में सीट के हत्थे पर हाथ रखने के लिए आधा इंच जगह तलाशने की कोशिश कर रहा है. मैं ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ और ये नेता दलित परिवार में. लेकिन आज वो फर्स्ट क्लास 1ए में बैठा हुआ है और मैं सेकेंड क्लास 26बी में बैठा हुआ है. पिरामिड उलटा हो गया है.”

विवेक अग्निहोत्री के इस ट्वीट पर फिल्म मसान के जरिए कई अवार्ड जीतने वाले फिल्म डायरेक्टर नीरज घेवान ने करारा जवाब दिया है. नीरज घेवान ने विवेक अग्निहोत्री को जवाब देते हुए ट्विटर पर लिखा- ”मैं एक दलित हूं. अपने देश के लिए कान फ़िल्म और एडवरटाइजिंग अवॉर्ड भी जीता है. नेशनल अवॉर्ड और फिल्मफेयर अवॉर्ड भी जीता है. ये सब मैंने अपनी दलित पहचान का इस्तेमाल किए बिना किया है. और हां, मैं अब बिजनेस क्लास में सफर करता हूं. अगली बार जब हम एक ही विमान में सवार हुए तो मैं आपको अपनी सीट पर बैठने का ऑफर दूंगा.” नीरज घेवान ने एक दूसरे ट्वीट में यह भी लिखा कि ”मैं कभी जाति कार्ड का इस्तेमाल नहीं करुंगा और न ही इसे नीची नज़रों से देखूंगा.”

नीरज के इस ट्वीट पर कई लोगों ने उनका समर्थन किया है. वरुण ग्रोवर ने इस मसले पर कई ट्वीट किए. वरुण नेअपने ट्वीट्स में सवाल उठाया है- ”एक शांतिपूर्ण रैली पर हमले के बाद दलितों ने ट्रैफिक रोककर प्रदर्शन किया. अपर कास्ट से ताल्लुक रखने वाले भारतीय कहते हैं- देखो इन अराजकतावादियों को, ये भारत तोड़ना चाहते हैं. लेकिन जब दलितों के कुएं में ज़हर मिलाया जाता है. दलितों को उनकी जगह दिखाने के लिए रेप और मर्डर किया जाता है, तब यही लोग कहते हैं कि भारत विविधताओं का देश है, झगड़े तो होंगे ही.”

योगेंद्र चौहान ने लिखा, ”किसी को विवेक से पूछना चाहिए कि ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने में उनका क्या योगदान है,जिस पर वो इतना फ़ख़्र कर रहे हैं.” तो पूर्व राज्यसभा सांसद तारिक अनवर लिखते हैं, ”आप चाहें तो उन्हें फिल्म बनाने के गुर भी सिखा सकते हैं.”

संघ को देश का रक्षक मानते हैं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज

कोट्टयम। क्या आपको यह लगता है कि देश की सुरक्षा आरएसएस यानि की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हाथ में है. क्या आप भी यह मानते हैं कि संविधान, लोकतंत्र और सेना के बाद इस देश की सुरक्षा संघ करती है. भले ही आप इससे इत्तेफाक न रखते हों लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज के लिए यही सच है.

सुप्रीम कोर्ट से रिटायर्ड जस्टिस के.टी. थॉमस ने कहा है कि संविधान, लोकतंत्र और सशस्त्रआ सेनाओं के बाद, आरएसएस ने भारत में लोगों को सुरक्षित रखा है. 31 दिसंबर को कोट्टयम में संघ के प्रशिक्षण कैंप को संबोधित करते हुए पूर्व जज ने यह बात कही. जस्टिस थॉमस ने कहा- “अगर किसी एक संस्थाह को आपातकाल के दौरान देश को आजाद कराने का श्रेय मिलना चाहिए, तो मैं वह श्रेय आरएसएस को दूंगा. मैं समझता हूं कि आरएसएस का शारीरिक प्रशिक्षण किसी हमले के समय देश और समाज की रक्षा के लिए है.”

जस्टिस थॉमस ने आगे कहा कि- “अगर पूछा जाए कि भारत में लोग सुरक्षित क्यों हैं, तो मैं कहूंगा कि देश में एक संविधान है,लोकतंत्र हैं, सशस्त्रि बल हैं और चौथा आरएसएस है. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंाकि आरएसएस ने आपातकाल के विरुद्ध काम किया.

हाल ही में केंद्रीय मंत्री अनंत हेगड़े के धर्मनिरपेक्षता को लेकर दिए गए विवादित बयान की तरह ही पूर्व जज ने भी धर्मनिरपेक्षता को लेकर सवाल उठाया. पूर्व जज ने कहा कि वह इस बात से इत्ते फाक नहीं रखते कि सेक्युसलरिज्म. धर्म की रक्षा के लिए है. जाहिर है कि देश के एक पूर्व जज के इस तरह के बयान से आने वाले दिनों में एक नई बहस छिड़ सकती है.

महाराष्ट्र के बाद गुजरात, मध्यप्रदेश, दिल्ली और यूपी पहुंची कोरेगांव की आहट

नई दिल्ली। भीमा-कोरेगांव की आग पुणे से निकल कर मुंबई और अब मुंबई से निकलकर महाराष्ट्र के तमाम क्षेत्रों के अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश और दिल्ली तक में फैल गई है. महाराष्ट्र के औरंगाबाद में प्रदर्शनकारियों ने जमकर प्रदर्शन किया, जिसकी वजह से वहां भारी मात्रा में पुलिस बल तैनात करना पड़ा. इसी तरह नागपुर में तमाम स्कूल-कॉलेज और दुकानें बंद रही. पत्थरबाजी के कारण यहां एक व्यक्ति के घायल होने की खबर है.

पुणे के नजदीक और एनसीपी नेता शरद पवार के गढ़ बारामती में भी विरोध का काफी असर रहा. यहां भी दुकाने बंद रही और प्रशासन ने बसों का संचालन रोक दिया. शरद पवार इस मुद्दे पर दलितों के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं. दक्षिण महाराष्ट्र के सांगली और मिराज में भी विरोध देखने को मिला.

विरोध की यह आग महाराष्ट्र से होकर मध्यप्रदेश आ गई. भीमा-कोरेगांव की घटना के विरोध में दलित संगठनों ने यहां भी बंद रखा. गुजरात के जूनागढ़ मे भी प्रदर्शन हुए. महाराष्ट्र औऱ गुजरात में भड़की हिंसा को देखते हुए उत्तर प्रदेश में भी हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है. इससे पहले दिल्ली में भी भीमा-कोरेगांव की आग पहुंच गई. घटना के विरोध मे अम्बेडकरवादी सगठनों ने दिल्ली स्थित महाराष्ट्र सदन पर जमकर प्रदर्शन किया.

आज 5 जनवरी को भी संसद मार्ग पर राष्ट्रीय दलित महासभा के बैनर तले विरोध प्रदर्शन किया गया. इस विरोध प्रदर्शन में भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण पर से रासुका हटाने और कोरेगांव में अम्बेडकरवादियों पर पत्थरबाजी के विरोध में अशोक भारती के नेतृत्व में प्रदर्शन किया गया.

कोरेगांव के आरोपी के साथ पीएम मोदी की फोटो वायरल

0

मुंबई। भीमा-कोरेगांव में दलितों पर पथराव और महाराष्ट्र में हिंसा फैलाने के आरोप में जिन दो हिंदुवादी नेताओं के खिलाफ केस दर्ज किया गया है, उनमें से एक की पीएम मोदी के साथ फोटो वायरल हो रही है. उस शख्स का नाम संभाजी भिड़े उर्फ गुरूजी है. गुरुजी नाम से पूरे महाराष्ट्र में विख्यात यह शख्स शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान का जाना माना नेता है.

जो तस्वीर वायरल हुई है, उसमें संभाजी भिड़े यानि की गुरूजी पीएम मोदी के साथ दिखाई दे रहा है. तस्वीर देखकर संभाजी की पीएम मोदी के साथ नजदीकी का साफ पता चल रहा है. यहां तक की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद संभाजी की तारीफ कर चुके हैं. 2014 लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान सांगली में एक रैली को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा था कि भिड़े उनके लिए आदर्श हैं.

पीएम मोदी ने कहा था कि- ‘मैं भिड़े गुरुजी का बहुत आभारी हूं, क्योंकि उन्होंने मुझे निमंत्रण नहीं दिया था बल्कि उन्होंने मुझे हुकुम किया था.’ मीडिया में यह भी खबर है कि कुछ दिन पहले ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने भी गुरुजी से मुलाकात की थी. शायद यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस पूरे मामले में कुछ भी कहने से बच रहे हैं.

गुजरात पुलिस ने दलित युवक को जूता चाटने को मजबूर किया

0

अहमदाबाद। क्या हो जब कानून के रखवाले खुद कानून को हाथ में लेकर लोगों पर अत्याचार करने लगें? क्या हो जब लोग गुंडो से ज़्यादा पुलिसवालों से डरें और क्या हो जब पुलिस हिरासत में भी लोग असुरक्षित महसूस करें. पुलिस की ऐसी ही गुंडई गुजरात के अहमदाबाद के अमराईवाड़ी में देखने को मिली जब पुलिस ने 38 साल के दलित युवक को बेवजह हिरासत में लेकर बेरहमी से पीटा. उसका गुनाह सिर्फ इतना था कि उसने बगैर वर्दी के पुलिसवाले को आम आदमी समझ कर अपने घर के बाहर हो रही घटना के बारे में पूछ लिया.

पीड़ित हर्षद जादव

पीड़ित हर्षद जादव के मुताबिक 29 दिसंबर की सुबह अपने घर के बाहर जमा भीड़ देखकर उन्होंने पास खड़े एक व्यक्ति से घटना के बारे में जानने की कोशिश की. उनके यह पूछने पर उस व्यक्ति ने हर्षद के गाल पर चांटा जड़ दिया. अपना बचाव करते हुए जब हर्षद ने उसे पीछे की तरफ धकेला तो उस व्यक्ति ने खुद को पुलिसवाला बताते हुए डंडे से उन्हें जमकर पीटा. इतना ही नहीं जब जादव की पत्नी उनका बचाव करने आई तो उनकी पत्नी को भी बुरी तरह पीटा गया. हर्षद का आरोप है कि उसे 5 घंटे तक हवालात में बंद रखने के बाद डीसीपी हिमकर सिंह ने उसे बुलाकर जाति पूछी. एक पुलिस वाले के बताने पर कि मैं दलित हूं; डीसीपी ने मुझसे उस पुलिसवाले के पैरों में गिर कर माफी मांगने को कहा. डर के मारे मैंने ऐसा किया भी. मेरे ऐसा करने के बाद डीसीपी ने मुझसे उस कॉन्सटेबल के जूते चाट कर मांफी मांगने को कहा. उसी शाम मुझे कोर्ट में पेश किया गया और बाद में ज़मानत पर रिहा कर दिया गया.

इंग्लिश लिट्रेचर में ग्रैजुएट हर्षद जादव ने जब इस पूरे मामले के बारे में अपने पिता को बताया तो उन्होंने दलित समाज के कुछ लोगों के साथ मिलकर पुलिस के खिलाफ एफआईआऱ दर्ज कराई. फिलहाल मामला जांच के लिए सीबीआई को सौंपा दिया गया है.

भीमा-कोरेगांव से परहेज है, तो फिर इंडिया गेट से क्यों नहीं?

आज़ाद भारत में अंग्रेज़ों की जीत का जश्न क्यों? इस सवाल के जरिये मनुवादी मीडिया और ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग भीमा कोरेगांव की ऐतिहासिक लड़ाई को अंग्रेज़ों की लड़ाई साबित करने की साज़िश कर रहे हैं. वो पूछ रहे हैं कि 200 साल पहले अंग्रेज़ों की जीत का जश्न मनाकर दलित देश विरोधी काम क्यों कर रहे हैं? असल में ये लोग हकीकत को बड़ी ही चालाकी से छुपा रहे हैं. क्योंकि अगर भीमा कोरेगांव जैसी ऐतिहासिक लड़ाई आपके लिए सिर्फ अंग्रेजी सेना की जीत है और उसपर गर्व करने का आपके पास कोई कारण नहीं है तो फिर सवाल है कि 42 मीटर ऊंचा इंडिया गेट आपके लिए गर्व का प्रतीक क्यों है?

इंडिया गेट प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की तरफ से लड़कर शहीद होने वाले भारतीय सैनिकों की याद में बनाया गया था. 13,000 से ज्यादा शहीदों के नाम इंडिया गेट पर उकेरे गये हैं. ये सैनिक फ्रांस, मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और अफगानिस्तान जैसे मोर्चों पर लड़े थे जिनका मकसद ना भारत को आज़ाद कराना था औऱ ना ही अंग्रेजों से विद्रोह करना, तो बताईये आप आज़ाद भारत में इंडिया गेट को कैसे देखते हैं?

आप हाइफा युद्ध को कैसे देखते हैं? 23 सिंतबर 1918 को विदेशी सरज़मीं पर लड़ी गई हाइफा की ऐतिहासिक लड़ाई में भी तो भारतीय सैनिक अंग्रेज़ों की तरफ से लड़े थे. क्या उन राजपूत जवानों की बहादुरी पर गर्व नहीं करना चाहिए? तो क्या दिल्ली के तीन मूर्ति चौक जिसे पहले हाइफा चौक कहा जाता था, वहां से गुजरते हुए हमें सम्मान और जोश की अनुभूति नहीं करनी चाहिए? क्योंकि ये सभी सैनिक तो अंग्रेज़ों के लिए लड़े थे.

सारागढ़ी की लड़ाई का क्या ? 12 सितंबर 1897 को खैबर पख्तूनख्वा में लड़ी गई सारागढ़ी की लड़ाई को क्या कोई झुठला सकता है? ब्रिटिश सेना के 21 सिख सैनिकों ने अफगान सेना के 10 हज़ार सैनिकों के छक्के छुड़ा दिये थे. क्या उस वक्त इन 21 बहादुरों का मकसद भारत की आज़ादी था? शायद नहीं, क्योंकि वो सब तो ब्रिटिश सेना की नौकरी कर रहे थे. तो क्या आप इस लड़ाई को इतिहास के पन्नों में दफना सकते हैं? क्या आपके लिए इस अदम्य साहस और वीरता की लड़ाई में गर्व की कोई बात नहीं?

एक सवाल मंगल पांडे के बारे में भी मंगल पांडे ब्रिटिश सेना के सिपाही थे. मज़े से अंग्रेज अफसरों के हुक्म का पालन कर रहे थे. जब तक उनको मातादीन भंगी ने ये ताना नहीं दिया कि ‘तु शूद्र से भेदभाव करता है लेकिन गाय के मांस का बना कारतूस मुंह से फाड़ता है’ तबतक उन्हें ब्रिटिश सिपाही होने में कोई दिक्कत थी ही नहीं. मंगल पांडे ने वैसे भी अपनी हिंदू धार्मिक भावना के आधार पर विरोध किया था ना कि भारत मां की आज़ादी के लिए, तो क्या आप मंगल पांडे पर गर्व करना छोड़ देंगे? शायद नहीं, क्योंकि विद्रोह का अपना महत्व होता है. इतिहास की हर घटना का अपना महत्व और प्रासंगिकता होती है. फिर आप भीमा कोरेगांव की लड़ाई को बदनाम करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? भीमा-कोरेगांव की लड़ाई तो फिर भी मानवता के खिलाफ खड़े लोगों से आजादी के लिए लड़ी गई थी.

1 जनवरी 1818 को पुणे के पास सिर्फ 500 महार सैनिकों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की 28 हज़ार सैनिकों की फौज को बुरी तरह धूल चटा दी थी. ब्रिटिश सेना की महार रेजिमेंट के शौर्य और अदम्य साहस जैसी मिसाल इतिहास में कहीं नहीं मिलती. पेशवा राज भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का सबसे क्रूरतम शासनकाल था. मराठों के साथ छल करके ब्राह्मण पेशवा जब सत्ता की कुर्सी पर आये तो उन्होंने शूद्रों को नरक जैसी यातनाएं देना शुरू कर दिया. पेशवा राज में शूद्रों को थूकने के लिए गले में हांडी टांगना जरूरी था. साथ ही शूद्रों को कमर पर झाड़ू बांधना जरूरी था जिससे उनके पैरों के निशान मिटते रहें. शूद्र केवल दोपहर के समय ही घर से बाहर निकल सकते थे क्योंकि उस समय शरीर की परछाई सबसे छोटी होती है, परछाई कहीं ब्राह्मणों के शरीर पर ना पड़ जाये इसलिये उनके लिए समय निर्धारित था. शूद्रों को पैरों में घुंघरू या घंटी बांधनी जरूरी थी ताकि उसकी आवाज़ सुनकर ब्राह्मण दूर से ही अलर्ट हो जाये और अपवित्र होने से बच जाये.

ऐसे समय में जब पेशवाओँ ने दलितों पर अत्यंत अमानवीय अत्याचार किये, उनका हर तरह से शोषण किया, तब उन्हें ब्रिटिश सेना में शामिल होने का मौका मिला. ब्रिटिश सेना में शामिल सवर्ण समाज के लोग शूद्रों से कोई संबंध नहीं रखते थे, इसलिये अलग महार रेजिमेंट बनाई गई. महारों के दिल में पेशवा साम्राज्य के अत्याचार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा था, इसलिये जब 1 जनवरी 1818 को भीमा कोरेगांव में पेशवा सेना के साथ उनका सामना हुआ तो वो उनपर शेरों की तरह टूट पड़े. सिर्फ 500 महार सैनिकों ने बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों को धूल चटा दी. जाहिर सी बात है, जैसे हम हाइफा और सारागढ़ी के युद्ध के वीरों की वीरता को नहीं झुठला सकते, जैसे मंगल पांडे की बहादुरी को नहीं नकार सकते, उसी तरह कोरेगांव के महार रेजिमेंट के जवानों के शौर्य को भी नहीं झुठलाया जा सकता.

1 जनवरी को इसी लड़ाई का 200वां शौर्य दिवस था जिसे मनाने देश भर के लाखों दलित भीमा कोरेगांव में जुटे थे. ये लड़ाई अन्याय, शोषण और अपमान के प्रतिरोध का प्रतीक है जिसे युगों-युगों तक याद किया जाएगा. अंग्रेजों ने वीर महारों के याद में विजय स्तंभ बनवाया जो आज लाखों दलितों के लिए प्रेरणा का प्रतीक है. आपको सवाल उन भगवाधारी गुंडों से पूछना चाहिए जो दलितों के स्वाभीमान से जीने को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे.

  • लेखक- सुमित चौहान
 

मुंबई में सरकार ने किया जिग्नेश मेवाणी का कार्यक्रम रद्द

0

मुंबई। भीमा कोरेगांव मामले में जिग्नेश मेवाणी की सक्रियता को देखते हुए प्रदेश सरकार ने चार जनवरी को मुंबई में प्रस्तावित जिग्नेश मेवानी के कार्यक्रम को रद्द कर दिया है. इस कार्यक्रम में मेवाणी के अलावा जेएनयू के छात्र उमर खालिद को भी जाना था. मुंबई के भाईदास हॉल में छात्र भारती नाम के संगठन ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था.

छात्र भारती के उपाध्यक्ष सागर भालेराव ने बताया कि मुंबई पुलिस ने पिछले दो तीन दिनों की हिंसा का हवाला देकर कार्यक्रम रद्द कर दिया है. इधर जब पुलिस ने कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे लोगों को अंदर जाने से रोका था छात्र नारेबाजी करने लगे और जबरन अंदर जाने की कोशिश कर लगे. इस दौरान पुलिस और छात्रों में झड़प हुई. पुलिस ने एहतियातन कई लोगों को हिरासत में लिया है. मुंबई पुलिस का कहना है कि इन लोगों ने धारा-144 का उल्लंघन किया था इसलिए इन्हें हिरासत में लिया गया है. बता दें कि महाराष्ट्र में जातीय हिंसा को भड़काने के आरोप में पुणे पुलिस ने गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवानी और जेएनयू छात्र उमर खालिद के खिलाफ FIR दर्ज कर लिया है. इनपर भड़काऊ भाषण देने का आरोप है.

उना की तरह भीमा-कोरेगांव मामले में पीएम मोदी की चुप्पी पर उठे सवाल

नई दिल्ली। एक जनवरी को भीमा-कोरेगांव में अम्बेडकरवादियों पर हमले के विरोध में शुरू हुई हिंसा की चिंगारी देश की संसद तक पहुंच गई है. इस मामले पर तमाम दलों के नेताओं ने अपने बयान दिए हैं और इस घटना की निंदा की है. लेकिन बात-बात पर ट्विट करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी ने नई बहस को जन्म दे दिया है. इतनी बड़ी घटना पर पीएम मोदी की चुप्पी को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

तीन जनवरी को लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने भीमा-कोरेगांव में दलितों पर हिंसा के मामले को उठाया. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकसभा में बीजेपी को हिंसा के लिए जिम्मेदार बताया था. खड़गे ने कहा कि इस तरह के मुद्दों पर प्रधानमंत्री हमेशा चुप हो जाते हैं और मौनी बाबा बने हुए हैं. खड़गे ने कोरेगांव के मुद्दे पर प्रधानमंत्री से सदन में आकर जवाब देने की मांग की.

इससे पहले कोरेगांव पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी आरएसएस और बीजेपी पर निशाना साधा था. 2 जनवरी को ट्वीट कर राहुल गांधी ने कहा था कि-“भारत के लिए RSS और बीजेपी का फासीवादी दृष्टिकोण ही यही है कि दलितों को भारतीय समाज में निम्न स्तर पर ही बने रहना चाहिए.”तो वहीं गुजरात के वडगाव से एमएलए जिग्नेश मेवाणी ने भी ट्विटर पर पीएम मोदी का एक पुराना विडियो ट्वीट कर उनका मजाक उड़ाया.

दरअसल तमाम मुद्दों पर तुरंत ट्विट कर अपनी राय जाहिर करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर दलितों से जुड़े मामले में चुप्पी साध लेते हैं. गुजरात के उना में दलितों पर हुए अत्याचार और इसके खिलाफ दलितों के आंदोलन के दौरान भी इस पर देशव्यापी बहस छिड़ गई थी, लेकिन पीएम मोदी इस पर कोई भी टिप्पणी करने से लगातार बचते रहें. तो एक बार फिर जब भीमा-कोरेगांव को लेकर बहस छिड़ी है, मोदी ने चुप्पी साध रखी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या देश में दलितों पर हो रही एक के बाद एक अत्याचार की घटनाएं प्रधानमंत्री मोदी के लिए कोई मायने नहीं रखती?

पांच जनवरी को संसद घेरेंगे अम्बेडकरवादी

नई दिल्ली। भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण की रिहाई को लेकर शुरू हुआ आंदोलन जोर पकड़ने लगा है. विगत 5 दिसंबर को राष्ट्रीय दलित महासभा के संयोजन में शुरू किए गए इस अभियान के तहत अब 5 जनवरी यानि कल संसद मार्ग पर विरोध प्रदर्शन होगा. इस दौरान चंद्रशेखर रावण पर से रासुका हटाने के साथ-साथ भीमा-कोरेगांव की घटना को लेकर भी आक्रोश जाहिर किया जाएगा.

इस मसले पर मिलियन लीडर मार्च के राष्ट्रीय संयोजक और राष्ट्रीय दलित महासभा के संस्थापक अशोक भारती ने एक बयान जारी करके जहां भीमा-कोरेगांव की घटना की निंदा की है. साथ ही इसके खिलाफ पांच जनवरी को संसद मार्ग पर लोगों से इकट्ठा होने का आवाहन किया.

इस बीच भीमा-कोरेगांव का मामला गुरुवार को संसद में भी उठा. कांग्रेस सांसद रजनी पाटिल ने सदन में यह मुद्दा उठाया. इस दौरान राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल ने आरोप लगाया कि भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा सरकार के संरक्षण में हुई. फिलहाल कोरेगांव का मुद्दा थमता हुआ नहीं दिख रहा है. 5 जनवरी को अम्बेडकरवादियों के प्रदर्शन के बाद चंद्रशेखर रावण पर से रासुका हटाने और कोरेगांव का मामला और जोर पकड़ सकता है.

नकल नहीं कराने पर दलित छात्रा को बेरहमी से पीटा

0

पटियाला। देश भर में राजनतिक पार्टियां जहाँ दलितों की मदद करने की और उनके हित में काम करने की बात करती हैं वहीं पंजाब के पटियाला शहर में एक दलित छात्रा को बेरहमी से पीटा गया. दलित छात्रा वीरपाल कौर की गलती सिर्फ इतनी थी के उसने परीक्षा मे नक़ल करवाने से इंकार कर दिया था. पटियाला के टोहड़ा गांव के सीनियर सेकेंडरी स्कूल की 10वीं कक्षा की दलित छात्रा ने अनुसूचित जाति आयोग को एक पत्र लिखकर अपने साथ हुए अत्याचार की आपबीती बताई.

वीरपाल कौर ने बताया की परीक्षा में स्कूल के क्लर्क ने अपने भतीजे और उसके दोस्तों को नकल करवाने का दबाव बनाया था लेकिन कौर मना कर दिया. नक़ल न करवाने की वजह से क्लर्क का भतीजा और उसके सहपाठी फेल हो गए. उसके बाद इन सब ने मिल कर छात्रा को बेरहमी से सबके सामने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, वह हाथ जोड़ती रही मगर किसी को भी उस पर तरस नहीं आया.

इसके बाद भी जब उन छात्रों के अहंकार की भूख नहीं मिटी तो उसकी फेसबुक की फेक प्रोफाइल बना कर उसे बदनाम करने की कोशिश की गयी. वीरपाल कौर के पिता को जब इस घटना का पता चला तो उन्होंने भादसों थाने में इसकी शिकायत दर्ज करवाई. इसके बाद तीनों आरोपियों ने छात्रा से न केवल माफी मांगी बल्कि पुलिस को यह भी बताया था कि फेसबुक पोस्ट स्कूल के कलर्क के कहने पर अपलोड की गई थी.

इतना ही नहीं छात्रों ने माफ़ी मांगने के बाद भी उस पर जुल्म करना नहीं छोड़ा. जाती सूचक शब्दों का प्रयोग कर उससे परेशान किया जाता रहा. इसके बावजूद वीरपाल कौर स्कूल की मेधावी छात्रा बनी रही. 10 वीं में उसके 80 फिसदी से ज्यादा अंक आए.

गन्धर्व गुलाटी

सहारनपुर दंगों में जेल गये सदस्यों को भीम आर्मी ने किया सम्मानित

0

सहारनपुर। गुरु रविदास मंदिर में हर साल आयोजित होने वाले कार्यक्रम में इस साल भीम आर्मी ने उन 39 सदस्यों को सम्मानित किया गया. इसमें वो लोग शामिल थे जो मई में हुए सहारनपुर दंगो के दौरान गिरफतार किये गए थे. 1 जनवरी को आयोजित इस कार्यक्रम में लगभग 1000 दलित शामिल हुए, जिसमें ज़मानत पर रिहा किए गाए दलित कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया.

सम्मानित सदस्यों में सहारनपुर भीम आर्मी के अध्यक्ष प्रवीन गौतम, भीम आर्मी प्रवक्ता मनजीत सिहं नौटियाल, एंव जिला अध्यक्ष कमल सिहं वालिया के नाम शामिल हैं. कार्यक्रम के मुख्य प्रबंधक एंव सहारनपुर भीम आर्मी के सचिव प्रमोद कुमार पांडेय के मुताबिक सम्मानित सदस्यों को डायरी और स्मृति चिन्ह दिया गया. इसके पीछे का मकसद समाज को उनसे परिचित कराना और उनके योगदान को लोगो के सामने लाना था.

कार्यक्रम के आयोजन की अनुमत देने वाले सहारनपुर जिला एसपी प्रबल प्रताप सिहं ने कहा कि भीम आर्मी यह आयोजन हर साल करती है, इसलिए इस साल भी यह समारोह आयोजित करने की अनुमति दी गई है और उन्हे इस बात की जानकारी पहले ही थी की इसमें कई सदस्यों को सम्मानित किया जाएगा.

आपको बता दें कि पिछले साल 5 मई को शब्बीरपुर के ठाकुर, महाराना प्रताप की प्रतिमा पर फूलों का हार चढ़ाने के लिए सिमलाना गांव की तरफ जा रहे थे, इस पर आसपास रह रहे दलितों ने तेज़ आवाज़ पर चल रहे गानों पर ऐतराज़ जताया. जल्द ही लड़ाई ने हिंसक रूप ले लिया और ठाकुरों ने और लोग बुलाकर 15 से 20 दलित घरों में आग लगा दी. इसमें काफी लोग घायल हुए थे.

रिपोर्ट- पीयूष शर्मा