बेंगलुरू। गौरी लंकेश हत्याकांड मामले में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने एक और व्यक्ति को गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को कोर्ट में पेश किया गया. इसके बाद कोर्ट ने उसकी कस्टडी 14 दिनों के लिए पुलिस को सौंप दी. पुलिस इस संबंध में अब गिरफ्तार व्यक्ति से पूछताछ करेगी. इस दौरान पुलिस गौरी लंकेश हत्या की गुत्थी सुलझाने की कोशिश करेगी.
गौरतलब है कि कन्नड़ की साप्ताहिक पत्रिका की संपादक गौरी लंकेश की 05 सितंबर, 2017 को उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस मामले की जांच के लिए कर्नाटक सरकार ने स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) का गठन किया है. सीसीटीवी फुटेज में सामने आया है कि हत्यारों ने हत्या वाले दिन लंकेश के घर की दो बार रेकी की थी. सफेद शर्ट और ब्लैक हेलमेट पहने एक व्यक्ति ने दोपहर 3 बजे और फिर शाम 7 बजे घर की रेकी की थी. वह रात 8:05 बजे फिर वहां आया. जब गौरी लंकेश घर पहुंची तो उसने उनपर गोलियां चला दीं. लंकेश ने अपने घर में दाखिल होने की कोशिश की लेकिन वह नीचे गिर पड़ीं और मौके पर ही उनकी मौत हो गई.
नई दिल्ली। चुनाव नजदीक आते ही केंद्र सरकार ने रिटायर्ड शिक्षकों को तोहफा दे दिया है. बीजेपी सरकार ने रिटायर्ड शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों के पेंशन में इजाफा किया है. इससे रिटायर्ड शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों खुश होंगे. केंद्र सरकार ने 23 लाख से अधिक विश्वविद्यालयों व कॉलेजों से रिटायर्ड शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को बड़ा तोहफा दे दिया है. सरकार ने इनकी पेंशन में 18 हजार रुपये तक का इजाफा कर दिया है. मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावेड़कर ने खुद सरकार के इस फैसले की जानकारी ट्विटर के माध्यम से दी.
जान लें कि सरकार की ओर से इन शिक्षक-गैर शिक्षकों को सातवें वेतन आयोग का लाभ दिया गया है. सरकार के इस फैसले से केंद्रीय विश्वविद्यालयों व यूजीसी के आधीन डीम्ड विश्वविद्यालयों के 25 हजार पेंशनरों को फायदा पहुंचेगा. इसके अलावा राज्यों के उन विश्वविद्यालयों व कॉलेजों को भी इसका लाभ मिलेगा, जिनके यहां पर सातवां वेतन आयोग लागू हो चुका है. फिलहाल इसमें आठ लाख शिक्षक व 15 लाख गैर-शिक्षक कर्मचारी रिटायर हो चुके हैं.
नई दिल्ली। दुसरों को ज्ञान देकर जीने की सीख देने वाले भय्यूजी महाराज की मौत ने सबको सदमे में डाल दिया है. मंगलवार को मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में भय्यूजी महाराज ने खुद को गोली मार ली. उन्हें फौरन अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. अभी-अभी भय्यूजी महाराज के मौत के कारण पर कुछ हद तक पर्दा हटा है. उनके पास से सुसाइड नोट बरामद हुआ है जिससे कि उनके मौत का कारण पता चल रहा है.
उनके पास से अंग्रेजी में लिखा सुसाइड नोट मिला है जिसमें कि उन्होंने लिखा है कि काफी परेशान हैं, इस कारण उनकी जिंदगी तनावग्रस्त हो गई है. तनाव के कारण वो खुद को गोली मार रहा हूं. मेरी मौत के लिए परिवार का कोई जिम्मेदार नहीं होगा. हालांकि इसको लेकर कांग्रेस के नेता ने आजतक से कहा कि बीजेपी के दबाव के कारण भय्यूजी महाराज की मौत हुई है.
प्राप्त जानकारी के मुताबिक घटना के फौरन बाद भय्यूजी को इंदौर के बॉम्बे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी मौत हो गई. उन्होंने खुदकुशी क्यों कि इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है. उनकी दर्दनाक मौत से उनके भक्त और समर्थक गहरे सदमे में हैं. मध्य प्रदेश में भय्यूजी महाराज को राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त था. कुछ वक्त पहले ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया था. उनके अलावा 4 अन्य संत भी राज्यमंत्री बनाए गए थे.
इसके अलावा जान लें कि 1968 को जन्मे भय्यूजी महाराज का असली नाम उदय सिंह देखमुख है. वह कपड़ों के एक ब्रांड के लिए कभी मॉडलिंग भी कर चुके हैं. भय्यू जी महाराज ने 2011 में अन्ना हजारे के अनशन अपने हाथ से जूस पीकर अनशन तुड़वाया था. वहीं पीएम बनने के पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी सद्भावना उपवास पर बैठे थे. उस उपवास को तुड़वाने के लिए उन्होंने भय्यू महाराज को आमंत्रित किया था. फिलहाल पुलिस इस मामले की जांच कर रही है.
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में भय्यूजी महाराज ने खुद को गोली मार ली. उन्हें फौरन अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. हालांकि अभी तक घटना के कारणों का पता नहीं चल पाया है. पुलिस मामले की जांच कर रही है.
प्राप्त जानकारी के मुताबिक घटना के फौरन बाद भय्यूजी को इंदौर के बॉम्बे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी मौत हो गई. उन्होंने खुदकुशी क्यों कि इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है. उनकी दर्दनाक मौत से उनके भक्त और समर्थक गहरे सदमे में हैं. मध्य प्रदेश में भय्यूजी महाराज को राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त था. कुछ वक्त पहले ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया था. उनके अलावा 4 अन्य संत भी राज्यमंत्री बनाए गए थे.
इसके अलावा जान लें कि 1968 को जन्मे भय्यूजी महाराज का असली नाम उदय सिंह देखमुख है. वह कपड़ों के एक ब्रांड के लिए कभी मॉडलिंग भी कर चुके हैं. भय्यू जी महाराज ने 2011 में अन्ना हजारे के अनशन अपने हाथ से जूस पीकर अनशन तुड़वाया था. वहीं पीएम बनने के पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी सद्भावना उपवास पर बैठे थे. उस उपवास को तुड़वाने के लिए उन्होंने भय्यू महाराज को आमंत्रित किया था.
लखनऊ। न्यायपालिका को लेकर बसपा प्रमुख मायावती ने भाजपा सरकार की जमकर खिंचाई की. मायावती का कहना है कि सरकार न्यायपालिका को अपना काम स्वतंत्र रुप से करने दे. साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ न्यायपालिका को बार-बार अपमानित करने व उससे नीचा दिखाने की प्रवृत्ति की तीखी आलोचना की.
इनका मानना है कि केन्द्र सरकार का न्यायपालिका के साथ ऐसा विद्वेषपूर्ण बर्ताव सही नहीं है तथा प्रतिपक्षी पार्टियों के साथ-साथ देश की न्यायपालिका के प्रति भी यह केन्द्र सरकार की हठधर्मी व निरंकुशता का द्योतक है. केन्द्र सरकार का कानून मंत्रालय अगर ’’पोस्ट आफिस’’ (डाकघर) नहीं है तो उसे पुलिस थाना (कोतवाली) बनने का भी अधिकार कानून व संविधान ने नहीं दिया है. यह बात श्री नरेन्द्र मोदी सरकार को विनम्रता के साथ स्वीकार करनी चाहिये.
इसके अलावा जजों की नियुक्ति पर उन्होंने कहा कि पहले 300 से ज्यादा जजों के पदों को खाली लटकाये रखना और फिर उसके बाद 126 जजों की नियुक्ति करना यह कौन सा जनहित व देशहित का काम है? नीति-निर्धारण मामलों के साथ-साथ न्यायपालिका में भी दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गो व धार्मिक अल्पसंख्यकों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं होने के कारण भी संविधान को उसकी सही जनहिताय की मंशा के अनुरूप देश में आज तक ढाला नहीं जा सका है. बीजेपी के मंत्रीगण अगर न्यायपालिका का पूरा-पूरा आदर-सम्मान नहीं कर सकते तो कम-से-कम उसका अपमान भी ना करें.
लखनऊ। सरकारी बंगला को लेकर मची घमासान में एक बड़ी खबर आ रही है. योगी सरकार ने मायावती के पुराने सरकारी बंगला पर सुरक्षा बढ़ा दी है. बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) सुप्रीमो मायावती का दांव आखिरकार कारगर साबित होता नजर आ रहा है. यूपी की पूर्व सीएम ने अपने पुराने निवास स्थान 13 ए मॉल एवेन्यू को खाली करने से पहले योगी सरकार को चिट्ठी लिखकर उसे मान्यवर कांशीराम यादगार विश्राम स्थल बताया था. इसके साथ ही मायावती ने योगी आदित्यनाथ सरकार से इस स्थल की सुरक्षा की मांग भी की थी. मान्यवर कांशीराम यादगार विश्राम स्थल मुद्दे को लेकर योगी सरकार ने मायावती की बात मान ली है.
प्राप्त जानकारी के मुताबिक योगी सरकार ने इस स्थल की सुरक्षा के लिए गार्ड तैनात किए हैं. इसके अलावा राज्य संपत्ति विभाग ने भी सफाई के लिए यहां कर्मचारी तैनात किए हैं. इसके अलावा बीएसपी अध्यक्ष के पूर्व निवास स्थान वाले 13 ए मॉल एवेन्यू बंगले पर जल्द ही पुलिस तैनात की जाएगी. राज्य संपत्ति विभाग ने इसके लिए लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक दीपक कुमार को एक पत्र भी लिखा हॉ. राज्य संपत्ति विभाग का कहना है कि यहां मान्यवर कांशीराम की मूर्ति के साथ कई दलित महापुरुषों की मूर्तियां भी हैं, इनकी देखभाल के लिए अभी चार गार्ड लगाए गए हैं.
गन्ना आयुक्त के दफ्तर को तुड़वाकर…
गौरतलब है कि संपत्ति विभाग के मुताबिक गन्ना आयुक्त दफ्तर को कांशीराम मेमोरियल को 13-ए मॉल एवेन्यू बनाया गया था. लेकिन मायावती ने 2007 में सत्ता में आने के बाद गन्ना आयुक्त के दफ्तर को तुड़वाकर अपने 13 मॉल एवेन्यू वाले घर से इसे जोड़ दिया था. इसके बाद मायावती के शासनकाल में ही इसे मान्यवर कांशीराम यादगार स्थल घोषित कर दिया गया.
नई दिल्ली। राजस्थान के स्कूलों में बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए संतो का प्रवचन सुनाया जाएगा. इसके लिए शिक्षा विभाग ने स्कूलों के लिए अतिरिक्त पाठयक्रम गतिविधियों की एक सूची जारी की है. इस सूची के अनुसार महीने के हर तीसरे शनिवार को छात्र स्कूल परिसर में संतों के प्रवचन सुनाए जाएंगे. साथ ही स्कूलों में बाल सभा का आयोजन किया जाएगा. विभाग ने हाल ही में शिविरा पंचांग जारी किया है. इस पंचांग के आधार पर हर तीसरे शनिवार को स्कूलों में राष्ट्रीय महत्व के समसामयिक समाचारों की समीक्षा होगी और किसी महापुरुष या स्थानीय संत के प्रवचन सुनाए जाएंगे. महीने के पहले शनिवार को बच्चों को किसी प्रेरक संत के बारे में जानकारी दी जाएगी.
प्राप्त खबरों के मुताबिक वैसे तो पहले भी स्कूलों के अंदर बाल सभाओं का आयोजन किया जाता था लेकिन वह महज खानापूर्ति हुआ करती थी. मगर अब इसके लिए बकायदा कलेंडर जारी कर दिया गया है. बाल सभाओं में बच्चों को बालसरंक्षण संबंधित मुद्दों पर बाल चलचित्र, चित्रकला प्रतियोगिता आदि के जरिए बाल अधिकार और बाल संरक्षण के संबंध में जागरुकता पैदा करने की कोशिश की जाएगी. इतना ही नहीं इसके साथ ही स्कूलों को बाल सभाओं और उत्सवों का रिकॉर्ड भी रखना होगा. चौथे शनिवार को साहित्य और महाकाव्यों पर प्रश्न व उत्तर का कार्यक्रम रखा जाएगा.
देश में चुनावी वर्ष प्रारंभ हो चुका है और इसी के साथ प्रारंभ हो चुका है आगामी चुनाव जीतने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी का चुनावी तिकड़म. देश में लगातार बढ़ रही मंहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, भूखमरी, आत्महत्या, अपराध, दलितों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों-महिलाओं के उत्पीड़न, महिलाओं के साथ छेड़खानी से लेकर बलात्कार की घटनायें, अमीरों की अमीरी व गरीबों की गरीबी आदि से आम जनता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी सरकार से एवं इसके मुखिया नरेन्द्र मोदी से खासे नाराज व गुस्से में हैं, जिसका प्रदर्शन पिछले वर्ष से ही कई बड़े-बड़े जनांदोलनों के जरिये कर रहे हैं.
केन्द्र सरकार के प्रति आम जनता के तमाम तबकों के आक्रोश से डरी सरकार ने जनांदोलनों का नेतृत्व कर रहे नेताओं व बुद्धिजीवियों को राष्ट्रीय स्तर पर निशाना बनाना पिछले वर्ष से ही प्रारंभ कर दिया था, जिसके बारे में आप भली-भांति जानते हैं (दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईं बाबा से लेकर भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर तक). साथ ही केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने देश से माओवाद को खत्म करने का एलान भी गद्दी संभालते ही किया था, लेकिन सरकार द्वारा करोड़ों-करोड़ रूपये खर्च करने व मिशन-2016 एवं मिशन-2017 के जरिये माओवाद को खत्म करने की तमाम जद्दोजहद के बावजूद भी जब सरकार माओवादियों को जंगल में बहुत अधिक नुकसान नहीं दे पायी, तो अब उसे कुछ नया करने के अलावा कोई उपाय नजर नहीं आया. इसीलिए चुनावी वर्ष की शुरुआत होते ही राष्ट्रीय स्तर पर ‘अरबन माओइस्ट’ का शिगूफा छोड़ा गया और बड़े ही सतही तौर पर ‘अरबन माओइस्ट’ के जरिये ‘प्रधानमंत्री की हत्या’ की साजिश की बात फैलायी जा रही है.
भीमा कोरेगांव में 1 जनवरी को हुई हिंसा को बहाना बनाकर ‘अरबन माओइस्ट’ के नाम पर दिल्ली, मुंबई व पुणे से देश के जाने-माने एक्टिविस्ट रोना विल्सन, वकील सुरेन्द्र गाडलिंग, प्रोफेसर शोमा सेन, दलित एक्टिविस्ट सुधीर ढावले एवं विस्थापन विरोधी नेता महेश राउत को 6 जून को गिरफ्तार कर लिया गया है. 6 जून को ही डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन (डीएसयू) के तेलंगाना राज्य अध्यक्ष कंचरला बद्री, राज्य कार्यकारणी सदस्य सुधीर एवं ओस्मानिया यूनिवर्सिटी मेम्बर रंजीत को ही पुलिस ने हैदराबाद से ‘अपहरण’ कर लिया और 2-3 दिन के बाद उनके साथियों के काफी मशक्क्त के बाद ही उसे कोर्ट में पेश किया. फिर 10 जून को तेलंगाना डेमोक्रेटिक फ्रंट (टीडीएफ) के राज्य संयोजक बंदी दुर्गा प्रसाद को भी हैदराबाद से गिरफ्तार कर लिया गया. बेशक, हैदराबाद से गिरफ्तार इन चारों को भी ‘अरबन माओइस्ट’ से ही विभूषित किया गया.
देश के अन्य राज्यों की तरह झारखंड में भी केन्द्र व राज्य सरकार के खिलाफ आम जनता के आक्रोश का विस्फोट पिछले वर्ष से ही लगातार बड़े-बड़े जनांदोलनों के जरिये हुआ है. सीएनटी-एसपीटी एक्ट में किये जा रहे संशोधनों के खिलाफ व गलत स्थानीयता नीति के खिलाफ व्यापक जनांदोलन की बात हो या फिर फर्जी मुठभेड़ में कोबरा द्वारा डोली मजदूर मोतीलाल बास्के की हत्या के खिलाफ उभरा अनोखा जनांदोलन, कई जगहों पर पुलिसिया गुंडागर्दी के खिलाफ जनता का स्वतःस्फूर्त्त आंदोलन हो व अपने हक-अधिकार के लिये ‘पत्थलगढ़ी आंदोलन’ हो, झारखंड भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी सरकार के खिलाफ अपने हक-अधिकार के लिये देश के अन्य हिस्सों के आंदोलनकारियों के साथ कदमताल कर रहा था. झारखंड में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी की ही सरकार है और इसके मुखिया हैं रघुवर दास, वैसे तो आजसू भी सत्ता में साझीउार है, लेकिन उसकी कोई औकाद नहीं है. झारखंड में व्यापक होते जनांदोलन एवं सरकार की नीतियों के खिलाफ कई किस्म के बनते संयुक्त मोर्चे ने रघुवर सरकार को सोचने को मजबूर कर दिया और सरकार ने इन सभी से निपटने के लिए अपने परंपरागत ‘दमन’ अधिकार को अपनाया.
इसकी शुरुआत हुई 7 नवंबर 2017 से, 7 नवंबर 2017 को झारखंड में 13 जनसंगठनों (जिसमें कई मजदूर संगठन, महिला संगठन, युवा संगठन व विस्थापित संगठन शामिल थे) के जरिये बनाये गये ‘महान बोल्शेविक क्रांति शताब्दी समारोह समिति, झारखंड’ के द्वारा गिरिडीह में समारोह का आयोजन किया गया था, इस समारोह में उमड़ी भीड़ से डरकर सरकार ने ‘ भाकपा (माओवादी) के नेताओं के इशारे पर उग्र प्रदर्शन व सशस्त्र क्रांति छेड़ने संबंधी नारे लगाने’ का आरोप लगाकर ‘महान बोल्शेविक क्रांति शताब्दी समारोह समिति, झारखंड’ के संयोजक बच्चा सिंह (रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियन ‘मजदूर संगठन समिति’ के केन्द्रीय महासचिव), सह-संयोजक दामोदर तुरी (विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजन समिति सदस्य), मजदूर संगठन समिति के वरिष्ठ नेता शहजाद अंसारी, कन्हाई पांडेय, गिरिडीह शाखा के अध्यक्ष प्रधान मुर्मू, सचिव अमित यादव, राजेन्द्र कोल, तुलसी तुरी, रंजीत राय, राजन तुरी, मनोज टुडू, दिलेश्वर कोल (कुल-12) पर नामजद व 800 अज्ञात पर मुफस्सिल थाना, गिरिडीह में कांड संख्या-386/17 धारा- 147, 148, 149, 341, 342, 323, 504, 506 एवं 353 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. यह मुकदमा झारखंड में आंदोलनकारी ताकतों को डरा नहीं सकी और सरकार की पुलिस मशीनरी से लड़ते-भिड़ते ‘महान बोल्शेविक क्रांति शताब्दी समारोह समिति, झारखंड’ ने 30 नवंबर 2017 तक 17 जगहों पर बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह का सफलतापूर्वक आयोजन किया. जनता के इस जुझारूपन को देखते हुए और फर्जी मुठभेड़ में मारे गये डोली मजदूर मोतीलाल बास्के के मामाले में अपनी व अपने सिपहसलार डीजीपी डीके पांडेय का गर्दन फंसता देख झारखंड सरकार ने झारखंड के आंदोलनकारियों की मुख्य आवाज बन कर उभर रहे ‘मजदूर संगठन समिति’ को भाकपा (माओवादी) का फ्रंटल संगठन बताते हुए 22 दिसंबर 2017 को प्रतिबंधित करने की घोषणा कर दी, जबकि ‘मजदूर संगठन समिति’ एक रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियन (पंजीयन संख्या-3113/89) था एवं 1989 से ही पंजीकृत था.
मजदूर संगठन समिति पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही झारखंड सरकार ने मजदूर नेताओं पर राजकीय दमन अभियान तेज कर दिया. मजदूर संगठन समिति के कई कार्यालयों को सील कर दिया गया, केन्द्रीय कार्यालय सहित कई शाखाओं व केन्द्रीय नेताओं सहित कई शाखाओं के मजदूर नेताओं के बैंक अकाउंट को फ्रीज कर दिया गया. गिरिडीह के मधुबन में मजदूर संगठन समिति के नेतृत्व में ‘डोली मजदूर कल्याण कोष’ से संचालित मजदूरों का, मजदूरों के लिये व मजदूरों के द्वारा नारे के आधार पर चलाये जा रहे ‘श्रमजीवी अस्पताल’ को भी सील करते हुए ‘डोली मजदूर कल्याण कोष’ के बैंक अकाउंट को भी फ्रीज कर दिया गया. त्रिपक्षीय समझौते (मजदूर संगठन समिति, जैन संस्था व जिला प्रशासन) के तहत ‘डोली मजदूर कल्याण कोष’ संग्रह कर रहे तीन मजदूर नेताओं व कार्यकर्त्ताओं अजय हेम्ब्रम, दयाचन्द हेम्ब्रम व मोहन मुर्मू को 24 दिसंबर 2017 को मधुबन से गिरफ्तार कर लिया गया और इन तीनों समेत मजदूर संगठन समिति के केन्द्रीय महासचिव बच्चा सिंह, विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजन समिति सदस्य दामोदर तुरी (मजदूर संगठन समिति पर प्रतिबंध की घोषणा करते हुए झारखंड सरकार ने दामोदर तुरी को भी मसंस का मुख्य संचालक बताया था), मसंस के मधुबन शाखा के अध्यक्ष अजीत राय, सचिव थानुराम महतो, कोषाध्यक्ष द्वारिका राय, कार्यालय सचिव नारायण महतो एवं मांसु हांसदा पर मधुबन थाना कांड संख्या-28/17 के अधीन 17 सीएलए एवं 10/13 यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया और गिरफ्तार तीनों को गिरिडीह जेल भेज दिया गया, जो कि अभी तक जेल में ही बंद हैं.
मधुबन थाना में यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज होने के बाद 30 दिसंबर 2017 को बोकारो जिला के बोकारो थर्मल थाना में थाना कांड संख्या– 139/17 के अधीन धारा 17 (1) (2) सीएलए के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. फिर 21 जनवरी 2018 को धनबाद जिला के कतरास थाना में थाना कांड संख्या 13/18 के अधीन 13 यूएपीए व 17 सीएलए के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. इन दोनों मुकदमों में भी एक साजिश के तहत बच्चा सिंह और दामोदर तुरी के साथ स्थानीय नेताओं का भी नाम दर्ज किया गया.
15 फरवरी 2018 को रांची के एक हॉल में लोकतंत्र बचाओ मंच द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद देश में विस्थापन विरोधी आवाज के रूप में उभर रहे व झारखंड में विस्थापितों की आवाज उठाने वाले प्रमुख नेताओं में से एक दामोदर तुरी को गिरफ्तार कर लिया गया और गिरिडीह जेल भेज दिया गया. झारखंड सरकार ने इनकी गिरफ्तारी को भी ‘अरबन माओइस्ट’ की गिरफ्तारी की तरह ही पेश किया. गिरिडीह जेल से जमानत मिलने के बाद अभी ये धनबाद जेल में बंद हैं.
1 मई 2018 को गिरिडीह के मुफस्सिल थानान्तर्गत एक गांव में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस समारोह समिति के बैनर तले ‘अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस’ मन रहे 13 मजदूर नेताओं- कन्हाई पांडेय, प्रधाल मुर्मू, मसूदन कोल, डेलियन कोल, कालीचरण साव, रंजीत राय, गुजर राय, लखन कोल, धनेश्वर कोल, अरविन्द लाल टुडू, कोलेश्वर कोल, सीताराम सोरेन एवं राजेन्द्र कोल को गिरफ्तार कर लिया गया और मुफस्सिल थाना कांड संख्या- 144/18 के अधीन धारा 188, 124ए, 34 एवं 10/13 यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज कर गिरिडीह जेल भेज दिया, जो कि अब तक गिरिडीह जेल में ही बंद हैं. ज्ञात हो कि इन सभी मजदूर नेताओं में से किसी पर भी पहले से किसी मुकदमे मे वारंट नहीं था. 7 नवंबर 2017 को इनमें से कुछ नेताओं पर मुकदमा दर्ज जरूर हुआ था, लेकिन उस मुकदमे में सभी ने जमानत ले लिया था. इन 13 मजदूर नेताओं को भी माओवादियों के शहरी चेहरे के बतौर ही झारखंड सरकार ने चित्रित किया.
मजदूर संगठन समिति पर झारखंड सरकार द्वारा प्रतिबंध की घोषणा के तुरंत बाद ही इसके नेता बच्चा सिंह ने रांची उच्च न्यायालय में ‘प्रतिबंध’ को चुनौती दी थी, लेकिन आज तक उसपर बहस नहीं हुई है. इस बीच बच्चा सिंह व अन्य नेताओं पर विभिन्न थानों में हुए मुकदमे में (सिर्फ बोकारो थर्मल में दर्ज हुए मुकदमे को छोड़कर) मजदूर नेताओं की गिरफ्तारी पर रांची उच्च न्यायालय ने स्टे लगा दिया था. मजदूर संगठन समिति पर प्रतिबंध के बाद जहां-जहां भी इस यूनियन का सघन कार्य था, वहां प्रबंधन की मनमानी बढ़ने लगी थी और इसके खिलाफ मजदूरों का आक्रोश भी. फलतः मजदूरों ने जगह-जगह पर नये-नये नाम से मजदूर संगठन बनाकर आंदोलन प्रारंभ कर दिया और 1 मई 2018 को ‘अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस’ व 5 मई 2018 को ‘मार्क्स का दो सौवां जन्मदिवस’ भी कई जगहों पर शानदार ढंग से मनाया. झारखंड सरकार ने इस सब के पीछे बच्चा सिंह का हाथ महसूस किया और उनकी गिरफ्तारी के लिये एक टीम बनाकर बोकारो पुलिस ने रात-दिन एक कर दिया. 31 मई 2018 को बच्चा सिंह अपने संगठन के केन्द्रीय सचिव दीपक कुमार के साथ बोकरो जिला के चन्दनकियारी के पर्वतपुर गांव में महावीर मंडल के घर में ठहरा हुआ था, वहीं से पुलिस ने अपने मुखबिर से सूचना पाकर रात के 11ः30-12ः00 बजे उनदोनों को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन पुलिस गिरफ्तारी से इंकार करती रही. 1 जून से ही सोशल साइट पर गिरफ्तारी की बात वायरल होने व 2 जून को बच्चा सिंह की पत्ना बबली देवी द्वारा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पति व उनके सहयोगी को कोर्ट में पेश करने की मांग करने अन्यथा कानूनी कार्रवाई की धमकी देने के बाद 3 जून की सुबह में बोकारो एसपी द्वारा प्रेस कांफ्रेंस में दोनों नेताओं को सामने लाया गया और बाद में तेनुघाट जेल भेज दिया गया. लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी 2 जून को दिखायी. मालूम हो कि दीपक कुमार पर पहले से कोई मुकदमा ना होने के बावजूद भी मजदूर संगठन समिति का केन्द्रीय सचिव होने के कारण ही उन्हें भी जेल भेज दिया. झारखंड सरकार ने इन दोनों की गिरफ्तारी को भी ‘अरबन माओइस्ट’ के बतौर ही दिखाया.
इस प्रकार झारखंड में अब तक मजदूरों के बीच माओवादी विचारधारा के प्रचारक व संगठक का आरोप लगाते हुए 18 मजदूर नेताओं व कार्यतर्त्ताओं के साथ-साथ विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन के नेता को भी मजदूर नेता बताते हुए खतरनाक काला कानून ‘यूएपीए’ के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया है और अभी भी कई मजदूर नेताओं पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है. झारखंड सरकार इन गिरफ्तारियों के जरिये मजदूरों के अनन्त शोषण, दलितों-अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले, भूख से हो रही मौतों, जंगलों-पहाड़ों पर सेना के आर्मर यूनिट द्वारा मोर्टारों व रॉकेट लांचरों से बरसाये जा रहे गोलों व जंगलो-पहाड़ों पर रहनेवाली आदिवासी जनता के साथ पुलिस द्वारा किये जा रहे कुकृत्यों के खिलाफ उठ रही आवाजों को दबाना चाहती है और साथ ही 16-17 फरवरी 2017 को ‘मोमेंटम झारखंड’ में देशी-विदेशी पूंजीपतियों के साथ किये गये 210 एमओयू (210 एमओयू के तहत हजारों एकड़ जमीने पूंजीपतियों को सौंपी जानी है, जिससे लाखों लोग विस्थापित होंगे) को धरातल पर उतारना चाहती है.
-रूपेश कुमार सिंह, स्वतंत्र पत्रकार
(नोट- लेख में दर्ज थाना कांड संख्या व मजदूर नेताओं पर लगाया गया धारा विभिन्न अखबारों में छपे समाचार से लिया गया है.)
कानपुर। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बेहतर स्वास्थ्य के लिए बीजेपी कार्यकर्ताओं की ओर से हवन-पूजन कराई जा रही है. यहां तक विपक्षी दल के नेता भी अटल बिहारी वाजपेयी के स्वास्थ्य के लिए कामना कर रहे हैं. लोकप्रिया नेता के स्वास्थ्य बिगड़ने से देशभर में लोग निराश हैं और इनके लिए दुआएं मांग रहे हैं.
मंगलवार को मिली जानकारी के मुताबिक अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिये कानपुर में बीजेपी कार्यकर्ताओं की ओर हवन-पूजन किया जा रहा है. पूर्व पीएम वाजपेयी का कानपुर से बहुत ही पुराना रिश्ता रहा है. वाजपेयी ने कानपुर के डीएवी कॉलेज से पढ़ाई की है और यहां उनसे जुड़े कई किस्से आज भी लोगों को याद हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि डीएवी कॉलेज में अटल जी ने अपने पिता के साथ ही एडमिशन लिया था. वाजपेयी कई सालों तक कानपुर में रहे.
जान लें कि सोमवार 11 जून को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एम्स में भर्ती कराया गया था. श्री वाजपेयी डिमेंशिया व यूरीन इन्फेक्शन से ग्रसित हैं. एम्स में भर्ती होने के बाद सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इनसे मुलाकात की. जांच में रिपोर्ट में उनको यूरीन इन्फेक्शन की बात सामने आई थी. मंगलवार को आई खबर के मुताबिक उनकी हालत में सुधार है और उन्हें आज छुट्टी मिल सकती है.
हैदराबाद। भारत के मंदिरों में दलितों को घुसने तक नहीं दिया जाता है तो ऐसे में एक चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है. हां, थोड़ी देर के लिए हैरानी हो सकती है लेकिन सच तो यही है. हैदराबाद में एक पुजारी अपने कंधे पर दलित भक्त को मंदिर में ले जाकर दर्शन कराएगा. गुंटूर जिला के पुजारी ने भी फैसला किया है कि वह एक बुजुर्ग दलित भक्त को अपने कंधे पर बैठाकर मंदिर का दर्शन कराएंगे. हालांकि इस तरह की पहल की शुरूआत कहीं ओर से हुई थी जो कि आगे पता चलेगा.
फिलहाल रंगराजन पुजारी कल्याणपुरम विजय कुमार 14 जून को गुंटूर के मोहन रंगानायक स्वामी मंदिर में 70 वर्षीय कुल्लाई चिन्ना नरसिंहुलु दलित बुजुर्ग को अपने कंधों पर जुलूस में ले जाने का फैसला किया है. इस फैसले का स्वागत किया जा रहा है. साथ ही लोगों का कहना है कि इससे हमारे समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा और भेदभाव खत्म होगा. इस कार्यक्रम में आंध्र प्रदेश के पूर्व मंत्री और गुंटूर जिले के टीडीपी के एक प्रमुख दलित नेता मणिका वाराप्रसाद राव ने शहर के मोहन रंगानायक स्वामी मंदिर में गुरुवार के समारोह का आयोजित करने की बात कही.
जातिवाद मिटाने के लिए पंडित की पहल…
इस पहल को 16 अप्रैल को प्रसिध्द बालाजी मंदिर के पुजारी सीएस रंगराजन ने आरंभ किया था. जिंहोंने चिल्कुर में 16 अप्रैल को दलित आदित्य परासरी को रंगनाथ मंदिर ले गये और युवक ने पूजा की थी. इसके बाद कई पुजारियों ने इस प्रकार के आयोजन में रुचि दिखाई. रंगराजन ने कहा कि कई पुजारियों की रूचि देखकर पहल सार्थक हो रहा है. इससे समानता व समरसता का संदेश फैल रहा है. संभावना है कि पूरे भारतवर्ष में ऐसी परंपरा लागू होगी और लोग जातिवाद को मिटाने के लिए आगे आएंगे.
नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी खराब स्वास्थ्य के चलते एम्स में भर्ती की खबर सुनकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उन्हें देखने एम्स गए हैं. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को जांच के लिए दिल्ली स्थित प्रसिद्ध ऑल इंडिया इन्स्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (AIIMS) में भर्ती कराया गया है. ऐसा कहा जा रहा है कि वह लंबे समय से बीमार चल रहे हैं.
हालांकि इसको लेकर बीजेपी की तरफ से जारी बयान में बताया गया कि वाजपेयी को रूटीन चेकअप के लिए एम्स ले जाया गया था, जहां डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें एडमिट कर लिया गया. वाजपेयी को एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया की निगरानी में रखा गया है. उधर एम्स की तरफ से जारी मेडिकल बुलेटिन में पूर्व प्रधानमंत्री की सेहत स्थिर बनी हुई है. जिससे घबराने की जरूरत नहीं है. बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी पिछले काफी समय से डिमेंशिया से जूझ रहे हैं.
पटना। बिहार के मुख्यमंत्री लगातार भाजपा से निराश दिख रहे हैं. पहले प्रधानमंत्री फसल बीमा को नकार दिया और अब बाढ़ राहत के लिए मिली राशि को उचित नहीं बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार इस पर ध्यान दे. इसको लेकर नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली से उम्मीद है कि वो पिछले साल बाढ़ राहत के लिए केंद्र द्वारा दी गयी राशि पर कोई निर्णय लेंगे. नीतीश ने सोमवार को इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा कि फ़िलहाल केंद्र द्वारा जो 1700 करोड़ की राशि दी गयी वो उचित नहीं है. नीतीश ने कहा कि जब उन्हें बाढ़ राहत के मद में मंत्रीमंडल समिति द्वारा निर्धारित राशि के विषय में पता चला तब उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात कर बातचीत की.
उन्होंने कहा कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को भी इस विषय में अवगत कराया था. बिहार सरकार ने पिछले साल बाढ़ के बाद केंद्र से 7300 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी. नीतीश के अनुसार अधिकारियों की जिस टीम ने हालात का जायज़ा लिया था उसने राज्य को 1700 करोड़ से अधिक की राशि देने की अनुशंसा की जिसे केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नामंज़ूर कर दिया. लेकिन नीतीश ने कहा कि अब उच्च स्तर पर सबके संज्ञान में बातों को ला दिया है और उम्मीद करते हैं कि जल्द इस सम्बंध में निर्णय होगा. हालांकि इससे नीतीश कुमार की नाराजगी दिख रही है लेकिन फिलहाल बिहार की भलाई के लिए केंद्र सरकार से आस लगाए बैठे हैं.
बहुत कम लोगो को जानकारी होगी कि दिल्ली का प्रेमलता हत्याकांड सन् 1974 का दलित स्त्री अस्मितार्थ पहला दलित आन्दोलन था जिसका संयुक्त नेतृत्व रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया व भारतीय बौद्ध महासभा दिल्ली के कार्यकर्ताओ ने किया था!
प्रेमलता दिल्ली के कस्तूरबा गांधी हायर सेकंडरी स्कूल,ईश्वर नगर, ओखला नयी दिल्ली छात्रावास मे रहती व पढती थी ! जो 10 वी क्लास की अनुसूचित जाति की छात्रा व बापा नगर, करोल बाग दिल्ली की रहने वाली थी और उसकी सहेली उषा रानी भी जो बाद मे पढ लिखकर दिल्ली नगर निगम के प्राइमरी स्कूल मे नियुक्त हो प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुयी है ! एक दिन प्रेम लता की हत्या कर उसकी लाश कुंऐ मे डाल दी ,जो छात्रावास कैम्पस मे ही था ! जब उसके घर वालो को पता चला तो आक्रोशित परिवार जनसमर्थन ले सडको पर उतर आन्दोलित हो गया और पुलिस प्रशासन की अकर्मण्यता देख बापा नगर की पुलिस चौकी फूंक दी! थाने पर विशाल प्रदर्शन हुआ जिसने आक्रामक रूप ले लिया ! विदित हो कि देव नगर/ बापा नगर मे जूते चप्पल बनाने के कारखाने थे ! जूते चप्पल चिपकाने वाले सलोचन बम का खुलकर प्रयोग हुआ जंहा भी फैंका वही आग लगती चली गयी जो आन्दोलन मे काफी मारक हथियार सिध्द हुआ, जिसमे दिल्ली के सभी दलित संगठन एकजूट हो उठ खडे हुऐ ! ज्ञात हो कि 1965 के चुनाव के बाद उत्तर भारत मे रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया प्रो बी.पी.मोर्य के नेतृत्व मे पूरे उफान के साथ उभर कर आ रही थी! 1967 मे दिल्ली के कार्पोरेशन चुनाव मे RPI के कार्पोरेटर चुनाव जीत कर आऐ जिनमे डा.अब्बास मलिक एक धाकड़ नेता के रूप मे उभरे जो जामा मस्जिद एरिया से जीत कर दिल्ली नगर निगम मे पार्षद बन पहुचे इधर दादा साहेब गायकवाड व बैरिस्टर खोब्रागड़े की पकड भी उत्तर भारत मे बन रही थी जबकि प्रो बी.पी.मोर्य व संघप्रिय गौतम की पहचान उत्तर भारत मे एक कुशल वक्ता व राजनेता के रूप मे पहले से ही स्थापित हो चुकी थी जिन्हे दलितो का बेताज बादशाह शोषित वंचित समाज के लोग कहने लगे थे! जंहा कंही पर भी दलित उत्पीड़न घटना होती तो यह दोनो एक स्वर से उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाते ! क्योकि 1957 के चुनाव मे जिन 25 लोगो को बाबा साहेब डा.अम्बेडकर ने विदेश पढने भेजा उनमे से 12 सासंद लोक सभा मे चुनकर आ गये थे ! जो बैरिस्टर के साथ साथ बुध्दजीवी भी थे ! बैरिस्टर खोब्रागड़े राज्यसभा के उपसभापति भी बने!
संयुक्त विधायक दल से भी यू.पी.पंजाब व एम.पी.से विधायक सासंद चुनकर आने लगे ! और दलितो के सामाजिक राजनीतिक मुद्दे तेजी से राष्ट्रीय पटल पर उभर कर आने लगे ! परिणाम स्वरूप प्रेमलता हत्याकांड को राज नेताओ ने अपने हाथ मे लेकर आवाज उठाई! न्याय के लिये जेल भरो आंदोलन शुरू हुआ ! और हजारो लोग जेल गये,जिनमे युवा महिलाओ के साथ नौजवा व बडे बूढो ने उत्पीड़न के खिलाफ दिल्ली की तिहाड जेल भर दी ! जिन पर बाद मे सरकारी मुकदमे भी कायम हुऐ ! परन्तु, किसी बडे अखबार ने इस आन्दोलन का नोटिस नही लिया व छोटी-मोटी खबर हाशिये पर देखने को मिलती ! तब भारतीय बौद्ध महासभा ने निर्णय लिया की अपने पत्र-पत्रिकाये निकलनी चाहिए तो महासभा की और से ” धम्म दर्पण ” त्रैमासिक पत्रिका को निकाला गया जिसका सम्पादन दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कैन मुख्य संपादक व सम्पादन मंडल मे महासभा के अध्यक्ष व अन्य पदाधिकारी होते, जो आज सुचारू रूप से अम्बेड़कर भवन से निकल रही है ! शान्ति स्वरूप शान्त इसकी कला सज्जा को देखते थे ! पीछे लिखे सूत्र वाक्य स्वय मैने ( डा.कुसुम वियोगी ) ने धम्म दर्पण के लिये लिखकर दिये ! कई नारे भी बौद्ध आन्दोलन को लिखकर दिये ,मसलन बाबा साहब की अंतिम इच्छा! बौध्द धम्म की ले लो दीक्षा!!
हमारा नारा ! समता मैत्री भाईचारा !!
बौध्द धम्म की क्या पहचान ! मानव मानव एक समान !! आदि !
स्त्री अस्मितार्थ उत्तर भारत का पहला ऐसा दलित आन्दोलन था !
जिसकी अगुवाई मे बैरिस्टर खोब्रागड़े, दादा साहेब गायकवाड, डा अब्बास मलिक व महाशय हरदेव सिह प्रो बी.पी.मोर्य प्रमुख थे ! जिन्हें दिल्ली रिपब्लिकन पार्टी के पदाधिकारियो को अपने चलाये आन्दोलन जलसे जुलूस मे सिरकत करने को बुलाते थे ! साथ ही भारतीय बौद्ध महासभा दिल्ली से लील चंद बौद्ध, एस.पी.सिह,भगवान दास,रोहिताश सिह रवि ,गुडहाई मौहल्ले से कैन व पंडित टी.आर.आनंद आदि प्रमुख रहे थे ! जो समाज के लोगो को एकजूट करते और बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार भी दलित बस्तियो मे करते ! उसी दौरान मै (कुसुम वियोगी) भारतीय बौद्ध महासभा के संपर्क मे आया ! और जन जाग्रति के गीत कविता मंचो से पढने लगे दूसरी तरफ एस.पी.सिह की सुपुत्री प्रेमलता गौतम मंचो से महिलाओ को अपने लिखे गीतो से आन्दोलित करती! विदित हो की जब भी कंही दलित समाज के जलसा /जुलूस होते तो पहले कवियो का कविता पाठ होता व भजनी प्रचारक गीत संगीत वाद्य यंत्रो से प्रस्तुत करते और फिर दलित चेतना को तहरीरे चलती,जो एक स्वस्थ परम्परा बन गयी थी ! उधर अम्बेड़करवादी प्रचारक मोती लाल संत,बुध्द संघ प्रेमी,हापुड के मिशन सिह बौद्ध,सूरज भान आजाद आदि प्रमुख लोक गायक थे !उसी समय शाहदरा के प्रतिष्ठित जनकवि बिहारी लाल हरित की तूती बोलती थी ! जिनके संपर्क बाबा साहब डा अम्बेड़कर व बाबू जगजीवन राम से भी रहे ! आप उस समय के ख्याति प्राप्त जनकवि समाज सुधारक थे ! जो “गोवर्धन बिहारी कहे करारी” के नाम से भी दिल्ली और बाहर के सूबे मे प्रसिद्ध थे ! उसी सत्तर के दशक मे महिला जाग्रति संगठन भारतीय बौद्ध महासभा दिल्ली बनाती और सामाजिक,धार्मिक कार्यो के साथ अपने राजनीतिक संगठन RPI को बल प्रदान करती ! गीतो के माध्यम से घर घर अलख जगाने के कार्यक्रम चलते!
जब प्रेमलता हत्याकांड को महाशय हरदेव सिह जो भजनी समाज सुधारक प्रचारक भी थे व रिपब्लिकन पार्टी दिल्ली के अध्यक्ष भी ! इनके साथ नेताजी तेज सिह सगर भी रहे जो संघर्ष शील जुझारू नेता थे ! साउथ दिल्ली मे ब्रहमजीत नेताजी रिपब्लिकन पार्टी के जुझारू नेता थे जो आज 99 साल की अवस्था मे अभी जीवित है ! जिनके सिर से नीली टोपी कभी नही उतरी ! जो यमुनापार शाहदरा मे रहते थे !वाल्मीकि समाज के पहले अम्बेड़करवादी बुध्दिस्ट थे ! जिनका परिवार आज भी शाहदरा मे रह रहा है ! लेखक का इन सभी से पारिवारिक नजदीकी संपर्क रहा ! भाई शेखर पंवार जो दलित साहित्य के प्रखर हस्ताक्षर है वो भी विश्वास नगर शाहदरा मे रहते थे जो अस्सी के दशक मे शाहदरा मे आकर किराये पर रहने लगे थे जो सरकारी सेवारत थे व नागपुर के प्रखर दलित साहित्यकार भी !उनका भी संपर्क इन सब लोगो से रहा ! जब मेरा उनका परिचय हुआ तो मराठी व हिन्दी साहित्य व आन्दोलनो पर चर्चा होती रहती थी ! मराठी साहित्यकार जो भी दिल्ली आता तो साहित्य को लेकर आपसी विमर्श होता चाहे वो दया पंवार रहे हो या डा.यशवंत मनोहर व डा.विमल कीर्ति,प्रभाकर गजभिये व वासनिक रहे हो वा मराठी कवि केशव मेश्राम, मोरे तथा अन्य मराठी साहित्यकार सब आकर वयोवृद्ध जनकवि बिहारी लाल हरित से आकर अवश्य मिलते और समय समय पर परिचर्चा व काव्य-गोष्ठी व हिन्दी उर्दू कवि-सम्मेलन मुशायरा होते और एक नयी दलित साहित्य आन्दोलन की धारा सत्तर अस्सी के दशक मे फूटी दलित साहित्यकारो मे एल.एन.सुथाकर, एन.आर.सागर,राजपाल सिंह राज, याद करन याद,आर.डी शास्त्री,हिमांशु राय,नत्थू सिह पथिक, मोती लाल संत,नत्थू राम ताम्रमेली,डा.राजपाल सिह राज,डा.सुखबीरसिह,डा.कुसुम वियोगी,मान सिह मान,भीमसैन संतोष,बुद्ध संघ प्रेमी,जालिम सिह निराला,आर.डी.निमेष,मंशा राम विद्रोही,कर्मशील अधूरा,के.पी.सिह आदित्य आदि प्रमुख थे! बाद मे अन्य कवि लेखक भी जुड़ते रहे तथा 1984 मे भारतीय दलित साहित्य मंच की स्थापना हुयी!
15 अगस्त सन् 1997 को डा.कुसुम वियोगी के प्रयास से लेखक के घर पर ” दलित लेखक संघ ” की स्थापना हुयी और 21 वी सदी का पहला अंतरराष्ट्रीय दलित साहित्यकार सम्मेलन डा.अम्बेडकरस्टडी सर्कल चंडीगढ व दलित लेखक संघ के सहयोग से दो दिवसीय सम्मेलन हुआ जिसके मुख्य कोऑर्डिनेटर डा.कुसुम वियोगी रहे, जिसमे देश विदेश के लगभग 450 अकादमिक व नान अकादमिक कवि/लेखक/साहित्यकारो ने भाग लिया था ! जिसमे विशेष अतिथि बतौर पंजाब के क्रांतिकारी कवि लाल सिह ” दिल ” रहे ! बाद मे दलित साहित्य विभिन्न भाषाओ मे आने लगा ! मराठी साहित्य का अनुवाद हिंदी मे और हिंदी का मराठी अनुवाद भाई शेखर पंवार ने किया ! यह दलित साहित्य आन्दोलन फूले/अम्बेड़कर /बुध्द की विचारधारा को समाहित कर आने लगा और आज साहित्य और समाज मे अपनी पकड बनायी ! आज देश विदेश के कालेज विद्यालयो के पाठ्यक्रमो मे पढाया जा रहा है ! जब भी उत्तर भारत मे अत्याचार होते कवि लेखक प्रतिरोध स्वरूप कविताऐ /गीत लिख सामाजिक /साहित्यक राजनीतिक आन्दोलन को गति प्रदान करते थे ! आज नये दलित साहित्यकार विभिन्न विधाओ मे लिख नये -नये प्रतिमान गढ रहे है!
उस समय के सामाजिक आन्दोलन की एक बडी भूमिका यह भी रही कि सभी नीली टोपी के नेता कहते तुम पढे लिखे बुध्दजीवी प्रत्याशी चुनो, समाज को जगाओ और रिपब्लिकन पार्टी से चुनाव लडाओ !
आज राजनीतिक परिस्थितिया भिन्न है ! सब दलित नेता रिजर्व सीट से चुनकर आते है और समाज हित से अधिक अपने हित लाभ मे अधिक मस्त/व्यस्त रहते है दलित उत्पीड़न के नाम पर मौन साधे पडे रहते है ! आज के नेता बाबासाहेब डा.अम्बेडकर के विपरीत ही कार्य करते नजर आते है ! जिन्होने दलित समाज से अपना विश्वास भी खो दिया है ! फलस्वरूप बसपा का गठन हुआ और जुझारू रिपब्लिकन पार्टी टुकडो मे बंटकर रह गयी और राजनैतिक आन्दोलनो की धार कुंद होती चली गयी !
कहना अतिशयोक्ति न होगी की स्त्री अस्मितार्थ प्रेमलता हत्याकांड उत्तर भारत का प्रथम दलित आन्दोलन था ! जिसका सामूहिक नेतृत्व रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया व भारतीय बौद्ध महासभा के द्वारा हुआ और सफल भी हुआ और दोषी दंडित भी हुऐ ! दलित साहित्यकारो ने अपनी-अपनी रचनाओ से जन जागरण के आन्दोलन को आगे बढाया ! आज दलित साहित्य की विश्व स्तरीय मान्यता है और इसका एक बडा पाठक वर्ग भी है जो परम्परागत साहित्य को सीधे-सीधे चुनौती दे खारिज कर रहा है और हाशिये के लोगो की आवाज को बुलन्द कर रहा है!
संपर्क :- डा.कुसुम वियोगी
( वरिष्ठ अम्बेड़करवादी लेखक, कवि/कथाकार /चिंतक साहित्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता है ! )
1/4334-ए, प्रग्या रामनगर विस्तार, मंड़ोली रोड, शाहदरा दिल्ली -110032
मोबाइल न: 09911409360
ज्ञात हो कि निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है. ऐसे में भाजपा के शीर्ष नेता सुब्रहमनियम स्वामी का यह कहना, ‘सरकारी नौकरियों में एससी और एसटी को मिलने वाले आरक्षण के नियमों को इतना शिथिल कर दिया जाएगा कि आरक्षण को किसी भी नीति के तहत समाप्त करने की जरूरत ही नहीं होगी, धीरे-धीरे स्वत: ही शिथिल हो जाएगा.’…आजकल यह सच होता नजर आ रहा है.
सरकार ने अपने चहेतों को अधिकारी बनाने के लिए बेक डोर एंट्री के जरिए प्रशासनिक सुधार के नाम पर सीधे संयुक्त सचिव बनाने के लिए ऑफर दिया है. अधिकारी बनने के लिए अब यूपीएससी की सिविल सर्विस परीक्षा पास करना जरूरी नहीं होगा. दरअसल मोदी सरकार ने नौकरशाही में प्रवेश पाने का अब तक सबसे बड़ा बदलाव कर दिया है. एक फैसले के बाद अब प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले सीनियर अधिकारी भी सरकार का हिस्सा बन सकते हैं. लैटरल (बैकडोर) एंट्री के जरिए सरकार ने इस योजना को नया रूप दे दिया है. रविवार (10.06.2018) को इन पदों पर नियुक्ति के लिए डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल ऐंड ट्रेनिंग (DoPT) के लिए विस्तार से गाइडलाइंस के साथ अधिसूचना जारी की गई है. शुरू से ही पीएम नरेन्द्र मोदी ब्यूरोक्रेसी में लैटरल एंट्री के के हिमायती रहे हैं. इसलिए सरकार अब इसके लिए सर्विस रूल में जरूरी बदलाव भी करेगी. डीओपीटी की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार मंत्रालयों में जॉइंट सेक्रटरी के पद पर नियुक्ति होगी.
इन पदों पर आवेदन के लिए अधिकतम उम्र की सीमा तय नहीं की गई है. इनका वेतन केंद्र सरकार के अंतर्गत जॉइंट सेक्रटरी वाला होगा. सारी सुविधा उसी अनुरूप ही मिलेगी. इन्हें सर्विस रूल की तरह काम करना होगा और दूसरी सुविधाएं भी उसी अनुरूप मिलेंगी. मालूम हो कि किसी मंत्रालय या विभाग में जॉइंट सेक्रटरी का पद काफी अहम होता है और तमाम बड़ी नीतियों को अंतिम रूप देने में या उनके अमल में इनका अहम योगदान होता है.
नवभारत टाइम्स के अनुसार इनके चयन के लिए किसी भी प्रत्याशी को कैबेनेट सेक्रेटरी की अगुवाई वाली कमिटी के सामने केवल एक इंटरव्यू देना होगा. योग्यता के अनुसार सामान्य ग्रेजुएट और किसी सरकारी, पब्लिक सेक्टर यूनिट, यूनिवर्सिटी के अलावा किसी प्राइवेट कंपनी में 15 साल काम का अनुभव रखने वाले भी इन पदों के लिए आवेदन दे सकते हैं. आवेदन में योग्यता इस तरह तय की गई है कि उस हिसाब से कहीं भी 15 साल का अनुभव रखने वालों के सरकार के टॉप ब्यूरोक्रेसी में डायरेक्ट एंट्री का रास्ता खुल गया है…. क्या ऐसे नियुक्त अधिकारियों को ‘पैराशूट अधिकारी’ की संज्ञा से नहीं नवाजा जाना चाहिए?
कहा जा रहा है कि राष्ट्र निर्माण में निजी क्षेत्र के प्रतिभाशाली और प्रेरणादायी लोगों का सहयोग लेने के लिए सरकार ने अपने कई विभागों में वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर सीधी भर्ती का फैसला किया है. यह भर्ती संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा से इतर होगी और इसमें संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे. प्रयोग के तौर पर फिलहाल केवल दस पदों पर भर्ती की जाएगी. प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापन के अनुसार सरकार प्रतिभाशाली लोगों को आमंत्रित कर रही है. ये लोग राजस्व, आर्थिक सेवाओं, आर्थिक मामलों, कृषि, समन्वय, कृषक कल्याण, सड़क परिवहन और राजमार्ग, जहाजरानी, पर्यावरण, वन और पर्यावरण, नई और अक्षय ऊर्जा, नागरिक उड्डयन और वाणिज्य क्षेत्र में कार्य करने के लिए आमंत्रित किए गए हैं. केंद्र सरकार के नियुक्ति और प्रशिक्षण विभाग की ओर से जारी परिपत्र में कहा गया है कि भारत सरकार प्रतिभाशाली लोगों की सेवाएं संयुक्त सचिव स्तर पर लेकर उन्हें राष्ट्र निर्माण से जोड़ने की इच्छुक है. यह नियुक्ति शुरुआत में तीन साल के लिए होगी. अगर प्रदर्शन अच्छा देखा गया तो उनके कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाया जा सकता है.
ये लोग विभाग के सचिव और अतिरिक्त सचिव के मातहत कार्य करेंगे, जो आमतौर पर आइएएस, आइपीएस, आइएफएस और अन्य अधीनस्थ सेवाओं के होते हैं. वैसे केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी भी इन्हीं सेवाओं से आए होते हैं. इनकी भर्ती संघ लोक सेवा आयोग द्वारा त्रिस्तरीय परीक्षा के जरिये की जाती है. निजी क्षेत्र के जिन विशेषज्ञों को सरकारी सेवा के लिए आमंत्रित किया गया है, उनकी एक जुलाई, 2018 को न्यूनतम 40 वर्ष की आयु होनी चाहिए. वे ग्रेजुएट होने चाहिए. अतिरिक्त योग्यता वाले आवेदनकर्ता को अतिरिक्त लाभ मिलेगा. निजी क्षेत्र के उपक्रमों, स्वायत्त संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों में कार्यरत लोग भी आवेदन कर सकते हैं. उनके लिए 15 साल का अनुभव आवश्यक होगा. चयनित अधिकारियों का वेतनमान संयुक्त सचिव के समकक्ष ही होगा. भत्ते और सुविधाएं के अतिरिक्त होंगे.
नौकरशाही के पिछले दरवाजे को निजी क्षेत्र के पेशेवरों के लिए खोलने के लिए केंद्र सरकार के फैसले पर कांग्रेस और माकपा ने जमकर विरोध जताया है. जबकि नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है. कांग्रेस प्रवक्ता पी एल पूनिया ने कहा कि इस प्रकार की भर्तियों के जरिये सरकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भाजपा और कुछ चहेते औद्योगिक घरानों के लोगों को सरकारी मशीनरी में फिट करना चाहती है. इससे जवाबदेही पर आधारित पूरे तंत्र का नाश हो जाएगा. अभी तक आइ ए एस अधिकारियों की भर्ती की जो प्रक्रिया है, वह पूरी तरह से पारदर्शी है, सरकार उसको भी खत्म करना चाहती है. पूनिया खुद भी पूर्व आइएएस अधिकारी हैं.
माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा है कि सरकार इन नियुक्तियों के बहाने संघ से जुड़े लोगों को सरकारी पदों पर बैठाना चाहती है ताकि नौकरशाही में दखल कायम किया जा सके. हमारा स्पष्ट मानना है कि यह कदम देश के लिए कुल मिलाकर नुकसानदायक साबित होगा. सरकार को इस तरह के कदम से बचना चाहिए.
नवभारत टाइम्स का यह भी कहना है कि इस प्रकार की सीधी भर्ती का पहला प्रस्ताव 2005 में प्रशासनिक सुधार पर पहली रिपोर्ट में आया था, लेकिन तब इसे सिरे से खारिज कर दिया गया था. फिर 2010 में आई प्रशासनिक सुधार पर दूसरी रिपोर्ट में भी ऐसा करने की सिफारिश की गई, वो भी बेनतीजारही. लेकिन पहली गम्भीर पहल पर 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद हुई. पीएम ने 2016 में इसकी संभावना तलाशने के लिए फिर कमिटी बनाई, जिसने अपनी रिपोर्ट में इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ने की अनुशंसा करदी….. भला करती भी क्यों न?… कमिटी मोदी सरकार द्वारा जो बनाई गई थी.
यथोक्त के आलोक में यहाँ पुन: उल्लिखित है कि भाजपा के शीर्ष नेता सुब्रहमनियम स्वामी का यह कहना, ‘सरकारी नौकरियों में एस सी और एस टी को मिलने वाले आरक्षण के नियमों को इतना शिथिल कर दिया जाएगा कि आरक्षण को किसी भी नीति के तहत समाप्त करने की जरूरत ही नहीं होगी, धीरे-धीरे स्वत: ही शिथिल हो जाएगा.’ आज इसकी शुरुआत होती नजर आ रही है. ज्ञात हो कि निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है. एस सी/एस टी और ओ बी सी वर्ग के लिए आज का दिन कोTop of Form
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भारत के सामाजिक लोकतंत्र के इतिहास में एक कलंकित दिन के तौर पर याद किया जाएगा. स्मरण रहे कि इस आशय के विज्ञापन में साफ-साफ लिखा है कि ये अफसर निजी क्षेत्र या विदेशी कंपनियों से भी हो सकते हैं. किंतु इन नियुक्तियों में एस सी, एस टी, ओ बी सी और विकलांगों (SC, ST, OBC, PH) को प्रदत्त आरक्षण की सुविधा समेत अन्य किन्हीं संवैधानिक नियमों का पालन नहीं होगा. कहना अतिशयोक्ति न होगा कि आप इसे सरकारी नौकरियों में आरक्षण की समाप्ति की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा और पहला कदम मान सकते हैं.
दिलीप मंडल का कहना है कि ऐसा करके सरकार संविधान के कई अनुच्छेदों का सीधा उल्लंघन कर रही है. अनुच्छेद 15 (4) का यह सीधा उल्लंघन है, जिसमें प्रावधान है कि सरकार वंचितों के लिए विशेष प्रावधान करेगी. अनुच्छेद 16 (4) में लिखा है कि सरकार के किसी भी स्तर पर अगर वंचित समुदायों के लोग पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, तो उन्हें आरक्षण दिया जाएगा. ज्वांयट सेक्रेटरी लेबल पर चूंकि एस सी, एस टी, ओ बी सी के लोग पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, इसलिए उनकी नियुक्ति में आरक्षण न देने का आज का विज्ञापन 16(4) का स्पष्ट उल्लंघन है. अनुच्छेद 15 और 16 मूल अधिकार हैं. यानी वर्तमानभारत सरकार नागरिकों के मूल अधिकारों के हनन की अपराधी है. इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 315 से 323 में यह बताया गया कि केंद्रीय लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी होगा, जो केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों को नियुक्त करेगा. अनुच्छेद 320 पढ़िए –
rticle 320- Functions of Public Service Commissions. It shall be the duty of the Union and the State Public Service Commissions to conduct examinations for appointments to the services of the Union and the services of the State respectively.
यहाँ ये सवाल अति प्रासंगिक है कि ऐसे में सरकार यूपीएससी को बाइपास करके और बगैर किसी परीक्षा और आरक्षण के अफसरों को सीधे नीतिगत पदों पर नियुक्त कैसे कर सकती है? यह मामला जटिल है और बहुत बड़ा मामला है. आम जनता को इसे समझाना होगा ताकि वह सरकार पर दबाव डालने के लिए आगे आ सके. यह काम समाज के प्रबुद्ध यानी पढ़े-लिखे लोगों का है. अगर आज सरकार ज्वायंट सेक्रेटरी की नियुक्ति बिना परीक्षा और बिना आरक्षण के कर ले गई, तो आगे चलकर क्या हो सकता है, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है.
शातिर दिमाग बीजेपी-आरएसएस आरक्षण खत्म करने की घोषणा कभी नहीं करेगी. वह ऐसे ही शातिर तरीके से आरक्षण को बेअसर कर देगी. यदि अब भी एस सी, एस टी और ओबीसी के लोग सामाजिक स्तर पर एकजुट न हुए तो भावी परिणाम बहुत ही भयंकर और कष्टकारी होंगे. भाजपा का मानना है कि भाजपा ने आरक्षण को नही हटाने की बात कहकर एस सी , एस टी, ओबीसी आदि आरक्षित वर्ग के वोट तो पक्के कर ही लिये हैं, अब उन्हें केवल नारों के बल पर बहलाया-फुसलाया जाना काफी आसान है….. शायद भाजपा इस सोचकर मुंगेरी लाल के जैसे सुनहरे सपने देख रही है. फिर भी, यहाँ मुझे अपना ही एक शेर याद आ रहा है –
देखकर वादों की माला मालिकों के हाथ में,
भुखमरों की मांग में सिन्दूर सा भर जाता है.
लेखक: तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह और अन्य. तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं. स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं. हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं.
पटना। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने अपने दोनों बेटों के बीच उठे विवाद को सुलझा लिया है. बड़े बेटे तेजप्रताप की मांग का समर्थन करते हुए लालू यादव ने तेजप्रताप के सहयोगी राजेंद्र पासवान को पार्टी का प्रदेश महासचिव नियुक्त कर दिया है. इस घटना के बाद फिलहाल लालू के दोनों बेटों के बीच विवाद की बात समाप्त हो गई है.
दरअसल लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक वारिस के तौर पर उभरे उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव पार्टी से लेकर प्रदेश तक में अपना कद बढ़ाने में जुटे हैं. लालू को सजा होने के बाद से अघोषित तौर पर आरजेडी की कमान तेजस्वी के हाथों में ही है. तेजस्वी के नाम को लेकर बड़े भाई तेजप्रताप का भी समर्थन है. तेजप्रताप ने कभी भी अपने बड़े होने की बात कह कर सत्ता और पद पर दावेदारी नहीं की. बल्कि वह तेजस्वी को अपने जिगड़ का टुकड़ा बताते हैं.
लेकिन जब पार्टी में उनकी बात नहीं सुनी गई तो तेजप्रताप ने बागी रुख अख्तियार किया, जिससे पार्टी से लेकर बिहार की सियासत तक में भूचाल आ गया. अपनी उपेक्षा से दुखी तेजप्रताप ने यहां तक कह दिया था कि वो राजपाठ छोड़कर ‘द्वारका’ जाना चाहते हैं. इसके बाद पार्टी ने समय रहते उसे तवज्जो दी और उनके करीबी नेता राजेंद्र पासवान को प्रदेश महासचिव नियुक्त कर दिया. इसके जरिए तेजप्रताप संदेश देने में सफल रहे हैं कि पार्टी में उनकी भी बराबर चलेगी. और उन्हें नजरअंदाज करना पार्टी नेताओं के लिए मुसीबत का सबब बन सकता है. हालांकि तेजस्वी यादव ने भी बड़े भाई को मार्गदर्शक बताया.
इस पूरे मामले में लालू प्रसाद की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही. राजनीति के दिग्गज खिलाड़ी रहे लालू ने वक्त रहते तुरंत हस्तक्षेप किया और तेजप्रताप की बात को सही ठहराया. लालू के बेटों को समझा दिया कि ऐसे मामले में फायदा विपक्षी दलों को होता है और कार्यकर्ताओं के बीच गलत संदेश जाता है. जिसे दोनों ने समझा और मामले को तुरंत सुलझा लिया गया. आखिरकार लालू ने पार्टी में पॉवर बैलेंस बनाने का फॉर्मूला निकाला. तेजप्रताप के करीबी को उनके मन के मुताबिक पद दिलाया. इसके बाद साबित हो गया है कि आरजेडी में सिर्फ तेजस्वी ही नहीं बल्कि तेजप्रताप की भी चलेगी.
नई दिल्ली। सनी लियोनी के बॉलीवुड में आने के बाद इनसे जुड़े कई विवाद सामने आ चुके हैं. हालांकि ज्यादातर लोग सनी लियोनी को पॉर्न स्टार की हैसियत से ही देखते हैं और अभिनेत्री का दर्जा नहीं देने की बात करते हैं लेकिन गुजरात के युवा नेता हार्दिक पटेल ने सनी लियोनी के पक्ष में अपनी बात रखी है.
पाटीदार नेता हार्दिक पटेल का मानना है कि पॉर्न स्टार से बॉलीवुड अभिनेत्री बनी सनी लियोनी को फिल्मी पर्दे पर उसी नजरिये से देखा जाना चाहिए, जिस निगाह से नर्गिस, श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित जैसी मशहूर अभिनेत्रियों को देखा जाता है.
पटेल ने संवाददाताओं से कहा, “अगर हम सनी लियोनी को फिल्मी पर्दे पर उसी नजरिये से देखें, जिस तरह हम नर्गिस, श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित को देखते हैं, तो इसमें भला दिक्कत क्या है? हमें सनी लियोनी को फिल्मी पर्दे पर गलत नजर से क्यों देखना चाहिए?” उन्होंने कहा, “अगर हमारी सोच ऐसी है कि हम अब भी सनी लियोनी को उनकी पुरानी छवि से ही देखना चाहते हैं, तो यह देश कभी नहीं बदल सकता.”
लखनऊ। एक बार फिर बीजेपी की मनमानी को देखते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने केंद्र सरकार पर जमकर बरसी. मायावती ने यूपीएससी में संयुक्त सचिव के पदों पर प्राइवेट नियुक्ति के फैसले से लेकर गोरखपुर मेडिकल कालेज के चर्चित डा. कफील खान के भाई काशिफ जमील पर रविवार रात हुये कातिलाना हमले के साथ-साथ इलाहाबाद में वकील रवि तिवारी की हत्या की तीव्र निन्दा की. बहन मायावती ने कहा कि ये घटनायें उत्तर प्रदेश में बढ़ते जंगलराज का प्रमाण नहीं तो और क्या हैं? प्रदेश में बीजेपी सरकार को जनसुरक्षा, जनहित व जनकल्याण पर ख़ास ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत है.
इस दौरान विशेष तौर पर यूपीएससी मुद्दे को लेकर कहा कि विभागों के प्राइवेट लोगों को ’संयुक्त सचिव’ स्तर पर नियुक्ति वास्तव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार की प्रशासनिक विफलता का परिणाम लगता है तथा खतरनाक प्रवृति को दर्शाता है. साथ ही उत्तर प्रदेश में बढ़ रहे अपराध को लेकर कहा कि यह जंगलराज के प्रमाण हैं. बीजेपी के नेताओं को जुमलेबाजी के सिवा कुछ नहीं आता. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी पर तंज कसते हुए कहा कि आज बीजेपी का हर स्तर का नेता यह मानकर चलने लगा है कि ‘‘संइया भये कोतवाल तो अब डर काह का.”
समस्तीपुर। जातिगत वैमनस्य और दलितों के खिलाफ हो रहे अत्याचार का अत्यंत गंभीर और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना समस्तीपुर जिले के मोरवा प्रखंड के गनई बहसी पंचायत के मोड़ा खुर्द गांव में हुआ है. जहां पर समाज के सामंतवादियों ने पासवान दलित समाज के लोगों पर लाठी बंदूक और पत्थर से जानलेवा हमला किया है. हमले में दर्जन हर लोग घायल है जिनका राजस्थानी अस्पताल में चल रहा है.
गौरतलब है कि कुछ महीने पहले गांव में अवस्थित दलित समाज के धर्म स्थान सलहेश मंदिर में दबंगों के द्वारा तोड़फोड़ किया गया और दलितों के टोला को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली सड़क निर्माण का दबंगों ने विरोध किया गया जिसके कारण दबंगों और पासवान जाति के दलित समाज के लोगों के बीच तनाव व्याप्त हो गया.
कंबल ओढा करके ईटा पत्थर…
इसी दौरान एक दलित मजदूर कमलेश पासवान पिता स्वर्गीय जगमोहन पासवान दूसरे गांव से मजदूरी करके वापस अपने घर वापस आ रहे थे जिसको दबंग लोग पकड़ कर के बांधकर कंबल ओढा करके ईटा पत्थर और 5 किलो का जो बंटखारा से उसे मारा और बुरी तरह घायल कर दिया. जिसके बाद उसका उपचार स्थानीय ताजपुर सरकारी अस्पताल में किया गया जहां पता चला कि उसका रीड का हड्डी टूटा हुआ है उसके बाद उसको जंदाहा के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है जहा वह इलाजरत है.
इस पूरे मामले से आहत और भयभीत दलित समाज के लोग अपनी सुरक्षा के लिए स्थानीय प्रशासन के पास गए और थाना में FIR दर्ज कराया आरोप स्थानीय वैशाली जिला के मोहरा बुजुर्ग गांव के माओवादी पृष्ठभूमि दबंगों पर लगा . इसी मामले में आगे चलकर मामला न्यायालय में गया और न्यायालय ने उक्त धर्म स्थान तथा सड़क निर्माण के जमीन और उसमें रखे गए सामान पर धारा 144 लगा दिया जिसके बाद सामान और उक्त जमीन का उपयोग कोई भी नहीं कर सकता था.
दिनांक 09/06/2018 को थाना प्रभारी के संवेदनहीनता के कारण सामंतवाद दबंग लोग विवादित निर्माण स्थल जहां पर धारा 144 लागू है वहां पर रखे गए बालू सीमेंट इत्यादि को उठाने लगे जिसका विरोध दलित समाज के लोगों ने किया.
लाठी बंदूक गोली की आवाज
उस वक्त स्थानीय पुलिस भी वहां पर उपस्थित थी लेकिन इसके बाबजूद पुलिस के सामने में फिर से दलितों पर हमला किया गया हमलावरों के ज्यादा संख्या में हथियारबंद होने के कारण पीड़ित दलित समाज के लोग अपने घर की ओर वापस चले आए और अपने-अपने घर में बैठ गए.
इसी दिन जब रात के लगभग 12:00 बज रहा था अब विरोधी सामंतवादी दबंग लोग लाठी डंडे पत्थर और बंदूक के साथ फिर से दलितों पर हमला के लिए दलित बस्ती ने पहुंच गए और जानलेवा हमला कर दिया. लाठी बंदूक गोली की आवाज और जान माल जाने के भय के कारण दलित समाज के लोग अपने घरों में ही बंद रहे और कैसे कैसे करके अपनी जान बचाई तत समय कोई भी उनकी सहायता के लिए प्रशासन की तरफ से नहीं आया.
स्थानीय अखबार प्रभात खबर में प्रकाशित इस दलित उत्पीड़न की जघन्य घटना की खबर को पढ़कर आज जब हमने पीड़ित पक्ष के लोगों से फोन पर बात किया तो उन लोगों ने यह सारी जानकारी हमें फोन पर बताई. जिसके बाद हमने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य श्री योगेंद्र पासवान जी से संपर्क किया और इस घटना के बारे में उनसे जानना चाहा उन्होंने कहा इसकी लिखित कोई भी सूचना हमारे पास नहीं है यदि कोई सूचना या शिकायत आएगी तो हम अवश्य ही विधिसम्मत कार्रवाई करेंगे.
पीड़ित पक्ष के लोगों ने यह भी कहा कि हम लोग प्रशासन से सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं लेकिन प्रशासन राजनीतिक दबाव के कारण अभी तक आरोपी लोगों को गिरफ्तारी नहीं कर रहे हैं और नीचे से ऊपर तक अधिकारियों सामंतवाद दबंग जाति के नेताओं के द्वारा प्रेशर डाला जा रहा है कि कोई कार्यवाही ना करें. इन सबके बीच पीड़ित परिवार डरा-सहमा और भयभीत है पीड़ितों ने फोन पर बताया कि उनका गांव में रहना मुश्किल हो गया है कभी भी हम लोगों का सामूहिक हत्या हो सकती है और मां बहन का इज्जत लूटा जा सकता है .
यदि प्रशासन हम लोगों को सहायता नहीं करता है तो हम लोगों के पास गांव छोड़ने के अलावे कोई भी उपाय नहीं होगा क्योंकि दबंग लोग हमला करने के बाद भी उन पर केस होने के बाद भी खुलेआम घूम रहे हैं और धमकी दे रहे हैं कि तुम हमारा क्या बिगाड़ लोगे. आपको बता दें कि घटना में पिरित और आरोपित दोनों तरफ से एफआईआर की गई है दलित समाज के लोगों ने बताया है कि हम लोग के द्वारा किए गए मुकदमा के बाद दबंगों ने लूटपाट का मुकदमा हम लोगों को डराने धमकाने के लिए कराया है.
दबंगो के द्वारा किए गए जानलेवा हमला में दर्जनभर दलित समाज के लोग घायल हैं. घायलों में मुख्यत प्रेम चंद्र पासवान, दशरथ पासवान, उपेंद्र पासवान, प्रशांत पासवान, रामबालक पासवान, योगेश्वर पासवान तथा एक महिला बबीता देवी व पति योगेश्वर पासवान का नाम बताया जा रहा है.
नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एम्स में भर्ती कराने की बात कही जा रही है. सोमवार को उनको एम्स अस्पताल ले जाया गया है. इस खबर से उनके शुभचिंतक निराश दिख रहे हैं. हालांकि उनको लेकर तमाम प्रकार की बात कही जा रही है लेकिन फिलहाल डराने वाली कोई खबर सामने नहीं आई है.
बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी इससे पहले फरवरी 2009 में अटल बिहारी वाजपेयी को करीब 9 दिन तक एम्स में रखा गया था, चेस्ट इंफेक्शन की शिकायत के बाद उन्हें भर्ती कराया गया था, जबकि 2010 में भी वाजपेयी जी को एम्स के कार्डियो न्यूरो सेंटर में भर्ती कराया गया था.
बीजेपी का बयान
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को नई दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया है. बीजेपी के द्वारा जारी इस खबर के बाद उनके शुभचिंतक परेशान हो गए. तमाम तरह के कयास लगाए जाने लगे. लेकिन एम्स के निदेशक रणदीप गुलरिया ने सभी अटकलों पर विराम लगा दिया है. वाजपेयी जी को उन्हीं की देख-रेख में एम्स में रखा गया है.
बीजेपी ने भी बयान जारी कर कहा है कि वाजपेयी जी को सिर्फ रूटीन चेकअप के लिए भर्ती कराया गया है. हर दो महीने पर रूटीन चेकअप के लिए वाजपेयी जी को एम्स ले जाया जाता है. कई बार उनके घर पर ही डॉक्टर रूटीन चेकअप के लिए पहुंचते हैं. इसके अलावा ‘आजतक’ से बातचीत में एम्स निदेशक ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री को रूटीन चेकअप के लिए भर्ती कराया गया है. वो बिल्कुल ठीक हैं. उन्होंने कहा कि सभी जरूरी जांच के बाद उन्हें आज शाम ही डिस्चार्ज कर दिया जाएगा.
गौरतलब है कि 93 वर्षीय अटल बिहारी वाजपेयी डिमेंशिया नाम की बीमारी से जूझ रहे है. वे 2009 से व्हीलचेयर पर हैं. वाजपेयी 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लखनऊ से लोकसभा सदस्य चुने गए थे. 25 दिसम्बर, 1924 में जन्मे वाजपेयी ने भारत छोड़ो आंदोलन के जरिए 1942 में भारतीय राजनीति में कदम रखा था.
दिल्ली। देश की राजधानी में एक और मशहूर बाबा पर रेप करने का आरोप लगा है. इसको लेकर दाती महाराज पर केस दर्ज कर ली गई है. पीड़िता का कहना है कि महाराज ने मंदिर के भीतर ही उसके साथ दुष्कर्म किया था. सनसनीखेज आरोप के साथ ही बाबा को लेकर चर्चा छिड़ गई है.
बेटी दाती महाराज के संरक्षण में…
एएनआई खबर के अनुसार दिल्ली के फतेहपुर बेरी इलाके में मशहूर शनिधाम मंदिर के संस्थापक दाती महाराज पर एक महिला ने रेप का आरोप लगाया है. महिला ने दाती महाराज के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है. पुलिस ने बताया कि पीड़िता की शिकायत पर दाती महाराज के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 354, 376 और 377 के तहत केस दर्ज कर लिया गया है. पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा है कि दो साल पहले दाती महाराज ने उसके साथ मंदिर के अंदर ही रेप किया था. इतना ही नहीं पीड़िता ने यह भी कहा है कि रेप करने के बाद दाती महाराज ने उसे यह बात किसी को न बताने की धमकी भी दी थी. वहीं पीड़िता के पिता ने बताया कि उस समय उन्होंने अपनी बेटी को दाती महाराज के संरक्षण में उनके आश्रम में ही छोड़ दिया था. हालांकि इसको लेकर जांच चल रही है.