लखनऊ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के वार्षिकोत्सव में जाने से रोकने के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत गरमा गई है. समाजवादी छात्र सभा ने अखिलेश यादव को इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाया था, लेकिन युनिवर्सिटी ने उनके कार्यक्रम पर रोक लगा दी, जिसके बाद अखिलेश यादव को लखनऊ एयरपोर्ट पर ही रोक दिया गया. इसको लेकर समाजवादी पार्टी ने जहां जमकर बवाल काटा तो वहीं उसे बसपा का भी साथ मिला है.
बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष सुश्री मायावती ने एक बयान जारी कर योगी सरकार के इस कदम की आलोचना की और सीएम योगी को जमकर घेरा. बसपा प्रमुख ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद श्री अखिलेश यादव को इलाहाबाद जाने से रोकने की निंदा करते हुए इसे राजनीति से प्रेरित कदम बताया. उन्होंने कहा कि योगी सरकार का ऐसा कदम भाजपा सरकार की तानाशाही और लोकतंत्र की हत्या का प्रतीक भी है. सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री ने इस घटना पर भाजपा को घेरते हुए कहा कि क्या बीजेपी की केंद्र व राज्य सरकार बी.एस.पी व सपा गठबंधन से इतनी ज्यादा भयभीत व बौखला गई है कि अब वह उन्हें अपनी राजनीतिक गतिविधि व पार्टी प्रोग्राम आदि करने पर भी रोक लगाने पर तुल गई है. यह अति दुर्भाग्यपूर्ण है. बसपा प्रमुख ने कहा कि ऐसी अलोकतांत्रिक कार्रवाईयों का हर स्तर पर डट कर मुकाबला किया जाएगा.



जावडे़कर ने राज्यसभा में बताया था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर लागू की गयी 200 सूत्री रोस्टर प्रणाली के खिलाफ केन्द्र सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर विशेष अनुमति याचिका खारिज करने के बाद सरकार अब पुनर्विचार याचिका दायर करेगी. जावड़ेकर ने कहा कि पुनर्विचार याचिका खारिज होने की स्थिति में हम अध्यादेश या विधेयक लाने का फैसला किया है’. जावड़ेकर ने इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरा होने तक उच्च शिक्षण संस्थाओं में नियुक्ति या भर्ती प्रक्रिया बंद रहने का भी भरोसा दिलाया.
हालांकि जावड़ेकर के बयान से इतर इस संबंध में बहुजन समाज के अध्यापकों ने शैक्षणिक संस्थानों द्वारा भर्तियां निकाले जाने का आरोप लगाया है. इस मुद्दे पर 31 जनवरी को दिल्ली में बड़े आंदोलन के बाद देश के तमाम हिस्सों में 13 प्वाइंट रोस्टर को लेकर विरोध-प्रदर्शन जारी है. देखना यह होगा कि सरकार आखिर अपने कहे पर कितना कायम रहती है और इसके लिए कितना वक्त लेती है. फिलहाल बहुजन संगठनों के विरोध को देखते हुए साफ है कि जब तक सरकार इस पर अध्यादेश लेकर नहीं आती, तब तक वो आंदोलन जारी रखेंगे.
नई दिल्ली। अम्बेडकरी आंदोलन की सजग प्रहरी बहुचर्चित मासिक पत्रिका “दलित दस्तक” ने बाबासाहेब द्वारा निकाले गए पहले समाचार पत्र ‘मूकनायक’ के सौ वर्ष पूरा होने पर आगामी वर्ष 2020 में 31 जनवरी को भव्य कार्यक्रम करने का ऐलान किया है. दलित दस्तक इस दिन ‘अम्बेडकरी पत्रकारिता के सौ वर्ष’ का महा उत्सव मनाएगी. इसकी घोषणा सोशल मीडिया फेसबुक पर पत्रिका के प्रमुख संपादक और प्रकाशक अशोक दास ने की. गौर हो कि 31 जनवरी 1920 को बाबासाहेब ने ‘मूकनायक’ के नाम से अपना पहला समाचार पत्र निकाला था. दलित दस्तक की टीम इस दिन को यादगार बनाना चाहती है. जहां तक दलित दस्तक की बात है तो यह पत्रिका जून 2012 से निरंतर प्रकाशित हो रही है और बहुजन आंदोलन में इसका एक अहम स्थान है. देश के 25 राज्यों में इसका प्रसार है और इससे लाखों पाठक जुड़े हैं.



उस समय मेरी इन तीनों शर्तों को ‘दलेस’ के अधिकारियों ने मानने के लिए अपनी सहमति प्रदान कर दी थी. लेकिन कुछ दलित लेखकों को जिन्हें गैर-दलितों का हुक्का भरने और ठकुरसुहाती करने की आदत है, वो मेरी बातों से सहमत नहीं हो सके और तरह-तरह के कुतर्क देकर अपनी ही चलाते रहें.
हालांकि उप सभापति की ओर से इस मुद्दे पर चर्चा नहीं कराए जाने पर सपा, बसपा और राजद के सांसदों ने हंगामा करना शुरू कर दिया. पहले उन्होंने संदन के बीच आकर मुद्दे पर चर्चा कराने और 13 प्वाइंट रोस्टर निरस्त कर 200 प्वाइंट रोस्टर पर बिल लाने की मांग की. फिर संसद स्थगित होने पर सांसद गांधी प्रतिमा के सामने आकर प्रदर्शन करने लगे. इससे साफ है कि सड़क पर बहुजन समाज के लोगों द्वारा रोस्टर को लेकर शुरू की गई लड़ाई अब संसद में बड़ा मुद्दा बनने वाली है, जिसको टाल पाना सत्ताधारी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा.