अखिलेश यादव को इलाहाबाद जाने से रोकने पर भड़कीं मायावती, योगी को लताड़ा

लखनऊ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के वार्षिकोत्सव में जाने से रोकने के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत गरमा गई है. समाजवादी छात्र सभा ने अखिलेश यादव को इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाया था, लेकिन युनिवर्सिटी ने उनके कार्यक्रम पर रोक लगा दी, जिसके बाद अखिलेश यादव को लखनऊ एयरपोर्ट पर ही रोक दिया गया. इसको लेकर समाजवादी पार्टी ने जहां जमकर बवाल काटा तो वहीं उसे बसपा का भी साथ मिला है.

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष सुश्री मायावती ने एक बयान जारी कर योगी सरकार के इस कदम की आलोचना की और सीएम योगी को जमकर घेरा. बसपा प्रमुख ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद श्री अखिलेश यादव को इलाहाबाद जाने से रोकने की निंदा करते हुए इसे राजनीति से प्रेरित कदम बताया. उन्होंने कहा कि योगी सरकार का ऐसा कदम भाजपा सरकार की तानाशाही और लोकतंत्र की हत्या का प्रतीक भी है. सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री ने इस घटना पर भाजपा को घेरते हुए कहा कि क्या बीजेपी की केंद्र व राज्य सरकार बी.एस.पी व सपा गठबंधन से इतनी ज्यादा भयभीत व बौखला गई है कि अब वह उन्हें अपनी राजनीतिक गतिविधि व पार्टी प्रोग्राम आदि करने पर भी रोक लगाने पर तुल गई है. यह अति दुर्भाग्यपूर्ण है. बसपा प्रमुख ने कहा कि ऐसी अलोकतांत्रिक कार्रवाईयों का हर स्तर पर डट कर मुकाबला किया जाएगा.

योगीराज में गायों की दुर्दशा

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उत्तर प्रदेश राज्य के जनपद मुज़फ्फरनगर में लगभग 150 से ज्यादा गाय की मौत का मामला सामना आया है. इस पूरी घटना को देखते हुए सबसे बड़ा चोकाने वाली बात ये है. कि आखिरकार भारतीय जनता पार्टी के मुख्य मंत्री माननीय योगी आदित्यनाथ के राज में गाय की मौतों की तादात बढ़ने के साथ आखिर क्यों मर रही है लगातार गाय, ये यूपी सरकार के साथ साथ जिला प्रसाशन के लिए एक बड़ा सवाल है.

दरअसल ये पूरा मामला उत्तर प्रदेश राज्य के जनपद मुज़फ्फरनगर का है. हम आपको बतादे की ये जनपद मुज़फ्फरनगर के उसी गांव का मामला है. जहां से केंद्र में बनी थी में भाजपा की सरकार लेकिन फिर भी उसी जनपद में आखिर क्यों मर रही है भाजपा शाशित देश के उत्तर प्रदेश में लगातार गाय ये अब तक का सबसे बड़ा चौका देने वाली घटना है. दरअसल जनपद मुजफ्फरनगर के ब्लॉक मोरना के खादर क्षेत्र क्ष्रेत्र में जहां लगभग 150 गांव की संदिग्ध परिस्थितियों में हो गई है. तो वंही मौत की सूचना पाकर गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है. सूचना के मुताबिक अब से कुछ दिन पूर्व भी ब्लाक मोरना के ही खाई खेड़ा गांव में बुधवार की सुबह भूख प्यास के चलते लगभग 11 गए मरने की बात सामने आई थी लगभग अभी 1 सप्ताह भी नहीं गुजरा था कि मुजफ्फरनगर के शुकरताल क्षेत्र के जंगल में लगभग 150 की संख्या में मृत गायों की सूचना मिलते ही क्षेत्र में मातम सा पसर गया, लेकिन शासन-प्रशासन को मानो भनक भी ना हो आज भगत सिंह गो वंश समिति के अध्यक्ष विकास अग्रवाल अपनी टीम के साथ लगभग 10 किलोमीटर दूर पैदल चलने के बाद मृत अवस्था में पड़ी गायो देखने पहुंचे घटनास्थल पर पहुंचने के बाद देखा कि मृत पड़ी गायों को चील कौवे नोच रहे हैं, और जंगल मे गाय के शवों के अंग इधर उधर बिखरे पड़े है. इस दौरान गाय चराने वाले व्यक्ति ने बताया कि शासन-प्रशासन की ओर से सिर्फ खानापूर्ति की गई है. मृत पड़ी गायो का अंतिम संस्कार नहीं किया गया है. वह खुले आसमान में हर दस पंद्रह कदम पर गायों के शव पड़े हैं. जिनको खूंखार पक्षियों ने बुरी तरीके से नोच रखा हैं. अब सवाल यह उठता है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में गायों को मारने वाला कौन है. क्यो योगीराज में गाय के अंतिम संस्कार के लिए शासन-प्रशासन से क्यों नहीं मिली सहायता,

इतना ही नही ग्रामीणों ने यहाँ तक बताया कि शासन प्रशासन की मिलीभगत के चलते कुछ भू माफियाओं ने कर रखा है सरकारी जमीनों पर भारी कब्जा, जिनमें भू माफिया करते है खेती, यदि गांव वालों की मानें तो भू माफियाओं ने अपनी खेती के नुकसान के चलते दिया है गौ माताओं को जहर अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन इन पूरे मामले पर संज्ञान लेते हुए जांच कर आरोपियों को पहुंचाएगी सलाखों के पीछे ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा, अगर सूत्रों की माने तो अभी तक इस पूरी घटना पर किसी भी तरह की कोई कारवाई नहीं हो पाई है.

वंही कुछ प्रत्यक्ष दर्शियों ने गाय की मौत की वजह पर बात करते हुए ये भी बताया कि ज्यादातर बीमार गाय एक के बाद एक गाय ने दम तोड़ दिया. और क्षेत्र में अन्य गाय के भी बीमार हो जाने की आशंका अभी भी बनी हुई है. वंही ककरौली क्षेत्र के गांव खाईखेड़ा में जिला पंचायत के निर्माणाधीन कांजी हाउस में बेसहारा गोवंश के लिए जिला पंचायत द्वारा एक गाड़ी भरकर हरा चारा भेजा गया तथा अस्थायी शेड की भी व्यवस्था करा दी गई है, जिससे गोवंश को राहत मिलने की उम्मीद बनी हुए है. जिला पंचायत के अवर अभियंता अरविंद कुमार कांजी हाउस में सबमर्सिबल सहित अन्य व्यवस्थाओं को शीघ्र बनाने में जुट गए हैं. मोरना व भोपा के पशु चिकित्सकों की टीम बीमार गोवंश का इलाज कर रही है. वंही मंसूरपुर क्षेत्र के एक गांव में

गोवंश को रख रखाव के उद्देश्य से एकत्र कर एक घर में बंद किया गया है. दरअसल मंसूरपुर क्षेत्र के गांव मुबारिकपुर में आवारा घूम रहे पशुओं से परेशान होकर ग्रामीणों ने उनको एक घर में बंद कर दिया. पशुओ की सूचना पर ग्राम सचिव इनाम भी मौके पर पहुंचे. गांव पुरा के पशु चिकित्सक शरद कुमार ने गांव में पहुंचकर पशुओं का चिकित्सीय परीक्षण किया. गांव में घूम रहे 55 आवारा पशुओं को ग्रामीणों ने एक घर में बंद कर दिया है. ग्राम प्रधान सुभाष त्यागी की ओर से पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था की गई है. ग्राम प्रधान का कहना है कि जिला प्रशासन को शीघ्र इन पशुओं को गोशाला में भेजने की व्यवस्था करनी चाहिए.

रिपोर्ट- संजय कुमार, मुजफ्फरनगर

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दलित वोटों के लिए कांग्रेस ने बनाई है यह खास रणनीति

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में दलित वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए कांग्रेस ने एक खास योजना पर काम शुरू कर दिया है. इसके लिए कांग्रेस ने 35 सदस्यीय ‘टीम यूपी’ बनाई है. पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा की ओर से बनाई गई इस टीम ने प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपना ब्लू प्रिंट भी सौंप दिया है. पार्टी जल्दी ही इसे जमीन पर उतारने जा रहे हैं.

कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष नितिन राउत के मुताबिक पार्ट उन सीटों पर ध्यान देगी जहां दलित मतदाताओं की संख्या 20 फीसदी या इससे अधिक है. इनमें 17 आरक्षित सीटें भी शामिल हैं. उनका कहना है कि दलित समुदाय तक पहुंचने के लिए पार्टी बड़े पैमाने पर जनसंपर्क, सभाएं और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करेंगे. इसके लिए पार्टी ने पूरी रूपरेखा तैयार कर ली है. इस टीम की अगुवाई अनुसूचित जाति विभाग के प्रवक्ता एसपी सिंह करेंगे.

राफेल को लेकर राहुल गांधी का एक और हमला

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नई दिल्ली। राफेल को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी काफी सक्रिय हैं. अपने द्वारा उठाए गए इस मुद्दे को लेकर राहुल गांधी लगातार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमलावर हैं. मंगलवार को एक बार फिर राहुल गांधी ने इस मुद्दे को लेकर नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा. कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी ने एक ईमेल का जिक्र करते हुए कहा, ‘एयरबस कंपनी के एग्जक्यूटिव ने ईमेल में लिखा है कि फ्रांस के रक्षा मंत्री के ऑफिस में अनिल अंबानी गए थे.

ईमेल के मुताबिक मीटिंग में अंबानी ने कहा था कि जब पीएम आएंगे तो एक एमओयू साइन होगा, जिसमें अनिल अंबानी का नाम होगा. यानी राफेल डील में. राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि इसके बारे में न तो भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री को मालूम था, न ही एचएएल को न ही विदेश मंत्री को. लेकिन राफेल डील से 10 दिन पहले अनिल अंबानी को इस डील के बारे में मालूम था. इसका मतलब है कि प्रधानमंत्री अनिल अंबानी के मिडिलमैन की तरह काम कर रहे थे. सिर्फ इसी आधार पर टॉप सेक्रेट को किसी के साथ शेयर करने को लेकर प्रधानमंत्री पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए. उन्हें जेल भेजना चाहिए. यह देशद्रोह का मामला है. राहुल गांधी ने कहा कि इस मुद्दे से तीन बातें जुड़ी हैं. ये हैं- करप्शन, प्रोसीजर और देशद्रोह. उन्होंने कहा कि इन तीन मामलों में कोई नहीं बचेगा.

कितना चमत्कार कर पाएगा प्रियंका गांधी का पहला रोड शो

यूं तो सोमवार को लखनऊ की सड़कों पर रोड शो के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, नई-नई पार्टी की सक्रिय राजनीति से जुड़ी प्रियंका गांधी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी और मध्य प्रदेश के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया एक साथ उतरे थे, लेकिन यह साफ था कि यह रोड शो सिर्फ प्रियंका गांधी को प्रोजेक्ट करने के लिए किया गया था, जिसमें राहुल गांधी बस अपनी बहन के साथ थे.

कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए कांग्रेस पार्टी के इन तीनों दिग्गजों ने एयरपोर्ट से लेकर कांग्रेस के कार्यालय तक रोड शो किया. इस दौरान इनके स्वागत के लिए लखनऊ में कई जगह सड़कें बैनरों और पोस्टरों से पटे रहें. कानपुर, उन्नाव, सीतापुर, लखीमपुर, फैजाबाद, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, अमेठी, रायबरेली, बाराबंकी, फैजाबाद जैसे आसपास के जिलों के कार्यकर्ता प्रियंका और राहुल के स्वागत के लिए पहुंचे. ऐसे में सवाल है कि सूबे में बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस को प्रियंका गांधी क्या संजीवनी दे पाएंगी?

फिलहाल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास 2 सांसद और 6 विधायक और एक एमएलसी है. प्रदेश में पार्टी के वोट प्रतिशत की बात करें तो यह दहाई के अंक में भी नहीं है. इससे पार्टी की खस्ता हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है. ऐसे में जब प्रियंका गांधी को ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ प्रदेश की कमान मिली है तो प्रियंका गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यहां के संगठन को फिर से खड़ा करने की होगी. लोकसभा चुनाव के करीब होने के कारण बहुत कम समय है. इतने कम समय में संगठन को नए तरीके से खड़ा करना आसान बिल्कुल नजर नहीं आ रहा है. इस बात को प्रियंका गांधी भी समझ रही है. ऐसे में अगर प्रियंका थोड़ी सी भी कामयाब रहीं तो यूपी की राजनीति में बड़ा कांग्रेस एक बार फिर से भले ही खड़ी न हो पाए, चलने जरूर लगेगी.

पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी पूर्वांचल में वाराणसी, गोरखपुर, भदोही, इलाहाबाद, मिर्जापुर, प्रतापगढ़, जौनपुर, गाजीपुर, बलिया, चंदौली, कुशीनगर, मऊ, आजमगढ़, देवरिया, महराजगंज, बस्ती, सोनभद्र, संत कबीरनगर और सिद्धार्थनगर जैसे जिले आते हैं. इस इलाके में ब्राह्मण मतदाता भी अच्छे खासे हैं, जो एक दौर में कांग्रेस का मूल वोटबैंक रहा है. ऐसे में माना जा रहा है कि प्रियंका के सहारे कांग्रेस इन्हीं वोटों को साधने की रणनीति पर काम कर रही है. यह वक्त बताएगा कि प्रियंका कितनी सफल होती हैं.

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हरियाणाः बसपा इनेलो गठबंधन टूटने के मायने

फाइल फोटोः गठबंधन की घोषणा के बाद मायावती ने अभय चौटाला को बांधी थी राखी

इनेलो से अलग होकर जजपा ने जींद उपचुनाव में शानदार प्रदर्शन करके प्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है, वहीं भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी के उम्मीदवार ने भी 13000 वोट लेकर दिखाया कि प्रदेश की राजनीति में उनका भी अहम स्थान है. इन दोनों वजहों से बसपा ने इनेलो से अपने 10 महीने के गठबंधन को आज खत्म कर लिया, पिछले वर्ष अप्रैल की गर्मियों से हरियाणा की राजनीति में इनेलो बसपा गठबंधन से शुरू हुई गरमा गरमी  रुकने का नाम नहीं ले रही. हरियाणा की राजनीति में एक नया तूफान आया और इनेलो को उड़ा ले गया, अभय सिंह मैदान में अकेले नजर आ रहे है पहले उनके भतीजे और अब उनकी बहन उनसे अलग हो गई है.

पिछले वर्ष जब इनेलो ने बसपा के साथ समझौता किया था तब इनेलो को साफ तौर पर लग रहा था कि प्रदेश में आने वाली सरकार उनके गठबंधन की है परन्तु धीरे धीरे ये धुंधला होता गया और आज लगभग खत्म ही हो गया. इनेलो का प्रदेश में मुख्यत जाट वोट बैंक है वहीं बसपा के साथ दलित है, जाटों का वोट प्रतिशत 25% के आस-पास है वहीं दलितों का 19%. दोनों दलों ने ये सोच के गठबंधन किया था कि यदि ये वोट बैंक आपस में मिल गया तो प्रदेश में उन्हें कोई भी अन्य दल रोक नहीं पाएगा और पिछले विधानसभा चुनावों में इनेलो 17 सीटें केवल 3000 वोटो से हारी थी और प्रदेश में कोई विधानसभा सीट ऐसी नहीं है जहां बसपा के 3000 वोट ना हो, इनेलो बसपा को प्रदेश में इस बार इन 17 सीटों पर जीत मिलने की पूरी संभावना थी और इन सीटों को मिलाकर  गणित कुछ ऐसा था 19 सीटें जिन पर इनेलो जीती हुई है और 1 सीट बसपा की ये कुल 37 हो  गई और यदि हम थोड़ा गहन और करे तो पाएंगे कि 23 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर गठबंधन हर बार 30000 से ज्यादा वोट लेता है तो इस प्रकार कुल 60 सीटें ऐसी थी जिन पर गठबंधन आसानी से जीत सकता था, और चौटाला साहब को प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री बन ने का मौका मिलता परंतु अफसोस ये हो नहीं पाया और ये सोच केवल सोच ही रह गई.

अब बात करते है गठबंधन टूटने से किसे ज्यादा नुकसान है, यदि हम बात बसपा की करे तो ना के बराबर नुकसान होने की सम्भावना है, क्योंकि प्रदेश की राजनीति बसपा कभी भी अहम भूमिका में नहीं रही उसे हर बार 5–6% वोट मिलता है और वो उसे इस बार भी मिलने की पूरी संभावना है. वहीं दूसरी तरफ इनेलो को ज्यादा नुकसान होता दिख रहा है क्योंकि इनेलो का कुछ वोट प्रतिशत तो उनके भतीजे ले गए और उस कमी को बसपा द्वारा पूरा करने की कोशिश  थी,दूसरा अब उनके पास केवल जाटों के वोट बचे है और वो कई धडो में बंटे हुए है तो ऐसे में इनेलो को काफी नुकसान होता दिख रहा है. वहीं यदि इस गठबंधन के टूटने से सबसे ज्यादा अगर किसी को फायदा होने की संभावना है तो वह भाजपा को.

अब प्रदेश की राजनीति में एक नया समीकरण देखने को मिलेगा जहा भाजपा, कांग्रेस मजबूती दिखा रही है वहीं जजपा और आप भी मुकाबले में आ गई है और बसपा भी अपने बहुजन के नारे पर दलितो–पिछड़ों के गठजोड़ के रास्ते पर निकल गई है और राजकुमार सैनी के नए नवेले दल लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया है.

कयास ये लगाए जा रहे है कि लोसपा के साथ पिछड़े तथा बसपा के साथ दलित वोट बैंक मिल कर ये गठबंधन प्रदेश में बहुजनो की सरकार देयेगा. इस नए गठबंधन से बसपा को नुक्सान होने के पूरी संभावना है क्योंकि एक तो ये दल बिल्कुल नया है अभी तक ग्रामीण  क्षेत्रों के पिछड़ों तक पहुंचा ही नहीं है ये केवल प्रदेश के कुछ हिस्से तक सीमित है और एक महत्वपूर्ण कारण ये है कि आज तक के चुनावी इतिहास में पिछड़ों ने कभी बसपा को वोट नहीं दिया लगभग कभी छुया ही नहीं तो अब भी पिछड़े वोटो का बसपा की तरफ स्थानांतरण होना मुश्किल ही लग रहा है और ऐसा प्रतीत हो रहा है एक बार फिर बसपा को चुनावों में हार का सामना करना पड़ सकता है.

लेखकः राजेश ओ.पी. सिंह (पूर्व छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय)

दलित दस्तक मैग्जीन का फरवरी 2019 अंक ऑन लाइन पढ़िए

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दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2018 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए सांतवें साल का 9वां अंक लेकर आए हैं. इस अंक के साथ ही दलित दस्तक ने एक नया बदलाव किया है. इसके तहत अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

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मायावती ने दिखाया मनुवादी मीडिया को आईना

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नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल में बनाए गए स्मारक और पार्कों में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती और हाथियों की बनी प्रतिमाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद मनुवादी मीडिया को जैसे बसपा और इसकी प्रमुख मायावती को बदनाम करने का मौका मिल गया. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद मीडिया ने कोर्ट की टिप्पणी से इतर अपनी तरह से इस खबर को लेकर बसपा को कठघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया. एक बार फिर इसी बहाने पार्क के निर्माण में घोटालों की बात कही जाने लगी. मीडिया की इस मनुवादी सोच पर बसपा प्रमुख मायावती ने तमाम मीडिया संस्थाओं को आड़े-हाथों लिया है. एक बयान जारी कर बसपा प्रमुख ने कहा है कि-

सदियों से तिरस्कृत दलित व पिछड़े वर्ग में जन्मे महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों के आदर-सम्मान में निर्मित भव्य स्थल/स्मारक/पार्क आदि उत्तर प्रदेश की नई शान, पहचान व व्यस्त पर्यटन स्थल है, जिसके आकर्षण से सरकार को नियमित आय भी होती है. मीडिया कृप्या करके माननीय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को तोड़-मरोड़ कर पेश ना करे.

माननीय न्यायालय में अपना पक्ष जरूर पूरी मजबूती के साथ आगे भी रखा जाएगा. हमें पूरा भरोसा है कि इस मामले में भी माननीय न्यायालय से पूरा इंसाफ मिलेगा. मीडिया व बीजेपी के लोग कटी पतंग ना बनें तो बेहतर है.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद एक बार फिर से इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई. इस मुद्दे पर विमल वरुण ने लिखा है- बीएसपी का चुनाव चिन्ह खड़ा हाथी हैं, जिसकी सूँड़ नीचे जमींन की तरफ है, जबकि इन स्थलों में लगे हाथियों की सूँड़ ऊपर की तरफ है, जो की स्वागत का प्रतीक है. क्या जज साहब को यह भी नहीं दिखता?

दलित प्रेरणा स्थल

तो वहीं इन पार्कों और स्मारकों में बसपा प्रमुख सुश्री मायावती की प्रतिमा लगने के मुद्दे पर समाजशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. विवेक कुमार का कहना है- बहनजी की मूर्ति लगाने का फ़ैसला पहले कैबिनेट में पारित हुआ होगा. फिर यह फ़ैसला विधानसभा के पटल पर पारित हुआ होगा. इसके पश्चात शहरी विकास मंत्रालय के बजट में इसके लिए धनराशि का प्रावधान किया गया होगा जो की उ.प्र. विधान सभा के दोनो सदनों एवम् राज्यपाल ने पारित किया होगा. अत: यह फ़ैसला संवैधानिक प्रक्रिया एवं संवैधानिक संस्था का फ़ैसला है, ना की किसी एक व्यक्ति का. इसलिए बहनजी की प्रतिमा के लिए बहनजी को व्यक्तिगत रूप से कैसे उत्तरदायी ठहराया जा सकता है? अगर भारत के दूसरे राजनैतिक दल अपने नेता की मूर्ति सरकारी पैसे से लगा सकते हैं, सरकारी पैसे से बने हुए भवनों के नाम अपने-अपने नेताओं के नाम पर रख सकते हैं तो फिर बहुजन समाज पार्टी अपने नेता की मूर्ति क्यों नहीं लगा सकती. क्या इस देश में दो क़ानून है – एक सवर्णो के लिए और दूसरा बहुजनो के लिए?

फिलहाल इस मुददे को लेकर बहस जारी है. साथ ही इस घटना ने मीडिया का जातिवादी चेहरा और देश के बहुजनों के लेकर दुर्भावना को एक बार फिर साबित कर दिया है.

13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ अध्यादेश लाएगी केंद्र सरकार!

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नई दिल्ली। 13 प्वाइंट रोस्टर पर सरकार अध्यादेश लाने की तैयारी में है.सरकार इस मुद्दे पर जारी जन आंदोलन और संसद के भीतर बहुजन राजनीतिक दलों के दबाव के आगे झुकती नजर आ रही है.  अगर मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की बात को सच माना जाए तो सरकार इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी और अगर यह खारिज हो जाता है तो सरकार अध्यादेश या विधेयक लाएगी.

संसद में इस मुद्दे पर लगातार जारी गतिरोध के बाद मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि उच्च शिक्षण संस्थाओं में नियुक्तियों में आरक्षण संबंधी रोस्टर प्रणाली से एससी, एसटी और पिछड़े वर्ग के आरक्षण को प्रभावित होने से बचाने के लिये सरकार ने विधेयक या अध्यादेश लाने का फैसला किया है. राज्यसभा में इस मुद्दे को लेकर पिछले तीन दिनों से बसपा, सपा, राजद एवं अन्य विपक्षी दल लगातार सरकार को घेर रहे थे. ये तमाम दल 13 प्वाइंट रोस्टर प्रणाली को रद्द कर वापस 200 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम लागू करने के लिए अध्यादेश या विधेयक लाने की मांग कर रहे थे.  इस पर सरकार की स्थिति स्पष्ट करते हुये जावड़ेकर ने शुक्रवार को कहा कि आरक्षण संबंधी रोस्टर प्रणाली पर उच्चतम न्यायालय में सरकार पुनर्विचार याचिका दायर करेगी. उन्होंने कहा कि अदालत में यह याचिका खारिज होने की स्थिति में सरकार ने अध्यादेश या विधेयक लाने का फैसला किया है.

जावडे़कर ने राज्यसभा में बताया था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर लागू की गयी 200 सूत्री रोस्टर प्रणाली के खिलाफ केन्द्र सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर विशेष अनुमति याचिका खारिज करने के बाद सरकार अब पुनर्विचार याचिका दायर करेगी. जावड़ेकर ने कहा कि पुनर्विचार याचिका खारिज होने की स्थिति में हम अध्यादेश या विधेयक लाने का फैसला किया है’. जावड़ेकर ने इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरा होने तक उच्च शिक्षण संस्थाओं में नियुक्ति या भर्ती प्रक्रिया बंद रहने का भी भरोसा दिलाया.

हालांकि जावड़ेकर के बयान से इतर इस संबंध में बहुजन समाज के अध्यापकों ने शैक्षणिक संस्थानों द्वारा भर्तियां निकाले जाने का आरोप लगाया है. इस मुद्दे पर 31 जनवरी को दिल्ली में बड़े आंदोलन के बाद देश के तमाम हिस्सों में 13 प्वाइंट रोस्टर को लेकर विरोध-प्रदर्शन जारी है. देखना यह होगा कि सरकार आखिर अपने कहे पर कितना कायम रहती है और इसके लिए कितना वक्त लेती है. फिलहाल बहुजन संगठनों के विरोध को देखते हुए साफ है कि जब तक सरकार इस पर अध्यादेश लेकर नहीं आती, तब तक वो आंदोलन जारी रखेंगे.

131 दलित सांसद क्या वास्तव में दलितों का प्रतिनिधित्व करते हैं?

आज पूरे देश में दलित मुद्दों को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है. अभी हाल ही में 13 रोस्टर प्रणाली के उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू करने का पूरे भारत मे विरोध हो रहा है. 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण का दलित पिछड़े समाज ने जमकर विरोध किया. इसकी संवैधानिक मान्यता को लेकर उच्चतम न्यायालय को लेकर अपना फैसला देना है. 2 अप्रैल को एससी एसटी एक्ट के विरोध में दलितों द्वारा किया गया देशव्यापी आंदोलन ने पूरे देश की नींव हिलाकर रख दी थी. इस आंदोलन में 10 से भी ज्यादा दलित युवकों की जान चली गयी थी. गुजरात का ऊना कांड, रोहित वेमुला कांड, शब्बीर पुर सहारनपुर का दलित कांड, उत्तराखंड में दलित बालिका के बलात्कार के बाद हत्या और भी न जाने कितने ही दिलों को झकझोर देने वाले दलित अत्यचारों व उत्पीड़न की दास्तां केवल कहानी बन कर रह गयी.

दलितों के विकास की बात करने वाले लोग तथा इन दबे कुचले लोगों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के दावा करने वाली सरकारों ने कभी वास्तविकता जानने की कोशिश की है शायद कभी नही. जिन सरकारी स्कूलों में दलितों के लिये छूट की व्यवस्था है क्या वहां से शिक्षा लेकर एक गरीब दलित प्रतिस्पर्धा के समय मे सरकारी नौकरी पा सकता है, जी नही. लेकिन कभी सरकार ने निजी शिक्षण संस्थानों के बजाय उन्हें अपग्रेड करने की सोची है? सरकारी विभागों का निजीकरण करके दलितों को नौकरी से भी वंचित किया जा रहा है. सरकारी ठेकेदारी में दलितों को कितना प्रतिनिधित्व मिल रहा है. क्या वास्तव में ही भारत मे सभी सरकारी विभागों में दलितों का बैकलॉग कोटा पूरा हो गया है. क्या इस देश की मीडिया में दलितों को कहीं स्थान मिल रहा है. इसलिये नहीं कि दलितों में योग्यता नही है बल्कि इसलिये कि आज भी जातीय भेदभाव फैला हुआ है.

उपरोक्त दो कॉलम इसलिये लिखे कि आज के शीर्षक से जुड़े आलेख को अच्छी तरह समझा जा सके. दलितों पर अत्याचार का मामला हो या उनके विकास से जुड़ी कोई योजनाएं या फिर दलित हितों से जुड़ा कोई मामला. अधिकांशतः हम सभी इसके लिए बसपा की सुप्रीमों बहन मायावती से अपेक्षाएं रखते हैं कि वो विरोध करें, मामला सदन में उठाये, जन आंदोलन करें या मीडिया को चिल्ला चिल्लाकर बताएं लेकिन हम उस वक्त सदन में बैठे आरक्षित वर्ग के 131 सांसदों को भूल जाते हैं. जो डॉ अम्बेडकर द्वारा प्रदत्त आरक्षण की बदौलत ही सदन में चुनकर आते हैं. लेकिन ये अधिकांशतः 131 सांसद स्वयं दलित होते हुए भी दलितों के मुद्दे पर कुछ बोलते क्यों नही, ये चुप्पी क्यों साध लेते हैं. तो इतना अध्ययन करने के बाद ये समझ आया कि लगभग ये सभी सांसद दलित विरोधी मानसिकता रखने वाली पार्टी के सदस्य हैं. जिनकी अपनी कोई सोच नही होती.

तमाम राजनैतिक विश्लेषक और दलित चिंतक मानते हैं कि ये लगभग सभी 131 दलित सांसद सबसे कमजोर व्यक्ति होते हैं. ये भी एक कड़वा सच है कि आरक्षित सीटों पर कभी भी मजबूत दलित चुनाव नही जीत सकता वहां से हमेशा कमजोर दलित ही सांसद बनकर आते हैं. यहां मजबूत दलित से मतलब है कि जो खुलकर दलित हितों की बात कर सके. दलित अत्यचारों के खिलाफ दलितों का नेतृत्व कर सके. वो स्वयं अम्बेडकरवादी हो तथा आडंबरवाद व पाखण्डवाद से दलितों को दूर रख सके, शोषक वर्ग मतलब उच्च सवर्ण जाति के धन्ना सेठों का चापलूस न हो तब ही उसे मजबूत दलित की संज्ञा दी जा सकती है. अब आप खुद ही समझ गये होंगे कि फिर ऐसा मजबूत दलित चुनाव कैसे जीत सकता है. इसलिये आरक्षित सीटों से कमजोर दलित जो सवर्णों का मित्र हो वही चुनाव जीत सकता है. अब भला ऐसे कमजोर सांसद क्या खाक दलितों की आवाज उठाएंगे. इस मामले में मै ये कह सकता हूँ कि बसपा का दलित सांसद अन्य के मुकाबले बहुत मजबूत होता है. इसी लिए सुरक्षित सीटों पर बसपा का सांसद हार जाता है. 2014 के आंकड़े देखिये कि अकेले भाजपा से 67 दलित सांसद हैं, कांग्रेस से 13, टीएमसी से 12 व ऐडीएमके व बीजद के 7-7 सांसद हैं.

अब आखिर में हम बात करते है कि आखिर 131 दलित सांसद मजबूत कैसे बनेंगे तो आज डॉ अम्बेडकर का वो दो वोट का लिया हुआ अधिकार याद आ गया. कि कितनी दूरदर्शी सोच के साथ उन्होंने दो वोटों का अधिकार मांगा था. कितना अजीब है कि अगर आपको अपने परिवार का मुखिया चुनना हो तो भला इसमे परिवार के अलावा पड़ोसी को क्यों हक मिलना चाहिये. सीटें आरक्षित इसलिए की गयीं थी कि दलितों के प्रतिनिधि भी संसद में पहुंचने चाहिये. जब 131 प्रतिनिधि दलितों के चाहिये तो चुनने का अधिकार भी दलितों को ही मिले. मेरा सुझाव है कि सुरक्षित सीटों पर दलित प्रतिनिधि चुनने का अधिकार केवल दलितों को ही हो. सुरक्षित सीटों पर वोट का अधिकार केवल आरक्षित वर्ग को ही हो. इसलिये 2 वोटों का प्रावधान होना चाहिये. एक सुरक्षित सीट के लिये तथा एक सामान्य सीट के लिए. अगर ऐसा होता है कि केवल दलित प्रतिनिधि दलित ही चुनेंगे तो निश्चित रूप से मजबूत दलित सांसद चुनकर जायेंगे जो सदन में मजबूत ताकत बनेंगे. वरना सुरक्षित सीट पर गैर दलित हमेशा उसे चुनते हैं जो उनका हितैषी हो. दलितों का भला चाहने वाले सभी राजनैतिक दल अगर वास्तव में दलितों का विकास चाहते हैं तो एक बार करके तो देखिए वरना ढोंग भी मत कीजिये.

दीपक मौर्य Read it also-कुशवाहा पर लाठी चार्ज के विरोध में आंदोलन की तैयारी में रालोसपा कार्यकर्ता

सुप्रीम कोर्ट से मायावती को बड़ा झटका

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दलित प्रेरणा स्थलyawati

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के पहले बहुजन समाज पार्टी को बड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने बसपा प्रमुख सुश्री मायावती को झटका देते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है. एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा है कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अपनी और हाथियों की मूर्तियां बनाने में जितना पैसा खर्च किया है, उसे वापस करना चाहिए. मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को होगी.

गौर हो कि इस मामले में 2009 में रविकांत और अन्य व्यक्तियों ने इस बारे में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सुश्री मायावती के वकील को कहा कि अपने क्लाइंट को कह दीजिए कि सबसे पहले वह मूर्तियों पर खर्च हुए पैसों को सरकारी खजाने में जमा कराएं. दरअसल याचिका कर्ताओं को इस बात की शिकायत है कि मायावती ने मुख्यमंत्री रहते खुद की और बहुजन समाज पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की प्रतिमा लगाकर सरकारी पैसों का गलत इस्तेमाल किया है.

रिपोर्ट के मुताबिक इन पार्कों को बनाने में 6000 करोड़ रुपये खर्च हुआ है. जहां तक मूर्तियों की बात है तो दलित प्रेरणा स्थल पर मुख्य गुंबद में बाबासाहब डॉ. आम्बेडकर और मान्यवर कांशीराम के साथ बसपा प्रमुख मायावती की प्रतिमा भी लगी है. इस पार्क में हाथी की 30 मूर्तियां लगाई गई है, जबकि कांसे की 22 प्रतिमाएं लगी हुई है. इसमें 685 करोड़ का खर्च माना जाता है.

हालांकि बहुजन समाज के लोगों की इन पार्कों में गहरी आस्था है. इसकी जायज वजह भी है. यहां जोतिबा फुले, शाहूजी महाराज, नरायणा गुरु, पेरियार, संत गाडगे सहित जिन बहुजन महापुरुषों की प्रतिमाएं लगाई गई हैं, उनका राष्ट्र के निर्माण में काफी अहम योगदान रहा है. हर वर्ष 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती और 15 मार्च को कांशीराम जयंती के लिए इन पार्कों में हजारों की संख्या में लोग जाते हैं.

दलित दस्तक मनाएगा ‘अम्बेडकरी पत्रकारिता के सौ साल’ का महा उत्सव

नई दिल्ली। अम्बेडकरी आंदोलन की सजग प्रहरी बहुचर्चित मासिक पत्रिका “दलित दस्तक” ने बाबासाहेब द्वारा निकाले गए पहले समाचार पत्र ‘मूकनायक’ के सौ वर्ष पूरा होने पर आगामी वर्ष 2020 में 31 जनवरी को भव्य कार्यक्रम करने का ऐलान किया है. दलित दस्तक इस दिन ‘अम्बेडकरी पत्रकारिता के सौ वर्ष’ का महा उत्सव मनाएगी. इसकी घोषणा सोशल मीडिया फेसबुक पर पत्रिका के प्रमुख संपादक और प्रकाशक अशोक दास ने की. गौर हो कि 31 जनवरी 1920 को बाबासाहेब ने ‘मूकनायक’ के नाम से अपना पहला समाचार पत्र निकाला था. दलित दस्तक की टीम इस दिन को यादगार बनाना चाहती है. जहां तक दलित दस्तक की बात है तो यह पत्रिका जून 2012 से निरंतर प्रकाशित हो रही है और बहुजन आंदोलन में इसका एक अहम स्थान है. देश के 25 राज्यों में इसका प्रसार है और इससे लाखों पाठक जुड़े हैं.

दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने आयोजन को लेकर बताया कि “हमारे मन में पिछले चार-पांच सालों से यह योजना थी. हमें लगा कि हम इस महत्वपूर्ण वक्त में हैं और आम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े हैं और पेशेवर पत्रकार हैं तो हमें इस दिन को यादगार तरीके से मनाना होगा. बाबा साहेब के जीवन के कई पहलू हैं. वह एक सफल पत्रकार भी थे और उन्हें बतौर पत्रकार दलित दस्तक की टीम की ओर से यह सच्ची श्रद्धांजली होगी.”

अम्बेडकरी पत्रकारिता के सौ साल पर दलित दस्तक द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रम का पहला पोस्टर

इस कार्यक्रम को लेकर योजनाओं का जिक्र करते हुए अशोक दास ने कहा कि हमारा उद्देश्य अम्बेडकरी-फुले मूवमेंट से जुड़ी पिछले सौ सालों के दौरान प्रकाशित हुई या वर्तमान में प्रकाशित हो रही पत्र-पत्रिकाओं का पता लगा कर उन्हें एक मंच पर लाना है. हमारी कोशिश रहेगी कि अम्बेडकरी-फुले आंदोलन के विचार वाली किसी भी भाषा की कोई भी पत्र-पत्रिका देश के किसी भी हिस्से से प्रकाशित हो रही हो, उन सबको महा उत्सव के दिन दिल्ली आमंत्रित किया जाए.

इसके साथ ही संपादक अशोक दास ने यह भी कहा कि मुख्यधारा की मीडिया में कार्यरत एससी-एसटी वर्ग के पत्रकारों को भी इस विशेष दिवस पर आयोजित भव्य समारोह में सम्मानित करने की योजना है. उन्होंने इसके लिए इस काम में लगे तमाम लोगों से भी दलित दस्तक से संपर्क कर सूचना देने की अपील की है ताकि तमाम लोगों को एक साथ मंच पर लाया जा सके.

गौरतलब है कि अशोक दास देश के सर्वोच्च पत्रकारिता संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC) के 2005-06 बैच के पूर्व छात्र हैं. अमर-उजाला, देशोन्नति, भड़ास4मीडिया सहित लोकमत समाचार से जुड़े रहे हैं. उन्होंने पांच सालों तक राजनीतिक रिपोर्टिंग की है, इस दौरान वह संसद और तमाम मंत्रालयों को कवर करते रहें. लेकिन आम्बेडकरी आंदोलन से जुड़ने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर ‘दलित दस्तक’ के जरिए अम्बेडकरी-फुले विचारधारा के प्रसार और हाशिए पर पड़े लोगों के हक की आवाज बुलंद करने की राह चुनी. फिलहाल मासिक पत्रिका के अलावा, दलित दस्तक यू-ट्यूब चैनल, वेबसाइट और दास प्रकाशन के जरिए सक्रिय हैं.

नोट- ‘दलित दस्तक’ के मुख्य संपादक एवं प्रकाशक अशोक दास से आप मोबाइल नंबर – 9711666056 या ईमेल- editorashokdas@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

यूपी बजट पर बहनजी का ट्विट

नई दिल्ली। ट्विटर पर आने के बाद यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा अध्यक्ष सुश्री मायावती ने साफ कर दिया है कि अब वह किसी भी मुद्दे पर तुरंत अपनी टिप्पणी देंगी. 6 फरवरी को आधिकारिक तौर पर ट्विटर पर सक्रिय होने के बाद बसपा प्रमुख ने आज आज 7 फरवरी को उत्तर प्रदेश सरकार के बजट पर अपना पहला ट्विट किया. इसमें सूबे की पूर्व मुखिया ने यूपी सरकार को कठघरे में खड़ा किया है.

बजट पर अपनी प्रतिक्रिया में बसपा प्रमुख ने कहा है कि –

चुनावी वर्ष में बीजेपी सरकारों का बजट चाहे कितना भी लुभावना क्यों न हो, वास्तव में सरकार का साल भर का जनहित व जनकल्याण एवं अपराध नियंत्रण व कानून-व्यवस्था का काम ही आम जनता के लिए महत्वपूर्ण होता है. और इन मामलों में केंद्र व खासकर उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार बुरी तरह से विफल साबित हुई है जो जगजाहिर है. केवल संगम स्नान से सरकारों के पाप नहीं धुल सकते. जनता बहुत होशियार है और सब जानती-समझती है.

 खास बात यह है कि बहनजी के ट्विट करते ही उनके समर्थकों द्वारा सिर्फ 15 मिनटों में ही डेढ़ सौ से ज्यादा बार रि- ट्विट कर दिया गया. यूं तो अक्टूबर 2018 में ही बसपा प्रमुख का ट्विटर एकाउंट बना चुका था लेकिन आधिकारिक घोषणा के बाद महज 24 घंटे में उनके 50 हजार से ज्यादा फॉलोअर हो गए हैं.

जहां तक बजट की बात है तो योगी सरकार ने इस बार 4 लाख 70 हज़ार 684 करोड़ रुपये का बजट पेश किया है, जो पिछले साल के बजट से 12 फीसदी ज्यादा है. बजट में गो कल्याण और यूपी के धार्मिक स्थलों और पर्यटन स्थलों पर इस बार ज्यादा जोर दिया गया है. योगी सरकार के बजट में गो कल्याण के लिए 500 करोड़ से अधिक का बजट पेश किया गया. यानि कुल मिलाकर बजट यूपीवासियों के कल्याण से ज्यादा धार्मिक रंग में रंगा हुआ दिख रहा है.

मप्र में दलित की जमीन को जबरन कब्जाने की कोशिश!

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जबरन गिराई गई बाउंड्री

पन्ना (मप्र)। मध्य प्रदेश में भले ही सरकार बदल गई हो, दलितों के हालात नहीं बदले. प्रदेश के पन्ना जिले में इंद्रपुरी निवासी एक दलित परिवार की जमीन को जबरन कब्जाने और उस पर निर्माण कराने की घटना सामने आई है. उस पर तुर्रा यह कि पीड़ितों द्वारा पुलिस सुपरिटेंडेंट ऑफिस में कंप्लेंट करने के बावजूद अभी तक न तो कोई FIR दर्ज हुई है और न ही जिनके खिलाफ शिकायत है, उनकी गिरफ्तारी ही हुई है.

पुलिस को दी गई शिकायत

घटना 23 जनवरी की है. पीड़िता देवकी प्रजापति के अनुसार शहर के इंद्रपुरी कॉलोनी निवासी राजा भईया तिवारी ने दस-पंद्रह लोगों के साथ पहुंच कर उसके घर के सामने निर्माण का सामान गिरवाया दिया और निर्माण करवाने लगा. इस दौरान विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई और पूरे परिवार को मारने की धमकी दी गई. पीड़िता का आरोप है कि गुंडों ने उनके घर की बाउंड्री को गिरा दिया. बलपूर्वक दरवाजे पर बालू और ईट गिराने के बाद दरवाजे के सामने ही बाउंड्री भी करवा दी गई. डरे हुए पीड़ित परिवार ने तब 100 नंबर पर फोन किया.

राजा भईया तिवारी

इस मामले में पीड़िता ने ‘दलित दस्तक’ को घटना से संबंधित वीडियो और फोटो मुहैया करवाया है, जो घटना की सच्चाई को बता रहा है. इस बारे में महिला का आरोप है कि पुलिस ने अभी तक न तो एफआईआर ही दर्ज किया है और न ही किसी पर कोई कार्रवाई किया है, जबकि उसके पास पूरा साक्ष्य मौजूद है. एससी थाने में भी मामले की सूचना दी गई है लेकिन वह भी खामोश है.

घटना के बाद पुलिस की मदद नहीं मिलने से पीड़ित परिवार दहशत में है. प्रदेश के वंचित तबको को उम्मीद थी कि सरकार बदलने के बाद उनके दिन भी बदलेंगे और कांग्रेस की नई सरकार उनके साथ अन्याय नहीं होने देगी, लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब प्रशासन और पुलिस ही पीड़ितों की फरियाद न सुने तो आखिर न्याय के लिए कोई पीड़ित व्यक्ति जाए कहां?

तेजस्वी की आरक्षण बढ़ाओ-बेरोजगारी हटाओ यात्रा शुरू

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पटना। राष्ट्रीय जनता दल के नेता और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव एक बार फिर यात्रा पर निकल पड़े हैं. यात्रा का मुद्दा है, ‘आरक्षण बढ़ाओ-बेरोजगारी हटाओ’. इस यात्रा के जरिए तेजस्वी यादव एक बार फिर बिहार के युवाओं खासकर बहुजन समाज के युवाओ को जोड़ने के लिए निकल पड़े हैं. यात्रा गुरुवार 7 फरवरी को दरभंगा से शुरू हो रही है.

तेजस्वी यादव ने अपनी इस यात्रा की घोषणा कर्पूरी ठाकुर की जयंती के दिन की थी. तेजस्वी के मुताबिक बिहार में रोजगार नाम की कोई चीज नहीं रह गई है. यहां के युवा रोजगार पाने के लिये दूसरे राज्यों में जा रहे हैं. वहीं, आरक्षण को लेकर भी तेजस्वी खुलकर बोलते हैं. उनका कहना है कि अब तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से अधिक हो चुका है. ऐसे में पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण का दायरा बढ़ाना होगा.

साहित्यकार सूरजपाल चौहान ने ‘दलित लेखक संघ’ एवं ‘अम्बेडकरी लेखक संघ’ पर लगाए गंभीर आरोप

वरिष्ठ साहित्यकार सूरजपाल चौहान

व्हाट्सएप पर दलित लेखक संघ एवं अम्बेडकरी लेखक संघ के बारे में जानकर और पढ़कर बेचैनी महसूस हुई. इस आपस की उठा-पटक में दलित लेखन और लेखकों को भारी नुकसान उठाना पर सकता है. साल भर पहले लगभग 20 वर्षों के बाद मैं दलित लेखक संघ से कुछ शर्तों के साथ जुड़ा था.

मेरी पहली शर्त थी कि ‘दलेस’ की गतिविधियों में गैर-दलित लेखकों का हस्तक्षेप कतई नहीं होगा. मेरी दूसरी शर्त यह थी कि जो हमारे पुराने लेखक साथी दूर बिखर कर रह गए हैं, उन्हें साथ रखकर कार्य करना होगा. और तीसरी शर्त यह कि गैर-दलित लेखकों को ‘दलेस’ जब अपने कार्यक्रम में आमंत्रित करेगा, वे तभी उसमें भाग ले सकते हैं. इन शर्तों के पीछे मेरा मानना था कि ऐसा नहीं कि हमारी हरेक बैठक में ये हस्तक्षेप करते रहेंगे और हम चुपचाप उन्हें और उनके कार्यों को सहन करते रहेंगे.

उस समय मेरी इन तीनों शर्तों को ‘दलेस’ के अधिकारियों ने मानने के लिए अपनी सहमति प्रदान कर दी थी. लेकिन कुछ दलित लेखकों को जिन्हें गैर-दलितों का हुक्का भरने और ठकुरसुहाती करने की आदत है, वो मेरी बातों से सहमत नहीं हो सके और तरह-तरह के कुतर्क देकर अपनी ही चलाते रहें.

दलेस के महासचिव श्री कर्मशील भारती से जब मैंने इस विषय को लेकर चर्चा की तो वह अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए बोले- “चौहान साहब, क्या करें, इन गैर-दलितों को ढोना मजबूरी है.” मैं यह सुनकर भौचक्क होकर रह गया, भला यह कैसी मजबूरी है?

इसी प्रकार मैंने श्री सुदेश तनवर और सूरज बड़त्या से बात की थी कि अब आप दोनों ‘दलेस’ को संभाल लो. उस समय इन दोनों ने मुझे विश्वास दिलाया था कि चलो ठीक है, आपके साथ-साथ हम दोनों भी ‘दलेस’ से जुड़ जाते हैं. लेकिन कुछ ही दिनों के बाद इन दोनों ने नेतागिरि करने के चक्कर में एक नया संघ ‘अम्बेडकरवादी लेखक संघ’ बना डाला और उसमें पदाधिकारी बन बैठे.

यदि सुदेश तनवर चाहते तो ‘दलेस’ में नई जान डाल सकते थे, क्योंकि वह दलेस के पूर्व महासचिव रह चुके हैं और लिखते-पढ़ते भी हैं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और अब दोनों संघों में आपस में लट्ठम-लट्ठ मची हुई है. अब भी समय है कि दलित लेखक एक हो जाएं, वरना गैर-दलित तो अपने-अपने मंसूबों में सफल हो ही रहे हैं.

 लेखक वरिष्ठ दलित साहित्यकार हैं और उनका दलित साहित्य में विशेष दखल है. 

रोस्टर मुद्दे पर बहुजन सांसदों का राज्यसभा में जमकर हंगामा

विश्वविद्यालयों में रोस्टर का मुद्दा सड़क से आगे अब संसद तक पहुंच गया है. बजट सत्र के दौरान आज बहुजन समाज के राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को राज्यसभा में जोर-शोर से उठाया. इस दौरान उपसभापति ने सांसदों को समझाने की कोशिश की लेकिन सांसद लगातार 13 प्वाइंट रोस्टर को रद्द कर 200 प्वाइंट रोस्टर पर बिल लाने की मांग करते रहे, जिसके बाद राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी.

सुबह सत्र शुरू होते ही भाजपा के सांसद ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा शुरू की. इस बीच सदन में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने रोस्टर का मुद्दा उठाते हुए जोरदार हंगामा शुरू कर दिया. सपा के नेता रामगोपाल यादव ने कहा कि यह देश के 85 फीसदी लोगों के हितों का सवाल है. इससे पहले बीते कल 5 फरवरी को बहुजन समाज पार्टी के राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ ने राज्यसभा के सभापति को आवेदन देकर 6 फरवरी को राज्य सभा कार्य संचालन के नियम 267 के तहत सभी विधायी और गैर विधायी कार्यों को रोककर विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में नियुक्तियों के लिए पदों के वितरण प्रणाली यानी विभागवार रोस्टर को लेकर चर्चा कराए जाने की मांग की थी.

हालांकि उप सभापति की ओर से इस मुद्दे पर चर्चा नहीं कराए जाने पर सपा, बसपा और राजद के सांसदों ने हंगामा करना शुरू कर दिया. पहले उन्होंने संदन के बीच आकर मुद्दे पर चर्चा कराने और 13 प्वाइंट रोस्टर निरस्त कर 200 प्वाइंट रोस्टर पर बिल लाने की मांग की. फिर संसद स्थगित होने पर सांसद गांधी प्रतिमा के सामने आकर प्रदर्शन करने लगे. इससे साफ है कि सड़क पर बहुजन समाज के लोगों द्वारा रोस्टर को लेकर शुरू की गई लड़ाई अब संसद में बड़ा मुद्दा बनने वाली है, जिसको टाल पाना सत्ताधारी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा.

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उज्ज्वला योजना : मुफ्त नहीं, लोन के बदले दिए थे कनेक्शन

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना भारत सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं में से एक है. योजना को पूर्ण रूप से ग्रामीणमहिलाओं को ध्यान में रख कर बनाया गया है. सरकार के हिसाब से ये एक समाज कल्याण योजना है. योजना को हरी झंडी प्रधानमंत्री नरेंदर मोदी ने 1 मई 2016 को उत्तर प्रदेश के बालियाँ जिले में दी. सस्ता राशन के साथ ही हर राशनकार्ड धारक को उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन भी मिलेगा. अभी तक केवल अंत्योदय कार्डधारक ही उज्ज्वला के लिए पात्र थे. खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन (एलपीजी सिलेंडर) को हर घर तक पहुंचाने के लिए सरकार ने ये बड़ा निर्णय लिया है. उज्ज्वला योजना की शुरुआत में (मई 2016) सामाजिक आर्थिक व जातिगत (एसईसीसी) जनगणना की सूची में दर्ज लोगों को मुफ्त कनेक्शन देकर हुई थी. उल्लेखनीय है कि इस योजना में सरकार ने बदलाव कर अंत्योदय, एससी-एसटी, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के लाभार्थियों समेत कई अन्य श्रेणी में उज्ज्वला का लाभ दिया. एचपीसीएल के डीजीएम (एलपीजी) प्रणव कुमार सिन्हा के अनुसार सरकार ने पात्र गृहस्थी राशनकार्ड धारकों को भी उज्ज्वला के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन दिए जाने का निर्णय लिया है.
किंतु दैनिक भास्कर (16.01.2019) के अनुसार कहानी कुछ और ही है.  हकीकत ये है कि पात्र लोगों को गैस कनेक्शन मुफ्त नहीं बल्कि  लोन के बदले दिए गए थे. गैस कनेक्शन के एवज में चूल्हे और भरी हुई टंकी के पैसे सब्सिडी के रूप में नहीं, बल्कि ऋण के रूप में दिए गए. इसके एवज में शर्त यह थी कि जब तक ऋण वसूल नहीं हो जाता, तब तक बिना सब्सिडी वाले महंगे सिलेंडर ही खरीदने होंगे. एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते गैस चूल्हे की कीमत मिलाकर ऋण के रूप में दी गई यह राशि दो हजार तक पहुंचने लगी थी. अब सवाल उठता है, क्या इस प्रकार की तथाकथित जनहित की योजना जनविरोधी नहीं? जाहिर है बिना सब्सिडी वाले करीब 1000 रुपए के सिलेंडर एकमुश्त रकम देकर खरीदना ग्रामीणों के लिए संभव नहीं है. नतीजा फिर से धुएं के बीच में खाना पक रहा है. सब्सिडी नहीं मिलने, लकड़ी-कंडे की उपलब्धता के चलते उज्ज्वला योजना की अहमियत पर अनेक सवाल उठ रहे हैं. अधिकारियों ने माना कि सिलेंडर महंगा ही नहीं अपितु  गांवों में आसानी से मिल भी नहीं पाता,  इसलिए भी गरीब उपभोक्ता सिलेंडर खरीद पाने में अपने को असहाय महसूस कर रहे हैं. हकीकत ये है कि मध्य प्रदेश के चोरल के 28 गांवों में दिए 1800 कनेक्शन, 10 से 15 फीसदी लोगों को छोड़कर दूसरी बार गैस रिफिल कराने नहीं पहुंचे. गैस महंगी होने से 15% लोगों ने ही दोबारा टंकी ली है, शेष  85% फिर से चूल्हा फूंक रहे हैं. भास्कर ने पड़ताल की तो खुलासा हुआ कि बमुश्किल 10 से 15% लोग ही दोबारा गैस सिलेंडर भरवाने पहुंच रहे हैं. आदिवासी इलाकों में हालात तो और भी खराब हैं. उन्हें सिलेंडर के लिए दूरदराज के शहर जाना पड़ता है जो काफी मंहगा पड़ता है.
खबर है कि इंदौर जिले में भी 58 हजार से ज्यादा कनेक्शन दिए गए हैं, लेकिन ज्यादातर लोग दोबारा टंकी/सिलेंडर भरवाने नहीं पहुंचे. ज्यादातर गरीब परिवार फिर से लकड़ी और कंडे के धुएं वाले चूल्हे पर ही खाना बनाने को मजबूर हैं. यह भी बताया गया कि हजार रुपए तक पहुंच गए महंगे बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर रिफिल कराना इन गरीब, आदिवासी/दलित परिवारों के बस की बात नहीं है. जिन्हें सब्सिडी की पात्रता है, वह उपभोक्ता भी कतराने लगे हैं. पहले उपभोक्ताओं को सब्सिडी वाली कीमत ही अदा करनी पड़ती थी और सब्सिडी की राशि सीधे कंपनियों के खाते में चली जाती थी. अब उपभोक्ताओं को टंकी की पूरी राशि एकमुश्त देनी होती है. सब्सिडी खाते में आती है. ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर बैंकिंग सुविधाओं के चलते भी ग्रामीणों को सब्सिडी का यह तरीका रास नहीं आ रहा.
इसका एक प्रमुख कारण शुरुआती 6-7 सिलेंडरों पर सब्सिडी नहीं मिलना भी है. दरअसल, पूरी तरह मुफ्त लगने वाली इस योजना में सिर्फ खाली टंकी की कीमत शामिल नहीं है. गरीब परिवारों को यह कनेक्शन 16 सौ से लेकर 2000 तक के ऋण पर दिए गए हैं. इस ऋण की भरपाई कनेक्शन धारकों को बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर खरीद कर चुकानी पड़ती है. योजना के आंकड़ों में सबसे ज्यादा गिरावट तब आई, जब बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर की कीमत हजार रुपए को पार कर गई. इन सब का नतीजा यह रहा कि गैस चूल्हे और टंकियां या तो धूल चाट रही हैं या फिर ताक पर रखी जा चुकी हैं, यानी उनका उपयोग बंद कर दिया है.
भास्कर की पड़ताल कहती है कि चारों तरफ जंगलों से घिरा इंदौर ज़िले के राजपुरा गांव की रहने वाली काली बाई को 2016 में उज्ज्वला योजना में गैस कनेक्शन दिया गया था. काली बाई को गैस चूल्हा चालू करना नहीं आता. गैस चूल्हे की गुणवत्ता भी खराब होने से वह हादसे का शिकार होते-होते बची. इसके बाद से काली बाई ने गैस कनेक्शन से तौबा कर लिया और सिलेंडर को घर की छत पर चढ़ा दिया. अब काली बाई लकड़ी जलाकर चूल्हे पर खाना पकाती हैं. उनका कहना है कि वैसे भी गैस इतनी महंगी है कि उनके लिए खरीद पाना मुमकीन नहीं है. उमठ गांव की मंजू बाई भी उन लोगों में शामिल हैं, जिन्हें 2016 में योजना की शुरुआत में कनेक्शन दिया गया. मजदूरी कर पेट पालने वाले इस परिवार के लिए यह कभी संभव नहीं हो सका कि गैस टंकी दोबारा रीफिल करा लें. जब कराने की सोची भी तो उस समय बिना सब्सिडी वाला एक सिलेंडर हजार रुपए के आसपास पहुंच गया, लिहाजा सिलेंडर न खरीद पाना ही एक मात्र विकल्प रह गया और सिलेंडर दोबारा भरवाने से पीछे हट गए. गैस एजेंसी भी बहुत दूर है. कंडे-लकड़ी की उपलब्धता होने से मंजू बाई के लिए यह योजना किसी काम की नहीं है. मंजू अब भी जंगल से लकड़ी जलाकर चूल्हा फूंक रही हैं.
अब सरकार की योजना है कि यदि पैसा नहीं है तो गैस कनेक्शन धारक  पांच किलो का सिलेंडर लें. इस प्रकार उज्ज्वला गैस कनेक्शन के बाद सिलेंडर को पुन: भराने में आ रही दुश्वारियां दूर हो जाएंगी. कम व छोटी पूंजी वाले ऐसे उज्ज्वला उपभोक्ताओं के घर सिलेंडर की आपूर्ति जारी रहे,  इसके लिए सरकार ने उन्हें पांच किलो के सिलेंडर का विकल्प दिया है. यानी अब उज्ज्वला गैस उपभोक्ता 14.2 किलो के बड़े गैस सिलेंडर की जगह पांच किलो के छोटे गैस सिलेंडर ले सकते हैं. पांच किलो के घरेलू गैस सिलेंडर पर निर्धारित सब्सिडी भी उज्ज्वला उपभोक्ताओं के बैंक खातों में जाएगी. इस प्रकार की जनहित योजनाओं को क्या कहा जाए? जिन योजनाओं का क्रियांवयन ही न हो पाए, ऐसी योजनाओं को सरकार की नाकाम योजना क्यों न कहा जाए? यदि गरीबों और मजलूमों की आर्थिक हालत को नजर अन्दाज करके कोई ऐसी योजना बनाई जाती है जिसका बोझ उठाने में उपभोक्ता अपने आप को असहाय महसूस करता है तो ऐसी योजनाओं का बनाना, सरकार की अदूरदर्शिता को ही दर्शाता है… और कुछ नहीं. इस प्रकार की योजनाएं गरीबों के साथ एक घिनौना मजाक ही तो है.

यूपी के लिए यह होगा प्रियंका गांधी का खास प्लॉन

नई दिल्ली। कांग्रेस में अपनी भूमिका निभाने को तैयार प्रियंका गांधी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में पार्टी को जीत दिलाने के लिए अपनी योजना तैयार कर ली है. खबर है कि पार्टी कार्यकर्ताओं का जोश बढ़ाने और अपने साथ जोड़ने के लिए प्रियंका ने ‘पर्सनल टच’ की योजना तैयार की है. इसके तहत प्रियंका गांधी अब सीधे प्रदेश के लोगों से संवाद करेंगी.

नई योजना के तहत प्रियंका गांधी की टीम ने पूर्वी यूपी के सभी जिलाध्यक्षों से अपने जिले में पार्टी के 15 अहम नेताओं और कार्यकर्ताओं की सूची मांगी है. जिलाध्यक्षों से कहा गया है कि वह अपने क्षेत्र के 15 महत्वपूर्ण नेताओं और कार्यकर्ताओं के नाम, नंबर, पता और मेल आईडी मुहैया करवाएं. दरअसल प्रियंका की टीम ने यह मांग इसलिए की है क्योंकि प्रियंका गांधी इन सभी के साथ व्यक्तिगत तौर पर संपर्क में रहेंगी. दरअसल, प्रियंका गांधी का मानना है यूपी की सियासत में कांग्रेस को दुबारा खड़ा करने के लिए सबसे पहले कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना होगा. और इसके लिए उनको आलाकमान के करीब होने का भरोसा देना होगा.

खबर है कि प्रियंका पूरा ब्यौरा लेने के बाद इन सभी के संपर्क करेंगी. दिल्ली में 7 फरवरी को कार्यभार संभालने के बाद प्रियंका यूपी के दौरे पर लखनऊ जाएंगी तो जिलाध्यक्षों और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नेताओं से मुलाकात के साथ ही इन लोगों से भी व्यक्तिगत मुलाकात करेंगी.

नोटबंदी के दौरान हेर-फेर के शक में गुजरातियों से जुड़े मामले सबसे ज्यादा

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Noteban
सांकेतिक फोटो

नई दिल्ली। नोटबंदी को लेकर एक नया तथ्य सामने आया है. इस तथ्य ने इशारों में भाजपा और पीएम मोदी पर सवाल उठा दिया है. संसद में एक सवाल के जवाब में यह मामला सामने आया. जिसके मुताबिक नोटबंदी के दौरान की जांच के मामले गुजरात में सबसे ज्यादा है. वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने इस बारे में आंकड़ा दिया कि 2018-19 के दौरान इस मामले में सबसे आगे गुजरात था. इसके बाद कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हैं.

दरअसल इनकम टैक्स विभाग नोटबंदी के बाद बड़ी रकम जमा करने के 1.5 लाख मामलों की जांच कर रहा है. ये ऐसे मामले हैं जिनमें बड़ी संख्या में 500 और 1000 के पुराने नोट जमा किए गए लेकिन इसकी कमाई का स्रोत स्पष्ट नहीं है. दिलचस्प यह है कि इस मामले में साल 2017-18 से 2018-19 के दौरान पीएम मोदी के गृह राज्य गुजरात के लोग सबसे आगे हैं.

आयकर विभाग ने साल 2017-18 के दौरान बैंकों में बड़ी रकम जमा करने के 20,088 मामलों की जांच शुरू की है. ये मामले नोटबंदी के दौरान (8 नवंबर 2016 से 31 दिसंबर 2016) बड़ी रकम जमा करने के हैं, जब 500 और 1000 के पुराने नोट अवैध घो‍षित करने के बाद बैंक में जमा किए जा रहे थे. साल 2017-18 से 2018-19 के दौरान पुराने नोट जमा करने संबंधी सबसे ज्यादा मामले जांच के लिए गुजरात से आए हैं.

साल 2018-19 के दौरान आयकर विभाग के पास जांच के लिए ऐसे 1,34,574 मामले चुने गए. साल 2017-18 के दौरान आयकर इनकम टैक्स एक्ट 1961 की धारा 142 (1) के तहत 2,99,937 जमाकर्ताओं को नोटिस भेजा गया, जिन्होंने नोटबंदी के दौरान बड़ी रकम जमा की थी, लेकिन इनकम टैक्स रिटर्न नहीं दाखिल किया.

गौरतलब है कि आयकर विभाग को यह आशंका पहले से थी कि नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद काला धन रखने वाले लोग बड़ी मात्रा में पुराने नोट बैंक में जमा करने की कोशिश करेंगे, इसलिए विभाग ने इस पर अंकुश के लिए तमाम कदम उठाए थे.