131 दलित सांसद क्या वास्तव में दलितों का प्रतिनिधित्व करते हैं?

आज पूरे देश में दलित मुद्दों को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है. अभी हाल ही में 13 रोस्टर प्रणाली के उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू करने का पूरे भारत मे विरोध हो रहा है. 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण का दलित पिछड़े समाज ने जमकर विरोध किया. इसकी संवैधानिक मान्यता को लेकर उच्चतम न्यायालय को लेकर अपना फैसला देना है. 2 अप्रैल को एससी एसटी एक्ट के विरोध में दलितों द्वारा किया गया देशव्यापी आंदोलन ने पूरे देश की नींव हिलाकर रख दी थी. इस आंदोलन में 10 से भी ज्यादा दलित युवकों की जान चली गयी थी. गुजरात का ऊना कांड, रोहित वेमुला कांड, शब्बीर पुर सहारनपुर का दलित कांड, उत्तराखंड में दलित बालिका के बलात्कार के बाद हत्या और भी न जाने कितने ही दिलों को झकझोर देने वाले दलित अत्यचारों व उत्पीड़न की दास्तां केवल कहानी बन कर रह गयी.

दलितों के विकास की बात करने वाले लोग तथा इन दबे कुचले लोगों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के दावा करने वाली सरकारों ने कभी वास्तविकता जानने की कोशिश की है शायद कभी नही. जिन सरकारी स्कूलों में दलितों के लिये छूट की व्यवस्था है क्या वहां से शिक्षा लेकर एक गरीब दलित प्रतिस्पर्धा के समय मे सरकारी नौकरी पा सकता है, जी नही. लेकिन कभी सरकार ने निजी शिक्षण संस्थानों के बजाय उन्हें अपग्रेड करने की सोची है? सरकारी विभागों का निजीकरण करके दलितों को नौकरी से भी वंचित किया जा रहा है. सरकारी ठेकेदारी में दलितों को कितना प्रतिनिधित्व मिल रहा है. क्या वास्तव में ही भारत मे सभी सरकारी विभागों में दलितों का बैकलॉग कोटा पूरा हो गया है. क्या इस देश की मीडिया में दलितों को कहीं स्थान मिल रहा है. इसलिये नहीं कि दलितों में योग्यता नही है बल्कि इसलिये कि आज भी जातीय भेदभाव फैला हुआ है.

उपरोक्त दो कॉलम इसलिये लिखे कि आज के शीर्षक से जुड़े आलेख को अच्छी तरह समझा जा सके. दलितों पर अत्याचार का मामला हो या उनके विकास से जुड़ी कोई योजनाएं या फिर दलित हितों से जुड़ा कोई मामला. अधिकांशतः हम सभी इसके लिए बसपा की सुप्रीमों बहन मायावती से अपेक्षाएं रखते हैं कि वो विरोध करें, मामला सदन में उठाये, जन आंदोलन करें या मीडिया को चिल्ला चिल्लाकर बताएं लेकिन हम उस वक्त सदन में बैठे आरक्षित वर्ग के 131 सांसदों को भूल जाते हैं. जो डॉ अम्बेडकर द्वारा प्रदत्त आरक्षण की बदौलत ही सदन में चुनकर आते हैं. लेकिन ये अधिकांशतः 131 सांसद स्वयं दलित होते हुए भी दलितों के मुद्दे पर कुछ बोलते क्यों नही, ये चुप्पी क्यों साध लेते हैं. तो इतना अध्ययन करने के बाद ये समझ आया कि लगभग ये सभी सांसद दलित विरोधी मानसिकता रखने वाली पार्टी के सदस्य हैं. जिनकी अपनी कोई सोच नही होती.

तमाम राजनैतिक विश्लेषक और दलित चिंतक मानते हैं कि ये लगभग सभी 131 दलित सांसद सबसे कमजोर व्यक्ति होते हैं. ये भी एक कड़वा सच है कि आरक्षित सीटों पर कभी भी मजबूत दलित चुनाव नही जीत सकता वहां से हमेशा कमजोर दलित ही सांसद बनकर आते हैं. यहां मजबूत दलित से मतलब है कि जो खुलकर दलित हितों की बात कर सके. दलित अत्यचारों के खिलाफ दलितों का नेतृत्व कर सके. वो स्वयं अम्बेडकरवादी हो तथा आडंबरवाद व पाखण्डवाद से दलितों को दूर रख सके, शोषक वर्ग मतलब उच्च सवर्ण जाति के धन्ना सेठों का चापलूस न हो तब ही उसे मजबूत दलित की संज्ञा दी जा सकती है. अब आप खुद ही समझ गये होंगे कि फिर ऐसा मजबूत दलित चुनाव कैसे जीत सकता है. इसलिये आरक्षित सीटों से कमजोर दलित जो सवर्णों का मित्र हो वही चुनाव जीत सकता है. अब भला ऐसे कमजोर सांसद क्या खाक दलितों की आवाज उठाएंगे. इस मामले में मै ये कह सकता हूँ कि बसपा का दलित सांसद अन्य के मुकाबले बहुत मजबूत होता है. इसी लिए सुरक्षित सीटों पर बसपा का सांसद हार जाता है. 2014 के आंकड़े देखिये कि अकेले भाजपा से 67 दलित सांसद हैं, कांग्रेस से 13, टीएमसी से 12 व ऐडीएमके व बीजद के 7-7 सांसद हैं.

अब आखिर में हम बात करते है कि आखिर 131 दलित सांसद मजबूत कैसे बनेंगे तो आज डॉ अम्बेडकर का वो दो वोट का लिया हुआ अधिकार याद आ गया. कि कितनी दूरदर्शी सोच के साथ उन्होंने दो वोटों का अधिकार मांगा था. कितना अजीब है कि अगर आपको अपने परिवार का मुखिया चुनना हो तो भला इसमे परिवार के अलावा पड़ोसी को क्यों हक मिलना चाहिये. सीटें आरक्षित इसलिए की गयीं थी कि दलितों के प्रतिनिधि भी संसद में पहुंचने चाहिये. जब 131 प्रतिनिधि दलितों के चाहिये तो चुनने का अधिकार भी दलितों को ही मिले. मेरा सुझाव है कि सुरक्षित सीटों पर दलित प्रतिनिधि चुनने का अधिकार केवल दलितों को ही हो. सुरक्षित सीटों पर वोट का अधिकार केवल आरक्षित वर्ग को ही हो. इसलिये 2 वोटों का प्रावधान होना चाहिये. एक सुरक्षित सीट के लिये तथा एक सामान्य सीट के लिए. अगर ऐसा होता है कि केवल दलित प्रतिनिधि दलित ही चुनेंगे तो निश्चित रूप से मजबूत दलित सांसद चुनकर जायेंगे जो सदन में मजबूत ताकत बनेंगे. वरना सुरक्षित सीट पर गैर दलित हमेशा उसे चुनते हैं जो उनका हितैषी हो. दलितों का भला चाहने वाले सभी राजनैतिक दल अगर वास्तव में दलितों का विकास चाहते हैं तो एक बार करके तो देखिए वरना ढोंग भी मत कीजिये.

दीपक मौर्य Read it also-कुशवाहा पर लाठी चार्ज के विरोध में आंदोलन की तैयारी में रालोसपा कार्यकर्ता

सुप्रीम कोर्ट से मायावती को बड़ा झटका

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दलित प्रेरणा स्थलyawati

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के पहले बहुजन समाज पार्टी को बड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने बसपा प्रमुख सुश्री मायावती को झटका देते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है. एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा है कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अपनी और हाथियों की मूर्तियां बनाने में जितना पैसा खर्च किया है, उसे वापस करना चाहिए. मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को होगी.

गौर हो कि इस मामले में 2009 में रविकांत और अन्य व्यक्तियों ने इस बारे में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सुश्री मायावती के वकील को कहा कि अपने क्लाइंट को कह दीजिए कि सबसे पहले वह मूर्तियों पर खर्च हुए पैसों को सरकारी खजाने में जमा कराएं. दरअसल याचिका कर्ताओं को इस बात की शिकायत है कि मायावती ने मुख्यमंत्री रहते खुद की और बहुजन समाज पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की प्रतिमा लगाकर सरकारी पैसों का गलत इस्तेमाल किया है.

रिपोर्ट के मुताबिक इन पार्कों को बनाने में 6000 करोड़ रुपये खर्च हुआ है. जहां तक मूर्तियों की बात है तो दलित प्रेरणा स्थल पर मुख्य गुंबद में बाबासाहब डॉ. आम्बेडकर और मान्यवर कांशीराम के साथ बसपा प्रमुख मायावती की प्रतिमा भी लगी है. इस पार्क में हाथी की 30 मूर्तियां लगाई गई है, जबकि कांसे की 22 प्रतिमाएं लगी हुई है. इसमें 685 करोड़ का खर्च माना जाता है.

हालांकि बहुजन समाज के लोगों की इन पार्कों में गहरी आस्था है. इसकी जायज वजह भी है. यहां जोतिबा फुले, शाहूजी महाराज, नरायणा गुरु, पेरियार, संत गाडगे सहित जिन बहुजन महापुरुषों की प्रतिमाएं लगाई गई हैं, उनका राष्ट्र के निर्माण में काफी अहम योगदान रहा है. हर वर्ष 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती और 15 मार्च को कांशीराम जयंती के लिए इन पार्कों में हजारों की संख्या में लोग जाते हैं.

दलित दस्तक मनाएगा ‘अम्बेडकरी पत्रकारिता के सौ साल’ का महा उत्सव

नई दिल्ली। अम्बेडकरी आंदोलन की सजग प्रहरी बहुचर्चित मासिक पत्रिका “दलित दस्तक” ने बाबासाहेब द्वारा निकाले गए पहले समाचार पत्र ‘मूकनायक’ के सौ वर्ष पूरा होने पर आगामी वर्ष 2020 में 31 जनवरी को भव्य कार्यक्रम करने का ऐलान किया है. दलित दस्तक इस दिन ‘अम्बेडकरी पत्रकारिता के सौ वर्ष’ का महा उत्सव मनाएगी. इसकी घोषणा सोशल मीडिया फेसबुक पर पत्रिका के प्रमुख संपादक और प्रकाशक अशोक दास ने की. गौर हो कि 31 जनवरी 1920 को बाबासाहेब ने ‘मूकनायक’ के नाम से अपना पहला समाचार पत्र निकाला था. दलित दस्तक की टीम इस दिन को यादगार बनाना चाहती है. जहां तक दलित दस्तक की बात है तो यह पत्रिका जून 2012 से निरंतर प्रकाशित हो रही है और बहुजन आंदोलन में इसका एक अहम स्थान है. देश के 25 राज्यों में इसका प्रसार है और इससे लाखों पाठक जुड़े हैं.

दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने आयोजन को लेकर बताया कि “हमारे मन में पिछले चार-पांच सालों से यह योजना थी. हमें लगा कि हम इस महत्वपूर्ण वक्त में हैं और आम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े हैं और पेशेवर पत्रकार हैं तो हमें इस दिन को यादगार तरीके से मनाना होगा. बाबा साहेब के जीवन के कई पहलू हैं. वह एक सफल पत्रकार भी थे और उन्हें बतौर पत्रकार दलित दस्तक की टीम की ओर से यह सच्ची श्रद्धांजली होगी.”

अम्बेडकरी पत्रकारिता के सौ साल पर दलित दस्तक द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रम का पहला पोस्टर

इस कार्यक्रम को लेकर योजनाओं का जिक्र करते हुए अशोक दास ने कहा कि हमारा उद्देश्य अम्बेडकरी-फुले मूवमेंट से जुड़ी पिछले सौ सालों के दौरान प्रकाशित हुई या वर्तमान में प्रकाशित हो रही पत्र-पत्रिकाओं का पता लगा कर उन्हें एक मंच पर लाना है. हमारी कोशिश रहेगी कि अम्बेडकरी-फुले आंदोलन के विचार वाली किसी भी भाषा की कोई भी पत्र-पत्रिका देश के किसी भी हिस्से से प्रकाशित हो रही हो, उन सबको महा उत्सव के दिन दिल्ली आमंत्रित किया जाए.

इसके साथ ही संपादक अशोक दास ने यह भी कहा कि मुख्यधारा की मीडिया में कार्यरत एससी-एसटी वर्ग के पत्रकारों को भी इस विशेष दिवस पर आयोजित भव्य समारोह में सम्मानित करने की योजना है. उन्होंने इसके लिए इस काम में लगे तमाम लोगों से भी दलित दस्तक से संपर्क कर सूचना देने की अपील की है ताकि तमाम लोगों को एक साथ मंच पर लाया जा सके.

गौरतलब है कि अशोक दास देश के सर्वोच्च पत्रकारिता संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC) के 2005-06 बैच के पूर्व छात्र हैं. अमर-उजाला, देशोन्नति, भड़ास4मीडिया सहित लोकमत समाचार से जुड़े रहे हैं. उन्होंने पांच सालों तक राजनीतिक रिपोर्टिंग की है, इस दौरान वह संसद और तमाम मंत्रालयों को कवर करते रहें. लेकिन आम्बेडकरी आंदोलन से जुड़ने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर ‘दलित दस्तक’ के जरिए अम्बेडकरी-फुले विचारधारा के प्रसार और हाशिए पर पड़े लोगों के हक की आवाज बुलंद करने की राह चुनी. फिलहाल मासिक पत्रिका के अलावा, दलित दस्तक यू-ट्यूब चैनल, वेबसाइट और दास प्रकाशन के जरिए सक्रिय हैं.

नोट- ‘दलित दस्तक’ के मुख्य संपादक एवं प्रकाशक अशोक दास से आप मोबाइल नंबर – 9711666056 या ईमेल- editorashokdas@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

यूपी बजट पर बहनजी का ट्विट

नई दिल्ली। ट्विटर पर आने के बाद यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा अध्यक्ष सुश्री मायावती ने साफ कर दिया है कि अब वह किसी भी मुद्दे पर तुरंत अपनी टिप्पणी देंगी. 6 फरवरी को आधिकारिक तौर पर ट्विटर पर सक्रिय होने के बाद बसपा प्रमुख ने आज आज 7 फरवरी को उत्तर प्रदेश सरकार के बजट पर अपना पहला ट्विट किया. इसमें सूबे की पूर्व मुखिया ने यूपी सरकार को कठघरे में खड़ा किया है.

बजट पर अपनी प्रतिक्रिया में बसपा प्रमुख ने कहा है कि –

चुनावी वर्ष में बीजेपी सरकारों का बजट चाहे कितना भी लुभावना क्यों न हो, वास्तव में सरकार का साल भर का जनहित व जनकल्याण एवं अपराध नियंत्रण व कानून-व्यवस्था का काम ही आम जनता के लिए महत्वपूर्ण होता है. और इन मामलों में केंद्र व खासकर उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार बुरी तरह से विफल साबित हुई है जो जगजाहिर है. केवल संगम स्नान से सरकारों के पाप नहीं धुल सकते. जनता बहुत होशियार है और सब जानती-समझती है.

 खास बात यह है कि बहनजी के ट्विट करते ही उनके समर्थकों द्वारा सिर्फ 15 मिनटों में ही डेढ़ सौ से ज्यादा बार रि- ट्विट कर दिया गया. यूं तो अक्टूबर 2018 में ही बसपा प्रमुख का ट्विटर एकाउंट बना चुका था लेकिन आधिकारिक घोषणा के बाद महज 24 घंटे में उनके 50 हजार से ज्यादा फॉलोअर हो गए हैं.

जहां तक बजट की बात है तो योगी सरकार ने इस बार 4 लाख 70 हज़ार 684 करोड़ रुपये का बजट पेश किया है, जो पिछले साल के बजट से 12 फीसदी ज्यादा है. बजट में गो कल्याण और यूपी के धार्मिक स्थलों और पर्यटन स्थलों पर इस बार ज्यादा जोर दिया गया है. योगी सरकार के बजट में गो कल्याण के लिए 500 करोड़ से अधिक का बजट पेश किया गया. यानि कुल मिलाकर बजट यूपीवासियों के कल्याण से ज्यादा धार्मिक रंग में रंगा हुआ दिख रहा है.

मप्र में दलित की जमीन को जबरन कब्जाने की कोशिश!

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जबरन गिराई गई बाउंड्री

पन्ना (मप्र)। मध्य प्रदेश में भले ही सरकार बदल गई हो, दलितों के हालात नहीं बदले. प्रदेश के पन्ना जिले में इंद्रपुरी निवासी एक दलित परिवार की जमीन को जबरन कब्जाने और उस पर निर्माण कराने की घटना सामने आई है. उस पर तुर्रा यह कि पीड़ितों द्वारा पुलिस सुपरिटेंडेंट ऑफिस में कंप्लेंट करने के बावजूद अभी तक न तो कोई FIR दर्ज हुई है और न ही जिनके खिलाफ शिकायत है, उनकी गिरफ्तारी ही हुई है.

पुलिस को दी गई शिकायत

घटना 23 जनवरी की है. पीड़िता देवकी प्रजापति के अनुसार शहर के इंद्रपुरी कॉलोनी निवासी राजा भईया तिवारी ने दस-पंद्रह लोगों के साथ पहुंच कर उसके घर के सामने निर्माण का सामान गिरवाया दिया और निर्माण करवाने लगा. इस दौरान विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई और पूरे परिवार को मारने की धमकी दी गई. पीड़िता का आरोप है कि गुंडों ने उनके घर की बाउंड्री को गिरा दिया. बलपूर्वक दरवाजे पर बालू और ईट गिराने के बाद दरवाजे के सामने ही बाउंड्री भी करवा दी गई. डरे हुए पीड़ित परिवार ने तब 100 नंबर पर फोन किया.

राजा भईया तिवारी

इस मामले में पीड़िता ने ‘दलित दस्तक’ को घटना से संबंधित वीडियो और फोटो मुहैया करवाया है, जो घटना की सच्चाई को बता रहा है. इस बारे में महिला का आरोप है कि पुलिस ने अभी तक न तो एफआईआर ही दर्ज किया है और न ही किसी पर कोई कार्रवाई किया है, जबकि उसके पास पूरा साक्ष्य मौजूद है. एससी थाने में भी मामले की सूचना दी गई है लेकिन वह भी खामोश है.

घटना के बाद पुलिस की मदद नहीं मिलने से पीड़ित परिवार दहशत में है. प्रदेश के वंचित तबको को उम्मीद थी कि सरकार बदलने के बाद उनके दिन भी बदलेंगे और कांग्रेस की नई सरकार उनके साथ अन्याय नहीं होने देगी, लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब प्रशासन और पुलिस ही पीड़ितों की फरियाद न सुने तो आखिर न्याय के लिए कोई पीड़ित व्यक्ति जाए कहां?

तेजस्वी की आरक्षण बढ़ाओ-बेरोजगारी हटाओ यात्रा शुरू

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पटना। राष्ट्रीय जनता दल के नेता और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव एक बार फिर यात्रा पर निकल पड़े हैं. यात्रा का मुद्दा है, ‘आरक्षण बढ़ाओ-बेरोजगारी हटाओ’. इस यात्रा के जरिए तेजस्वी यादव एक बार फिर बिहार के युवाओं खासकर बहुजन समाज के युवाओ को जोड़ने के लिए निकल पड़े हैं. यात्रा गुरुवार 7 फरवरी को दरभंगा से शुरू हो रही है.

तेजस्वी यादव ने अपनी इस यात्रा की घोषणा कर्पूरी ठाकुर की जयंती के दिन की थी. तेजस्वी के मुताबिक बिहार में रोजगार नाम की कोई चीज नहीं रह गई है. यहां के युवा रोजगार पाने के लिये दूसरे राज्यों में जा रहे हैं. वहीं, आरक्षण को लेकर भी तेजस्वी खुलकर बोलते हैं. उनका कहना है कि अब तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से अधिक हो चुका है. ऐसे में पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण का दायरा बढ़ाना होगा.

साहित्यकार सूरजपाल चौहान ने ‘दलित लेखक संघ’ एवं ‘अम्बेडकरी लेखक संघ’ पर लगाए गंभीर आरोप

वरिष्ठ साहित्यकार सूरजपाल चौहान

व्हाट्सएप पर दलित लेखक संघ एवं अम्बेडकरी लेखक संघ के बारे में जानकर और पढ़कर बेचैनी महसूस हुई. इस आपस की उठा-पटक में दलित लेखन और लेखकों को भारी नुकसान उठाना पर सकता है. साल भर पहले लगभग 20 वर्षों के बाद मैं दलित लेखक संघ से कुछ शर्तों के साथ जुड़ा था.

मेरी पहली शर्त थी कि ‘दलेस’ की गतिविधियों में गैर-दलित लेखकों का हस्तक्षेप कतई नहीं होगा. मेरी दूसरी शर्त यह थी कि जो हमारे पुराने लेखक साथी दूर बिखर कर रह गए हैं, उन्हें साथ रखकर कार्य करना होगा. और तीसरी शर्त यह कि गैर-दलित लेखकों को ‘दलेस’ जब अपने कार्यक्रम में आमंत्रित करेगा, वे तभी उसमें भाग ले सकते हैं. इन शर्तों के पीछे मेरा मानना था कि ऐसा नहीं कि हमारी हरेक बैठक में ये हस्तक्षेप करते रहेंगे और हम चुपचाप उन्हें और उनके कार्यों को सहन करते रहेंगे.

उस समय मेरी इन तीनों शर्तों को ‘दलेस’ के अधिकारियों ने मानने के लिए अपनी सहमति प्रदान कर दी थी. लेकिन कुछ दलित लेखकों को जिन्हें गैर-दलितों का हुक्का भरने और ठकुरसुहाती करने की आदत है, वो मेरी बातों से सहमत नहीं हो सके और तरह-तरह के कुतर्क देकर अपनी ही चलाते रहें.

दलेस के महासचिव श्री कर्मशील भारती से जब मैंने इस विषय को लेकर चर्चा की तो वह अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए बोले- “चौहान साहब, क्या करें, इन गैर-दलितों को ढोना मजबूरी है.” मैं यह सुनकर भौचक्क होकर रह गया, भला यह कैसी मजबूरी है?

इसी प्रकार मैंने श्री सुदेश तनवर और सूरज बड़त्या से बात की थी कि अब आप दोनों ‘दलेस’ को संभाल लो. उस समय इन दोनों ने मुझे विश्वास दिलाया था कि चलो ठीक है, आपके साथ-साथ हम दोनों भी ‘दलेस’ से जुड़ जाते हैं. लेकिन कुछ ही दिनों के बाद इन दोनों ने नेतागिरि करने के चक्कर में एक नया संघ ‘अम्बेडकरवादी लेखक संघ’ बना डाला और उसमें पदाधिकारी बन बैठे.

यदि सुदेश तनवर चाहते तो ‘दलेस’ में नई जान डाल सकते थे, क्योंकि वह दलेस के पूर्व महासचिव रह चुके हैं और लिखते-पढ़ते भी हैं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और अब दोनों संघों में आपस में लट्ठम-लट्ठ मची हुई है. अब भी समय है कि दलित लेखक एक हो जाएं, वरना गैर-दलित तो अपने-अपने मंसूबों में सफल हो ही रहे हैं.

 लेखक वरिष्ठ दलित साहित्यकार हैं और उनका दलित साहित्य में विशेष दखल है. 

रोस्टर मुद्दे पर बहुजन सांसदों का राज्यसभा में जमकर हंगामा

विश्वविद्यालयों में रोस्टर का मुद्दा सड़क से आगे अब संसद तक पहुंच गया है. बजट सत्र के दौरान आज बहुजन समाज के राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को राज्यसभा में जोर-शोर से उठाया. इस दौरान उपसभापति ने सांसदों को समझाने की कोशिश की लेकिन सांसद लगातार 13 प्वाइंट रोस्टर को रद्द कर 200 प्वाइंट रोस्टर पर बिल लाने की मांग करते रहे, जिसके बाद राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी.

सुबह सत्र शुरू होते ही भाजपा के सांसद ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा शुरू की. इस बीच सदन में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने रोस्टर का मुद्दा उठाते हुए जोरदार हंगामा शुरू कर दिया. सपा के नेता रामगोपाल यादव ने कहा कि यह देश के 85 फीसदी लोगों के हितों का सवाल है. इससे पहले बीते कल 5 फरवरी को बहुजन समाज पार्टी के राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ ने राज्यसभा के सभापति को आवेदन देकर 6 फरवरी को राज्य सभा कार्य संचालन के नियम 267 के तहत सभी विधायी और गैर विधायी कार्यों को रोककर विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में नियुक्तियों के लिए पदों के वितरण प्रणाली यानी विभागवार रोस्टर को लेकर चर्चा कराए जाने की मांग की थी.

हालांकि उप सभापति की ओर से इस मुद्दे पर चर्चा नहीं कराए जाने पर सपा, बसपा और राजद के सांसदों ने हंगामा करना शुरू कर दिया. पहले उन्होंने संदन के बीच आकर मुद्दे पर चर्चा कराने और 13 प्वाइंट रोस्टर निरस्त कर 200 प्वाइंट रोस्टर पर बिल लाने की मांग की. फिर संसद स्थगित होने पर सांसद गांधी प्रतिमा के सामने आकर प्रदर्शन करने लगे. इससे साफ है कि सड़क पर बहुजन समाज के लोगों द्वारा रोस्टर को लेकर शुरू की गई लड़ाई अब संसद में बड़ा मुद्दा बनने वाली है, जिसको टाल पाना सत्ताधारी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा.

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उज्ज्वला योजना : मुफ्त नहीं, लोन के बदले दिए थे कनेक्शन

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना भारत सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं में से एक है. योजना को पूर्ण रूप से ग्रामीणमहिलाओं को ध्यान में रख कर बनाया गया है. सरकार के हिसाब से ये एक समाज कल्याण योजना है. योजना को हरी झंडी प्रधानमंत्री नरेंदर मोदी ने 1 मई 2016 को उत्तर प्रदेश के बालियाँ जिले में दी. सस्ता राशन के साथ ही हर राशनकार्ड धारक को उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन भी मिलेगा. अभी तक केवल अंत्योदय कार्डधारक ही उज्ज्वला के लिए पात्र थे. खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन (एलपीजी सिलेंडर) को हर घर तक पहुंचाने के लिए सरकार ने ये बड़ा निर्णय लिया है. उज्ज्वला योजना की शुरुआत में (मई 2016) सामाजिक आर्थिक व जातिगत (एसईसीसी) जनगणना की सूची में दर्ज लोगों को मुफ्त कनेक्शन देकर हुई थी. उल्लेखनीय है कि इस योजना में सरकार ने बदलाव कर अंत्योदय, एससी-एसटी, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के लाभार्थियों समेत कई अन्य श्रेणी में उज्ज्वला का लाभ दिया. एचपीसीएल के डीजीएम (एलपीजी) प्रणव कुमार सिन्हा के अनुसार सरकार ने पात्र गृहस्थी राशनकार्ड धारकों को भी उज्ज्वला के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन दिए जाने का निर्णय लिया है.
किंतु दैनिक भास्कर (16.01.2019) के अनुसार कहानी कुछ और ही है.  हकीकत ये है कि पात्र लोगों को गैस कनेक्शन मुफ्त नहीं बल्कि  लोन के बदले दिए गए थे. गैस कनेक्शन के एवज में चूल्हे और भरी हुई टंकी के पैसे सब्सिडी के रूप में नहीं, बल्कि ऋण के रूप में दिए गए. इसके एवज में शर्त यह थी कि जब तक ऋण वसूल नहीं हो जाता, तब तक बिना सब्सिडी वाले महंगे सिलेंडर ही खरीदने होंगे. एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते गैस चूल्हे की कीमत मिलाकर ऋण के रूप में दी गई यह राशि दो हजार तक पहुंचने लगी थी. अब सवाल उठता है, क्या इस प्रकार की तथाकथित जनहित की योजना जनविरोधी नहीं? जाहिर है बिना सब्सिडी वाले करीब 1000 रुपए के सिलेंडर एकमुश्त रकम देकर खरीदना ग्रामीणों के लिए संभव नहीं है. नतीजा फिर से धुएं के बीच में खाना पक रहा है. सब्सिडी नहीं मिलने, लकड़ी-कंडे की उपलब्धता के चलते उज्ज्वला योजना की अहमियत पर अनेक सवाल उठ रहे हैं. अधिकारियों ने माना कि सिलेंडर महंगा ही नहीं अपितु  गांवों में आसानी से मिल भी नहीं पाता,  इसलिए भी गरीब उपभोक्ता सिलेंडर खरीद पाने में अपने को असहाय महसूस कर रहे हैं. हकीकत ये है कि मध्य प्रदेश के चोरल के 28 गांवों में दिए 1800 कनेक्शन, 10 से 15 फीसदी लोगों को छोड़कर दूसरी बार गैस रिफिल कराने नहीं पहुंचे. गैस महंगी होने से 15% लोगों ने ही दोबारा टंकी ली है, शेष  85% फिर से चूल्हा फूंक रहे हैं. भास्कर ने पड़ताल की तो खुलासा हुआ कि बमुश्किल 10 से 15% लोग ही दोबारा गैस सिलेंडर भरवाने पहुंच रहे हैं. आदिवासी इलाकों में हालात तो और भी खराब हैं. उन्हें सिलेंडर के लिए दूरदराज के शहर जाना पड़ता है जो काफी मंहगा पड़ता है.
खबर है कि इंदौर जिले में भी 58 हजार से ज्यादा कनेक्शन दिए गए हैं, लेकिन ज्यादातर लोग दोबारा टंकी/सिलेंडर भरवाने नहीं पहुंचे. ज्यादातर गरीब परिवार फिर से लकड़ी और कंडे के धुएं वाले चूल्हे पर ही खाना बनाने को मजबूर हैं. यह भी बताया गया कि हजार रुपए तक पहुंच गए महंगे बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर रिफिल कराना इन गरीब, आदिवासी/दलित परिवारों के बस की बात नहीं है. जिन्हें सब्सिडी की पात्रता है, वह उपभोक्ता भी कतराने लगे हैं. पहले उपभोक्ताओं को सब्सिडी वाली कीमत ही अदा करनी पड़ती थी और सब्सिडी की राशि सीधे कंपनियों के खाते में चली जाती थी. अब उपभोक्ताओं को टंकी की पूरी राशि एकमुश्त देनी होती है. सब्सिडी खाते में आती है. ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर बैंकिंग सुविधाओं के चलते भी ग्रामीणों को सब्सिडी का यह तरीका रास नहीं आ रहा.
इसका एक प्रमुख कारण शुरुआती 6-7 सिलेंडरों पर सब्सिडी नहीं मिलना भी है. दरअसल, पूरी तरह मुफ्त लगने वाली इस योजना में सिर्फ खाली टंकी की कीमत शामिल नहीं है. गरीब परिवारों को यह कनेक्शन 16 सौ से लेकर 2000 तक के ऋण पर दिए गए हैं. इस ऋण की भरपाई कनेक्शन धारकों को बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर खरीद कर चुकानी पड़ती है. योजना के आंकड़ों में सबसे ज्यादा गिरावट तब आई, जब बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर की कीमत हजार रुपए को पार कर गई. इन सब का नतीजा यह रहा कि गैस चूल्हे और टंकियां या तो धूल चाट रही हैं या फिर ताक पर रखी जा चुकी हैं, यानी उनका उपयोग बंद कर दिया है.
भास्कर की पड़ताल कहती है कि चारों तरफ जंगलों से घिरा इंदौर ज़िले के राजपुरा गांव की रहने वाली काली बाई को 2016 में उज्ज्वला योजना में गैस कनेक्शन दिया गया था. काली बाई को गैस चूल्हा चालू करना नहीं आता. गैस चूल्हे की गुणवत्ता भी खराब होने से वह हादसे का शिकार होते-होते बची. इसके बाद से काली बाई ने गैस कनेक्शन से तौबा कर लिया और सिलेंडर को घर की छत पर चढ़ा दिया. अब काली बाई लकड़ी जलाकर चूल्हे पर खाना पकाती हैं. उनका कहना है कि वैसे भी गैस इतनी महंगी है कि उनके लिए खरीद पाना मुमकीन नहीं है. उमठ गांव की मंजू बाई भी उन लोगों में शामिल हैं, जिन्हें 2016 में योजना की शुरुआत में कनेक्शन दिया गया. मजदूरी कर पेट पालने वाले इस परिवार के लिए यह कभी संभव नहीं हो सका कि गैस टंकी दोबारा रीफिल करा लें. जब कराने की सोची भी तो उस समय बिना सब्सिडी वाला एक सिलेंडर हजार रुपए के आसपास पहुंच गया, लिहाजा सिलेंडर न खरीद पाना ही एक मात्र विकल्प रह गया और सिलेंडर दोबारा भरवाने से पीछे हट गए. गैस एजेंसी भी बहुत दूर है. कंडे-लकड़ी की उपलब्धता होने से मंजू बाई के लिए यह योजना किसी काम की नहीं है. मंजू अब भी जंगल से लकड़ी जलाकर चूल्हा फूंक रही हैं.
अब सरकार की योजना है कि यदि पैसा नहीं है तो गैस कनेक्शन धारक  पांच किलो का सिलेंडर लें. इस प्रकार उज्ज्वला गैस कनेक्शन के बाद सिलेंडर को पुन: भराने में आ रही दुश्वारियां दूर हो जाएंगी. कम व छोटी पूंजी वाले ऐसे उज्ज्वला उपभोक्ताओं के घर सिलेंडर की आपूर्ति जारी रहे,  इसके लिए सरकार ने उन्हें पांच किलो के सिलेंडर का विकल्प दिया है. यानी अब उज्ज्वला गैस उपभोक्ता 14.2 किलो के बड़े गैस सिलेंडर की जगह पांच किलो के छोटे गैस सिलेंडर ले सकते हैं. पांच किलो के घरेलू गैस सिलेंडर पर निर्धारित सब्सिडी भी उज्ज्वला उपभोक्ताओं के बैंक खातों में जाएगी. इस प्रकार की जनहित योजनाओं को क्या कहा जाए? जिन योजनाओं का क्रियांवयन ही न हो पाए, ऐसी योजनाओं को सरकार की नाकाम योजना क्यों न कहा जाए? यदि गरीबों और मजलूमों की आर्थिक हालत को नजर अन्दाज करके कोई ऐसी योजना बनाई जाती है जिसका बोझ उठाने में उपभोक्ता अपने आप को असहाय महसूस करता है तो ऐसी योजनाओं का बनाना, सरकार की अदूरदर्शिता को ही दर्शाता है… और कुछ नहीं. इस प्रकार की योजनाएं गरीबों के साथ एक घिनौना मजाक ही तो है.

यूपी के लिए यह होगा प्रियंका गांधी का खास प्लॉन

नई दिल्ली। कांग्रेस में अपनी भूमिका निभाने को तैयार प्रियंका गांधी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में पार्टी को जीत दिलाने के लिए अपनी योजना तैयार कर ली है. खबर है कि पार्टी कार्यकर्ताओं का जोश बढ़ाने और अपने साथ जोड़ने के लिए प्रियंका ने ‘पर्सनल टच’ की योजना तैयार की है. इसके तहत प्रियंका गांधी अब सीधे प्रदेश के लोगों से संवाद करेंगी.

नई योजना के तहत प्रियंका गांधी की टीम ने पूर्वी यूपी के सभी जिलाध्यक्षों से अपने जिले में पार्टी के 15 अहम नेताओं और कार्यकर्ताओं की सूची मांगी है. जिलाध्यक्षों से कहा गया है कि वह अपने क्षेत्र के 15 महत्वपूर्ण नेताओं और कार्यकर्ताओं के नाम, नंबर, पता और मेल आईडी मुहैया करवाएं. दरअसल प्रियंका की टीम ने यह मांग इसलिए की है क्योंकि प्रियंका गांधी इन सभी के साथ व्यक्तिगत तौर पर संपर्क में रहेंगी. दरअसल, प्रियंका गांधी का मानना है यूपी की सियासत में कांग्रेस को दुबारा खड़ा करने के लिए सबसे पहले कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना होगा. और इसके लिए उनको आलाकमान के करीब होने का भरोसा देना होगा.

खबर है कि प्रियंका पूरा ब्यौरा लेने के बाद इन सभी के संपर्क करेंगी. दिल्ली में 7 फरवरी को कार्यभार संभालने के बाद प्रियंका यूपी के दौरे पर लखनऊ जाएंगी तो जिलाध्यक्षों और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नेताओं से मुलाकात के साथ ही इन लोगों से भी व्यक्तिगत मुलाकात करेंगी.

नोटबंदी के दौरान हेर-फेर के शक में गुजरातियों से जुड़े मामले सबसे ज्यादा

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सांकेतिक फोटो

नई दिल्ली। नोटबंदी को लेकर एक नया तथ्य सामने आया है. इस तथ्य ने इशारों में भाजपा और पीएम मोदी पर सवाल उठा दिया है. संसद में एक सवाल के जवाब में यह मामला सामने आया. जिसके मुताबिक नोटबंदी के दौरान की जांच के मामले गुजरात में सबसे ज्यादा है. वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने इस बारे में आंकड़ा दिया कि 2018-19 के दौरान इस मामले में सबसे आगे गुजरात था. इसके बाद कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हैं.

दरअसल इनकम टैक्स विभाग नोटबंदी के बाद बड़ी रकम जमा करने के 1.5 लाख मामलों की जांच कर रहा है. ये ऐसे मामले हैं जिनमें बड़ी संख्या में 500 और 1000 के पुराने नोट जमा किए गए लेकिन इसकी कमाई का स्रोत स्पष्ट नहीं है. दिलचस्प यह है कि इस मामले में साल 2017-18 से 2018-19 के दौरान पीएम मोदी के गृह राज्य गुजरात के लोग सबसे आगे हैं.

आयकर विभाग ने साल 2017-18 के दौरान बैंकों में बड़ी रकम जमा करने के 20,088 मामलों की जांच शुरू की है. ये मामले नोटबंदी के दौरान (8 नवंबर 2016 से 31 दिसंबर 2016) बड़ी रकम जमा करने के हैं, जब 500 और 1000 के पुराने नोट अवैध घो‍षित करने के बाद बैंक में जमा किए जा रहे थे. साल 2017-18 से 2018-19 के दौरान पुराने नोट जमा करने संबंधी सबसे ज्यादा मामले जांच के लिए गुजरात से आए हैं.

साल 2018-19 के दौरान आयकर विभाग के पास जांच के लिए ऐसे 1,34,574 मामले चुने गए. साल 2017-18 के दौरान आयकर इनकम टैक्स एक्ट 1961 की धारा 142 (1) के तहत 2,99,937 जमाकर्ताओं को नोटिस भेजा गया, जिन्होंने नोटबंदी के दौरान बड़ी रकम जमा की थी, लेकिन इनकम टैक्स रिटर्न नहीं दाखिल किया.

गौरतलब है कि आयकर विभाग को यह आशंका पहले से थी कि नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद काला धन रखने वाले लोग बड़ी मात्रा में पुराने नोट बैंक में जमा करने की कोशिश करेंगे, इसलिए विभाग ने इस पर अंकुश के लिए तमाम कदम उठाए थे.

ट्विटर पर आईं बहनजी, समर्थकों ने किया स्वागत

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नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी अब खुद को नए कलेवर में ढालने को तैयार है. इसका सबसे बड़ा सबूत पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का सोशल मीडिया ट्विटर पर आना है. अब तक सोशल मीडिया से दूर रहने वाली बसपा और उसकी प्रमुख मायावती के ट्विटर पर आने के कदम का बसपा समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया है. बसपा प्रमुख का ट्विटर हैंडल @Sushrimayawati है. उनके ट्विटर हैंडल पर ट्विटर पर आने से संबंधित जारी की गई प्रेस रिलिज भी अपलोड है, इससे आप उनके वास्तविक ट्विटर हैंडल को पहचान सकते हैं.

हालांकि ट्विटर पर दिख रहा है कि बहनजी का अकाउंट अक्टूबर 2018 में ही बन गया था, लेकिन आधिकारिक तौर पर वह अब सामने आई हैं. बसपा प्रमुख के ट्विटर पर आने से बसपा समर्थकों में खासा उत्साह भी है. इस संबंध में जानकारी मिलते ही लोग उन्हें फॉलो करने लगे हैं. एक घंटे में उनके 15 हजार से ज्यादा फॉलोअर हो गए थे, जिनका बढ़ना जारी था. बसपा प्रमुख के ट्विटर पर आने को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं भी आ रही है.

बहुजन लेखक एच.एल दुसाध ने लिखा है- 21वीं सदी में कदम रखने के लिए उनका अभिनंदन होना चाहिए. तो योगेश कुमार ने लिखा है- Late but right step … यानि देरी से उठाया गया सही कदम. अजय गजभिये का कहना है- ये तो पहले ही हो जाना चाहिए था. वक्त के साथ बदलाव जरूरी है, ये बहनजी को सीखना होगा. तो वहीं इस खबर से उत्साहित मनीष कुमार का कहना है कि ये ऐतिहासिक कदम साबित होगा.

दरअसल जहां सभी राजनैतिक दल सोशल मीडिया के जरिए पिछले काफी लंबे वक्त से एक्टिव हैं और हर मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं तो वहीं बसपा इससे अब तक दूर थी. पार्टी की न तो कोई आधिकारिक वेबसाइट की पुष्टि की जाती है और न ही सोशल मीडिया पर उसका कोई अकाउंट था. पिछले दिनों तो एक मुद्दे पर हुए विवाद में बसपा की ओर से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा गया था कि बसपा सोशल मीडिया पर नहीं है. जबकि बसपा के समर्थक लगातार इस बात की मांग कर रहे थे कि पार्टी को अन्य राजनैतिक दलों की तरह सोशल मीडिया पर एक्टिव होना चाहिए. आज जब सभी दलों की रणनीति में सोशल मीडिया एक बड़ा फैक्टर है, बसपा के वहां नहीं होने से पार्टी को नुकसान भी हो रहा था.

ऐसे में बसपा प्रमुख मायावती के ट्विटर पर आने से वह अपने प्रशंसकों और समर्थकों से सीधे जुड़ गई हैं. पार्टी द्वारा इस संबंध में जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि सुश्री मायावती अब ट्विटर के जरिए भी विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखेंगी.

सीबीआई के बहाने मोदी और ममता की लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया फैसला

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नई दिल्ली। केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार या यूं कहें की ममता बनर्जी और पीएम नरेन्द्र मोदी के बीच पिछले दो दिनों से जारी वर्चस्व की लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दे दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को जांच के लिए सीबीआई के सामने पेश होने का आदेश दिया है. हालांकि शीर्ष अदालत ने राजीव कुमार की गिरफ्तारी पर रोक लगा दिया है. अदालत के इस फैसले को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी नैतिक जीत बताकर स्वागत किया है.

कोर्ट का फैसला आने के बाद कोलकाता में धरने पर बैठीं ममता बनर्जी ने कहा कि हम कोर्ट के इस फैसले का सम्मान और स्वागत करते हैं. उन्होंने कहा कि हम यही चाहते हैं और यह हमारी नैतिक जीत है. ममता ने कहा कि राजीव कुमार ने कभी नहीं कहा कि वह जांच में सहयोग नहीं करेंगे. राजीव कुमार ने खुद लिखा है कि आपस में बैठकर बातचीत करते हैं. लेकिन वह उन्हें बिना किसी नोटिस के गिरफ्तार करना चाहते थे. मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि ‘केंद्र और राज्य सरकार के अपने अपने दायरे हैं. हम एक- दूसरे के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं देते. हम यही चाहते थे. राजीव कुमार पहले ही पांच पत्र लिख चुके हैं कि मिलकर इस पर बात करते हैं. इस देश का बिग बॉस कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि संविधान है.’

कांग्रेस दफ्तर पहुंची प्रियंका गांधी, संभाला पद

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नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा महासचिव घोषित किए जाने के बाद प्रियंका गांधी ने मंगलवार को अपना पदभार संभाल लिया है. सोमवार को अमेरिका से लौटी प्रियंका गांधी ने आते ही अपना काम शुरू कर दिया है. कांग्रेस दफ्तर में भी प्रियंका गांधी के नाम की प्लेट लग गई है. खबर यह भी है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ यूपी के कांग्रेस नेताओं के साथ बैठक करेंगे. खास बात ये है कि प्रियंका गांधी के इस कमरे से ही राहुल गांधी के पॉलिटिकल करियर की शुरुआत हुई थी. ये कमरा कभी राहुल गांधी का हुआ करता था. प्रियंका गांधी का ये कमरा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बिलकुल बगल में हैं. प्रियंका गांधी को 23 जनवरी को कांग्रेस महासचिव बनाए जाने का ऐलान हुआ था.

बताते चलें कि प्रियंका गांधी वाड्रा को राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी है. उनके साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी है. कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. बता दें कि मंगलवार को ही एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी के रोल पर बात की. उन्होंने कहा कि क्योंकि प्रियंका गांधी को महासचिव बनाया गया है, ऐसे में उनका रोल सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहता है बल्कि पूरे देश में उनका रोल होगा. प्रियंका गांधी बेटी के इलाज के सिलसिले में अमेरिका में थीं.

मोदी VS ममताः सड़क से संसद तक शह-मात का खेल

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कोलकाता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच शह-मात का खेल जारी है. कोलकाता में रविवार शाम को शुरू हुआ 2019 का सबसे बड़ा सियासी ड्रामा पहले कोलकाता से लेकर दिल्ली की सड़कों पर चला और फिर संसद की चौखट तक पहुंच गया. आलम यह रहा कि इस मुद्दे पर भारी हंगामे के बीच लोकसभा और राज्यसभा दोनों की कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित करनी पड़ी. मामला चुनाव आयोग तक भी पहुंच गया है.

लोकसभा चुनाव के लिहाज से इस बार पश्चिम बंगाल आर-पार की लड़ाई का अखाड़ा बना है, भारतीय जनता पार्टी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगा रही है तो जवाब में ममता बनर्जी भी उन्हें रोकने के लिए मुस्तैद हैं. रविवार रात को सीबीआई के अधिकारियों के खिलाफ कोलकाता की पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ सोमवार को सीबीआई सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. सीबीआई ने ममता सरकार के खिलाफ काम में बाधा डालने का आरोप लगाया, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उल्टा सीबीआई से कहा कि कमिश्नर के खिलाफ कोई सबूत हैं तो पेश करिए, जिसके बाद सीबीआई फिलहाल सकते में है.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि जबतक कोई सबूत नहीं होंगे, तबतक कार्रवाई नहीं होगी. अब इस मसले की सुनवाई मंगलवार को होगी. दूसरी ओर कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार भी कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंचे हैं. उन्होंने हाई कोर्ट से अपील की है कि उनके खिलाफ जारी सभी नोटिस पर स्टे लगाया जाए. इस पर भी मंगलवार को सुनवाई होगी.

दूसरी ओर सोमवार को संसद की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्ष ने आक्रामक रूप से सीबीआई विवाद का मुद्दा उठाया. कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत अन्य विपक्षी पार्टियों ने कोलकाता के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा और सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाया. भाजपा की ओर से इसका जवाब गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दिया. उनका तर्क था कि सीबीआई के अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जांच करने पहुंचे थे, लेकिन उन्हें काम नहीं करने दिया. जिस दौरान राजनाथ सिंह लोकसभा में जवाब दे रहे थे, तब लोकसभा में टीएमसी के सांसदों ने ‘’सीबीआई तोता है, तोता है…तोता है’ के नारे लगाए. दूसरी ओर उधर कोलकाता में ममता बनर्जी रविवार रात से ही केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं और धरने पर बैठी हैं. ममता धरना स्थल से ही सरकार चला रही हैं. सोमवार दोपहर को उन्होंने धरना स्थल पर ही कैबिनेट बैठक भी की.

पूर्वांचल में भाजपा के खिलाफ भोजपुरी में नए नारे

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लखनऊ। 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज होती जा रही है. सारे दल जहां प्रत्याशियों के नाम फाइनल करने में लग गए हैं तो वहीं चुनाव को लेकर नए-नए नारे भी गढ़े जाने लगे हैं. पूर्वांचल में तो भोजपुरी में नए नारे तैयार किए गए हैं. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर तो अपने कार्यक्रमों में लगातार वो नारे भी लगा रहे हैं. भाजपा के खिलाफ उन्होंने भोजपुरी में कई नए नारे निकाले हैं.

इन दिलचस्प नारों के बारे में आप खुद सुनिए. ‘पिछड़ों के आरक्षण में बंटवारा ना भईल त भाजपा गईल, शिक्षा में सुधार ना भईल त भाजपा गईल और शराब बंद ना भईल त भाजपा गईल’. ओमप्रकाश राजभर ये नारे अपनी सभी सभाओं में लगवा रहे हैं.

दरअसल चुनावों के दौरान नए नारों का खूब महत्व होता है. नारे अगर जुबान पर चढ़ जाए तो यह किसी दल को सियासी बढ़त दिलाने का काम करती हैं. एक वक्त में मान्यवर कांशीराम ने खूब नए नारे निकाले, जिनकी बदौलत बहुजन समाज पार्टी को खूब प्रसिद्धी मिली और वो बहुजन समाज के बीच तेजी से लोकप्रिय भी हुई. ‘जिसकी जितनी संख्या भारी उतनी उसकी हिस्सेदारी’ जैसे नारे खूब प्रसिद्ध हुए थे.

यूपी में बसपा-सपा गठबंधन में शामिल हो सकता है ये नया दल

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नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा गठबंधन में एक और सहयोगी की इंट्री हो सकती है. मोदी सरकार पर लगातार हमलावर बने एनडीए के सहयोगी और यूपी सरकार में मंत्री सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी प्रदेश के बसपा-सपा गठबंधन में शामिल हो सकती है. भाजपा पर लगातार हमलावर पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर का कहना है कि उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव में बसपा-सपा गठबंधन का हिस्सा बनने से भी परहेज नहीं है. गठबंधन का हिस्सा बनने की दिशा में कोशिशें भी शुरू कर दी हैं.
फाइल फोटोः सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर

राजभर लगातार पिछड़े वर्ग को आरक्षण को लेकर मुखर हैं. उनका कहना है कि भाजपा नेताओं ने आश्वासन के बाद भी उनकी किसी बात पर ध्यान नहीं दिया. पिछड़ा वर्ग के 27 फीसदी आरक्षण में बंटवारे से कम पर वह भाजपा की कोई बात नहीं मानने वाले हैं. राजभर का कहना है कि 24 फरवरी से पहले ही वह तय कर लेंगे कि लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा के साथ रहना है या नहीं. उनका कहना है कि लोकसभा चुनाव में गठबंधन को लेकर भाजपा के किसी नेता ने अभी तक उनसे कोई बात नहीं की है.

दिल्ली में 3-4 फरवरी को दलित साहित्य महोत्सव, लगेगा दिग्गज साहित्यकारों का जमावड़ा

नई दिल्ली। दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज में ‘दलित साहित्य महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है. यह महोत्सव 3 और चार जनवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में आयोजित होगा. कार्यक्रम का समय सुबह 9.30 से शाम 6.30 तक होगा. इस तरह का यह पहला महोत्सव है. इस महोत्सव में देश के विभिन्न हिस्सों से दलित साहित्यकार जुटेंगे. इस महोत्सव का आयोजन “अम्बडेकरवादी लेखक संघ” द्वारा किया जा रहा है.

आयोजकों के मुताबिक इसका उद्देश्य भारत में दलित-आदिवासी और वंचित अस्मिताओं के लेखन, साहित्य, और संस्कृति को समाज के सामने लाना है. आयोजकों का कहना है कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से ही भारत के वंचित समुदाय की समस्याओं को सामने लाया जा सकता है. इसीलिए इस बार के महोत्सव का मूल थीम ‘दलित’ शब्द रखा है. यह महोत्सव दो दिन तक चलेगा.

महोत्सव के आयोजकों में डॉ़ नामदेव, संस्थापक सूरज बडत्या, सचिव संजीव डांडा आदि शामिल हैं. इन्होंने कार्यक्रम की जानकारी देते हुए कहा कि इस महोत्सव के लिए भारत की विभिन्न भाषाओं के दलित-आदिवासी, महिला, घुमंतू आदिवासी, अल्पसंख्यक और हिजड़ा समुदाय के साहित्यकारों से संपर्क किया गया है. जिनमें से करीबन 15 भाषाओं के लेखक, संस्कृतिकर्मी, गायक, नाटककार, कलाकार शामिल होंगे. नेपाल की प्रमुख दलित लेखक आहुति, नर्मदा बचाओ आन्दोलन की नेत्री मेधा पाटकर, आदिवासी लेखक लक्ष्मण गायकवाड, दलित लेखक शरणकुमार लिम्बाले, गुजरात से हरीश मंगलम और आदिवासी कवि-गायक गोवर्धन बंजारा, कलाकार मनमोहन बावा, कन्नड़ भाषा के आदिवासी लेखक शान्था नाइक के शामिल होने की बात कही जा रही है.

तो वहीं हैदराबाद से वी कृष्णा, त्रिवेंद्रम से जयाश्री, शामल मुस्तफा खान, पंजाब के लेखक बलबीर माधोपुरी, क्रान्तिपाल, मदन वीरा, मोहन त्यागी और कई अन्य इस महोत्सव में शामिल हो रहे हैं. हिंदी लेखकों में मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, ममता कालिया, चौथीराम यादव, हरिराम मीणा, श्योराज सिंह बेचैन, निर्मला पुतुल, बल्ली सिंह चीमा व कई अन्य हैं. भोजपुरी भाषा से मुसाफिर बैठा, प्रहलादचांद दास आदि शामिल होंगे.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के अकादमिक समिति के सदस्य प्रो. हंसराज सुमन ने बताया कि इस लिटरेचर फेस्टिवल की मुख्य बात इसमें महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और गुजरात से आने वाले लोकगायक रहेंगे जो दलित-आदिवासी परम्परा और संस्कृति से लोगों को रूबरू कराएंगे. आंबेडकरवादी लेखक संघ (अलेस) के अध्यक्ष बलराज सिंहमार, इग्नू के प्रोफेसर प्रमोद मेहरा ने कहा कि महोत्सव में छह सत्र समानांतर रूप से चलेंगे. इसमें एक सत्र अंग्रेजी भाषा का और एक सत्र विभिन्न भारतीय भाषाओं का भी होगा. दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और स्त्रीवादी चिन्तक डॉ़ हेमलता कुमार ने कहा कि आज कोर्पोरेट घरानों ने साहित्य को कब्जाने की मुहीम चला रखी है. पुरुषवादी संस्कार, समाज और साहित्य में हावी हों रहें हैं. ऐसे पुरुषवादी समाज में स्त्रियाँ भी दलित की श्रेणी में ही आती हैं. इसलिए ये महोत्सव एक ऐतिहासिक भूमिका निभाएगा. इस महोत्सव के आयोजक संगठनों में अम्बेडकरवादी लेखक संघ, हिंदी विभाग, किरोड़ीमल कॉलेज, रश्मि प्रकाशन, लखनऊ, रिदम पत्रिका, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम), दिल्ली समर्थक समूह, अलग दुनिया, मंतव्य पत्रिका, अक्षर प्रकाशन और वितरक, दिल्ली, फोरम फॉर डेमोक्रेसी, मगध फाउंडेशन, कहानी पंजाब, अम्बेडकर वर्ल्ड शामिल हैं.

कुशवाहा पर लाठी चार्ज के विरोध में आंदोलन की तैयारी में रालोसपा कार्यकर्ता

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पटना। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा पर पुलिस के लाठी चार्ज के बाद बवाल बढ़ता जा रहा है. इस घटना के बाद रालोसपा कार्यकर्ताओं को नीतीश कुमार को घेरने के एक और मौका मिल गया है. खबर है कि अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष पर लाठी चार्ज से नाराज रालोसपा कार्यकर्ता आंदोलन की तैयारी में हैं. शिक्षा में सुधार की मांग को लेकर शनिवार को निकाले गए आक्रोश मार्च के दौरान कुशवाहा पुलिस की लाठीचार्ज से घालय हो गए थे.

इसके बाद कुशवाहा को पटना कॉलेज मेडिकल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया. कुशवाहा पर यह हमला तब हुआ जब वो अपने कार्यकर्ताओं के साथ जनाक्रोश मार्च निकाल रहे थे. पटना के डाकबंगला चौराहे पर जब पुलिसवालों ने मार्च को रोका तो समर्थकों और पुलिस वालों में झड़प हुई जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज किया. इस दौरान कुशवाहा को भी चोट लगी और उसके बाद उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.

पटना मेडिकल कॉलेज में घायल उपेंद्र कुशवाहा और अन्य रालोसपा कार्यकर्ता

कुशवाहा पर हमले के बाद विपक्षी दलों के नेताओं ने इस घटना की निंदा की है. बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन मांझी के अलावा कांग्रेस नेताओं ने भी लाठीचार्ज की निंदा की है. आने वाले दिनों में यह मामला और तूल पकड़ सकता है.

रिपोर्ट- बिहार प्रतिनिधि

अदालत ने आनंद तेलतुंबड़े की गिरफ्तारी को बताया गैर कानूनी, रिहा करने का आदेश

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नई दिल्ली। दलित स्कॉलर और सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबड़े की गिरफ्तारी और रिहाई को लेकर दिन भर नाटक चलता रहा. पहले उन्हें तड़के चार बजे मुंबई एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया, फिर उन्हें रिहा भी कर दिया गया. पुणे की एक अदालत ने भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में गिरफ्तार आनंद तेलतुंबड़े (Anand Teltumbde) को रिहा करने का आदेश दिया. कोर्ट ने गिरफ्तारी को गैर-कानूनी करार देते हुए यह आदेश दिया है.

इससे पहले पुणे पुलिस ने शुक्रवार को पुणे सेशन कोर्ट ने आनंद की अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद उनको शनिवार की सुबह मुंबई एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया था. पुणे सत्र न्यायालय ने शुक्रवार को तेलतुंबडे के खिलाफ पर्याप्त सामग्री का हवाला देते हुए गिरफ्तारी से पहले जमानत अर्जी देने से इनकार कर दिया था. एडिशनल सेशन जज किशोर वडाने ने फैसला सुनाने के दौरान कहा था कि ‘मेरे विचार में जांच अधिकारी द्वारा अपराध के कथित मामले में वर्तमान अभियुक्त की संलिप्तता दर्शाने के लिए पर्याप्त सामग्री एकत्र की गई है. इसके अलावा वर्तमान आरोपी के संबंध में जांच बहुत महत्वपूर्ण चरण में है.’ लेकिन इसके बाद अदालत ने ही उन्हें रिहा करने के भी आदेश दिए.