वर्तमान की परत खोलती कविताएं…

दुख-सुख, आचार-विचार, चेतन-अचेतन अवस्था ही नहीं, मुक्तावस्था भी कविता को जन्म देती है. अनुभूतियों का वह स्तर जहाँ पहुँचकर मानव स्वयं को भूल जाता है और अपनी निजता को लोक-सत्ता में लीन किए रहता है या फिर सत्ता और सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा हो जाता है, वहाँ विचारवान मानव जैसे कवि हो जाता है. संकुचन समाप्त प्राय: हो जाता है. फिर जैसा मन, वैसी कविता. व्यक्ति यदि मानसिक रूप से धार्मिक है तो धार्मिक कविता, राजनीतिक है तो राजनीतिक कविता, किसी का प्रेमी है तो प्रेमान्ध कविता, उत्पीड़ित है तो प्रताड़ना के खिलाफ चीखती-चिल्लाती अर्थात देश, काल और परिस्थिति कविता को सदैव प्रभावित करती है.

सड़क-चौराहों तक हिन्दू-मुसलमान के लबादे में लिपटी सियासी गर्मी कब बाज आती है अपनी बेशर्मी से जमकर कवायद करती है सियासी मुनाफा कमाने की.

इस प्रकार की कविता करना किसी जीवट व्यक्तित्व का ही काम हो सकता है, वरना तो आज की सियासत के चलते किसी की भी पूंछ सीधी नहीं हो पा रही हैं. इसलिए यह कहना कि जिस कविता में समाज के सरोकार प्रकट होते हैं, वह कविता आमजन की कविता बन जाती है…. ईश कुमार गंगानिया जी के कविताओं में अक्सर ये गुण देखने को मिलते हैं. जाहिर सी बात है कि लोकतंत्र के वर्तमान रूप – स्वरूप को यदि ऐसे का ऐसे ही झेलते रहे तो देश के शहरों का तो पता नहीं क्या होगा, किंतु ग्रामीण तबकों से उठने वाला धुआँ कभी थमने वाला नहीं लग रहा. मुझे ईश कुमार गंगानिया जी के कविताओं में अक्सर वह ज़मीन दिखाई देती है जहाँ कोई व्यक्ति सच कह सकता है. पुनर्निमाण की प्रक्रिया अपने चर्म पर है. ऐसे में मुझे उनकी ‘बदलाव की बात करें तो’ शीर्षांकित कविता की अधोलिखित पंकितियां उद्धृत करने का मन हो रहा है…. यथा

‘बदलाव की बात करें तो राम-रहीम मंदिर-मस्जिद और शिवाले वैसे ही नजर आते हैं जैसे हुआ करते थे पहले भी बदलाव की बात करें अगर तो बस ये सियासी चौसर के पालतू पियादे हो गए हैं.‘

कविता लिखना औरों के साथ कुछ बांटने, अकेलेपन के एहसास को ख़त्म करने, अत्याचार और अन्याय के खिलाफत की एक अहम प्रक्रिया है, किंतु समाज और राजनीति के सरोकारों पर बात करना भी कविता का काम है, इसे नकारा नहीं जा सकता, विगत इसका प्रमाण है. कविता यदि समीचीन है और समय के साथ सफर तय करती है तो इसे काव्य प्रवृति की सघन प्रवृत्ति कहा जा सकता है. देश, काल और परिस्थिति को भुला कर कविता करने भ्रम पालना जैसे अन्धे कुए में झांकर कोई ऐसा प्रतिबिम्ब देखना है जो वास्तव में है ही नहीं. ईश कुमार इस भ्रम को नही पालते…… ‘मेरी मर्जी’ शीर्षांकित की अधोलिखित पंक्तियां, इस ओर इशारा करती हैं…

‘मैं ही स्वतयंभु, मैं ही संप्रभु मैं ही रिंगमास्ट‍र लोकतंत्र के अखाड़े का मेरी ही लगेगी मुहर देशभक्ति और देशद्रोही के पिछवाड़े कौन रहेगा देश, और कौन जाएगा सीमा पार तय करना मेरा है अधिकार लोकतंत्र के तोते उड़ाऊं या उड़ाऊं कबूतर, मेरी मर्जी…’

ईश कुमार जी की कविताएं अपने समय की विसंगति, विडम्बना और तनाव से जुड़े सवालों को बखूभी इठाती हैं. यूँ तो हिन्दी साहित्य पर हिन्दी साहित्य पर विष्लेषण और चिन्ता किये जाने की स्थिति कमतर होती जा रही है किंतु ईश कुमार इस आपत्ति के दायरे से परे के कवि हैं. इतना ही नहीं, उनकी कविताएं सत्ता का प्रतिपक्ष प्रस्तुत करने में काफी हद तक सामर्थ्यवान हैं. ‘तानाशाही का आगाज’ नामक कविता समसामयिक राजनीति के चरित्र का खुलासा करने का उपक्रम करती है…यथा

‘लगता है देश में तानाशाही का आगाज लोकतंत्र का दरवाजा खटखटा रहा है मेरे चहेते गुलाब न जाने क्यूं गुलाब कहीं खो गए हैं और कांटे ही कांटे बचे रह गए हैं मेरे निजी संबंधों की तरह.‘

कहना अतिशयोक्ति नहीं कि आज का दौर कई मायनों में कठिन व पेचीदा दौर है. लोकतांत्रिक अवधारणा के विपरीत पूँजी और शक्ति के केन्द्रीकरण के कारण निरंकुश तानाशाही की ओर बढ़ती साम्राज्यवादी सत्ता ने दमन का रास्ता अपना लिया है, ऐसा लगता है. सत्ता के इस निरंकुश मार्ग से जनता भी अछूती नहीं रह गई है. कवि ईश कुमार अपनी अधोलिखित कविता ‘स्लोगन बनाने की कला’ में यही संदेश देते नजर आते हैं

‘मध्यवम वर्गीय इंसान ने आजकल जैसे आदर्शो और इंसानी मूल्यों का मोह ही त्याग दिया है और बनकर रह गया है वह भी खुराफातों का बाजार.‘

आज के खुरापाती दौर के चलते आखिर कोई रचनाकार करे भी तो क्या? इतिहास गवाह है कि ऐसे समय में एक रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यकम से केवल और केवल सार्थक हस्तमक्षेप करने के अलावा कुछ और नहीं कर पाता. आज के दौर में भी समकालीन कविता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है, उसमें आज का समय परिलक्षित हो, यह जरूरी है. उनकी हर कविता इस भाव को परिलक्षित करती है. ईश कुमार जी ने कुछ ग़ज़लें कहने का भी प्रयास किया है किंतु उनकी ग़ज़लें उनकी कविताओं के सामने बौनी नजर आती हैं. हाँ! उनसे इतनी आस जरूर बनती है कि आने वाले समय में वो ग़ज़लों को भी उम्दा धरातल देने में सफल होंगे. सारांशत: उनकी कविताएं वर्तमान की परतें निकोलने में अग्रणीय हैं. ऐसे में पुस्तक की सफलता की कामना की जा सकती है. पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय है.

समीक्षक – तेजपाल सिंह ‘तेज’ कौन जाएगा पाकिस्तान (कविताएं) कवि : ईश कुमार गंगानिया प्रकाशक : पराग बुक्स (9911379368) Read it also-दुबई (यु. ए. इ.) यात्रा : एक अनुभव

टीम इंडिया ये 4 गलतियां जिस से झेलनी पड़ी हार

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नई दिल्ली। विशाखापत्तनम में खेले गए आखिरी गेंद तक खिंचे कम स्कोर वाले पहले टी-20 मैच में ऑस्ट्रेलिया ने अपने पुछल्ले बल्लेबाजों के दम पर भारत पर तीन विकेट से रोमांचक जीत दर्ज कर ली. इतना ही नहीं कंगारू टीम ने दो मैचों की टी-20 सीरीज में 1-0 से बढ़त बना ली. अपने घर में यह भारत की आठ मैचों में पहली हार है. अब भारत इस सीरीज को बराबर ही कर सकता है लेकिन, जीत नहीं सकता. अगला टी-20 मैच 27 फरवरी को बेंगलुरु में खेला जाएगा.

ऑस्ट्रेलिया ने पहले गेंदबाजी करते हुए भारत को 7 विकेट पर 126 रन पर रोक दिया और फिर निर्धारित 20 ओवरों में 7 विकेट खोकर लक्ष्य हासिल कर लिया. ऑस्ट्रेलिया के लिए ग्लेन मैक्सवेल ने सर्वाधिक 56, डार्सी शॉर्ट ने 37 और अपना पदार्पण मैच खेल रहे पीटर हैंड्सकॉम्ब ने 13 रन बनाए. इस रोमांचक मैच में भारत ने कई गलतियां कीं, जिसके कारण ऑस्ट्रेलिया को फायदा मिला. आइए एक नजर डालते हैं टीम इंडिया की हार के कारणों पर:

1. उमेश यादव का आखिरी ओवर में 14 रन देना: इस मैच में एक पल ऐसा आया, जब भारत की जीत लगभग तय लग रही थी. लेकिन, उमेश यादव का आखिरी ओवर टीम इंडिया को भारी पड़ गया. ऑस्ट्रेलिया को आखिरी छह गेंदों पर 14 रन बनाने थे और गेंद अनुभवी गेंदबाज उमेश यादव के हाथों में थी. लेकिन, उमेश अपने अनुभव का फायदा नहीं उठा पाए और ऑस्ट्रेलिया ने आखिरी ओवर में 14 रन बटोरकर रोमांचक जीत अपने नाम कर ली. बुमराह ने 19वें ओवर में केवल दो रन दिए तथा पीटर हैंडसकॉम्ब और नाथन कुल्टर नाइल को आउट करके भारतीय खेमे में उम्मीद जगा दी. लेकिन, उमेश आखिरी ओवर में 14 रन लुटा गए. उमेश यादव आखिरी ओवर करने आए. उनके सामने ऑस्ट्रेलिया के पुछल्ले बल्लेबाज झाए रिचर्डसन (नाबाद 7 रन) और पैट कमिंस (नाबाद 7 रन) थे. इन दोनों ने उमेश पर एक एक चौका लगाया. कमिंस ने पांचवीं गेंद चार रन के लिए भेजी और अंतिम गेंद पर दो रन लेकर जीत अपने नाम कर ली.

2. मैक्सवेल और शॉर्ट की पार्टनरशिप: विशाखापत्तनम की पिच पर गेंदबाजों को मदद मिल रही थी और बल्लेबाजों के लिए रन बनाना कभी मुश्किल साबित हो रहा था. भारत को अच्छी शुरुआत भी मिली और 5 रनों के स्कोर पर ऑस्ट्रेलिया के दो विकेट गिर गए थे. लेकिन, टीम इंडिया इसका फायदा नहीं उठा पाई. ग्लेन मैक्सवेल और डार्शी शॉर्ट ने मिलकर तीसरे विकेट के लिए 84 रन जोड़ दिए और मैच को भारत की पकड़ से दूर ले गए. मैक्सवेल ने 40 गेंदों पर छठा टी-20 अर्धशतक पूरा किया. ऑस्ट्रेलिया के लिए ग्लेन मैक्सवेल ने सर्वाधिक 56 और शॉर्ट ने 37 रन बनाए.

3. धोनी चले कछुआ चाल: मध्यक्रम लड़खड़ाने और धोनी की धीमी बल्लेबाजी से टीम इंडिया अच्छा स्कोर नहीं बना पाई. धोनी ने 11वें ओवर के शुरू में क्रीज पर कदम रखा और आखिर तक टिके रहे. लेकिन, उनके बल्ले से केवल एक छक्का निकला. धोनी ने यह छक्का भी 20वें ओवर में लगाया. उन्होंने 29 रन बनाए, लेकिन इसके लिए 37 गेंदें खेलीं. धीमी बल्लेबाजी के लिए पहले भी आलोचकों के निशाने पर इस विकेटकीपर बल्लेबाज का स्ट्राइक रेट 78.37 रहा.

4. प्लेइंग इलेवन से छेड़छाड़ करना: वर्ल्ड कप में कुछ ही महीने बाकी रह गए हैं, लेकिन, टीम इंडिया अब तक अपनी बेस्ट इलेवन की तलाश कर रही है. कप्तान विराट कोहली ने इस मैच को शिखर धवन को आराम देकर ओपनिंग कॉम्बिनेशन के साथ छेड़छाड़ कर दी, जिसका खामियाजा भारत को भुगतना पड़ा. हालांकि धवन की जगह खेलने वाले केएल राहुल ने शानदार अर्धशतक लगाया. लेकिन, राहुल को मिडिल ऑर्डर में फिट कर धवन को शामिल किया जा सकता था. वहीं दिनेश कार्तिक को बाहर बैठाया जा सकता था.

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‘टोटल धमाल’, ओपनिंग डे पर हुई अपार कमाई

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नई दिल्ली। ‘टोटल धमाल’ कॉमेडी फिल्म रिलीज होने साथ ही बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त रिस्पॉन्स दे रही है. पहले दिन अजय देवगन, अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित की कॉमेडी फिल्म ‘टोटल धमाल’ने शानदार कमाई कर डाली. दर्शक सिनेमाघरों से निकलने पर हंस-हंस बोल रहे हैं कि फिल्म तो बहुत मजेदार है. ट्रेड एनलिस्ट तरण आदर्श के ट्वीट के मुताबिक फिल्म ने पहले दिन 16.50 करोड़ रुपए का कारोबार किया है. यानी इस फिल्म को वीकेंड से अच्छा कलेक्शन करने को मिल सकता है, क्योंकि अभी भी वीकेंड के दो दिन शनिवार और रविवार बचे हुए हैं. देखना होगा कि क्या फिल्म वीकेंड पर 50 करोड़ का आंकड़ा पार कर पाएगी.

‘टोटल धमाल’ फिल्म के रिलीजिंग के बारे में बात करें तो इस साल पहले दिन सबसे अधिक कमाने वाली बड़ी फिल्म कही जा सकती है, क्योंकि रिलीज वाले दिन न तो हॉलीडे था और न ही कोई स्पेशल दिन. वहीं रणवीर सिंह की फिल्म ‘गली बॉय को वेलेन्टाइन्स डे का फायदा मिला था और 19.26 करोड़ रुपए कमाए थे. जबकि दूसरे दिन शनिवार को कमाई सीधे 13.10 करोड़ पर आ गई थी. हालांकि एक अनुमान के अनुसार देखा जाए तो अजय देवगन, अनिल कपूर और माधुरी दीक्षितकी फिल्म दूसरे दिन करीब 14-15 करोड़ रुपए कमा सकती है.

इंद्र कुमार के डायरेक्शन में ‘धमाल’ सीरीज की यह तीसरी फिल्म है. ‘टोटल धमाल’ में इस बार अजय देवगन, अनिल कपूर, माधुरी दीक्षित, रितेश देशमुख, अरशद वारसी, जावेद जाफरी , संजय मिश्रा और पीतोबाश नजर आंगे. फिल्म की टीम का दावा है कि इस बार धमाल का मजा तीन गुना ज्यादा होने वाला है. इस फिल्म में कोबरा, वनमानुष से लेकर बब्बर शेर तक दिखाई दे रहे हैं.

धमाल सीरीज की पहली फिल्म साल 2007 में रिलीज हुई थी. जिसमें संजय दत्त,अरशद वारसी, रितेश देशमुख, जावेद जाफरी और आशीष चौधरी मुख्य किरदार में थे. दर्शकों को यह फिल्म खूब पसंद आई थी. सीरीज की दूसरी फिल्म ‘डबल धमाल’ 4 साल बाद 2011 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म को दर्शकों को उतना प्यार नहीं मिला था. जितना प्यार सीरीज की पहली फिल्म को मिला था. सीरीज की तीसरी फिल्म में कई नए किरदार जुड़े हैं. जिनमें अजय देवगन, अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित शामिल हैं.

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आम चुनाव 2019: चुनावी समर में इसबार कई बड़े चेहरे नजर नहीं आएंगे

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बिहार में लोकसभा चुनाव-2019 के दंगल में पिछले लोकसभा चुनावों में सक्रिय रहे कई चेहरे नजर नहीं आएंगे. इनमें से कई ऐसे हैं, जिनके नाम पर भीड़ जुटती थी. जिन्हें देखने और सुनने दूर-दराज से लोग आते थे. इसबार इनमें से कुछ सक्रिय राजनीति से दूर हो चुके हैं, कुछ कानूनी प्रावधानों के तहत चुनाव प्रक्रिया से बाहर हैं. कई नेता दिवंगत हो चुके हैं. कई की भूमिकाएं बदल गई हैं.

बिहार के चुनाव में चर्चित चेहरों में पिछले चार दशक से सबसे बड़ा नाम लालू प्रसाद का रहा है. फिलहाल वह चारा घोटाला में सजायाफ्ता हैं और रांची के होटवार जेल में हैं. महागठबंधन को लालू के आकर्षण और देसी भाषण के बगैर चुनावी लड़ाई लड़नी होगी. पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र पहले ही चुनावी राजनीति से अलग हो चुके हैं. अब उनका न तो किसी दल से सीधा जुड़ाव है और न ही उनका स्वास्थ्य ही चुनावी सक्रियता की इजाजत देगा. कभी जहानाबाद की राजनीति की धुरी रहे जगदीश शर्मा भी चारा घोटाले में जेल की सजा काट रहे हैं.

भोला सिंह, असरारुल हक हो चुके हैं दिवंगत बेगूसराय के सांसद भोला प्रसाद सिंह और किशनगंज के सांसद मौलाना असरारुल हक का निधन हो चुका है. वर्ष 2009 तक लोकसभा चुनाव में सक्रिय रहे कैप्टन जयनारायण निषाद और जॉर्ज फर्नांडिस भी अब हमारे बीच नहीं हैं. राजद के दिग्गज नेता रघुनाव झा, अटल जी के सहयोगी लालमुनी चौबे भी दिवंगत हो चुके हैं.

रामविलास राज्यसभा जाएंगे लोजपा सुप्रीमो पासवान ने तय किया है कि वह लोकसभा चुनाव लड़ने की जगह राज्यसभा जाएंगे. हाजीपुर की जनता चुनाव में उन्हें मिस करेगी. हालांकि, वह लोजपा और एनडीए के स्टार प्रचारक के रूप में सक्रिय रहेंगे. चर्चाओं के मुताबिक मधुबनी के सांसद हुकुमदेव नारायण यादव भी चुनाव में नहीं उतरेंगे. प्रकाश झा और शेखर सुमन भी चुनाव नहीं लड़ेंगे. पिछली बार जमुई से कांग्रेस के टिकट पर लड़े अशोक चौधरी और जदयू से श्याम रजक की भूमिकाएं बदल चुकी हैं. महेश्वर हजारी और डॉ. अशोक कुमार का भी यही हाल है.

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SP-BSP गठबंधन: जानें, क्यों 2014 के फॉर्म्युले को सीट शेयरिंग में नहीं दी जगह, यह है वजह

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन में लड़ रहे बीएसपी और एसपी ने यूपी में अपनी सीटों का बंटवारा कर लिया है. अखिलेश की समाजवादी पार्टी 37 सीटों पर लड़ेगी, जबकि मायावती की बीएसपी 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी. कुल 80 सीटों में से 75 अपने पास रखने के बाद दोनों दलों ने तीन सीटें आरएलएडी और दो कांग्रेस के लिए छोड़ दी हैं. हालांकि दोनों दलों ने सीटों के बंटवारे के लिए 2014 के आम चुनाव के फॉर्म्युले को नहीं माना है. जानें, दोनों दलों ने किस फॉर्म्युले से किया सीटों का बंटवारा…

2014 नहीं, 2009 के गणित से कर रहे काम एसपी और बीएसपी ने चुनावी समीकरण तैयार करने के लिए 2014 की बजाय 2009 के आम चुनावों को आधार माना है. दोनों दलों का कहना है कि 2014 में मोदी लहर थी, जिसके चलते उनके अपने वोट बड़ी संख्या में कट गए थे. लेकिन, 2009 के आम चुनाव में दोनों दलों से मजबूत गढ़ का संकेत मिलता है. तब 80 लोकसभा सीटों में से समाजवादी पार्टी ने 23.4 फीसदी वोट के साथ 23 सीटें जीती थीं, जबकि 27.5 पर्सेंट मतों के साथ बीएसपी के खाते में 20 सीटें गई थीं. उस वक्त बीजेपी को महज 10 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था, जबकि आरएलडी के खाते में 5 सीटें गई थीं. इसके अलावा एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार जीता था.

आसान नहीं समझना सीट बंटवारे का फॉर्म्युला बीएसपी 12 ऐसी सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जहां उसका वोट शेयर 2014 में एसपी के मुकाबले कम था. इसके अलावा वह दो ऐसी सीटों से भी चुनावी जंग में उतरेगी, जहां उसके वोट एसपी के लगभग बराबर थे.

कम वोट वाली 14 सीटें एसपी के खाते में आम चुनाव में एसपी समाजवादी पार्टी के खाते में भी ऐसी 14 सीटें गई हैं, जहां 2014 में उसका वोट प्रतिशत बीएसपी के मुकाबले कम था.

मिर्जापुर में बीएसपी से आधे वोट, सीट SP के खाते में पूर्वांचल की मिर्जापुर सीट पर बीएसपी को 20.6 फीसदी वोट मिले थे, एसपी को 10.6 पर्सेंट वोट ही मिले थे. लेकिन, यह सीट भी मायावती ने अखिलेश यादव को सौंप दी है.

2014 में लड़ते साथ तो कितनी बनती बात यदि बीते आम चुनाव में बीएसपी और एसपी एक साथ लड़ते तो करीब 15 सीटें ऐसी थीं, जहां उनका वोट प्रतिशत 50 से भी अधिक रहता. 31 सीटों पर दोनों दलों को 40 से 50 फीसदी तक वोट मिलते. 23 सीटों पर दोनों दलों का वोट प्रतिशत 30 से 40 पर्सेंट तक होता. 3 सीटों पर यह आंकड़ा 20 से 30 फीसदी तक और 3 ही सीटों पर 20 फीसदी से नीचे रहता.

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश से 10 नहीं, करीब 20 लाख आदिवासी हो सकते हैं ज़मीन से बेदखल

भारत में छत्तीसगढ़ के धारबागुड़ा में एक राहत शिविर मैं बैठे आदिवासी. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली। बीते बुधवार को यह रिपोर्ट किया गया था कि सुप्रीम कोर्ट करीब10 लाख से अधिक आदिवासियों और वनवासियों को वन भूमि से बेदखल करने का आदेश दिया है.

शीर्ष अदालत के आदेश के अनुसार, जिन परिवारों के वनभूमि के दावों को खारिज कर दिया गया था, उन्हें राज्यों द्वारा इस मामले की अगली सुनवाई से पहले बेदखल किया जाना है.

हालांकि कोर्ट के आदेश की वजह से लगभग 20 लाख आदिवासी और वनवासी परिवार प्रभावित हो सकते हैं. यह आंकड़ा जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा एकत्र आंकड़ों के अनुसार है. मंत्रालय के मुताबिक 30 नवंबर, 2018 तक देश भर में 19.39 लाख दावों को खारिज कर दिया गया था.

कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में पास होने वाले वन अधिकार अधिनियम के तहत सरकार को निर्धारित मानदंडों के अनुसार आदिवासियों और अन्य वनवासियों को पारंपरिक वनभूमि वापस सौंपना होता है. साल 2006 में पास होने वाले इस अधिनियम का वन अधिकारियों के साथ वन्यजीव समूहों और नेचुरलिस्टों ने विरोध किया था.

वनवासियों के समूह का एक राष्ट्रीय मंच ‘कैंपेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी’ के सचिव शंकर गोपालकृष्णन के अनुसार, यह आदेश उन राज्यों के लिए लागू होता है जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा व्यक्तिगत रूप से निर्देशित किया गया है. हालांकि आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ेगी.

उन्होंने द वायर को बताया बताया, ‘जैसा ही अन्य राज्य अदालत में अपना हलफनामा दायर करेंगे, उनके लिए भी संभावित तौर पर ऐसा ही आदेश पारित होगा और इस तरह प्रभावित होने वालों की संख्या बढ़ जाएगी.’

गोपालकृष्णन ने कहा कि आदेश को वन विभाग द्वारा आदिवासियों और वनवासियों को जमीन से बेदखल करने के लिए दुरुपयोग भी किया जा सकता है.

अदालत का यह आदेश एक वन्यजीव समूह द्वारा दायर की गई याचिका के संबंध में आया है जिसमें उसने वन अधिकार अधिनियम की वैधता पर सवाल उठा था.

याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि वे सभी जिनके पारंपरिक वनभूमि पर दावे कानून के तहत खारिज हो जाते हैं, उन्हें राज्य सरकारों द्वारा निष्कासित कर दिया जाना चाहिए.

याचिकाकर्ता बेंगलुरु स्थित वाइल्डलाइफ फर्स्ट जैसे कुछ गैर-सरकारी संगठनों का मानना है कि यह कानून संविधान के खिलाफ है और इसकी वजह से जंगलों की कटाई में तेजी आ रही है. उनका कहना है कि अगर यह कानून बचा भी रह जाता है तब भी दावों के खारिज होने के कारण राज्य सरकारें अपने आप जनजाति परिवारों को बाहर कर देंगी.

जनजाति समूहों का कहना है कि कई मामलों में दावों को गलत तरीके से खारिज कर दिया गया. उनका कहना है कि इसकी नए अधिनियम के तहत समीक्षा होनी चाहिए जिसे जनजाति मामलों के मंत्रालय ने सुधार प्रक्रिया के रूप में लाया था. कानून के तहत उन्हें अपने आप बाहर नहीं निकाला जा सकता है और कुछ मामलों में तो जमीनें उनके नाम पर नहीं हैं क्योंकि वे उन्हें पैतृक वन संपदा के रूप में मिली हैं.

वन अधिकार कानून के बचाव के लिए केंद्र सरकार ने जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस इंदिरा की पीठ के समक्ष 13 फरवरी को अपने वकीलों को ही नहीं भेजा. इसी वजह से पीठ ने राज्यों को आदेश दे दिया कि वे 27 जुलाई तक उन सभी आदिवासियों को बेदखल कर दें जिनके दावे खारिज हो गए हैं. इसके साथ ही पीठ ने इसकी एक रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जमा करने को भी कहा. यह लिखित आदेश 20 जनवरी को जारी हुआ है.

आदिवासी मामलों के मंत्री को इस महीने की शुरुआत में भेजे गए एक पत्र में, विपक्षी दलों और भूमि अधिकार कार्यकर्ताओं के समूहों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारत सरकार ने कानून का बचाव नहीं किया है.

पत्र में कहा गया है, ‘पिछली तीन सुनवाई में – मार्च, मई और दिसंबर 2018 में – केंद्र सरकार ने कुछ नहीं कहा है.’ इसके अलावा बीते 13 फरवरी को हुई आखिरी सुनवाई के दौरान कोर्ट में सरकारी वकील मौजूद ही नहीं थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में, पूर्व राज्यसभा सांसद और माकपा की नेता बृंदा करात ने भी कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से प्रभावित लोगों की कुल संख्या बहुत अधिक हो सकती है.

वह कहती हैं कि चूंकि 42.19 लाख दावों में से केवल 18.89 लाख दावों को स्वीकार किया गया है, शेष 23.30 लाख दावेदारों को आदेश की वजह से बदखल किया जाएगी. उन्होंने मोदी से आदिवासियों और वनवासियों की रक्षा के लिए अध्यादेश पारित करने का आग्रह किया है.

साभार- द वायर read it also- सुप्रीम कोर्ट ने 16 राज्यों के 10 लाख से अधिक आदिवासियों को जमीन से बेदखल करने का आदेश दिया  

दलित ज्वाइंट एक्शन कमेटी के कार्यकर्ता भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को दिखाएंगे काले झंडे

दलित ज्वाइंट एक्शन कमेटी के कार्यकर्ता 25 फरवरी को हिसार में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को काले झंडे दिखाएंगे. अधिवक्ता रजत कल्सन ने बताया कि दलित पीड़ित परिवारों की जायज मांगों के लिए जींद में 379 दिन से चल रहे अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे पीड़ित परिवारों की मांगों की भाजपा की खट्टर सरकार द्वारा अनदेखी करने और बार-बार झूठे आश्वासन देने से लोग नाराज हैं.

वादा खिलाफी व विश्वासघात के विरोध में अमित शाह के हिसार आगमन पर दलित ज्वाइंट एक्शन कमेटी के लोग काले झंडों से विरोध जताएंगे. इतने लंबे और कड़े संघर्ष के बाद भी भाजपा की दलित विरोधी सरकार ने पीड़ित परिवारों की जायज मांगों को पूरा नहीं किया है. खासकर के दलित समाज की संयुक्त मांग दो अप्रैल के आन्दोलन के दौरान दलित समाज के लोगों पर जो झूठे मुकदमें दर्ज किए गए थे, हरियाणा सरकार ने उन मुकदमों को भी खारिज नहीं किया है.

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संख्यानुपात में आरक्षण का मुद्दा म्लान कर सकता है: राष्ट्रवादी लहर !

एक ऐसे समय में जबकि लोकसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा होने ही वाली है, गत 14 फ़रवरी को जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले में सीआरपीऍफ़ की टुकड़ी पर एक भयावह आतंकी हमला हुआ, जिसमें 40 से अधिक जवानों की जान चली गयी और कई घायल हुए. इस आतंकी हमले के बाद देश भर में बड़े स्तर पर लोगो में वैसा ही गुस्सा देखा गया जैसा कभी संसद, मुंबई, उरी इत्यादि आतंकी घटनाओं के बाद दिखा था. किन्तु पुलवामा की घटना कुछेक मामले में बाकी घटनाओं भिन्न रही. अतीत की सभी घटनाओं में हमारी चूक को लेकर सवाल जरुर खड़े हुए, किन्तु इस मामले में पुलवामा आतंकी हमला शायद सबसे अलग है. देश के इस सबसे सुरक्षित मार्ग पर 250 किलो भयावह विस्फोटक सामग्री लेकर एक अकेला हमलावर कैसे 78 गाड़ियों के काफिले में घुस गया और कैसे उस एकमात्र गाड़ी को टारगेट किया, जो बुलेट प्रूफ नहीं थी, ऐसे दो-चार नहीं ढेरों सवाल हैं, जिसे लेकर केंद्र सरकार की ओर से संतोषजनक जवाब अबतक नहीं मिल पाया है. इस कारण ही इस किस्म की घटना को लेकर पहली बार कोई सरकार इस तरह विपक्ष व बुद्धिजीवियों के निशाने पर आई है. सोशल मीडिया पर ढेरों लोगों ने सरकार पर निशाना साधते हुए लिखा है, ’पुलवामा धमाके में बस और सैनिकों के ही परखच्चे नहीं उड़े, बल्कि राफेल, राम मंदिर, मंहगाई-बेरोजगारी, भष्टाचार, भागते लुटेरे, पिंजरे में कैद होता तोता, सुप्रीम कोर्ट के बहार आकर रोते जज, किसानों की दुर्दशा, सवर्ण आरक्षण, 13 पॉइंट रोस्टर, मोदी सरकार की समस्त विफलतायें और देश से जुड़े दूसरे जरुरी मुद्दे भी उड़ गए. यही है मोदी मैजिक!’ यही नहीं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने तो इसके लिए मोदी सरकार को सीधा दोषी ठहरा दिया है.

दरअसल मोदी सरकार अगर विपक्ष के निशाने पर आ गयी है तो उसके लिए खुद भाजपा के नेता जिम्मेवार हैं. मीडिया में कई ऐसे तस्वीरें वायरल हुई हैं,जिनमें देखा गया है कि शहीदों की लाशें ले जाते वक्त उसके कई नेताओं के चेहरे पर ऐसी हंसी खिली रही जो जश्न के माहौल में उभरती है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देश-विदेश के नेताओं के साथ ऐसी कई तस्वीरे मीडिया में आई है, जिनमें वह ठहाके लगाते हुए दिखे. इन पक्तियों के लिखे जाने के दौरान इस मामले में सबसे बड़ा आरोप मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की ओर से यह लगाया गया है-‘ 14 फ़रवरी,2019 को दिन में 3 बज कर 10 मिनट पर पुलवामा की घटना हुई, पूरा देश सदमे से जूझ रहा था, किन्तु मोदी उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट में अपने प्रचार की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म की शूटिंग में व्यस्त रहे. देश जब शहीदों के शवों के टुकड़े चुन रहा था, मोदी डिस्कवरी चैनल के मुखिया व उनके क्रू के साथ नौका विहार करते हुए घडियालों को निहार रहे थे. मोदी के लिए सत्ता की लालसा देश की सेना और शहीदों से बड़ी है.शहीदों और शहादत के अपमान का जो उदहारण मोदी जी ने पेश किया है वैसा कोई उदारण पूरी दुनिया में नहीं है. ’विपक्ष की इस बात को पूरी तरह न झुठलाते हुए सरकार की ओर से कह दिया गया है,’ भारत उस घटना से डरा नहीं है, रुका नहीं है’, यह सन्देश प्रधानमंत्री देना चाहते है.

इसमें कोई शक नहीं कि पुलवामा जैसी स्तब्धकारी घटना पर जितनी गंभीरता सरकार को दिखानी चाहिए थी, वैसा नहीं किये जाने के कारण ही इसे लेकर विपक्ष को राजनीति गरमाने का मौका मिल गया है. लेकिन इस मामले में खुद मोदी सरकार विपक्ष से कई कदम आगे है. पुलवामा घटना के बाद विपक्ष जनभावना का सम्मान करते हुए अपना कई प्रोग्राम ख़ारिज कर दिया, किन्तु मोदी सरकार की ओर से ऐसा नहीं किया गया. शहीदों की लाशें चिता पर चढ़ने के पहले मोदी-शाह और उनके लोग इस घटना से उपजे गुस्से को भुनाने में जुट गए और पकिस्तान तथा कश्मीरियों के बहाने, उस मुस्लिम विद्वेष को एक बार फिर तुंग पर पहुचाने में सफल हो गए, जो भाजपा की विजय में सबसे प्रभावी कारक का काम करता है. पुलवामा की घटना के जरिये आगामी लोकसभा चुनाव का लक्ष्य सधते देखकर ही इसे ब्रह्मास्त्र की तरह इस्तेमाल करने के लिए 19 जनवरी को गुजरात भाजपा के नेता और पार्टी प्रवक्ता भरत पंड्या ने कार्यकर्ताओं को कह दिया, ’40 जवानों के शहीद होने के बाद देश में इस समय ‘राष्ट्रवादी लहर’ चल रही है. हमें इसे वोटों में तब्दील करना होगा.’

वास्तव में विपुल प्रचार माध्यमों के समर्थन से पुष्ट दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा जिस तरह मुद्दे सेट करने में महारत हासिल कर चुकी है, उसके आधार पर यह मानकर चलना चाहिए कि पुलवामा का आतंकी हमला ही लोकसभा चुनाव-2019 का मुख्य मुद्दा बनने जा रहा है, जिसमें राष्ट्रवादी लहर पर सवार होकर मोदी एक बार फिर सत्ता में आने का प्रयास करेंगे. चूँकि मुद्दा सेट करने में भाजपा अप्रतिरोध्य है, इसलिए न चाहते हुए भी विपक्ष मोदी सरकार की तमाम नाकामियां भूलकर राष्ट्रवाद की पिच पर खेलने के लिए मजबूर होगा. और दुनिया जानती है कि इस पर भाजपा को मात देना बहुत कठिन काम है. हालांकि प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने के बाद नयी उर्जा से सराबोर कांग्रेस शायद इस पिच पर भी कुछ कमाल कर जाये, क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ उसका ट्रैक रिकार्ड भाजपा से बेहतर होने के साथ– साथ इंदिरा और राजीव गांघी के प्राण-बलिदान की पूंजी भी उसके पास है. किन्तु ऐसी लड़ाई में तो बहुजनवादी दल भाजपा और कांग्रेस की लड़ाई में के बीच सैंडविच बनकर रह जायेंगे:उनका अता-पता ही नहीं चलेगा. ऐसा में वे कौन सा ऐसा मुद्दा उठायें जो भाजपा को अप्रतिरोध्य बनाने वाली ‘राष्ट्रवाद की लहर’ को म्लान कर सके, यह सबसे बड़ा सवाल है! बहरहाल आज जबकि राष्ट्रवाद की लहर पर सवार होकर भाजपा एक बार फिर निर्णायक चुनावी लड़ाई में उतरने जा रही है, मीडिया,धन-बल और मोदी जैसे प्रभावशाली नेता से शून्य बहुजनवादी दलों को भाजपा की खूबियों और कमियों का एक बार गंभीरता से सिंहावलोकन कर लेना चाहिए.

देश के धन्नासेठों, मीडिया, लेखकों, साधु-संतों एवं प्रभु वर्ग के प्रबल समर्थन से पुष्ट संघ के राजनीतिक संगठन भाजपा जैसी ताकतवर राजनीतिक पार्टी आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में कोई और नहीं है: विपक्ष, विशेषकर बहुजनवादी दल उसके सामने पूरी तरह बौने हैं. किन्तु यदि हम इस बात को ध्यान में रखे कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सत्ता हासिल करने में संख्या-बल सर्वाधिक महत्वपूर्ण फैक्टर का काम करता है और इसी संख्या-बल को अनुकूल करने के लिए राजनीतिक दलों को धन-बल,मीडिया-बल ,कुशल प्रवक्ताओं-कार्यकर्ताओं की भीड़ तथा योग्य नेतृत्व की जरुरत पड़ती है तो पता चलेगा ढेरों कमियों से घिरे भारत के बहुजनवादी दलों जैसी अनुकूल स्थिति पूरे विश्व में और कहीं है ही नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि आज की तारीख में सामाजिक अन्याय की शिकार बनाई गयी भारत के बहुजन समाज (एससी-एसटी-ओबीसीऔर इनसे धर्मान्तरित तबकों) जैसी विपुलतम आबादी दुनिया में कही और है ही नहीं.इसी विशालतम आबादी के सबसे बड़े हिस्से को न्याय दिलाने के लिए जब अगस्त, 1990 में मंडल की रिपोर्ट प्रकाश में आई, तब संग-संग भाजपा ने राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन छेड़ दिया, जिसके फलस्वरूप राष्ट्र की करोड़ों की संपदा और असंख्य लोगों की प्राण-हानि हुई. सामाजिक न्याय को दबाने के लिए शुरू किये गए मंदिर आन्दोलन की नौका पर सवार होकर ही भाजपा एकाधिक बार सत्ता में आई और हर बार उसने ऐसी नीतियां अख्तियार की जिससे बहुजन मंडल-पूर्व स्थिति में पहुँच जाए. इसके लिए उसने खास तौर से उस आरक्षण को निशाना बनाया, जिसके सहारे हजारों साल से शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनैतिक-शैक्षिक-धार्मिक) से बहिष्कृत बहुजन कुछ-कुछ राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने लगे थे. आरक्षण के खात्मे के लिए उसने नरसिंह राव की उन नवउदारवादियों नीतियों को हथियार की तरह इस्तेमाल किया, जिन्हें कभी वह विदेशियों का गुलाम बनाने वाली नीतिया घोषित किया करती थी. इससे आरक्षण को ख़त्म करने में वह काफी हद कामयाब जरुर हो गयी, किन्तु उसकी छवि सबसे बड़े सामाजिक न्याय-विरोधी दल की बन गयी, यही उसकी एक ऐसी कमजोरी है, जिसकी काट वह आंबेडकर प्रेम प्रदर्शन में दूसरे दलों को मीलों पीछे छोड़ने के बाद भी आजतक नहीं ढूंढ पाई है. उसकी इसी कमजोरी का सद्व्यवहार कर लालू प्रसाद यादव ने उसे बिहार विधानसभा चुनाव- 2015 बुरी तरह शिकस्त दे दिया था. स्मरण रहे बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जब संघ प्रमुख ने आरक्षण के समीक्षा की बात उठाया, तब लालू प्रसाद यादव ने फिजा में यह बात फैला दी,’तुम आरक्षण का खात्मा करना चाहते हो, हम सत्ता में आयेंगे तो संख्यानुपात में सबको आरक्षण देंगे.’ तब विपुल प्रचारमाध्यमों और संघ के विशाल संख्यक एकनिष्ठ कार्यकर्ताओं से लैस भाजपा लाख कोशिशें करके भी लालू की उस बात की काट नहीं ढूंढ पाई और शर्मनाक हार झेलने के लिए विवश हुई.

2019 में स्थितियां और बदतर हुईं हैं. तब 2015 में मोदी का सम्मोहन चरम पर था : वे अपराजेय थे. किन्तु अपने कार्यकाल में लोगों के खाते 15 लाख रूपये जमा कराने; युवाओं को हर साल दो करोड़ नौकरियां देने व अच्छे दिन लाने इत्यादि में बुरी तरह विफल मोदी आज खुद भाजपा के लिए ही बोझ बन चुके हैं. इस बीच वह सामाजिक न्याय को क्षति पहुचाने व आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने के मोर्चे पर नरसिंह राव, डॉ.मनमोहन सिंह और खुद संघी वाजपेयी जैसे अपने पूर्ववर्तियों को बहुत पीछे छोड़ चुके हैं. इधर उनके कार्यकाल के स्लॉग ओवर में 7 से 22 जनवरी, 2019 के मध्य जिस तरह ‘सवर्ण आरक्षण’ तथा ‘विभागवार आरक्षण’ पर मोहर लगी है, उससे जहाँ एक ओर उनकी छवि नयी सदी के सबसे बड़े सवर्ण ह्रदय-सम्राट के रूप में स्थापित हुई है, वहीँ दूसरी ओर वह बहुजनों की नज़रों में मंडल उत्तर-काल के सबसे बड़े सामाजिक न्याय विरोधी के रूप में उभरे हैं. उनकी चरम सामाजिक न्याय-विरोधी छवि के कारण ही 8 जनवरी, 2019 से रातो-रात बहुजन नेताओं में संख्यानुपात में आरक्षण की वह मांग शोर में तब्दील हो गयी, जिसके लिए बहुजन बुद्धिजीवी वर्षों से प्रयास कर रहे थे. उसके अतिरिक्त 13 प्वाइंट रोस्टर के खात्मे की लड़ाई के साथ बहुजन बुद्धिजीवि अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में मूलनिवासी एसटी-एससी और ओबीसी को प्राथमिकता दिए जाने की मांग उठाने लगे है, जिसके सुप्रीम कोर्ट द्वारा लाखों आदिवासियों को जंगल से खदेड़ने का आदेश जारी होने के बाद जोर पकड़ने की सम्भावना काफी बढ़ गयी. ऐसे में 7 जनवरी, 2019 के बाद के बदले हालात को दृष्टिगत रखते हुए यदि बहुजनवादी दल नौकरियों के साथ-साथ शैक्षणिक व अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में प्रमुख सामाजिक समूहों -एसटी/एससी,ओबीसी,सवर्ण और धार्मिक अल्पसंख्यकों – के संख्यानुपात में आरक्षण के दिलाने के मुद्दे पर चुनाव में उतरें तो शायद बिहार विधानसभा चुनाव- 2015 से भी बेहतर परिणाम देने में सफल हो जायेंगे. संख्यानुपात में आरक्षण के सामने राष्ट्रवाद की बड़ी से बड़ी लहर का भी म्लान होना अवधारित है.

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष है- सम्पर्क: 9654816191

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दलित परिवार (बेटी) की बिंदौली पर हमला, पिता, भाई समेत चार घायल

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चित्तौड़गढ़। जिला मुख्यालय के सदर थाना क्षेत्र के लक्ष्मीपुरा गांव में बुधवार रात एक दलित परिवार की ओर से निकाली जा रही बिंदौली में आपसी मारपीट में चार जनें घायल हो गए. घायलों में दुल्हन का पिता व भाई शामिल हैं. घटना से सकते में आई दुल्हन भी एकबार बेहोश हो गई. सूचना मिलने पर सदर थाना पुलिस रात को ही मौके पर पहुंची. पुलिस ने जानलेवा हमले व एसटीएससी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर एक आरोपित को हिरासत में ले लिया है. गुरुवार दोपहर पुलिस उप अधीक्षक (मुख्यालय) माधो सिंह साढ़ा लक्ष्मीपुरा पहुंचे और मौका मुआयना किया.

उन्होंने बताया कि लक्ष्मीपुरा निवासी नाथूलाल भाम्बी की पुत्री का विवाह था. उसकी बुधवार रात बिंदौली निकाली जा रही थी. इसी दौरान बिंदौली में शामिल कुछ लोगों की वहां से गुजर रहे सवर्ण वर्ग के किशोर से कहासुनी हो गई. लोगों ने उसे मार-पीटकर भगा दिया. उसके बाद किशोर के साथ 10-15 लोग लाठी-सरिया लेकर आए और हमला कर फरार हो गए. हमले में दुल्हन के पिता नाथूलाल (69), उसका पुत्र शिवलाल (32) और रमेश (25) घायल हो गए. इन तीनों को रात में ही जिला चिकित्सालय ले जाया गया. नाथूलाल की हालत गंभीर है. रमेश के हाथ में फ्रेक्चर हो गया है. उधर घटना की सूचना मिलते ही रात करीब 12 बजे सदर थाना के एसआई रोशनलाल जाप्ते के साथ मौके पर पहुंचे, लेकिन तब तक बदमाश फरार हो चुके थे.

गुरुवार दोपहर चित्तौडग़ढ़ के पुलिस उप अधीक्षक माधो सिंह ने पीडि़त परिवार के बयान दर्ज किए हैं, वहीं घटना को लेकर कई दलित संगठनों के पदाधिकारी भी पीडि़त के पास पहुंचे और जानकारी ली. ओछड़ी ग्राम पंचायत सरपंच दिग्विजय सिंह भी मौके पर पहुंचे हैं. पुड़िया और पत्थर फेंके नाथूलाल ने बताया कि रात में बिंदौली निकालते समय कुछ लोग आए और उन्होंने बिंदौली पर पुड़िया और पत्थर फेंकने शुरू कर दिए. बाद में उन्होंने मारपीट भी की. गांव के प्रकाशचंद्र भाम्बी के अनुसार, अफरा-तफरी और झगड़े के दौरान आरोपितों ने दुल्हन को बग्गी से उतारने का प्रयास किया, जिससे वह बेहोश हो गई. इस घटना को लेकर परिजनों में आक्रोश है. प्रत्येक कार्यक्रम में करते हैं हंगामा ग्रामीणों और परिजनों की मानें तो गांव में कुछ लोग हैं शराब पीकर उत्पात मचाते हैं. किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान ये लोग कार्यक्रम को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, लेेकिन इनकी पुलिस में शिकायत नहीं की गई. उसी का नतीजा है कि इतने बड़े घटनाक्रम को अंजाम दिया गया.

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नगीना सीट से चुनाव लड़ सकती हैं मायावती, सीटों के बंटवारे के बाद अटकलें तेज

लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ बनाए गए बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के महागठबंधन में सीटों के बंटवारे में वेस्ट यूपी में अखिलेश यादव ने मायावती को ज्यादा तरजीह दी है. पश्चिम यूपी की पांच रिजर्व सीटों में से चार पर बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों को गठबंधन का प्रत्याशी बनाने का निर्णय किया गया है. इसके अलावा एक रिजर्व सीट पर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी उतारने का निर्णय हुआ है. गुरुवार को सीटों के बंटवारे के बाद हुए निर्णय में नगीना सुरक्षित सीट के बीएसपी के खाते में आने से मायावती के चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हो गई हैं.

गुरुवार को हुए समझौते के मुताबिक, वेस्ट यूपी के मेरठ मंडल में एसपी सिर्फ एक सीट गाजियाबाद पर चुनाव लड़ेगी. जबकि बीएसपी यहां मेरठ, गौतमबुद्धनगर और बुलंदशहर लोकसभा तीन सीट पर उम्मीदवार उतारेगी. इसके अलावा बागपत की सीट आरएलडी के पास रहेगी. सहारनपुर मंडल में एसपी के पास सिर्फ कैराना सीट रहेगी. यह सीट एसपी ने आरएलडी से वापस ले ली है. कैराना की जगह मुजफ्फरनगर की सीट आरएलडी को दी गई है. इन सब के साथ सहारनपुर की सीट को बीएसपी के कोटे में डाला गया है.

*पश्चिम यूपी में सीटों के बंटवारे में माया को अखिलेश ने दी तरजीह *पांच रिजर्व सीटों में से चार सीटों को बीएसपी के खाते में डालने का फैसला *नगीना सीट पर बीएसपी ने किया दावा, मायावती खुद लड़ सकती हैं चुनाव *सहारनपुर सीट पर भी बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी को उतारने का फैसला

दूसरी ओर मुरादाबाद मंडल में एसपी मुरादाबाद, रामपुर और संभल तो बीएसपी बिजनौर, नगीना अपने पास रखेंगी. दिलचस्प बात यह है कि वेस्ट यूपी की पांच रिजर्व सीटों में से चार नगीना, बुलंदशहर, आगरा और शाहजहांपुर बीएसपी के पास रहेगी. एक रिजर्व सीट हाथरस एसपी को मिली हैं.

सहारनपुर और मेरठ सीट बीएसपी को

दलित मुद्दे पर आंदोलन और हिंसा को लेकर चर्चा में रही सहारनपुर और मेरठ सीट बीएसपी के खाते में गई है. सहारनपुर सीट यूपी में योगी सरकार बनने के बाद वहां हुई हिंसा के बाद चर्चा में आई थी. इस हिंसा में दलित उत्पीड़न का आरोप लगाकर बीएसपी प्रमुख मायावती ने राज्यसभा की सदस्यता तक से इस्तीफा दे दिया था और इसके बाद वह सहारनपुर पहुंच गई थीं. इस दौरान मायावती ने बीजेपी पर खुद की हत्या कराने तक की साजिश रचने का आरोप लगा दिया था. इस के साथ बीते साल दो अप्रैल को दलित आरक्षण को लेकर अदालत के आदेश पर संशोधन के खिलाफ भारत बंद के दौरान मेरठ और हापुड़ में सबसे ज्यादा हिंसा हुई थी. इस घटना के दौरान कई दलितों की गिरफ्तारी हुई थी. साथ ही हजारों दलितों के खिलाफ एफआईआर लिखी गई थी. इस पूरे मामले के बाद अब गठबंधन के फैसले में मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट को बीएसपी को दिया गया है.

नगीना से माया के चुनाव में उतारने की अटकलें तेज

नगीना सीट शीट शेयरिंग के आंकड़े के मुताबिक एसपी के खाते में जानी चाहिए थी. 2014 में इस सीट पर एसपी दूसरे नंबर पर रही थी, लेकिन बीएसपी ने चर्चित गाजियाबाद सीट को छोड़कर नगीना की सीट को चुन लिया. माना जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में खुद मायावती इस सीट से चुनाव लड़ सकती हैं. अब तक राज्यसभा की सांसद रहीं माया के सियासी जीवन में बिजनौर जिले का बड़ा योगदान है. मायावती ने पहली बार लोकसभा का चुनाव भी बिजनौर की सीट से ही जीता था, ऐसे में यह माना जा रहा है कि इस बार नगीना सीट से मायावती लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरेंगी. वहीं पार्टी के नेताओं का कहना है कि इस सीट पर मायावती को अपनी दावेदारी का फैसला खुद करना है.

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सुप्रीम कोर्ट ने 16 राज्यों के 10 लाख से अधिक आदिवासियों को जमीन से बेदखल करने का आदेश दिया

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से देश के करीब 12 लाख आदिवासियों और वनवासियों को अपने घरों से बेदखल होना पड़ सकता है। दरअसल शीर्ष अदालत ने 16 राज्यों के करीब 11.8 लाख आदिवासियों के जमीन पर कब्जे के दावों को खारिज करते हुए सरकारों को आदेश दिया है कि वे अपने कानूनों के मुताबिक जमीनें खाली कराएं। सुप्रीम कोर्ट ने लाखों हेक्टेयर जमीन को कब्जे से मुक्त कराने का आदेश दिया।

*अदालत ने 16 राज्यों की सरकारों को आदेश दिया है कि वे अपने कानूनों के मुताबिक जमीनें खाली कराए *SC के इस आदेश से देश के करीब 12 लाख आदिवासियों और वनवासियों को अपने घरों से बेदखल होना पड़ सकता है *प्रभावित लोगों की कुल संख्या पता चलने के बाद केंद्र सरकार उनको लेकर विचार करेगी

बिजनेस स्टैंडर्ड की ख़बर के अनुसार, अब अन्य राज्यों को भी अदालत का आदेश लागू करने के लिए बाध्य होना होगा जिसकी वजह से देशभर में अपनी जमीन से जबरदस्ती बेदखल किए जाने वालों की संख्या में बढ़ोतरी देखी जाएगी. अदालत का यह आदेश एक वन्यजीव समूह द्वारा दायर की गई याचिका के संबंध में आया है जिसमें उसने वन अधिकार अधिनियम की वैधता पर सवाल उठा था.

याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि वे सभी जिनके पारंपरिक वनभूमि पर दावे कानून के तहत खारिज हो जाते हैं, उन्हें राज्य सरकारों द्वारा निष्कासित कर दिया जाना चाहिए.

इस कानून के बचाव के लिए केंद्र सरकार ने जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस इंदिरा की पीठ के समक्ष 13 फरवरी को अपने वकीलों को ही नहीं भेजा. इसी वजह से पीठ ने राज्यों को आदेश दे दिया कि वे 27 जुलाई तक उन सभी आदिवासियों को बेदखल कर दें जिनके दावे खारिज हो गए हैं. इसके साथ ही पीठ ने इसकी एक रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जमा करने को भी कहा. यह लिखित आदेश 20 जनवरी को जारी हुआ है.

अदालत ने कहा, ‘राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करेंगी कि जहां दावे खारिज करने के आदेश पारित कर दिए गए हैं, वहां सुनवाई की अगली तारीख को या उससे पहले निष्कासन शुरू कर दिया जाएगा. अगर उनका निष्कासन शुरू नहीं होता है तो अदालत उस मामले को गंभीरता से लेगी.’

मामले की अगली सुनवाई की तारीख 27 जुलाई है. इस तारीख तक राज्य सरकारों को अदालत के आदेश से आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करने का काम शुरू कर देना होगा.

अदालत के आदेश के विश्लेषण से पता चलता है कि शीर्ष अदालत को अब तक अस्वीकृति की दर बताने वाले 16 राज्यों से खारिज किए गए दावों की कुल संख्या 1,127,446 है जिसमें आदिवासी और अन्य वन-निवास घर शामिल हैं. वहीं जिन राज्यों ने अदालत को अभी तक ऐसी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है उन्हें उपलब्ध कराने को कहा गया है. उनके द्वारा जानकारी उपलब्ध कराए जाने के बाद यह संख्या बढ़ भी सकती है.

कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में पास होने वाले वन अधिकार अधिनियम के तहत सरकार को निर्धारित मानदंडों के विरुद्ध आदिवासियों और अन्य वनवासियों को पारंपरिक वनभूमि वापस सौंपना होता है. साल 2006 में पास होने वाले इस अधिनियम का वन अधिकारियों के साथ वन्यजीव समूहों और नेचुरलिस्टों ने विरोध किया था.

जनजातीय समूह मानते हैं कि उनके दावों को कुछ राज्यों में व्यवस्थित रूप से अस्वीकार कर दिया गया है और उनकी समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है. वहीं कई राज्यों से ऐसी रिपोर्टें आई हैं जहां समुदायिक-स्तर के दावों को स्वीकार करने को लेकर भी गति बहुत धीमी है.

याचिकाकर्ता बेंगलुरु स्थित वाइल्डलाइफ फर्स्ट जैसे कुछ गैर-सरकारी संगठनों का मानना है कि यह कानून संविधान के खिलाफ है और इसकी वजह से जंगलों की कटाई में तेजी आ रही है. उनका कहना है कि अगर यह कानून बचा भी रह जाता है तब भी दावों के खारिज होने के कारण राज्य सरकारें अपने आप जनजाति परिवारों को बाहर कर देंगी.

जनजाति समूहों का कहना है कि कई मामलों में दावों को गलत तरीके से खारिज कर दिया गया. उनका कहना है कि इसकी नए अधिनियम के तहत समीक्षा होनी चाहिए जिसे जनजाति मामलों के मंत्रालय ने सुधार प्रक्रिया के रूप में लाया था. कानून के तहत उन्हें अपने आप बाहर नहीं निकाला जा सकता है और कुछ मामलों में तो जमीनें उनके नाम पर नहीं हैं क्योंकि वे उन्हें पैतृक वन संपदा के रूप में मिली हैं.

अदालत ने जब आखिरी बार इस मामले की सुनवाई की थी तब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पर इस मामले में मूक-दर्शक बने रहने का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा, ‘भाजपा सुप्रीम कोर्ट में मूक दर्शक बनी हुई है, जहां वन अधिकार कानून को चुनौती दी जा रही है. वह लाखों आदिवासियों और गरीब किसानों को जंगलों से बाहर निकालने के अपने इरादे का संकेत दे रही है. कांग्रेस हमारे वंचित भाई-बहनों के साथ खड़ी है और इस अन्याय के खिलाफ पूरे दम से लड़ाई लड़ेगी’

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अब श्रीनगर आने-जाने के लिए अर्धसैनिक बलों के जवानों को मिलेगी हवाई सेवा

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नई दिल्ली। पुलवामा आतंकी हमले के बाद केंद्र सरकार ने जवानों की सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए गुरुवार को बड़ा एलान किया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, गृह मंत्रालय ने जानकारी दी है कि अब जवानों को हवाई जहाज से आने-जाने की सुविधा मिलेगी. गृह मंत्रालय ने केंद्रीय सशस्त्र अर्धसैनिक बलों के सभी जवानों की दिल्ली-श्रीनगर, श्रीनगर-दिल्ली, जम्मू-श्रीनगर और श्रीनगर-जम्मू क्षेत्रों में हवाई यात्रा की मंजूरी दी है.

सरकार के इस एलान के बाद 7 लाख 80 हजार जवानों को इसका फायदा मिलेगा. इसमें कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल और एएसआई को भी शामिल किया गया है. बता दें पहले इन्हें इस सुविधा से बाहर रखा गया था. अब जवानों को श्रीनगर से छुट्टी पर जाने और छुट्टी से लौटने पर भी हवाई यात्रा की सुविधा मिल सकेगी.

गौरतलब है कि पुलवामा में 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकवादी हमला हुआ था जिसमें 40 जवान शहीद हो गए थे. हमले के तुरंत बाद मोदी सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ बड़ा एक्शन लेते हुए पाक से मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएनएफ) का दर्जा वापस लेने का एलान किया, जो पाकिस्तान को 1996 में मिला था.

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बसपा और सपा ने जारी की सीटों की लिस्ट, देखिए किस सीट पर किसका उम्मीदवार

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नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने सीटों को लेकर अपनी लिस्ट जारी कर दी है. संयुक्त बयान जारी कर दोनों दलों ने बताया है कि कौन सी पार्टी किस लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेगी. बसपा ने अपने 38 सीटों की लिस्ट जारी की है, जबकि सपा ने 37 सीटों की. सुरक्षित सीटों की बात करें तो बसपा लोकसभा की 10 सुरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ेगी जबकि सपा 7 सुरक्षित सीटों पर लड़ेगी. देखिए लिस्ट

Samajwadi party List
बसपा-सपा ने जारी की लोकसभा सीटों की लिस्ट

अगर EVM से ऐसे होगा चुनाव तो धांधली मुश्किल

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एड. रमेश चन्द्र गुप्ता

नई दिल्ली। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ईवीएम के खिलाफ राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों और तमाम जागरूक व्यक्तियों ने मोर्चा खोला हुआ है. चुनाव आयोग से लगातार आगामी चुनाव EVM की जगह बैलेट पेपर से कराने की मांग की जा रही है. साथ ही चुनाव EVM से कराए जाने की स्थिति में उसमें कई नियमों को लेकर सवाल उठाए गए हैं.

उत्तर प्रदेश के बरेली के रहने वाले एडवोकेट रमेश चन्द्र गुप्ता ने चुनाव आयोग से सूचना के अधिकार के तहत कुछ सवाल पूछे हैं जो काफी दिलचस्प हैं. उनका कहना है कि वे भारत देश के एक जागरुक मतदाता हैं. उन्होंने ये सवाल इसलिए उठाए हैं क्योंकि वो चाहते हैं कि चुनाव फ्री, फेयर और ट्रांसपैरेंट हो. एडवोकेट गुप्ता ने जिन सवालों को उठाया है अगर चुनाव आयोग उसे मान लेता है तो फिर EVM से चुनाव होने की स्थिति में भी किसी के द्वारा EVM के साथ छेड़छाड़ करना मुश्किल होगा. एडवोकेट गुप्ता के सवालों पर नजर डालने पर साफ है कि ये काफी महत्वपूर्ण हैं.

एडवोकेट रमेश ने आयोग से जो सूचना मांगी है, उसमें VVPAT को लेकर तमाम सवाल उठाए गए हैं. उन्होंने पूछा है कि क्या 2019 लोकसभा चुनाव में सभी EVM के साथ VVPAT लगाना अनिवार्य है. एक अन्य सवाल में एडवोकेट गुप्ता ने आयोग से यह पूछा है कि कितने प्रतिशत वोटों की गिनती VVPAT से निकली पर्चियों से होगी. उन्होंने यह भी पूछा है कि मतगणना दोबारा होने यानि रि-काउंटिंग की स्थिति में रिकाउंटिंग EVM से होगी या VVPAT से निकली हुई पर्चियों से.

अपने सवालों में VVPAT का मुद्दा मजबूती से उठाए जाने पर एडवोकेट गुप्ता कहते हैं कि “जब हम EVM से वोटिंग करते हैं तो वोटिंग के सात सेकेंड के बाद उसमें से एक पर्ची निकलती है, जिसमें कैंडिडेट का नाम, उसका चुनाव चिन्ह और उसका नंबर होता है. यह समय इतना कम होता है कि इस दौरान मतदाता उसे देख नहीं पाता. इसके बाद वह पर्ची नीचे गिर जाती है. एक बूथ पर जितने मतदाताओं ने वोट किए हैं, उसकी पर्ची यानि वीवीपैट भी उतनी होनी चाहिए. इससे पारदर्शिता रहती है. साथ ही नियम है कि शुरुआती 50 पर्चियों का मिलान ईवीएम में हुए मतदान से कर लिया जाए, जिससे यह तय हो जाए कि ईवीएम सही काम कर रही है. लेकिन कई बार इसकी अनदेेखी हो जाती है.”

एडवोकेट रमेश चन्द्र गुप्ता के ये तमाम सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन्हीं की अनदेखी EVM में छेड़छाड़ का कारण बनती है. अगर इन सवालों पर चुनाव आयोग ईमानदारी से सोचता है और उसको लागू करने की पहल करता है तो ऐसी स्थिति में EVM के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ या तो बहुत मुश्किल होगी या फिर ऐसा होने की स्थिति में उसे आसानी से पकड़ा जा सकेगा. और ऐसे में रमेश चन्द्र गुप्ता जैसे देश के तमाम मतदाताओं के फ्री, फेयर और ट्रांसपैरेंट चुनाव की मांग पूरी की जा सकेगी.

पुराने पैटर्न से ही होंगे CBSE बोर्ड एग्जाम

नई दिल्ली। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 10वीं की परीक्षाएं गुरुवार से शुरू होने जा रही है. पिछले साल पेपर लीक और उसके बाद हुए बवाल का सामना करने के बाद बोर्ड और केंद्र सरकार ने पेपर लीक जैसी घटनाओं से बचने के लिए कई घोषणाएं की थी. इन घोषणाओं में इलेक्ट्रॉनिकली कोडेड पेपर की घोषणा भी थी, हालांकि यह सिर्फ वादा ही रह गया. दरअसल इस बार भी पुराने पैटर्न से ही परीक्षा का आयोजन किया जाएगा.

इलेक्ट्रॉनिकली कोडेड पेपर का था वादा

पिछले साल सरकार ने इलेक्ट्रॉनिकली कोडेड पेपर पैटर्न से परीक्षा करवाने की घोषणा की थी. इस पैटर्न को लेकर कहा जा रहा था कि सभी स्कूलों को सीधे इलेक्ट्रॉनिकली कोडेड पेपर भेजे जाएंगे. यह पेपर आधे घंटे पहले ही सेंटर्स को इलेक्ट्रॉनिक पेपर भेजा जाएगा. हर पेपर के लिए पासवर्ड भी होगा, जो कि हर सेंटर को दिया जाएगा. उसके बाद सेंटर पर ही प्रिंट आउट निकालकर छात्रों को एग्जाम पेपर बांटा जाएगा. हालांकि इस बार ऐसा कुछ नहीं होगा और पेपर पुराने तरीके से ही करवाए जाएंगे.

पुराने पैटर्न से होगी परीक्षा

सीबीएसई अधिकारियों ने बताया कि इस बार परीक्षा का आयोजन पुराने पैटर्न से होगा. वहीं केंद्रीय विद्यालय के टीचर्स का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिकली कोडेड पेपर को लेकर कोई जानकारी नहीं है और पेपर पहले से ही प्रिंट किए हुए मिलेंगे. स्कूलों को कस्टोडियन बैंक से पेपर लाने होंगे और फिर बच्चों को बांटे जाएंगे.

क्या है पुराना पैटर्न

स्कूल तक पेपर कस्टोडियन बैंक से लाए जाते हैं और बैंक तक सीबीएसई की ओर से पेपर पहुंचाए जाते हैं. जिस दिन जिस विषय की परीक्षा होती है, उस दिन सुबह स्कूल के प्रतिनिधि, बैंक प्रतिनिधि और सीबीएसई के प्रतिनिधि तीनों की मौजूदगी में प्रश्न पत्र को बैंक के लॉकर से निकाला जाता है. प्रश्न पत्र बैंक से निकल कर जब स्कूल तक पहुंचते हैं, तो रास्ते में उस गाड़ी में एक सुरक्षा गार्ड, एक सीबीएसई का प्रतिनिधि और एक स्कूल का प्रतिनिधि होता है.

उसके बाद बोर्ड की परीक्षा शुरू होने से ठीक आधे घंटे पहले स्कूल प्रिंसिपल, बोर्ड के हेड एग्जामिनर और परीक्षा में निगरानी के लिए शामिल होने वाले शिक्षकों की मौजूदगी में प्रश्न पत्र को खोला जाता है. नियमों के अनुसार इसकी वीडियोग्राफी भी होती है और उसे सीबीएसई को भेजना होता है. हर मौके पर इस बात का खास ख़्याल रखा जाता है कि प्रश्न पत्र की सील खुली न हो.

बता दें कि पिछले साल सीबीएसई ने पेपर लीक की वजह से 12वीं क्लास के इकोनॉमिक्स और 10वीं क्लास के मैथ्स का पेपर दोबारा कराने का फैसला किया था.

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मायावती ने मोदी-शाह का मजाक बनाया

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नई दिल्ली। हाल तक अकेले जीतने का दावा करने वाली भाजपा अब तमाम राज्यों में गठबंधन की राह चल पड़ी है. भाजपा के इस कदम ने विपक्षी दलों को सवाल उठाने का मौका दे दिया है. बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने भाजपा के गठबंधन के फैसले पर चुटकी ली है. बसपा प्रमुख ने एक ट्विट पर सीधा पार्टी के नेतृत्व पर हमला बोला है. हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी या फिर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का नाम तो नहीं लिया है लेकिन बहनजी का इशारा इसी जोड़ी की ओर है.

अपने ट्विट में बसपा प्रमुख मायावती ने मजबूत नेतृत्व का डंका पीटने वाली भाजपा के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि-

“बीजेपी द्धारा लोकसभा चुनाव हेतु पहले बिहार फिर महाराष्ट्र व उसके बाद तमिलनाडु में पूरी लाचारी में दण्डवत होकर गठबंधन करना क्या इनके मज़बूत नेतृत्व को दर्शाता है? वास्तव में बीएसपी और सपा गठबंधन से बीजेपी इतनी ज़्यादा भयभीत है कि इसे अब अपने गठबंधन के लिये दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही है.

लेकिन भाजपा अब चुनाव के समय में चाहे लाख हाथ-पांव मार ले, इनकी ग़रीब, मज़दूर, किसान व जनविरोधी नीति व इनके अहंकारी रवैये से लगातार दु:खी व त्रस्त, देश की 130 करोड़ जनता इन्हें अब किसी भी क़ीमत पर माफ करने वाली नहीं है. जनता इनका घमण्ड चुनाव में तोड़ेगी व इनकी सरकार जायेगी.”

दरअसल हाल तक शिवसेना के खिलाफ जहर उगलने वाली भाजपा ने महाराष्ट्र में उससे गठबंधन कर लिया है. गठबंधन के बाद शिवसेना राज्य में 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जबकि भाजपा 25 सीटों पर. विधानसभा चुनाव में भी दोनों दलों के बीच गठबंधन की बात हुई है. दरअसल भाजपा पहले उत्तर प्रदेश में अपने 2014 वाले प्रदर्शन को दोहराने को लेकर आश्वस्त थी, लेकिन प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के साथ आने से भाजपा घबराई हुई है. उसी तरह बिहार में भी महागठबंधन के बाद भाजपा को डर सता रहा है. बसपा प्रमुख ने इसी को मुद्दा बनाते हुए भाजपा पर निशाना साधा है.

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पुलवामा हमले पर न्यूजीलैंड की संसद में निंदा प्रस्ताव पास

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नई दिल्ली। पुलवामा घटना पर दुनिया के तमाम देशों से लानत झेल रहे पाकिस्तान को अब न्यूजीलैंड से भी झटका मिला है. न्यूजीलैंड की संसद में गुरुवार को पुलवामा आतंकी हमले को लेकर निंदा कर प्रस्ताव पारित किया गया. संसद ने इस बात को लेकर प्रस्ताव पारित किया. इससे पहले पुलवामा आतंकी हमले को लेकर अमेरिका ने भी पाकिस्तान को लताड़ लगाई है.

इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने भी इस मामले में दखल देते हुए हमले के बाद दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव को कम करने के लिए ‘तत्काल कदम’ उठाने की मांग की है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने मंगलवार को दोनों पक्षों के अत्यधिक संयम बरतने और तनाव कम करने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया. इसके साथ ही कहा कि यदि दोनों पक्ष राजी होते हैं तो महासचिव मध्यस्थता के लिए हमेशा तैयार हैं. संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी मिशन ने महासचिव के साथ बैठक का अनुरोध किया है. इसके अलावा पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र को दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए कदम उठाने चाहिए.

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पुलवामा अटैक पर देखिए डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा

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नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले को लेकर पाकिस्तान की दुनिया भर में आलोचना हो रही है. तमाम देश इस मामले पर भारत के साथ खड़े हैं और पाकिस्तान को लताड़ रहे हैं. इस कड़ी में अब भारत को अमेरिका का भी साथ मिला है. घटना के पांच दिनों के बाद आखिर अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस मामले में पाकिस्तान को लताड़ा है. डोनाल्ड ट्रंप ने पुलवामा हमले को ‘भयावह’बताया है. मंगलवार को अपने ओवल ऑफिस में मीडिया से बात करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि मुझे घटना को लेकर रिपोर्ट मिली है. पुलवामा में जो भी हुआ वह भीषण था.

वहीं, अमेरिकी विदेशी विभाग ने भी भारत के साथ खड़े होते हुए कहा है कि पाकिस्तान को इसके जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए. विदेश विभाग के डिप्टी प्रवक्ता रॉबर्ट पॉलडिनो ने कहा कि पुलवामा हमले के साथ ही अमेरिका भारत के संपर्क में है, हम ना सिर्फ इस हमले की भर्तस्ना करते हैं बल्कि हम भारत के साथ भी खड़े हैं.

इससे पहले भी अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) जॉन बॉल्टन ने भी भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से इस मुद्दे पर बात की थी और कहा था कि भारत को एक्शन लेने का पूरा अधिकार है.

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धमाल फ्रेंचाइजी की सबसे बड़ी हिट होगी अजय देवगन की ‘टोटल धमाल’

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इंद्र कुमार की मचअवेटेड मूवी टोटल धमाल 22 फरवरी को रिलीज हो रही है. ये धमाल फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्म है. मूवी के ट्रेलर ने पहले से धमाल मचाया हुआ है. नई और पुरानी स्टारकास्ट के साथ कॉमेडी का भरपूर डोज मिलेगा. फिल्म से अजय देवगन, माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर पहली बार जुड़े हैं. इनकी मौजूदगी फिल्म को और एंटरटेनिंग बनाने वाली है.

टोटल धमाल में कॉमेडी के साथ एडवेंचर भी देखने को मिलेगा. बड़ी स्टारकास्ट के अलावा सलमान खान-सोनाक्षी सिन्हा का स्पेशल अपीयरेंस है. मेकर्स ने फिल्म को हिट कराने के सभी फैक्टर शामिल किए हैं. फिल्म का बजट 100 करोड़ रुपये बताया जा रहा है. ट्रेड एक्सपर्ट्स के मुताबिक मूवी पहले दिन 15 करोड़ का कलेक्शन कर सकती है. टोटल धमाल इस फ्रेंचाइजी की सबसे बड़ी हिट साबित हो सकती हैं. जानते हैं 5 वजहें.

#1. अजय देवगन

गोलमाल सीरीज में अजय देवगन की कॉमेडी को दर्शक काफी पसंद करते हैं. अब टोटल धमाल से अजय का नाम जुड़ना इस फ्रेंचाइजी को बड़ा बनाता है. अजय फिल्म इंडस्ट्री के ऐसे एक्टर्स में शुमार हैं जो हर रोल में फिट हो जाते हैं. टोटल धमाल के ट्रेलर में अजय देवगन की कॉमेडी दर्शकों को पहले से गुदगुदा रही है. फिल्म को अजय की स्टार पावर का फायदा मिलेगा.

#2. नई स्टारकास्ट

टोटल धमाल की नई स्टारकास्ट सबसे बड़ा हाईलाइट है. 2007 में आई धमाल चार दोस्तों (आशीष चौधरी, रितेश देशमुख, जावेद जाफरी, अरशद वारसी) की कहानी थी. 2011 में रिलीज हुई डबल धमाल में भी यही सितारे मौजूद थे. मगर तीसरी सीरीज में मेकर्स ने सितारों की लंबी-चौड़ी फौज खड़ी कर दी है. फिल्म में अजय देवगन, अनिल कपूर, माधुरी दीक्षित, ईशा गुप्ता, रितेश देशमुख, अरशद वारसी, जावेद जाफरी, बोमन ईरानी, संजय मिश्रा, अली असगर, महेश मांझरेकर, जॉनी लीवर दिखेंगे.

#3. अनिल कपूर-माधुरी दीक्षित

टोटल धमाल में अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित दो दशकों बाद सिल्वर स्क्रीन पर साथ दिखेंगे. 90 के दशक में दोनों की जोड़ी ने धमाल मचाया था. उनका चार्म आज भी बरकरार है. टोटल धमाल में माधुरी और अनिल कॉमेडी करते हुए दिखेंगे. माधुरी दीक्षित को कॉमेडी करते हुए देखना फैंस के लिए किसी ट्रीट से कम नहीं होगा.

#4. एडवेंचर्स कॉमेडी

टोटल धमाल में इस बार कॉमेडी को एडवेंचर्स फ्लेवर के साथ परोसा जाएगा. फिल्म का ट्रेलर दमदार है. हर धमाल सीरीज में पैसों को लेकर भागमभाग होती है. इस बार 50 करोड़ की रकम के लिए सर्च ऑपरेशन होगा. पैसे पाने की इस अफरा तफरी में सभी की जिंदगी क्रेजी एडवेंचर्स राइड से गुजरेगी.

#5. साल की पहली कॉमेडी फिल्म

टोटल धमाल 2019 की पहली कॉमेडी फिल्म है. जनवरी का महीना राजनीतिक प्रोपगेंडा और पीरियड फिल्मों के नाम रहा. वहीं फरवरी में रोमांटिक और लाइट कंटेंट पर बेस्ड फिल्में रिलीज हुईं. लंबे गैप के बाद सिल्वर स्क्रीन पर बड़े बैनर की कॉमेडी मूवी रिलीज होगी. ऐसे में फिल्म को लेकर लोगों में जबरदस्त क्रेज बना हुआ है. कहा जा रहा है कि टोटल धमाल इस फ्रेंचाइजी की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म होगी.

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बहन जी ने गुरू रविदास जी की जयन्ती पर दी बधाई

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नई दिल्ली। 19 फरवरी 2019 : ’’मन चंगा तो कठौती में गंगा’’ का आदर्श व जीवन को सच्चा व सार्थक बनाने वाले अमर मानवतावादी संदेश सर्वसमाज को देने वाले महान सन्तगुरु सन्त रविदास जी की जयन्ती के शुभ अवसर पर देश की आमजनता व ख़ासकर उनके करोड़ों अनुयाईयों को शत्-शत् बधाई देते हुये बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद सुश्री मायावती जी ने आज यहाँ कहा कि सामाजिक परिवर्तन का अलख जगाने वाले महान सन्तों में जाने-माने सन्तगुरु सन्त रविदास जी ने अपना सारा जीवन इन्सानियत का संदेश देने में गुज़ारा और इस क्रम में ख़ासकर जातिभेद के ख़िलाफ आजीवन कड़ा संघर्ष करते रहे.

सन्त रविदास जयन्ती पर अपने बयान में उन्होंने कहा कि आज के संकीर्ण व जातिवादी माहौल में उनके मानवतावादी संदेश की बहुत ही ज़्यादा अहमियत है और मन को हर लिहाज़ से वास्तव में चंगा करके जीवन गुजारने की ज़रूरत है. ख़ासकर सत्ताधारी पार्टी के लोगों को चाहिये कि वे केवल उन्हें स्मरण करने की रस्म नहीं निभायें बल्कि इससे पहले अपने मन को संकीर्णता, जातिवाद व साप्रदायिकता आदि से पाक करके मन को चंगा करें क्योंकि छोटे मन से कोई भी बड़ा नहीं हो सकता.

संत रविदास जी, वाराणसी में छोटी समझी जाने वाली जाति में जन्म लेने के बावजूद प्रभु-भक्ति के बल पर ब्रम्हाकार हुये. एक प्रबल समाज सुधारक के तौर पर वे आजीवन कड़ा संघर्ष करके हिन्दू धर्म में व्याप्त जन्म पर आधारित गै़र-बराबरी वाली वर्ण-व्यवस्था व अन्य कुरीतियों के ख़िलाफ संघर्ष करते रहे तथा उसमें सुधार की पुरज़ोर कोशिश लगातार करते रहे.

संत रविदास जी जाति-भेदभाव पर कड़ा प्रहार करते हुये कहते हैं कि ’’देश की एकता, अखण्डता, शान्ति, संगठन एवं साम्प्रदायिक सद्भाव के लिये जाति रोग का समूल नष्ट होना आवश्यक है. मानव जाति एक है. इसलिये सभी प्राणियों को समान समझकर प्रेम करना चाहिये.’’ यही कारण है कि मीराबाई तथा महारानी झाली ने संत रविदास को अपना गुरू स्वीकार किया. उनका मानना था कि ’’जाति-पांति व मानवता के समग्र विकास में बड़ा बाधक है.’’ वे कहते हैं कि : ’’जाति-पांति के फेर में, उलझि रहे सब लोग. मानुषता को खात है, रैदास जात का रोग’’

बसपा सुप्रिमो ने कहा कि अपने कर्म के बल पर महान संतगुरु बनने वाले संत रविदास जी ने सामाजिक परिवर्तन व मानवता के मूल्यों को अपनाने व उसके विकास के लिये लोगों में जो अलख जगाया उसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है. यही कारण है कि आज हर जगह बड़ी संख्या में उनके अनुयायी मौजूद हैं.

ऐसे महान संतगुरु के आदर-सम्मान में व उनकी स्मृति को बनाये रखने के लिये बी.एस.पी की सरकार ने उत्तर प्रदेश में जो कार्य किये हैं उनमें संत रविदास जी के नाम पर भदोही ज़िले का नामकरण, संत रविदास की जन्म नगरी वाराणसी में संत रविदास पार्क व घाट की स्थापना, फैज़ाबाद में संतगुरू रविदास राजकीय महाविद्यालय का निर्माण, वाराणसी में ही संत रविदास जी की प्रतिमा की स्थापना, संत रविदास सम्मान पुस्कार की स्थापना आदि प्रमुख हैं.

इसके साथ ही, संत रविदास पालीटेक्निक, चन्दौली की स्थापना, संत रविदास एस.सी/एस.टी प्रशिक्षण संस्थान, वाराणसी में गंगा नदी पर बनने वाले पुल का नाम संत रविदास के नाम पर करने तथा बदायूँ में संत रविदास धर्मशाला हेतु सहायता, बिल्सी में संत रविदास की प्रतिमा स्थापना की स्वीकृति आदि. इसके अलावा भी और कई कार्य महान संतगुरु के आदर-सम्मान में बी.एस.पी. की सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश में किये गये हैं.

मायावती जी ने जयंती के अवसर पर कहा कि ख़ासकर सत्ताधारी पार्टी बीजेपी द्वारा संकीर्ण, जातिवादी व साम्प्रदायिक द्वेष के साथ-साथ छोटे मन आदि का व्यवहार करने के कारण ही देश में आज अनेकों प्रकार की विषमतायें व विकृतियाँ पहले से काफी ज्यादा बढ़ गयी हैं और समाज का तानाबाना बिखरता जा रहा है जिससे देश की 130 करोड़ आमजनता का दिन-प्रतिदिन का जीवन काफी ज्यादा त्रस्त, दुःखी व व्यथित है, जो अति-दुर्भाग्यपूर्ण है.

बीजेपी की सरकारों द्वारा अदूरदर्शी व छोटे मन से लगातार काम करते रहने का ही परिणाम है कि बढ़ती महंगाई, गरीबी, भीषण बेरोजगारी आदि से देश के सामान्य जनजीवन में अव्यवस्था छाई है तथा राष्ट्रीय सुरक्षा भी गंभीर समस्या का शिकार है जिससे जितना जल्दी पार पाया जाये उतना ही देश के लिये बेहतर होगा लेकिन यह सब बीजेपी के बस की बात कतई नहीं लगती है. ये लोग सत्ता में रहने के बावजूद हर समस्या का राजनीतिकरण करके केवल लम्बी-चौड़ी बयानबाज़ी व लोगों को इमोशनली ब्लैकमेल करने की कोशिश में ही लगातार लगे रहते हैं और यह अब वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के पुलवामा के अति-घातक आतंकी हमले के मामले में भी देश में हर तरफ यही दिखाई पड़ रहा है. बीजेपी को समझना चाहिये कि इस प्रकार की राजनीति से देश का कोई भला होने वाला नहीं है. इसलिये बीजेपी को देश हित के मद्देनज़र मूल तौर पर अपना रवैया बदलने की जरूरत है.

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