दलित के अंतिम संस्कार के लिए श्मशान का रास्ता रोका

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दलाराम भील के अंतिम संस्कार के लिए रास्ते के इंतजार में बैठे परिजन

दलित आदिवासियों को जीते जी तो न्याय नहीं मिलता, मरने के बाद भी उन्हें इंसाफ मयस्सर नहीं है. दलितों की लाशें कब तक श्मसान पहुंचने का इंतज़ार करेगी? घटना राजस्थान के जालोर जिले के भीनमाल तहसील के जूनी बाली गांव की है. शनिवार 2 मार्च को इस समाज के एक व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार के लिए इंतजार करना पड़ा. लाश कई घंटे तक सड़क पर रखी रही लेकिन जातिवादी गुंडों ने उसे श्मशान तक जाने का रास्ता नहीं दिया. इस मामले में प्रशासन से गुहार लगाने के बावजूद भी वंचितों को कोई मदद नहीं मिली, जिसके बाद थक कर परिवार वालों और संबंधियों को दूसरे रास्ते से श्मशान को लेकर जाना पड़ा.

जिंदा दलितों से नफरत तो समझ आती है,पर मरे हुए दलित आदिवासियों की लाशों से भी उतनी ही घृणा ? लानत है इस समाज पर? दरअसल, 2 मार्च को 5 बजे के करीब जूनी बाली के दलाराम भील की मौत हो गई. जिसके बाद उसके अंतिम संस्कार की तैयारी हुई. लेकिन जैसे ही घर और समाज वाले उसे लेकर श्मशान की ओर चलें, उनका रास्ता रोक दिया गया. इन रोते हुए गरीबों की आवाज़ कहीं नहीं पहुंची, न शासन तक, न प्रशासन तक, जबकि मीडिया, पुलिस तथा सामान्य प्रशासन सब वहां मौजूद था.

पीड़ित पक्ष ने बताया कि जूनी बाली के चौधरी परिवार द्वारा अतिक्रमण करके सौ साल से ज्यादा पुराने श्मशान भूमि के रास्ते को रोक दिया गया और प्रशासन उसके सामने लाचार है. अब प्रशासन लाचार है कि लचर या फिर पक्षपाती, यह तो सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज लोग तय करें. लेकिन खुले आम दलितों के मूलभूत मानवीय अधिकार का हनन किया जा रहा है,पर सुनने वाला कोई नहीं है.

इस बारे में पीड़ित पक्ष के मालाराम राणा ने बताया कि हमारी 2 हेक्टेयर जमीन है, जिसका इस्तेमाल हम श्मशान भूमि के लिए करते हैं. वहीं दूसरे पक्ष की जमीन है, जिस पर वो लोग खेती करते हैं. श्मशान तक जाने के लिए हम जिस रास्ते का इस्तेमाल करते हैं, उसको रोक दिया गया है और दीवार से घेर दिया गया है. हमने प्रशासन से गुहार लगाई है, लेकिन अभी तक सिर्फ आश्वासन मिला है. एडीएम साहब ने मंगलवार को रास्ता क्लियर कराने का आश्वासन दिया है, देखिए उस दिन क्या होता है. इस पूरे घटनाक्रम से सवाल उठता है कि आखिर दलित-आदिवासी समाज के लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में भी प्रशासन क्यों नाकाम हो जाता है और सत्ता जातिवादियों के आगे क्यों झुक जाती है?

क्या आप इन ढाई महीने के लिए चैनल देखना बंद नहीं कर सकते? कर दीजिए- रवीश कुमार

अगर आप अपनी नागरिकता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। अगर आप लोकतंत्र में एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में भूमिका निभाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। अगर आप अपने बच्चों को सांप्रदायिकता से बचाना से बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। अगर आप भारत में पत्रकारिता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। न्यूज़ चैनलों को देखना ख़ुद के पतन को देखना है। आप ऐसा मत कीजिए।

पत्रकारिता के लिए न सही, ख़ुद को बचाने के लिए आप चैनल और अख़बार दोनों बंद कर दें। मैं आपसे अपील करता हूं कि आप कोई भी न्यूज़ चैनल न देखें। न टीवी सेट पर देखें और न ही मोबाइल पर। अपनी दिनचर्या से चैनलों को देखना हटा दीजिए। कोई अपवाद न रखें, बेशक मुझे भी न देखें लेकिन न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कीजिए।

मैं यह बात पहले से कहता रहा हूं। मैं जानता हूं कि आप इतनी आसानी से मूर्खता के इस नशे से बाहर नहीं आ सकते लेकिन एक बार फिर अपील करता हूं कि बस इन ढाई महीनों के न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दीजिए। जो आप इस वक्त चैनलों पर देख रहे हैं, वह सनक का संसार है। उन्माद का संसार है। इनकी यही फितरत हो गई है। पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है। जब पाकिस्तान से तनाव नहीं होता है तब ये चैनल मंदिर को लेकर तनाव पैदा करते हैं, जब मंदिर का तनाव नहीं होता है तो ये चैनल पद्मावति फिल्म को लेकर तनाव पैदा करते हैं जब फिल्म का तनाव नहीं होता है तो ये चैनल कैराना के झूठ को लेकर हिन्दू-मुसलमान में तनाव में पैदा करते हैं। जब कुछ नहीं होता है तो ये फर्ज़ी सर्वे पर घंटों कार्यक्रम करते हैं जिनका कोई मतलब नहीं होता है।

क्या आप समझ पाते हैं कि यह सब क्यों हो रहा है? क्या आप पब्लिक के तौर पर इन चैनलों में पब्लिक को देख पाते हैं? इन चैनलों ने आप पब्लिक को हटा दिया है। कुचल दिया है। पब्लिक के सवाल नहीं हैं। चैनलों के सवाल पब्लिक के सवाल बनाए जा रहे हैं। यह इतनी भी बारीक बात नहीं है कि आप समझ नहीं सकते। लोग परेशान हैं। वे चैनल-चैनल घूम कर लौट जाते हैं मगर उनकी जगह नहीं होती। नौजावनों के तमाम सवालों को जगह नहीं होती मगर चैनल अपना सवाल पकड़ा कर उन्हें मूर्ख बना रहे हैं। और चैनलों को ये सवाल कहां से आते हैं, आपको पता होना चाहिए। ये अब जब भी करते हैं, जो कुछ भी करते हैं उसी तनाव के लिए करते हैं जो एक नेता के लिए रास्ता बनाता है। जिनका नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है।

न्यूज़ चैनलों, सरकार, बीजेपी और मोदी इन सबका विलय हो चुका है। यह विलय इतना बेहतरीन है कि आप फर्क नहीं कर पाएंगे कि पत्रकारिता है या प्रोपेगैंडा है। आप एक नेता को पसंद करते हैं। यह स्वाभाविक है और बहुत हद तक ज़रूरी भी। लेकिन उस पसंद का लाभ उठाकर इन चैनलों के लिए जो किया जा रहा है वो ख़तरनाक है। बीजेपी के भी ज़िम्मेदार समर्थक को सही सूचना की ज़रूरत होती है। सरकार और मोदी की भक्ति में प्रोपेगैंडा को परोसना भी उस समर्थक का अपमान है। उसे मूर्ख समझना है जबकि वह अपने सामने के विकल्पों की सूचनाओं के आधार पर किसी का समर्थन करता है। आज के न्यूज़ चैनल न सिर्फ सामान्य नागरिक का अपमान करते हैं बल्कि उससे कहीं ज़्यादा भाजपा समर्थकों का अपमान करते हैं।

मैं भाजपा समर्थकों से भी अपील करता हूं कि आप इन चैनलों को न देखें। आप भारत के लोकतंत्र की बर्बादी में शामिल न हों। क्या आप इन बेहूदा चैनलों के बग़ैर नरेंद्र मोदी का समर्थन नहीं कर सकते? क्या यह ज़रूरी है कि नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के लिए पत्रकारिता के पतन का भी समर्थन किया जाए? फिर आप एक ईमानदार राजनीतिक समर्थक नहीं हैं? एक बार ठंडे दिमाग़ से सोचिए कि मैं क्या कह रहा हूं। क्या श्रेष्ठ पत्रकारिता के मानकों के साथ नरेंद्र मोदी का समर्थन करना असंभव हो चुका है? क्या अब आपके समर्थक होने के लिए भी चैनलों का प्रोपेगैंडा और उन्माद ज़रूरी हो चुका है? भाजपा समर्थकों आपने भाजपा को चुना था, इन चैनलों को नहीं। मीडिया का पतन राजनीति का भी पतन है। एक अच्छे समर्थक का भी पतन है।

चैनल आपकी नागरिकता पर हमला कर रहे हैं। लोकतंत्र में नागरिक हवा में नहीं होता है। सिर्फ किसी भौगोलिक प्रदेश में पैदा हो जाने से आप नागरिक नहीं होते। सही सूचना और सही सवाल आपकी नागरिकता के लिए ज़रूरी है। इन न्यूज़ चैनलों के पास दोनों नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी पत्रकारिता के इस पतन के अभिभावक हैं। संरक्षक हैं। उनकी भक्ति में चैनलों ने ख़ुद को भांड बना दिया है। वे पहले भी भांड थे मगर अब वे आपको भांड बना रहे हैं। आपका भांड बन जाना लोकतंत्र का मिट जाना होगा।

भारत पाकिस्तान तनाव के बहाने इन्हें राष्ट्रभक्त होने का मौका मिल गया है। इनके पास राष्ट्र को लेकर कोई भक्ति नहीं है। भक्ति होती तो लोकतंत्र के ज़रूरी स्तंभ पत्रकारिता के उच्च मानकों को गढ़ते। चैनलों पर जिस तरह का हिन्दुस्तान गढ़ा जा चुका है, उनके ज़रिए आपके भीतर जिस तरह का हिन्दुस्तान गढ़ा गया है वो हमारा हिन्दुस्तान नहीं है। वो एक नकली हिन्दुस्तान है। देश से प्रेम का मतलब होता है कि हम सब अपना अपना काम उच्च आदर्शों और मानकों के हिसाब से करें। आपकी देशभक्ति की जगह चैनल किसी और के इशारे पर नकली देशभक्ति गढ़ रहे हैं। हिम्मत देखिए कि झूठी सूचनाओं और अनाप-शनाप नारों और विश्लेषणों से आपकी देशभक्ति गढ़ी जा रही है। आपके भीतर देशभक्ति के प्राकृतिक चैनल को ख़त्म कर ये न्यूज़ चैनल कृत्रिम चैनल बनाना चाहते हैं। ताकि आप एक मुर्दा रोबोट बन कर रह जाएं।

इस वक्त के अख़बार और चैनल आपकी नागरिकता और नागरिक अधिकारों के ख़ात्मे का एलान बन चुके हैं। आपको सामने से दिख जाना चाहिए कि ये होने वाला नहीं बल्कि हो चुका है। अख़बारों के हाल भी वहीं हैं। हिन्दी के अख़बारों ने तो पाठकों की हत्या की सुपारी ले ली है। ग़लत और कमज़ोर सूचनाओं के आधार पर पाठकों की हत्या ही हो रही है। अखबारों के पन्ने भी ध्यान से देखें। हिन्दी अख़बारों को उठा कर घर से फेंक दें। एक दिन अलार्म लगाकर सो जाइये। उठकर हॉकर से कह दीजिए कि भइया चुनाव बाद अख़बार दे जाना।

यह निज़ाम, यह सरकार नहीं चाहती है कि आप सही सूचनाओं से लैस सक्षम नागरिक बनें। चैनलों ने विपक्ष बनने की हर संभावना को ख़त्म किया है। आपके भीतर अगर सरकार का विपक्ष न बने तो आप सरकार का समर्थक भी नहीं बन सकते। होश में सपोर्ट करना और नशे का इंजेक्शन देकर सपोर्ट करवाना दोनों अलग बातें हैं। पहले में आपका स्वाभिमान झलकता है। दूसरे में आपका अपमान। क्या आप अपमानित होकर इन न्यूज़ चैनलों को देखना चाहते हैं, इनके ज़रिए सरकार को समर्थन करना चाहते हैं?

मैं जानता हूं कि मेरी यह बात न करोड़ों लोगों तक पहुंचेगी और न करोड़ों लोग न्यूज़ चैनल देखना छोड़ेंगे। मगर मैं आपको आगाह करता हूं कि अगर यही चैनलों की पत्रकारिता है तो भारत में लोकतंत्र का भविष्य सुंदर नहीं है। न्यूज़ चैनलों ने एक ऐसी पब्लिक गढ़ रही है जो गलत सूचनाओं और सीमित सूचनाओं पर आधारित होगी। चैनल अपनी बनाई हुई इस पब्लिक से उस पब्लिक को हरा देंगे जिसे सूचनाओं की ज़रूरत होती है, जिसके पास सवाल होते हैं। सवाल और सूचना के बग़ैर लोकतंत्र नहीं होता। लोकतंत्र में नागिरक नहीं होता।

सत्य और तथ्य की हर संभावना समाप्त कर दी गई है। मैं हर रोज़ पब्लिक को धेकेले जाते देखता हूं। चैनल पब्लिक को मंझधार में धकेल कर रखना चाहते हैं। जहां राजनीति अपना बंवडर रच रही है। राजनीतिक दलों से बाहर के मसलों की जगह नहीं बची है। न जाने कितने मसले इंतज़ार कर रहे हैं। चैनलों ने अपने संपर्क में आए लोगों को लोगों के खिलाफ तैयार किया है। आपकी हार का एलान है इन चैनलों की बादशाहत। आपकी ग़ुलामी है इनकी जीत। इनके असर से कोई इतनी आसानी से नहीं निकल सकता है। आप एक दर्शक हैं। आप एक नेता का समर्थन करने के लिए पत्रकारिता के पतन का समर्थन मत कीजिए। सिर्फ ढाई महीने की बात है। चैनलों को देखना बंद कर दीजिए।

  • लेखक टीवी पत्रकार हैं। एनडीटीवी से जुड़े हैं।

अभिनंदन की रिहाई को ले कर यूं आखिरी पल तक खेल करता रहा पाकिस्तान

नई दिल्ली। पाकिस्तान ने तमाम पैंतरेबाजी और उकसावे की हरकत करने के बाद भारतीय पायलट अभिनंदन को शुक्रवार रात अटारी बॉर्डर पर रिहा कर दिया. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने शांति का शिगूफा छोड़ते हुए अभिनंदन को छोड़ने की घोषणा की थी. लेकिन यह पड़ोसी देश अपनी पुरानी आदतों से बाज नहीं आया और भारतीय पायलट को छोड़ने से पहले तमाम हथकंडे, प्रॉपगैंडा और पैंतरे अपनाएं. पाकिस्तान ने अभिनंदन को रिहा करने में जान-बूझकर देरी की.अभिनंदन को लाने के लिए हवाई यात्रा की इजाजत के लिए भारतीय प्रस्ताव पर भी पाकिस्तान ने हामी नहीं भरी. यहां तक कि पाकिस्तान के पीएम इमरान खान की लाहौर में मौजूदगी के बाद भी वहां की सेना और खुफिया एजेंसी ISI ने अभिनंदन की रिहाई में खेल करते रहे.

शाम 4 बजे तक पहुंचना था भारत अभिनंदन को शुक्रवार को दोपहर दो बजे से शाम चार बजे के बीच भारत पहुंचना था. लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें लाहौर में घंटों रोके रखा. रिहा किए जाने से पहले अभिनंदन को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के दफ्तर में ले जाया गया और उनसे हस्ताक्षर करवाया गया.

प्रॉपेगैंडा विडियो से खेल करने की कोशिश इसके अलावा पाकिस्तान ने अभिनंदन का एक प्रॉपगेंडा विडियो भी बनाया और उसे वायरल किया. खास बात यह है कि अभिनंदन के विडियो में कई कट हैं जो संकेत देते हैं कि इसे पाकिस्तानी रुख के अनुरूप करने के लिए बहुत काट-छांट की गई. पाकिस्तान सरकार ने स्थानीय समयानुसार रात 8.30 बजे पायलट का विडियो संदेश स्थानीय मीडिया को जारी भी किया. इस समय तक अभिनंदन को भारत को सौंपा भी नहीं गया था.

ISI और पाकिस्तानी सेना की साजिश आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि ISI के लाहौर दफ्तर में अभिनंदन का एक विडियो बनाया. इस विडियो में अभिनंदन पाकिस्तानी अधिकारियों के व्यवहार के बारे में बता रहे थे. भारतीय अधिकारियों ने बताया कि अभिनंदन को एक ऐसे ही बयान पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला गया. सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तानी सेना ने भी अभिनंदन की रिहाई में आखिरी पल तक खेल करने की कोशिश की.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान शुक्रवार को वाघा सीमा पर भारतीय वायु सेना के पायलट अभिनंदन को भारत को सौंपने की प्रक्रिया को ‘सुचारू’ बनाने के लिए लाहौर में मौजूद थे. आधिकारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी . खान शुक्रवार दोपहर भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन को इस्लामाबाद से वाघा बॉर्डर लाये जाने से कुछ घंटे पहले कड़ी सुरक्षा के बीच लाहौर पहुंचे. एक आधिकारिक सूत्र ने बताया, ‘प्रधानमंत्री खान का शहर में रहने का मुख्य उद्देश्य भारतीय पायलट को सीमा सुरक्षा बल को सौंपने की प्रक्रिया को ‘सुचारू’ बनाना था.’ पाकिस्तान के पीएम के सीमा के पास होने के बावजूद अभिनंदन की रिहाई में देरी से इमरान की मंशा पर शक पैदा होता है. सूत्रों के अनुसार पाकिस्तानी सेना और ISI ने अभिनंद की रिहाई में काफी रोड़े अटकाए.

भारत ने अटारी बॉर्डर पर रद्द किया था बीटिंग रिट्रीट दरअसल, पाकिस्तान पहले वाघा-अटारी बॉर्डर होने वाली बीटिंग रिट्रीट समारोह के दौरान अभिनंदन को सौंपना चाहता था. पर भारत ने इससे साफ इनकार कर दिया था. भारत अभिनंदन को इस तरह सार्वजनिक तौर पर रिहा करने के खिलाफ था. अटारी बॉर्डर पर भीड़ को देखते हुए भारत ने अपनी तरफ होने वाला बीटिंग रिट्रीट समारोह ही रद्द कर दिया था.

गौरतलब है कि अभिनंदन ने पाकिस्तान के एक घुसपैठिए लड़ाकू विमान F-16 को मार गिराने के दौरान पाकिस्तान की सीमा में चले गए थे. अभिनंदन का विमान भी क्रैश हो गया था. पाकिस्तान ने अभिनंदन को विशेष विमान से भारत लाने के नई दिल्ली के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. पाकिस्तान ने अपने एयर स्पेस को बंद करने का हवाला देते हुए कहा कि वह इसकी इजाजत नहीं दे सकते हैं. हालांकि एक भारतीय अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान इसकी इजाजत दे सकता था लेकिन उसके अधिकारियों ने ऐसा नहीं होने दिया.

बाद में अभिनंदन को पाकिस्तान ने घंटों की देरी के बाद अटारी बॉर्डर पर शुक्रवार रात 9.25 मिनट पर रिहा किया. करीब 60 घंटे पाकिस्तानी सेना की कैद में रहने के बाद अभिनंदन ने भारत वापसी की.

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ममता बनर्जी ने पाकिस्तान में 300 मौतों की रिपोर्ट पर उठाया गंभीर सवाल

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पश्चिम बंगाल। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारत द्वारा पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी अड्डों पर हमले को लेकर सवाल उठाया है. ममता बनर्जी ने एक बयान में आतंकी कैंप पर भारतीय वायुसेना द्वारा एयर स्ट्राइक को लेकर सवाल खड़ा किया है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने बृहस्पतिवार को कहा कि जवानों का जीवन चुनावी राजनीति से ज्यादा कीमती है, लेकिन देश को यह जानने का अधिकार है कि पाकिस्तान के बालाकोट में वायुसेना के हवाई हमले के बाद वास्तव में वहां क्या हुआ था.

ममता बनर्जी ने अपने सवालों के पक्ष में विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स का सहारा लिया. राज्य सचिवालय में संवाददाताओं से बातचीत में उन्होंने कहा, “हवाई हमलों के बाद, हमें बताया गया कि 300 मौतें हुईं, 350 मौतें हुईं. लेकिन मैंने न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट में ऐसी खबरें पढ़ीं जिनमें कहा गया कि कोई इंसान नहीं मारा गया. एक अन्य विदेशी मीडिया रिपोर्ट में केवल एक व्यक्ति के घायल होने की बात कही गई थी.”

26 फरवरी को भारतीय वायुसेना द्वारा पाकिस्तान की जमीन पर जैश के आतंकी कैंप पर एयर स्ट्राइक किया गया था, जिसमें करीब 300 आतंकियों को मार गिराए जाने की बात कही गई थी. जबकि विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स में कहा गया था कि बालाकोट में आतंकी शिविरों पर भारतीय वायु सेना के हमलों से कोई नुकसान नहीं हुआ है. ममता ने मांग किया है कि बलों को तथ्यों के साथ सामने आने का मौका दिया जाना चाहिए. भारतीय राजनीति कि इस दिग्गज नेता ने कहा, “इस देश के लोग यह जानना चाहते हैं कि बालाकोट में कितने मारे गए, वास्तव में बम कहां गिराया गया था? क्या यह लक्ष्य पर गिरा था?”

ममता बनर्जी के सवाल को इसलिए भी नहीं टाला जा सकता क्योंकि बीबीसी ने भी अपनी एक रिपोर्ट्स में भारत के टेलिविजन चैनलों द्वारा पाकिस्तान पर हमले का वीडियो बताकर जिन वीडियो को दिखाया गया था वह काफी पुराने वीडियो थे. इस रिपोर्ट से कई टेलिविजन चैनलों के खबरों की प्रमाणिकता भी शक के घेरे में आती है.

दरअसल सोशल मीडिया पर भी इस तरह के सवाल लगातार उठ रहे हैं. पूरा देश सेना के साथ है लेकिन सरकार जिस तरह इस पूरे मामले को भुनाने की कवायद में जुटी है, उससे तमाम लोगों में नाराजगी भी है. विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स और ममता बनर्जी जैसे दिग्गज नेता के बयान ने इसको और बल दिया है.

जब विमान में मौजूद लोगों ने अभिनंदन के माता-पिता का तालियों से स्वागत किया

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चेन्नई। जब कोई सिपाही लड़ाई के मोर्चे पर जाता है, तो न सिर्फ उसके लिए बल्कि उसके पूरे परिवार के लिए देश के भीतर सम्मान बढ़ जाता है. ऐसा ही एक नजारा चेन्नई एयरपोर्ट पर देखने को मिला. चेन्नई एयरपोर्ट पर विंग कमांडर अभिनंदन के माता-पिता दिल्ली जाने वाले एक फ्लाइट में चढ़े. वो जैसे ही विमान के भीतर पहुंचे, सभी यात्री खड़े होकर तालियां बजाने लगे और उनका स्वागत किया.

इंडियन एयरफोर्स के विंग कमांडर अभिनंदन के माता-पिता अपने बेटे को लेने के लिए दिल्ली जा रहे थे. विंग कमांडर अभिनंदन को पाकिस्तान आज रिहा करने जा रहा है. अभिनंदन को लेने के लिए वायुसेना के प्रतिनिधिमंडल के साथ उनके माता-पिता भी उन्हेंत रिसीव करने के लिए दिल्लीा एयरपोर्ट से अमृतसर जाने के लिए रवाना हो गए हैं. वायुसेना का एक प्रतिनिधिमंडल आज कमांडर अभिनंदन को लेने वाघा बॉर्डर जाएगा, जिसके साथ अभिनंदन के माता-पिता भी मौजूद हैं.

विंग कमांडर अभिनंदन के बारे में ये बातें सबको जाननी चाहिए

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Image Credit: BBC
1. अभिनंदर भारतीय वायु सेना में विंग कमांडर के पद पर हैं. इंडियन एयरफोर्स में उनका चयन साल 2004 में एक फाइटर पायलट के तौर पर हुआ था. 2. अभिनंदन 34 साल के हैं. वे नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) से ग्रेजुएट हैं. 3. अभिनंदन की शुरुआती पढ़ाई चेन्नई के सैनिक वेलफेयर स्कूल, अमावतीनगर से हुई है. 4. अपने 15 सालों के कॅरियर में वे दो बार प्रमोट हो चुके हैं. पहले उन्हें एक निपुण सुखोई 30 फाइटर पायलट का खिताब मिला. बाद में उनके युद्ध कौशल को देखते हुए विंग कमांडर के तौर पर प्रमोट किया गया. इसके बाद उन्हें मिग 21 बिसन सौंप दिया गया. 5. अभिनंदन के पिता जानेमाने पूर्व पायलट एयर मार्शल सिम्हाकुट्टी वर्धमान हैं. वे पूर्वी वायु कमान के मुखिया पद से रिटायर हुए थे. 6. अभिनंदन की मां एक डॉक्टर हैं. 7. उनकी पत्नी भी भारतीय वायुसेना में स्क्वॉड्रन लीडर रह चुकी हैं. उनके दो बच्चे हैं. 8. अभिनंदन के भाई भी इंडियन एयरफोर्स में ही हैं 9. वह तमिलनाडु के रहने वाले हैं, जहां उनका पैतृक गांव थिरुपनामूर हैं. 10. अपने दोस्तों के बीच अभिनंदन पढ़ने और अच्छी स्पीच देने के लिए मशहूर हैं. वायुसेना के आंतरिक कार्यक्रमों में अभिनंदन को अक्सर बोलने के लिए कहा जाता है.

समुदाय और राष्ट्र ईमानदारी तथा दूरदर्शिता के बिना प्रगति नहीं कर सकते – मंत्री राजेंद्र पाल गौतम

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नई दिल्ली। दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 28 फरवरी को अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग दिल्ली सरकार के तत्वावधान में “आरक्षित समुदायों के सामाजिक सशक्तिकरण से संबंधित विभिन्न विषयों पर एक सम्मलेन” आयोजित किया गया जिस में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया. इस दौरान वक्ताओं ने सुझाव दिया कि विभिन्न आरक्षित समुदायों के बीच सामाजिक गठजोड़ को आकार लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह तेजी से स्पष्ट हो रहा है कि आपसी सहयोग और मजबूत संबंधों के माध्यम से ही ये समुदाय सुरक्षा को मजबूत कर सकते हैं, सामाजिक ताने-बाने को मजबूत कर सकते हैं और देश में सम्मानजनक स्थान बना सकते हैं.

सम्मेलन का उद्देश्य सामाजिक गतिशीलता और एससी, एसटी और ओबीसी जैसे सभी समुदायों के मुद्दों को समझना और सामाजिक एकीकरण के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना था. इस मौके पर दिल्ली के समाज कल्याण मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम ने अपने वक्तव्य के कहा कि समुदाय और राष्ट्र ईमानदारी तथा दूरदर्शिता के बिना प्रगति नहीं कर सकते, जो लोगों को स्वतंत्रता, न्याय और समानता की गारंटी देता है. मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए उन्होंने चेताया कि समाज में विभाजन पर विभाजन हमारे राष्ट्र को कमजोर कर रहा है, इसलिए समय आ गया है कि हम शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सामाजिक एकीकरण की ओर बढ़ें.

उन्होंने कहा कि जो लोग विकास की दौड़ में पीछे रह गए हैं, जिन्हे समान अवसर और बराबरी का दर्जा आज भी पूरी तरह नहीं मिल पाया, उन लोगों को मुख्यधारा में शामिल करना एक संवैधानिक जनादेश है और इसे पूरा करने के लिए हमें एकजुट होकर काम करना होगा.

उन्होंने अपने भाषण में कहा कि केवल सामाजिक एकीकरण द्वारा ही ‘आईडिया ऑफ़ इंडिया’ के लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है. जिसका सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था. उन्होंने सभी आरक्षित समुदायों के सदस्यों को संगठित होने को कहा व हाशिए पर खड़े समुदायों के सामाजिक उत्थान के लिए एक साथ काम करने का आह्वान किया. सभी से अनुरोध भी किया आपसी द्वेष और मतभेद को छोड़ कर समाज के बेहतर निर्माण में योगदान दें. क्योंकि सब समुदाय एक ही हैं, जातियों में बांटकर हमें कमजोर करने की कोशिश की गई है और इसी वजह से हम पिछड़ रहे हैं.

ओबीसी आयोग के सचिव श्री शमीम अख़तर ने अपना स्वागत भाषण देते हुए राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता पर जोर दिया और जोर देकर कहा कि यदि समाज का सबसे बड़ा वर्ग वंचित रह जाता है, तो राष्ट्र के लिए अपना सही गौरव हासिल करना संभव नहीं है. उन्होंने यह भी उम्मीद की कि यह सम्मेलन सामाजिक एकीकरण की दिशा में एक छोटा सा प्रयास है लेकिन महत्पूर्ण कदम साबित होगा.

श्री पी.एस कृष्णन, (Rtd.) I.A.S., भारत सरकार के उन मुट्ठी भर नौकरशाहों में से हैं, जिन्होंने समाज के वंचित वर्गों के हितों के लिए प्रतिबद्ध रहकर कार्य किया है. उन्होंने मंडल आयोग के पीछे की पृष्ठभूमि, तर्क और सभी आरक्षण के मुद्दों और आगे के रोड मैप पर अपने उल्लेखनीय विचार व्यक्त किए. उन्होंने कहा कि एससी / एसटी और अल्पसंख्यकों की स्थिति देश में बेहतर नहीं है. उन्होंने पूछा, क्या डॉ अंबेडकर के विचार को इसकी समग्रता में स्वीकार किया गया था? उन्होंने कहा कि यदि हम संवैधानिक सुरक्षा उपायों और आपसी सहयोग का प्रभावी ढंग से उपयोग करते हैं, तो यह निश्चित रूप से भारत को एक वास्तविक और बेहतर लोकतंत्र बनने में मदद करेगा.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर श्री विवेक कुमार ने सभा को संबोधित करते हुए जोर दिया कि शिक्षा, आर्थिक उन्नति और सामाजिक सशक्तिकरण के बिना किसी भी समुदाय का सामाजिक कल्याण संभव नहीं है. इसलिए सभी को विकास का सामान्य अवसर प्राप्त होना चाहिए. उन्होंने कहा कि चूंकि इस देश में बहुत कुछ तय करने वाली राजनीति है, इसलिए सभी लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए एकजुट होना जरूरी है.

सोशल एक्टिविस्ट और (Rtd.) I.A.S श्री पी आर मीना ने सभी वर्गों को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने में वर्तमान विफलताओं पर विस्तार से चर्चा किया. एक सांप्रदायिक रूप से संचालित राजनीति में अपने भाग्य को तराशने के लिए कमजोर वर्गों को एक साथ आने की अपील की. उन्होंने कहा कि सरकारी आयोगों के द्वारा किये गए सभी स्वतंत्र अध्ययनों ने ये साबित कर दिया है कि लोकतांत्रिक भारत में दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर रखा गया है और उन्हें न्याय और समानता हासिल करने के लिए एक स्थायी गठबंधन बनाने की जरूरत है ताकि एक सम्मानजनक अस्तित्व पर कोई आंच न आये.

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट और एक्टिविस्ट फ़िरोज़ अहमद ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारतीय पिछड़े मुसलमान वास्तव में भारतीय हैं और उनको वही समानता मिलना चाहिए जो दूसरों को प्राप्त है .

अखिल भारतीय मुस्लिम पिछड़ा वर्ग महासंघ के महासचिव डॉ इदरीस क़ुरैशी जो कई वर्षों से हाशिए पर खड़े समुदायों के सामाजिक उत्थान के लिए काम कर रहे हैं. इस सम्मेलन में, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पिछड़े भारतीय मुस्लिम जातियों को कानून के तहत अपनी मूल पहचान की घोषणा करके एक छतरी के नीचे आना चाहिए.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के रिटायर्ट प्रोफेसर नंदू राम सहित अन्य लोगों ने भी सम्मेलन में अपने विचार व्यक्त किए. नंदू राम ने जोर देकर कहा कि हाशिए पर पहुँच चुके वर्गों को अच्छी शिक्षा प्रदान करना और रोजगार से वांछित लोगों के हित के लिए सकारात्मक कार्रवाई करना उसी वक़्त संभव हो सकता है जब एक जिम्मेदार सरकार हो जो सबकी हितों की रक्षा करना जानती हो.

अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग दिल्ली सरकार के अध्यक्ष श्री हरिओम डेढा ने वक्ताओं और प्रतिभागियों का धन्यवाद किया और यह उम्मीद ज़ाहिर किआ कि सभी हाशिए के समुदाय एक बेहतर भारत के पुनर्निर्माण के लिए करीब आएंगे.

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सफाई कर्मचारियों के पैर धोने से कौन महिमामंडित होता है?

अपनी कुंभ यात्रा के दौरान पीएम मोदी सफाईकर्मियों के पैर धोते हुए

24 फरवरी 2019 का दिन देश के इतिहास में हमेशा याद रहेगा. शायद इसलिए कि प्रधान मंत्री मोदी ने कुंभ में सफाई करने वाले कुछ सफाई कर्मचारियों के पैर धोने का उपक्रम किया. इस मौके पर कुंभ में सफाई अभियान की तारीफ करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 22 करोड़ लोगों के बीच सफाई बड़ी जिम्मेदारी थी, जिसे सफाई कर्मचारियों ने साबित किया कि दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं. ये सफाईकर्मी बिना किसी की प्रशंसा के चुपचाप अपना काम कर रहे थे. लेकिन इनकी मेहनत का पता मुझे दिल्ली में लगातार मिलता रहता था. वो यहीं नहीं रुकें, अपितु वोटों की खातिर मोदी जी ने कोरिया से मिले सोल शांति पुरस्कार की राशि को नमामि गंगे प्रॉजेक्ट को समर्पित किया. इसके बाद पांव धोने का उपक्रम किया गया. पांव धोने के उपक्रम से उन राजनेताओं के माथे पर शिकन पड़ना जरूरी ही है जो दलितों के घर जाकर खाना खाने का नाटक करते रहे हैं. किंतु मोदी जी की नाटकबाजी दलितों के घर जाकर खाना खाने के उपक्रम से ज्यादा खतरनाक है. यद्यपि दोनों का मकसद केवल और केवल दलितों के वोट हासिल करना दिखता है. किंतु दलित हैं कि राजनीति की भाषा समझते ही नहीं.

इस संबंध में विल्सन बेजवाड़ा कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री को सफाई कर्मियों और दलितों के पैर नहीं धोने चाहिए बल्कि उनसे हाथ मिलाना चाहिए. पैर धोने से कौन ग्लोरिफाई (महिमामंडित) होता है. प्रधानमंत्री ही ग्लोरिफाइ होते हैं ना. वह सफाईकर्मियों के पांव पकड़ते हैं तो वह यह संदेश दे रहे हैं कि आप (सफाईकर्मी) बहुत तुच्छ हैं और मैं महान हूं. इससे किसका फायदा होता है? इनके पैर धोकर वह खुद को महान दिखा रहे हैं. यह बहुत खतरनाक विचारधारा है.

संगम को पवित्र माना जाता है और हिंदू मानते हैं कि कुंभ के दौरान वहां स्नाोन करने से पाप धुलते हैं और मोक्ष प्राप्तत होता है. बड़ी संख्यान में श्रद्धालु नदी के किनारे कैंप या अखाड़ों में रुकते हैं. पिछले कुछ हफ्तों में कई राजनेता, मंत्री और नामी हस्तियां कुंभ मेला पहुंची. स्मृुति ईरानी, योगी आदित्युनाथ और अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने अपने कुंभ जाने की तस्वी रें भी साझा की हैं. 48 दिनों तक चलने वाले कुंभ मेले में करोड़ों की संख्यान में श्रद्धालु संगम में डुबकी लगाने पहुंच रहे हैं. 15 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन से शुरू हुआ कुंभ मेला 4 मार्च को महाशिवरात्रि के दिन समाप्तफ होगा. तो क्या कोई ऐसा मान सकता है कि कुम्भ अथवा गंगा स्नान करने में उन लोगों की ज्यादा ही रुचि रहती है जो पापी होते हैं?

खैर प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर सफाईकर्मियों के लिए स्वच्छ सेवा कोष की घोषणा भी की और घोषणा करते हुए कहा, ‘आज स्वच्छ सेवा कोष की भी घोषणा की गई है. इस कोष से आपके परिवार को विशेष परिस्थितियों में मदद सुनिश्चित हो पाएगी. यह देशवासियों की तरफ से आपका आभार है. इस बार कुंभ की पहचान स्वच्छ कुंभ के तौर पर हुई तो केवल सफाई कर्मचारियों के कारण यह संभव हो सका. पीएम मोदी ने कहा, ‘दिव्य कुंभ को भव्य कुंभ बनाने में आपने कोई कसर नहीं छोड़ी. जहां 1 लाख से ज्यादा शौचालय हों, 20 हजार से ज्यादा कूड़ादान हो, वहां काम कैसे हुआ इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता. आज मेरे लिए भी ऐसा ही पल है जो भुलाया नहीं जा सकता. आज जिन सफाईकर्मी भाइयों-बहनों के चरण धोकर मैंने वंदना की है, वह पल मेरे साथ जीवनभर रहेगा.’

मोदी जी ने औपचारिकतावश नाविकों और पुलिस कर्मियों की भी तारीफ की. किंतु पीएम मोदी जी के द्वारा सफाई प्लांट का उद्घाटन से पहले सफाई करने के लिए टैंक में उतरे दो मजदूरों की मौत की मोदी जी को कोई याद ही न रही. वृतांत इस प्रकार है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 नवंबर को संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जिस दीनापुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का उद्घाटन करने वाले थे, उसे चालू करने में जुटे दो मजदूरों की मौत हो गई. सीवर में काम करने वाले अनेक सफाई कर्मियों की मृत्यु को मोदी जी दरकिनार कर देते हैं. फिर भी सफाईकर्मियों की सीवर में मौत की घटनाओं को रोकने की दिशा में कोई ठोस उपाय नहीं दिख रहे हैं. इस ओर मोदी जी का कोई ध्यान नहीं है….मोदी जी को यह याद क्यों नहीं रहता कि वोट तो सीवर में मरने वालों के भी होते हैं. यदि मोदी जी अपने कार्यकाल में दलितों के हितों को ही अनदेखी नहीं करते तो मोदी जी को सफाई कर्मियों के पैर की जरूरत ही न पड़ती. सफाई कर्मियों के पैर धोने की बजाय यदि मोदी जी दलितों के हक में अधोलिखित काम ही कर देते तो काफी होता.

> सफाई कर्मियों से छीनकर ठेकेदारों को दी गयी सभी सरकारी नौकरियां उन्हें लौटा देते > सफाई कर्मियों के बच्चों को समुचित शिक्षा प्रदान करा देते और उनके लिए पीएचडी तक मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था कर देते > हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट में दलित समुदाय को प्रतिनिधित्व प्रदान करने का उपक्रम करने की व्यवस्था कर देते.

किंतु आपने तो दलितों के हितों की रक्षा करने की बजाय कुछ उल्टा ही काम किया है. आपके नेतृत्व में भाजपा सरकार ने पूरे पांच साल में सफाई कर्मी ही नहीं बल्कि पूरे SC, ST, OBC समुदाय के हितों का गला घोटा है और उनके संवैधानिक अधिकारों पर बज्र प्रहार किया है, इसलिए आप अब जो भी कर रहे हैं वह सिर्फ नौटंकी लगती है और कुछ नहीं. पूरा देश जानता है कि आप आजकल जो कुछ भी कर हैं केवल और केवल 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए कर रहे हैं.

ऐसे में आपके द्वारा सफाई कर्मचारियों के पैर धोने का क्या औचित्य रह जाता है जबकि 13 फरवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ द्वारा एक NGO की याचिका पर सुनवाई करते हुए 11 लाख से अधिक आदिवासियों को जमीन से बेदखल करने का आदेश दे दिया गया है. इस आदेश की वजह से करीब 20 राज्यों के आदिवासियों और जंगल में रहने वाले अन्य लोग प्रभावित होंगे. सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला इस वजह से भी आया क्योंकि केंद्र सरकार आदिवासियों और वनवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने एक कानून का बचाव नहीं कर सकी. खेदजनक तो ये भी है कि सरकार के द्वारा आदिवासियों के मुद्दों की वकालत करने के लिए कोई भी सरकारी वकील नहीं भेजा गया. इसे क्या कहें? सरकार की गरीब तबके के प्रति अनदेखी अथवा सरकार का जाति भावना से ग्रस्त होना? इस मामले में केंद्र सरकार की भूमिका बेहद ही गैरजिम्मेदाराना, दोषपूर्ण और संदिग्ध नजर आती है. क्या सरकार ने अपनी आदिवासी-विरोधी कार्पोरेट नीतियों को विस्तार देने के लिए ऐसा किया? कहा जाता है कि कानून की पवित्रता तभी तक तक बनी रह सकती है, जब तक वो लोगों की इच्छा/जरूरतों की अभिव्यक्ति करे. लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया है जो मुलनिवासी माने जाने वाले आदिवासियों की इच्छा के विरूद्ध है.

आदिवासी और वनवासियों के लिए काम करने वाली एक संस्था ‘अभियान फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी’ का आरोप है कि सुनवाई के समय केंद्र सरकार का वकील कोर्ट में मौजूद ही नहीं था. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद देशभर से आदिवासियों को जबरदस्ती जंगल की जमीन से बेदखल करने की घटनाएं सामने आएंगी. जाहिर है जमीन को अपनी ‘मां’ कहने वाले आदिवासी आसानी से जमीन खाली नहीं करेंगे, ऐसे में सैनिकों की मदद से बलपूर्वक उन्हें बेदखल किया जाएगा. इस बाबत हमें ब्राजील में घटी घटना का स्मरण होना चाहिए जिसके तहत वहाँ के आदिवासियों ने सरकार का अपने तरीके से भरपूर विरोध किया था. यहाँ तक कि परम्परागत हथियारों जैसे तीर कमान और भालों को जमकर इस्तेमाल किया गया था. शंका है कि कहीं वो ही अवस्था भारत में न आ जाए. अफसोस की बात तो ये है कि जिन आदिवासियों ने जंगलों को बचाया आज जंगल बचाने के नाम पर उन्हें ही उजाड़ा जा रहा है. आदिवासियों का जंगल से रिश्ता बहुत गहरा है. उनकी अस्मिता और अस्तित्व जंगल, नदी, पहाड़ से ही परिभाषित होता है. इसलिए जब भी किसी बाहरी ने उन्हें जंगल से बेदखल करने की कोशिश की है, आदिवासियों ने हमेशा विद्रोह किए हैं. अंग्रेजों ने आदिवासी इलाकों पर जबरन कब्जा करना शुरू कर दिया था जिसके खिलाफ आजादी की लड़ाई से भी पहले 18वीं और 19वीं सदी में आदिवासियों ने आंदोलन किये हैं. सही मायने में ये आंदोलन भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की शुरूआत मानी जानी चाहिए.

विदित हो कि बिरसा मुंडा शहीद हो गए लेकिन उनके आंदोलन के दबाव में अंग्रेज सरकार ने 1908 में आदिवासियों के वनाधिकारों को बचाने के लिए ‘छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट’ बनाया. बाद में इसी की तर्ज पर ‘संथाल परगना टेनेंसी एक्ट’ लाया गया. इनकी रोशनी में ही भारत के संविधान में आदिवासियों के अधिकारों संबंधी प्रावधान किये गए थे. किंतु सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी को एक ऐसा आदेश जारी किया है जो संभवतः आजाद भारत के इतिहास में आदिवासियों के खिलाफ तंत्र की तरफ से सबसे बड़ी कार्यवाही साबित होगी. सुप्रीम कोर्ट को आदिवासियों के विस्थापन को रोकने के लिए स्वत: संज्ञान लेना चाहिए.

इस संबंध में सोशल मीडिया के जरिए जस्टिस काटजू कहते हैं कि “मी लॉर्ड, आर्टिकल 21 भूल गए हैं जिसके जरिए संविधान हमें जीने का अधिकार देता है. मैं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बेहद दुखी हूं जिसमें कहा गया है कि 17 राज्यों के जंगलों में रहने वाले 10 लाख से भी ज्यादा आदिवासियों को जमीन खाली करके जाना होगा. मेरी अगुवाई में बनी बेंच द्वारा सुप्रीम कोर्ट (कैलाश वर्सेस स्टेट ऑफ महाराष्ट्र) का फैसला आया था. उसके मुताबिक, भारत प्रवासियों का देश है (जैसे कि नार्थ अमेरिका) यहाँ की 93 से 94% आबादी प्रवासियों की वंशज है. यहां पर मूलनिवासी तो द्रविड़ियन आदिवासी हैं (मसलन भील, गोंड, संथाल, टोडा जैसे आदिवासी) जिनका बेरहमी से कत्ल किया गया, जिनके साथ आक्रांता प्रवासियों ने बुरा बर्ताव किया और उन्हें जंगलों में रहने के लिए मजबूर कर दिया. ताकि वो अपना वजूद बचा सकें. और अब उन्हें जंगलों से भी भगाया जा रहा है. यह अति दुखदायी है कि अब वो कहां जाएंगे? क्या उन्हें अब समुद्र में फेंक दिया जाएगा? या गैस चैंबर में डाल दिया जाएगा? क्या फॉरेस्ट एक्ट संविधान द्वारा प्रदत्त आर्टिकल 21 के ऊपर है?”

इतना ही नहीं, आपके कार्यकाल में विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती के लिए 200 पाइंट रोस्टर के बदले 13 पाइंट रोस्टर लागू कर दिया गया; संसद मार्ग थाने के सामने देश का संविधान जलाया गया. जातिगत भावना के तहत दलितों के विरोध में ही कार्य किए गए. अब तो इस कार्यकाल में आपके पास समय ही शेष नहीं रह गया है ताकि आप अपनी कथनी और करनी के सवालों को हल कर सकें. अगला दौर किसका होगा … कौन जाने?

  • लेखक तेजपाल सिंह ‘तेज’ स्वतंत्र लेखक हैं।

यूएसए बेस्ड ‘अम्बेडकर अवार्ड 2018’ भंवर मेघवंशी सहित तीन को

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नई दिल्ली। दलित आदिवासी एवं घुमन्तू अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के संस्थापक सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार, लेखक व चिंतक भंवर मेघवंशी को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त “अम्बेडकर अवार्ड 2018” दिया जायेगा. संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित संगठन ‘फ्रेंड्स फ़ॉर एजुकेशन इंटरनेशनल’ (एफ एफ ई आई) भारत में ग्रासरूट पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं व संघर्षशील व्यक्तियों को अम्बेडकर अवार्डस देता है.

बेजवाड़ा विल्सन

एफ एफ ई आई के संस्थापक अध्यक्ष बेंजामिन कैला ने लॉस एंजेल्स में बताया कि इस वर्ष भारत की तीन शख्सियतों को यह अवार्ड से दिया जायेगा, जिसमें भंवर मेघवंशी भी शामिल हैं. संगठन के अमेरिका स्थित ऑफिस ने सोशल मीडिया पर अम्बेडकर अवार्ड 2018 के विजेताओं के नाम की घोषणा करते हुए जानकारी दी कि इस वर्ष का अवार्ड जातिवाद के खिलाफ लड़ रही अमृता प्रणय (तमिलनाडु), सफाई कर्मचारी आंदोलन के नेता बेजवाड़ा विल्सन (आंध्रप्रदेश) वह जमीनी स्तर पर संघर्षरत सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी (राजस्थान) को इस सम्मान से नवाजा जायेगा.

मेघवंशी को उनके द्वारा वंचित वर्गों के मध्य विगत दो दशकों से किये जा रहे कामों को देखते हुए यह अवार्ड देने का फैसला किया गया है. अमेरिका में स्थित पेरियार इंटरनेशनल उनके अवार्ड को स्पॉन्सर कर रही है. अवार्ड की घोषणा करते हुए संस्था के अध्यक्ष बेंजामिन कैला ने बताया कि उनका संगठन विगत कुछ वर्षों से भारत में सामाजिक न्याय व समानता के अम्बेडकरवादी मूल्यों के लिए लड़ने वाले लोगों का चयन कर उन्हें पुरुस्कृत करता है. इस अवार्ड के तहत 50 हजार रुपये की राशि और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है.

पति प्रणय की फोटो के सामने अपने बच्चे के साथ अमृता प्रणय

जबकि बेजवाड़ा विल्सन सफाई कर्मचारी आंदोलन के अगुवा हैं. उन्हें भारत सरकार मैग्सेसे अवार्ड से भी सम्मानित कर चुकी है. विल्सन सफाई कर्मचारियों के हक के लिए देश भर में आंदोलन करते हैं. दूसरी ओर अमृता का नाम तब सुर्खियों में आया था जब उनके पति प्रणय को उन्हीं के घरवालों ने हत्या कर दी थी. प्रणय दलित समाज का युवा था और अमृता का ताल्लुक कथित सवर्ण समाज से. दोनों ने अपनी मर्जी से शादी कर ली थी, जिससे अमृता के घरवाले नाराज थे. प्रणय की हत्या के वक्त अमृता गर्भवती थी और उसने हाल ही में बच्चे को जन्म दिया है. पति की हत्या के बाद अमृता ने समाज के बीच गैरबराबरी के खिलाफ लड़ने की बात कही थी.

(विशेष प्रतिनिधि)

पाकिस्तान की कैद में मौजूद अभिनंदन के बारे में सब जानिए

पाकिस्तानी सेना की हिरासत में भारतीय वायु सेना के अभिनंदन

नई दिल्ली। पुलवामा की घटना के बाद भारत और पाकिस्तान के मध्य जारी तनाव के बीच भारतीय वायु सेना के पायलट विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तानी सेना की गिरफ्त में हैं. पूरा देश इस जांबाज युवा की सुरक्षित वापसी चाहता है. अभिनंदन ने बुधवार सुबह फाइटर प्लेन मिग 21 से उड़ान भरी थी, लेकिन पाकिस्तानी एयरफ़ोर्स ने मिग-21 को मार गिराया और अभिनंदन को अपने क़ब्ज़े में ले लिया.

इस बीच एक के बाद एक अभिनंदन के तीन से चार वीडियो सामने आए हैं, जिसने देश के लोगों की धड़कन बढ़ा दी है. पाकिस्तान से आए पहले वीडियो में अभिनंदन ज़ख़्मी दिख रहे हैं और उनके चेहरे पर ख़ून फैला हुआ है. जबकि एक दूसरे वीडियो में कुछ लोग अभिनंदन के साथ मार-पीट कर रहे हैं. एक अन्य वीडियो में अभिनंदन की आंखों पर पट्टी है और वो कह रहे हैं, ”मेरा नाम विंग कमांडर अभिनंदन है. मेरा सर्विस नंबर 27981 है. मैं एक फ्लाइंग पायलट हूं और मैं हिन्दू हूं.”

एक और वीडियो में अभिनंदन चाय या कॉफी जैसा कुछ पी रहे हैं. वह इसमें किसी के सवालों का जवाब दे रहे हैं. अभिनंदन इस वीडियो में कह रहे हैं कि उनके साथ बढ़िया व्यवहार किया जा रहा है और वो अगर भारत वापस आते हैं तब भी यही बात कहेंगे.

इस वीडियो में अभिनंदन ख़ुद को दक्षिण भारत का बता रहे हैं. उनसे यह भी पूछा गया कि क्या वो शादीशुदा हैं तो इसके जवाब में उन्होंने हां कहा. गौरतलब है कि अभिनंदन के एक अन्य भाई भी एयरफ़ोर्स में हैं. उनके पिता भी एयरफ़ोर्स में ही थे. वह एयर मार्शल थे और उनका नाम एस. वर्धमान है. अभिनंदन 2004 में कमीशन्ड हुए थे. फिलहाल पूरा देश अभिनंदन की सलामती की दुआ मांग रहा है और सरकार से सिर्फ एक ही मांग कर रहा है कि सरकार अभिनंदन को सही सलामत देश वापस लेकर आए.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने माना, एक मिग-21 क्रैश, उसका एक पायलट लापता

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नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसे हालात के बीच आज पहली बार भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने मीडिया को सरकार की तरफ से स्टेटमेंट दिया. दोपहर को विदेश मंत्रालय के अधिकारी रवीश कुमार ने मीडिया को दिए स्टेटमेंट में इस बात को माना कि भारत का एक मिग-21 विमान क्रैश हुआ है और मिग-21 का एक पायलट लापता है.

उन्होंने अपने बहुत ही छोटे वक्तव्य में कहा कि हमने सबूतों के आधार पर हमला किया है. उन्होंने यह भी जानकारी दी कि भारतीय वायु सेना ने पाक के एक लड़ाकू विमान को मार गिराया है. विदेश मंत्रालय का यह बयान पाकिस्तान के उस दावे के बाद आया है, जिसमें पाकिस्तान ने कहा है कि उसने 2 भारतीय विमान मार गिराया है और एक पायलट को जिंदा पकड़ा है. हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा यह भी कहा गया कि पाकिस्तान ने अभी तक आधिकारिक तौर पर भारत को उसके पायलट को पकड़ने की सूचना नहीं दी है.

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मासूम चंद्रशेखर के ‘आजाद’ बनने की पूरी कहानी, क्या उनसे जुड़ी ये अहंम बातें जानते हैं आप?

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महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद 27 फरवरी को 1931 को शहीद हुए थे. देश के इस महान सपूत का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ था. चंद्रशेखर आजाद का जीवन ही नहीं उनकी मौत भी प्रेरणा देने वाली है. आज ही यानि 27 फरवरी, 1931 को चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिशों से एक मुठभेड़ में कभी अंग्रेजी पकड़ में न आने की शपथ के चलते खुद को गोली मार ली थी. आजाद की मौत से जुड़ी एक गोपनीय फाइल आज भी लखनऊ के सीआईडी ऑफिस में रखी है. हम आपको उनके जीवन से जुड़े ऐसी ही 15 बातें बता रहे हैं-

चन्द्रशेखर आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के भाबरा गांव (अब आजाद नगर) में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ था. आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी अकाल के समय उत्तर प्रदेश के अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों मध्य प्रदेश अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे, फिर जाकर भाबरा गांव बस गए. यहीं चन्द्रशेखर आजाद का बचपन बीता.

जैसा बताया गया आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गांव में बीता था. बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाए थे. इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी.

जलियांवाला बाग नरसंहार समय चन्द्रशेखर आजाद बनारस में पढ़ाई कर रहे थे. गांधीजी ने सन् 1921 में असहयोग आन्दोलन का फरमान जारी किया तो तमाम अन्य छात्रों की तरह आजाद भी सड़कों पर उतर आए.

पहली बार गिरफ़्तार होने पर उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई. हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, ‘वन्दे मातरम्‌’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ का स्वर बुलंद किया. इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से ‘आजाद’ पुकारे जाने लगे.

इस घटना का उल्लेख पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोड़ने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है. ‘ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र 15 या 16 साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गई. वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बांध दिया गया. जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह ‘भारत माता की जय!’ चिल्लाता था. हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया.

असहयोग आन्दोलन के दौरान जब फरवरी 1922 में चौरी चौरा की घटना के पश्चात् गांधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया. जिसके बाद पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ का गठन किया. चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गए.

हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ ने धन की व्यवस्था करने के लिए जब गांव के अमीर घरों में डकैतियां डालने का निश्चय किया तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के ऊपर हाथ नहीं उठाया जाएगा. एक गांव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन ली तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया.

रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद ने साथी क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश खजाना लूटने और हथियार खरीदने के लिए ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन डकैती को अंजाम दिया. इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था.

17 दिसंबर, 1928 को आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया और ज्यों ही जे.पी. सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकले, तो राजगुरु ने पहली गोली दाग दी, जो सांडर्स के माथे पर लग गई वह मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा. फिर भगत सिंह ने आगे बढ़कर 4-6 गोलियां दागी. जब सांडर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया, तो चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया.

सांडर्स की हत्या के बाद लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए, जिन पर लिखा था- लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है.

भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फांसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गांधीजी के पास भेजा जहां से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था.

आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाए तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया. आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फांसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें.

इसके बाद वे एक रोज अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे, तभी पुलिस ने उन्हें घेर लिया. भारी गोलाबारी के बाद जब आजाद के पास अंतिम कारतूस बचा तो उन्होंने खुद को गोली मार ली.

इस तरह उन्होंने ताउम्र अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार नहीं होने का अपना वादा भी पूरा कर लिया. यह दुखद घटना 27 फ़रवरी 1931 के दिन घटित हुई और हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई.

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पाकिस्‍तान ने परमाणु हथियारों की कमेटी की बैठक बुलाई, दी ये धमकी

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नई दिल्‍ली। Surgical Strike 2 के बाद शायद पाकिस्‍तान को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर ये क्‍या और कैसे हो गया? भारतीय वायुसेना के बालाकोट में एयर स्‍ट्राइक के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बड़ी बैठक बुलाई है. इस बैठक में पाकिस्तानी सेना की तैयारियों का जायजा लिया जाएगा. राष्‍ट्रीय सुरक्षा समिति के पास ही परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने की शक्ति होती है.

पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने संकेत दिया है कि वो भारत को करारा जवाब देने की तैयारी में जुटे हुए हैं. गफूर ने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री ने कहा था कि अगर भारत हमला करता है, तो पाकिस्तान जवाब देने का सोचेगा नहीं, जवाब देगा. हम फिर दोहराते हैं कि हम चौंकाएंगे और हमारा जवाब अलग तरीके का होगा. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री इमरान खान ने नेशनल कमांड अथॉरिटी की बैठक बुलाई है और सब जानते हैं कि यह क्या है.

गफूर ने एक बार फिर गीदड़भभकी के लहजे में कहा कि अब भारत इंतजार करे, हमने तय कर लिया है कि हम जवाब देंगे. हालांकि, डिफेंस एक्‍सपर्ट की मानें तो पाकिस्‍तान एक बार फिर सिर्फ भारत को डराने की कोशिश कर रहा है. पाकिस्‍तान पर चारों ओर से अतंरराष्‍ट्रीय दबाव है. अमेरिका कई बार पाकिस्‍तान को आतंकियों पर कार्रवाई करने के बारे में कह चुका है. ऐसे में पाकिस्‍तान का भारत को जवाब देना मुमकिन नहीं लगता है. दरअसल, पाकिस्‍तान इस समय बौखलाया हुआ है.

भारत भी पाकिस्‍तान की चालों को समझता है. इसलिए सीमाओं पर सेनाएं सर्तक हैं. तीनों सेनाओं के लिए जरूरी प्रस्तावों को लेकर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण, सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत, चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ और नेवी चीफ एडमिरल सुनील लांबा मुलाकात करेंगे.

बता दें कि Pulwama Terror Attack के बाद भारत ने पाकिस्तान में Surgical Strike2 की है. भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान में घुसकर Air Strikes की. वायुसेना ने 12 मिराज 2000 विमानों ने पाकिस्तान में आतंकी कैंपों को ध्वस्त कर दिया. विदेश सचिव विजय गोखले ने मंगलवार सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस करके वायुसेना के इस पराक्रम की पुष्टि की है. विदेश सचिव ने बताया कि 14 फरवरी को जैश-ए-मुहम्मद के आतंकी हमले (Pulwama Terror Attack) में 40 जवान शहीद हो गए थे. उन्होंने बताया कि इंटेलिजेंस के मुताबिक जैश-ए-मुहम्मद भारत पर और भी फिदायीन हमले की तैयारी कर रहा था. इन हमलों को रोकने के लिए भारत ने मंगलवार तड़के हवाई हमला किया. इस हमले में बालाकोट में जैश-ए-मुहम्मद का सबसे बड़े कैम्प को तबाह कर दिया.

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लोकसभा चुनाव में मैनपुरी से मुलायम, कन्नौज से अखिलेश लड़ेंगे चुनाव

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव लोकसभा चुनाव मैनपुरी से और वह खुद कन्नौज से लड़ेंगे. इस दौरान अखिलेश ने पाकिस्तान में भारतीय वायु सेना के हमले की सराहना की और कहा कि शहीद जवानों का बदला लेना और पाक को उसी की भाषा में जवाब देना जरूरी है. सपा अध्यक्ष मंगलवार को अपने सैफई स्थित आवास पर पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे.

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव सोमवार रात सैफई पहुंचे और कुछ देर पार्टी कार्यकर्ताओं से बातचीत की. मंगलवार सुबह वह विनायकपुर बरनाहल मैनपुरी के शहीद सैनिक रामवकील के घर जाकर उन्हें श्रद्धाजंलि दी और परिजनों को ढांढस बंधाया. इसके पहले सैफई में पत्रकारों से वार्ता करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना ने जो किया वह सराहनीय है. हम सेना को बधाई देते हैं. आतंकवाद पर कठोर से कठोर कार्रवाई होनी चाहिए. इस दौरान उन्होंने मुलायम सिंह यादव के सपा के टिकट पर मैनपुरी और स्वयं के कन्नौज से चुनाव लड़ने की घोषणा की.

अखिलेश ने कहा कि मैनपुरी सांसद तेज प्रताप यादव काफी मेहनती हैं. इसलिए उन्हें कहीं न कहीं ऐडजस्ट किया जाएगा. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक सफाई कर्मी के पैर धोने पर तंज कसते हुए कहा कि अब चुनाव आ गया है ये सब तो होगा ही. इसलिए जनता को इन सबसे सावधान रहने की जरूरत है.

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रेलवे में 1.30 लाख भर्तियां, जानिये ये खास बातें

भारतीय रेलवे ने 1.30 लाख पदों पर भर्ती के लिए शॉर्ट नोटिस जारी कर दिया है. अब विस्तृत नोटिफिकेशन का इंतजार है. विभिन्न रेलवे भर्ती बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट्स पर इसे देखा जा सकता है. नई 1 लाख 30 हजार पदों के लिए आवेदन पक्रिया 28 फरवरी से शुरू हो जाएगी. 28 फरवरी से पहले इन भर्तियों का विस्तृत नोटिफिकेशन आएगा. आयु की गणना 01 जुलाई, 2019 से की जाएगी. योग्यता व आयु की विस्तृत जानकारी पूरा नोटिफिकेशन जारी होने के बाद ही सामने आ पाएगी। यहां पढ़ें इस 1.30 लाख भर्ती से जुड़ी ये खास बातें-

योग्यता पदों से संबंधित पूरी जानकारी के लिए आरआरबी की आधिकारिक वेबसाइट पर पूरा और विस्तृत नोटिफिकेशन जल्द जारी होगा. आरआरबी ने इच्छुक अभ्यर्थियों से कहा है कि वे आधिकारिक नोटिफिकेशन के लिए आरआरबी की वेबसाइट देखते रहें।. विस्तृत नोटिफिकेशन को देखकर ही मांगी गई क्वालिफिकेशन का पता चल पाएगा.

इन पदों पर होगी भर्तियां गैर-तकनीकी लोकप्रिय श्रेणियों (एनटीपीसी), पैरा-मेडिकल स्टाफ, मंत्रिस्तरीय और आइसोलेटेड कैटेगरी के लिए 30,000 रिक्तियां हैं. इसके अलावा लेवल -1 (ग्रुप डी) पदों के लिए 1 लाख उम्मीदवारों की भर्ती की जाएगी.

RRB NTPC के तहत इन पदों पर नियुक्तियां नॉन टेक्निकल पॉपुलर कैटेगरी के तहत अनेक पदों पर कैंडिडेट का चयन किया जाता है. इसमें जूनियर क्लर्क कम टाइपिस्ट, अकाउंट क्लर्क कम टाइपिस्ट, ट्रेन क्लर्क, ट्रैफिक असिस्टेंट, गुड्स गार्ड, स्टेशन मास्टर, कमॉर्शियल अप्रेंटिस इत्यादि पदों पर आरआरबी बहाली करेगा.

पैरा मेडिकल स्टाफ के तहत होंगी नियुक्तियां इसके तहत स्टाफ नर्स, हेल्थ और मलेरिया इंस्पेक्टर, फार्मासिस्ट, ईसीजी टेक्निशियन, लैब असिस्टेंट इत्यादि पदों पर बहाली की जाएगी.

मिनिस्टेरियल और आइसोलेटेड कैटेगरी के पद इसके तहत स्टेनोग्राफर, चीफ लॉ असिस्टेंट, जूनियर ट्रांसलेटर (हिन्दी) के पदों पर चयन किया जाता है.

लेवल- 1 पद (ग्रुप डी) पिछले साल जहां ग्रुप डी की 63000 भर्तियां निकली थीं, वहीं इस बार 1 लाख भर्तियां निकलेंगी. इसके तहत ट्रैक मेंटेनर, विभिन्न विभागों में हेल्पर और असिस्टेंट, असिस्टेंट प्वाइंटमेन और अन्य लेवल वन पोस्ट पर करीब एक लाख अभ्यर्थियों की बहाली होगी.

लेवल- 1 पद (ग्रुप डी) की भर्ती के लिए इस बार आरआरबी नहीं आरआरसी का नोटिफिकेशन ( RRC – 01/2019 ) जारी होगा. रेलवे में ग्रुप डी पदों पर भर्ती के लिए रेल मंत्रालय ने आरआरसी (रेलवे रिक्रूटमेंट सेल) का गठन किया था.

आवेदन शुरू होने की तारीख एनटीपीसी के लिए – 28 फरवरी से पैरा मेडिकल स्टाफ के लिए- 04 मार्च 2019 से मिनिस्टेरियल व आइसोलेटेड कैटेगरी के लिए- 08 मार्च से लेवल-1 पदों के लिए- 12 मार्च, 2019 से

आवेदन फीस सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को आवेदन शुल्क के तौर पर 500 रुपये और आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को 250 रुपये देना होगा. पहले चरण की सीबीटी परीक्षा में शामिल होने पर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को बैंक चार्ज काट कर 400 रुपये लौटाये जाएंगे. वहीं, आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों और महिला कैंडिडेट्स को 250 रुपये में से बैंक चार्ज काट कर शेष राशि लौटा दी जाएगी.

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हापुड़ की लड़कियों पर बनी फिल्म को मिला ऑस्कर, गांव में जश्न का माहौल

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हापुड़। हापुड़ की महिलाओं पर बनी फिल्म ‘पीरियड एंड ऑफ सेंटेंस’ को अमेरिका में ‘सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र’ श्रेणी में ऑस्कर पुरस्कार मिलने से शहर में खुशी का माहौल है.

इस फिल्म में हापुड़ के गांव काठीखेड़ा की दो महिलाओं ने अभिनय किया है. काठीखेड़ा निवासी सुमन ‘एक्शन इंडिया’ के नाम से एनजीओ चलाती हैं जो कि सैनिटरी पैड बनाती है. इसमें महिलाएं ही काम करती हैं. इन महिलाओं को लेकर भारतीय फिल्म निर्माता गुनीत मोंगा ने फिल्म बनायी. फिल्म में उन महिलाओं की कहानी जो मासिक धर्म से जुड़ी रूढ़िवादिता के खिलाफ आवाज बुलंद करती है.

इस फिल्म के ऑस्कर पुरस्कार के लिए चयनित होने के बाद सुमन और स्नेहा को पुरस्कार के लिए अमेरिका बुलाया गया. उन्हें सोमवार को पुरस्कार से नवाजा गया. सुमन के भाई सुमित वर्मा ने बताया कि सुमन और स्नेहा 2 मार्च को अमेरिका से भारत लौटेंगी. उनके लौटने पर उनका भव्य स्वागत किया जाएगा.

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मायावती ने वायुसेना को दी बधाई, बोलीं- सेना को पहले ही फ्रीहैंड देते तो नहीं होता पुलवामा जैसा हमला

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मायावती (फाइल फोटो)

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने भारतीय वायुसेना के बहादुर जांबाज़ों की साहसिक कार्रवाई की मंगलवार को जमकर तारीफ की. उन्होंने सैनिकों को सलाम करते हुए कहा कि यदि हमारी सेना को बीजेपी सरकार पहले ही खुले हाथ दे देती तो बेहतर होता. मायावती ने मंगलवार को ट्वीट कर कहा,’जैश आतंकियों के खिलाफ पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर भारतीय वायुसेना के बहादुर जांबाज़ों की साहसिक कार्रवाई को सलाम व सम्मान.

बीएसपी प्रमुख ने आगे लिखा, ‘काश हमारी सेना को बीजेपी सरकार पहले ही खुला हाथ दे देती तो बेहतर होता.’ उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा, ‘प्रधानमंत्री ने पुलवामा के जवानों की शहादत के बदले में कार्रवाई करने के लिए जो खुला हाथ सेना को दिया है अगर यह फैसला मोदी सरकार द्वारा पहले ले लिया गया होता तो पठानकोट, उरी और पुलवामा जैसी अति-दुःखद व अति-चिन्तित करने वाली घटनाए नहीं होती और न ही इतने जवान शहीद होते.

बता दें कि वायुसेना की साहसिक कार्रवाई के बाद देश के सभी राजनीतिक दलों ने एक सुर में वायुसैनिकों की तारीफ की है. इस बाबत एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी ट्वीट कर सेना को बधाई दी थी. उन्होंने ट्विटर पर लिखा था, ‘अपनी वायुसेना और सशस्त्र बलों को सलाम करता हूं. बहुत बधाई.’ गौरतलब है कि भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने मंगलवार को तड़के नियंत्रण रेखा के दूसरी ओर पाकिस्तानी हिस्से में कई आतंकी शिविरों पर बमबारी की. सरकार से जुड़े सूत्रों ने यह जानकारी देते हुए बताया कि यह कार्रवाई जम्मू कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी को आतंकी गुट जैश ए मोहम्मद द्वारा किए गए आत्मघाती हमले के ठीक 12 दिन बाद की गई है. पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे.

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कश्मीर के बडगाम में वायुसेना का मिग विमान क्रैश

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जम्मू कश्मीर के बडगाम से सात किलोमीटर दूर गारेंद गांव में एक मिग लड़ाकू विमान क्रैश हो गया. विमान खेत में जाकर गिरा और इसमें आग लग गई. हादसे की वजह अब तक साफ़ नहीं हो पाई है. इस दुर्घटना में विमान के दोनो पायलट शहीद हो गए. इस विमान ने श्रीनगर एयरबेस से उड़ान भरी थी. सूत्रों का कहना है कि कश्मीर में विमान पेट्रोलिंग पर था तभी प्लेन क्रैश हो गया.

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि विमान नीचे की ओर आने लगा और थोड़ी देर बाद जोरदार आवाज आई और विमान क्रैश हो गया. इसमें आग लग गई. मौके पर पुलिस और बचाव दल पहुंच गया है.

मालूम हो कि यह घटना ऐसे वक्त हुई है जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का माहौल है. बता दें कि बीते 20 दिनों में भारत के 5 विमान क्रैश हुए हैं. हाल ही में बेंगलुरु में एयरो शो के दौरान दो सूर्य किरण विमान आपस में टकराकर क्रैश हो गए थे.

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भारत ने पाक के बालाकोट में जैश के ठिकाने तबाह किए

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भारतीय वायुसेना ने पुलवामा आतंकी हमले का करारा जवाब देते हुए पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों को निशाना बनाया है. वायु सेना के मिराज-2000 विमानों की ओर से की गई इस कार्रवाई में आतंकी कैंपों को भारी नुकसान हुआ है, मंगलवार सुबह करीब 3 बजे भारत की ओर से इस कार्रवाई को अंजाम दिया गया.

खैबर पख्तूनख्वा के बालाकोट में भारत की इस एयर स्ट्राइक के बाद दशहत का माहौल है. बीबीसी से बातचीत में स्थानीय निवासी मोहम्मद आदिल ने बताया कि 3 बजे का वक्त था, बहुत तेज आवाज आई, ऐसा लगा जैसे जलजला आ गया. बाद में पता चला कि वहां धमाका हुआ है, इसमें कई घर तबाह हो गए हैं. पांच से दस मिनट तक जहाजों की आवाज आई फिर वह बंद हो गई.

बालाकोट स्थित लाहौर होटल के मालिक ने इंडिया टुडे को फोन पर बताया कि यहां सुबह तड़के बमबारी हुई थी. उनके मुताबिक 4-5 बम गिराए गए और तीन बजे का वक्त था. होटल मालिक ने बताया कि वो सो रहे थे और हमले वाली जगह उनके होटल से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

भारत सरकार की ओर से कहा गया है कि इस कार्रवाई में किसी नागरिक या सेना को निशाना नहीं बनाया गया है बल्कि एयर फोर्स का टारगेट जैश के ठिकाने थे. विदेश मंत्रालय की ओर से विदेश सचिव विजय गोखले ने बताया कि 14 फरवरी को पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने पुलवामा में आतंकी हमला किया था, जिसमें हमारे 40 जवान शहीद हुए थे.

गोखले ने बताया कि इससे पहले पठानकोट में भी जैश की तरफ से आतंकी हमला किया गया था. पाकिस्तान हमेशा इन संगठनों की अपने देश में मौजूदगी से इनकार करता आया है. पाकिस्तान को कई बार सबूत भी दिए गए लेकिन उसने आतंकी संगठन के खिलाफ आजतक कोई कार्रवाई की.

विदेश मंत्रालय के मुताबिक जैश भारत के कई हिस्सों में आतंकी वारदातों को अंजाम देने की फिराक में था और इसके लिए फिदायीन आतंकियों को ट्रेनिंग दी जा रही थी. इस खतरे से निपटने के लिए भारत के लिए एक स्ट्राइक करना बेहद जरूरी हो गया था. हमने खुफिया जानकारी के आधार पर आज सुबह बालाकोट में एयर स्ट्राइक की है जिसमें जैश के कमांडर समेत कई आतंकियों को ढेर किया गया है.

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 क्या संविधान ने हमे सम्मान से जीने के लिए पैर धोने की व्यस्था दी है?

क्या भारत के संविधान में दलितों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए पैर धौने की व्यवस्था दी गई है? आप संविधान पढ़ेंगे तो पता चलेगा और उसका उत्तर होगा “बिल्कुल भी नही” ! तो फिर दलितों/सामाजिक रूप से बहिष्कृत निचली और पिछड़ी जातियों के सम्मान से जीने के लिए क्या व्यवथा दी गई है! अब प्रश्न यह उठता है कि इन जातियों को ही स्पेशल ट्रीटमेंट की आवश्यकता क्यों महसूस की गई और बाकायदा बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने इसके लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्था की! इसके लिए थोड़ा इतिहास में जाने की आवश्यकता है!

यह सर्वविदित है कि भारत के इतिहास के प्रारंभिक काल मे सम्राट अशोक के कालखंड में समता मूलक सामाजिक व्यवस्था जहां सब बराबर थे कोई जाति या धर्म नही था न शोषण था, के बाद वैदिक काल में कुछेक शोषकों द्वारा कूटरचित धर्मशास्त्रों की रचना की गई जिसमें भगवान का डर दिखाकर लोगो को आसानी से डराया जा सकता था, इस विचारधारा को मानने वाले लोगों ने महसूस किया कि यदि बिना मेहनत के सीधे में लोगो को डरा धमकाकर यदि अपना पेट आसानी से भर सकता है एवं हमारी पीढ़ियों का उज्जवल भविष्य बनता है तो क्यों न इसी व्यवस्था को पूर्णकालील व्यवस्था बना दिया जाए और इसी व्यवस्था के तहत चतुवर्ण व्यवस्था अपने अस्तित्व में आई जिसमें लोगों को व्यवस्था के अंदर जीने के लिए उनका कार्य विभाजन किया गया, सभी जनमानस जो समान थे बाद में कार्य विभाजन के बाद लोग वर्गों में बंट गए मुख्य रूप से कार्यो का विभाजन चार वर्गों के रूप में किया गया जिसमें ब्राम्हण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र थे! इस सामाजिक व्यवस्था के अनुसार ब्राम्हण का कार्य केवल पूजा पाठ करना,एवं धर्म ग्रंथो की शिक्षा देना ,भिक्षा माँगना आदि से अपना गुजारा चलाना था,जबकि क्षत्रिय का कार्य राज्य की सीमा की सुरक्षा,वैश्य का कार्य व्यापार करना जबकि शुद्र को इन तीनो वर्गों की सेवा,साफ सफाई और घृणात्मक कार्य करना जो उपरोक्त तीनों वर्ग में से कोई नही कर सकता था!

उपरोक्त अनुसार व्यस्था चलते रही और इन चारों वर्गों में सबसे आसानी से पेट भरकर खाने वाला वर्ग कालांतर में शूद्रों का शोषक वर्ग बन गया क्योंकि इसने ऐसी मन गणन्त्र व्यवस्था बना रखी थी जिसमे शूद्रों को शिक्षा,धन,से दूर रखा और उन्हें केवल अपना गुलाम बनाये रखा उनको डराने का सबसे प्रबल हथियार जो उन्होंने विकसित किया था वह था “धर्म आधारित (शोषक) जाति व्यवस्था” जिसमें सभी जातियों को धर्म और ईश्वर के प्रति डर दिखाकर आसानी से अपना गुलाम बनाया जा सकता था, चूँकि निचली जातियां गुलामी एवं भय में जी रही थी अतः ईश्वर और धर्म का उपयोग कर सबसे ज्यादा इनको ही डराया जा सकता था और डराकर शोषण किया जा सकता था, ये शुद्र वर्ग न केवल शारीरिक गुलाम था बल्कि कालांतर में मानसिक गुलाम भी बन गया और आज भी बना हुआ है. इस धर्म आधारित शोषक व्यवस्था में शुद्र लगभग 5 सदियों से शिक्षा,धन,संसाधनों,न्याय,सामाजिक समानता,सम्मान,से दूर रखा गया और उसके साथ जानवरो से बदतर व्यवहार किया गया! इस शुद्र वर्ग ने शोषण को अपना कर्म और शोषक को अपना ईश्वर मान लिया था और आज भी माने हुए है.

लगभग पांच हज़ार सालो तक इनके साथ ऐसी ही गैर बराबरी होते आई और शोषण होते रहा लेकिन इनके मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उपरोक्त तीनों वर्गों में से कोई भी वर्ग या कोई भी व्यक्ति इनके साथ खड़ा नही हुआ! पांच हज़ार वर्षो के शोषण के बाद शुद्र वर्ग में एक ऐसे कर्मयोगी का जन्म हुआ जिसने पहली बार सामाजिक तिरस्कार झेलते हुए महसूस किया कि सभी इंसान समान है ,सभी इंसानों का खून का रंग भी लाल है सभी एक जैसे है लेकिन सबके साथ एक जैसा सामाजिक व्यवहार नही होता है, कोई बिना मेहनत के भी मलाईदार बना हुआ है और कोई जी तोड़ परिश्रम के बाद भी शोषण का शिकार है उन्होंने इसके कारणों का अध्यन किया और पाया कि इसके पीछे का कारण चतुवर्ण आधारित धार्मिक जातिगत व्यवस्था जिम्मेदार है और इसका अंत उसी व्यवस्था को चुनोती देकर दी जा सकती है और उसके लिए पांच हज़ार सालो से लोगो के दिमाग मे सेट व्यस्था को उखाड़ फेकना इतना आसान नही है इसके लिए मेरिट चाहिए, मेरिट के लिए उन्होंने अत्यंत परिश्रम किया गहन अध्ययन किया न केवल देश मे बल्कि विदेशों के नामी गिरामी यूनिवर्सिटी की परीक्षा पास करके अपने आपको सामर्थवान बनाया इसके उपरांत उन्होंने भारत का भाग्य लिखा जिसे हम ” भारत का संविधान ” कहते है. इस महान विचारक, लेखक, शिक्षाविद, सामाजिकचिंतक, अर्थशास्त्री, इंजीनियर, समाजशास्त्री, राजनीतिज्ञ ,कानूनविद, और बाद में भारतरत्न कहलाए वे थे डॉ भीमराव आंबेडकर जिन्हें प्यार से “बाबा साहेब” भी कहा जाता है.

 उन्होंने पाँच हज़ार साल तक हुए शोषण के शिकार शोषितों,वंचितों,दबे कुचलो,महिलाओं के लिए लिखित समानता आधारित भारत के संविधान में लिपिबद्ध करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था दी! जिसमे भारत के प्रत्येक नागरिकों के लिए मूल अधिकार दिए (भारत का संविधान भाग 3 अनुच्छेद 14 से 30) जबकि शूद्रों (अनुसूचित जाति और जनजाति) के लिए भारत के संविधान में पाँचवी अनुसूची (भाग 10 अनुच्छेद 244) अनुसूचित और जनजाति क्षेत्रो में प्रशासन की व्यस्था की गई! भारत के संविधान में प्रदत्त मूल अधिकार भारत के सभी नागरिको पर लागू होते है एवं इन अधिकारों से भारत के प्रत्येक नागरिक को समता का अधिकार(अनुच्छेद 14-18),स्वत्रंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22),शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24),धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार(25-28),संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30) में सभी नागरिकों को विधि के संगत न्याय की व्यवस्था दी गई ! धर्म,मूलवंश,जाति,लिंग या जन्मस्थान के आधार पर लोगों से विभेद नही किया जा सकता था! नोकरियों के विषय मे समानता के अवसर का प्रावधान था,छुआछूत को निषिद्ध किया गया था, बोलने की आज़ादी / अभिव्यक्ति की आज़ादी दी गयी!मानव के साथ कोई दुर्व्यापार न करे,कोई बलात श्रम न करा पाए,कारखानों में बालको के नियोजन का प्रतिषेद किया गया,लोगो को अपने हिसाब से धर्म की स्वत्रन्त्रता दी गई वह धर्म माने अथवा न माने,या कोई भी धर्म माने!अल्पसंख्यक के हितों का संरक्षण ,शिक्षा के अधिकार दिए गए! उपरोक्त सभी अधिकार “26 जनवरी 1950”  को “भारत के संविधान” के अस्तित्व में आने के साथ ही सभी नागरिकों को मुफ्त में मिल गए! बस यही कारण था कि भारत के संविधान के लागू होते ही उन सभी नागरिकों को समानता के अधिकार मिले जो सम्राट अशोक के काल से लेकर संविधान लागू होने के पहले तक रोककर रखे गए थे, इसकी जद में सभी नागरिक थे तो स्वाभाविक है इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति भी आई जिनका शोषण पांच हज़ार सालो से होता आया था!

 यही वजह रही कि वेदों में लिखी कूटरचित और शोषणकारी नीतियों का खुलकर विरोध हुआ और संविधान में दिए अधिकारो से दबे कुचले समाज,अनुसूचित जाति जनजाति  और महिलाओं को सामाजिक समानता मिली, नोकरी के अवसरों में समानता मिली ,वह शिक्षा एक अधिकार मिला जो उनसे छीना जा चूका था शिक्षा के अधिकार पाते ही वंचित वर्ग शिक्षित और प्रबुद्ध हुआ फलस्वरूप उसमें भी नेतृत्व क्षमता विकसित हुई अब महिलाएं भी शासन और प्रशासन चला सकती थी ! वाक- स्वत्रंतता मिली जिस कारण वंचित शोषण के खिलाफ बोल सकते थे ! केवल जाति और धर्म देखकर दिए जाने वाले न्याय की जगह सभी को समान न्याय मिलने लगा, छुआछूत निषिद्ध और असंवैधानिक करार दिया गया! स्पष्ट है कि संविधान में वंचितों,दबे कुचलों, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए के लिए जो संवैधानिक प्रावधान किए गए है उनमें उपरोक्त प्रावधान शामिल है न कि इन वर्गों के पैर धोना! इस प्रकार हम पाते है कि संवैधानिक प्रावधान वे कारण थे जिसने “धर्म आधारित जाति आधारित शोषक वर्ण व्यस्था” और उनके प्रशासकों की चूले हिला कर रख दी थी! वो इस बात से भयभीत हो गए कि हमारी शोषण आधारित ,धर्म आधारित , चतुर्वर्ण व्यस्था को यह भारत का संविधान न केवल चुनौती दे रहा अपितु हमारी षणयंत्र पूर्वक रचित व्यवस्था को नष्ट करने में तुला हुआ है! अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए इस शोषण व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इसके प्रशासको ने वही धर्म आधारित व्यवस्था “मनुस्मृति”  की पुरजोर वकालत करते आ रहे है ! इसी का परिणाम है कि इन्होंने इसी वर्ष दिल्ली में भारत का संविधान जलाया और सबसे बड़ा देशद्रोह किया परंतु इनके ही काका-मामा शासन प्रशासन और न्यायपालिका में है इसलिए ये देशद्रोहीयो पर कोई कार्यवाही नही हुई और आज भी बेख़ौफ़ होकर घूम रहे है.

चूंकि “भारत के संविधान” को एकदम से नष्ट करने पर भूचाल आ जायेगा इसलिए ये शोषक धीरे धीरे अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए किए गए विशेष प्रावधान जैसे कि आरक्षण खत्म करना,गैरसंवैधानिक तरीके से आर्थिक आधार पर आरक्षण देना,पदोन्नति में आरक्षण खत्म करना, अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को नष्ट करने की कोशिश करना, 200 पॉइंट पोस्टर सिस्टम को खत्म कर 13 पॉइंट रोस्टर सिस्टम लागू करना! ये संविधान में प्रदत्त उन शक्तियों को ही नष्ट कर देना चाहते है जिसके कारण वंचित को समान स्तर पर जीने की सामाजिक व्यवस्था बनाई गई है. जब संविधान के वे मुख्य प्रयोजन धीरे धीरे नष्ट कर दिए जाएंगे जिनसे दलितों, वंचितों महिलाओं को विशेष ट्रीटमेंट देकर समता मूलक समाज की कल्पना कि गई है तो वह संविधान किस काम का बचेगा? यही षणयंत्र धीरे धीरे संविधान की आत्मा को चोट पहुचा रहा है और अंदर से खोखला कर रहा है ,ये देश फिर से उसी पांच हज़ार साल पहले जाने की ओर अग्रसर है जहाँ गैर बराबरी, शोषण,अन्याय,अत्याचार,छुआछूत,गुलामी,कायम की जा सके, यदि समय रहते देश का मूलनिवासी ST/SC/OBC/minority का 80% जनसंख्या वाला तबका जागरूक नही हुआ तो देश मे शीघ्र ही “लोकतांत्रिक व्यस्था” खत्म हो जावेगी एवं तानाशाही “मनुस्मृति व्यवथा” लागू कर दी जावेगी जहाँ पूर्व की भांति, शोषण,अत्याचार,गुलामी,छुआछूत,ग़ैरबराबरी,गरीबी,सामाजिक त्रिस्कार का बोलबाला होगा जहाँ बुद्धिजीवी,शिक्षविद, वैज्ञानिक,इंजीनियर,वकील,डॉ को फांसी चढ़ा दी जाएगी केवल धार्मिक उन्मादियों को जीने की स्वतंत्रता होगी विज्ञान और तकनीकी अपनी अंतिम सांसे गिनेगी.

उपरोक्त अनुसार स्पष्ट है इस देश मे वंचितों, दलितों,गरीबो से हमदर्दी दिखाने के लिए इन वर्गों की आरती उतारने की जरूरत है न ही पैर धौने के जरूरत है क्योंकि ये असंवैधानिक प्रक्रिया है अगर आपको इन वंचितों का वास्तविक सम्मान करना है तो आप उन्हें अवसरों की समानता दीजिए! नोकरी दीजिए! उनसे जाति ,धर्म,लिंग,सम्प्रदाय के आधार पर शिक्षा,धन, जल,जंगल जमीन संसाधन मत छीनिए! आपको उनके न पैर धौने की जरूरत है न पैर पकड़ने की क्योंकि भारत के संविधान में इन वर्गों के सम्मान के लिए ऑलरेडी संवैधानिक उपचार दिए गए है जरूरत है केवल लागू करने की, इसलिए पैर मत धोइये बल्कि  जरूरत है केवल उनको संवैधानिक प्रावधान को हूबहू लागू कराने की! यही उनका वास्तविक सम्मान होगा फालतू के ढोंग छोड़िए ये देश कर्मकांडो और अंधविश्वास से नही चलता ये देश दुनिया के सबसे ताकतवर संविधान से चलता है, आज जरूरत है इस संविधान को बचाने की आओ मूलनिवासियों/ बहुजनों हम देश को बचाने का प्रण ले.

लेखक: राजेश बकोड़े सोशल थिंकर,B.Sc.,M.Sc.,MSW