आजकल “13 प्वाइंट रोस्टर” आम 85 फीसदी पिछड़े लोगों के लिए एक कौतूहल का विषय बना हुआ है तो समझदार पिछड़ों के लिए आक्रोश का। लोग जानना चाहते हैं आखिर यह 13 पॉइंट रोस्टर है क्या? लेकिन विशेषज्ञों के अभाव में विस्तार से 13 पॉइंट रोस्टर और इससे सामाजिक न्याय की क्षति के बारे में बताने वालों की कमी है जिससे अभी यह जनपदों और गांवों तक के लोगों के लिए समझ से बाहर की बात है।
रोस्टर अंग्रेजी का एक शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है सूची (क्रम, लिस्ट) और वर्तमान संदर्भ में इसे हम नियुक्ति में पदों का क्रम-विभाजन समझ सकते हैं। भारत में नियुक्ति में रोस्टर का बहुत ही बड़ा महत्व है। क्योंकि भारत एक जाति प्रधान देश है और वेद सहित अन्य ब्राह्मण ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि हजारों जातियों और कई वर्गों में विभाजित दिख रहे इस मानव समाज को आर्यों के आने के बाद यानी वैदिक काल में ब्राह्मण, क्षत्रि, वैश्य और शूद्र चार वर्णों में बांटा गया था और अछूत समाज को अवर्ण या अतिशूद्र के रूप में वर्ण से भी बाहर रखा गया था।
शूद्र और अति शुद्र समाज में जन्मे गुरुओं और महापुरुषों के हृदय विदारक अनवरत संघर्ष के बाद आजाद भारत में जब संविधान बनाने का अवसर दुनिया के महान विद्वान भारतरत्न बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर को प्राप्त हुआ तो उन्होंने पूरे भारतीय समाज को एससी एसटी ओबीसी और सामान्य इन चार भागों में विभाजित किया और चूंकि एससी एसटी ओबीसी को हजारों वर्षों से उनके सभी मानवीय अधिकारों को छीन कर जानवर से भी बदतर, गुलाम की जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर के रखा गया था इसलिए बाबा साहेब ने उनके लिए उनके छीने गए सभी मानवीय अधिकारों को दिलाने की संविधान में विशेष व्यवस्था (आरक्षण/प्रतिनिधित्व/ भागीदारी) किया। लेकिन एससी एसटी और ओबीसी के लिए बाबा साहेब का यह संवैधानिक प्रयास मनुवादियों को सहन नहीं हुआ और इसलिए संविधान लागू होने के बाद से ही ये इस संविधान की आलोचना करने लगे और संविधान में उल्लेखित व्यवस्था के लागू होने देने में पग-पग पर रोड़े अटकाते रहे। यह “13 प्वाइंट रोस्टर” भी उनके इसी प्रयास का एक अहम हिस्सा है।
धमाल तब मचा जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पूर्व फैसले के खिलाफ दाखिल अनुमति याचिका को खारिज करते हुए विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की नियुक्ति में “200 प्वाइंट रोस्टर” को खत्म करके 13 पॉइंट का रोस्टर जारी करने संबंधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पुनः कायम रख दिया। साथ ही साथ प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय को “इकाई (Unit)” न मानकर “विषयवार विभाग” को ही नियुक्ति का इकाई बना दिया। इसका मतलब यह हुआ कि अब विषयवार विभाग स्तर पर ही प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला जाएगा।

इस निर्णय के आने के बाद पहले तो जो एससी एसटी और ओबीसी समाज के बुद्धिजीवी हैं उनके बीच यह 13 पॉइंट रोस्टर चर्चा का विषय बना। इन बुद्धिजीवियों में देश के नामी सोसल एक्टिविस्ट और वरिष्ठ पत्रकार योगेंद्र यादव, दिलीप मंडल, उर्मिलेश, प्रो.रतन लाल, बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मा.वामन मेश्राम, प्रो. एम.पी. अहिरवार, प्रो. विवेक कुमार, JNU में सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष के प्रतीक जयंत जिज्ञासु, जाकिर हुसैन कालेज के असिस्टेंट प्रो. लक्ष्मण यादव इत्यादि प्रमुख हैं।
13 प्वाइंट रोस्टर और इसके भयावह परिणाम
13 प्वाइंट का मतलब 01 से 13 तक का वर्टिकल ( ऊपर से नीचे) क्रमांक (1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 ) है। बर्तमान संदर्भ में हम इसे पद- क्रमांक भी समझ सकते हैं। अब किस पद क्रमांक पर एससी एसटी ओबीसी और सामान्य वर्ग में से किस वर्ग का प्रोफ़ेसर रखा या नियुक्त किया जाएगा इसका जो निर्धारण किया गया है उसको रोस्टर (सिस्टम/तरीका) कहते हैं।
तो इस 13 प्वाइंट रोस्टर में ऊपर से क्रमांक 1,2,3 सामान्य वर्ग के लिए, चौथा पद ओबीसी के लिए, फिर पांचवा-छठवां पद सामान्य वर्ग के लिए, सातवां पद अनुसूचित जाति के लिए, आठवां ओबीसी के लिए और फिर फिर नवां-दसवां और ग्यारहवां पद सामान्य के लिए, 12 वां पद ओबीसी के लिए और अंतिम 13 वां पद भी सामान्य वर्ग के लिए निर्धारित है। यानी 13 में 09 पद पर सामान्य, 03 पद पर ओबीसी, और 01 पद पर एससी वर्ग के लोग असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त किये जा सकते हैं, जबकि एसटी वर्ग (आदिवासी) को इस 13 पॉइंट रोस्टर से ही गायब कर दिया गया है। इसका मतलब, अब एसटी वर्ग के लोगों को नौकरी नहीं मिलेगी । अभी केवल विश्वविद्यालयों में और भारी विरोध के बाद भी अगर यही रोस्टर रह जाता है तो बाद में किसी विभाग में किसी भी नौकरी के लिए यही रोस्टर काम करेगा। चूंकि इस रोस्टर के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विभाग को ही नियुक्ति की इकाई माना है इसलिए इस निर्णय के बाद कॉलेज /विश्वविद्यालय के अंतर्गत अब किसी भी विभाग में जरूरत होने पर भी एक-दो या तीन से अधिक व्याख्याताओं के पदों के लिए जानबूझकर विज्ञापन नहीं निकाला जाएगा। वैसे जरूरत भी नहीं पड़ेगी। और यह तीनों पद सामान्य श्रेणी के व्याख्याताओं की नियुक्ति के लिए ही निर्धारित हैं। इसलिए अब ओबीसी और एससी वर्ग के लोग भी प्रोफेसर नियुक्त नहीं हो सकेंगे।
क्योंकि यदि विभाग में प्रोफेसर के 4 पदों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन होगा तब 13 प्वाइंट रोस्टर के मुताबिक एक ओबीसी और 7 का होगा तब एक पर एससी समाज का उम्मीदवार नियुक्त किया जाएगा। 200 पॉइंट के रोस्टर में 14 वां पद एसटी का, 15 वां एससी का और 16 वां पद ओबीसी का निर्धारित है और चूंकि यह तीनों पद आरक्षित वर्ग के लिए निर्धारित हैं, इसलिए ही लगता है, 16 प्वाइंट का रोस्टर जानबूझकर नहीं बनाया गया होगा, क्योंकि 16 पॉइंट रोस्टर में 9 सामान्य वर्ग के असिस्टेंट प्रोफेसर होते तो सात आरक्षित वर्ग के भी बन जाते जो इन्हें किसी भी हालत में मंजूर नहीं। इसलिये भी पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवि इस 13 पॉइंट रोस्टर का विरोध कर रहे हैं। चूंकि 200 पॉइंट का रोस्टर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है इसलिए मान लीजिए, जो संभव नहीं है, अगर किसी विभाग में 26 स्वीकृत पदों पर प्रोफेसर की नियुक्ति होगी तो 13 के बाद फिर एक से नियूक्ति शुरू की जाएगी यानी किसी भी हालत में एसटी बिल्कुल ही गायब रहेगा और प्रत्येक 13 में 9 सामान्य वर्ग के प्रोफ़ेसर और कर्मचारी नियुक्त होते रहेंगे। और तब आपकी पीएचडी और डिलीट वगैरह की डिग्रियां धरी की धरी रह जाएंगी क्योंकि इस 13 पॉइंट रोस्टर ने आपके प्रोफेसर बनने के अधिकार को छीन लिया है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नामांकन भी इसी 13 पॉइंट रोस्टर के आधार पर होने लगेगा। फिर आप नामांकन के लिए भी दौड़ लगाते रहेंगे लेकिन होगा नहीं।
एससी एसटी और ओबीसी समाज के आरक्षण संबंधी संवैधानिक अधिकार पर मनुवादियों के इतने बड़े हमले के बाद भी देश के इस्टैबलिश्ड राजनीतिक लीडरों में एकमात्र भारत के नेलसन मंडेला पुत्र और बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता पूर्व उपमुख्यमंत्री माननीय तेजस्वी प्रसाद यादव ने इस 13 पॉइंट रोस्टर को गंभीरता से लिया और इसका मुस्तैदी से विरोध भी किया। बाकी लोगों ने या तो इस 13 प्वाइंट रोस्टर को समझा नहीं और समझा भी तो डर और लालच के कारण मात्र खाना पूरी करके मौन हो गए। लेकिन राजद नेता तेजस्वी यादव ने पीएम पर हमला बोलते हुए यहां तक कहा कि, “इस फैसले से लंबी लड़ाई के बाद हासिल आरक्षण की नृशंस हत्या हुई है। प्रधानमंत्री की रहनुमाई में सामाजिक न्याय को कुचला जा रहा है।” वहीं जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर गंगा सहाय मीणा कहते हैं, “एससी एसटी एक्ट से भी ज्यादा ‘अहम’ रोस्टर का मसला है।”
मेरा तो मानना है मनुवादी मानव कृत यह 13 पॉइंट रोस्टर पचासी फ़ीसदी पिछड़ों के लिए कैंसर से भी अधिक खतरनाक है। क्योंकि कैंसर केवल उसे खत्म करता है जिसे यह हो जाता है लेकिन यह 13 प्वाइंट रोस्टर पीढ़ी-दर-पीढ़ी को जानवर बना-बनाकर गुलाम बनाती जाएगी और लोगों को इसका अहसास भी नहीं होगा। इसलिए समय बर्बाद किए बिना इस 13 पॉइंट रोस्टर को खत्म करा देना ही आने वाली पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लिए हितकर होगा।
यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी समझता हूं कि इस दौरान शायद 13 प्वाइंट रोस्टर के इसी गंभीर परिणाम को समझते हुए तेजस्वी यादव यहां तक कहते हैं कि, ” हमें चुनाव में एक भी सीट नहीं मिले तो भी कोई गम नहीं, हम गोली भी खा लें तो भी कोई गम नहीं, लेकिन समाज की हिस्सेदारी को पाने के लिए हम अंतिम दम तक संघर्ष करते रहेंगे, क्योंकि यह 13 पॉइंट रोस्टर हमारी पीढ़ियों को बर्बाद कर देने वाला रोस्टर है।” इस 13 पॉइंट रोस्टर का एससी एसटी ओबीसी समाज के प्रबुद्ध लोगों द्वारा विरोध क्यों किया जा रहा है? खासकर 85 फीसदी पिछड़े लोगों को इसे समझना बहुत जरूरी है।
संविधान के अनु. 15 (4) और 16 (4) में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से एससी, एसटी और ओबीसी समाज के लोगों के नौकरी में समुचित प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 340 में भी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े ओबीसी समाज की पहचान कर उनके लिए प्रतिनिधित्व वगैरह की व्यवस्था करने की बात कही गई है। लेकिन एक या एक से अधिक पदों पर नियुक्ति के लिए किस वर्ग को किस क्रम पर रखा जाएगा इसका निर्धारण करने के लिए ही बनाई गई व्यवस्था का नाम रोस्टर है।
ओबीसी को आरक्षण मिलने से पहले एससी और एसटी वर्ग के लोगों की नियुक्ति के लिए 40 और 100 प्वाइंट का रोस्टर बनाया गया था। मंडल कमिशन लागू होने के बाद वर्ष 1992 में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के फैसला से जब 52 फ़ीसदी पिछड़ों को 27 फ़ीसदी आरक्षण प्राप्त हुआ तो उसके आलोक में नए ढंग से रोस्टर बनाने की आवश्यकता भी पड़ी। भारत सरकार के डीओपीटी मंत्रालय के निर्देश पर यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन) द्वारा जेएनयू के एक प्रोफेसर राव साहब काले की अध्यक्षता में रोस्टर की खामियों को दूर करने के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई, जिसमें एक कानूनविद जोश वर्गीज और दूसरे यूजीसी के तत्कालीन सचिव डॉ आर के चौहान सदस्य थे।
200 प्वाइंट का ही रोस्टर क्यों ?
काले कमेटी ने आर.के. सभरवाल बनाम स्टेट ऑफ़ पंजाब के मामले में वर्ष 1995 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच के फैसले में दिए गए दिशा निर्देश के आलोक में यूजीसी द्वारा निर्गत 2 जुलाई 1997 के दिशानिर्देशों के मद्देनजर जांच परख के बाद विश्वविद्यालय स्तर पर नियुक्तियों के लिए 200 पॉइंट का रोस्टर जारी करने की सिफारिश किया ताकि सभी वर्गों को आबादी के हिसाब से यानी एससी को 15% ,एसटी को 7.5 %, ओबीसी को 27% और सामान्य वर्ग को 50.5 % की भागीदारी प्राप्त हो जाए। कमेटी का कहना था कि 100 पॉइंट का रोस्टर रहने पर आदिवासी यानी एसटी समाज की आबादी 7.50 फ़ीसदी है तो 100 व्याख्याताओं की नियुक्ति में एसटी की 7.50 फ़ीसदी आबादी / आरक्षण के हिसाब से 7 या 8 पदों पर ही इस वर्ग की नियुक्ति की जा सकेगी। चूंकि आदमी को तो आधा किया नहीं जा सकता। अब अगर 100 पदों में से 7 पदों पर एसटी की नियुक्ति की जाती है तो एसटी को आधा का नुकसान हो रहा है और 8 पदों पर की जाती है तो अन्य की हिस्सेदारी कम हो जाती है। उसी तरह सामान्य वर्ग के लिए जो 50 पॉइंट 5% सीट निर्धारित है तो फिर उसे भी 50 या 51 सीटों पर नियुक्ति करनी होगी तो यहां भी किसी न किसी वर्ग के साथ अन्याय होगा।
इसलिए कमेटी ने 200 पॉइंट का रोस्टर बनाया और कहा कि 200 के रोस्टर में एसटी को 7.50 ×2= 15, एससी को 15× 2=30, ओबीसी को 27×2= 54 और सामान्य वर्ग को 50.5×2=101 के गणितीय हिसाब से पदों पर नियुक्ति की जा सकेगी, जिसमें किसी की कोई हिस्सेमारी नहीं होगी। आबादी एवं वर्तमान आरक्षण के इसी प्रतिशत सूत्र के आधार पर प्रो. काले कमिटी ने सभी वर्गों की नियुक्ति के लिए 200 पॉइंट का रोस्टर बनाया और इसे लागू करने की सिफारिश किया जो बिल्कुल ही वैज्ञानिक, तार्किक और न्यायिक है तथा इससे किसी भी वर्ग की हिस्सेदारी का कोई नुकसान नहीं है।
विश्वविद्यालय/कॉलेज ही इकाई क्यों?
प्रो. काले कमेटी ने एक और सिफारिश किया, वह यह की विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तीन कटेगरी के शिक्षक हैं। (1). प्रोफेसर (2). एसोसिएट प्रोफेसर और (3).असिस्टेंट प्रोफेसर। इनकी सेलरी और सेवा शर्त एक है। इनके तीन स्तरीय कैडर बनाने के साथ-साथ विश्वविद्यालय / कॉलेजों को ही इनकी नियुक्ति की इकाई होने की भी अनुसंशा किया। सभी वर्गों को समुचित प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए इससे बेहतर दूसरा कोई उपाय भी नहीं दिखता। जेएनयू में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम के चेयरपर्सन प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं कि, ” सरकार विश्वविद्यालय को इकाई मानकर “अनुदान” देती है और ‘आरक्षण’ विभाग को इकाई मान कर देने की बात की जा रही है, यह तो अपने आप में विरोधाभास है।” जेएनयू की शोध छात्रा कनकलता जादव ने तो एक बड़ा ही अहम सवाल पूछकर 13 प्वाइंट रोस्टर समर्थकों के गाल पर तमाचा जड़ दिया कि विभाग को नियुक्ति की इकाई मानने के कितने साल बाद एसटी एससी ओबीसी का नंबर आएगा?
शार्टफाल और बैकलॉग
प्रोफेसर काले कमेटी ने पाया कि बहुत से ऐसे कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं जहां आरक्षण तो लागू हो गया है लेकिन असिस्टेंट प्रोफेसरों की आरक्षित सीटों को भी सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से ही भर दिया गया है तो संबंधित कॉलेजों / विश्वविद्यालयों में रोस्टर के मुताबिक जितनी आरक्षित सीटों पर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की नियुक्ति कर दी गई है या खाली रखी गयी है तो कमेटी ने पहले उतनी सीटों को शार्टफॉल या बैकलॉग मानकर नई नियुक्ति में उन सीटों को संबंधित आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों से भरने की और फिर बाद की नई नियुक्ति के लिए 200 पॉइंट रोस्टर के साथ भरने की अनुशंसा किया ताकि सभी वर्गों का बैलेंस/ प्रतिनिधित्व मेंटेन रहे। मतलब साफ है कि जब तक आरक्षित वर्गों का पुराना बैकलॉग पूरी तरह से भर नहीं जाता तब तक किसी नए पद पर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन नहीं निकाला जाएगा।
जैसे मान लिया जाए कि किसी विश्वविद्यालय में वर्ष 2006 से आरक्षण लागू है लेकिन उस विश्वविद्यालय में किसी भी एससी, एसटी और ओबीसी के प्रोफेसर की बहाली किए बिना ही 56 पदों पर सामान्य वर्ग के असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली कर दी गई है तो कानूनन चाहिए तो यह कि हड़पी हुई 27 आरक्षित सीटों पर कार्यरत सामान्य वर्ग के व्याख्याताओं को हटाकर 200 प्वाइंट रोस्टर के मुताबिक ओबीसी के 15, एससी के 08 और एसटी के 04 व्याख्याताओं की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकालकर इन आरक्षित वर्गों के व्याख्याताओं की नियुक्ति कर दी जाय।
लेकिन व्यवहारतः ऐसा करना न उचित होगा न मानवीय ही। इसलिए प्रो. काले कमेटी की सिफारिश के अनुसार जब आगे उस विश्वविद्यालय में नए असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति करनी होगी तो पहले 200 प्वाइंट के रोस्टर के अनुसार उनकी आरक्षित कोटे की सीटें भर ली जाएंगी और उसके बाद फिर आगे रोस्टर अनुसार सभी वर्गों की नियुक्ति की जाएगी। लेकिन मनुवादियों द्वारा इस नियम को भी नहीं मानकर एक दूसरा अमानवीय और असंवैधानिक नया नियम बना दिया गया कि पहले से जिन आरक्षित पदों पर जो असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत हैं यदि वह पद उनके रिटायरमेंट के बाद खाली होती है तो उन सीटों पर आरक्षित वर्ग के असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली की जाएगी। नई बहाली में उसकी क्षती पूर्ति नहीं की जाएगी, लेकिन ऐसा कर देने से आरक्षण/प्रतिनिधित्व का जो महत्व और उद्देश्य है वह खत्म हो जाता है क्योंकि फिर तो वर्गों की नियुक्ति का बैलेंस/प्रतिनिधित्व कभी मेंटेन ही नहीं होगा। कई पीढ़ी गुजर जाएगी तो भी नहीं।
वर्तमान स्थिति
प्रोफेसर काले कमिटी की सिफारिश के आलोक में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू जी सी) ने नोटिफिकेशन निकाला तो इसके खिलाफ BHU के विवेकानंद तिवारी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2017 में 200 पॉइंट के रोस्टर को खारिज करते हुए विश्वविद्यालय/ कॉलेज को नियुक्ति की इकाई की जगह 13 प्वाइंट रोस्टर के साथ विभाग को नियुक्ति की इकाई मानकर प्रोफेसरों की नियुक्ति का निर्णय दे दिया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी कायम रख दिया। इस निर्णय के खिलाफ एससी, एसटी और ओबीसी के भारी दबाव पर बीजेपी सरकार SLP लेकर सुप्रीम कोर्ट गयी तो जरूर लेकिन, जैसा कहा जा रहा है, लेकिन सरकार द्वारा सही ढंग से सबूत के साथ पक्ष नहीं रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय को पुनः कायम रख दिया तो आपने देखा प्रबुद्ध पिछड़ों का आक्रोश सड़क पर आ गया। यहां यह कहने में मुझे तनिक भी हिचक नहीं है कि जब 1775 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने शायद भारत में पहली दफे किसी नंदकुमार देव् नामक एक ब्राह्मण को फांसी की सज़ा देकर फांसी पर लटका दिया तो तब इसका बहुत विरोध हुआ था और विरोध का एक प्रमुख कारण यह भी था कि इस मामले में जज, जूरी और सरकारी वकील सभी के सभी अंग्रेज ही थे। तो इस मामले में भी यह बात उजागर हुई है कि सभी पक्ष, विपक्ष, सरकारी वकील सहित जज भी एक ही जाति के थे।
यहां हम सब को यह समझना भी जरूरी है कि उधर इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2 जजों का फैसला आया और इधर विश्वविद्यालयों में नए नियम के अनुसार यूजीसी ने रोस्टर बनाकर प्रोफेसरों की बहाली की प्रक्रिया प्रारंभ करने का निर्देश जारी कर दिया और आपको ताज्जुब होगा कि BHU सहित 11 विश्वविद्यालयों में जैसे लूट मची हो, ताबड़तोड़ 700 व्याख्याताओं की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला दिया गया जिसमें एसटी के लिए एक भी पद नहीं , एससी के लिए मात्र 18 और ओबीसी के लिए मात्र 57 सीटें निर्धारित की गयीं थी। और हरियाणा के एक विश्वविद्यालय ने तो 11 जनवरी को कुल 22 विभागों में प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला लेकिन उसमें आरक्षित वर्गों के लिए कोई पद निर्धारित नहीं थे। इससे इनके मन में, चाहे कितने भी ऊंचे पद पर ये बिराजमान क्यों न हों, आज भी आरक्षित वर्गों के प्रति नफरत का जो भाव है, उसे समझा जा सकता है।
द्वापर और त्रेता युग में तो आम जनता के लिए कोई संविधान नहीं था तो शंबूक की गर्दन कटती थी और एकलव्य का अंगूठा भी कटता था। लेकिन आज भारत में जब विश्वरत्न बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर का भारतीय संविधान मौजूद है तो अब इस 13 पॉइंट रोस्टर से रोज-रोज शंबुकों की गर्दन और एकलव्यों का अंगूठा भी कटता रहेगा। क्योंकि यह रोस्टर दिखाने के लिए 13 प्वाइंट का है असल में यह 03 प्वाइंट रोस्टर है। इसलिए संक्षेप में यह कहना बेहतर होगा कि यह 13 पॉइंट रोस्टर एससी एसटी और ओबीसी समाज के लिए मनुवादी हुकूमत द्वारा निर्गत 85 फीसदी पिछड़ों को जानवर बनाकर गुलाम बनाये रखने का वारंट है, कहिये इनके मौत का वारंट है। यदि चुप रह गए तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलाम बनी रहेगी और संघर्ष करके जीत लिया तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी राज करेगी।
- लेखकः एडवोकेट गणपति मंडल, संपर्कः 9304080117


लखनऊ। 2019 की तैयारियों में व्यस्त बहुजन समाज पार्टी ने अपने नेताओं के लिए एक नया फरमान जारी किया है. पार्टी ने अपने फरमान में कहा है कि बसपा का कोई भी प्रत्याशी या नेता होर्डिंग्स या बैनर में पार्टी अध्यक्ष मायावती के बराबर फोटो नहीं लगा सकेगा. पार्टी की ओर से जारी निर्देश में यह भी कहा गया है कि बसपा के किसी भी प्रत्याशी या नेता को अब होर्डिंग लगाने से पहले उसे बसपा प्रभारियों को दिखाना होगा और उनकी सहमति लेनी होगी.




13 प्वाइंट रोस्टर के तहत निकली इन दो भर्तियों को देखिए. उत्तर प्रदेश के वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर की तरफ से 1 मार्च 2019 को एक विज्ञापन निकला है. 13 प्वाइंट रोस्टर विभागवार आरक्षण की बात करता है. ऐसे में जिस चालाकी से विभागवार पद निकाले गए हैं वह साफ तौर पर दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के प्रति इस विश्वविद्यालय के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के भेदभाव पूर्ण नजरिए को साबित करता है.
इसी तरह जननायक चंद्रशेखर युनिवर्सिटी बलिया में तमाम विभागों और पदों को मिलाकर कुल 70 पदों के लिए विज्ञापन निकाले गए हैं. इसमें गैर बहुजन वर्गों ने 60 पद अपने कब्जे में ले लिया हैं, जबकि पिछड़े वर्ग यानि ओबीसी के हिस्से में 10 सीटें आई हैं. एक बार फिर यहां भी दलित औऱ आदिवासी समाज के हाथ कुछ नहीं लगा है.
सेना ने संख्या नहीं बताई तो क्या सेना का शौर्य घट गया? इसके उलट सेना के प्रति लोगों की आस्था और मजबूत हुई है. मीडिया का वॉर हिस्टीरिया सिर्फ वोट के मकसद से है. असली युद्ध अब कूटनीतिक तरीके से लड़ा जाता है. हम पहले ही चार युद्ध जीत चुके हैं. एक और जंग जीत जाएंगे, उससे क्या पाकिस्तान ठीक हो जाएगा? पाकिस्तान मेरी समझ से कूटनीतिक तरीके से ही दवाब में आएगा. उस पर आर्थिक, व्यापारिक पाबंदी से लेकर दूसरे दवाब बनाने होंगे.
अभिनन्दन जब पाकिस्तान से आ रहे होते हैं, तब दिन भर मीडिया वाघा बॉर्डर पर तो रहता है, लेकिन उसी दिन पांच अर्धसैनिक बल और पुलिस की मुठभेड़ में मौत हो जाती है और मीडिया उस तरफ कैमरा तक नहीं घुमाना चाहता है, क्यों? क्योंकि शोक कभी वोट पैदा नहीं करता, वोट उन्माद पैदा करता है. मीडिया और प्रधानमंत्री एक दूसरे के पूरक हैं. मीडिया उन्माद और वॉर हिस्टीरिया पैदा कर रहा है, तो इसका लाभ उठाकर नरेंद्र मोदी अपने चुनावी कार्यक्रम को अश्वमेघ घोड़ा की तरह दौड़ा रहे हैं, लेकिन उनसे पूछा जाने वाला कोई सवाल सेना के खिलाफ बताया जाता है. यह दरअसल उनकी राजनीति के प्रति उन्माद पैदा करता है.


ओबीसी आयोग के सचिव श्री शमीम अख़तर ने अपना स्वागत भाषण देते हुए राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता पर जोर दिया और जोर देकर कहा कि यदि समाज का सबसे बड़ा वर्ग वंचित रह जाता है, तो राष्ट्र के लिए अपना सही गौरव हासिल करना संभव नहीं है. उन्होंने यह भी उम्मीद की कि यह सम्मेलन सामाजिक एकीकरण की दिशा में एक छोटा सा प्रयास है लेकिन महत्पूर्ण कदम साबित होगा.

रोस्टर लागू कर दिया गया; संसद मार्ग थाने के सामने देश का संविधान जलाया गया. जातिगत भावना के तहत दलितों के विरोध में ही कार्य किए गए. अब तो इस कार्यकाल में आपके पास समय ही शेष नहीं रह गया है ताकि आप अपनी कथनी और करनी के सवालों को हल कर सकें. अगला दौर किसका होगा … कौन जाने?
नई दिल्ली। दलित आदिवासी एवं घुमन्तू अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के संस्थापक सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार, लेखक व चिंतक भंवर मेघवंशी को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त “अम्बेडकर अवार्ड 2018” दिया जायेगा. संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित संगठन ‘फ्रेंड्स फ़ॉर एजुकेशन इंटरनेशनल’ (एफ एफ ई आई) भारत में ग्रासरूट पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं व संघर्षशील व्यक्तियों को अम्बेडकर अवार्डस देता है.
