13 प्वाइंट रोस्टरः वंचितों को गुलाम बनाने की पहल                 

  आजकल “13 प्वाइंट रोस्टर” आम 85 फीसदी पिछड़े लोगों के लिए एक कौतूहल का विषय बना हुआ है तो समझदार पिछड़ों  के लिए आक्रोश का। लोग जानना चाहते हैं आखिर यह 13 पॉइंट रोस्टर है क्या? लेकिन विशेषज्ञों के अभाव में विस्तार से 13 पॉइंट रोस्टर और इससे सामाजिक  न्याय की क्षति  के बारे में बताने वालों की कमी है जिससे अभी यह जनपदों और गांवों तक के लोगों के लिए समझ से बाहर की बात है।

रोस्टर अंग्रेजी का एक शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है सूची  (क्रम, लिस्ट)  और वर्तमान संदर्भ में इसे हम नियुक्ति में पदों का क्रम-विभाजन समझ सकते हैं। भारत में नियुक्ति में  रोस्टर का बहुत ही बड़ा महत्व है। क्योंकि भारत एक जाति प्रधान देश है और वेद सहित  अन्य ब्राह्मण ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि  हजारों जातियों और कई वर्गों में विभाजित दिख रहे इस मानव समाज को आर्यों के आने के बाद  यानी वैदिक काल में  ब्राह्मण, क्षत्रि, वैश्य  और शूद्र चार वर्णों में  बांटा गया था और अछूत समाज को अवर्ण या अतिशूद्र के रूप में वर्ण से भी बाहर रखा गया था।

शूद्र और अति शुद्र समाज में जन्मे गुरुओं और महापुरुषों के हृदय विदारक अनवरत संघर्ष के बाद आजाद भारत में जब संविधान बनाने का अवसर दुनिया के महान विद्वान भारतरत्न बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर को प्राप्त हुआ तो उन्होंने पूरे भारतीय समाज को  एससी एसटी ओबीसी और सामान्य इन चार भागों में विभाजित किया और चूंकि एससी एसटी ओबीसी को हजारों वर्षों से उनके सभी मानवीय अधिकारों को छीन कर जानवर से भी बदतर, गुलाम की जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर के रखा गया था इसलिए बाबा साहेब ने उनके लिए उनके छीने गए सभी मानवीय अधिकारों को दिलाने की संविधान में विशेष व्यवस्था (आरक्षण/प्रतिनिधित्व/ भागीदारी) किया। लेकिन एससी एसटी और ओबीसी के लिए बाबा साहेब  का यह संवैधानिक प्रयास मनुवादियों को सहन नहीं हुआ और इसलिए संविधान लागू होने के बाद से ही ये इस संविधान की आलोचना करने लगे और संविधान में उल्लेखित व्यवस्था  के लागू होने देने में पग-पग पर रोड़े अटकाते रहे। यह “13 प्वाइंट रोस्टर” भी उनके इसी प्रयास का एक अहम हिस्सा है।

धमाल तब मचा जब सुप्रीम कोर्ट  ने अपने ही पूर्व फैसले के खिलाफ दाखिल अनुमति याचिका को खारिज करते हुए  विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की नियुक्ति में  “200 प्वाइंट रोस्टर” को खत्म करके 13 पॉइंट का रोस्टर जारी करने संबंधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पुनः कायम रख दिया। साथ ही साथ प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय को “इकाई (Unit)” न मानकर  “विषयवार विभाग” को ही नियुक्ति का इकाई बना दिया। इसका मतलब यह हुआ कि अब विषयवार विभाग स्तर पर ही प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला जाएगा।

वाराणसी, बनारस हिन्दू विवि

इस निर्णय के आने के बाद पहले तो जो एससी एसटी और ओबीसी समाज के बुद्धिजीवी हैं उनके बीच यह 13 पॉइंट रोस्टर चर्चा का विषय बना। इन बुद्धिजीवियों में देश के नामी सोसल एक्टिविस्ट और वरिष्ठ पत्रकार योगेंद्र यादव, दिलीप मंडल, उर्मिलेश, प्रो.रतन लाल, बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मा.वामन मेश्राम, प्रो. एम.पी. अहिरवार, प्रो. विवेक कुमार, JNU में सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष के  प्रतीक जयंत जिज्ञासु, जाकिर हुसैन कालेज के असिस्टेंट प्रो. लक्ष्मण यादव इत्यादि प्रमुख हैं।

13 प्वाइंट रोस्टर और इसके भयावह परिणाम

13 प्वाइंट का मतलब 01 से 13 तक का वर्टिकल ( ऊपर से नीचे) क्रमांक (1  2  3  4  5  6  7  8  9  10  11  12  13 ) है। बर्तमान संदर्भ में हम इसे पद- क्रमांक भी समझ सकते हैं। अब किस पद क्रमांक पर एससी एसटी  ओबीसी और सामान्य वर्ग में से  किस वर्ग का  प्रोफ़ेसर रखा या नियुक्त किया जाएगा इसका जो निर्धारण किया गया है उसको रोस्टर (सिस्टम/तरीका) कहते हैं।

तो इस 13 प्वाइंट रोस्टर में ऊपर से क्रमांक 1,2,3 सामान्य वर्ग के लिए, चौथा पद ओबीसी के लिए, फिर पांचवा-छठवां पद सामान्य वर्ग के लिए, सातवां पद अनुसूचित जाति के लिए, आठवां ओबीसी के लिए और फिर फिर नवां-दसवां और ग्यारहवां पद सामान्य के लिए, 12 वां पद ओबीसी के लिए और अंतिम 13 वां पद भी सामान्य वर्ग के लिए निर्धारित है। यानी 13 में 09 पद पर सामान्य, 03 पद पर ओबीसी, और 01 पद पर एससी वर्ग के लोग असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त किये जा सकते हैं,  जबकि एसटी वर्ग (आदिवासी) को इस 13 पॉइंट रोस्टर से ही गायब कर दिया गया है। इसका मतलब, अब एसटी वर्ग के लोगों को नौकरी नहीं मिलेगी । अभी केवल विश्वविद्यालयों में और भारी विरोध के बाद भी अगर यही रोस्टर रह जाता है तो बाद में किसी विभाग में किसी  भी नौकरी के लिए यही रोस्टर काम करेगा। चूंकि इस रोस्टर के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विभाग को ही नियुक्ति की इकाई माना है  इसलिए इस निर्णय के बाद कॉलेज /विश्वविद्यालय के अंतर्गत  अब किसी भी विभाग में जरूरत होने पर भी एक-दो या तीन से अधिक व्याख्याताओं के पदों के लिए जानबूझकर  विज्ञापन नहीं निकाला जाएगा। वैसे जरूरत भी नहीं पड़ेगी। और यह तीनों पद सामान्य श्रेणी के व्याख्याताओं की नियुक्ति के लिए ही निर्धारित हैं। इसलिए अब ओबीसी और एससी वर्ग के लोग  भी प्रोफेसर नियुक्त नहीं हो सकेंगे।

क्योंकि यदि विभाग में प्रोफेसर के 4 पदों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन होगा तब 13 प्वाइंट रोस्टर के मुताबिक एक ओबीसी और 7 का होगा तब एक पर एससी समाज का उम्मीदवार नियुक्त किया जाएगा। 200 पॉइंट के रोस्टर में 14 वां पद एसटी का, 15 वां एससी का और 16 वां पद ओबीसी का निर्धारित है और चूंकि यह तीनों पद आरक्षित वर्ग के लिए निर्धारित हैं, इसलिए ही लगता है, 16 प्वाइंट का  रोस्टर जानबूझकर नहीं बनाया गया होगा, क्योंकि 16 पॉइंट रोस्टर में 9 सामान्य वर्ग के असिस्टेंट प्रोफेसर होते तो सात आरक्षित वर्ग के भी  बन जाते जो इन्हें किसी भी हालत में मंजूर नहीं। इसलिये भी पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवि  इस 13 पॉइंट रोस्टर का विरोध कर रहे हैं।  चूंकि 200 पॉइंट का रोस्टर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है इसलिए मान लीजिए, जो संभव नहीं है,  अगर किसी विभाग में 26 स्वीकृत पदों पर प्रोफेसर की नियुक्ति होगी तो 13 के बाद फिर एक से नियूक्ति शुरू की जाएगी यानी किसी भी हालत में एसटी बिल्कुल ही गायब रहेगा और प्रत्येक 13 में 9 सामान्य वर्ग के प्रोफ़ेसर और कर्मचारी नियुक्त होते रहेंगे। और तब आपकी पीएचडी और डिलीट वगैरह की डिग्रियां धरी की धरी रह जाएंगी क्योंकि इस 13 पॉइंट रोस्टर ने आपके प्रोफेसर बनने के अधिकार को छीन लिया है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में  नामांकन भी इसी 13 पॉइंट रोस्टर के आधार पर होने लगेगा। फिर आप नामांकन के लिए भी दौड़ लगाते रहेंगे लेकिन होगा नहीं।

एससी एसटी और ओबीसी समाज के आरक्षण संबंधी संवैधानिक अधिकार पर मनुवादियों के इतने बड़े हमले के बाद भी देश के इस्टैबलिश्ड राजनीतिक लीडरों  में एकमात्र भारत के नेलसन मंडेला पुत्र और बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता पूर्व उपमुख्यमंत्री माननीय तेजस्वी प्रसाद यादव ने इस 13 पॉइंट रोस्टर को  गंभीरता से लिया और इसका  मुस्तैदी  से विरोध भी किया। बाकी लोगों ने या तो इस 13 प्वाइंट रोस्टर को समझा नहीं और समझा भी  तो डर और लालच के कारण मात्र खाना पूरी करके मौन हो गए। लेकिन राजद नेता तेजस्वी यादव ने पीएम पर हमला बोलते हुए यहां तक कहा कि, “इस फैसले से लंबी लड़ाई के बाद हासिल आरक्षण की नृशंस हत्या हुई है। प्रधानमंत्री की रहनुमाई में सामाजिक न्याय को कुचला जा रहा है।” वहीं जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर गंगा सहाय मीणा कहते हैं, “एससी एसटी एक्ट से भी ज्यादा ‘अहम’ रोस्टर का मसला है।”

मेरा तो मानना है  मनुवादी मानव कृत यह  13 पॉइंट रोस्टर पचासी फ़ीसदी पिछड़ों के लिए कैंसर से भी अधिक खतरनाक है। क्योंकि कैंसर केवल उसे  खत्म करता है जिसे यह हो जाता है लेकिन यह 13 प्वाइंट रोस्टर पीढ़ी-दर-पीढ़ी को जानवर बना-बनाकर गुलाम बनाती जाएगी और लोगों को इसका अहसास भी नहीं होगा। इसलिए  समय बर्बाद किए बिना इस 13 पॉइंट रोस्टर को खत्म करा देना ही आने वाली पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लिए हितकर होगा।

यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी समझता हूं कि इस दौरान  शायद 13 प्वाइंट रोस्टर के इसी गंभीर परिणाम को समझते हुए  तेजस्वी यादव  यहां तक कहते हैं कि, ” हमें चुनाव में एक भी सीट नहीं मिले तो भी  कोई गम नहीं,  हम गोली भी खा लें तो भी कोई गम नहीं, लेकिन समाज की हिस्सेदारी को पाने के लिए हम अंतिम दम तक संघर्ष करते रहेंगे, क्योंकि यह 13 पॉइंट रोस्टर हमारी पीढ़ियों को बर्बाद कर देने वाला रोस्टर है।” इस 13 पॉइंट रोस्टर का एससी एसटी ओबीसी समाज के प्रबुद्ध लोगों द्वारा विरोध क्यों किया जा रहा है? खासकर 85 फीसदी पिछड़े लोगों को इसे समझना बहुत जरूरी है।

संविधान के अनु. 15 (4) और 16 (4) में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से एससी, एसटी और ओबीसी समाज के लोगों के नौकरी में समुचित प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 340 में भी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े  ओबीसी समाज  की पहचान कर उनके लिए प्रतिनिधित्व वगैरह की व्यवस्था  करने की बात कही गई है। लेकिन एक  या एक से अधिक पदों पर नियुक्ति के लिए किस वर्ग को किस क्रम पर रखा जाएगा इसका निर्धारण करने के लिए ही बनाई गई व्यवस्था का नाम रोस्टर है।

ओबीसी को आरक्षण मिलने से पहले एससी और एसटी वर्ग के लोगों की नियुक्ति के लिए  40 और 100 प्वाइंट का रोस्टर बनाया गया था। मंडल कमिशन लागू होने के बाद वर्ष 1992 में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के फैसला से जब 52 फ़ीसदी पिछड़ों को 27 फ़ीसदी आरक्षण प्राप्त हुआ तो उसके आलोक में नए ढंग से रोस्टर बनाने की आवश्यकता भी पड़ी। भारत सरकार के डीओपीटी मंत्रालय के निर्देश पर यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन) द्वारा जेएनयू के  एक प्रोफेसर राव साहब  काले की अध्यक्षता में रोस्टर की खामियों को दूर करने के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई, जिसमें एक कानूनविद जोश वर्गीज और दूसरे यूजीसी के तत्कालीन सचिव  डॉ आर के चौहान सदस्य थे।

200 प्वाइंट का ही रोस्टर क्यों ? 

काले कमेटी ने आर.के. सभरवाल बनाम स्टेट ऑफ़ पंजाब के मामले में वर्ष 1995 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच के फैसले  में दिए गए दिशा निर्देश के आलोक में  यूजीसी द्वारा निर्गत 2 जुलाई 1997 के दिशानिर्देशों के मद्देनजर जांच परख के बाद विश्वविद्यालय स्तर पर नियुक्तियों के लिए 200 पॉइंट का रोस्टर जारी करने की सिफारिश किया ताकि सभी वर्गों को आबादी के हिसाब से यानी एससी को 15% ,एसटी को 7.5 %, ओबीसी को 27% और सामान्य वर्ग को 50.5 % की भागीदारी प्राप्त हो जाए। कमेटी का कहना था कि 100 पॉइंट का रोस्टर रहने पर आदिवासी यानी एसटी समाज की आबादी 7.50 फ़ीसदी है तो 100 व्याख्याताओं की नियुक्ति में  एसटी की 7.50 फ़ीसदी आबादी / आरक्षण के हिसाब से  7 या 8 पदों पर ही इस वर्ग की नियुक्ति की जा सकेगी। चूंकि आदमी को तो आधा किया नहीं जा सकता। अब अगर 100 पदों में से  7 पदों पर एसटी की नियुक्ति की जाती है तो एसटी  को आधा का नुकसान हो रहा है और 8 पदों पर की जाती है तो अन्य की हिस्सेदारी कम हो जाती है। उसी तरह  सामान्य वर्ग के लिए  जो 50 पॉइंट 5%  सीट निर्धारित है  तो फिर  उसे भी  50  या  51  सीटों पर नियुक्ति करनी होगी  तो यहां भी किसी न किसी वर्ग   के साथ अन्याय होगा।

इसलिए कमेटी ने 200 पॉइंट का रोस्टर बनाया और कहा कि 200 के रोस्टर में एसटी को 7.50 ×2= 15, एससी को 15× 2=30, ओबीसी को 27×2= 54 और सामान्य वर्ग को 50.5×2=101 के गणितीय हिसाब से पदों पर नियुक्ति की जा सकेगी, जिसमें किसी की कोई हिस्सेमारी नहीं होगी। आबादी एवं वर्तमान आरक्षण के इसी प्रतिशत सूत्र के आधार पर प्रो. काले कमिटी ने सभी वर्गों की नियुक्ति के लिए 200 पॉइंट का रोस्टर बनाया और  इसे लागू करने की सिफारिश किया जो बिल्कुल ही वैज्ञानिक, तार्किक और न्यायिक है तथा इससे किसी भी वर्ग की  हिस्सेदारी का कोई नुकसान नहीं है।

विश्वविद्यालय/कॉलेज ही इकाई क्यों?

प्रो. काले कमेटी ने एक और सिफारिश किया, वह यह की विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तीन कटेगरी के शिक्षक हैं। (1). प्रोफेसर  (2). एसोसिएट प्रोफेसर और (3).असिस्टेंट प्रोफेसर। इनकी सेलरी और  सेवा शर्त एक है। इनके तीन स्तरीय कैडर बनाने के साथ-साथ  विश्वविद्यालय / कॉलेजों को ही इनकी नियुक्ति की इकाई होने की भी अनुसंशा किया। सभी वर्गों को समुचित प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए इससे बेहतर दूसरा कोई उपाय भी नहीं दिखता। जेएनयू में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम के चेयरपर्सन प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं कि, ” सरकार विश्वविद्यालय को इकाई मानकर “अनुदान” देती है और ‘आरक्षण’ विभाग को इकाई मान कर देने की बात की जा रही है, यह तो अपने आप में विरोधाभास है।” जेएनयू की शोध छात्रा कनकलता जादव ने तो एक बड़ा ही अहम सवाल पूछकर 13 प्वाइंट रोस्टर समर्थकों के गाल पर तमाचा जड़ दिया  कि विभाग को नियुक्ति की इकाई मानने के कितने साल बाद एसटी एससी ओबीसी का नंबर आएगा?

शार्टफाल और  बैकलॉग 

प्रोफेसर काले कमेटी ने पाया कि बहुत से ऐसे कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं जहां आरक्षण तो लागू हो गया है लेकिन असिस्टेंट प्रोफेसरों की आरक्षित सीटों को भी सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से ही भर दिया गया है  तो संबंधित कॉलेजों / विश्वविद्यालयों में रोस्टर के मुताबिक जितनी आरक्षित  सीटों पर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की नियुक्ति कर दी गई है या खाली रखी गयी है  तो  कमेटी ने पहले उतनी सीटों को शार्टफॉल या बैकलॉग मानकर नई नियुक्ति में  उन सीटों को संबंधित आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों से भरने की और फिर बाद की नई नियुक्ति के लिए 200 पॉइंट रोस्टर के साथ भरने की अनुशंसा किया ताकि सभी वर्गों  का बैलेंस/ प्रतिनिधित्व मेंटेन रहे। मतलब साफ है कि जब तक आरक्षित वर्गों का पुराना बैकलॉग पूरी तरह से भर नहीं जाता तब तक किसी नए पद पर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन नहीं निकाला जाएगा।

जैसे मान लिया जाए  कि किसी विश्वविद्यालय में वर्ष 2006 से आरक्षण लागू है लेकिन उस विश्वविद्यालय में किसी भी एससी, एसटी और ओबीसी  के प्रोफेसर की बहाली किए बिना ही  56 पदों पर  सामान्य वर्ग के असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली  कर दी गई है तो कानूनन  चाहिए तो यह  कि हड़पी हुई 27 आरक्षित सीटों पर कार्यरत सामान्य वर्ग के  व्याख्याताओं को हटाकर 200 प्वाइंट रोस्टर के  मुताबिक ओबीसी के 15, एससी के 08 और एसटी के 04 व्याख्याताओं की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकालकर इन आरक्षित वर्गों  के व्याख्याताओं की नियुक्ति कर दी जाय।

 लेकिन व्यवहारतः ऐसा करना न उचित होगा न मानवीय ही। इसलिए प्रो. काले कमेटी की  सिफारिश के अनुसार जब आगे उस विश्वविद्यालय में  नए असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति करनी होगी तो पहले  200 प्वाइंट के रोस्टर के अनुसार उनकी आरक्षित कोटे की सीटें भर ली जाएंगी  और उसके बाद फिर आगे  रोस्टर अनुसार सभी वर्गों की नियुक्ति की जाएगी। लेकिन मनुवादियों द्वारा  इस नियम को भी नहीं मानकर एक दूसरा अमानवीय और असंवैधानिक नया नियम बना दिया गया कि पहले से जिन आरक्षित पदों पर जो असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत हैं यदि वह पद उनके रिटायरमेंट के बाद खाली होती है तो उन सीटों पर आरक्षित वर्ग के असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली की जाएगी। नई बहाली में उसकी क्षती पूर्ति  नहीं की जाएगी, लेकिन ऐसा कर देने से आरक्षण/प्रतिनिधित्व का जो महत्व और उद्देश्य है वह खत्म हो जाता है क्योंकि फिर तो वर्गों की नियुक्ति का बैलेंस/प्रतिनिधित्व कभी मेंटेन ही नहीं होगा। कई पीढ़ी गुजर जाएगी तो भी नहीं।

वर्तमान स्थिति

प्रोफेसर काले कमिटी की सिफारिश के आलोक में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग  (यू जी सी) ने नोटिफिकेशन निकाला तो इसके खिलाफ BHU के विवेकानंद तिवारी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की  और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च  2017 में 200 पॉइंट के रोस्टर को खारिज करते हुए  विश्वविद्यालय/ कॉलेज को नियुक्ति की इकाई की जगह 13 प्वाइंट रोस्टर के साथ विभाग को नियुक्ति की इकाई मानकर प्रोफेसरों की नियुक्ति का निर्णय दे दिया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी कायम रख दिया। इस निर्णय के खिलाफ एससी, एसटी और ओबीसी के भारी दबाव पर बीजेपी सरकार SLP लेकर सुप्रीम कोर्ट गयी तो जरूर लेकिन, जैसा कहा जा रहा है, लेकिन  सरकार द्वारा सही ढंग से सबूत के साथ पक्ष नहीं रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय को  पुनः कायम रख दिया तो आपने देखा प्रबुद्ध पिछड़ों का आक्रोश सड़क पर आ गया। यहां यह कहने में मुझे तनिक भी हिचक नहीं है कि जब 1775 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने शायद भारत में पहली दफे किसी नंदकुमार देव् नामक एक ब्राह्मण को फांसी की सज़ा देकर फांसी पर लटका दिया तो तब इसका बहुत विरोध हुआ था और विरोध का एक प्रमुख कारण यह भी था कि इस मामले में जज, जूरी और सरकारी वकील सभी के सभी अंग्रेज ही थे। तो इस मामले में भी यह बात उजागर हुई है कि सभी पक्ष,  विपक्ष, सरकारी वकील सहित जज भी एक ही  जाति के थे।

यहां हम सब को यह समझना भी जरूरी है कि उधर इलाहाबाद हाई कोर्ट के  2 जजों का फैसला आया और इधर विश्वविद्यालयों में नए नियम के अनुसार यूजीसी ने रोस्टर बनाकर प्रोफेसरों की बहाली की प्रक्रिया प्रारंभ करने का निर्देश जारी कर दिया और आपको ताज्जुब होगा कि BHU सहित 11 विश्वविद्यालयों में जैसे लूट मची हो, ताबड़तोड़ 700 व्याख्याताओं की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला दिया  गया जिसमें एसटी के लिए एक भी पद नहीं , एससी के लिए मात्र 18 और ओबीसी के लिए मात्र 57 सीटें निर्धारित की गयीं थी। और हरियाणा के एक विश्वविद्यालय ने तो 11 जनवरी को कुल 22 विभागों में प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला लेकिन उसमें आरक्षित वर्गों के लिए कोई पद निर्धारित नहीं थे। इससे इनके मन में, चाहे कितने भी ऊंचे पद पर ये बिराजमान क्यों न हों, आज भी आरक्षित वर्गों के प्रति नफरत का जो भाव है, उसे  समझा जा सकता है।

द्वापर और त्रेता युग में तो आम जनता के लिए कोई संविधान नहीं था तो शंबूक की गर्दन कटती थी और एकलव्य का अंगूठा भी कटता था। लेकिन आज भारत में जब विश्वरत्न बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर का भारतीय संविधान मौजूद है तो अब इस 13 पॉइंट रोस्टर से रोज-रोज शंबुकों की गर्दन और एकलव्यों का अंगूठा भी कटता रहेगा। क्योंकि यह रोस्टर दिखाने के लिए 13 प्वाइंट का है असल में यह 03 प्वाइंट रोस्टर है। इसलिए संक्षेप में यह कहना बेहतर होगा कि यह 13 पॉइंट रोस्टर एससी एसटी और ओबीसी समाज के लिए मनुवादी हुकूमत द्वारा निर्गत 85 फीसदी पिछड़ों को जानवर बनाकर गुलाम बनाये रखने का वारंट है, कहिये इनके मौत का वारंट है। यदि चुप रह गए तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलाम बनी रहेगी और संघर्ष करके जीत लिया तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी राज करेगी।

  • लेखकः एडवोकेट गणपति मंडल, संपर्कः 9304080117

बसपा ने प्रत्याशियों के लिए जारी किया नया निर्देश

लखनऊ। 2019 की तैयारियों में व्यस्त बहुजन समाज पार्टी ने अपने नेताओं के लिए एक नया फरमान जारी किया है. पार्टी ने अपने फरमान में कहा है कि बसपा का कोई भी प्रत्याशी या नेता होर्डिंग्स या बैनर में पार्टी अध्यक्ष मायावती के बराबर फोटो नहीं लगा सकेगा. पार्टी की ओर से जारी निर्देश में यह भी कहा गया है कि बसपा के किसी भी प्रत्याशी या नेता को अब होर्डिंग लगाने से पहले उसे बसपा प्रभारियों को दिखाना होगा और उनकी सहमति लेनी होगी.

पार्टी अध्यक्ष सुश्री मायावती के निर्देश पर मंगलवार को प्रदेश के सभी मंडलों में नवनियुक्त मंडल-जोन इंचार्जों ने एक बैठक कर पार्टी अध्यक्ष का यह नया आदेश सबको सुना दिया. दरअसल ऐसा पार्टी से जुड़े नए नेताओं को पार्टी के निर्देश बताने के तहत किया गया है.

पार्टी के पुराने नेताओं को तो बसपा के नियम कानून और होर्डिंग-बैनर लगाने का तौर-तरीका पता है, लेकिन चुनाव के मौके पर तमाम जगह समर्थक और पार्टी में आए नए नेता अपने हिसाब से होर्डिंग्स में महापुरुषों और बसपा अध्यक्ष के बराबर या उनसे भी बड़ी अपनी फोटो लगा देते हैं, जिनको समझाने के लिए यह बैठक आयोजित किया गया था. इस बैठक में यह भी तय किया गया कि कोई भी नेता पार्टी की मुखिया मायावती के सामने उनके बराबर या बड़ी फोटो नहीं लगा सकेगा. पार्टी का साफ निर्देश है कि पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के सामने सिर्फ पार्टी संस्थापक मान्यवर कांशीराम या फिर पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की तस्वीर ही लगाई जा सकती है.

पार्टी की ओर से जारी दिशा-निर्देश में कहा गया कि बैनर-होर्डिंग्स के ऊपरी हिस्से पर महापुरुषों की फोटो लगेगी और नीचे की तरफ होर्डिंग्स लगवाने वाले की तस्वीर होगी. दरअसल चुनाव के दौरान होर्डिंग्स की अपनी राजनीति होती है. चुनाव के मौके पर तमाम छुटभैये नेता या प्रत्याशी खुद को पार्टी के शीर्ष नेताओं से अपनी करीबी दिखाने के लिए उनकी फोटो के साथ बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स लगा कर उसे प्रचारित करते हैं. कार्यकर्ताओं को इन बैनर और होर्डिंग्स से भ्रम न हो, इसलिए बसपा ने इस तरह का निर्देश जारी कर दिया है. साथ ही बहुजन समाज के महापुरुषों की तस्वीर सबसे ऊपर रखने का निर्देश जारी कर बसपा ने साफ कर दिया है कि भले ही उसके टिकट पर कोई भी चुनाव लड़े बहुजन समाज के महापुरुषों का सम्मान पार्टी में सबसे ऊपर है.

जानिए धोनी और रोहित ने कैसे जीती हारी हुई बाजी

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरे वनडे में शतकीय पारी खेलने वाले भारतीय कप्तान विराट कोहली ने कहा कि वह 46वें ओवर में विजय शंकर को गेंद सौंपना चाहते थे, लेकिन पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और उपकप्तान रोहित शर्मा ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. ‘मैन ऑफ द मैचकोहली ने 120 गेंदों में 116 रनों की पारी खेली, जबकि डेथ ओवरों में भारतीय गेंदबाजों ने शानदर प्रदर्शन किया. भारत ने यह मैच आठ रनों से जीता. विजय शंकर अंतिम ओवर की पहली तीन गेंदों पर दो विकेट चटकाए.

कोहली ने मैच के बाद कहा, ‘मैं ऑस्ट्रेलिया की बल्लेबाजी के दौरान 46वां ओवर शंकर को देने के बारे में सोच रहा था, लेकिन धोनी और रोहित ने मुझे जसप्रीत बुमराह और मोहम्मद शमी के साथ गेंदबाजी जारी रखने की सलाह दी. उनका सोचना था कि अगर हम कुछ विकेट निकाल लेते है तो मैच में बने रहेंगे और ऐसा ही हुआ. बुमराह ने स्टंप्स की सीध में गेंदबाजी की और यह काम आया. रोहित से सलाह लेना हमेशा अच्छा रहता है वह टीम का उपकप्तान है और धोनी लंबे समय से यह काम करते आ रहे हैं.’

गौरतलब है कि 46वें ओवर में बुमराह ने दो विकेट निकाले. उन्होंने ओवर के दूसरी गेंद पर नाथन कूल्टर नाइल (4) और चौथी गेंद पर पैट कमिंस (0) को क्रमश: बोल्ड और विकेट के पीछे धोनी के हाथों कैच कराया और ऑस्ट्रेलिया का स्कोर बदलकर 223/8 हो गया.

भारतीय कप्तान ने आखिरी के ओवरों में शानदार गेंदबाजी के दम पर मैच में टीम की वापसी करने वाले बुमराह की तारीफ की. उन्होंने कहा, ‘बुमराह चैम्पियन गेंदबाज है. एक ओवर में दो विकेट लेकर उसने मैच का रुख हमारे तरफ मोड़ दिया. ऐसे मैचों से आपको काफी आत्मविश्वास मिलता है. विश्व कप में भी हमें ऐसे कम स्कोर वाले मैच मिल सकते है. यह पिच केदार जाधव की गेंदबाजी के लिए सटीक थी. वह आखिरी ओवर में भी गेंदबाजी करना चाहता है.’

वनडे क्रिकेट में 40वां शतक लगाने वाले कोहली ने कहा, ‘यह सिर्फ संख्या है. लेकिन जब आप मैच जीतते हैं, तो अच्छा लगता है. जब मैं बल्लेबाजी के लिए उतरा तो हालात मुश्किल थे. मेरे पास पूरी पारी में बल्लेबाजी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. मुझे टीम की गेंदबाजी से ज्यादा खुशी मिली है.’

ऑस्ट्रेलिया के कप्तान एरॉन फिंच ने मार्कस स्टोइनिस कि तारीफ करते हुए कहा कि यह ऐसा मैच था जिसे टीम आखिर तक ले जाना चाहती थी. उन्होंने कहा, ‘यह ऐसा मैच था जिसे हम आखिर तक ले जाना चाहते थे और उम्मीद कर रहे थे कि जीत दर्ज करे. मार्कस स्टोइनिस ने शानदार पारी खेली. मैच में पूरे दिन उतारचढ़ाव होता रहा. मैच का लय एक समय हमारे पक्ष में था, लेकिन हमने इसे खो दिया.’

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Total Dhamaal का जलवा अब तक कायम, कर गई इतनी कमाई

नई दिल्ली: टोटल धमाल से बॉक्स ऑफिस पर लगातार जलवा कायम रखने वाले अजय देवगन, अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित  की तिकड़ी अभी भी खूब धमाल मचा रही है. दूसरे हफ्ते भी धांसू कमाई करते हुए करीब 30 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर चुकी है. हालांकि कुल कमाई करीब 130 करोड़ के पास पहुंच गई हैं. ‘टोटल धमालको टक्कर देने के लिए इस हफ्ते कार्तिक आर्यन (Kartik Aaryan) और कृति सेनन की फिल्म लुका छुपीसिनेमा घर में रिलीज हुई है. हालांकि इस पर कोई फर्क देखने को नहीं मिला. ट्रेड एनलिस्ट तरण आदर्श ने अपने ट्वीट के जरिए जानकारी दी थी कि मंगलवार तक फिल्म आसानी से 125 करोड़ कमा लेगी.

टोटल धमालका बॉक्स ऑफिस को लेकर तरण आदर्श ने आगे बताया कि दूसरे हफ्ते शुक्रवार को  4.75 करोड़, शनिवार को 7.02 करोड़, रविवार को 11.45 करोड़ और सोमवार को 6.03 करोड़ कमा लिए हैं. रोजाना के आंकड़े के मुताबिक फिल्म ने मंगलवार की करीब 5 से 6 करोड़ के बीच का कलेक्शन कर सकती है. हालांकि अजय देवगन की फिल्म टोटल धमालकी निगाहें 150 करोड़ की तरफ है. देखना होगा कि यह आंकड़ा कब तक छू पाती है. खराब रिव्यू के बावजूद कॉमेडी फिल्म टोटल धमालकी बॉक्स ऑफिस पर रफ्तार थम ही नहीं रही है.

अनिल कपूर, अजय देवगन और माधुरी दीक्षित स्टारर टोटल धमालबॉक्स ऑफिस पर आगे बढ़ रही है. महाशिवरात्रि की छुट्टी की फायदा फिल्म को मिला. ‘टोटल धमालका बजट लगभग 100 करोड़ रुपये बताया जाता है, इस तरह फिल्म ने अच्छा बिजनेस कर लिया है, फिल्म के ओवरसीज बिजनेस को लेकर भी अच्छी खबर आ रही है.

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अमेरिका ने दिया पाकिस्तान को बड़ा झटका

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नई दिल्ली। अमेरिका ने पाकिस्तान को एक बड़ा झटका दिया है. पाकिस्तानी नागरिकों को मिलने वाले वीजा की अवधि को अमेरिका ने घटा दिया है. दरअसल, अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता के हवाले से बताया गया है कि अमेरिका ने पाकिस्तानी नागरिकों के लिए वीजा की अवधि पांच साल से घटाकर तीन महीने कर दिया है. यह जानकारी एआरवाई न्यूज ने अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता के हवाले से दी है. बता दें कि वैश्विक मंच पर आतंकवाद को लेकर आलोचनाओं का सामना कर रहे पाकिस्तान के लिए यह किसी दोहरे झटके से कम नहीं है.

आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान वैश्विक तौर पर अलग-थलक पड़ता नजर आ रहा है. यही वजह है कि आतंकवाद को पनाह देने वाले पाकिस्‍तान को एक बार फिर से झटका लगा है. अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने फैसला किया है कि वह पाकिस्‍तान के नागरिकों को तीन महीने से ज्‍यादा का वीजा नहीं देगी. बता दें कि इससे पहले तक पाकिस्‍तान के नागरिकों को अमेरिका की ओर से पांच साल तक का वीजा दिया जाता था.

image source- The Daily Star

गौरतलब है कि इससे पहले आतंकवाद को लेकर भी पाकिस्तान को अमेरिका ने खरी-खोटी सुनाई थी और पाक की सरजमीं पर आतंकवाद को पनाह न देने के चेतावनी दी थी. अमेरिका ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान की सरजमीं पर हुए एयर स्ट्राइक पर भी भारत का साथ दिया था और जैश के आंतकी कैंप पर भारतीय वायुसेना की कार्रवाई को जायज ठहराया था.

साभार- एनडीटीवी

मोदी सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ देश भर में सड़कों पर उतरे बहुजन

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बिहार के भागलपुर में भारत बंद के दौरान सड़क पर उतरे बहुजन
नई दिल्ली/पटना/लखनऊ। 13 प्वाइंट रोस्टर और आदिवासी समाज को उनकी जमीन से बेदखल करने के खिलाफ देश के दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज ने आज 5 मार्च को देश भर में व्यापक तौर पर भारत बंद का आयोजन किया है. अपने हक के लिए देश के तमाम हिस्सों में वंचित समाज का जागरुक तबका सड़कों पर है.

बिहार भी सुलग रहा है. राज्य के पटना, नवादा, भागलपुर,बांका, मधुबनी और खगड़िया आदि जिलों में बंद और रेल रोकने की खबर है. तो झारखंड में भी बराबर आग लगी है. राज्य के धनबाद और रांची सहित तमाम जिलों से व्यापक बंद की खबरे हैं.

नवादा, बिहार

तो सत्ता के केंद्र दिल्ली में जंतर मंतर पर भी बहुजन आंदोलनकारी भारी संख्या में जुटे हैं. इसमें 13 प्वाइंट रोस्टर के विरोध सहित आदिवासी समाज के लोग भी बहुत संख्या में हैं, जो सरकार द्वारा जमीन से बेदखली का विरोध कर रहे हैं.

झारखंड

ऐसे ही उत्तर प्रदेश के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षक गुस्से में हैं. इसके अलावा राजस्थान के जयपुर में भी बंद का खासा असर है.

वाराणसी, बनारस हिन्दू विवि

आंदोलन की यह चिंगारी दक्षिण के राज्यों में भी पहुंच गई है. दक्षिण के कटक और ओडिसा सहित तमाम जगहों पर दलित, आदिवासी और ओबीसी समाज के लोगों ने सड़क पर उतर कर सरकार की दमनकारी नीति के खिलाफ विरोध दर्ज करवा रहे हैं.

कुल मिलाकर वंचित समाज के गुस्से का आलम यह है कि आंदोलन की यह आग सत्ताधारी दल को जलाने के लिए तैयार है. उन्होंने साफ कह दिया है कि जब तक उनकी मांगों को पूरा नहीं कर दिया जाता, आंदोलन जारी रहेगा.

वंचित बहुजन नौकरियों,खासकर निजीक्षेत्र में आरक्षण की सीमाबद्धता को समझें!

सवर्ण आरक्षण से पनपा : संख्यानुपात में आरक्षण का जज्बा !  गत 7 जनवरी को जब यह तय हो गया कि मोदी सरकार गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का विधेयक लोकसभा और राज्य सभा में न सिर्फ लाएगी, बल्कि उसे पारित भी करा लेगी, तब बहुजन बुद्धिजीवियों में भारी निराशा की लहर दौड़ गयी. कारण जिन सवर्णों का राज-सत्ता, ज्ञान-सत्ता और धर्म-सत्ता के साथ ही अर्थ-सत्ता पर भी 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा हो, उस सवर्ण वर्ग के आठ लाख आय वालों को गरीब मानते हुए आरक्षण सुलभ कराना संविधान और सामाजिक न्याय की अवधारणा का खुला मजाक था. किन्तु आरक्षण के मामले में मोदी सरकार द्वारा उलटी गंगा बहाने के प्रयास में भी बहुजन बुद्धिजीवियों को कुछेक सकारात्मक बात नजर आई. इनमें कईयों को इस बात को लेकर ख़ुशी हुई कि इससे आरक्षण का विरोध बंद हो जायेगा तथा ये दूसरों को ‘सरकारी दामाद’ या ‘कोटे वाला/वाली’ कहना बंद कर देंगे. लेकिन इस बात को लेकर ख़ुशी मनाने वालों की सख्या ज्यादे थी कि इससे आरक्षण की 50 प्रतिशत वाली सीमा टूट जाएगी तथा इसका दायरा 100 प्रतिशत तक फ़ैल जायेगा एवं संख्यानुपात में आरक्षण का मुद्दा चल निकलेगा. बहुजन बुद्धिजीवियों का यह अनुमान सही निकला और 7 जनवरी को सोशल मीडिया पर उभरा धीरे-धीरे उभरा ‘जिसका जितनी संख्या भारी –उसकी उतनी भागीदारी’ का नारा 9 जनवरी की रात सवर्ण आरक्षण बिल पास होते ही सैलाब में बदल गया. यूँ तो सवर्ण आरक्षण के विरुद्ध जिसकी जितनी संख्या भारी के रूप में अपनी भावना का प्रकटीकरण करने के लिए तो सबसे पहले सामने आये बहुजन बुद्धिजीवी, किन्तु थोड़े ही अन्तराल में पक्ष-विपक्ष के बहुजन नेता भी होड़ में उतर आये. राजद के तेजस्वी यादव ने उसी दिन आरक्षण का दायरा बढ़ाने के लिए ट्विट कर कहा कि दलित-पिछड़ों को को 90 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए.सत्ता पक्ष की अनुप्रिया पटेल ने 8 जनवरी को घोषणा किया कि जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी भागीदारी के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए. अनुप्रिया पटेल की तरह सपा के तेज तर्रार नेता धर्मेन्द्र यादव ने जाति जनगणना की मांग उठाते हुए सुझाव दिया कि,’आरक्षण व्यवस्था सौ फीसदी होनी चाहिए, जो सभी जातियों के बीच उनके अनुपात में बाँट दिया जाय. इससे आरक्षण को लेकर उठने वाला विवाद ही ख़त्म हो जायेगा.’उन्हीं की तरह ही राजद के जय प्रकाश यादव ने कहा कि, ‘अब दलित –पिछड़ों को 85 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए. अब वे 50 प्रतिशत से संतुष्ट नहीं रहने वाले हैं.’ आरक्षण बढाने की इसी होड़ में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घोषणा किया कि,’हम सत्ता में आये तो हिन्दू समाज के एससी,एसटी,ओबीसी को 85 प्रतिशत आरक्षण देंगे.’ बहरहाल चुनाव को ध्यान में रखकर आनन-फानन में 9 जनवरी को संसद में पारित सवर्ण आरक्षण पर जब राष्ट्रपति ने 12 जनवरी को अपने हस्ताक्षर की मोहर लगा दिया, तब ऐसा लगा सामाजिक न्यायवादी दल तमाम क्षेत्रों में संख्यानुपात में आरक्षण के लिए सड़कों पर उतर पड़ेंगे. लेकिन वैसा नहीं हुआ. पर, 22 जनवरी को जब सुप्रीम कोर्ट ने विभागवार आरक्षण का रास्ता साफ़ कर दिया, तब जाकर सख्यानुपात में आरक्षण का मामला गरमाया.लेकिन कितना!

विभागवार आरक्षण :मानव जाति के इतिहास के सबसे बेरहम फैसलों में से एक!

13 पॉइंट रोस्टर के द्वारा लागू होने वाला था विभागवार आरक्षण मानव जाति के इतिहास के सबसे बेरहम फैसलों में से एक था, जो चरम सवर्णवादी सरकार की मंशा को ध्यान में रखते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने दिया था. यह चरम अमानवीय इसलिए था क्योंकि इसके जरिये भारत के उस जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग को अवसरों पर पहला हक़ सुनिश्चित करवाने का बलिष्ठ्तम प्रयास हुआ था, जिसका हजारों साल पूर्व की भांति आज भी राज-सत्ता,धर्म-सत्ता और अर्थ-सत्ता के साथ ज्ञान – सत्ता पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा है. इसके जरिये एससी/एसटी,ओबीसी से युक्त उन जन्मजात वंचित वर्गों को अवसरों से दूर धकेलने का अभूतपुर्व प्रयास हुआ था, जो आरक्षण के सहारे अभी-अभी राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने की प्रक्रिया में शामिल हुए थे. चूँकि भारत का इतिहास आरक्षण पर संघर्ष का इतिहास है, इसलिए सवर्ण आरक्षण के अल्प अंतराल के बाद ही शासक वर्ग द्वारा जिस तरह विभागवार आरक्षण के जरिये बहुजनों के आरक्षण की ताबूत में अंतिम कीलें ठोंकने का कुत्सित प्रयास हुआ, उसके बाद चप्पे-चप्पे पर आरक्षण की मांग उठाते हुए आरक्षण पर संघर्ष को शिखर पर पहुंचा देना चाहिए था, जो नहीं हुआ.

कितना सीमित है:आर-पार की लड़ाई का मुद्दा !

इसमें कोई शक नहीं कि विभागवार आरक्षण के बाद बहुजन छात्र और गुरुजन जिस तरह सडकों पर उतरे ,उससे हताश-निराश बहुजनों में उम्मीद का संचार हुआ, किन्तु इनकी मांगो से भारी निराशा हुई. ये विभागवार आरक्षण के खिलाफ आर-पार की लड़ाई के लिए सडकों पर उतरे थे, किन्तु जो मांग उठाया, वह काफी हद तक कारुणिक रही.यूँ तो 23 जनवरी से ही विभागवार आरक्षण के खिलाफ उनका छिट-फुट विरोध शुरू हो गया था, किन्तु 31 जनवरी,2019 से ही यह प्रभावी रूप में सामने आया. 31 जनवरी के बाद से ही वे विभागवार आरक्षण के खिलाफ आंदोलित हैं. इस सिलसिले वे पांच मार्च को भारत बंद के जरिये अपने आन्दोलन को शिखर पर पहुंचाने जा रहे हैं. बहरहाल 31 जनवरी से लेकर पांच मार्च तक यदि उनकी मांगो पर गौर किया जाय तो बिलकुल ही नहीं लगेगा ये आर-पार की लड़ाई में जुटे हैं: नजर आयेगा बहुत ही सीमित मुद्दों को लेकर लड़ रहे हैं. यदि इनकी लड़ाई के कॉमन एजंडे पर ध्यान दिया जाय तो दिखेगा कि प्रायः सभी के एजंडे में 13 पॉइंट रोस्टर की जगह 200 पॉइंट रोस्टर लागू करना , जाति आधार जनगणना कराना, निजीक्षेत्र और न्यायपालिका में एससी/एसटी/ओबीसी को मिले: मोटामोटी यही मांगे शामिल हैं.इस मामले में ‘आरक्षण बढ़ाने’ की लड़ाई लड़ रहे तेजस्वी यादव,जो बहुजनों की नयी आशा और आकांक्षा के रूप में उभर रहे हैं, का राजद भी अपवाद नहीं है. यदि इन मांगो को यदि कोई आरक्षण बढाने की लड़ाई के लिहाज से ध्यान से देखे तो दिखेगा कि बहुजन छात्र और गुरुजन सरकारी नौकरियों से आगे बढ़कर निजी क्षेत्र और न्यायपालिका तक आरक्षण के विस्तार में ही समाज की मुक्ति तथा सवर्ण और विभागवार आरक्षण का प्रतिकार देख रहे हैं.अगर ऐसा है तो मानना पड़ेगा वंचित वर्ग आरक्षण की लड़ाई में अभी भी प्रायः दो दशक पीछे चल रहा है: उसने भोपाल घोषणापत्र से कोई खास सबक नहीं लिया.

डॉ. आंबेडकर की ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ के बाद बहुजनों को मुक्ति की सर्वोत्तम रचना: चंद्रभान प्रसाद का ‘भोपाल दस्तावेज और घोषणापत्र’ !

स्मरण रहे नवउदारवादी अर्थनीति के जरिये निजीकरण, उदारीकरण क गंगा बहाने वाले नरसिंह राव के बाद सत्ता में आकार जब स्वदेशी के परम हिमायती राष्ट्रवादी अटल बिहारी वाजपेयी विनिवेशीकरण के जरिये लाभजनक सरकारी उपक्रमों तक को औने-पौने दामों में निजीक्षेत्र के स्वामियों को बेचने लगे, तब आरक्षण के खात्मे से त्रस्त आरक्षित वर्गों के तमाम संगठन निजीक्षेत्र में आरक्षण की मांग उठाने लगे. ऐसा इसलिए कि सरकारी नकारियों को ही अपनी उन्नति-प्रगति का एकमात्र माध्यम मानने वाले इन वर्गों, खासकर दलित बुद्धिजीवी – एक्टिविस्टों को लगा कि निजीकरण के जरिये सारी नैकरिया निजीक्षेत्र में शिफ्ट हो जाएँगी. ऐसा मानकर ही जब आरक्षित वर्गों के तमाम संगठन गली-कूचों में निजीक्षेत्र में आरक्षण की मांग बुलंद करने लगे, उन्ही दिनों सुप्रसिद्ध दलित चिन्तक चंद्रभान प्रसाद के नेतृत्व में 12-13 जनवरी,2002 को ऐतिहासिक भोपाल कांफ्रेंस हुआ. यह स्वाधीन भारत के इतिहास का संभवतः सबसे महत्वपूर्ण दलित सम्मलेन था, जिसमें भूमंडलीकरण के दौर की चुनौतियों से निपटने के लिए देश के २५० सौ अधिक मनीषी एकत्र हुए थे . इस अवसर पर चंद्रभान प्रसाद द्वारा लिखित ऐतिहासिक भोपाल दस्तावेज और भोपाल घोषणापत्र जारी हुआ. इस लेखक के मुताबिक जन्मजात वंचितों की मुक्ति के लिहाज से डॉ. आंबेडकर की ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ के बाद ‘भोपाल दस्तावेज और घोषणापत्र’ जैसी कोई और रचना शायद अबतक नहीं आई है . इसी सम्मेलन में अमेरिका के सर्वव्यापी आरक्षण ‘डाइवर्सिटी’ के तर्ज पर भारत में आरक्षण का दायरा बढ़ाने की ठोस परिकल्पना सामने आई.हालाँकि चंद्रभान प्रसाद ने वह परिकल्पना सिर्फ एससी-एसटी के लिए प्रस्तुत की थी जिसे परवर्तीकाल में ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ के जरिये ओबीसी और वंचितों से धर्मान्तरित अल्पसंख्यकों तक प्रसारित होने का अवसर मिला. बहरहाल चंद्रभान प्रसाद ने भोपाल दस्तावेज में दलितों(एससी-एसटी) के अतीत और वर्तमान की आर्थिक ,सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक अवस्था का निर्भूल विश्लेषण करते हुए २१वीं सदी में भूमंडलीकरण के सैलाब में दलितों को तिनको की भांति बहने से बचाने के लिए 21 सूत्रीय निर्भूल एजेंडा प्रस्तुत किया था, जो इस देश में वंचितों की मुक्ति में आकाश दीप का काम करता रहेगा. इस क्रम में उन्होंने नौकरियों,खासकर निजीक्षेत्र में आरक्षण से दलितों को मोहमुक्त करने का जैसा प्रयास किया था,वह बेमिसाल है. आज निजी क्षेत्र के आरक्षण के लिए अतिरक्त उत्साह का प्रदर्शन कर रहे बहुजन छात्र और गुरुजनों को चंद्रभान प्रसाद के उस प्रयास पर संजीदगी से विचार करने की जरुरत है.

आरक्षण की सीमायें !

चंद्रभान प्रसाद ने आरक्षण की सीमाबद्धता पर आलोकपात करते हुए भोपाल दस्तावेज में लिखा था – ‘लगभग सभी दलित आन्दोलनों में आरक्षण का मुद्दा बारं-बार आता है और इसे प्रगति के निर्णायक साधन के रूप में देखा जाता है. शासकीय नौकरियों और विधानसभाओं में आरक्षण और छात्रवृत्तियों के रूप में शिक्षा में कुछ मदद के अलावा,अनुसूचित जाति, जनजाति ने राज्य या समाज से कुछ उल्लेखनीय नहीं लिया. गरीबी हटाने, बकरी व सुअर पालने, रोड किनारे दूकान खोलने के लिए लघु ऋणों के जरिये समुदाय को अधिकारसंपन्न बनाने की योजनाओं से अनुसूचित जाति/जनजाति को कुछ ठोस हासिल नहीं हुआ. इस प्रकार प्रगति के एक साधन के बतौर आरक्षण पर विश्वास अनुसूचित जाति/जनजाति की चेतना को गढ़ता रहा. पर, यह कठोर सचाई है कि बहुत से सरकारी विभागों में अनुसूचित जाति/ जनजाति का कोटा खाली रहता है. हमें अनुसूचित जाति/जनजाति की प्रगति और शोषण-मुक्ति में शासकीय नौकरियों में आरक्षण की सीमित भूमिका को भी समझना होगा. जब तक हम यह नहीं समझते, आंदोलनों को एच्छिक उद्देश्यों की ओर परिवर्तित करना मुश्किल होगा.

मान लीजिये एक समय सीमा के मध्य सरकार पूरी तरह से निर्धारित आरक्षण का कोटा भर देती है तो कितने अनुसूचित जाति /जनजाति के सदस्यों को रोजगार मिलेगा ? केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के वार्षिक प्रतिवेदन 2000-2001 के अनुसार राज्य (केंद्र सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों,राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों) के तहत 1.94 करोड़ नौकरिया हैं. इसका अर्थ है यदि अनुसूचित जाति/जनजाति को उनका वर्तमान कोटा 22.50 प्रतिशत पूरा दे दिया जाय तो 45 लाख से ज्यादा लोग रोजगार नहीं नहीं पा सकते. यदि 45 लाख को पांच से गुणा किया जाय ( मान लें कि सरकारी नौकरी करने वाले एक कर्मचारी से पांच लोगों का परिवार पलता है) तो लक्ष्य 2.25 करोड़ की जनसँख्या से ज्यादे नहीं पहुंच सकता. चूंकि 1991 की जनगणना के मुताबिक 84.63 करोड़ लोगों में से दलितों की आबादी 20.59 करोड़ है, जिनमें 13.82 करोड़ अनुसूचित जाति एवं 6.67 करोड़ आदिवासी हैं, तब सवाल पैदा होता है शेष 18 करोड़ एससी-एसटी आबादी का क्या होगा?

कितना कारगर निजी क्षेत्र में आरक्षण!

राज्य के तहत नौकरियों की अपर्याप्तता से वाफिफ कई शिक्षित अनुसूचित जाति/ के लोग निजी क्षेत्र में आरक्षण का अधिकार बढाने की बात कर रहे हैं. यह सराहनीय है क्योंकि यह अनुसूचित जाति/ जनजाति के अग्रसर होने के लिए दूसरा कदम है. लेकिन हमें इस क्षेत्र की सीमाओं को भी समझना होगा. केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के वार्षिक प्रतिवेदन के अनुसार संगठित निजी क्षेत्र में कुल रोजगार केवल 86.96 लाख है. इस प्रकार यदि अनुसूचित जाति/ जनजाति निजी क्षेत्र में आरक्षण का अधिकार प्राप्त भी कर ले और निजी क्षेत्र इमानदारी से 22.50 प्रतिशत कोटा लागू कर दे तो 19.57 लाख लोगों को ही नौकरिया मिल पाएंगी. यदि 19.57 लाख को पाँच से गुणा किया जाय तो 97.85 लाख अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोगों को लाभ मिल पायेगा. इस प्रकार यदि सरकारी क्षेत्र की नौकरियों से लाभान्वित होने वाले 2.25 करोड़ और निजी क्षेत्र से लाभान्वित होने वाले 97.85 लाख की कुल आबादी को जोड़ लिया जाय तो भी 17 करोड़ अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोग शेष रह जायेंगे. यह आरक्षण और आरक्षण के आंदोलनों की सीमाओं को दर्शाता है.’

ऐसे में जिस आरक्षण के लाभ के दायरे से अनुसूचित जाति/ जनजाति की प्रायः 90 प्रतिशत आबादी बाहर है, वह आरक्षण दलितों को वर्तमान आर्थिक स्थिति से ऊपर उठाने में सहायक नहीं हो सकता, इसलिए भोपाल घोषणापत्र में आरक्षण से परे रणनीति पर विचार करने का आह्वान करते हुए कहा गया था -’ हमें ऐसी रणनीति बनाने के बारे में सोचना होगा जो इस समुदाय के प्रत्येक सदस्य के लिए लागू हो और जिसके द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में अनुसूचित जाति/ जनजाति की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित हो सके.’

विश्व परिदृश्य

भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में दलितों की भागीदारी सुनिश्चित करवाने की रणनीति बनाने के क्रम में चंद्रभान प्रसाद ने अमेरिकी और दक्षिण अफ्रीकी मॉडल को अपनाने का सुझाव हुए लिखा है-‘दुनिया के कई देशों में भारत में विद्यमान स्थिति जैसी समानांतर स्थितियां हैं. इन समान स्थितियों, परिस्थितियों के सामाजिक-ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक पहलुओं की जांच –पड़ताल करना प्रत्येक समझदार व्यक्ति के लिए जरुरी है. उन प्रयासों का भी मूल्यांकन करना जरुरी है जो समानता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए जरुरी है. हम दो उप-महाद्वीपों के अनुभवों का परिक्षण करेंगे. देश हैं संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका. दोनों देश भेदभाव,नस्लवाद,रंगभेद,हिंसक भूतकाल असमानता और शांतिपूर्ण विरोधों के कोलाहल भरे इतिहास से गुजरे हैं. भारत की विशिष्ट जाति-व्यवस्था के बावजूद यहां की असमानताओं के कारण ये देश भारत के लिए सम्भावनायें पैदा करते हैं. अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और भारत बहु-संस्कृति, बहु-जातिय, बहु-भाषाई और बहुलतावादी समाज हैं. अमेरिका भारत के साथ प्रजातांत्रिक आकार और इतिहास में मुकाबला करता है, जबकि दक्षिण अफ्रीका खूनी रंगभेद के युग के बाद एक संवेदनशील प्रजातंत्र के रूप में पल्लवित हो रहा है.’’

स्मरण रहे चंद्रभान प्रसाद ने उपरोक्त बातें 2002 तक उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर कही थी. तब उन्होंने उन्होंने भारतीय अर्थ व्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में एससी/एसटी की भागीदारी सुनिश्चित करवाने के लिए अमेरिका की डाइवर्सिटी पॉलिसी और दक्षिण अफ्रीका रोजगार समानता अधिनियम के जरिये एक नया क्रन्तिकारी मार्ग सुझाया जिसके जरिये हमने जाना कि अमेरिका ने भारत के दलित -आदिवासियों की भांति अपने देश के कालों, रेड इंडियंस,हिस्पैनिक्स इत्यादि को संपदा-संसाधनों भागीदार बनाने के लिए अम्बेडकरी आरक्षण की जो आइडिया को उधार लिया,उस आरक्षण को सिर्फ नौकरियों तक सीमित न रखकर सप्लाई, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, फिल्म-मीडिया इत्यादि अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों तक प्रसारित कर दिया,जिसके फलस्वरूप अमेरिकी दलितों में भूरि-भूरि उद्योगपतियों, ठेकेदारों, पत्रकारों, फिल्म स्टारों इत्यादि का उदय हुआ. चंद्रभान प्रसाद द्वारा सुलभ कराइ गयी जानकारी से ही भारत में सर्वप्यापी आरक्षण के विचार का बीजारोपड़ हुआ. परवर्तीकाल में भोपाल दस्तावेज और घोषणापत्र से ही प्रेरणा लेकर बहुजन डाइवर्सिटी मिशन से जुड़े लेखकों ने शक्ति के स्रोतों(आर्थिक, राजनैतिक , शैक्षिक ,धार्मिक ) में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन का अभियान छेड़ा.

रंग ला रहा है विद्या गौतम का देश की हर ईंट में भागीदारी का आन्दोलन!

आज नौकरियों की सीमाबद्धता को देखते हुए ‘देश की हर ईंट में भागीदारी’ के स्लोगन के साथ अखिल भारतीय आंबेडकर महासभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष विद्या गौतम एससी,एसटी,ओबीसी के लिए संख्यानुपात में सर्वव्यापी आरक्षण की लड़ाई में चला रही हैं. इस लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने 2018 के अगस्त में सप्लाई, डीलरशिप, निर्माण,सफाई, मरम्मत, वितरण व आवंटन; सभी प्रकार की नियुक्तियों, मनोनयन, सभी आयोगों व निगमों के पदाधिकारियों, राज्य व केंद्र सरकार मंत्रीमंडलों, संविदा पर भर्तियों इत्यादि में एससी,एसटी और ओबीसी के संख्यानुपात में आरक्षण के लिए 46 दिनों का आमरण अनशन किया,जिसमें उनके समर्थन में कई राज्यों के 4 हजार से अधिक लोग भूख हड़ताल पर बैठे. नौकरियों की सीमाओं से भलीभांति अवगत विद्या गौतम का देश की हर ईंट में भागीदारी के पीछे तर्क है ,’हमें न जमीन, ना व्यापार, ना उद्योग,किसी भी साधन-संसाधन में हिस्सेदारी नहीं मिली: साधन के नाम पर केवल आरक्षण के तहत सरकारी नौकरी में हिस्सेदारी प्राप्त हुई. जिनको नौकरी मिली ,उनका जीवन स्तर सुधरा: जिनको नौकरी नहीं मिली उनके जीवन से बदहाली नहीं जा सकी.जब तक किसी बेटे को बाप के सपदा-संसाधन में हिस्सा नहीं मिल जाता,तब तक वो बेटा बराबर का भाई नहीं हो सकता. उसी प्रकार जिस कौम को राष्ट्र के सम्पदा-संसाधनों में हिस्सा नहीं मिल जाता ,वह कौम राष्ट्र की मुख्यधारा से नहीं जुड़ सकती. ऐसी कौम मजबूर ही बनी रहेगी. इसीलिए ‘ भीख नहीं भागीदारी ,देश की हर ईंट में चाहिए हिस्सेदारी!’

आज विद्या गौतम से प्रेरणा लेकर माता सावित्री बाई फुले महासभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्देश सिंह जैसे अन्य कई संगठनों के लोग शक्ति के समस्त स्रोतों में एससी-एसटी-ओबीसी के संख्यानुपात में आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे में आज जबकि सवर्ण और विभागवार आरक्षण से आक्रोशित होकर बहुजन छात्र और गुरुजन तथा सामाजिक न्यायवादी दलों के नेता वंचित समुदायों की गुलामी से मुक्ति के लिए संख्यानुपात में आरक्षण बढाने की लड़ाई में उतरने का मन बना रहे हैं, बेहतर है वे नौकरियों में आरक्षण की सीमाबद्धता की उपलब्धि करते हुए विद्या गौतम की भांति सप्लाई, डीलरशिप, निर्माण,सफाई, मरम्मत, वितरण व आवंटन; सभी प्रकार की नियुक्तियों, मनोनयन, सभी आयोगों व निगमों के पदाधिकारियों, राज्य व केंद्र सरकार मंत्रीमंडलों, संविदा पर भारतियों इत्यादि में एससी,एसटी और ओबीसी को संख्यानुपात में आरक्षण दिलवाने के लिए कमर कसें.

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रोस्टर पर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका खारिज, भर्तियों से SC-ST गायब

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नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों की भर्तियों में 200 प्वाइंट रोस्टर की फिर से बहाली को लेकर चल रहे आंदोलन में बहुजन समाज को झटका लगा है. इलाहाबाद हाई कोर्ट में 200 प्वाइंट रोस्टर की फिर से बहाली की मांग खारिज होने के बाद केंद्र सरकार इस पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करने और ऐसा नहीं होने पर इस मुद्दे पर अध्यादेश लाने की बात कहती रही, लेकिन हकीकत यह है कि इस मुद्दे पर केंद्र ने बहुजनों को धोखा दे दिया है.

इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर रिव्यू पेटिशन खारिज हो गया है. इसके ठीक बाद अब तमाम विश्वविद्यालयों में 13 प्वाइंट रोस्टर के तहत भर्तियां निकालने लगी हैं. इन भर्तियों में सवर्ण तबके के हिस्से में 90 से 95 फीसदी तक सीटें आ रही हैं, जबकि ओबीसी के हिस्से में 5 से 10 फीसदी. सबसे ज्यादा झटका दलित और आदिवासी समाज को लगा है, जिनको इन भर्तियों में एक भी सीट नहीं मिल रही है.

13 प्वाइंट रोस्टर के तहत निकली इन दो भर्तियों को देखिए. उत्तर प्रदेश के वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर की तरफ से 1 मार्च 2019 को एक विज्ञापन निकला है. 13 प्वाइंट रोस्टर विभागवार आरक्षण की बात करता है. ऐसे में जिस चालाकी से विभागवार पद निकाले गए हैं वह साफ तौर पर दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के प्रति इस विश्वविद्यालय के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के भेदभाव पूर्ण नजरिए को साबित करता है.

इसमें फिजिक्स, केमेस्ट्री, मैथेमेटिक्स और अर्थ एंड प्लानेटरी साइंस इन चार विभागों के लिए प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए नियुक्तियां निकाली गई है. इन सभी विभागों में अलग अलग पदों पर 7-7 रिक्तियों के विज्ञापन निकाले गए हैं. इसमें कुल 28 में से 24 पद गैर बहुजनों के हिस्से में आय़ा है, जबकि ओबीसी के हिस्से में चार पद आए हैं. जहां तक दलित और आदिवासी समाज की बात है तो वह मुंह ताकता आरक्षण का मजाक बनता देख रहा है. इसी तरह जननायक चंद्रशेखर युनिवर्सिटी बलिया में तमाम विभागों और पदों को मिलाकर कुल 70 पदों के लिए विज्ञापन निकाले गए हैं. इसमें गैर बहुजन वर्गों ने 60 पद अपने कब्जे में ले लिया हैं, जबकि पिछड़े वर्ग यानि ओबीसी के हिस्से में 10 सीटें आई हैं. एक बार फिर यहां भी दलित औऱ आदिवासी समाज के हाथ कुछ नहीं लगा है.

शैक्षणिक संस्थाओं के अलावा अब रेलवे में भी 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने का आदेश जारी हो चुका है. ऐसे में देश के बहुजन इस अत्याचारी व्यवस्था के खिलाफ एक बार फिर 5 मार्च को भारत बंद की तैयारी में हैं. उनका साफ कहना है कि जब तक उन्हें इंसाफ नहीं मिलता, और सरकार इसको लेकर अध्यादेश नहीं लाती, तब तक वो 13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ और 200 प्वाइंट रोस्टर की बहाली के लिए जंग जारी रखेंगे.

5 मार्च को बहुजन समाज का भारत बंद

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नई दिल्ली। दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के साथ हो रहे अत्याचार और उनके अधिकारों पर डाका डालने की कोशिश के खिलाफ तमाम बुद्धीजिवियों और बहुजन समाज के भिन्न-भिन्न संगठनों ने 5 मार्च को भारत बंद का ऐलान किया है. इस दौरान देश भर में मौजूद बहुजन समाज के लोगों से इस बैठक में शामिल होकर वंचित तबके के अधिकार को और संविधान को बचाने की गुहार लगाई गई है. इसका आयोजन संविधान बचाओ संघर्ष समिति सहित तमाम संगठनों ने किया है.

राजधानी दिल्ली सहित देश के तमाम हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग इसकी तैयारियों में जुट गए हैं. खास तौर पर उच्च शिक्षा में अनुचित रोस्टर प्रणाली को लागू किए जाने के खिलाफ उच्च शिक्षा के शिक्षकों और शोधार्थियों में खासा रोष है. तो वहीं जंगल से बेदखल करने को लेकर आदिवासी समाज भी गुस्से में है. वर्तमान वक्त में देश के संविधान पर भी तमाम हमले हो रहे हैं, जिसकी वजह से देश के वंचितों के अधिकारों पर संकट गहरा गया है. इसको लेकर पूरे बहुजन समाज के लोग सड़कों पर आने की तैयारी में हैं.

मीडिया का वॉर हिस्टीरिया

भारतीय मीडिया ने बालाकोट में भारतीय सेना की कार्रवाई के बाद हुई मौतों के आंकड़ों पर जो खबर चलाई, वो एजेंडा सेटिंग का हिस्सा था. संख्या क्या है कोई नहीं जान पाएगा, जब तक पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर नहीं बता दे. लेकिन वह क्यों बता देगा? पत्रकार किसी खास पार्टी को लाभ पहुंचाने के मकसद में फंस गए या उस मुहिम का हिस्सा बन गए ये वही जाने. मेरे हिसाब से भारत ने पाकिस्तान में घुसकर कर हमला किया, यही महत्वपूर्ण था और पाकिस्तान पर शुरुआती दवाब बनाने के लिए काफी था. आगे की लड़ाई कूटनीतिक ही होनी थी. कितने मरे, यह सिर्फ उनके लिए था जिनको इस उन्माद को वोट में परिवर्तन करना या होता दिख रहा था.

लोकतंत्र में कोई सवाल सत्ता पक्ष से नहीं पूछा जाना अहितकर होता है. दुर्भाग्य से सोशल मीडिया पर सवाल पूछने वाले ट्रोलर्स के निशाने पर रहते हैं. फिर, अगर सत्ता पक्ष इस कार्रवाई को वोट में बदलना चाहता है तो विपक्ष को भी सवाल पूछने का पूरा हक है. तीनों सेना के प्रमुखों ने अपनी पीसी में कभी भी संख्या का जिक्र नहीं किया. फिर मीडिया तथाकथित मौतें क्यों जारी करता रहा, यह बड़ा सवाल है. सेना ने संख्या नहीं बताई तो क्या सेना का शौर्य घट गया? इसके उलट सेना के प्रति लोगों की आस्था और मजबूत हुई है. मीडिया का वॉर हिस्टीरिया सिर्फ वोट के मकसद से है. असली युद्ध अब कूटनीतिक तरीके से लड़ा जाता है. हम पहले ही चार युद्ध जीत चुके हैं. एक और जंग जीत जाएंगे, उससे क्या पाकिस्तान ठीक हो जाएगा? पाकिस्तान मेरी समझ से कूटनीतिक तरीके से ही दवाब में आएगा. उस पर आर्थिक, व्यापारिक पाबंदी से लेकर दूसरे दवाब बनाने होंगे.

बहरहाल इस दिशा में भारत बेहतर प्रयास कर सकता है. कर भी रहा होगा, लेकिन चुनावी एजेंडा बाकी सारी बातों पर हावी है. यह बहुत बुरा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सर्वदलीय बैठक तक में नहीं जाते हैं. निश्चित तौर पर हमारे लिए अभिनंदन का लौटना न सिर्फ जेनेवा संधि की जीत है, बल्कि गर्व का विषय है. पर यह दुर्भाग्य है कि विंग कमांडर अभिनन्दन जब पाकिस्तान से आ रहे होते हैं, तब दिन भर मीडिया वाघा बॉर्डर पर तो रहता है, लेकिन उसी दिन पांच अर्धसैनिक बल और पुलिस की मुठभेड़ में मौत हो जाती है और मीडिया उस तरफ कैमरा तक नहीं घुमाना चाहता है, क्यों? क्योंकि शोक कभी वोट पैदा नहीं करता, वोट उन्माद पैदा करता है. मीडिया और प्रधानमंत्री एक दूसरे के पूरक हैं. मीडिया उन्माद और वॉर हिस्टीरिया पैदा कर रहा है, तो इसका लाभ उठाकर नरेंद्र मोदी अपने चुनावी कार्यक्रम को अश्वमेघ घोड़ा की तरह दौड़ा रहे हैं, लेकिन उनसे पूछा जाने वाला कोई सवाल सेना के खिलाफ बताया जाता है. यह दरअसल उनकी राजनीति के प्रति उन्माद पैदा करता है.

  • लेखक पत्रकार रहे हैं. फिलहाल शिक्षा जगत से जुड़े हैं.

पीएम मोदी ने वही किया जिसका अंदेशा था

इंडिया टुडे कनक्लेव में पीएम मोदी

पीएम मोदी ने सेना की उपलब्धि को ठीक उसी तरह भुनाया जिसका अंदेशा था. इंडिया टुडे कॉनक्लेव में वो ठीक वही बोले जिसका अंदाज़ा था. उन्होंने मोदी विरोध और देश विरोध एक कर दिया. खुद पर उठ रहे सवालों को सेना के शौर्य और क्षमता पर प्रश्न बना दिया. मोदी सरकार के राजनीतिक फैसलों पर विपक्षियों के एतराज़ को आतंकियों पर हो रही कार्रवाई पर ऐतराज़ बना डाला.

ये बेहद खतरनाक रास्ता है. नरेंद्र मोदी उस तरफ चल पड़े हैं. एक सीधी-सीधी सैन्य तानाशाही होती है जिसमें सेनाध्यक्ष ही राष्ट्राध्यक्ष बन जाता है. आधा मुल्क सेना की ताकत से डर कर विरोध नहीं करता और बाकी आधा उस वरदी के सम्मान में मूक रहता है. भारत सौभाग्यशाली है कि इस तरह की तानाशाही उसने कभी देखी नहीं लेकिन मोदी दूसरी तरह से इसी चीज़ को देश और अपने विरोधियों पर लाद रहे हैं.

अपने हर फैसले के बचाव में सेना, सेना की क्षमता, सेना के सम्मान को ढाल बनाना खुद ही सेना का अपमान है. वैसे भी नरेंद्र मोदी ‘देशविरोध’ या ‘देश के अपमान’ पर जो सबक कॉन्क्लेव में खड़े होकर दे रहे थे मेरी निजी राय में उन्हें ये नैतिक अधिकार नहीं है. उनके गुजरात शासन में भारत ने जो कुछ 2002 में झेला उसकी कालिख मिटी नहीं है. देश ज़्यादा शर्मिंदा तब होता है जब अपने ही सिद्धांतों के खिलाफ हो रही किसी वारदात का गवाह बनता है. उनका अपना राजनैतिक प्रादुर्भाव उस दुर्घटना का परिणाम है. किसी को देशहित या देशविरोध समझाने की क्लास लेने की उन्हें कतई ज़रूरत नहीं है. इस देश का हर व्यक्ति चाहे वो किसी भी दल, धर्म, जाति, लिंग, राज्य से संबंध रखता हो देश का भला ही चाहता है, हां तौर-तरीके जुदा हो सकते हैं.

बाकी सेना के ‘कुछ ज़्यादा ही’ इस्तेमाल को लेकर मेरी फिक्र को कृपया मोदी से जोड़कर सीमित करके ना देखें, क्योंकि मोदी कल रहें या ना रहें मगर इस फॉर्मूले की सफलता नए प्रधानमंत्रियों को इसके इस्तेमाल के लोभ में ज़रूर डालती रहेगी. ये ज़्यादा चिंताजनक है.

  • टीवी पत्रकार नितिन ठाकुर के फेसबुक वॉल से

दलित के अंतिम संस्कार के लिए श्मशान का रास्ता रोका

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दलाराम भील के अंतिम संस्कार के लिए रास्ते के इंतजार में बैठे परिजन

दलित आदिवासियों को जीते जी तो न्याय नहीं मिलता, मरने के बाद भी उन्हें इंसाफ मयस्सर नहीं है. दलितों की लाशें कब तक श्मसान पहुंचने का इंतज़ार करेगी? घटना राजस्थान के जालोर जिले के भीनमाल तहसील के जूनी बाली गांव की है. शनिवार 2 मार्च को इस समाज के एक व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार के लिए इंतजार करना पड़ा. लाश कई घंटे तक सड़क पर रखी रही लेकिन जातिवादी गुंडों ने उसे श्मशान तक जाने का रास्ता नहीं दिया. इस मामले में प्रशासन से गुहार लगाने के बावजूद भी वंचितों को कोई मदद नहीं मिली, जिसके बाद थक कर परिवार वालों और संबंधियों को दूसरे रास्ते से श्मशान को लेकर जाना पड़ा.

जिंदा दलितों से नफरत तो समझ आती है,पर मरे हुए दलित आदिवासियों की लाशों से भी उतनी ही घृणा ? लानत है इस समाज पर? दरअसल, 2 मार्च को 5 बजे के करीब जूनी बाली के दलाराम भील की मौत हो गई. जिसके बाद उसके अंतिम संस्कार की तैयारी हुई. लेकिन जैसे ही घर और समाज वाले उसे लेकर श्मशान की ओर चलें, उनका रास्ता रोक दिया गया. इन रोते हुए गरीबों की आवाज़ कहीं नहीं पहुंची, न शासन तक, न प्रशासन तक, जबकि मीडिया, पुलिस तथा सामान्य प्रशासन सब वहां मौजूद था.

पीड़ित पक्ष ने बताया कि जूनी बाली के चौधरी परिवार द्वारा अतिक्रमण करके सौ साल से ज्यादा पुराने श्मशान भूमि के रास्ते को रोक दिया गया और प्रशासन उसके सामने लाचार है. अब प्रशासन लाचार है कि लचर या फिर पक्षपाती, यह तो सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज लोग तय करें. लेकिन खुले आम दलितों के मूलभूत मानवीय अधिकार का हनन किया जा रहा है,पर सुनने वाला कोई नहीं है.

इस बारे में पीड़ित पक्ष के मालाराम राणा ने बताया कि हमारी 2 हेक्टेयर जमीन है, जिसका इस्तेमाल हम श्मशान भूमि के लिए करते हैं. वहीं दूसरे पक्ष की जमीन है, जिस पर वो लोग खेती करते हैं. श्मशान तक जाने के लिए हम जिस रास्ते का इस्तेमाल करते हैं, उसको रोक दिया गया है और दीवार से घेर दिया गया है. हमने प्रशासन से गुहार लगाई है, लेकिन अभी तक सिर्फ आश्वासन मिला है. एडीएम साहब ने मंगलवार को रास्ता क्लियर कराने का आश्वासन दिया है, देखिए उस दिन क्या होता है. इस पूरे घटनाक्रम से सवाल उठता है कि आखिर दलित-आदिवासी समाज के लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में भी प्रशासन क्यों नाकाम हो जाता है और सत्ता जातिवादियों के आगे क्यों झुक जाती है?

क्या आप इन ढाई महीने के लिए चैनल देखना बंद नहीं कर सकते? कर दीजिए- रवीश कुमार

अगर आप अपनी नागरिकता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। अगर आप लोकतंत्र में एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में भूमिका निभाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। अगर आप अपने बच्चों को सांप्रदायिकता से बचाना से बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। अगर आप भारत में पत्रकारिता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। न्यूज़ चैनलों को देखना ख़ुद के पतन को देखना है। आप ऐसा मत कीजिए।

पत्रकारिता के लिए न सही, ख़ुद को बचाने के लिए आप चैनल और अख़बार दोनों बंद कर दें। मैं आपसे अपील करता हूं कि आप कोई भी न्यूज़ चैनल न देखें। न टीवी सेट पर देखें और न ही मोबाइल पर। अपनी दिनचर्या से चैनलों को देखना हटा दीजिए। कोई अपवाद न रखें, बेशक मुझे भी न देखें लेकिन न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कीजिए।

मैं यह बात पहले से कहता रहा हूं। मैं जानता हूं कि आप इतनी आसानी से मूर्खता के इस नशे से बाहर नहीं आ सकते लेकिन एक बार फिर अपील करता हूं कि बस इन ढाई महीनों के न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दीजिए। जो आप इस वक्त चैनलों पर देख रहे हैं, वह सनक का संसार है। उन्माद का संसार है। इनकी यही फितरत हो गई है। पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है। जब पाकिस्तान से तनाव नहीं होता है तब ये चैनल मंदिर को लेकर तनाव पैदा करते हैं, जब मंदिर का तनाव नहीं होता है तो ये चैनल पद्मावति फिल्म को लेकर तनाव पैदा करते हैं जब फिल्म का तनाव नहीं होता है तो ये चैनल कैराना के झूठ को लेकर हिन्दू-मुसलमान में तनाव में पैदा करते हैं। जब कुछ नहीं होता है तो ये फर्ज़ी सर्वे पर घंटों कार्यक्रम करते हैं जिनका कोई मतलब नहीं होता है।

क्या आप समझ पाते हैं कि यह सब क्यों हो रहा है? क्या आप पब्लिक के तौर पर इन चैनलों में पब्लिक को देख पाते हैं? इन चैनलों ने आप पब्लिक को हटा दिया है। कुचल दिया है। पब्लिक के सवाल नहीं हैं। चैनलों के सवाल पब्लिक के सवाल बनाए जा रहे हैं। यह इतनी भी बारीक बात नहीं है कि आप समझ नहीं सकते। लोग परेशान हैं। वे चैनल-चैनल घूम कर लौट जाते हैं मगर उनकी जगह नहीं होती। नौजावनों के तमाम सवालों को जगह नहीं होती मगर चैनल अपना सवाल पकड़ा कर उन्हें मूर्ख बना रहे हैं। और चैनलों को ये सवाल कहां से आते हैं, आपको पता होना चाहिए। ये अब जब भी करते हैं, जो कुछ भी करते हैं उसी तनाव के लिए करते हैं जो एक नेता के लिए रास्ता बनाता है। जिनका नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है।

न्यूज़ चैनलों, सरकार, बीजेपी और मोदी इन सबका विलय हो चुका है। यह विलय इतना बेहतरीन है कि आप फर्क नहीं कर पाएंगे कि पत्रकारिता है या प्रोपेगैंडा है। आप एक नेता को पसंद करते हैं। यह स्वाभाविक है और बहुत हद तक ज़रूरी भी। लेकिन उस पसंद का लाभ उठाकर इन चैनलों के लिए जो किया जा रहा है वो ख़तरनाक है। बीजेपी के भी ज़िम्मेदार समर्थक को सही सूचना की ज़रूरत होती है। सरकार और मोदी की भक्ति में प्रोपेगैंडा को परोसना भी उस समर्थक का अपमान है। उसे मूर्ख समझना है जबकि वह अपने सामने के विकल्पों की सूचनाओं के आधार पर किसी का समर्थन करता है। आज के न्यूज़ चैनल न सिर्फ सामान्य नागरिक का अपमान करते हैं बल्कि उससे कहीं ज़्यादा भाजपा समर्थकों का अपमान करते हैं।

मैं भाजपा समर्थकों से भी अपील करता हूं कि आप इन चैनलों को न देखें। आप भारत के लोकतंत्र की बर्बादी में शामिल न हों। क्या आप इन बेहूदा चैनलों के बग़ैर नरेंद्र मोदी का समर्थन नहीं कर सकते? क्या यह ज़रूरी है कि नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के लिए पत्रकारिता के पतन का भी समर्थन किया जाए? फिर आप एक ईमानदार राजनीतिक समर्थक नहीं हैं? एक बार ठंडे दिमाग़ से सोचिए कि मैं क्या कह रहा हूं। क्या श्रेष्ठ पत्रकारिता के मानकों के साथ नरेंद्र मोदी का समर्थन करना असंभव हो चुका है? क्या अब आपके समर्थक होने के लिए भी चैनलों का प्रोपेगैंडा और उन्माद ज़रूरी हो चुका है? भाजपा समर्थकों आपने भाजपा को चुना था, इन चैनलों को नहीं। मीडिया का पतन राजनीति का भी पतन है। एक अच्छे समर्थक का भी पतन है।

चैनल आपकी नागरिकता पर हमला कर रहे हैं। लोकतंत्र में नागरिक हवा में नहीं होता है। सिर्फ किसी भौगोलिक प्रदेश में पैदा हो जाने से आप नागरिक नहीं होते। सही सूचना और सही सवाल आपकी नागरिकता के लिए ज़रूरी है। इन न्यूज़ चैनलों के पास दोनों नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी पत्रकारिता के इस पतन के अभिभावक हैं। संरक्षक हैं। उनकी भक्ति में चैनलों ने ख़ुद को भांड बना दिया है। वे पहले भी भांड थे मगर अब वे आपको भांड बना रहे हैं। आपका भांड बन जाना लोकतंत्र का मिट जाना होगा।

भारत पाकिस्तान तनाव के बहाने इन्हें राष्ट्रभक्त होने का मौका मिल गया है। इनके पास राष्ट्र को लेकर कोई भक्ति नहीं है। भक्ति होती तो लोकतंत्र के ज़रूरी स्तंभ पत्रकारिता के उच्च मानकों को गढ़ते। चैनलों पर जिस तरह का हिन्दुस्तान गढ़ा जा चुका है, उनके ज़रिए आपके भीतर जिस तरह का हिन्दुस्तान गढ़ा गया है वो हमारा हिन्दुस्तान नहीं है। वो एक नकली हिन्दुस्तान है। देश से प्रेम का मतलब होता है कि हम सब अपना अपना काम उच्च आदर्शों और मानकों के हिसाब से करें। आपकी देशभक्ति की जगह चैनल किसी और के इशारे पर नकली देशभक्ति गढ़ रहे हैं। हिम्मत देखिए कि झूठी सूचनाओं और अनाप-शनाप नारों और विश्लेषणों से आपकी देशभक्ति गढ़ी जा रही है। आपके भीतर देशभक्ति के प्राकृतिक चैनल को ख़त्म कर ये न्यूज़ चैनल कृत्रिम चैनल बनाना चाहते हैं। ताकि आप एक मुर्दा रोबोट बन कर रह जाएं।

इस वक्त के अख़बार और चैनल आपकी नागरिकता और नागरिक अधिकारों के ख़ात्मे का एलान बन चुके हैं। आपको सामने से दिख जाना चाहिए कि ये होने वाला नहीं बल्कि हो चुका है। अख़बारों के हाल भी वहीं हैं। हिन्दी के अख़बारों ने तो पाठकों की हत्या की सुपारी ले ली है। ग़लत और कमज़ोर सूचनाओं के आधार पर पाठकों की हत्या ही हो रही है। अखबारों के पन्ने भी ध्यान से देखें। हिन्दी अख़बारों को उठा कर घर से फेंक दें। एक दिन अलार्म लगाकर सो जाइये। उठकर हॉकर से कह दीजिए कि भइया चुनाव बाद अख़बार दे जाना।

यह निज़ाम, यह सरकार नहीं चाहती है कि आप सही सूचनाओं से लैस सक्षम नागरिक बनें। चैनलों ने विपक्ष बनने की हर संभावना को ख़त्म किया है। आपके भीतर अगर सरकार का विपक्ष न बने तो आप सरकार का समर्थक भी नहीं बन सकते। होश में सपोर्ट करना और नशे का इंजेक्शन देकर सपोर्ट करवाना दोनों अलग बातें हैं। पहले में आपका स्वाभिमान झलकता है। दूसरे में आपका अपमान। क्या आप अपमानित होकर इन न्यूज़ चैनलों को देखना चाहते हैं, इनके ज़रिए सरकार को समर्थन करना चाहते हैं?

मैं जानता हूं कि मेरी यह बात न करोड़ों लोगों तक पहुंचेगी और न करोड़ों लोग न्यूज़ चैनल देखना छोड़ेंगे। मगर मैं आपको आगाह करता हूं कि अगर यही चैनलों की पत्रकारिता है तो भारत में लोकतंत्र का भविष्य सुंदर नहीं है। न्यूज़ चैनलों ने एक ऐसी पब्लिक गढ़ रही है जो गलत सूचनाओं और सीमित सूचनाओं पर आधारित होगी। चैनल अपनी बनाई हुई इस पब्लिक से उस पब्लिक को हरा देंगे जिसे सूचनाओं की ज़रूरत होती है, जिसके पास सवाल होते हैं। सवाल और सूचना के बग़ैर लोकतंत्र नहीं होता। लोकतंत्र में नागिरक नहीं होता।

सत्य और तथ्य की हर संभावना समाप्त कर दी गई है। मैं हर रोज़ पब्लिक को धेकेले जाते देखता हूं। चैनल पब्लिक को मंझधार में धकेल कर रखना चाहते हैं। जहां राजनीति अपना बंवडर रच रही है। राजनीतिक दलों से बाहर के मसलों की जगह नहीं बची है। न जाने कितने मसले इंतज़ार कर रहे हैं। चैनलों ने अपने संपर्क में आए लोगों को लोगों के खिलाफ तैयार किया है। आपकी हार का एलान है इन चैनलों की बादशाहत। आपकी ग़ुलामी है इनकी जीत। इनके असर से कोई इतनी आसानी से नहीं निकल सकता है। आप एक दर्शक हैं। आप एक नेता का समर्थन करने के लिए पत्रकारिता के पतन का समर्थन मत कीजिए। सिर्फ ढाई महीने की बात है। चैनलों को देखना बंद कर दीजिए।

  • लेखक टीवी पत्रकार हैं। एनडीटीवी से जुड़े हैं।

अभिनंदन की रिहाई को ले कर यूं आखिरी पल तक खेल करता रहा पाकिस्तान

नई दिल्ली। पाकिस्तान ने तमाम पैंतरेबाजी और उकसावे की हरकत करने के बाद भारतीय पायलट अभिनंदन को शुक्रवार रात अटारी बॉर्डर पर रिहा कर दिया. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने शांति का शिगूफा छोड़ते हुए अभिनंदन को छोड़ने की घोषणा की थी. लेकिन यह पड़ोसी देश अपनी पुरानी आदतों से बाज नहीं आया और भारतीय पायलट को छोड़ने से पहले तमाम हथकंडे, प्रॉपगैंडा और पैंतरे अपनाएं. पाकिस्तान ने अभिनंदन को रिहा करने में जान-बूझकर देरी की.अभिनंदन को लाने के लिए हवाई यात्रा की इजाजत के लिए भारतीय प्रस्ताव पर भी पाकिस्तान ने हामी नहीं भरी. यहां तक कि पाकिस्तान के पीएम इमरान खान की लाहौर में मौजूदगी के बाद भी वहां की सेना और खुफिया एजेंसी ISI ने अभिनंदन की रिहाई में खेल करते रहे.

शाम 4 बजे तक पहुंचना था भारत अभिनंदन को शुक्रवार को दोपहर दो बजे से शाम चार बजे के बीच भारत पहुंचना था. लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें लाहौर में घंटों रोके रखा. रिहा किए जाने से पहले अभिनंदन को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के दफ्तर में ले जाया गया और उनसे हस्ताक्षर करवाया गया.

प्रॉपेगैंडा विडियो से खेल करने की कोशिश इसके अलावा पाकिस्तान ने अभिनंदन का एक प्रॉपगेंडा विडियो भी बनाया और उसे वायरल किया. खास बात यह है कि अभिनंदन के विडियो में कई कट हैं जो संकेत देते हैं कि इसे पाकिस्तानी रुख के अनुरूप करने के लिए बहुत काट-छांट की गई. पाकिस्तान सरकार ने स्थानीय समयानुसार रात 8.30 बजे पायलट का विडियो संदेश स्थानीय मीडिया को जारी भी किया. इस समय तक अभिनंदन को भारत को सौंपा भी नहीं गया था.

ISI और पाकिस्तानी सेना की साजिश आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि ISI के लाहौर दफ्तर में अभिनंदन का एक विडियो बनाया. इस विडियो में अभिनंदन पाकिस्तानी अधिकारियों के व्यवहार के बारे में बता रहे थे. भारतीय अधिकारियों ने बताया कि अभिनंदन को एक ऐसे ही बयान पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला गया. सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तानी सेना ने भी अभिनंदन की रिहाई में आखिरी पल तक खेल करने की कोशिश की.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान शुक्रवार को वाघा सीमा पर भारतीय वायु सेना के पायलट अभिनंदन को भारत को सौंपने की प्रक्रिया को ‘सुचारू’ बनाने के लिए लाहौर में मौजूद थे. आधिकारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी . खान शुक्रवार दोपहर भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन को इस्लामाबाद से वाघा बॉर्डर लाये जाने से कुछ घंटे पहले कड़ी सुरक्षा के बीच लाहौर पहुंचे. एक आधिकारिक सूत्र ने बताया, ‘प्रधानमंत्री खान का शहर में रहने का मुख्य उद्देश्य भारतीय पायलट को सीमा सुरक्षा बल को सौंपने की प्रक्रिया को ‘सुचारू’ बनाना था.’ पाकिस्तान के पीएम के सीमा के पास होने के बावजूद अभिनंदन की रिहाई में देरी से इमरान की मंशा पर शक पैदा होता है. सूत्रों के अनुसार पाकिस्तानी सेना और ISI ने अभिनंद की रिहाई में काफी रोड़े अटकाए.

भारत ने अटारी बॉर्डर पर रद्द किया था बीटिंग रिट्रीट दरअसल, पाकिस्तान पहले वाघा-अटारी बॉर्डर होने वाली बीटिंग रिट्रीट समारोह के दौरान अभिनंदन को सौंपना चाहता था. पर भारत ने इससे साफ इनकार कर दिया था. भारत अभिनंदन को इस तरह सार्वजनिक तौर पर रिहा करने के खिलाफ था. अटारी बॉर्डर पर भीड़ को देखते हुए भारत ने अपनी तरफ होने वाला बीटिंग रिट्रीट समारोह ही रद्द कर दिया था.

गौरतलब है कि अभिनंदन ने पाकिस्तान के एक घुसपैठिए लड़ाकू विमान F-16 को मार गिराने के दौरान पाकिस्तान की सीमा में चले गए थे. अभिनंदन का विमान भी क्रैश हो गया था. पाकिस्तान ने अभिनंदन को विशेष विमान से भारत लाने के नई दिल्ली के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. पाकिस्तान ने अपने एयर स्पेस को बंद करने का हवाला देते हुए कहा कि वह इसकी इजाजत नहीं दे सकते हैं. हालांकि एक भारतीय अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान इसकी इजाजत दे सकता था लेकिन उसके अधिकारियों ने ऐसा नहीं होने दिया.

बाद में अभिनंदन को पाकिस्तान ने घंटों की देरी के बाद अटारी बॉर्डर पर शुक्रवार रात 9.25 मिनट पर रिहा किया. करीब 60 घंटे पाकिस्तानी सेना की कैद में रहने के बाद अभिनंदन ने भारत वापसी की.

Read it also-जब विमान में मौजूद लोगों ने अभिनंदन के माता-पिता का तालियों से स्वागत किया

ममता बनर्जी ने पाकिस्तान में 300 मौतों की रिपोर्ट पर उठाया गंभीर सवाल

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पश्चिम बंगाल। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारत द्वारा पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी अड्डों पर हमले को लेकर सवाल उठाया है. ममता बनर्जी ने एक बयान में आतंकी कैंप पर भारतीय वायुसेना द्वारा एयर स्ट्राइक को लेकर सवाल खड़ा किया है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने बृहस्पतिवार को कहा कि जवानों का जीवन चुनावी राजनीति से ज्यादा कीमती है, लेकिन देश को यह जानने का अधिकार है कि पाकिस्तान के बालाकोट में वायुसेना के हवाई हमले के बाद वास्तव में वहां क्या हुआ था.

ममता बनर्जी ने अपने सवालों के पक्ष में विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स का सहारा लिया. राज्य सचिवालय में संवाददाताओं से बातचीत में उन्होंने कहा, “हवाई हमलों के बाद, हमें बताया गया कि 300 मौतें हुईं, 350 मौतें हुईं. लेकिन मैंने न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट में ऐसी खबरें पढ़ीं जिनमें कहा गया कि कोई इंसान नहीं मारा गया. एक अन्य विदेशी मीडिया रिपोर्ट में केवल एक व्यक्ति के घायल होने की बात कही गई थी.”

26 फरवरी को भारतीय वायुसेना द्वारा पाकिस्तान की जमीन पर जैश के आतंकी कैंप पर एयर स्ट्राइक किया गया था, जिसमें करीब 300 आतंकियों को मार गिराए जाने की बात कही गई थी. जबकि विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स में कहा गया था कि बालाकोट में आतंकी शिविरों पर भारतीय वायु सेना के हमलों से कोई नुकसान नहीं हुआ है. ममता ने मांग किया है कि बलों को तथ्यों के साथ सामने आने का मौका दिया जाना चाहिए. भारतीय राजनीति कि इस दिग्गज नेता ने कहा, “इस देश के लोग यह जानना चाहते हैं कि बालाकोट में कितने मारे गए, वास्तव में बम कहां गिराया गया था? क्या यह लक्ष्य पर गिरा था?”

ममता बनर्जी के सवाल को इसलिए भी नहीं टाला जा सकता क्योंकि बीबीसी ने भी अपनी एक रिपोर्ट्स में भारत के टेलिविजन चैनलों द्वारा पाकिस्तान पर हमले का वीडियो बताकर जिन वीडियो को दिखाया गया था वह काफी पुराने वीडियो थे. इस रिपोर्ट से कई टेलिविजन चैनलों के खबरों की प्रमाणिकता भी शक के घेरे में आती है.

दरअसल सोशल मीडिया पर भी इस तरह के सवाल लगातार उठ रहे हैं. पूरा देश सेना के साथ है लेकिन सरकार जिस तरह इस पूरे मामले को भुनाने की कवायद में जुटी है, उससे तमाम लोगों में नाराजगी भी है. विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स और ममता बनर्जी जैसे दिग्गज नेता के बयान ने इसको और बल दिया है.

जब विमान में मौजूद लोगों ने अभिनंदन के माता-पिता का तालियों से स्वागत किया

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चेन्नई। जब कोई सिपाही लड़ाई के मोर्चे पर जाता है, तो न सिर्फ उसके लिए बल्कि उसके पूरे परिवार के लिए देश के भीतर सम्मान बढ़ जाता है. ऐसा ही एक नजारा चेन्नई एयरपोर्ट पर देखने को मिला. चेन्नई एयरपोर्ट पर विंग कमांडर अभिनंदन के माता-पिता दिल्ली जाने वाले एक फ्लाइट में चढ़े. वो जैसे ही विमान के भीतर पहुंचे, सभी यात्री खड़े होकर तालियां बजाने लगे और उनका स्वागत किया.

इंडियन एयरफोर्स के विंग कमांडर अभिनंदन के माता-पिता अपने बेटे को लेने के लिए दिल्ली जा रहे थे. विंग कमांडर अभिनंदन को पाकिस्तान आज रिहा करने जा रहा है. अभिनंदन को लेने के लिए वायुसेना के प्रतिनिधिमंडल के साथ उनके माता-पिता भी उन्हेंत रिसीव करने के लिए दिल्लीा एयरपोर्ट से अमृतसर जाने के लिए रवाना हो गए हैं. वायुसेना का एक प्रतिनिधिमंडल आज कमांडर अभिनंदन को लेने वाघा बॉर्डर जाएगा, जिसके साथ अभिनंदन के माता-पिता भी मौजूद हैं.

विंग कमांडर अभिनंदन के बारे में ये बातें सबको जाननी चाहिए

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Image Credit: BBC
1. अभिनंदर भारतीय वायु सेना में विंग कमांडर के पद पर हैं. इंडियन एयरफोर्स में उनका चयन साल 2004 में एक फाइटर पायलट के तौर पर हुआ था. 2. अभिनंदन 34 साल के हैं. वे नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) से ग्रेजुएट हैं. 3. अभिनंदन की शुरुआती पढ़ाई चेन्नई के सैनिक वेलफेयर स्कूल, अमावतीनगर से हुई है. 4. अपने 15 सालों के कॅरियर में वे दो बार प्रमोट हो चुके हैं. पहले उन्हें एक निपुण सुखोई 30 फाइटर पायलट का खिताब मिला. बाद में उनके युद्ध कौशल को देखते हुए विंग कमांडर के तौर पर प्रमोट किया गया. इसके बाद उन्हें मिग 21 बिसन सौंप दिया गया. 5. अभिनंदन के पिता जानेमाने पूर्व पायलट एयर मार्शल सिम्हाकुट्टी वर्धमान हैं. वे पूर्वी वायु कमान के मुखिया पद से रिटायर हुए थे. 6. अभिनंदन की मां एक डॉक्टर हैं. 7. उनकी पत्नी भी भारतीय वायुसेना में स्क्वॉड्रन लीडर रह चुकी हैं. उनके दो बच्चे हैं. 8. अभिनंदन के भाई भी इंडियन एयरफोर्स में ही हैं 9. वह तमिलनाडु के रहने वाले हैं, जहां उनका पैतृक गांव थिरुपनामूर हैं. 10. अपने दोस्तों के बीच अभिनंदन पढ़ने और अच्छी स्पीच देने के लिए मशहूर हैं. वायुसेना के आंतरिक कार्यक्रमों में अभिनंदन को अक्सर बोलने के लिए कहा जाता है.

समुदाय और राष्ट्र ईमानदारी तथा दूरदर्शिता के बिना प्रगति नहीं कर सकते – मंत्री राजेंद्र पाल गौतम

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नई दिल्ली। दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 28 फरवरी को अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग दिल्ली सरकार के तत्वावधान में “आरक्षित समुदायों के सामाजिक सशक्तिकरण से संबंधित विभिन्न विषयों पर एक सम्मलेन” आयोजित किया गया जिस में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया. इस दौरान वक्ताओं ने सुझाव दिया कि विभिन्न आरक्षित समुदायों के बीच सामाजिक गठजोड़ को आकार लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह तेजी से स्पष्ट हो रहा है कि आपसी सहयोग और मजबूत संबंधों के माध्यम से ही ये समुदाय सुरक्षा को मजबूत कर सकते हैं, सामाजिक ताने-बाने को मजबूत कर सकते हैं और देश में सम्मानजनक स्थान बना सकते हैं.

सम्मेलन का उद्देश्य सामाजिक गतिशीलता और एससी, एसटी और ओबीसी जैसे सभी समुदायों के मुद्दों को समझना और सामाजिक एकीकरण के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना था. इस मौके पर दिल्ली के समाज कल्याण मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम ने अपने वक्तव्य के कहा कि समुदाय और राष्ट्र ईमानदारी तथा दूरदर्शिता के बिना प्रगति नहीं कर सकते, जो लोगों को स्वतंत्रता, न्याय और समानता की गारंटी देता है. मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए उन्होंने चेताया कि समाज में विभाजन पर विभाजन हमारे राष्ट्र को कमजोर कर रहा है, इसलिए समय आ गया है कि हम शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सामाजिक एकीकरण की ओर बढ़ें.

उन्होंने कहा कि जो लोग विकास की दौड़ में पीछे रह गए हैं, जिन्हे समान अवसर और बराबरी का दर्जा आज भी पूरी तरह नहीं मिल पाया, उन लोगों को मुख्यधारा में शामिल करना एक संवैधानिक जनादेश है और इसे पूरा करने के लिए हमें एकजुट होकर काम करना होगा.

उन्होंने अपने भाषण में कहा कि केवल सामाजिक एकीकरण द्वारा ही ‘आईडिया ऑफ़ इंडिया’ के लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है. जिसका सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था. उन्होंने सभी आरक्षित समुदायों के सदस्यों को संगठित होने को कहा व हाशिए पर खड़े समुदायों के सामाजिक उत्थान के लिए एक साथ काम करने का आह्वान किया. सभी से अनुरोध भी किया आपसी द्वेष और मतभेद को छोड़ कर समाज के बेहतर निर्माण में योगदान दें. क्योंकि सब समुदाय एक ही हैं, जातियों में बांटकर हमें कमजोर करने की कोशिश की गई है और इसी वजह से हम पिछड़ रहे हैं.

ओबीसी आयोग के सचिव श्री शमीम अख़तर ने अपना स्वागत भाषण देते हुए राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता पर जोर दिया और जोर देकर कहा कि यदि समाज का सबसे बड़ा वर्ग वंचित रह जाता है, तो राष्ट्र के लिए अपना सही गौरव हासिल करना संभव नहीं है. उन्होंने यह भी उम्मीद की कि यह सम्मेलन सामाजिक एकीकरण की दिशा में एक छोटा सा प्रयास है लेकिन महत्पूर्ण कदम साबित होगा.

श्री पी.एस कृष्णन, (Rtd.) I.A.S., भारत सरकार के उन मुट्ठी भर नौकरशाहों में से हैं, जिन्होंने समाज के वंचित वर्गों के हितों के लिए प्रतिबद्ध रहकर कार्य किया है. उन्होंने मंडल आयोग के पीछे की पृष्ठभूमि, तर्क और सभी आरक्षण के मुद्दों और आगे के रोड मैप पर अपने उल्लेखनीय विचार व्यक्त किए. उन्होंने कहा कि एससी / एसटी और अल्पसंख्यकों की स्थिति देश में बेहतर नहीं है. उन्होंने पूछा, क्या डॉ अंबेडकर के विचार को इसकी समग्रता में स्वीकार किया गया था? उन्होंने कहा कि यदि हम संवैधानिक सुरक्षा उपायों और आपसी सहयोग का प्रभावी ढंग से उपयोग करते हैं, तो यह निश्चित रूप से भारत को एक वास्तविक और बेहतर लोकतंत्र बनने में मदद करेगा.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर श्री विवेक कुमार ने सभा को संबोधित करते हुए जोर दिया कि शिक्षा, आर्थिक उन्नति और सामाजिक सशक्तिकरण के बिना किसी भी समुदाय का सामाजिक कल्याण संभव नहीं है. इसलिए सभी को विकास का सामान्य अवसर प्राप्त होना चाहिए. उन्होंने कहा कि चूंकि इस देश में बहुत कुछ तय करने वाली राजनीति है, इसलिए सभी लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए एकजुट होना जरूरी है.

सोशल एक्टिविस्ट और (Rtd.) I.A.S श्री पी आर मीना ने सभी वर्गों को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने में वर्तमान विफलताओं पर विस्तार से चर्चा किया. एक सांप्रदायिक रूप से संचालित राजनीति में अपने भाग्य को तराशने के लिए कमजोर वर्गों को एक साथ आने की अपील की. उन्होंने कहा कि सरकारी आयोगों के द्वारा किये गए सभी स्वतंत्र अध्ययनों ने ये साबित कर दिया है कि लोकतांत्रिक भारत में दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर रखा गया है और उन्हें न्याय और समानता हासिल करने के लिए एक स्थायी गठबंधन बनाने की जरूरत है ताकि एक सम्मानजनक अस्तित्व पर कोई आंच न आये.

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट और एक्टिविस्ट फ़िरोज़ अहमद ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारतीय पिछड़े मुसलमान वास्तव में भारतीय हैं और उनको वही समानता मिलना चाहिए जो दूसरों को प्राप्त है .

अखिल भारतीय मुस्लिम पिछड़ा वर्ग महासंघ के महासचिव डॉ इदरीस क़ुरैशी जो कई वर्षों से हाशिए पर खड़े समुदायों के सामाजिक उत्थान के लिए काम कर रहे हैं. इस सम्मेलन में, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पिछड़े भारतीय मुस्लिम जातियों को कानून के तहत अपनी मूल पहचान की घोषणा करके एक छतरी के नीचे आना चाहिए.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के रिटायर्ट प्रोफेसर नंदू राम सहित अन्य लोगों ने भी सम्मेलन में अपने विचार व्यक्त किए. नंदू राम ने जोर देकर कहा कि हाशिए पर पहुँच चुके वर्गों को अच्छी शिक्षा प्रदान करना और रोजगार से वांछित लोगों के हित के लिए सकारात्मक कार्रवाई करना उसी वक़्त संभव हो सकता है जब एक जिम्मेदार सरकार हो जो सबकी हितों की रक्षा करना जानती हो.

अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग दिल्ली सरकार के अध्यक्ष श्री हरिओम डेढा ने वक्ताओं और प्रतिभागियों का धन्यवाद किया और यह उम्मीद ज़ाहिर किआ कि सभी हाशिए के समुदाय एक बेहतर भारत के पुनर्निर्माण के लिए करीब आएंगे.

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सफाई कर्मचारियों के पैर धोने से कौन महिमामंडित होता है?

अपनी कुंभ यात्रा के दौरान पीएम मोदी सफाईकर्मियों के पैर धोते हुए

24 फरवरी 2019 का दिन देश के इतिहास में हमेशा याद रहेगा. शायद इसलिए कि प्रधान मंत्री मोदी ने कुंभ में सफाई करने वाले कुछ सफाई कर्मचारियों के पैर धोने का उपक्रम किया. इस मौके पर कुंभ में सफाई अभियान की तारीफ करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 22 करोड़ लोगों के बीच सफाई बड़ी जिम्मेदारी थी, जिसे सफाई कर्मचारियों ने साबित किया कि दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं. ये सफाईकर्मी बिना किसी की प्रशंसा के चुपचाप अपना काम कर रहे थे. लेकिन इनकी मेहनत का पता मुझे दिल्ली में लगातार मिलता रहता था. वो यहीं नहीं रुकें, अपितु वोटों की खातिर मोदी जी ने कोरिया से मिले सोल शांति पुरस्कार की राशि को नमामि गंगे प्रॉजेक्ट को समर्पित किया. इसके बाद पांव धोने का उपक्रम किया गया. पांव धोने के उपक्रम से उन राजनेताओं के माथे पर शिकन पड़ना जरूरी ही है जो दलितों के घर जाकर खाना खाने का नाटक करते रहे हैं. किंतु मोदी जी की नाटकबाजी दलितों के घर जाकर खाना खाने के उपक्रम से ज्यादा खतरनाक है. यद्यपि दोनों का मकसद केवल और केवल दलितों के वोट हासिल करना दिखता है. किंतु दलित हैं कि राजनीति की भाषा समझते ही नहीं.

इस संबंध में विल्सन बेजवाड़ा कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री को सफाई कर्मियों और दलितों के पैर नहीं धोने चाहिए बल्कि उनसे हाथ मिलाना चाहिए. पैर धोने से कौन ग्लोरिफाई (महिमामंडित) होता है. प्रधानमंत्री ही ग्लोरिफाइ होते हैं ना. वह सफाईकर्मियों के पांव पकड़ते हैं तो वह यह संदेश दे रहे हैं कि आप (सफाईकर्मी) बहुत तुच्छ हैं और मैं महान हूं. इससे किसका फायदा होता है? इनके पैर धोकर वह खुद को महान दिखा रहे हैं. यह बहुत खतरनाक विचारधारा है.

संगम को पवित्र माना जाता है और हिंदू मानते हैं कि कुंभ के दौरान वहां स्नाोन करने से पाप धुलते हैं और मोक्ष प्राप्तत होता है. बड़ी संख्यान में श्रद्धालु नदी के किनारे कैंप या अखाड़ों में रुकते हैं. पिछले कुछ हफ्तों में कई राजनेता, मंत्री और नामी हस्तियां कुंभ मेला पहुंची. स्मृुति ईरानी, योगी आदित्युनाथ और अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने अपने कुंभ जाने की तस्वी रें भी साझा की हैं. 48 दिनों तक चलने वाले कुंभ मेले में करोड़ों की संख्यान में श्रद्धालु संगम में डुबकी लगाने पहुंच रहे हैं. 15 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन से शुरू हुआ कुंभ मेला 4 मार्च को महाशिवरात्रि के दिन समाप्तफ होगा. तो क्या कोई ऐसा मान सकता है कि कुम्भ अथवा गंगा स्नान करने में उन लोगों की ज्यादा ही रुचि रहती है जो पापी होते हैं?

खैर प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर सफाईकर्मियों के लिए स्वच्छ सेवा कोष की घोषणा भी की और घोषणा करते हुए कहा, ‘आज स्वच्छ सेवा कोष की भी घोषणा की गई है. इस कोष से आपके परिवार को विशेष परिस्थितियों में मदद सुनिश्चित हो पाएगी. यह देशवासियों की तरफ से आपका आभार है. इस बार कुंभ की पहचान स्वच्छ कुंभ के तौर पर हुई तो केवल सफाई कर्मचारियों के कारण यह संभव हो सका. पीएम मोदी ने कहा, ‘दिव्य कुंभ को भव्य कुंभ बनाने में आपने कोई कसर नहीं छोड़ी. जहां 1 लाख से ज्यादा शौचालय हों, 20 हजार से ज्यादा कूड़ादान हो, वहां काम कैसे हुआ इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता. आज मेरे लिए भी ऐसा ही पल है जो भुलाया नहीं जा सकता. आज जिन सफाईकर्मी भाइयों-बहनों के चरण धोकर मैंने वंदना की है, वह पल मेरे साथ जीवनभर रहेगा.’

मोदी जी ने औपचारिकतावश नाविकों और पुलिस कर्मियों की भी तारीफ की. किंतु पीएम मोदी जी के द्वारा सफाई प्लांट का उद्घाटन से पहले सफाई करने के लिए टैंक में उतरे दो मजदूरों की मौत की मोदी जी को कोई याद ही न रही. वृतांत इस प्रकार है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 नवंबर को संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जिस दीनापुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का उद्घाटन करने वाले थे, उसे चालू करने में जुटे दो मजदूरों की मौत हो गई. सीवर में काम करने वाले अनेक सफाई कर्मियों की मृत्यु को मोदी जी दरकिनार कर देते हैं. फिर भी सफाईकर्मियों की सीवर में मौत की घटनाओं को रोकने की दिशा में कोई ठोस उपाय नहीं दिख रहे हैं. इस ओर मोदी जी का कोई ध्यान नहीं है….मोदी जी को यह याद क्यों नहीं रहता कि वोट तो सीवर में मरने वालों के भी होते हैं. यदि मोदी जी अपने कार्यकाल में दलितों के हितों को ही अनदेखी नहीं करते तो मोदी जी को सफाई कर्मियों के पैर की जरूरत ही न पड़ती. सफाई कर्मियों के पैर धोने की बजाय यदि मोदी जी दलितों के हक में अधोलिखित काम ही कर देते तो काफी होता.

> सफाई कर्मियों से छीनकर ठेकेदारों को दी गयी सभी सरकारी नौकरियां उन्हें लौटा देते > सफाई कर्मियों के बच्चों को समुचित शिक्षा प्रदान करा देते और उनके लिए पीएचडी तक मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था कर देते > हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट में दलित समुदाय को प्रतिनिधित्व प्रदान करने का उपक्रम करने की व्यवस्था कर देते.

किंतु आपने तो दलितों के हितों की रक्षा करने की बजाय कुछ उल्टा ही काम किया है. आपके नेतृत्व में भाजपा सरकार ने पूरे पांच साल में सफाई कर्मी ही नहीं बल्कि पूरे SC, ST, OBC समुदाय के हितों का गला घोटा है और उनके संवैधानिक अधिकारों पर बज्र प्रहार किया है, इसलिए आप अब जो भी कर रहे हैं वह सिर्फ नौटंकी लगती है और कुछ नहीं. पूरा देश जानता है कि आप आजकल जो कुछ भी कर हैं केवल और केवल 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए कर रहे हैं.

ऐसे में आपके द्वारा सफाई कर्मचारियों के पैर धोने का क्या औचित्य रह जाता है जबकि 13 फरवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ द्वारा एक NGO की याचिका पर सुनवाई करते हुए 11 लाख से अधिक आदिवासियों को जमीन से बेदखल करने का आदेश दे दिया गया है. इस आदेश की वजह से करीब 20 राज्यों के आदिवासियों और जंगल में रहने वाले अन्य लोग प्रभावित होंगे. सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला इस वजह से भी आया क्योंकि केंद्र सरकार आदिवासियों और वनवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने एक कानून का बचाव नहीं कर सकी. खेदजनक तो ये भी है कि सरकार के द्वारा आदिवासियों के मुद्दों की वकालत करने के लिए कोई भी सरकारी वकील नहीं भेजा गया. इसे क्या कहें? सरकार की गरीब तबके के प्रति अनदेखी अथवा सरकार का जाति भावना से ग्रस्त होना? इस मामले में केंद्र सरकार की भूमिका बेहद ही गैरजिम्मेदाराना, दोषपूर्ण और संदिग्ध नजर आती है. क्या सरकार ने अपनी आदिवासी-विरोधी कार्पोरेट नीतियों को विस्तार देने के लिए ऐसा किया? कहा जाता है कि कानून की पवित्रता तभी तक तक बनी रह सकती है, जब तक वो लोगों की इच्छा/जरूरतों की अभिव्यक्ति करे. लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया है जो मुलनिवासी माने जाने वाले आदिवासियों की इच्छा के विरूद्ध है.

आदिवासी और वनवासियों के लिए काम करने वाली एक संस्था ‘अभियान फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी’ का आरोप है कि सुनवाई के समय केंद्र सरकार का वकील कोर्ट में मौजूद ही नहीं था. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद देशभर से आदिवासियों को जबरदस्ती जंगल की जमीन से बेदखल करने की घटनाएं सामने आएंगी. जाहिर है जमीन को अपनी ‘मां’ कहने वाले आदिवासी आसानी से जमीन खाली नहीं करेंगे, ऐसे में सैनिकों की मदद से बलपूर्वक उन्हें बेदखल किया जाएगा. इस बाबत हमें ब्राजील में घटी घटना का स्मरण होना चाहिए जिसके तहत वहाँ के आदिवासियों ने सरकार का अपने तरीके से भरपूर विरोध किया था. यहाँ तक कि परम्परागत हथियारों जैसे तीर कमान और भालों को जमकर इस्तेमाल किया गया था. शंका है कि कहीं वो ही अवस्था भारत में न आ जाए. अफसोस की बात तो ये है कि जिन आदिवासियों ने जंगलों को बचाया आज जंगल बचाने के नाम पर उन्हें ही उजाड़ा जा रहा है. आदिवासियों का जंगल से रिश्ता बहुत गहरा है. उनकी अस्मिता और अस्तित्व जंगल, नदी, पहाड़ से ही परिभाषित होता है. इसलिए जब भी किसी बाहरी ने उन्हें जंगल से बेदखल करने की कोशिश की है, आदिवासियों ने हमेशा विद्रोह किए हैं. अंग्रेजों ने आदिवासी इलाकों पर जबरन कब्जा करना शुरू कर दिया था जिसके खिलाफ आजादी की लड़ाई से भी पहले 18वीं और 19वीं सदी में आदिवासियों ने आंदोलन किये हैं. सही मायने में ये आंदोलन भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की शुरूआत मानी जानी चाहिए.

विदित हो कि बिरसा मुंडा शहीद हो गए लेकिन उनके आंदोलन के दबाव में अंग्रेज सरकार ने 1908 में आदिवासियों के वनाधिकारों को बचाने के लिए ‘छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट’ बनाया. बाद में इसी की तर्ज पर ‘संथाल परगना टेनेंसी एक्ट’ लाया गया. इनकी रोशनी में ही भारत के संविधान में आदिवासियों के अधिकारों संबंधी प्रावधान किये गए थे. किंतु सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी को एक ऐसा आदेश जारी किया है जो संभवतः आजाद भारत के इतिहास में आदिवासियों के खिलाफ तंत्र की तरफ से सबसे बड़ी कार्यवाही साबित होगी. सुप्रीम कोर्ट को आदिवासियों के विस्थापन को रोकने के लिए स्वत: संज्ञान लेना चाहिए.

इस संबंध में सोशल मीडिया के जरिए जस्टिस काटजू कहते हैं कि “मी लॉर्ड, आर्टिकल 21 भूल गए हैं जिसके जरिए संविधान हमें जीने का अधिकार देता है. मैं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बेहद दुखी हूं जिसमें कहा गया है कि 17 राज्यों के जंगलों में रहने वाले 10 लाख से भी ज्यादा आदिवासियों को जमीन खाली करके जाना होगा. मेरी अगुवाई में बनी बेंच द्वारा सुप्रीम कोर्ट (कैलाश वर्सेस स्टेट ऑफ महाराष्ट्र) का फैसला आया था. उसके मुताबिक, भारत प्रवासियों का देश है (जैसे कि नार्थ अमेरिका) यहाँ की 93 से 94% आबादी प्रवासियों की वंशज है. यहां पर मूलनिवासी तो द्रविड़ियन आदिवासी हैं (मसलन भील, गोंड, संथाल, टोडा जैसे आदिवासी) जिनका बेरहमी से कत्ल किया गया, जिनके साथ आक्रांता प्रवासियों ने बुरा बर्ताव किया और उन्हें जंगलों में रहने के लिए मजबूर कर दिया. ताकि वो अपना वजूद बचा सकें. और अब उन्हें जंगलों से भी भगाया जा रहा है. यह अति दुखदायी है कि अब वो कहां जाएंगे? क्या उन्हें अब समुद्र में फेंक दिया जाएगा? या गैस चैंबर में डाल दिया जाएगा? क्या फॉरेस्ट एक्ट संविधान द्वारा प्रदत्त आर्टिकल 21 के ऊपर है?”

इतना ही नहीं, आपके कार्यकाल में विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती के लिए 200 पाइंट रोस्टर के बदले 13 पाइंट रोस्टर लागू कर दिया गया; संसद मार्ग थाने के सामने देश का संविधान जलाया गया. जातिगत भावना के तहत दलितों के विरोध में ही कार्य किए गए. अब तो इस कार्यकाल में आपके पास समय ही शेष नहीं रह गया है ताकि आप अपनी कथनी और करनी के सवालों को हल कर सकें. अगला दौर किसका होगा … कौन जाने?

  • लेखक तेजपाल सिंह ‘तेज’ स्वतंत्र लेखक हैं।

यूएसए बेस्ड ‘अम्बेडकर अवार्ड 2018’ भंवर मेघवंशी सहित तीन को

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नई दिल्ली। दलित आदिवासी एवं घुमन्तू अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के संस्थापक सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार, लेखक व चिंतक भंवर मेघवंशी को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त “अम्बेडकर अवार्ड 2018” दिया जायेगा. संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित संगठन ‘फ्रेंड्स फ़ॉर एजुकेशन इंटरनेशनल’ (एफ एफ ई आई) भारत में ग्रासरूट पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं व संघर्षशील व्यक्तियों को अम्बेडकर अवार्डस देता है.

बेजवाड़ा विल्सन

एफ एफ ई आई के संस्थापक अध्यक्ष बेंजामिन कैला ने लॉस एंजेल्स में बताया कि इस वर्ष भारत की तीन शख्सियतों को यह अवार्ड से दिया जायेगा, जिसमें भंवर मेघवंशी भी शामिल हैं. संगठन के अमेरिका स्थित ऑफिस ने सोशल मीडिया पर अम्बेडकर अवार्ड 2018 के विजेताओं के नाम की घोषणा करते हुए जानकारी दी कि इस वर्ष का अवार्ड जातिवाद के खिलाफ लड़ रही अमृता प्रणय (तमिलनाडु), सफाई कर्मचारी आंदोलन के नेता बेजवाड़ा विल्सन (आंध्रप्रदेश) वह जमीनी स्तर पर संघर्षरत सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी (राजस्थान) को इस सम्मान से नवाजा जायेगा.

मेघवंशी को उनके द्वारा वंचित वर्गों के मध्य विगत दो दशकों से किये जा रहे कामों को देखते हुए यह अवार्ड देने का फैसला किया गया है. अमेरिका में स्थित पेरियार इंटरनेशनल उनके अवार्ड को स्पॉन्सर कर रही है. अवार्ड की घोषणा करते हुए संस्था के अध्यक्ष बेंजामिन कैला ने बताया कि उनका संगठन विगत कुछ वर्षों से भारत में सामाजिक न्याय व समानता के अम्बेडकरवादी मूल्यों के लिए लड़ने वाले लोगों का चयन कर उन्हें पुरुस्कृत करता है. इस अवार्ड के तहत 50 हजार रुपये की राशि और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है.

पति प्रणय की फोटो के सामने अपने बच्चे के साथ अमृता प्रणय

जबकि बेजवाड़ा विल्सन सफाई कर्मचारी आंदोलन के अगुवा हैं. उन्हें भारत सरकार मैग्सेसे अवार्ड से भी सम्मानित कर चुकी है. विल्सन सफाई कर्मचारियों के हक के लिए देश भर में आंदोलन करते हैं. दूसरी ओर अमृता का नाम तब सुर्खियों में आया था जब उनके पति प्रणय को उन्हीं के घरवालों ने हत्या कर दी थी. प्रणय दलित समाज का युवा था और अमृता का ताल्लुक कथित सवर्ण समाज से. दोनों ने अपनी मर्जी से शादी कर ली थी, जिससे अमृता के घरवाले नाराज थे. प्रणय की हत्या के वक्त अमृता गर्भवती थी और उसने हाल ही में बच्चे को जन्म दिया है. पति की हत्या के बाद अमृता ने समाज के बीच गैरबराबरी के खिलाफ लड़ने की बात कही थी.

(विशेष प्रतिनिधि)