डिक्की का डॉ. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र से समझौता

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नई दिल्ली। खबर पिछले हफ्ते की है लेकिन महत्वपूर्ण है. 20 जुलाई को आई खबर के मुताबिक दलित उद्यमिता पर अनुसंधान के माध्यम से अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के सशक्तिकरण के लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के तहत आने वाले डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र (डीएआईसी) और दलित भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (डिक्की) के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुआ है. इस समझौते को लेकर केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने संयुक्त प्रयास की सराहना की और कहा कि समझौता ज्ञापन का उद्देश्य दलित उद्यमिता पर शोध और इन समुदायों की महिलाओं और युवाओं के बीच कौशल विकास की क्षमता विकसित कर एससी और एसटी समुदायों का सशक्तिकरण करना है.


A memorandum of understanding was signed between the Dr Ambedkar International Centre (DAIC) under the Ministry of Social Justice and Empowerment and the Dalit Indian Chamber of Commerce and Industry (DICCI) for empowerment of SC and ST communities through research on Dalit entrepreneurship.

Union Minister for Social Justice and Empowerment Thaawarchand Gehlot, applauded the applauded the joint effort and said the aims of the MoU include empowerment of SC and ST communities through research on Dalit entrepreneurship, building skill development capacity among women and youth of such communities.

DICCI brings together all Dalit entrepreneurs under one umbrella, and acts as their one-stop resource centre, while promoting entrepreneurship among the youth as a solution to their socio-economic problems.

According to an official statement, “The DAIC, through this collaboration, will also try to find out how far the SC and ST communities have engaged themselves in starting and establishing their own businesses.”

“The data will be used to identify the reason why the spirit of entrepreneurship has not been infused among Dalit youth to develop business leadership for empowering them to walk in step with the world,” it said.

The main areas of collaboration will include strengthening ties between DAIC and industrial organisations in the fields of research and training, creating a knowledge bank which may be used to facilitate scholars, researchers and policy makers and exchanging academic materials and publications.

It will also include conducting lecture programmes, seminars, symposiums and other types of academic discussions and undertake joint research attachment of staff for purposes of curriculum development and review.

Both DAIC and DICCI will be having rights on intellectual property and knowledge products created through collaborative efforts. The MoU will also provide free of cost mutual access to facilities available at their campus for purpose of fundamental academic research.

7 जुलाई को सीटीईटी परीक्षा से पहले जान लें ये 5 खास बातें

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) 7 जुलाई को केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करेगा. सीटीईटी एडमिट कार्ड जारी कर दिए गए हैं. जिन अभ्‍यर्थियों ने इस परीक्षा के लिए फॉर्म भरा है वे ऑफिशियिल वेबसाइट ctet.nic.in के जरिये अपना एडमिट कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं. बोर्ड के मुताबिक CTET paper 1 के लिए 8,17,892 उम्मीदवारों ने और 4,27,897 उम्मीदवारों ने पेपर 2 के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है. 8,38,381 उम्मीदवार ऐसे हैं जिन्होंने दोनों पेपरों के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है. 1. बोर्ड ने अभ्यर्थी को परीक्षा शुरू होने के 90 मिनट पहले केंद्र पर प्रवेश कर जाने का निर्देश दिया है. परीक्षा दो पालियों में ली जायेगी. प्रथम पाली सुबह 9.30 से 12 बजे तक और दूसरी पाली दो बजे से 4.30 बजे तक आयोजित होंगी. दोनों पेपर 150-150 मार्क्स के होंगे.

2. पेपर पेन पेपर मोड में होगा. परीक्षार्थियों को OMR शीट पर अपने उत्तर देने होंगे. दोनों पेपरों में 150-150 मल्टीपल च्वॉइस प्रश्न पूछे जाएंगे.

3. पेपर-1 में चाइल्ड डेवलपमेंट एंड पेडगोजी, लेग्वेंज I, लेंग्वेज II, मैथ्स, पर्यावरण से जुड़े प्रश्न पूछे जाएंगे. प्रत्येक विषय से 30-30 प्रश्न पूछे जाएंगे. प्रत्येक सेक्शन 30-30 मार्क्स का होगा. पेपर नंबर – 2 में चाइल्ड डेवलपमेंट एंड पेडगोजी, लेग्वेंज I, लेंग्वेज II, मैथ्स एंड साइंस (मैथ्स व साइंस के टीचर के लिए), सोशल साइंस/सोशल साइंस (सोशल स्टडीज/सोशल साइंस टीचर) से प्रश्न आएंगे. चाइल्ड डेवलपमेंट एंड पेडगोजी, लेग्वेंज I, लेंग्वेज II से प्रत्येक से 30-30 (30-30 मार्क्स) और मैथ्स एंड साइंस (मैथ्स व साइंस के टीचर के लिए), सोशल साइंस/सोशल साइंस (सोशल स्टडीज/सोशल साइंस टीचर) से 60-60 प्रश्न (60-60 मार्क्स) पूछे जाएंगे.

4. उम्मीदवार परीक्षा केंद्र पर अपना ऑरिजनल एडमिट कार्ड, दो बॉल पेन (काला/नीला) जरूर लेकर जाएं. साथ ही फोटो आईडी भी लेकर जाएं.

5. मोबाइल, ईयरफोन, हाथ में बांधने वाली घड़ी, कैमरा, ब्लूटूथ, कैलकुलेटर, पेपर, स्केल जैसी चीजें प्रतिबंधित हैं.

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नदी किनारे पड़ी पिता से लिपटी मासूम की मौत की यह तस्वीर दुनिया को झकझोर रही है

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मेक्सिको सिटी। भला कौन भूल सकता है करीब 4 साल पहले एक 3 साल के सीरियाई बच्चे एलन कुर्दी के शव की उस तस्वीर को, जिसने दुनिया को झकझोर दिया था. अब एक ऐसी ही और तस्वीर सामने आई है. बस जगह बदल गई है. भूमध्य सागर की जगह दक्षिणी अमेरिका और उत्तरी मेक्सिको में बहने वाली नदी रियो ग्रैंड है. एलन कुर्दी की जगह मेक्सिको के ऑस्कर अल्बर्टो मार्टिनेज रैमिरेज (25) और उनकी 23 महीने की बेटी वलेरिया है. अमेरिका में शरण की हसरत लिए बाप अपनी बेटी को पीठ पर लाद नदी तैरकर पार कर रहा था, ताकि यूएस के टेक्सस पहुंच जाए. लेकिन दोनों डूब गए. उनका शव रियो ग्रैंड नदी के किनारे औंधे मुंह पड़ा हुआ था. 23 महीने की बेटी का सिर बाप की टी-शर्ट में है. उसका एक हाथ पिता की गर्दन के पास है. वैसे भी कहा जाता है कि एक तस्वीर हजारों शब्दों के बराबर होती है लेकिन इस तस्वीर को आखिर कोई कैसे बयां करे, अनगिनत पन्ने भर दें तब भी बयां नहीं हो सकती. इस तस्वीर ने प्रवासियों और शरणार्थियों की समस्या पर दुनियाभर में बहस छेड़ दी है.

इंसानी सरहदों की भेंट चढ़े बाप-बेटी तस्वीर किसी को भी झकझोर देगी, दहला देगी, विचलित कर देगी. पुल बंद था तो पिता ने बेटी के साथ पार करने का फैसला किया. मां भी साथ में थी लेकिन वह बीच से लौट आई. सोचिए, उस मासूम को कहां पता होगा कि सरहदें क्या हैं, दुनिया क्या है, दुनियादारी क्या है, देश क्या है, परदेस क्या है…? एक मासूम के लिए माता-पिता का साया ही सुरक्षा का अहसास होता है, इस बात की गारंटी होती है कि कोई डर नहीं है. जब वह मासूम नदी में अपने पिता की पीठ पर लदी होगी तब भी उसमें यही अहसास रहा होगा. बीच-बीच में उसने छोटे-छोटे हाथों से पानी में छपाक-छपाक भी किया होगा. पिता की पीठ पर लदी मासूम पानी से अठखेलियां भी की होगी. उसे क्या पता था कि कुछ देर बाद न वह रहेगी, न उसकी सुरक्षा का कवच पिता रहेगा. उसे तो यह भी कहां पता था कि मौत क्या है. तस्वीर देखिए, पिता अपनी टी-शर्ट में अपने जिगर के टुकड़े को छुपा लिया था, लेकिन उसे मौत से नहीं छिपा पाया, खुद भी नहीं छिप पाया. तस्वीर हिला देने वाली है लेकिन सोचिए, उस मां, उस पत्नी पर क्या गुजरी होगी जिसने अपने सामने इस मंजर को देखा था. मार्टिनेज रैमिरेज और वलेरिया इंसान के बनाए सरहदों की बलि चढ़ गए.

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भारतीय टीम की नारंगी जर्सी के ज़रिए भगवाकरण का आरोप

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भारतीय क्रिकेट टीम की विश्व कप में दूसरी जर्सी पर विवाद हो गया है. भारतीय टीम 30 जून को इंग्लैंड के ख़िलाफ़ होने वाले मैच में नारंगी रंग की जर्सी पहनेगी.

जनसत्ता में प्रकाशित समाचार के अनुसार इस जर्सी पर राजनीति शूरू हो गई है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं को इस जर्सी के पहनने के पीछे भगवाकरण का संदेह लग रहा है.

अख़बार लिखता है कि इस मामले पर मुंबई से समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आसिम आज़मी ने प्रधानमंत्री मोदी पर हर चीज़ का भगवाकरण करने के प्रयास का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा है कि मोदी पूरे देश को भगवा रंग में रंगना चाहते हैं.

कांग्रेस विधायक नसीम ख़ान ने भी आज़मी के आरोप का समर्थन किया है और भगवाकरण का आरोप लगाया है. भाजपा ने इसका मज़ाक़ बनाते हुए इसे संकुचित सोच बताया है.

वहीं अख़बार ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा के बयान को प्रकाशित किया है. आनंद शर्मा का कहना है कि टीम की ड्रेस राजनीतिक विषय नहीं है और वह विश्व विजेता बनने की कामना करते हैं.

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1 जुलाई से लागू होंगे ये 5 नए नियम, करेंगे आपको प्रभावित

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आने वाले महीने यानी 1 जुलाई से ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन और होम लोन से जुड़े नए नियम लागू होने वाले हैं. इन नए नियमों या बदलाव के बाद देश के करोड़ों ग्राहकों की लाइफ बदल जाएगी. आइए जानते हैं ऐसे ही बड़े बदलाव के बारे में.

ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन में बदलाव अगर आप ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन करते हैं तो 1 जून से आपको बड़ी राहत मिलने वाली है. दरअसल, रिजर्व बैंक ने आम आदमी को राहत देते हुए RTGS और NEFT लेनदेन पर लगाए गए शुल्क को हटा दिया है.

इसका मतलब यह हुआ कि अब रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (RTGS) और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर (NEFT) के जरिए ट्रांजेक्‍शन करने वाले लोगों को किसी भी तरह का एक्‍स्‍ट्रा चार्ज नहीं देना होगा. इसके अलावा आरबीआई ने RTGS के जरिए पैसे भेजने का समय डेढ़ घंटे बढ़ाकर शाम 6 बजे तक कर दिया है.

होम लोन में बदलाव अगर आप स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया के ग्राहक हैं तो 1 जुलाई से होम लोन से जुड़े एक बदलाव के लिए तैयार रहें. दरअसल, SBI के ग्राहकों को 1 जुलाई से रेपो रेट से जुड़े होम लोन ऑफर किए जाएंगे. इसका मतलब यह हुआ कि एसबीआई की होम लोन की ब्याज दर पूरी तरह रेपो रेट पर आधारित हो जाएगी. यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जितनी बार रेपो रेट में बदलाव करेगा उतनी बार होम लोन के ब्‍याज दरों में भी बदलाव होगा. फिलहाल, एसबीआई अपने तरीके से ब्‍याज दरों में कटौती करता है.

आने वाले महीने यानी 1 जुलाई से ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन और होम लोन से जुड़े नए नियम लागू होने वाले हैं. इन नए नियमों या बदलाव के बाद देश के करोड़ों ग्राहकों की लाइफ बदल जाएगी. आइए जानते हैं ऐसे ही बड़े बदलाव के बारे में.

ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन में बदलाव अगर आप ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन करते हैं तो 1 जून से आपको बड़ी राहत मिलने वाली है. दरअसल, रिजर्व बैंक ने आम आदमी को राहत देते हुए RTGS और NEFT लेनदेन पर लगाए गए शुल्क को हटा दिया है.

इसका मतलब यह हुआ कि अब रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (RTGS) और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर (NEFT) के जरिए ट्रांजेक्‍शन करने वाले लोगों को किसी भी तरह का एक्‍स्‍ट्रा चार्ज नहीं देना होगा. इसके अलावा आरबीआई ने RTGS के जरिए पैसे भेजने का समय डेढ़ घंटे बढ़ाकर शाम 6 बजे तक कर दिया है.

होम लोन में बदलाव अगर आप स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया के ग्राहक हैं तो 1 जुलाई से होम लोन से जुड़े एक बदलाव के लिए तैयार रहें. दरअसल, SBI के ग्राहकों को 1 जुलाई से रेपो रेट से जुड़े होम लोन ऑफर किए जाएंगे. इसका मतलब यह हुआ कि एसबीआई की होम लोन की ब्याज दर पूरी तरह रेपो रेट पर आधारित हो जाएगी. यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जितनी बार रेपो रेट में बदलाव करेगा उतनी बार होम लोन के ब्‍याज दरों में भी बदलाव होगा. फिलहाल, एसबीआई अपने तरीके से ब्‍याज दरों में कटौती करता है.

कार खरीदना होगा महंगा अगर आप महिंद्रा या मारुति की कार खरीदने की सोच रहे हैं तो 1 जुलाई से भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. दरअसल, ऑटोमोबाइल कंपनी महिंद्रा ने अपने पैसेंजर व्‍हीकल्‍स की कीमत में 36,000 रुपये तक का इजाफा किया है. इसी तरह मारुति सुजुकी इंडिया ने अपनी लोकप्रिय कॉम्पैक्ट सेडान कार डिजायर की कीमत में 12,690 रुपये तक की वृद्धि की है.

स्‍मॉल सेविंग स्‍कीम्‍स की ब्‍याज दर पर कैंची! अगर आप पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF), सुकन्या योजना या फिर नेशनल सेविंग स्‍कीम (NSC) के तहत निवेश करते हैं तो आपको 1 जुलाई से बड़ा झटका लग सकता है. मीडिया रिपोर्ट की मानें तो मोदी सरकार स्मॉल सेविंग्स स्कीम पर ब्‍याज दर में कटौती करने की तैयारी में है. सरकार जल्‍द ही इसको लेकर नोटिफिकेशन जारी कर सकती है. यह कटौती जुलाई-सितंबर की अवधि के लिए 0.30 फीसदी तक की हो सकती है.

BSBD अकाउंट के नियम भी बदलेंगे 1 जुलाई से बेसिक सेविंग बैंक अकाउंट (BSBD अकाउंट) को लेकर कई नियम बदलने जा रहे हैं. इसका मतलब ऐसे खातों से है, जिसे शून्य राशि से खोला जा सकता है. ऐसे बैंक खाताधारकों का कैश डिपॉजिट फ्री में होगा. इसके अलावा, ऑनलाइन बैंकिंग की मदद से पैसा भेजने और मंगाने पर किसी तरह का चार्ज नहीं लगेगा. वहीं सरकारी स्कीम का पैसा चेक से निकालना चाहते हैं तो इसके लिए कोई चार्ज नहीं भरना होगा. यही नहीं, साथ ही सरकारी रकम की चेक से निकासी और जमा पर कोई चार्ज नहीं लगेगा.

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झारखंड में मॉब लिंचिंग के शिकार तबरेज अंसारी के परिजनों के नए बयान से मामला उलझा

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रांची। झारखंड में बाइक चोरी के शक में पीट-पीटकर मार डाले गए तबरेज अंसारी के एक रिश्तेदार का दावा है कि उसे जहरीला पानी दिया गया था. तबरेज के रिश्तेदार मोहम्मद मसरूर ने बताया, ‘तबरेज के साथ मारपीट के बाद उसे ‘धतूरा’ मिला हुआ पानी दिया गया था.’ साथ ही बताया कि इस मामले में चार्जशीट तुरंत फाइल होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए.’ इस मामले में मुख्य आरोपी सहित 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और दो पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया. कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय जनता दल और लेफ्ट पार्टियों ने सीबीआई की मांग करते हुए राजभवन पर धरना प्रदर्शन किया.

वहीं, झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग की तीन सदस्यीय टीम ने मंगलवार को तबरेज अंसारी के गांव का दौरा किया. आयोग के अध्यक्ष मोहम्मद कमाल खान ने कहा, ‘हमने मृतक के गांव, कदमडीह का दौरा किया, साथ ही घटनास्थल का भी दौरा किया और मृतक के परिवार के सदस्यों से जानकारी एकत्र किया है.’ उन्होंने कहा कि पुलिस और जिला प्रशासन ने अपराधियों को पकड़ने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए सभी जरूरी उपाय किए हैं.

तबरेज की हत्या किये जाने के विरोध में सैकड़ों लोग यहां जंतर-मंतर पर जुटे और उन्होंने पिछले सप्ताह हुई इस घटना के मामले में प्रदेश के मुख्यमंत्री रघुबर दास से इस्तीफे की मांग की. प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व करते हुए, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद ने कहा कि यह ‘‘शर्मनाक” है कि विपक्ष को इस जघन्य घटना के बारे में बोलने के लिए एक सप्ताह का समय लग गया. उमर ने भीड़ द्वारा पीट पीट कर हत्या किये जाने की घटना पर अंकुश लगाने के लिए ‘‘निर्भया जैसे आंदोलन” का आह्वान भी किया.

उमर ने कहा, ‘‘लोगों को सड़कों पर उतरने की आवश्यकता है क्योंकि दोषियों को राजनीतिक संरक्षण दिया जा रहा है.’ पूर्व छात्र नेता ने कहा, ‘हमारा गुस्सा विपक्ष पर भी है. आज वे कहां हैं।’ प्रदर्शनकारी अपने हाथ में तख्तियां लिये हुए थे। उन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और दास का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा मांगा. इस प्रदर्शन में भाकपा नेता कन्हैया कुमार ने भी हिस्सा लिया.

बता दें, झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले में भीड़ ने तबरेज अंसारी को चोरी के संदेह में कथित रूप से पीट पीट कर मार डाला था. तबरेज अंसारी की 17 जून को पिटाई की गई और 22 जून को उसने दम तोड़ दिया.

मॉब लिंचिंग पर मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है कड़ा कानून

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गाय के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए मध्य प्रदेश सरकार कड़ा कानून बनाने जा रही है. इस कानून के तहत खुद को गोरक्षक बताकर हिंसा करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. सरकार ये संशोधित विधेयक विधान सभा के मानसून सत्र में पेश कर पारित कराना चाहती है. अगर विधेयक पारित होता है तो मध्य प्रदेश में इस तरह के मामलों के लिए अलग से कानून बन जाएगा.

अभी क्या है कानून

मध्य प्रदेश में अभी जो कानून लागू है, उसके तहत गोवंश की हत्या, गोमांस रखने और उसके परिवहन पर पूरी तरह रोक है. इसमें गोवंश के नाम पर हिंसा या मॉब लिंचिंग का जिक्र नहीं है.

संशोधित कानून कैसा होगा

संशोधन के बाद अब कोई व्यक्ति गोवंश का वध, गोमांस और गोवंश का परिवहन, मांस रखना या सहयोग करना या इसके अंतर्गत कोई हिंसा या क्षति नहीं करने पर पांच साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान होगा.

हिंदुस्तान बना ‘लिंचिस्तान’!

देश में कभी चोरी तो कभी गाय के नाम पर हिंसा के मामले में आए दिन मामले सामने आते रहते हैं. अभी हाल ही में झारखंड के सरायकेला खरसावां में चोरी के शक में गुस्साई भीड़ ने एक युवक को इतना पीटा की उसकी मौत हो गई. युवक की पहचान तबरेज अंसार के रूप में हुई. तबरेज की उम्र 22 साल थी और उसने इलाज के दौरान दम तोड़ा था.

झारखंड देश का इकलौता राज्य नहीं है जहां मॉब लिंचिंग की घटना हुई हो. पिछले कुछ सालों में हिंदुस्तान में कई लिंचिस्तान बन गए हैं. इनमें प्रमुख हैं – उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, गुजरात और राजस्थान. मॉब लिंचिंग में देश में जितने लोग मारे गए उनमें से 7 फीसदी महिलाएं भी हैं.

गोरक्षा के नाम पर सबसे ज्यादा मॉब लिंचिंग

देश में 2009 से 2019 तक हेट क्राइम के 287 बड़े मामले हुए हैं. इनमें 98 लोगों की मौत हुई है, जबकि 722 लोग जख्मी हुए हैं. इनमें सबसे ज्यादा 59% मुस्लिम, 14% हिंदू और 15% ईसाई हैं. सबसे ज्यादा 28% हमले गोरक्षा के नाम पर, 13% हमले दो धर्म के लोगों में प्रेम प्रसंग पर, 9% धार्मिक हिंसा और 29% हमले अन्य कारणों से हुए. गोरक्षा के नाम पर ही सबसे ज्यादा मॉब लिंचिंग मामले सामने आए हैं. 2014 से अब तक पूरे देश में 125 मामले सामने आए हैं. इन मामलों में 48 लोगों की मौत हुई. जबकि 252 लोग घायल हुए हैं. (स्रोत- सभी आंकड़े फैक्टचेकर डॉट इन और इंडियास्पेंड से.)

आखिर होती क्यों है मॉब लिंचिंग?

लोगों के चोरी, गोरक्षा, मान-सम्मान और धर्म के नाम पर भड़काया जाता है. आजकल इसका सबसे बड़ा माध्यम है सोशल मीडिया. भड़की हुई भीड़ बहुत जल्द गुस्सा हो जाती है. यही गुस्साई भीड़ हत्यारी बन जाती है. ऐसी भीड़ यह नहीं देखती कि पीड़ित किस काम से आया है. ये भीड़ तर्कहीन होती है. विवेकहीन होती है. इसीलिए असम में मछली पकड़ने गए दो युवकों को मार दिया जाता है. झारखंड में मॉब लिंचिंग की हर साल खबर आती है. दादरी कांड जहां अचानक भीड़ ने अखलाक के खुशहाल परिवार को शक के बिना पर मार डाला.

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जेल से बाहर आने की कोशिश में लगे राम रहीम का बड़ा राज आया सामने

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चंडीगढ़/सिरसा़। सुनारिया जेल में दुष्‍कर्म की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत के पैरोल में बड़ा पेंच फंस गया है. किसी तरह से जेल से बाहर आने की कोशिश में लगे गुरमीत के बारे में बड़ा खुलासा हुआ है. उसने खेती के नाम पर 42 दिनों का पैरोल मांगा है, लेकिन जांच मेंं सामने आया है कि उसके नाम पर न तो कोई खेत है और न ही वह काश्‍तकार है. इस बीच राम रहीम की पैरोल पर सीएम मनोहर लाल ने कहा कि कुछ कानूनी प्रक्रियाएं हैं. पैरोल लेने का अधिकार रखने वाला व्यक्ति इसकी तलाश कर सकता है. हम ऐसा करनेे से किसी को रोक नहींं सकते. हालांकि अभी तक राम रहीम की पैरोल पर कोई फैसला नहीं हुआ है. उधर, छत्रपति साहू के बेटे अंशुल ने कहा कि अगर राम रहीम को पैरोल दी जाती है तो वह इसके खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे.

दूसरी ओर, हरियाणा सरकार ने गुरमीत के प्रति पॉजिटिव रुख दिखाया है. ऐसे में दो साध्वियों से दुष्‍कर्म के मामले में सुनारिया जेल में सजा काट रहे डेरा सच्‍चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के पैराेल पर जेल से बाहर आने को लेकर सस्‍पेंस गहरा गया है. पूरे मामले में विपक्ष भी कुछ नहीं बोल रहा है. पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि यह तो सरकार की मर्जी है और उसे फैसला लेना है.

हरियाणा के जेल मंत्री कृष्‍णलाल पंवार ने कहा कि इस बारे में निर्णय प्रशासन लेगा, लेकिन गुरमीत पैराेल का हकदार है. जेल में उसका आचरण अच्‍छा रहा है. इसके साथ ही स्‍वास्‍थ्‍य व खेल मंत्री अनिल विज ने भी गुरमीत राम रहीम को पैराेल दिए जाने का समर्थन किया है. हरियाणा के गृह सचिव ने कहा है कि गुरमीत राम रहीम की अर्जी पर अभी विचार किया जा रहा है.

सिरसा के तहसीलदार ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि सिरसा में गुरमीत राम रहीम के नाम न तो कोई खेती योग्‍य जमीन है और न ही वह काश्‍तकार (ठेके पर खेती करने वाला) है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सिरसा में जो चल-अचल संपत्ति है, वह डेरा सच्चा सौदा के नाम दर्ज है. ऐसे में पैरोल के लिए खेती करने के मामले में पेंच फंस गया है. डेरा प्रमुख के नाम जमीन संबंधी जानकारी पुलिस ने सिरसा के तहसीलदार से मांगी थी. तहसीलदार ने अपनी रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी है. उधर, डीसी ने सिरसा एसडीएम से भी पैरोल के संबंध में रिपोर्ट मांगी है.

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बसपा के सपा से गठबंधन तोड़ने पर भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर ने दिया बयान

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नई दिल्ली। भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर ने पहली बार सीधे तौर पर बीएसपी प्रमुख मायावती पर निशाना साधा है. चंद्रशेखर ने बुधवार को मायावती पर कांशीराम द्वारा शुरू किए गए सामाजिक न्याय आंदोलन को कमजोर करने के प्रयास का आरोप लगाया है. चंद्रशेखर ने कहा कि मायावती ने समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन तोड़कर बहुजन आंदोलन को कमजोर कर दिया है. उन्होंने कहा, ‘यह फैसला उन कमजोर वर्ग के लोगों के पक्ष में नहीं है, जिन्हें इस गठबंधन से मजबूती मिली थी’. चंद्रशेखर ने कहा कि बसपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी ताकत खो दी है. भीम आर्मी प्रमुख ने कहा, “जब उन्होंने सपा के साथ गठबंधन की घोषणा की, तो बसपा कार्यकर्ताओं ने खुद को आश्वस्त किया कि पार्टी आगे बढ़ेगी, लेकिन तभी उन्होंने गठबंधन तोड़ कर सभी को निराश कर दिया”.

भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर ने भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने और अपने भाई आनंद कुमार और भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के शीर्ष पदों पर नियुक्त करने पर भी मायावती को आड़े हाथों लिया. यह पूछे जाने पर कि क्या 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी भाग लेगी, उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर अभी तक निर्णय नहीं लिया गया है. आपको बता दें कि बसपा सुप्रिमो मायावती हमेशा चंद्रशेखर की आलोचना करती रही हैं. उन्होंने चंद्रशेखर को भाजपा की बी टीम तक कहा लेकिन, ऐसा पहली बार है जब भीम आर्मी प्रमुख ने बसपा अध्यक्ष पर हमला बोला है.

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जेल में हथियार लहराने का वीडियो वायरल, जानिए आखिर क्या हुआ था

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उन्नाव जेल मामले में बुधवार को बड़ी कार्रवाई हुई. उन्नाव जेल अधीक्षक एके सिंह की रिपोर्ट पर चार जेलकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई है. दो हेड वार्डर और दो जेल वार्डर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश जारी किए गए हैं. अब चारों जेलकर्मियों के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई की जाएगी. आपको बता दें कि यहां उम्रकैद की सजा काट रहे दो कैदियों का जेल के अंदर हथियार लहराते वीडियो वायरल हुआ था. मामले पर हड़कंप मचते ही जिलाधिकारी ने जेल अधीक्षक को कड़ी फटकार लगाते हुए रिपोर्ट तलब की थी.

उन्नाव जेल में तैनात हेड वार्डर माता प्रसाद और हेमराज के साथ जेल वार्डर सलीम और अवधेश साहू के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं. इन्हीं 4 जेलकर्मियों की मिलीभगत से बदमाशों ने हथियार लहराते वीडियो बनाया और उसे वायरल किया था. अब जेल विभाग में बदमाशों से मिलीभगत करने वाले जेलकर्मियों को भी बर्खास्त करने की तैयारी है.

घटना प्रकाश में आने के बाद बुधवार शाम जिलाधिकारी देवेंद्र कुमार पांडेय, एसपी माधव प्रसाद वर्मा, एडीएम राकेश कुमार सिंह, एएसपी विनोद कुमार पांडेय, सीओ सिटी उमेश चंद्र त्यागी समेत आधा दर्जन अधिकारी जिला जेल पहुंच कर छानबीन की. वीडियो वायरल होने से हुई बदनामी पर डीएम ने जेल अधीक्षक एके सिंह और जेलर बृजेंद्र सिंह को फटकार लगाई और मामले की फौरन तफ्तीश के लिए रिपोर्ट तलब की.

अब तक की जांच में हेड जेल वार्डर माता प्रसाद, हेमराज, जेल वार्डर अवधेश साहू और सलीम खां की मिलीभगत पाई गई है. जिला प्रशासन अब इन्हें बर्खास्त करने की तैयारी में लगा है. जांच में पाया गया कि एक साजिश के तहत हथियार लहराते वीडियो को वायरल किया गया.

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भाजपा नेता के बिगड़े विधायक बेटे के खिलाफ निगम कर्मियों ने खोला मोर्चा

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भाजपा के बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय के विधायक बेटे आकाश विजयवर्गीय द्वारा खुलेआम निगम अधिकारी से मारपीट करने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. बुधवार को इस घटना के बाद नगर निगम ने भी अपने तेवर सख्त कर दिए हैं. इंदौर नगर निगम के इस मामले में 21 कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया है. इन पर आरोप है कि इन लोगों ने बीजेपी विधायक आकाश विजयवर्गीय का साथ दिया था.

 इसके साथ ही बीजेपी विधायक आकाश विजयवर्गीय पर कार्रवाई की मांग भी जोर पकड़ने लगी है. विधायक की गुंडागर्दी के विरोध में इंदौर नगर निगम में कर्मचारियों ने काम ठप्प कर दिया है और सड़क पर उतर आए हैं. निगम के सभी विभागों के कर्मचारियों ने काली पट्टी बांधकर आकाश विजयवर्गीय के खिलाफ विरोध जताया. खास बात यह है कि इस मामले में सफाई देने और अपने बिगड़े विधायक बेटे की गलती मानने की बजाय भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय अपने बेटे का बचाव करने में जुटे हैं.

भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का विधायक बेटा सरेआम गुंडागर्दी करते हुए

गौरतलब है कि आकाश विजयवर्गीय इंदौर 3 से बीजेपी विधायक है. उसने बुधवार को गंजी कंपाउंड इलाके में नगर निगम की टीम के काम में बाधा डाला. नगर निगम की टीम एक जर्जर मकान ढहाने गयी थी. लोग इसका विरोध कर रहे थे. उसी दौरान आकाश भी अपने समर्थकों के साथ वहां पहुंच गया और कार्रवाई का विरोध करने लगा. उसने खुलेआम अधिकारियों को चेतावनी भी दी. उसकी गुंडागर्दी यहीं नहीं रुकी बल्कि उसने निगम की जेसीबी मशीन की चाभी निकाल ली. आकाश विजयवर्गीय और निगम अधिकारियों के बीच इस दौरान तीखी बहस हुई. उसके बाद आकाश ने बैट उठाया और सरेआम गुंडागर्दी दिखाते हुए नगर-निगम के अफसर को पीटना शुरू कर दिया.

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‘धार्मिक उन्माद’ पर मायावती ने बोला भाजपा पर हमला

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की मुखिया मायावती ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर हमला बोला है. नीति आयोग की रिपोर्ट में यूपी की बदहाल सेवाओं और धर्म-जाति के नाम पर हो रहे अपराधों को लेकर माया ने सरकार पर निशाना साधा. बीएसपी चीफ ने बीजेपी को डबल इंजन वाली सरकार बताया और सवाल उठाया कि जातिवादी और धार्मिक उन्मादियों को सरकार क्यों मायावती ने झारखंड के चर्चित मॉब लिचिंग मामले में ट्वीट किया,’बीजेपी सरकारें ऐसे जातिवादी व धार्मिक उन्मादी जघन्य अपराध अपने राज्यों में लगातार क्यों होने देती हैं जिससे पूरा राज्य और वहां की सरकार ही नहीं बल्कि देश की भी बदनामी होती है और पीएम (नरेंद्र मोदी) को भी शर्मिंदा होना पड़ता है. वैसे अब तो पुलिस व सरकारी कर्मचारी भी इस नई आफत के शिकार हैं.’

नीति आयोग की ओर से जारी किए गए नैशनल हेल्थ इंडेक्स में उत्तर प्रदेश का स्थान देशभर में निचले पायदान (21वीं रैंक) पर है. यूपी की खराब स्वास्थ्य सेवाओं पर मायावती ने राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया. उन्होंने लिखा, ‘नीति आयोग की रिपोर्ट सरकार को लज्जित करने वाली है कि जनस्वास्थ्य के मामले में यूपी देश का सबसे पिछड़ा राज्य है.’

मायावती नीति आयोग की रिपोर्ट को लेकर जहां सरकार पर हमलावर हुईं वहीं सरकार को डबल इंजन वाली सरकार बताया. मायावती ने खराब स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सवाल उठाया कि बीजेपी की ऐसी डबल इंजन वाली सरकार का क्या लाभ? ऐसा विकास करोड़ों जनता के किस काम का जिसमें उसका जीवन पूरी तरह से नरक बना हुआ है?

मायावती ने मॉब लिचिंग को लेकर पूरे राज्य को जिम्मेदार बताया है. हालांकि इससे पहले बुधवार को लोकसभा में पीएम ने कहा था कि झारखंड में मॉब लिंचिंग की घटना से वह आहत हैं. उन्होंने कहा कि यह कहना कि झारखंड मॉब लिंचिंग का अड्डा बन गया है, ठीक नहीं है. उन्होंने कहा कि क्या झारखंड राज्य को दोषी बता देना सही है? जो बुरा हुआ है उसे अलग करें. लेकिन सबको कठघरे में रखकर राजनीति तो कर लेंगे. पूरे झारखंड को बदनाम करने का हक हमें नहीं है. वहां भी सज्जनों की भरमार है. न्याय हो, इसके लिए कानूनी व्यवस्था है.

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145वीं जयंती पर पूरे देश ने किया शाहूजी महाराज को याद

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भारत के समस्त शोषितों, पीड़ितों और ब्राह्मणी व्यवस्था की मारी जनता के हितैषी, उद्धारक एवं आरक्षण व्यवस्था के जनक तथा समतामूलक समाज के महान पक्षधर कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहू जी महाराज की 145 वीं जयंती पूरे देश में धूमधाम से मनाई जा रही है. इस मौके पर देश के अलग-अलग राज्यों में तमाम बहुजनवादी संगठन कार्यक्रम आयोजित कर शाहूजी महाराज को श्रद्धांजलि दे रहे हैं.

गौरतलब है की शाहूजी महाराज का जन्म 26 जून 1874 को कोल्हापुर में हुआ था. वह कोल्हापुर रियासत के राजा थे. उन्हें आरक्षण का जनक भी कहा जाता है. उनके प्रशासन में ज्यादातर ब्राह्मण जाति के लोग ही थे. इस एकाधिकार को समाप्त करने के लिए उन्होंने आरक्षण का कानून बनाया और अपनी रियासत में बहुजन समाज के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की. देश में आरक्षण की यह पहली व्यवस्था मानी जाती है.

शाहूजी महाराज महात्मा जोतिबा राव फुले से प्रभावित रहें और डॉ. अम्बेडकर के मददगार थे. उन्होंने 1912 में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और मुफ्त करने का कानून बनाकर शूद्रों एवं दलितों के लिए शिक्षा का दरवाजा खोला. 1917 में पुनर्विवाह का कानून भी पास किया. 6 मई 1922 को उनका निर्वाण हुआ.

भाजपा दिग्गज कैलाश विजयवर्गीय के विधायक बेटे ने की सरेआम गुंडागर्दी

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भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का विधायक बेटा सरेआम गुंडागर्दी करते हुए

भाजपा के विवादित नेता कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय ने निगम कर्मचारियों के साथ मारपीट की है. अपने पिता की बदौलत आकाश खुद इंदौर 3 विधानसभा सीट से विधायक है, लेकिन उसने जिस तरह से बीच सड़क पर गुंडागर्दी की है, वह हैरान करने वाला है. साफ दिख रहा है कि पिता के पद के घमंड में आकाश कानून की परवाह भी नहीं करता है. कैलाश विजयवर्गीय भाजपा के महासचिव हैं.

महासच‍िव और बंगाल में बीजेपी की जीत के सूत्रधार कैलाश विजयवर्गीय के बेटे ने इंदौर के भरे बाजार में गुंडागर्दी की हदें पार कर दी. कैलाश विजयवर्गीय के विधायक बेटे आकाश विजयवर्गीय ने नगर निगम अधिकारी को क्रिकेट बैट से  सरेआम पीटा. भीड़ वहां मूकदर्शक बनी रही. पुल‍िस को भी इस हालात को कंट्रोल करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी.

जानकारी के मुताबिक, गंजी कंपाउंड क्षेत्र में एक जर्जर मकान को तोड़ने के लिए निगम की टीम पहुंची थी. इस दौरान इंदौर तीन नंबर क्षेत्र से विधायक आकाश विजयवर्गीय भी वहां पहुंच गया. उसने निगम अधिकारियों को धमकी देते हुए उन्हें पांच मिनट में वहां से चले जाने को कहा, वरना नतीजा भुगतने को तैयार करने को कहा. आकाश की धमकी की परवाह किए बिना जब निगम अधिकारी अपना काम करने लगे तो आकाश उनसे भीड़ गया और हाथ में आए बैट से निगम अध‍िकारी को पीटने लगा. इसके बाद उनके साथ मौजूद लोगों ने पोकलेन की चाबी भी निकाल ली. इसके बाद निगम के अधिकारियों और विधायक के बीच जमकर विवाद हो गया और मारपीट होने लगे. आकाश विजयवर्गीय ने पोकलेन मशीन पर पथराव कर उसे फोड़ दिया. इस घटना के बाद स‍ियासी तूफान भी मच गया है.

हालांकि तमाम अधिकार होते हुए भी मामला भाजपा विधायक और कैलाश विजयवर्गीय से जुड़े होने के कारण पुलिस हाथ बांधे खड़ी रही और तुरंत आकाश पर कोई कार्रवाई नहीं की.

44 साल पहले लगी इमरजेंसी के बारे में वो बातें जो शायद आपको न पता हों

आधी रात को की गई आपातकाल की घोषणा

आज से ठीक 44 साल पहले देश में आपातकाल यानी इमरजेंसी लगा दी गई थी. इसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का काला अध्याय भी कहा जाता है. 25 जून 1975 की आधी रात को आपातकाल की घोषणा की गई थी जो 21 मार्च 1977 तक लगी रही. आइए जानते हैं इमरजेंसी को लेकर कुछ रोचक तथ्य –

1. तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी. 26 जून को रेडियो से इंदिरा गांधी ने इसे दोहराया.

2. आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा कि जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी.

3. आपातकाल के पीछे सबसे अहम वजह 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से इंदिरा गांधी के खिलाफ दिया गया फैसला बताया जाता है. यह फैसला 12 जून 1975 को दिया गया था.

4. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को रायबरेली के चुनाव अभियान में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का दोषी पाया था. साथ ही उनके चुनाव को खारिज कर दिया था. इतना ही नहीं, इंदिरा गांधी पर छह साल तक के लिए चुनाव लड़ने या कोई पद संभालने पर भी रोक लगा दी गई थी.

5. उस वक्त जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने यह फैसला सुनाया था. हालांकि 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश बरकरार रखा, लेकिन इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दी.

6. बताया जाता है कि आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था.

7. सुप्रीम कोर्ट ने 2 जनवरी, 2011 को यह स्वीकार किया था कि देश में आपातकाल के दौरान इस कोर्ट से भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था. आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) के तहत राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी शुरू हो गई थी.

8. गिरफ्तार होने वालों में जयप्रकाश नारायण, जॉर्ज फर्नांडिस और अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे. 21 महीने तक इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू रखा इस दौरान विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया.

9. आपातकाल लागू करने के लगभग दो साल बाद विरोध की लहर तेज होती देख प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग करके आम चुनाव कराने की सिफारिश कर दी. देश के लिए वो 21 माह जेल सरीखे बीते थे.

10. कहा जाता है कि आपातकाल के दौरान संजय गांधी और उनके दोस्तों की चौकड़ी ही देश को चला रहे थे और उन्होंने इंदिरा गांधी को एक तरह से कब्‍जे में कर लिया था.

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सिर काटने वाले बयान को लेकर विवाद में फंसे भाजपा सांसद

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भाजपा के एक सांसद ने कथित तौर पर यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि अगर कोई मुस्लिम लड़का आदिवासी लड़कियों का पीछा करता है, तो उसका सिर काट दिया जाएगा. आदिलाबाद के सांसद सोयम बापू राव का एक वीडियो कथित तौर पर सोमवार को वायरल हो गया.

एक वीडियो क्लिप में वह कथित तौर पर कह रहे हैं कि मैं मुस्लिम युवाओं से कहना चाहता हूं, कि अगर तुम हमारी आदिवासी लड़कियों का पीछा करने की कोशिश करते हो, तो तुम्हारा सिर काट दिया जाएगा. मैं आदिलाबाद जिले में अल्पसंख्यक युवा भाइयों से अनुरोध कर रहा हूं, हमारी लड़कियों का पीछा न करें.

इसमें उन्होंने कहा कि तुम्हारे लिए मुश्किल हो जाएगा अगर हमने तुम्हारा पीछा करना शुरू कर दिया. अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं का एक समूह अदिलाबाद पुलिस से मिलकर भाजपा सांसद के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है.

 

झारखंड मॉब लिंचिंग: दो महीने पहले हुई थी मृतक की शादी

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तबरेज की पत्नी शाइस्ता परवीन

सराईकेला मॉब लिंचिंग मामले में मृतक शम्स तबरेज की दो महीने पहले ही शादी हुई थी. 27 अप्रैल को उसका निकाह हुआ था. परिवारवालों के मुताबिक निकाह के लिए ही तबरेज पुणे से गांव आया था. निकाह के बाद ईद पर्व मनाने के लिए वह गांव में रुक गया था.

तबरेज के सिर से माता-पिता का साया बचपन में ही उठ गया था. आठ साल की उम्र में मां दुनिया छोड़कर चली गई. बारह साल होते-होते पिता चल बसे. तबरेज और उसकी इकलौती बहन का पालन-पोषण चाचा के घर हुआ. दो साल पहले बहन की शादी हुई. बहन की शादी के बाद तबरेज पुणे काम करने चला गया. वहां वह वेल्डिंग का काम करता था.

घटना के बाद पत्नी शाइस्ता परवीन का रो-रो कर बुरा हाल है. किसी तरह खुद को संभालते हुए शाइस्ता ने न्यूज-18 से बात की. शाइस्ता ने कहा कि उसे हर हाल में इंसाफ चाहिए. पिटाई करने वालों को कड़ी-कड़ी से सजा मिलनी चाहिए. उन्‍होंने मुआवजे की भी मांग की है.

मृतक के चाचा मशरूम आलम का कहना है कि उन्हें कानून और संविधान पर पूरा भरोसा है. परिवार को न्याय मिले, इस दिशा में प्रशासन और सरकार को हर संभव कोशिश करनी चाहिए.

बता दें कि 17 जून की रात को मृतक तबरेज जमशेदपुर स्थित अपने फुआ के घर से अपने गांव कदमडीहा लौट रहा था. इसी दौरान धातकीडीह गांव में ग्रामीणों ने मोटरसाइकिल चोरी के आरोप में उसे पकड़ लिया और बांधकर रात भर पीटा. 18 जून की सुबह उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया. पुलिस ने पहले उसका इलाज सदर अस्पताल में कराया, फिर शाम को जेल भेज दिया.

22 जून की सुबह तबरेज को जेल से गंभीर हालत में सदर अस्पताल लाया गया, जहां उसकी मौत हो गयी. हालांकि मृतक के परिजनों के द्वारा उसके जिंदा होने का दावा कर उसे रेफर करने की मांग की गयी. अस्पताल प्रशासन ने उसे जमशेदपुर के टीएमएच अस्पताल रेफर कर दिया. वहां भी डॉक्टरों ने उसे मृत करार दिया. वापस सरायकेला लाकर शव का पोस्टमार्टम कराया गया.

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संसद में बोले आजम खान- तीन तलाक निजी मामला

नई दिल्ली। संसद में सोमवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा करते हुए समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान ने भी अपना मत व्यक्त किया. उन्होंने तीन तलाक बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि तीन तलाक कुरान और शरियत का आंतरिक मामला है. कुरान में हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी को नहीं है.

आजम खान ने कहा कि इसका किसी के स्वाभिमान या कानून से कोई मतलब नहीं है. तीन तलाक पर आजम ने कहा कि यह हमारा निजी मामला है और इस पर कुरान के अलावा कोई बात कुबूल नहीं की जाएगी. महिलाओं के जो हमदर्द बनते हैं वह हिन्दू महिलाओं की दिक्कतों के बारे में भी बताएं. देश खुद को शादी, निकाह, मंडप से अलग न कर ले.

आजम खान ने कहा कि देश की पहाड़ियों में हमारी लाशें दफ्न हैं. उन्होंने कहा कि 1942 में हिन्दू मुस्लिम जब एक बर्तन में खाना खा रहे थे तभी अंग्रेजों को लग गया था कि अब यहां रहना मुमकिन नहीं है. आजम खान ने कहा कि आज देश बहुत कमजोर हो रहा है, मैं किसी को कलमा पढ़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, लेकिन अगर मैं न कहूं तो आप जबदस्ती नहीं कर सकते और कर सकते हैं तो कहिए.

संविधान से चलेगा देश

आजम खान ने कहा कि संविधान से देश चलेगा, अगर संविधान हमसे कहेगा तो मैं जरूर कहूंगा और संविधान को न मानने वाले लोग देश के साथ अच्छा नहीं करेंगे. आजम खान ने कहा कि मोदी सरकार पर बहुत बोझ है जो कहा जाए वो किया जाए. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को मेरी भैंस की फिक्र रही लेकिन मेरी नहीं. आजम ने कहा कि सरकार के पैसे से बना दरवाजा गिरा दिया जाएगा, बच्चों को पढ़ाई से रोका जाएगा.

आजम खान ने कहा कि इस मुल्क की दूसरी बड़ी आबादी के साथ जैसा रवैया है वह काफी दुखद है. उन्होंने कहा कि मैं एक यूनिवरर्सिटी का संस्थापक हूं और वह यूनिवर्सिटी ऐसी है कि राष्ट्रपति भवन भी फीका नजर आए. आजम ने कहा कि वहां गरीबों के लिए विशेष और निशुल्क पढ़ाई दी जा रही है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस से हमारी खूब नाराजगी है लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि विकास सिर्फ इन्हीं 5 सालों में हुआ है.

आजम खान ने कहा कि किसी पर कटाक्ष करना बहुत आसान है लेकिन अगर मैंने अपने पूरे राजनीतिक करियर में सुई के बराबर में बेईमानी की हो तो मैं अभी इस सदन को छोड़ने के लिए तैयार हूं. आजम खान ने कहा कि अगर बेईमान होता तो देश की सबसे बड़ी अदालत में आज खड़ा नहीं होता. उन्होंने कहा कि मेरे पास पाकिस्तान जाने का हक था लेकिन हमने यही रहना मुनासिब समझा और आज हम गद्दार हो गए. आजम ने कहा कि जो वंदे मातरम नहीं कहेगा उसे भारत में रहने का हक नहीं, ऐसी बात सदन में कही गई लेकिन मैं बात दूं कि बात वंदे मातरम की नहीं है.

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SP-BSP गठबंधन टूटना BJP की साजिश: सांसद शफीक उर रहमान

समाजवादी पार्टी से बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन तोड़ने का ऐलान किया है. बीएसपी प्रमुख मायावती ने कहा कि पार्टी के हित में अब बीएसपी आगे होने वाले सभी छोटे-बड़े चुनाव अकेले अपने बूते पर ही लड़ेगी. वहीं गठबंधन टूटने को लेकर सांसद शफीक उर रहमान ने इसे भारतीय जनता पार्टी की साजिश करार दिया है.

समाजवादी पार्टी के सांसद शफीक उर रहमान बर्क ने गठबंधन टूटने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब हार हो जाती है तो बहुत सी चीजें हो जाती हैं. आपस का तालमेल टूट जाता है. उन्होंने उम्मीद जताई कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का तालमेल नहीं टूटेगा. शफीक उर रहमान ने कहा कि बसपा सुप्रीमो अगर अकेले चुनाव लडेंगी तो कोई फायदा नहीं होगा. भारतीय जनता पार्टी कोशिश कर रही है कि सपा-बसपा गठजोड़ टूट जाए.

वहीं बीजेपी नेता विनय सहस्त्रबुद्धे ने एसपी बीएसपी के गठजोड़ का टूटना अप्राकृतिक बताया. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के बीच में गठजोड़ टूटने पर बीजेपी के राज्यसभा सांसद विनय सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि हमारी पार्टी ने बहुत पहले ही कहा था कि 23 मई के बाद यह गठबंधन नहीं रहेगा. उन्होंने कहा हम कोई राजनीतिक भविष्यवाणी करने वाली पार्टी में नहीं है लेकिन हमारी पार्टी ने यकीनन बहुत पहले से ही कहा था कि 23 मई के बाद यह गठबंधन नहीं रहेगा. जो भी अप्राकृतिक है, बना बनाया है, वह इस देश की राजनीति में टिकने वाला नहीं है. जाति की राजनीति के दिन बीत चुके हैं. सबका साथ सबका विकास का मंत्र अपनाया जाए, इसी में देश का भला है.

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह का इस गठबंधन को लेकर कहना है कि अब मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही है. बीएसपी और एसपी के बीच गठजोड़ टूटने की खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए संजय सिंह ने कहा कि आज देश में विश्वास का सवाल है. अगर उन्होंने कांग्रेस को भी साथ में लिया होता तो अविश्वास नहीं होता. एसी-बीएसपी दोनों पार्टियों का आपस में अविश्वास है. अब आगे जो लड़ाई होगी वह कांग्रेसी और बीजेपी के बीच होने वाली है.

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लोक सेवाओं में लैटरल एंट्री को लेकर सरकार की नीयत पर उठते सवाल

केंद्र सरकार द्वारा संयुक्त सचिव, उप सचिव तथा निदेशक स्तर के पदों पर चरणबद्ध तरीके से भारी संख्या में निजी क्षेत्र के व्यक्तियों को रखने और इस नियुक्ति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों को किसी तरह का आरक्षण नहीं देने के निर्णय के बाद इन वर्गों में भारी रोष व्याप्त है. डीओपीटी द्वारा विस्तृत दिशानिर्देश के साथ जारी अधिसूचना के अनुसार लैटरल एंट्री के लिए आवेदक के पास सामान्य स्नातक स्तर की शिक्षा के साथ किसी सरकारी या पब्लिक सेक्टर यूनिट या यूनिवर्सिटी के अलावा किसी निजी कंपनी में 15 साल का कार्य अनुभव होना चाहिए. लेकिन इसमें आरक्षण का कोई उल्लेख नहीं है. सरकारी सेवा में कार्यरत एससी, एसटी, ओबीसी के अधिकारियों की मानें तो सरकार का यह फैसला न सिर्फ अन्यायपूर्ण, मनमाना बल्कि संविधान के भी विरुद्ध है, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए नौकरियो में आरक्षण की स्पष्ट व्यवस्था की गई है.

वहीं सरकार इन पदों को एकल पद और एक व्यक्ति तथा सरकार के मध्य करार बताकर आरक्षण के दायरे से बाहर बता रही है. यह बात और है कि स्वयं डीओपीटी के अपने नियम के अनुसार कोई भी सरकारी नौकरी सिर्फ तभी आरक्षण नीति के दायरे से बाहर हो सकती है यदि वह 45 दिनों से कम के लिए हो, जबकि यह नियुक्तियां 3 से 5 साल की अवधि के लिए हैं. ऐसे में कुछ सवाल हैं जो मन में उभरते हैं. इसमें सबसे पहला सवाल तो यह है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में सरकार को निजी क्षेत्र से लोगों को लेने की क्या जरूरत है? दूसरा, नौकरशाही नाकाम हुई है या उसे नाकाम किया गया है? तीसरा, एससी, एसटी, ओबीसी के अवसरों को छीनने की साजिश तो नहीं है लैटरल एंट्री सिस्टम? चैथा प्रश्न, सरकार को यदि आरक्षण से इतनी ही दिक्कत है तो वह इसे समाप्त ही क्यों नहीं कर देती? और सबसे आखिरी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सवाल कि सरकार ने इस तरह से निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को नौकरियों पर रखने से जुड़े समस्यात्मक पक्षों पर विचार किया है या नहीं?

सरकार को क्यों चाहिए निजी क्षेत्र के विशेषज्ञ

सरकार को लोक सेवा के लिए निजी क्षेत्र के विशेषज्ञ किस उद्देश्य से चाहिए यह बड़ा प्रश्न है. जिन पदों के लिए सरकार निजी क्षेत्र से विशेषज्ञों को ला रही है वह सीधे-सीधे नीति निर्माण से जुड़े हैं, ऐसे में जो सरकारी अधिकारी लाइन, स्टाफ और सहायक तीनों एजेंसियों में काम कर संयुक्त सचिव, उप सचिव तथा निदेशक के पदों पर पहुंचते हैं उनका व्यावहारिक अनुभव और समझ किसी भी रूप में निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों से कम नहीं है, फिर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को लाने से सरकार को क्या हासिल होने वाला है? गौरतलब है कि एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कॉलेज, हैदराबाद में लोक और निजी क्षेत्र दोनों के ही उच्च अधिकारियों को एक साथ प्रशिक्षण दिया जाता है. साथ ही सरकार समय-समय पर अपने अधिकारियों को रिफ्रेशर कोर्स और नवाचार सीखने के लिए विदेशों में भी प्रशिक्षण व अध्ययन हेतु भेजती है. फिर लोक सेवकों पर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को वरीयता देने का आधार क्या है? हालांकि सरकार की इस नयी घोषणा में सिर्फ निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को लेने की बात नहीं की गई है लेकिन सरकार के इस फैसले से निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों की बहाली का रास्ता साफ हो चुका है. जिसे लेकर सबसे अधिक आपत्ति जताई जा रही है और जो बेबुनियाद भी नहीं है.

नौकरशाही नाकाम हुई है या उसे नाकाम बना दिया गया है

सरकार लोक सेवा के उच्च पदों पर बाहरी लोगों को इस तर्क के आधार पर भी रख रही है कि नौकरशाही का प्रदर्शन समय की बदलती जरूरतों व सरकार तथा लोक अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा है. लेकिन जैसा कि विदित है लोकसेवा सदैव राजनीतिक परिवेश में कार्य करती है. ऐसे में लोक सेवकों की विफलता की जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व को भी लेनी होगी. ऐसे एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों नीतिगत फैसले हैं जो नौकरशाही पर दबाव डालकर क्रियान्वित कराए गए हैं और जब उनके अपेक्षित परिणाम नहीं निकले तब उनकी नाकामी का ठीकरा नौकरशाही के सर पर फोड़ दिया गया है. इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण नोटबंदी का फैसला है जो सरकार ने सभी विशेषज्ञों यहाँ तक कि आरबीआई गवर्नर की राय को भी नजरअंदाज कर लिया. जिससे हुई अफरा-तफरी और आर्थिक तबाही को हम सभी ने देखा. इसी तरह अभी हाल ही में दिल्ली मेट्रो समेत दिल्ली में तमाम सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को महिलाओं के लिए निःशुल्क करने का फैसला भी विशुद्ध राजनीतिक लाभ-हानि का आकलन करते हुए लिया गया है न कि इसके वित्तीय व अन्य व्यावहारिक पक्षों को ध्यान में रखकर. इसके बावजूद योजना नाकाम हुई या क्रियान्वयन संबंधी समस्याएं आयीं तो बलि का बकरा बनने के लिए नौकरशाह तो हैं हीं. हालांकि ऐसा नहीं है कि नौकरशाही हमेशा सही ही होती है हो लेकिन प्रायः यह नौकरशाही से अधिक राजनीतिक नेतृत्व की विफलता होती है कि उसे नौकरशाही से सही तरीके से काम लेना नहीं आता. इसके पीछे एक बड़ी वजह राजनीतिक सत्ता का एक व्यक्ति में केंद्रित हो जाना और गैर अनुभवी बल्कि अधिक साफगोई से कहे तो अयोग्य लोगों को मंत्री पद पर नियुक्त करना है. आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि एक सरकार के समय में बेहतर काम करने वाले नौकरशाह अचानक दूसरी सरकार के आने पर इतने अयोग्य हो जाते हैं कि सरकार को बाहर से विशेषज्ञों की भर्ती करनी पड़ती है.

एससी, एसटी, ओबीसी के अवसरों को छीनने की साजिश तो नहीं है लैटरल एंट्री सिस्टम

सरकार जिन पदों पर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को बहाल करने जा रही है उन पदों पर एससी, एसटी, ओबीसी का आरक्षण शून्य हो जाएगा और अघोषित तौर पर यह सारे पद सामान्य श्रेणी के लिए आरक्षित हो जाएंगे. ऐसे में एससी, एसटी, ओबीसी के वे अधिकारी जो नीचे से पदोन्नत होकर इन पदों पर पहुंचते उनकी संख्या (जो अभी ही बेहद कम है) लगभग नगण्य रह जाएगी. यह एक तरह से इन वर्गों के अधिकारियों के हिस्से को हड़पने जैसा कार्य है. यहां ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पदोन्नति में आरक्षण को सही ठहराया है, जिसके बाद सरकार को आरक्षित वर्गों के अधिकारियों को पदोन्नति में आरक्षण देते हुए शीर्ष पदों पर इन वर्गों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना चाहिए. लेकिन यहां उलटे सरकार तो एससी, एसटी, ओबीसी को अब तक प्राप्त अवसरों को भी छीनने में लग गई है. सरकार के इस फैसले के बाद निःसंदेह नीति निर्माण से जुड़े इन महत्वपूर्ण पदों पर आरक्षित श्रेणी के अधिकारियों की पहुंच समाप्त हो जाएगी और वहां सामाजिक विविधता की बजाय एक खास वर्ग लोगों का ही वर्चस्व स्थापित हो जाएगा.

सरकार सीधे सीधे आरक्षण खत्म क्यों नहीं कर देती

केंद्र सरकार द्वारा तमाम हथकंडे अपनाकर कभी विनिवेश तो कभी लेटरल एंट्री जैसे प्रावधानों के माध्यम से आरक्षण को निष्प्रभावी बनाने और उसे सीमित करने के अनवरत जारी प्रयासों को देखकर किसी भी व्यक्ति के मन में यह विचार स्वभाविक रूप से उभरता है कि सरकार घुमा फिरा कर काम करने की बजाय सीधे सीधे आरक्षण को समाप्त क्यों नहीं कर देती. इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं है. सरकार द्वारा ऐसा नहीं करने के पीछे अनेक कारण जिम्मेदार हैं. सबसे पहली वजह तो यह है कि सरकार के लिए आरक्षण को निष्प्रभावी बनाना आसान है बनिस्पत उसे समाप्त करने के. सरकार विज्ञापन में आरक्षण की व्यवस्था कर आरक्षित सीटों को रिक्त छोड़ दे तो अधिक समस्या नहीं होगी लेकिन यदि वह विज्ञापन में आरक्षण ही नहीं दे तो आरक्षित वर्गों के सदस्य सड़कों पर उतर जाएंगे, क्योंकि यहां उन्हें अपना अधिकार स्पष्ट रूप से खतरे में नजर आएगा. दूसरी वजह यह है कि सरकार के लिए अपने फैसले को अदालत में सही ठहराने में समस्या आ सकती है. जिस उद्देश्य से नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी वह अभी तक पूरा नहीं हुआ है. अभी भी शासन-प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर एससी, एसटी, ओबीसी के सदस्यों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी की तुलना में बेहद कम है. ऐसी स्थिति में सरकार आरक्षण समाप्त करने के लिए शायद ही कोई ठोस आधार बता सकती है. लेकिन इन सबसे बढ़कर एक अन्य वजह भी है जो आमतौर पर लोगों के सामने नहीं आती. असल में मौजूदा सरकार हो या पूर्वर्ती सरकारें भारत में अब तक शायद ही कोई सरकार एससी, एसटी, ओबीसी समुदाय के हितों को लेकर ईमानदार रही है. यह सभी सरकारें आरक्षण को दिखावे के लिए ही सही बनाए रखना चाहती हैं ताकि आरक्षित वर्गों के सदस्य लगातार समाप्ति की तरफ अग्रसर सरकारी नौकरी की मृगतृष्णा के मायाजाल से बाहर नहीं निकल सके. सरकार उन्हें उस तरफ उलझाए रखना चाहती है जिधर उनके लिए अवसर निरंतर सीमित होते जा रहे हैं.

निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को लोक प्रशासन के शीर्ष पदों पर बैठाने के हैं अपने खतरे

एक समय था जब हम नव लोक प्रशासन की अवधारणा में विश्वास करते थे और मानते थे कि लोक प्रशासन को प्रासंगिक, मूल्योन्मुख, परिवर्तनकारी तथा सामाजिक समानता का पोषक होना चाहिए. फिर हमने नव लोक प्रबंधन की अवधारणा को अपनाया और दक्षता प्रभाविता तथा कार्य कुशलता के लिए बाजार को वरीयता देते हुए कम सरकार की वकालत की और माना कि सरकार या प्रशासन की भूमिका मुख्य रूप से नियामकीय हो जो लोक तथा निजी प्रशासन दोनों को लेवल प्लेइंग फील्ड उपलब्ध कराए. आज हम नव लोक प्रबंधन से भी आगे की अवस्था में प्रवेश कर चुके हैं जहां निजी क्षेत्र के लोग ही निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के लिए नीति निर्माण व समान अवसर की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के कार्य को करेंगे. यह राज्य के पश्चबेलन की अवस्था से बढ़कर राज्य द्वारा बाजार की शक्तियों के हक में अपनी नीति निर्माण से जुड़ी जिम्मेदारियों को निजी क्षेत्र के साथ साझा करना है. ऐसा करते समय सरकार समाज के सबसे वंचित वर्गों के अधिकारों पर तो प्रहार कर ही रही है साथ ही हितों के टकराव से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष को भी नजरअंदाज कर रही है जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. सरकार निजी क्षेत्र के जिन विशेषज्ञों को नीति निर्माण से जुड़े उच्च प्रशासनिक पदों पर बैठाने जा रही है उनकी अपने औद्योगिक प्रतिष्ठानों के साथ संबद्धता को देखते हुए इस बात की संभावना हमेशा बनी रहेगी कि वह अपने अपने प्रतिष्ठानों को गलत तरीके से लाभ पहुंचाने का प्रयास करें. क्योंकि शासन के उच्च पदों पर कार्य करते हुए निजी क्षेत्र के यह विशेषज्ञ न सिर्फ सभी गोपनीय दस्तावेजों तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं बल्कि अपने अपने औद्योगिक प्रतिष्ठानों के हित में नीति निर्माण और नीतिगत बदलाव की पहल भी कर सकते हैं.

इतना ही नहीं इससे सत्ताधारी दल को डोनेशन या अन्य तरीके से लाभ पहुंचाकर अलग-अलग औद्योगिक घराने अपने अधिक से अधिक लोगों को इन पदों पर बैठाने की कोशिश कर सकते हैं जो एक तरह से श्पदों की बिक्री प्रणालीश् की पुनर्स्थापना के जैसा कदम हो सकता है. यहां यह बात विशेष रुप से ध्यान देने योग्य है कि केंद्र सरकार पिछले दरवाजे से प्रवेश (लैटरल एंट्री) के जरिए जिन मंत्रालय या विभागों में संयुक्त सचिव, उप सचिव तथा निदेशक स्तर के पद निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों से भरने जा रही है उनमें राजस्व, वित्तीय सेवा, आर्थिक मामले, किसान कल्याण, सड़क परिवहन और हाईवे के साथ-साथ जहाजरानी और पर्यावरण जैसे बेहद संवेदनशील मंत्रालय व विभाग शामिल हैं. ऐसी स्थिति में जबकि अनेक निजी कंपनियां बैंकों का हजारों करोड़ का कर्ज दबाए बैठी हैं, अनेक उद्योगपति बैंकों का अरबों खरबों लेकर विदेश भाग चुके हैं, अनेक औद्योगिक घरानों पर गलत तरीके से किसानों की जमीन हड़पने के आरोप लग रहे हैं तथा अनेक कंपनियां अपने प्लांट लगाने और खनन हेतु पहाड़ से लेकर जंगल तक को नष्ट करने पर तुली हुई हैं यह सोचकर भी डर लगता है कि वैसी कंपनियों के अधिकारियों को अब यह भी तय करने का काम मिलने वाला है कि क्या सही है और क्या गलत. क्या होना चाहिए और क्या नहीं. यह कल्पना से भी परे खतरनाक स्थिति होने वाली है. लिहाजा कोई भी गंभीर व्यक्ति जिसे सविधान, राज व्यवस्था तथा प्रशासन का थोड़ा सा भी ज्ञान और अनुभव है इस व्यवस्था की वकालत करने से पूर्व इससे जुड़े इन समस्यात्मक पहलुओं पर विचार जरूर करेगा.

उपसंहार

भारत में लोक सेवाओं में पिछले दरवाजे से नियुक्ति एक बेहद संवेदनशील मसला है. ’टैलेंटेड और मोटिवेटेड’ भारतीयों को लोक सेवा से जोड़ने के नाम पर की जा रही इस कवायद के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभावों व परिणामों पर सम्यक विचार कर ठोस तर्क के साथ ही इस तरह का कोई निर्णय लिया जाना चाहिए. अभी सरकार इस निर्णय के पीछे जो तर्क दे रही है वह बड़ी संख्या में आम लोगों, विशेषकर एससी, एसटी, ओबीसी समुदाय के लोगों व अधिकारियों के गले नहीं उतर रहा है. इससे न सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी के अधिकारियों के संविधान प्रदत अधिकारों का अतिक्रमण होता है बल्कि शासन की नैतिकता, सच्चरित्रता और साख के भी खतरे में पड़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है. अनेक लोग यह तर्क दे सकते हैं कि जो सरकार यह कदम उठा रही है उसे जनता ने चुना है लेकिन यदि सब कुछ चुनावी नतीजों से ही तय किया जा सकता तो फिर संविधान, अदालत, मीडिया, नागरिक समाज और लोकमत आदि की तो जरूरत ही समाप्त हो जानी चाहिए. कुल मिलाकर यह फैसला बेहद गंभीर खामियों से युक्त है जिसे स्वीकार करने का अर्थ भारतीय संविधान, लोकतंत्र व न्याय की मूल भावना के विरुद्ध जाना होगा जिसके दूरगामी परिणाम अत्यंत घातक होंगे.

लेखकः मनीष चन्द्रा

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