BBAU: हॉस्टल न मिलने पर विवि कैंपस में तंबू लगा कर रहने को मजबूर छात्र

BBAU के होनहार दलित छात्र रोहित सिंह को हॉस्टल न मिलने से विवि के प्रांगण में बिना किसी दबाव के तंबू लगाकर रहने के लिए मजबूर हुआ. आज रोहित सिंह ने विवि प्रशासन को लिखित में रहने के लिए ज्ञापन दिया.

आपको सूचित करना चाहता हूँ कि प्रार्थी रोहित सिंह जो एम०ए० शिक्षा शास्त्र प्रथम वर्ष का छात्र है, और साथ मे बी०पी०एल०कार्ड धारक है, जिसने अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए छात्रावास न मिलने से विश्वविद्यालय के प्रांगड़ में तंबू लगाने की अनुमति और तंबू का सामान मांगने के लिए 31 अगस्त2018 को प्रार्थना पत्र DSW,कुलसचिव,और कुलपति को दिया था लेकिन विश्विद्यालय ने एक हफ्ते के बाद भी मेरे प्रार्थना पत्र के जबाब देने को उचित नही समझा, तो प्रार्थी ने पुनः 10 सितम्बर2018 को एक प्रार्थना पत्र दिया जिसमें प्रार्थी ने ये अवगत कराया था कि प्रार्थी 13 सितम्बर2018 से तंबू लगाकर रहने लगेगा, लेकिन प्रार्थी यह सोचकर नही रहा कि शायद आखिरी सूची में प्रार्थी का नाम आ जाए लेकिन आखिरी सूची जारी होने के बाद जब प्रार्थी की सारी उम्मीद खत्म हो जाने के बाद तथा अपनी पढ़ाई को नियमित व सुचारूरूप से करने लिए और अपने उज्जवल भविष्य को ध्यान में रखकर दिनांक 24/09/2018 दिन सोमवार से बिना किसी दवाव के विश्वविद्यालय के छात्रावास के प्रांगड़ में तंबू लगाकर रहने जा रहा है.यदि इस दरमियान प्रार्थी को कोई शारीरिक व मानसिक नुकसान होता है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी कुलानुशासक और DSW महोदय की होगी .

अतः श्री मान जी से निवेदन है कि प्रार्थी के द्वारा बताई गई समस्याओ को, उज्जवल भविष्य को ध्यान में रखकर उसको रहने दिया जाए, और उसके सामान की सुरक्षा की मुहैया कराई जाए. महान कृपा होगी.

दिनांक:- 18/09/2018 प्रार्थी

रोहित सिंह एम०ए०शिक्षा शास्त्र प्रथम वर्ष बी बी ए यू लखनऊ मो.8381909041

संलग्न:-पूर्व में दिए गए प्रार्थना पत्रो की छायाप्रति.

प्रेषित प्रतिलिपि-

1:-कुलसचिव, बी बी ए यू ,लखनऊ. 2:-सा. कुलसचिव, SC/ST सेल,बी बी ए यू लखनऊ. 3:-कुलपति,बी बी ए यू ,लखनऊ. 4:-कुलानुशासक, बी बी ए यू, लखनऊ. 5:-मा. चैयरमैन, राष्ट्रीय अनु. जाति आयोग, भारत सरकार, नई दिल्ली. 6:-मा. मंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार नई दिल्ली. 7:-मा. प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली. 8:-मा. राष्ट्रपति महोदय, नई दिल्ली.

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बसपा पूर्व विधायक योगेश वर्मा से हटाई ‘रासुका’, हाईकोर्ट ने दिया रिहा करने का आदेश

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मेरठ। इलाहाबाद होईकोर्ट ने बसपा पूर्व विधायक योगेश वर्मा से रासुका हटाने और रिहा करने का आदेश दिया है. योगेश वर्मा पर दो अप्रैल को मेरठ में हुई हिंसा के आरोप में रासुका की कार्रवाई की गई थी.

बता दें कि मेरठ के हस्तिनापुर सीट से पूर्व बसपा विधायक योगेश वर्मा को बड़ी राहत मिली है. योगेश वर्मा ने रासुका के तहत की गई कार्रवाई को चुनौती दी थी. जस्टिस वी. के. नारायण और जस्टिस आर. एन. कक्कड़ की खंडपीठ ने यह आदेश दिया है.

उल्लेखनीय है कि बसपा नेता और पूर्व विधायक योगेश वर्मा को मेरठ पुलिस ने जेल भेजा था. योगेश वर्मा और उनके भाई पवन वर्मा व राजन वर्मा इस आंदोलन से सीधे जुड़े थे. सुबह जो बवाल मवाना में हुआ, उसके पीछे योगेश वर्मा के समर्थक ही रहे. एनएच-58 पर मोदीपुरम की तरफ से जो बवाल होते हुए रोहटा रोड और कंकरखेड़ा तक पहुंचा, वहां पर भी योगेश वर्मा ने खुद ही कमान संभाले रखी. यही नहीं कचहरी के पूर्वी गेट पर डॉ. अंबेडकर प्रतिमा के पास सुबह से जनसभा हो रही थी और भारी भीड़ जमा थी. लेकिन उसमें सिर्फ नारेबाजी के अलावा कोई हंगामा नहीं था. लेकिन जैसे ही दोपहर में करीब 12 बजे योगेश वर्मा अपने करीब सौ समर्थकों के साथ वहां पहुंचे तो भीड़ में हलचल शुरू हो गई. इस दौरान योगेश वर्मा ने संबोधन शुरू किया तो समर्थकों ने एनएएस कॉलेज की तरफ से आने वाले मार्ग पर उपद्रव करते हुए डिवाइडर पर रखे गमले तोड़ डाले और पुलिस कर्मियों की पिटाई करते हुए गाड़ी में तोड़फोड़ करते हुए जला डालीं.

इसके बाद इन उपद्रवियों की तरफ से फायरिंग भी हुई तो योगेश वर्मा ने मंच से कहा कि फायर नहीं है, जोश में युवक डंडे फटकार रहे हैं. लेकिन उपद्रवी लगातार उग्र होते गए. इसके बाद माहौल तब ज्यादा गरमाया जब उपद्रवियों ने पूर्वी कचहरी गेट तोड़ भीतर घुसकर वाहनों को क्षतिग्रस्त करते हुए एक बाइक और स्कूटी में आग लगा दी और पथराव कर दिया. तब जवाब में पुलिस ने भी हवाई फायरिंग की. इस दौरान योगेश वर्मा वहां से खिसक गए और सबसे ज्यादा बवाल वाले कंकरखेड़ा क्षेत्र में पहुंचे. यहां भी उनके पहुंचने के बाद बवाल बढ़ता चला गया, लेकिन पुलिस योगेश वर्मा को रोकने की हिम्मत नहीं जुटा सकी. इन तमाम सूचनाओं पर नजर रखे भाजपा विधायक और वरिष्ठ पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और डीजीपी से फोन पर बात करते हुए पूरे माहौल की जानकारी दी. साथ ही बसपा के पूर्व विधायक योगेश वर्मा पर सख्ती की मांग की. इसके बाद शासन से मिले निर्देश पर तत्काल योगेश वर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया. योगेश वर्मा के पकड़े जाने के बाद तमाम बवाली भी गायब हो गए.

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बसपा से गठबंधन की आस में जोगी पिता-पुत्र का दिल्ली में डेरा

रायपुर। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के सुप्रीमो व पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन करने के लिए अपने पुत्र विधायक अमित जोगी के साथ दिल्ली में डेरा डाल दिया है. वहीं, बसपा प्रदेश प्रभारी ओपी वाचपेयी भी मायावती से मिलने दिल्ली पहुंचे हैं.

ज्ञात हो कि अपना इलाज कराने दिल्ली पहुंचे जोगी ने कुछ महीने पहले विधानसभा चुनाव में गठबंधन को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती से मुलाकात की थी, लेकिन उस समय बसपा ने गठबंधन पर कोई तवज्जो नहीं दिया था. तब जोगी ने उस मुलाकात को औपचारिक बताकर गठबंधन की खबर को सिरे से खारिज कर दिया था.

जोगी इलाज के बहाने बुधवार को फिर दिल्ली रवाना हुए. पार्टी सूत्रों के अनुसार वह गठबंधन के लिए बसपा सुप्रीमो से फिर बातचीत करेंगे. छत्तीसगढ़ में बसपा के गढ़ में 23 सितंबर से अजीत जोगी का विजय रथ भी निकलना है.

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दलित समाज में पैठ बनाने की आप की कोशिश

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (आप) दिल्ली व पंजाब की दलित सियासत में मजबूत पैठ बनाने की कोशिश में है. देश भर में कहीं भी दलितों के साथ होने वाली हिंसा के खिलाफ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल काफी मुखर रहते हैं. वहीं, बीते दिनों पंजाब में हरपाल चीमा को नेता प्रतिपक्ष बनाने के पीछे दलित समाज को सम्मान व हक दिलाने की आप ने दलील दी थी. दूसरी तरफ दिल्ली विधानसभा से लेकर सड़क पर दलित मसलों पर दिल्ली सरकार के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम सड़क से लेकर सदन में संघर्ष करते दिखते हैं. इसी कड़ी में बुधवार को राजेंद्र पाल गौतम ने भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर से उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में मुलाकात की. उनके साथ दलित समाज का एक प्रतिनिधिमंडल भी था. इस दौरान दोनों नेताओं ने 2019 के लोक सभा चुनाव के बारे में एक घंटे से अधिक समय तक चर्चा की. साथ ही दलित आंदोलन को साथ-साथ आगे बढ़ाने की मंशा भी जाहिर की.

मुलाकात के बारे में राजेंद्र पाल गौतम का कहना था कि चंद्रशेखर उनके समाज से ताल्लुक रखते हैं. उनकी तबियत की जानकारी लेने के साथ ही 2019 के चुनाव में न्याय की लड़ाई और संविधान की रक्षा सहित कमजोर वर्ग की लड़ाई में भीम आर्मी प्रमुख का भी सहयोग लिए जाने पर चर्चा हुई. दोनों नेताओं ने करीब एक घंटे से ज्यादा समाज के अलग-अलग मसलों पर बात की. गौरतलब है कि इससे पहले अरविंद केजरीवाल ने भी सहारनपुर जाकर भीम आर्मी प्रमुख से मिलने की इच्छा जताई थी. लेकिन जिला प्रशासन ने इसकी इजाजत नहीं दी थी. ऐसे में केजरीवाल को अपना कार्यक्रम रद्द करना पड़ा था.

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कार में गाना बजाने पर दलित युवक की पिटाई, मां पर भी हमला

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नई दिल्ली। फरीदाबाद केभतौला गांव में कार में गाना बजाने को लेकर एक दलित युवक और उसकी मां के साथ मारपीट का मामला सामने आया है. आरोप है कि जब युवक अपनी कार में गाना बजा रहा था, तो कुछ युवक वहां आ गए और झगड़ने लगे. थोड़ी देर बाद वे युवक के घर पहुंचे और लाठी डंडों से पीटने लगे. इस दौरान बीचबचाव करने आई युवक की मां को भी उन्होंने फावड़ा मार दिया, जिससे वह घायल हो गईं. उनके 12 टांके आए हैं. शिकायत पर पुलिस ने मारपीट और एससी-एसटी ऐक्ट में केस दर्ज कर जांच शुरू केस के जांच अधिकारी एएसआई कर्मबीर ने बताया कि भतौला गांव का करण अपनी कार घर के सामने खड़ी करता है. करण अपनी कार में गाना बजा रहा था. इसे लेकर विवाद हो गया. शिकायत के मुताबिक, कुछ देर में गांव के रवि, सुभाष, विधुड़ी और पवन एक साथ करण के घर पर पहुंच गए. चारों ने करण को सरिया और लाठी डंडों से पीटा और जातिसूचक गाली भी दी.

इस बीच जब करण की मां पूरण देवी बेटे को बचाने के लिए आई तो आरोपितों ने उन्हें फावड़ा मार दिया. यह उनके चेहरे पर लगा. इसके बाद आरोपित वहां से फरार हो गए. बाद में पुलिस को सूचना दी गई. एससी-एसटी ऐक्ट लगने के चलते खेड़ी पुल थाना पुलिस ने केस की फाइल डीसीपी सेंट्रल ऑफिस भेज दी है. अब आगे की जांच एसीपी या डीसीपी स्तर पर होगी.

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दलित से की शादी तो काट दिए बेटी के हाथ

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नई दिल्ली। तेलंगाना में दलित दामाद की निर्मम तरीके से हत्या का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि तेलंगाना से एक और हिला देने वाली घटना सामने आई है. दलित युवक से शादी करने को लेकर बेटी से नाराज पिता ने उसका हाथ काट दिया और चेहरे को भी जख्मी कर दिया. यह घटना हैदराबाद की है. बंजारा हिल्स पुलिस ने बताया कि एक पिता इस बात से गुस्से में था कि उसकी बेटी ने दलित युवक से शादी कर ली थी.

20 वर्षीय माधवी ओबीसी वर्ग से आती हैं जबकि उनका पति बी.संदीप (22) दलित समुदाय से हैं. संदीप और माधवी चारी पांच सालों से रिलेशनशिप में थे. 12 सितंबर को उनलोगों ने लड़की के पिता मनोहर चारी (42) के कड़े विरोध के बाद भी चोरी-छिपे शादी कर ली. पुलिस ने बताया कि दंपती ने 12 सितंबर को शादी करने के बाद एसआर नगर थाने जाकर मदद की गुहार लगाई थी.

बुधवार दोपहर बाद मनोहर ने अपनी बेटी को फोन किया था और सुलह के लिए अपने पति के साथ घर आने को कहा था. पति-पत्नी एरागाडा इलाके के गोकुल थिएटर पहुंचे. करीब 3.30 बजे माधवी का पिता भी वहां पहुंचा और अपने थैले से चॉपर निकाला. पुलिस को मिली सीसीटीवी फुटेज में दिखा कि मनोहर ने पहले संदीप पर हमला किया जो वहां से भाग गया. मनोहर ने फिर अपनी बेटी के हाथ पर चॉपर मारा और अगली बार उसके चेहरे पर निशाना बनाया. माधवी जमीन पर गिर गईं. मनोहर ने फिर से अपनी बेटी पर हमला करना चाहा लेकिन एक व्यक्ति ने पीछे से उसको लात मारी. वह डर गया और भाग गया.

माधवी के गले और जबड़े के बीच 12 ईंच गहरा जख्म है. उनका बायां हाथ कटकर त्वचा के सहारे झूल रहा था. खबर लिखे जाने तक उनकी सर्जरी चल रही थी. दूसरे अस्पताल में संदीप का इलाज चल रहा है. डॉक्टर ने बताया कि वह काफी सदमे में हैं.

बंजारा हिल्स के एसीपी विजय कुमार ने बताया कि मनोहर के खिलाफ हत्या की कोशिश का मामला दर्ज कर लिया गया है.

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बिहार में जदयू ने खेला दलित कार्ड..

पटना। बिहार में जदयू ने दलित कार्ड खेला है. पहली अक्टूबर से जदयू हर जिला में दलित-महादलित सम्मेलन का आयोजन करेगा. मंगलवार को कार्यक्रम का कैलेंडर जारी करते हुए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव आरसीपी सिंह ने बताया कि सम्मेलन के लिए छह टीम गठित की गई है.

इसके अलावा 19 अक्टूबर से ही सम्मेलन की तैयारी के लिए पार्टी के जिला प्रभारियों का दौरा आरंभ हो जाएगा. एक टीम का वह खुद नेतृत्व करेंगे.

आरसीपी सिंह ने बताया कि हर टीम में पार्टी के प्रदेश प्रवक्ताओं को भी शामिल किया गया है. सिंह ने बताया कि दशहरा बाद 25 अक्टूबर से प्रमंडल स्तर पर दलित-महादलित सम्मेलन आयोजित होगा जो 3 नवंबर को संपन्न होगा.

उनके मुताबिक, 25 अक्टूबर को सारण, 26 अक्टूबर को तिरहुत, 27 अक्टूबर को दरभंगा, 28 अक्टूबर को सहरसा, 29 अक्टूबर को पूर्णिया, 30 अक्टूबर को भागलपुर, 31 अक्टूबर को मुंगेर, पहली नंवबर को मगध एवं 3 नवंबर को पटना प्रमंडल में यह सम्मेलन आयोजित होगा.

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मेरे पति को इसलिए मारा गया क्योंकि वो मेरी जाति के नहीं थे

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“प्रणय एक मां की तरह मेरा ख़्याल रखता था. वह मुझे नहलाता था, खिलाता था और मेरे लिए खाना बनाता था. वह मेरी ज़िंदगी और दिनचर्या का हिस्सा था.” यह कहना है 21 वर्षीय अमृता वर्षिनी का जिनके पति की उनके सामने गर्दन पर वार करके हत्या कर दी गई थी. चार दिन पहले नलगोंडा (तेलंगाना) के मिरयालागुडा शहर में 24 वर्षीय प्रणय पेरुमल्ला की तब हत्या कर दी गई थी जब वह अपनी गर्भवती पत्नी का चेकअप कराकर अस्पताल से बाहर आ रहे थे. प्रणय पेरुमल्ला की हत्या कथित तौर पर कॉन्ट्रेक्ट किलर ने की थी जिसकी सुपारी उनकी पत्नी अमृता के परिजनों ने दी थी. नलगोंडा के पुलिस अधीक्षक ए.वी. रंगनाथ ने मंगलवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर बताया कि अमृता के पिता मारुति राव, उनके क़रीबी करीम, असग़र, भारी, सुभाष शर्मा, अमृता के चाचा श्रवण और उनके ड्राइवर को प्रणय की हत्या और उसकी साज़िश के मामले में गिरफ़्तार किया गया है.

अमृता वर्षिनी प्रणय की हत्या की पूरी साज़िश के बारे में पुलिस अधीक्षक ने बताया कि इसके लिए एक करोड़ रुपये का सौदा हुआ था. अमृता के पिता के निर्देश पर करीम नाम के शख़्स ने असग़र अली, भारी और सुभाष शर्मा से संपर्क किया. पुलिस ने बताया कि अभियुक्त असग़र अली और मोहम्मद भारी नलगोंडा के निवासी हैं और हिरेन पंड्या की हत्या मामले में भी अभियुक्त हैं. 9 अगस्त से इसको लेकर रेकी की जा रही थी.

प्रणय की तस्वीर पुलिस ने सार्वजनिक किया है कि प्रणय पर हमले की पहली कोशिश 14 अगस्त, दूसरी सितंबर के पहले हफ़्ते और आख़िरी 15 सितंबर को दोपहर 1.30 बजे की गई और उनकी हत्या कर दी गई. पुलिस अधीक्षक ने कहा, “जांच के दौरान लड़की के पिता ने कहा कि प्रणय अनुसूचित जाति से था, उसने ठीक से पढ़ाई नहीं की थी और मध्यम वर्ग के परिवार से संबंध रखता था.”

बीबीसी ने अमृता से उनके ससुराल में मुलाक़ात की. पांच महीने की गर्भवती अमृता दुर्बल नज़र आती हैं, लेकिन चेहरे पर उनके साहस है. रोने के बाद ख़ुद को हिम्मत बंधाते हुए वह कहती हैं कि वे दोनों बचपन से एक-दूसरे को प्यार करते थे. अमृता ने प्रणय और ख़ुद की बचपन की एक फ़ोटो फ़ेसबुक पर पोस्ट करते हुए लिखा था, “बचपन के प्यार से शादी करने से कुछ भी बेहतर नहीं है. हमेशा साथ रहने के लिए पैदा हुए.” बेचैनी से अपने फ़ोन को दूर करते हुए वह अपने बेडरूम के दरवाज़े पर नज़रें गड़ाकर देखती हैं जहां से कमरे में लोग आ जा रहे हैं. अमृता अपने ख़्यालों में खोई नज़र आती हैं.

2016 में पहली बार की शादी

प्रणय से वह कैसे मिलीं? इस सवाल पर उनके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आती है और वह कहती हैं, “स्कूल में वह मुझसे एक साल सीनियर थे. हम हमेशा एक-दूसरे को पसंद करते थे. मैं नौवीं क्लास में थी और प्रणय 10वीं क्लास में थे. हमारा प्यार तब शुरू हुआ था. हम फ़ोन पर बहुत अधिक बात करते थे.” वह धीरे-धीरे अपना हाथ पेट पर ले जाती हैं और कहती हैं कि यह बच्चा हमारे प्यार का प्रतीक रहेगा. “मुझे ख़ुशी है कि कम से कम मेरे पास मेरा बच्चा है. यह बच्चा प्रणय को मेरे पास रखेगा जैसे वह हमेशा था.” अमृता कहती हैं, “हमें एक-दूसरे के लिए भागना पड़ा.”

प्रणय का पोस्टर

अमृता और प्रणय की कहानी ऐसी नहीं है कि वह एक-दूसरे से मिले और ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे. उन्हें एक-दूसरे से शादी से पहले धमकियों और शारीरिक यातनाओं का सामना करना पड़ा. अमृता कहती हैं, “यह बेहद छोटा शहर है. तो यह बहुत सामान्य बात है कि मेरे परिजनों को हमारे रिश्ते के बारे में पता चल गया. मेरे परिजनों ने मुझे चेतावनी दी. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं प्रणय से कभी भी न मिलूं, लेकिन यह सब मुझे नहीं रोक सका.” “मैंने उनकी जाति या आर्थिक स्थिति नहीं देखी थी. हमारे लिए यह महत्वपूर्ण था कि हम एक-दूसरे को प्यार करते हैं और अच्छे से समझते हैं.” अमृता जब इंजीनियरिंग में दूसरे वर्ष की छात्रा थीं तब दोनों ने अप्रैल 2016 में पहली बार शादी की. हालांकि, उन्होंने शादी का पंजीकरण नहीं कराया था. उनके परिजनों को यह पसंद नहीं आया और उन्होंने अमृता को कमरे में बंद कर दिया था.

प्रणय अपने भाई के साथ
प्रणय अपने भाई के साथ

अमृता साहस के साथ कहती हैं, “मेरे चाचा ने प्रणय को धमकी दी थी. उन्होंने डम्बल से मुझे मारा. यह सब मेरी मां और तकरीबन 20 रिश्तेदारों के सामने हुआ. कोई भी मेरे साथ नहीं खड़ा हुआ. मुझे कमरे में बंद कर दिया गया. वह चाहते थे कि मैं प्रणय को भूल जाऊं क्योंकि वह अनुसूचित जाति से है.” “बचपन में मेरी मां दूसरी जाति के दोस्त बनाने के लिए मुझे हतोत्साहित करती थीं. मुझे कमरे में बंद रखा जाता था और हर दिन कुछ अचार और चावल ही खाने के लिए दिया जाता था. प्रणय को मैं भूल जाऊं इसलिए मेरे चाचा मुझे मारते थे और धमकी देते थे. उन्होंने मेरी पढ़ाई बंद करा दी. मेरे पास प्रणय से बात करने के लिए कोई रास्ता नहीं था.” उस समय के बाद अमृता ने प्रणय को तभी देखा जब उन्होंने 30 जनवरी 2018 को आर्य समाज मंदिर में दोबारा शादी की.

वह कहती हैं, “मुझे स्वास्थ्य समस्याएं होती थीं तो मैं डॉक्टर या अस्पताल के किसी स्टाफ़ का फ़ोन लेकर प्रणय से बात करती थी. वह कुछ लम्हे हमारे प्यार को आगे बढ़ा रहे थे. हमने आख़िरकार आर्य समाज मंदिर में शादी करने का फ़ैसला किया ताकि हमारे पास शादी का कोई दस्तावेज़ हो. हम दोनों ने अपने प्यार के लिए लड़ने का फ़ैसला किया.” प्रणय के परिवार को शादी की कोई जानकारी नहीं थी. शादी के बाद यह जोड़ा सुरक्षा के लिहाज से हैदराबाद चला गया. अमृता बताती हैं, “हम डेढ़ महीने तक हैदराबाद में रहे, लेकिन मेरे पिता ने हमारी जानकारी के लिए कुछ गुंडों को भेजा. इस वजह से हम प्रणय के घर में मिरयालागुडा रहने चले आए हमने सोचा की परिवार के पास रहने से हम सुरक्षित रहेंगे.” “हमारी योजना थी कि हम उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाएंगे और इसी बीच मैं गर्भवती हो गई. यह हमारे लिए सबसे अच्छा क्षण था.”

“जब तक बच्चा नहीं हो जाता तब तक हमने यहीं रुकने का फ़ैसला लिया. बच्चा होने के बाद पढ़ाई के लिए हम कनाडा जाने की पूरी व्यवस्था कर रहे थे.” अमृता कहती हैं कि उनके गर्भवती होने की ख़बर ने उन्हें उम्मीद और ख़ुशी दी. हालांकि, बच्चे के लिए वे कुछ ज़्यादा ही युवा थे, लेकिन प्रणय ने अपने परिजनों को बताया कि बच्चा अमृता के परिजनों के ख़िलाफ़ मज़बूती से खड़े होने में मदद करेगा. लाइन

प्रणयअमृता के पिता ने गर्भपात कराने को कहा

अमृता ने अपने परिजनों को गर्भवती होने की बात कही थी. वह बताती हैं, “मैंने जब से उन्हें गर्भावस्था की बात कही थी, वह तभी से कह रहे थे कि मैं गर्भपात करा लूं. गणेश चतुर्थी की बधाई के लिए मैंने दोबारा उनसे बात की थी. उन्होंने फिर गर्भपात कराने को कहा.” “हम हमेशा इस डर में रहते थे कि मेरे पिता और उनके गुंडे हमें नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे, लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि वह इतनी क्रूरता पर उतर आएंगे.” अमृता कहती हैं कि प्रणय उन्हें प्यार से ‘कन्ना’ बुलाते थे. उस दिन को याद करते हुए वह कहती हैं, “हम सुबह लगभग 11 बजे देर से सोकर उठे थे. मेरे पीठ में दर्द था. मैंने प्रणय को बुलाया. मुझे अभी भी उनकी आवाज़ याद है, उन्होंने कहा था, ‘कन्ना आ रहा हूं.”

वह सिसकते हुए कहती हैं, “मैंने नाश्ता किया. प्रणय ने अपना नाश्ता तक नहीं किया था. हम अस्पताल गए. हम बात कर रहे थे कि कैसे मेरा पीठ का दर्द ठीक हो सकता है.”

वह बताती हैं कि जब वे डॉक्टर के पास थे तब अमृता के पिता का डॉक्टर के पास फोन आया और उन्होंने गर्भपात के बारे में मालूम किया.

“डॉक्टर ने यह कहते हुए फ़ोन काट दिया कि हम अस्पताल में नहीं हैं. इस बीच मेरे पिता की मिस्ड कॉल मेरे पास आई. मेरे चेकअप के बाद हम अस्पताल से बाहर निकल रहे थे और मैं प्रणय से कुछ पूछ रही थी, लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिला. मैंने देखा तो वह ज़मीन पर गिरे थे और एक शख़्स उनकी गर्दन काट रहा था.”

“मेरी सास ने उस शख़्स को धक्का दिया और मैं मदद मांगने अस्पताल के अंदर गई. कुछ मिनट बाद मैंने अपने पिता को कॉल किया, लेकिन उन्होंने जवाब दिया कि वोह क्या कर सकते हैं? उसे अस्पताल ले जाओ.”

“कुछ दिनों पहले मेरे पिता का एक छोटा ऑपरेशन था. मेरी मां और रिश्तेदारों ने मुझे उन्हें देखने को कहा. मैंने मना कर दिया और झूठ बोला कि हम बेंगलुरु जा रहे हैं. अगले दिन एक शख़्स मेरे घर किसी किराए की कार के बारे में जानकारी लेने आया जो घर के बाहर खड़ी थी. उस शख़्स का उच्चारण बेहद अजीब था. मेरे ससुर ने उसे जवाब दिया. मुझे लगता है कि अस्पताल में वही शख़्स था जिसने प्रणय को मारा.”

अमृता कहती हैं कि उन्हें विश्वास है कि उनके पिता प्रणय को नुकसान पहुंचाने के लिए कुछ समय से योजना बना रहे थे.

प्रणय की मां
प्रणय की मां

अमृता की मां ने पिता को दी पूरी जानकारी? “अभी तक मेरे घरवालों ने मुझसे बात नहीं की है. मेरी मां अक्सर मुझे फ़ोन करती थीं. मुझे लगता है कि वह मेरे स्वास्थ्य की जानकारी लेने की जगह मेरे पिता को जान-बूझकर या अनजाने में मेरी जानकारी दे रही थीं. मैं अपने पूरे परिवार को दोष देती हूं. मैं वापस उनके पास नहीं जाऊंगी. प्रणय के परिजन अब मेरे परिजन हैं.” इस घटना के बाद दलितों और महिलाओं से जुड़े कल्याण समूह प्रणय के घर आकर अपनी सहानुभूति जता रहे हैं. उनके घर में ‘जय भीम’ और ‘प्रणय अमर रहे’ जैसे नारे गूंज रहे हैं. अमृता कहती हैं कि उन्हें ख़ुशी है कि उन्हें इस लड़ाई में समर्थन मिल रहा है. उन्होंने ‘जस्टिस फ़ॉर प्रणय’ नाम से एक फ़ेसबुक पेज बनाया है. मैं इसका जाति विहीन समाज के रूप में अपने काम के तौर पर इस्तेमाल करूंगी. दृढ़ संकल्प की भावना के साथ अमृता कहती हैं, “प्रणय हमेशा कहते थे कि प्रेमियों को जाति के कारण समस्याओं का सामना नहीं करना चाहिए. जाति के कारण हमने मुश्किलों का सामना किया है. मैं न्याय के लिए लड़ूंगी. मेरी इच्छा है कि प्रणय की मूर्ति शहर के बीचों बीच लगाई जाए. मैं इसके लिए ज़रूरी अनुमति लूंगी.” वह आरोप लगाते हुए कहती हैं कि उनके पिता ने उनके पति को इसलिए मारा क्योंकि वह उनकी जाति के नहीं थे. प्रणय के घर में महिला और दलित समाज का आना जाना जारी हैप्रणय के घर में महिला और दलित समाज का आना जाना जारी

‘जाति विहीन समाज के लिए लड़ूंगी’ वह कहती हैं, “अगर वह कोशिश करते तो प्रणय से बेहतर पति मेरे लिए नहीं ढूंढ सकते थे. मेरे पिता को हमारे संबंध से सिर्फ़ इसलिए समस्या थी क्योंकि प्रणय अनुसूचित जाति से था.” “मैं जाति विहीन समाज के लिए लड़ूंगी.” प्रणय की मां हेमलता, पिता बालास्वामी और छोटे भाई अजय बेहद मायूस हैं. अजय अमृता की मदद करते दिखते हैं और उन्हें अकेला नहीं छोड़ते. ‘प्रणय अमर रहे’ के नारे लगने के बाद जब प्रणय की मां हेमलता रोते हुए बरामदे में आती हैं तो अमृता उन्हें सांत्वना देती हैं. वह कहती हैं, “अजय अब मेरा भी भाई है. यह मेरा घर है और यहीं मेरा बच्चा आएगा.” उन्हें डर है कि उनके पिता उनके बच्चे और ससुराल पक्ष के लोगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. लेकिन अब अमृता और उनके बच्चे के भविष्य पर सवाल खड़ा हो गया है. प्रणय के परिवार ने कहा है कि वह अमृता को अपनी बेटी की तरह मानते हैं, लेकिन अमृता की वित्तीय स्वतंत्रता भी एक बड़ा विषय है. यह भी याद रखे जाने की ज़रूरत है कि उन्होंने अपने प्यार के लिए लड़ते समय पढ़ाई छोड़ दी थी.

साभार बीबीसी Read it also-जातीय नफरत से फिर हारा प्यार, मार दिया गया प्रणब दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

संघ प्रमुख मोहन भागवत से कुछ प्रश्न

नई दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘ संघ के नजरिए से भारत का भविष्य’ तीन दिवसीय मंथन शिविर को संबोधित करते हुए मोहनभागवत ने कुछ आदर्श वाक्य बोले हैं, जिसका निहितार्थ यह निकाला जा रहा है कि सभी भारतीय बिना किसी भेदभाव के समान हैं और संघ उनको अपना मानता है. उनके इस भाषण ने मेरे मन में कुछ प्रश्न पैदा किए-

1- पहला प्रश्न यह है कि क्या मोहनभागवत और संघ वर्ण-व्यवस्था, जाति व्यवस्था और महिलाओं को पुरूषों की अधीनता में रखने के विचार का समर्थन करने वाले वेदों, स्मृतियों, पुराणों, रामायण, गीता और रामचरित मानस को खारिज करते हैं और अब संघ इन ग्रंथों को महान ग्रंथ नहीं मानेगा. क्या संघ डॉ. आंबेडकर, पेरियार और रामस्वरूप वर्मा द्वारा इन ग्रंथों को जलाने जाने का समर्थन करता है?

2- दूसरा प्रश्न यह कि क्या संघ और मोहनभागवत हेडगेवार, गोलवरकर, दीनदयाल उपाध्याय और अभी-अभी जल्दी ही स्वर्ग सिधारे अटल बिहारी बाजपेयी जैसे अपने आदर्श नायको को खारिज करता है, जो वर्ण- जाति व्यस्वस्था और स्त्रियों पर पुरूषों के नियंत्रण का समर्थन करते थे और मनुस्मृति को महान ग्रंथ मानते.

3- क्या संघ और मोहनभागवत सावरकर की इन बात के लिए निंदा करते हैं कि उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार को हिंदुओं के लिए वीरतापूर्ण कार्य माना था. क्या अब सावरकर को अपना नायक नहीं मानेगे.

4- क्या संघ और मोहनभागवत राम को ईश्वर या आदर्श व्यक्तित्व अब नहीं मानेगे, जिन्होंने वर्ण व्यवस्था की रक्षा के लिए शंबूक का बध किया और स्त्रियों पर पुरूषों के नियंत्रण के लिेए सीता की अग्नि परीक्षा ली और बाद उनको घर से निकाल दिया या जिन्होंने साफ-साफ कहा कि द्विज ( सवर्ण) ही मुझे सबसे प्रिय हैं.

5- क्या संंघ बाबरी मस्जिद विध्वंस, गुजरात नरसंहार और हाल के मुजफ्फपुर दंगों कि लिए शर्मिंदा है?

6- क्या संघ अब किसी भी ऐसे व्यक्ति को संघ में शामिल नहीं करेगा, जो वर्ण-जाति व्यवस्था में विश्वास रखता हो और वर्णवादी-जातिवादी आचरण करता हो.

7-क्या संघ अपनी शाखाओं में स्त्री-पुरूषों को समान रूप से एक साथ शामिल होने की इजाजत देगा.

8-क्या संघ कार्पोेरेट घरानों और सरकारों के उस गठजोड़ के खिलाफ खड़ा होगा, जो इसे देश मूल निवासी 10 करोड़ आदिवासियों को उजाड़ रहे हैं, उनके जल, जंगल और जमीन पर कब्जा कर रहे हैं. उन्हें उनके निवास स्थानों से खदेड़ रहे है, प्रतिरोध और विरोध करने पर जेलों में ठूस रहे और उनकी हत्याएं कर रहे है.

9- क्या संघ मुट्ठीभर उच्च जातीय कार्पोरेरट घरानों के हाथों में देश की सारी संपदा केंद्रित होते जाने के खिलाफ है? संघ को यह भी बताना चाहिए कि वह कार्पोरेट के साथ खड़ा है या 90 प्रतिशत भारत के बहुजन के साथ?

10- क्या मोहनभागवत फुले, डॉ. आंबेडकर और पेरियार की इस बात का समर्थन करता है कि ब्राह्मणवाद, हिंदुत्व और वर्ण-जाति व्यस्था एक दूसरे के पर्याय हैं. तीनों का खात्मा एक साथ ही होगा?

रामू सिद्धार्थ

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उत्तराखंड के दो हजार स्कूलों को RSS को देने की साजिश

उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में इन दिनों सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। प्रदेश के दो हजार से ज्यादा प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों को बंद करने का फरमान जारी कर दिया गया है। साथ ही बंद किए विद्यालयों को विद्या भारती को देने का आदेश दे दिया गया है। महानिदेशक विद्यालयी शिक्षा उत्तराखंड के. आलोक शेखर तिवारी ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों की पिछले दिनों बैठक के बाद 12 सितम्बर 2018 को एक पत्र जारी किया है।

पत्र के 17वें प्वाइंट में ऐसे विद्यालय जो कि शून्य या 10 से कम छात्र संख्या वाले हैं, उनको बंद करने के पश्चात् उसके भवनों को विद्या भारती के विद्यालयों को देने का प्रस्ताव शासन को दिया गया है। अगर ऐसे विद्यालयों की संख्या की बात करें तो कैबिनेट में ऐसे 2715 प्राथमिक से लेकर माध्यमिक तक के विद्यालयों को बंद करने का निर्णय लिया जा चुका है। महानिदेशक के इस फैसले के बाद वह कठघरे में हैं। सवाल है कि जब उन क्षेत्रों में बच्चे ही नहीं हैं तो विद्या भारती के विद्यालयों के लिए बच्चे कहाँ से आयेंगे? आरोप लगाया जा रहा है कि कहीं आरएसएस के विद्यालयों को स्थापित करने के लिए दो हजार से ज्यादा स्कूलों को तो बंद नहीं किया गया है?

दरअसल ये नियमों की अनदेखी का भी मामला है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 साफ़ कहता है कि 1 किमी में प्राथमिक विद्यालय हो तो 10 से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को बंद कैसे किया जा सकता है? इसी पत्र के 15 वे बिंदु में विद्या भारती के मान्यता प्राप्त विद्यालयों को भौतिक संसाधन उपलब्ध कराने हेतु समग्र शिक्षा अभियान से अनुदान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। इस फैसले से भी शिक्षा विभाग के भीतर बड़ी साजिश की बू आ रही है। एक तरफ जहां सैकड़ों की संख्या में राज्य के सरकारी विद्यालय जर्जर बने हुए हैं और उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है तो वहीं दूसरी ओर विद्या भारती के विद्यालयों के लिए बजट कहां से आ गया? प्रदेश में चर्चा है कि बीजेपी की सरकार सरकारी विद्यालयों को बंद कर उसी के जरिए आरएसएस का एजेंडा चलाने की पृष्ठभूमि तैयार करने में जुटी है.

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जापान जाएंगे प्रो. विवेक कुमार, 4th डॉ. बी. आर. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में होंगे शामिल

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नई दिल्ली। आगामी 23-24 सितंबर को जापान के शहर फुकोका में 4th डॉ. बी.आर. आम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस का आयोजन किया जा रहा है. यह आयोजन डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन, बुराकु लिबरेशन लीग और इंटरनेशनल मूवमेंट अगेंस्ट डिस्क्रीमिनेशन एंड रेसिज्म, जापान द्वारा फुकेका के रिसेन्ट होटल में आयोजित किया गया है. इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का बीजक भाषण भारत के सुप्रसिद्ध जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अम्बेडकर चेयर के प्रोफेसर एवं विश्व प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार देंगे.

यह अपने आप में एक ऐतिहासिक आयोजन है. जैसा कि लोग जानते हैं कि बाबासाहेब आम्बेडकर के अनुयायियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अम्बेडकरी आंदोलन को स्थापित किया जा रहा है. इस आंदोलन के तहत 9 विश्वविद्यालयों में बाबासाहेब की प्रतिमाओं की स्थापना अपने आप में बहुत कुछ कहती है. इसी कड़ी में विदेश में रह रहे अम्बेडकरवादियों ने सामानांतर मुहिम भी चला रखी है, जिसके तहत विश्व के अनेक राष्ट्रों के बहिष्कृत समाज आपस में गठबंधन कर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन कर विश्व को अपनी परेशानियों से अवगत करा रहे हैं.

अतः इसी कड़ी में 1999 में रंगभेद के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार समिति द्वारा डरबन में सैकड़ों भारतीय पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी आवाज उठाने गए थे. इसलिए जापान में ये चौथा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है. यहां पर डॉ. आम्बेडकर की प्रतिमा को कोयासान (Koyasan) विश्वविद्यालय में 2015 में किया गया था. अब अम्बेडकरी आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए यहां तमाम रणनीति बनाई जाएगी, जिससे भविष्य के अंतरराष्ट्रीय आंदोलनों को नई दिशा मिल सकेगी.

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एमपी में बसपा को लगा बड़ा झटका…

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बहुजन समाज पार्टी को झटका लगा है. बीना और खुरई से विधानसभा चुनाव लड़ चुके पार्टी के वरिष्ठ नेता सुरेश पटेल अपने समर्थकों सहित बीजेपी में शामिल हो गए हैं. वे मंगलवार को सीएम शिवराज की उपस्थिति में पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगे.

मध्य प्रदेश के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह सुरेश पटेल को सीएम हाउस लेकर जाएंगे जहां वे बीजेपी की सदस्यता ग्रहण करेंगे इस दौरान सीएम शिवराज उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाएंगे. बताया जा रहा है कि सुरेश पटेल पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं जिसके चलते उन्होने यह कदम उठाया है.

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चातुर्वण्य व्यवस्था में बहुजन समाज का अस्तित्व?

भारत वर्ष में अनेक महापुरूष पैदा हुये जिनमें तथागत बुद्ध, संत रविदास, कबीर दास, साहुजी महाराज, बिरसा मुण्डा, ज्योतिबा फूले, सावित्री बाई फूले, रामास्वामी नायकर, संत गाडगे, डाॅ0 बी. आर. अम्बेडकर, जगदेव प्रसाद आदि अग्रगण्य हैं, जिन्होंने सदियों से मानवीय अधिकार से वंचित और समाज के नीचले पायदान पर खड़े लोगों के आवाज बनें. इन महापुरूषों ने बहुजन समाज के लिए रोटी, कपडा़ और मकान की लड़ाई नहीं लड़ी है, बल्कि भारत देश में करीब साढे चार हजार वर्ष पहले बनाई गयी अमानवीय एवं घिनौनी जाति व्यवस्था (सामाजिक व्यवस्था) के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी.
मानवता विरोधी वर्ण/जाति व्यवस्था:
हमारे तमाम महापुरूष इस मानवता विरोधी वर्ण/जाति व्यवस्था एवं अन्य सामाजिक बुराइयों के विरूद्ध संघर्ष करते रहे. इन लोगों ने इस भेदभाव जनित वर्ण व्यवस्था को नकार दिया था और माना था कि जिस प्रकार गंदी नाली के बीच खड़ा होकर स्वच्छ पानी पीने की उम्मीद नहीं कर सकते, उसी प्रकार इस जाति व्यवस्था में रहकर हम कभी मान-सम्मान, इज्जत, प्रतिष्ठा, समानता, स्वतंत्रता, बराबरी और न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते हैं और न ही कभी स्वाभिमान की जिन्दगी जी सकते हैं. क्योंकि यह सामाजिक व्यवस्था शूद्र समाज ;ैब्ए ैज्ए व्ठब्द्ध को मानवीय अधिकार से वंचित करने का आदेश देता है. इस व्यवस्था में जो जाति कथित रूप से जितना उॅची है उसी हिसाब से समाज में उसे मान-सम्मान और इज्जत प्रतिष्ठा दी जाती है. इसमें योग्यता की कोई कीमत नहीं है. वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत शुद्र समाज आज भी मानसिक रूप से गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ है. हमें आज भी एहसास नहीं हो रहा है कि चातुर्वण्र्य व्यवस्था में मनुवादियों द्वारा रचे गये धर्म रूपी काली कोठरी में कैद हैं. इसमें हमें सतत अपमान मिलता है और रह रह कर अत्याचार एवं बेइज्जत भी किया जाता है फिर भी इसी में जीने को अभ्यस्त अथवा मजबूर है. ?
बहुजन समाज अपना इतिहास नहीं जानते.
बाबा साहब ने कहा था ‘‘जो व्यक्ति अपना इतिहास नहीं जानता है, वह व्यक्ति अपना भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता है. हम अपने आपको जानने की कोशिश नहीें करते हैं. सच्चाई यह है कि हमने अपने महापुरूषों के विचारों को नहीं पढ़ा है, न समझा है और न ही उनके विचारों से प्रेरणा लेकर सामाजिक और आर्थिक गुलामी से मुक्ति पाने का प्रयास किया है. क्या हम कभी महसूस या अनुभव करते हैं कि हमारे पूर्वज गुलामी की जिन्दगी जीने के लिए मजबूर क्यों थे ? सदियों से वे नारकीय एवं जलालत की जिन्दगी जीने के लिए विवश थे. ऐसी जीवन जीने का एक मात्र कारण था चातुर्वण्र्य व्यवस्था, जिसमें हम आज भी पल रहे हैं, वही गुलामी हम आज भी झेल रहे हैं और न संभले तो आने वाली पीढ़ी भी यही गुलामी जीने के लिए विवश रहेगी. यह सामाजिक गुलामी का क्रम पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहेगा. क्या हमने कभी विचार किया है कि इस गुलामी से कैसे मुक्त हो सकते हैं ?
बाबा साहब ने जीवन भर हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ी और इसमें सुधार करने का भी प्रयास किया लेकिन चातुर्वण्र्य व्यवस्था के ठेकेदारों ने कहा कि एक अछूत व्यक्ति हिन्दू धर्म को सुधारने की बात करता है यह कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता. तब बाबा साहब ने कहा कि हिन्दू धर्म को सुधारा नहीं जा सकता है इसे सिर्फ नकारा जा सकता है. बाबा साहब ने हमें नया मार्ग देने के लिए 14 अक्तूबर 1956 (अशोक धम्म विजय दशमी) को हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिये. उन्होंने प्रेरणा देकर चले गये कि बौद्ध धर्म में ही व्ठब्ए ैब्ए ैज् को समानता, भाईचारा, न्याय एवं स्वतंत्रता मिल सकता है. बहुजन समाज को अपना इतिहास पढ़ना होगा और उससे प्रेरणा लेने की आवष्यकता है. अपने महापुरूषों के विचारों को अपनाना होगा और उनके बताये हुये मार्ग पर चलना भी होगा. तभी हमारी मुक्ति संभव है.
चातुर्वण्र्य व्यवस्था में बंधे शूद्र और शोषण में उनका जीना
जिस चातुर्वण्र्य व्यवस्था ने हमें कभी अपना नहीं माना, उसने हमें कभी स्वीकार नहीं किया और इसमें हमें कभी मानवता का दर्जा नहीं दिया, फिर भी हम उसेे अपना मान रहे हैं? ऐसे जलालत की जिन्दगी जीने के लिए कब तक मजबूर और लाचार बने रहेंगे? यह मजबूरी कब तक पीढ़ी दर पीढ़ी बनी रहेगी? यह अपमान और कलंक अपने माथे पर रख कर कब तक विवश की जिन्दगी जीते रहेंगे. क्या हम कभी अपने आप से प्रष्न करते हैं कि इस अपमान और कलंक रूपी बोझ से कैसे मुक्त होंगे? हिन्दू धर्म में वर्ण है, वर्ण में शुद्र, शुद्र में जातियाॅ, जातियों में क्रमिक उॅच नीच की व्यवस्था जिसमें अपने से नीचे वाली जातियों पर अत्याचार और शोषण करना अपना अधिकार समझता है. हिन्दू धर्म में जाति रूपी क्रमिक दासता की व्यवस्था में शोषित व्यक्ति कभी भी गौरवान्वित महसूस नहीं कर सकते हैं और न वह स्वाभिमान की जिन्दगी जी सकते है. ऐसी जलालत भरी जिन्दगी में वे गर्व से कैसे कह सकते हैं कि हम हिन्दू हैं??? हिन्दू धर्म में मरी हुई गाय का महत्व ज्यादा है और जिन्दा इन्सानों की कीमत कम है.
धर्म का आधार लेकर शूद्र समाज का शोषण:
चातुर्वण्र्य व्यवस्था में सैकड़़ो पीढ़ियों से जन्म देना माता-पिता का काम था लेकिन उनके बच्चों के जीवन जीने का निर्धारण चातुर्वण्र्य व्यवस्था द्वारा किया जाता था. इस व्यवस्था में मूलवासियों को अपना जीवन जीने की स्वतंत्रता नहीं थी. जब तक हम अपना जीवन का महत्व नहीं समझेंगे तब तक अपना जीवन जीने का नियंत्रण खुद नहीं कर सकते हैं. हमारी दयनीयता की स्थिति यह है कि हम इंसान हैं या नहीं हैं, इस बारे में भी हमें संदेह हो जाता है. अगर हम इंसान हैं तो फिर हमें इस समाज में इंसान का दर्जा क्यों नहीं दिया जा रहा है? क्यों हमारे साथ हर कदम पर भेदभाव होता है? हमारे उपर बेवजह अत्याचार क्यों होता है? बिना कोई अपराध के, बिना कोई बुरा बर्ताव किये हमसे घृणा क्यों करता है? खुद के परिश्रम से हम आगे बढ़ना चाहते हैं तो हमें क्यों रोका जाता है?
अपनी कमाई के पैसे से कपड़ा पहनते हैं, जमीन खरीदते हैं, मकान बनाते हैं, गाड़ी खरीदते हैं तो तथाकथित सवर्णों को तकलीफ क्यों होती है? हमारी तरक्की होने से शोषक जातियों को कष्ट होता है. जब हम अपना हक और अधिकार की मांग करते हैं तो वे इसे अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझते हैं. इसे रोकने के लिए धर्म का सहारा लेते हैं और समझते हैं कि तुम्हारी यह मांग हमारे हिन्दू धर्म व्यवस्था के खिलाफ है. शूद्रों के विकास होने से चातुर्वण्र्य व्यवस्था खतरे में पड़ने लगती है. इसलिए तथाकथित सवर्ण हमारे साथ भेदभाव, दुव्र्यवहार, अपमान, और अत्याचार करता है और हमारी उन्नति का हर संभव रास्ता रोकता है. हमारे साथ वह अन्याय करता है इसके लिए वह कभी अफसोस नहीं करता है. हमारे साथ अन्याय करना वह अपना धर्म समझता है. धर्म का सहारा लेकर सवर्ण हमारा शोषण करता है. धर्म के आधार पर ही हमें नीच और अछूत बनाये हुये है.
बीमारियों से भरे चातुर्वण्र्य व्यवस्था से हम बाहर निकलें.
शूद्र समाज जो इस देश का मूलवासी है. चातुर्वण्र्य व्यवस्था के अन्तर्गत वह आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से गुलाम बने हुये हैं. शूद्र समाज की सबसे बड़ी विडम्बना है कि उसेे गुलामी का एहसास नहीं हो रहा है. इस समाज को 6743 जातियों में बाॅट कर लाचार और मजबूरी की जिन्दगी जीने के लिए विवश किया गया है. इस सोपानगत सामाजिक व्यवस्था (हिन्दू धर्म) में जिस जाति को जितना नीचे स्तर पर रखा गया है वह उतना ही गरीब, लाचार, उपेक्षणीय है. और उसके साथ उतना ही भेदभाव, द्वेष और अमानवीय व्यवहार किया जाता है. इस व्यवस्था में अपने से नीचे वाली जातियों पर अत्याचार करना और उन्हें दबा कर रखने में तथाकथित उच्च जाति के लोग अपने को गर्व महसूस करते हंै. चातुर्वण्र्य व्यवस्था के पोषक लोग बराबर कहते रहते हैं कि यह कथित सनातन और समृद्ध आदर्श सामाजिक व्यवस्था है. इस व्यवस्था के समर्थक इसे मजबूत बनाये रखना चाहते हैं क्योंकि इसमें जातीय श्रेष्ठा के आधार पर उसे हरामखोरी और मान-सम्मान फोकट में मिलता है. इस व्यवस्था में मानव के एक बड़े हिस्से को दूसरे मानव वर्ग द्वारा इंसान का दर्जा नहीं दिया जाता. इस धर्म आधारित सामाजिक व्यवस्था में उॅच्च नीच की भावना के कारण जातिगत भेदभाव और अत्याचार होता रहता है. हिन्दू धर्म के ब्राह्मण तुलसीदास द्वारा रचितकथित पवित्र ग्रंथ रामचरितमानस में आदेश दिया गया है कि ‘‘पूजये विप्र शीलगुण हीना, पुजिये न शुद्रगुणज्ञान प्रवीणा’’. अर्थात हिन्दू धर्म का कानून कहता है कि सवर्ण यदि आचरण-व्यवहार से गिरा हुआ है फिर भी वह पुज्यनीय, मान-सम्मान पाने योग्य है और शुद्र (ैब् ैज्ए व्ठब्) कितना भी ज्ञानी है आचरण और व्यवहार से निपुण है फिर भी वह मान-सम्मान पाने का हकदार नहीं है. इसी रामचरितमानस में कहा गया है-‘‘ढोल, गॅवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़न के अधिकारी’’. अर्थात ढोल, गॅवार, शूद्र पशु, नारी ये सभी अपमानित होने और प्रताड़ना पाने के हीे लायक हैं.
शूद्र समाज को मानसिक गुलाम बनाने के लिए ही इस तरह के धार्मिक ग्रंथों की रचना की गयी है. यह धार्मिक कानून हमारे पूर्वजों के उपर जबरदस्ती थोपा गया है. इस काले कानून को भारतीय संविधान के द्वारा खत्म कर दिया गया है परन्तु धार्मिक व्यवस्था के ठेकेदारों ने यह काला कानून आज भी व्ठब्ए ब्ैए ैज् के उपर अप्रत्यक्ष रूप से लागू किया हुआ है. चार्तुवण्र्य व्यवस्था के ठेकेदार यह घिनौना कानून हमारे उपर लागू करता है तो दोषी वह नहीं है, बल्कि दोषी हम हैं कि इस काला कानून को अपने उपर लागू करने देते हैं और हम इसे पूरे मन से सहज स्वीकार कर लेते हैं तथा आॅख बंद करके इसका समर्थन भी करते हैं. कभी हम खुल कर विरोध करने का साहस नहीं दिखाते हैं. परिवार, समाज को इस घिनौनी व्यवस्था से मुक्त करने का कभी प्रयास नहीं करते हैं. फिर भी हम इस व्यवस्था में समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय की आशा लगाये बैठे हैं ?
आरक्षण का सिकुड़ना और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का चैपट होना
बाबा साहब ने हमें जाति बंधन से मुक्त होने के लिए कहा था परन्तु हम पुनः जातिगत बंधन में बंधते जा रहे हैं. हमें जातियों में बाॅट कर हमारा सब कुछ समाप्त कर दिया गया है. जब तक हम जातियों में बंटे रहेंगे तब तक चातुर्वण्र्य व्यवस्था मजबूत बनी रहेगी. हमारा बर्बादी का सबसे बड़ा कारण जातियों में बंटे रहना है. जिसका परिणाम हम देख रहे हैं कि जो भी हमें अधिकार मिला था वह धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं, छीने जा रहे हैं और, यही हाल रहा तो आने वाले समय में हमारी पीढ़ी अधिक बुरा परिणाम झेलने के लिए मजबूर होगी. बाबा साहब का दिया हुआ आरक्षण दिन प्रतिदिन संकुचित और समाप्त हो रहा है. सरकारी व्यवस्था के अन्तर्गत माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा तो बदहाल है ही, व्ठब्ए ैब्ए ैज् को आगे बढ़ने का जो मुख्य आधार सरकारी प्राथमिक शिक्षा, मूलभूत शिक्षा व्यवस्था है, उसे एक सोची-समझी साजिश के तहत नकारा और पंगु बना दिया गया है. स्कूलों के शिक्षकों को जनगणना, टीकाकरण, चुनाव आदि गैर शैक्षणिक कार्यो में लगाकर पठन-पाठन को बाधित किया जाता है. प्राथमिक सरकारी स्कूलों में चलाई जाने वाली महत्वाकांक्षी पोषाहार योजना (खिचड़ी योजना) तो शिक्षा व्यवस्था को चैपट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता कभी नहीं पूछते हैं कि स्कूल में पढ़ाई क्यों नहीं हो रही है ? जबकि बच्चों को एक दिन पोषाहार नहीं मिलेगा तो शिक्षक से अनेक तरह के प्रश्न करने लगेंगे. स्कूल जाने वक्त माॅ अपने बेटा-बेटी से पूछती है कि प्लेट ले जा रहा है कि नहीं ? लेकिन माॅ बच्चों से कभी नहीं पूछती है कि बैग में सभी किताब ले जा रहा है कि नहीं ? इसलिए शिक्षक भोजन व्यवस्था में उलझे रहते हैं तो छात्र-छात्राएॅ खाने-पीने में व्यस्त रहते हैं. सरकारी स्कूलों में पढ़ाई एच्छिक व गैरजरूरी गतिविधि बन कर रह गई है. सरकारी स्कूलों में (SC, ST, OBC) के अधिकांश बच्चे पढ़ाई करते हैं, जहाॅ पढ़ाई नही के बराबर होती है. जबकि प्राइवेट स्कूलों में तथाकथित सवर्ण समाज के अधिकांश बच्चे पढ़ते है, जहाॅ की पढ़ाई उच्च स्तरीय एवं गुणवत्तापूर्ण होती है. विचारणी प्रश्न है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ा हुआ बच्चा प्राइवेट स्कूलों में पढ़े हुए बच्चों के साथ प्रतियोगिता में बराबरी कैसे कर सकते है? सदियों से लेकर अंग्रेजो का शासन आने तक भारत के शूद्र समाज एवं समूचे समाज की स्त्रियों को प्रायः शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं था. जबकि अप्रत्यक्ष रूप से शुद्र समाज को आज भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है.
हमारा मार्गदाता हैं तथागत बुद्ध और बाबा साहब.
अगर हम मान-सम्मान, इज्जत, प्रतिष्ठा और स्वाभिमान के साथ जीवन जीना चाहते हैं तो एक मात्र रास्ता है तथागत गौतम बुद्ध का बताया हुआ धम्म मार्ग को स्वीकार करना. इस मार्ग पर चलने से खुद का जीवन में बदलाव तो होगा ही आने वाली पीढ़ियों को सामाजिक गुलामी से मुक्ति भी मिल जायेगी. तथागत बुद्ध हमारे मार्गदाता हैं और जो व्यक्ति उनके मार्ग पर चलते हैं उनके जीवन में सुख, शांति एवं खुशहाली मिलना निश्चित है. तथागत गौतम बुद्ध का धम्म मार्ग अपना कर कई देश विकसित हो गए. वहाॅ की जनता उनके मार्ग पर चल कर सुख, शांति एवं समृद्धि का जीवन जी रहे हैं. परन्तु दुर्भाग्य है शुद्र समाज का कि तथागत बुद्ध एवं बाबा साहब को नहीं समझ रहे हैं और न ही उन्हें अपना मार्गदाता मान रहे हैं. बल्कि उनके बताये हुये रास्ते और उनके विचारों को ठुकरा रहे हैं और अनसुना कर दिये हैं. बाबा साहब का आरक्षण और सुविधाएॅ मुझे बहुत अच्छा लगा लेकिन उनके विचार और मार्गदर्शन हमें इतना गन्दा लगा कि उससे हम बहुत दूर भागते गये. जिसका परिणाम देख रहे हैं कि बहुजन समाज को जिस गति से आगे बढ़ना चाहिए था वह नहीं बढ़ रहे हंै बल्कि समस्या और गंभीर होता जा रहा है और बाबा साहब द्वारा दिया गया अधिकार दिन प्रतिदिन समाप्त होते जा रहा है.
साथियो बाबा साहब की विरासत को संभाल कर न रखने एवं उनके सपनों की दिशा में काम न करके हम बाबा साहब को धोखा नहीं दे रहे हैं बल्कि हम अपने आप को धोखा दे रहे हैं. हम अपनी जमीर के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं. हम अपनी आने वाली पीढ़ियों (बेटा, पोता…….) के साथ गद्दारी कर रहे हैं. हमारी संतानें, हमारे बेटी-बेटा ही हमसे एक दिन सवाल करेगें कि बाबा साहब जैसे व्यक्ति ने अकेले दम पर इस समाज की अमानवीय एवं घिनौनी दशा से उबार कर खुशहाली, समृद्धि एवं समानता का अधिकार दिलाया और आज हमलोग करोड़ों की संख्या में रहकर भी उनके दिये गये अधिकार को बचा कर नहीं रख पा रहे हैं तो धोखेबाज और गद्दार होने का प्रमाण-पत्र हमलोग अपनी संतानों से ही प्राप्त करेंगे…..
भवतु सब्ब मंगलम् !
युगेश्वर नन्दन (नागसेन)

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मंदिर में पूजा करने से रोका तो 50 से ज्यादा लोगों ने बदला धर्म

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मन्दिर

नई दिल्ली। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में 50 से ज्यादा लोगों के धर्म परिवर्तन करने का मामला सामना आया है. आरोप है कि एक मंदिर के पुजारी ने एक जाति विषेश को पूजा करने से रोका. इतना ही नहीं पुजारी पर गुस्से में आकर पीटने की धमकी देने और जाति का नाम लेकर गाली देने का भी आरोप है.

मामला 11 सितंबर का है. साहिबाबाद में डिफेंस कॉलोनी में रहने वाले हिमांशु कुमार मंदिर में बजरंग बली की मूर्ति पर चोला चढ़ाने गए थे. हिमांशु का कहना है कि मंदिर के पुजारी ने उन्हें ना सिर्फ चोला चढ़ाने से मना किया बल्कि उनके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का भी इस्तेमाल किया और विरोध करने पर मारपीट करने को तैयार हो गया.

पुजारी की हरकत से आहत होकर हिमांशु अपने घर गए और अपनी बात सबके सामने रखी. जिसके बाद इलाके के सभी लोग एक जगह पर जुटे और लोगों ने एकसाथ बौद्ध धर्म अपनाने की बात तय की और रविवार के दिन एकसाथ 50 से ज्यादा लोगों ने गाज़ियाबाद के नवयुग बाज़ार के पास अंबेडकर मैदान मे बौद्ध धर्म अपना लिया.

इसके पहले पिछले शनिवार को लोगों ने पुजारी के खिलाफ पुलिस में भी शिकायत दी थी, लेकिन जब पुजारी को मंदिर से हटा दिया गया तो लोगों ने अपनी शिकायत वापस ले ली.

इन आरोपों पर इलाके के लोगों की अलग-अलग राय है. कुछ का कहना है की पुजारी 8 वर्षों से है और वो कभी भेदभाव नहीं करते, जबकि कुछ आरोपों को सच मान रहे हैं. मंदिर का पुजारी इन आरोपों को गलत बता रहा है.

पीड़ित का कहना है कि बौद्ध धर्म में किसी का अपमान नहीं किया जाता. इसलिए उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया है. हालांकि इस विषय में मंदिर की तरफ से कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है. वहीं बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलवाने वाले धर्म प्रचारक का कहना है कि 65 से 70 लोगों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी गई है.

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जातीय नफरत से फिर हारा प्यार, मार दिया गया प्रणब

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कहते हैं प्यार से खूबसूरत शै कुछ भी नहीं. इसी तरह इस दुनिया में जातिवाद और ब्राह्मणवाद से बदत्तर, निर्मम और घिनौनी व्यवस्था भी कोई और नहीं है. जाति को लेकर हुए एक और ऑनर किलिंग का मामला सामने आने के बाद ऐसा कहा जा सकता है. तेलंगाना के नलगोंडा के 24 साल का दलित युवक प्रणय सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि उसने एक ऊंची जाति सवर्ण समाज की वैश्य लड़की अमृथा से प्यार किया था. बचपन की दोस्ती और फिर अफेयर के बाद 8 महीने पहले दोनों ने शादी करके ज़िंदगी भर साथ रहने का फैसला किया था. पर अमृथा के ऊंची जात वाले माँ-बाप को बेटी का दलित लड़के से रिश्ता कतई मंजूर नहीं हुआ. लड़की के परिवार की धमकियों और जान के खतरे को देखते हुए दोनों अपने शहर से दूर दूसरी जगह भी रहने चले गए थे. शादी के बाद से ही लड़की के पैरेंट्स ने प्रणय और उसके परिवार को लगातार टॉर्चर करना शुरू कर दिया. प्रणय पर किडनैपिंग, रेप, धमकी, बलवा जैसे कई आरोपों में एफआईआर भी करवाई लेकिन अमृथा के हरकदम पर प्रणय का साथ देने के चलते पुलिसिया कार्यवाही ज़ोर नहीं पकड़ सकी. 8 महीने के बाद गुरुवार को प्रणय की एक स्थानीय अस्पताल के सामने दिनदहाड़े धारदार हथियार से हत्या कर दी गई जब वो अपनी प्रेग्नेंट पत्नी को चैकअप के बाद अस्पताल से बाहर लेकर आ रहा था. अमृथा और प्रणय दोनों ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे और वेल सेटल्ड भी. आर्थिक पक्ष मजबूत होने के बाद भी प्रणय की जाति ही उसकी जान लिए जाने कारण बन गई. आर्थिक स्थिति भारत में उतना मायने नहीं रखती जितना मायने रखता है ऊँची जात होना. अमृथा 7 महीने की प्रेग्नेंट है. दोनों इस समय आने वाले मेहमान के स्वागत की तैयारी कर रहे थे, भविष्य के सपने बुन रहे थे. पर जातिवाद-ब्राह्मणवाद न ही प्यार देखता है ना इंसानियत. उसे सपने, वजूद, व्यक्ति, भविष्य कुछ नहीं दिखता. अमृथा और प्रणय जैसे लाखों की खुशियां जातिवाद की निर्मम व्यवस्था की भेंट चढ़ गई. सवर्ण बेहतर समाज बनाना तो दूर की बात, अब तक इंसान भी नहीं बन सके हैं. लोग कहते हैं जमाना बदल गया है, बदला तो फिर ये क्यों???

 दीपाली तायड़े

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जेएनयू में लेफ्ट की जीत के मायने

JNUSU के चुनाव में यूनाइटेड लेफ्ट ने भारी बहुमत से विजय हासिल है. इस बार चुनाव में चार लेफ्ट पार्टी साथ में थी, इनके बीच गठबंधन था . ये चार लेफ्ट पार्टी हैं – AISA , DSF . SFI और AISF . पिछले साल भी तीन लेफ्ट पार्टी मिलकर चुनाव लड़ी थी – AISA , SFI , और DSF . इस चुनाव में AISF भी इस गठबंधन में शामिल हो गया है. पिछले साल AISF ने अलग रहकर चुनाव लड़ा था.

पिछले साल चुनाव में जब तीन लेफ्ट पार्टी साथ में थी, अध्यक्ष पद पर यूनाइटेड लेफ्ट को 1506 मत मिले थे . ABVP दुसरे और बापसा तीसरे स्थान था. ABVP को 1042 और बापसा ( बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन ) को 935 मत मिले थे. वाइस – प्रेसीडेंट, जनरल सेक्रेटरी और जॉइंट सेक्रेटरी सभी पद पर भी ABVP दूसरे स्थान और बापसा तीसरे स्थान पर था. इस साल प्रेसीडेंट पद पर यूनाइटेड लेफ्ट को 2151 मत मिले हैं, उसके मतो में भारी बढ़ोतरी हुयी हैं, वही ABVP और बापसा दोनों में मतों में कमी आयी है. ABVP को 972 और बापसा को 675 मत मिले हैं.

चुनाव से पहले ऐसा महसूस हो रहा था कि JNU छात्र समुदाय परिवर्तन चाहता है. इसलिए दूसरी पार्टियों को अपने पक्ष में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद थी. अधिकतर छात्रों का मानना था कि ABVP सेंट्रल पेनल में कोई न कोई सीट जीतेगा. दूसरी तरफ, बापसा को भी उम्मीद थी कि वह पिछली साल की तुलना में और भी अच्छा प्रदर्शन करेगा . याद रहे कि बापसा पिछले दो सालो से अच्छा प्रदर्शन कर रहा है. NSUI को भी उम्मीद में था कि उसके साथ मुस्लिम ज्यादा जुड़े हैं, इसलिए वह पिछले सालो की बजाय बेहतर प्रदर्शन करेगा.

लेकिन चुनाव परिणाम ने सारे पूर्वानुमान को धता बता दी और यूनाइटेड लेफ्ट को भारी बहुमत मिला. इस बार मतदान 68 % रहा जो कि पिछली कई सालो में सर्वाधिक है. याद रहे कि 2017 में मतदान का प्रतिशत 59 % था. JNU में आमतौर मतदान 60 % से कम ही रहता है. मतदान का प्रतिशत अधिक होने से लग रहा था कि छात्र कुछ नया परिणाम देगा और वैसा ही हुआ.

समुदाय के सामने सबसे अहम मुद्दा था – ABVP को रोकने के लिए वह किस दल को चुने. ऐसे में यूनाइटेड लेफ्ट के अतिरिक्त एक विकल्प बापसा था. किन्तु बापसा के प्रेसिडेंट पद के उम्मीदवार प्रवीण थलाप्पली अपने भाषण से किसी को ज्यादा आकर्षित नहीं कर पाए. उनका भाषण और प्रश्न – उत्तर दोनों का सेशन भी बहुत साधारण रहा. वह बापसा की विचाधार को सही ढंग से छात्र समुदाय के सामने पेश नहीं कर पाए. इसका कारण यह हो सकता है कि प्रवीण थल्लापेली ने हिंदी में भाषण दिया और वेनॉन- हिंदी पृष्ठ भूमि से आते हैं. धयान रहे कि प्रेसिडेंटि अलडिबेट की स्पीच निर्णायक होती है जिसको सुनने ढेर सारी भीड़ आती है. इसका खामियाजा बापसा के अन्य उमीदवारो को भी झेलना पड़ा. प्रेसिडेंटिअल डिबेट का दिन ही चुनाव प्रचार का अंतिम दिन होता है. दूसरी तरफ, इस चुनाव में एक नई पार्टी छात्र राजद भी था जिसके उम्मीदवार जयंत कुमार थे. उन्होंने भी अपने को दलित–बहुजन राजनीति के उत्तराधिकारी रूप में पेश किया और फुले-अम्बेडकर-पेरियार–सहित सभी बहुजन आइकन का नाम लिया. उन्होंने भी छात्र समुदाय का एक बड़ा मत प्राप्त किया किन्तु वे जीतने से बहुत दूर रहे.

प्रेसिडेंटिअल डिबेट के समय ABVP के लोगो ने उस समय हो-हल्ला मचाया जब यूनाइटेड लेफ्ट के उम्मीदवार ने स्पीच देना शुरू किया जिससे कई बार डिबेट में व्यवधान पड़ा. ध्यान रहे कि कैंपस में ABVP ने कई बार हिंसा की है. जिससे छात्र समुदाय की नजर में ABVP की छवि ख़राब है. इस हिंसा का फायदा यूनाइटेड लेफ्ट को मिला. छात्र समुदाय ने सोचा कि यदि ABVP यूनियन में आ गया तो और ज्यादा हिंसा करेगा. इसलिए ABVP को रोकने के लिए यूनाइटेड लेफ्ट को ही मत दिया जाये.

ABVP की हिंसा, जयंत कुमार की दावेदारी और बापसा उम्मीदवार की साधारण स्पीच से छात्र समुदाय ने मन बना लिया कि यूनाइटेड लेफ्ट को ही मत दिया जाये. इन्ही सब कारणों से छात्र समुदाय ने यूनाइटेड लेफ्ट को ही मत देकर भारी बहुमत से विजयी बनाया.

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जातिवाद का नया रूप

बीते मार्च महीने से लेकर सितंबर महीने तक देश में जो सबसे बड़ा मुद्दा है, वह अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण एक्ट यानि आम बोलचाल की भाषा में एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट है. पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट में संशोधन करने का फरमान जारी कर दिया. इसके खिलाफ दो अप्रैल को एससी-एसटी समाज के लोग देश भर में सड़कों पर उतर गए. वंचित तबके के तेवर देख डरी सरकार ने संसद में अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया गया संसोधन वापस ले लिया. फिर क्या था, सवर्ण तबका भड़क गया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को फिर से बहाल करने की मांग को लेकर 6 सितंबर को प्रदर्शन कर डाला. इस पूरे धरना-प्रदर्शन और विरोध के केंद्र में जाति थी.

जाति… जिसके बारे में कहा जाता है कि वो जाति नहीं… जाति समाज की सच्चाई है. आप चाहे जितना इससे बचना चाहें, यह घूम फिर कर आपके सामने आ ही जाती है. खास कर वंचित तबके के सामने तो जाति का सवाल जन्म से लेकर मरण तक बना रहता है. गांवों में जाति के सवाल ज्यादा आते थे और माना जाता था कि महानगर जातिवाद से अछूते हैं. अगर जातिवाद है भी तो ढके-छिपे रूप में, ताकि किसी को भनक न लगे. लेकिन जातिवाद ने अब महानगरों को भी अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है. बीते कुछ सालों में जातीय संघर्ष समाज के भीतर से निकल कर सड़क पर आ गया है. अब लोग जाति को अपने घर और संबंधित समाज के भीतर नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि वो हर वक्त उससे चिपके हुए हैं. घर के बाहर.. सड़क पर भी. सड़क पर सरपट भागती इन गाड़ियां को देखिए… आपको खुद समझ में आ जाएगा. ये गाड़ियां सिर्फ इंसानों को नहीं ढो रही, बल्कि ये उस जातीय अहं का वाहक बन गई हैं, जिसे बार-बार दिखाने और बताने में कुछ खास तबके के लोग अपनी बहादुरी समझते हैं. आप इन गाड़ियों को गौर से देखिए. इन पर लिखी पहचान को देखिए. ब्राह्मण, राजपूत, जाट, गुज्जर जैसे जातीय पहचान लेकर चलने वाली गाड़ियां पहले इक्का-दुक्का दिखती थीं लेकिन यह चलन अब आम हो गया है.

हालांकि उच्च जातीय पहचान लिए इन लोगों के बीच आपको वो जातियां भी दिख जाएंगी जो कल तक अपनी जाति बताने से हिचकती थी. ऑटो पर लिखा चौरसिया और सायकिल पर लिखा जाटव जी, कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं. हालांकि गाड़ियों से पहचान को जोड़ने का सिलसिला कोई नया नहीं है. तमाम गाड़ियों में आपको ईश्वर, अल्लाह, जीसस, गुरुनानक और बुद्ध आराम से देखने को मिल जाएंगे. लेकिन हाल तक ये गाड़ियों के भीतर ड्राइविंग सीट के सामने लगते रहे थे. हर कोई अपनी आस्था के हिसाब से तस्वीरों और नाम का चुनाव करता था. हालांकि यह अलग विषय है कि बावजूद इसके हर रोज सड़कों पर होने वाले एक्सिडेंट में कोई कमी नहीं आई है. खैर, यह आस्था का मुद्दा हो सकता है. लेकिन यही ईश्वर जब गाड़ियों से बाहर निकल आते हैं, क्या तब भी इसे महज आस्था माना जाए? शायद नहीं. वजह चाहे जो हो, ये दिखाता है कि राजनीति ने समाज को कितना बांट दिया है. समाज के भीतर बढ़ता जातिवाद एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए ठीक नहीं है.

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भीम आर्मी के जांबाज साथी एडवोकेट चन्द्रशेखर रावण के जज्बे को भीम सलाम…..

बहुजनों के बीच अब चन्द्रशेखर रावण किसी पहचान के लिए मोहताज नही हैं.भीम आर्मी के जांबाज साथी एडवोकेट चन्द्रशेखर रावण जी अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा नही रह गए हैं लिहाजा उन्हें रिहा कर दिया गया है.एक सुकून मिला है यह जानकर कि चन्द्रशेखर रावण जी को रामराज्य वाली सरकारों ने रिहा कर दिया है.

यूपी और देश मे सच मे रामराज्य आ गया है.स्वभाविक है कि रामराज्य आएगा तो बहुजन को शम्बूक,एकलब्य,रावण,बालि, महिषासुर,हिरणकश्यप की तरह ट्रीट किया जाएगा.आखिर रामराज का मतलब ही तो यही है कि “पूजिय विप्र शीलगुन हीना, शूद्र न गनगुन ज्ञान प्रवीना.”

चन्द्रशेखर रावण बकालत पास हैं.उन्हें भारतीय संविधान की समझ है.वे संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ भीम राव अम्बेडकर जी के अनन्य समर्थक हैं लेकिन जाति से अनुसूचित हैं तो वे देश के लिए खतरा हैं क्योंकि वे संविधान पढ़ अपने अधिकार व कर्तव्य जान गए हैं और उसके इम्प्लीमेंट हेतु जद्दोजहद कर रहे हैं.वे यह समझ रहे हैं कि उनका हजारो वर्ष से वंचित समाज संविधान प्रदत्त अधिकारों से आज भी महरूम है.उन्हें यह भान है कि शिक्षित होने के बाद उनका अब यह कर्तव्य है कि वे अपने समाज को संविधान प्रदत्त अधिकार दिलाएं.वे अपने मान-सम्मान से वंचित समाज को समता का अधिकार दिलाना अपना फर्ज मान रहे हैं तो वे अभिजात्य समाज के आंख की किरकिरी तो होंगे ही.

जब भी चन्द्रशेखर रावण जैसे लोग विद्रोह करते हैं तो वे रावण,बलि,महिषासुर,शम्बूक,एकलब्य,जगदेव प्रसाद,लालू यादव आदि के रूप में समाज के सामने तिरस्कृत रूप में पेश किए जाते हैं.मुंहजोर लोग इन वंचित समाज के रहनुमाओं को अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने का कोई अवसर भी नही देते हैं.ये इन्हें इस तरीके से प्रचारित कर डालते हैं कि सुपद ,कुपद और कुपद,सुपद नजर आने लगता है.

चन्द्रशेखर रावण ने अपने समाज के सम्मान हेतु संघर्ष किया तो वे राष्ट्र विरोधी हो गए.चन्द्रशेखर रावण को रामराज्य वाली सरकार ने मुकदमो में फंसा कर रासुका में निरुद्ध कर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बता जेल भेज दिया.गजब का तर्क है भाई,पढ़ाया जाता है कि संविधान जलाने,फाड़ने आदि पर देश की नागरिकता तक चली जायेगी तो संविधान फूंकने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्ध न होंगे लेकिन संविधान में लिखी बातों को लागू करने का आग्रह करने वाला रासुका में जेल चला जायेगा.

खैर जब रामराज्य है तो यह होना ही है.हां दुनिया के ग्लोबलाइजेशन के कारण चन्द्रशेखर रावण के साथ शम्बूक जैसा सलूक नही हुआ,यही गनीमत है.चन्द्रशेखर रावण जी ने जितनी बहादुरी से सारी परिस्थितियों का मुकाबला किया है वह काबिलेतारीफ है.उनकी रिहाई पर दिल प्रसन्न हुआ और उम्मीद है कि पुराने तेवर व जज्बे के साथ रावण का न्याय युद्ध जारी रहेगा.

चंद्रभूषण सिंह यादव Read it also-चंद्रशेखर रावण जेल से रिहा, भीम आर्मी समर्थकों में जबरदस्त उत्साह दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

छत्तीसगढ़ की इकलौती सीट जहां बसपा का कब्जा

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ की जैजैपुर विधानसभा बसपा का मजबूत गढ़ है. 2008 में परिसीमन के बाद वजूद में आई जैजैपुर राज्य की इकलौती सीट है जहां से बसपा के केशवचंद्र विधायक हैं. बसपा के इस किले में सेंधमारी के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के साथ-साथ अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस (JCCJ) पूरी ताकत के साथ लगी हुई हैं.

राज्य में चंद महीनों के बाद होने वाले विधानसभा होने हैं. बसपा राज्य में अपने जनाधार को बढ़ाने के लिए पूरी टीम लगा रखा है. ऐसे में पार्टी अपनी सबसे मजबूत सीट जैजैपुर को हरहाल में बरकरार रखने की कोशिश में जुटी हुई है. बसपा से मौजूदा विधायक केशव चंद्रा का टिकट पक्का माना जा रहा है. जबकि कांग्रेस और बीजेपी में दावेदारों की लंबी फहरिश्त है.

2008 के परिणाम

2008 में परिसीमन में मालखरौदा, पामगढ़, सक्ती के क्षेत्र को मिलाकर जैजैपुर विधानसभा सीट बनी. 2008 का पहला चुनाव हुआ तो पामगढ़ छोड़कर चुनाव लड़ रहे कांग्रेस प्रत्याशी राजेश्री महंत रामसुंदर दास ने यहां जीत दर्ज की. उन्होंने मालखरौदा के तत्कालीन विधायक निर्मल सिन्हा को पराजित किया था. दिलचस्प बात ये है कि बसपा दूसरे नंबर पर रही.

कांग्रेस के मंहत रामसुंदर दास को 43346 वोट मिले थे.

बसपा के केशवचंद्र को 33907 वोट मिले थे.

2013 विधानसभा के नतीजे

2013 के विधानसभा चुनाव में जैजैपुर की जनता ने आश्चर्यजनक परिणाम दिया. बसपा दूसरे नंबर से पहले नंबर पर आ गई. इसी का नतीजा था इस सीट पर केशवचंद्र ने जीत दर्ज करते हुए बसपा का खाता खोला. वे प्रदेश में बसपा के इकलौते विधायक हैं. कांग्रेस पहले नंबर से तीसरे नंबर पर पहुंच गई.

बसपा के केशवचंद्र को 47188 वोट मिले थे.

बीजेपी के डॉ. कैलाश शाहू को 44609 मिले थे.

छत्तीसगढ़ के समीकरण

आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं. राज्य में अभी कुल 11 लोकसभा और 5 राज्यसभा की सीटें हैं. छत्तीसगढ़ में कुल 27 जिले हैं. राज्य में कुल 51 सीटें सामान्य, 10 सीटें एससी और 29 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं.

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दुनिया भर में ‘ब्रांड चमार’ की धमक

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नई दिल्ली। सहारनपुर के शब्बीरपुर में जब भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद रावण ने अपने गांव के सामने हाइवे पर द ग्रेट चमार का बोर्ड लगाया था तो काफी हो-हल्ला हुआ था. लोगों के लिए यह एक अजूबा था, ऐसा अजूबा जिसे उन्होंने पहले नहीं देखा था. दरअसल भारत में हजारों जातियों की भीड़ में चमार जाति को सबसे हीन माना जाता है. ऐसे में हर कोई यह देख कर हैरान था कि कोई भी ‘चमार’ होने का जश्न कैसे मना सकता है. यह सिलसिला अब आगे बढ़ चुका है. चमार शब्द एक ब्रांड के रूप में स्थापित हो गया है. आज सरकार ने भले ही दलित शब्द पर प्रतिबंध लगाने का फरमान सुना दिया है, दलित और चमार शब्द इस समाज के नई पीढ़ी के युवाओं के बीच एक ब्रांड बन चुका है. अब इस समाज के युवाओं को इस शब्द से एतराज नहीं है. आखिरी छोड़ पर खड़े समुदाय के युवा दलित औऱ चमार जैसे शब्द को एक फैशन लेबल और ब्रांड के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. गूगल पर दलित टी-शर्ट सर्च करते ही कई स्लोगन वाले टी-शर्ट दिख जाते हैं. इन स्लोगनों में गौरव छिपा हुआ है. आप खुद देखिए.. ‘Untouchable-Property of Dalit’ और ‘Keep Calm And Say Jai Bhim’ जैसे स्लोगन्स के साथ वाली टी-शर्ट्स बड़ी संख्या में दिखाई देती हैं। अब दलित शब्द छुपाने का नहीं बल्कि गर्व करने का प्रतीक बनता जा रहा है. बात सिर्फ टी-शर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इससे आगे बढ़ गई है. मुंबई में आर्टिस्ट सुधीर राजभर ने ‘चमार स्टूडियो’ बनाया है. इस स्टूडियों में वह हैंडबैग्स को फैशनेबल बनाते हैं. 6 महीने पहले इस स्टूडियो को कमर्शली लॉन्च करने वाले राजभर कहते हैं,- ‘इसे मैंने कई मोचियों (चमड़े का काम करने वाले) के साथ शुरू किया, उसमें अधिकतर दलित थे और अपनी छोटी-छोटी दुकानें चलाते थे. बाद में हमने चमड़े के कुछ और कारीगरों को अपने साथ जोड़ा.’ ये प्रोड्क्टस बाजार के अन्य प्रोडक्ट्स को कड़ी टक्कर देते हैं. इन डिजाइनर प्रॉडक्ट्स की कीमत 1500 से 6000 तक होती है. भारत जैसे समाज में इस तरह का बदलाव कोई छोटा बदलाव नहीं है. यह एक क्रांति है. ऐसी क्रांति जिसकी मशाल वंचित तबके के युवाओं ने जलाई भी है और थाम भी रखी है. वो इस मशाल की रौशनी में अपने समाज और शब्दों की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं.

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