IPL 2019: 18 DEC को जयपुर में होगा ऑक्शन

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नई दिल्ली। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) 2019 से पहले खिलाड़ियों की नीलामी 18 दिसंबर को जयपुर में होगी. बीसीसीआई ने सोमवार को इसकी घोषणा की. ये नीलामी एक दिन की होगी. इसके आयोजन स्थल में भी बदलाव किया गया है और ये बेंगलुरू की जगह जयपुर में होगी. सिर्फ 70 खिलाड़ियों को नीलामी में जगह दी गई है जिसमें 50 भारतीय और 20 विदेशी खिलाड़ी शामिल हैं. आठ टीमों के पास नीलामी में बोली लगाने के लिए कुल 145 करोड़ 25 लाख रुपये की राशि है.

नीलामी से पहले पिछले महीने टीमों ने रिटेन किए हुए खिलाड़ियों के नामों की घोषणा की और इस दौरान कुछ बड़े नामों को रिलीज किया. किंग्स इलेवन पंजाब ने युवराज सिंह जबकि दिल्ली डेयरडेविल्स ने गौतम गंभीर को रिलीज किया. साल 2018 सीजन की नीलामी में जयदेव उनादकट के लिए 11 करोड़ 50 लाख रुपये की बोली लगाने के बाद राजस्थान रायल्स ने इस तेज गेंदबाजी को रिलीज कर दिया है. आम चुनावों के साथ अगर तारीखों का टकराव होता है तो 2019 आईपीएल के कुछ हिस्से या पूरे टूर्नामेंट का आयोजन भारत के बाहर हो सकता है.

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रजनी-अक्षय की 2.0 फिल्म 400 करोड़ पार

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मुंबई। सिर्फ़ चार दिनों में वर्ल्डवाइड 400 करोड़ रूपये से अधिक का कलेक्शन करने वाली रजनीकांत और अक्षय कुमार की साइंस-फिक्शन थ्रिलर फिल्म ‘2.0’ ने हिंदी वर्जन के जरिये 100 करोड़ रूपये का आंकड़ा पार कर लिया है.

शंकर ने निर्देशन में बनी फिल्म 2.0 ने अपने रिलीज़ के पांचवे दिन यानि इस सोमवार को 13 करोड़ 75 लाख रूपये का कलेक्शन किया जिसके चलते फिल्म का कुल कलेक्शन अब 111 करोड़ रूपये तक पहुंच गया है. फिल्म ने वर्किंग डे में 20 करोड़ 25 लाख रूपये से ओपनिंग ली थी और उसके मुकाबले करीब 35 प्रतिशत की गिरावट दर्ज़ की गई है, जो की फिल्म की ग्रोथ के लिए बेहद अहम् है. फिल्म को इस हफ़्ते बॉक्स ऑफ़िस पर ऐसा कोई बड़ा ख़तरा नहीं है. इस हफ़्ते केदारनाथ रिलीज़ होगी और फिल्म का बज़ इस फिल्म से डेब्यू कर रही सैफ़ अली खान की बेटी सारा को लेकर ही है.

फिल्म 2.0 इस साल की 12वीं ऐसी फिल्म है जिसने 100 करोड़ या उससे अधिक का कलेक्शन किया हैl फिल्म को ओवरसीज़ से भी अच्छा कलेक्शन मिला है. शनिवार तक के कलेक्शन के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका से फिल्म को 24 करोड़ 55 लाख रूपये का कलेक्शन मिला जबकि यू के से चार करोड़ 54 लाकह और ऑस्ट्रेलिया से चार करोड़ 87 लाख रूपये.

फिल्म को पहले चार दोनों में ही वर्ल्डवाइड बॉक्स ऑफ़िस से 403 करोड़ रूपये का कलेक्शन मिल चुका है. इसमें से भारत ने 298 करोड़ इंडियन और 105 करोड़ ओवरसीज़ बॉक्स ऑफ़िस से मिले हैं. तमिलनाडु बॉक्स ऑफ़िस पर फिल्म को 4 दिनों में 62 करोड़ रूपये का कलेक्शन मिला है.

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बाबरी की बात

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उर्दू, अंग्रेज़ी के अच्छे जानकार हिंदी और संस्कृत से पी.जी. इस पूरे आंदोलन को करीब से जानने समझने वाले और बाबरी मस्जिद के मुद्दई स्व. हाशिम अंसारी के करीब रहने वाले कुछ लोगों में हाजी आफाक साहब भी हैं। बाबरी मस्जिद विवाद पर यूँ तो बात करने के लिए यहाँ काफी कुछ है लेकिन इस पूरे विवाद पर कब किसने क्या किया इसकी काफी दिलचस्प जानकारी इनसे गुफ्तगू के दौरान हुई यह लेख इसी बात चीत पर आधारित है.

अयोध्या मसले पर सुलह की कोशिश में भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर ने सबसे पहले बात-चीत का सिलसिला शुरू किया जो भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. वीपी सिंह तक चला यहाँ इस बात का जिक्र इसलिए ज़रूरी है क्यूंकि यह देश के प्रधानमंत्रियों द्वारा किया जाने वाला प्रयास था इसलिए महत्वपूर्ण भी था लेकिन इसका कोई हल नहीं निकल सका कारण सिर्फ इतना था कि सुलह की सूरत में शर्त एक ही थी कि मुसलमान मस्जिद से अपना दावा छोड़ दें. शंकराचार्य जी, जस्टिस पलोक बासु से होता हुवा यह सिलसिला श्री श्री रवि शंकर तक पहुंचा लेकिन सब में एक ही बात थी कि मुसलमान बाबरी मस्जिद से अपना दावा छोड़ दें.

जबकि होना यह चाहिए था कि दोनों पक्षों को साथ ला कर दोनों के ही धार्मिक स्थलों का निर्माण कराने की बात पर सहमती बनानी चाहिए थी और सांप्रदायिक शक्तियों को मुंह तोड़ जवाब भी देना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं हुवा बल्कि इसके उलट ऐसा माहौल बनाया गया जिससे देश में लगातार नफरत फैलती गयी. उस समय से अगर हम देखें तो एक तरफ सुलह की लगातार बात हो रही है वही दूसरी तरफ पूरे देश में मुसलमानों और उनकी इबादतगाहों के खिलाफ घृणा का माहौल भी बनाया जा रहा है जिसमे आये दिन ऐसे बयान दिए जा रहे हैं जिससे मुसलमानों की इबादतगाहों, मकबरों एवं कब्रिस्तानो के लिए लगातार खतरा पैदा होता जा रहा है. आखिर हम कब समझेंगे कि जब सुलह का माहौल ही नहीं होगा तो सुलह की बात कैसे होगी.

एक खास बात जिसको मंदिर की पैरवी करने वालों ने हमेशा नज़रंदाज़ किया वो यह कि देश के मुसलमानों ने कभी नहीं कहा कि वो मंदिर के खिलाफ हैं बल्कि वो तो हमेशा इस बात पर सहमत हैं कि अदालत से जो भी फैसला होगा वो उनको मंज़ूर होगा.

देश का आम मुसलमान यह चाहता हैं कि मंदिर भी बने और मस्जिद की जगह मस्जिद बन जाए जिससे शांति-सदभाव का सन्देश पूरी दुनिया में अयोध्या से जाए. इसमें हर्ज़ भी नहीं है देश में इसकी तमाम मिसाल मौजूद है लेकिन अगर हमारे अन्दर एक दूसरे के प्रति नफरत और घृणा होगी तो हम साथ कैसे खड़े होंगे अगर हम साथ खड़े हो गए तो अयोध्या ही नहीं काशी और मथुरा का भी हल निकाल लेंगे लेकिन अगर हमने हल निकाल लिया तो फिर इस देश के तमाम सियासी दल किस मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे क्यूंकि पूरे देश में धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषाई झगडा खड़ा करके तो ये चुनाव जीतते आये हैं.

अभी हाल ही में कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता सीपी जोशी का बयान आया है कि ताला कांग्रेस के समय लगा और उनके ही प्रधानमंत्री ने ताला खुलवाया और कांग्रेस का प्रधानमंत्री ही मंदिर निर्माण करा सकता है यही बात राजबब्बर ने भी कही हमें यहाँ यह समझना होगा कि सियासी दलों के लिए मंदिर मुद्दा सिर्फ सरकार बनाने का जरिया है न कि आस्था की बात है. बात सिर्फ कांग्रेस की ही नहीं बल्कि बीजेपी जो मंदिर आन्दोलन पर ही टिकी पार्टी है उसने देश में इसी मुद्दे पर 4 बार सरकार बनायीं और 2014 में प्रचंड बहुमत से केंद्र की सत्ता में काबिज़ हुई फिर राम मंदिर के नाम पर ही उत्तर प्रदेश में सत्ता में यह बोल कर आयी कि प्रदेश में सरकार होगी तो हम संसद में अध्यादेश ला कर मंदिर निर्माण करा लेंगे लेकिन पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद वो लगातार इससे कन्नी काट रही है और उसके ज़िम्मेदार नेता लगातार बयान दे रहे हैं कि हम मंदिर के लिए अध्यादेश नहीं ला सकते जबकि उनके ही कुछ सांसद, विधायक आज भी आम भारतियों को गुमराह करने पर तुले हुए हैं कि मुसलमानों की वजह से मंदिर निर्माण नहीं हो रहा है.

जबकि हकीकत यह है कि इस पूरे मामले में मुसलमान ही विक्टिम है और उसको ही अपराधी की तरह नेता और मीडिया पेश करते रहे हैं. एक तरफ तो मस्जिद को तत्कालीन सरकार और दक्षिणपंथी संगठनों के कार्यकर्ताओं की भीड़ के माध्यम से तोड़ा गया वही दूसरी तरफ अयोध्या में 17 मुस्लिमो की हत्या भी की गई लेकिन इन दोनों ही अपराधिक मामलों में आज तक न्याय नहीं हो पाया और न ही किसी को सजा हुई अगर सजा भी हुई तो सिर्फ एक दिन की उस समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह को जो मौजूदा समय में राजस्थान और हिमांचल प्रदेश के राज्यपाल हैं.

इस पूरे विवाद में अब खेल खुल गया है जहाँ पहले इस मुद्दे पर कांग्रेस,भाजपा सहित उत्तर प्रदेश के ही सियासी दल हाथ आजमाते थे वही महाराष्ट्र में उत्तर भारतियों के खिलाफ नफरत और घृणा फैलाने वाली पार्टी शिवसेना ने इस मुद्दे पर अयोध्या कूच कर दिया और उद्धव ठाकरे भाजपा को मंदिर मुद्दे पर लगातार कटघरे में खड़ा करते रहे उन्होंने इसके लिए एक नारा “हर हिन्दू की यही पुकार पहले मंदिर फिर सरकार” दिया जिसका असर 25 नवम्बर की धर्मसभा में भी देखने को मिला और भीड़ में कुछ राम भक्त भाजपा, विहिप और संतो तक से बहस करते हुए टीवी पर दिखाई दिए. शिवसेना मंदिर आन्दोलन से शुरू से जुडी रही है और भाजपा गठबंधन में हिस्सेदार भी है. इस पूरे मामले को करीब से समझने की ज़रूरत है कि क्यों शिवसेना राम मंदिर मुद्दे को भाजपा से छीनना चाहती है और अयोध्या में ही भाजपा को घेर कर उसकी हिंदुत्व की छवि को तार तार करने की कोशिश उद्धव ठाकरे द्वारा की गयी. 24-25 नवम्बर को जो हुवा उससे एक बात तो साफ़ है कि यह मुद्दा अब भाजपा की झोली से निकल चुका है शिवसेना और कांग्रेस दोनों इस मुद्दे को अब हथियाना चाहते हैं.

हमें यह भी जानना होगा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब राम चरित्र मानस काशी में बैठ कर अवधी में लिखा तो उस समय अकबर का शासन था उन्होंने न ही बाबर का ज़िक्र किया और नहीं ही मंदिर तोड़े जाने के विषय में ही कुछ लिखा अगर ऐसा कुछ होता तो ज़रूर तुलसीदास जी अपनी रचना के माध्यम से इसका उल्लेख करते. लेकिन गोसाईं जी ने ऐसा नहीं किया और भी बहुत से उधाहरण है जिनसे हम यह समझ सकते हैं कि यह मुद्दा सिर्फ सियासी है और सियासी फ़ायदे के लिए लोगों को आपस में लड़ाया जा रहा है.

इस पूरे मामले में इन्साफ का सवाल आज तक बना हुवा है और इस घटना के साजिशकर्ता और अपराधियों का महिमा मंडन मीडिया जब तब करती ही रहती है साथ ही देश की राजनीती में ऐसे लोगों का कद आसमान छु रहा है. लेकिन देश का युवा आज भी बेहतर शिक्षा और रोज़गार की तलाश में लगातार पलायन कर रहा है उसका भविष्य अंधकारमय है और चूँकि सत्ता शासन नहीं चाहते कि देश की आम जनता अपने हक़ हुकूक के लिए लडे इसलिए वो धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा को हथियार बना कर जनता को आपस में लड़ाते रहते हैं.

अब समय आ गया है जब हम देश के लिए कुछ बेहतर करने का फैसला ले और संविधान विरोधी और सांप्रदायिक ताकतों को पूरी तरह से ऐसे नकारे जैसे जर्मनी में हिटलर के बाद नाजीवाद को आम जर्मन नागरिकों ने ‘नेवर अगेन’ मतलब ‘अब फिर नहीं’ के नारे के साथ ज़मिदोज़ कर दिया और अपने देश की मूल समस्याओं को हल करने की तरफ अपनी उर्जा लगा दी. गुफरान सिद्दीकी

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दलित परिवार पर टूटा जातिवादियों का कहर

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गोंडा जिले में दलित परिवार पर दबंगो का कहर टूटा है. जिले के परसपुर थाना क्षेत्र में दलित दम्पत्ति को धारदार हथियार और लाठी डंडे से हमला कर दिया. दलित दम्पत्ति का आरोप है कि गाँव के ही कुछ दबंग उसकी जमीन पर जबरन रास्ता निकालना चाहते हैं. जबकि रास्ता दूसरी तरफ से खुला हुआ है. डरा सहमा ये परिवार दबंगो की दबंगई का शिकार हुआ, तो अपनी सुरक्षा की गुहार लगाने एसपी कार्यालय पहुँच गया.

मामला जिले के परसपुर थाना क्षेत्र के सेवरी गावँ का है. जहाँ एक दलित परिवार की ज़मीन पर रास्ता निकालने को लेकर हुए विवाद में कुछ दबंग छवि के लोगो ने लाठी डंडे और फावड़े से पिटाई कर दी. जिससे एक का हाथ टूट गया और दूसरे का सिर फट गया. इतना ही नहीं, जब इन लोगों ने थाने पर गुहार लगाई तो खाकी नें भी उनकी सुनवाई नहीं की.

पीड़ित महिला पुष्पा ने रोते हुए बताया कि गाँव के ही कृष्णदत्त पांडे, सरयू प्रसाद पांडे, सोनू और सीताराम ने मिलकर उन्हें मारा है. वो लोग हमारी ज़मीन पर जबरन कब्जा कर रहे हैं. मिट्टी पटवा कर दलित के घर के दरवाजे पर कूड़ा भी फेक देते हैं. पुष्पा ने बताया कि हम थाने पर तीन महीने से दौड़ रहे हैं लेकिन कोई सुनवाई नही हो रही है.

अब पुलिस अधीक्षक से अपनी ज़मीन बचने की गुहार लगा रही हैं. वहीं इस पूरे मामले पर जिले के एसपी आर पी सिंह ने बताया कि जय प्रकाश ने सूचना दी है, कि उसे और उसकी पत्नी को गाँव के ही दो लोगो ने मारा है. इस संबंध में अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत करके एक आदमी को अरेस्ट कर लिया गया है. पीड़ितों का मेडिकल कराया गया है और मेडिकल रिपोर्ट की अभी प्रतीक्षा की जा रही है. श्रोत:- News18

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विपक्षी गठबंधन पर मायावती के सस्पेंस के पीछे का सच

भाजपा के खिलाफ  बनाने की खातिर विपक्षी दलों ने 10 दिसंबर को महाबैठक करने का ऐलान किया है. यह बैठक दोपहर 3.30 बजे से पार्लियामेंट एनेक्सी में होना तय है. बैठक को लेकर समाजवादी पार्टी ने अपनी सहमति दे दी है… तो वहीं इस बैठक में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी, राजद के तेजस्वी यादव, तेलगु देशम पार्टी के अध्यक्ष और बैठक के मुख्य संयोजक चंद्रबाबू नायडू, एनसीपी के शरद पवार, जेडीएस के एच.डी. कुमारास्वामी सहित नेशनल कांफ्रेंस के फारुक अबदुल्ला के पहुंचने की पूरी संभवना है. उम्मीद यह भी जताई जा रही है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस बैठक में हिस्सा लेने आ सकते हैं. लेकिन इन सबके बीच सबकी नजरें बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती पर टिकी है, जिन्होंने इस बैठक को लेकर अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं. न तो बसपा ने इस बैठक में शामिल होने से इंकार किया है, और न ही शामिल होने को लेकर ही कोई बयान दिया है.

हालांकि विपक्षी दल इसकी तैयारी में भी हैं कि बसपा की ओर से किसी के शामिल नहीं होने पर यह बैठक प्रभावित न हो. लेकिन असल में ऐसा है नहीं. साफ है कि मायावती या फिर बसपा के किसी प्रतिनिधि का इस बैठक में जाना जहां इस विपक्षी गठबंधन को मजबूती देगा तो वहीं बसपा की अनुपस्थिति से विपक्षी गठबंधन को झटका तो लगेगा ही. ऐसे में सवाल यह है कि आखिर बसपा मुखिया मायावती इस बैठक को लेकर अपनी चुप्पी क्यों साधे हुए हैं?

दरअसल इसकी सबसे बड़ी वजह गठबंधन को लेकर मायावती की वो सोच है, जिसको वह पहले भी जाहिर कर चुकी हैं. मायावती का कहना रहा है कि पहले सीटों का बंटवारा हो जाए फिर गठबंधन के साथ मंच साझा किया जाए. लेकिन अभी उत्तर प्रदेश में सीटों का फाइनल बंटवारा नहीं हुआ है, जिसकी वजह से वो विपक्षी बैठक को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं हैं और फिलहाल चुप हैं. वहीं विपक्ष के लिए मायावती इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि देश के हर राज्य में कम या ज्यादा उनके वोटर मौजूद हैं.

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अगर 10 दिसंबर की बैठक में बसपा शामिल नहीं होती हैं तो क्या बिना बसपा के विपक्षी गठबंधन को धार मिल पाएगी.

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रिटायर होते ही मुख्य चुनाव आयुक्त ने खोली चुनावों की पोल

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नई दिल्ली। एक दिसंबर को नौकरी और पद से रिटायर होने के बाद पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने बड़ा धमाका किया है. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने माना है कि नोटबंदी को कोई असर चुनाव के दौरान देखने को नहीं मिला है. रावत ने कहा कि नोटबंदी के बाद अनुमान लगाया जा रहा था कि चुनावों में कालेधन का इस्‍तेमाल बंद हो जाएगा लेकिन ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है. उन्‍होंने कहा कि पांच विधानसभा में हो रहे चुनावों को देखते हुए अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजनीतिक पार्टियों और उनके फाइनेंसरों के पास पैसे की कोई कमी नहीं है. चुनाव में जिस तरह से पैसे का इस्‍तेमाल हो रहा है वह काला धन ही है.

मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर आसीन रहे ओपी रावत 1 दिसंबर 2018 को रिटायर हो गए और उनकी जगह सुनील अरोड़ा को नया मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया है. ओपी रावत का मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर कार्यकाल एक साल रहा और इस दौरान उन्होंने त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, और मिजोरम में चुनाव कराए. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा कि हमने हाल ही में 5 राज्यों के चुनावों के दौरान भी 200 करोड़ रुपए की रिकॉर्ड रकम सीज की है. इसका मतलब ये है कि चुनावों के दौरान जिस सोर्स से पैसा चुनावों में आ रहा है, वह बेहद प्रभावी है और नोटबंदी का उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा है. स्रोतः न्यूज18

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राहुल गांधी को पप्पू कहना भाजपा सांसद को पड़ा भारी, मांफी मांग भागना पड़ा

बांसवाड़ा। बीजेपी के एक सांसद को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पप्पू कहना उस समय भारी पड़ गया, जब वो राजस्थान में बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार कर रहे थे. बीजेपी सांसद ने राहुल गांधी को पप्पू कहा, तो वहां मौजूद कांग्रेसी पार्षद भड़क गईं. इसके बाद कांग्रेसी पार्षद के साथ स्थानीय लोगों ने बीजेपी सांसद को घेर लिया. माहौल को देखते हुए बीजेपी सांसद को माफी मांगकर किसी तरह वहां से भागना पड़ा.

दरअसल, गुजरात के सुरेंद्रनगर से बीजेपी सांसद देवजी भाई राजस्थान के बांसवाड़ा के भागाकोट इलाके में अपनी पार्टी के प्रत्याशी के चुनाव प्रचार के लिए आए थे. जब वो बांसवाड़ा सीट से बीजेपी प्रत्याशी हकरू मईड़ा के पक्ष में चुनाव प्रचार करने वार्ड नंबर 36 पहुंचे और वहीं पर एक मीटिंग करने लगे, तभी वार्ड की पार्षद सीता डामोर वहां आ धमकी. डामोर कहने लगीं कि यहां पर पांच साल से बीजेपी का शासन है. सड़क पर हर जगह गड्ढे हैं. कम से कम यहां की सड़कों के गड्ढे तो भरवा दो.

इसके बाद बीजेपी सांसद देवजी भाई ने पूछा कि आखिर यह महिला कौन है, तो उनके बगल में बैठे लोगों ने कहा कि ये भी कांग्रेसी पार्षद हैं. इस पर सांसद महोदय ने तपाक से कह दिया कि आप अपने पप्पू को बुला लो, वही गड्ढा भर देगा. इतना कहते ही कांग्रेसी पार्षद सीता डामोर बीजेपी सांसद देवजी भाई पर टूट पड़ीं. डामोर ने सांसद से कहा कि आखिर तुमने पप्पू कैसे कह दिया.

यह मामला इतना गरमा गया कि वहां पर मोहल्ले के लोग इकट्ठे हो गए और बीजेपी सांसद को घेर लिया. फिर बीजेपी सांसद को सबके सामने माफी मांगनी पड़ी और किसी तरह वहां से भागना पड़ा. इसके बाद भी लोग शांत नहीं हुए और बीजेपी दफ्तर आ धमके. विरोध कर रहे लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए बीजेपी के नेताओं ने सांसद देवजी भाई को बांसवाड़ा से गुजरात के लिए वापस रवाना कर दिया.

स्रोत- आज तक

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आज के दौर में अम्बेडकरवादियों के झुण्ड के झुण्ड पैदा हो रहे हैं किंतु…..

पूरे विश्व में ‘बुध्द’’ ही ऐसे व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने कहा था कि मेरी पूजा मत करना, ना ही मुझसे कोई उम्मीद लगा के रखना कि मैं कोई चमत्कार करूंगा…….. दु:ख तुमने पैदा किया है और उसको दूर भी तुम्हें ही करना पड़ेगा. मै सिर्फ मार्ग बता सकता हूँ क्योंकि मै जिस मार्ग पर चला हूँ उस रास्ते पर तुम्हे स्वयं ही चलना पडेगा. मैं कोई मुक्तिदाता नही, मैं केवल और केवल मार्गदाता हूँ.

मुझे लगता है कि बुद्ध का यही एक ऐसा विचार रहा होगा जिसने बाबा साहेब को बुद्ध धम्म के अलावा कोई अन्य धम्म अपनी ओर नहीं खींच पाया क्योंकि बाबा साहेब ने भी अपने अंतिम दिनों में ऐसा ही कुछ कहा था कि कोई भी मुझे पूजने की वस्तु न बनाए, अन्यथा इसमें उसका ही अहित होगा. बताते चलें कि 14 अक्टूबर 1956 को बाबा साहेब आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. इसका खास कारण था कि वे तथाकथित देवताओं के जंजाल को तोड़कर एक ऐसे भारत की कल्पना करते थे जो धार्मिक तो हो किंतु ग़ैर-बराबरी को जीवन मूल्य न माने.

उन्होंने ये भी कहा था कि कोई भी किसी बात को महज इसलिए न माने कि वो किसी किताब में लिखी है या फिर किसी अमुक व्यक्ति के द्वारा कही गई है. इसलिए भी नहीं कि वो मैंने कही है… उस बात की सत्यता या तर्क को अपने स्तर पर भी परख लेने की जरूरत है. बाबा साहेब आंबेडकर ने यह बात 1950 में ‘बुद्ध और उनके धर्म का भविष्य’ नामक एक लेख में कहा था कि यदि नई दुनिया पुरानी दुनिया से भिन्न है तो नई दुनिया को पुरानी दुनिया से धर्म की अधिक जरूरत है. उनकी यह तमाम कोशिशें शोषण के सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक दासत्व के प्रकट-अप्रकट कारणों को समाप्त करने की दिशा में एक ठोस प्रयास था.

अक्सर यह भी पढ़ने को मिलता है कि बाबा साहेब अंबेडकर के द्वारा बौद्ध धम्म को एक उचित धम्म मानने के पीछे बुद्ध की विचारधारा में छिपी नैतिकता तथा विवेकशीलता थी. बाबा साहेब अपने एक प्रसिद्द लेख ‘बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स’ में लिखते हैं कि भिक्षु संघ का संविधान एक लोकतांत्रिक संविधान था. स्वयं बुद्ध केवल भिक्षुकों में से एक भिक्षु ही थे. वह तानाशाह कभी नहीं रहे. कहा जाता है कि उनकी मृत्यु से पहले उनसे दो बार कहा गया कि वह संघ पर अपना नियंत्रण रखने के लिए किसी व्यक्ति को संघ का प्रमुख नियुक्त कर दें. लेकिन हर बार उन्होंने तानाशाह बनने और संघ का प्रमुख नियुक्त करने से इंकार कर दिया. कहा भिक्षु संघ ही प्रमुख है.

आज जिस विषय पर मै विचारने का प्रयास कर रहा हूँ, वह सीधे तौर पर हमारे रहन-सहन, हमारी संस्कृति और आज के गतिशील जीवन के मूल्यों से सम्बंधित विषय है. कहना अतिशयोक्ति नहीं कि बुद्ध और बाबा साहेब अम्बेडकर के विचारों को आत्मसात न कर पाने के कारण आज भी हम अनेक परम्परागत विचारों और शैलियों से उभर नहीं पाए हैं. रुढिवादिता आज भी हमारे जहन में डर बनाए हुए है. इसका कारण मुझे तो केवल और केवल यह लगता है कि हम बुद्ध और बाबा साहेब अम्बेडकर के अनुयाई होने का दावा तो करते हैं किंतु उनके आदर्शो को हम स्वीकार करने में अभी लगभग दूर ही हैं. यह बात अलग है कि तथाकाथित अम्बेडकरवादियों की एक लम्बी कतार मंचों से बड़ी-बड़ी बात करती है लेकिन आचार-व्यवहार में जहाँ की तहाँ है. यह जानते हुए भी कि कि परम्पराएं हमारे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि विकास के लिए न केवल बाधक हैं अपितु कष्टकारी भी हैं, हम इन को छोड़ कर हम अपने जीवन मूल्यों को बचा सकने का प्रयास क्यों नहीं करते? यही आज का मूल प्रश्न है. कमाल की बात तो ये है कि बाबा साहेब अम्बेडकर को हिन्दूवादी शक्तियां अपनी ओर ठीक वैसे ही उन्होंने मुसलमान सांई बाबा को अपनी ओर खींचकर कमाऊ देवता की भूमिका में अंगीकार कर लिया. अब वो शक्तियां बाबा साहेब को अपने पाले में खींचकर राजसत्ता के शिखर को चूमने के प्रयास में जुटी हैं. और हम नाहक ही उछ्ल-कूद रहे हैं बुद्ध और बाबा साहेब के नाम पर.

ऊपरी तौर पर आज हम नित्यप्रति होने वाले अनेक आयोजन बुद्ध रीति अथवा बाबा साहेब अम्बेडकर विचारों के अनुरूप और उनको साक्षी मानकर सम्पन्न करते हैं किंतु कार्यविधि में कोई अन्तर देखने को नहीं मिलता. हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों की छाया ही हर कार्यक्रम में देखने को मिलती है. तथागत बुद्ध और बाबा साहेब की पूजा ठीक उसी प्रकार की जाती है जैसे हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा की जाती है. यह गर्व की बात मानी जा सकती है कि आज शहरों के मुकाबले गावों में बुद्ध और बाबा साहेब की मूर्तियां स्थापित की जा रही हैं किंतु ये नवनिर्मित बुद्ध विहार अथवा अम्बेडकर भवन पूजा-पाठ के हिसाब से परम्परागत हिन्दू मन्दिरों का रूप ही लेते जा रहे हैं…. यह दुख की बात ही नहीं अपितु समाजिक विकास के लिए अति घातक है. ऐसे कर्मकाण्डों से बचने के लिए हमें पहले अपनी औरतों को वैचारिक और मानसिक रूप से शिक्षित करके उनके मन से तथाकथित भगवान के डर से मुक्त करने की जरूरत है. आज हमें बुद्ध जैसे भिक्षु की ही जरूरत है न कि बुद्ध और अम्बेडकर के नाम पर माला जपने वाले झुंडों की.

बड़े ही दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज के दौर में अम्बेडवादियों के झुण्ड के झुण्ड पैदा हो रहे हैं… खासकर राजनीति के क्षेत्र में. अम्बेडकर की विरासत को आगे ले जाने के नाम पहले सामाजिक और धार्मिक मंच बनते हैं और फिर धीरे-धीरे कुछ समय के अंतराल से ये सामाजिक व धार्मिक मंच राजनीतिक दलों में तबदील हो जाते हैं. ….जाहिर है कि ऐसे लोग न तो समाज के तरफदार होते हैं और बाबा साहेब के. ये तो बस बाबा साहेब का लाकेट पहनकर अपने-अपने हितों को साथने के लिए वर्चस्वशाली राजनीतिक दलों के हितों साधने का साधन बनकर कुछ चन्द चुपड़ी रोटियां पाने का काम ही करते हैं. मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूँ, इस सच्चाई का सबको पता है किंतु इनमें से अधिकतर लोग वो हैं जो अम्बेडकर विरोधी दलों की गुलामी कर रहे दलितों नेताओं के चमचों में शामिल हैं. गए वर्षों में भाजपा नीत सरकार के दौर में दलितों के खिलाफ न जाने कितने ही निर्णय हुए… वो अलग बात है कि बाद में सरकार ने दलितों की नाक काटकर अपने ही रुमाल से पौंछने का काम किया. एक जानेमाने तथाकथित दलित नेता ने तो अपने बेटे को ही मैदान में उतारकर 02.04.2018 के दलित/ अल्पसंख्यक/ पिछड़ा वर्ग के द्वारा आयोजित सामुहिक बन्द में उतार कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने का काम किया. भाजपा में शामिल दलित नेता ही नहीं, कांग्रेस में शामिल दलित नेता भी ऐसी दलित विरोधी गतिविधियों पर सवाल करने से हमेशा कतराते रहे हैं. और तो और ये दलित नेता अपने आकाओं के क्रियाकलाप की समीक्षा न करके दलित राजनीति के सच्चे पैरोकारों के पैरों में कुल्हाड़ी मारने का काम करते हैं. बाबा साहेब का ये कहना कि मुझे गैरों से ज्यादा अपने वर्ग के ही पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया, ऐसे में यह सही ही लगता है.

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हिन्दुस्तान का गोत्र कॉपर है, जाति मर्करी और धर्म सल्फेट….

पुष्कर में खुलासा होता है कि राहुल गान्धी का गोत्र दत्तात्रेय है. हमारे पीएम प्रत्याशी मोदी चुनाव प्रचार के दौरान पूर्वांचल पहुंच कर अपनी जाति का ऐलान करते है. हम राहुल के गोत्र पर सवाल खडा करते है. ये गोत्र और जाति ही हिन्दुस्तान का, हिन्दुस्तान के लोगों का मुस्तकबिल तय कर रह है. तो जान लीजिए फिर कि असलियत क्या है?

असलियत ये है कि हिन्दुस्तान का गोत्र कॉपर है, जाति मर्करी और धर्म सल्फेट. ये सच आपको न मोदी बताएंगे, न राहुल. ये बताने की औकात इन दोनों में क्या, किसी नेता में नहीं है, किसी राजनीति में नहीं है. ये सच आपको ही बताना होगा. ये सच आपको ही समझाना होगा, समाज को, राजनीति को.

एनजीटी ने पश्चिम यूपी के 6 जिलों (हिंडन नदी समेत आसपास के जिले) के ग्राउंड वाटर सैपल का परीक्षण किया. परीक्षण रिपोर्ट बताती है कि पानी का हाल ऐसा है, जिसे पीना तो दूर, उसमें घंटों तक पैर भी रखे रहे तो उंगलियां काटने की नौबत आ जाएगी.

खबर बीबीसी में छपी है. आपको बीबीसी का नाम सुन कर देशद्रोही मीडिया का ख्याल आ सकता है, तो जान लीजिए कि मूल रिपोर्ट एनजीटी की है. स्वीकार कर लीजिए सच को. इस बात से कोई फर्क नहीं पडेगा कि रिपोर्ट छपी कहां है?

क्या कहती है ये रिपोर्ट? 6 जिलों के 168 जगहों से लिए गए 500 से अधिक पानी के सैंपल में औसत से 200 गुना अधिक कैडमियम, कॉपर, शीशा, मर्करी, सल्फेट, आयरन आदि पाए गए है. यानी इसमें इतना हैवी मेटल है, जिसे पी कर आम इंसान भी बीमार हो जाए. और ऐस हो भी रहा है. गांव के गांव बीमार हो रहे है.

तो ये मुद्दा राजनीति का नहीं है क्या? राहुल गांधी के दत्तात्रेय गोत्र जानने से अधिक जरूरी ये जानना नहीं है कि हमरे पानी में मर्करी या आर्सेनिक कितना है? मोदी जी चाय बेचते थे ये जानना जरूरी है या फिर ये जानना जरूरी है कि पानी बेचने वाले आखिर कहां से साफ पनी ला कर बेच रहे है और कौन हमारे पानी को बीमार बना रह है?

याद रखिए, न मोदी जी में इतनी ताकत है कि वे पानी के सौदागरों के खिलाफ बोल सके न राहुल गांधी में वो नैतिक बल है कि पानी को प्रदूषित करने वालों के खिलाफ हल्ला बोल सके.

तो आप क्या करेंगे? हम क्या करेंगे? राजनीति का रोना रोएंगे? बोलेंगे कि राजनीति यही है. राजनीति ऐसे ही होती है. नहीं जनाब. राजनीति ऐसे नहीं होती है. ऐसे तो सिर्फ हमारे-आपके खिलाफ, जनता के खिलाफ साजिशें रची जाती है. जो हो रही है.

जिस दिन हम राहुल के गोत्र और मोदी के चाय बेचने की महागाथा जानने की जगह हिन्दुस्तान का गोत्र समझ लेंगे, उसी दिन राजनीति भी बदल जाएगी. राजनीति का एजेंडा भी बदल जाएगा….

याद रखिए, हिन्दुस्तान का गोत्र कॉपर है, जाति मर्करी और धर्म सल्फेट…. — शशि शेखर के फेसबुक वॉल से

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मोहम्मद अज़ीज को रवीश कुमार की श्रद्धांजलि

गानों की दुनिया का अज़ीम सितारा था,मोहम्मद अज़ीज़ प्यारा था. काम की व्यस्तता के बीच हमारे अज़ीज़ मोहम्मद अज़ीज़ दुनिया को विदा कर गए. मोहम्मद रफ़ी के क़रीब इनकी आवाज़ पहचानी गई लेकिन अज़ीज़ का अपना मक़ाम रहा. अज़ीज़ अपने वर्तमान में रफ़ी साहब के अतीत को जीते रहे या जीते हुए देखे गए. यह अज़ीज़ के साथ नाइंसाफ़ी हुई. मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ बंद गले की थी मगर बंद गली से निकलते हुए जब चौराहे पर पहुँचती थी तब सुनने वाला भी खुल जाता है. एक बंद गिरह के खुल जाने की आवाज़ थी मोहम्मद अज़ीज़ की. यहीं पर मोहम्मद अज़ीज़ महफ़िलों से निकल कर मोहल्लों के गायक हो जाते थे. अज़ीज़ अज़ीमतर हो जाते थे.

एक उदास और ख़ाली दौर में अज़ीज़ की आवाज़ सावन की तरह थी. सुनने वालों ने उनकी आवाज़ को गले तो लगाया मगर अज़ीज़ को उसका श्रेय नहीं दिया. अपनी लोकप्रियता के शिखर पर भी वो गायक बड़ा गायक नहीं माना गया जबकि उनके गाने की शास्त्रीयता कमाल की थी. अज़ीज़ गा नहीं सकने वालों के गायक थे. उनकी नक़ल करने वाले आपको कहीं भी मिल जाएँगे. उनकी आवाज़ दूर से आती लगती है. जैसे बहुत दूर से चली आ रही कोई आवाज़ क़रीब आती जा रही हो. कई बार वे क़रीब से दूर ले जाते थे.

फिल्म ‘सिंदूर’ के गाने में लता गा रही हैं. पतझड़ सावन बसंत बहार. पाँचवा मौसम प्यार का, इंतज़ार का. कोयल कूके बुलबुल गाए हर इक मौसम आए जाए. गाना एकतरफ़ा चला जा रहा है. तभी अज़ीज़ साहब इस पंक्ति के साथ गाने में प्रवेश करते हैं. ‘ लेकिन प्यार का मौसम आए. सारे जीवन में एक बार एक बार.’ अज़ीज़ के आते ही गाना दमदार हो जाता है. जोश आ जाता है. गाने में सावन आ जाता है.

चौंसठ साल की ज़िंदगी में बीस हज़ार गाने गा कर गए हैं. उनके कई गानों पर फ़िदा रहा हूँ. ‘मरते दम तक’ का गाना भी पसंद आता है. छोड़ेंगे न हम न तेरा साथ, ओ साथी मरते दम तक. सुभाष घई की फ़िल्म ‘राम लखन’ का गाना ‘माई नेम इज़ लखन’ उस दौर को दमदार बनाया गया था. इस गाने ने अनिल कपूर को घर-घर का दुलारा बना दिया. मोहम्मद अज़ीज़ अनिल कपूर में ढल गए थे. यह उनके श्रेष्ठतम गानों में से एक था.

मोहम्मद अज़ीज़ को काग़ज़ पर सामान्य गीत ही मिले लेकिन उन्होंने अपने सुरों से उसे ख़ास बना दिया. और जब ख़ास गीत मिले उसे आसमान पर पहुँचा दिया. महेश भट्ट की फिल्म ‘नाम’ का गाना याद आ रहा है. ये आँसू ये जज़्बात, तुम बेचते हो ग़रीबों के हालात बेचते हो अमीरों की शाम ग़रीबों के नाम. मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ ही उस वक़्त के भारत के कुलीन तबक़े को चुनौती दे सकती थी. बहुत ख़ूब दी भी . उनकी आवाज़ की वतनपरस्ती अतुलनीय है. आप कोई भी चुनावी रैली बता दीजिए जिसमें ‘कर्मा’ फ़िल्म का गाना न बजता हो. रैलियों का समां ही बँधता है मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ से.’ हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हमवतन हमनाम हैं, जो करें इनको जुदा मज़हब नहीं, इल्ज़ाम है. हम जिएंगे और मरेंगे, ऐ वतन तेरे लिए दिल दिया है, जाँ भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए .’

हमने हिन्दी प्रदेशों की सड़कों पर रात-बिरात यहाँ वहाँ से निकलते हुए अपनी कार में मोहम्मद अज़ीज़ को ख़ूब सुना है. उनके गानों से हल्का होते हुए गाँवों को देखा है, क़स्बों को देखा है. तेज़ी से गुज़रते ट्रक से जब भी अज़ीज़ की आवाज़ आई, रगों में सनसनी फैल गई. अज़ीज़ के गाने ट्रक वालों के हमसफ़र रहे. ढाबों में उनका गाना सुनते हुए एक कप चाय और पी ली. उनका गाया हुआ बिगाड़ कर गाने में भी मज़ा आता था. फिल्में फ्लाप हो जाती थीं मगर अज़ीज़ के गाने हिट हो जाते थे.

विनोद खन्ना अभिनीत ‘सूर्या’ का गाना सुनकर लगता है कि कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो है. इस गाने को सुनते हुए अक्सर लगता रहा कि तमाम तकलीफ़ों को मिटाने ‘सूर्या’ आ रहा है. सूर्या के आते ही सब ठीक हो जाएगा. नाइंसाफ़ी से लड़ते रहना है. सुबह होगी. बाद की पढ़ाई ने समझा दिया कि मसीहा कभी नहीं आता. किसी एक के आने से सब ठीक नहीं होता है. यह सच है कि मैंने ‘सूर्या’ के इस गाने को असंख्य बार सुना है. सोचता रहता हूँ कि मुंबई के गीत लिखने वालों ने कितनी ख़ूबी से ऐसे गाने पब्लिक स्पेस में अमर कर दिए. इस गाने को आप किसी किसान रैली में बजा दीजिए, फिर असर देखिए.

जो हल चलाए, उसकी जमीं हो ये फ़ैसला हो,आज और यहीं हो अब तक हुआ है,पर अब न होगा मेहनत कहीं हो, दौलत कहीं हो ये हुक्म दुनिया के नाम लेकर आएगा सूर्या एक नई सुबह का पैग़ाम लेकर आएगा सूर्या आसमां का धरती को सलाम लेकर आएगा सूर्या

अज़ीज़ साहब हम आपके क़र्ज़दार हैं. आपके गानों ने मुझे नए ख़्वाब दिए हैं. लोग कहते थे कि आपकी आवाज़ लोकल है. शुक्रिया आपके कारण मैं लोकल बना रहा. मुझे इस देश के गाँव और क़स्बे आपकी आवाज़ के जैसे लगते हैं. दूर से क़रीब आते हुए और क़रीब से दूर जाते हुए. हिन्दी फ़िल्मों के गाने न होते तो मेरी रगों में ख़ून नहीं दौड़ता. आपने कई चाट गानों को सुनने लायक बनाया. कई गानो को नहीं सुने जा सकने लायक भी गाया. राम अवतार का एक गाना झेला नहीं जाता है. ‘फूल और अंगारे’ का गाना आज भी सुनकर हँसता हूँ और आपको सराहता हूँ.

तुम पियो तो गंगाजल है ये हम पीये तो है ये शराब पानी जैसा है हमारा ख़ून और तुम्हारा ख़ून है गुलाब सब ख़्याल है सब फ़रेब है अपनी सुबह न शाम है तुम अमीर हो ख़ुशनसीब हो मैं ग़रीब हूँ बदनसीब हूँ पी पी के अपने ज़ख़्म सीने दो मुझको पीना है पीने दो मुझको जीना है जीने दो

मोहम्मद अज़ीज़ मेरे गायक हैं. रफ़ी के वारिस हैं मगर रफ़ी की नक़ल नहीं हैं. हालांकि उनमें रफ़ी की ऊँचाई भी थी लेकिन वे उन अनाम लोगों की ख़ातिर नीचे भी आते थे जिनकी कोई आवाज़ नहीं थी. अज़ीज़ के कई गानों में अमीरी और ग़रीबी का अंतर दिखेगा. हम समझते हैं कि गायक को गाने संयोग से ही मिलते हैं फिर भी अज़ीज़ उनके गायक बन गए जिन्हें कहना नहीं आया. जो आवाज़ के ग़रीब थे. जिन्हें लोगों ने नहीं सुना. उन्हें अज़ीज़ का इंतज़ार था और अज़ीज़ मिला. आपने हिन्दी फ़िल्मों के गानों का विस्तार किया है. नए श्रोता बनाए. आप चले गए. मगर आप जा नहीं सकेंगे. लोग मर्द टांगे वाला गाते रहेंगे, इसलिए कि इस गाने को कोई कैसे गा सकता है. ‘आख़िर क्यों’ का गाना कैसे भूल सकता हूँ. यह गाना आपको रफी बनाता है.

एक अंधेरा लाख सितारे एक निराशा लाख सहारे सबसे बड़ी सौग़ात है जीवन नादां है जो जीवन से हारे बीते हुए कल की ख़ातिर तू आने वाला कल मत खोना जाने कौन कहाँ से आकर राहें तेरी फिर से सँवारे

अज़ीज़ की बनाई रविशों पर चलते हुए हम तब भी गुनगुनाया करेंगे जब आप मेरे सफ़र में नहीं होंगे. जब भी हम अस्सी और नब्बे के दशक को याद करेंगे, अज़ीज़ साहब आपको गुनगुनाएँगे. आपका ही तो गाना है. ‘देश बदलते हैं वेष बदलते नहीं दिल बदलते नहीं दिल, हम बंज़ारे.’ हम बंज़ारों के अज़ीज़ को आख़िरी सलाम.

रवीश कुमार देश के जाने-माने टीवी पत्रकार हैं.

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1857 क्रांति के सूत्रधार थे मातादीन वाल्मीकि

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1857 की क्रांति को घोषित तौर पर पहला स्वतंत्रता संग्राम का युद्ध माना जाता है. भारतीय इतिहासकारों द्वारा इस पूरी क्रांति का श्रेय मंगल पांडे को दे दिया जाता है, लेकिन असल में इस क्रांति के सूत्रधार मातादीन भंगी थे. माना जाता है कि मातादीन भंगी मूलतः मेरठ के रहने वाले थे. लेकिन रोजी-रोटी के लिए इनके पूर्वजों ने यूपी के कई शहरों की खाक छानी और एक समय बंगाल में जाकर बस गए. उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के कारण वे पढ़-लिख नहीं पाए थे, क्योंकि हिन्दू धर्म व्यवस्था एक भंगी को पढ़ने का अधिकार नहीं देती थी. हालांकि मातादीन के पुरखे शुरू से ही अंग्रेजों के संपर्क में आने से सरकारी नौकरी में रहे थे. अतः शीघ्र ही मातीदीन को भी बैरकपुर फैक्ट्री में खलासी की नौकरी मिल गई. यहां अंग्रेज सेना के सिपाहियों के लिए कारतूस बनाए जाते थे. अंग्रेजी फौज के निकट रहने के कारण मातादीन के जीवन पर उसका खासा असर पड़ा था. अनुशासन, संयम, स्वाभिमान, स्पष्टवादिता आदि गुण उन्होंने सैनिकों की संगत से ही पाए थे.

मातादीन को पहलवानी का भी शौक था. वह इस मल्लयुद्ध कला में दक्षता हासिल करना चाहते थे, लेकिन अछूत होने के कारण किसी भी हिन्दू उस्ताद ने उन्हें अपना शागिर्द नहीं बनाया. वह हर हिन्दू उस्ताद के अखाड़े में मल्लयुद्ध की कला सीखने के लिए जाते लेकिन वहां से उन्हें निराश लौटना पड़ता था. वहां उनसे वही सलूक किया जाता जो एक वक्त में द्रोणाचार्य के आश्रम में आदिवासी वीर तीरंदाज एकलव्य के साथ हुआ था. लेकिन कहते हैं कि जहां चाह होती है वहां राह भी निकल ही आती है. आखिरकार मातादीन की मल्लयुद्ध सीखने की इच्छा पूरी हुई और एक मुसलमान खलीफा इस्लाउद्दीन जो पल्टन नंबर 70 में बैंड बजाते थे, मातादीन को मल्लयुद्ध सिखाने के लिए राजी हो गए. अपनी लगन की बदौलत मातादीन ने उस्ताद इस्लाउद्दीन से मल्लयुद्ध के सभी गुर सीख लिए थे. अब वह एक कुशल मल्लयुद्ध योद्धा बन चुके थे. इस कला की वजह से ही अब लोग उन्हें पहचानने लगे थे.

इसी मल्लयुद्ध कला की बदौलत ही मातादीन की दोस्ती मंगल पाण्डे से हुई थी. मंगल पाण्डे स्वयं भी मल्लयुद्ध के शौकीन थे. एक कुश्ती प्रतियोगिता में मंगल पाण्डे मातादीन का सुदृढ़ शरीर और कुश्ती का बेहतरीन प्रदर्शन देख कर गदगद हो गए. इस्लाउद्दीन के अखाड़े और मातादीन के नाम की वजह से मंगल पाण्डे ने उसकी छवि एक मुस्लिम पहलवान की बना ली थी. मातादीन को यह भनक लग चुकी थी कि मंगल पांडे उन्हें मुसलमान समझ रहा है, सो सीधी बात कहने के आदि मातादीन ने मंगल पाण्डे को अपनी जाति भी बता दी. इसके बाद मातादीन के प्रति मंगल पांडे का व्यवहार बदल गया था.

एक दिन गर्मी से तर-बतर, थके-मांदे, प्यासे मातादीन ने मंगल पाण्डे से पानी का लोटा मांगा. मंगल पाण्डे ने इसे एक अछूत का दुस्साहस समझते हुए कहा, ‘अरे भंगी, मेरा लोटा छूकर अपवित्र करेगा क्या?’ प्रतिउत्तर में मातादीन ने मंगल पांडे को ललकार दिया और कहा कि पंडत, तुम्हारी पंडिताई उस समय कहा चली जाती है जब तुम और तुम्हारे जैसे चुटियाधारी गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से काटकर बंदूकों में भरते हो.’ मातादीन की ये बातें मंगल पाण्डे तक ही सीमित नहीं रही बल्कि एक बटालियन से दूसरी बटालियन, एक छावनी से दूसरी छावनी तक फैलती चली गई. इन्हीं शब्दों ने सेना में विद्रोह की स्थिति बना दी. 1 मार्च, 1857 को मंगल पाण्डे परेड मैदान में लाईन से निकल बाहर आया और एक अधिकारी को गाली मार दी. इसके बाद विद्रोह बढ़ता चला गया. मंगल पाण्डे को फांसी पर लटका दिया गया. जो गिरफ्तार हुए उनमें मातादीन प्रमुख थे. मातादीन को भी अंग्रेज ऑफिसर ने फांसी पर लटका दिया.

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अयोध्या एक तहज़ीब के मर जाने की कहानी है

कहते हैं अयोध्या में राम जन्मे, वहीं खेले कूदे बड़े हुए, बनवास भेजे गए, लौट कर आए तो वहां राज भी किया, उनकी जिंदगी के हर पल को याद करने के लिए एक मंदिर बनाया गया, जहां खेले, वहां गुलेला मंदिर है, जहां पढ़ाई की वहां वशिष्ठ मंदिर हैं. जहां बैठकर राज किया वहां मंदिर है. जहां खाना खाया वहां सीता रसोई है. जहां भरत रहे वहां मंदिर है. हनुमान मंदिर है. कोप भवन है. सुमित्रा मंदिर है. दशरथ भवन है. ऐसे बीसीयों मंदिर हैं. और इन सबकी उम्र 400-500 साल है. यानी ये मंदिर तब बने जब हिंदुस्तान पर मुगल या मुसलमानों का राज रहा.

अजीब है न! कैसे बनने दिए होंगे मुसलमानों ने ये मंदिर! उन्हें तो मंदिर तोड़ने के लिए याद किया जाता है. उनके रहते एक पूरा शहर मंदिरों में तब्दील होता रहा और उन्होंने कुछ नहीं किया! कैसे अताताई थे वे, जो मंदिरों के लिए जमीन दे रहे थे. शायद वे लोग झूठे होंगे जो बताते हैं कि जहां गुलेला मंदिर बनना था उसके लिए जमीन मुसलमान शासकों ने ही दी. दिगंबर अखाड़े में रखा वह दस्तावेज भी गलत ही होगा जिसमें लिखा है कि मुसलमान राजाओं ने मंदिरों के बनाने के लिए 500 बीघा जमीन दी. निर्मोही अखाड़े के लिए नवाब सिराजुदौला के जमीन देने की बात भी सच नहीं ही होगी, सच तो बस बाबर है और उसकी बनवाई बाबरी मस्जिद! अब तो तुलसी भी गलत लगने लगे हैं जो 1528 के आसपास ही जन्मे थे. लोग कहते हैं कि 1528 में ही बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई. तुलसी ने तो देखा या सुना होगा उस बात को. बाबर राम के जन्म स्थल को तोड़ रहा था और तुलसी लिख रहे थे मांग के खाइबो मसीत में सोइबो. और फिर उन्होंने रामायण लिखा डाली. राम मंदिर के टूटने का और बाबरी मस्जिद बनने क्या तुलसी को जरा भी अफसोस न रहा होगा! कहीं लिखा क्यों नहीं!

अयोध्या में सच और झूठ अपने मायने खो चुके हैं. मुसलमान पांच पीढ़ी से वहां फूलों की खेती कर रहे हैं. उनके फूल सब मंदिरों पर उनमें बसे देवताओं पर.. राम पर चढ़ते रहे. मुसलमान वहां खड़ाऊं बनाने के पेशे में जाने कब से हैं. ऋषि मुनि, संन्यासी, राम भक्त सब मुसलमानों की बनाई खड़ाऊं पहनते रहे. सुंदर भवन मंदिर का सारा प्रबंध चार दशक तक एक मुसलमान के हाथों में रहा. 1949 में इसकी कमान संभालने वाले मुन्नू मियां 23 दिसंबर 1992 तक इसके मैनेजर रहे. जब कभी लोग कम होते और आरती के वक्त मुन्नू मियां खुद खड़ताल बजाने खड़े हो जाते तब क्या वह सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और झूठ क्या?

अग्रवालों के बनवाए एक मंदिर की हर ईंट पर 786 लिखा है. उसके लिए सारी ईंटें राजा हुसैन अली खां ने दीं. किसे सच मानें? क्या मंदिर बनवाने वाले वे अग्रवाल सनकी थे या दीवाना था वह हुसैन अली खां जो मंदिर के लिए ईंटें दे रहा था? इस मंदिर में दुआ के लिए उठने वाले हाथ हिंदू या मुसलमान किसके हों, पहचाना ही नहीं जाता. सब आते हैं. एक नंबर 786 ने इस मंदिर को सबका बना दिया. क्या बस छह दिसंबर 1992 ही सच है! जाने कौन.

छह दिसंबर 1992 के बाद सरकार ने अयोध्या के ज्यादातर मंदिरों को अधिग्रहण में ले लिया. वहां ताले पड़ गए. आरती बंद हो गई. लोगों का आना जाना बंद हो गया. बंद दरवाजों के पीछे बैठे देवी देवता क्या कोसते होंगे कभी उन्हें जो एक गुंबद पर चढ़कर राम को छू लेने की कोशिश कर रहे थे? सूने पड़े हनुमान मंदिर या सीता रसोई में उस खून की गंध नहीं आती होगी जो राम के नाम पर अयोध्या और भारत में बहाया गया?

अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी है. अयोध्या एक तहजीब के मर जाने की कहानी

– सोशल मीडिया पर घूम रहा यह लेख साभार

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महात्मा ज्योतिबा फुले स्मृति दिवस: ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता है

ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर का जीवन और कर्तृत्व बहुत ही बारीकी से समझे जाने योग्य है. आज जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं उनमे ये आवश्यकता और अधिक मुखर और बहुरंगी बन पडी है. दलित आन्दोलन या दलित अस्मिता को स्थापित करने के विचार में भी एक “क्रोनोलाजिकल” प्रवृत्ति है, समय के क्रम में उसमे एक से दूसरे पायदान तक विक्सित होने का एक पैटर्न है और एक सोपान से दूसरे सोपान में प्रवेश करने के अपने कारण हैं. ये कारण सावधानी से समझे और समझाये जा सकते हैं.

अधिक विस्तार में न जाकर ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर के उठाये कदमों को एकसाथ रखकर देखें. दोनों में एक जैसी त्वरा और स्पष्टता है. समय और परिस्थिति के अनुकूल दलित समाज के मनोविज्ञान को पढ़ने, गढ़ने और एक सामूहिक शुभ की दिशा में उसे प्रवृत्त करने की दोनों में मजबूत तैयारी दिखती है. और चूंकि कालक्रम में उनकी स्थितियां और उनसे अपेक्षाएं भिन्न है, इसलिए एक ही ध्येय की प्राप्ति के लिए गए उनके कदमों में समानता होते हुए भी कुछ विशिष्ट अंतर भी नजर आते हैं.

ज्योतिबा के समय में जब कि शिक्षा दलितों के लिए एक दुर्लभ आकाशकुसुम था, और शोषण के हथियार के रूप में निरक्षरता और अंधविश्वास जैसे “भोले-भाले” कारणों को ही मुख्य कारण माना जा सकता था– ऐसे वातावरण में शिक्षा और कुरीती निवारण –इन दो उपायों पर पूरी ऊर्जा लगा देना आसान था. न केवल आसान था बल्कि यही संभव भी था. और यही ज्योतिबा ने अपने जीवन में किया भी. क्रान्ति-दृष्टाओं की नैदानिक दूरदृष्टि और चिकित्सा कौशल की सफलता का निर्धारण भी समय और परिस्थितियाँ ही करती हैं.

इस विवशता से इतिहास का कोई क्रांतिकारी या महापुरुष कभी नहीं बच सका है. ज्योतिबा और उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी आम्बेडकर के कर्तृत्व में जो भेद हैं उन्हें भी इस विवशता के आलोक में देखना उपयोगी है. इसलिए नही कि एक बार बन चुके इतिहास में अतीत से भविष्य की ओर चुने गये मार्ग को हम इस भाँती पहचान सकेंगे, बल्कि इसलिए भी कि अभी के जाग्रत वर्तमान से भविष्य की ओर जाने वाले मार्ग के लिए पाथेय भी हमें इसी से मिलेगा.

ज्योतिबा के समय की “चुनौती” और आंबेडकर के समय के “अवसर” को तत्कालीन दलित समाज की उभर रही चेतना और समसामयिक जगत में उभर रहे अवसरों और चुनौतियों की युति से जोड़कर देखना होगा. जहां ज्योतिबा एक पगडंडी बनाते हैं उसी को आम्बेडकर एक राजमार्ग में बदलकर न केवल यात्रा की दशा बदलते हैं बल्कि गंतव्य की दिशा भी बदल देते हैं. नए लक्ष्य के परिभाषण के लिए आम्बेडकर न केवल मार्ग और लक्ष्य की पुनर्रचना करते हैं बल्कि अतीत में खो गए अन्य मार्गों और लक्ष्यों का भी पुनरुद्धार करते चलते हैं. फूले में जो शुरुआती लहर है वो आम्बेडकर में प्रौढ़ सुनामी बनकर सामने आती है, और एक नैतिक आग्रह और सुधार से आरम्भ हुआ सिलसिला, किसी खो गए सुनहरे अतीत को भविष्य में प्रक्षेपित करने लगता है.

आगे यही प्रक्षेपण अतीत में छीन लिए गए “अधिकार” को फिर से पाने की सामूहिक प्यास में बदल जाता है.

इस यात्रा में पहला हिस्सा जो शिक्षा, साक्षरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जन्माने जैसे नितांत निजी गुणों के परिष्कार में ले जाता था, वहीं दूसरा हिस्सा अधिकार, समानता और आत्मसम्मान जैसे कहीं अधिक व्यापक, इतिहास सिद्ध और वैश्विक विचारों के समर्थन में कहीं अधिक निर्णायक जन-संगठन में ले जाता है. इतना ही नहीं बल्कि इसके साधन और परिणाम स्वरूप राजनीतिक उपायों की खोज, निर्माण और पालन भी आरम्भ हो जाता है.

यह नया विकास स्वतन्त्रता पश्चात की राष्ट्रीय और स्थानीय राजनीति में बहुतेरी नयी प्रवृत्तियों को जन्म देता है. जो समाज हजारों साल से निचली जातियों को अछूत समझता आया था उसकी राजनीतिक रणनीति में जाति का समीकरण सर्वाधिक पवित्र साध्य बन गया. ये ज्योतिबा और आम्बेडकर का किया हुआ चमत्कार है, जिसकी भारत जैसे रुढ़िवादी समाज ने कभी कल्पना भी न की थी. यहाँ न केवल एक रेखीय क्रम में अधिकारों की मांग बढ़ती जाती है बल्कि उन्हें अपने दम पर हासिल करने की क्षमता भी बढ़ती जाती है.

इसके साथ साथ इतिहास और धार्मिक ग्रंथों के अँधेरे और सडांध-भरे तलघरों में घुसकर शोषण और दमन की यांत्रिकी को बेनकाब करने का विज्ञान भी विकसित होता जाता है.ये बहुआयामी प्रवृत्तियाँ जहां एक साथ एक ही समय में इतनी दिशाओं से आक्रमण करती हैं कि शोषक और रुढ़िवादी वर्ग इससे हताश होकर “आत्मरक्षण” की आक्रामक मुद्रा में आ जाता है.एक विस्मृत और शोषित अतीत की राख से उभरकर भविष्य के लिए सम्मान और समानता का दावा करती हुयी ये दलित चेतना इस प्रष्ठभूमि में लगातार आगे बढ़ती जाती है। Sanjay Shraman Jothe

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ऊना दलित पीड़ितों ने राष्ट्रपति को पत्र लिख मांगी इच्छा मृत्यु

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ऊना मामले के एक दलित पीड़ित ने मंगलवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को खत लिखकर इच्छा मृत्यु की मांग की है. पीड़ित ने कहा कि गुजरात सरकार ने उनसे किया कोई भी वादा पूरा नहीं किया है. उन्होंने कहा कि उनमें से एक 7 दिसंबर से दिल्ली में आमरण उपवास करेगा.

अपने परिवार की ओर से लिखते हुए वशराम सरवइया (28) ने लिखा है कि उस वक्त मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल द्वारा किए किसी भी वादे को गुजरात सरकार ने पूरा नहीं किया है. “उन्होंने कहा था कि हर एक पीड़ित को 5 एकड़ भूमि दी जाएगी, पीड़ितों को उनकी योग्यता के अनुसार सरकारी नौकरी दी जाएगी और मोटा सामढियाला को एक विकसित गांव में बदल दिया जाएगा. घटना हुए दो साल और चार महीने हो गए लेकिन सरकार ने अपना कोई भी वादा पूरा नहीं किया और न ही वादे पूरा करने की कोई कोशिश की.”

वशराम, उनके छोटे भाई, पिता और मां उन्हीं 8 दलितों में शामिल थे जिन्हें गौ रक्षकों ने गिर सोमनाथ जिले के ऊना तालुका के मोटा सामढियाला गांव में 11 जुलाई, 2016 को पीटा था. हमलावरों ने इस परिवार पर गौ हत्या करने का आरोप लगाया था. लेकिन बाद में पुलिस की जांच में पता चला कि वह मरे हुए जानवरों के शवों से चमड़ा निकालने का काम करते हैं. उनके साथ मारपीट की वीडियो पूरे देश में वायरल हो गई थी. जिसके बाद राज्य में दलितों ने विरोध प्रदर्शन भी किया. वशराम का कहना है कि ये उनका पैतृक व्यवसाय है.

वशराम ने लिखा है, “हम पशुओं की खाल बेचने का काम करते थे और उसे छोड़ने के बाद आजीविका के लिए कुछ नहीं बचा. यह संभव है कि भविष्य में हम भूख से मर जाएं. हम अपने मामले को बोलकर और लिखकर कई बार पेश कर चुके हैं लेकिन गुजरात सरकार ने हमारी किसी भी परेशानी की ओर कोई ध्यान नहीं दिया.” उनका कहना है कि उन्हें और बाकी पीड़ितों को बहुत दुख है कि सरकार ने दलितों के खिलाफ दर्ज 74 मामलों को वापस नहीं लिया. ये मामले घटना के बाद राज्य में हुए हिंसक प्रदर्शनों के दौरान दर्ज हुए थे. उन्होंने खत में लिखा है, “पुलिस ने आंदोलन के दौरान दलितों के खिलाफ कई झूठे मामले दायर किए थे.” 10वीं तक पढ़े लिखे वशराम का कहाना है कि वो और उनका परिवार अब अपना जीवन खत्म करना चाहते हैं. उन्हें सरकार की ओर से कोई सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई है. गवाहों को कोर्ट तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए पुलिस ने कुछ नहीं किया और आरोपियों को भी बेल मिल गई.

उन्होंने खत में आगे लिखा है, “सरकार हमारी मांगों को पूरा करने में नाकाम रही है. हम बहुत दुखी हैं. हम अब आगे जीना नहीं चाहते इसलिए हम इच्छा मृत्यु की इजाजत मांग रहे हैं.”

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‘इनेलो-बसपा गठबंधन चट्टान की तरह मजबूत’

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इसराना। बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश भारती ने कहा कि भाजपा की सरकार झूठे वायदों के सहारे सत्ता में आई थी. प्रदेश की जनता भाजपा के झूठ को समझ चुकी है. प्रदेश में बसपा और इनेलो का गठबंधन चट्टान की तरह मजबूती से खड़ा है. गठबंधन का एक ही नारा है. किसान का बेटा सीएम और गरीब की बेटी देश की पीएम बनेगी. प्रकाश भारती नौल्था में बसपा कार्यालय के उद्‌घाटन व ज्वॉइनिंग कार्यक्रम पर आयोजित जनसभा को संबोधित कर रहे थे. इस दौरान रेलवे में कार्यरत रामचंद्र अलाड़िया अपने हजारों समर्थकों के साथ बसपा में शामिल हो गए. इस मौके पर गुरमुख सिंह, प्रदेश सचिव रामकुमार वाल्मीकि, जिला अध्यक्ष सतबीर पांचाल, सुनीता सभरवाल, इनेलो युवा जिला अध्यक्ष नवीन नैन, लखपत रोड़, जसमेर लोचभ, आजाद नौल्था, कुमारी अनीता व ललित कुमार उपस्थित रहे.

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गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय में बापसा ने लहराया परचम

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गांधीनगर। गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय गांधीनगर के स्टूडेंट कौंसिल चुनाव में बिरसा आंबेडकर फुले छात्र संगठन (BAPSA) के प्रत्याशी बिरेंद्री ने स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज से भारी मतों से अपनी जीत दर्ज की है. बता दें कि यह चुनाव विश्वविद्यालय में इस बार सिर्फ तीन स्कूल में कराया गया बाकि के स्कूलों में डीन द्वारा नॉमिनेटेड कैंडिडेट आते हैं. इसमें स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज सबसे अहम् माना जाता है. ऐसे समय में अगर बिरसा, आंबेडकर और फुले जैसे विचारधारा वाला संघठन जीते तो और भी दिलचस्प हो जाता हैं. बिरेंदी ने कुल 80 वोट पाकर अपने प्रतिद्वंद्वी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के पल्लवी दास (21वोट) और एक स्वतंत्र उम्मीदार रजनी (21 वोट) को करारी शिकस्त दी हैं.

बिरसा आंबेडकर फुले छात्र संगठन के सदस्यों का कहना है कि यह उनका पहला छात्र संगठन चुनाव हैं जब उनके कोई उम्मीदार इस चुनाव में हिस्सा लिया और इतने ज्यादा वोटों से जीते. उन्होंने बताया कि इस चुनाव में उनको लेफ्ट (LDSF) संगठन ने फासीवादी ताकतों को शिक्षण संस्थानों में रोकने तथा यूनिवर्सिटी में प्रजातंत्र स्थापित करने में सहयोग देने के लिए अपना समर्थन दिया. उन्होंने बताया कि यह जीत संविधान को मानने वालों की जीत हैं.

बिरसा आंबेडकर फुले छात्र संगठन के अध्यक्ष हवालदार भारती ने बताया कि बापसा इस विश्वविद्यालय में 15 नवंबर 2017 को ठीक एक साल पहले स्थापित हुआ और आज उन तमाम सामाजिक न्याय पसंद छात्रों की आवाज बनकर काम कर रही हैं. भारती ने बताया कि यह सिर्फ बापसा की जीत नहीं हैं यह जीत बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर, शाहूजी महाराज, ज्योतिबाफुले, माता सावित्रीबाई फुले, फ़ातिमा शेख़, पेरियार, गुरु घासीदास और कबीरदास जैसे उन तमाम बहुजन नायकों की विचारधारा की जीत हैं जिन्होंने भारतभूमि पर सामाजिक न्याय के लिए अपने जीवन के अंतिम समय तक कार्य कियें.

इस चुनाव में स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ से एक और बहुजन छात्र लक्ष्मण चेट्टी ने भीं अपने स्वतंत्र उम्मीदारी से चुनाव जीत लिया. वहीं स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज़ लिटरेचर एंड कल्चरल स्टडीज से भी एक स्वतंत्र उम्मीदवार मनोहर कुमार ने अपनी जीत दर्ज की.

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26/11 मुंबई हमलों की मुख्य गवाह देविका का दर्द

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मुंबई। मुंबई में 18 जवानों और 166 निर्दोष लोगों की जान लेने वाले पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब तो फांसी पर टंग गया, मगर जाते-जाते उसने बांद्रा के गर्वमेंट कॉलोनी में रहने वाली 19 वर्षीय देविका रोटवानी की जिंदगी को बदल कर रख दी. देविका ही वह मुख्य गवाह हैं, जिनकी गवाही को अदालत ने मान्य किया और कसाब को फांसी की सजा सुनाई.

2006 में मां को खो चुकी देविका तब मात्र नौ साल की थी, जब उसने कसाब को आंखों के सामने सीएसटी स्टेशन पर खून की होली खेलते हुए देखा था. देविका बताती हैं, ‘आंतकी कसाब ने मेरी जिंदगी बदल कर रख दी है. दुनिया हमें कसाब की बेटी तक कहने लगी, जो मुझे बहुत बुरा लगता है.’

देविका बताती हैं, ‘उस शाम मैं अपने पिता नटवरलाल रोटवानी और छोटे भाई जयेश के साथ बड़े भाई भरत से पुणे मिलने जा रही थी. हमलोग सीएसटी के प्लैटफॉर्म 12 पर खड़े होकर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे. अचानक लोगों के चीखने, चिल्लाने और भागो-भागो की आवाजें आने लगीं. बीच-बीच में गोलियों की तेज आवाजें और धमाके सुनाई देने लगे. पिता ने मेरा हाथ पकड़ा और भीड़ के साथ भागने की कोशिश करने लगे. मगर अचानक मुझे गोली लगी और मैं वहीं गिर पड़ी.

वह कहती हैं, ‘जब आंखें खुलीं, सामने एक व्यक्ति को हंसते हुए लोगों पर गोलियां चलाते हुए देखा. वह कसाब था, जो अंधाधुंध गोलियां बरसा रहा था. कुछ देर बाद मैं फिर बेहोश हो गई और होश आने पर खुद को पहले कामा और बाद में जेजे अस्पताल में पाया. सौभाग्य से पिता और भाई को गोली नहीं लगी थी. मगर, जेजे अस्पताल में ढाई महीने तक चले इलाज के दौरान मेरे साथ-साथ दूसरे जख्मियों के ड्रेसिंग बदलने के चक्कर में भाई बीमार हो गया. उसके गले में संक्रमण हो गया, जबकि मेरे पैरों की छह बार सर्जरी करानी पड़ी. थोड़ा सामान्य होने पर हमलोग मुंबई से राजस्थान चले गए.’

बकौल देविका, ‘अचानक एक दिन मुंबई पुलिस का फोन आया कि आप कसाब के खिलाफ अदालत में गवाही देंगी? पहले तो उस आतंकी का खौफनाक चेहरा आंखों के सामने आते ही मैं सहम गई, मगर उसकी बर्बरता और खूंखार हंसी से लबरेज गोलीबारी ने हौसला बढ़ा दिया. मैंने गवाही देने के लिए हामी भर दीं. वैसाखी के सहारे में अदालत में पहुंची, जहां मेरे सामने तीन लोगों को पहचान के लिए लाया गया. उनमें से एक कसाब भी था. मैं जज के सामने उसको पहचान गई. दिल तो किया की वैसाखी उठाकर उस पर हमला कर दूं, मगर चाहकर भी कर नहीं पाई.’

कसाब पर गवाही देने के बाद देविका का जीवन बदल गया. वह कहती हैं, ‘कसाब की पहचान लिए जाने की बातें जब मीडिया से होते हुए रिश्तेदारों और पड़ोसियों तक पहुंचीं, तो सब का रवैया बदल गया. मेवे के कारोबारी पिता को होलसेलरों ने माल (मेवा) देना बंद कर दिया. स्कूल वालों में मेरा नाम काट दिया. पड़ोसियों ने दूरी बना ली. कर्जा देने को कोई तैयार नहीं था. लोगों को डर था कि कहीं आंतकवादी उनके घरों, दुकानों या रिश्तेदारों पर हमला न कर दें. मेरी हालत गुनहगार जैसी हो गई, मगर पिता और भाई ने मेरा हौसला बढ़ाए रखा, क्योंकि मैं देश के लिए काम कर रही थीं. एक एनजीओ की मदद से सातवीं में दाखिला मिल गया.’

देविका बताती हैं कि कारोबार बंद होने से आर्थिक तंगी आ गई. मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को ट्वीट कर स्थिति बताई. मंत्रालय के चक्कर काटें, लेकिन किसी ने मदद नहीं की. बड़े भाई की आमदनी से घर खर्च चल रहा है. फोर्ट स्थित सिद्धार्थ कॉलेज से 11वीं की पढ़ाई कर रही देविका आईपीएस बनने का सपना देख रही हैं. मगर, उसे मलाल है कि उसने किसके लिए यह कदम उठाया, जिसके चलते आज उसका परिवार न घर का रहा है, न घाट का. हालांकि, दर्जनों ‘अवॉर्ड’ उसे देश सेवा के लिए प्रेरित करते हैं.

देविका बताती हैं, ‘जेजे अस्पताल में उसका इलाज काफी लंबा चला. मां के नहीं रहने पर भाई और पिता देखभाल करते थे. इसलिए वे बांद्रा (ईस्ट) के कदम चॉल स्थित भाड़े के घर नहीं जाते थे. मकान मालिक को लगा कि देविका और उसके परिजन आतंकी हमले में मारे गए हैं. इसलिए उन्होंने देविका के परिजन की खोजबीन किए बिना उसके सामान बेच दिए, जिसमें जिंदगी भर की जमा-पूंजी और दस्तावेज रखे हुए थे. सामान के नाम पर बस एक पेटी मिली, जो खाली थी.

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‘बाहुबली 2’ का रिकॉर्ड तोड़ ‘बधाई हो’ ने छठे हफ्ते कर दिखाया यह कारनामा

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नई दिल्ली। आयुष्मान खुराना की छोटे बजट की फिल्म ‘बधाई हो’ ने भारत की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म ‘बाहुबली: द कन्क्लूजन’ को भी पीछे छोड़ दिया है. बॉक्स ऑफिस इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, ‘बधाई हो’ ने छठे वीकएंड पर सबसे ज्यादा कमाई करने का रिकॉर्ड अपने नाम किया है. फिल्म ने छठे वीकएंड पर 3.75 करोड़ रुपये बटोरे हैं, जबकि ‘बाहुबली 2’ अपने छठे वीकएंड पर 3.35 करोड़ रुपये का कलेक्शन कर पाई थी. आयुष्मान खुराना और सान्या मल्होत्रा की इस फिल्म ने अब तक 130 करोड़ रुपये का बिजनेस कर लिया है. 30 करोड़ के बजट में बनी यह फिल्म छठे हफ्ते तक 135 करोड़ रुपये कमा सकती है.

‘बधाई हो’ ने पहले हफ्ते 65.33 करोड़ रुपये कमाए. दूसरे हफ्ते इसका कलेक्शन 27.56 करोड़ रुपये रहा. तीसरे वीक फिल्म के खाते में 15.22 करोड़ और चौथे हफ्ते 10.43 करोड़ रुपये आए. पांचवे वीक में फिल्म ने 7.63 करोड़ का कारोबार किया और छठे वीकएंड पर इसकी कमाई 3.75 करोड़ रुपये रही है. फिल्म अब तक 129.92 करोड़ रुपये का जबरदस्त बिजनेस कर चुकी है.

बता दें, ‘बधाई हो’ फिल्म आयुष्मान खुराना पर आधारित हैं, जिनकी खुद की उम्र शादी करने की है लेकिन इस उम्र में जब उनकी मां बनीं नीता गुप्ता प्रेग्नेंट हो जाती है तो उनकी जिंदगी में खलबली मच जाती है. ‘बधाई हो’ में आयुष्मान खुराना की जोड़ी ‘दंगल’ गर्ल सान्या मल्होत्रा  के साथ बनी है. फिल्म में नीता गुप्ता के पति का किरदार गजराज राव ने निभाया है.

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पीएम मोदी का ‘भय’ और सीजेआई गोगोई से गुपचुप मुलाकात! देखें तस्वीर

नई दिल्ली। हाल के दिनों में कई बातें ऐसी हुई हैं जो देश के इतिहास में पहली बार हुई हैं। कुछ अच्छी, कुछ बुरी और कुछ बहुत बुरी। कल एक मुलाकात हुई है जो खास है और ऐतिहासिक भी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की सुप्रीम कोर्ट में मुलाकात। मुलाकात खास इस लिहाज से कि सुप्रीम कोर्ट में मुख्यन्यायाधीश रंजन गोगोई से प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात थी और ऐतिहासिक इस लिहाज से देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रधानमंत्री सुप्रीम कोर्ट में आये थे।

प्रधानमंत्री मोदी रविवार रात साढ़े नौ बजे सुप्रीम कोर्ट में आये थे, मौका था विधि दिवस की पूर्व संध्या पर कोर्ट द्वारा आयोजित भोज जो BIMSTEC देशों यानि बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड के जजों के लिए आयोजित किया गया था।

आपको ये खबर कहीं प्रमुखता से नहीं दिखी होगी और न ही हर समय कैमरे के सामने रहने वाले प्रधानमंत्री जी की फ़ोटो दिखी होगी। मुझे एक वेब पोर्टल के सौजन्य से प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की एक तस्वीर मिली है। आप लोगों से साझा कर रहा हूँ।

इसकी वजह ये थी कि न तो हमें यानि सुप्रीम कोर्ट कवर करने वाले रिपोर्टर्स को बताया गया और न ही प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) कवर करने वाले पत्रकारों को। इसकी वजह क्या रही होगी हम और आप केवल अनुमान लगा सकते हैं!

मैं कोई अपना अनुमान आपसे साझा करूँ उससे पहले एक ‘क्रांतिकारी’ एडवोकेट की बात साझा करता हूँ। एक दिन पहले उस एडवोकेट का फोन आया कि ‘क्या आपको पता है कि प्रधानमंत्री सुप्रीम कोर्ट आ रहे हैं! क्यों आ रहे हैं! उनको क्यों आना चाहिए! रफेल डील मामले में प्रधानमंत्री के खिलाफ दायर पेटिशन पर जब मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है, प्रधानमंत्री को सुप्रीम कोर्ट क्यों आना चाहिए!’

एक साथ इतने सवाल सुनकर मैं इरिटेट हो गया, झुंझलाते हुए कहा ‘ तो क्या हो गया! BIMSTEC के जजों के लिए भोज में प्रधानमंत्री के शामिल होने में समस्या क्या है! प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं आ सकते!’ एडवोकेट का जवाब था ‘आजतक तो विधि दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री कभी नहीं आये! आखिर आज क्यों! जिस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप पर मुख्यन्यायाधीश की बेंच सुनवाई कर रही है, भ्रष्टाचार का आरोप खुद प्रधानमंत्री के खिलाफ हो… ऐसे में प्रधानमंत्री को मुख्यन्यायाधीश से कोर्ट में आकर मुलाकात क्यों करनी चाहिए?’

अब इस तस्वीर को देखकर सोच रहा हूँ कि एडवोकेट की बात बेवजह नहीं थी! न्यायपालिका में कार्यपालिका के दखल का आरोप पुराना है। और हाल के दिनों में तो जजों ने भी खुले में आकर प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिये इस बात को साबित भी किया है। हाल में ये भी हुआ कि एक मुख्य न्यायाधीश को लेकर विपक्ष ने महाभियोग लाने की कोशिश भी किया था। दीपक मिश्रा को बीजेपी और सरकार का सीजेआई साबित करने की हरसंभव कोशिश की गई और कुछ हद तक ऐसी इमेज बन भी गई!

अब पीएम और सीजेआई के मुलाकात की इस तस्वीर को देखिए। कल को रफेल मामले में मोदी सरकार को क्लीन चिट मिल जाती है तो लोग क्या कहेंगे! क्या इस फोटो को आधार बनाकर माई लार्ड और सरकार के रिश्ते पर सवाल नहीं उठाएंगे! न्यायपालिका की गरिमा के लिए मुलाकात की ये तस्वीर अच्छी नहीं कही जाएगी माई लार्ड!

साभार- भड़ास4मिडिया Read it also-कांग्रेस की वजह से प्रदेश और देश में भाजपा की सरकारें: मायावती

संविधान के मकसद को नाकाम करने में मोदी ही नंबर-1 पीएम है.

आज 26 नवम्बर है: संविधान दिवस ! 1949 में आज ही के दिन बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने राष्ट्र को वह महान संविधान सौपा था, जिसकी उद्देश्यिका में भारत के लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ कराने की घोषणा की गयी थी.

किन्तु संविधान सौंपने के एक दिन पूर्व अर्थात 25 नवम्बर, 1949 को उन्होंने इसे लेकर संसद के केन्द्रीय कक्ष से राष्ट्र को चेतावनी भी दिया था. उन्होंने कहा था- ’26 जनवरी, 1950 को हम राजनीतिक रूप से समान किन्तु आर्थिक और सामाजिक रूप से असमान होंगे. जितना शीघ्र हो सके हमें यह भेदभाव और पृथकता दूर कर लेनी होगी. यदि ऐसा नहीं किया गया तो जो लोग इस भेदभाव के शिकार हैं, वे राजनीतिक लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा देंगे, जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है.’ हमें यह स्वीकारने में कोई द्विधा नहीं होनी चाहिए कि स्वाधीन भारत के शासकों ने डॉ.आंबेडकर की उस ऐतिहासिक चेतावनी की प्रायः पूरी तरह अनेदखी कर दिया,जिसके फलस्वरूप आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी,जोकि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है, का भीषणतम साम्राज्य आज भारत में कायम हो गया है:अल्पजन जन्मजात विशेषाधिकारयुक्त सुविधाभोगी तबके का धर्म के साथ अर्थ-ज्ञान और राज-सत्ता पर 90 प्रतिशत कब्ज़ा हो गया है,जो इस बात का प्रमाण है कि संविधान अपने उद्देश्यों को पूरा करने में प्रायः पूरी व्यर्थ हो चुका है.

यही कारण है आजकल वंचित वर्गों के असंख्य संगठन और नेता आरक्षण के साथ संविधान बचाने के लिए रैलियां निकाल रहे हैं: भूरि-भूरि सेमीनार आयोजित कर रहे हैं. आज के इस खास दिन संविधान बचाने के नाम पर पूरे देश में सैकड़ों सेमीनार आयोजित किये गए होंगे, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है.

बहरहाल यह सवाल किसी को भी परेशान कर सकता है कि आजाद भारत के शासकों ने भयावह आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे तथा लोगों को तीन न्याय –सामाजिक,आर्थिक ,राजनीतिक- सुलभ कराने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाया? इस सवाल का बेहतर जवाब खुद बाबा साहेब आंबेडकर ही दे गए थे. उन्होंने कहा था,’संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो ,अगर इसका इस्तेमाल करने वाले लोग बुरे होंगे तो यह बुरा साबित होगा. अगर संविधान बुरा है,पर उसका इस्तेमाल करने वाले अच्छे होंगे तो बुरा संविधान भी अच्छा साबित होगा.’ जिस बेरहमी से अबतक आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की समस्या तथा तथा तीन न्याय की उपेक्षा हुई है, हमें अब मान लेना चाहिए कि हमारे संविधान का इस्तेमाल करनेवाले लोग अच्छे लोगों में शुमार करने लायक नहीं रहे. अगर ऐसा नहीं होता तो वे आर्थिक और सामाजिक विषमता से देश को उबारने तथा सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक न्याय सुलभ करने के लिए संविधान में उपलब्ध प्रावधानों का सम्यक इस्तेमाल करते,जो नहीं हुआ.

आखिर क्यों नहीं आजाद भारत के शासक अच्छे लोग साबित हो सके,यह सवाल भी लोगों को परेशान कर सकता है.इसका जवाब यह है-‘चूंकि सारी दुनिया में ही आर्थिक और सामाजिक विषमता की उत्पत्ति शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक) के लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे से ही होती रही है और इसके खात्मे का उत्तम उपाय सिर्फ लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों-आर्थिक, राजनीतिक,शैक्षिक और धार्मिक- का वाजिब बंटवारा है, इसलिए आजाद भारत के शासक, जो हजारों साल के विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न वर्ग से रहे, समग्र –वर्ग की चेतना से दरिद्र होने के कारण इसके खात्मे की दिशा में आगे नहीं बढ़े. क्योंकि इसके लिए उन्हें विविधतामय भारत के विभिन्न सामाजिक समूहों के मध्य शक्ति के स्रोतों का वाजिब बंटवारा कराना पड़ता और ऐसा करने पर उनका वर्गीय-हित विघ्नित होता, अतः वे स्व-वर्णीय हित के हाथों विवश होकर डॉ.आंबेडकर की अतिमूल्यवान चेतावनी तथा संविधान की उद्देश्यिका की अनदेखी कर गए और विषमता के खात्मे तथा तीन न्याय सुलभ करने के लायक ठोस नीतियां बनाने की बजाय गरीबी हटाओ,लोकतंत्र बचाओ,राम मंदिर बनाओ,भ्रष्टाचार मिटाओ इत्यादि जैसे लोक लुभावन नारों के जरिये सत्ता अख्तियार करते रहे .

उधर बाबा साहेब की सतर्कतावाणी की अवहेलना के फलस्वरूप गणतंत्र के विस्फोटित होने का सामान धीरे-धीरे तैयार होता रहा.आज पौने दो सौ जिलों तक नक्सलवाद का विस्तार;सच्चर रिपोर्ट में उभरी मुस्लिम समुदाय की बदहाली; महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर हमारा बांग्लादेश,नेपाल और पाकिस्तान जैसे पिछड़े राष्ट्रों से पीछे रहना; तेज विकास के दौर में 84 करोड़ से अधिक लोगों का 20-25 रूपये रोजाना पर गुजर-बसर और कुछ नहीं, बारूद के वे ढेर हैं जिसे अगर सम्यक तरीके से निष्क्रिय नहीं किया गया तो निकट भविष्य में हमारे लोकतंत्र का विस्फोटित होना तय है. बहरहाल यहां लाख टके का सवाल पैदा होता है, जब संविधान के सदुपयोग के लिहाज से आजाद भारत के तमाम शासक अच्छे लोगों में उत्तीर्ण होने में विफल रहे तो वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी को किस श्रेणी में रखा जाय? क्योंकि वे संविधान और आंबेडकर-प्रेम के मामले में बहुत आगे निकल चुके हैं.

जहां तक संविधान के प्रति श्रद्धा का सवाल है, इस मामले में 26 नवम्बर, 2015 एक खास दिन बन चुका है है. उस दिन मोदी ने बाबा साहेब डॉ.भीमराव आंबेडकर की 125 वीं जयंती वर्ष को स्मरणीय बनाने के लिए 26 नवम्बर को ‘संविधान दिवस’ घोषित करने के बाद 27 नवम्बर को लोकसभा में राष्ट्र के समक्ष एक मार्मिक अपील करते हुए कहा था –‘26 नवम्बर इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है. इसे उजागर करने के पीछे 26 जनवरी को नीचा दिखाने का प्रयास नहीं है. 26 जनवरी की जो ताकत है, वह 26 नवम्बर में निहित है, यह उजागर करने की आवश्यकता है. भारत जैसा देश जो विविधताओं से भरा हुआ देश है, हम सबको बांधने की ताकत संविधान में है, हम सबको बढाने की ताकत संविधान में है और इसलिए समय की मांग है कि हम संविधान की सैंक्टिटी,संविधान की शक्ति और संविधान में निहित बातों से जन-जन को परिचित कराने का एक निरंतर प्रयास करें. हमें इस प्रक्रिया को एक पूरे रिलीजियस भाव से, एक पूरे समर्पित भाव से करना चाहिये. बाबा साहेब आंबेडकर की 125 वीं जयंती जब देश मना रहा है तो उसके कारण संसद के साथ जोड़कर इस कार्यक्रम(संविधान दिवस ) की रचना हुई. लेकिन भविष्य में इसको लोकसभा तक सीमित नहीं रखना है. इसको जन-सभा तक ले जाना है. इस पर व्यापक रूप से सेमिनार हो, डिबेट हो, कम्पटीशन हो, हर पीढ़ी के लोग संविधान के संबंध में सोचें, समझें और चर्चा करें. इस संबंध में एक निरंतर मंथन चलते रहना चाहिए और इसलिए एक छोटे से प्रयास का आरंभ हो रहा है.’

इतना ही नहीं उस अवसर पर संविधान निर्माण में डॉ.आंबेडकर की भूमिका की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्होंने यहां तक कह डाला था -‘ अगर बाबा साहब आंबेडकर ने इस आरक्षण की व्यवस्था को बल नहीं दिया होता, तो कोई बताये कि मेरे दलित, पीड़ित, शोषित समाज की हालत क्या होती? परमात्मा ने उसे वह सब दिया है, जो मुझे और आपको दिया है, लेकिन उसे अवसर नहीं मिला और उसके कारण उसकी दुर्दशा है. उन्हें अवसर देना हमारा दायित्व बनता है-‘ उनके उस भावुक आह्वान को देखते हुए ढेरों लोग उम्मीद कर रहे थे कि वे आने वाले दिनों में कुछ ऐसे ठोस विधाई एजेंडे पेश करेंगे जिससे संविधान के उद्देश्यिका की अबतक हुयी उपेक्षा की भरपाई होगी: समता तथा सामाजिक न्याय की डॉ.आंबेडकर की संकल्पना को आगे बढाने में मदद मिलेगी.

किन्तु जिस तरह सत्ता में आने के पहले प्रत्येक व्यक्ति के खाते में 15 लाख रूपये जमा कराने का उनका वादा जुमला साबित हुआ, उसी तरह उनका डॉ.आंबेडकर और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता दिखाना भी जुमला साबित हुआ.

उनके कार्यकाल में 1 प्रतिशत टॉप की आबादी जो दौलत सन 2000 में 37 प्रतिशत बढ़कर 2016 में 58.5 प्रतिशत तक पहुंची थी, वह सिर्फ एक साल , 2017 में 73 प्रतिशत पहुँच गयी. आज टॉप की 10 प्रतिशत आबादी का 90 प्रतिशत से ज्यादा धन-दौलत पर कब्ज़ा हो चुका है.जो सरकारी नौकरियां अरक्षित वर्गों , विशेषकर दलितों के बचे रहने का एकमात्र स्रोत थी, वह ख़त्म हो चुकी है, इसका खुलासा खुद मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी 5 अगत , 2018 को कर दिया. उन्होंने उस दिन कहा कि सरकारी नौकरिया ख़त्म हो चुकी हैं , इसलिए अब आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह गया है. जाहिर है मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों के कारण ही आरक्षण लगभग कागजों की शोभा बनकर रह गया है. मोदी ने न सिर्फ अल्पजन विशेषाधिकारयुक्त वर्ग के हित में रेलवे स्टेशनों, हॉस्पिटलों आदि को निजीक्षेत्र में देने में सर्वशक्ति लगाया है, बल्कि देश की पांच दर्जन टॉप की यूनिवर्सिटियों को स्वायत्तता प्रदान कर उन्हें निजी हाथों में देने का भी उपक्रम चलाया है. धर्म-सत्ता पर विशेशाधिकार युक्त वर्ग का पहले से शतप्रतिशत कब्ज़ा था ही, आज उनकी सवर्णपरस्त नीतियों के चलते इस वर्ग का अर्थ-सत्ता, राज सत्ता, ज्ञान-सत्ता पर भी 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो चुका.

ऐसे में अल्पजन सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के स्रोतों पर औसतन 90 प्रतिशत से ज्यादे कब्जे के फलस्वरूप संविधान की उद्देश्यिका में वर्णित तीन न्याय- सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक- पूरी तरह सपना बन चुका जो इस बात संकेतक है कि संविधान अपने मूल उद्देश्य में विफल हो चुका है. और आज की तारीख में इस विफलता में मोदी की भूमिका का आंकलन करते हुए यह खुली घोषणा की जा सकती है कि संविधान के उद्देश्यों को व्यर्थ करने वालों में प्रधानमंत्री मोदी ही टॉप पर रहेंगे.

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