अब इस नेता ने भी कहा, दिल्ली की कुर्सी पर दलित की बेटी बैठेगी

Omprakash Rajbhar
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर (फाइल फोटो)

लखनऊ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय सीट वाराणसी में मंगलवार को चुनाव प्रचार करने पहुंचे योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने बड़ा बयान दिया है. पिछड़े समाज के इस नेता ने कहा है कि इस बार दिल्ली की कुर्सी पर एक दलित की बेटी बैठेगी. हालांकि उन्होंने खुल कर किसी की नाम नहीं लिया लेकिन उनके इस बयान से समझा जा सकता है कि ओमप्रकाश राजभर का इशारा किस ओर है. उन्होंने यह बात समाचार चैनल ‘न्यूज 18’ से बातचीत के दौरान कही.

लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर भाजपा से नाराज सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने यह भी दावा किया कि यूपी से बीजेपी को महज 15 सीटें मिलेगी, जबकि सपा-बसपा गठबंधन को 55 से 60 सीटें हासिल होंगी. ओमप्रकाश राजभर ने जिस तरह ‘दलित की बेटी’ के दिल्ली की कुर्सी पर बैठने की बात कही है उससे साफ है कि उनका इशारा बसपा प्रमुख मायावती की तरफ है. इससे एक बात यह भी सामने आ रही है कि बहुजन समाज के तमाम अन्य नेता भी चाहते हैं कि मायावती देश की प्रधानमंत्री बनें.

भाजपा से नाराज राजभर ने कहा कि पूर्वांचल की कम से कम 30 सीटों पर हमारा साथ न मिलने से बीजेपी को प्रभाव पड़ेगा. उन्होंने दावा किया कि गोरखपुर, गाजीपुर और बलिया सीट बीजेपी हार रही है. 12 मई को वोटिंग के दिन मैं बहुत खुश था. चंदौली में मेरी सभा से बीजेपी को पसीना छूट गया. सपा-बसपा गठबंधन में जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि राजनीति में विकल्प हमेशा खुले रहते हैं.

खुद को जलाने के बाद गैंगरेप पीड़िता ने बताया दहलाने वाला सच

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सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

यूपी के हापुड़ में गैंगरेप की शिकार हुई महिला की खुदकुशी की कोशिश के बाद जो सच्चाई सामने आई है वह एक आम इंसान को परेशान करने वाली है. महिला ने जो सच्चाई बतायी है; वह दहलाने वाली और झकझोड़ने वाली है. आग की वजह से 75 से 80 फीसदी जल चुकी महिला ने जो कहा है उसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे. पीड़िता ने कहा, ‘मेरी इच्छा थी की मैं मर जाऊं. कोई भी इस दर्द से नहीं गुजरना चाहेगा. लेकिन गनीमत है अब लोग मेरा रेप नहीं करेंगे क्योंकि मैं पूरी तरह जल चुकी हूं.’

बाबूगढ़ थाने में दर्ज की गई एफआईआर के मुताबिक महिला की 10 साल पहले हापुड़ में शादी कराई गई. उस वक्त महिला की उम्र 14 वर्ष की थी. शादी के सालभर बाद यह रिश्ता टूट गया जिसके बाद महिला अपने पहले पति से हुए बच्चे के साथ अपने पिता के घर रहने आ गई.

कुछ महीने के बाद महिला के पिता और चाची ने उसे 10,000 रुपए में एक व्यक्ति को बेच दिया. जिस व्यक्ति ने महिला को खरीदा था उसके साथ साल 2011 में उसकी शादी हो गई.

महिला को दूसरे पति के साथ भी एक बच्चा हुआ. एफआईआर रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में महिला के साथ ज्यादती होनी शुरू हुई. महिला के मौजूदा पति ने एक व्यक्ति से 10% ब्याज पर कर्ज लिया था जिसे वह चुका नहीं पा रहा था. गरीबी का लाभ उठाते हुए कर्ज देने वाले व्यक्ति ने महिला के साथ कई बार रेप किया. उसने यह भी धमकी दी कि उसे गांव में बदनाम कर देगा. उस व्यक्ति के साथ महिला को तीसरा बच्चा हुआ.

महिला ने शिकायत में कहा है कि इस मामले के बारे में उसने अपने पति को कई बार बताया. पति ने उसे चुप रहने को कहा और दूसरे घरों में मजदूर के तौर पर काम करते रहने को कहा. 2016 में भी महिला के साथ शम्मु नाम के एक व्यक्ति ने फर्म में अकेला पाकर रेप किया. 2017 में महिला ने एफआईआर में कहा है कि उसके साथ 14 अलग-अलग लोगों ने रेप किया. इन 14 लोगों में गुड्डु, मधु, विपिन, गरुमीत, रम्मू, अनुज, गोपाल, डॉक्टर सुभाष, नगीनू, केदार और कुछ अन्य लोगों के नाम शामिल हैं.

महिला ने अपने साथ हुए रेप के बारे में एसएचओ से शिकायत की तो कोई कार्रवाई नहीं की गई. महिला ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन नबंर(1076) पर भी कॉल किया लेकिन उसे नहीं सुना गया.

महिला की मुलाकात एक भंडारे में एक व्यक्ति से हुई जिससे उसने अपने आपबीती सुनाई. वह महिला की मदद करने को तैयार हो गया. महिला और उसके दोस्त को आरोपियों ने जान से मारने की धमकी दी. महिला अपने दोस्त के साथ गांव छोड़कर जाने पर मजबूर हो गई. नवंबर 2018 में महिला उस व्यक्ति के साथ मुरादाबाद में रहने लगी. महिला को वहां भी आरोपियों से धमकी मिलती रही. महिला ने धमकियों से तंग आकर खुद को आग के हवाले कर लिया. महिला को पहले मुरादाबाद में भर्ती कराया गया, जहां हालत गंभीर होने के चलते उसे दिल्ली रेफर कर दिया गया.

इस मामले में पुलिस ने आईपीसी की धारा 366(अपहरण), 328, 376, 376डी और 506 के तहत 16 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है.

भारत में चार प्रकार के बौद्ध हैं

पहले, परम्परागत बौद्ध हैं जो अधिकतर लद्दाख, अरुणाचल, सिक्किम, असम, नागालैण्ड, पश्चिम बंगाल आदि प्रांतों में रहते हैं- चकमा, बरुआ, ताईआदि. ये वे बौद्ध हैं जो भारत के बुद्ध धम्म के विपत्तिकाल में स्वयं को बचा सके और बुद्ध धम्म की धरोहर को मुसीबतों में संरक्षित रख सके. इन बौद्धों के पास बुद्ध धम्म की बड़ी अनमोल धरोहरें संरक्षित हैं- गौरवशाली बौद्ध संस्कृति व दुर्लभ ग्रंथ. इनके पास भगवान बुद्ध के वास्तविक चीवर तक संरक्षित हैं, पूरे भी और टुकड़ों में भी, भगवान के द्वारा उपयोग मे ली गई वस्तुएं जैसे पात्र, आसन, नख आदि. अधिकतर पारम्परिक बौद्ध अनुसूचित जनजाति में हैं लेकिन आधुनिक शिक्षा की कमी के कारण जनजाति का लाभ नहीं ले पा रहे हैं . इनके रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, पूजा-संस्कार, आस्था-विश्वास सब के केन्द्र में भगवान बुद्ध और बुद्ध धम्म होता है. उनकी नैतिक कथाओं, कहानियों और कहावतों में भी सिर्फ बुद्ध होते हैं. उनके सपनों में भी बुद्ध और उनका धम्म होता है.यानीकि उनकी कल्पना और दैनिक जीवन का ताना बाना भी बुद्धमय होता है. इन बौद्धों की संख्या सिन्धी, सिक्ख, जैन, पारसी, ईसाइयों की तरह अल्पसंख्या में है लेकिन इन समुदायों का राजनैतिक महत्व भी नहीं के बराबर है क्योंकि इनमें राजनैतिक जागरूकता बहुत कम है.हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों में इनके मत निर्णायक होते हैं लेकिन इनको शासन व संसाधनों की मुख्यधारा से अलग थलग पटका गया है. यही नहीं इनके साथ तो भारतीयों जैसा व्यवहार ही नहीं किया जाता हैं .ये बहुत मेहनकश, भोले सरल स्वभाव के, ईमानदार व वफादार होते हैं.

दूसरे, वे बौद्ध हैं जो ओशो के अनुयायी या ओशो के विचारों को बहुत पसंद करते हैं. ये घोषित रूप में बौद्ध नहीं हैं लेकिन बौद्धिक स्तर पर तथागत बुद्ध के प्रति उनकी गहरी वैज्ञानिक श्रद्धा है. बुद्ध के प्रति गर्व की भावना है, बुद्ध की खोज विपस्सना ध्यान साधना को जीवन में उतारते है ,बुद्ध और बौद्ध धम्म को भारत का गौरव मानते हैं.

तीसरे, वे बौद्ध हैं जो विपस्सना आचार्य सत्यनारायण गोयनका जी द्वारा दुनिया भर में चलाए जा रहे विपस्सना ध्यान साधना शिविरों में गए हुए हैं. विपस्सना के निष्ठावान ये साधकगण भी घोषित रूप में बौद्ध नहीं हैं लेकिन भगवान बुद्ध के प्रति उनके मन में गहरी श्रद्धा है. सच यह है कि वे बुद्ध व उनके धम्म के परिपूर्ण व सच्चे बौद्ध हैं लेकिन दैनिक जीवन में वे सवर्ण-अवर्ण, हिन्दू मुस्लिम,सिख, ईसाई आदि सब लोग हैं. संसार में बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार कर फिर से बौद्ध शासन लाने में गोयनका जी का महान योगदान है. हालांकि गोयनका जी के देहांत के बाद घालमेल शुरू हो गई है.

चौथे प्रकार के बौद्ध हैं जो बोधिसत्व बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के बताए हुए मार्ग पर चलते हुए स्वयं को बौद्ध मानते हैं. उनमें से भी अधिकतर ने धार्मिक अंधविश्वासों व कर्मकांड को भी छोड़ दिया है. ये अनुसूचित जाति के हैं लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में हिन्दू हैं लेकिन अधिकतर निष्ठावान बौद्ध हैं. ये न हिनयान व महायान दोनों शाखाओं का सम्मान करते हैं लेकिन बाबासाहेब ने जो बुद्ध की शिक्षाओं का मानवतावदी व वैज्ञानिक पक्ष सामने लाए थे, उसको मानते है.ये नवयानी है.

इस प्रकार अघोषित रूप से भारत की एक बहुत बड़ी जनसंख्या बौद्ध है अथवा बुद्धानुयायी है.

चारों प्रकार के बौद्ध अनुयायियों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं.

परम्परागत बौद्ध भाषा, बोली,क्षेत्रीयता, रीति रिवाजों में बाकी बौद्धों से अलग हैं ,कौतुहल और अभी भी जिज्ञासा का विषय हैं. उनके साथ शेष बौद्धों की न घनिष्ठ मैत्री है और न सामाजिक धार्मिक सम्पर्क.

ओशो से प्रभावित बुद्ध अनुयायियों के लिए बुद्ध व धम्म एक दार्शनिक चर्चा का विषय भर है. संस्कारिक तल पर कई लोग रूढिवादी व अंधविश्वासी होते हैं. भारत की सामाजिक,साम्प्रदायिक, आर्थिक ,धार्मिक विषमताओं से उनका सरोकार न के बराबर है. बुद्ध प्रेमी-ओशो प्रेमी नामक एक समुदाय-सा है जिनके बीच उनकी गहरी मैत्री है. शेष बुद्धानुरागियों से उनकी मैत्री नहीं के बराबर है.इनमें भी कई देवी देवताओं की आराधना, नृत्य, मनोरंजन आदि के शामिल होने से ओशो ने बताई बुद्ध मूल धारा अब भोथरी हो गई है.

विपस्सना करने वाले ध्यानी बौद्धों के जीवन केन्द्र विपस्सना ज्यादा महत्वपूर्ण है.दस ,बीस दिवसीय,सतिपट्ठान आदि शिविर करने में ज्यादा लगन रहती है. विपस्सना के प्रति उनकी लगन कमाल की है. एक तरह से वे धम्म को व्यवहारिक तल पर जीने का पूरा प्रयास कर रहे हैं. . ये विपस्सी साधक स्वयं को बौद्ध तो घोषित नहीं करते लेकिन घोषित बौद्धों से अधिक निष्ठावान बौद्ध हैं. लेकिन सामाजिक सरोकारों से इनका भी कोई ज्यादा वास्ता नहीं है. खास बात यह भी है कि अधिकतर लोग शरीर व मन के सुख शांति के लिए बुद्ध की खोजी विपस्सना का ध्यान तो करते हैं लेकिन दैनिक जीवन में अपने अपने संप्रदाय धर्म के अंधविश्वासपूर्ण सारे कर्मकांडों ,पूजापाठ आदि में उलझे रहते है ध्यान के प्रति श्रद्धा है लेकिन बुद्ध के प्रति नहीं.घर में तो वही भेरोजी की ही पूजा करते है.

चौथे प्रकार के बौद्ध हैं जो बोधिसत्व बाबासाहेब के प्रभाव में स्वयं को बौद्ध मानते हैं. उनके लिए सामाजिक सुधार व वैज्ञानिक सोच प्राथमिक है, यह समुदाय 14 अक्टूबर 1956 के बाद अस्तित्व में आया है.भारत की सामाजिक राजनैतिक धार्मिक विसंगतियों के निराकरण के लिए यह नवयान सर्वाधिक उत्साही और सक्रिय है .भारत के बौद्धों की जनसंख्या में 13 % पारम्परिक बौद्ध हैं और शेष 87% में नवयानी बौद्ध हैं. भारत को बुद्धमय बनाने का सबसे प्रबल सपना इन्हीं नवयानियों का है. जाति विहीन समाज बनाना उनकी प्राथमिकता है. लेकिन इन नवयानियों में भी चार प्रकार के बौद्ध हैं:

1. पड़े हुए बौद्ध 2. खड़े हुए बौद्ध 3. बढ़े हुए बौद्ध 4. चढ़े हुए बौद्ध

पड़े हुए बौद्ध

पड़े हुए बौद्ध वे हैं जो किसी भी लिहाज से बौद्ध नहीं हैं. बस बाबा साहेब या बुद्ध जयंती के अवसर पर धुम धड़ाका ,समारोह में वेभाषण, ‘नमो बुद्धाय जय भीम’ का जयकारा लगाते हैं. साल के बाकी दिनों में वे उन्हीं संस्कारों में लिप्त रहते हैं जिन संस्कारों से बाबा साहेब ने मुक्त करने का आह्वान किया था.

खड़े हुए बौद्ध

खड़े हुए बौद्ध सबसे ज्यादा मुखर हैं. घर,चर्चा में या बंद पंडालों में हिन्दुत्व, ब्राह्मणवाद, मनुवाद, अंधविश्वास, पाखण्ड आदि की सुबह से शाम निन्दा करना, कर्मकांडों की सर्जरी करना, उपहास करना उनकी प्राथमिकता में है.बुद्ध धम्म के बारे में उनकी जानकारी व रूचि नहीं होती है. उनकी दिनचर्या, संस्कार, आचार में बुद्ध धम्म की छाया भी नहीं है. बस पानी पी पी कर दूसरी जाति,धर्म की आलोचना व स्वयं का महिमामंडन को ही वे अंबेडवाद व बुद्ध धम्म समझते हैं. उन्हें यह तो मालूम है कि मनुस्मृति या रामचरितमानस में कौनसी बातें निन्दनीय हैं लेकिन यह नहीं मालूम कि धम्मपद में कितने पद हैं या बुद्ध और उनका धम्म में क्या लिखा हुआ है. उन्हें विपस्सना या आरएसएस का एजेंडा तो दिखता है,त्रिपिटक की अट्ठकथाओं में भी ब्राह्मणवाद दिखता है, ध्यान,साधना आदि सब कुछ मनुवाद लगता है, उनका सारा सरोकार 22 प्रतिज्ञाओं से है,उनमें भी सिर्फ पहली तीन प्रतिज्ञाओं पर सारा जोर रहता है, शेष प्रतिज्ञाओं का वे स्वयं भी पालन नहीं करते हैं. उन्हें यह तो अच्छे से मालूम है कि गलत क्या है, लेकिन सही क्या इस बात की जानकारी लगभग नहीं ही है या है तो पालन नहीं करते.

ऐसा मुस्लिम ढूढ़ना मुश्किल है जिसे नमाज़ न आती हो, ऐसा सिक्ख ढूँढ़ना मुश्किल है जिसे गुरूग्रंथ साहेब के शबद न याद हों, ऐसा इसाई ढूंढ़ना लगभग नामुमकिन है जिसे बाइबिल के कुछ सानेट न याद हों, ऐसा हिन्दू तो ढूँढ़ना असम्भव है जिसे कोई आरती-चालीसा-स्तुति-भजन न आता हो लेकिन ऐसे कथित बौद्ध लाखों की संख्या में मिल जाएंगे जिन्हें त्रिशरण,पंचशील, बुद्ध वन्दना कुछ नहीं आता लेकिन मंचों पर दावे से अपने को बौद्ध कहते हैं. इन खड़े हुए बौद्धों की सोच क्रान्तिकारी है, तार्किक है. ये ही बौद्ध बाबासाहेब और भगवान बुद्ध की जयंती मनाने के प्रति सर्वाधिक सक्रिय हैं.

बढ़े हुए बौद्ध

बढ़े हुए बौद्ध वे हैं जो निन्दा,आलोचना,सर्जरी ,विवाद से थोड़ा आगे बढ़ कर सच्चे अर्थों में धम्म का व्यवहारिक रूप से पालन कर रहे हैं. उन्हें त्रिशरण,पंचशील,बुद्ध त्रिरत्न वन्दना सुत्तपाठ आता है. जन्मदिन, विवाह, गृहप्रवेश इत्यादि अवसरों पर पूज्य भन्ते या बोधाचार्यों से संस्कार सम्पन्न कराते हैं. पुराने संस्कारों को छोड़ कर उन्होंने बौद्ध संस्कारों को जीवन में आत्मसात करना शुरू कर दिया है. वे सच्चे अर्थों में बुद्धमय भारत बनाने की दिशा में अग्रसर हैं. यह सही है कि सिर्फ निन्दा-आलोचना करते रहने भर से बुद्धमय भारत नहीं बनेगा. सकारात्मक विकल्प पर व्यावहारिक काम करने से भारत बुद्धमय होगा. नवयानी बौद्धों में यह बढ़े हुए बौद्ध ही उम्मीद की मशाल हैं.

चढ़े हुए बौद्ध

चढ़े हुए बौद्ध, इन्हें धम्म के वास्तविक नायक कहिये, जो धम्म के मूल तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं. ध्यान,साधना,विपस्सना करते हैं, बुद्ध वचनों को मूल रूप में अध्ययन करते हैं, त्रिपिटक में धम्म खंगालते हैं, शून्यागारों में ध्यान करते हैं. उपोसथ धारण करते हैं. धम्म के आध्यात्मिक पक्ष को सर्वोपरि प्राथमिकता देते हैं और सामाजिक सरोकारों में भी सकारात्मक व रचनात्मक योगदान देते हैं. उन्हें धम्म का मर्मज्ञ कहा जा सकता है. सातवीं संगीति भारत में आयोजित करना इन बौद्धों का सपना और महत्वाकांक्षा है. वे इसके लिए प्रयासरत भी हैं. दान भी करते हैं और धम्म का प्रचार भी करते हैं.शेष बौद्धों के मन में यह बात अभी कल्पना में भी नहीं है. भारत को सच्चे अर्थों में बुद्धमय यही बौद्ध बनाएंगे, चढ़े हुए बौद्ध.

बुद्ध के अनुयायियों के ये चार समूह अलग अलग नहीं हैं बल्कि उद्देश्य के लिहाज से चारों एक ही हैं. पड़ा हुआ बौद्ध ही एक दिन खड़ा हुआ बौद्ध बनता है. खड़ा हुआ बौद्ध ही कभी बढ़ा हुआ बौद्ध बनता है और यह बढ़ा हुआ बौद्ध ही एक दिन चढ़ा हुआ बौद्ध बनता है. यह भी सम्भव है कि अभी कोई पड़ा बौद्ध और खड़ा बौद्ध के बीच के दौर से गुजर रहा हो. यह परस्पर निरंतर विकास की प्रक्रिया है. यह विकास स्वयं के प्रयास से भी होता है तथा प्रशिक्षण से भी होता है. जबरन कुछ नहीं होता. स्वैच्छिक विकास बहुत क्रांतिकारी परिणाम देता है.

जो खड़े हुए हैं उन्हें पड़े हुए लोगों पर कटाक्ष नहीं करना है बल्कि याद यह रखना है कि कभी वे स्वयं भी वहीं थे. बढ़े हुए लोगों को खड़े हुए लोगों को बढ़ने के लिए प्रेरित करना है क्योंकि वे धम्म की ओर बढना चाहते है. चढ़े हुए बौद्धों को शेष तीन के प्रति भी मैत्री भाव से बर्ताव करना है. बढ़े और चढ़े हुए बौद्धों की संख्या जैसे-जैसे बढ़ती जाएगी, भारत बुद्धमय होता जाएगा.

भारत तीव्र गति से बुद्धमय होगा लोगों में तर्क विवेक और वैज्ञानिक चेतना निरंतर बढ रही हैं.अब भारत के सभी प्रगतिशील,वैज्ञानिक सोच व मानवतावदी लोगों मैत्री व आपसी समझ बढ़ती जाएगी. क्योंकि बुद्ध वचन हैं कि मैत्री ही सम्पूर्ण धम्म है. …. भवतु सब्ब मंगल…..

लेखक- डॉ. एम.एल. परिहार Read it also-आप लोग बहक गए, इसलिए कमजोर पड़ा आंदोलन : मायावती

अलवर गैंगरेप मुद्दे पर भिड़ें मोदी और मायावती

सांकेतिक चित्र
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नई दिल्ली। अलवर में पति के सामने महिला से गैंगरेप की शर्मनाक वारदात का मुद्दा देश भर में छाया हुआ है. इस पूरे घटनाक्रम में जिस तरह महिला को चोट पहुंचाई गई और इस घटना को लेकर राजस्थान पुलिस का रवैया जिस तरह असंवेदनशील रहा उससे दलित समाज और न्याय पसंद लोगों में काफी गुस्सा है. तो दूसरी ओर इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बसपा प्रमुख मायावती आपस में भिड़ गए हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दलित युवती के साथ हुई इस घटना का जिक्र करते हुए बीएसपी सुप्रीमो मायावती को राजस्थान की कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस लेने की चुनौती दे डाली। 12 मई को उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक चुनावी रैली के दौरान पीएम मोदी ने मायावती पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘एक दलित की बेटी के साथ राजस्थान के अलवर में गैंगरेप हुआ लेकिन उनपर राजनीति करने वाली बहनजी चुप हैं. अगर वास्तव में देश की बेटियों के प्रति आप ईमानदार हैं तो आज ही तत्काल प्रभाव से राजस्थान में कांग्रेस सरकार से अपना समर्थन वापस लीजिए.’

पीएम मोदी के इस बयान से भड़की बहनजी ने मोदी को करारा जवाब दिया है. समर्थन वापस लेने वाले बयान को बसपा प्रमुख ने घृणित कांड की आड़ में घृणित राजनीतिक करने का आरोप लगाया है. मायावती ने कहा कि “बीएसपी राजस्थान में उचित और सख्त कार्रवाई न होने पर राजनीतिक फैसला जरूर लेगी साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के ऊना और रोहित वेमुला जैसे कांड के बाद भी अपने पद से इस्तीफा क्यों नहीं देते हैं.?”

 बता दें कि राजस्थान के अलवर में दलित महिला के साथ गैंगरेप की घटना सामने आई है, जिसकी चर्चा पूरे देश में है. मायावती खुद इस केस में राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार पर देरी से कार्रवाई करने का आरोप लगा चुकी हैं.

मायावती का मोदी पर जोरदार वार, राजनीतिक फायदे के लिए पत्नी को छोड़ा

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है. मायावती ने कहा कि भाजपा की महिला नेता उनके पतियों के पीएम मोदी से करीबी से घबराती हैं. उनका कहना है कि उन महिलाओं को डर है कि कहीं पीएम मोदी उन्हें भी अपनी पत्नी की तरह अपने पतियों से अलग ना करवा दें.

न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक मायावती ने कहा, ‘मुझे तो यह भी मालूम चला है कि भाजपा में खासकर विवाहित महिलाएं अपने आदमियों को श्री मोदी के नजदीक जाते देखकर, यह सोच कर भी काफी ज्यादा घबराती रहती हैं कि कहीं ये मोदी अपनी औरत की तरह हमें भी अपने पति से अलग ना करवा दे.’ दरअसल अलवर गैंगरेप मामले में मोदी द्वारा मायावती पर की गई टिप्पणी को लेकर बहनजी पीएम मोदी पर भड़की हुई हैं. उन्होंने कहा, ‘नरेंद्र मोदी ने अलवर गैंगरेप मामले पर चुप्पी साधी हुई थी. वह इस मुद्दे पर गंदी राजनीतिक करने की कोशिश कर रहे हैं. यह बेहद शर्मनाक है. वह कैसे किसी की बहन और पत्नियों की इज्जत कर सकते हैं, जब राजनीतिक फायदे के लिए उन्होंने अपने पत्नी को ही छोड़ दिया.’

कमल हासन ने गोडसे को कहा पहला हिन्दू अतिवादी, भाजपा भड़की

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kamal hassanतामिलनाडु। लोकसभा चुनाव 2019 के आखिरी चरण के चुनाव के लिए सारी पार्टियां जोर लगा रही हैं. आखिरी चरण के लिए बची 59 सीटों पर तमाम दल अपने प्रत्याशी को जीत दिलाने के लिए कमर कसे हुए हैं. इस बीच फिल्म अभिनेता से नेता बने कमल हासन ने हिन्दू आतंकवाद को लेकर बड़ा बयान दिया है. कमल हासन ने तमिलनाडु में चुनावी प्रचार के दौरान कहा कि भारत का पहला अतिवादी हिन्दू ही था. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत का पहला अतिवादी हिन्दू था, जिसका नाम है नाथूराम गोडसे. बता दें कि नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी थी. तमिलनाडु के अरावाकुरुची विधानसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार के दौरान कमल हासन ने कहा कि ‘मैं यह इसलिए नहीं बोल रहा हूं क्योंकि यहां काफी मुस्लिम हैं. मैं यहां महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने कह रहा हूं. स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी हिन्दू है और उसका नाम है नाथूराम गोडसे.’ बता दें कि कमल हासन ने राजनीति में कदम रखा है और उन्होंने पिछले साल ही मक्कल निधि मैय्यम पार्टी की स्थापना की थी.

साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद बनाम सामाजिक न्याय और कन्हैया

दलित आंदोलन (फाइल फोटो)

कन्हैया की संभावनाओं को लेकर बहस तेज है. नामचीन हस्तियों ने बेगूसराय में कन्हैया के पक्ष में चुनाव प्रचार किया. चुनाव बाद भी बहस जारी है. अब अपूर्वानंद जैसे बड़े नाम खुलकर इनके पक्ष में मुहिम चला रहे हैं. वहीं, कुछ लोग कन्हैया को शक की नजर से देखते हैं. यह शक क्यों? राजनीति में युवा नेतृत्व को आगे आना ही चाहिए. फिर साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद के विरोध में झंडा बुलंद करने वाला एक तबका कन्हैया का विरोध क्यों कर रहा है? वह भी तब जब कन्हैया देश स्तर पर राजनीतिक दिशा दशा में बड़े बदलाव की तरफ उम्मीद जगाता है. यह सही है कि कन्हैया मीडिया चैनलों और सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी के साम्प्रदायिक मंसूबों को बहुत मजबूती से चुनौती देते हैं.

 कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास साम्प्रदायिक मुद्दों पर बेहतरीन रहा है. इससे असहमत नहीं हुआ जा सकता है. पर सवाल उठता है कि क्या इस सिर्फ तर्क से कन्हैया का समर्थन किया जाना चाहिए? इस पर आगे कुछ कहा जाए, उससे पहले कुछ अपना अनुभव और उनके एक हालिया फेसबुक पोस्ट पर चर्चा करना चाहता हूं. मेरे कुछ अनुभव रहे हैं जिससे लगता है कि कन्हैया के भीतर का सच आने में समय नहीं लगेगा. साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद के साथ साथ एक और पहलू है जिस पर नरेंद्र मोदी की सरकार ने खुलकर हमला किया है. वह है सामाजिक न्याय और आरक्षण की पूरी अवधारणा. इन दोनों ही मसलों पर कन्हैया की पार्टी सीपीआई में गजब का दोहरापन है. सीपीआई में करीब डेढ़ दशक सक्रिय रहने के दौरान दर्जनों ऐसे नेताओं से सामना हुआ है जो जाति के सवाल पर भले सार्वजानिक रूप से अपने को वर्णविहीन समाज के सबसे बड़े समर्थक के तौर पर पेश करते रहे हों, लेकिन निजी व्यवहार में वो बहुत बड़े जातिवादी रहे हैं. वो सामाजिक न्याय, आरक्षण, दलित उत्पीड़न, यूनिवर्सिटी में पिछड़े-दलितों की भागीदारी बढ़ाने जैसे सवालों पर बहुत ही चालाकी से किनारा कर लेते रहे हैं. सामाजिक न्याय को बहुत ही आसानी से परिवारवाद की राजनीति बोलकर ख़ारिज कर देते हैं.

 चाहे दिल्ली का अजय भवन हो या पटना का जनशक्ति भवन, दोनों जगहों पर एक खास समाज से आने वाले नेता ही क्रांति कर सकते हैं यह समझ बहुत साफ साफ है. “जर जमीन बंट कर रहेगा अपन अपन छोड़ कर” पता नहीं यह कहावत किसने और कैसे गढ़ा होगा, लेकिन यह सच के काफी करीब है. सीपीआई में ज्यादातर पिछड़े और दलित नेताओं को नेतृत्व क्षमता होने के बावजूद हाशिये पर रखा गया या उनको पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया.

 अब बात फायरब्रांड और वामपंथ के नए दुलारे कन्हैया के फेसबुक पोस्ट की. इन्होंने अपने फेसबुक वॉल पर रोशन सुचान नाम के किसी व्यक्ति का पोस्ट डाला है. जिसमें वो बहुत खुलकर नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने और उसके बिहार की राजनीति में फायदे गिना रहे हैं. जाहिर है कन्हैया सुचान जी की राय से सहमत होते होंगे, तभी तो उन्होंने इसे अपने पोस्ट पर डाला है. ऐसे में यह मानना कतई अनुचित नहीं होगा कि ये पोस्ट कन्हैया की सहमति से ही लिखा गया होगा, ताकि आप अपने को दूसरे के माध्यम से एंडोर्स किया जा सके. पोस्ट के लेखक की दिली इच्छा है कि तेजस्वी जेल जाएं और कन्हैया विपक्ष के सर्वमान्य नेता हो जाएं. इसके लिए अगर बीजेपी की सरकार भी आ जाए तो कोई दिक्कत नहीं है. इसका मतलब जो लोग यह समझते थे कि ये अपने भाषणों में नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते हैं और साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद पर बहुत खुलकर अपनी बात रखते हैं. ये सब छलावा था. दरअसल, ये बहुत सोच समझकर साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद के सवाल को उठाते हैं ताकि सामाजिक न्याय के मुद्दों को काउंटर किया जा सके. बीजेपी का कमंडल से मंडल को कुंद करने का पुराना इतिहास रहा है.

 फेसबुक पोस्ट में एक नए राजनीतिक समीकरण (मुस्लिम-भूमिहार-दलित) का सुझाव पेश किया जा रहा हैं. इस परिकल्पना में अति पिछड़ा और पिछड़ा कहीं नहीं है. पिछले 5 साल में नरेंद्र मोदी सरकार के फैसलों का सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी का हुआ है तो वो दलितों के साथ साथ पिछड़े समाज का हुआ है. हर रैली में अपने को पिछड़ा-अति पिछड़ा बताने वाले नरेंद्र मोदी सामाजिक न्याय के मुद्दों को लगातार सांप्रदायिक राष्ट्रवाद से काउंटर कर रहे हैं. दरअसल, कन्हैया अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए सामाजिक न्याय और आरक्षण के मुद्दों पर सबसे मुखर और उभरते नेता तेजस्वी को जेल भेजने की मंशा रखने वाले पोस्ट को साझा करने से नहीं चुकते हैं. जाहिर है उद्देश्य बहुत साफ है. कन्हैया सांप्रदायिक शक्तियों से लड़ने के नाम पर दरअसल सामाजिक न्याय की धारा को कुंद करना चाहते हैं. इसी महीन बारीकी को समझना पड़ेगा.

  • लेखक राहुल कुमार पत्रकारिता से जुड़े हैं।

बिहार की जनता के नाम तेजस्वी यादव का इमोशनल खत

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लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर आज यानि रविवार को देश के 7 राज्यों की 59 सीटों पर मतदान हो रहा है. बिहार में 8 सीटों के लिए मतदान होना है. इस मौके पर आरजेडी नेता और राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव  ने बिहारवासियों के नाम एक पत्र लिखा है. इस पत्र में तेजस्वी ने अपने पिता के साथ हुए अन्याय का जिक्र किया है तो वहीं पिता की गैरमौजूदगी के बावजूद समर्थन देने के लिए बिहार की जनता का धन्यवाद किया है. तेजस्वी यादव ने इस पत्र को फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा किया है. आप खुद पढ़िए तेजस्वी यादव का खत-

मेरे प्रिय बिहारवासियों,

आज जब देश में छठे चरण का चुनाव हो रहा है। मैं हर एक बिहारवासी को दिल से धन्यवाद करना चाहता हूँ। यह पहला चुनाव है जब मेरे पिता को साज़िशन चुनाव प्रचार से दूर किया गया है। साम्प्रदायिक ताकतों से उनकी लड़ाई अभी भी जारी है … हाँ वो शारीरिक रूप से साथ नहीं इसलिए दिल थोड़ा सा भारी है लेकिन वैचारिक रूप से हर कण-हर क्षण वो हम सबों के संग है।

मैं आपका धन्यवाद इसलिए भी करना चाहता हूँ कि आपने इस चुनाव में मेरी हिम्मत, हौसले और जुनून को बनाए रखा है ठीक वैसे ही जैसे मेरे पिता के लिए करते हैं। आपकी पहनाई एक-एक माला, आपकी ओजस्वी आवाज में लगा एक-एक नारा, अन्याय के अन्धेरे को जड़ से मिटाने का… लालटेन जलाने का आपका प्रण… मुझपर ऋण है।

एक नया बिहार बनाने में आपने जो बढ़-चढ़ कर मेरा साथ दिया है उससे मुझे भी शक्ति मिली है कि अपनी हर एक सांस को बिहार की सेवा के लिए समर्पित करूं। हर उस इंसान के दुख दर्द को दूर करूं जो नीतीश-मोदी राज के नकारेपन का शिकार हुआ है।

वो नियोजित शिक्षक जिनकी परवाह नीतीश चाचा को नहीं है। वो पीड़ित बच्चियां जिनके साथ घिनौने जुर्म और ज्यादतियों का अन्तहीन सिलसिला रहा। वो व्यापारी जो आए दिन रंगदारी, लूट डकैती से परेशान हैं, जी.एस.टी. नोटबन्दी की मार से बेहाल है। वो दलित, पिछड़े और वंचित लोग जिनके आरक्षण को खत्म करने की साजिशें की जा रहीं है। वो हाशिए पर डाल दिए गए इंसान जो लगभग 14 साल के नीतीश चाचा के शासन के बाद भी ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ का नारा लगाने को मजबूर है। वो घर चलाने वाली हमारी माताएं बहनें जिन्हें रसोई गैस और राशन मंहगा होने से घर चलाने में दिक्कत आ रही है।

वो छात्र, शिक्षा व्यवस्था में फैला भ्रष्टाचार जिनकी योग्यता का मखौल उड़ा रहा है। वो बहन, बेटियां जिन पर घर में घुसकर एसिड अटैक हो रहा है। वो अल्पसंख्यक भाई जिनके खिलाफ नीतीश मोदी सरकार के मंत्री खुलेआम नफरत फैलाने वाले भाषण दे रहें है। वो प्रशासन के ईमानदार अधिकारी जिन्हें अपना फर्ज निभाने पर मोदी-नीतीश के मंत्रियों द्वारा गाली मिल रहीं है। वो मतदाता जिसका वोट पहले धोखे से छीना गया और अब चुनावों में धोखे से भाजपा और जदयू के पक्ष में डलवाने की असफल कोशिश हो रही है।

वो किसान जो सुसाईड नोट में ‘मोदी को वोट मत देना’ लिखकर मरने को मजबूर है। वो मजदूर जो 14 साल के नीतीश चाचा के राज के बाद भी घर छोड़ने को मजबूर है वो रिक्शेवाला जो 14 साल के नाकाम राज के बोझ को अभी तक भी खींचे जा रहा है। वो बेरोजगार जिसे दो करोड़ नौकरियों का झांसा देकर उसे पकौड़े बेचने का ज्ञान दे दिया गया। वो गरीब जिसके खाते में 15 लाख तो क्या 15 रूपये भी नहीं आए और बिहार का वो एक-एक नागरिक जो अभी भी बिहार के स्पेशल पैकेज और विशेष राज्य के दर्जे के वादे के पूरा होने का इन्तजार कर रहा है।

हम सब साथ मिलकर इस अन्यायी सत्ता को जड़ से उखाड़ेंगे, अत्याचारी अन्धेरों को घर में घुसकर हटाएँगे पर हिंसा से ‘तीर’ चलाकर नहीं, प्यार से ‘लालटेन’ जलाकर। याद रखिएगा हमारा एक वोट बिहार के एक-एक नागरिक को इंसाफ देगा… बिहार को एक नई प्रभात देगा।

अंधेरों को हराते हैं, चलो लालटेन जलाते हैं

लालटेन का बटन दबाएं… राष्ट्रीय जनता दल को जिताएं… तानाशाही हटाएं… अपनी सरकार बनाएं

आपका,

तेजस्वी यादव

6वें चरण में 59.70 फीसदी मतदान, बंगाल में वोटिंग 80 फीसदी पार

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वोट डाल कर बाहर आने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

नई दिल्ली। छठे चरण में 7 राज्यों की 59 लोकसभा सीटों पर मतदान संपन्‍न हो गया है. वोटिंग प्रतिशत की बात है तो देशभर में 59.70 फीसदी मतदान हुई. पश्चिम बंगाल में एक बार फिर बंपर वोटिंग हुई. बंगाल में इस चरण में लगभग 80.13 फीसद मतदान हुआ. इसके अलावा दिल्ली में 55.44 फीसदी, हरियाणा में 62.14 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 50.82 फीसदी, बिहार में 55.04 फीसदी, झारखंड में 64.46 फीसदी और मध्य प्रदेश में 60.12 फीसदी मतदान हुआ.

इस चरण में तमाम दिग्गज मैदान में हैं. इसमें केन्द्रीय मंत्री राधामोहन सिंह, हर्षवर्धन और मेनका गांधी के अलावा समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया शामिल हैं. लोकसभा चुनाव के इस चरण को भाजपा के लिये कड़ी परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है क्योंकि 2014 के चुनाव में भाजपा ने इनमें से 45 सीटें जीतीं थीं जबकि तृणमूल कांग्रेस को आठ, कांग्रेस को दो और समाजवादी पार्टी और लोक जनशक्ति पार्टी को एक-एक सीट पर जीत मिली थी. भाजपा ने 2014 के चुनाव में इस चरण में उत्तर प्रदेश की 14 में से 13 सीटों पर जीत हासिल की थी. सिर्फ यूपी के आजमगढ़ में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव को जीत मिली थी.

दिल्ली की सभी 7 सीटों के लिए भी आज ही मतदान हो रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, शीला दीक्षित, भाजपा प्रत्याशी गौतम गंभीर आदि ने इस दौरान दिल्ली में अपने-अपने बूथ पर वोट डाला.

IPL: फाइनल में पहुंचे चेन्नई किंग्स, बताया इनकी वजह से मिली जीत

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चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने दिल्ली कैपिटल्स के खिलाफ दूसरे क्वालिफायर में 6 विकेट से जीत का श्रेय गेंदबाजों को दिया. उन्होंने कहा कि गेंदबाजी विभाग के लगातार अच्छे प्रदर्शन के दम पर ही उनकी टीम 8वीं बार आईपीएल फाइनल में पहुंचने में सफल रही. चेन्नई के गेंदबाजों ने दिल्ली को 9 विकेट पर 147 रनों पर रोक दिया था. चेन्नई ने 19 ओवरों में 4 विकेट पर 151 रन बनाकर जीत दर्ज की.

धोनी ने मैच के बाद कहा, ‘खिलाड़ियों ने जिस तरह का खेल दिखाया वह बेहतरीन था. स्पिनरों को कुछ टर्न मिल रहा था और हमने सही समय पर विकेट निकाले. उनके पास बाएं हाथ के बल्लेबाज थे और हमारे बाएं हाथ के स्पिनरों ने उनके सामने अच्छा प्रदर्शन किया.’ उन्होंने कहा, ‘अहम चीज लगातार विकेट हासिल करना रही. इसका श्रेय गेंदबाजों को दिए जाने की जरूरत है. कप्तान सिर्फ यही कहता है कि मुझे इसकी जरूरत है. इसके बाद ये उनका काम होता है कि वे कैसे गेंदबाजी करें. हम इस सत्र में अभी जहां पर हैं, उसके लिए गेंदबाजी विभाग को शुक्रिया. ’

दिल्ली के कप्तान श्रेयस अय्यर ने हार के लिए बल्लेबाजों को दोषी ठहराया, लेकिन साथ ही कहा कि उनके लिए यह सत्र शानदार रहा. अय्यर ने कहा, ‘हमारी शुरुआत निराशाजनक रही. हमने पावरप्ले में ही दो विकेट गंवा दिए, जिससे उबरना मुश्किल था. उनके पास शानदार स्पिनर हैं. कोई भी बल्लेबाज पारी को संवार नहीं पाया और अच्छी साझेदारियां नहीं निभाई गई.’

अय्यर ने कहा, ‘हमारे लिए परिणाम निराशाजनक है, लेकिन यह हमारे लिए अच्छी सीख है. हमारे लिए यह सत्र अच्छा रहा है.’ मुकाबले में फाफ डु प्लेसिस को ‘मैन ऑफ द मैच’ चुना गया.

आतिशी के खिलाफ आपत्तिजनक पर्चे बांटने के लिए अखबार बेचने वाले को मिले थे पैसे: रिपोर्ट

पूर्वी दिल्ली में दो दिन पहले आम आदमी की प्रत्याशी आतिशी के खिलाफ आपत्तिजनक पर्चा बंटने को लेकर हंगामा खड़ा हो गया था. अब इस मामले में नया खुलासा हुआ है. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक एक न्यूज़पेपर वेंडर को 300 पर्चे बंटाने के लिए पैसे दिए गए थे.

रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी दिल्ली के योजना विहार इलाके के इस वेंडर ने कहा कि गुरुवार की सुबह उन्हें अखबार के साथ 300 पर्चे बांटने के लिए पैसे मिले थे, जिसे ‘ए’ और ‘सी’ ब्लॉक में बांटे गए. हर 100 पर्चे बांटने के लिए 15 रुपये दिए जाते हैं. हालांकि न्यूज़पेपर वेंडर एसोसिएशन के सचिव रामांकत ने कहा कि उनके वेंडर ने ये पर्चे नहीं बांटे थे. उन्होंने कहा कि पिछले 8 दिनों से वो लगातार आम आदमा पार्टी का पर्चा अखबार के साथ बांट रहे थे.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पूर्वी दिल्ली के रिटर्निंग ऑफिसर ने इस मामले में FIR दर्ज करने को कहा है. लोकसभा चुनाव 2019 के छठे चरण के तहत दिल्ली में 12 मई को वोटिंग है. मतदान से पहले राजनीतिक दलों के बीच घमासान मचा हुआ है. गुरुवार को पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी आतिशी ने गौतम गंभीर पर आपत्तिजनक पर्चा बंटवाने का आरोप लगाया था. इसके बाद से दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी है.

गंभीर ने कहा था कि अगर ये आरोप सही साबित हो गया, तो वो तुरंत अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेंगे. साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि अगर आरोप साबित हुए फिर वो सबके सामने फांसी लगा लेंगे. इस बीच गंभीर ने सीएम अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और आतिशी मारलेना पर मानहानि का नोटिस भेजा है. जवाब में आम आदमी पार्टी ने भी गंभीर के खिलाफ नोटिस भेजा है.

इस बीच आम आदमी पार्टी की आतिशी के गंभीर आरोपो पर उन्हें कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित का साथ मिला है. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित ने कहा है कि मैं गौतम गंभीर को जानता हूं, मुझे नहीं लगता है कि वह इस तरह की गिरी हुई हरकत करेंगे. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि आतिशी के खिलाफ जो पर्चा निकला है वह बहुत भद्दा है, उसकी निंदा होनी चाहिए.

साभार NEWS18

Fani Cyclone: तकनीक का इस्तेमाल कर बचाई गई हजारों की जान

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वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआईआर) की दो प्रयोगशालाओं की तकनीकों से ओडिशा तथा आंध्र प्रदेश में गत दिनों आए ‘फेनी’ तूफान से कई लोगों की जान बचाई गई. इस तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ओडिशा के तटीय इलाके में बड़े पिरामिड ढांचे की छत वाले भवनों का निर्माण किया जा चुका है जिससे वहां काफी कम नुकसान होता है. इसी का नतीजा है कि पिछले 10 साल में आए कई चक्रवाती तूफानों में हजारों लोगों की जान अब तक बचाई जा सकी है.

सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं का काफी योगदान सीएसआईआर के महानिदेशक शेखर सी. मांडे ने बताया कि सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं की भवन निर्माण तकनीकों का काफी योगदान रहा है. उन्होंने बताया कि स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग रिसर्च सेंटर, चेन्नई और सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, रुड़की ने भवन निर्माण की जो तकनीकें विकसित की हैं उनके आधार पर करीब 10 साल पहले भुवनेश्वर में मॉडल बिल्डिंग बनाए गए थे. ओडिशा में सीएसआईआर ने उस समय 75 ऐसे भवन बनाए थे जो तूफान से पूरी तरह सुरक्षित हैं.

तटीय इलाकों में पिरामिड ढांचे की छत वाले भवन मांडे ने बताया कि इस तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ओडिशा के तटीय इलाकों में बड़े पैमाने पर पिरामिड ढांचे की छत वाले भवनों का निर्माण किया गया है जिससे अब वहां चक्रवाती तूफानों में घरों और लोगों की जान का नुकसान बेहद कम होता है. आंध्र प्रदेश में भी इस तरह के मॉडल भवन बनाए गए हैं. सीएसआईआर के महानिदेशक ने बताया कि वर्ष 1977 और 1999 में ओडिशा में आए चक्रवाती तूफानों में तकरीबन दस-दस हजार लोग अकाल काल के शिकार हो गए थे. लेकिन, पिछले कुछ समय में आए तूफानों में यह संख्या 20-30 या कभी-कभी इससे भी कम रहती है.

ओडिशा के सभी शिविरों में सीएसआईआर की डिजाइन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन काम करने वाले सीएसआईआर के महानिदेशक ने बताया कि ओडिशा में इस समय तूफान से सुरक्षित जितने शिविर बनाए गए हैं उनमें अधिकतर की डिजाइन परिषद की प्रयोगशालाओं द्वारा विकसित तकनीकों पर आधारित है. इस प्रकार परिषद ने हजारों की संख्या में लोगों की जान बचाने में मदद की है. उन्होंने बताया कि स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग रिसर्च सेंटर, चेन्नई में एक विंड टनल स्थापित किया गया है जिसमें तूफान जैसी स्थिति पैदा कर किसी ढांचे की मजबूती परखी जाती है. यह देश में इमारतों के ढांचों की मजबूती की जांच करने वाला सबसे अच्छा विंड टनल है.

अन्य तकनीकें भी मददगार सीएसआईआर की अन्य तकनीकें भी आपदा प्रभावित इलाकों में लोगों के राहत एवं पुनर्वास में मददगार हो रही है. ओडिशा में पिछले दिनों आए ‘फेनी’ तूफान से प्रभावित इलाकों में सीएसआईआर ने पानी को साफ करने वाला एक विशेष वाहन भेजा है जो किसी भी प्रकार के पानी को पानी को पीने लायक बनाता है. यह वाहन परिषद् की सेंट्रल सॉल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएसएमसीआरआई) द्वारा विकसित पानी साफ करने की प्रौद्योगिकी पर तैयार किया गया है.

आप लोग बहक गए, इसलिए कमजोर पड़ा आंदोलन : मायावती

नई दिल्ली। करीब 12 बजे से जीटीबी एनक्लेव का रामलीला मैदान बीएसपी के झंडों से पटने लगा था. समाजवादी पार्टी के झंडे भी लहरा रहे थे. भाषण दिए जाते रहे… बीच-बीच में ‘जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है’ और ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, बटन दबेगा हाथी पर’ के नारे भी लगते रहे. माहौल में जोश भरने के लिए ‘बहन मायावती को पीएम बनावांगे, बाबा साहब के सपनो का देश बनावांगे’ का गाना बजाया जा रहा था. महिलाएं और युवक डांस भी कर रहे थे. ढाई घंटे के इंतजार के बाद मायावती का आगमन हुआ. वह कांग्रेस और बीजेपी पर जमकर बरसीं.

बीएसपी सुप्रीमो ने कहा कि कांग्रेस के 90 साल के शासन में अति गरीब, किसान और अल्पसंख्यकों को उनके अधिकार से वंचित रखा गया. यही काम बीजेपी ने भी किया. गरीबों, दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों का विकास नहीं किया. इन दोनों पार्टियों के राज में आरक्षण का पूरा फायदा नहीं मिल सका है. प्राइवेट सेक्टर में भी आज आरक्षण लागू नहीं कर सके हैं. मायावती ने ऐलान किया है कि केंद्र में उनकी सरकार बनती है तो वो अति गरीबों को स्थाई रोजगार देंगी. मायावती ने राज्य और केंद्र की ‘मास्टर की’ अपने पास रखने की अपील की. उन्होंने कहा कि आपने सबको आजमा लिया है, अब बीएसपी को सत्ता में लाओ. समर्थकों को काशीराम की याद दिलाते हुए मायावती ने कहा कि दिल्ली उनकी कर्मभूमि रही है. उनका ज्यादातर मूवमेंट यहीं चला. यहां की कोई ऐसी बस्ती और मोहल्ला नहीं छोड़ा था, जहां पार्टी का नीला झंडा नहीं फहराया. आज यहीं पर उनका आंदोलन कमजोर पड़ गया है. आप लोग कुछ समय उनके साथ चले, लेकिन बाद में इधर-उधर बहक गए. नतीजतन कांग्रेस और बीजेपी को राज करने का मौका मिल गया. अन्ना आंदोलन की आड़ में आम आदमी पार्टी ने भी सत्ता हथिया ली, लेकिन आप अपने मूवमेंट को आगे नहीं बढ़ा पाए. कुछ विधायक जरूर चुने गए, लेकिन दिल्ली की सत्ता तक नहीं पहुंच सके. यूपी का जिक्र करते हुए मायावती ने कहा कि वहां अब परिवर्तन की लहर आ गई है. प्रधानमंत्री समेत सभी बड़े नेताओं के चेहरे लटके हुए हैं. पड़ोसी राज्यों में चल रही परिवर्तन की लहर का असर दिल्ली पर भी होना चाहिए. हर बूथ पर अपना एक-एक वोट डलना चाहिए. समाजवादी पार्टी के लोग भी अपना वोट बीएसपी को ट्रांसफर करवाएं.

दिल्ली यूनिट को लिए आड़े हाथ

दिल्ली में बीएसपी के पांच कैंडिडेट उतारे हैं. मायावती ने भरी रैली में इसके लिए बीएसपी की दिल्ली यूनिट को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि हमें सातों सीटों पर चुनाव लड़ना था, लेकिन यहां के नेताओं की ढिलाई और गलती की वजह से हम दो सीटों पर कैंडिडेट नहीं उतार सके. प्रदेश की कार्यकारिणी को अपने काम में सुधार लाने की जरूरत है. उन्होंने चांदनी चौक से शाहिद अली, नॉर्थ ईस्ट दिल्ली से राजवीर सिंह, ईस्ट दिल्ली संजय गहलोत, वेस्ट दिल्ली सीता शरण सेन और साउथ दिल्ली से सिद्धांत गौतम को वोट देने की अपील की.

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जाति को लेकर BSP मुखिया मायावती का एक बार फिर PM मोदी पर हमला

लखनऊ। लोकसभा चुनाव 2019 में बहुजन समाज पार्टी की मुखिया ने पीएम नरेंद्र मोदी को लगातार अपने रडार पर रखा है. बसपा मुखिया मायावती ने जाति को लेकर एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है.

लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिया मायावती ने ट्वीट किया है कि श्री मोदी जन्म से ओबीसी नहीं हैं. उन्होंने जातिवाद का दंश नहीं झेला है और जातियों को लेकर मिथ्या बातें करते हैं. बसपा प्रमुख ने कहा कि जातिवाद के अभिशाप से पीडि़त लोग कैसे इसका सामना करते हैं, इन्हें पता होना चाहिए. उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी जन्म से ओबीसी नहीं हैं, इस बात को पूरा देश जानता है.

मायावती ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जन्म से पिछड़े नहीं हैं, बस राजनीतिक फायदे के लिए वह ऐसा कर रहे हैं. लोकसभा चुनाव के पहले चरण से ही मायावती और नरेंद्र मोदी के बीच जाति पर टिप्पणी को लेकर बहस छिड़ी हुई है. बसपा सुप्रीमो ने कहा कि जातिवाद के अभिशाप से पीडि़त लोग कैसे इसका सामना करते हैं, इन्हें पता होना चाहिए. उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी जन्म से ओबीसी नहीं हैं, इस बात को पूरा देश जानता है.

बसपा मुखिया मायावती ने आरोप लगाया कि जातिवाद का दंश क्या होता है, इन्हें नहीं पता क्योंकि इन्होंने कभी इसे झेला ही नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से महागठबंधन को लेकर लगातार की जा रही बयानबाजी पर मायावती ने कहा कि गठबंधन के बारे में पीएम को इस तरह की गलत बातें नहीं करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि गठबंधन जाति के नाम पर वोट नहीं ले रहा है, लेकिन भाजपा वाले इस प्रकार का झूठ प्रचारित कर रहे हैं. पीएम मोदी तो चुनावी फायदे के लिए जबरदस्ती पिछड़ा बन रहे हैं, इसका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ के लिए हो रहा है.

बसपा प्रमुख ने दावा किया कि इस बार उत्तर प्रदेश में महागठबंधन को सबसे ज्यादा सीटें मिलने जा रही हैं. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी चुनाव हारने जा रहे हैं, ये निश्चित हो गया है.

मायावती ने कहा कि पीएम मोदी को गठबंधन के लिए ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से बचा जाना चाहिए क्योंकि ऐसे शब्द ठीक नहीं हैं. बसपा प्रमुख ने कहा कि मोदी ने खुद को जबरदस्ती का पिछड़ा घोषित कर रखा है. अगर वह जन्म से ही पिछड़े हैं तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन्हें दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनने देगा. संघ ने कल्याण सिंह जैसे पिछड़े वर्ग के नेता के साथ क्या किया, यह सबको मालूम है. मायावती ने कहा कि गठबंधन पर आरोप लगाने के बजाय मोदी को गुजरात में झांकना चाहिए. मुझे पता चला है कि वहां दलितों को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार नहीं मिला है. वहां एक दलित युवक को अपनी शादी में घोड़े पर नहीं चढऩे दिया गया. गुजरात में दलितों पर जुल्म किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि भाजपा सत्ता में नहीं आ रही है और मोदी का दोबारा प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं होगा.

इससे पहले भी मायावती और नरेंद्र मोदी के बीच इस मुद्दे पर जुबानी जंग छिड़ चुकी है. मायावती ने पीएम मोदी को एक फर्जी ओबीसी करार दिया था. मैनपुरी में जब मायावती ने मुलायम सिंह यादव के समर्थन में सभा की थी तो उन्होंने मुलायम सिंह को पिछड़ों का असली नेता बताया था और नरेंद्र मोदी को फर्जी ओबीसी का कहा था.

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जातिवादियों के आतंक से दलित परिवार को छोड़ना पड़ा इलाका

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बुराड़ी। करीब डेढ़ महीने बाद एक दलित पीड़ित परिवार की शिकायत पर बुराड़ी थाने में दबंग आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज हो सका. क्योंकि दंबगों ने न सिर्फ अछूत कहा बल्कि जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए दंपति को बुरी तरह पीटा था. पीड़ित दलित परिवार का कसूर सिर्फ इतना था कि वह हैंडपंप से पानी भरने पहुंचा और सवर्ण जाति के दबंगों ने उसे रोक दिया. आरोपियों के हमले में पत्नी की उंगली टूट गई थी जबकि पति का सिर फट गया था. इस हमले में पीड़ित दलित परिवार इस कदर डर गया कि मामले की पुलिस को इत्तला दी.

आरोप है कि कि पुलिस ने बजाय उनकी सुनने के हमलावरों की तरफदारी की. पीड़ित परिवार का दावा है कि इंसाफ के लिए दर दर भटके. दबंगों ने पुलिस से शिकायत करने पर जान से मारने की धमकी दी. आखिरकार एससी-एसटी कमीशन के दखल पर अब 42 दिन बाद बुराड़ी थाने की पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मारपीट, जान से मारने की धमकी देने समेत अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया है.

आरोप है कि 28 मार्च को उनका बेटा गली में पानी भरने के लिए जा रहा था. उसी दौरान आरोपियों ने उसे पानी भरने से रोक दिया. बच्चे ने जब मां को बताया तो आरोपियों ने महिला और उसके पति पर हमला कर दिया. महिला के हाथ पर व पति के सिर पर रॉड मारी. परिवार का आरोप है कि पुलिस को फोन करने के बाद पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी. इसके बाद करीब एक सप्ताह पहले यहां से मकान खाली करके इलाके के संडे मार्किट में किराए पर घर लिया है. महिला का आरोप है कि ये सभी लोग इनके परिवार के लिए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर डराते धमकाते हैं. उनको हैंडपंप से पानी भी नहीं भरने दिया जाता है.

पुलिस अफसरों का कहना है कि मामले में पीड़ितों व चश्मदीदों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट समेत सभी पहलुओं पर जांच की जा रही है. दरअसल, पीड़ित परिवार ए-ब्लॉक, वेस्ट कमल विहार, बुराड़ी में रहता है. परिवार में पति व तीन बच्चे हैं. महिला ने बयान दिया है कि पति मजदूरी करता है. अपना मकान है. इनके पड़ोस में पिंटू यादव, पन्ना लाल, चंदू यादव व अन्य लोग रहते हैं. पीड़ित दलित का आरोप है कि 2016 में अपना मकान बनाया था. 2017 में शिफ्ट किया. आसपड़ोस सवर्ण बाहुल्य इलाका है. इससे पहले भी कई बार छोटी छोटी बातों पर झगड़ा व मारपीट कर चुके हैं. आरोप है कि मकान खाली करके कहीं और चले जाने को कहते हैं.

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इन 7 सीटों में दलित वोट कर सकता है हार-जीत का फैसला

नई दिल्ली। दिल्ली में भले ही केवल एक सीट उत्तर पश्चिम आरक्षित हो लेकिन सभी सीटाें पर दलित वोटर किसी भी उम्मीदवार को हराने जिताने का माद्दा रखते हैं. पूर्वी और उत्तर पूर्वी दिल्ली में पूर्वांचली वोटर का आंकड़ा अगर छोड़ दिया जाए तो तीन सीटों में सबसे अधिक दलित वोटर हैं, बची हुई सीटाें पर भी दलित वोटर कमजोर नहीं हैं. खास बात यह है कि जाट गूर्जर बाहुल्य क्षेत्र के रूप में जानी जाने वाली दक्षिणी दिल्ली में दोनों के वोटरों को जोड़ दिया जाए तो भी दलित वोटरों की संख्या अधिक है.

चांदनी चौक- दूसरे नंबर पर दलित मतदाताओं की संख्या उत्तर पश्चिमी के अलावा पश्चिम दिल्ली और दक्षिण दिल्ली में दलित मतदातों की संख्या अन्य जातियों के मुकाबले सबसे अधिक है. उत्तर पश्चिमी में दूसरे नंबर वैश्य तो पश्चिमी दिल्ली में दूसरे नंबर पर पंजाबी मतदाता है और दक्षिणी दिल्ली में दूसरे नंबर पर गुर्जर मतदाता है. वहीं, वैश्य बाहुल्य चांदनी चौक में दूसरे नंबर दलित मतदाताओं की संख्या है. दो सीटों पर पूर्वाचल के मतदाताओं का बोलबाला.

पूर्वी और उत्तर पूर्वी दिल्ली से पूर्वांचली वोटर सबसे अधिक- उत्तर पूर्व और पूर्वी दिल्ली पर पूर्वाचल के मतदाताओं का बोलबाला है. लेकिन यहां दलितों की संख्या भी ठीक ठाक है. उत्तर पूर्व सीट पर 42 फीसदी पूर्वांचल के मतदाता हैं. ऐसे ही पूर्वी दिल्ली में 1945141 मतदाताओं में से पूर्वाचल के लोगों की संख्या 39 फीसदी के करीब है. इन्हीं दोनों सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं 13 फीसदी के करीब अन्य सीटों की तुलना में अधिक है.

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पुलिस की सुरक्षा में निकली दलित दूल्हे की बारात

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अहमदाबाद। 10 मई (भाषा) गुजरात के साबरकांठा जिले के एक गांव में ग्रामीणों के एक वर्ग से तीखी प्रतिक्रिया मिलने की आशंका से एक दलित दूल्हे ने शुक्रवार को पुलिस की सुरक्षा में अपनी बारात निकाली. एक अधिकारी ने यह जानकारी दी. गांव के नेता रंजीतसिंह राठौड़ ने बताया कि गांव से होकर बारात निकालने की उनकी योजना को लेकर कुछ गैर दलित निवासियों के आपत्ति जताने के बाद प्रांतिज तालुका के तहत सितवाड़ा गांव के रहने वाले दूल्हे के परिजनों ने पुलिस सुरक्षा मांगने का फैसला किया. पुलिस के अनुसार दूल्हे को बारात निकालने के दौरान सुरक्षा दी गयी और बारात शांतिपूर्ण तरीके से निकली. प्रांतिज के पुलिस इंस्पेक्टर के. एस. ब्रह्मभट्ट ने कहा, ‘‘सितवाड़ा के अनुसूचित जाति के लोगों को आशंका थी कि अगर उन्होंने गांव से होकर बारात निकाली तो कुछ गलत हो सकता है.’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए उन्होंने हमसे सुरक्षा मांगी. गांव में पुलिस के तैनात रहने से बारात शांतिपूर्ण ढ़ंग से निकली.’’

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दलित दूल्हा घोड़ी पर सवार हुआ, गांव ने समुदाय का किया बहिष्कार

प्रतीकात्मक

गुजरात के मेहसाणा जिले के एक गांव में दलित व्यक्ति के अपनी शादी में घोड़ी पर बैठने का खामियाजा पूरे समुदाय को भुगतना पड़ा है. पूरे गांव ने अनुसूचित जाति(एससी) समुदाय के लोगों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया है. पुलिस ने गुरुवार को यह जानकारी दी. पुलिस के अनुसार कडी तालुका के लोर गांव के अगड़ी जाति के लोग दूल्हे के घोड़ी चढ़ने के कदम से कथित रूप से नाखुश थे. घटना मंगलवार की है.

गांव के सरपंच विनूजी ठाकोर ने गांव के अन्य नेताओं के साथ फरमान जारी कर गांववालों को दलित समुदाय के लोगों का बहिष्कार करने को कहा. उन्होंने बताया कि इस संबंध में ठाकोर को गिरफ्तार कर लिया गया है. पुलिस उपाधीक्षक मंजीत वंजारा ने बताया, ”सात मई को मेहुल परमार की बारात गांव से गुजर रही थी. चूंकि परमार एक दलित है इसलिए गांव के कुछ नेताओं ने इस पर आपत्ति की और समुदाय के लोगों को अपनी हद पार नहीं करने की चेतावनी दी.

जब दूल्हे के फैसले ने उसे पहुंचाया सलाखों के पीछे, जानें ऐसा क्या हुआ

उन्होंने बताया, ”अगले दिन गांव के कुछ प्रमुख ग्रामीणों ने दलितों के सामाजिक बहिष्कार की घोषणा की. इसके अलावा समुदाय के लोगों से बात करने या उनके साथ किसी तरह का मेलजोल रखने वालों पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाये जाने की भी घोषणा की गयी थी. वंजारा बृहस्पतिवार को दलित ग्रामीणों द्वारा फोन किये जाने के बाद गांव पहुंची थीं.

उन्होंने बताया कि गांव के सरपंच विनूजी ठाकोर की गिरफ्तारी के अलावा चार अन्य के खिलाफ भी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार रोकथाम अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामले दर्ज किये गये हैं. पत्रकारों से बात करते हुए मेहुल परमार ने कहा कि बहिष्कार के आह्वान के बाद दुकानदारों ने उन्हें दूध या अन्य जरूरी घरेलू सामान तक बेचने से मना कर दिया था.

उन्होंने कहा, ”जब मैं घोड़ी चढ़ा तो कुछ ग्रामीणों ने मुझे इस तरह से बारात नहीं निकालने को कहा था. आज सुबह जब हमें सामाजिक बहिष्कार का पता चला तो हमने पुलिस की मदद मांगी. सुबह चाय बनाने के लिये किसी ने हमें दूध तक न”

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अलवर सामूहिक बलात्कार, जाति और हिंदू संस्कृति

18 वर्षीय दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार की रूह कंपा देने वाली घटना किसी भी इंसान को स्तब्ध कर देने वाली. 5-6 बलात्कारियों 3 घंटे तक बारी-बारी से महिला के साथ बलात्कार किया. इस दौरान वे महिला और उसके पति को पीटते रहे. बलात्कारियों का दुस्साहस देखिए वे बलात्कार का वीडियो भी बनाते रहे. इतना नहीं उन्होंने बलात्कार के बाद इन वीडियों को नष्ट करने के लिए 9 हजार रूपए की भी मांग की. यह सब तब हुआ जब पति-पत्नी शादी की खरीदारी के लिए अलवर जा रहे थे.

इस पूरी घटना को पुलिस, राजनेता और बलात्कारियों के संरक्षकों के सहयोग से कई दिनों तक छिपाया गया. इसका एक कारण यह भी था कि इस घटना के सामने आने से दलित समाज में व्यापक आक्रोश पैदा हो सकता था और इससे राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेसी सरकार के उम्मीदवार को चुनावी नुकसान हो सकता था.

आइए भारत मे बलात्कार संबंधी कुछ तथ्यों को देख लें- ● भारत में प्रत्येक दिन 106 महिला बलात्कार का शिकार होती है. ● सामाजिक तबकों के आधार पर सर्वाधिक बलात्कार की शिकार आदिवासी, दलित तथा अल्पसंख्यक समुदाय की महिलायें होती हैं. ● औसतन प्रत्येक दिन 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. ● बलात्कार की शिकार महिलाओं में 94 प्रतिशत 2 वर्ष से लेकर 12 वर्ष की मासूम बच्चियां हैं. ● दुधमुँही मासूम बच्ची से लेकर 70 साल की दादी-परदादी भी बलात्कार का शिकार होती हैं बलात्कार को हिंदू धर्म और संस्कृति में पूर्ण स्वीकृति प्राप्त है-

डॉ.आंबेडकर ने अपनी किताब हिंदू धर्म की पहेलियां ( बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाग्मय खंड-8 ) के भाग-एक की पन्द्रहवीं पहेली के परिशिष्ट-3 में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बलात्कारी चरित्र की ओर चर्चा की है. आंबेडकर ने लिखा, “ तीनो देव ( ब्राह्मा, विष्णु और शिव ) सती ( अनसूया ) का शील-हरण करने अत्रि (ऋषि ) की कुटिया की ओर चल पड़े. इन तीनों ने ब्राह्मण भिक्षुओं का वेष धारण किया. जब वे वहां पहुंचे, अत्रि बाहर गए हुए थे. अनसूया ने उनका स्वागत किया और उनके लिए भोजन तैयार किया.” इन तीनों ने उनसे निर्वस्त होने को कहा. आंबेडकर विस्तार से पूरी कथा सुनाते हैं. अंत में आंबेडकर की टिप्पणी इस प्रकार है, “इस कहानी में अनैतिकता की दुर्गंध भरी पड़ी है और उसके अंत को जान-बूझकर ऐसा मोड़ दिया गया है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु,महेश के उस वास्तविक कुकर्म पर पर्दा डाल दिया जाय.” ( पृष्ठृ173-174 ). आंबेडकर ब्राह्मा द्वारा अपनी बेटी वाची के साथ बलात्कार की भी चर्चा करते हैं.’’(पृ.177)

मनुस्मृति भी जाति के आधार पर स्त्रियों के साथ बलात्कार को प्रोत्साहित करती है-

मनुस्मृति में जहां एक ओर शूद्र वर्ण के किसी व्यक्ति द्वारा ब्राह्मण की स्त्री के साथ व्यभिचार करने पर शूद्र को प्राण दंड का आदेश देती है- अब्राह्मण: संग्रहणे प्राणान्तं दण्डमर्हति. चतुर्णामपि वर्णानां दारा रक्ष्यतमा: सदा.. (8.359 ) वहीं यदि ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ग की किसी स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो उसे केवल पांच सौ पर्ण का आर्थिक दंड देना होगा- अगुप्ते क्षत्रियावैश्ये शूद्रा वा ब्राह्मणो व्रजन् . शतानि पच्च दण्ड्य: स्यात्सहस्रं त्वन्त्ज्यस्त्रियम्..(8.385 )

हिंदू राष्ट्र के आधुनिक विचारक-नायक सावरक बलात्कार को वीरतापूर्ण और शौर्यपूर्ण कार्य कार्य मानते थे, उन्होंने अपनी किताब सिक्स ग्लोरियस इकोज ऑफ इंडियन हिस्ट्री में इस बात के पक्ष में तर्क दिया है कि, क्यों मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार जायज है. वे इतने पर ही नहीं रूकते हिंदुओं को ललकारते हुए कहते हैं कि “ यदि अवसर उपलब्ध हो तो ऐसा न करना कोई नैतिक या वीरतापूर्ण काम नहीं है,बल्कि कायरता है”.(See Chapter VIII of the online edition made available by Mumbai-based Swatantryaveer Savarkar Rashtriya Smarak). उनकी यह किताब 1966 में मराठी में प्रकाशति हुई थी.

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इंदौर की सफाईकर्मी ने सोना गिरवी रख बेटी को पढ़ाया, अब उसे 1 करोड़ की स्कॉलरशिप मिली

इंदौर (मध्यप्रदेश)। सफाईकर्मियों की बदौलत जहां इंदौर सफाई में देश में पहले नंबर पर आया है. वहीं, अब एक महिला सफाईकर्मी नूतन घावरी की बेटी रोहिणी को प्रदेश सरकार के अनुसूचित जनजाति विभाग ने एक करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप दी है. मार्केटिंग में एमबीए कर चुकी रोहिणी अब पीएचडी के लिए स्कॉटलैंड जाएंगी. रोहिणी की मां नूतन कर्मचारी राज्य बीमा निगम अस्पताल में सफाईकर्मी हैं.

नूतन बताती हैं, “मैं दस साल तक रोहिणी को अपने साथ ही ड्यूटी पर ले जाती थी, लेकिन उसका मन तो पढ़ाई-लिखाई में ही लगता था. उसने आगे पढ़ने की इच्छा जताई तो हम भी मना नहीं कर पाए. सोना गिरवी रखकर उसे पढ़ाया. सोना आज भी गिरवी रखा हुआ है.” वहीं, रोहिणी ने बताया कि मैं जब भी परिवार के साथ किसी शादी समारोह में जाती थी, तो लोग पापा को ताने मारते हुए कहते थे कि बेटी बड़ी हो गई है. हाथ पीले कर दो नहीं तो अच्छा लड़का नही मिलेगा. अब वे लोग ही पापा को बधाई देते हैं और अपने बच्चों को मेरा उदाहरण देते हैं.

रोहिणी के साथ भाई-बहनों की भी खेल में रुचि : राेहिणी वालीबाॅल की राष्ट्रीय खिलाड़ी भी हैं. उसकी दो बहनें- कोमल, अश्विनी, एक भाई हर्ष है. कोमल नीट क्वालिफाई हैं. अश्विनी 12वीं में है और वह भी स्टेट लेवल की वॉलीबॉल खिलाड़ी हैं. भाई हर्ष नेशलन अंडर 14 बास्केटबाॅल टीम का कप्तान है.

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