हाल ही मे नेशनल कमिशन फॉर शैडयूल्ड caste ने ओएनजीसी की अंतरिम सीएमडी अल्का मित्तल को समन भेजा है। ओएनजीसी की सीएमडी अल्का मित्तल को यह समन एससी-एसटी अधिकारियों के कॉर्पोरेट प्रमोशन में नियमों के उल्लंघन के मामले में मिला है।
ONGC यानि ऑइल अँड नैचुरल गॅस कार्पोरेशन लिमिटेड…. भारत सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी है। ओएनजीसी में लगभग 28000 (अठाइस हजार) कर्मचारी काम करते हैं जिसमें लगभग साढ़े सात हजार एससी-एसटी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। आरोप है कि कॉरपोरेट प्रमोशन में इनके साथ भेदभाव किया जाता है। यही मामला एससी-एसटी आयोग पहुंचा है। जहां चार फरवरी को आयोग ने ओएनजीसी के अधिकारियों को तलब किया था। इससे जुड़ी एक खबर petrowatch.com नाम की वेबसाइट पर सामने आ चुकी है।
आयोग ने ओएनजीसी से जो सवाल किए हैं उससे मामले की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस बारे में दलित दस्तक ने ओएनजीसी के कुछ रिटायर्ड कर्मचारियों से बात की, जिन्होंने ओएनजीसी के भीतर जातिवाद की कलई खोलकर रख दी।
ओएनजीसी की Recruitment & Promotion Policy आखिरी बार सन 1997 और 2004 में revise की गयी थी। उसके बाद ओएनजीसी की ऑफिसर्स एसोसिएशन के साथ मैनेजमेंट ने कोई MOU यानी मेमोरेंडम ऑफ अंडर स्टैंडिंग नहीं किया। ओएनजीसी मैनेजमेंट कभी भी तकरीबन 7500 कर्मचारियों का नेतृत्व करने वाले एससी-एसटी असोसिएशन के साथ Recruitment & Promotion Policy के विषय में कोई मशविरा या बातचीत नहीं करता। यह सीधे उनके कैरियर ग्रोथ को affect करता है।
हद तो तब हुआ, जब मैनेजमेंट ने ONGC की Corporate Promotion policy को साल 2014 और फिर 2015 में अपनी मर्जी से बदल डाला। आरोप है कि मैनेजमेंट ने जानबूझ कर ऐसे बदलाव किए जिससे ज़्यादातर जनरल कैटेगरी के जूनियर अधिकारियों को पदोन्नति दी गयी और ज़्यादातर एससी एसटी जो उनसे कई वर्ष सीनियर और काबिल थे उन्हे पीछे छोड़ दिया गया।
इसका नतीजा ये हुआ की हज़ारों की संख्या में सीनियर और काबिल एससी एसटी अधिकारी पीछे रह गए। न सिर्फ पीछे रह गए, बल्कि टॉप मैनेजमेंट में एससी-एसटी की हिस्सेदारी लगभग नहीं के बराबर है। यह सब तब है, जबकि ONGC एक सार्वजनिक क्षेत्र की सरकारी कंपनी है और यहां ओएनजीसी गाइडलाइंस के साथ ही भर्ती और पदोन्नति की प्रक्रिया में डीओपीटी और डीपीई के नियम भी लागू होते हैं। लेकिन ओएनजीसी मैनेजमेंट अपनी मर्जी से नियमों में बदलाव करके सारे सरकारी नियमों को लगातार ताक पर रख रही है। ओएनजीसी के भीतर जातिवाद का आलम यह है कि दलित एवं आदिवासी समाज के जिन अनुभवी और योग्य अधिकारियों को प्रोमोशन तक नहीं दिया जा रहा है, वे अनसूचित जाति एवं जनजाति के अधिकारी भारत के टॉप आईआईटी, आईआईएम, एनआईटी और अन्य टॉप के संस्थानो से ऑल इंडिया प्रतियोगी परीक्षा से चुनकर ओएनजीसी में आए हैं। इनकी जगह ज्यादातर सवर्ण समाज के जूनियर अधिकारी आगे बढ़ रहे हैं।
यहां ध्यान देना होगा कि ओएनजीसी में काम करन वाले अनसुचित जाति और जनजाति के अधिकारी कोई पदोन्नति में आरक्षण की मांग नहीं कर रहे हैं। उनकी आपत्ति यह है कि ओएनजीसी का मैनेजमेंट उन्हें दरकिनार कर के उनसे चार-पाँच साल जूनियर जनरल कैटेगरी के अधिकारियों को साल दर साल ज्यादा प्रमोशन दे रही है। ये दिन दहाड़े नियमों का उल्लंधन है, चोरी है और जाति पर आधारित भेदभाव है।
दरअसल ओएनजीसी के भीतर एससी-एसटी कर्मचारियों के साथ पहले भी भेदभाव का आरोप लगता रहा है। लेकिन प्रोमोशन को लेकर नियम 2014-2015 में तब बदले गए जब एससी-एसटी की (SPECIAL RECRUITMENT DRIVE) वाली बैच प्रमोशन के लिए eligible हुयी। अगर नियमों का ठीक से पालन होता तो ज़्यादातर एससी-एसटी अधिकारी ओएनजीसी के टॉप पोस्ट पर होते। आरोप है कि उन्हे रोकने के लिए सारा गोलमाल चल रहा है। और यदि दिखावे के लिए कुछ अधिकारियों को प्रोमोशन दिया भी जाता है तो उन्हे जान बूझकर कम महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दिया जाता है।
ओएनजीसी के एससी-एसटी एसोसिएशन ने इस मामले में दखल करते हुए ओएनजीसी मैनेजमेंट के साथ उठाया, लेकिन मैनेजमेंट ने उनकी बातों को अनदेखा कर दिया। जिसके बाद एसोसिएशन ने इस मामले को नेशनल कमिशन फॉर शैडयूल्ड caste और शैडयूल्ड tribe के सामने उठाया, जिन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए ओएनजीसी के CMD को समन भेजकर जवाब तलब किया है। साथ ही ओएनजीसी से नियुक्तियों और प्रमोशन से संबंधित डाटा मांगा है।
यहां एक सवाल यह भी उठता है कि क्या ONGC या उसकी सहयोगी कंपनी में कोई एससी-एसटी बोर्ड ऑफ़ डाइरेक्टर पद पर है? जवाब है, बिलकुल नहीं। बोर्ड की तो छोड़िए, कुल 91 एक्सिक्यूटिव डाइरेक्टर में से सिर्फ एक ST, 6 SC और एक OBC है। लगभग यही स्थिति ग्रुप जनरल मैनेजर यानि E-8 और E-9 लेवेल पर है। आप ONGC की आधिकारिक वेबसाइट पर जाइए और साल दर साल ONGC के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की लिस्ट देखिये। आपको सिर्फ और सिर्फ शर्मा, द्विवेदी, मिश्रा इत्यादि दिखेंगे।
हालिया आंकड़ा देखिए। कुछ महीने पहले ONGC के CMD और डाइरेक्टर (Finance) थे, सुभाष कुमार शर्मा, जबकि ओएनजीसी विदेश लिमिटेड के डाइरेक्टर (Finance) थे विवेकानद शर्मा एवं ओएनजीसी के डाइरेक्टर ऑनशोर हैं अनुराग शर्मा। प्रोजेक्ट हेड की जिम्मेदारियां भी इसी एक खास वर्ग ने पकड़ रखी है। अब हम आपको इससे भी मजेदार बात बताते हैं, ओएनजीसी के ज़्यादातर बोर्ड मेम्बर्स साल दर साल कथित ऊंची जाति से रहे हैं जबकि ओएनजीसी का तेल और गैस उत्पादन साल दर साल तेजी से गिर रहा है। क्या भारत में मेरिट की यही परिभाषा है?
ओएनजीसी ने सारे सरकारी नियमों को ताक पर रख कर हज़ारों अनुभवी और काबिल एससीटी एसटी अधिकारियों को प्रमोशन और महत्वपूर्ण पदों से साल दर साल दूर रखा है। क्या इक्कीसवी सदी में जातिवाद का ये नया कॉर्पोरेट मॉडल है। कुल मिलाकर इस मामले के अनुसूचित जाति आयोग में पहुंचने पर ओएनजीसी के एससी-एसटी कर्मचारियों में न्याय की उम्मीद जगी है।
हिंदी फिल्मों की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका लता मंगेशकर (28 सितंबर 1929 – 6 फ़रवरी 2022) केनिधन के बाद, जैसा कि हमारी परंपरा है, उन्हें बड़े पैमाने पर श्रद्धांजलि दी गई। श्रद्धांजलियां जितनी जनता की ओर से रहीं, उतनी ही जोर से भारत सरकार की ओर से भी। उनके निधन पर दो दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। इस दौरान राष्ट्र-ध्वज आधा झुका रहा और देश में कहीं भी सरकारी स्तर पर मनोरंजक कार्यक्रम की मनाही रही।
लता जी ने 92 वर्ष का लंबा जीवन जिया। 1950 के बाद से कई दशकों तक उन्होंने फिल्मी-गायन की दुनिया पर एकछत्र राज किया। संगीत के संस्कार उन्हें पारिवारिक विरासत में मिले थे। उनके पिता का वास्ता भी संगीत की दुनिया से था। लता की सगी बहनें आशा भोंसले और उषा मंगेशकर भी प्रसिद्ध गायिकाएं हैं। लता जी भले ही इंदौर में पैदा हुईं, लेकिन उनकी रगों में गोवा के एक प्रसिद्ध देवदासी परिवार का रक्त था। उनकी दादी देवादासी थीं। मराठी और हिंदी की प्रख्यात दलित लेखिका सुजाता पारमिता ने लता को दलित और देवदासी परिवार से बताया है। पारमिता के अनुसार, लता के पिता भी देवदासी माँ की संतान थे। जबकि कुछ अन्य लोग उन्हें भट्ट ब्राह्मण परिवार का साबित करते हैं। जो भी हो, लेकिन लता जी की आवाज में प्राकृतिक रूप से कुछ ऐसा था, जो बरबस सबको अपनी ओर खींचता था।
आज पलट कर देखने पर हम पाते हैं कि लता जी को 50 वर्षों से अधिक समय तक पार्श्व-गायन के शीर्ष पर बनाए रखने में मुख्य रूप से दो चीजों का योगदान था। इनमें सर्वोपरि थी, उनकी प्राकृतिक आवाज, जो सिर्फ और सिर्फ उनकी थी। प्रकृति ने उन्हें यह अद्भुत नियामत बख्शी थी। जैसा कि गायक बड़े गुलाम अली ने एक बार उनके लिए बहुत प्यार से कहा था- “कमबख्त कभी बेसुरी नहीं होती, वाह-क्या अल्लाह की देन है।”
लेकिन इसके अलावा उन्हें बुलंदी पर बरकरार रखने में भारत के एक राजनीतिक धड़े की भी भूमिका थी। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रिय गायिका थीं। यह एक अजीब विरोधाभास था। वे श्रृंगारिक प्रेम के गीत गाती थीं, लेकिन आजीवन उन ताकतों के साथ खड़ी रहीं, जो अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक प्रेम करने वालों की हत्या कर देने के हिमायती हैं।
वर्ष 2001 में तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न‘ से नवाजा था। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। भाजपा ने ही उन्हें राज्य सभा के लिए भी मनोनीत किया था। लेकिन सदन में उपस्थिति का उनका रिकार्ड बेहद खराब था। सदन नहीं जाने के कारण वे वहां से मिलने वाला वेतन भी नहीं लेती थीं, ताकि कोई उन पर उंगली न उठा सके। इन सबके बरक्स उनके सामाजिक सरोकार किस प्रकार के थे, इसका पता इससे चलता है कि उन्हें भारत रत्न मिलने के कुछ ही समय बाद जब उनके मुंबई स्थित घर के पास एक फ्लाइओवर बनने लगा तो उन्होंने धमकी दी कि अगर उनके घर के पास फ्लाई ओवर बना तो वे देश छोड़ कर चली जाएंगी। उनकी धमकियों के आगे सरकार को झुकना पड़ा और वह फ्लाईओवर नहीं बन सका। यह उनके स्वार्थ की पराकाष्ठा के प्रदर्शन का एक नमूना है। सवाल ये है कि क्या किसी को राजनीतिक दल यूं ही इतना सम्मानित किया करते हैं?
लता के आदर्श राष्ट्रीय स्वयं संघ के प्रेरणा पुरुष विनायक दामोदर सावरकर थे। वे सावरकर की प्रशंसा का कोई भी मौका नहीं छोड़ती थीं। वे हर वर्ष सावरकर जयंती पर ट्वीट कर उन्हें अपने पिता समान और भारत माता का सच्चा सपूत बताया करती थीं। सावरकर की ही भांति लता की निजी आस्था न तो स्त्री की आजादी में थी, न ही उन्हें भारत की धर्मनिरपेक्षता से लगाव था।
हावर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अशरफ़ अज़ीज़ के लेख “द फिमेल वॉयस ऑफ हिंदुस्तानी फिल्म सांग्स” में लता के अवदान की विस्तृत चर्चा है। इस सुचिंतत लेख में अशरफ़ अज़ीज़ की भी स्थापना है कि “लता मंगेशकर की आवाज ने औरतों को आज्ञाकारी और घरेलू बनाने में भरपूर मदद की।” वे भारत की धर्मनिरपेक्षता पर आघात करने वाली सबसे बड़ी घटना, बाबरी मस्जिद के विध्वंस से प्रसन्न थीं। 5 अगस्त, 2020 को जब कोविड महामारी के दौरान भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री ने तोड़ी गई मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर की आधारशिला रखी तो लता जी ने ट्वीट किया था कि “कई राजाओं का, कई पीढ़ियों का और समस्त विश्व के राम भक्तों का सदियों से अधूरा सपना आज साकार हो रहा है”।
राज्य-सत्ता की दमनकारी नीतियों के विरोध में जनता का विरोध भी उन्हें उचित नहीं लगता था। 2021 में जानी-मानी अंतरराष्ट्रीय पॉप गायिका रिहाना ने भारत में चल रहे किसान आंदोलन के पक्ष में ट्वीट किया तो लता मंगेशकर ने ट्वीट कर रिहाना को लताड़ लगाई। उस समय लता मंगेशकर के साथ-साथ कुछ अन्य सेलिब्रिटीज सचिन तेंदुलकर, अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी ने भी रिहाना को लताड़ने वाले ट्वीट किए। लेकिन एक मजेदार बात यह सामने आई कि इन ट्वीटों के सिर्फ़ भाव ही नहीं बल्कि कई शब्द भी समान थे। बाद में मालूम चला कि लता मंगेशकर समेत इन सभी लोगों ने भाजपा के आईटी सेल द्वारा उपलब्ध करवाई सामग्री ट्विटर पर पोस्ट की थी।
दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा, लता की लोकप्रियता का उपयोग किस तरह किया करते थे, इसका पता 2019 में प्रसारित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ की रिकार्डिंग को सुनने से भी लगता है। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने श्रोताओं को लता मंगेशकर से फोन पर हुई ‘निजी’ बातचीत की रिकार्डिंग सुनाई। प्रधानमंत्री के अनुसार, यह रिकार्डिंग उस समय की है, जब उन्होंने लता मंगेशकर को उनके 90वें जन्म दिन की बधाई देने के लिए औचक फोन किया।
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए मोदी कहते हैं कि लता जी से उनकी “यह बातचीत वैसी ही थी, जैसे बहुत दुलारमय छोटा भाई अपनी बड़ी बहन से बात करता है।” वे कहते हैं कि “मैं इस तरह के व्यक्तिगत संवाद के बारे में कभी बताता नहीं, लेकिन आज चाहता हूं कि आप भी लता दीदी की बातें सुनें।” रिकार्डिंग की शुरुआत में मोदी कहते हैं कि “लता दीदी प्रणाम, मैं नरेंद्र मोदी बोल रहा हूं। मैंने फोन इसलिए किया, क्योंकि इस बार आपके जन्मदिन पर मैं हवाई जहाज में ट्रैव्लिंग कर रहा हूं, तो मैंने सोचा जाने से पहले मैं आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई… अग्रिम बधाई दे दूं.. आपको प्रणाम करने के लिए मैंने अमेरिका जाने से पहले आपको फोन किया है।’’
मोदी इस कार्यक्रम में यह जताते हैं कि यह दो व्यक्तियों के बीच सच्चे हृदय से हुई बातचीत है, जिसमें लता सरकार की उपलब्धियों के पुल बांधती हैं। लेकिन उस रिकार्डिंग में ही मालूम चल जाता है कि यह सुनियोजित बातचीत थी, जिसे लता की लोकप्रियता का फायदा उठाने के लिए प्रधानमंत्री की प्रचार टीम ने आयोजित किया था। दरअसल, उसमें लता का यह कहा हुआ भी रिकार्ड है कि “आपका फोन आएगा, यही सुनकर मैं बहुत ये हो गई थी।” लता के मुंह से अनायास निकला यह वाक्य बता देता है कि पूरी बातचीत बनावटी है। लेकिन तमाम मीडिया-संस्थानों ने इससे संबंधित खबर को उस प्रकार से ही प्रसारित किया जैसा कि प्रधानमंत्री की प्रचार टीम चाहती थी। हर जगह इस खबर की धूम रही कि प्रधानमंत्री ने लता मंगेशकर को जन्मदिन की बधाई दी। खबरों में कहा गया कि स्वर कोकिला लता मंगेशकर उनके प्रधानमंत्री बनने को देश के लिए सौभाग्य की बात मानती हैं।
उम्र में नरेंद्र मोदी लता मंगेशकर से 31 वर्ष छोटे हैं। इस रिकार्डिंग में लता उनसे आशीर्वाद मांगती हैं। वे कहती हैं कि जन्मदिन पर अगर “आपका आशीर्वाद मिले तो मेरा सौभाग्य होगा।” प्रधानमंत्री उनकी बात काट कर कहते हैं कि मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में मीडिया-मैनेजमेंट का जो दौर चल रहा है, उसमें उपरोक्त लता-मोदी प्रहसन कोई अनोखी बात नहीं है। लेकिन जब एक कलाकार के रूप में लता के व्यवहार और एक कलाकार की गरिमा से संबंधित सरोकारों का आकलन करना हो तो इन छोटी लगने वाली बातों को ध्यान में रखना होगा क्योंकि इनके निहितार्थ छोटे नहीं हैं।
लता जी के निधन के बाद मैंने अपने फेसबुक वॉल पर उनके सामाजिक सरोकारों के सवालों को उठाया था। उस पोस्ट को पढ़ने के बाद एक ट्रेड टोली ने मेरी पोस्ट पर गाली-गलौज करने का आह्वान किया। जड़मति लंपट युवाओं की इस टोली के आह्वान के बाद लगभग 700 लोगों ने मेरे फेसबुक वॉल पर आकर गालियां दीं, जो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी है। मेरी उस पोस्ट को शेयर करने वाले मित्रों को, जिनमें हिमांशु कुमार जैसे प्रसिद्ध कार्यकर्ता भी शामिल थे, को भी गालियां दी गईं। लेकिन ये ट्रोल-सेना क्या लता को उन सवालों से बचा पाएगी, जो सांभा जी भगत जैसे लोकप्रिय मराठी गायक वर्षों से उठाते रहे हैं?
सांभा जी बताते हैं कि किस प्रकार लता मंगेशकर ने डॉ. आंबेडकर से संबंधित गीत गाने से मना कर दिया था। सांभा जी ने इस संबंध में 2015 में रांची स्थित आदिवासी और दलित समुदाय से आने वाले युवा वकीलों के संगठन ‘उलगुलान’ द्वारा आयोजित एक संगीत कार्यक्रम में जो कहा, उसे यहां उन्हीं के शब्दों में पूरा उद्धृत कर देना प्रासंगिक होगा, ताकि हम उस दर्द की तासीर को ठीक से महसूस कर सकें।
सांभा जी भगत ने उपरोक्त कार्यक्रम में कहा कि: “लता बाई, आशा बाई, उषा बाई- तीनों मिलकर गाते हैं।… उनके आगे भी गणपति होते हैं, पीछे भी गणपति होते हैं। लेकिन इस पूरे दृश्य में हम लोग किधर खड़े हैं? लता बाई की आवाज बहुत अच्छी है।… एक बार हमारे लोग गए थे लता बाई के पास में कि हमारे जो बाबा साहब आंबेडकर हैं, उनका एक गाना गाओ आप। लेकिन लता बाई ने इंकार कर दिया। मैं कहता हूं कि यह बहुत महत्वपूर्ण है कि किसको नकारा जाता है। लता बाई ने क्यों इंकार किया? क्योंकि डॉ. आम्बेडकर अछूत हैं। उन्होंने बाकी सब गाया है। हमलोग उनको बोले कि पैसे का प्राब्लम है तो पैसे देते हैं न! लेकिन उन्होंने नहीं गाया।… उनकी बहुत सुंदर आवाज है। ऐसी सुंदर आवाज अगर हमारे बाबा साहब के नाम का स्पर्श होने से अपवित्र होती है तो ऐसी आवाज हमारे लिए कचरा है। कोई जरूरत नहीं है उसकी। हमारी हजारों लता बाई और आशा बाई को उन्होंने गांव-गांव में खत्म किया है। वे उन लोगों को अपना भाई बताती हैं कि जिन्होंने हजारों लोगों का कत्लेआम किया है। एक कलाकार को अपना पक्ष जरूर चुनना चाहिए। अगर कत्लेआम करने वाले उनके भाई हैं तो वे हमारी बहन नहीं हो सकतीं।”(जोर हमारा)
लता किस प्रकार का गायन खुशी से करती थीं, इसे देखना हो तो उस वीडियो को देखना चाहिए, जिसमें वे सावरकर के गीत “हे हिंदू शक्ति संभूत दिप्ततम तेजा” को पूरे मनोयोग से गा रही हैं। शिवा जी का सांप्रदायिकीकरण करने वाले इस गीत की पंक्तियां इस प्रकार है:
“हे हिंदू शक्ति संभूत दिप्ततम तेजा
हे हिंदू तपस्या पूत ईश्वरी ओजा
हे हिंदू श्री सौभाग्य भूतिच्या साजा
हे हिंदू नृसिंहा प्रभो शिवाजीराजा
करि हिंदू राष्ट्र हें तूतें”
इस मराठी गीत को वीडियो में संगीत उनके भाई हृदयनाथ मंगेशकर ने दिया था।
लता और उनके परिवार का जिक्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी ने हाल ही में प्रकाशित हुई अपने भाषणों की पुस्तक ‘विकास के पथ’ में भी किया है। गडकरी बताते हैं कि लता “दीदी ‘कट्टर’ राष्ट्रवादी हैं।… स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के प्रति उनकी प्रगाढ़ श्रद्धा है।” गडकरी ने किताब में बताया है कि “जिस समय मुंबई के वरली-बांद्रा पुल का भूमि पूजन कार्यक्रम था, उस समय मैंने लता दीदी और उनके भाई हृदयनाथ मंगेशकर के सामने इच्छा रखी कि सावरकर द्वारा रचित गीत या तो स्वयं उनके द्वारा अथवा उनके परिवार के द्वारा गाया जाना चाहिए।… इस कार्यक्रम में हृदयनाथ मंगेशकर आए और इस परिवार की वीर सावरकर के प्रति जो श्रद्धा है उसी के अनुरूप उन्होंने वीर सावरकर रचित चार गानों को बड़ी सुंदरता से पेश किया।” (जोर हमारा)
लता के संगीत पर, उनकी हर-दिल-आवाज पर बहुत सारे लोग बात करेंगे। लेकिन यह तो उनकी आवाज के प्रशंसक भी जानते हैं कि उनकी आवाज में कुछ प्राकृतिक जादू था। जन्मजात थी उनकी आवाज। उस मूल आवाज में लता जी का अपना तो कुछ था नहीं। ऐसे में यह ज्यादा आवश्यक है कि हम देखें कि जो लता का अपना था, वह क्या था?
सवाल यह नहीं है कि उन्होंने बाबा साहब आंबेडकर के गानों को क्यों नहीं गाया। इन थोथे प्रतीकों का खूब दुरूपयोग होता है। कोई उनके बाबा साहब आंबेडकर पर कहे औपचारिक शब्दों को सामने रख सकता है तो कोई उनकी नेहरू अथवा किसी कम्युनिस्ट, बहुजन नेता के साथ की तस्वीरों को। इसलिए मेरा सवाल यह है कि लता मंगेशकर के सामाजिक सरोकार क्या थे, वे धार्मिक पोंगापंथ के पक्ष में थीं या वैज्ञानिक-चेतना के प्रसार के पक्ष में? स्त्रियों को प्रेम करने की आजादी, दलित-पिछड़ों द्वारा सामाजिक-आर्थिक समानता के लिए संघर्ष आदि के प्रति उनके विचार क्या थे? और, यह जो कुछ उनका अपना था, उसके आधार पर उन्हें इतिहास में किस प्रकार याद किया जाएगा? वे किस ओर खड़ीं हैं?
दरअसल लता जी की वैचारिक बुनावट प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी थी। मुझे नहीं पता कि उन्होंने अपने-अपने प्रतिगामी समाजिक सरोकारों का उस प्रकार सचेत चुनाव किया था या नहीं, जिस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े उच्च वर्णीय लोग करते हैं।
लेकिन, उपरोक्त प्रसंगों से इतना तो स्पष्ट है कि दुनिया कैसी होनी चाहिए, कौन-सी ताकतें दुनिया के सुर को बिगाड़ती हैं और कौन इसे संवारने के लिए संघर्षरत हैं, इस बारे में उनका कोई विचार ही नहीं था। किसी विचारहीन कलाकार का इतिहास में स्थान नहीं बना पाना कठिन है, चाहे वह अपने जीवन-काल में कितना भी महान क्यों न लगता रहा हो। लता के गीत भले ही कुछ अरसे तक जीवित रहें, लेकिन शायद एक कलाकार के रूप में वे इतिहास के कूड़ेदान में वैसे ही जाएंगी, जैसे कोई टूटा हुआ सितार जाता है, चाहे उसने अपने अच्छे दिनों में कितने भी सुंदर राग क्यों न निकाले हों।
उनकी दिलकश आवाज का जादू देश के करोड़ों लोगों की तरह मुझे भी प्रभावित करता है। मैं भी चाहूंगा कि किसी को भी मिली ऐसी प्रकृति प्रदत्त नियामत का सम्मान हो, लेकिन यह भी अवश्य देखा जाना चाहिए कि उसने जाने-अनजाने इस नियामत को किन ताकतों के पक्ष में बरता तथा उन ताकतों ने उसका किस प्रकार का सामाजिक-राजनीतिक उपयोग किया।
उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने देश की राजनीति और राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के बीच हलचल मचा दी है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर कुल पांच राज्यों में हुए चुनाव में भाजपा चार राज्यों में जीत गई है और सरकार बना चुकी है। पंजाब में आम आदमी पार्टी को भारी बहुमत मिला है। दलित राजनीति के परिपेक्ष्य में देखें तो यह चुनाव काफी निराशा भरा रहा। दलित समाज के वोटों पर दावा करने वाली बसपा यूपी, पंजाब और उत्तराखंड में औंधे मुंह गिरी है। बसपा की सबसे शर्मनाक हार उसके गढ़ उत्तर प्रदेश में हुई है, जहां सीटों से लेकर वोट प्रतिशत तक में उसका भारी नुकसान हुआ है। उत्तर प्रदेश में बसपा महज बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा की सीट ही जीत सकी है। जो लोग उस क्षेत्र की राजनीति को जानते हैं, उन्हें पता है कि यह जीत बसपा की नहीं, बल्कि बसपा के टिकट पर जीते उमाशंकर सिंह की अपनी लोकप्रियता की जीत है। इस तरह देखा जाए तो बसपा अपनी स्थापना के बाद निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी थी।
प्रदेशवार बहुजन समाज पार्टी के प्रदर्शन का आंकलन करें तो उत्तर प्रदेश में बसपा को 12.88 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि बसपा को एक करोड़,18 लाख, 73 हजार 137 वोटरों ने वोट किया है। 2017 में जब माना रहा था कि बसपा अपने सबसे बुरे दौर में है, तब भी उसे 19 सीटें और 22.24 प्रतिशत मिला था। ऐसे में बसपा की इस हार को शर्मनाक माना जा रहा है।
पार्टी
सीटें
फायदा/नुकसान
वोट प्रतिशत
वोट मिले
भाजपा
255
57 सीटें घटी
41.29
तीन करोड़ 80 लाख 51, हजार 721 वोट
सपा
111
64 सीटें बढ़ी
32.06
2 करोड़ 95 लाख, 43 हजार, 934 वोट
अपना दल
12
3 सीटें बढ़ी
रालोद
08
7 सीटें बढ़ी
02.85
26 लाख, 30 हजार, 168 वोट
निषाद पार्टी
06
5 सीटें बढ़ी
सुभासपा
06
2 सीटें बढ़ी
कांग्रेस
02
5 सीटें घटी
02.33
21 लाख, 51 हजार, 234 वोट
बसपा
01
18 सीटें घटी
12.88
एक करोड़,18 लाख, 73 हजार 137 वोट
इस तरह देखा जाए तो उत्तर प्रदेश चुनाव में बहुजन समाज पार्टी भले वोट प्रतिशत में कुछ दलों से आगे हो, सीटों के मामले में सबसे आखिर में खड़ी दिखती है। ओमप्रकाश राजभर की पार्टी, अनुप्रिया पटेल की पार्टी, कांग्रेस पार्टी, जयंत चौधरी की लोकदल पार्टी और यहां तक की निषाद पार्टी तक बहुजन समाज पार्टी से आगे हैं।
पंजाब में बसपा को 1.77 प्रतिशत वोट मिला है। कुल मिले वोटों की संख्या की बात करें तो बसपा को यहां सिर्फ 2 लाख 75 हजार 232 वोटरों ने ही वोट दिया है।117 सीटों में से बसपा ने 20 सीटों पर अपना प्रत्याशी उतारा था। बसपा को यूपी की तरह ही सिर्फ एक सीट मिली। नवां शहर में बसपा प्रत्याशी डॉ. नक्षत्र सिंह ने बसपा की लाज बचाई। पंजाब में बसपा और अकाली दल के बीच गठबंधन हुआ था। बसपा के साथ गठबंधन में शामिल अकाली दल को 18.38 फीसदी वोट मिले और वह सिर्फ 3 सीटें जीत सकी। उसे 12 सीटों का नुकसानहुआ है। गठबंधन ने 80 सीटों पर जीत का दावा किया था।
पंजाब में आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला है। उसने 117 में से 92 सीटें जीत ली है। उसे 72 सीटों का फायदा हुआ है।कांग्रेस को दलित मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के चेहरे को सामने रखकर चुनाव लड़ने के बावजूद सिर्फ 18 सीटें मिली है, उसे 59 सीटों का नुकसान हुआ है। जबकि उत्तराखंड की 70 सीटों मेंबहुजन समाज पार्टी दो सीटें जीती है। प्रदेश मेंबसपा का वोट शेयर 4.82 प्रतिशत रहा है।उसे कुल 2 लाख, 59 हजार, 371 वोट मिला है।
सन् 1984 में अपनी स्थापना के बाद से सबसे निराशाजनक दौर से गुजर रही बहुजन समाज पार्टी की इस हार की वजह को लेकर तमाम समीक्षाएं हो रही है। नतीजों के दूसरे दिन जिस तरह बहनजी ने सामने आकर मुस्लिमों से लेकर दलित समाज पर निशाना साधा लेकिन ब्राह्मणों को लेकर चुप्पी साधे रखीं, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं। जाने-माने लेखक कँवल भारती का कहना है, “एक समय था, जब कांशीराम से प्रभावित होकर बहुत से गैर-चमार जातियों के बुद्धिजीवी बसपा से जुड़े थे। इनमें पासी, खटिक, वाल्मिकी समुदाय के कई प्रदेश स्तर के महत्वपूर्ण नेता थे। कुछ को मायावती सरकार में मंत्री भी बनाया गया था। पर बसपा नेतृत्व ने उन सबको निकाल बाहर किया। ऐसा क्यों किया गया? इसके पीछे क्या कारण था? बसपा के भक्त प्रवक्ता इसका यही उत्तर देंगे कि वे पार्टी के खिलाफ काम कर रहे थे। चलो मान लिया, फिर उनकी जगह पर उन समुदायों में नया नेतृत्व क्यों नहीं तैयार किया गया? इसका वे कोई जवाब नहीं देंगे।”
बसपा की हार पर देश के प्रख्यात समाजशास्त्री और जेएनयू में सोशल साइंस विभाग के अध्यक्ष प्रो. विवेक कुमार बसपा की कार्यशैली की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, “भारतीय राजनीति (perception) धारणा का खेल बन गया है, जिसने परसेप्शन बना लिया, रोड शो, इवेंट मैनेजर्स, मीडिया, सोशल मीडिया, तथाकतिथ बुद्धिजीवियों के माध्यम से वह आगे निकल गई। हर बात पर नेता और पार्टी का बाईट/इंटरव्यू जरुरी हो गया है। शोषितों की आवाज़ उन्ही के दरवाज़े से बुलंद करनी होती है।”
चाहे बसपा हो या फिर समाजवादी पार्टी, वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उनके राजनीति करने के तरीके पर ही सवाल उठाते हैं। उर्मिलेश कहते हैं, “जिन दिनों अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हुए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने फरसा लहराते हुए एक खास मंदिर के निर्माण का अभियान चलाया, एक कार्यक्रम में मैने तब कहा था कि ‘यह क्या, अखिलेश यादव हारने के लिए चुनाव लड़ रहे है!’ मेरी उस टिप्पणी पर बहुतेरे लोग नाराज हुए थे। परंतु मुझे अचरज हुआ था कि अखिलेश जी जरूरी मुद्दों को छोड़कर यह सब क्या कर रहे हैं! कुछ ही समय बाद वह समाज और अवाम के जरूरी मुद्दों पर बात करने लगे। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पौने पांच साल की ‘लंबी छुट्टी’ के बाद सिर्फ ‘तीन महीने की सीमित सक्रियता’ से भला पांच साल के लिए कोई नयी सरकार कैसे बनती?
दूसरी ओर विपक्ष की तमाम गोलबंदी के बीच भाजपा की इस जीत और आम जनता के वोट देने के तरीके पर भी चर्चा हो रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर आशुतोष कुमार का कहना है, “बिहार और यूपी के नतीजों के बाद कम से कम एक बात अंतिम रूप से साबित हो गई है। सामाजिक न्याय की अस्मितावादी राजनीति के सहारे हिन्दू राष्ट्रवाद का मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। हिन्दू राष्ट्र की अस्मिता ने सामाजिक अस्मिताओं को न केवल अच्छी तरह जज़्ब कर लिया है, बल्कि उन्हें ही अपनी ताक़त बना चुकी है। इस कारण मंडल बनाम कमंडल का फार्मूला बेमानी हो चुका है।”
बसपा का चुनाव दर चुनाव प्रदर्शन
साल
1993
1996
2002
2007
2012
2017
2022
वोट प्रतिशत
11.12
19.64
23.06
30.43
25.98
22.24
12.88
सीटें
67
67
98
206
80
19
01
लेकिन यहां सवाल यह भी है कि उत्तर प्रदेश का विपक्ष, जिसमें समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी प्रमुख रही, आखिर उसने यह कैसे मान लिया कि वह आराम से जीत जाएगी। दिलीप मंडल ने अपने एक लेख में लिखा है कि समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस को इस बात का भरोसा रहा कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार अपने कार्यकाल की गलतियों और लोगों की नाराज़गी के बोझ से गिर जाएगी और सत्ता उनके पास आ जाएगी। लेकिन एंटी-इनकंबेंसी यानी सत्तारूढ़ दल से नाराज़गी किसी सरकार को गिराने के लिए हमेशा काफी नहीं होती है। विपक्ष को ये भी बताना होता है कि वह सत्ता में आने के बाद क्या करने वाली है। उसे जनता को सपने दिखाने पड़ते हैं।
तो सवाल है कि क्या विपक्षी दल खासकर बसपा और समाजवादी पार्टी जनता को सपने दिखाने में नाकामयाब रही? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ें तो अखिलेश यादव ने जनता को सपने दिखाए, उन्होंने वादे भी किये, लेकिन काफी देर से। भाजपा के 24X7चुनावी मोड में रहने का मुकाबला निश्चित तौर पर कुछ महीनों की सक्रियता से नहीं की जा सकती। भाजपा कई मोर्चों पर एक साथ लड़ रही थी, जबकि विपक्षी दल ऐसा करने से चूक गए। खासतौर पर बहुजन समाज पार्टी का चुनावी प्रचार महज औपचारिकता भर रहा। कोरोना के कारण यह चुनाव डिजिटल लड़ा गया और इस मायने में बसपा की तैयारी बहुत खराब दिखी। बसपा के पास अपना फेसबुक पेज तक नहीं था। बहनजी ने अब तक की सबसे कम रैलियां की। आकाश आनंद, जिनको बसपा ने युवा चेहरे के तौर पर प्रस्तुत किया, उनको पूरे चुनाव में कभी भी चुनाव प्रचार में नहीं उतारा गया। मंच से बहनजी ने अपना कोई खास विजन पेश नहीं किया। समाज के सामने अपना रोडमैप नहीं रखा, जिसका फर्क भी पड़ा। तो वहीं सोशल मीडिया पर भी बसपा का चुनाव प्रचार काफी ढ़ीला रहा। बसपा 2022 का चुनाव 2007 के स्टाइल में ही लड़ रही थी। बसपा ने खुद को न समय के हिसाब से अपडेट किया है और न ऐसा करने की कोशिश करती दिखती है।
चुनावी नतीजे बताते हैं कि बसपा के वोट प्रतिशत में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज हुई है। 2017 में बसपा को मिले 22.24 प्रतिशत वोट से घटकर 2022 में बसपा 12.88 प्रतिशत तक पहुंच गई है। सवाल है कि बसपा का तकरीबन 10 प्रतिशत का वोट शेयर किसके पास गया? चुनाव के दौरान लोगों से बातचीत करते हुए या फिर जिस तरह से लोगों की प्रतिक्रिया आ रही थी, उसमें साफ महसूस हो रहा था कि दलितों का एक तबका बसपा से उदासीन है। उसमें शहरों में रहने वाला दलित वोटरों की संख्या ज्यादा थी, जो बसपा को जमकर लड़ते हुए देखना चाहते थे। वो दूसरे दलों के आक्रामक चुनाव प्रचार से प्रभावित थे, और उन्हें महसूस हो रहा था कि बसपा उस मजबूती से चुनाव नहीं लड़ रही है, जिस मजबूती से समाजवादी पार्टी या फिर भाजपा लड़ रही है। ऐसे में दलित समाज के जो वोटर सजग थे और भाजपा की साजिशों से परिचित थे, उन्होंने भाजपा को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी को चुना। हालांकि गाँवों की जाटव बस्तियों में आज भी बहनजी का जादू कायम दिखा। गरीब जनता के लिए आज भी मायावती उनकी नायिका हैं और उन्हीं के वोटों के बूते बसपा 10 फीसदी वोट हासिल कर पाई है।
लेकिन बसपा के लिए चिंता की बात यह है कि कल तक उसके पाले में खड़े लोग आखिर उससे दूर क्यों होते जा रहे हैं? चुनावी नतीजों के बाद दलित दस्तक को पाठकों की मिली तमाम प्रतिक्रियाओं में उसका जवाब ढूंढ़ा जा सकता है। मान्यवर कांशीराम के समय से ही बसपा के आंदोलन से जुड़े इस सरकारी कर्मी का कहना है, “बहनजी या तो बीमारी को पकड़ नहीं पा रही हैं, या फिर जानबूझ कर अनदेखा कर रही हैं। बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा की ओर इशारा करते हुए पाठक का कहना है कि कैंसर पेट में है और बहनजी हाथ-पैर काट कर फेंक रही हैं। पाठक इस बात पर नाराजगी जताता है कि बहनजी ने दलित-पिछड़े वर्ग के जनाधार वाले तमाम नेताओं को एक-एक कर पार्टी से निकाल दिया। अगर उनकी थोड़ी-बहुत गलती थी भी तो उन्हें फटकार लगाई जा सकती थी, धमकाया जा सकता था, लेकिन बहनजी ने उन्हें सफाई पेश करने तक का मौका नहीं दिया। वह सवाल उठाता है कि आप इतिहास को उठाकर देख लिजिए जितनी बेदर्दी से बहनजी अपने साथ काम करने वाले सालों पुराने नेताओं को एक झटके में पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा देती हैं, उतना किसी पार्टी ने अपने नेता को बाहर नहीं किया। बहनजी बहुजन से सर्वजन हो गईं ऐसे में उन्होंने बहुजनों को भी खो दिया है।
इस चुनाव में इसका बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश का अंबेडकरनगर जिला बना है। अंबेडकरनगर बहुजन समाज पार्टी का गढ़ रहा है। बसपा प्रमुख मायावती ने ही मुख्यमंत्री रहते सन् 1995 में इसे जिला बनाया था, और बाबासाहेब के नाम पर जिले का नाम अंबेडकर नगर रखा गया था। मायावती यहां से जीतकर लोकसभा में भी पहुंची थी। 2017 में भाजपा की आंधी के बावजूद बसपा के यहां से तीन विधायक जीते। इसमें मायावती के नजदीकी और बसपा के यूपी प्रदेश अध्यक्ष और बसपा सरकार में मंत्री रह चुके रामअचल राजभर ने अकबरपुर से जीत हासिल की। कटेहरी से बसपा के लालजी वर्मा जीते जबकि जलालपुर से रितेश पांडे ने जीत दर्ज की। लेकिन यूपी के पंचायत चुनाव के दौरान बसपा के एक नेता ने बहनजी का कान भर दिया और मायावती ने रामअचल राजभर और लालजी वर्मा को पार्टी से बाहर कर दिया। इन दोनों नेताओं की तमाम कोशिशों के बावजूद इनका पक्ष नहीं सुना गया। चुनाव से पहले ये दोनों समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए और नतीजा यह हुआ कि जिस अंबेडकरनगर में समाजवादी पार्टी का कोई वजूद नहीं था, वहां सभी पांचों सीटों पर समाजवादी पार्टी भारी मतों से जीती। इस तरह बसपा प्रमुख के एक फैसले ने बसपा के गढ़ को नेस्तनाबूत कर दिया।
चुनावी नतीजों के बाद बहुजनों, खासकर दलितों के बीच सोशल मीडिया पर आपसी संघर्ष छिड़ गया। नतीजों के बाद बसपा की कमियों पर बात करने वालों को बसपा के कार्यकर्ता और कोर समर्थक पचा नहीं पा रहे हैं। और उन्हें ही भला बुरा कह रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट की भरमार है, जिसमें सवाल उठाने वाले बहुजन पत्रकारों से लेकर बुद्धिजीवियों तक को गालियां मिल रही है। बसपा समर्थकों की ऐसी प्रतिक्रिया से लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे प्रो. कालीचरण स्नेही नाराज दिखते हैं। प्रो. स्नेही का कहना है, “बीएसपी इस देश के बहुजनों की एकमात्र राजनीतिक पार्टी है, इसे हर हाल में बचाए रखना बहुजनों की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है। इस समय जो लोग भी बीएसपी की हार पर अपना नजरिया प्रस्तुत कर रहे हैं, वे बीएसपी के हितचिंतक और समर्थक हैं, उनकी बात पर गौर करने की जरूरत है, उन्हें खारिज करने की नहीं। पार्टी को अब “सर्वजन हिताय” की जगह “बहुजन हिताय” के नारे के साथ अपने पुराने फार्मूले पर तुरंत लौटने की जरूरत है।
अब बड़ा सवाल यह है कि इस चुनावी नतीजे के बाद बसपा कहां खड़ी है और क्या अब भी उसकी राजनैतिक वापसी संभव है? सामाजिक कार्यकर्ता और दलितों के संगठन नैक्डोर के अध्यक्ष अशोक भारती कहते हैं, “बहुजन समाज पार्टी एक ऐतिहासिक जरूरत थी। 2007 में जब वो सत्ता में आ गई और उसने जो काम किये, उन कामों से उसने अपनी ऐतिहासिक जरूरत को पूरा कर लिया। बहुजन महापुरुषों को बसपा ने पहचान दी, उनको स्थापित किया। लेकिन वह पहचान की राजनीति से आगे नही बढ़ सकी। बसपा ने पूरे देश में दलितों की उम्मीदे तो जगाई लेकिन जब उन उम्मीदों को पूरा करने का वक्त आया तो बसपा आगे का रोडमैप नहीं बना सकी। तब तक बसपा के संस्थापक और नीति निर्माता मा. कांशीराम के परिनिर्वाण हो जाने से भी काफी नुकसान हुआ।
अशोक भारती कहते हैं कि बसपा समाज का रुपांतरण करने के लिए सत्ता में आई थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद वो सैद्धांतिक विचलन में फंस गई। उसने बहुजन का सर्वजन कर दिया। बसपा ने मिशन आउटसोर्स कर दिया। पार्टी की वापसी पर उनका कहना है कि पार्टी ऐसी स्थिति में पहुंच गई है, जहां से उसकी वापसी तब तक संभव नहीं दिखती, जब तक कोई बहुत बड़ा और क्रांतिकारी परिवर्तन न हो। बसपा को सतीश चंद्र मिश्रा पर भी बड़ा फैसला लेना पड़ेगा।
गौर करने लायक एक बात यह भी है कि बसपा से छिटके वोट आखिर किसे मिले। तमाम एजेंसियां इसकी अपनी तरह से व्याख्या कर रही हैं। लेकिन दलित बस्तियों में घूमने और दलित समाज के मतदाताओं से बात करने पर साफ पता चलता है कि वो वोट समाजवादी पार्टी को गए हैं। जो एजेंसियां भी यह भ्रम फैला रही हैं कि बसपा से छिटके वोट भाजपा को गए हैं, कहीं न कहीं वो 2024 के लिए भाजपा का एजेंडा सेट करने में लगे हैं। जो लोग बहुजन राजनीति और अंबेडकरी आंदोलन की समझ रखते हैं उनको पता है कि बसपा का कैडर वोट भाजपा में नहीं जा सकता। समाजवादी पार्टी का वोट प्रतिशत इस बार पर मुहर भी लगाता है। यानी दलितों का बसपा के नेताओं (बसपा से नहीं) और उसकी कार्यप्रणाली से जो मोहभंग हुआ है, उसमें उसने दूसरे विकल्प के रूप में समाजवादी पार्टी की ओर देखना शुरू कर दिया है।
संभवतः ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद जिस तरह बसपा ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन तोड़ा उससे अखिलेश यादव एक विक्टिम की तरह सामने आएं। बहनजी के गठबंधन तोड़ने को लोगों अवसरवादिता माना, क्योंकि बहुजन समाज इस गठबंधन के जरिए देश में बड़े बदलाव का सपना पाले हुए था। और जब अखिलेश यादव ने बसपा सुप्रीमों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला, तो यह समाजवादी पार्टी के पक्ष में गया।
बसपा अब उस स्थिति में पहुंच गई है, जहां उसके पास खोने को कुछ नहीं है। क्योंकि वह कुछ फीसदी वोटों के अलावा सबकुछ खो चुकी है। ऐसे में वापसी के लिए भी बसपा के पास आखिरी मौका है। जिसके लिए उसे नब्बे के दशक की राजनीति से निकल कर वर्तमान समय की राजनीति करनी होगी। जिसमें मंच पर नेताओं का हुजूम होना चाहिए, पार्टी के पास दर्जनों चेहरे होने चाहिए। उनको खुल कर बोलने की आजादी होनी चाहिए। जनता के मुद्दों पर सड़क पर उतरना होगा। देश से जुड़े हर मसले पर अपनी प्रतिक्रिया देनी होगी। युवाओं और महिलाओं के साथ ही हर वर्ग का सेल बनाना होगा। उसमें हर वर्ग के युवाओं को कमान देनी होगी और बहुजन विचारधारा पर अडिग होकर आक्रामक होकर काम करना होगा। दलित, पिछड़े, मुस्लिम समाज के सक्षण नेताओं और कार्यकर्ताओं हुजूम ही बसपा को बचा सकता है। बसपा अब भी खड़ी हो सकती है, क्योंकि लोगों की नाराजगी बसपा के नेताओं और उसके काम करने के तरीके को लेकर है, बहुजन समाज पार्टी को बहुजन समाज आज भी उतना ही समर्थन और प्यार करता है।
सात साल पहले 2015 की यूपीएससी परीक्षा में टॉप कर चर्चा में आई चर्चित आईएएस अधिकारी टीना डाबी फिर से सुर्खियों में हैं। वजह यह है कि टीना डाबी दुबारा शादी करने जा रही हैं। टीना डाबी ने खुद अपने इंस्टाग्राम पर इसका खुलासा किया है। इससे पहले साल 2018 में टीना डाबी ने यूपीएससी परीक्षा में दूसरे रैंक पर रहे आईएएस अतहर खान से शादी की थी। हालांकि दो साल बाद 2020 में दोनों ने आपसी सहमति से तलाक ले लिया था। टीना डाबी से तलाक के बाद अतहर खान जम्मू कश्मीर कैडर लेकर अपने राज्य चले गए थे।
इस बीच दो सालों तक अकेले रहने के बाद टीना डाबी की जिंदगी में एक नया शख्स आ गया है। और टीना डाबी ने उन्हें अपना फियांसे बताया है। टीना डाबी की जिंदगी में आए इस नए शख्स का नाम है- प्रदीप गवांडे।
टीना डाबी की ये तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी है, लोग उन्हें नई जिंदगी की शुरुआत के लिए शुभकामनाएं दे रहें हैं। वहीं दूसरी तरफ लोग उनके मंगेतर के बारे में जानने के लिए काफी उत्साहित हैं। तो हम आपको बताते हैं कि कौन हैं प्रदीप गवांडे।
प्रदीप गवांडे साल 2013 बैच के IAS अफसर हैं। प्रदीप फिलहाल राजस्थान आर्कियोलॉजी एण्ड म्यूजियम डिपार्टमेंट में डायरेक्टर हैं। प्रदीप का जन्म 9 दिसंबर 1980 को हुआ था और वह टीना से उम्र में 13 साल बड़े हैं। प्रदीप और टीना डाबी दोनों की यह दूसरी शादी है।
प्रदीप ने नासिक के सरकारी मेडिकल कॉलेज से MBBS किया है। बाद में उन्होंने यूपीएससी एग्जाम क्रैक कर लिया। ट्रेनिंग के बाद उन्हें राजस्थान कैडर मिला। एबीपी न्यूज की खबर के मुताबिक प्रदीप गवांडे करीब 7 महीने पहले राजस्थान कौशल एवं आजीविका विकास निगम के मुख्य प्रबंधक थे। उस वक्त रिश्वत मामले वे जांच के दायरे में थे। उन्हें एसीबी की टीम ने 5 लाख रुपए के रिश्वत मामले में गिरफ्तार किया था।
टीना डाबी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती है और उनकी दूसरी शादी की खबर ने सोशल मीडिया पर बवाल मचा रखा है। टीना डॉबी के फालोअर्स की ओर उनकी शादी पर मिली जुली प्रतिक्रिया आ रही है। कुछ फैंस टीना डॉबी के इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं, जबकि कई फैंस ऐसे भी हैं, जो उनके नए दूल्हे के लुक्स, उनके ज्यादा उम्र के होने और रिश्वत के मामले में नाम आने से खुश नजर नहीं आ रहे हैं।
हाल के दिनों में कांग्रेस शासित राजस्थान में दलितों के उपर अत्याचार की घटनाओं में अत्याधिक वृद्धि देखी गई है। गत 15 मार्च को ही पाली जिले में स्वास्थ्यकर्मी रहे जितेंद्र मेघवाल की हत्या उनके ही गांव के दबंगों ने केवल इसलिए कर दी थी, क्योंकि दबंगों को जितेंद्र का अच्छे से रहना-सहना पसंद नहीं था। दलितों के खिलाफ अत्याचार का मामला राजस्थान में किस कदर बढ़ रहा है, इसकी ओर बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने आवाज उठाई है। उन्होंने भारत सरकार से राजस्थान में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है।
ट्वीटर पर जारी अपने संदेश में उन्होंने कहा है कि “राजस्थान कांग्रेस सरकार में दलितों व आदिवासियों पर अत्याचार की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। हाल ही में डीडवाना व धोलपुर में दलित युवतियों के साथ बलात्कार व अलवर में दलित युवक की ट्रैक्टर से कुचलकर हत्या व जोधपुर के पाली में दलित युवक की हत्या ने दलित समाज को झकझोर दिया है।”
आगे उन्होंने कहा कि “इससे यह स्पष्ट है कि राजस्थान में खासकर दलितों व आदिवासियों की सुरक्षा करने में वहां की कांग्रेसी सरकार पूरी तरह से विफल रही है। अतः यह उचित होगा कि इस सरकार को बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जाए।”
बहरहाल, राजस्थान में दलितों के खिलाफ अत्याचार की बढ़ती घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि राजस्थान सरकार में सामंती ताकतों के मंसूबे कितने बढ़े हैं। इस संबंध में बसपा प्रमुख मायावती ने स्पष्ट कहा है कि यह केवल इस कारण से हो रहा है क्योंकि एक तरफ तो राजस्थान की गहलोत सरकार दलितों की रक्षा करने में नाकाम है और दूसरी तरफ वह कार्रवाई न कर सामंती ताकतों का मनोबल बढ़ा रही है।
कहते है हिम्मत और हौसला बुलंद हो तो हर मुकाम हासिल किया जा सकता है। कुछ ऐसी ही कहानी है बहुजन नौजवान सतेंद्र सिंह की। मध्य प्रदेश के ग्वालियर के सतेंद्र सिंह लोहिया ने 21वीं राष्ट्रीय पैरा तैराकी चैंपियनशिप में 100 मीटर बैक स्ट्रोक प्रतिस्पर्धा में मध्यप्रदेश के लिए रजत पदक हासिल किया। यह प्रतियोगिता बीते 24 मार्च से 27 मार्च तक आयोजित हुई, जिसमें देश के 25 राज्यों के लगभग 400 तैराकों ने भाग लिया।
रजत पदक जीत सतेंद्र सिंह लोहिया लाखों दिव्यांगो के प्रेरणास्रोत बन गए हैं। इनके संघर्ष की कहानी किसी को भी रोमांचित कर देने की क्षमता रखती है। करीब 34 वर्षीय सतेंद्र सिंह लोहिया का जन्म ग्वालियर वेसली नदी के किनारे एक गाता गाँव जिला भिंड में हुआ। बचपन में वे दोनों पैरों से बामुश्किल चल पाते थे। स्कूल ख़त्म होने के बाद घंटो तक वेसली नदी में तैरते रहते। गाँव वाले उनकी दिव्यांगता पर ताने मारते थे, लेकिन निराश होने के बजाय उन्होंने निश्चय किया कि वह दिव्यांगता को कभी अपने राह का रोड़ा नहीं बनने नहीं देंगे।
धुन के पक्के सतेंद्र ने ऐसा ही किया। सन् 2007 में डॉ. वी. के. डबास के संपर्क में आए तो उन्होंने सतेंद्र सिंह लोहिया को पैरा तैराकी के लिए प्रेरित किया। इसने सतेंद्र के जीवन को नई दिशा मिली। फिर वर्ष 2009 में कोलकाता में आयोजित राष्ट्रीय पैरालंपिक स्विमिंग चैंपियनशिप में पहली बार उन्होंने कांस्य पदक जीता। इस जीत ने उन्हें इतना अधिक प्रोत्साहित किया कि वह राष्ट्रीय पैरालम्पिक में एक के बाद एक 24 स्वर्ण पदक जीते। उन्होंने जून 2018 में अपनी पैरा रिले टीम के माध्यम से इंग्लिश चैनल को तैरकर पार किया।
इतना ही नहीं, उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैरालंपकि तैराकी चैंपियनशिप में एक स्वर्ण पदक के साथ तीन पदक हासिल किये। उनकी बेहतरीन उपलब्धि के लिए वर्ष 2014 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें विक्रम अवार्ड से नवाज़ा। इसके अलावा वर्ष 2019 में सतेंद्र को विश्व दिव्यांगता दिवस के अवसर पर को सर्वश्रेष्ठ दिव्यांग खिलाड़ी के पुरुस्कार से उपराष्ट्रपति ने सम्मानित किया। फिर आया साल 2020 जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सतेंद्र को तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार प्रदान किया।
बताते चलें कि यह पुरस्कार पहली बार किसी दिव्यांग पैरा तैराक खिलाडी को दिया गया। सतेंद्र सिंह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सराहा है। वर्तमान में वे इंदौर में कमर्शियल टैक्स विभाग में कार्यरत हैं।
प्रसिद्ध दलित चिंतक व लेखक कंवल भारती ने भाजपा के एससी, एसटी और ओबीसी विधायकों, सांसदों और मंत्रियों से सवाल पूछा है। उनका सवाल है कि उनके रहते जब सरकारी नौकरियों में भागीदारी खत्म की जा रही है तो वे किस काम के हैं।
दरअसल, यह सवाल कंवल भारती ने अकारण नहीं पूछा है। जिस तरीके से केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर संविधा के आधार पर बहालियां की जा रही हैं तथा निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसके कारण आरक्षित वर्गों का हित प्रभावित हो रहा है।
इसी के मद्देनजर कंवल भारती ने अपना आक्रोश व्यक्त किया है। अपने फेसबुक पर उन्होंने टिप्पणी की है कि “क्या भाजपा के एससी, एसटी और ओबीसी विधायकों, सांसदों और मंत्रियों की अपने समुदाय के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या वे बस अपने ही उत्थान और भोग-विलास के लिए सत्ता में आए हैं? अगर उनके रहते नौकरियों में उनकी भागीदारी खत्म की जा रही है, उन पर अत्याचार किए जा रहे हैं, उनके विकास को रोका जा रहा है, तो मतलब साफ़ है, कि उन्हें उनके समाज की बर्बादी की क़ीमत पर सत्ता-सुख दिया गया है।”
कंवल भारती ने अपनी चिंता दलितों के खिलाफ बढ़ते अत्याचार की घटनाआं को लेकर भी व्यक्त की है। बीते 15 मार्च को राजस्थान के पाली जिले में जितेंद्र मेघवाल की हत्या का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा है कि “मूंछें रखने पर किसी दलित की हत्या का क्या मतलब है? वही जो डा. आंबेडकर ने कहा था कि भारत के गाँव गणतांत्रिक नहीं हैं, वे दलितों के लिए घेटो हैं. घेटो यहूदियों को यातनाएं देने के लिए ईसाईयों ने बनाए थे. जिनमें लाखों यहूदियों को यातनाएं देकर इसलिए मार दिया गया था, क्योंकि वे ईसाईयों के साथ मिश्रित होकर रहना नहीं चाहते थे. लेकिन भारत में सवर्णों ने लाखों दलितों को इसलिए मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि वे सवर्णों के साथ समान स्तर पर मिश्रित होकर रहना चाहते हैं. इसका क्या अर्थ है? क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि दलित हिंदू नहीं हैं? राष्ट्रवादी हरामखोरों क्यों कहते हो कि हम राष्ट्रवादी बनें? क्या यही तुम्हारा राष्ट्रवाद है? क्या ऐसा ही होगा हिंदू राष्ट्र?”
हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में सेना में भर्ती का मुद्दा जोर-शोर से उठाया गया। अब एक बार फिर बहुजन समाज पार्टी प्रमुख बहन मायावती ने केंद्र सरकार से इस दिशा में जल्द ही ठोस कदम उठाने की मांग की है।
बताते चलें कि वर्ष 2020 से सेना में नये रंगरूटों की भर्ती पर सरकार ने रोक लगा रखी है। इसके कारण यूपी और बिहार जैसे प्रदेशों के हजारों नौजवानों का भविष्य दांव पर लगा है। उनकी समस्या यह है कि उम्र संबंधी शर्तों के कारण वे बिना परीक्षा दिए ही अयोग्य होते जा रहे हैं।
ट्वीटर पर जारी अपने संदेश में बसपा प्रमुख ने सोमवार को यह मामला उठाया। अपने संदेश में उन्होंने कहा कि “कोरोना के कारण सेना में भर्ती रैलियों के आयोजन पर पिछले दो साल से लगी हुई रोक अभी आगे लगातार जारी रहेगी। संसद में दी गई यह जानकारी निश्चय ही देश के नौजवानों, बेरोजगार परिवारों व खासकर सेना में भर्ती का जज़्बा रखने वाले परिश्रमी युवाओं के लिए अच्छी ख़बर नहीं है।”
दरअसल, यह बात केंद्रीय रक्षा मंत्रालय के द्वारा संसद में दिये गए एक जवाब के बाद साफ हो गई है कि अभी भी केंद्र सरकार की मंशा सेना रूकी पड़ी भर्तियों को शुरू करने की नहीं है। इसके आलोक में बसपा प्रमुख मायावती ने कहा है कि “मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इसको लेकर सैन्य अफसर भी चिन्तित हैं, क्योंकि उनके अनुसार इस आर्मी रिक्रूटमेन्ट रैलियों पर अनवरत पाबन्दी का बुरा प्रभाव सेना की तैयारियों पर नीचे तक पड़ेगा। अब जबकि कोरोना के हालात नार्मल हैं, केन्द्र सरकार दोनों पहलुओं पर यथासमय पुनर्विचार करे।”
बहरहाल, अभी भी यह मामला साफ नहीं किया जा रहा है कि भारत सरकार सेना में जवानों की भर्ती क्यों नहीं करना चाह रही है। जबकि देश के लगभग सभी सरकारी विभागों में कामकाज सामान्य तरीके से चल रहा है। यहां तक कि शादी-विवाह जैसे आयोजनों में भी संख्या संबंधी प्रतिबंध हटा लिए गए हैं।
सिनेमा जगत में भी दलित-बहुजन से जुड़े विषयों को प्रमुखता से दिखाया जाने लगा है। रजनीकांत की फिल्म ‘काला’ और सुपरहिट रही फिल्म ‘जय भीम’ के बाद एक और फिल्म ने सफलता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। आदिवासी नायकों को जबरदस्त तरीके से प्रदर्शित करनेवाली इस फिल्म का नाम है ‘आरआरआर’ और इसके निर्देशक हैं एस एस राजमौली।
इस फिल्म ने कश्मीरी ब्राह्मणों के प्रोपगेंडा पर आधारित विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ को भी पीछे छोड़ दिया है। इसकी सफलता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि ‘आरआरआर’ ने दो दिनों में ही साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए का कारोबार किया है। यह 2डी, 3डी; दोनों रूपों में उपलब्ध है।
फिल्म के बारे में युवा सामाजिक कार्यकर्ता राजन कुमार लिखते हैं कि “इस फिल्म में जल जंगल जमीन और मावा नाटे मावा राज (हमारी जमीन पर हमारी सरकार) का नारा देने वाले और आदिवासियों को एकजुट कर अंग्रेजों तथा हैदराबाद निजाम के विरुद्ध आंदोलन छेड़ने वाले क्रांतिकारी आदिवासी योद्धा कुमराम भीम और मनयम में आदिवासियों को एकजुट कर बगावत का बिगुल फूंकने वाले मनयम के नायक अल्लूरी सीताराम राजू के दोस्ती की कहानी गढ़कर अंग्रेजी शासन से जबरदस्त संग्राम को दिखाया गया है।”
राजन के मुताबिक, “हालांकि वास्तविक रूप से दोनों दोस्त नहीं थे, लेकिन दोनों समकालीन थे, और दोनों ने आदिवासियों को एकजुट कर अंग्रेजों और हैदराबाद निजाम के विरुद्ध संग्राम किया। फिल्म की कहानी वास्तविक कहानी से पूर्णतः अलग है, लेकिन आदिवासियों के बीच जिस तरह कुमराम भीम और अल्लूरी सीताराम राजू समझे और पूजे जाते हैं, उसको ध्यान में रखकर ईश्वरीय रूप देने के लिहाज से फिल्म बनाने की कोशिश की गई है।
इस फिल्म में जबरदस्त एक्शन है, यह दर्शकों को बांधे रखती है, फिल्म की कहानी भी जबरदस्त है, हालांकि अंत में अल्लूरी सीताराम राजू को राम के रूप में लड़ते हुए दिखाया गया है, जो थोड़ा अजीब सा लगता है। एक तरह से आदिवासियों को राम से जोड़ने का प्रयास भी किया गया है।
यह फिल्म भारत में अंग्रेजी हुकूमत के सर्वोच्च अधिकारी द्वारा एक गोंड आदिवासी छोटी बच्ची को जबरन उठा लेने, उसे कैदी की तरह रखकर अपनी सेवा करवाने उसके उत्पीड़न से शुरू होती है, जो फिल्म के नायक कुमराम भीम से परिचय कराती है, जो उस छोटी बच्ची को वापस लाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत से टकराता है। एक दूसरी कहानी अल्लूरी सीताराम राजू के गांव से जुड़ी है, जहां उसका पूरा परिवार मारा जाता है, और बदले की आग में जलता हुआ वह अपने गांव के लोगों के लिए अधिक से अधिक हथियार जुटाने की फिराक में अंग्रेजी सेना के सर्वोच्च रैंक तक पहुंचता है।
फिर कुमराम भीम और अल्लूरी सीताराम राजू के बीच दोस्ती और संघर्ष भी होता है, और अंत में दोनों के बीच फिर से दोस्ती और अपने लोगों के लिए मिलकर संघर्ष। जिसके बाद अंग्रेजी सत्ता को जबरदस्त मात मिलती है।
निस्संदेह यह ऐसी पहली फिल्म है जो किसी आदिवासी महानायक को इतने गौरवपूर्ण ढंग से पर्दे पर दिखाया है।”
‘जारी रहेगा प्रतिरोध’ नरेन्द्र वाल्मीकि की प्रथम काव्य-संग्रह है। जिसका प्रकाशन अभी हाल ही में 2021 में हुआ है। इस काव्य-संग्रह को इन्होंने ओमप्रकाश वाल्मीकि को समर्पित किया है। यह कविता संग्रह दलितों के जीवन की पीड़ाओं एवं वेदना को केंद्र में रखकर लिखी गई है। इस कविता-संग्रह में जहाँ एक तरफ इन्होंने दलितों के साथ सदियों से किये गये अत्याचार एवं शोषण का वर्णन किया है, वहीं दूसरी ओर सदियों से स्थापित कुव्यवस्था एवं परम्परा के विरूद्ध आक्रोश का स्वर भी विद्यमान है। तथाकथित सवर्ण समाज मात्र अस्पृश्यता को ना अपनाकर वे दावा करते हों कि वे वर्णव्यवस्था का समर्थन नहीं करते हैं। किन्तु यह एक भ्रामक तथ्य है, जिसमें ना केवल वे उलझे हैं , बल्कि दलित भी उसी भ्रमपूर्ण विश्वास में उलझे हुए हैं। दलित और सवर्ण का एक साथ उठना-बैठना, खाना-पीना अस्पृश्यता के अंत की ओर एक अच्छी पहल हो सकती है। लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता कि जातिगत भेद-भाव की समाप्ति हो चुकी है। वर्तमान समय में वैचारिक असमानता का अंत करने की आवश्यकता है , जिसका अंत शिक्षित समाज भी अभी तक नहीं कर पाया है। कवि ने इस विषय को भी केन्द्र में रखकर लिखा है। इन्होंने दलितों की सदियों से पोषित मानसिकता के विरूद्ध भी लिखा है। एक तरफ भारत देश ने जहाँ आधुनिक एवं वैज्ञानिक प्रगति चरम पर है किन्तु आज भी देश के विशेष वर्ग के लोगों का सीवरों में प्रवेश करना, देश के वैज्ञानिक प्रगति पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। इस काव्य-संग्रह में नरेन्द्र वाल्मीकि ने इन विषयों पर अपने विचार प्रदान किये हैं। “ जहाँ ना पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि” – एक कवि के संदर्भ में यह कथन से हम सभी परिचित हैं। कवि के संदर्भ में यह बातें यूं ही नहीं कही गई। वाकय में एक कवि की नजर वहाँ तक पहुँचती है , जिसका अनुभव अन्य व्यक्ति को होना असम्भव है। अपनी कविता ‘खोखली बातें’ में कवि ने इस कथन को चरितार्थ किया है। इस कविता में भारत देश की यथार्थता की उस छवि को प्रकट किया है , जिससे भारत के आधुनिकता एवं विकास पर एक प्रश्नचिन्ह लग जाता है। “आधुनिकता केवैज्ञानिकता के नाम पर मंगलपर जाने वालों। अभी भी देश के नागरिक अपने उदर के ‘मंगल’ के लिए उतरते हैं गंदे नालों में”उपर्युक्त पंक्ति पढ़ने के बाद हम यह सोचने के लिये विवश हो जाते हैं कि जहाँ भारत ने मंगल तक पहुँचने में सफल हो चुका है। किन्तु हमने यह कैसी वैज्ञानिक प्रगति हासिल की है कि इस आधुनिक युग में भी हमने उन आधुनिक उपकरणों का विकास नहीं किया कि सफाईकर्मी सफाई के लिए सीवर में उतरने से बच जायें। अपने पेट के भूख की विवशता के कारण वे उन गंदे नालों में उतरने से मना भी नहीं कर सकते हैं और उनकी यही विवशता का लाभ उठाया जाता रहा है। सफाईकर्मियों की इस वाध्यता ने भारत के आधुनिकता और वैज्ञानिकता पर सवालिया निशान लगाने का कार्य किया है। कवि के हृदय की आशा और विश्वास ने भावी समाज के विकास में हमेशा से महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ‘अब और नहीं’ कविता में कवि ने अपने इसी आशा और विश्वास का संचार किया है। जहाँ कवि ने यह आशा अभिव्यक्त की है कि अगर हमने सामाजिक बुराईयों का प्रतिरोध किया तो आने वाली पीढ़ी को हम ऐसा संसार दे सकते हैं , जिसमें जाति और धर्म के नाम पर उनके साथ असमानपूर्ण भेदभाव नहीं किया जाएगा। समाज के भविष्य के प्रति आशान्वित कवि को इस बात का भान है कि समाज में वह जिस समानतापूर्ण समाज का स्वपन उसने देखा है। वह परिवर्तन लाना इतना आसान नहीं है , इसके लिए शोषित समाज को विरोधी स्वर अपना पड़ेगा। वे अमानवीय काम जा आज तक वे करते आये हैं, जिन बंधनों में वे बंधे हैं। उन्हें तोड़ने की आवश्यकता है। अत: कवि ने लिखा है – “तोड़ डालो सारे बंधन जो- बनते हैं बाधक तुम्हारी तरक्की के मार्ग में।” ‘बस्स ! बहुत हो चुका’ कविता में कवि ने शोषक वर्ग को इस बात से आगाह किया है कि जहाँ हमारी हाथों में इतनी ताकत है कि हम धरती का सीना चीरकर पूरे भारत का पेट पालने का सामर्थ्य रखते हैं। तो इस बात के प्रति किसी प्रकार का संदेह नहीं किया जा सकता है कि अपने अधिकारों के लिए हमारे ये हाथ उस व्यवस्था को भी उखाड़ देंगी, जिसने तुम्हें स्थापित किया है। व्यक्ति ही नहीं, किसी भी देश, समाज, समुदाय के शिक्षा ही वह कड़ी है जो ना केवल अज्ञानता के अंधकार का अंत करती है बल्कि शोषण, अत्याचार से भी मुक्ति प्रदान करने का कार्य करती है। यही कारण है कि बाबा साहब डॉ. आंबेडकर ने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा था। ‘जारी रहेगा प्रतिरोध’ कवि ने शिक्षा की इस ताकत की यथार्थता को अभिव्यक्त करते हुए लिखा है कि चूंकि अब उनके हाथों में कलम की ताकत है। जिससे वे उन सड़ी-गली व्यवस्थाओं के बारे में लिखेंगे, जिनसे समाज के दो-मुंहे सच को उजागर किया जा सके। वर्णवाद राष्ट्रवाद के नाम पर उनके साथ जो अत्याचार किये गये हैं , उनकी कलम उन असहाय और विवश लोगों के दर्द और पीड़ाओं का बखान करेंगी। तत्कालीन समय में किसान की समस्या से कोई भी व्यक्ति अपरिचित नहीं है। कवि का हृदय भी अन्नदाताओं की पुकार को अनसूना करने से दुखी है। ‘हल ही हल है’ कविता में कवि ने लिखा है कि जीवन के लिए जितना उपयोगी जल है , हल भी हमारे लिए उतना ही उपयोगी है।यही कारण है कि ‘हल’ और ‘जल’ को एक-दूसरे के समानार्थी करते हुए कवि ने लिखा है – “हल के बिना जल किसी काम का नहीं है। ये शाश्वत सत्य अटल है….हल ही हल है।”किसी भी समाज का विकास शिक्षा के अभाव में असम्भव है। शिक्षा ना केवल अज्ञानता बल्कि संकीर्ण विचारधारा, अंधविश्वास आदि कुरीतियों से भी हमें मुक्त करने का कार्य करती है। किन्तु भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था इस तरह हावी है कि शिक्षा के सबसे ऊँचे पायदान पर विराजमान शिक्षक भी जातिगत विचारधारा से अछूता नहीं है। ‘योग्यता पर भारी जाति’ कविता में कवि ने हमारे समाज के इसी कटुपूर्ण यथार्थता को अभिव्यक्त किया है कि व्यक्ति की योग्यता का मूल्यांकन उसके ज्ञान से नहीं बल्कि उसकी जाति से किया जाता है। एक दलित आज भी इस भेद-भाव के शिकार हो रहे हैं। किन्तु एक विचारपूर्ण तथ्य है कि आधुनिक एवं वैज्ञानिक युग में समाज में ऊँच-नीच के भेद-भाव के अस्तित्व अगर आज भी अपना स्थान बनाये हुए हैं , तो इसके लिए केवल तथाकथित सवर्ण समाज उत्तरदायी नहीं है। कोई भी व्यक्ति तभी श्रेष्ठ है जब अन्य व्यक्ति ने स्वंय को उससे कमतर समझा हो। दलित समाज शिक्षा प्राप्त करने में सफल तो हो रही है। किन्तु यह दुखद है कि भारतीय संस्कृति के संवाहकों ने दलित समाज में जिस हीनताबोध का रोपने का कार्य किया है , उस हीनताबोध से दलितों ने अभी तक स्वंय को मुक्त नहीं किया है। अत: समाज में ऊँच-नीच के भेद-भाव के अस्तित्व को कायम रखने में दलित समाज भी उतना ही उत्तरदायी है कि जितना कि सवर्ण समाज। ‘उनका श्रेष्ठत्व’ कविता में कवि ने इस तथ्य को ही अभिव्यक्त किया है।हिन्दी साहित्य में जब से आधुनिक दलित साहित्य का उद्भव हुआ है, दलित साहित्य को नकारने का उपक्रम भी साथ-साथ ही चल रहा है। जिसके लिए दलित साहित्य पर कई तरह के आरोप लगाये जाते रहे हैं। जिनमें एक आरोप दलित साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र पर भी लगाया गया। ‘कैसी कविता लिखेगा’ में कवि ने इसी संदर्भ में अपने विचार को अभिव्यक्त करते हुए लिखा है कि एक विशेष जाति में मात्र जन्म लेने के कारण जिस व्यक्ति के सभी अधिकार छीन लिये गये हों, वह कदम-कदम पर अपमानित हुआ हो , तो उसके हाथ में कलम आने पर स्वभाविक है कि वह अपने भोगे हुए यथार्थ, अपमान एवं शोषण की गाथा ही लिखेगा।इस प्रकार देखें तो कवि नरेन्द्र वाल्मीकि ने अपने प्रथम काव्य संग्रह में शोषित वर्ग की सभी समस्याओं एवं पीड़ाओं का वर्णन किया है। साथ ही एक कवि के कर्तव्य का सफल निर्वहन करते हुए इन्होंने शोषित समाज में अत्याचार एवं शोषण के विरूद्ध आवाज उठाने के लिए भी प्रेरित किया है। सच्चा मार्गदर्शक वही होते हैं जो अमुख को उसकी कमी से भी अवगत कराये। कवि ने यह कार्य भी सफलतापूर्वक किया है। आरम्भ से ही कवियों ने अपने सकारात्मक संदेशों के माध्यम समाज में सकारात्मक परिवर्तन लानेका महत्वपूर्ण कार्य किया है।‘अंबेडकर’ कविता में इन्होंने अंबेडकर को एक परिधि में ना बाँधने का संदेश दिया है। वे लिखते हैं- “अंबेडकर को एक परिधि में मत बांधोउड़ने दो उसे समस्त मानव जन के लिए।” किन्तु कवि को अपने विचारों के आयाम को और भी विस्तार लाने की आवश्यकता है। जिस प्रकार इन्होंने तत्कालीन घटनाओं पर अपनी पैनी नजर रखते हुए इन्होंने हाथरस, शालीन बाग, किसान-आंदोलन , एक दलित शोध छात्र की समस्याओं को अपनी कविता का विषय बनाया है। उसी प्रकार जब इन्होंने दलित स्त्री के साथ किये गये अत्याचारों का वर्णन किया है। तब वे अपने विचारों में परिवर्तन लाये। समाज के अत्याचारों एवं शोषण से पीड़ित दलित स्त्री की छवि आंकने के बजाय आवश्यक है कि दलित स्त्री के हाथों में आंदोलन की मशाल को थमाया जाय , उनके हाथों में हथियारस्वरुप संविधान हो। अब दलित कवियों के लिए यह आवश्यक है कि दलित स्त्रियों के समस्याओं को वर्तमान समय के संदर्भ में देखें। दलित रचनाकार दलित स्त्रियों के संदर्भ में कहा करते हैं कि दलित स्त्रियों का दोहरा शोषण किया जाता है। किन्तु तात्कालिक समय में देखें तो दलित स्त्रियों के शोषण का दायरा अब बढ़ चुका है। अत: कवि को शोषण के उस बढ़े हुए दायरे पर भी अपने विचार अभिप्रकट करने की आवश्यकता है। दलित स्त्रियाँ शिक्षित हैं , उनका पदार्पण अब कार्यालयों, विश्वविद्यालयों आदि बड़े-बड़े स्थानों में हो चुका है। दलित मध्यवर्गीय समाज, जिन्होंने तथाकथित सवर्ण समाज का अनुसरण करना प्रारम्भ कर दिया है। जिसके कारण अब दलित समाज में भी दहेज एवं अन्य आडम्बरों ने अपनी जड़ों को जमाना प्रारम्भ कर दिया है। अब दलित कवियों को इन नये विषयों पर लिखने की आवश्यकता है। इसी प्रकार कवि ने दलितों को समाज, शिक्षा आदि क्षेत्रों में वाली समस्याओं एवं शोषण का वर्णन तो किया है। परन्तु यह काव्य-संग्रह दलितों के एक विशेष जाति के शोषण की व्यथा पर केंद्रित है। कवि को अन्य दलित जाति की समस्याओं पर भी अपने विचार प्रदान करने की आवश्यकता है। शब्दों के चयन की बात करें तो कुछ स्थानों पर कवि को सावधानी बरतने की आवश्यकता है। ‘छोड़ने’ के स्थान पर कवि ने अगर ‘तजने’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया होता तो वाक्य प्रभावकारी होते। हालांकि कुछ स्थानों पर अपने गम्भीर विचारों को अभिप्रकट करने के लिए प्रभावकारी शब्दों का चयन किया है। ‘बस्स ! बहुत हो चुका’ कविता की उक्त पंक्तियाँ – “ ये खुरदुरे हाथ जो चीर सकते हैं धरती का सोना तुम्हारे लिए अब उखाड़ देंगे तुम्हारी ये व्यवस्था अपने हक अधिकारों के लिए।” उपर्युक्त पंक्ति में ‘खुरदुरे हाथ’ शोषित श्रमिक वर्ग की क्षमता पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है। इस कविता-संग्रह का शीर्षक ‘जारी रहेगा प्रतिरोध’ के अनुरुप कविताओं का चयन भी कवि ने किया है। जिन संदर्भों में विचारों के आयाम को बढ़ाने की आवश्यकता है। उन कविताओं में भी कवि ने अपने प्रतिरोध के स्वर को नहीं दबाया है , बस कुछ कविताओं में आक्रोश का अभाव है।निष्कर्षत: इस कविता संग्रह में कवि समाज की विसंगतियाँ , अंधविश्वास आदि का वर्णन करने के साथ शोषण का विरोध ,जहाँ इन्होंने एक ओर दलितों को परम्परागत कार्य करने से मना किया है , दलित समाज की वेदना एवं पीड़ा का बखान है। वहीं दूसरी ओर दलित समाज की कमियों को भी उजागर करने का कार्य किया है। केवल समाज ही नहीं राजनीति पर भी इन्होंने अपनी कलम चलायी। एक सशक्त कवि की भूमिका का निर्वहन करते हुए तात्कालीन समस्याओं पर भी दृष्टिपात किया है। किसी भी दलित रचना की सार्थकता तभी प्रमाणित होती है जब उनमें दलित चेतना हो। काव्य-संग्रह में विद्यमान कवि का आक्रोशित स्वर उनकी दलित चेतना की पुष्टि करती है। (लेखिका पीएचडी शोधार्थी व युवा साहित्य समालोचक हैं)
यह एक ऐतिहासिक तस्वीर है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चरणों में पड़े हैं। जबकि भारतीय लोकतंत्र समतामूलक मूल्यों पर आधारित है। कम से कम संविधान में तो उसे ऐसा ही बनाया गया है ताकि किसी को इस कदर झूकना नहीं पड़े।
दरअसल, भारतीय राजनीति में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। दलित, पिछड़े और तमाम वंचित समुदायों को कमोबेश हिस्सेदारी दी जा रही है। हालांकि पहले भी ऐसा ही होता था जब कांग्रेस का जमाना था। बिहार को ही उदाहरण लें तो हम पाते हैं कि कैसे कांग्रेस ने बिहार में पिछड़े, दलित और मुसलमानों को मुख्यमंत्री तक बनाया था। यह हम बेशक कह सकते हैं कि कांग्रेस ने सबसे अधिक प्रधानता सवर्णों को दी। लेकिन तमाम जातिगत दृष्टिकोणों के बावजूद कांग्रेस की नीति लोकतंत्र को मजबूत करने की रही। इमेजिन करिए कि यदि कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया होता तो क्या होता? क्या कोई अब्दुल गफूर बिहार जैसे प्रदेश का मुख्यमंत्री बनता? क्या भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री बन पाते?
लेकिन देश में हाल के वर्षों में एक अलग तरह की सियासत चल रही है। इस सियासत की मंशा लोकतंत्र को पहले कमजोर और फिर इसे खत्म कर देने की है। मैं कोई भविष्यवक्ता नहीं हूं, परंतु यह मैं महसूस कर रहा हूं कि अगले पचास साल के बाद भारत में लोकतंत्र का या तो अस्तित्व ही नहीं रहेगा या फिर रहेगा भी तो केवल औपचारिक तौर पर।
मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि लोकतंत्र को महत्वहीन बनाने के सारे तिकड़म आरएसएस के द्वारा किये जा रहे हैं। अब यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आरएसएस की मंशा क्या है। वह संविधान के बजाय मनु के विधान के हिसाब से देश चलाना है और सवर्णों को इस देश का शासक अनंत तक बनाए रखना है।
दरअसल, मैं चिंतित इस बात से हूं कि वे लोग, जो चुनाव में पराजित हो जाते हैं, उन्हें भी सत्ता में शामिल किया जा रहा है। अब कल की ही बात देखिए कि केशव प्रसाद मौर्य, जो सिराथु विधानसभा क्षेत्र से पराजित हो गए, उन्हें आरएसएस ने उपमुख्यमंत्री बना दिया। सामान्य तौर पर तो यह ऐसा लगता है जैसे वह केशव प्रसाद मौर्य को कैबिनेट में स्थान देकर मौर्य समुदाय को साधने की कोशिश कर रहा है। वहीं एक और उदाहरण देखिए। उत्तराखंड में पुष्कर सिंह घामी को आरएसएस ने मुख्यमंत्री बना दिया, जबकि वे अपना चुनाव हार गए थे।
दरअसल, यह समझने की आवश्यकता है कि आरएसएस के तिकड़म का विस्तार कितना है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी जो कि अपना चुनाव पहले हार गयी थीं, उन्होंने स्वयं को मुख्यमंत्री बना दिया। जबकि नैतिकता यह होनी चाहिए थी कि जबतक वह चुनाव न जीत जातीं, तबतक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपने ही दल के किसी और सदस्य को बैठने देतीं। यदि वह ऐसा कर पातीं तो निस्संदेह लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास और बढ़ता।
तो मामला यही है कि जनादेश का अपमान किया जा रहा है। जनता को यह बताया जा रहा है कि तुम्हारे वोटों का कोई मतलब नहीं है। तुम जिसे पराजित करोगे, हम उसे सत्ता में लाएंगे। जाहिर तौर पर जब ऐसा बार-बार होगा तो इसका परिणाम यही होगा कि जनता भी एक दिन यही मान लेगी कि वोटों का कोई मतलब नहीं है। वैसे भी हमारे देश में कम मतदान एक बड़ी समस्या है। लेकिन राजनीतिक दलों के लिए इस समस्या का कोई महत्व नहीं है।
मैं तो बिहार में 2005 से देख रहा हूं। नीतीश कुमार ने आखिरी बार चुनाव वर्ष 2004 में लड़ा था। तब वे बाढ़ संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार थे। बाढ़ की जनता ने उनके खिलाफ जनादेश दिया था। लेकिन 2005 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह बहुत ही दिलचस्प है कि जनादेश को ठेंगा दिखाने के लिए उन्होंने कैसी धूर्तता की। नीतीश कुमार ने स्वयं को विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया। तबसे लेकर आजतक वह यही कर रहे हैं। वे चुनाव नहीं लड़ते हैं।
वर्ष 2020 में तो आरएसएस ने जनादेश का जबरदस्त अपमान तब किया जब बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के खिलाफ जनादेश दिया और उनके दल के विजेताओं की संख्या 43 रह गयी। निस्संदेह बिहार की जनता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार को नहीं देखना चाहती थी। लेकिन आरएसएस ने लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करने के लिए नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार का गठन किया। अब इसका परिणाम क्या हुआ है, यह कल योगी आदित्यनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में नीतीश कुमार का नरेंद्र मोदी की चरणों में गिर जाने की घटना ने बता दिया है। यह पतित होने की पराकाष्ठा है।
दरअसल, सियासत में ईमानदारी का दौर खत्म किया जा चुका है। कर्पूरी ठाकुर एक उदाहरण हैं। वे बिहार में विधान परिषद को सत्ता का पिछला दरवाजा मानते थे। राज्यसभा भी एक तरह से संसद का पिछला दरवाजा ही है। कर्पूरी ठाकुर विधान परिषद को खत्म कर देना चाहते थे। वे मानते थे कि यदि किसी को सत्ता में आना है तो चुनाव लड़े। चुनाव लड़ने का मतलब जनता का आदेश हासिल करे।
खैर, अब कहां कोई कर्पूरी ठाकुर मुमकिन है। आरएसएस ने भारतीय लोकतंत्र की जड़ में मट्ठा डालने का काम प्रारंभ कर दिया है। याद रखिए नैतिकता रहेगी तभी लोकतंत्र का महत्व बना रहेगा।
दलित साहित्य वर्तमान में द्विज साहित्य के समानांतर खड़ा हो गया है। जाहिर तौर पर इसके पीछे दलित साहित्यकारों की एक लंबी सूची है, जिनके सृजन से ऐसा संभव हो पाया है। इन साहित्यकारों में प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन का नाम भी अग्रणी साहित्यकारों में शुमार है। यह उनकी उपलब्धियों का ही परिणाम है कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें सीनियर प्रोफेसर के रूप में पदोन्नत किया है।
प्रो. बेचैन के साथ अन्य चार प्रोफेसरों को भी पदोन्नति दी गई है। इनमें प्रो. मोहन, प्रो. पी.सी. टंडन, प्रो. कुमुद शर्मा और प्रो. सुधा सिंह शामिल हैं।
यदि बात प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन की करें तो हम पाते हैं कि हिंदी दलित साहित्य जगत में उनकी रचनाएं मील के पत्थर के समान हैं। उनकी कहानियों के केंद्र में शोषण, गरीबी, अशिक्षा, जातिवाद और भेदभाव के शिकार दलितों का संघर्ष रहा है। वे नब्बे के दशक से ही अपने लेखन से शोषणकारी शक्तियों की पहचान करते हैं, जिनकी वजह से दलित सामाजिक अधिकारों से वंचित और हाशिये पर चले गये है। जैसे कि उनकी ‘भरोसे की बहन’ (2010) और ‘मेरी प्रिय कहानियां’ (2019), नामक दो महत्वपूर्ण कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। इन दोनों संग्रह की कहानियों में दलित अधिकारों और हकों के संघर्ष स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
दरअसल, प्रो. बेचैन ने जब लेखन शुरू किया था तब पूरा समाज बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रहा था। वह दौर था 1990 का। मंडल कमीशन के लागू होने के बाद आरक्षण को लेकर समाज में उथलपुथल मचा था। दलित साहित्य भी तब अंगड़ाइयां लेने लगा था। उसी दौर में प्रो. बेचैन ने पत्रकारिता के अलावा साहित्य सृजन करना प्रारंभ किया। मीडिया में वंचितों की हिस्सेदारी को लेकर उनके द्वारा किया गया एक सर्वेक्षण आज भी लोग शिद्दत से याद करते हैं। अपनी रपट में उन्होंने मीडिया के दोहरे चरित्र व उसकी वजहों के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी।
प्रो. बेचैन साहसी साहित्यकार रहे हैं। उनकी एक कहानी ‘शोध प्रबंध’ (हंस, जुलाई 2000) तब खासा चर्चित रही थी। यह उच्च शिक्षा में हो रहे दलित शोषण की बड़ी सघनता से पड़ताल करने वाले कहानी है। इस कहानी में जहां एक तरफ उच्च शिक्षा में शोधरत दलित छात्राओं के शोषण को सामने रखा गया है, वहीं दूसरी ओर सवर्ण प्रोफेसर के नैतिक पतन और निर्लजता की इबारत भी लिखी गई है।
बहरहाल, प्रो. बेचैन को सीनियर प्रोफेसर के रूप में पदोन्नति वास्तव में दलित साहित्य के महत्व को रेखांकित करता है। यह दलित साहित्य के हर अध्येता के लिए गर्व की बात है।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर सुर्खियों में हैं। वजह बहुत खास है। कुछ ऐसा जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। लेकिन सियासत के खेल निराले होते हैं। वही नीतीश कुमार जिन्होंने वर्ष 2013 में नरेद्र मोदी को अपने घर पर दावत देने का आमंत्रण वापस ले लिया था, शुक्रवार को योगी आदित्यनाथ की दूसरी ताजपोशी के दौरान नरेंद्र मोदी के चरणों में कुछ ज्यादा ही झुक गए।
सामान्य तौर पर यह लोकाचार है कि जब दो नेता मिलते हैं तो एक-दूसरे का सम्मान करते ही हैं। लेकिन नीतीश कुमार, जिन्हें उनकी पार्टी के नेतागण पीएम उम्मीदवार बताने की कोशिशें करते रहते हैं, लखनऊ के इकाना इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में हजारों की भीड़ के सामने जब नरेंद्र मोदी से मिले तो उन्होंने अपनी ही राजनीतिक मर्यादा को तोड़ दिया।
बताते चलें कि नीतीश कुमार की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में रही है, जो राजनीतिक संबंधों को महत्व तो देते ही हैं, अपने स्वाभिमान की रक्षा भी करते हैं। जैसे कि वर्ष 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के पहले जब नीतीश भाजपा से अलग हो गए थे और लालू प्रसाद की शरण में चले गए थे, तब राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में उन्होंने नरेंद्र मोदी की अवहेलना की थी। तब हुआ यह था कि न तो नरेंद्र मोदी ने और ना ही नीतीश कुमार ने एक-दूसरे का सम्मान किया था।
खैर, मौजूदा दौर भाजपा के सितारे आसमान पर हैं। मुकेश सहनी की पार्टी के तीनों विधायकों के भाजपा में चले जाने के बाद बिहार में भाजपा वैसे भी 77 विधायकों के साथ नंबर वन पार्टी बन गयी है। ऐसे में भाजपा की कृपा से नीतीश कुमार का बिहार में मुख्यमंत्री बने रहना भी एक मजबूरी हो सकती है कि योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी के दौरान उन्होंने खुद को सबसे अधिक वफादार साबित करने की कोशिश की।
शुक्रवार को योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। लखनऊ के इकाना इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में 50 मंत्रियों ने भी भी शपथ ली। इनमें एक वह दयाशंकर सिंह भी हैं, जिन्होंने करीब छह साल पहले बसपा प्रमुख मायावती को अपशब्द कहे थे। इन्हें योगी आदित्यनाथ ने स्वतंत्र प्रभार मंत्री बनाया है।
हालांकि यह माना जा रहा है कि भाजपा ने 2024 में होनेवाले लोकसभा चुनाव के लिहाज से मंत्रिमंडल में लगभग हर जाति और समुदाय को प्रतिनिधित्व दिया है। वहीं ब्राह्मणों को सम्मान देते हुए ब्रजेश पाठक का कद बढ़ा दिया गया है। दिनेश शर्मा की जगह अब वे केशव प्रसाद मौर्य के साथ उममुख्यमंत्री का पद साझा करेंगे। योगी मंत्रिमंडल में कुल 16 कैबिनेट मंत्री, 14 स्वतंत्र प्रभारी और 20 राज्यमंत्री शामिल किए गए हैं। देखें पूरी सूची–
हिन्दू साम्प्रदायिकता मुसलमानों के विरूद्ध क्यों अस्तित्व में आयी ? इस प्रश्न को समझे बिना मुस्लिम साम्प्रदायिकता को ठीक से नहीं समझा जा सकता । जिन लोगों ने भारत-विभाजन की परिस्थितियों को देखा और भोगा है, वे इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि विभाजन तत्कालीन परिस्थितियों की माँग था । जहाँ तक विभाजन के दंगों की बात है, तो उनमें दोनों ही समुदाय तबाह और बरबाद हुए । किन्तु , यह विडम्बना ही है कि हिन्दू समुदाय ने इस दर्द को इस स्तर पर अनुभव किया कि मुसलमानों के प्रति कभी न खत्म होने वाली नफरत भी उसकी गहराईयों में बस गयी । इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय मुसलमानों के प्रति हिन्दू समुदाय आक्रामक बनते गये । सबसे पहले उनका आर्थिक वहिष्कार हुआ । व्यापार, उद्योग, कृषि-क्षेत्रों में हिन्दुओं का कब्जा पहले से ही था, अब सरकारी नौकरियों में भी हो गया । चूंकि अधिकांश मुस्लिम प्रबुद्ध जन पाकिस्तान चले गये थे, इसलिये भारतीय मुसलमानों में उस नेतृत्व का अभाव हो गया, जो उनको संगठित करता और उनकी समस्याओं को जोरदार ढंग से उठाता । इसका लाभ न केवल कठमुल्लावाद ने, बल्कि उन मुस्लिम नेताओं ने भी उठाया, जिन्होंने मुस्लिम राजनीति के बल पर अपने निजी स्वार्थों को पूरा किया । एक ओर मुल्ला-मौलवियों ने उन्हें इस्लाम के सही समझ से दूर रखकर अज्ञानता, अन्धविश्वास और पाखण्ड सिखाया , तो दूसरी ओर इसी आधार पर मुस्लिम नेताओं ने सत्ता के लिये उनका इस्तेमाल किया और सत्ता में आने के बाद उन्होंने न मुसलमानों की आर्थिक लड़ाई लड़ी और न सामाजिक सुरक्षा के खिलाफ ही कोई ताकतवर मुहिम चलायी ।
अत: नेतृत्वहीन भारतीय मुसलमान जैसा कि प्रो. फ़करुद्दीन बेन्नूर ने लिखा है, “भीतर ही भीतर असुरक्षित तथा अकेलेपन से संत्रस्त होते जा रहे हैं । परिणामत: मुस्लिम मध्यवर्ग के सदस्य सांप्रदायिक प्रतीकों तथा संकल्पनाओं को फिर से स्वीकार करते जा रहे हैं । यह प्रवृत्ति बेहद विफलताओं में से उभरती है और यही कारण है कि आज का सुशिक्षित मध्यवर्गीय मुसलमान, आधुनिक शिक्षा-दीक्षा से विभूषित होते हुए भी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है और जमातवादी सूत्रों को स्वीकार करने लगा है ।”
मुस्लिम संगठनों के मूल में भी यही प्रतिक्रिया निहित है । 1987 में जब दिल्ली की जामा मस्जिद के नायब इमाम सैयद अहमद बुखारी ने ‘ आदिम सेना’ का गठन किया, तो उनकी दलील यह थी कि – “ जब हिन्दू शिव तक पहुँच सकते हैं, तो हम आदम तक क्यों नहीं पहुँच सकते ?” सैयद बुखारी ने एक भेंटवार्ता में इसे प्रतिक्रियावादी कार्यवाही स्वंय स्वीकार किया। वह कहते हैं –
“अब आप थोड़ा पीछे की ओर देखें तो पता चलता है कि आज़ाद हिन्दुस्तान में शुरु से ही मुख्तलिफ सेनाएं बनने लगी थीं । शिव सेना, हिन्दू सेना और बजरंग दल बना । चूंकि आये दिन हो रही साम्प्रदायिक घटनाओं से मुसलमान अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहे थे । और, यह भी महसूस किया जा रहा था कि ये सेनाएँ एक ही फिरके में बन रही थीं, लेकिन मुसलमानों में कोई ऐसी सेना नहीं थीं, जो इनका मुकाबला कर सके । अपनी सुरक्षा और इन सेनाओं से मुकाबला करने के लिये कुछ लोग हथियार चाहते थे । छोटे-छोटे गुटों में उनकी गतिविधियाँ तेज हो रही थीं । वे सुरक्षा के उपाय ढूंढ रहे थे । चूंकि ये सेना एक ही संप्रदाय की थीं, इसलिये हुकुमत की कोई चिंता नहीं थी, जबकि इससे देश को काफी नुकसान पहुँच रहा था । हमें अपनी सुरक्षा का बंदोबस्त करना था, अन्य सेनाओं का मुकाबला करना था और हुकुमत को झकझोरना था । ऐसे में हमने सेना बनायी और कामयाब भी हुए ।”
‘आदम सेना’ के उद्देश्यों में दो उद्देश्य बहुत महत्वपूर्ण हैं , जो भारत के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष के प्रति संगठन की निष्ठा को प्रमाणित करते हैं । इनमें पहला उद्देश्य यह है कि ‘यह संगठन किसी भी कीमत पर साम्प्रदायिक पागलों की इस प्यारे देश को तोड़ने की कोशिशों को कामयाब नहीं होने देगा ।’ दूसरा उद्देश्य यह है कि ‘यह संगठन किसी भी किस्म की व्यक्तिगत या सामूहिक हिंसा से कोई वास्ता नहीं रखेगा । अगर संगठन का कोई भी सदस्य हिंसा करता पाया जाता है, तो संगठन से उसे फौरन हटा दिया जाएगा ।’
विश्व हिन्दू परिषद की तर्ज पर अयोध्या में विश्व मुस्लिम परिषद नामक संगठन भी 1990 में अस्तित्व में आया । विश्व हिन्दू परिषद ने मंदिर के मामले में जो राष्ट्र का वातावरण पिछले तीन वर्षों में खराब किया हुआ है और मुसलमानों के विरूद्ध अपने उत्तेजक भाषणों से जो साम्प्रादायिक दंगे भड़काने में अहम भूमिका निभायी, उसकी प्रतिक्रिया में विश्व मुस्लिम परिषद जैसे संगठन का जन्म हो ही सकता है । इस संगठन की ओर से अयोध्या में मुस्लिम क्षेत्रों में चस्पा किये गये पर्चों में (जो उर्दू में हाथ से लिखकर फोटोस्टेट कराकर चस्पा किये गये) संगठन का जो परिचय और ध्येय व्यक्त किया गया है, वह एक प्रमुख हिन्दी दैनिक के अनुसार निम्न प्रकार है-
“तवारीख गवाह है कि मुगलों के वक्त से आज तक मुसलमान हिन्दुस्तान का वफादार रहा है और हिन्दुस्तान की गैर मुस्लिम अकवास (जाति) और उनकी इबादतगाहों का मुहाफ़िज (रक्षक) रहा है । लेकिन मुसलमानों को आजादी के बाद इस वफादारी का जो सिला (इमाम) मिला, उससे हमारी मस्जिदें, मकबरें, दरगाहें और हमारी इस्लामी पहिचान , यहाँ तक कि हमारे मकानात और दुकानें वगैरह भी महफ़ूज नहीं रह गयीं । हजारों मुसलमानों का कत्लेआम हुआ । बेशक इस्लाम ने अमन का पैग़ाम दिया, लेकिन अपनी हिफ़ाजत के लिये बातिल से जंगें भी कीं । आपके शहर में एक तंजीम (संस्था) ‘ विश्व मुस्लिम परिषद’ का कयाम अमल में आ चुका है , जिसने अहद (प्रण ) किया है कि बाबरी मस्जिद को नुकसान पहुँचाने के ग़ैर पसंदाना अकदाम (अप्रिय कदम) की मुखालफत करना और मुसलमानों की पहिचान कायम रखना है । तंजीम के इस नजरिये पर अमल के लिये हमारा मुत्तहिद होना जरुरी है ।”
इस समाचार के अंत में लिखा है कि ‘विश्व मुस्लिम परिषद’ का मुखिया कौन है तथा इसका वजूद यदि है, तो कितना प्रभावकारी है , यह बातें अभी साफ नहीं हैं ।’ किन्तु यदि इस समाचार पत्र के कई माह बाद तक भी विश्व मुस्लिम परिषद नामक संगठन की गतिविधियाँ प्रकाश में नहीं आयीं, तो इससे एक निष्कर्ष यह भी निकाला जा सकता है कि विश्व मुस्लिम परिषद का गठन ही न हुआ हो और मुसलमानों ने विश्व हिन्दू परिषद की आक्रामक कार्यवाहियों का जवाब देने के मकसद से महज़ एक प्रतिक्रिया ही व्यक्त की हो । इसके अतिरिक्त, यह निष्कर्ष निकालना भी उचित न होगा कि विश्व मुस्लिम परिषद का यह पर्चा , जो मुस्लिम क्षेत्रों में चस्पा किया गया, मुसलमानों को साम्प्रदायिक तनाव के लिये उत्तेजित करने के उद्देश्य से किसी हिन्दू संगठन का ही सुनियोजित षड्यंत्र हो ।
अभी हाल में लखनऊ में मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने एक नये संगठन ‘मुस्लिम महाज’ का गठन किया है । एक हिन्दी दैनिक में प्रकाशित समाचार में कहा गया है कि ‘मुस्लिम महाज’ ने एक प्रस्ताव द्वारा बाबरी मस्जिद की रक्षा और और उसकी वापसी की माँग केन्द्रीय सरकार से की है । दूसरे प्रस्ताव में देश के मुसलमानों से कहा गया है कि वे वोट की राजनीति से अपने को अलग कर लें । न वोट दें और न वोट माँगें । वोट की राजनीति के चलते ही भारत की मुस्लिम जनता को पिछले 46 वर्षों में बेइज़्ज़ती और साम्प्रदायिक दंगों के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला, जबकि मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने के नाम पर स्वयंभू मुस्लिम नेताओं ने सिर्फ ऐश की है । संगठन ने सभी मुसलमान सांसदों, विधायकों और मंत्रियों से माँग की है कि ‘वह सुविधा और सत्ता का मोह छोड़कर अपने पदों का त्याग करें, अन्यथा उनका घेराव किया जाएगा ।’
कहना न होगा कि मंदिर- मस्जिद- विवाद से उत्पन्न भय और असुरक्षा की भावना ही ‘मुस्लिम महाज’ के गठन का भी मूलाधार है ।
अत: हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मुसलमानों के प्रति हिन्दुत्व के आक्रामक तेवर, निराधार आरोप, भ्रामक दृष्टिकोण और दुष्प्रचार के फलस्वरुप मुस्लिम साम्प्रदायिकता ने जन्म लिया । यद्यपि यह प्रतिक्रियात्मक है और तुलनात्मक दृष्टि से उतनी आक्रामक और हिंसक नहीं है, जितनी हिन्दू साम्प्रदायिकता है, (क्योंकि हिन्दू साम्प्रदायिकता मुसलमानों के साथ-साथ दलित-पिछड़ी जातियों के प्रति भी आक्रामक और हिंसक है) तथापि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि साम्प्रदायिक विद्वेष स्वंय में एक ऐसा अपराध है, जो देश में अराजकता उत्पन्न करता है और राष्ट्रीय एकता को खण्डित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।
– डॉ. संतोष कुमारउत्तर प्रदेश के राजभर समाज में पहचान, चेतना, वैचारिक निर्माण और राजनीतिक उभारबहुत ही नया मंथनव विमर्श है। पहचान निर्माण की पारंपरिक पंक्तियों के बाद इस समुदाय ने उन्हें स्वयं को एक शैव पंथ भारशिव के साथ जोड़ा और आगे पश्चिमी भारत के नागवंशी के दावे के साथ जुड़ गया जो बौद्ध धर्म के प्रति अधिकआमुखहै। राजभर समुदाय के बीच दो तहें दिखाई देती हैं, सबसे पहले हिंदू धर्म के भीतर शैव धर्म का पालन करते हुए, हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। दूसरे, समुदाय के बीच केवल कुछ ही बौद्ध विरासत को साझा करते हैं। राजभर समुदाय ने अपनी पहचान मोटे तौर पर उत्तर प्रदेश में हिंदू धर्म के शैव रूप से संबंधित पाईहै। औपनिवेशिक काल में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ये वे लोग थे जिन्होंने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी और कई राजभर नाम इससे जुड़े हैं। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और चुनावी राजनीति में मध्ययुगीन महाराजासुहेलदेव राजभर के वंशजहोने का दावा राजभर समुदाय के बीच अधिक प्रभावशाली और मजबूतहै। महाराजा सुहेलदेव पर बौद्धिकजगत और समाज में वाद-विवाद चल रहा है। उत्तर प्रदेश के क्षत्रिय समूहों का दावा है कि वह राजपूतथे। भर/राजभर समुदाय का कहना है कि वह राजभर थे और मध्य उत्तर प्रदेश के पासी समुदाय उन्हें पासी राजा मानते हैं।
कई औपनिवेशिक नृवंशविज्ञान अभिलेखों में, गजेटियर राजा सुहेलदेव का उल्लेख राजभर और पासी के रूप में किया गया है, जिसने इस पर विवाद को विकसित किया। अधिकांश इतिहासकारों जैसेके पी जायसवाल व एम बी राजभरका सुझाव है कि वह एक राजभर महाराजा थे।महाराजा सुहेलदेव ने 11वीं शताब्दी में महमूद गज़नवी के सेनापति सैयद सालार गाजी को मार गिराया व अगले 100 वर्षो तक भारत मेंशांति कायम की।
इतिहास के आईनेमेंराजभर
राजभर समुदाय के इतिहास पर तीन प्रमुख ऐतिहासिक व्याख्याएं मिलती हैं। सबसे पहले, ऋग्वैदिक मूल और इस समुदाय के जुड़ाव का दावा करता है। दूसरा भारत के मूल निवासियों के बारे में नागभर शिव के रूप में बात करता है और अंत में बुद्ध के काल के भार्ग वंशजों को जोड़ता है। प्रारंभिक वैदिक काल के दौरान भर समुदाय पाया गया और यह भारत नाम से मिलता जुलता था। भारशिव के साथ राजभर का जुड़ाव एक शैव पंथ और आगे नागवंशी के पश्चिमी भारत के दावे से जुड़ता है। बुद्ध के काल में, सुमासुमगिरी पूर्वी उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर में एक जगह है जहाँ एक भार्ग जाति का शासन था। आईनेअकबरी के अनुसार, “बौद्ध प्रभुत्व की अवधि के दौरान भर एक शक्तिशाली जनजाति थी।” यह जाति, जिसे राजभर, भरत, भरपटवा और भर शब्द के नाम से जाना जाता है, उत्तर भारत में गोरखपुर से लेकर मध्य भारत में सागर तक फैले देश के एक विस्तृत हिस्से में है। अन्य जनजातियाँ, जैसे कि शेउरी, चेरु, मझवार और कोल उनके साथ जुड़े स्थानों में थे; लेकिन यह मानने का एक अच्छा कारण है कि भरों की संख्या उन सभी से बहुत अधिक थी। वे अवध में बहुत शक्तिशाली थे; और वाराणसी (पहले बनारस) और इलाहाबाद, या गंगा के दोनों किनारों परस्थित क्षेत्र, लगभग सत्तर मील लंबा, लगभग उनके अधिकार में था। हालांकि, यह जोड़ना सही है कि कुछ मूर्तियां, भर को श्रेष्ठ जाति के रूप में दर्शाती हैं, और शेषबौद्ध और या जैन धर्म से जुड़ी हुई हैं।
परम्परागत कथाओं के अनुसार गोरखपुर क्षेत्र में राजभर वंश भारद्वाज क्षत्रिय परिवार से जुड़ा था और उसका पुत्र मांस-मदिरा के सेवन से निम्न दर्जे का हो गया था। उनकी संतान का नाम सुरहा था और वे सुरौली गांव में बस गए थे। सूरह में से एक ने उच्च वर्णलड़की के साथ नाजायज संबंध बनाए और उससे कानूनी तरीके से शादी करने की सोची लेकिन उसे मार दिया गया। इस घटना के बाद समाज को नीचा समझा गया और वह पतित हो गया। भर राजा ने वही किया जो उनकी स्थिति में आदिवासी हमेशा करते थे और खुद को हिंदू जाति व्यवस्था में एक तरह की मध्यस्थ जाति में कायस्थ के रूप में भर्ती कराया। दूसरी शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक, उत्तर प्रदेश में 33 राजभर राजाओं की एक श्रृंखला थी। औपनिवेशिक नृवंशविज्ञान और जनगणना अभिलेखों में राजभर का अच्छी तरह से प्रतिनिधित्व किया गया है और स्वतंत्रता के बाद वे नए समय और स्थान में विकसित हो रहे हैं।
राजभर जनसांख्यिकी और भौगोलिक स्थिति
जैसा कि बी सुब्बाराव कहते हैं कि “भूगोल के बिना इतिहास एक बिना फ्रेम की तस्वीर की तरह है।” यहाँ, राजभर समुदाय मध्य भारतीय क्षेत्र के बाद पश्चिमी से उत्तरी भारत की ओर है। उत्तर प्रदेश के मामले में, वे राज्य के पूर्वी भाग में पाए जाने वाले द्रविड़ मूल की जाति हैं। राजभर समुदाय विभिन्न नामों और पहचानों के माध्यम से भारत में व्यापक है। 1891 की जनगणना में, उन्हें भारद्वाज, कन्नौजिया और राजभर की मुख्य उपजातियों के तहत वर्गीकृत भर के साथ रखा गया था। संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) की 1891 की जनगणना में 177858 राजभर का उल्लेख है और सबसे अधिक 47608 बलिया में, 28141 वाराणसी में, 25094 आजमगढ़ में, 19094 गोरखपुर में है। 1931 की जनगणना में भारत में राजभर की जनसंख्या 527174 बताई गई है। भारत सरकार अधिनियम 1935 अनुसूची के अनुसार, उनकी उपस्थिति बिहार, उड़ीसा, बंगाल, मध्य प्रदेश और बरार में है। भारत सरकार अधिनियम 1935 में 429 जाति की अनुसूची में उनका उल्लेख अछूत श्रेणी में किया गया था।
आजादी के बाद 1955 में इस कार्यक्रम में बदलाव किया गया और उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग के रूप में रखा गया। 1981 में राजभर को उत्तर प्रदेश में गैर-अधिसूचित जाति के रूप में रखा गया था और बाद में 1993 में मंडल आयोग, समाज कल्याण मंत्रालय की सिफारिश के तहत, केंद्र सरकार ने अन्य पिछड़े वर्गों की एक सूची जारी की जिसमें भर को पिछड़ा आरक्षण के लाभार्थी के रूप में उल्लेख किया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1997 में भर और राजभर पर्यायवाची बताते हुए एक संशोधन जारी किया। हाल ही में, उत्तर प्रदेश सरकार ने 30 जून 2019 को 17अन्य पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का आदेश जारी किया।
इतिहास में राजभर महाराजासुहेलदेवकी खोज
महाराष्ट्र स्टेट आर्काइव मुंबई से राजभर महाराजासुहेलदेव के इतिहास को खंगालने का सफर बहुत लंबा है। 1980 के दशक के दौरान, युवा राजभर लोगों के एक समूह ने एक चर्चा व अनुसंधान समूह का गठन किया जो बाद में मुंबई में भर शोध संस्थान के रूप में विकसित हुआ, मग्गुबंगलराजभरइसके प्रमुख संस्थापक सदस्य हैंजो किएम बी राजभर के नामसे प्रसिद्धहैं। एम बी राजभर पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के मार्टिनगंज ब्लॉक के ग्राम फूलेश के मूल निवासी हैं।पूर्वी उत्तर प्रदेशपूर्वांचल के नाम से लोकप्रिय है।उन्होंने टी.डी. कॉलेज जौनपुर से रसायन विज्ञान में स्नातक किया और बाद में मुंबई में एक रासायनिक फर्म (मेडिसिन प्रोडक्शन) में शामिल हो गए। उनकी ऐतिहासिक शोध में बहुत रुचि है और 1982 में मुंबई, महाराष्ट्र में एक चर्चा व अनुसंधान समूह का गठन किया।
एक युवा और उत्सुक दिमाग होने के नाते एम बी राजभर ने मुंबई आर्काइव के औपनिवेशिक अभिलेखों में राजा सुहेलदेव के बारे में खोज की और उनके बारे में जानकारी प्रसारित की। लेकिन बड़ी चुनौती यह थी कि राजा सुहेलदेव की कोई भी छवि (image) पुरालेख में या भारत में किसी अन्य स्थान पर नहीं थी। उन्हें पता चला कि राजा सुहेलदेव की एक तस्वीर ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन में है, डायरेक्टर ऑफ स्टेट आर्काइव मुंबई के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश समकक्ष को सूचित किया और छवि प्राप्त की। राजा सुहेलदेव की घोड़े की सवारी और भाला और ढाल पहने हुए इस छवि ने संपूर्ण भारत समेतउत्तर प्रदेश के राजभर समुदाय और सामाजिक परिवेश में लोकप्रियता हासिल की। एम बी राजभर ने नाग भर शिव का इतिहास, भर/राजभर साम्राज्य, आदिरामायण की कथावस्तु, श्रावस्ती सम्राट सुहेलदेव, Bhar/Rajbhar History as told by British Historians समेतदरजनो पुस्तकेंलिखी है।युवा राजभर शोधकर्ताओके इस समूह ने उत्तर भारत के सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में राजा सुहेलदेव की स्थापना की, और इसने राज्य की राजनीति में अपने राजा के प्रतीक और मूर्तियों के माध्यम से राजभर समुदाय की अधिक मुखर प्रस्तुति, चेतना और पहचान निर्माण का नेतृत्व किया। भोजपुरी गायिकाचिंता राजभर का लोकप्रिय गीत इसे सहीव्यक्त करता है…
गुंज रहा है जय सुहेलदेव नारा भारत में
चमकेगा फिर से राजभर का सिताराभारत में!
राजभर समुदाय का राजनीतिक समावेश एवंप्रतिनिधित्व
भारत मेंक्षेत्रीय दलों के उदय और जाति की प्रतिनिधि राजनीति के साथ, राजभर ने राजनीतिक आंदोलन शुरू किए और खुद को राज्य की राजनीति से जोड़ा। प्रथम राजभर विधायक दूधनाथ कांग्रेस से थे।यह पहली बार था जब उन्होंने चुनावी जीत का स्वाद चखा।मान्यवर कांशीराम ने उन्हें बहुजन समाज पार्टी में एकजुट किया और पार्टी के विभिन्न पदों पर जिम्मेदारी दी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में, राजभर बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए और सीटें जीतने में मदद की। सुखदेवराजभरउत्तरप्रदेशकी 11वींविधानसभामें 1991-1993 तकराजभरसमुदायकेपहलेसदस्यथेऔरवेआजमगढ़जिलेसेचुनेगएऔरसुश्रीमायावतीकैबिनेटमेंविधानसभाकेअध्यक्षकेरूपमेंकार्यकिया। रामआचलराजभरप्रमुखराजभरनेताओंमेंसेएकहैंऔरवह 1991 सेबहुजनसमाजपार्टीकेशुरुआतीसदस्यथेऔर 4 बार विधायकउम्मीदवारीजीती।वहराज्यपरिवहनमंत्रीथेऔरउत्तराखंडमेंबसपाप्रदेशअध्यक्षकापदसंभालाथा।औरहालहीमेंबेहतरस्थानऔरअवसरकेलिएसपामेंशामिलहोगए। कालीचरण राजभर पूर्वी यूपी के गाजीपुर जिले के एक प्रमुख राजभर नेता हैं। वह 2002 और 2007 में बसपा से राज्य विधानसभा में चुने गए थे। और बाद में वह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। ओम प्रकाश राजभर बसपा के मूल कार्डर थे। उन्होंने कहा कि मैं मान्यवर कांशीराम का शिष्य था और पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर काम किया। और अपने राजभर समुदाय के स्वतंत्र नेता बन गए बाद में 2002 में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का गठन किया. शकदीपराजभरपूर्वीयूपीकीराजनीतिमेंएकउभरताहुआनामहै।और 2018 मेंराज्यसभाकेसदस्यबने।ग्रामप्रधानसेअपनीराजनीतिकयात्राशुरूकीऔरसुहेलदेवभारतीयसमाजपार्टी (एसबीएसपी) औरभारतीयजनतापार्टी (बीजेपी) गठबंधनकेमाध्यमसेराज्यसभामेंचुनेगएऔरसामाजकल्याणकररहेहैं।अनिलराजभरराजभरसमुदायकेबीचएकबहुतहीजीवंतनेताहैं।उन्होंनेभाजपाकेसाथसक्रियरूपसेकामकियाऔर 2017 केराज्यविधानसभाचुनावमेंभाजपाकेतहतवाराणसीजिलेकीशिवपुरसीटसेचुनावीजीतहासिलकी।क्योंकि 20% आबादीराजभरकीहै।वहराजभरसमुदायमेंअत्यधिकसक्रियहैंऔरजनताकोलामबंदकरतेहैं।
विजय राजभर आजमगढ़ मंडलमें 2017 से भाजपा के तहत घोसी, मऊ से विधायक हैं। वह बहुत सक्रिय राजनेता हैं और महाराजा सुहेलदेव जयंती और अन्य सामुदायिक कार्यक्रमों में बहुत बड़े स्तर पर भाग लेते हैं। और राजभर समुदाय में राजनीतिक चेतना जगा रहे हैं।साथ ही अन्य राजभर नेता प्रदेश में सक्रिय हैं
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का गठन औरओम प्रकाश राजभर
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी उत्तर प्रदेश की एक मजबूत राजनीतिक पार्टी है और पूर्वी यूपी के राजनीतिक समीकरण पर हावी है, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की स्थापना ओम प्रकाश राजभर ने 27 अक्टूबर 2002 को महाराजा सुहेलदेव पार्क वाराणसी, उत्तर प्रदेश में अपने 27 अनुयायियों के साथ की थी। पहले इसका नाम भारतीय समाज पार्टी था बाद में सुहेलदेव जोड़ा गया।उन्होंने गुलामी छोड़ो समाज जोड़ो का नारा दिया और अपने देवी-देवताओं के प्रतीक के रूप में पीले सफा (पगड़ी) और पीले झंडे को अपनाया। उन्होंने एक-दूसरे के सम्मानदेने के लिए “जय सुहेलदेव” का अभिवादन अपनाया और राजभरलोगों को सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टीको राज्य की राजनीति के केंद्र में लानेका आवाहनकिया
इससे पहले के अपने राजनीतिक सफर में ओम प्रकाश राजभर मान्यवर कांशीराम से प्रभावित थे और 1980’s में बसपा के मेहनती कार्यकर्ता के रूप में शामिल हुए थे। बाद में 1996 में, वह बसपा के जिला अध्यक्ष वाराणसी बने। वह मान्यवर कांशी राम के विचारों का पालन कर रहे थे कि “हमें अपने इतिहास को जानना चाहिए और अपने पूर्वजों का सम्मान करना चाहिए और जो समुदाय कर रहे हैं वे खुद को विकसित नहीं कर सकते हैं।” वह मान्यवर कांशी राम के लोकप्रिय नारे “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिसेदारी” से बहुत प्रभावित थे। जब सुश्री मायावती (तत्कालीनमुख्यमंत्री) ने भदोही जिले का नाम बदल दिया तो उन्हें पीड़ा हुई। भदोही जिले का नाम संत कबीर नगर रख दिया। इस जिले का नाम उस क्षेत्र के भर राज से मिला, जिसकी राजधानी भदोही थी। ओम प्रकाश राजभर उस नाम परिवर्तन के खिलाफ थे जिन्होंने बसपा के भीतर अपनी आवाज उठाई और 2001 में पार्टी छोड़ दी और आगे सोनेलाल पटेल के अपना दल (पार्टी) में शामिल हो गए। जहां उन्हें फिर से भेदभाव और बहिष्कार का सामना करना पड़ा। अंत में, उन्होंने 2002 में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का गठन किया।
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टीऔर राजभर पहचान व चेतना निर्माण
अपनी स्थापना से ही सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में राजभर के लिए प्रमुख संगठन बन गई। पिछले 20 वर्षों में राजभर की पहचान निर्माण और चेतना उच्च स्तर पर विकसितहो रही है। यहापहचान व चेतना निर्माण की एक मजबूत लहर है, जिसमें राजभर जनता ने महाराजा सुहेलदेव जयंती और उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरी और साथ ही ग्रामीण क्षेत्रमें उनकी प्रतिमाओं की स्थापना का जश्न मनाना शुरू कर दिया। यहां एक बात विशेषहै कि राजभर समुदाय नौकरी और मजदूरी के लिए बड़े पैमाने पर मुंबई (महाराष्ट्र) की ओर पलायन करता रहा है। इसलिए, राजभर समुदाय के पहचान और चेतना के आंदोलन को मुंबई, महाराष्ट्र से गति मिली जहां भर शोध संस्थान ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने प्रारंभिक स्तर पर महाराजा सुहेलदेव जयंती मनाने की प्रवृत्ति शुरू की और इसे बड़े पैमाने पर विकसित किया। यही प्रथा उत्तर प्रदेश में राजभर समुदाय, के विशेष सन्दर्भ में पूर्वांचल में शुरु हुई। उन्होंने अपने धार्मिक स्थलों और घरों में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के पीले झंडे की मेजबानी की। पहचान निर्माण और राजनीतिक दावे की इस पूरी प्रक्रिया में महाराजा सुहेलदेव राजभर की मूर्तियों की स्थापना बहुत महत्वपूर्ण घटना है।
समानांतर आचार्य शिवप्रसाद सिंह राजभर, गोपीलाल चौधरी, शिवपार्सन राय, डॉ धनेश्वर राय, सुभाष प्रसाद और बीरबल राम द्वारा गठितराष्ट्रवीर महाराजा सुहेलदेव ट्रस्ट ने मध्य और उत्तरी भारत में राजभर समुदाय के बीच चेतना और जागृति फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजभर के लोग आचार्य शिवप्रसाद सिंह राजभर को राजगुरु कहते हैं। उन्होंने राजभर के इतिहास पर आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं और वे समुदाय में बहुत प्रसिद्ध हैं। एम बी राजभर और उनकी टीम नेमहाराजा सुहेलदेव की मूर्ति की स्थापना के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती से मुलाकात की, लेकिन उनकी सरकार बीच में ही गिर गई। इसकेबाद, यह पहल भारतीय जनता पार्टीऔर मुख्यमंत्री श्रीराजनाथ सिंह द्वारा की गई तथा सांसद श्री लालजी टंडन के प्रयासों ने 23 मई 1999 को लालबाग लखनऊ में महाराजा सुहेलदेव की प्रतिमा की स्थापना की।हाल ही में, भारतीय जनता पार्टीने महाराजा सुहेलदेव को राष्ट्रीय नायक के रूप में स्थापित करने का गौरव पूर्णकदम उठाया। और श्रावस्ती जिले में उनकी प्रतिमा के शिलान्यास का नेतृत्व किया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 16फरवरी 2021 को उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में महाराजा सुहेलदेव स्मारक और चित्तौरा झील के विकास की आधारशिला रखी, जो की राजभर पहचान और चेतना का नया प्रतिमान है।
सुहेलदेव भारतीय समाजपार्टीऔरराजनीतिक सफलता
इसकी स्थापना से, सुहेलदेव भारतीय समाजपार्टी ने पूर्वी यूपी की राजनीति में बहुत अहम भूमिका निभाई है। 2017 के राज्य विधानसभा चुनावों में, सुहेलदेव भारतीय समाजपार्टीयूपी में गेम चेंजर के रूप में उभरा। राजनीति। सुहेलदेव भारतीय समाजपार्टीअध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने बीजेपी के साथ गठबंधन करने का फैसला किया। इस चुनाव पूर्व गठबंधन के माध्यम से सुहेलदेव भारतीय समाजपार्टी ने चुनाव में 4 सीटें जीतीं और ओम प्रकाश राजभर ने गाजीपुर जिले की जहूराबाद सीट से विधानसभाका चुनाव जीता और 2017 में मुख्यमंत्री आदित्य नाथ योगी के मंत्रिमंडल में पिछड़ा समुदाय कल्याण और विकलांग कल्याण मंत्री बने। श्री कैलाश नाथ सोनकर ने अजगरा वाराणसी, श्री त्रिवेणी राम ने गाजीपुर के जखानिया, श्री रामानंद बौध ने पूर्वी यूपी के कुशीनगर जिले के रामकोला से चुनावों में विजयहासिल की। सुहेलदेव भारतीय समाजपार्टी के तहत, राजभर के नेताओं और जनता ने आवाज उठानी शुरू कर दी, अच्छी शिक्षा, नौकरी और आर्थिक स्थिरता की मांग की और अंत में राजनीतिक प्रतिनिधित्व मांगा। सुहेलदेव भारतीय समाजपार्टीने राज्य विधानसभा चुनाव 2017 में अपनी पहचान बनाई और 2019 के संसदीय चुनाव जीतने के लिए भाजपा का समर्थन किया।
ओम प्रकाश राजभर अपनीमुखर राजनीति के लिए जाने जाते हैं। वे भारतीय जनतापार्टी से विधानसभा चुनाव 2022 से बहुत पहले, गठबंधन तोड़ चुके थे।तथासुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने अपने चुनाव का विगुसल अकेले ही फूका।03 अगस्त 2021 को उनकी बैठकभाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह से हुई और उन्होनें समान शिक्षा, गरीबों को मुफ्त चिकित्सा सुविधा, घरेलू बिजली बिल में छूट, शराबबंदी और सामाजिक न्याय रिपोर्ट का कार्यान्वयनशर्त रखीऐसा ना होने परउन्होंनेसमझौता नहीं किया। तथा भागीदारी संकल्प मोर्चा बनाया और छोटे दलो को बीजेपी के खिलाफलामबंद कियाजिसमेएआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीनओवैसी कोसामिल किया।बाद में ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया।सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने 18 सीटों पर ओम प्रकाश राजभर के नेत्रत्व में 2022 का चुनावमज़बूतीसे लड़ा। सुहेलदेव भारतीय समाजपार्टीप्रमुख अपने बयानों के लिए बहुत चर्चा में रहे।ओम प्रकाश राजभर ने नारा दिया कियूपी में खदेड़ाहोबे।राज्य विधानसभा चुनाव 2022 मेंपार्टी6 सीटें जीतने में सफल रही है।ओम प्रकाश राजभर ने गाजीपुर जिले की जहूराबाद सीट से तथा जाफराबाद जौनपुर से जगदीश नारायण, महादेव बस्ती से दुधराम, जखनिया गाजीपुर से बेदी, मऊ से अब्बास अंसारी, बेलथरा रोड से हंसु रामने जीत हाशिल की।
यहा एक विशेष मुद्दा है कि राजभर लोगों को जुटाने और उनकेवोटों को स्थानांतरित करने के लिए भाजपा द्वारा उतारे गए उम्मीदवार सफल नहीं हुए और राजभर नेताओं काप्रयासनिश्फलरहाऔरचुनाव मेहार मिली।राजभर समाज का ज्यादातर वोट सपा–सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी गठबंधन को पोल हुआवशेष बसपा और बीजेपी को प्राप्त हुआ।
खोज और स्थापनाकी शुरुआत सेमहाराजा सुहेलदेव का गौरवशाली इतिहास, भर शोध संस्थान,राष्ट्रवीर महाराजा सुहेलदेव ट्रस्ट वसुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने अपने 20 वर्ष के सक्रिय राजनीति में राजभर समाज को नई चेतना जागृति और पहचान दी है। राजभर समाज आज अपने समाजिक राजनीतिक व आर्थिक अधिकारो को प्राप्तकरविकसित हो रहा है।
मीडिया में खबर है कि ओम प्रकाश राजभर ने बीजेपी गठबंधन में शामिल होने के लिए गृह मंत्री और बीजेपी नेता अमित शाह से मुलाकात की है। अत:वर्त्तमान उत्तर प्रदेश में राजभर राजनीति का भविष्य पार्टीअध्यक्ष ओम प्रकाश राजभरवसुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी नेतृत्वकेनिर्णयोपर निर्भर करेगा।
– डॉ. संतोष कुमार, सहायक प्रोफेसर इतिहास, अमिटीविश्वविद्यालय, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मामला अंधविश्वास से जुड़ा है या फिर इसके पीछे कोई आस्था है? आखिर लोग पैरों में काला धागा क्यों बांधते हैं? क्या काला धागा दलितों की पहचान के लिए है जैसे द्विज अपनी पहचान बताने के लिए जनेऊ पहनते हैं या फिर अपने हाथ में लाल रंग का धागा बंधवाते हैं? आखिर क्या है इसके पीछे की कहानी? यही मकसद रहा दलित लेखक संघ की अध्यक्ष अनिता भारती का जब दो दिन पहले उन्होंने अपने फेसबुक पर यह सवाल पूछा कि “आजकल हर कोई अपने पैर में काला धागा बांध कर रखता है। कोई इसका कारण बता सकता है?”
जाहिर तौर पर यह एक बुनियादी सवाल है। लेकिन लोगों ने अनिता भारती के सवाल का अजीबोगरीब जवाब दिये हैं। कुछ ने तो इसे पैर में दर्द का इलाज बताया है तो किसी ने किसी की काली नजर से बचने का नुस्खा। हालांकि अनेक ऐसे भी हैं जो इसे सीधे तौर पर खारिज करते हैं और अंधविश्वास करार देते हैं। मसलन, डॉ. शशिधर मेहता इसे टोटका करार देते हैं। वहीं संतोष पटेल की नजर में यह अंधविश्वास है। वहीं सूरज बड़तिया नामक एक शख्स ने मजाकिया लहजे में कहा है – “काला धागा बांधने से अच्छे सपने आते हैं और विदेश जाने की हिम्मत आती है। मैं तो पूरे शरीर में बांधता हूँ”
यह तो अनिता भारती के उपरोक्त सवाल के जवाबों की शुरूआत मात्र है। राजेंद्र कुमार नामक एक व्यक्ति ने कहा है – “ये तो अछूतो की पहचान थी। अब फटे कपड़े काला धागा दिमाग कम की पहचान है।” वहीं जोगपाल सिंह नामक एक व्यक्ति ने थोड़ा विस्तार से लिखा है– “जब देश में मनु स्मृति लागू था तो तब शूद्र जातियों को ब्राह्मणो का आदेश था कि वे लोग पैर में काले धागे में घुंघरू डालकर ही पहनकर अपने घरों से बाहर निकलेंगे, क्योकि जब शूद्र निकलते थे तो उनके पैर में बंधे घुंघरू की आवाज सुनकर ब्राह्मण लोग अपने घरों में चले जाते थे। क्योंकि शूद्रों को उच्च जाति के लोगो के सामने निकलने की अनुमति उस काल में नही थी। आज भी शूद्र लोग मानसिक रूप से गुलाम है जो उसी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं।”
बहरहाल, यह यह एक महत्वपूर्ण सवाल है कि काला धागा बांधने का मतलब क्या है? सबसे महत्वपूर्ण यह कि इसे अब फैशन कहा जाने लगा है और अंधविश्वास तो खैर वजह है ही।
बिहार में सियासी खेल अब भी जारी हैं। बोचहां विधानसभा क्षेत्र में होनेवाले उपचुनाव को लेकर पहले तो मुकेश सहनी ने एनडीए में रहते हुए भाजपा को आंख दिखाते हुए राजद के कद्दावर मंत्री रहे रमई राम की बेटी डॉ. गीता राम को अपना उम्मीदवार बना दिया। वहीं अब उनकी पार्टी के तीन विधायकों ने मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी को छोड़ दिया है और अपना समर्थन भाजपा को दे दिया है। इन तीन विधायकों में एक मिश्रीलाल यादव भी शामिल हैं।
अब सवाल उठता है कि मुकेश सहनी का क्या होगा? वजह यह कि मुकेश सहनी फिलहाल बिहार सरकार में मंत्री हैं? अब जबकि उनके विधायकों ने पाला बदल लिया है तो क्या वे मंत्री पद से इस्तीफा देंगे?
दरअसल, भाजपा मुकेश सहनी से लगातार नाराज चल रही है। उसकी यह नाराजगी तब से है जब यूपी चुनाव में मुकेश साहनी ने अपने उम्मीदवार उतारे। तब भाजपा ने इसे गठबंधन धर्म का अपमान करार दिया था। हालांकि भाजपा ने जदयू के द्वारा यूपी में अलग होकर चुनाव लड़ने के संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की थी। इसकी वजह संभवत: यह कि मुकेश सहनी प्रारंभ से ही एनडीए के सबसे कमजोर कड़ी रहे क्योंकि वह स्वयं विधानसभा का चुनाव जीत नहीं सके थे और एनडीए ने इसके बावजूद उन्हें मंत्री पद दिया था।
अब ऐसे में भाजपा जो कि बिहार में एनडीए का सबसे बड़ा घटक दल है, उसे विश्वास था कि मुकेश सहनी भाजपा को आगे बढ़ाने में मदद करेंगे। लेकिन मुकेश सहनी की पहचान एक महत्वाकांक्षी राजनेता की रही है। वे अपने आधार मतदाताओं को हर हाल में अपने पास रखना चाहते हैं, तो ऐसे में उन्होंने चुपचाप मंत्री पद पर बने रहने की बजाय राजनीति को तवज्जो दी।
इस बीच कई बार ऐसे मौके आए जब लगा कि मुकेश सहनी राजद के साथ चले जाएंगे। लेकिन राजद ने तो उनके लिए पहले ही अपने दरवाजे बंद कर लिया था। बोचहां उपचुनाव में ही राजद ने मुकेश सहनी को बड़ा झटका देते हुए उसके उम्मीदवार अमर पासवान को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया।
बहरहाल, मुकेश सहनी का क्या होगा, यह तो आनेवाला समय ही बताएगा। परंतु, बिहार की राजनीति में जिस तरह से भाजपा अपना कद बढ़ाते जा रही है, वह नीतीश कुमार के लिए खतरे की घंटी ही है।
क्या मुसलमान अपराधी और हिंसक हैं? इसका एक ताजा उदाहरण तो यह है कि हाल में उत्तर प्रदेश में, दो राजनैतिक दलों ने 66 अपराधी राजनेताओं की सूची जारी की है, जिनमें मुस्लिम नेताओं की संख्या सिर्फ पाँच हैं। इसमें भी रामपुर के मोहम्मद आज़म खाँ का नाम सिर्फ इसलिये है कि उन्होंने अपनी एक तकरीर में भारत माँ को डायन कहा था ।
राजनीति को हम अपने विषय का प्रतिपाद्य इसलिये नहीं बना सकते कि राजनीति का अपराधीकरण इतनी तीव्र गति से हो रहा है कि दोनों एक-दूसरे के पर्याय हो गये हैं ।
अत: सच तो यह है कि अपराधी की कोई जाति और कोई धर्म नहीं होता । अपराधी और हिंसक प्रवृत्ति के लोग हर वर्ग और हर समुदाय में मिल जायेंगे । उन्हें किसी वर्ग विशेष या धर्म विशेष से जोड़कर देखना एक ऐसा घृणित सिद्धान्त है, जो एक खतरनाक सांप्रदायिकता को जन्म देता है । हिन्दुओं का यह कहना कि मुसलमान अपराधी और हिंसक होते हैं , मुख्यत: विद्वेष की राजनीति पर आधारित है । यदि हम तथ्यों का निष्पक्ष विश्लेषण करें , तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि हिन्दू दृष्टिकोण निराधार है ।
भारत में मुसलमानों की आबादी 12 प्रतिशत के करीब है और सम्पूर्ण मुस्लिम आबादी का 71.2 प्रतिशत भाग गांवों में रहता है । नगरों में उनकी आबादी सिर्फ 17.8 प्रतिशत है । मुरादाबाद और अलीगढ़ आदि कुछ शहरों में उनकी जनसंख्या 27 प्रतिशत से अधिक होने के कारण उन्हें नागरी समाज मान लिया गया है, जो ग़लत है । मुसलमानों में शिक्षा की बद्तर स्थिति है । अधिकांश मुसलमान अशिक्षित हैं,जो मजदूरी करके जीवन यापन करते हैं । एक विद्वान ने लिखा है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में मुसलमान या तो मजदूर हैं या कृषि से जुड़े छोटे-छोटे व्यवसाय में हैं । उनके व्यवसाय भी उनके हुनर से जुड़े हैं ।ये शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े और आर्थिक दृष्टि से ग़रीबी की रेखा के नीचे आते हैं । क्या ये मजदूर और दस्तकार मुसलमान हिंसक हो सकते हैं ? वह भी उस स्थिति में, जब उनके व्यवसाय हिन्दुओं पर निर्भर करते हैं ?
हिन्दू पंडितों का चिंतन इस तथ्य की सदैव उपेक्षा करता है कि हिन्दू धर्म ने वर्णव्यवस्था के अंतर्गत एक वर्ग विशेष को धन-सम्पत्ति अर्जित करने का अधिकार देकर अपराध और हिंसा को न केवल जन्म दिया है, अपितु उसको वैधानिक स्वरूप भी दिया है । वर्णव्यवस्था के उल्लंघन पर निम्न वर्ग के लोगों के लिये हिन्दू मानस का विधान ‘मनुस्मृति’, जो आज भी गांवों में हिन्दुओं के नीजी कानून के रूप में व्यवहार में है, कितने हिंसक और क्रूरतम आदेश देती है, यह नीचे दिये गये कुछ नमूमों से मालूम हो जायेगा –
“यदि अधम जाति शूद्र ऊंची जाति के कर्मों को करके धन कमाने लगे, तो राजा उसका सब धन छीन कर उसे देश से निकाल दे !”
“ बिल्ली, नेवला, चिड़िया, मेढक, कुत्त, उल्लू और कौए की हत्या में जितना पाप लगता है , उतना ही शूद्र की हत्या में होता है ।
“यदि शूद्र कठोर शब्द कहे तो, उसकी जीभ काट दें ।यदि वह ऊंची जातियों के नाम और जाति का नाम द्रोह से ले तो उसके मुंह में जलती हुई दस अंगुल की कील ठोंक दें । यदि वह अहंकार से ब्राह्मण को धर्म सिखाये, तो उसके मुंह और कान में गरम तेल डाल दें । यदि वह ऊंची जातियों के बराबर आसन पर बैठने की इच्छा करे, तो राजा उसकी कमर दाग़ कर देश से निकाल दें या उसके चूतड़ कटवा दें।”
इन्हीं हिंसक आदेशों के कारण हिन्दुओं को दलितों का उत्थान बरदाश्त नहीं है और वे निरन्न्तर उनको अपनी हिंसा से दबाते रहते हैं । क्या हिन्दुओं की भाँति मुसलमानों को दूसरे मनुष्य पर महज़ इसलिये अत्याचार करने का इस्लाम आदेश देता है कि वे उन्हीं जैसे समान अधिकार चाहते हैं ?
सितम्बर 1990 में करनैल गंज (गौण्डा) के दंगों, अक्टूबर व नवम्बर 1990 में अयोध्या में कारसेवा के बाद भड़के दंगों, नवम्बर 1991 में बनारस के मदनपुरा में हुए दंगों की रिपोर्ट पूर्ण रूप से हिन्दू-आक्रामाकता को ही प्रमाणित करती है । इन दंगों में जिस क्रूर और बर्बर तरीकों से मुसलमान बूढ़े, बच्चों और औरतों का कत्लेआम हुआ, वह अत्यंत मार्मिक, हृदयविदारक और आतंकित कर देने वाला है । वह मनुष्यता के लिये अभिशाप और हिन्दुत्व का वह रूप है, जिसके लिये हिंसक और अपराधी शब्द भी छोटे लगते हैं । उसे यदि कोई सार्थक नाम दिया जा सकता है, तो वह ‘आतंक’ के सिवा दूसरा नहीं हो सकता ।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मुसलमान अतिवादी नहीं हैं ।यह कहना भी उचित नहीं होगा कि मुसलमानों ने दंगों में हिंसक भूमिका नहीं निभायी । किन्तु, इस सच को भी स्मरण रखना होगा कि मुस्लिम-हिंसा प्रतिरक्षा के अर्थ में उत्पन्न हुई है ।
दंगे सिर्फ मुसलमानों को तबाह और बरबाद करने की साजिश होते हैं । प्रमाण इससे अधिक और क्या हो सकता है कि सभी दंगों में हिन्दुओं के सारे हमले मुसलमानों के कारोबारों पर हुए । बनारस का मदनपुरा मौहल्ला मुसलमानों का साड़ी उद्योग का प्रमुख केंद्र था और एक पत्रकार की रिपोर्ट है कि हिन्दुओं ने उस केंद्र को तबाह करने के इरादे से ही बनारस में दंगे की योजना बनायी थी ।” इस आधार पर, मुसलमान , जैसा कि असगर अली इंजीनियर का कथन है , “यह सोचने पर मजबूर करता है कि साम्प्रदायिक तत्व आर्थिक रूप से उसे कभी भी उभरने नहीं देंगें ।” वह आगे कहते हैं –
“ आज मुस्लिम समुदाय स्वंय को चारों ओर से घिरा हुआ महसूस कर रहा है । बहुसंख्यक वर्ग का छोटा सा, किन्तु सशक्त और संगठित साम्प्रदायिक वर्ग दिन-प्रतिदिन आक्रामक और हिंसक रुख अपना रहा है। उनमें मौजूद धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शक्तियाँ कमजोर पड़ रही हैं । मुसलमानों के इतिहास, रहन-सहन रीति-रिवाज और कई मामलों में धार्मिक आचरण पर भी हमले हो रहे हैं ।”
ऐसी स्थिति में , अपनी पहचान बनाये रखने अपने व्यवसायों की असुरक्षा की दृष्टि से हिन्दू आक्रामकता का सामना करना मुसलमानों की स्वभाविक नहीं, तात्कालिक आवश्यकता है । इस आवश्यकता को, उनकी चारित्रिक हिंसा कहना उन्हें बदनाम करने की ही एक खतरनाक साजिश है ।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आजमगढ़ लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया है। मंगलवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला से मिलकर उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया। उनके अलावा उनकी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान ने भी रामपुर लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया है। ये दोनों हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में विजयी रहे हैं। अब अखिलेश विधानसभा में करहल विधानसभा क्षेत्र और आजम खान रामपुर के विधायक के रूप में सदस्य रहेंगे। हालांकि यह तय है कि इस बार विपक्ष की कमान अखिलेश यादव के हाथों में रहेगी।
बताते चलें कि अखिलेश यादव ने विधान सभा चुनाव में करहल सीट से बीजेपी के उम्मीदवार और केंद्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल को 67,504 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में अखिलेश यादव को 1,48,196 वोट मिले तो वहीं एसपी सिंह बघेल ने 80,692 वोट हासिल किए।
दरअसल, पहले यह कयास लगाया जा रहा था कि अखिलेश यूपी की सियासत को मझधार में छोड़ दिल्ली की सियासत करेंगे और विधानसभा में विपक्ष की कुर्सी पर अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव को बिठाएंगे। सूत्र बताते हैं कि इसे लेकर पार्टी में तेज हलचल थी। पार्टी के लोगों का कहना था कि अखिलेश की लीडरशिप में सपा गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया। यह इसके बावजूद कि गठबंधन भाजपा को सत्ता में आने नहीं रोक सकी और 125 सीटों पर सिमट गयी। दल के लोगों का कहना था कि सपा प्रमुख ने सूबे की जनता में यह विश्वास जगाया है कि भाजपा राज का खात्मा किया जा सकता है।
बहरहाल, सांसद पद से अखिलेश यादव के इस्तीफे के बाद यह तो साफ हो गया है कि इस बार योगी आदित्यनाथ की सरकार को विधानसभा में मजबूत विपक्ष का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा अखिलेश के निशाने पर वर्ष 2024 में होनेवाला लोकसभा चुनाव है। उनकी यह कोशिश रहेगी कि भाजपा को यूपी में हराया जाय। यदि भाजपा यूपी में हारती है तो निश्चित तौर पर नरेंद्र मोदी हुकूमत के लिए मुश्किलें होंगी।