Canada में होगा Ambedkar Jayanti का सबसे खास प्रोग्राम, दुनिया भर से जुटेंगे ये दिग्गज

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अंबेडकर जयंती की तैयारियों जोर पकड़ चुकी हैं। चाहे भारत हो, चाहे अमेरिका, चाहे इंग्लैंड या फिर कनाडा, दुनिया भर के अंबेडकरवादियों में अंबेडकर जयंती का खासा उत्साह है।

कनाडा के वैंकुअर के अंबेडकरवादी इसे Dr. Ambedkar International Symposium for Emancipation and Equality Day के तौर पर मना रहे हैं। यानी इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी को मुक्ति और समानता दिवस के रूप में आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम 21 अप्रैल से 26 अप्रैल तक चलेगा। कार्यक्रम का आयोजन चेतना एसोसिएशन ऑफ कनाडा और अंबेडकराइट इंटरनेशनल को-ऑर्डिनेशन सोसाइटी (AICS) संगठन मिलकर कर रहे हैं।

इस अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से शामिल होने के लिए अंबेडकरवादी पहुंच रहे हैं। इस दौरान बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा दिये गए तमाम सिद्धांतों पर लगातार छह दिनों तक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। इसमें बुद्धिज्म से लेकर बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के द्वारा दिये गए समानता के सिद्धांत सहित तमाम महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं।

इस कार्यक्रम में विशेष आमंत्रित सदस्यों में जज नीतू बधान स्मिथ, एमएलए लीला अहिर, ग्लोबल रेडियो से मीरा इस्त्रादा, भंते सरनपाला, दलित दस्तक के संपादक अशोक दास और राज रतन अंबेडकर शामिल होंगे।

इस कार्यक्रम को करने के लिए कई सदस्यों की अलग-अलग कमेटी बनी है।  इसकी स्टेयरिंग कमेटी के सदस्यों में जय बिरदी, परम कैंथ, सुजीत बैंस, हरमेश चंदर, आनंद बाली, हरजिंदर मॉल शामिल हैं। जबकि इसके एकेडमिक एडवाइजर में जेएनयू के प्रो. विवेक कुमार, डॉ. के.पी. सिंह, डॉ. सूरज येंगड़े, डॉ. सुजाता, डॉ. युवराज नरानवारे शामिल हैं।

21 अप्रैल से 26 अप्रैल तक चलने वाले इस आयोजन में 23 अप्रैल को बाबासाहेब की जयंती समानता दिवस के रूप में मनाई जाएगी। जबकि 24 अप्रैल को कनाडा के बर्नाबी शहर में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पन किया जाएगा।

कनाडा का बर्नाबी वह ऐतिहासिक शहर है, जहां की सिटी काउंसिल ने 2020 में बाबासाहेब की जयंती 14 अप्रैल को ‘डॉ. अंबेडकर डे ऑफ इक्वालिटी’ के तौर पर मनाने का ऐलान किया था। बीते साल 2022 में कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रोविंस ने अप्रैल महीने को ‘दलित हिस्ट्री मंथ’ के तौर पर मनाने की घोषणा की थी। इन दोनों बड़ी घोषणाओं में कनाडा के अंबेडकरवादी संगठनों चेतना एसोसिएशन ऑफ कनाडा और अंबेडकराइट इंटरनेशनल को-ऑर्डिनेशन सोसाइटी (AICS) की अहम भूमिका थी।

इस कार्यक्रम में मुझे भी आमंत्रित किया गया है। और मैं 18 अप्रैल से 8 मई तक कनाडा में इस आयोजन सहित तमाम अन्य आयोजनों में शामिल होऊंगा। वहां कॉस्ट एंड मीडिया विषय पर अपनी बात रखूंगा। निश्चित तौर पर इस तरह के कार्यक्रम दुनिया भर के अंबेडकरवादियों को एक साथ लाने और एक नए विचार को दुनिया भर में ले जाने में अहम भूमिका निभाएंगे। इस तरह के आयोजन होते रहने चाहिए।

भारत के सवर्णों के लिए क्यों अछूत हैं “सम्राट अशोक”

इस बार आज 29 मार्च 2023 को सम्राट अशोक की जयंती मनाई गई। ऐसे लोगों द्वारा जो अशोक की महानता को, भारत के लिए उनके योगदान को और बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में उनके योगदान को भूले नहीं है। लेकिन भारत की सरकारों ने उस सम्राट अशोक को अनदेखा कर दिया, जिसके राज्य का चिन्ह आज भी इस्तेमाल होता है। जिसका दिया चक्र, जिसे अशोक चक्र कहा जाता है, भारत के तिरंगे में है। चाहे कांग्रेस की सरकार हो, जनता दल की सरकार हो, गठबंधन की सरकारें रही हों, या अब भाजपा की सरकार हो, भारत की तमाम सरकारों ने अगर सम्राट अशोक को नजरअंदाज कर दिया, तो सवाल उठता है ऐसा क्यों?

पहले बात सम्राट अशोक की। ताकि आप सम्राट अशोक की महानता समझ सकें।

सम्राट अशोक, जिनका जिक्र ईसा पूर्व 304 से ईसा पूर्व 232 को याद करते हुए होता है, भारतीय मौर्य राजवंश के महान सम्राट थे। उनका पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक था। उनका राज्य काल ईसा पूर्व 269 से, 232 प्राचीन भारत में था। तमाम स्रोतों के मुताबिक मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती सम्राट अशोक का साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश, तक्षशिला की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी, सुवर्णगिरी पहाड़ी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बंगाल पाटलीपुत्र से पश्चिम में अफ़गानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान तक पहुँच गया था। सम्राट अशोक का साम्राज्य आज का सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, के अधिकांश भूभाग पर था, यह विशाल साम्राज्य उस समय तक से आज तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य रहा है।

इसी वजह से सम्राट अशोक को ‘चक्रवर्ती सम्राट अशोक’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है- ‘सम्राटों के सम्राट’। यह स्थान भारत में केवल सम्राट अशोक को मिला है। सम्राट अशोक को बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भी जाना जाता है। इस वजह से आज के बौद्ध समाज में सम्राट अशोक को काफी अहम दर्जा दिया जाता है।

सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफ़गानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया। सम्राट अशोक अपने पूरे जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारे। सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र एवं पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा।

बावजूद इसके सम्राट अशोक भारत के सत्ताधारियों के बीच अनदेखे हैं। उनकी महानता का जिक्र सत्ता में बैठे लोग नहीं करते। दरअसल भारत की सत्ता में बैठे लोग सम्राट अशोक को एक चक्रवर्ती राजा के तौर पर तो याद करना चाहते हैं, लेकिन वो सम्राट अशोक को ऐसे महान राजा के रूप में याद नहीं करना चाहते, जिसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था और जिनकी वजह से न सिर्फ भारत बल्कि एशिया के कई हिस्से बौद्धमय हो गए। क्योंकि ऐसा करना उनको सूट नहीं करता।

दरअसल सम्राट अशोक और बौद्ध धर्म से उनके जुड़ाव की कहानी ऐतिहासिक कलिंग युद्ध के बाद परवान चढ़ी। हालांकि वो पहले से ही कुछ बौद्ध भिक्खुओं के संपर्क में थे। लेकिन कलिंग युद्ध में जब लाखों लोग मारे गए तो सम्राट अशोक परेशान हो गए। उनका मन मानवता के प्रति दया और करुणा से भर गया। और उन्होंने फिर कभी युद्ध न करने की प्रतिज्ञा की। यहाँ से अशोक के आध्यात्मिक और धम्म जीवन का युग शुरू हुआ। और महान चक्रवर्ती सम्राट ने महान बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया।

 अशोक की यही पहचान भारत की सत्ता में एक के बाद एक आने वाले नेताओं और राजनैतिक दलों को रास नहीं आती है। क्योंकि अगर वो सम्राट अशोक का जिक्र करेंगे तो उन्हें अशोक की महानता का जिक्र करना पड़ेगा। उनके शासनकाल में हुए तमाम ऐतिहासिक कामों को याद करना पड़ेगा।

उन्हें बताना पड़ेगा कि सम्राट अशोक के ही समय में 23 विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई थीl जिसमें विश्वविख्यात तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, कंधार, आदि विश्वविद्यालय प्रमुख थे। …. उन्हें बताना पड़ेगा कि सम्राट अशोक के शासन काल को विश्व के बुद्धिजीवी और इतिहासकार भारतीय इतिहास का सबसे “स्वर्णिम काल” मानते थे। उन्हें बताना पड़ेगा कि वह सम्राट अशोक का ही शासनकाल था, जिसमें भारत “विश्व गुरु” था और सोने की चिड़िया कहलाया। जनता खुशहाल थी, लोगों के बीच कोई भेदभाव नहीं था।

आज की सरकारों को बताना पड़ेगा कि सम्राट अशोक के ही शासनकाल में सबसे प्रख्यात महामार्ग “ग्रांड ट्रंक रोड” जैसे कई हाईवे बने। लोगों के ठहरने के लिए सरायें बनायीं गईं थी। मानव तो मानव सम्राट अशोक के शासन में पशुओं के लिए भी पहली बार “चिकित्सालय” (हॉस्पिटल) खोले गएl पशुओं को मारना बंद करा दिया गया।

लेकिन मैंने जैसा कहा कि यह भारत की सत्ता में बैठे लोगों को सूट नहीं करता। क्योंकि जब वो अशोक का जिक्र करते हुए उनकी महानताओं का जिक्र करेंगे तो सवाल उठेगा कि अब अशोक जैसा शासन क्यों नहीं है? सवाल उठेगा कि फिर जब सम्राट अशोक के समय भारत बौद्धमय था, तो फिर बौद्ध धर्म कैसे खत्म हो गया। और इस सवाल का जवाब देने में कई लोगों के नकाब उतर जाएंगे। कई ऐसे लोगों का नाम आएगा, इतिहास कुरेदा जाएगा। भारत की सरकारें उस इतिहास को दबाए रखना चाहती है।

तब बात बौद्ध धर्म की भी आएगी। भारत के सत्ताधारियों को बताना पड़ेगा कि  मगध साम्राज्य जिसके सम्राट अशोक थे, का इतिहास, भारत का इतिहास रहा है। उन्हें बताना पड़ेगा कि सम्राट अशोक ने अपने साम्राज्य के हर कोने में शिलालेखों, स्तंभलेखों सहित अन्य अभिलेखों के जरिये आम लोगों को नैतिक के अलावे जीवन की बेहतरी की शिक्षा दी। बताना पड़ेगा कि अशोक के दो लघु शिलालेख, 14 वृहद शिलालेख, 07 स्तंभ लेख, तीन गुफा लेख, चार लघु सतंभ लेख, दो स्मारक स्तंभ लेख मिले हैं। इन अभिलेखों के कई संस्करण अलग-अलग जगहों पर उत्कीर्ण करवाए गए हैं।

उन्हें बताना पड़ेगा कि सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए 84 हजार बौद्ध स्तूप बनवाएं। बस बात यहीं आकर रूक जाती है। क्योंकि हिन्दू राष्ट्र बनाने की होड़ में अशोक का बौद्ध प्रेम एक बड़ी बाधा है।

इसलिए भारत की सत्ता में बैठे लोग अशोक काल में उकेरे गए प्रतीतात्मक चिह्न, जिसे हम ‘अशोक चिह्न’ के नाम से जानते हैं और जो आज भारत का राष्ट्रीय चिह्न है, उसका तो इस्तेमाल करेंगे। वो सम्राट अशोक के राज चिन्ह “अशोक चक्र” को अपने भारतीय ध्वज में तो लगाएंगे। वो सम्राट अशोक के राज चिन्ह “चारमुखी शेर” को भारतीय “राष्ट्रीय प्रतीक” तो मानेंगे, देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध सम्मान, सम्राट अशोक के नाम पर “अशोक चक्र” तो देंगे, लेकिन भारत के सम्राट अशोक को याद नहीं करेंगे।

यह हैरान करने वाली बात है कि जिस सम्राट अशोक से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ जिसने “अखंड भारत” पर एक-छत्र राज किया हो। और जिसके नाम के साथ दुनिया भर के इतिहासकार “महान” शब्द लगाते हैं। उन्हीं के देश में उनकी जयंती नहीं मनाई जाती और ना ही कोई सार्वजानिक अवकाश रहता है।

जरा सोचिए, अगर सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म नहीं अपनाया होता तो भी क्या भारत की सरकार और आजादी के बाद से अब तक सत्ता में बैठे लोग उन्हें इस तरह अनदेखा करते? शायद नहीं। सरकारें भले सम्राट अशोक को भुला देना चाहती हों, लेकिन भारत का अंबेडकरवादी समाज अपने उस सम्राट को आज भी आदर देता है, वही है जो अशोक जयंती पर कार्यक्रम करता है, सम्राट अशोक को याद करता है। भारत को, भारत की सरकार को भी अपने इस महान सम्राट को वह सम्मान देना होगा, जिसके वह हकदार हैं। इसके लिए आवाज उठाने का वक्त आ गया है।

मध्यप्रदेश में जमीन पट्टा न मिलने से परेशान आदिवासी समाज

मध्यप्रदेश का मण्डला जिला एक आदिवासी बाहुल्य है। जो पांचवी अनुसूची क्षेत्र में आता है। इस जिले में बसे आदिवासी समुदाय की आजीविका का प्रमुख साधन खेती है। लेकिन, सहजता से खेती कर पाना इतना सरल नहीं है, यह हमें मण्डला जिले का मोहगांव ब्लॉक बताता है। इस ब्लॉक के 12 गाँव में आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी लोग पीढ़ियों से राजस्व और वन भूमि पर खेती करते आ रहे हैं, लेकिन इन ग्रामीणों को आजतक भू-अधिकार पत्र (पट्टा) प्रदान नहीं किये गये हैं। भूमि के पट्टे ना मिलने से आदिवासी और अन्य परंपरागत निवासी सरकार की किसान सम्मान निधि, कृषि क्षतिपूर्ति जैसी अन्य योजनाओं से वंचित रह जाते है। वहीं, पट्टा न मिलने से लोग जमीन पर आधिकारिक हक भी नहीं जता पाते।

ऐसे में यहां के निवासियों ने दखल रहित भूमि अधिनियम 1970 के प्रावधान के तहत एक अभियान चलाकर कलेक्टर के नाम 300 व्यक्तिगत ज्ञापन सौंपा है। किसानों के इन ज्ञापनों को जब हम देखते और अध्ययन करते हैं, तब ज्ञापन में उल्लेखित जानकारी का अंश कुछ इस प्रकार उल्लिखित मिलता है:-

मैं सियाराम झारिया पिता राम कृपाल, ब्लॉक मोहगांव, जिला मंडला मध्यप्रदेश का मूल निवासी हूं। मैं राजस्व भूमि विगत 50 वर्षो, पीढ़ियों से काबिज होकर मकान बनाकर रहा हूं। मेरे पास अजीविका का यही मात्र एक साधन है। …. श्रीमान जी से प्रार्थना है कि, हमारी अर्जी को संज्ञान में लेते हुए, मध्यप्रदेश सरकार की मंशा अनुसार उचित जांच कराकर (भू-अधिकार पत्र) दिलाने का कष्ट करें। जिससे हम अपने परिवार का भरण-पोषण अच्छे से कर सकें। जगह काबिज अनुमानित रकबा 1 एकड़ है।

ऐसा ही, वर्णन 300 किसानों ने अपने ज्ञापनों में किया है। कलेक्टर के नाम पट्टा प्राप्ति का ज्ञापन सौपने वाले कुछ किसानों से हमने बात की। जिनमें से एक किसान सहदेव कुमार भवेदी भी है। इनका कहना है कि,‘जब मैं पैदा नहीं हुआ था, तब से हमारी इस जमीन पर हम खेती करते आ रहे हैं। हमें इस गैर पट्टा वाली जमीन पर किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलता है। हमारी सरकार से मांग है कि हमारी जमीन का पट्टा बनाये। पट्टा ना होने से गांव वाले कहते हैं पट्टा है नहीं, जमीन पर कब्जा किये हो। ऐसे में लड़ाई के हालात बन जाते हैं। यहां सवाल यह है कि क्या इस स्थिति में सहदेव कुमार भवेदी सहित अन्य किसानों के स्वतंत्रता और बंधुता जैसे संवैधानिक मूल्य प्रभावित नहीं होते?

किसानों की काबिज भूमि के पट्टे प्राप्ति का अभियान चलाने में अहम भूमिका निभाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार सिन्हा का कहना है कि, ‘यह कहानी मंडला जिले के मोहगांव ब्लॉक के 12 गाँवों की है। जहां पीढ़ियों से लोग काबिज भूमि पर खेती करते आ रहे हैं। लेकिन उन्हें अब तक पट्टा नहीं मिला। जिससे किसानों को कृषि योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिलता। सिन्हा आगे कहते हैं, ‘मेरे ख्याल से मध्यप्रदेश में अगर सर्वे किया जाए, तो ऐसे हजारों परिवार मिलेगें। जो कि पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं। लेकिन उन्हें पट्टे नहीं मिले।

इस पूरे मामले में सरकार का रुख सरकार पर कई सवाल खड़े करता है। मध्य प्रदेश सरकार जो शहरों में बसाहट है; उसकी नजूल भूमि का पट्टा देने की तो बात कर रही है, लेकिन ग्रामीण इलाको में जो लोग खेती करते आ रहे हैं, उनके पट्टे के बारें में अभी तक सरकार का कोई जवाब नहीं आया। प्रभावित परिवारों का सवाल है कि क्या पीढ़ियों से खेती कर रहे लोगों को पट्टा ना मिलना और उनका जवाब ना आना लोगों के विश्वास और न्याय जैसे संवैधानिक मूल्यों पर संकट पैदा नहीं करता?

जमीन पट्टों के संबंध में कानून की बात करें तब वन अधिकार अधिनियम 2006 आदिवासियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को वन संसाधन भूमि अन्य के अधिकारों की मान्यता प्रदान करता है। यह कानून व्यक्तियों, परिवारों और समुदायों को जमीन और जंगल का हकदार बताता है। मुख्यत: ग्रामसभा को दावों और अधिकारों की प्रक्रिया चलाने के लिए मजबूत करता है। ऐसे ही, पेसा एक्ट जो जल, जंगल और जमीन के अधिकार और आदिवासियों को मजबूत बनाने की बात करता है। इन दोनों अधिनियम के सहारे ही आदिवासी एवं अन्य मूलनिवासी लोग जमीन पट्टों की माँग करते हैं। लेकिन, उनकी यह मांग अक्सर ज्ञापनों और फ़ाइल्स में सिमट कर रह जाती है।

मंडला में जमीन पट्टे की समस्या इतनी व्यापक है कि वन भूमि अधिकार पत्र हासिल करने के लिए आदिवासी वर्ग के लोगों ने कलेक्टर के अलावा अन्य अधिकारियों को व्यक्तिगत के अलावा सामूहिक आवेदन भी लिखे। इन्हीं आवेदनों में से एक आवेदन अनु-विभागीय अधिकारी मंडला को लिखा गया। आवेदन का कुछ अंश इस प्रकार हैं-

यह आवेदन मध्यप्रदेश सरकार की मंशा अनुसार 13 दिसम्बर 2005 के पूर्व से वनभूमि में काबिज लोगों को वन अधिकार पत्र दिलाए जाने के संदर्भ में है। आवेदन में वर्णित है कि हम समस्त आवेदक गण ग्राम सिमैया, ग्राम पंचायत सिंगापुर, जिला मंडला के मूल निवासी हैं। हम पिछली कई पीढ़ियों से गांव में निवास और खेती करते आ रहे हैं। जिससे हमारे परिवार का पालन पोषण होता है।

पत्र में आगे जिक्र है कि, सन् 2006 में वन अधिकार अधिनियम आने से हमने दावा फार्म भरा है। वन अधिकार पत्र हेतु 2010 से निरंतर कार्यवाही चल रही है। जबकि ग्राम सभा से संकल्प पारित करवाकर एवं गांव के बुजुर्गों का कथन एवं सभी साक्ष्य लगाकर दावा पेश कर चुके हैं। इस वन भूमि को कृषि योग्य बनाने में हमारा काफी श्रम व धन लगा हुआ है। पत्र में आगे वर्णित है: काबिज वन भूमि का संबंधित विभाग द्वारा भौतिक निरीक्षण किया जा चुका है।

फिर, पत्र में लिखा गया कि महोदय जी से निवेदन है कि हम सभी दावेदारों की अर्जी को अपने संज्ञान में लेते हुए हमें वन अधिकार पत्र दिलाने की कृप्या करें। इन वन अधिकार दावेदारों में बलमत, इमरत, चरणलाल और मनीराम सहित 12 लोगों के नाम शामिल है। वन अधिकार पत्र की मांग को लेकर इसी तरह चुभावल ग्राम पंचायत के आदिवासी लोगों ने सामूहिक आवेदन कलेक्टर (मंडला) को लिखा। इस आवेदन पत्र में राजकुमार, लल्लु, सुखदेव और बुधियाबाई सहित 11 लोगों के नाम दर्ज हैं।

अब सवाल यह है कि इतनी कार्यवाही करने और भूमि के भौतिक निरीक्षण के बावजूद पट्टा ना दिया जाना, क्या किसानों की विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद 14) को नजर अंदाज नहीं करता?

वहीं, मंडला से करीब 50 किमी दूर एक गाँव है ओढ़ारी। यहाँ बसनिया बांध (अनुमानित लागत 2700 करोड़ रुपए) प्रस्तावित है। बांध में 31 गाँव डूब क्षेत्र में आएंगे। इसमें ग्राम ओढ़ारी भी शामिल है। इस गाँव (ओढ़ारी) के भूतपूर्व सरपंच लम्मू सिंह माराबी सहित कुछ आदिवासी लोगों का दावा है कि, ‘गाँव में लगभग 60 प्रतिशत लोग 80-90 वर्षों (दादा-परदादा) के समय से वन और राजस्व भूमि पर खेती करते आ रहें हैं। लेकिन हमलोगों को अब तक भू-अधिकार पत्र (पट्टा) नहीं मिला। हमने कई बार पट्टे की मांग की, पर पट्टा नहीं मिला।’

जमीन पट्टे से जुड़े इस मामले में ‘दलित दस्तक’ ने वन विभाग का पक्ष जानना चाहा। वन विभाग का रवैया टाल-मटोल वाला रहा। विभाग का कहना था कि ‘अभी उन लोगों को कोई यहां से भगा नहीं रहा है। जब भगायेगा तो देखा जायेगा।’ लेकिन श्याम सिंह टेकाम सहित अन्य आदिवासियों का इस मामले में अलग मत है। वर्तमान स्थिति का जिक्र करते हुए वो कहते हैं कि, ‘आज की स्थिति यह है कि बसनियाँ बांध ओढ़ारी ग्राम में प्रस्तावित किये जाने से हमारा पट्टा भी गया और जमीन (जीविका का एक मात्र साधन) भी जा रही ऐसे में हमारी जीविका पर सीधा संकट पैदा हो जायेगा।

ओढ़ारी ग्रामवासियों ने यह भी कहा कि,‘पटटे की समस्या केवल हमारे गांव की ही नहीं, बल्कि हमारे आस-पास धनगांव, चिमकाटोला, रम्पुरा, बिलगड़ा जैसे अन्य आदिवासी गांव की भी है। ओढ़ारी या अन्य ग्रामवासियों की जमीन यदि बसनिया बांध डूबती है और उन्हें पट्टा ना होने से मुआवजा नहीं मिलता। तब क्या इन ग्रामवासियों के आर्थिक न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य का हनन नहीं होगा?

मध्य प्रदेश में जमीन पट्टों के इन मामलों को विधानसभा में मंडला के क्षेत्रीय (निवास विधानसभा) विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले ने उठाया था। लेकिन, समाधान योग्य कोई जवाब नहीं आया। विधायक अशोक मर्सकोले द्वारा विधानसभा में यह सवाल उठाया गया था। उन्होंने पूछा था कि, क्या राजस्व मंत्री महोदय यह बताने की कृप्या करेंगे कि शासकीय राजस्व भूमि पर विगत कई वर्षो से खेती करते आ रहे काश्तकारों को पट्टा देने की क्या कार्य योजना और प्रावधान है? उन्होंने राज्य सरकार से भूमि काबिज गरीब किसानो को पट्टा देने के आदेशों की जानकारी भी मांगी थी।

तब इस सवाल को लेकर राजस्व मंत्री गोविन्द सिंह राजपूत का जो जवाब आया; उसे देखना भी जरूरी है। उनका कहना था कि मध्यप्रदेश नजूलनिर्वर्तन नियम 2020 के अध्याय-7 कंडिका 128 से 136 में प्रावधान किये गये हैं। म.प्र. नजूल निर्वर्तन नियम 2020 के प्रभावी होने से पूर्व में जारी सभी निर्देश निरस्त हो गये है। इसी तरह पट्टों की समस्या को लेकर पहले भी अन्य विधायक भी विधानसभा में सवाल पूछ चुके। भू-अधिकार समस्या बरकरार है।

जब हमने विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले से जमीन पट्टों के बारें में बातचीत की। तब विधायक मर्सकोले का कहना था कि ‘राजस्व के वो पट्टे राजस्व विभाग के अंतर्गत आते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में कई सालों से लोगों ने कब्जा किया है, जिनका निराकरण होना है। मगर शासन स्तर पर कार्यवाही या फाइल आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसलिए वो पट्टे नहीं मिल रहे। और ऐसा ही प्रकरण वन अधिकार के पट्टों जैसा है।’ विधायक अशोक मर्सकोले आगे कहते हैं कि, ‘…पिछली बार मैंने (पट्टा समस्या को लेकर) विधानसभा में प्रश्न लगाया था, तब उसके उत्तर में नजूल भूमि का ही जिक्र किया गया। जमीन पट्टों के ये प्रकरण यहीं तक सीमित नहीं, ये बहुत बड़े स्तर पर हैं।’

वास्तव में आदिवासी वर्ग को पट्टे ना मिल पाने की यह कहानी केवल मंडला जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्यप्रदेश के गुना और विदिशा जिले में भी आदिवासी समूह ऐसी ही मुश्किल से जूझ रहा है। गुना जिले के सहरिया आदिवासियों को वन भूमि पट्टों की प्राप्ति हेतु देश व्यापी संगठन एकता परिषद के गुना केंद्र ने मई 2022 को एक ज्ञापन पत्र कलेक्टर के नाम लिखा। पत्र में बताया गया कि वन अधिकार कानून 2006 के तहत 13 दिसम्बर 2005 से पूर्व वन भूमि पर काबिज हितग्राहियों ने (भूमि) अधिकार पाने के लिए आनलाईन आवेदन किये हैं। यह आवेदन वर्तमान में ब्लॉक स्तरीय कमेटी व जिला स्तरीय कमेटी के पास लंबित हैं। इस पत्र में आगे पट्टों सहित आदिवासियों की अन्य मूलभूत आवश्यकताओं के समाधान की मांग की गयी।

एक परिषद के जिला संयोजक सूरज सहरिया ने हमें एक सूची भी सौंपी। सूची में दावा किया गया कि गुना जिले की बम्हौरी तहसील में ही आदिवासी वर्ग के 2822 वन अधिकार दावे निरस्त किये गये। वहीं, अन्य परंपरागत दावों की निरस्ती का आंकड़ा 4679 (बम्हौरी तहसील) है। वहीं; एमपी वन मित्र पोर्टल कि रिपोर्ट मार्च 2022 के अनुसार गुना जिले की पांच तहसीलों क्रमशः आरोन, गुना, चाचैड़ा, बम्हौरी और राघौगढ़ में आदिवासी वर्ग के 6202 वन अधिकार दावे निरस्त किये गये।

जब हमने विदिशा जिले में आदिवासी लोगों से जमीन पट्टों की समस्या को लेकर मुलाकात की। तब गंजबासौदा तहसील के रातन सिंह सहरिया सहित कई आदिवासी लोगों ने बताया कि हम सालों से वन भूमि पर खेती करते आ रहें हैं, मगर अबतक किसी भी कृषि योजना का फायदा नहीं मिला। वन भूमि की खेती के नाम पर कुछ साल पहले हम लोगों को एक सरकारी पत्र बस दिए गए थे। क्या इन लोगों के साथ संविधान की प्रस्तावना में, आर्थिक न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य का पालन हुआ? शायद उतना नहीं जितना जरूरी था।

जब आदिवसियों को दिए इन पत्रों को हम देखते और अध्ययन करते है, तब हमें पत्रों में ऊपरी भाग पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, मध्यप्रदेश शासन और प्रति (प्राप्तकर्ता) का नाम लिखा मिलता है। पत्र में आगे वर्णित किया गया कुछ अंश ऐसे है- आप विगत कई वर्षों से वनभूमि का उपयोग करते रहें है, परंतु आपको उस पर कोई हक नहीं मिल सका। पहली बार मेरी सरकार ने आपके दावे को स्वीकार कर वन भूमि पर आपको अधिकार पत्र दिया है। अब आप अपनी भूमि को बिना किसी रुकावट के उपयोग कर सकते हैं। भूमि पर आपका अधिकार सुरक्षित रहेगा और आने वाली पीढ़ियां भी इसका लाभ लें सकेगीं। यह पत्र, अक्टूबर, 2009 का लिखा है। लेकिन, पत्र में यह नहीं लिखा है की प्राप्तकर्ता को कितनी जमीन दी गई है।

मध्यप्रदेश में जमीन पट्टे की मांग सिवनी (पांचवीं अनुसूची क्षेत्र) जिले से भी उठ रही है। जिले की जनपद पंचायत घंसौर, ग्राम पंचायत बखारी माल और धूमामाल के बरगी बांध विस्थापितों ने एक पत्र, दिनांक 22-02-2023 मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नाम लिखा है। पत्र में कहा गया कि, वन अधिकार कानून 2006 के तहत पूर्व से काबिज दावेदारों को जांच उपरांत भू-अधिकार पत्र प्रदान किये जाएंगे। इस पत्र के जरिए प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि ना मिलने जैसी कई मूलभूत समस्याओं के समाधान की मांग की गयी।

मध्यप्रदेश में आदिवासी समुदाय के जमीन पट्टों की समस्या इतनी विकट है कि बड़वानी (पांचवी अनुसूची क्षेत्र) जैसे जिले में जायस (जय आदिवासी युवा शक्ति) संगठन करीब तीन सप्ताह तक जमीन पट्टों को लेकर धरना प्रदर्शन कर चुका है। लेकिन, बड़वानी की हालत यह है कि जिले की जनपद पंचायत निवाली के वन अधिकार अधिनियम अंतर्गत 683 भू-अधिकार पत्र दावों को वर्ष 2019 में निरस्त किया गया। वहीं, पिछले साल 2022 में निवाली के 690 भू-अधिकार दावे निरस्त हुए।

जब हम मध्यप्रदेश स्तर पर वनाधिकार दावों की निरस्ती देखते हैं, तब हमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का जून 2020 में दिया वह बयान याद आता है, जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि, ‘प्रदेश में 3 लाख 58 हजार 339 वन अधिकार दावों को निरस्त किया जाना दर्शाता है कि अधिकारियों ने काम को गंभीरता से नहीं लिया। अधिकारी माइंडसेट बना ले, गरीब के अधिकारों को वो छीनने नहीं देंगे।’

सीएम ने कलेक्टर और वन मण्डल अधिकारियों से यह भी कहा था कि ‘कोई भी आदिवासी जो 31 दिसम्बर 2005 को या उससे पहले से भूमि पर काबिज है उसे अनिवार्य रूप से भूमि का पट्टा मिल जाए। कोई पात्र आदिवासी पट्टे से वंचित न रहे। काम मे थोड़ी भी लापरवाही हुई तो सख्त कार्यवाही होगी। सीएम का कहना था कि आदिवासी समाज का ऐसा वर्ग है जो अपनी बात ढंग से बता भी नहीं पाता ऐसे में उन से पट्टों के साक्ष्य मांगना और उसके आधार पर पट्टों को निरस्त करना गलत है।’

वहीं, हम राष्ट्रीय स्तर पर भू-अधिकार दावे निरस्ती का जब रिकार्ड देखते हैं। तब हमें ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट से पता चलता है कि, मई 2015 तक सरकार को 44 लाख वन अधिकार दावे प्राप्त हुए, लेकिन, इसमें 17 लाख लोगों को ही अधिकार पत्र प्राप्त हुआ। ऐसे में, जब हम देश में दायर किए गए वन अधिकार दावों की स्थिति देखते हैं तो जनजातीय मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, नवम्बर 2022 तक, वनाधिकार कानून 2006 के अंतर्गत 42,97,245 व्यक्तिगत दावे प्राप्त हुए। जिनमें 21,46,782 (करीब 50%) दावों को भूमि अधिकार प्राप्त हुआ। वहीं, 1,69,372 सामुदायिक दावें प्राप्त हुए, जिसमें 1,02,889 (करीब61%) दावों को भू-अधिकार मिला। आगे, 14 दिसम्बर 2022 को जनजातीय मंत्रालय की तरफ से पेश किए गए डेटा से पता चला कि, जून 2022 तक दायर दावों में से करीब 50 फीसदी दावों का ही निपटारा हुआ है।

विचारणीय है कि एक तरफ आदिवासी वर्ग सालों से जमीन पट्टों की मांग करता आ रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ लाखों भू-अधिकार दावें निरस्त हो रहें हैं और दावों का निपटारा भी नहीं हो पा रहा है। ऐसी स्थति में, आदिवासी वर्ग के गरिमा पूर्ण जीवन जीने की आजादी, न्याय, विश्वास, समता जैसे संवैधानिक मूल्यों पर संकट बरकरार है। आदिवासी वर्ग को लेकर हमें बार-बार सुनने मिलता हैं कि,‘‘जल, जंगल और जमीन, ये हैं आदिवासी के अधीन, लेकिन हकीकत बिल्कुल इससे उलट है। आदिवासी वर्ग आज भी भूमि जैसे अन्य संसाधनिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।

अमेरिका और कनाडा का अंबेडकर जयंती को लेकर बड़ा फैसला

अमेरिका के दो राज्यों ने एक ऐसा बड़ा फैसला किया है, जो दुनिया भर में मौजूद अंबेडकरवादियों के लिए बड़ी खबर है। बहुजन समाज की मुक्ति के लिए काम करने वाले दो महानायकों बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर और महात्मा ज्योतिराव फुले की जयंती को देखते हुए अमेरिकी राज्य वाशिंगटन ने जहां अप्रैल महीने को दलित हिस्ट्री मंथ घोषित किया है, तो मिशिगन राज्य ने 9 अप्रैल से 15 अप्रैल के सप्ताह को सोशल इक्विटी वीक घोषित किया है। इन दोनों राज्यों के गवर्नर ने इस बारे में एक आदेश जारी किया है। इस आदेश में जो लिखा गया है, औऱ जिस तरह से बाबासाहेब आंबेडकर और महात्मा जोतिराव फुले को याद किया गया है, वह काफी अहम है। वहीं दूसरी ओर कनाडा के Burnaby City में बाबासाहेब अम्बेडकर की जयंती का दिन (14 अप्रैल) Dr. B.R Ambedkar Day Of Equality के रूप में मनाया जाएगा। 

 वाशिंगटन स्टेट के गर्वनर जे. इंसली ने अप्रैल महीने को Dalit History Month घोषित किया है। 27 मार्च को इस संबंध में आदेश जारी करते हुए डॉ. आंबेडकर और ज्योतिबाराव फुले के योगदान को जिस तरह रेखांकित किया गया है, वह काफी अहम है। बाबासाहेब आंबेडकर और ज्योतिबा फुले का जिस तरह गुणगान किया गया है, वह बहुजन समाज के लिए गर्व की बात है।

अपने आदेश में गर्वनर जे. इंसली ने कहा है कि- वाशिंगटन राज्य एक ऐसा घर है, जहां डायवर्सिटी है। और अमेरिका का संविधान और वाशिंगटन स्टेट इस बात को सुनिश्चित करता है कि यहां रहने वाले हर व्यक्ति को समान अधिकार, सम्मान और बराबरी का दर्जा मिले।

अप्रैल में महत्वपूर्ण दलित लीडर और सोशल रिफार्मर डॉ. बी. आर. अंबेडकर और महात्मा ज्योतिराव फुले की जयंती है, जिन्होंने भारत में सिस्टेमेटिक डिस्क्रिमीनेशन के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया। इस वजह से यह दलितों के लिए एक महत्वपू्र्ण महीना है। …. चूंकि महात्मा ज्योतिराव फुले और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने जो आंदोलन किया उसने वंचित शोषित समाज के लाखों लोगों को, जिसमें हर समाज की महिलाएं भी शामिल हैं, उनके जीवन को बेहतर बनाया। और इससे करोड़ों वंचितों को सम्मान के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक बराबरी मिली, जिससे उन्हें न केवल भारत में बल्कि अमेरिका में भी सम्मान के साथ जीने का मौका मिल पाया।

इस आदेश में गवर्नर ने जो आगे कहा है उसे मैं हू-ब-हू अंग्रेजी में ही बता रहा हूं, ताकि उस भाव को आप बेहतर महसूस कर सकें। इन दोनों महानायकों के बारे में गवर्नर ने लिखा है कि- The work of these great social reformers is recognized for the revival of democretic principals in modern india to embrace the principles in modern india to embrace the principles of compassion and non violence for a society that leads to equality, liberty, justice and fraternity.

इसमें आगे कहा गया है कि यह महीना इक्विटी, सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और गरिमा के प्रति समर्पण की विरासत को याद रखने और सम्मान देने का एक अवसर है, जो वाशिंगटन और दुनिया भर के लोगों को प्रेरित करता है। ऐसे में वाशिंगटन राज्य भारत के लाखों वंचित लोगों की मुक्ति का जश्न मनाने के  लिए वाशिंगटन में रहने वाले लोगों को इस जश्न में शामिल होने की अनुमति देता है।

निश्चित तौर पर वाशिंगटन के गवर्नर ने जिस तरह से बाबासाहेब आंबेडकर और राष्ट्रपिता जोतिराव फुले को याद किया है, वह शानदार है। लेकिन रुकिये वाशिंगटन की तरह ही मिशिगन स्टेट की गवर्नर ग्रेचन व्हिटमर ने भी एक आदेश जारी किया है। जिसमें  9 अप्रैल से 15 अप्रैल को “सोशल इक्विटी वीक” के तौर पर मनाए जाने की घोषणा की है।

दरअसल पिछले कुछ सालों में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर और जोतिबाराव फुले सरीखे वंचित समाज में जन्में महानयकों के योगदान को दुनिया याद कर रही है। साल 2021 में ब्रिटिश कोलंबिया कनाडा ने बाबासाहेब आंबेडकर की जयंती 14 अप्रैल को “Dr. B. R. Ambedkar Equality Day” के तौर पर मनाने की घोषणा की थी। साल 2022 में भी बरनबी सिटी के मेयर ने भी बाबासाहेब की जयंती को “Dr. Ambedkar day of Equality” के तौर पर डिक्लेयर किया था।

तो वहीं दूसरी ओर कनाडा के Burnaby City में बाबासाहेब अम्बेडकर की जयंती का दिन (14 अप्रैल) Dr. B.R Ambedkar Day Of Equality के रूप में मनाया जाएगा। कनाडा में रहने वाले अंबेडकरवादियों के प्रयास से यहां अंबेडकरी आंदोलन जोर पकड़ चुका है।

इस पूरी खबर में सबसे बड़ी बात यह है कि जब दुनिया में बाबासाहेब आंबेडकर को याद किया जा रहा है, उनकी जयंती की तैयारियां हो रही है, भारतीय मीडिया इस बारे में चुप है। जब अमेरिका जैसे देश में वाशिंगटन जैसे राज्य बाबासाहेब आंबेडकर और जोतिबा फुले की जयंती को Dalit History Month घोषित कर रहे हैं। भारत की मनुवादी मीडिया आंख मूदे हैं।

अब हार्वर्ड युनिवर्सिटी में जातिवाद बैन, अंबेडकरवादियों की बड़ी जीत

अमेरिका के सिएटल शहर में जाति आधारित भेदभाव बैन होने के बाद अब दूसरी खबर हार्वर्ड युनिवर्सिटी से आई है। अमेरिका के बोस्टन में स्थित दुनिया की शानदार युनिवर्सिटी में से एक हार्वर्ड युनिवर्सिटी ने भी अपने नॉन डिस्क्रीमिनेशन पॉलिसी में जाति को भी शामिल कर लिया है। यह एक सितंबर 2023 से लागू होगा। जब दुनिया भर में फैले अंबेडकरवादी बाबासाहेब अंबडेकर की जयंती की तैयारियों में जुटे हैं, उसके ठीक पहले आई इस खबर से अंबेडकरवादियों में खासा उत्साह है।

इसकी घोषणा करते हुए हार्वर्ड युनिवर्सिटी ने कहा है कि हार्वर्ड युनिवर्सिटी शिक्षा और रोजगार में सभी को समान मौका देने के लिए कमिटेड है। इसके साथ ही पहले से ही 14 तरह के भेदभाव को अपनी नॉन डिस्क्रीमिनेशन पॉलिसी में शामिल करने वाली हार्वर्ड युनिवर्सिटी ने इसमें कॉस्ट यानी जाति को भी जोड़ लिया है। इस लड़ाई को लड़ने वाले तमाम संस्थाओं में से एक अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर ने इस जानकारी को साझा किया। इस घोषणा के बाद दुनिया भर के अंबेडकरवादियों में खुशी की लहर है। जिस तरह से जाति आधारित भेदभाव को अब दुनिया भर में समझा जाने लगा है, वह सालों से इसके लिए लड़ रहे अंबेडकरवादियों की जीत है।

खासकर अमेरिका में 23 युनिवर्सिटी में जाति को लेकर कानून बन चुका है। आज ही के दिन अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसद आयशा वहाब ने सीनेट में कास्ट डिसक्रिमिनेशन को अवैध घोषित करने का विधेयक पेश किया है। यदि यह कानून पारित हो जाता है तो कैलिफोर्निया कॉस्ट डिस्क्रिमिनेशन के खिलाफ कानून बनाने वाला पहला राज्य बन जाएगा।

दरअसल भारत से बाहर पहले सवर्ण समाज के लोग पहुंचे। लेकिन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचने के बाद भी उन्होंने न तो अपना जातीय दंभ छोड़ा और न ही अपनी स्वघोषित श्रेष्ठता को किनारे रखा। हालांकि विदेशी धरती पर उनकी स्वघोषित श्रेष्ठता को किसी ने भी भाव नहीं दिया। लेकिन सालों बाद जब वंचित तबके के लोग विदेशों का रुख करने लगें, भारत के जातिवादियों को विदेशी धरती पर भी खुद को श्रेष्ठ समझने की सोई हुई चाह दुबारा जाग उठी।

जाहिर है, वो पहले से वहां मौजूद थे, और शोषित-वंचित तबके के लोग अपनी जमीन तलाशने को संघर्ष कर रहे थे। ऐसे में विदेशी धरती पर पहुंचे शोषित समाज के लोगों को विदेशी धरती पर अपने भारतीय भाई नहीं बल्कि श्रेष्ठता बोध में सने ज्यादातर वही लोग मिले, जो ब्राह्मण, बनिया और ठाकुर होने के दंभ से भरे थे और जिन्होंने भारत में शोषित तबको के शोषण का कोई मौका नहीं छोड़ा था। दलितों को लग गया कि विदेशी धरती पर जब भी वो भारतीय जातिवादियों से टकराएंगे, उन्हें समान मौका नहीं मिलेगा।

सालों तक इसके खिलाफ संघर्ष करने और वंचित समाज के स्कॉलर्स द्वारा लगातार तमाम विदेशी मंचों पर इसका जिक्र करने के बाद आखिर दुनिया भी भारत की जाति संरचना को समझने लगी। उन्हें समझ में आ गया कि भारत में किस तरह जाति के आधार पर शोषितों के साथ भेदभाव होता है। आखिरकार अंबेडकरवादियों का संघर्ष रंग लाया और अमेरिकी शहर सिएटल के बाद हार्वर्ड युनिवर्सिटी ने भी जातिवाद की सच्चाई को समझते हुए जाति को नॉन डिस्क्रीमिनेशन पॉलिसी में शामिल कर लिया है। हालांकि जातिवाद के खिलाफ यह लड़ाई यहीं खत्म नहीं होती। लड़ाई जारी रहेगी, जब तक दुनिया भर में जातिवाद को अपराध नहीं मान लिया जाता। या दुनिया भर से जातिवाद खत्म नहीं हो जाता।

दलितों को लेकर आरएसएस का नया पैंतरा

भारतीय जनता पार्टी के पिता संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस ने दलितों के ऊपर नया जाल फेंका है। खास तौर पर उस दलितों पर जो बेहद गरीब हैं और अपनी हर परेशानी का हल पत्थर की मूर्तियों में ढूंढ़ते हैं। आरएसएस का कहना है कि गांव में किसी भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर बैठने से न रोका जाए। शिव मंदिरों में जल चढ़ाने से न रोका जाए और न ही दलितों को सार्वजनिक कुएं से पानी भरने से ही रोका जाए।

खबर है कि आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में यह एजेंडा तय किया गया है। इस एजेंडे को खासकर पू्र्वी और पश्चिमी क्षेत्र में जमीन पर उतारने की कवायद शुरू कर दी गई है। खास बात यह है कि इसके लिए वाल्मीकि जयंती, अंबेकर जयंती और सतगुरु रविदास जयंती जैसे मौकों को भुनाया जाएगा।

दरअसल दलित समाज में लगातार बढ़ रही जागरूकता और जातीय अत्याचार को लेकर गरीब से गरीब आदमी के विरोधी तेवर ने आरएसएस और सवर्ण हिन्दुओं को चिंता में डाल दिया है। जो लोग पहले बिना विरोध के सवर्णों की हाजिरी बजाते थे, उनके तमाम अत्याचारों को सहते थे, उनके विरोध ने संघ और हिन्दु राष्ट्र की वकालत करने वाले लोगों को चिंता में डाल दिया है।

दलित समाज का ज्यादातर हिस्सा जातीय अत्याचार और हिन्दू धर्म में मौजूद जातीय सड़ांध की खुलकर खिलाफत भी करने लगा है। साथ ही हिन्दु धर्म से उसका मोहभंग भी हो रहा है। अब यह आग गांवों तक में फैल गई है, जो आरएसएस के लिए चिंता की बात है। साफ है कि बहुजनों ने जिस तरह हिन्दु धर्म में फैले जातीय सड़ांध की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी है, उससे संघ और सवर्ण समाज डरा हुआ है। बहुजनों की तमाम जातियों के भीतर अंबेडकरवादी विचारधारा तेजी से फैल रही है। संघ को उसकी काट सिर्फ हिन्दुत्व की राजनीति में दिख रही है। संघ, भाजपा सहित जाति के समर्थकों को डर है कि कहीं दलित समाज के लोग उनके खिलाफ बगावत न कर दें। इसलिए वो दलितों को अधिकार देने की बात करने लगे हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब संघ को दलितों से इतनी फिक्र है तो वह जाति मुक्त भारत की बात क्यों नहीं करते। आजादी का अमृत महोत्सव जैसे वक्त में जाति को सबसे बड़ा मुद्दा घोषित क्यों नहीं करते? यही बात संघ की असलियत को जाहिर करता है।

पिछले दिनों अमेरिका के सिएटल शहर में जिस तरह जाति के खिलाफ कानून बन गया और जिस तरह जातीय भेदभाव दुनिया भर में अब एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है, उसने भी संघ की नींद उड़ा दी है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फैले अंबेडकरवादी भारत के जातिवाद की कलई खोल रहे हैं।

इन तमाम बातों से डरे हिन्दु राष्ट्र के समर्थकों और संघ ने दलितों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए मंदिर प्रवेश का चारा फेंका है। संघ और हिन्दु राष्ट्र के समर्थकों को पता है कि उनका हिन्दु राष्ट्र का सपना बिना दलितों-पिछड़ों के संभव नहीं है, सवाल यह है कि देश का बहुजन अपनी ताकत को कब समझेगा? दलितों को पिछड़ों को यह समझना होगा कि उनका उद्धार मंदिर में नहीं, बल्कि किताबों में है। उस रास्ते पर चलने से है, जिसे बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने दिखाया था। संघ और हिन्दुवादी अब दलितों से डरने लगे हैं। दलितों को बस अपनी ताकत समझने की जरूरत है।

2024 के चुनाव में भाजपा को हराया जा सकता है, सर्वे रिपोर्ट से उड़ी मोदी की नींद

 चुनावों पर करीब से नजर रखने वाली संस्था सीएसडीएस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने का फार्मूला दिया है। सीएसडीएस का दावा है कि अगर इस फार्मूले पर काम किया जाए तो अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को आसानी से सत्ता से बाहर किया जा सकता है। दरअसल सीएसडीएस ने 2024 चुनावों को लेकर जो सर्वे किया है, उसके मुताबिक अगर भाजपा को छोड़कर सारा विपक्ष साथ मिलकर चुनाव लड़े तो आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को दुबारा सत्ता में आने से आसानी से रोका जा सकता है। सर्वे करने वाली संस्था का कहना है कि ऐसा होने पर विपक्ष को आसानी से बहुमत मिल जाएगा। दरअसल सीएसडीएस के इस दावे के पीछे पिछले चुनावों में तमाम दलों को मिली सीटें और वोट प्रतिशत है।

 

अपनी रिपोर्ट में सीएसडीएस ने दावा किया है कि अगर सभी पार्टियां भाजपा के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ती है तो भाजपा 235-240 सीटों पर सिमट सकती है। 2019 में भाजपा को मिली सीटों में सहयोगी दलों का भी बड़ा हाथ था। आंकड़े बताते हैं कि अगर आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को पिछले चुनाव के मुकाबले एक फीसदी वोट भी कम मिलते हैं तो भाजपा 225-230 सीटों पर सिमट जाएगी, जबकि विपक्ष 310-325 सीटों तक पहुंच जाएगा। ऐसे ही अगर भाजपा 2024 के चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले अगर दो प्रतिशत वोट कम पाती है तो उसके सीटों की संख्या 210-215 तक पहुंच जाएगा। इस पड़ताल में एक और दिलचस्प बात सामने आई है, जिसने भाजपा की नींद उड़ा दी है। रिपोर्ट कहती है कि अगर विपक्ष का पांच प्रतिशत वोट किसी भी दूसरी पार्टी को चला जाए तो भाजपा 242-247 सीटों तक ही पहुंच पाएगी। जबकि विपक्ष को 290-295 सीटें मिल जाएगी।

यानी साफ है कि 2024 के चुनाव में भाजपा को हराया जा सकता है। लेकिन तब, जब विपक्षी दल ऐसा चाहें। क्योंकि विपक्षी दलों की आपसी खिंचतान ही अभी भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है। भाजपा ने भी अपने खेमे में तमाम विपक्षी दलों को साध रखा है, जिसका उसे फायदा मिल रहा है। सहयोगी दलों को अपने साथ रखने के लिए भाजपा जहां कोई मौका नहीं चूकती है, वहीं भाजपा को हराने का दावा करने वाले विपक्षी दल आपसी मनमुटाव से आगे नहीं बढ़ पाते। इस रिपोर्ट के आने के बाद यह देखना है कि क्या विपक्ष सचमुच में भाजपा की विभाजनकारी राजनीति को रोकने के लिए साथ आएंगे, या फिर महज मोदी और भाजपा के खिलाफ बातें कर के अपने वोट बैंक को बचाने की कवायद में जुटे रहेंगे और एक बार फिर से आपसी झगड़े और इगो में भाजपा को जीत जाने देगा।

जीत गई बसपा, आर.एस प्रवीण कुमार से डरे तेलंगाना के मुख्यमंत्री

एक सच्चा अंबेडकरवादी जब हुंकार भरता है, तो बड़ी-बड़ी तानाशाह सरकार घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती है। यह तस्वीर तेलंगाना के बसपा प्रमुख आर.एस प्रवीण कुमार की है, जो जीत के बाद अपना आमरण अनशन तोड़ रहे हैं। दरअसल तेलंगाना में भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद तेलंगाना के तमाम विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। लेकिन आईपीएस की नौकरी छोड़कर बहुजन समाज पार्टी का दामन थामने वाले चर्चित अंबेडकरवादी आर.एस. प्रवीण ने सरकार के खिलाफ आमरण अनशन का ऐलान कर दिया था। उन्होंने 16 मार्च को घोषणा की थी कि जब तक ग्रुप-वन की प्रारंभिक परीक्षा रद्द नहीं होती, वह आमरण अनशन पर रहेंगे। उन्होंने 17 मार्च से बसपा मुख्यालय पर आमरण अनशन भी शुरू कर दिया। बाद में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर घर पर छोड़ दिया। उन्होंने वहां भी अनशन जारी रखा। इस बीच मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव पर दबाव बढ़ता गया, जिसके बाद आखिरकार 24 घंटे के भीतर सरकार को बसपा और छात्र संगठनों की मांग माननी पड़ी। तेलंगाना राज्य लोक सेवा आयोग ने ग्रुप वन की प्रारंभिक परीक्षा सहित दो अन्य परीक्षाएं रद्द कर दी। जिसके बाद आर.एस प्रवीण ने अनशन वापस ले लिया। इस बीच आर.एस प्रवीण की बेटी का भी एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह पिता के आमरण अनशन की घोषणा के बाद रोती हुई नजर आई थी।

आमरण अनशन तोड़ने के बाद आर.एस.प्रवीण ने ऐलान किया है कि वह तेलंगाना राज्य लोकसेवा आयोग में फैले भ्रष्टाचार और सरकारी तानाशाही के खिलाफ लड़ते रहेंगे। दरअसल आईपीएस की नौकरी से इस्तीफा देकर राजनीति में आए डॉ. आर.एस प्रवीण लगातार सक्रिय हैं। वह मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के खिलाफ लगातार मोर्चा खोले हैं। लोगों को बसपा से जोड़ने के लिए वह लगातार पूरे प्रदेश की यात्रा कर रहे हैं। खबर है कि अप्रैल महीने में उनकी यात्रा के समापन के मौके पर बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो बहन मायावती एक विशाल जनसभा में शामिल होंगी।

Video Link-  https://www.youtube.com/watch?v=BVzXkCBNM0s

यूपी के बुलंदशहर में दलितों ने क्यों बनवा दिया है शहीद स्मारक

बहुजन क्रांति स्तंभ, बुलंदशहर, यूपीबुलंदशहर, यूपी। आपको याद होगा साल 2018 में 20 मार्च दिन। जब एससी-एसटी एक्ट कानून में संशोधन के खिलाफ दलित समाज गुस्से में था। इसके खिलाफ दो अप्रैल को देश के अलग-अलग हिस्सों में दलित समाज सड़क पर उतरा था। इस दौरान हुई हिंसा में दलित समाज के 13 युवा शहीद हो गए। इन्हीं शहीदों की याद में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 53 फीट ऊंचा ‘बहुजन क्रांति स्तंभ’ बन गया है, जिसका उदघाटन आने वाले 2 अप्रैल 2023 को होने जा रहा है।

भीमा कोरेगांव के स्तंभ की तर्ज पर यह बहुजन क्रांति स्तंभ बुलंदशहर के स्याना क्षेत्र स्थित सराय गांव में बनकर लगभग तैयार है। क्या है इसके बनने की कहानी, इसे कौन बनवा रहा है, यहां और क्या-क्या होगा, इस खबर में जानिये सबकुछ- 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया था। इस फैसले में SC-ST एक्ट में कई तरह का संशोधन किया गया। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि SC-ST एक्ट में पब्लिक सर्वेंट की गिरफ्तारी, एंपॉयटिंग अथॉरिटी की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती।

साथ ही आम लोगों को भी पुलिस कप्तान यानी एसएसपी की मंजूरी के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा। जबकि इसके पहले शिकायत के बाद तुरंत गिरफ्तारी का नियम था। दलितों को समझ में आ गया कि उनके संरक्षण के लिए मिले एससी-एसटी एक्ट को कमजोर किया जा रहा है।

फिर क्या था, इस बदलाव के बाद दलित समाज के विभिन्न संगठनों ने 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद का आह्वान किया। इस दौरान लाखों लोग सड़क पर उतरे थे। खासकर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में बड़ा प्रदर्शन हुआ। इस दौरान पुलिस के साथ झड़प में 13 लोगों की मौत हो गई, जिसे दलित समाज ने शहीद कहा। उन्हीं की याद में यह बहुजन क्रांति स्तंभ बनाया जा रहा है।

कैसा होगा बहुजन क्रांति स्तंभ

यह स्तंभ 48 फीट ऊंचा होगा। इसके इसके ऊपर 5 फीट व्यास का अशोक चक्र होगा। ये अशोक चक्र स्टील का है। साइंस के नियम के हिसाब से ये दिन के तीन पहरों में तीन बार रंग बदलेगा। यह सुबह के समय नीला, दोपहर में चांदी सरीखा तो सूरज ढलने के समय सोने जैसा दिखेगा। स्तंभ के एक तरफ 2 अप्रैल के आंदोलन में शहीद हुए सभी 13 लोगों की प्रतिमाएं लगाई जाएंगी, तो दूसरी तरफ अंबेडकर और बुद्ध के शिलालेख होंगे। साथ ही बाबासाहेब अंबेडकर का जीवन दर्शन भी पत्थरों पर लिखा होगा।

बी.पी. अशोक आईपीएस

कौन बनवा रहा है यह स्तंभ

इस कवायद के पीछे पीसीएस अधिकारी बी.पी. अशोक हैं, जो हाल ही में प्रोमोट होकर आईपीएस बने हैं। बी.पी. अशोक के पिता डॉ. देवीसिंह अशोक भी आईपीएस रहे हैं। अंबेडकरी आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए बी.पी. अशोक जाना पहचाना नाम हैं। सराय गांव जहां यह स्तंभ बन रहा है, वह बी.पी. अशोक का पैतृक गांव है। एससी-एसटी एक्ट के बाद हुई हिंसा से दुखी होकर उन्होंने राष्ट्रपति को इस्तीफे की भी पेशकश कर दी थी।

बी.पी. अशोक का कहना है कि बहुजन क्रांति स्तंभ राष्ट्रीय एकता और अखंडता का प्रतीक होगा। फिलहाल 2 अप्रैल को इसके उद्घाटन के मौके पर हजारों लोगों के जुटने की खबर है। फिलहाल यह स्तंभ इस पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

ऑस्कर अवार्ड में क्या मूलनिवासियों की अनदेखी हुई?

13 मार्च की तारीख भारत के लिए बेइंतहा सम्मान लेकर आई। इस दिन हर ओर ऑस्कर अवार्ड की चर्चा हो रही है। भारत की झोली में पहली बार दो ऑस्कर अवार्ड एक साथ आए हैं। भारतीय फिल्म RRR के गीत ‘नाटू-नाटू’ ने जहां बेस्ट ओरिजिनल सांग की श्रेणी में ऑस्कर जीता है। तो दूसरी ओर तमिल भाषा की डॉक्यूमेंट्री ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ ने ‘डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट’ केटेगरी में भारत के लिए पहला ऑस्कर जीत लिया है।

 डायरेक्टर एसएस राजमौली की फिल्म RRR का गाना इस कैटेगरी में नॉमिनेशन पाने वाली पहली भारतीय फिल्म है। नाटू-नाटू का मतलब होता है नाचना। यह गाना अभिनेता राम चरण और जूनियर एनटीआर पर फिल्माया गया है।

जबकि डाक्यूमेंट्री को कार्तिकी गोंजाल्विस द्वारा निर्देशित किया गया था और इसे OTT प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स ने रिलिज किया था। यह डॉक्यूमेंट्री हाथियों और उनकी देखभाल करने वालों के बीच के बेहद शानदार रिश्ते को लेकर है।

इस तरह भारत के हिस्से में दो ऑस्कर अवार्ड आ गए हैं। 13 मार्च की सुबह जब इन अवार्ड की घोषणा हुई, दुनिया भर में भारत का डंका बज गया। लेकिन कुछ ऐसा था, जिसकी चर्चा होनी चाहिए थी और हुई नहीं। कुछ ऐसा था, जो रह गया।

दरअसल जो दोनों अवार्ड मिले, उससे भारत के मूलनिवासी समाज की कहानी जुड़ी थी। RRR जहां आदिवासी नायक कोमराम भीम को केंद्र में रखकर बनाकर बनाई गई थी, तो वहीं डाक्यूमेंट्री ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ में हाथी के जो साथी हैं, वो भी आदिवासी समाज के हैं।

ऑस्कर अवार्ड लेते वक्त गोंजाल्विस ने अकादमी पुरस्कार, निर्माता गुनीत मोंगा, उनके परिवार को धन्यवाद दिया और पुरस्कार को अपनी ‘‘मातृभूमि भारत” को समर्पित किया। उन्होंने कहा, ‘‘अकादमी का हमारी फिल्म को सराहने, मूल निवासियों और जानवरों पर ध्यान देने के लिए शुक्रिया… ‘नेटफ्लिक्स’ का हम पर विश्वास करने… मेरी निर्माता गुनीत के साथ अपनी आदिवासी समझ को साझा करने के लिए बोमन और बेली का शुक्रिया…।”

लेकिन कहीं न कहीं यहां उन नामों को कम तवज्जो दी गई, जिनकी वजह से ये फिल्में बन पाईं। जो असल तौर पर इस फिल्म के हीरो कहे जा सकते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने इस मुद्दे को उठाया है। उनका कहना है-

जब स्टेज पर चढ़कर ऑस्कर लेने के बारी आई तो फ़िल्म के दोनों, मदुमलै जंगल के, आदिवासी किरदार, जिनका वास्तविक जीवन ही ये डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म है, सीन से ग़ायब हो गए।

ये उस मंदिर या मूर्ति की तरह है, जिन्हें बनाता कोई है, छेनी और हथौड़ा किसी और का चलता है, पसीना किसी और का गिरता है और प्राण प्रतिष्ठा का प्रपंच करके कोई और उसका स्वामी बन जाता है। बनाने वाले की अक्सर गर्भ गृह में एंट्री बैन हो जाती है।

इतिहास से लेकर वर्तमान तक के सारे निर्माण, सारे नृत्य, डांस, कलाकारी जिनकी है, उनका इतिहास में नाम लेवा नहीं होता। देवदासियों का सादिर अट्टम सौ साल से कम समय में भरत नाट्यम बन गया और इसमें पैसा और नाम आते है देवदासियों को धकेलकर बाहर कर दिया गया। कितना निष्ठुर है ये सब।

दरअसल डाक्यूमेंट्री ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ के असली हीरो बोमन और बेली, अमु और रघु हैं। साथ ही कट्टुनायकन समाज के वो ट्राइबल, जिन्होंने अपनी मेहनत और समर्पण से और हाथियों को साध कर इस फिल्म की शूटिंग में मदद की।

“गांव में जिंदगी भर चमार बने रहतें, बाहर लोग हमें नाम से बुलाते हैं”

बिहार के सारण जिले की अपनी एक अंतरराष्ट्रीय पहचान है। वजह हैं लोक कलाकार और रंगकर्मी भिखारी ठाकुर। बिहार के चर्चित मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव का यह राजनीतिक क्षेत्र रहा है। इसी सारण जिले में एक गांव है अफौर। जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर भूमिहार और ब्राह्मण बहुल अफौर गांव में चमारों की भी ठीक-ठाक आबादी है।

चमारों की बस्ती के ठीक सामने से पक्की सड़क गुजरती है। लेकिन उनके दरवाजों तक वो सड़क नहीं जाती, बल्कि उन्हें मुंह चिढ़ाते सीधी निकल जाती है। हम यहां पहुंचे तो सबसे पहले गरजू राम से टकराएं। वह पास के ही नैनी गांव के रहने वाले हैं। उनकी बेटी की शादी इसी टोले के अशर्फी दास के सबसे बड़े बेटे संजीव कुमार दास से हुई है। गरजू राम फौज से रिटायर हैं। अपनी बेटी से मिलने आए थे। हमने उनसे पूछा कि इस इलाके दलितों की जिंदगी कितनी बदली है?

गरजू राम मानते हैं कि हमलोगों की स्थिति बहुत सुधरी है। उनका कहना है कि पिछले 50 सालों में और अब की स्थिति में बहुत फर्क है। बताते हैं कि पहले मिट्टी के घर थे, अब ज्यादातर लोगों के घर ईंट के छतदार बन गए हैं। सड़कें भी कमोबेश पहुंची है। बिजली भी मिल रही है और पानी भी। यानी कुल मिलाकर स्थिति बदल रही है।

हालांकि गरजू राम यह जोड़ना नहीं भूलते की बिजली पानी के अलावा बाकी चीजें लोगों ने अपनी मेहनत से हासिल की है।

इसी बस्ती में किशोर राम भी रहते हैं। लंबे वक्त तक कलकत्ता के जूट मिल में काम करने वाले किशोर राम रिटायर होकर वापस गांव आ चुके हैं। हाथ का इशारा करते हुए बताते हैं कि जब मैं छोटा था तो यहीं पास में ही हमारे बाप-दादा मरे हुए जानवरों की खाल उतारते थे। बहुत गरीबी का वक्त था। कई बार वही मांस बस्ती के हर घर में बनता था, जिससे हमारा पेट भरता था। लेकिन अब चीजें काफी बदल गई हैं। अब हमारी बस्ती में कोई यह काम नहीं करता।

 तो आखिर इससे निकले कैसे? उप मुखिया बलदेव दास इसका श्रेय अशर्फी दास को देते हैं। अशर्फी दास के पिता सरयू दास भी कोलकाता के जूट मिल में लंबे समय तक काम करते रहे। सरयू दास के पांच बेटे और दो बेटियां थी। अशर्फी दास भाईयों में चौथे नंबर के बेटे थे। बलदेव दास कहते हैं- अशर्फी दास हमारे टोले के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे थे। ग्रेजुएट थे। हम साथ ही बड़े हुए। वह जागरूक थे। छपरा शहर में जगदम कॉलेज में पढ़ने जाते थे, तो उनको सही गलत की जानकारी थी। घर-घर में घूमकर सबको समझाते थे। कई बार मरे जानवरों का जो मांस पकता था, वो बर्तन ही फेंक देते थे। उन्होंने बहुत समझाया, उससे बाद में लोगों को समझ में आने लगा कि यह गलत काम है।

 

हमें यहीं अशर्फी दास के भाई नागेश्वर दास जिसे सभी नगेसर कहते हैं, वह मिले। नागेश्वर दास अपने बड़े भाई को याद करते हुए पहले रुआसे हो जाते हैं। कहते हैं कि भईया अब इस दुनिया में नहीं रहे। हालांकि अगले ही पल खुद को संभालते हुए कहते हैं कि भईया काफी समझदार थे। उनकी कोशिशों से हमारा टोला काफी बदला। उनका एक प्रभाव था। छोटे-बड़े सभी लोग उनका लिहाज करते थे, इसलिए सभी उनकी बात मानते थे।

 नागेश्वर दास की छह बेटियां और एक बेटा है। वह खुद मजदूरी किया करते थे। अब शरीर कमजोर है तो मजदूरी नहीं कर पाते। गाय पाल रखी है, उसकी देखभाल में और थोड़ा-बहुत खेती में समय देते हैं। मैंने उनसे पूछा कि क्या गांव के बड़े लोग मजदूरी के पूरे पैसे देते हैं? नागेश्वर कहते हैं, ‘पहले जोर-जबरदस्ती थी, पूरे पैसे नहीं मिलते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है।’

यह बदलाव क्यों और कैसे आया, इसकी एक झलक टोले के दूसरे लोगों के चेहरे देखकर समझ में आ गया। एक साथ कई युवा बैठे बातें कर रहे थे। साफ-सुथरे कपड़े पहने। दाढ़ी बनी हुई। कईयों के हाथों में घड़ी और एंड्रायड  फोन भी थे। पता चला कि वो सब बाहर रहते हैं और कमाते हैं। छठ के त्यौहार में घर आए हैं। इन युवाओं में एक राजेश कुमार दास भी थे, जो पिछले 15 सालों से हैदराबाद की किसी कंपनी में काम करते हैं। मैंने गांव छोड़ने की वजह पूछी।

 राजेश बोल पड़े- क्या है यहां? यहां रहते तो गरीबी में पड़े रहते। बाहर जाकर आदमी बन गए। हालांकि उनको गांव-घर छोड़ने का दुख भी है। बोले, घरवाली और बच्चे यहीं रहते हैं। कौन नहीं चाहता अपने परिवार के साथ रहना, अपने बच्चों को बड़ा होते देखना। लेकिन अगर हमें इज्जत से जीना है तो हमारे पास घर छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं है। यहां जिंदगी भर चमार बने रहतें, बाहर लोग हमें नाम से बुलाते हैं।

लेकिन इसी टोले में किसुन और भगेसर की जिंदगी आज भी नहीं बदली। परिवार की जो हालत तीन दशक पहले थी, वही आज भी है। वजह, यह परिवार न तो बाहर कमाने निकल पाया, न ही बच्चों को पढ़ा पाया। नतीजा यह हुआ कि गांव के कुछ सामंत परिवारों के घर की चाकरी करने में पहले खुद की जिंदगी होम हुई, अब बच्चों की हो रही है। और यह सिर्फ इन दो घरों का मसला नहीं है, बल्कि शिक्षा के मामले में कई घरों की कहानी यही है।

 अशर्फी दास जिनको इस टोले से कुछ कुरितियां दूर करने का श्रेय जाता है, वह सिविल कोर्ट की सरकारी नौकरी में चले गए थे। उनके सभी बच्चे पढ़कर आगे बढ़ गए। लेकिन बाकी सब यहीं रह गए। किसी दूसरे परिवार का कोई बच्चा न तो उच्च शिक्षा हासिल कर सका, न ही सरकारी नौकरी में ही जा सका। पढ़ाई के नाम पर टोले के बाकी परिवारों के बच्चे 10वीं तक आते-आते हांफने लगते हैं। 15 साल की उम्र में ही ये अपना ठिकाना दिल्ली, गुजरात या फिर हरियाणा के किसी शहर को बना लेते हैं। फिर उनकी बाकी की जिंदगी वहीं कटती है। गांव बस त्योहार और शादियों में आना होता है।

लेकिन बाहर की दुनिया देखने से अब उनमें चेतना आ रही है। सोशल मीडिया पर वह अपना इतिहास ढूंढ़ रहे हैं। यही वजह है कि अब टोले में सरस्वती पूजा की जगह रविदास जयंती और अंबेडकर जयंती मनाई जाने लगी है। नागेश्वर के बेटे विक्की जो ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं, का कहना है कि- अब हमलोग सही गलत समझने लगे हैं। इसके बावजूद जाति की वजह से हमें कई बार ताने सुनने पड़ते हैं। लेकिन अब गांव का कोई बड़ी जात का आदमी जाति के नाम पर हमें अपमानित करने की कोशिश करता है तो हम मुंहतोड़ जवाब देते हैं। हम समझ गए हैं कि बेहतर शिक्षा के जरिये अच्छे पैसे कमाकर हम इस स्थिति से निकल सकते हैं। मेरी उम्र के सभी बच्चे पढ़ रहे हैं और बेहतर भविष्य के सपने देखते हैं।

विक्की की यह बात एक उम्मीद देती है कि नई पीढ़ी का भविष्य बेहतर होगा। लेकिन यह मजह अफौर के इस टोले की हकीकत है। देश के अलग-अलग हिस्सों में चमारों की बस्ती की कहानी अलग है। हर टोले को अशर्फी दास जैसे एक नायक की जरूरत है।

स्मृति दिवस विशेषः महाराष्ट्र में पुनर्जागरण की अगुवाई करने वाली महानायिका हैं सावित्रीबाई फुले

 आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण के दो केंद्र रहे हैं- बंगाल और महाराष्ट्र। बंगाली पुनर्जागरण मूलत: हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं के भीतर सुधार चाहता था और इसके अगुवा उच्च जातियों और उच्च वर्गों के लोग थे। इसके विपरीत महाराष्ट्र के पुनर्जागरण ने हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं को चुनौती दी। वर्ण-जाति व्यवस्था को तोड़ने और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के खात्मे के लिए संघर्ष किया। महाराष्ट्र के पुनर्जागरण की अगुवाई शूद्र और महिलाएं कर रही थीं। इस पुनर्जागरण के दो स्तंभ थे- सावित्री बाई फुले और उनके पति जोतिराव फुले।
 हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपरा में शूद्रों और महिलाओं को एक समान माना गया है। ग्रंथों में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि स्त्री और शूद्र एक समान होते हैं। हिंदू धर्मशास्त्र ये भी कहते हैं कि स्त्री और शूद्र अध्ययन न करें। ये स्थापित मान्यताएं थीं और सभी वर्णों के लोग इनका पालन करते आए थे।
हिंदू धर्म, समाज व्यवस्था और परंपरा में शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए तय स्थान को आधुनिक भारत में पहली बार जिस महिला ने संगठित रूप से चुनौती दी, उनका नाम सावित्री बाई फुले है। वे आजीवन शूद्रों-अति शूद्रों की मुक्ति और महिलाओं की मुक्ति के लिए संघर्ष करती रहीं।
ईसाई मिशनरियों से मिली पढ़ने की सीख
उनका जन्म नायगांव नाम के गांव में 3 जनवरी 1831 को हुआ था। यह महाराष्ट्र के सतारा जिले में है, जो पुणे के नजदीक है। वे खंडोजी नेवसे पाटिल की बड़ी बेटी थीं, जो वर्णव्यस्था के अनुसार शूद्र जाति के थे। वे जन्म से शूद्र और स्त्री दोनों एक साथ थीं, जिसके चलते उन्हें दोनों के दंड जन्मजात मिले थे।
ऐसे समय में जब शूद्र जाति के किसी लड़के के लिए भी शिक्षा लेने की मनाही थी, उस समय शूद्र जाति में पैदा किसी लड़की के लिए शिक्षा पाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। वे घर के काम करती थीं और पिता के साथ खेती के काम में सहयोग करती थीं। पहली किताब उन्होंने तब देखी, जब वे गांव के अन्य लोगों के साथ बाजार शिरवाल गईं। उन्होंने देखा कि कुछ विदेशी महिला और पुरुष एक पेड़ के नीचे ईसा मसीह की प्रार्थना करते हुए गाना गा रहे थे। वे जिज्ञासावश वहां रुक गईं, उन महिला-पुरुषों में किसी ने उनके हाथ में एक पुस्तिका थमायी। सावित्रा बाई पुस्तिका लेने में हिचक रही थीं। देने वाले ने कहा कि यदि तुम्हे पढ़ना नहीं आता, तब भी इस पुस्तिका को ले जाओ। इसमें छपे चित्रों को देखो, तुम्हें मजा आयेगा. वह पुस्तिका सावित्री बाई अपने साथ लेकर आईं। जब 9 वर्ष की उम्र में उनकी शादी 13 वर्षीय जोतिराव फुले के साथ हुई और वे अपने घर से जोतिराव फुले के घर आईं, तब वह पुस्तिका भी वे अपने साथ लेकर आई थीं।
फातिमा शेख और सावित्री बाई बनी शिक्षिका: 1 जनवरी को खोला स्कूल जोतिराव फुले सावित्री बाई फुले के जीवनसाथी होने के साथ ही उनके शिक्षक भी बने। जोतिराव फुले और सगुणा बाई की देख-रेख में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करन के बाद सावित्री बाई फुले ने औपचारिक शिक्षा अहमदनगर में ग्रहण की। उसके बाद उन्होंने पुणे के अध्यापक प्रशिक्षण संस्थान से प्रशिक्षण लिया। इस प्रशिक्षण स्कूल में उनके साथ फातिमा शेख ने भी अध्यापन का प्रशिक्षण लिया। यहीं उनकी गहरी मित्रता कायम हुई। फातिमा शेख उस्मान शेख की बहन थीं, जो जोतिराव फुले के घनिष्ठ मित्र और सहयोगी थे। बाद में इन दोनों ने एक साथ ही अध्यापन का कार्य भी किया।
फुले दंपत्ति ने 1 जनवरी 1848 को लड़कियों के लिए पहला स्कूल पुणे में खोला। जब 15 मई 1848 को पुणे के भीड़वाडा में जोतिराव फुले ने स्कूल खोला, तो वहां सावित्री बाई फुले मुख्य अध्यापिका बनीं। इन स्कूलों के दरवाजे सभी जातियों के लिए खुले थे। जोतिराव फुले और सावित्री बाई फुले द्वारा लड़कियों की शिक्षा के लिए खोले जा रहे स्कूलों की संख्या बढ़ती जा रही थी। इनकी संख्या चार वर्षों में 18 तक पहुंच गई। फुले दंपत्ति के ये कदम सीधे ब्राह्मणवाद को चुनौती थे। इससे उनके एकाधिकार को चुनौती मिल रही थी, जो समाज पर उनके वर्चस्व को तोड़ रहा था। पुरोहितों ने जोतिराव फुले के पिता गोविंदराव पर कड़ा दबाव बनाया। गोविंदराव पुरोहितों और समाज के सामने कमजोर पड़ गए। उन्होंने जोतिराव फुले से कहा कि या तो अपनी पत्नी के साथ स्कूल में पढ़ाना छोड़ें या घर। एक इतिहास निर्माता नायक की तरह दुखी और भारी दिल से जोतिराव फुले और सावित्री बाई फुले ने शूद्रों-अति शूद्रों और महिलाओं की मुक्ति के लिए घर छोड़ने का निर्णय लिया। जब सावित्री बाई पर फेंका गया गोबर और पत्थर परिवार से निकाले जाने बाद ब्राह्मणवादी शक्तियों ने सावित्री बाई फुले का पीछा नहीं छोड़ा। जब सावित्री बाई फुले स्कूल में पढ़ाने जातीं, तो उनके ऊपर गांव वाले पत्थर और गोबर फेंकते। सावित्री बाई रुक जातीं और उनसे विनम्रतापूर्वक कहतीं, ‘मेरे भाई, मैं तुम्हारी बहनों को पढ़ाकर एक अच्छा कार्य कर रही हूं। आप के द्वारा फेंके जाने वाले पत्थर और गोबर मुझे रोक नहीं सकते, बल्कि इससे मुझे प्रेरणा मिलती है। ऐसे लगता है जैसे आप फूल बरसा रहे हों। मैं दृढ़ निश्चय के साथ अपनी बहनों की सेवा करती रहूंगी। मैं प्रार्थना करूंगी की भगवान आप को बरकत दें।’ गोबर से सावित्री बाई फुले की साड़ी गंदी हो जाती थी, इस स्थिति से निपटने के लिए वह अपने पास एक साड़ी और रखती थीं। स्कूल में जाकर साड़ी बदल लेती थीं।
शिक्षा के साथ ही फुले दंपत्ति ने समाज की अन्य समस्याओं की ओर ध्यान देना शुरू किया। सबसे बदतर हालत विधवाओं की थी। ये ज्यादातर उच्च जातियों की थीं। इसमें अधिकांश ब्राह्मण परिवारों की। अक्सर गर्भवती होने पर ये विधवाएं या तो आत्महत्या कर लेतीं या जिस बच्चे को जन्म देती, उसे फेंक देतीं। 1863 में फुले दंपत्ति ने बाल हत्या प्रतिबंधक गृह शुरू किया। कोई भी विधवा आकर यहां अपने बच्चे को जन्म दे सकती थी। उसका नाम गुप्त रखा जाता था। इस बाल हत्या प्रतिबंधक गृह का पोस्टर जगह-जगह लगाया गया। इन पोस्टरों पर लिखा था कि ‘विधवाओं! यहां अनाम रहकर बिना किसी बाधा के अपना बच्चा पैदा कीजिए। अपना बच्चा साथ ले जाएं या यहीं रखें, यह आपकी मर्जी पर निर्भर रहेगा।’ सावित्री बाई फुले बालहत्या प्रतिबंधक गृह में आने वाली महिलाओं और पैदा होने वाले बच्चों की देखरेख खुद करती थीं। इसी तरह की एक ब्राह्मणी विधवा काशीबाई के बच्चे को फुले दंपत्ति ने अपने बच्चे की तरह पाला। जिनका नाम यशवंत था। सत्यशोधक समाज का नेतृत्व सामाजिक परिवर्तन के लिए जोतिराव फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी। उनकी मृत्यु के बाद सत्यशोधक समाज की बागडोर सावित्री बाई फुले के हाथों में सौंपी गई। 1891 से लेकर 1897 उन्होंने इसका नेतृत्व किया। सत्यशोधक विवाह पद्धति को भी अमलीजामा पहनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। सावित्री बाई फुले आधुनिक मराठी की महत्वपूर्ण कवयित्री भी थीं। उनका पहला काव्य संकलन 1854 में काव्य फुले के रूप में प्रकाशित हुआ, जब उनकी उम्र 23 वर्ष थी। 1892 में उनकी कविताओं के दूसरा संग्रह ‘बावन काशी सुबोध रतनाकर’ प्रकाशित हुआ। यह बावन कविताओं का संग्रह है। इसे उन्होंने जोतिराव फुले की याद में लिखा है और उन्हीं को समर्पित किया है। सावित्री बाई फुले के भाषण भी 1892 में प्रकाशित हुए। इसके अतिरिक्त उनके द्वारा लिखे पत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये पत्र उस समय की परिस्थितियों, लोगों की मानसिकता, फुले के प्रति सावित्री बाई की सोच और उनके विचारों को सामने लाते हैं। 1896 में एक एक बार फिर पुणे और आस-पास के क्षेत्रों में अकाल पड़ा। सावित्री बाई फुले ने दिन-रात अकाल पीड़ितों को मदद पहुंचाने लिए एक कर दिया। उन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि अकाल पीड़ितों को बड़े पैमाने पर राहत सामग्री पहुंचाए। शूद्रों-अति शूद्रों और महिलाओं की शिक्षिका और पथप्रदर्शक मां सावित्री बाई का जीवन अनवरत अन्याय के खिलाफ संघर्ष करते और न्याय की स्थापना के लिए बीता। उनकी मृत्यु भी समाज सेवा करते ही हुई। 1897 में प्लेग की वजह से पुणे में महामारी फैल गई। वे लोगों की चिकित्सा और सेवा में जुट गईं। स्वंय भी इस बीमारी का शिकार हो गईं। 10 मार्च 1897 को उनकी मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु के बाद भी उनके कार्य और विचार मशाल की तरह देश को रास्ता दिखा रहे हैं।

दिल्ली में वर्ल्ड बुक फेयर में लगा है विचारों का मेला, 5 मार्च है अंतिम तारीख

दिल्ली के प्रगति मैदान में इन दिनों किताबों का मेला लगा है। विचारों का मेला लगा है। यह मेला 5 मार्च तक चलेगा। विश्व पुस्तक मेले का यह 50वां साल है। इस लिहाज से यह महत्पूर्ण है। भांति-भांति के प्रकाशक, भांति-भांति की पुस्तकों के साथ मौजूद हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित इस विश्व पुस्तक मेले में कहा जा रहा है कि यहां तकरीबन 2000 प्रकाशक स्टॉल लगे हैं। कोविड के कारण यह पुस्तक मेला तीन सालों बाद आयोजित हो रहा है। पुस्तक मेले में हर दिन कोई न कोई ख्याति प्राप्त लेखक पहुंचता है और उनको सुनने जुटती है भारी भीड़।

पुस्तक मेले में हर विचारधारा की पुस्तकें और लेखकों को आसानी से टहलते देखा जा सकता है। अंबेडकरी-फुले आंदोलन के प्रकाशकों की बात करें तो इस साल बहुजन वैचारिकी वाले छह बुक स्टॉल लगे हुए हैं। उसमें दलित दस्तक के स्टॉल के साथ-साथ जयपुर के प्रकाशक एम.एल. परिहार की बुद्धम पब्लिकेशन, फारवर्ड प्रेस सहित जाने माने प्रकाशक सम्यक प्रकाशन और गौतम बुक सेंटर का स्टॉल लगा हुआ है। ये सभी स्टॉल हाल नंबर 2 में आस-पास ही मौजूद हैं। हॉल नंबर दो में दलित दस्तक का स्टॉल नंबर- 378 है। इसके आस-पास ही बाकी सभी प्रकाशकों के स्टॉल भी मौजूद हैं। इसके अलावा आदिवासी साहित्य के साथ इस बार वंदना थेटे भी अपने प्रकाशन के साथ मौजूद हैं।विश्व पुस्तक मेला

खास बात यह भी है कि बीते दिनों में दलित-आदिवासी समाज को केंद्र में रखकर तमाम बड़े-बड़े प्रकाशक भी पुस्तकें प्रकाशित करने लगे हैं। चाहे राजकमल हो, वाणी प्रकाशन हो या फिर पेंग्विन और अन्य प्रकाशन संस्थान, प्रकाशकों में बाबासाहेब के साहित्य को प्रकाशित करने की होड़ मची है। इस बारे में दलित दस्तक के संपादक अशोक दास का कहना है कि भले ही तमाम प्रकाशक दलित साहित्य प्रकाशित कर रहे हों, कोई भी पुस्तक खरीदने से पहले पाठकों को यह भी देखना होगा कि उसको लिखा किसने है। क्योंकि लिखने वाला अगर अंबेडकरी विचारधारा की बजाय किसी अन्य विचारधारा से प्रेरित है तो फिर वह दलित साहित्य के साथ न्याय नहीं कर पाएगा, बल्कि वह पाठको को और भ्रम में ही डालेगा।

फिलहाल पुस्तक मेला अपने अंतिम चरण में है। साहित्य प्रेमियों का आना लगातार जारी है। खास बात यह भी है कि इस मेले में स्कूली छात्र भी खूब पहुंच रहे हैं। तो तमाम पुस्तक प्रेमी अपने बच्चों के साथ पुस्तक मेले में शिरकत कर रहे हैं। इस उम्मीद के साथ कि न्यू मीडिया और ट्विटर और इंस्टा के इस दौर में उनके बच्चे किताबों से भी जुड़े रहें और बेहतर इंसान बन सकें। इस दौरान पाठकों में अपने प्रिय लेखकों के साथ तस्वीरें लेने की होड़ भी देखी जा रही है।

 

अमेरिका में अंबेडकरवादियों की बड़ी जीत, सिएटल शहर में जातिगत भेदभाव पर लगा बैन

अमेरिका के सिएटल शहर में अब जाति को लेकर भेदभाव करने वालों की खैर नहीं होगी। सिएटल में जाति आधारित भेदभाव को प्रतिबंधित कर दिया गया है। मंगलवार को एक बड़े फैसले में सिएटल सिटी काउंसिल ने शहर के भेदभाव विरोधी कानून में जाति को भी शामिल कर लिया। यानी अब इस शहर में अगर कोई किसी से जाति के आधार पर भेदभाव करता है, तो उस पर कार्रवाई होगी। पहले भेदभाव विरोधी कानून में रंग और नस्ल आधारित भेदभाव ही शामिल था। सिएटल सिटी काउंसिल ने इस अध्यादेश को 6-1 से पारित कर दिया।

सिटी काउंसिल में इस प्रस्ताव को सिटी काउंसिल मेंबर क्षमा सावंत लेकर आई थीं। क्षमा सावंत खुद ऊंची जाति की भारतीय हिन्दू हैं, लेकिन सामाजिक न्याय की पक्षधर हैं।  क्षमा सावंत का कहना है कि “हमें यह समझने की जरूरत है कि भले ही अमेरिका में दलितों के खिलाफ भेदभाव उस तरह नहीं दिखता जैसा कि दक्षिण एशिया में हर जगह दिखता है, लेकिन यहां भी भेदभाव एक सच्चाई है।”

अमेरिका की नगर परिषद में पेश हुआ ये अपनी तरह का पहला प्रस्ताव है। इसको लेकर लंबे समय से मांग की जा रही थी। इसके समर्थक इसे सामाजिक और समानता के लिए अहम कदम मान रहे हैं। हालांकि दक्षिण एशिया और खासकर भारत के लोग इसका विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि इस प्रस्ताव का मकसद दक्षिण एशिया के लोगों खासकर भारतीय अमेरिकियों को निशाना बनाना है। बता दें कि अमेरिका में भारतीय मूल के अप्रवासियों की संख्या दूसरे नंबर पर है। अमेरिकन कम्यूनिटी सर्वे के 2018 के आंकड़े के मुताबिक अमेरिका में भारतीय मूल के 42 लाख लोग रहते हैं। भारत में जाति आधारित भेदभाव पर 1948 से ही प्रतिबंध है।

इस कानून को बनाने के लिए अमेरिका में एक लंबी मुहिम चली थी। इसमें वशिंगटन युनिवर्सिटी के 8000 से ज्यादा लोगों एकेडमिक वर्कर्स ने अपना समर्थन दिया था। इस बिल को काउंसिल में रखने वाली काउंसिल मेंबर क्षमा सावंत को 50 विभिन्न संगठनों ने समर्थन दिया था, जिसमें अमेरिकी संगठन भी शामिल थे। इस बिल को 21 फरवरी को मंजूरी मिल गई। यह इस मायने में काफी अहम है कि अमेरिका में पहली बार किसी शहर में कास्ट डिस्क्रीमिनेशन को बैन किया गया है।

हालांकि बाद के दिनों में जब भारत से तमाम जातियों के लोग अमेरिका पहुंचे तो वहां वह अपने साथ जाति लेकर गए। जिससे जातिवाद की घटनाएं सामने आने लगी। पिछले दिनों अमेरिका में ही सिसको कंपनी में एक दलित के साथ भेदभाव का मामला सुर्खियों में रहा था, जिसके बाद से ही अमेरिका में भेदभाव विरोधी कानून में जाति को भी शामिल करने की मांग हो रही थी। सिएटल में जातिवाद को अपराध मानने का प्रस्ताव पेश होने के बाद अब अमेरिका के दूसरे शहरों में भी ऐसा होने की संभावना बढ़ गई है।

बागेश्वर धाम वाले धीरेन्द्र शास्त्री के भाई ने दलितों को पिस्तौल दिखाकर धमकाया

 हिन्दू धर्म में ऋृषि-मुनियों को श्रद्धा से देखने की परंपरा रही है। लेकिन अब हिन्दू धर्म में ऋृषि-मुनियों की परंपरा को कलियुगी बाबा लगातार दागदार कर रहे हैं। इन दिनों बागेश्वर धाम का धीरेन्द्र शास्त्री चर्चा में है। बागेश्वर धाम वाले धीरेन्द्र शास्त्री का भाई गुंडा निकल गया है। शास्त्री के भाई ने हथियारों के बल पर दलितों को धमकाया है, जिसका वीडियो वायरल हो रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडिया में बागेश्वर धाम वाले शास्त्री के भाई ने एक दलित महिला की शादी में घुसकर वहां मौजूद मेहमानों को पिस्तौल दिखाकर धमकाया।

इस दौरान धीरेन्द्र शास्त्री का भाई सौरभ गर्ग उर्फ शालिगराम शराब के नशे में था। वीडियों में एक हाथ में सिगरेट लिए सौरभ को एक शख्स को गाली देते हुए और उसके सिर पर पिस्तौल ताने हुए देखा गया। पुलिस का कहना है कि सौरभ बागेश्वर धाम के गीतों की बजाय शादी मे बुंदेलखंड के लोकप्रिय राई नृत्य संगीत को बजाने से नाराज था। हद है, अब कोई बाबा और उसका गुंडा भाई यह तय करेगा कि कौन अपनी शादी में किस गीत-संगीत को बजाएगा।

 दरअसल धीरेन्द्र शास्त्री और बागेश्वर धाम पिछले कुछ वक्त से लगातार विवाद में है। 26 साल के धीरेन्द्र शास्त्री पर जमीन के अवैध कब्जे से लेकर लोगों को चमत्कार के नाम पर गुमराह करने के भी आरोप लगते रहे हैं। पिछले दिनों धीरेन्द्र शास्त्री ने महाराष्ट्र के महान संत तुकाराम को लेकर भी विवादित बयान दिया था।

 बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक धीरेंद्र शास्त्री के साथ स्कूल में पढ़ चुके एक व्यक्ति ने बीबीसी को बताया था कि, ”स्कूल में धीरेंद्र पढ़ाई में बहुत ख़ास नहीं था। कहता था कि बड़े होकर धंधा करना है। फिर पता नहीं कहाँ, एक साल के लिए ग़ायब हो गया था। लौटा तो अलग ही था। धीरे-धीरे विधायकों, बाहुबलियों का आना शुरू हुआ। ये बना तो कांग्रेस नेताओं के कारण है पर आज जो हो रहा है, उसमें भाजपा का रोल है। वरना पाँच साल पहले तक साइकिल, मोटर-साइकिल से घूमा करता था।”

बीबीसी की इसी रिपोर्ट में चंदला के पूर्व विधायक आरडी प्रजापति ने भी शास्त्री पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि- ”गढ़ा में जो सरकारी ज़मीन थी, उस पर धीरेंद्र शास्त्री ने अपना निर्माण करवा लिया।” धीरेंद्र शास्त्री पर ज़मीन हड़पने के आरोप कुछ स्थानीय लोगों ने भी लगाया था और धरना भी दिया था, लेकिन इसपर कोई खास कार्रवाई नहीं हुई।

आम जनता में इन जैसे लोगों को चमत्कारिक संत मान लेने की जो जल्दी होती है, वह चिंता की बात है। ऐसे में जिस तरह धीरेन्द्र शास्त्री के भाई का दलित समाज की बेटी की शादी में सिगरेट पीते हुए और हाथ में पिस्तौल लहराते हुए धमकाने का वीडियो सामने आया है, उससे साफ है कि बागेश्वर धाम की इमारत के नीचे काफी सच दबा है। धीरेन्द्र शास्त्री के भाई को लेकर पुलिस-प्रशासन की चुप्पी समझ से परे हैं। दलित संगठन परिवार को धमकाने के लिए सौरभ गर्ग पर एससी-एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज करने की मांग कर रहे हैं।

” हिंदी दलित नाटक और रंगमंच “

हिंदी दलित साहित्य की अवधारणा में नाटक या रंगमंच को देखे तो भारतीय समाज में जातियों के परस्पर टकराव झेलती जातियों का संघर्ष नजर आता है। यहाँ दर्द भी है और अधिकार की माँग भी। इसी चाह, आंदोलन और वैमनस्य तथा आक्रोश के गर्भ से दलित नाटक तथा रंगमंच का निर्माण हुआ। दलित नाटककार एवं रंगकर्मियों ने अपनी अस्मिता तथा संस्कृति को पहचाना और हिंदी हिंदू रंगमंच के समान अपनी मौजूदगी दर्ज की। जब हम दलित नाटक या दलित रंगमंच की ओर देखते हैं तो कुछ बातें हमारे सम्मुख उपस्थित होती है। अत्याचार सहते हमारी जातीय बंधु, सवर्ण पुरूषों द्वारा बलात्कार का शिकार होती हमारी माँ, बहने, बेटियाँ तथा देवदासी प्रथा के अंतर्गत हिंदू देवताओं के प्रतिनिधियों के हवस की शिकार धर्म भीरू महिलाएँ, मंदिरों में अपनी इज्जत बचाने के लिए चिल्लाती तथा अंधविश्वास की शिकार महिलाएँ यह सब जो होता है वह भारत में स्थापित सवर्णवादी व्यवस्था के कारण । सवर्णवादी व्यवस्था के उत्पीड़न की प्रतिक्रिया स्वरूप दलित साहित्य की एक मजबूत विधा के रूप में नाटक की उत्पत्ति हुई । सबसे पहले दलित समाज में इस व्यवस्था के प्रति आक्रोश निर्माण हुआ और इसी आक्रोश ने आंदोलन का रूप ले लिया । इसी आंदोलन के गर्भ से नाटक का जन्म हुआ । स्वयं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था, ”मेरे दस भाषणों से कई अधिक एक नाटक की प्रस्तुति लोगों पर असर डालती है।”1 मानवीय मूल्यों की स्थापना करना दलित नाटक तथा रंगमंच का मुख्य उद्देश्य रहा है। इसका निर्माता संवेदनशील होने के कारण अपनी वेदना, अपने उपर होने वाले अत्याचार, अपने अधिकारों का होता हनन, छटपटाहट को नाटक द्वारा व्यक्त कर समाज में चेतना निर्माण करने का कार्य करता है। उपर हमने कहाँ है कि दलित नाटक की उत्पत्ति बहुत मजबूत रूप से हुई है। किंतु इसके बावजूद भी यह विधा अचर्चित दिखाई देती है। इसके कई कारण हमें दिखाई देते हैं। यह नाटक जब-जब कहीं खेले जाते हैं या इसका मंचन होता है तब इसका काफी विरोध होता रहा है। व्यावसायिक नाटकों से इसका संघर्ष, रंगमंच की प्रतिकुलता, लेखकों की आर्थिक उदारता, प्रकाशक वर्ग द्वारा इनकी होती उपेक्षा आदि अनेक कारण इसके अचर्चा के रहे हैं ।

मूलत: नाटक यह विधा दलितों की ही देन है। शुरू से ही दलित समाज उत्पादक और श्रमजीवी रहा है। यह लोग दिन भर मजदूरी करके जब रात को वापिस आते हैं तो मनोरंजन के लिए अनेक कलाएँ प्रस्तुत करते थे । बिमारियों से मुक्ति, अकाल, अनावृष्टि से बचने के लिए यह लोग मुखौटा, जानवरों की खाल लगाकर नृत्य करते थे। नाटक का प्राथमिक रूप यही रहा है। मोहनदास नैमिशराय ने दलित नाट्य परंपरा को लोकनाट्य परंपरा से जोड़ते हुए लिखा है, ”मैं अगर कहूँ कि हर रंगकर्मी के भीतर उसकी स्मृतियों का दबाव होता है तो गलत नहीं होगा । थिएटर और लेखन के प्रति मेरे अनुराग का कारण भी वहीं रहा है। उसे विकसित किया सांग, ढोला तथा नौटंकी ने हमारे पड़ोसी लगभग अल्हा-उदल की कथा सुनते थे । बाद में मुझे पता चला वे हमारे पुरखे थे । उनकी बहादूरी के किस्से हमें रोमांचित करते थे। बिहार में ‘राजा सल्हेस’ का किस्सा लगभग इसी तरह का है। उस किस्से में अस्मिता का भाव है। साथ हमलावर को जवाब देने की प्रवृत्ति भी, दलितों के लिए नाटक से जुड़ना व्यक्तिगत रूची की बात कम और सामूहिक अधिक है।”2

मनोरंजन की जो तमाम विधाएँ है वह दलितों से ही विकसित होती नजर आती है। जैसे – नट, नृत्य, गायन इत्यादी । गाँव में नट-नटी के करतब दिखाने के लिए भाड़े-भड़ौती करना, विदूषक, मसखरा, बहरूपिया बनना, किसी के गुणों-अवगुणों का गा-गाकर प्रचार करना दलित लोग ही करते थे। इसी कलाओं को आगे चलकर नाटक का स्वरूप प्राप्त हुआ । कोई भी लोककला क्यों न हो, जैसे – जलसा, लावणी या नाटक उसमें काम करनेवाले ज्यादातर लोग दलित समाज के ही होते हैं । इससे पता चलता है कि नाटक दलितों के द्वारा ही खेला जाता है ।

वस्तुत: नाटकों का विवेचन दो रूपों में हम कर सकते है। वर्तमान में नाटक के दो रूप हमें दिखाई देते हैं। एक वह नाटक जो रंगमंच के अधिन है। जिसका निर्माण ही रंगमंच को आधार बनाकर किया जाता है । जिसे आज हम मूल प्रवाह का नाटक कहते हैं । जिसका उद्देश्य केवल मनोरंजन तथा अर्थ प्राप्ती ही होता है। लेकिन दलित नाटक इससे अलग है। यह दलितों द्वारा ही लिखा जाता है । यह अलग बात है कि आज गैर दलित लेखक भी दलितों के उपर लिख रहे हैं। लेकिन यह लेखन सहानुभूतिपरक होता है। परंतु आज दलितों को सहानुभूति नहीं चाहिए । क्योंकि सहानुभूति से कोई प्रश्न हल नहीं हो सकत हैं ।

एक तरफ वह नाटक है जिसके पास पूरी तरह से रंगमंच होता है और एक ओर वह नाटक है जिसके पास कोई विशेष रंगमंच ही नहीं है । इसे हम दलित नाटक कहते हैं । इसके पास न कोई रंगमंच है न रंगमंच की कोई साधन सामग्री। सही बात तो यह है कि दलित नाटकों को इन साधनों की कोई जरूरत ही नहीं होती । इसकी थीम ही इतनी सशकत होती है कि बिना किसी साधन-सामग्री तथा रंगमंच के बीना ही यह दर्शकों पर अपना प्रभाव छोड़ जाती है । यह नाटक जिसने भोगा है, उसके द्वारा लिखने के कारण उसमें अभिव्यक्ति सामर्थ्य इतना होता है कि उसे संगीत, प्रकाश, वस्त्रसज्जा आदि साधनों की कोई जरूरत नहीं होती । इसीलिए इसे मुक्त नाटक भी कहा जाता है।

मूलत: हिंदी में दलित रंगमंच का जो प्रारूप है वह लोकरंगमंच है। लोकमंच पर काम करनेवाले लोग दलित ही रहे हैं । उसमें काम करने वाला वर्ग दलित ही रहा है। जो लोककलाएँ थी, उन्होंने ही आगे चलकर नाटक का रूप धारण किया । इस संदर्भ में दशरथ ओझा का मानना है कि, ”हिंदी नाटक की परंपरा का मूल स्रोत यह जन-नाटक ही है, जो स्वांग आदि नाम से अपने प्राचीन रूप से अब तक विद्यमान है। क्रमश: इन जन-नाटकों की एक शाखा ने विकसित होकर साहित्यिक रूप धारण किया।”3

आज दलित साहित्य के अंतर्गत नाटक विधा प्रमुखता के साथ हमारे सामने आती है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी के प्रेरणा से आज दलित नाटक एवं दलित रंगभूमी आगे बढ़ रही है। इतिहास में घटित अनेक प्रसंग एवं घटनाओं ने दलित नाटककारों को लिखने के लिए प्रेरित किया है। इतिहास में ऐसे कई पात्र है जिनके मानवी हक को नकार कर उन्हें केवल जैविक रूप में देखा गया है । ऐसे पात्रों की वकालत करने का काम इस रंगभूमी ने किया है। वरिष्ठ आत्मकथाकार कौशल्या बैसंत्री के अनुसार, ”निश्चित ही नकारे हुए मानवीय हक को प्राप्त करने के लिए दलित रंगभूमी ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।”4

20 वीं सदी में सबसे पहले स्वामी अछूतानंद ने हिंदी दलित नाट्य लेखन को लेकर पहल की । इनके चार नाटक दृष्टिगोचर होते हैं । इनका पहला नाटक ‘रामराज्य न्याय’ में रामायण के उपेक्षित तथा जुल्म का शिकार पात्र शंबूक की हत्या का चित्रण है । उनके अन्य नाटक, ‘मायानन्द बलिदान’, ‘पारख-पद’, ‘बली छलन’, यह हिंदू शास्त्रों और वाङ्मय के ऐसे पात्रों पर लिखे गए हैं, जिनके उत्पीड़न को सवर्ण साहित्यकारों और समाज ने त्यागा या बलिदान की संज्ञा देकर सवर्णों द्वारा दलितों के शोषण तथा सवर्ण पात्रों के छल को महिमामंडित करने का षड़यंत्र रचा था । अछूतानंद ने अपने नाटकों में ऐसे मर्म को छूनेवाले संवादों को रखा है जिससे दर्शक तथा पाठक को राम के प्रति अपनी मानसिकता बदलने को प्रेरित करते हैं और राम के वर्चस्ववाद को प्रस्तुत करते हैं ।

हिंदी दलित नाटक की इसी परंपरा में महत्त्वपूर्ण रूप से शिवप्रसन्नदास का ‘हरिजन’, माता प्रसाद का ‘अछूत का बेटा’, ‘धर्म के नाम पर धोखा’, ‘प्रतिशोध’, मोहनदास नेमिशराय का ‘अदालतनामा’, ‘हैलो कामरेड’, डॉ. एन.सिंह का ‘कठौती में गंगा’, एन.आर. सागर का ‘मार्ग का काटा’, ‘अन्तिम अवरोध’, सुनील कुमार सुमन द्वारा लिखित ‘एक बार फिर’, एल.एम. धर्मरत कृत ‘अछूत का प्यार’, कर्मशील भारती द्वारा लिखित ‘मान सम्मान’, ‘फांसी’, रूपनारायण सोनकर द्वारा लिखित ‘विषधर’, ‘एक दलित डिप्टी कलेक्टर’, ‘महानायक’, रत्नकुमार सांभरिया द्वारा लिखित ‘वीमा’, सुशीला टाकभौरे का ‘नंगा सत्य’, आदि प्रमुख नाटक है।

दलित नाटक और रंगमंच की दृष्टि से कर्मशील भारती और धर्मवीर ने दिल्ली में दलित न्याय मंच स्थापित किया था। जिसके द्वारा अनेक दलित नाटकों का मंचन हुआ । कर्मशील भारती के अनेक नाटकों का यहाँ सफलतापूर्वक मंचन भी हुआ है। जिसमें – ‘मेरा वजूद’, ‘फाँसी’, ‘संवादों के पीछे’, आदि प्रमुखता से देखे जा सकते हैं । उन्होंने 10 अक्टूबर, 1989 को विजयादशमी के दिन मुनीरका गाँव में ‘मेरा वजूद’, नाटक का मंचन किया था। उन्होंने ‘मान-सन्मान’, ‘श्रेष्ठ-कौन’, ‘झुठा अहंकार’, ‘आजादी किसकी’, आदि नाटकों का भी मंचन किया है। साथ ही वरिष्ठ दलित कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा लिखित ‘दो चेहरे’ नाटक भी कई नाट्य संस्थाओं द्वारा मंचित हुआ है।

60 के दशक में प्रसिद्ध रंगकर्मी रमेश मेहता ने एक नाटक लिखा था, जिसका नाम था – ‘रोटी और बेटी’। नाटक के माध्यम से उन्होंने जातीय आधार पर लोगों को उद्वेलित और उत्तेजित करती आ रही ज्वलंत समस्या को उजागर किया है। इसी परंपरा में आगे 1977 में मनोहर लाल मानव ने ‘चावली’ नामक नाटक की निर्मिती की। इसकी मूल थीम दलित समाज के पढ़े-लिखे तबके में मध्यवर्गीय मूल्यों के प्रति रूझान और समाज का झकझोर कर उन्हें शिक्षित समाज के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देना है। इस नाटक का निर्देशन आनन्द कुमार ने किया था।  यह नाटक अनेक सार्वजनिक सभाओं में और दलित बस्तियों में मंचित हुआ था । 1980 मे मनोहरलाल और डालचंद के संयुक्त प्रयास से एल.के. रैना के द्वारा ‘कबिरा खड़ा बाजार में’, विशेष रूप से दलित लोगों के लिए मंचित किया ।

जहाँ तक दलित समाज के शौकिया, नाटककारों की बात है, उसमें उत्तर प्रदेश के ही नाटककारों ने कई प्रस्तुतियाँ की । एकलव्य के जीवन पर वर्तमान के संदर्भ को लेकर भीमसेन संतोष द्वारा ‘शोषित के नाम संतोष का पैगाम’ नाटक लिखा, जो शोषित साहित्य प्रकाशन, दिल्ली की ओर से 1983 में प्रकाशित हुआ। इस नाटक में उन्होंने दलितों के भीतर की पीड़ा को बाहर लाने का प्रयास किया है। इस प्रकार दलित नाटकों का लेखन और मंचन आज भी होता हुआ दिखाई देता है। वर्तमान समय में दलित नाटककार सिनेमा और सिरियल के चकाचौंध से प्रभावित तो हुए हैं, किंतु वह अपने मूल उद्देश्य से दूर नहीं गये । वह आंबेडकरी विचारों से हटे नहीं है। वह सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन के लिए कटिबद्ध दिखाई देते हैं । भले ही आज दलित नाटक एवं दलित रंगभूमी के सामने अनेक समस्याएँ है किंतु बाबासाहेब आंबेडकर के प्रेरणा से दलित नाटककार, दलित नाटक, दलित रंगभूमी और दलित कलाकार आज आगे बढ़ रहा है।

संदर्भ : 1) मोहनदास नेमिशराय, दलित साहित्य अवधारणा में रंगमंच, पृ. 54 2) संपा. मनोहर भंडारी, दलित साहित्य समग्र परिदृश्य, पृ. 149 3) दशरथ ओझा, हिंदी नाटक का उद्भव और विकास, पृ. 53 4) संपा. डॉ. उमाकांत बिरादार, डॉ. विजकुमार रोडे, दलित विमर्श : नाटक तथा रंगमंच, पृ. 138 संप्रति : 1)    प्रोफेसर डॉ. संजय राठोड हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, पिन-431004 चलभाष् – 9421686342 ई-मेल – drsanjayrathod5@gmail.com तथा 2) विकास सूर्यकांत वाघमारे शिक्षा : एम.ए. (हिंदी), सेट, एम.फिल.,                 पी.जी. डिप्लोमा, पी-एच.डी. (कार्यरत) आदि । चलभाष् : 9518325363, 9075181603 ई-मेल :waghamarev12@gmail.com पत्राचार का पता : शोधार्थी, हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, पिन-431004 मौलिकता प्रमाणपत्र- ” हिंदी दलित नाटक और रंगमंच” शीर्षक शोध आलेख स्वलिखित,  अप्रकाशित है।

रामचरित मानस विवाद के बीच समाजवादी पार्टी का बड़ा फैसला

 समाजवादी पार्टी ने अपनी पार्टी के दो सवर्ण नेताओं को निष्कासित कर दिया है। इसमें पहला नाम रोली तिवारी मिश्रा जबकि दूसरा नाम ऋचा सिंह का है। ये दोनों नेता रामचरित मानस मुद्दे पर स्वामी प्रसाद मौर्य का लगातार विरोध कर रही थीं और मौर्य के खिलाफ सोशल मीडिया पर मोर्चा खोल रखा था। ऐसे में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के फैसले से साफ हो गया है कि अखिलेश यादव अपनी पार्टी के सवर्ण नेताओं की बजाय पिछड़े समाज के नेताओं के साथ खड़े हैं।

 दरअसल, रोली मिश्रा और ऋचा सिंह सोशल मीडिया पर स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान का लगातार विरोध कर रही थीं। और हिन्दू धर्म और रामचरित मानस के समर्थन में खड़े होने के साथ ही स्वामी प्रसाद मौर्य पर खुलकर तो अखिलेश यादव पर इशारों-इशारों में हमला कर रही थीं। लगातार ऐसा होने के बाद अखिलेश यादव ने दोनों नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

 इस बीच कई सपा नेताओं ने रोली तिवारी मिश्रा और ऋचा सिंह पर भाजपा के इशारे पर काम करने का आरोप भी लगा रहे थे। क्योंकि रोली तिवारी मिश्रा इस पूरे विवाद के बाद जिस तरह से हिन्दू धर्म की राजनीति पर उतर आई थीं, उससे साफ हो गया था कि आने वाले दिनों में उनका सपा में रहने का कोई इरादा नहीं है। सोशल मीडिया ट्विटर पर खुद को डॉ. रोली तिवारी मिश्रा लिखने वाली सपा नेत्री ने बाद में अपने नाम के आगे पण्डित जोड़ लिया था।

सपा से निकाले जाने के बाद मिश्रा ने अखिलेश यादव को टैग करते हुए लिखा कि राष्ट्रद्रोहियों, सनातन धर्मद्रोहियों, रामद्रोहियों के खिलाफ आवाज उठाती थी, उठाती रहूंगी। सनातन धर्म के स्वाभिमान प्रभु श्रीराम, श्रीरामचरित मानस के सम्मान के लिए ऐसे हजारों निष्कासन स्वीकार। अखिलेश यादव की इस कार्रवाई के खिलाफ जहां तमाम सवर्ण समाजवादी पार्टी को सनातन धर्म का विरोधी बताकर अखिलेश यादव पर निशाना साध रहे हैं तो वहीं अखिलेश यादव ने भी साफ कर दिया है कि धर्म और सम्मान की लड़ाई में वह सम्मान के साथ हैं।

People think who has come to live among us – Ramesh Bhangi

When a person lying in a corner of the village comes to live in the city and allegedly starts living in the midst of civilized society, there is a stir among the people around. He is harassed. People are not able to digest that till yesterday the person who used to serve at our place has come to live on an equal footing with us. This is to say of Ramesh Chand Gehlot i.e. Ramesh Bhangi.

Ramesh Bhangi of Valmiki Samaj is a well-known name in the world of Dalit literature and is practicing law these days. When he came to live in a society in Ghaziabad, there was a buzz in the neighborhood. He was harassed. Dirt was poured into their water tank. The neighbors wanted Ramesh to leave the Bhangi Society, but he stayed put as we faced difficulties.

It is not that Ramesh Bhangi promoted his caste. Ramesh Bhangi says my certificate name is Ramesh Chand Gehlot. It is a common name, it does not reveal caste, but in Indian society your caste goes ahead of you. As the fragrance of a flower moves forward, so does your caste. Can’t escape caste. I have to say that India itself means caste. The identity of India is only from caste.

How did Ramesh Bhangi become Ramesh Gehlot, and why? When asked, Ramesh says, “All the books on sociology, all start with caste. All the books written on India start with caste. So the reality of India is caste, it is difficult to avoid it, so I added my caste to my name.

Ramesh Bhangi struggled a lot in order to come to Delhi from the Dalit colony of the village. He was born in 1968 in Malakpur village of Baghpat district of Uttar Pradesh, situated on the edge of Delhi. From here he took education up to primary. When he was studying in the fifth standard, he and other children of his caste were made to sweep the school. The teacher then used to keep a separate stick for the children of the Dalit community. A big stick, so that he can beat the children of Dalit society and also stay away from them.

Later in the day, Ramesh Bhangi came to Delhi. During this he also did the work of scrap. He used to go around the city to collect papers. Ramesh Bhangi did not give up the desire to move forward despite doing many odd jobs during the days of struggle. His inspiration was Babasaheb Dr. Ambedkar, whose biography he got to read in his childhood. Babasaheb’s life struggle instilled in Ramesh Bhangi the belief that life can be successful if there is struggle. Ramesh realized how caste works when he went to the exchange office to enroll for a job. There was a vacancy for the bus conductor. But the clerk sitting there told him to work as a sweeper, what would he do by working as a bus conductor? However, later he got a job as a bus conductor and then later he was appointed as a translator in the Central Translation Bureau of the Ministry of Home Affairs. After which he saw closely what the Dalit community had to face while living in the residential colony.

He saw casteism closely while living in different government and private flats. And when he came to live in Vasundhara area of Ghaziabad situated at the mouth of Delhi, then there was an earthquake in the society. Ramesh Bhangi recollects, “I joined a society of Vasundhara in 2001. Everything went well for a few years. Then in the year 2006, my neighbor asked my wife about caste. Then the wife told her caste. Since then she started cutting off from us and gradually other people of the neighborhood also came to know about our caste.

After the truth of Ramesh Bhangi’s caste came to the fore, many times the neighbors argued with him. He was harassed in various ways. Ramesh says- “Everyone wanted us to leave from there. But if we stick to our identity, the neighbors start harassing us indirectly. Like broke the chairs kept on my terrace. They break our pots, they break the plants in them. Let’s break the water boil inside the water tank. Since we do not see who has done this, we cannot even say anything. So in this way there is an attempt to harass us.”

After all, in a society where all the people are educated, intelligent, who are called civilized, why do those people do this? When I ask, Ramesh Bhangi says that the people of Dalit society are still not being fully accepted in the residential areas of the cities. If the person in front belongs to the Valmiki community, the discrimination against him increases further. People also want to escape from our shadow. This is a mental illness and if the person in front has a mental illness, then he should also get treated. I am a Victim.

लोगों को लगता है कि हमारे बीच यह कौन रहने आ गया- रमेश भंगी

गांव के एक कोने में पड़ा हुआ व्यक्ति जब शहर में रहने के लिए आता है और कथित तौर पर सभ्य समाज के बीच में रहना शुरू करता है तो आसपास के लोगों के बीच में हलचल मच जाती है। उसे परेशान किया जाता है। लोग यह पचा नहीं पाते हैं कि कल तक जो व्यक्ति हमारे यहां चाकरी करता था, वह हमारे बराबर में रहने आ गया है। यह कहना है रमेश चंद गहलोत यानी रमेश भंगी का।

वाल्मीकि समाज के रमेश भंगी दलित साहित्य की दुनिया में एक जाना-पहचाना नाम हैं और इन दिनों वकालत कर रहे हैं। जब वो गाजियाबाद की एक सोसाइटी में रहने आएं तो आस-पड़ोस में खुसर-फुसर शुरू हो गई। उन्हें परेशान किया गया। उनके पानी की टंकी में गंदगी डाली गई। पड़ोसी चाहते थे कि रमेश भंगी सोसाइटी छोड़ दें, लेकिन हम मुश्किल को झेलते हुए वह वहां जमें रहें।

ऐसा नहीं है कि रमेश भंगी ने अपनी जाति का प्रचार किया था। रमेश भंगी कहते हैं मेरा सर्टिफिकेट का नाम रमेश चंद गहलोत है। सामान्य नाम है, इससे जाती का पता नहीं चलता, लेकिन भारतीय समाज में आपसे आगे आपकी जाति चलती है। जैसे किसी फूल की खुशबू आगे चलती है, वैसे ही आपकी जाति भी आगे चलती है। जाति से बच नहीं सकते। मेरा तो कहना है कि भारत का मतलब ही जाति है। भारत की पहचान ही जाति से ही है।

रमेश गहलोत से रमेश भंगी कैसे बन गए, और क्यों? पूछने पर रमेश कहते हैं, “समाजशास्त्र की जितनी किताबें हैं, सब सब की सब जाति से शुरू होती हैं। भारत के ऊपर जितनी किताबें लिखी गई हैं, सभी जाति से ही शुरू होती है। तो भारत की जो इस सच्चाई है वह जाति है इससे बचना मुश्किल है इसलिए मैंने अपने नाम के साथ ही अपनी जाति जोड़ ली।”

रमेश भंगी ने गांव की दलित बस्ती से दिल्ली आने के क्रम में काफी संघर्ष किया। दिल्ली के किनारे पर बसे उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के मलकपुर गांव में सन् 1968 में उनका जन्म हुआ। यहीं से उन्होंने प्राइमरी तक की शिक्षा ली। जब वो पांचवी में पढ़ते थे, तब स्कूल में उनसे और उनकी जाति के बाकी बच्चों से स्कूल में झाड़ू लगवाया जाता था। टीचर तब दलित समाज के बच्चों के लिए अलग से डंडे रखता था। एक बड़ा सा डंडा, ताकि वो दलित समाज के बच्चों को पीट भी दे और उनसे दूर भी रहे।

बाद के दिनों में रमेश भंगी दिल्ली आ गए। इस दौरान उन्होंने कबाड़ी का काम भी किया। वो शहर में घूम-घूम कर कागज चुना करते थे। संघर्ष के दिनों में कई छोटे-मोटे काम करने के बावजूद रमेश भंगी ने आगे बढ़ने की चाह नहीं छोड़ी। उनके प्रेरणा बने थे- बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, जिनकी एक जीवनी उन्हें बचपन में ही पढ़ने को मिल गई थी। बाबासाहेब के जीवन संघर्ष ने रमेश भंगी में यह विश्वास पैदा किया कि संघर्ष किया जाए तो जीवन सफल हो सकता है। जाति किस तरह काम करती है इसका अहसास रमेश को तब हुआ, जब वो नौकरी के लिए एक्सचेंज ऑफिस में नाम लिखवाने गए। बस कंडक्टर के लिए वेकैंसी थी। लेकिन वहां बैठे क्लर्क ने उनसे कहा कि वह सफाई कर्मचारी का काम कर लें, बस कंडक्टर की नौकरी कर वह क्या करेंगे?  हालांकि बाद में उन्हें बस कंडक्टर की नौकरी मिल गई और फिर बाद में वह गृह मंत्रालय के केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो में अनुवादक के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई। जिसके बाद रिहायशी कॉलोनी में रहने के दौरान दलित समाज के व्यक्ति को क्या-क्या झेलना पड़ता है, उन्होंने इसे करीब से देखा।

अलग-अलग सरकारी और निजी फ्लैट में रहने के दौरान उन्होंने जातिवाद को नजदीक से देखा। और जब वो दिल्ली के मुहाने पर बसे गाजियाबाद के वसुंधरा इलाके में रहने आएं तब तो सोसाइटी में भूचाल आ गया। रमेश भंगी याद करते, “मैं 2001 में वसुंधरा की एक सोसायटी में आ गया। कुछ सालों तक सब ठीक चला। फिर साल 2006 की बात है, मेरी पड़ोसी ने मेरी पत्नी से जाति के बारे में पूछा। तब पत्नी ने अपनी जाति बता दी। तब से वह हमसे कटने लगी और धीरे-धीरे आस-पड़ोस के दूसरे लोगों को भी हमारी जाति पता चल गई।”

रमेश भंगी की जाति का सच सामने आने के बाद कई बार पड़ोसियों ने उनसे तू-तू मैं-मैं की। उनको तरह-तरह से परेशान किया गया। रमेश कहते हैं- “सब चाहते थे कि हम वहां से चले जाएं। लेकिन हम अपनी पहचान के साथ डटे रहें तो पड़ोसी हमें अप्रत्यक्ष रूप से परेशान करने लगे। जैसे कि मेरी छत पर रखी कुर्सियां तोड़ दी। हमारे गमले तोड़ देते हैं, उसमें लगे पौधे तोड़ देते हैं। वाटर टैंक के अंदर लगे वाटर बॉईल को तोड़ देते हैं। हम चूकि देखते नहीं है कि यह किसने किया है, इसलिए हम कुछ बोल भी नहीं पाते हैं। तो इस तरह हमें परेशान करने की कोशिश की जाती है।”

आखिर जिस समाज में सभी लोग पढ़े-लिखे हैं, समझदार हैं, जिन्हें सभ्य कहा जाता है, वो लोग ऐसा क्यों करते हैं? मेरे पूछने पर रमेश भंगी कहते हैं कि शहरों के रिहायशी इलाकों में दलित समाज के लोगों को अब भी पूरी तरह से एक्सेप्ट नहीं किया जा रहा है। सामने वाला वाल्मीकि समाज का हो तो उसके साथ भेदभाव और बढ़ जाता है। लोग हमारी परछाई से भी बचना चाहते हैं। यह एक मानसिक रोग है और मानसिक रोग सामने वाले को है तो इलाज भी उसे करना चाहिए। मैं तो विक्टिम हूं।

हिन्दू राष्ट्र की पोल खोलने वाली कहानी

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आज मैं मित्र अनुज के गांव में गया, जहां मुस्लिम ना के बराबर रहते हैं, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी का तो नामोनिशान तक नही गांव में, मैंने गांव के नुक्कड़ पर ही अनुज के घर के बारे में गांव के बाहर ही खड़े एक व्यक्ति मुकेश से पूछा कि भाईसाहब अनुज जी के घर जाना है।
मुकेश ने कहा की कौन अनुज?
मैंने बोला अनुज जी ,,
उसने फिर बोला भाई अनुज कौन से वाले?
मैंने कहा वही अनुज जी, अब वो आदमी गर्म हो गया, कहने लगा, अनुज-अनुज कर रहे, पूरा नाम बताओ?
मैंने बोला पूरा नाम जरूरी है क्या?
कहने लगा जरूरी है, बिल्कुल जरूरी है।
यहां कई अनुज रहते हैं, एक अनुज जाटों में है, दो अनुज चमारों में हैं, एक अनुज मालियों में हैं, एक त्यागियों में अनुज और एक अनुज तिवारी।
मैंने कहा अनुज हिन्दू,,
अब उस आदमी का पारा सातवें आसमान पर था, कहने लगा हिन्दू-हिन्दू नही , नाम बताओ पूरा नाम क्या है?
मैंने कहा अनुज जबभी मुझसे बहस करता है तो कहता है कि मैं “हिन्दू” हूँ,, हिन्दू राष्ट्र बनाने में अपना अहम योगदान दे रहा हूँ।
तो मुझे लगा कि जो व्यक्ति हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए ततपर हो , प्रयासरत हो, अग्रणी हो, कम से कम उसकी पहचान हिन्दू से तो होगी ही।
अब वो आदमी चिल्लाने भर पर आ गया, कहने लगा जब उसका पूरा नाम पता हो तब उसके बारे में पूछना उससे पहले नही।
मैं तब से यही सोच रहा हूँ कि जो व्यक्ति दिन-रात हिन्दू-राष्ट्र हिन्दू-राष्ट्र का राग अलाप रहा है वो अपने गांव तक को हिन्दू बना नही पाया वो देश को क्या हिन्दू राष्ट्र बनाएगा?
गांवों में आज भी ना केवल मोहल्ले बल्कि शमसान तक जातिओ के हिसाब से बंटे हुए हैं।
ऐसा देश जहां “जन्म से मृत्यु” के बाद भी “जाति नही जाती” वहां हिन्दू राष्ट्र की कल्पना मात्र करना भी हास्यस्पद नही तो क्या हे।
जाति । जाति । जाति ।
Mp Singh जी की पोस्ट से साभार 🙏