Why Celebrate the Independence Day of India – 15 August

A question that is often raised in some circles is, “Why should one celebrate Independence Day of India?” Although this is a rather complex topic that can’t be answered simply, a broader reflection on pre-independence and post-independence is needed. Upon reflecting, the following comes to my mind:

On June 9, 2000, the Honourable KG Balakrishnan was appointed to the post of Chief Justice of India. This was made possible when the then President of India, His Excellency, the Late Shri KR Narayanan, probed and asked a question as to why the list of potential candidates for the post of Chief Justice of India had no representation from the Scheduled Castes and Scheduled Tribes.

In view of the recent Manipur Violence and Tragedy, the Chief Justice of India, Hon. Chandrachud, rightfully intervened and raised questions. Recently, a number of measures were undertaken, including the appointment of the former Maharashtra DGP and NIA officer Mr. Dattatray Padsalgikar to monitor the probe by the investigating agencies. (www.thehindu.com).

During a conversation in 1930, Dr. Ambedkar told Gandhiji: “I have no homeland… how can I call this land my own homeland and this religion my own, wherein we are treated worse than cats and dogs, wherein we cannot get water to drink?”

Upon further reflections, the question that comes to my mind is: Do Dalits now believe they have a homeland? Is the representation of Dalits enhanced in independent India in comparison to colonial India? Are institutional pillars (judiciary, bureaucracy, and political leadership) effective in implementing the values of justice, liberty, equality, and fraternity? While there are incidents which suggest more effectiveness of these structures is needed, the overall trend suggests that there are now significant gains made in India for everyone. Would these gains have been made in the colonial era? Perhaps not to the same degree, or for the same reasons.

For me, it is more important that the caravan of transformation be kept moving forward recognizing, the pace can vary from time to time. This will also add to the tributes to, and for, many people who sacrificed and lost their lives for independence- and during the days of partition.

It is also important to see, at least on some occasions, a “glass half full”; celebrate accomplishments; learn, strategize, and commit our pledges for continuous improvements at both the individual and the systemic levels. Occasions such as Independence Day provide opportunities for these considerations.

With India’s population of over 1.4 billion and a strong diaspora, there is untapped potential to work together and attain outcomes that are aligned with the United Nations Sustainable Goals for 2030.

Let us celebrate the gains that India has made – and pledge to continue to strengthen the structures of democracy and achieve a more inclusive India!

Happy 77th Independence Day of India and greetings to all!

Jai Bhim

Jai Birdie, General Secretary Chetna Association, Canada 

राजस्थान, मप्र और छत्तीसगढ़ चुनव को लेकर बहनजी का बड़ा ऐलान

सुश्री मायावतीमध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। इस बीच बहुजन समाज पार्टी की मुखिया बहन मायावती ने एक साथ कांग्रेस और भाजपा दोनों पर जमकर हमला बोला है। एक बयान जारी कर बहनजी ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को बेनकाब किया है।

मायावती ने आरोप लगाया है कि मध्यप्रदेश सरकार में 50 प्रतिशत कमीशनखोरी के आरोप को लेकर कांग्रेस व भाजपा के बीच जारी आरोप-प्रत्यारोप, मुकदमों आदि की राजनीति से कमरतोड़ महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, शोषण-अत्याचार आदि जनहित से जुड़े ज्वलन्त मुद्दे चुनाव के समय पीछे छूट जा रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया है कि जरूरी मुद्दों का छूट जाना कितना उचित है। ऐसा क्यों हो रहा है?

दोनों दलों पर जमकर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा है कि भाजपा-शासित मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि कांग्रेस शासित राजस्थान व छत्तीसगढ़ में भी भ्रष्टाचार अहम मुद्दा है। बहनजी ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस व भाजपा की जनविरोधी नीतियों व विकास के हवा-हवाई दावों के कारण सर्वसमाज के गरीबों, बेरोजगारों, किसानों व महिला सुरक्षा आदि का मुद्दा तीनों राज्यों में असली चुनावी मुद्दा है।

चुनावी मुद्दों का जिक्र करने के बाद देश की कद्दावर नेता और बसपा प्रमुख मायावती ने ऐलान किया कि बीएसपी इन तीनों राज्यों में भाजपा व कांग्रेस सरकारों के खिलाफ जनहित व जनकल्याण के खास मुद्दों को लेकर अकेले अपने बूते पर विधानसभा का यह चुनाव लड़ रही है। उम्मीदवारों के नाम भी स्थानीय स्तर पर घोषित किए जा रहे हैं। पार्टी को भरोसा है कि वह अच्छा रिजल्ट हासिल करेंगी।

दरअसल उत्तर प्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ तीन ऐसे राज्य हैं, जहां बहुजन समाज पार्टी का दबदबा आज भी माना जाता है। एक वक्त में इन तीनों राज्यों की सियासत में तेजी से उभरी बहुजन समाज पार्टी आज भले ही थोड़ी कमजोर दिखने लगी हो, इन राज्यों में न तो बसपा के समर्थक कम हुए हैं और न ही बसपा को लेकर जुनून। हाल ही में बसपा के नेशनल को-आर्डिनेटर आकाश आनंद की भोपाल में हुई रैली में उमड़े जनसैलाब ने इस पर मुहर भी लगाई है।

डॉ. हरिसिंह गौर‌‌‌‌: जिनको भारत रत्न की मांग के लिए खून से हो रहे हैं हस्ताक्षर

मध्यप्रदेश का सागर जिला कई मायनों में प्रदेश का एक अहम जिला है। इस जिले को एक और व्यक्ति के नाम से भी जाना जाता है। वो हैं, डॉ. हरिसिंह गौर‌‌‌‌। मध्यप्रदेश के सागर को डॉ. हरिसिंह गौर की नगरी के रूप में जाना‌ जाता है। जिले में कई सालों से डॉ. हरिसिंह गौर‌‌‌‌ साहब को भारत रत्न दिये जाने की मांग की जा रही है। इसके लिए उनके चाहने वालों ने खून से हस्तक्षार अभियान भी चलाया। यह मांग अब इतनी तेज हो चुकी है कि यह अभियान संभागीय स्तर से निकलकर अब यह राज्य का एक अहम मुद्दा बन गया है।

कौन है डॉ. हरिसिंह गौर

डॉ. हरिसिंह गौर सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक, शिक्षाशास्त्री, ख्यति प्राप्त विधिवेत्ता, न्यायविद्, समाज सुधारक, साहित्यकार (कवि, उपन्यासकार) तथा महान दानी एवं देशभक्त थे। वह बीसवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ शिक्षा मनीषियों में से थे। गौर दिल्ली विवि के उपकुलपति तथा नागपुर विवि के उपकुलपति व कुलपति रहे। वे भारतीय संविधान सभा के उपसभापति, साइमन कमीशन के सदस्य तथा रायल सोसायटी फॉर लिटरेचर के फेलो भी रहे थे। गौर साहब ने कानून, शिक्षा, साहित्य, समाज सुधार, संस्कृति, राष्ट्रीय आंदोलन, संविधान निर्माण आदि में भी अपना अहम अवदान दिया।

डॉ॰ गौर का जन्म 26 नवम्बर 1870 को‌ सागर जिले के शनिचरीटोरी के पास एक निर्धन परिवार में हुआ था। उन्होंने सागर, जबलपुर, नागपुर से पढ़ाई‌ करने‌ के बाद, इंग्लैंड से 1892 में दर्शनशास्त्र व अर्थशास्त्र में ऑनर्स की उपाधि प्राप्त की। फिर 1902 में एल. एल. एम किया। आगे उन्होंने अंतर-विश्वविद्यालयीन शिक्षा समिति में कैंब्रिज विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। फिर, चार वर्ष तक इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल में वकालत की।

गौर साहब ने 1929 में “स्पिरिट ऑफ बुद्धिज़्म” किताब लिखी। इस किताब की प्रस्तावना महान कवि रवींद्र नाथ टैगोर द्वारा लिखी गई। इस पुस्तक को पढ़कर बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर काफी प्रभावित हुए। जापान में इस बौद्ध दर्शन से गौर साहब को धर्मगुरु का सम्मान दिया गया।

डॉ. हरिसिंह गौर का जीवन में सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि, उन्होंने अपने जीवन की सारी कमाई और जमा पूँजी शिक्षा के लिए दान कर दी। गौर साहब ने जीवन की संपूर्ण जमा पूंजी 20 लाख रुपये से प्रदेश के बहुत पिछड़े इलाके बुंदेलखंड (सागर) में 18 जुलाई 1946 को सागर विश्वविद्यालय की स्थापना की। महान दानी के रूप प्रसिद्ध हुए हरीसिंह गौर का 25 दिसम्बर 1949 को निधन हो गया। इसके बाद सागर विश्वविद्यालय का नाम डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय कर दिया गया। बाद में डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय की मान्यता प्राप्त हुयी।

  हरिसिंह गौर को भारत रत्न क्यों देना चाहिए, इसको लेकर एक परिचर्चा के दौरान हरिसिंह गौर भारत रत्न समिति के संयोजक इंजी. संतोष प्रजापति कहते हैं कि, “डॉ गौर ने सागर जैसे पिछड़े इलाके में विवि की स्थापना की थी। इस विवि से आचार्य रजनी​श (ओशो) जैसे महान दार्शनिक ने शिक्षा प्राप्त की। इस विवि से निकले छात्र प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति कर रहे हैं। हम किसी राजनीतिक पार्टी को दोष नहीं दे रहे कि उन्होंने डॉ. गौर को भारत रत्न नहीं दिया। कारण यह है कि हमने कभी अपनी आवाज को इतना बुलंद ही नहीं किया कि हमारी आवाज केंद्र सरकार तक पहुंच सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 अगस्त को सागर आ रहे हैं, हमारे मन में विचार आया कि क्यों न हम उनके सामने अपनी बात रखें की वे डॉ. गौर को भारत रत्न प्रदान करें ताकि हमारे सागर और विवि का देश—दुनिया में गौरव बढ़े।

हरिसिंह गौर को भारत रत्न देने की मांग के लिए आयोजित कार्यक्रम में उमड़े प्रशंसकहरिसिंह गौर भारत रत्न समिति के सदस्य विनोद प्रजापति का कहना है कि डॉ. हरिसिंह गौर को ‘भारत रत्न’ दिलाए जाने की मांग को लेकर सागर में इंजी​. संतोष प्रजापति के संयोजन में डॉ. हरिसिंह गौर भारत रत्न समिति चरणबद्ध आंदोलन कर रही है। हाल ही में समिति ने पीएम के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर मांग को आगे बढ़ाया।

हरिसिंह गौर को भारत रत्न देने की मांग के प्रति जब हमने विश्वविद्यालय में एक संवाद किया। तब, राष्ट्रपति के पूर्व ओएसडी और विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर रहे और वर्तमान में केन्द्रीय विवि पंजाब में पदस्त डॉ. कन्हैया त्रिपाठी ने बताया कि, “हरिसिंह गौर का संविधान और‌ भारत के निर्माण में अभूतपूर्व योगदान रहा है। गौर साहब को भारत रत्न देने की मांग केवल स्थानीय स्तर से नहीं उठनी चाहिए‌, बल्कि देश के कोने-कोने से यह मांग उठनी चाहिए। मुझे नहीं समझ आता कि भारत सरकार ने अब तक गौर साहब को भारत रत्न क्यों नहीं दिया। भारत सरकार को यह फैसला बहुत पहले लेना चाहिए था। हालांकि कन्हैया त्रिपाठी यह भी जोड़ते हैं कि भारत रत्न मांगने से नहीं मिलता‌। यह सरकारों की मंशा के ऊपर है। देश के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर को भी भारत रत्न मरणोपरांत दशकों बाद‌ दिया गया।

हरिसिंह गौर को भारत रत्न क्यों मिलना चाहिए, इसके जवाब में बैचलर ऑफ जर्नलिज्म के छात्र बलदेव तर्क देते हैं कि, “हरिसिंह गौर ने शिक्षा, महिलाओं और इस क्षेत्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। इसका अंदाजा उनके द्वारा संपूर्ण संपत्ति दान किये जाने से लगाया जा सकता है। उन्होंने कई लोकहितकारी कानून भी पास कराये थे।”

हरिसिंह गौर को भारत रत्न देने की मांग के लिए आयोजित कार्यक्रम में उमड़े प्रशंसक

विधि विभाग में एल. एल. बी के छात्र दीनदयाल बताते हैं कि, “डॉ. गौर को भारत रत्न देने की मांग आज से नहीं, बल्कि कई सालों से उठती आयी है‌। गौर साहब का देशहित में समाजिक योगदान बहुत बड़ा है। हरिसिंह गौर वर्तमान यूनिफॉर्म सिविल कोर्ट कानून के प्रति भी सकारात्मक नजरिया रखते थे। डॉ. गौर चहुमुखी दृष्टिकोण वाले‌ व्यक्तित्व थे।”

 डॉ. गौर को भारत रत्न देने की मांग को लेकर लगातार विचार-विमर्श, चर्चाएं और सभाएं लगातार आयोजित की जाती है। यह मांग और चर्चाएं देश में तब तक होती रहेगी, जब तक कि, गौर साहब को भारत रत्न मिल नहीं जाता है‌। खास बात यह भी है कि डॉ. हरिसिंह गौर को भारत रत्न देने की मांग को लेकर तमाम शिक्षाविदों से लेकर स्थानीय राजनेताओं का भी समर्थन मिल रहा है।

स्वीडन के गोथनबर्ग में 19-22 सितंबर तक ग्लोबल इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कांफ्रेंस, ‘दलित दस्तक’ के संपादक अशोक दास सहित छह भारतीय पत्रकारों को मिली फेलोशिप

 यूरोपीय देश स्वीडन में चार दिनों का ग्लोबल इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कांफ्रेंस होने जा रहा है। यह कांफ्रेंस 19-22 सितंबर तक स्वीडन के ऐतिहासिक गोथनबर्ग शहर में होगा। इस कांफ्रेंस में 110 देशों के 2000 पत्रकारों के शामिल होने की संभावना है। कांफ्रेंस के दौरान चार दिनों में लगभग 200 वर्कशॉप, एक्सपर्ट पैनल्स, नेटवर्किंग सेशन और स्पेशल इवेंट होंगे। इस कांफ्रेंस में दुनिया के दिग्गज पत्रकार (Speakers) हिस्सा लेंगे जो तमाम विषयों पर कांफ्रेंस में हिस्सा लेने वाले पत्रकारों को अलग-अलग विषयों पर संबोधित करेंगे। इस कांफ्रेंस में भारत से छह पत्रकारों को फेलोशिप मिली है, जिसमें ‘दलित दस्तक’ के फाउंडर और संपादक अशोक दास (अशोक कुमार) भी शामिल हैं।

लगातार चार दिनों तक होने वाले इस कांफ्रेंस में हाल के दिनों में चर्चा में आए AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की पत्रकारिता की अलग-अलग विधाओं सहित न्यूज रूम में होने वाले परिवर्तन को लेकर भी सेशन होंगे। इसके अलावा अलग-अलग क्षेत्र से संबंधित खोजी पत्रकारिता, डिजिटल पत्रकारिता, खोजी पत्रकारिता में रिसर्च का महत्व, पत्रकारिता में नई टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव, डाटा ड्राइवेन जर्नलिस्म, पर्यावरण पत्रकारिता और मोबाइल पत्रकारिता जैसे तमाम विषयों पर इसमें महारत रखने वाले दिग्गज पत्रकार और विशेषज्ञ संबोधित करेंगे। कार्यक्रम में इंवेस्टीगेटिव रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को ‘ग्लोबल शाइनिंग लाइट अवार्ड’ से सम्मानित भी किया जाएगा।

बता दें कि इस अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में भारत के मूल निवासियों (Indigenous) दलित और आदिवासी समाज के मुद्दों पर केंद्रित मीडिया संस्थान दलित दस्तक के फाउंडर और संपादक अशोक दास (अशोक कुमार) को भी फेलोशिप मिली है। अशोक दास ने साल 2012 में दलित दस्तक की शुरुआत की थी। मासिक पत्रिका के रूप में शुरू हुए दलित दस्तक का वर्तमान में वेबसाइट और यू-ट्यूब चैनल (एक मिलियन सब्सक्राइबर) भी है। अशोक 18-25 सितंबर तक स्वीडन में रहेंगे। भारत से पत्रकारों का चयन Global Investigative Journalism Networ (GIJC) के भारत के हिन्दी संपादक दीपक तिवारी ने किया है।

भारत से दलित दस्तक के फाउंडर और एडिटर अशोक दास को फेलोशिप मिली है।

जहां तक ग्लोबल इंवेस्टिगेशन जर्नलिज्म कांफ्रेंस की बात है तो यह कांफ्रेंस खोजी पत्रकारिता के लिए दुनिया में होने वाली सबसे बड़ी कांफ्रेंस है। सम्मेलन में नवीनतम उपकरणों और तकनीकों, अत्याधुनिक कार्यशालाओं और व्यापक नेटवर्किंग और विचार-मंथन सत्रों पर प्रशिक्षण की सुविधा है। यह वैश्विक (ग्लोबल) कांफ्रेंस हर दो साल बाद होता है। पहली बार इसका आयोजन साल 2001 में कोपेनहेगेन (डेनमार्क) में हुआ था। तब से यह सिलसिला लगातार जारी है।

मध्य प्रदेश में दलित वोटों के लिए भाजपा का नया पैतरा

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 8 फरवरी 2023 को सागर में आयोजित आंबेडकर महाकुंभ में छह बड़ी घोषणाएं की।ये सभी घोषणाएं दलितों को लुभाने वाली घोषणाएं थी। इसमें, राज्य के औद्योगिक समूहों में एससी-एसटी के लिए 20% भूखंड आरक्षित करना। MSME नीति के तहत अनुसूचित जाति के कारोबारी संगठनों के लिए ‘क्लस्टर’ चिन्हित करना। अनुसूचित जाति के सदस्यों को आवंटित पेट्रोल पंप स्थापित करने के लिए जमीन देना। एससी- एसटी समुदायों के सदस्यों को सरकार के स्टोर खरीद नियम में छूट देना जैसी घोषणाएं शामिल थी।

लेकिन इन घोषणाओं के साथ शिवराज सरकार ने जो सबसे बड़ी घोषणा की थी, वह थी मध्यप्रदेश के सागर में 100 करोड़ रुपये की लागत से सतगुरु रविदासजी का मंदिर बनाना। यानी अपने राजनीतिक स्वार्थ और दलित समाज के वोटरों को लुभाने के लिए बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के बाद अब राजनीतिक दलों के निशाने पर सतगुरु रविदास हैं। पहले भी कुछ क्षेत्रों में रहे हैं, लेकिन अब ये सुनियोजित योजना के तहत किया जा रहा है। और मध्यप्रदेश में तो लगता है कि भाजपा को विधानसभा चुनाव में अपने जीत के लिए सतगुरु रविदास और उनके अनुयायियों का ही सहारा है।

यही वजह है कि चुनाव के मुहाने पर खड़े मध्य प्रदेश में चुनावी गहमा-गहमी के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 12 अगस्त को सागर में सतगुरु रविदास मंदिर की नींव रखेंगे।

रविदास मंदिर के लिए मध्य प्रदेश के सागर में आरक्षित जमीनइस मंदिर के लिए नरयावली के बड़तूमा गांव में 11 एकड़ सरकारी जमीन अलॉट की गई है। भारतीय जनता पार्टी इस मंदिर के जरिये क्या हासिल करना चाहती है और उसके निशाने पर क्या है, यह बताने के लिए इस मंदिर के निर्माण को लेकर भाजपा की रणनीति को देख कर समझा जा सकता है।

 भाजपा और संघ ने जैसे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा एकत्र किया था। उसी तर्ज पर संत रविदास मंदिर के लिए समरसता यात्राएं निकाल रही है। यह यात्रा प्रदेश के 5 अलग-अलग अंचलों यानी नीमच, धार, श्योपुर, बालाघाट और सिंगरौली से शुरू की गई है। ये यात्राएं 53 हजार गांवों में पहुंचेंगी। साथ ही यह यात्रा 187 विधानसभा क्षेत्रों से होकर भी गुजरेंगी।

इस दौरान वहां की मिट्टी और नदियों का जल एकत्र करके सागर लाया जाएगा। यानी साफ है कि दलितों और खासकर सतगुरु रविदास में आस्था रखने वाले समाज को भाजपा अपनी इस मुहिम के जरिये साथ जोड़ना चाहती है। और इसके लिए उनकी आस्था को निशाना बनाया जा रहा है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 25 जुलाई को सिंगरौली से इस यात्रा को हरी झंडी दिखाई थी, जिसका का समापन 12 अगस्त को सागर में होगा, जहां प्रधानमंत्री मोदी मंदिर की नींव रखने के बाद एक सभा को संबोधित करेंगे।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मध्य प्रदेश में सतगुरु रविदास मंदिर ही क्यों और वो भी सागर में ही क्यों? इसका जवाब भी जान लिजिए।

  • मध्य प्रदेश में दलित समाज की आबादी 1 करोड़ 13 लाख 42 हजार है।
  • यह प्रदेश की कुल जनसंख्या में लगभग 16 प्रतिशत हैं।
  • प्रदेश में विधानसभा की 84 सीटों पर दलित वोटर हार-जीत तय करते हैं।
  • आरक्षित सीटों की बात करें तो मध्यप्रदेश विधानसभा में 35 सीट आरक्षित है।

अब सवाल यह उठता है कि सतगुरु रविदास का मंदिर सागर जिले में ही क्यों। इसकी भी अपनी एक वजह है। रिपोर्ट के मुताबिक सागर जिले में दलितों का वोट 21 प्रतिशत है। सागर में 5 सीटें ऐसी हैं, जहां पर अहिरवार समाज का वोट निर्णायक भूमिका में है। इसमें नरयावली में दलित समाज का वोट 59 हजार है। बंडा में 54 हजार, सुरखी में 45 हजार और सागर में 44 हजार दलितों के वोट हैं।  जबकि इससे सटे दमोह, टीकमगढ़, छतरपुर और रायसेन जिले में भी दलित समाज का वोट निर्णायक है।

दूसरी ओर मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में यह दलित समाज का वोट 22 प्रतिशत है। आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 41.6 और बसपा को 5.1% वोट मिले थे। बीएसपी के प्रभाव का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 2003, 2008 और 2013 के विधानसभा चुनावों में 69 सीटें ऐसी थीं, जहां पर बसपा का वोट शेयर औसतन 10% से अधिक रहा है।

मध्य प्रदेश में बसपा की यही ताकत कांग्रेस और भाजपा दोनों को हमेशा से परेशाना करती रही है। इस बार सतगुरु रविदास मंदिर के जरिये भाजपा बसपा के इसी वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी में है।

लेकिन दलितों के सामने अब भी सवाल वही है कि उन्हें मूर्तियां चाहिए या रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा। क्योंकि आजादी के बाद से जैसे-जैसे बाबासाहेब आंबेडकर के समाज की ताकत और हैसियत बढ़ने लगी, तमाम राज्यों में तमाम राजनैतिक दलों ने उनकी बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं बना कर खुद को अंबडकरवादियों का हितैषी बताते हुए अंबेडकरवादी समाज का वोट हासिल करने का काम किया। लेकिन वहीं दूसरी ओर दलितों तक उनके जायज अधिकारों को भी पूरा नहीं पहुंचने दिया गया।

 मंदिर का स्वागत है, लेकिन भाजपा सरकार और उसके नेता अगर सच में दलितों की हितैषी हैं तो उसे इस समाज को मिलने वाले हकों को कागज से बाहर जमीन पर उतारना होगा।

मेरा सवाल यह भी है कि ये तमाम नेता ये क्यों नहीं बताते कि सरकार में रहते हुए उन्होंने दलितों के लिए क्या किया। मध्य प्रदेश सरकार और मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान को यह बताना चाहिए कि अपने कार्यकाल में उनकी सरकार ने दलितों के लिए क्या किया। 12 अगस्त को जब पीएम मोदी सागर में सतगुरु रविदास मंदिर की नींव रखेंगे, तब उन्हें बताना चाहिए कि उनकी केंद्र सरकार ने दलितों और आदिवासियों के हित में क्या-क्या काम किया। याद रहे, जब भी कोई नेता, मंत्री, सीएम या पीएम मंच से नए वादे करे, जनता को उनसे बीते सालों का हिसाब जरूर मांगना चाहिए।

Michigan based Indian Diaspora Condemn Violence & the genocide of Kuki-Zomi tribes in Manipur

Michigan based Indian Diaspora Condemn Violence & the genocide of Kuki-Zomi tribes in Manipur, India and demand Freedom Equality and Justic, Sunday 7/30/2023, 3:00 PM to 5:00PM EST at Hart Plaza, Detroit Michgan

The Michigan based Indian diaspora and the members from NAMTA, AANA, IAMC, CAPI and ICA in the United States denounces the ongoing genocide against the Kuki-Zomi tribes in Manipur, India.

Indian Constitutional commitment to the principles of liberty, fraternity and equalitycompels us to raise our voice against these atrocious acts of violence and oppression that have been ongoing for over three months where over 60,000 have been rendered homeless, 6200+ houses burned, 320+ churches burned and over 170+villages burned and decimated to the ground.

We are further pained to see videos in social media of women being paraded naked, gangraped, tortured and executed by self-styled firing squads and more. There has been an internet ban for over two months, in the region and we worry that more of these videos will come out once internet connectivity is restored.

India cannot call itself a democracy if it lets such genocide continue. The principles of- liberty, fraternity and equality –must be uphold to substantialize. the foundation of a just and inclusive nation. Today, we see those foundations being.

We are appalled at the apathy of the authorities, both at the state and central government level to stop this violence and protect these tribes.

The Kuki and Zomi tribes, like many indigenous communities, have long endured historical injustices and discrimination. Today, they face an existential threat as evidence of violence, rape, and forced displacement emerges daily.

We demand the local State and Central Indian government to uphold the constitutional values and take immediate action to protect the lives and rights of these tribes.

Justice must be served, and the perpetrators of these heinous crimes must beheld accountable for their actions. We call upon the international community and human rights organizations to join us in closely monitoring the situation in Manipur & providing support to safeguard the rights and cultural heritage of the Kuki- Zomi tribes.

In solidarity, Michigan Indians for Equality and Justice NAMTA, AANA, IAMC, CAPI, ICA

बिहार में जातिगत जनगणना पर पटना हाई कोर्ट की मुहर

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार को बड़ी कामयाबी मिली है। प्रदेश में अब जातिगत जनगणना करने को लेकर पटना हाई कोर्ट ने हरी झंडी दिखा दी है। पटना हाई कोर्ट ने जातिगत गणगणना के खिलाफ दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। उच्च न्यायालय ने नीतीश सरकार के जातिगत गणना कराने के फैसले को सही करार दिया है। ऐसे में अब बिहार सरकार को बड़ी राहत मिल गई है। हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद बिहार में जातिगत जनगणना फिर से शुरू हो पाएगा। पटना हाईकोर्ट ने जातीय गणना के खिलाफ दायर याचिका पर जुलाई में लगातार पांच दिन सुनवाई की। दोनों ओर के पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने 7 जुलाई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अगस्त के पहले ही दिन अपने फैसले में हाई कोर्ट ने करीब 100 पन्नों का आदेश जारी किया। नीतीश सरकार ने पिछले साल बिहार में जातिगत गणना कराने का नोटिफिकेशन जारी किया था। इसके बाद जनवरी 2023 में इस पर काम शुरू हुआ। जातिगत गणना को दो चरणों में आयोजित किया गया। पहला चरण जनवरी में तो दूसरा अप्रैल में शुरू हुआ। दूसरे चरण के दौरान पटना हाईकोर्ट ने जातिगत गणना पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी। जिससे बिहार में इस पर काम रुक गया। साथ ही कोर्ट के आदेश पर तब तक इकट्ठा किए गए आंकड़ों को संरक्षित रखा गया। इस पूरी बहस में सबसे बड़ी बात यह रही कि कोर्ट ने उन सभी अर्जियों को खारिज कर दिया है, जिनमें यह दलील देते हुए जातिगत जनगणना पर रोक लगाने की मांग की गई थी कि जनगणना का काम सिर्फ केंद्र का है राज्य का नहीं। यानी अब अन्य राज्य भी जाति जनगणना को लेकर अपने फैसले ले सकते हैं और पटना हाई कोर्ट का यह फैसला आने वाले दिनों में नजीर बन सकती है।

ट्रेन में हुए हत्याकांड को लेकर भाजपा-आरएसएस पर उठते सवाल

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ये RPF का मोदी भक्त कांस्टेबल- चेतन सिंह है. इसकी तैनाती- जयपुर-मुंबई एक्सप्रेस ट्रेन में सुरक्षा देने वाले सिपाहियों में थी. भाजपा और आरएसएस के दुष्प्रचार ने इसकी रगों में नफ़रत भर इसे चलता-फिरता जौम्बी बना दिया. इसके साथ इसके सीनियर- ASI टीकाराम मीना थे. ट्रेन में हुई राजनितिक बहस के बीच ही इसने ASI टीकाराम मीना को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया. इसके बाद इसने मधुबनी के अब्दुल कादिर की भी गोली मारकर हत्या कर दी. फिर ये आगे चला जहाँ इसे रेल बोगी की पैंट्ररी में एक आदमी मिला, उसे भी इसने मौत के घाट उतार दिया. फिर आगे S-6 कोच में गया. वहां इसे असगर अली नाम का जयपुर का एक चूड़ी बेचने वाला मिला उसे भी इसने गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया.

हत्याएं करते हुए चेतन सिंह ये कह रहा है कि- हिंदुस्तान में रहना है तो योगी-मोदी कहना होगा. चेतन सिंह ने पहले अपने सीनियर की हत्या की बाद में बोगी में जो मुस्लिम मिले उन्हें बिना जाने ही उनकी हत्याएं कीं. ये सामान्य घटना नहीं है ये एक नस्लवादी घटना है, एक आतंकवादी घटना है, और इसके लिए आरएसएस-भाजपा का प्रचार तंत्र जिम्मेदार है. इसके लिए टीवी की बहसें जिम्मेदार हैं. भाजपा ने राजनितिक लाभ के लिए इस देश की नस्लों में सालों-साल के लिए नफरत बोई है. ऐसे जौम्बी कभी भी किसी को नोच सकते हैं. इस आतंकवादी घटना की आलोचना बिना इसकी जड़ यानी आरएसएस और भाजपा के दुष्प्रचार की आलोचना किये बिना नहीं की जा सकती. पूरे हिंदुस्तान ही नहीं , पूरी दुनिया के लिए ये शर्मशार करने वाली घटना है. ये आरएसएस के कारखाने के प्रोडक्ट हैं जो मानव-बम बनकर हमारे आसपास घूम रहे हैं.

– श्याम मीरा सिंह के ट्विटर से

टांट्या भील की अनसुनी कहानी

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मध्यप्रदेश के उस समय निमाड़ व वर्तमान में खंडवा नाम से पुकारे जाने वाले इस ज़िले की पंधाना तहसील के बडदा गाँव स्थित सन् 1842 में एक यशस्वी बालक ने भील समुदाय (अनुसूचित जनजाति) में जन्म लिया। बचपन में ही माँ का साया सिर से उठ जाने उपरांत टांट्या भील नामक इस मासूम बालक ने अपने किसान पिता भाऊ भील से कहा, “पिताजी एक बात पूछनी है?” पिता भाऊ भील ने कहा, “पूछो बेटा, क्या पूछना है?” बालक टांट्या भील ने कहा, “पिताजी भील किसे कहते हैं?” पिता भाऊ भील ने बालक के गालों को सहलाते हुए कहा, “जान देकर भी जो जल, जंगल और ज़मीन की हिफ़ाजत करते हुए शोषितों की आवाज़ को बुलंद करे।” बालक टांट्या भील ने वीरतापूर्वक कहा, “मैं करूँगा जल, जंगल, ज़मीन और शोषितों की हिफ़ाजत।” पिता भाऊ भील ने बच्चे की आँखों में झाँकते हुए कहा, “जोहार हो।” पुत्र टांट्या भील को गले से लगाते हुए भाऊ भील ने इसे भाला, तलवार, लाठी, बँदूक, गोफन और तीर – कमान चलाना सिखाया। मुसलमानों के नोगजे पीर में इनके परिवार की बेहद आस्था थी। उन दिनों सामंतवादियों द्वारा बड़े पैमाने पर आदिवासियों की ज़मीनें हड़पी जा रही थी और इनकी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा था। किशोरावस्था से ही टांट्या भील ने दबे – कुचले आदिवासियों को सामंतवादियों के चुंगल से निकालना प्रारंभ कर दिया। जिस कारण सामंतवादियों ने टांट्या भील पर अपराधिक मुकदमा दर्ज़ कराते हुए जेल भिजवा दिया। उसी दौरान समंतवादियों ने इनकी पुश्तैनी ज़मीन भी हड़प ली। 24 नवम्बर, सन् 1878 को टांट्या भील ने अपने 12 जेल मित्रों के साथ जेल से भागने की योजना बनाई और देर रात लगभग 12:30 बजे जेल की सलाख़ें तोड़कर, बीस फीट ऊँची दीवार फाँद ली। अपने गिरोह के साथ टांट्या भील आगे – आगे और पुलिस पीछे – पीछे। इसके बाद टांट्या भील ने अपने परम मित्र भीमा नायक के साथ मिलकर, समंतवादियों के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया। जख़्मी शेर के रूप में टांट्या भील नाम का यह योद्धा… सामंतवादियों की खोज में इन्हें सबक़ सिखाने निकल पड़ा। बहुत से भील युवाओं ने टांट्या भील के गिरोह में जुड़ते हुए सभी शस्त्रों में निपुणता प्राप्त की और बुलँद आवाज़ में कहा, “जोहार हो।”

टांट्या भील के नेतृत्व में इनके गिरोह ने बड़े पैमाने पर सामंतवादियों की बड़ी – बड़ी हवेलियों को लुटते हुए उस धन को शोषितों में बाँटना प्रारंभ कर दिया। टांट्या भील का नाम सुनते ही सामंतवादियों की हालत पतली हो जाती। टांट्या भील कई बार गिरफ़्तार हुए और प्रशासनिक चुंगल से निकल कर, हवा के झोंके की भाँति फ़रार हुए। दुबले – फुर्तीले टांट्या भील की बँदूक जब भी चलती… सिर्फ़ और सिर्फ़ इंसाफ़ करती। काले सियाह जंगली घोड़ों की सवारी के शौक़ीन टांट्या भील के घोड़े की टापों की ध्वनि सुनते ही सामंतवादी दुबक कर छुप जाते।

नमक के साथ बाजरे की दो रोटियाँ खाने वाले टांट्या भील ने भूख से बिलखते दलितों की थाली में भाँति – भाँति के पकवान सजा दिए। इस योद्धा ने सारी उम्र स्वयं मैले – कुचैले कपड़ों में रहते हुए निर्वस्त्रों को बेशक़ीमती पोशाकों से सजा दिया। महिलाओं का मुँहबोला भाई बनते हुए बड़े स्तर पर इनकी लड़कियों की निःशुल्क शादियाँ कराई। इसलिए ये सभी लड़कियाँ टांट्या भील को मामा कहने लगी। एक दिन समंतवादियों ने अंग्रेज़ी हुकूमत के साथ मिलकर, गणेश नाम के एक मुखबिर की पत्नी को मोहरा बनाया। जिस कारण इन्होंने टांट्या भील के हाथ पर राखी बांधने के उद्देश्य से अपने घर बुलाया और राखी की जगह हथकड़ी बंधवा दी। टांट्या भील को मोटी – मोटी बेड़ियों में जकड़ लिया गया। दूर तक इनका जुलूस निकाला गया और 19 अक्टूबर, सन् 1889 को जबलपुर सैशन कोर्ट ने इन्हें फ़ांसी की सज़ा सुनाई। दा न्यूयार्क टाइम्स में 10 नवंबर, सन् 1889 को इनकी ख़बर सहित फ़ोटो भी अख़बार में छपी और 04 दिसंबर, सन् 1889 को इन्हें फ़ांसी दे दी गई। समंतवादियों के इशारे पर, इस महान् भील योद्धा के पार्थिव शरीर को खुर्दबुर्द अवस्था में इंदौर शहर के पातालपानी रेलवे स्टेशन पर फेंक दिया गया। नोट: बहुजन संघर्ष उपरांत टांट्या भील को शहीद का दर्ज़ा मिला था। सरकार ने अब इनकी कहानियाँ पाठ्यक्रम में शामिल करते हुए इनके नाम पर ‘जननायक टांट्या भील’ नामक एक लाख़ रुपए का पुरस्कार भी घोषित किया है।

सिद्धार्थ टैंपल ट्रस्ट, यमुना विहार, दिल्ली द्वारा Dr Ambedkar Library, Education Centre एवं Computer Centre का उदघाटन

                                     जय भीम ! नमो बुद्धाय !! बुद्धमेव जयते !!! दिनांक 30 जुलाई 2023 को सिद्धार्थ टैंपल ट्रस्ट, यमुना विहार, दिल्ली के द्वारा बौद्ध विहार परिसर में Dr Ambedkar Library , Education Centre एवं Computer Centre का उदघाटन पूज्य भिक्खू चंदिमा थेरो, संस्थापक – अध्यक्ष , सारनाथ महाविहार धम्म शिक्षण समिति के सानिध्य में मुख्य अतिथि महोपासक आनन्द श्रीकृष्णा जी – प्राख्यात साहित्यकार एवं सामाजिक चिंतक के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ।

इस अवसर पर पूज्य भिक्खु संघ के द्वारा बुद्ध – धम्म – संघ वंदना संपन्न कराई गई । पूज्य भिक्खू चंदिमा थेरो एवं आनन्द श्रीकृष्णा जी के द्वारा शिलालेख का लोकार्पण किया गया तथा पूज्य भिक्खू चंदिमा थेरो के द्वारा HOLY BAUDDH BOOK ( पवित्र बौद्ध ग्रन्थ) TRIPITAK ( त्रिपिटक ) पुस्तकालय में संरक्षित की गई।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री राजेन्द्र पाल गौतम – पूर्व मंत्री दिल्ली सरकार, श्री जे सी आदर्श – अपर जिलाधिकारी (सेवा निवृत्त ) एवं सामाजिक चिंतक, श्री आर ए सेठ – अपर आयुक्त ( GST) , श्री गम्भीर सिंह – अपर जिलाधिकारी, गाजियाबाद, डॉ. आत्मा राम जोशी – पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष , समता सैनिक दल, श्री एस एस गौतम – प्राख्यात साहित्यकार एवं सामाजिक चिंतक, डॉ अजय कुमार -प्रोफेसर , दिल्ली विश्व विद्यालय एवं डॉ. एस पी अशोक – Advocate on Record , Supreme Court of India एवं अन्य न्यायाधीश गण , प्रशासक, साहित्यकार, शिक्षाविद्, सामाजिक चिंतक आदि उपस्थित हुए एवं समाज और छात्र – छात्राओं को मार्ग दर्शन प्रदान किया गया । NCC Cadets के द्वारा पूज्य भंतेजी , मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों को Guard of Honour दिया गया। काकार्यक्रम की अध्यक्षता श्री बलजोर सिंह जी (Ex MLA) , अध्यक्ष – सिद्धार्थ टैंपल ट्रस्ट के द्वारा की गई।

कार्यक्रम का संचालन एस एस वरुण – महासचिव , सिद्धार्थ टैम्पल ट्रस्ट, यमुना विहार , दिल्ली के द्वारा किया गया। इस अवसर पर देश -विदेश से बौद्ध धर्म तथा बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर के जीवन दर्शन में आस्थावान धम्म उपासक – उपासिकाएं उपस्थित हुए।

सादर अभिवादन एस एस वरुण महासचिव सिद्धार्थ टैम्पल ट्रस्ट, यमुना विहार, दिल्ली

उत्तर प्रदेश में SSP को शाबासी के बदले मिला ट्रांसफर

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक बड़ा हादसा होने से बच गया, लेकिन इस पूरे मामले में जिले के एसएसपी प्रभाकर चौधरी नप गए। दरअसल इन दिनों सावन का महीना चल रहा है। सड़कों पर कांवड़ियों का तांता लगा है। बीते कल 30 जुलाई को ऐसे ही कांवड़िए बरेली में मस्जिद के पास पहुंचे। कांवड़िए जिद पर अड़े थे कि मस्जिद के बाहर से ही DJ बजता हुआ जाएगा। मुस्लिम समाज को इस पर आपत्ति थी। मामला पुलिस के पास पहुंचा। बरेली में एसएसपी प्रभाकर चौधरी थे। उन्होंने कांवड़ियों को खूब समझाया। कांवड़ियें फिर भी नहीं माने। ऐसे में जिले में धार्मिक सौहार्द बिगड़ने का खतरा था। दंगा होने की भी आशंका थी।

एसएसपी प्रभाकर चौधरी के मुताबिक, ‘कांवड़िए गैर परम्परागत जुलूस निकालना चाहते थे। ये नहीं माने और DJ को जबरदस्ती नए रूट पर ले जाने लगे। 4 घंटे तक ये हंगामा करते रहे। ऐसी भी आशंका है कि कुछ लोग शराब पीये हुए थे और कुछ के पास अवैध हथियार भी थे।

यानी मामला बिगड़ सकता था। ऐसे में पुलिस कप्तान ने अपनी पुलिस को लाठी चार्ज का आदेश दिया और उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में दंगे जैसी स्थिति बनने से बच गई।

ऐसे में होना क्या चाहिए था? निश्चित तौर पर सरकार को एसएसपी प्रभाकर चौधरी की पीठ थपथपानी चाहिए थी। पुलिस के इस फैसले के साथ खड़ा होना चाहिए था। लेकिन ठहरिये। ये उत्तर प्रदेश है और यहां योगी जी की सरकार हैं। वही योगी जी जिनमें हिन्दुव समर्थक तबका मोदी जी का अक्स ढूंढ़ रहा है। इसलिए यहां कुछ और हुआ। दंगे जैसी स्थिति संभालने के बाद एसएसपी प्रभाकर घर भी नहीं पहुंचे होंगे कि उनका ट्रांसफर कर दिया गया।

नया ट्रांसफर पी.ए.सी लखनऊ में 32वीं वाहिनी में हुआ है। बताया जा रहा है कि अपनी नौकरी के 13 सालों में यह उनका 21वां ट्रांसफर है। वजह यह है कि प्रभाकर नेताओं के दबाव में नहीं आते हैं। क़ानून व्यवस्था के लिए जो सही लगता है वही फैसला लेते हैं।

लेकिन यहां बात सही गलत की नहीं थी। मामला धर्म का था। उस धर्म का जो फिलहाल भारत की राजनीति में इंसान और उसकी जान से भी अहम हो गया है। मामला सरकार की नाक का था। क्योंकि यूपी की सरकार ने कांवरियों को फूल बरसाने के आदेश दिये थे, फूल बरसाए भी गए थे। और जिन पर फूल बरसाए गए थे, उन पर एसएसपी प्रभाकर चौधरी ने डंडे बरसा दिये थे। अघोषित तौर पर हिन्दू राष्ट्र बनाने की पुरजोर वकालत कर रही सरकार को यह कैसे बर्दास्त होता। आप दर्शक हैं, आप जनता जनार्दन हैं, खुद सोचिए… कौन सही है, कौन गलत।

क्या चंद्रशेखर आजाद और केसीआर ने सेल्फ गोल कर लिया है?

भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद अपने तेलंगाना दौरे के दूसरे दिन तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव यानी केसीआर से मिले। इससे पहले चंद्रशेखर आजाद केसीआर की बेटी कविता राव से भी मिल चुके हैं। इस दौरान चंद्रशेखर लगातार केसीआर सरकार की तारीफें करते दिखे। चंद्रशेखर ने अपने बयान में कहा था कि उन्हें कविता दीदी ने खाने पर बुलाया था। लेकिन साफ है कि जब दो राजनीतिक लोग साथ बैठते हैं तो बात राजनीति की भी होती है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि केसीआर द्वारा चंद्रशेखर आजाद को इतनी तव्वजो देने की वजह आखिर है क्या? क्या कहीं केसीआर तेलंगाना के पूर्व आईपीएस अधिकारी और फिलहाल तेलंगाना में बसपा की कमान संभाल रहे आर.एस. प्रवीण कुमार से डर गए हैं। और इसी वजह से दलितों के बीच उभरते नेता चंद्रशेखर आजाद को अपने साथ लाकर दलितों को संदेश देना चाह रहे हैं?

अगर ऐसा है तो यह विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़े तेलंगाना में बसपा की  बड़ी राजनीतिक जीत है। और केसीआर ने बसपा को ताकतवर मानकर राजनीतिक तौर पर सेल्फ गोल कर लिया है।

 

तेलंगाना में 17 प्रतिशत दलित वोट है जो एक बड़ा फैक्टर है। तेलंगाना में किसी पार्टी की सरकार बनाने में उसकी बड़ी भूमिका होगी। इसे बसपा के पक्ष में लाने के लिए आर.एस प्रवीण लगातार बहुजन राज्याधिकार यात्रा पर चल रहे हैं, इसके जरिये बसपा तेजी से लोगों के बीच पहुंच रही है। तो वहीं इसमें एससी-एसटी सोशल वेलफेयर स्कूल के सेक्रेटी रहने के दौरान आर. एस. प्रवीण ने जिन लाखों बच्चों की जिंदगी बदली थी, उनका और उनके परिवार का समर्थन भी उन्हें खूब मिल रहा है। कुछ मिलाकर तेलंगाना चुनाव में बहुजन समाज पार्टी अपनी मजबूत उपस्थिति से सबको चौंका सकती है।केसीआर इसी से डरे हुए हैं। यही वजह है कि वह भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर को अपने साथ लाए हैं।

तो वहीं अपने दो दिनों के तेलंगाना दौरे के दौरान चंद्रशेखर आजाद ने जिस तरह केसीआर के पक्ष में बयान दिया है, उससे साफ दिख रहा है कि भीम आर्मी प्रमुख केसीआर को अपना समर्थन देने को तैयार है। लेकिन यहां सवाल यह भी है कि राजनीति में समझौते ऐसे ही नहीं होते, बात अपने-अपने फायदे की भी होती है। तो केसीआर के साथ और आर.एस. प्रवीण के खिलाफ खड़े होने में आजाद समाज पार्टी और चंद्रशेखर आजाद का फायदा क्या है?

जहां तक चंद्रशेखर आजाद की राजनीति की बात है तो अब तक आजाद समाज पार्टी कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से गठबंधन नहीं होने पर चंद्रशेखर का मायूस होने के वीडियो ने उल्टा उनकी छवि को कमजोर ही किया। कुल मिलाकर उनका कोई भी राजनीतिक फैसला ऐसा नहीं रहा है, जिससे लगे कि पार्टी राजनीतिक तौर पर परिपक्व हो रही है। अब तेलंगाना जाकर चंद्रशेखर ने एक और राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय दिया है। क्योंकि तेलंगाना में बहुजन समाज पार्टी के प्रमुख रिटायर्ड आई.पी.एस अधिकारी आर.एस. प्रवीण हैं।

आर.एस प्रवीण लंबे समय तक तेलंगाना सोशल वेलफेयर एंड रेजिडेंशियन इंस्टीट्यूट के सेक्रेट्री रहे हैं। इस दौरान उन्होंने लाखों एससी-एसटी बच्चों की जिंदगी बदल दी थी। इस नाते देश भर के अंबेडकरवादियों के बीच वह खासे लोकप्रिय हैं। ऐसे में चंद्रशेखर आजाद का केसीआर के साथ आने पर देश भर के अंबेडकरवादी सवाल उठा रहे हैं। तो क्या यह राजनीतिक तौर पर चंद्रशेखर के लिए एक और गलत फैसला है। अगर हां, तो चंद्रशेखर आजाद ने कहीं सेल्फ गोल तो नहीं कर लिया।

तेलंगाना पहुंचे चंद्रशेखर आजाद, KCR और चंद्रशेखर के साथ आने के मायने क्या है

हैदराबाद में केसीआर की बेटी और एमएलसी कविता और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजादखुद को अंबेडकरवादी आंदोलन का सिपाही कहने वाला कोई व्यक्ति जब तेलंगाना में जाता है, खासतौर पर हैदराबाद में, तो उसकी एक कोशिश पूर्व आईपीएस अधिकारी और एससी-एसटी सोशल वेलफेयर एंड एजुकेशनल इंस्टीट्यूट के सेक्रेट्री रहे आर.एस.प्रवीण कुमार से मिलने की जरूर होती है। क्योंकि सोशल वेलफेयर इंस्टीट्यूट का सेक्रेट्री रहने के दौरान उन्होंने जिस तरह तेलंगाना में लाखों एससी-एसटी बच्चों की जिंदगी बदल कर रख दी, उसकी चर्चा दुनिया भर में हुई थी।

लेकिन भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद 27 जुलाई को जब हैदराबाद पहुंचे, तो उन्होंने तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी कविता से मुलाकात की। वो के. चंद्रशेखर राव, जिसके सामने आर.एस प्रवीण मजबूती से खड़े हैं। आईपीएस की नौकरी छोड़कर बहुजन समाज पार्टी में शामिल होकर राजनीति शुरू करने वाले आर.एस. प्रवीण तेलंगाना के बहुजनों के हकों के लिए लड़ रहे हैं।

तो क्या दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 जुलाई को अपनी ताकत दिखाने के बाद चंद्रशेखर आजाद चार राज्यों के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले जिस तरह राजनीति के पुराने खिलाड़ियों के बीच अपनी धमक कायम करना चाहते थे, उसकी शुरूआत हो गई है? कमोबेश लग तो कुछ ऐसा ही रहा है। लेकिन चंद्रशेखर का यह कदम बहुजनों को रास नहीं आ रहा है और बहुजन समाज के लोग चंद्रशेखर को जमकर ट्रोल कर रहे हैं।

दरअसल कुछ समय पहले तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने संविधान में बदलाव की बात कही थी, जिसका अंबेडकरी समाज के भीतर भारी विरोध हुआ था। उसी के.सी.आर की सरकार का समर्थन करना और उनकी बेटी से मुलाकात करने को बहुजन समाज के लोग पचा नहीं पा रहे हैं।

इंजीनियर स्नेहा नाम की ट्विटर यूजर का कहना है कि बहुजन आंदोलन को कमजोर करने तेलगांना पहुंचे चंद्रशेखर! क्या संविधान बदलने की बात करने वाले KCR को मिलेगा अब भीम आर्मी का साथ?  क्या प्रवीण कुमार से डर गए है KCR? क्या KCR चंद्रशेखर का कर रहे है उपयोग?

 

तो क्या स्नेहा के उठाए सवाल सही हैं? क्या केसीआर आर.एस. प्रवीण के मैदान में उतरने के बाद तेलंगाना में बहुजन समाज पार्टी की बढ़ती ताकत से डरे हुई हैं। और दलित वोटों को अपने पाले में रोके रखने के लिए चंद्रशेखर आजाद के चेहरे का सहारा लेना चाहती है?

इससे इंकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि राजनीति में कुछ भी यूं ही नहीं होता। यूं ही कोई सहारनपुर से हैदराबाद नहीं पहुंच जाता। और इसकी तस्दीक केसीआर की बेटी कविता जो कि विधान परिषद की सदस्य भी हैं, उनके ऑफिस से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति को देखने से साफ हो जाता है। इस विज्ञप्ति में कहा गया है कि दोनों नेताओं यानी चंद्रशेखर और कविता ने अपनी-अपनी नीतियों और तेलंगाना में बहुजनों और दलितों के लिए राज्य सरकार द्वारा किये जा रहे कार्यक्रमों पर चर्चा की। इसमें कहा गया है कि आजाद ने राज्य सरकार की महत्वकांक्षी दलित बंधु योजना की विशेष प्रशंसा की।

इस विज्ञप्ति से साफ है कि केसीआर की सरकार चंद्रशेखर के सहारे दलितों के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं को और हाल ही में हैदराबाद में बनी बाबासाहेब आंबेडकर की 125 फीट ऊंची प्रतिमा को प्रचारित करना चाह रही है। साथ ही बसपा सुप्रीमो मायावती के बरक्स एक अन्य दलित चेहरे चंद्रशेखर की मुहर लगावाना चाह रही है।

अपने इस दौरे में चंद्रशेखर आजाद का बाबासाहेब के स्टैच्यू से करीब चार मिनट का एक वीडियो स्टेटमेंट भी सामने आया है, जिसमें वह केसीआर की सरकार को अपना समर्थन देते हुए दिखाई दे रहे हैं। उसके भविष्य की बेहतर कामना करते हुए नजर आ रहे हैं।

अब अगर चंद्रशेखर इस मुलाकात को गैर राजनीतिक मुलाकात कह कर अपना हाथ झटकने की कोशिश करेंगे तो सवाल उठेगा कि फिर इतनी राजनीतिक बातें क्यों?

इस बीच सोशल मीडिया पर भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद का एक पुराना ट्विट भी वायरल हो रहा है, जिसमें चंद्रशेखर ने केसीआर पर जमकर निशाना साधा था।

 27 जनवरी 2020 को किये इस ट्विट में चंद्रशेखर ने तेलंगाना की सरकार को तानाशाह बताया था। उन्होंने ट्विट किया था- तेलंगाना में तानाशाही चरम पर है, लोगों के विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार को छीना जा रहा है। पहले हमारे लोगों को लाठियां मारी गई, फिर मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। अब मुझे एयरपोर्ट ले आएं हैं, दिल्ली भेज रहे हैं। @TelanganaCMO याद रखे बहुजन समाज इस अपमान को कभी नहीं भूलेगा। जल्द वापिस आऊंगा।

लेकिन चंद्रशेखर ऐसे आएंगे, यह किसको पता था।

राष्ट्रीय सामाजिक न्याय दिवस: 26.07.2023

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आधुनिक भारत के इतिहास में दिनांक 26.07.1902ई का दिन का काफी महत्व है। इसी दिन राजर्षि छत्रपति शाहू जी महाराज ने ब्राह्मणवादी मनुवादी व्यवस्था के विरुद्ध यहां के मूलनिवासियों के लिए सामाजिक न्याय अर्थात समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा की आधारशिला रखी थीं। आज के दिन हम अपने महानायक कोल्हापुर नरेश शाहूजी महाराज के प्रति मूलनिवासी बहुजन समाज की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि और नमन पेश करते हैं।

ब्राह्मणवादी मनुवादी व्यवस्था ने 3500 वर्षों पूर्व उत्तर वैदिक काल में यहां के मूलनिवासियों अर्थात आज के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्गों एवं महिलाओें को राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक , सांस्कृतिक एवं शिक्षा के अधिकारों से वंचित कर दिया था और उनसे मानवीय मूल्यों एवं सम्मान को छीन लिया था। किन्तु महानायक शाहूजी महाराज ने राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले और उनकी पत्नी राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फूले के कार्यों को राजनीतिक शक्ति यानी कानून के जरिए एक निर्णय लेकर बहुजन समाज के उन तमाम गुलामी की जंजीरों को अपने कोल्हापुर राज्य में तोड़ दिया था और 26 जुलाई ,1902 ई में मूलनिवासी बहुजनों लिए 50 प्रतिशत आरक्षण सभी पदों पर नियुक्ति में लागू कर दिया था।

हम सभी जानते हैं कि बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने उनके कार्यों और विचारों को आगे बढ़ाते हुए अपने जीवन भर त्याग एवं संघर्षों के बल पर पूना पैक्ट और भारतीय संविधान के माध्यम से पूरे देश में हम मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों लिए राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक न्याय के दरवाजे खोल दिए। हमें समानता,स्वतंत्रता, भाईचारा, मानवीय प्रतिष्ठा और गरिमा के संवैधानिक अधिकार देकर उन्होंने तथागत बुद्ध,संत कबीर एवं संत रविदास,राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले एवं माता सावित्रीबाई फूले और आधुनिक भारत की नींव रखने वाले छत्रपति शाहूजी महाराज के सपनों को साकार रूप दिए।

आज भी ब्राह्मणवादी मनुवादी पार्टियों एवं शक्तियों द्वारा मूलनिवासी बहुजन समाज के संवैधानिक अधिकारों पर हमले किए जा रहे हैं। किन्तु बहुजन समाज में जो चेतना और जागृति आयी है एवं जिस तरह लोग संगठित हो रहे हैं ,आने वाले दिनों में सभी प्रकार के षड्यंत्रकारी कारनामे विफल साबित होंगे। निश्चित तौर पर आज के दिन हमारे लिए संकल्प लेने का अवसर है कि हम लगातार संघर्ष कर अपने संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखेंगे और समतामूलक लोकतांत्रिक भारत का निर्माण करेंगे। इसके लिए आज हम संकल्प लें कि अपने इन अधिकारों एवं मांगों की प्राप्ति के लिए हम लगातार संगठित संघर्ष चलाएंगे —

1.जातिगत जनगणना कराना होगा

2.सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए गठित कोलेजियम सिस्टम को खत्म करो और “भारतीय न्यायिक सेवा आयोग” गठित कर उसके माध्यम से जनसंख्या के अनुपात में जजों की नियुक्ति में आरक्षण लागू करो!

3.सभी आर्थिक संसाधनों-जमीन, जंगल, उद्यमों एवं व्यापारों सहित विकास के कार्यों में सभी श्रेणियों- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्गों एवं अल्पसंख्यक समुदायों को जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण लागू करो!

4.पिछड़े वर्गों( ओबीसी) के लिए जनसंख्या के अनुपात में 54% आरक्षण सभी सेवाओं और शिक्षण संस्थानों में लागू हों!

5.पिछड़े वर्गों के आरक्षण में लागू किए गए क्रीमीलेयर को समाप्त करो!

6.अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के लिए प्रमोशन में आरक्षण लागू करने के लिए अध्यादेश लाओ और संविधान में संशोधन करो!

7.आरक्षण के प्रावधानों और प्रमोशन में आरक्षण को संविधान की 9 वीं अनुसूची में शामिल करो ताकि उसके साथ कोई छेड़छाड़ कोई भी सरकार नहीं कर सके!

8.पूर्व में की गई सामाजिक- आर्थिक जनगणना की रिपोर्ट प्रकाशित करो!

9.सभी निजी क्षेत्रों में भी सभी श्रेणियों के लिए जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व आरक्षण लागू करो!

10.शिक्षा एवं सरकारी संस्थानों का निजीकरण बंद करो!

आइए,हम अपने महानायक और आधुनिक भारत के निर्माता राजर्षि छत्रपति शाहू जी महाराज के प्रति पुनः शत-शत नमन और श्रद्धांजलि अर्पित करें और अपनी उपर्युक्त मांगों की पूर्ति के लिए लगातार संघर्ष करें। जय शाहूजी महाराज! जय भीम! जय भारत!

विलक्षण रविदास बिहार फुले अम्बेडकर युवा मंच बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन, बिहार

अब बाहर से समर्थन नहीं, सरकार में शामिल होगी बसपा!

 साल 2018 में राजस्थान में हुए विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का प्रदर्शन शानदार रहा था। बसपा ने प्रदेश के छह सीटों पर जीत दर्ज की थी। तब बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस को बाहर से समर्थन दिया था। लेकिन सत्ता के लालच में बसपा के सभी छह विधायकों ने खुद को कांग्रेस में विलय कर लिया था और इस तरह छह सीटों जीतने के कुछ महीने बाद ही बसपा की राजस्थान में जीरो सीट हो गई थी। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती का कहना है कि अब बसपा बाहर से समर्थन देने की बजाय सरकार में शामिल होगी यानी अब पार्टी के विधायक सरकार में मंत्री बनेंगे।

राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और तेलंगाना जैसे चार महत्वूपर्ण राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर बहनजी ने 25 जुलाई को समीक्षा बैठक के दौरान यह फैसला किया। इन राज्यों में विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर बहनजी ने प्रदेश के प्रमुख नेताओं के साथ बैठक बुलाई थी। इस बैठक में बसपा सुप्रीमो ने कहा कि “बी.एस.पी कई राज्यों में बैलेन्स ऑफ पावर बनकर जरूर उभरी है, किन्तु बी.एस.पी विरोधी जातिवादी तत्व सरकार बनाने के अपने लोभ में साम, दाम, दण्ड, भेद आदि अनेकों घिनौने हथकण्डे अपना कर बी.एस.पी. के विधायकों को तोड़ लेते हैं। जिससे जनता के साथ विश्वासघात करके घोर स्वार्थी जनविरोधी तत्व सत्ता पर काबिज हो जाते हैं। ऐसा बार-बार होने से बी.एस.पी मूवमेंट को भी काफी आधात पहुंचता है। अतः आगे इन विधानसभा आम चुनाव के बाद बैलेन्स ऑफ पावर बनने पर लोगों की चाहत के हिसाब से सरकार में शामिल होने पर विचार किया जाएगा।”

बहनजी ने आगे कहा कि हालांकि बसपा ने उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में चार बार अपनी सरकार बनाई है और बाबासाहेब आंबेडकर और मान्यवर कांशीराम के सपनों को जमीन पर उतारने का शानदार काम किया है। लेकिन दूसरे राज्यों में भी बैलेन्स ऑफ पावर बनकर सरकार में शामिल होकर करोड़ों गरीबों, शोषितों और उपेक्षितों के हित व कल्याण के लिए काम किया जा सकता है। साथ ही उन पर होने वाले जुल्म-ज्यादती व अन्याय-अत्याचार आदि को रोकने का काम भी किया जा सकता है।

बहनजी कि इस नई घोषणा और रणनीति का बसपा समर्थकों और पार्टी के नेताओं ने स्वागत किया है। और इसे जरूरी और साकारात्मक फैसला बताया जा रहा है। दरअसल बहुजन समाज पार्टी का प्रदर्शन कई राज्यों में काफी बेहतर होता रहा है। इसमे छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं। बसपा का दक्षिण में भी जनाधार है और पार्टी यहां भी सीटें जीतने में सफल रही है। लेकिन अपनी अब तक की नीति के कारण बहुजन समाज पार्टी कहीं भी सरकार में शामिल होने की बजाय बाहर से समर्थन देती रही है, जिससे उसके विधायकों में असंतोष रहता है। लेकिन चार राज्यों के चुनाव के पहले बसपा सुप्रीमों द्वारा लिये गए इस नए राजनैतिक फैसले से निश्चित तौर पर बसपा के प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं में जोश बढ़ जाएगा।

इंफाल का उनका घर मैतेइयों ने जला दिया है

(10 मई,  2022) मणिपुर से रोज हिंसा और आगजनी की खबरें आ रही हैं। मेरी एक मित्र का घर पूर्वी इंफाल में था। मणिपुर पुलिस बल में कार्यरत रहे उनके पति का निधन कई वर्ष पहले हो चुका है। वे स्वयं चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़ी पेशेवर हैं तथा अपने दो बच्चों-एक बेटा और एक बेटी- को पालते हुए स्वाभिमानपूर्वक जीवन जीती रही हैं।

आखिर उस इंफाल शहर में एक अकेली मां को क्या भय हो सकता है, जिसके बीचोबीच स्त्री सशक्तिकरण का अनूठा प्रतीक ‘इमा कैथल’ शान से देर शाम तक इठलाता रहता है। ‘इमा कैथल’ मणिपुरी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- मदर्स मार्केट। माता बाजार या कहें, अम्मा का बाजार। यह एक ऐसा बाजार है, जिसे सिर्फ महिलाएं चलाती हैं। इसे लगभग पांच सौ साल पहले 16वीं शताब्‍दी में महिलाओं द्वारा कुछ छोटी दुकानों के साथ शुरु किया गया था। आज यह एशिया का सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली महिला बाजार है।
इस बाजार की खास बात यह है कि यहां दुकानदार केवल और केवल महिलाएं ही हो सकती हैं। उनमें भी वही, जो शादी शुदा हों।
उस विशाल बाजार कॉम्लेक्स में लगभग 5000 महिलाएं दुकानदारी करती हैं। इन दुकानों में मछलियों, सब्जियों, मसालों, फलों से लेकर स्थानीय चाट तक न जाने कितनी तरह की चीजें मिलती हैं। पूर्वोत्तर भारत में महिलाएं मछली से लेकर सूअर तक मांस बेचते हुए दिखती हैं। बल्कि मांस की दुकानों को चलाते हुए शायद ही कोई पुरुष दिखाता है। वे ही इन्हें बिक्री के दौरान काटती भी हैं, जो मुझे जैसे उत्तर भारतीय को शुरु में अजूबा लगा था।

मणिपुर पर संसद में हंगामा, विपक्ष ने दिखाए तेवर, मोदी गायब

2019 में जब हम पहली बार इंफाल में मिले थे। उन्होंने अपनी कामचलताऊ हिंदी में मुझे इस बाजार का इतिहास बताया था। मणिपुर में पुराने समय में लुलुप-काबा यानी बंधुवा मजदूरी की प्रथा थी। इसके तहत पुरुषों को खेती करने और युद्ध लड़ने के लिए दूर भेज दिया जाता था। ऐसे में महिलाएं ही घर चलाती थी। खेतों में काम करती थी और बोए गए अनाज बेचती थीं। इस करण उन्होंने एक ऐसा बाजार निर्मित किया जहां केवल महिलाएं ही सामान बेचें। ब्रिटिश हुकूमत ने जब मणिपुर में जबरन आर्थिक सुधार लागू करने की कोशिश की तो इमा कैथल की इन साहसी महिलाओं ने उसका खुलकर विरोध किया। इन महिलाओं ने एक आंदोलन शुरू किया जिसे नुपी लेन, यानी ‘औरतों की जंग’ कहा गया। नुपी लें के तहत महिलाओं ने अंग्रेजों की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लगातार विरोध-प्रदर्शन किए। माताओं का यह आंदोलन दूसरे विश्वयुद्ध तक चलता रहा।
मेरी मित्र कहना था कि इंफाल आने वाले पर्यटकों के लिए शायद इमा कैथल सिर्फ का कौतुहल की चीज हो। लेकिन हम मणिपुरियों के लिए यह मातृशक्ति का पर्याय है। उन्होंने बताया था कि आज भी यह बाजार सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर चर्चा के लिए जाना जाता है। स्थानीय लोग मणिपुर राजनीतिक-सामजिक मिजाज समझने और उनपर चर्चा के लिए भी यहां आते हैं।
हालांकि मेरी मित्र राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं रखतीं। उन्होंने स्वयं भी इसे स्पष्ट किया था कि बच्चों को अच्छी परवरिश दे सकूं उन्हें अच्छी शिक्षा दिला दूं और अपनी जिंदगी में पीछे छूट गई खुशियों में कुछ को कुछ क्षण के लिए ही जी लूं, इतना ही मेरे लिए काफी है।
3 मई को उन्हें खबर मिली कि उनकी कॉलोनी पर हमला होने वाला है। इससे पहले कि लोग कुछ सोच पाते, मैतेइयियों का एक समूह उनकी कॉलोनी में पहुंचा। उनमें सिर्फ युवक नहीं थे, बल्कि अधेड़ और किशोर उम्र की बच्चे भी शामिल थे। उनके पास अत्याधुनिक हथियार थे, वे दरवाजों को पीट रहे थे तथा जो भी कुकी दिख रहा था, उस पर हमला कर रहे थे। वे वहां से किसी तरह भागीं। उनके परिवार के साथ दर्जनों अन्य परिवार जान बचाने के लिए किसी तरह पूर्वी इंफाल के नागा बहुल इलाके में पहुंचे और स्थानीय लोगों की मौन-सहमति से लोडस्टार पब्लिक स्कूल में छिप गए। नागाओं पर उन्हें भरोसा था। उस स्कूल का परिसर बहुत विशाल था, जिसमें उस समय अनेक वाहनों को सुरक्षा की दृष्टि से रखा गया था।
उन्होंने चार लोंगों की हत्या होते अपने आंखों से देखा। वे सभी कूकी थे। वे वहां कुछ दिन रहीं। हर दिन वहां भी मैतेइियों का हमले की आशंका फिजा में तैरती रहती। उतने सारे लोग दम साधे वहां रहते ताकि बाहर आने जाने वालों को उनकी मौजूदगी का आभास न हों। कुछ दिन बाद सुरक्षा-बलों के ट्रकों में उन्हें वहां से निकाला गया और राहत-शिविर में पहुंचाया गया। वे अब अपनी किशोर उम्र की बेटी और जवान हो रहे बेटे साथ दिल्ली में रोजी-रोटी के संघर्ष में लगी हैं।
इंफाल का उनका घर मैतेइयों ने जला दिया है। आज सुबह जब वे फोन पर उन घटनाओं के बारे में बता रहीं थीं, ताे मैं उनके स्वर में असायहता से भरा कंपन महसूस कर सकता था।
15 मई, 2023
इन दिनों असम के जिस कस्बे में रहता हूं, वहां से मणिपुर का प्रवेश द्वार, जिसे माओ गेट कहा जाता है, महज चार घंटे का रास्ता है।
मणिपुर से मेरा रिश्ता पुराना रहा है। किशोरावस्था में पहली बार एनसीएसी द्वारा आयोजित एक ट्रैकिंग कार्यक्रम में गया था। उन दिनों पटना में रहता था। उसके बाद दिल्ली में रहते हुए पूर्वोत्तरी राज्यों की यात्रा कार से की थी और उस समय भी मणिपुर में कई दिन रहा था। अब तो खैर, यह इतना करीब है कि सुबह नाश्ता घर में और लंच इंफाल में किया जा सकता है। पहले रास्ते बहुत खराब थे, अब कोलकात्ता से थाईलैंड तक के लिए एक प्रशस्त के हाईवे बन रहा है,जिसके रास्ते में मेरा यह कस्बा और मणिपुर भी आता है। उसके बाद हाईवे मोरेह बार्डर से म्यमार में प्रवेश करेगा और थाईलैंड की राजधानी बैंकाक तक जाएगा। मौजूदा केंद्र सरकार की कोशिश है कि पूर्वोत्तर को हाईवे से पाट दिया जाए। उनकी नजर में यही एकमात्र विकास है, जिससे पूर्वोत्तर के आदिवासियों को कथित मुख्य धारा में शामिल किया जा सकता है।
जब से मणिपुर में हिंसा शुरु हुई है, वहां की जमीनी हालत समझने की कोशिश कर रहा हूं। इस संबंध में मेरी मणिपुर में तीन परिचितों से बीच-बीच में बातचीत होती रही है। तीनों महिलाएं हैं, जिनमें से दो कूकी और एक मैतेई हैं।
हिंसा के पहले सप्ताह में ही दोनों कूकी महिलाओं को अपने परिवार के साथ मणिपुर छोड़कर भागना पड़ा है। इनमें से एक हिंसा के बाद अब अपनी किशोर उम्र की बेटी और जवान हो रहे बेटे साथ दिल्ली में रोजी-रोटी के संघर्ष में लगी हैं। दूसरी कूकी महिला चूरचांदपुर की हैं। उन्होंने गुवाहाटी में बसे अपने संबंधियों के घर शरण ले रखी है। तीसरी महिला, जो मैतेई हैं; इंफाल की रहने वाली हैं, उन्हें घर नहीं छोड़ना पड़ा है, लेकिन वे भी वहां भय के साये में जी रही हैं।
दोनों कूकी महिलाएं अक्सर मेरे व्हाट्स एप वहां हो रही क्रूर घटनाओं के वीडियो, फोटोग्राफ आदि भेजती रहती हैं तथा कूकी लोगों के बीच गाए जा रहे संघर्ष के गीतों, उनकी मार्मिक अपीलें आदि भेजती रहती हैं। मणिपुर में इंटरनेट पर प्रतिबंध है, ये वीडियो और अपीलें उनतक पता नहीं कैसे पहुंचती हैं। शायद मणिपुर से लगातार पलायन कर रहे कूकी लोग अपने साथ इन्हें लेकर आते हों।
उनके द्वारा दी सूचनाओं में मुख्य तौर पर मैतेइयों की क्रूरता और अत्याचारों का जिक्र होता है। वे जब किसी संगठन द्वारा वितरित पंपलेट या खबरों के लिंक आदि भेजती हैं तो उसमें कुछ राजनीतिक बातें भी होती हैं। मसलन, इनमें कहा गया होता है कि मैतेइयों के हिंसा करने वाले संगठनों को मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह और भाजपा से राज्य सभा सांसद, महाराजा सनाजाओबा लीशेम्बा का वरदहस्त प्राप्त है। कुछ पंपलेटों में यह भी बताया गया होता है कि किस प्रकार भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर भारत की सांप्रदायिक राजनीति को इस पहाड़ी राज्य में पहुंचाया है।
लेकिन मैतेई समुदाय से आने वाली महिला ऐसी कोई तस्वीर, वीडियो आदि नहीं भेजतीं और इस बारे में पूछने पर प्राय: सवालों से बचना चाहती हैं। आज जब मैंने उनसे कूकी लड़कियों पर मैतेइयों के अत्याचार बारे में पूछा तो उन्होंने छूटते ही कहा कि वे एक स्त्री होने नाते शर्मिंदा हैं।
मैंने उन्हें कहा कि मेरे पास कूकियों पर मैतेइयों के अत्याचार की कई कथाएं और वीडियो हैं। अगर उनके पास कूकियों द्वारा मैतेइयों पर किए गए अत्याचार के प्रमाण स्वरूप कुछ वीडियो-तस्वीरें आदि हों तो मुझे भेजें ताकि मैं अपने एक लेख में उनका भी जिक्र कर सकूं। पहले तो उन्होंने शंका जताई कि कहीं उन वीडियो के शेयर करने पर उनका नाम तो बाहर नहीं आएगा। मैंने जब उन्हें इस बारे में आश्वस्त किया तो उन्होंने कहा कि वे थोड़ी देर में इस बारे में बताएगीं। उन्होंने इस बीच शायद किसी से बात की और मुझे व्हाट्सएप किया कि उन वीडियोज को “किसी बाहरी के साथ शेयर करने की इजाजत नहीं है।” इस बारे में पूछने पर यह रोक किसने लगाई है, उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।
यह रोक उनके मैतेई समुदाय की ओर से भी हो सकती है। पिछले दिनों कई मैतेई लोगों और संगठनों पर झूठी खबरें, वीडियो फैलाने के आरोप में मुकदमे दर्ज हुए हैं।
मणिपुर की हालत को समझने के लिए मैंने मणिपुर के कुछ प्रमुख राजनेताओं और समाजकर्मियों से भी बात की है। उनसे जो सूचनाएं और विश्लेषण मुझे प्राप्त हुए, वे सभी उतनी ही हैं, जितने अखबारों में प्रकाशित हो चुकी हैं। पत्रकारिता के अपने अनुभव जानता हूं कि इन लोगों की बातचीत में उन्हीं बातों दुहराव होता है, जिसे सब पहले से जानते हैं। ऐसे मामलों में राजनेताओं की दिलचस्पी प्राय: अपना नाम प्रकाशित करवाने में, अपने आधार-क्षेत्र को इस माध्यम से अपनी पक्षधरता बताने में होती है। लेकिन हिंदी में लिखे जा रहे मेरे लेख से उनका वांछित पूरा नहीं हो सकता।
उपरोक्त महिलाएं मणिपुर की मेरी विभिन्न यात्राओं के दौरान मित्र बनीं थीं। राजनीति और समाजकर्म से उनका दूर–दूर तक नाता नहीं है। मुझे लगता है कि विभिन्न पैमानों में साधारण लगने वाली इन असाधरण महिलाओं से बातचीत ने मुझे जमीनी स्तर पर दोनों समुदायों की भावनाओं, प्रतिक्रियाओं और कार्रवाइयों में किस प्रकार का अंतर है, इसे समझने में बहुत मदद की है। …. 

प्रख्यात दलित कार्यकर्ता मिलिंद मकवाना की अमेरिका मे मौत

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पिछले दिनों कैलिफोर्निया असेंबली में जातिगत भेदभाव पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक के विरोधी एक प्रमुख भारतीय-अमेरिकी दलित कार्यकर्ता की क्यूपर्टिनो में सिटी काउंसिल की बहस के दौरान दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गयी। मिलिंद मकवाना 18 जुलाई को हुई इस बैठक में एसबी403 के खिलाफ अपनी बात रख रहे थे और उसी दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा। एसबी403 कैलिफोर्निया राज्य में जातिगत भेदभाव पर प्रतिबंध लगाने वाला विधेयक है जिसे राज्य की सीनेट ने मई में मंजूरी दी थी। कैलिफोर्निया पहला अमेरिकी राज्य है जिसने भेदभाव-विरोधी कानूनों में जाति को संरक्षित श्रेणी के रूप में जोड़ा है।

क्यूपर्टिनो के कार्यकर्ता मिलिंद मकवाना ने दिनभर विभिन्न बैठकों और सिटी काउंसिल की बहस में भाग लिया। उन्होंने विधेयक के खिलाफ अपनी बात रखी की और कहा कि यह विधेयक दलित विरोधी है। बहस के कुछ ही देर बाद वह बेहोश हो गए।

‘मिलिंद सभी समुदायों के बीच आपसी सद्भाव चाहते थे’ हिंदू स्वयंसेवक संघ (एचएसएस) द्वारा जारी एक बयान में मिलिंद की पत्नी पूर्वी मकवाना ने कहा, “मिलिंद की साफ धारणा थी कि दलित और बहुजन भी हिंदू हैं। वह वंचित समुदायों के लिए न्याय के प्रति जुनूनी थे और साथ ही, सभी समुदायों के बीच आपसी विश्वास और सद्भाव चाहते थे।”

पूर्वी ने कहा, ”अपने पूरे जीवन में वह धर्म के लिए खड़े रहे। मैं, समुदाय से आग्रह करती हूं वह न्याय, सामंजस्य और धर्म के मिलिंद के सपने को समर्थन दें और आगे बढ़ाएं।”

मिलिंद, सेवा इंटरनेशनल यूएसए के सक्रिय कार्यकर्ता थे। एक सेवा स्वयंसेवक के रूप में, मिलिंद ने वर्ष 2015 में तमिलनाडु में भारी बाढ़ आने पर राहत कार्यों में हिस्सा लिया था। वह ‘आंबेडकर-फुले नेटवर्क ऑफ अमेरिकन दलित्स एंड बहुजन्स’ (एपीएनएडीबी) के भी सदस्य थे।

मणिपुर को लेकर लंबी चुप्पी के पीछे यह है भाजपा की साजिश!

लेखक- बिलक्षण रविदास। मणिपुर में हो रही हिंसा पर लंबी चुप्पी के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तब जुबान खोली, जब दो महिलाओं के साथ हैवानियत हुई और सरकार की थू-थू होने लगी। इसके बाद अब बीजेपी के दो सांसद और सरकार के मंत्रियों अनुराग ठाकुर और स्मृति ईरानी ने प्रेस कॉन्फ्रेन्स में मणिपुर में महिलाओं के साथ की गई हिंसा, बलात्कार और हत्या को लेकर अपनी पार्टी का बचाव करने सामने आ गए। उनका कहना था कि मणिपुर के साथ-साथ राजस्थान और बंगाल में भी महिलाओं के साथ बलात्कार और निर्वस्त्र करने की घटनाएं हुई हैं। लेकिन सभी पार्टियों द्वारा बातें केवल मणिपुर की जा रही हैं। ऐसा कहकर दोनों मंत्रियों ने अपने प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा दिए गए बयान को ही दुहराया है।

यह सच है कि भारत के सभी राज्यों में महिलाओं के साथ बलात्कार और हिंसा की घटनाएं होती रहती हैं। ऐसी अपराधिक घटनाओं के जिम्मेदार अपराधियों पर शीघ्र ही कार्रवाई की जाती रही हैं और अपराधियों को गिरफ्तार कर सजा भी दी जाती रही हैं। ऐसी घटनाओं में राज्य सरकार या किसी पार्टी विशेष द्वारा संरक्षण देने की भूमिका नहीं रही हैं।

लेकिन मणिपुर में महिलाओं के साथ हुई बर्बरता अलग किस्म की हैं जिसमें अपराधियों के साथ भाजपा की केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन की संलिप्तता उजागर हो चुकी हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो पीड़िता के द्वारा एफआईआर दर्ज कराते ही अपराधियों की गिरफ्तारी हो गई होती। न कि एक महीने बाद फिर से एफआईआर दर्ज की जाती और न 77 दिनों बाद सोशल मीडिया पर ऐसी घटनाओं से सम्बंधित वीडियो वायरल होने के बाद अपराधियों की गिरफ्तारी की कार्रवाई की जाती।  महिलाओं के प्रति भाजपा का क्या आचरण रहा है ये बातें पहलवान महिलाओं के साथ हो रही घटनाएं, राम-रहीम की सारी परिघटनाएं, गुजरात, यूपी, मध्य प्रदेश आदि राज्यों की एक दर्जन से ज्यादा ही घटनाएं गवाह हैं।

दरअसल मणिपुर में प्राकृतिक खनिजों पर कब्जा करने और पूंजीपति मित्रों को बेचने के लिए वोट पाना और सत्ता सरकार में बने रहना आवश्यक है। इस लक्ष्य को पाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 371 का बंटाधार करना जरूरी कदम है। इसके लिए गैर-जनजाति समुदाय मैतेई को जनजाति सूची में शामिल करने का षड्यंत्रकारी कानूनी कार्रवाई की गई।

इस समुदाय को जनजाति में शामिल कर अपना वोट बैंक बनाने की कोशिश गई है जिसके विरोध में वहां की जनजातियां संघर्ष कर रही हैं। इसलिए केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के निर्देशन में मणिपुर में सामुदायिक दंगे गत 78 दिनों से जारी हैं, जिसमें अपार जन धन की हानि होती जा रही हैं। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसलिए ही मोदी जी एवं उनके उपर्युक्त दोनों मंत्रियों ने 76 दिन तक चुप्पी साधे रखी। यह भाजपा की सबसे निंदनीय और राष्ट्र विरोधी घृणित कार्य है, जिसे इतिहास में काला अध्याय के रूप में लोग जानेंगे।


नोट- लेखक भागलपुर विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर पद से रिटायर्ड हैं। यह लेखक के अपने निजी विचार है। संस्थान का इससे सहमत होना जरूरी नहीं है।

लंदन से फ्रांस और फ्रांस से लंदन तक सतेन्द्र सिंह ने तैर कर पार किया 72 किमी का इंग्लिश चैनल

बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को अपना आदर्श मानने वाले दिव्यांग तैराक सतेन्द्र सिंह ने एक और कारनामा कर दिखाया है। सतेन्द्र इन दिनों लंदन में हैं, जहां उन्होंने लंदन से फ्रांस और फ्रांस से लंदन तक 72 किमी की इंग्लिश चैनल टू वे मैराथन रिले तैराकी को सफलता पूर्वक पूरा कर इतिहास रच दिया है।

इस रिले तैराकी में छह दिव्यांग तैराक थे, जिसका नेतृत्व सेतन्द्र सिंह ने किया। सतेन्द्र ने अपनी टीम के साथ 18 जुलाई को यूके में डोबर समु्द्रतट से तैराकी शुरू की थी और टीम ने 19 जुलाई को तैराकी पूरी की। यह पूरी रिले तैराकी 31 घंटे और 29 मिनट में 72 किलोमीटर की दूरी तय करने के साथ पूरी हुई।

सतेन्द्र सिंह ने जिस तरह इस टीम का सफलता पूर्वक नेतृत्व किया, उसकी हर ओर चर्चा हो रही है। सतेन्द्र के साथ इस टीम में शामिल अन्य दिव्यांग तैराकों में नागपुर के जयंत जयप्रकाश दुबले, असम से एलविस अली हजारिका, बंगाल से रिमो शाह, तेलंगाना से सिवाकुमार और तमिलनाडु से स्नेहन शामिल थे। सतेन्द्र मध्य प्रदेश के भिंड के रहने वाले हैं। वह इंदौर में वाणिज्यकर विभाग में जॉब करते हैं।

सतेन्द्र और उनकी टीम ने लंदन के Dover से फ्रांस के Wassant तक जिस इंग्लिश चैनल को तैरकर पार किया, उसे विश्व में जितने भी चैनल हैं, उनका राजा कहा जाता है। इसका तापमान सबसे ठंडा रहता है। सतेन्द्र सिंह की टीम जब इंग्लिश चैनल में तैर रही थी, उस वक्त समुद्र में तेज ठंडी हवाएं और लहरें चल रही थी। समुद्र के पानी का तापमान 14 डिग्री सेल्सियस था।

इस उपलब्धि पर ‘दलित दस्तक’ से फोन पर बात करते हुए सतेन्द्र सिंह ने कहा कि, जीवन में कभी हार नहीं मानना चाहिए और निराश नहीं होना चाहिए। दिव्यांग युवाओं को सहानुभूति की नहीं, बल्कि सम्मान और प्रोत्साहन की जरूरत है। मेरा मानना है कि मेरे जैसा कोई भी व्यक्ति हो, अगर वह सफलता का संकल्प ले और मेहनत करे तो वह जीवन में मुझसे भी आगे बढ़ सकता है।

इस मैराथन तैराकी की एक और बड़ी उपलब्धि यह है कि सतेन्द्र सिंह के नेतृत्व में यह पहली एशियाई टीम है, जिसने ठंडे नार्थ चैनल को पार किया है। सतेन्द्र और उनके साथियों ने यह साबित कर दिया है कि इरादा मजबूत हो तो कोई भी मंजिल हासिल की जा सकती है।

निष्पक्ष सुनवाई के लिए गैर सवर्ण और गैर ओबीसी जज की अपील करने पर 10 लाख का जुर्माना कितना सही?

ओबीसी आरक्षण से जुड़े एक मामले की सुनवाई से सवर्ण समाज के और ओबीसी समाज के जज को नहीं रखने संबंधित याचिका दायर करने वाले लोकेन्द्र गुर्जर पर अदालत ने 10 लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया है। दरअसल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में ओबीसी आरक्षण से संबंधित एक मामला चल रहा है। यह मामला लोकेश गुर्जर Vs मध्यप्रदेश सरकार के बीच चल रहा है। इसी मामले में लोकेश गुर्जर ने इस मामले की सुनवाई से सवर्ण समाज के और ओबीसी समाज के जजों को अलग रखने की मांग थी। यानी लोकेश की मांग थी कि मामले की सुनवाई एससी-एसटी समाज के जजों से कराई जाए। लोकेश की यही मांग माननीय जजों को नागवार गुजरी।

न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ ने 17 जुलाई को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश से सामने आई इस अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह अदालत को डराने का प्रयास था। साथ ही याचिका कर्ता लोकेन्द्र गुर्जर पर दस लाख रुपये का जुर्माना भी लगाने का आदेश सुना दिया।

शीर्ष न्यायालय के जजों के जुर्माने वाले फैसले को लेकर मामता तूल पकड़ गया है। कई लोग इसे न्यायपालिका का मनमानापन बता रहे हैं और जुर्माने की आलोचना कर रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने इस मुद्दे को ट्विटर पर उठाया है और इसके खिलाफ मुहिम शुरू कर दी है। दिलीप मंडल का तर्क है कि-

संविधान के मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में एक अपील आती है कि ओबीसी आरक्षण से जुड़े केस में, चूँकि ओबीसी और सवर्ण पार्टी यानी पक्ष हैं, इसलिए मामले की सुनवाई निष्पक्ष बेंच करे, जिसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के जज हों। गौर करें कि याचिकाकर्ता लोकेंद्र सिंह गुर्जर ओबीसी हैं, पर ओबीसी जज नहीं माँग रहे हैं। निष्पक्ष बेंच की माँग कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के अधिकार में ये तो था कि इस याचिका को ख़ारिज कर देता, लेकिन कोर्ट ने याचिकाकर्ता लोकेंद्र गुर्जर पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया है ताकि लोग आगे से कभी न्यायपालिका के जातिवाद पर बात न करें। कोर्ट भय को हथियार बना रहा है।

दिलीप मंडल ने प्रशांत भूषण द्वारा अदालत की अवमानना की याद दिलाते हुए कहा कि इसी कोर्ट ने प्रशांत भूषण पर सिर्फ़ ₹1 का जुर्माना लगाया था, जबकि प्रशांत बाहर बयानबाज़ी कर रहे थे। लोकेन्द्र पर जुर्माना ग़लत बात है और हम इस मामले में चीफ़ जस्टिस और सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की माँग करते हैं। ये जुर्माना हटाया जाए।

वरिष्ठ पत्रकार का यह भी कहना है कि ये मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उनकी मांग है कि इस आदेश को देने वाले सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों को हटाने की कार्यवाही शुरू की जाए।

इस मामले के सामने आने के बाद इसके पक्ष और विरोध में सोशल मीडिया पर जंग तेज हो गई है। तमाम लोग, जिसमें ज्यादातर सवर्ण समाज के लोग हैं, उनका कहना है कि अदालत के मामलों में जातिवाद की बात नहीं करनी चाहिए। उन्होंने इस मामले में याचिकाकर्ता लोकेन्द्र गुर्जर पर हुई कार्रवाई को सही बताया है। जबकि तमाम लोग लोकेन्द्र की मांग का समर्थन कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब न्यायालय में एक ही जाति के लोगों का जमावड़ा लगा है, और मामला जाति से ही जुड़ा हो, ऐसे में लोकेन्द्र की मांग गलत नहीं है। तमाम लोगों ने कोलेजियम सिस्टम को लेकर भी अदालत पर सवाल उठाया है।

कई जाने-माने एक्टिविस्ट भी लोकेश के पक्ष में सामने आए हैं। लंदन युनिवर्सिटी से पोलिटिकल साइंस में पीएचडी कर रहे अरविंद कुमार का कहना है कि यह जुर्माना दस लाख लोगों से एक-एक रुपये लेकर भरा जाना चाहिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के वकील नीतिश मेश्राम ने ट्विट करते हुए कहा है कि वो उन तमाम मामलों की लिस्ट दे सकते हैं, जिसमें जातिवाद होता है।

मैं आपको एक घटना की याद दिलाता हूं। साल 2022 का मामला है। रिपोर्ट बीबीसी में प्रकाशित हुई थी। हुआ यह था कि केरल में कोझीकोड के सेशन कोर्ट के जज एस कृष्ण कुमार की अदालत में एक मामला आया था। जिसमें सीवी कुट्टन नाम के व्यक्ति पर 42 साल की दलित महिला के यौन उत्पीड़न का आरोप था। इस पर सुनवाई करते हुए जज एस कृष्ण कुमार ने आरोपी को जमानत दे दी थी। अपने फै़सले में जज ने कहा था, ”यह मानना विश्वास से बिल्कुल परे है कि अभियुक्त ने यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि पीड़िता दलित है, उन्हें छुआ होगा।” राजस्थान की भंवरी देवी का मामला याद है न। भंवरी देवी का गैंग रेप हुआ था। लंबे समय तक मामला चला। राजस्थान हाईकोर्ट ने दोषियों को सजा सुना दी। लेकिन मामले में लगातार जज बदलने लगे। फिर सुनवाई हुई और नवंबर, 1995 में अभियुक्तों को बलात्कार के आरोपों से बरी कर दिया गया। उन्हें मामूली अपराधों में दोषी करार दिया गया और वे महज नौ महीने की सजा पाकर जेल से छूट गए थे। जजों ने कहा था कि अगड़ी जाति का कोई पुरुष किसी पिछड़ी जाति की महिला का रेप नहीं कर सकता क्योंकि वह ‘अशुद्ध’ होती है। सोचिए जरा, जिस न्यायपालिका में इस सोच के जज भी बैठते हों, वहां जाति से जुड़े मसले पर पूर्वाग्रह से बचने की मांग करने के लिए मामले से जुड़े जाति पक्ष के जजों को अलग रखना क्या सचमुच में कोई इतना बड़ा गुनाह है कि उसके लिए 10 लाख का जुर्माना लगा दिया जाए?