BSP के नाम पर पैसे की धोखाधड़ी पर भड़कीं मायावती

 सोशल मीडिया पर इन दिनों बीएसपी को आर्थिक सहयोग देने के इच्छुक NRI अम्बेडकरवादियों के लिए एक मैसेज घूम रहा है. इस मैसेज में बैंक का खाता नंबर भी दिया गया है. बहुजन समाज पार्टी ने इस मैसेज को गलत बताया है. पार्टी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि आर्थिक सहयोग देने के इच्छुक एन.आर.आई साथियों के लिए जारी किया गया बैंक खाता नंबर शीर्षक से सोशल मीडिया पर प्रसारित खबर पूरी तरह से गलत व फ्राड है.

बहुजन समाज पार्टी ने इस मामले को लेकर एक बयान जारी किया है, जिसमें पार्टी का कहना है- “बहुजन समाज पार्टी को जानकारी मिली है कि सोशल मीडिया पर एक विज्ञप्ति प्रसारित करके यह प्रचारित किया जा रहा है कि बी.एस.पी. द्वारा ‘‘विदेशों में रहने वाले मिशनरी साथियों के लिये खाता नम्बर जारी किया गया है‘‘ ताकि इच्छुक एन.आर.आई. बी.एस.पी. को आर्थिक सहयोग कर सकें। यह खबर शत-प्रतिशत गलत व मिथ्या प्रचार है तथा इससे बी.एस.पी. अथवा बी.एस.पी. के किसी भी सदस्य आदि का कोई लेना-देना नहीं है। बी.एस.पी. इस प्रकार के षड़यन्त्रकारी दुष्प्रचार की तीव्र निन्दा व भर्त्सना करती है तथा चुनाव आयोग से माँग करती है कि वह ना केवल इस पर तत्काल सख्त कानूनी कार्रवाही करें बल्कि आगे भी ऐसी गलत/भ्रामक/मिथ्या प्रचार पर कड़ी नजर रखें।”

पार्टी ने अपने बयान में आगे देश की आम जनता से इस प्रकार के दुष्प्रचार में नहीं पड़ने और भ्रमित नहीं होने की अपील की है. हालांकि दलित दस्तक ने कथित तौर पर सोशल मीडिया पर घूम रहे फ्राड मैसेज के बारे में पता करने की कोशिश की लेकिन वह मैसेज हमारे पास उपलब्ध नहीं हो पाया.

स्लोवाकिया में पहली बार महिला राष्ट्रपति

0

 

स्लोवाकिया की पहली महिला राष्ट्रपति जुजोना कैपुतोवा (फोटो क्रेडिटः एजेंसी)

स्लोवाकिया को नया राष्ट्रपति मिल गया है. इसमें नई खबर यह है कि इस देश में पहली बार ऐसा हुआ है जब जनता ने किसी महिला को अपना राष्ट्रपति चुना है. नवनिर्वाचित राष्ट्रपति का नाम जुजाना कैपुतोवा है. इस तरह जुजाना कैपुतोवा यहां की पहली महिला राष्ट्र प्रमुख बन गई हैं. 46 वर्षीय कैपुतोवा तलाकशुदा और दो बच्चों की मां हैं. कैपुतोवा को एक वकील के तौर पर देश भर में शोहरत मिली थी, जब उन्होंने अवैध कचरा भराव क्षेत्र के खिलाफ एक मामले की अगुवाई की. यह संघर्ष 14 साल तक चला था. उन्होंने हाई प्रोफाइल राजनयिक मारोस सेफकोविक को दूसरे चरण की वोट की गिनती में हरा दिया. कैपुतोवा की ख्याति भ्रष्टाचार-रोधी मुहिम चलाने वाली उम्मीदवर के रूप में है. कैपुतोवा को यूरोपियन कमीशन के उपाध्यक्ष सेफकोविट के 42 फीसदी पर 58 फीसदी वोटों से जीत हासिल हुई. वह उदारवादी प्रोग्रेसिव स्लोवाकिया पार्टी की सदस्य हैं. इस पार्टी की संसद में कोई सीट नहीं है. कैपुतोवा का जीतना इसलिए भी अहम है क्योंकि स्लोवाकिया ऐसा देश है जहां समलैंगिक विवाह व गोद लेना अब तक कानूनी नहीं है. माना जा रहा है कि वह उदारवादी विचारों को बढ़ावा देंगी.

बसपा ने छह उम्मीदवारों की आधिकारिक घोषणा की

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी ने आज छह लोकसभा सीटों के लिए प्रत्याशियों के नामों की आधिकारिक घोषणा कर दी है. पार्टी महासचिव मेवालाल गौतम द्वारा जारी सूची के मुताबिक शाहजहांपुर (सुरक्षित) से अमर चन्द्र जौहर, मिसरिख (सुरक्षित) सीट से नीलू सत्यार्थी, फर्रूखाबाद से मनोज अग्रवाल, अकबरपुर से निशा सचान और जालौन से पंकज सिंह को प्रत्याशी घोषित किया है. हमीरपुर से पार्टी ने दिलीप कुमार सिंह को टिकट दिया है.

हालांकि तमाम नेता पहले से ही चुनाव प्रचार में लगे हुए थे, लेकिन पार्टी के आधिकारिक ऐलान के बाद यह साफ हो गया है कि बसपा और गठबंधन की तरफ से वे उम्मीदवार हैं. 17वीं लोकसभा के लिए चुनावी रण 11 अप्रैल से शुरू हो रहा है. इस दिन पहले चरण का मतदान होगा. पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में चुनाव हो रहे हैं.

रमणिका गुप्ता का जाना एक हादसा है

लंबे समय से बीमार रही रमणिका गुप्ता का निधन हो गया. उनकी बीमारी की हालत में मैं उनसे कई बार मिलने गया और यह महसूस होता था कि वह और जीना चाह रही हैं. थोड़ा बहुत भी ठीक होती तो भि‍ड़ जाती अपने कामों में, समय पर मैगजीन युद्ध रत आम आदमी आना है. कौन सा काम कैसा  हो रहा है? एक तरह से उन्हें अपने जाने का भी एहसास हो चुका था. क्योंकि उमर उनकी काफी हो रही थी. वह अपने तमाम राइटिंग्स और स्पीच को इकट्ठा कर रही थी. इसके प्रकाशित करने की तैयारी में थी. शायद वह अब तक प्रकाशित भी हो गई होगी.

बहुत सारे काम वे जल्‍दबाजी में करना चाह रही थी. हर जगह वह आप अपनी उपस्थिति देना चाहती थी. बता दूं कि रमणिका गुप्ता ने अपने कैरियर की शुरुआत हजारीबाग बिहार. अब झारखंड में है, से शुरू की थी. परिवार से विद्रोह करते हुए उन्होंने कोयला मजदूरों के लिए आंदोलन जारी रखा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी से वह विधायक चुनी गई. उनके जज्बे और साहस की हमेशा तारीफ में होती थी. इसके साथ साथ उन्होंने अपना साहित्यिक काम भी जारी रखा. वह हजारीबाग से ही युद्ध रात आम आदमी पत्रिका निकालती थी. शुरू में यह त्रैमासिक थी.

उन्हें अपने नाम का बेहद मोह था जैसा कि सभी को होता है. लेकिन वह उसे प्रजेंट करने में कभी भी संकोच नहीं करती थी. उन्होंने अपने जीते जी रमणिका फाउंडेशन बनाया और खुद उसकी संस्थापक सदस्य बनी. रमणिका फाउंडेशन के मार्फत वे कई विधाओं में पुरस्कार भी दिया करती थी. पत्रिका का प्रकाशन भी रमणिका फाउंडेशन के माध्यम से ही होता था.

उन्होंने आदिवासी मुद्दों पर जमकर लिखा और इस पर लिखने वालों को आगे भी बढ़ाए. इसी प्रकार वे दलित मुद्दों पर भी काफी लिखा करती थी और दलित लेखकों को प्रमोट करने का श्रेय उन्हें जाता है. उनकी कविताएं और कहानियां चर्चित रही हैं खासकर उन की एक कहानी बहू जुठाई बेहद चर्चित रही है. यदि मौका मिले तो आप इस कहानी को जरूर पढ़ें.

वे स्त्री मुद्दों को उठाने वाली देश की अग्रणी महिलाओं में शुमार की जाती थी. उनकी तमाम रचनाओं में महिला वादी सोच स्पष्ट दिखाई पड़ती थी. उनकी आत्मकथा हादसे बेहद चर्चित रही. उन्होंने अपने अंतरंग संबंधों और तमाम अनुभवों को इस आत्मकथा में साझा किया था. जिसके कारण वह विवादों में भी घिरी थी.

मेरा जब भी दिल्ली जाना होता मैं रमणिका जी के पास जरूर आता और प्रभावित था कि वे एक बुजुर्ग महिला होने के बावजूद बेहद सक्रिय थी. रात को केवल 4 या 5 घंटे सोती, बाकी समय लिखने पढ़ने में जाता. उनकी पत्रिका का विशेषांक मल मूत्र ढोता भारत के लिए मैं कई बार दिल्ली गया और इस काम में मैंने मदद की. इसके बाद मैंने पिछड़ा वर्ग विशेषांक संपादन का जिम्मा लिया और क़रीब 4 साल की मेहनत के बाद यह अंक मार्केट में आया. इस बीच मुझे कई बार रायपुर से दिल्ली का दौरा करना पड़ा. तमाम लोगों से इंटरव्यू एवं आलेख मंगाए गए. रचनाओं की छटनी और प्रूफ चेकिंग. एक बहुत बड़ा काम था. यह अंक दो भागों में प्रकाशित हुआ.

 एक बार की घटना मुझे याद आ रही है रमणिका जी को जब पता चलता कि कोई दिल्‍ली के बाहर से लेखक या लेखिका आई हैं. तो उन्हें फोन कर बुला लेती और गपशप मारते हैं. कुछ लिखना पढ़ना होता. इसी दरमियान कंवल भारती जी को उन्होंने फोन पर बुलवाया और उन्होंने कहा कि भारती जी अब आप आ जाइए शाम का खाना खाएंगे कुछ रम शम पिएंगे. कंवल भारती जी ऑटो में तुरंत डिफेंस कॉलोनी स्थित रमणिका जी के निवास पर आ गए. एक-दो दिन पहले से मैं भी वहां पर था. जैसे ही कंवल भारती आए तो उन्होंने स्वागत सत्कार किया और बातचीत करने लगे. कंवल भारती जी ने कहा कि आपने मंगवा लिए (इशारा रम की तरफ था) तो रमणिका जी तुरंत कहने लगी कि नहीं हम तो आजकल लेना बंद कर दिए हैं और यहां पर पिलाना भी बंद हैं. तो कंवल भारती जी तमक गए बोले कि आप ने मुझे बुलाया है, यही बोल कर, इसलिए मैं आया हूं. सहमति के लिए रमणिका जी ने मुझसे हामी भराने की कोशिश की, तो मैंने कहा कि आपने तो कहा था कि आइए कुछ रम सम पिएंगे. रमणिका जी ने कहा कि ऐसा तो मैंने नहीं कहा था. उसके तुरंत बाद कंवल भारती जी नाराज हो कर चले गए. वह कई बार अपने कहे बातों को बदल दिया करती थी और कभी भी अचानक बहुत पैसे वाली हो जाती. तो कभी वे बिल्कुल गरीबों से व्यवहार करती. वह अक्सर कहां करती थी कि मेरे बेटे की कंपनी( जो अमेरिका में है) का टर्नओवर बिहार सरकार के टर्नओवर से ज्यादा है. उनका यह फाउंडेशन उन्हीं की मदद से चल रहा है. उनके यहां जो कर्मचारी काम करते थे उनमें से एक दिनेश को छोड़कर कोई भी कर्मचारी साल 6 महीना से ज्यादा नहीं टिक पाता था. वे रगड़ कर काम लेती थी और किसी भी कर्मचारी को फांके मानने का मौका नहीं देती थी. इसलिए संपादक से लेकर टायपिस्ट टिक नही पाते.

कोई कर्मचारी यदि उनके टेलीफोन से अपने रिश्तेदारों से फोन भी करता तो वह उनकी सैलरी से फोन के बिल के पैसे काट लिया करती. प्रोफेशनल तो इतनी थी कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते. यदि आप जानेंगे कि वे एक दलित आदिवासी और महिला वादी महिला थी. लेकिन इमोशनल तो बिल्कुल भी नहीं थी. कई बार उनके महिला वादी होने पर भी संदेह होता.

ऐसा ही एक वाक्‍या मुझे याद आ रहा है.  एक नेपाली जोड़ा उनके यहां निवास करता था. उसकी पत्नी घर पर झाड़ू पोछा खाना वगैरह बनाने का काम करती थी और पति कहीं किसी कंपनी में चौकीदार था. इसी दरमियान बता दूं मैं की झारखंड हजारीबाग निवासी रमणिका जी के पुराने मित्र का बेटा आईएएस परीक्षा की तैयारी करने के लिए रमणिका का फाउंडेशन में साल भर से ठहरा हुआ था. नाम तो मुझे याद नहीं आ रहा है. लेकिन वह भूमिहार परिवार का था ऐसी जानकारी रमणिका जी ने दी थी. वह लड़का पढ़ाई कम और हीरोगिरी ज्यादा करता था. अक्सर रमणिका फाउंडेशन में आने वाली महिलाओं के पीछे पीछे घूमता रहता और नेपाल से आए उस नेपाली चौकीदार की पत्नी के भी पीछे-पीछे वह घूमा करता था. बाद में पता चला कि इस लड़के ने उस नेपाली महिला के साथ धमकी देकर जबरदस्ती संबंध बनाया और वह महिला प्रेग्नेंट हो गई.  यह जानकारी  उस नेपाली महिला के पति को नहीं हो पाई. क्योंकि वह आधी रात चौकीदारी की ड्यूटी से फाउंडेशन में आकर रुकता था यहां के एक छोटे से कमरे में नेपाली जोड़े को निवास हेतु जगह दिया गया था.  रमणिका फाउंडेशन में हंगामा मच गया. जैसा की होना चाहिए था. इस मामले में रमणिका जी के द्वारा पुलिस में रिपोर्ट लिखा जाना चाहिए था. लेकिन हुआ इसके उलट, वह महिला लगातार रोती रही और पुलिस में जाने की कोशिश करती रही. लेकिन रमणिका जी ने उन्हें डांट कर रोका और उस मामले मैं लीपापोती कर के उसे रफा-दफा कर दिया गया. एक प्रकार से रमणिका जी ने उस भूमिहार बलात्कारी लड़के को बचाने की पूरी कोशिश की जिसमें वह पूरी तरह सफल हो गई. उनके इस व्यवहार से उनके महिला वादी होने पर संदेह होता रहा है मुझे. मैं नहीं समझ पाया कि वह अपने लिखने, कहने और विचारधारा के उलट कैसे व्‍यवहार कर सकती हैं.

जैसा कि मैंने पहले बताया है कि वह फ्रंट में रहने के लिए कुछ भी किया करती. एक बार उन्होंने मुझे फोन किया संजीव जी आमिर खान से संपर्क करो. उन्होंने जो सत्य में जयते पर सफाई कामगारों के लिए एपिसोड बनाया है. उसमें मुझे भी ले ले मैंने भी तो मल मूत्र ढोता भारत पत्रिका विशेषांक निकाला था. इस तरह वे अपने असिस्टेंट उसे फोन करवाती. जिस पर में उन्हें कोई संकोच नहीं था. वह किसी भी संपादक को यदि लेख भेजती, तो उन्हें फोन जरूर करवाती है. जैसे उन्होंने यदि 10 संपादकों को लेख भेजा है. तो अपने असिस्टेंट से उन्हें फोन करने के लिए कहती है और वे स्वयं बात करती. वे जिस प्रकार लाल सलाम बोलने में संकोच नहीं करती थी ठीक उसी प्रकार वह जय भीम बोलने में भी संकोच नहीं करती थी. डॉक्टर अंबेडकर के द्वारा किए गए प्रयासों को वह खुले दिल से स्वीकार करती थी और उन्हें मंचों पर साझा भी करती. सक्रियता उनकी सबसे बड़ी खूबी रही है वह बेहद प्रोफेशनल और सक्रिय महिला थी. मौत के कुछ दिनों पहले भी वह मंचों पर देखी गई और जज्बे के साथ अपने बातों को भी रखती थी. उनका जाना निश्चित रूप से साहित्य और विचारधारा की दुनिया में एक बड़ी खाई है जिसकी क्षतिपूर्ति आसान नहीं है.

  • संजीव खुदशाह
  • (यह लेखक के अपने विचार हैं.)

गोरखपुर सीट पर आया बड़ा ट्विस्ट, निषाद पार्टी का गठबंधन को झटका

गठबंधन की घोषणा के दौरान सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ संजय निषाद (फाइल फोटो, फोटो क्रेडिटः HT)

लखनऊ। यूपी के सीएम और पूर्वांचल में भाजपा के बड़े चेहरे योगी आदित्यनाथ को एक बार फिर से गोरखपुर में हार का डर सताने लगा है. पिछले उपचुनाव में मिली हार के बाद योगी की काफी फजीहत हुई थी. कहा गया कि भाजपा का पूर्वांचल में सबसे मजबूत किला दरकने लगा है. यही वजह है कि 2019 आम चुनाव में गोरखपुर सीट को लेकर योगी कोई चूक करने को तैयार नहीं है. बड़ी खबर यह है कि सपा-बसपा-रालोद महागठबंध में शामिल होने के दो दिन बाद ही निषाद पार्टी ने खुद को गठबंधन से अलग कर लिया है. अलग होने के बाद निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की है. निषाद पार्टी के इस कदम से जहां सपा-बसपा हैरान हैं तो वहीं इससे गोरखपुर सीट पर नया समीकरण बनता दिख रहा है.

दरअसल निषाद पार्टी के गठबंधन में शामिल होने के बाद योगी को एक बार फिर गोरखपुर में हार का डर सताने लगा था. इसकी वजह यह है कि इस लोकसभा सीट पर निषाद वोट काफी अहम है. इसी वोट के जरिए योगी के यूपी के सीएम बनने के बाद खाली हुई इस सीट पर सपा अध्य़क्ष अखिलेश यादव ने संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को मैदान में उतारा था, जिसके बाद बसपा के समर्थन से प्रवीण निषाद ने जीत हासिल की थी. सपा-बसपा एक बार फिर इस सीट पर योगी को मात देने की तैयारी में जुटे थे. लेकिन ऐन वक्त पर संजय निषाद के इस कदम से भाजपा बढ़त लेती हुई दिखने लगी है. भाजपा पहले ही निषाद समाज के एक अन्य कद्दावर नेता रहे दिवंगत जमुना प्रसाद निषाद के परिवार को पार्टी में शामिल कर चुकी है.

23 साल बाद एक बार फिर भाजपा ने जमुना प्रसाद निषाद की पत्नी और पूर्व विधायक राजमति निषाद और उनके बेटे अमरेन्द्र निषाद को पार्टी में शामिल कर लिया है. इस परिवार के कद का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि सन् 1999 के लोकसभा चुनाव में जमुना प्रसाद निषाद ने भाजपा के योगी आदित्यनाथ को कड़ी टक्कर दी थी और वह मात्र तकरीबन 7 हजार वोटों से चुनाव हार गए थे. हालांकि उनकी मृत्यु के बाद यह परिवार समाजवादी पार्टी के साथ चला गया था. लेकिन मार्च के दूसरे हफ्ते में इसने एक बार फिर भाजपा का दामन थाम लिया था.

भाजपा यह मानकर चल रही है कि निषाद समाज के दोनों प्रमुख नेताओं को अपने पाले में लाकर वह गोरखपुर में अब निषाद समाज को भाजपा के पक्ष में एकजुट कर सकती है. अब देखना यह होगा कि भाजपा की इस रणनीति की काट मायावती और अखिलेश यादव कैसे निकालते हैं. गठबंधन के तरह गोरखपुर की सीट समाजवादी पार्टी के खाते में गई है.

पापा की पोलिटिक्स पर सोनाक्षी सिन्हा का बड़ा बयान

पिता शत्रुध्न सिन्हा के साथ सोनाक्षी सिन्हा (फाइल फोटो)

नई दिल्ली। फिल्म अभिनेता और राजनीतिज्ञ शत्रुध्न सिन्हा कांग्रेस ज्वाइन करने की तैयारी में है. पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी से उनकी मुलाकात हो चुकी है और सब कुछ तय हो चुका है. सिन्हा के 4 अप्रैल को कांग्रेस ज्वाइन करने की खबर है. ऐसे में उनकी बेटी और फिल्म अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा ने बड़ा बयान दिया है. सोनाक्षी ने कहा है कि “उनके पिता को यह काम पहले ही कर लेना चाहिए था.”

अपने पिता के फैसले को उनका निजी फैसला बताते हुए सोनाक्षी ने कहा कि “मुझे लगता है कि मुझे लगता है कि उन्होंने फैसला लेने में देरी कर दी. सोनाक्षी ने उम्मीद जताई की कांग्रेस के साथ वो और अच्छा काम करेंगे और अलग-थलग नहीं पड़ेंगे. सोनाक्षी ने कहा कि मेरे पिता अटलजी और आडवाणी जी के समय से ही पार्टी के सदस्य थे, इन नाते पार्टी में उनका बहुत सम्मान था, लेकिन मुझे लगता है कि हाल के दिनों में उन्हें वो सम्मान नहीं मिला, जिसके वो हकदार थे.”

सिन्हा कांग्रेस के टिकट पर पटना साहिब के अपने वर्तमान सीट से ही प्रत्याशी होंगे. वर्तमान में वह वहीं से सांसद हैं. भाजपा ने इस बार उनका टिकट काटते हुए रविशंकर प्रसाद को टिकट दिया है, हालांकि भाजपा के भीतर भी इसका काफी विरोध हो रहा है और प्रदेश के भाजपा कार्यकर्ताओं का एक गुट एक अन्य भाजपा नेता और राज्यसभा सदस्य आर. के. सिन्हा को पटना से चुनाव लड़ाने की मांग कर रहा था. फिलहाल पटना साहिब के सीट का मुकाबला दिलचस्प हो गया है.

बिहार में महागठबंधन की सीटों का ऐलान

पटना। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नीत महागठबंधन ने सीटों की संख्या के बाद घटक दलों के बीच सीटों का बंटवारा कर लिया है. आरजेडी ने अपने 18 सीटों के लिए उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है. साथ ही कांग्रेस ने भी अभी तक सात सीटों के लिए उम्मीवारों का ऐलान कर दिया है. प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ही वीआईपी और हम के उम्मीवारों की भी घोषणा कर दी गई. आरएलएसपी ने अभी अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा नहीं की है.

पटना में ज्वाइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सीटों और प्रत्याशियों के नाम का ऐलान किया गया. प्रेस कॉन्फ्रेंस में तेजस्वी यादव, पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी, वीआईपी पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी सहित अन्य घटक दलों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए. पीसी से कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहना झा और रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा नदारद रहे. ज्ञात हो कि यह प्रेस कॉन्फ्रेंस पहले गुरुवार को होनी थी, जिसे ऐन मोके पर टाल दिया गया था.

आरजेडी के खाते में आने वाली सीटें- भागलपुर, बांका, मधेपुरा, दरभंगा, वैशाली, गोपालगंज, सीवान, महाराजगंज, सारण, हाजीपुर, बेगूसराय, पाटलिपुत्र, बक्सर, जहानाबाद, नवादा, झंझारपुर, अररिया, सीतमढ़ी और शिवहर

कांग्रेस के खाते में आने वाली सीटें- किशनगंज, पूणिया, कटिहार, समस्तीपुर, मुंगेर, पटनासाहिब, सासाराम, वाल्मीकि नगर और सुपौल

आरएलएसपी के खाते में आने वाली सीटें- पश्चिमि चंपारण, पूर्वी चंपारण, उजियारपुर, काराकाट और जमुई

HAM के खाते में आने वाली सीटें- नालंदा, औरंगाबाद और गया

वीआईपी के खाते में मधुबनी, मुजफ्फरपुर और खगड़िया सीट आई हैं.

प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए तेजस्वी यादव ने कहा कि कई दिनों से उम्मीदवारों के नाम का इंतजार था. साथ ही उन्होंने कहा कि महागठबंधन अटटू है, यह जनता के दिलों का गठबंधन है. हम लोकतंत्र को बचाने के लिए लड़ रहे हैं. हमने दो चरणों के लिए उम्मीवारों की घोषणा पहले की कर चुके हैं.

महागठबंधन में जारी गतिरोध के बीच गुरुवार को काफी देर तक बिहार कांग्रेस के नेताओं की राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ घंटों तक बैठक चली थी. बैठक के बाद खबर आयी की आरजेडी के साथ सभी समस्याओं का हल निकाल लिया गया है. दरभंगा की सीट आरजेडी के खाते में गई है. ज्ञात हो कि महागठबंधन के घटक दलों के बीच सीटों की संख्या की घोषणा पहले हो चुकी थी.

Read it also-इतिहास की महाभारत हो या आज की महाभारत, जनता न जगी तो जनता का विनाश सम्भव है.

डॉ. लोहिया बीना सत्ता में गए भी एकछत्र राजा थे

0

डॉ. राममनोहर लोहिया की मृत्यु के बाद देश में शोक का जो सैलाब आया, उससे यह साबित हो गया कि महात्मा गांधी के बाद यदि सही माने में देश के करोड़ो गरीब, भूखे-नंगे इंसानों का कोई रहनुमा था तो वह थे डॉ. राममनोहर लोहिया. डॉ. लोहिया ने अपने को आम जनता में इस तरह से मिला दिया था कि अनजान आदमी के लिए, जो डॉ. लोहिया को पहचानता न हो, यह समझ सकना प्रायः असंभव था कि उनके बीच खड़ा व्यक्ति अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का महान नेता डॉ. लोहिया है अथवा कोई साधारण कार्यकर्ता. एक बार लोहिया जी कहीं जा रहे थे. मोटर गाडी पर उनके साथ और भी कई कार्यकर्ता थे. रास्ते में कोई हलवाई जलेबी छान रहा था. लोहिया जी ने गाड़ी रुकवा दी. उतर पड़े. कुछ गर्म-गर्म जलेबियाँ तौलाई गईं. चलने के समय जब दूकानदार को पैसे दिए जाने लगे तो खासी परेशानी पैदा हो गई. हुआ यह कि जब लोहिया जी जलेबी खाने में मशगुल थे तभी किसी तरह दूकानदार को पता चल गया कि डॉ. लोहिया हैं. फिर क्या था? दूकानदार पैसे लेने को तैयार ही नहीं हो और, लोहिया जी बिना पैसे दिये वहां से टलने को तैयार नहीं. दुकानदार का कहना था कि उसका सौभाग्य था कि डॉक्टर लोहिया ने उसकी दूकान पर जलेबी खाई, इसलिए वह पैसे नहीं ले सकता. लोहिया जी का कहना था कि यह हो नहीं सकता कि वे जलेबी खायें और पैसे न दें. बहस में समय बीत रहा था. अगली सभा में पहुँचने में देर हो रही थी. सभी लोग परेशान. अंत में लोहिया जी ने ही रास्ता निकाला. कहा- “अच्छा! एक काम करो. तुम इन जलेबियों के तो भरपाई पैसे ले लो, और अपनी ओर से एक जलेबी दे दो, जो खाकर मैं तुम्हारी बात रख दूँ.” दूकानदार भी इस शर्त पर समझौते के लिए तैयार हो गया. ऐसे थे डॉ. लोहिया, आम लोगों में मिल जाने वाले.

1965 में 10 अगस्त को गिरफ्तार होकर लोहिया जी हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में पहुंचे थे. चूँकि डॉ. लोहिया की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सर्वोच्च न्यायालय में विचारार्थ स्वीकृत हो चुकी थी और उसकी सुनवाई 23 अगस्त को होने वाली थी, इसलिए 20 अगस्त को लोहिया जी को हजारीबाग से दिल्ली ले जाया गया. जब वे वार्ड से विदा होने लगे राजनीतिक कैदियों से मिलने से पहले, उन्होंने परिचारकों से मिलना अधिक पसंद किया. सबसे पहले वे उस सेल में गये, जिसमें वार्ड का सफैया-योगीहरी रहता था. लोहिया जी को देखकर जैसे ही योगी अपने सेल से बाहर आया, लोहिया जी ने उसे पकड़ कर अपनी छाती से लगा लिया और कहने लगे – “जा रहा हूँ, पता नहीं फिर हम लोगों की भेंट होगी कि नहीं.” योगी लोहिया जी के आलिंगन में खड़ा अविरल रो रहा था और लोहिया जी उसकी पीठ थपथपा रहे थे. लगता था जैसे परिवार के दो सदस्य आपस में बिछुड़ रहे हों. उसके बाद लोहिया जी ने सभी परिचरों-पनिहा, रसोइया, पहरा, मेठ-सबको गले लगाया और बाद में राजनीतिक कैदियों की बारी आई, जिसमें किसी की पीठ थपथपाई, किसी को प्यार से चपत लगाई तो किसी से सिर्फ नमस्कार ही किया.

लोहिया जी अपने व्यवहार से किसी को भी मोह लेते थे. और, वह भी इस प्रकार से कि वह आदमी हमेशा के लिए उनका श्रद्धालु हो जाए. इसका बहुत बड़ा प्रमाण मिला था अक्टूबर 1967 में, लोहिया जी की बिमारी के समय. रीवां की वह पान वाली तथा दिल्ली का वह टैक्सी ड्राईवर. डॉ. लोहिया पान नहीं खाते थे. फिर भी आदमी तो मौज वाले थे न ! मौज में आ गया और कभी रीवां में एक बूढी पान वाली से पान खा लिया. लेकिन वह पान भी ऐसा जैसे विदुर के घर कृष्ण ने साग खा लिया. वह पान वाली हो गई डॉक्टर लोहिया की भक्त. जब लोहिया जी की बिमारी की खबर उसने सुनी तो एकमात्र अपनी रोटी का सहारा-दूकान बंद करके चल पड़ी दिल्ली की ओर. दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल के हाते में, आँगन में, वह बूढी पान वाली बैठी रहती थी और बराबर हाथ जोड़कर डॉ. लोहिया की जिन्दगी के लिए भगवान से प्रार्थना करती रहती थी. जब कोई कह देता कि लोहिया जी को अभी कुछ आराम हैं तो ख़ुशी से उसका चेहरा चमक उठता और यदि कोई बिमारी बढ़ जाने की खबर कह देता तो उसका चेहरा उतर जाता था. इसी प्रकार वह टैक्सी ड्राईवर भी सिर्फ उतनी ही देर तक अपनी टैक्सी चलाता, जितनी देर में मालिक को देने भर कमा लेता. और, बाकी समय अस्पताल में बैठा रहता. इस तरह डॉक्टर लोहिया ने अपने को आम जनता में बिल्कुल एकाकार कर लिया था. यही कारण है कि डॉ. लोहिया बीना सत्ता में गए भी एकछत्र राजा थे-जनता के हृदय के राजा.

नीरज कुमार

Read it also-वैज्ञानिक कथाकार नरेंद्र मोदी का राष्ट्र को संबोधन और चुनाव आयोग का समापन

इतिहास की महाभारत हो या आज की महाभारत, जनता न जगी तो जनता का विनाश सम्भव है.

महाभारत युद्ध शुरू होने की महक फिजाओ में गूंज रही है. शहरों से लेकर गांव और गांव के मोहल्लों में चर्चाओं का दौर जारी है. जहाँ भी दो लोग इकठ्ठा हो रहे है बस एक ही चर्चा युद्ध, युद्ध और सिर्फ युद्ध पुरे वातावरण में एक डर का माहौल व्याप्त है. युद्ध होगा तो कौन जीतेगा, कौन हारेगा. किसको कितना नुकसान होगा, किसको कितना फायदा होगा. किसके खेमे में कौन धुरंदर है. गद्दी किसको मिलेगी. सारा गणित लगाया जा रहा है इसके अलावा भी बहुत सी चर्चाये चल रही है.

कोई दुर्योधन को ठीक बता रहा है तो कोई युधिष्ठिर को, गद्दी का असली वारिस कौन, दुर्योधन का अपमान से लेकर द्रोपती चीरहरण, जुआ, लाखशाह ग्रह, वनवास सब मुद्दों पर चर्चाये है. लोग बंटे हुए है खेमो में. चर्चाये दबी जुबान चल रही है क्योंकि लोकतंत्र थोड़े ही है जो आप खुल कर आवाज बुलंद करो.

कुछ लोग इनसे अलग भी चर्चाये कर रहे है. वो दोनों खेमों की आलोचना करते हुए बोल रहे है कि ये जो युद्ध होने वाला है ये सिर्फ सत्ता पर कब्जे के लिए होने वाला है. इसमें सबसे ज्यादा नुकशान पशुपालक, किसान, दस्तकार मतलब आम जनता का ही होगा. इनकी सत्ता की लालसा में जो मारे जायेगे वो आम लोग होंगे. ये लड़ाई कोई धर्म की लड़ाई नही है. ये लड़ाई गद्दी की लड़ाई हैं. दोनों खेमे ही लुटेरे है. इसलिए लड़ाई ही लड़नी है तो अपने लिए लड़े.

ऐसे लोगो की बाते अनसुनी की जा रही है. ऐसे लोगो को धर्मद्रोही, देश द्रोही की संज्ञा दी जा रही है. ऐसे लोगो को जेल में डाला जा रहा है या मरवाया जा रहा है. दोनों खेमो द्वारा गांव, कस्बो के मुखियाओं को अपनी तरफ करने के लिए मीटिंगे की जा रही है. राजशाही है तो जिधर मुखिया उधर वहां की जनता ये तो लाजमी है, फोन मत रखना अभी पिक्चर बाकि है.

युद्ध के खर्चे के लिए किसानों का लगान बढ़ा दिया गया है. हथियार फैक्ट्रियों में जबरदस्ती नौजवानों की भर्तियां की जा रही है. युद्ध का उन्माद जोरों पर है. धर्म के धुरंधर, धार्मिक प्रवर्तक अपने-अपने खेमे के पक्ष में माहौल तैयार कर चुके है. प्रचार भोंपू जिनका काम तो था जनता को सच्चाई बताना लेकिन उन्होंने भी सत्ता की मलाई खाने के चक्कर में जनता से गद्दारी करते हुए जनता की आँखों पर काली पट्टी बांधने का काम किया.

अब वो दिन भी आ ही गया जिस दिन युद्ध होगा. आचार संहिता लग गयी. नियम कानून सुना दिए गए. दोनों खेमों की सेनाएं आमने-सामने आ डटीं है. सेनाओं में सैनिक जो कुछ दिन पहले किसान या मजदूर था लाल आँखे किये पुरे उत्साह में दुश्मन खेमें को हराने के लिए लालायित खड़े है. सेना में भी दोनों तरफ रिश्तेदार आमने-सामने है. किसी का जीजा इस तरफ है तो साला उस तरफ है, किसी का ससुर उस तरफ है तो दामाद इस तरफ है. लेकिन युद्ध का उन्माद जिसको धर्म की लड़ाई की संज्ञा दी गयी थी उसने सब रिश्ते नातो को ताक पर रख कर एक दूसरे की जान लेने के लिए लोगो को अँधा बनाकर आमने-सामने ला खड़ा किया है. युद्ध शुरू हो चूका है दोनों तरफ से लाशें गिर रही है. मरने वाले दोनों तरफ से आपसी रिश्तेदार है. चारो तरफ मातम पसरा हुआ है. महिलाएं विधवा हो रही है. किसी का बेटा मर रहा है तो किसी का बाप मर रहा है. चारो तरफ चिताएं जल रही है. लाशों को ढोने के लिए कंधे कम पड़ गए है. आँखों से आँशु सूख गए है. गांव मोहल्लों में सिर्फ महिलाएं और बुजर्ग बचे हुए है, मातम मनाने के लिए वो एक दूसरे के मर्गत में भी जा रहे है. मर्गत में बैठने, सात्वना देने इसके साथ ही उलाहना देने भी, कोई बोल रहा है कि मेरे बेटे को तो उसके जीजा ने, उसके फूफा ने या उसके साले ने मारा है. इस सब में सबसे पीड़ित है, वो है महिलाएं जिनके मरने वाले भी और मारने वाले भी दोनों ही परिवार से ही है.

किसी के पति को उसके भाई ने ही मारा है तो किसी के भाई, भतीजे को पति ने मारा है. जो अपँग हुआ है वो इलाज के लिए कराह रहा है. युद्ध ने लोगो का सब कुछ छिन लिया है. लोगो की आँखों से युद्ध की काली पट्टी धीरे-धीरे खिसक रही है. उनको अब वो देश द्रोही, धर्म द्रोही याद आ रहे है. लेकिन अब पछताये क्या होत है, जब चिड़िया चुग गयी खेत…

तीर कमान से निकल चुका था जो विनाश करके ही वापिस लौटेगा. विनाश हो चूका था. जिधर देखो उधर विधवा, उधर लाशें, उधर अपँग जीतने वालो को गद्दी मिल गयी. गद्दी पर बैठते ही शासक ने जनता पर नए-नए कर थोप दिए. नये-नये जनता विरोधी फरमान जारी कर दिए गए. महाभारत से लेकर आज तक कितने ही युद्ध हुए है. उन्होंने सिर्फ विनाश ही किया. लेकिन एक भी युद्ध जनता के लिए नही लड़ा गया. युद्ध अपनी लूट को जारी रखने या लूट तंत्र पर कब्जे के लिए लड़ा गया. जनता को प्रत्येक युद्ध ने विनाश के कगार पर ही पहुंचाया है.

कासिम, गजनी, गोरी, बाबर, अकबर, सिंकदर, पृथ्वीराज, सुग्रीव, विभीषण, सांगा, महाराणा प्रताप, मान सिंह, या अंग्रेज सबने युद्ध गद्दी के लिए किये. कोई धार्मिक चोला पहन कर आया तो कोई व्यापारी बन कर आया. लेकिन ध्ये सिर्फ एक, सत्ता पर कब्जा.

समय बदला इस समय को बदलने में देश द्रोहियो, धर्म द्रोहियो का अहम रोल रहा, जनता भी कुछ जागरूक हुई की इन युद्ध में सबसे ज्यादा नुकसान हमारा और फायदा लुटेरे शासक का होता है. अब नए समय में नया कानून बना. कानून कहता की सत्ता पर कब्जे के लिए तलवार की जरूरत नही होगी, सत्ता लूट के लिए नही बनी, सत्ता लुटेरो को लगाम लगाने के लिए होगी. सत्ता बहुमत मेहनतकश आवाम की रक्षा के लिए होगी. सत्ता हाशिये पर खड़े लाइन के आखिरी इंसान के लिए भी होगी. सत्ता सबकी होगी. सत्ता का चुनाव जनता करेगी. अब राजा आसमान से उतरकर नही आएगा, राजा जनता के अंदर से ही होगा.

जनता खुश हुई. वो खुशियां मना रही थी. वो फूल बरसा रही थी. अबकी बार फूलो की बारिस आसमान से नही जमीन से ही हो रही थी क्योंकि ये जनता की जीत थी, आसमानी लोगो की नही अब न युद्ध होगा और न कोई अपनों को खोयेगा. अपनी है धरती अब अपना वतन है, अपनी है सत्ता अपना है चमन

लेकिन आसमान से आने वालों और उनके समर्थक धार्मिक पर्वतको में बैचनी, विचलन चल रही थी. अब उनको भी खाना खाने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी. उनको भी आम जनता की तरह आम जिंदगी व्यतीत करनी पड़ेगी. उनको भी पालकी की जगह जमीन पर चलना पड़ेगा. हल-फावड़ा चलाना पड़ेगा, मजदूरी करनी पड़ेगी. घोर कलयुग आ गया ऐसे शब्द इन आसमानी लोगो के मुंह से सुने जा रहे रहे. आँखों के आगे अँधेरा छा रहा था. लेकिन इसी अँधेरे में जाति, धर्म, अंधराष्ट्रवाद ने एक नई आशा जगाई, अँधेरे में एक नई रोशनी की किरण दिखी. बस लुटेरे को अपना चोला बदल कर आम आदमी वाला चोला पहनना था बाकि काम जाति, धर्म, अंधराष्ट्रवाद ने करना था.

नई व्यवस्था पहले वाली से हजार गुणा बेहतर है लेकिन इसमें भी लुटेरा शासक अपनी जगह अप्रत्यक्ष तौर पर बनाये हुए है. उसने अब भी गद्दी के लिए समय-समय पर युद्ध करवाये, जातिय, धार्मिक दंगे करवाये. युद्ध का विरोध करने वाले अब भी देश द्रोही, धर्म द्रोही की संज्ञा से नवाजे गये. अब भी जेल से लेकर मौत तक उनका दमन जारी है.

एक बार फिर 2019 में सत्ता के लिए युद्ध का शंखनाद हो चूका है. धर्म-जात के प्रवर्तक जनता की आँखों पर पट्टी बांधने के लिए मैदान में पहुंच चुके है. प्रचार भोंपू भी लुटेरी सत्ता के प्रति अपना फर्ज ईमानदारी से निभा रहे है. जनता की पट्टी का काला रंग और काला करने के लिए सैनिको का बलिदान दिया जा रहा है. दोनों ही खेमे इस युद्ध को भी धर्म की रक्षा, राष्ट्र की रक्षा की जीत का नाम देकर मैदान में आ डटे है. मन्दिरो में आरती- घन्टाल बजाये जा रहे है, मस्जिदों, गुरद्वारों में मत्थे टेके जा रहे है.

“बुढ़ापे के कारण महाभारत में दादा भीष्म की और वर्तमान में अडवाणी की अवस्था नगण्य हो चुकी है. अब वो चला हुआ कारतूस के समान हो चूके है. जिस दादा भीष्म ने इस साम्राज्य को मजबूत खड़ा किया. आज वो तीरों की सन्यां पर लेटा हुआ अपने साम्राज्य के आखिरी दिन देख रहा है. अपनी ताकत का लोहा पुरे भारतवर्ष में मनवाया. उसकी आज हालात देखने लायक है. बुढ़ापा बैरी होता है सुना था, आज देखा भी जा रहा है. कोई आँशु भी पोछने नही आएगा ऐसा तो सपने में भी नही सोचा था. चलो छोड़ो इनको क्योकि जैसा बोयेगा वैसा ही काटेगा.” हम जनता पर आते है –

जनता भी खेमों में बंट कर मंदिर-मस्जिद, कश्मीर, भारत-पाकिस्तान पर उलझी हुई है. वो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की जरूरी मुलभुत समस्याओं को भूल गयी है. उसको न शिक्षा चाहिए, न रोजगार और न इलाज चाहिए. उनको न पूरी मजदूरी चाहिए न पूरा फसल का दाम चाहिए और न ही रोटी-कपड़ा-मकान चाहिए. उनको युद्ध, युद्ध और सिर्फ युद्ध चाहिए…

युद्ध जब विनाश कर चूका होगा तब ये देश द्रोही, धर्म द्रोही की संज्ञा से नवाजे हुए मुसाफिर याद आएंगे.

उदय चे इसे भी पढ़ें-महागठबंधन के लिए कांग्रेस ने खड़ी की मुश्किल

क्या मायावती पर बन रही है फिल्म? विद्या बालन को कास्ट किए जाने की चर्चा

0

बॉलीवुड में राजनेताओं की रियल लाइफ पर बन रही फिल्मों की कड़ी में एक और नाम शामिल हो गया है. डॉ. मनमोहन सिंह, बाल ठाकरे, एनटी रामाराव, नरेंद्र मोदी और जयललिता के बाद अब देश में दलित राजनीति को ताकतवर बनाने वाली मायावती के जीवन ने फिल्मकारों को आकर्षिक किया है.

सूत्रों के आधार पर पिंकविला ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती पर भी बॉयोपिक बन सकती है. इस फिल्म का निर्देशन सुभाष कपूर कर सकते हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ मायवती की बॉयोपिक के लिए बॉलीवुड एक्ट्रेस विद्या बालन को कास्ट किया जा सकता है. हालांकि जब इस सिलसिले में सुभाष कपूर से बात की गई तो उन्होंने खुद को लेकर आ रही ख़बरों को खारिज कर दिया.

वैसे अगर रिपोर्ट्स की बात सच साबित हुईं तो ये विद्या बालन के लिए बड़ा मौका होगा. बता दें विद्या बालन, फिलहाल एक वेब सीरीज पर भी काम कर रही हैं. इसमें वो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रोल निभा रही हैं.

बताने की जरूरत नहीं कि मायावती भारत की राजनीति में पिछले ढाई दशक से एक बड़ी ताकत के रूप में नजर आती रही हैं. उन्होंने अलग अलग टर्म में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में काम किया है. उन्हें लेकर राजनीति में कई विवाद और आरोप भी हैं. अब ये देखने वाली बात होगी कि मायावती की बॉयोपिक बनती है तो उसमें उनकी जिंदगी के किन पहलुओं पर रोशनी डाली जाएगी.

इससे पहले सुभाष कपूर, ‘मोगुल’ नाम की बॉयोपिक पर काम करने वाले थे. लेकिन सुभाष पर मीटू के तहत आरोप लगा और उन्हें इस प्रोजेक्ट से हाथ धोना पड़ा.

साभार-आजतक

वैज्ञानिक कथाकार नरेंद्र मोदी का राष्ट्र को संबोधन और चुनाव आयोग का समापन

0

अगस्त 2008 की एक सुबह हम चेन्नई से श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर पहुंचे थे. दुनिया भर से आए दर्जनो अंतरिक्ष-पत्रकारों के बीच मैं गांव गली कवर करने वाला भी पहुंच गया था. भारत अपना पहला मून मिशन चंद्रयान का प्रक्षेपण करने वाला था. वहां दुनिया भर से आए ऐसे पत्रकार थे जो कई वर्षों से अंतरिक्ष प्रक्षेपण कवर कर रहे थे. यही उनका कार्यक्षेत्र भी था. वे भारत की कामयाबी को शक और हैरत से देख रहे थे. भारत की तरफ से दो चार ही अनुभवी पत्रकार थे. बाकी फ़ोटो खींच रहे थे और वीडियो बना रहे थे.

बहरहाल बारिश की बूंदें कुछ सेकेंड के लिए रूकी और उतनी ही देर में चंद्रयान अपने लक्ष्य की तरफ निकल गया. वह क्षण देखना और दर्शकों को दिखाना दोनों ही गर्व का था. उसके बाद हम सभी छत से उतर कर एक बड़े से सभागार में लाए गए, जहां चंद्रयान प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिकों ने हम सबको बताया. उस समय इसरो के प्रमुख जी माधवन थे. सैंकड़ों कैमरे के सामने देश के वैज्ञानिक देश से बात कर रहे थे. उसके बाद के कुछ दिनों तक वही वैज्ञानिक कई न्यूज़ चैनलों में जाकर अपनी कामयाबी के बारे में बता रहे थे.

2008 की कामयाबी मामूली नहीं थी. तब भी भारत में एक प्रधानमंत्री थे जिनका नाम मनमोहन सिंह था. उन्होंने बधाई दी और बाकी वैज्ञानिकों पर छोड़ दिया कि वे देश से संवाद करें. सैंकड़ों कैमरों के सामने इसरो के वैज्ञानिक थे. मनमोहन सिंह और उनसे पहले के किसी प्रधानमंत्री ने इसरो की कामयाबी को अपने चुनावी पोस्टर में इस्तमाल नहीं किया. बुधवार को मिशन शक्ति के सफल होते ही व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में मिसाइल की फ़ोटो के साथ नरेंद्र मोदी के पोस्टर बनकर चलने लगे थे.

यही नहीं 27 मार्च को जब भारत ने ए-सैट मिसाइल क्षमता का परीक्षण किया तो कैमरों के सामने से सारे वैज्ञानिक ग़ायब कर दिए गए. सिर्फ और सिर्फ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामने थे. इस कामयाबी की एक ही तस्वीर जनता के बीच पहुंची है. राष्ट्र के नाम संबोधन वाली नरेंद्र मोदी की तस्वीर. उनके सहयोगी इसे फ़ैसला लेने वाली सरकार की कामयाबी बताते रहे. प्रक्षेपण और परीक्षण के समय जश्न मनाते वैज्ञानिकों की तस्वीरें भी नज़र नहीं आईं.

NDTV के आर्काइव में – 19 अप्रैल 2012 का एक वीडियो फ़ुटेज है. उस समय भारत ने लो-ऑरबिट में उपग्रह को मारने वाली मिसाइल अग्नि-V का सफल परीक्षण किया था. वीडियो में तब के DRDO के निदेशक जश्न मनाते दिख रहे हैं. 27मार्च 2019 को भी DRDO के निदेशक पद पर डॉ. जी सतीश रेड्डी विराजमान हैं मगर वे मीडिया से ग़ायब थे. उनकी टीम ग़ायब थी. उनकी जगह DRDO से रिटायर और इस समय नीति आयोग के सदस्य बन चुके विजय सारस्वत मीडिया में इसके बारे में ज्ञान दे रहे थे. मौजूदा चेयरमैन और वैज्ञानिक देश के सामने से ग़ायब रहे. एक रिटायर किया हुआ चेयरमैन ज्ञान दे रहा था ताकि वह इसी बहाने यूपीए सरकार पर टिप्पणी कर सके कि उसने मिशन शक्ति की अनुमति नहीं दी. बाद में इन्हीं के बयान के सहारे अरुण जेटली बीजेपी मुख्यालय में कांग्रेस पर हमला कर रहे थे. मौजूदा चेयरमैन यह बात नहीं कह सकते थे क्योंकि चुनाव के कारण आचार संहिता लागू है.

जबकि इसी वी के सारस्वत ने 10 फ़रवरी 2010 को कहा था कि भारत के पास उपग्रह को मार गिराने वाली मिसाइल क्षमता है लेकिन वह असली उपग्रह को मार कर अपनी क्षमता का प्रदर्शन नहीं करेगा. भारत इसकी ज़रूरत महसूस नहीं करता क्योंकि इससे अंतरिक्ष में कचरा पैदा होता है. इन कचरों से अंतरिक्ष में उपग्रहों के सिस्टम को नुक़सान पहुंचता है. उस समय DRDO चीफ़ रहते हुए वी के सारस्वत ने जो कहा मान लिया गया. आज वही नीति आयोग के सदस्य बनकर सारस्वत यूपीए सरकार को निशाना बना रहे हैं. आप इनके बयान को इंटरनेट में सर्च कर सकते हैं. नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार की तरह वी के सारस्वत ने भी आचार संहिता का उल्लंघन किया है.

ज़ाहिर है यह राजनीति है. इसरो और रक्षा अनुसंधान का इस्तमाल नरेंद्र मोदी अपने राजनीतिक हित के लिए कर रहे हैं. उनका राष्ट्र के नाम संबोधन करना और कुछ नहीं बल्कि मतदाताओं को प्रभावित करना था. वे पुलवामा के बाद ऐसा कुछ चाहते थे जिससे पांच साल की नाकामी पर चर्चा और सवाल ग़ायब हो जाएं. जो संवाददाता उज्ज्वला योजना की ख़ामियों की रिपोर्टिंग ठीक से नहीं कर पाते वही बुधवार को दिन भर अंतरिक्ष विज्ञान के एक्सपर्ट बन गए. उनकी रिपोर्टिंग में विज्ञान कम था. मोदी का गुणगान था और विपक्ष का उपहास.

सितंबर 2014 से इसरो देश के नाम पर भाजपा और नरेंद्र मोदी की राजनीति का केंद्र बन गया था जब मंगलयान के समय प्रधानमंत्री मोदी ख़ुद वैज्ञानिकों के बीच मौजूद थे. उसी दिन तय हो गया था कि भारत की वैज्ञानिक कामयाबी वैज्ञानिकों की नहीं होगी, प्रधानमंत्री मोदी की होगी. चीन ने भी इस क्षमता का परीक्षण किया मगर उसने टीवी पर आकर दुनिया को नहीं बताया. यही परंपरा रही है. अंतरिक्ष विज्ञान की कामयाबी वैज्ञानिकों पर छोड़ दी जाती है. लेकिन अब यह सब मोदी के लिए प्रोपेगैंडा का हिस्सा भर हैं.

चुनाव आयोग नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन की जांच कर रहा है. आयोग के क़ानूनी सलाहकार रहे मेंदीरत्ता ने ‘द प्रिंट’ से कहा है कि उन्होंने आचार संहिता लागू होने के बाद किसी प्रधानमंत्री को कभी ऐसा करते नहीं देखा. प्रधानमंत्री ने संबोधन में ऐसे बहुत से शब्दों का प्रयोग किया है जिनका इस्तमाल अपने राजनीतिक मंचों पर करते रहे हैं. यह मामला चुनाव आयोग का इम्तिहान है. मुझे संदेह है कि आयोग कुछ करेगा. वह बहाने ढूंढ लाएगा. क्या हम एक संस्था के रूप में चुनाव आयोग का समापन देख रहे हैं? समापन का सीधा प्रसारण!

साभार- NDTVइंडिया इसे भी पढ़ें-अब ट्रेन से अयोध्या जाएंगी प्रियंका गांधी

अलविदा रमणिका गुप्ता: आपने सार्थक जीवन जीया, समाज को बहुत कुछ दिया

0

जानी मानी कवि, कथाकार एवं चिंतक तथा पत्रकार रमणिका गुप्ता का जन्म 22, अप्रैल 1930 को पटियाला रियासत के सुनाम गांव में हुआ. उन्हें बचपन से ही स्वतंत्राता आंदोलन के प्रति भारी लगाव था. वे बचपन से ही मुखर और दबंग थी और शोषण का खुलकर विरोध करती थीं. वे पटियाला के संभ्रात बेदी कुल में पैदा हुई. उनके पिता स्वर्गीय डाक्टर लेफ्टीनेन्ट कर्नल प्यारेलाल बेदी थे. रमणिका गुप्ता की शिक्षा विक्टोरिया कॉलेज पटियाला में आई.ए. तक हुई. जब वे आई.ए. में पढ़ती थीं तो विक्टोरिया कॉलेज फॉर वूमेन, पटियाला में आई.एन.ए. (सुभाष चन्द्र बोस की फौज) के समर्थन में उन्होंने अपने कॉलेज में हड़ताल कराने का प्रयास भी किया था. इस पर कॉलेज में उनकी केनिंग भी की गई थी. रमणिका जी अरूणा आसफअली और गांधी की अनन्य भक्त रहीं. रमणिका जी साहित्य, कविता, अभिनय, नृत्य के साथ-साथ खेल-कूद में भी शिरकत करती थीं. वे कॉलेज की चैम्पियन, नेटबॉल की कैप्टन होने के साथ-साथ वाद-विवाद में भी बहुत हिस्सा लेती थीं.

इस कम उम्र में भी उन्होंने 1946-47 में देश के बंटवारे के क्रम में जो भूमिका अपनाई वह व्यवस्था के प्रतिरोध की थी. उन्होंने 14 साल की उम्र में ही खादी पहननी शुरू कर दी थी. उन्होंने दंगों का विरोध किया और जिन मुसलमान लड़कियों को दंगाई जबरदस्ती उठा कर ले गए थे उनके संबंध में सार्वजनिक तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्रा गुरुमुख सिंह मुसाफिर और डॉ. सुशीला नैयार के समक्ष महारानी पटियाला की उपस्थिति में कहा कि रियासत के अफसरों के घरों में वे लड़कियां हैं. इसका परिणाम यह हुआ कि उनको पटियाला रियासत के बाहर अम्बाला शहर में मामा के यहां भेज दिया गया. विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि उन्होंने बेदी कुल की होने के बावजूद वेद प्रकाश गुप्ता, जो अंबाला में उनके मामा की मातहती में सहायक नियोजन पदाधिकारी थे, से 1948 में अन्तर्जातीय प्रेम-विवाह सिविल-मैरिज विधि से किया.

उनके मात-पिता और संबंधियों ने इसका कड़ा विरोध किया लेकिन उन्होंने वही किया जो उन्हें उचित लगा. शादी के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और बी.ए., एम.ए. तथा बी.एड. की परीक्षाएं पास की.

उनका जीवन, संघर्ष का वृत्तांत है और उनका लेखन उस वृत्तांत का प्रतिबिंब. अपना जीवन समाज सेवा में न्योछावर कर चुकीं रमणिका गुप्ता की एक संघर्षशील छवि है. जहां वे सामाजिक परिवर्तन, बराबरी और भाईचारे के अपने सपने को साकार करने में कार्यरत थीं, वहीं वे दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों, मजदूरों, किसानों और खेतिहर मज़दूरों के अधिकार के लिए निरंतर तत्पर रहती थीं. धार्मिक, जातीय व रूढ़ियों को दूर करने हेतु वे दृढ़ संकल्प थीं. वे सांप्रदायिक सद्भाव की मुहिम एक अभियान के रूप में चलाती रही थीं. उन्होंने चीन-भारत युद्ध के समय नागपुर जा कर सिविल डिफेन्स का प्रशिक्षण भी लिया. धनबाद में वृहद कवि सम्मेलन का आयोजन टैबेल्यू, कविता-पाठ और नृत्य के शो पेश करके देश के रक्षा-कोष हेतु हजारों रुपए का कोष संग्रह करवाया. खतरा उठा कर भी हर प्रकार के अन्याय का विरोध करना उनकी आदत थी. वे कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी में सक्रिय थीं और इस पार्टी की ओर से कोयला खानों की मजदूर यूनियन की अध्यक्ष व सी.आई.टू. झारखण्ड की उपाध्यक्ष थीं. वे सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक के साथ-साथ राजनीतिक-आर्थिक दायरों में एक साथ और समान तत्परता से सक्रिय थीं.

झारखंड के कोयलांचल में उनका पर्दापण 1960 में हुआ जब उनके पति वेदप्रकाश गुप्ता सहायक लेबर कमिश्नर के रूप में धनबाद आए. उनके साथ रमणिका गुप्ता भी आईं जो तब तक बी.एड़ तथा हिंदी में एम.ए. कर चुकी थीं. वे दो लड़कियों और एक लड़के की मां भी बन चुकी थीं. दरअसल धनबाद में ही उन्होंने सक्रिय रूप से राजनीति में प्रवेश किया और एक नेतृत्वकारी भूमिका अदा की. पहले वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में रहीं और उस पार्टी द्वारा संचालित अभियानों और आंदोलनों के नेतृत्व किया.

1965 में उनके पति वेदप्रकाश गुप्ता का तबादला कानपुर हुआ तो उन्हें धनबाद छोड़कर पति एवं बाल-बच्चों के साथ जाना ठीक नहीं लगा. वस्तुतः वे वहीं अपना कार्यक्षेत्रा बना चुकी थीं. धनबाद में वे समाज-सेवा से भी जुड़ीं तथा बच्चों की बालवाड़ी और महिलाओं का प्रशिक्षण केन्द्र खोला, जिसमें वे महिलाओं को काम भी दिलाती थीं ताकि वे कुछ आर्थिक उर्पाजन भी कर सकें. उन्होंने सोशल वैलफेयर बोर्ड के तहत 5 गांवों में सेंटर भी खोलें.

उनके द्वारा संपादित एवं प्रकाशित पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ उनके जीने के सृजन और लिखने के सृजन के बीच सेतु की तरह है. यह पत्रिका अपने नाम से ही आम आदमी की युद्धरत स्थिति उजागर करती है. उनके साहित्य में उनके जीवन की ललक है. उन दिनों उनकी कविताµ‘रंग-बिरंगी तोड़ चूड़ियां हाथों में तलवार गहूंगी मैं भी तुम्हारे संग चलूंगी मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी’ बहुत लोकप्रिय हुई थी.

1967 में बिहार में पड़े अकाल के दिनों में वे सक्रिय रहीं और कई गांवों में लंगर चलाए.

1967 में रमणिका जी कच्छ आंदोलन में गईं. जार्ज फर्नाडीज के साथ दो बार गिरफ्तार हुईं. आंदोलन में उन्हें इतनी मार लगी थी कि वे बेहोश हो गईं.

1968 में वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर मांडू क्षेत्रा से चुनाव लड़ीं जो एक उपचुनाव था. ये सीट राजा कामख्या नारायण ने खाली की थी. चुनाव के दरम्यान ही उन्होंने गोमिया में पानी की लड़ाई लड़ी. मांडू क्षेत्रा पानी की कमी वाला क्षेत्रा रहा है. उस समय मांडू क्षेत्रा में गोमिया, माण्डू एवं चुरचू प्रखंड थे. चुरचू का थोड़ा भाग छोड़कर बाकी सब खनन् क्षेत्रा था. वे केवल 700 वोटों से चुनाव हारीं जबकि उस सीट पर कांग्रेस के मंत्रियों तक की जमानत जब्त हो जाया करती थी. उन्होंने जनता से जो वायदा किया था, उन्होंने उसे निभाया और मांडू में ही रह गईं. टाटा की वेस्ट बोकारो कोलयरी में लड़ कर मजदूरों के बच्चों के लिए हाई स्कूल का भवन बनवाया और स्कूल चलवाया. पानी देने एवं छोटानागपुर के आदिवासियों के जंगल के अधिकारों, जल-जंगल-जमीन और लाठा-छावन और जलावन की जबरदस्त लड़ाई भी सन् 1969 में ही उन्होंने छेड़ी और सफल हुईं.

मांडू क्षेत्रा के पहला चापाकल बंजी गांव में टाटा ने लगवाया जो अब भी इस आंदोलन का गवाह है. पानी के आंदोलन के चलते जनता उन्हें ‘पानी की रानी’ कहने लगी. लाठा, छावन, जलावन के लिए ‘कूप’ की और जल-जंगल-जमीन के अधिकार तथा डिमॉर्केशन में जोती गई जमीन रैयत को वापिस दिलाने की लड़ाई में वे पुराने हजारीबाग जिले के आदिवासियों को जेल भरो अभियान में साथ लाने में सफल हुईं. आठ हजार एकड़ जमीन के करीब मुक्त कराई गई. जंगल के सिपाहियों द्वारा महिलाओं पर किए जा रहे जुल्म के खिलाफ, उन्होंने ‘घूस नहीं अब घूसा देंगे’ का आंदोलन वहां की आदिवासी जनता को साथ लेकर चलाया. पतरातू स्वांग और खुदगड्डा में पानी का आंदोलन भी चलाया. कोलमाइंस में ‘कोयला श्रमिक संगठन’ के नाम से यूनियन बनाई. राजा और टाटा की खदानों में यूनियन बनाकर माफिया और ठेकेदारों के विरुद्ध ऐतिहासिक संघर्ष भी किया और कई बार शारीरिक तौर पर प्रताड़ित भी हुईं. उन दिनों एन.सी.डी.सी. की सरकारी कोयला खदानों में झाडू लगाने वाले स्वीपर भी राजस्थान से लाए जाते थे. इसके विरोध में स्वांग और कथारा कोलयरी में 1969 में ही उन्होंने स्थानीय लोगों के रोजगार की लड़ाई शुरू की जिसमें भारी संख्या में लोग जेल गए.

यूनियन के माध्यम से उन्होंने ठेकेदारी प्रथा के खिलाफ राजाराम गढ़ की केदला-झारखंड की खदानों में भीषण संघर्ष छेड़ा और ठेकेदारों, लठैतों, माफिया का सामना कर, मजदूरों के अधिकार दिलाए. लोकसभा की याचिका-समिति के सामने भी उन्होंने याचिका दायर की.

हमारा काम क्या है, लिख कर दो/ हमारा नाम क्या है लिखकर दो/ वेतन क्या है लिखकर दो/ हम कौन हैं लिखकर दो – के नारे मजदूरों को दिए जो पूरे कोयला क्षेत्रा में गूंज उठे. इन मांगों को लेकर उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. रैलीगढ़ा और कुजु क्षेत्रा की खदानों में खदानों के मालिकों और ठेकेदारों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा तो ठेकेदारों, पहलवानों ने इन पर जानलेवा हमला किया, जिसमें इनका बायां हाथ और कालरबोन टूट गई. लाठियों के इक्कीस घाव शरीर पर लगे तथा भाला से आंख का ऊपरी हिस्सा कट गया. इन पर कई बार जानलेवा हमले हुए और एक लम्बा संघर्ष छिड़ गया. इन्होंने सदैव किसान व मजदूरों को मिलाकर लड़ाईयां लड़ीं. हड़ताल के दौरान मजदूर आठ आना चौका पर मिट्टी काटते रहे. वे चूहे की बिलों से धान चुनकर लाते और वही उबाल कर खाते रहे पर हारे नहीं, झुके नहीं. केदला माइंस के राष्ट्रीयकरण के लिए उन्होंने वृहद संघर्ष छेड़ा. केदला माइंस में लगभग सवा साल तक हड़ताल चली और तब जाकर कहीं खदानें सरकारी हुईं.

कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद वे अपील कमेटी की मैम्बर बनीं और हजारों लोगों को नौकरी दिलाई, जिसमें महिलाएं भी थीं. पर महिलाओं की नौकरी में काफी दिक्कत हुई. अधिकांश स्त्रा-कामगारों की छंटनी कर दी गई. वे 1972-73 एवं 1974-79 तक में कांग्रेस की तरफ से बिहार विधान परिषद की सदस्य (एम.एल.सी.), कांग्रेस पार्टी की हजारीबाग जिला की अध्यक्ष, बी.पी.सी.सी तथा ए.आई.सी.सी. की सदस्य भी रहीं. 1977 में स्थानीय लोगों को कांग्रेस का टिकट न दिए जाने के विरोध में उन्होंने हजारीबाग जिला की कांग्रेस का अध्यक्ष पद एवं ए.आई.सी.सी. की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और लोकदल के टिकट पर 1979 में एम.एल.ए. चुनी गईं. उनके भीतर पूर्ण परिवर्तन की छटपटाहट ने अंततः उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवाद) के संगठन में पहुंचा दिया.

उन्होंने विस्थापितों के सवाल पर 1980 के अगस्त में आंदोलन छेड़ा और 2000 लोगों को लेकर जेल गईं, जिसमें भारी संख्या में महिलाएं भी गिरफ्तार हुईं. सब लोग दो माह जेल में रहे. बिहार सरकार के साथ समझौता होने के कारण उन्हें और उनके सभी साथियों पर केस समाप्त कर उन्हें छोड़ दिया गया. विस्थापितों को 3 एकड़ पर नौकरी की बजाय चूल्हा परती एक नौकरी अथवा जमीन के बदले जमीन, पुनर्वास एवं विस्थापित महिलाओं को भी मुआवजा एवं नौकरी में हिस्से की तथा खदानों के 10 किलोमीटर के क्षेत्रा के भीतर (कोल माइंस के ईदगिर्द) सामुदायिक विकास एवं कल्याण योजना बनाने की मांग भी रखी गई.

विस्थापितों को आंदोलन के साथ-साथ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में तीन अलग-अलग मुकदमे भी दायर किए जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोजगार व पुनर्वास की योजना बनाने के लिए कोल इंडिया को आदेश दिया और पुनर्वासµयोजना लागू होने तक सुप्रीम कोर्ट ने कोल इंडिया को काम पर रोक के स्थगना-आदेश भी दिए.

रमणिका जी द्वारा किसानों के साथ मिलकर एक और रिट-पैटीशन दायर की गई. ये सभी केस 1981 से 1997 तक सुप्रीम कोर्ट में चले. इन 16 वर्षों के दौरान श्रीमती गुप्ता ने किसानों और मजदूरों के आंदोलनों के बल पर सरकार को कई सुधार करने के लिए मजबूर किया. सर सिफ्टन द्वारा 1908 में किए गए सर्वे के अनुसार टांड जमीन की मुआवजा दर मात्रा रु. 2/- प्रति एकड थी. इनके आंदोलन की वजह से यह दर 30 हजार रुपए कहीं-कहीं इसके भी अधिक राशि तक प्रति एकड तक पहुंच गई. देरी करने के एवज में सूद की राशि भी अलग से दी जाने लगी.

गांव वालों को रोजगार न देकर स्वैच्छिक अवकाश के नाम पर मजदूरों के बदले, खासकर औरतों के बदले उनके द्वारा किसी व्यक्ति को भी नौकरी देने के प्रवाधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और इस योजना को रद्द करवाया. हालांकि कोलइण्डिया ने बाद में बीमारी के नाम पर 9.4.3 के तहत स्वैच्छिक अवकाश की नीति चालू रखी और छटनी जारी रही, पर इस स्थानादेश के कारण तत्काल स्त्रा, आदिवासी व दलित मजश्दूरों की नौकरियां काफी हद तक बच गईं.

इन्होंने विस्थापित खेतिहर, भूमिहीन एवं हाशिए वाले किसानों के लिए कोड़कर राईट की लड़ाई भी बिहार सरकार से जीती, जिसके चलते गैरमजुरआ जमीनों पर भी किसानों को कोलइंडिया में नौकरी मिली. जहां-जहां उन्होंने संघर्ष किए वहां-वहां गांव उजड़ने से बच गए. सुप्रीम कोर्ट ने विस्थापित स्त्रा को भी नौकरी देने का आदेश दिया.

1985 में सिंगरौली क्षेत्रा में मजदूरों और किसानों के आंदोलन के सिलसिले में उन्हें लगभग एक साल तक भूमिगत भी रहना पड़ा,फलतः वे हृदय रोग की शिकार हो गईं.

इन्होंने चतरा में दलित स्त्रियों के डोले पहली रात बाबू साहबों के घर जाने की प्रथा के खिलाफ भी आवाजश् उठाई. 1975 में जंगलों में उगे महुए गाछों को पहलवानों के कब्जे से मुक्त करवाकर ग्रामीणों के महुआ चुनने के अधिकार को लागू करवाया.

उन्होंने 1975 में अर्न्तराष्ट्रीय महिला सम्मेलन बर्लिन में और आई.सी.एफ.टी.यू. मैक्सिको की अन्तर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस में मजदूरों की ओर से प्रतिनिधित्व किया. 1984 में रूस में पीस मिशन के डेलिगेशन का नेतृत्व किया. 1987 में यूगेस्लावाकिया तथा नार्वे और 1993 में फिलीपींस, तथा 1994 में क्यूबा में उन्होंने सी.आई.टी.यू. की ओर से भारतीय मजदूरों का प्रतिनिधित्व किया. 2000 में द्वितीय विश्व दलित सम्मेलन में भाग लिया.

उम्र के प्रभाव को अस्वीकार करते हुए वे अभी भी ओजस्विता के साथ विषमता के विरुद्ध सख्त प्रहार करती थीं. उन्हें धर्म, जाति यहां तक कि लिंग के प्रभाव से मुक्त माना जा सकता है. वे भविष्य की स्त्रा मालूम पड़ती हैं; वह स्त्रा जिसकी उपलब्धि हेतु वर्तमान स्त्रा समुदाय संघर्षरत है. रमणिका गुप्ता अपने लेखन में ‘बहु जुठाई’ जैसी सड़ी गली रस्म, आदिवासी दलितों के प्रति सवर्णों का भेदमूलक जातिपरक व्यवहार तथा शोषण और स्त्रियों के यौन शोषण के विरुद्ध संघर्ष को उकेरा है. हेंदेगढ़ा में कुर्मियों की पंचायत प्रेम करने वाले दलित लड़के को मार देती है और उसकी प्रेमिका को लुकाठी से दाग देती है तो रमणिका गुप्ता के शब्द उनकी कविताओं और कहानियों चीख उठते हैं. इसी तरह जब वे मजदूरों की समस्याओं को लेकर प्रबन्धन को चुनौती देती थीं. तो उनके लेखन में उनके अनुभव कई विधाओं में मुखरित हो जाते थे और इन तबकों को अपनी बुलन्द आवाज में वे आह्वान कर प्रेरित करती थीं.

साभार- लोकवाणी इसे भी पढ़ें-मायावती ने ‘गरीबी हटाओं’ के नारे पर बीजेपी और कांग्रेस पर साधा निशाना

जाति की वजह से नहीं मिली निरहुआ को कुर्सी, भाजपा पर भड़के प्रशंसक

नई दिल्ली। 27 मार्च को राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण दो तस्वीरें काफी कुछ कह गई. एक तस्वीर कांग्रेस पार्टी के दिल्ली ऑफिस की थी तो दूसरी भाजपा के लखनऊ दफ्तर की. दोनों घटनाएं भी महत्वपूर्ण थी. दिल्ली में हिन्दी फिल्म अभिनेत्री उर्मिला मांतोडकर ने कांग्रेस पार्टी को ज्वाइन किया तो दूसरी ओर लखनऊ में भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने भाजपा का दामन थामा. दोनों पार्टी दफ्तरों में दिग्गज नेता मौजूद थे, जिन्होंने इन दोनों फिल्मी कलाकारों को पार्टी की सदस्यता दी. हालांकि इस मौके की जारी की गई तस्वरों ने एक बड़ा सवाल उठा दिया है.

कांग्रेस दफ्तर में पार्टी की सदस्यता लेने के लिए मौजूद उर्मिला मंतोडकर को काफी सम्मान मिला. पार्टी के नेताओं ने उन्हें अपनी बात कहने का मौका दिया और उन्हें नेताओं की कतार के ठीक बीच में बैठाकर उन्हें वेलकम किया. लेकिन लखनऊ से दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ को बैठने को कुर्सी तक नहीं मिली. ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखने वाले प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र नाथ पांडे और ठाकुर जाति के राजनाथ सिंह के बेटे और नोएडा के विधायक पंकज सिंह ठाठ से बैठे हैं. कुछ और अंजाने चेहरों को भी कुर्सियां नसीब हो गई लेकिन पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले निरहुआ को पार्टी ने कुर्सी देने का शिष्टाचार भी नहीं निभाया, जबकि सारा तामझाम भोजपुरी सुपरस्टार को पार्टी ज्वाइन कराने के लिए ही था. ये वही निरहुआ हैं, जिनके जरिए भाजपा आजमगढ़ में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को चुनौती देने की योजना बना रही है.

ऐसे ही व्यवहार से पार्टी ज्वाइन करने पहुंचे उत्तर प्रदेश व्यापार मंडल के नेता संजय गुप्ता वहां से लौट गए. उनका कहना है कि अगर बीजेपी ज्वॉइन करने से पहले ये हालत है तो ज्वॉइन करने के बाद क्या होगा.

निरहुआ की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उनके प्रशंसकों ने भाजपा को निशाने पर लिया है.

राहुल यादव ने ट्विटर पर लिखा है- आज़मगढ़ से उठने वाले को यहां बैठने की सीट भी नही मिली. जियो राजा #निरहुआ, पहले ही दिन #निहुरा दिए गए.

रजनीश यादव ने लिखा- आज़मगढ़ से उठने वाले को यहां बैठने की सीट भी नही मिली। जियो राजा #निरहुआ, पहले ही दिन #निहुरा दिए गए।

चंदन यादव ने लिखा है- असली चौकिदार है … खड़ा होइके ही चउकिदारी करे के पड़ी बाऊ #Nirahua उर्फ #DineshLalYadav

तमाम लोग भाजपा के इस कदम को पिछड़ी जाति के निरहुआ का अपमान बता रहे हैं. बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा के इस व्यवहार के पीछे पार्टी नेताओं का जातीय दंभ नहीं है?

Read it also-टिकट ना मिलने से अब जोशी हुए खफा  

फिल्मी चेहरों की शरण में राजनीतिक दल

0

नई दिल्ली। मार्च के आखिरी हफ्ते में एक के बाद एक कई फिल्मी सितारों ने राजनीति में कदम रखा. 27 मार्च को खबर आई कि भोजपुरी इंडस्ट्री के जुबली स्टार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ बीजेपी में शामिल हो गए हैं. तो वहीं छम्मा-छम्मा गर्ल के नाम से मशहूर उर्मिला मंतोडकर ने कांग्रेस का दामन थाम लिया. एक खबर क्रिकेट की दुनिया से भी आई जब पूर्व भारतीय क्रिकेट सितारा गौतम गंभीर ने भाजपा ज्वाइन कर लिया.

लखनऊ में 27 मार्च को भोजपुरी फिल्म अभिनेता रवि किशन और दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने यूपी के मुख्यमंत्री CM योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की. चर्चा है कि दोनों अभिनेताओं को पूर्वांचल से बीजेपी का टिकट मिल सकता है. कहा जा रहा है कि रवि किशन को गोरखपुर से और निरहुआ को आजमगढ़ से टिकट मिलने के आसार हैं. दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ मूल रूप से गाजीपुर के गांव टंडवा से हैं. पूर्वांचल के एक और स्टार मनोज तिवारी पहले से ही भाजपा में हैं और उनके पास दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है. तो भाजपा मे ही हेमामालिनी भी लंबे समय से हैं. एक बार फिर से वह मथुरा से भाजपा की उम्मीदवार होंगी.

कलाकारों को राजनीति का यह चस्का सबसे पहले दक्षिण में लगा, जहां कई कद्दावर नेताओं ने न सिर्फ राजनीति में कदम रखा बल्कि प्रदेश के मुख्यमंत्री तक बनें. दक्षिण से ही 2019 के चुनाव में एक और जाने-माने चेहरे ने हुंकार भर दी है. हालांकि किसी पार्टी में शामिल होने की बजाय उसने चुनाव में निर्दलीय उतरने का फैसला किया है. दक्षिण भारत से लेकर हिंदी फिल्मों तक में अपने अभिनय क्षमता का लोहा मनवा चुके प्रकाश राज ने बेंगलूरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल कर दिया है.

तो उधर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने फिल्मी सितारों को साथ लेकर लोकसभा चुनाव में उतरने का मन बना लिया है. मुनमुन सेन, शताब्दी रॉय और दीपक अधिकारी जैसे फिल्मी सितारों के साथ ही इस बार खबर है कि टीएमसी ने मिमी चक्रबर्ती और नुसरत जहां जैसी कलाकारों को भी चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी कर ली है. खबरों के मुताबिक मिमी जादवपुर, नुसरत बशीरहाट, शताब्दी बीरभूम, मुनमुन आसनसोल और दीपक घाटल लोकसभा सीट से किस्मत आज़माने वाले हैं.

एक के बाद एक फिल्मी सितारों का राजनीति की दुनिया में कदम रखने से यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या लोगों का राजनेताओं पर से भरोसा उठता जा रहा है? और सभी दलों के लिए फिल्मी सितारें चुनाव जीताऊ कैंडिडेट बन गए हैं. एक सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक दलों का लक्ष्य महज अपने सीटों की गिनती को बढ़ाना है, चाहे वो जो जीता कर ले आए?

अंतरिक्ष में एयर स्ट्राइक का असली सच यह है

2019 में किसकी सरकार बनेगी यह तो चुनाव के नतीजों के बाद साफ होगा, लेकिन उसके पहले दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल जारी है. यह साफ हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी और उसके ब्रांड नरेन्द्र मोदी 2019 के चुनाव में जीत के लिए एयर स्ट्राइक पर निर्भर हैं. ऐसे में मोदी के एयर स्ट्राइक को चुनौती देने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने NYAY स्कीम की घोषणा कर दी. इस योजना के मुताबिक कांग्रेस की सरकार बनने पर देश के तकरीबन पांच करोड़ गरीबों के खाते में सलाना 72 हजार रुपये डालने की बात कही जा रही है. इससे  बैकफुट पर आई भाजपा ने अबकी बार अंतरिक्ष में एयर स्ट्राइक का दांव चल दिया है.

कांग्रेस की सरकार में वित्त मंत्री रहे पी. चिदंबरम जब एक प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा घोषित NYAY स्कीम कैसे लागू होगी… यह बता रहे थे, उसी के आस-पास नरेंद्र मोदी ने एयर स्ट्राइक की खबर दे दी. भारत ने अंतरिक्ष के भीतर एक सेटेलाइट को मार कर गिरा दिया. इसी सूचना को लेकर मोदी देश की जनता के बीच मन की बात कहने आ गए. पहले उन्होंने ट्विट किया कि वो बड़ी खबर सुनाने वाले हैं, जिसके बाद फिर उन्होंने अंतरिक्ष में सेटेलाइट मारने की खबर सुनाई. ऐसा कर मोदी एक बार फिर से एयर स्ट्राइक के भरोसे चुनावी बढ़त लेने के मूड में हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या इसका असर चुनावों में भी होगा?

दरअसल यह वास्तव में एक बड़ी खबर है कि भारत ने यह उपलब्धि हासिल की है. अमेरिका, चीन और रूस के बाद भारत चौथा ऐसा देश बन गया है, जो अंतरिक्ष में किसी सेटेलाइट को माकर गिरा सकता है. देश के वैज्ञानिकों को इसके लिए बहुत बधाई. संभवतः परमाणु परीक्षण के बाद यह दूसरी बड़ी उपलब्धि है. लेकिन यहां सवाल राजनीति का है, तो चुनावों में इसका कितना असर होगा यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन जनता को यह समझना होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने जिस एंटी सैटेलाइन हथियार की बात कही, ऐसा करने का माद्दा भारत के पास 2012 से ही था. DRDO के तत्कालीन प्रमुख वीके सारस्वत ने 2012 में ही दावा कर दिया था कि भारत के पास दुश्मन सैटेलाइट को मार गिराने के सभी जरूरी तकनीक मौजूद हैं. तो ऐसा नहीं है कि यह वर्तमान सरकार की कोई बड़ी उपलब्धि है जो उसने बीते पांच साल में हासिल किया है. निस्संदे यह भारत सरकार की उपलब्धि है, जिसमें कांग्रेस की सरकार को भी क्रेडिट जाता है. लेकिन अगर इसे मोदी जी या भाजपा अपनी उपलब्धि कहते हैं तो ऐसा बिल्कुल नहीं है.

भले ही यह मोदी सरकार की निजी उपलब्धि नहीं है लेकिन इस परीक्षण का चुनावी फायदा लेने के लिए भाजपा और उसके नेता एयर स्ट्राइक का मुद्दा एक बार फिर से गरमाने में लग गए हैं.

Read it also-भाजपा ने इस वजह से काट दिया दलित-पिछड़ों का टिकट

नही रही आदिवासी-दलितों और महिलाओं के संघर्ष का चेहरा

0

नई दिल्ली। हिंदी की लोकप्रिय साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता रमणिका गुप्ता का मंगलवार को निधन हो गया. उन्होंने दिल्ली के अपोलो अस्पताल में दोपहर तीन बजे अंतिम सांस ली. वह 89 वर्ष की थीं.

22 अप्रैल 1930 को पंजाब में जन्मी रमणिका ने आदिवासी व दलित साहित्य को नया आयाम दिया. वह साहित्य, समाज सेवा और राजनीति कई क्षेत्रों से जुड़ी हुई थीं.

वह सामाजिक सरोकारों की पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादक थीं. उन्होंने स्त्री विमर्श पर बेहतरीन काम किया.

वह देश की वामपंथी प्रगतिशील धारा की प्रमुख रचनाकार थीं. उन्होंने मजदूर आंदोलन से अपने साहित्य को धार दी. उन्होंने झारखंड के हजारीबाग के कोयलांचल से मजदूर आंदोलनों को साहित्य के जरिए राष्ट्रीय फलक पर पहुंचाने का काम किया.

नारी मुक्ति के साथ झारखंड समेत देश के आदिवासी साहित्यिक स्वर को व्यापक समाज में लाने के उनके विशिष्ट योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.

उनके आदिवासी एवं दलित अधिकारों से लेकर स्त्री विमर्श पर कई किताबें, कविता संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं. रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘हादसे और आपहुदरी’ बहुत लोकप्रिय हैं. वह कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं.

उनकी मशहूर कृतियों में ‘भीड़ सतर में चलने लगी है’, ‘तुम कौन’, ‘तिल-तिल नूतन’, ‘मैं आजाद हुई हूं’, ‘अब मूरख नहीं बनेंगे हम’, ‘भला मैं कैसे मरती’, ‘आदम से आदमी तक’, ‘विज्ञापन बनते कवि’, ‘कैसे करोगे बंटवारा इतिहास का’,‘दलित हस्तक्षेप’, ‘निज घरे परदेसी’, ‘सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे’, ‘कलम और कुदाल के बहाने’, ‘दलित हस्तक्षेप’, ‘दलित चेतना- साहित्यिक और सामाजिक सरोकार’, ‘दक्षिण- वाम के कठघरे’ और ‘दलित साहित्य’, ‘असम नरसंहार-एक रपट’, ‘राष्ट्रीय एकता’, ‘विघटन के बीज’ प्रमुख हैं.

उनका उपन्यास ‘सीता-मौसी’ और कहानी संग्रह ‘बहू जुठाई’ भी खासा लोकप्रिय रहा.

सामाजिक आंदोलनों के लिए पहचानी जाने वाली रमणिका विधायक भी रहीं. उन्होंने बिहार विधानपरिषद और विधानसभा में विधायक के रूप में काम किया है. वह इसके अलावा ट्रेड यूनियन नेता के तौर पर भी काम कर चुकी हैं. वह चुनावी राजनीति से अलग होने के बाद भी मजदूर यूनियन से जुड़ी रहीं.

इसे भी पढ़ें-बसपा ने आखिरी वक्त पर फिर बदला फतेहपुर का प्रत्याशी, अब ये होगें नए प्रत्याशी

मायावती ने ‘गरीबी हटाओं’ के नारे पर बीजेपी और कांग्रेस पर साधा निशाना

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने बुधवार को एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस पर निशाना साधा है. उन्होंने गरीबों और किसानों के मामले में दोनों को एक ही थाली के चट्टे-बट्टे बताया है. मायावती ने ट्वीट किया, “सत्ताधारी बीजेपी का कांग्रेस पार्टी पर आरोप कि उसका गरीबी हटाओ-2 का नारा चुनावी धोखा है, यह सच है, परन्तु क्या चुनावी धोखा व वादाखिलाफी का अधिकार केवल बीजेपी के पास ही है? गरीबों, मजदूरों, किसानों आदि के हितों की उपेक्षा के मामले में दोनों ही पार्टियां एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं.”

गौरतलब है इससे पहले बसपा मुखिया ने भाजपा सरकार पर नोटबंदी को लेकर हमला बोला था. इसके कारण कामगार बेरोजगार होकर गांव में गुजर-बसर करने के लिए मजबूर हैं.

Read it also-कांग्रेस पर इतनी हमलावर क्यों हैं मायावती

बसपा ने आखिरी वक्त पर फिर बदला फतेहपुर का प्रत्याशी, अब ये होगें नए प्रत्याशी

गुड्डू पंडित (फोइल फोटो)

लखनऊ। लोकसभा चुनाव के लिए हर राजनैतिक दल की एक ही ख्वाहिश है, किसी भी तरह ज्यादा से ज्यादा प्रत्याशी जीतना. इसके लिए हर पार्टी सीट जीताऊ उम्मीदवार पर दांव लगा रही है. इसी को ध्यान में रखते हुए बहुजन समाज पार्टी ने आखिरी वक्त पर फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार आखिरी वक्त में बदल दिया. खबर है कि इस सीट पर बसपा ने राजवीर सिंह का टिकट काटकर भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित को टिकट दे दिया है.

 फतेहपुर सीकरी से दिल्ली के राजवीर सिंह ने बसपा प्रत्याशी के तौर पर पर्चा दाखिल किया था. हालांकि पार्टी की ओर से उन्हें बी फॉर्म नहीं दिया गया था. इसके बाद अचानक गुड्डू पंडित का नाम चर्चा में आ गया. मंगलवार को ही गुड्डू पंडित अपना नामांकन दाखिल करेंगे क्योंकि आज नामांकन का अंतिम दिन है. गुड्डू पंडित दबंग छवि के नेता हैं. उन पर कई केस भी दर्ज हैं. गुड्डू पंडित समाजवादी पार्टी में भी रह चुका है.

गौरतलब है कि फतेहपुर सीकरी सीट को लेकर काफी उहापोह रही है. पहले बसपा ने इस सीट से रामबीर उपाध्याय की पत्नी सीमा उपाध्याय को यहां से प्रत्याशी घोषित किया, लेकिन सीमा उपाध्याय ने इस सीट पर समीकरण पक्ष में नहीं होने की बात कहते हुए यह सीट छोड़ दी. इसके बाद प्रत्याशी के तौर पर राजवीर सिंह का नाम आया. लेकिन ऐन आखिरी वक्त में गुड्डू पंडित को टिकट देने की बात सामने आई है.

गोरखपुर-बस्ती मंडल में दांव पर होगी बसपा की साख

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में गोरखपुर और बस्ती मंडल में बहुजन समाज पार्टी की कड़ी परीक्षा है. पार्टी इन दोनों मंडलों की नौ लोकसभा सीटों में से छह पर चुनाव मैदान में है. सीटों के बंटवारे में बसपा के हिस्से में बस्ती, संतकबीरनगर, डुमरियागंज, बांसगांव, देवरिया व सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र बसपा के हिस्से में आया है.

इन सभी सीटों को जीतने के लिए बसपा पूरा जोर लगा रही है. पार्टी ने इन सीटों पर खास रणनीति बनाई है. सूचना के मुताबिक मायावती और अखिलेश यादव की संयुक्त रैली 13 मई को गोरखपुर में प्रस्तावित है. इस रैली में गोरखपुर, महाराजगंज व कुशीनगर के लोकसभा क्षेत्रों के कार्यकर्ता शामिल होंगे. इस संयुक्त रैली के अलावा बसपा प्रमुख मायावती दो अन्य रैलियों को अकेले संबोधित करेंगी. खबर है कि बहनजी बांसगांव लोकसभा क्षेत्र व सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र में अकेले रैली करेंगी. रैली का कार्यक्रम 14 अप्रैल को तय होन की बात सामने आई है.

टिकट ना मिलने से अब जोशी हुए खफा

सत्ता में बने रहने के लिए भारतीय जनता पार्टी एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है. 2019 की जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी चुन-चुनकर उम्मीदवारों को टिकट दे रही है. लेकिन इसी वजह से बीजेपी के दिग्गज ही पार्टी से खफा हो गए हैं. बताया जा रहा है कि लालकृष्ण आडवाणी की तरह ही बीजेपी ने वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी को टिकट ना देने का मन बनाया है. जब पार्टी की ओर से संगठन महासचिव रामलाल ने उन्हें इस बात की जानकारी दी तो इस पर वह खफा हो गए.

दरअसल, सोमवार को बीजेपी के संगठन महासचिव रामलाल ने बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी से मुलाकात की थी. रामलाल ने मुरली मनोहर जोशी से कहा कि पार्टी ने डिसाइड किया है कि आपको चुनाव नहीं लड़वाया जाए. रामलाल ने कहा कि पार्टी चाहती है कि आप पार्टी ऑफिस आकर चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान करें.

हालांकि, पार्टी की इस अपील को मुरली मनोहर जोशी ने सीधे तौर पर नकार दिया. जोशी ने कहा कि ये पार्टी के संस्कार नहीं हैं, अगर हमें चुनाव ना लड़वाने का फैसला हुआ है तो कम से कम पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को हमें आकर सूचित करना चाहिए. मुरली मनोहर जोशी ने साफ कहा कि वह पार्टी दफ्तर आकर इसकी घोषणा नहीं करेंगे.

आपको बता दें कि इससे पहले बीजेपी दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी का गांधीनगर से टिकट कटने पर काफी बवाल हुआ था. गांधीनगर से अब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह चुनाव लड़ रहे हैं. आडवाणी का टिकट कटने पर शत्रुघ्न सिन्हा समेत कांग्रेस के नेताओं ने भी सवाल खड़े किए थे.

गौरतलब है कि इससे पहले भी रामलाल ने ही लालकृष्ण आडवाणी, कलराज मिश्र से मुलाकात कर और शांता कुमार, करिया मुंडा से फोन पर बात करके उन्हें टिकट ना देने के फैसले के बारे में जानकारी दी थी. तब भी रामलाल ने इन नेताओं को सूचित किया था कि वह अपनी ओर से चुनाव ना लड़ने का ऐलान करें.

लेकिन लालकृष्ण आडवाणी भी मुरली मनोहर जोशी की तरह तैयार नहीं हुए. सूत्रों की मानें तो आडवाणी ने भी मुरली मनोहर जोशी की तरह रामलाल से कहा था कि पार्टी हमें चुनाव में टिकट नहीं देना चाहती है तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को खुद आकर पार्टी के फैसले की जानकारी देनी चाहिए.

श्रोत- आजतक इसे भी पढ़ें-उत्तर भारत में सवर्ण वर्चस्व विरोधी बहुजन राजनीति के प्रणेता मान्यवर कांशीराम