BJP को वोट मत देना, लिखकर किसान ने किया सुसाइड

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हरिद्वार के लक्सर में एक किसान ने कर्ज़ के दबाव में आकर आत्महत्या कर ली. पुलिस ने इस मामले में बैंक के एजेंट को गिरफ्तार किया है. लेकिन इस घटना ने राजनीतिक तूल इसलिए पकड़ लिया है क्योंकि किसान के पास से एक सुसाइड नोट बरामद हुआ है, जिसमें बीजेपी को वोट ना देने की बात लिखी हुई है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हरिद्वार के लक्सर में किसान ईश्वरचंद शर्मा ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी. किसान ने सुसाइड नोट में यह आरोप लगाया है कि लोन एजेंट अजित सिंह (राठी) ने उसे बैंक से लोन दिलवाने का दावा किया था. लोन दिलवाने के पहले एजेंट ने बैंक गारंटी के तौर पर किसान से ब्लैंक चेक ले लिया था. जैसे ही किसान के नाम पर लोन मिला वैसे ही एजेंट ने चेक से सारी रकम निकाल ली. जब यह बात किसान को पता लगी तो उसने सल्फास खाकर आत्महत्या कर ली.

किसान ने एक सुसाइड नोट भी अपने साथ छोड़ा है. इसमें लिखा गया है कि, ” पांच साल में भाजपा सरकार ने किसान को खत्म व नष्ट कर दिया है. इसे वोट मत देना वरना ये आपको चाय ही बिकवा देगी. पांच साल में हर काम बंद हो गया. भाजपा सरकार ने किसान को खत्म किया है. आज भाजपा से किसान दुखी हैं.”

इसके अलावा किसान ने अपने सुसाइड नोट में बैंक एजेंट अजित सिंह का नाम भी लिखा है. किसान ईश्वरचंद ने आरोप लगाया है कि कृषि कार्ड से 2012, 2013 और 2014 में एजेंट ने फर्जी तरीके से उसके नाम पर कई बैंकों से लाखों रुपये कर्ज लिया. उन्हें इस कर्ज से एक पैसा भी नहीं मिला. बल्कि उनके बेटे पर गलत आरोप लगाए गए.

फिलहाल पुलिस ने ईश्वरचंद के बेटे की शिकायत पर एजेंट अजित सिंह के ख़िलाफ़ धारा 306 के तहत केस दर्ज कर लिया है. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

  • साभार आजतक

दलित दस्तक मैग्जीन का अप्रैल 2019 अंक ऑन लाइन पढ़िए

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दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2018 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए सांतवें साल का ग्यारहवां अंक लेकर आए हैं. अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

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फिल्म ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ पर चला चुनाव आयोग का डंडा

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फिल्म ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ को लेकर चुनाव आयोग ने एक बड़ा फैसला लिया है. चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फिल्म ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ पर रोक लगा दी है. चुनाव आयोग ने कहा कि है कि जब तक लोकसभा चुनाव खत्म नहीं हो जाते, तब तक इस फिल्म पर रोक लगी रहेगी. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ की रिलीज पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया था. अदालत ने कहा था कि याचिकाकर्ता की चिंता का हल करने के लिए उचित संस्था निर्वाचन आयोग है, क्योंकि यह एक संवैधानिक निकाय है.

इसके बाद फिल्म ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ की टीम ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिका को खारिज किए जाने पर न्यायपालिका के प्रति आभार जताया. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की चिंता का हल करने के लिए उचित संस्था निर्वाचन आयोग है जो कि एक संवैधानिक निकाय है. चुनाव आयोग को ही यह तय करना चाहिए कि आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर फिल्म की रिलीज चुनाव के दौरान किसी विशेष राजनीतिक पार्टी को फायदा या उसके लिए झुकाव तो पैदा नहीं करती. फिल्म में पीएम मोदी का किरदार निभा रहे अभिनेता विवेक ओबेरॉय ने सुप्रीम कोर्ट के रुख की सराहना की.

इससे पहले भी खबर थी कि चुनाव आयोग द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बनी बायोपिक फिल्म की रिलीज को रोके जाने की संभावना नहीं है और इस मुद्दे को सीबीएफसी के विवेक पर छोड़ा जा सकता है. कांग्रेस सहित विपक्षी दलों का दावा था कि फिल्म चुनाव में भाजपा को अनुचित लाभ देगी और चुनाव समाप्त होने तक इसके रिलीज को टाल दिया जाना चाहिए. सात-चरण में होने वाले लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से शुरू होने हैं और 19 मई को समाप्त होंगे.

10 मार्च को चुनाव की घोषणा के साथ आदर्श आचार संहिता लागू हो गया था. संहिता सभी दलों और उम्मीदवारों को एक समान धरातल उपलब्ध कराने पर बल देती है. आयोग में एक राय है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड मामले पर निर्णय लेने का सक्षम प्राधिकारण है. फिल्म ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ पहले चरण के मतदान की तारीख से एक सप्ताह पहले 5 अप्रैल को रिलीज होने वाली थी.

इसे भी पढ़ें-राफेल मामले में मोदी को सु्प्रीम कोर्ट का झटका

बुद्ध को मानने वाले देश में एक अनुभव

अपने देश पर गर्व करते हों तो गर्व करने के लिए और अपने देश पर गर्व करवाने के लिए अपने कर्तव्य को भी मानो और उसे निभाओ. आपके देश का नाम पूरी दुनियाँ जाने और कहे कि उस देश के नागरिक अतिथि की मदद करते हैं और अपने देश की शान ऊँची रखते हैं. ऐसे करने में हर नागरिक की भूमिका होती है. एक अनुभव आपके साथ साँझा कर रही हूँ. जापान का ये ओसाका शहर है जिसकी दूरी फ़्लाइट से एक घंटा पैंतीस मिनट्स में तय होती है टोक्यो से. यहाँ के लोग अपनी भाषा जापानी में ही बात करते है. आम लोगों में यहाँ इंग्लिश का चलन न के बराबर है. जैसे ही मैं एर्पॉर्ट से बाहर आयी तो मैंने किसी को मेरे होटेल का पता पूछा कि कैसे पहुँचा जाये.
उन्होंने बताया की ट्रेन या बस लीजिए. ट्रेन के तीन स्टॉप थे और बस का एक तो मैंने Texi लेने के बारे में पूछा तो उसने बताया की Texi इक्स्पेन्सिव है यहाँ. सुनते हुए मेरा ध्यान अपने समान और बताये हुए रास्ते से बस और मेट्रो बदलना चिंता का विषय था फिर भी मुझे लगा कि देखा जाएगा जो होगा. आज तो पूछते हुए ही पहुँचते है. मैंने उनसे पूछा कि बस कहाँ मिलेगी. वह स्वयं मुझे बस स्टॉप तक छोड़ने आया. ऐसी मेहमान नवाजी देखकर मन बाग़ बाग़ हो गया. भारत और जापान के बारे में भी बात की. फिर एक बात कहाँ छुटती. वो थी सेल्फ़ी लेना. झट ली. पहली तस्वीर में Katsutaka जी के साथ.
बस में बैठे तो पता चला कि ये बस होटेल तक नहीं जाएगी. ड्राइवर ने अपने फ़ोन से ऐड्रेस खोजा और बताया कि ये बस ओसाका स्टेशन तक जाएगी फिर वहाँ से दूसर रूट लेना होगा. उन्होंने मुझे रास्ते तक छोड़ा और फिर मुझे तय करना था कि कौन सा ऑप्शन लूँ. रास्ते की जानकारी तो थी नहीं तो मैंने फिर पूछ लिया. जिनसे पूछा वे ग्रूप में थे तीन लड़कियाँ और एक लड़का. उन लोग ने केवल Texi का रास्ता बताया बल्कि 10 minutes की वॉकिंग के साथ मुझे Texi स्टैंड तक लाये. फिर Texi वाले को समझकर मुझे Texi में बैठाया. इतना अपनापन एक अजनबी के साथ मैंने ज़िंदगी में पहली बार देखा.
इतने देशों की यात्रा के अनुभव के साथ इस नतीजे पर पहुँची हूँ कि ये शायद बुद्ध की देशना हैं. मैं अपने तय स्थान पर पहुँची तो Texi वाले ने न केवल मेरा सामान उतारा बल्कि बुकिंग तक वही खड़ा रहा. और सबसे ज़्यादा कमाल की बात जिसके लिए इस पोस्ट को लिख रही हूँ कि उन्हें मुझसे पैसे लेने से मना कर दिया. मैंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि एक व्यक्ति अपने पेशे में भी इतना humble और नैतिक हो सकता है. मैंने पूछा तो उनका एक ही जवाब था कि उसने ये सर्विस की है. अवाक हूँ कि आज भी ऐसे व्यक्ति मिलते हैं. और भी विस्तार से लिखूँगी. अभी के लिए इतना ही
 डॉ. कौशल पंवार के फेसबुक वॉल से 

राफेल मामले में मोदी को सु्प्रीम कोर्ट का झटका

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नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के ठीक एक दिन पहले भाजपा और पीएम मोदी को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका दिया है. सुप्रीम कोर्ट राफेल मामले पर सुनवाई करते हुए इस मामले की दुबारा सुनवाई के लिए तैयार हो गया है. इससे जहां भाजपा को झटका लगा है तो कांग्रेस को पीएम मोदी को घेरने का एक और बहाना मिल गया है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल के मुद्दे पर भाजपा पर लगातार हमलावर हैं.

 राफेल मामले पर बुधवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय से लीक हुए दस्तावेजों की वैधता को मंजूरी दे दी है. कोर्ट के फैसले के मुताबिक याचिकाकर्ता के दिए दस्तावेज अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के हिस्सा होंगे. शीर्ष न्यायालय का फैसला आने के बाद राफेल मामले पर सुप्रीम कोर्ट के दोबारा सुनवाई के फैसले से एक तरफ जहां बीजेपी को झटका लगा है, वहीं कांग्रेस के लिए राहत की खबर है. राफेल माले पर सुप्रीम कोर्ट के दोबारा सुनवाई के फैसले के बाद भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में राफेल मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है.

66 पूर्व नौकरशाहों ने आचार संहिता उल्लंघन मामले में लिखा राष्ट्रपति को पत्र

electionनई दिल्ली। क्या हो जब देश के पूर्व नौकरशाहों को नियम और कानून बचाने के लिए सामने आना पड़े और इसके लिए राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखनी पड़े. जी हां, देश के 66 पूर्व नौकरशाहों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखकर चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का मामला उठाया है और इसको रोकने के लिए गुहार लगाई है. साथ ही आगामी लोकसभा चुनाव को निष्पक्ष तरीके से उठाने की मांग की है. अपने पत्र में पूर्व नौकरशाहों ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाया है.

File Photo: Courtesy PTI

राष्ट्रपति कोविंद को पत्र लिखने वालों में पूर्व विदेश सचिव शिवशंकर मेनन, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, पंजाब के पूर्व डीजीपी जुलियो रिबेरो, प्रसार भारती के पूर्व सीईओ जवाहर सरकार और ट्राई के पूर्व चेयरमैन राजीव खुल्लर जैसे पूर्व नौकरशाह शामिल हैं. नौकरशाहों की ओर से लिखे पत्र में कहा गया है कि सत्तारूढ़ दल और केंद्र सरकार अपने रुतबे का दुरुपयोग मनमाने ढंग से करते हुए आचार संहिता की धज्जियां उड़ा रहे हैं. उनके ऐसे मनमाने कामकाज से साफ है कि चुनाव आयोग के प्रति भी उनके मन में कोई सम्मान नहीं है.

अपनी चिट्ठी में चुनाव आयोग की शिकायत करते हुए नौकरशाहों ने अपने पत्र में ‘ऑपरेशन शक्ति’ के दौरान एंटी सैटेलाइट मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन, नरेंद्र मोदी पर बनी बायोपिक फिल्म, वेब सीरीज और बीजेपी के कई नेताओं के आपत्तिजनक भाषणों का जिक्र भी किया गया है. जिन पर चुनाव आयोग को की गई शिकायत के बावजूद महज दिखावे की ही कार्रवाई हुई. गौरतलब है कि राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखने से पहले पूर्व नौकरशाहों ने चुनाव आयोग को भी पत्र लिखकर अपनी चिंता से अवगत कराया था.

   

गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में सामाजिक न्याय सप्ताह का आयोजन

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गांधीनगर। गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय गांधीनगर में बिरसा आम्बेडकर फुले छात्र संगठन (BAPSA-CUG) के द्वारा विश्वविद्यालयमें “सामाजिक न्याय सप्ताह” का आयोजन किया जा रहा है. यह कार्यक्रम 9 अप्रैल से 15 अप्रैल तक चलेगा. कार्यक्रम में बहुजन नायकों के सामाजिक न्याय संबंधी विचार पर विभिन्न कार्यक्रम की रुपरेखा तैयार की गई है. कार्यक्रम के पहले दिन मान्यवर कांशीराम पर बनी फिल्म “द ग्रेट लीडर कांशीराम” का प्रदर्शन किया गया.

इस दौरान होने वाले अन्य कार्यक्रमों में 10 अप्रैल को व्हिसल ब्लोवर थियेटर ग्रुप द्वारा “उर्फे आलो” नाटक का आयोजन किया जाएगा जो मुख्य रूप से सफाई कामगारों के दयनीय जीवन पर आधारित है. कार्यक्रम में तीसरे दिन 11 अप्रैल को राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के जन्मदिवस के मौके पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एन. सुकुमार ज्योतिबा फुले-आम्बेडकर और उनके सामाजिक न्याय पर अपनी बात रखेंगे. जबकि 12 अप्रैल को महिलाओं और आदिवासियों के सामाजिक न्याय को लेकर एक खुली परिचर्चा का भी आयोजन किया गया है, जिसमें गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और छात्र आपस में परिचर्चा करेंगे.

13 अप्रैल को बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की जयंती समारोह मनाया जाएगा जिसमें डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय औरंगाबाद, महाराष्ट्र के राजश्री शाहू महाराज अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. उमेश आर. बागडे होंगे जो ज्योतिबा फुले के शिक्षावादी सिद्धांत और उसके महत्व पर बात करेंगे साथ ही गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी आकाश कुमार रावत ओबीसी आरक्षण से संबंधित मंडल कमिशन सिफारिश की पुर्नवलोकन पर बात करेंगे. 14 अप्रैल को बाबासाहेब के जन्मदिवस पर ‘एक शाम संविधान के नाम’ विष्य पर गीत-संगीत का कार्यक्रम तथा छात्रों द्वारा ‘संविधान बचाओ’ नामक नाटक का मंचन किया जाएगा. कार्यक्रम के अंतिम दिन 15 अप्रैल को मौलाना असीम बिहारी के जन्म जयंती के उपलक्ष्य में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली के शोधार्थी जुबैर आलम अपने व्याख्यान में ‘सामाजिक न्याय और पसमांदा मुस्लिम’ पर बात करेंगे.

  • रिपोर्टः संतोष बंजारे

बसपा ने यूपी के पांच और सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित किया

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी ने एक प्रेस रिलिज जारी कर अपने पांच उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की है.  इसमें धौरहरा से अरसद अहमद सिद्दीकी, सीतापुर से नकुल दुबे, मोहनलालगंज (सुरक्षित) सीट से सी.एल. वर्मा, फतेहपुर से सुखदेव प्रसाद, कैसरगंज से चन्द्रदेव राम यादव को टिकट दिया गया है. इसके साथ ही इन सीटों पर विभिन्न नामों को लेकर चल रही अटकलें समाप्त हो गई है. गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव को लेकर पहले चरण का मतदान 11 अप्रैल को होगा.  

भाजपा का चुनावी घोषणा पत्र जारी, मध्यम वर्ग, राम और राष्ट्रवाद के जरिए दुबारा सत्ता में आने की तैयारी

पार्टी का घोषणा पत्र जारी करते भाजपा नेता

नई दिल्ली। अपने पिछले कई बार के इतिहास की तरह भारतीय जनता पार्टी ने इस बार भी कांग्रेस का घोषणापत्र जारी होने के कुछ दिन बाद अपना घोषणा पत्र सोमवार 8 अप्रैल को जारी कर दिया. घोषणा पत्र में भाजपा की नजर मध्यम वर्ग पर है, तो वहीं पार्टी राम और राष्ट्रवाद के जरिए पार्टी एक बार फिर सत्ता में आने का मौका मांग रही है. बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया है कि 2019 में सरकार के आने पर वह इनकम टैक्स के स्लैब में बदलाव करेगी. ऐसी घोषणा कर पार्टी ने मध्यम वर्ग को अपने पाले में खिंचने की कोशिश की है. घोषणा पत्र का नाम भाजपा ने संकल्प पत्र रखा है.

 कांग्रेस के घोषणा पत्र जारी करने के बाद भी भाजपा के बड़े नेताओं ने कहा था कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में मध्यम वर्ग की अनदेखी की गई है. मध्यम वर्ग के अलावा भाजपा एक बार फिर अपने पसंदीदा एजेंडे राम मंदिर और राष्ट्रवाद को सामने लेकर आई है. घोषणा पत्र में कहा गया है कि राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्धता है और आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस की नीति है. जब तक आतंकवाद समाप्त नहीं होगा यह नीति जारी रहेगी. वहीं राम मंदिर पर सभी संभावनाओं की तलाश करने की बात कही गई है और जल्द-से-जल्द सौहार्दपूर्ण वातावरण में मंदिर निर्माण की कोशिश की जाएगी.  घोषणा पत्र जारी करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को सभी क्षेत्रों में मजबूत बनाने में ‘राष्ट्रवाद हमारी प्रेरणा, अन्त्योदय दर्शन और सुशासन मंत्र’ की तरह है.

पांच साल में ऐसे बदल गया भाजपा का कवर पेज, सभी गायब सिर्फ मोदी छाए

हालांकि इस दौरान पूरे कार्यक्रम के केंद्र में मोदी और अमित शाह रहे. घोषणा पत्र जारी करने के दौरान मंच पर मोदी और अमित शाह के साथ सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और राजनाथ सिंह के अलावा थावर चंद गहलोत और एक अन्य नेता मौजूद थे. एक और तो देखने को मिली, उसमें साल 2014 के घोषणा पत्र में जहां कवर पेज पर अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली आदि नेताओं की भी तस्वीर थी तो इस पर कवर पेज पर सिर्फ मोदी ही छाए रहे.

महागठबंधन की पहली हुंकार रैली

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नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती जी देश में 17वीं लोकसभा के हो रहे आमचुनाव में अपनी चुनावी अभियान की शुरुआत दिनांक 2 अप्रैल 2019, को ओडिसा राज्य से की थी. और आज दिनांक 06 अप्रैल 2019 को उत्तराखण्ड की दो रैलियों के बाद कल महागठबंधन की पहली संयुक्त रैली को सहारनपुर जिले के देवबन्द में सम्बोधित करेगी, इसमें तीनों दलों के प्रमुख मौजूद होगें. देवबन्द की यह रैली जामिया तिब्बिया मेडिकल कालेज के पास आयोजित की गई है, और 8 अप्रैल 2019, दिन सोमवार को ग्रेटर नोएडा में उत्तर प्रदेश के महागठबंधन के तीनो प्रमुख जनता को सम्बोधित करेंगे.

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटों पर हो रहे आमचुनाव में बी.एस.पी.-समाजवादी पार्टी व आर.एल.डी. पहली बार गठबन्धन के आधार पर काफी मजबूती के साथ यह चुनाव लड़ रही है.

सुश्री मायावती जी अपने चुनावी अभियान के तहत अब तक उड़ीसा, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना व महाराष्ट्र राज्य में चुनावी कार्यक्रम कर चुकी हैं.

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पुस्तक विमोचन के मौके पर दिलीप मंडल ने उठाया अरुंधति राय पर सवाल, मिला यह जवाब

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5 अप्रैल को दिल्ली के मावलंकर हॉल में अरुंधति राय की पुस्तक एक था डॉक्टर एक था संत का विमोचन हुआ

नई दिल्ली। दिल्ली के मावलंकर हाल में लेखिका अरुंधति राय और वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के बीच खूब जुबानी जंग हुआ। मौका था। बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका अरुणधति राय की पुस्तक “एक था गांधी- एक था संत” के हिन्दी अनुवाद का विमोचन कार्यक्रम का। कार्यक्रम 5 अप्रैल को दिल्ली के मावलंकर हॉल में हुआ। इस दौरान बतौर अतिथि पहुंचे वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने अरुणधति राय की इस बात को लेकर आलोचना किया कि एनीहिलेशन ऑफ कॉस्ट की भूमिका में अरुणधति ने इस किताब को लोगों के बीच ले जाने का काम किया।

दरअसल पुस्तक का हिन्दी अनुवाद दिल्ली विवि के हिन्दू कॉलेज में पढ़ाने वाले इतिहासकार और एक्टिविस्ट और विद्वान अनिल यादव ‘जयहिंद’ ने किया है। पुस्तक का हिन्दी अनुवाद राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। विमोचन कार्यक्रम में बतौर अतिथि वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, दिलीप मंडल, लेखिका एवं एक्टिविस्ट अनिता भारती, डॉ. मनीषा बांगर और सुनील सरदार मौजूद थे। इस मौके पर सबने अपनी बात रखी। पुस्तक के अनुवादक अनिल जयहिंद ने इस किताब के हिन्दी में अनुवाद की कहानी बताई। अनिता भारती ने कहा कि उन्होंने इस किताब को पूरा पढ़ा है और इस किताब ने गांधी की पोल खोल कर रख दी है। उर्मिलेश जी और डॉ. मनीषा बांगर ने इस प्रयास के लिए अरुणधति राय और अनुवादकों का धन्यवाद किया।

5 अप्रैल को दिल्ली के मावलंकर हॉल में अरुंधति राय की पुस्तक एक था डॉक्टर एक था संत का विमोचन हुआ

हालांकि कार्यक्रम में तब अजीब स्थिति पैदा हो गई जब बोलने आए दिलीप मंडल ने अरुंधति राय की मंच से ही आलोचना करनी शुरू कर दी। हालांकि उन्होंने तर्कों के आधार पर आलोचना की लेकिन एक समय सबके लिए असहज स्थिति पैदा हो गई। दिलीप मंडल ने कहा कि वो अरुंधति राय को इस बात की इजाजत नहीं देते हैं कि वो ‘एनीहीलेशन ऑफ कॉस्ट’ को अपनी किताब बताएं। उन्होंने इस सवाल को भी उठाया कि आज गूगल पर इस किताब को सर्च करने पर लेखकों में अरुंधति राय का नाम आता है। हालांकि अरुंधति राय ने कहा कि उन्होंने ऐसा कभी क्लेम नहीं किया है और इस किताब की सिर्फ भूमिका लिखी है।

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UPSC: जानें- कौन हैं वो 20 कैंडिडेट, जो बने सिविल सर्विसेज के टॉपर

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने सिविल सर्विसेज परीक्षा के नतीजे जारी किए हैं, जिसमें 759 परीक्षार्थियों ने सफलता हासिल की है. वहीं जयपुर के रहने वाले कनिष्क कटारिया ने इस परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया और महिलाओं में सृष्टि देशमुख सबसे आगे है. ऐसे में जानते हैं उन उम्मीदवारों के बारे में, जिनका नाम टॉप-20 में शामिल है.

ये हैं परीक्षा के टॉपर्स की लिस्ट

1. कनिष्क कटारिया

2. अक्षत जैन

3. जूनैद अहमद

4. श्रेयांश

5. सृष्टि जयंत देशमुख

6. शुभम् गुप्ता

7. कर्णति वरुण रेड्डी

8. वैशाली सिंह

9. गुंजन द्विवेदी

10. तन्मय वशिष्ठ शर्मा

11. पूज्य प्रियदर्शनी

12. नम्रता जैन

13. वर्णित नेगी

14. अंकिता चौधरी

15. अतिराग चापलोत

16. DHODMISE तृप्ति अंकुश

17. राहुल शरनप्पा संकनूर

18. ऋषिता गुप्ता

19. हरप्रीत सिंह

20. चित्रा मिश्रा

इस बार फाइनल रिजल्ट में 759 परीक्षार्थी परीक्षा पास करने में कामयाब हुए. इनमें जनरल कैटेगरी के 361, ओबीसी के 209, एससी के 128 और एसटी के 61 परीक्षार्थी शामिल हैं. इस बार शीर्ष 25 में 15 पुरुष परीक्षार्थी और 10 महिला परीक्षार्थी का नाम शामिल है.

बता दें, यह परीक्षा देश में में नौकरशाही के सर्वोच्च पदों के लिए आयोजित की जाती है. इस बार भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) 180 पद, भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के लिए 30 पद, भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के लिए 150 पद, सेंट्रल सर्विस ग्रुप ए के लिए 384 पद, ग्रुप बी सर्विस के लिए 68 पदों के लिए UPSC ने वैकेंसी निकाली थी.

श्रोत-आजतक Read it also-छात्र ने राहुल गांधी से 72 हजार पर पूछा सवाल, राहुल ने दिया यह जवाब  

लोकसभा चुनाव 2019, बहुजन एजेंडा:सामाजिक और राजनीतिक क्रान्ति का एक नया शंखनाद!

2 अप्रैल,2018 भारतीय आंदोलनों के इतिहास के बेहद खास दिनों में चिन्हिंत हो चुका है. उस दिन एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट को कमजोर किये के खिलाफ,बिना किसी नामी-गिरामी नेता और संगठन के आह्वान के ही लाखों लोग सडकों पर उतरे और अभूतपूर्व भारत बंद का इतिहास रच दिए.बहुजन समाज के अभूतपूर्व दबाव में आकर तब केंद्र सरकार उस एक्ट में आवश्यक संशोधन करने का आश्वासन देने के लिए बाध्य हुई थी. उस भारत बंद से यह सत्य स्थापित हुआ था कि यदि वंचित बहुजन समाज के लोग संगठित होकर सडकों पर उतरें तो वे अपनी बड़ी से बड़ी मांगे पूरी करवा सकते हैं: सरकारों को झुकने के लिए बाध्य कर सकते हैं. 2018 के उस भारत बंद से प्रेरणा लेकर एक बार फिर बहुजन समाज के छात्र-गुरुजन, लेखक-एक्टिविस्ट 5 मार्च,2019 को 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ सड़कों पर उतरे और तानाशाही मोदी सरकर को झुका कर अपनी मांगे पूरी करवाने में सफल हो गए.बहरहाल जो ऐतिहासिक 2 अप्रैल 5 मार्च,2019 के भारत बंद का प्रेरणा का स्रोत बना, उस बंद को ऐतिहासिक रूप प्रदान करने के सिलसिले में 16 युवाओं को अपना प्राण बलिदान करना पड़ा था. बाद में भारत बंद के उन शहीदों शहादत को स्मरण करने व बहुजन-मुक्ति की दिशा में एक नया संकल्प लेने के इरादे से 5 मार्च के भारत बंद में अग्रणी भूमिका अदा करने वाले बुद्धिजीवियों ने ’संविधान बचाओ संघर्ष समिति’ के बैनर तले 2 अप्रैल,2019 को ‘रामलीला मैदान चलो’ का आह्वान किया.

उनके आह्वान पर 2 अप्रैल,2018 के शहीदों की शहादत को स्मरण करने के लिए देश के विभिन्न अंचलों से चलकर लोग भारी संख्या में लोग ऐतिहासिक रामलीला मैदान में उपस्थित हुए और कड़ी धूप में सुबह ग्यारह से शाम 6 बजे तक शहादत दिवस की कार्यवाई देखते रहे. उस दिन संविधान बचाओं संघर्ष समिति की ओर से शहीद परिवारों को शाल भेंट कर सम्मानित करने के साथ सरकार के समक्ष मांग राखी गयी कि शहीद परिवारों को एक-एक करोड़ की मुवावजा तथा तथा प्रत्येक के परिवार से एक सदस्य को विवेक तिवारी की विधवा की भांति नौकरी मिले. मांग यह भी रखी गयी कि शहर के चौक-चौराहों पर शहीदों की प्रतिमा लगे तथा 2 अप्रैल के भारत बंद में शामिल लोगों के मुकदमे वापस लिए जाएँ.

2 अप्रैल,2019 को ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 2 अप्रैल,2018 के शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि देने के साथ ‘संविधान बचाओं संघर्ष समिति’ ने अप्रैल 2018 के भारत बंद से प्रेरणा लेते हुए एक और ऐसा काम किया जिसे सरल शब्दों में सामाजिक और राजनीतिक क्रान्ति का एक नया शंखनाद कहा जा सकता है.उस दिन संविधान बचाओ संघर्ष समिति से जुड़े बौद्धिकों ने लोकसभा चुनाव-2019 के लिए 15 सूत्रीय ‘बहुजन मैनिफेस्टो’ जारी करने का ऐतिहासिक काम अंजाम दिया. इसके जरिये उन्होंने देश के राजनीतिक दलों के सामने एक नक्शा पेश कर यह बताया की देश के राजनीतिक दलों को किन मुद्दों पर चुनाव केन्द्रित करना चाहिए.इसके असर को जानने के लिए बहुजन मैनिफेस्टो पर नजर दौड़ा लेना होगा.

बहुजन मैनिफेस्टो में सबसे पहले जातिवार जनगणना पर कहा गया है कि केंद्र सरकार ने 2011 में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना के नाम पर एक आधा-अधूरा सर्वे कराया था। ऐसी घोषणा की गई कि वह काम 2015 में पूरा हो गया, लेकिन आज तक उसकी रिपोर्ट नहीं आई. सरकार एक श्वेतपत्र जारी करके बताएगी कि 4,893 करोड़ रुपए खर्च करके कराई गई उस जातिगत सर्वे का क्या हुआ. अगर ईमानदार और प्रामाणिक आंकड़ा मौजूद हुआ तो उसकी रिपोर्ट जारी की जाए. 2021 की जनगणना में जाति का कॉलम शामिल किया जाए और हर जातियों से संबंधित आंकड़े जारी किए जाएं. जाति की गिनती अलग से नहीं, बल्कि जनगणना में ही कराई जाए. इसका दूसरा बिंदु है आबादी के अनुपात में आरक्षण. जनगणना के आंकड़ों के आधार पर संविधान द्वारा चिह्नित सामाजिक समूहों यानी एससी-एसटी और ओबीसी को आबादी के अनुपात में नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण दिया जाए. चूंकि सवर्ण गरीबों के आरक्षण के लिए 50 प्रतिशत की अदालत द्वारा लगाई गई सीमा तोड़ी जा चुकी है, इसलिए वंचित समूहों को आबादी के अनुपात में आरक्षण देने में अब कोई बाधा नहीं है.ओबीसी आरक्षण 52 फीसदी किया जाएगा. यह घोषणापत्र तीसरे नंबर पर कहता है,’आरक्षण लागू करने के लिए कानून बने’. आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान होने के बावजूद एससी-एसटी-ओबीसी का कोटा नहीं भरा जाता. इसके लिए तमाम तरह के भ्रष्टाचार किए जा रहे हैं, लेकिन आरक्षण का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों को दंडित करने का कोई कानून नहीं है. इसलिए एक ऐसा कानून बनाया जाए, जिससे आरक्षण का नियम तोड़कर नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में भर्तियां करने वाले अधिकारियों को कैद और अर्थदंड दिया जाए और एक बार दंडित किए जाने के बाद उक्त अफसर को नियुक्ति की प्रक्रिया से हमेशा के लिए दूर रखा जाए. चौथे नंबर पर इसमें आरक्षण अनुपालन के लिए लोकपाल बनाये जाने की मांग उठाई गई है.

कोटा का बैकलॉग पूरा होने तक अनरिजर्व कटेगरी की नियुक्तियों पर रोक लगे, यह बात इसमें पुरजोर तरीके से उठाई गयी है .एससी-एसटी-ओबीसी के लाखों पद इतने साल बाद भी खाली पड़े हैं,जबकि अनरिजर्व कटेगरी के पद भर जाते हैं. इस वजह से नौकरशाही और शिक्षा संस्थानों में जबर्दस्त सामाजिक असंतुलन हो गया है. इसलिए आवश्यक है कि सबसे पहले तमाम बैकलॉग पूरे किए जाएं और ऐसा होने तक अनरिजर्व कटेगरी में अब और नियुक्तियां न की जाएं. जब कोटा फुल हो जाए, तो जिस कटेगरी के पद की वेकेंसी हो, उसे उसी कटेगरी से भरा जाए. रोस्टर लागू करने का यही एकमात्र तरीका है. निजी क्षेत्र में आरक्षण बहुजनों की पुरानी मांग रही है, जिसे इसमें पुरजोर तरीके से उठाते हुए कहा गया है कि भारत में 1992 के बाद से अबाध निजीकरण जारी है. कई सरकारी संस्थान निजी हाथों में दिए जा चुके हैं. उन कंपनियों में अब आरक्षण नहीं दिया जा रहा है. एडहॉक और आउटसोर्सिंग की वजह से भी आरक्षण का प्रावधान कमजोर हुआ है. ऐसे में निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने के अलावा सामाजिक न्याय के अनुपालन का कोई रास्ता नहीं है. इसके पहले चरण में उन तमाम निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू किया जाए, जो कंपनियां सरकार से किसी तरह का लोन, सस्ती जमीन, टैक्स छूट आदि लेती हैं. मंडल आयोग की रिपोर्ट में इसका प्रावधान भी है. आउटसोर्सिंग में भी आरक्षण लागू हो,यह बात भी जोरदार तरीके से उठाई गयी है. लेकिन इसका सबसे क्रान्तिकारी पक्ष शायद सप्लाई और ठेकों में आरक्षण है. इस विषय में इसमें कहा गया है. 100 करोड़ तक के ठेके और सप्लाई में आरक्षण लागू किया जाए. केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय निकाय और पीएसयू में 100 करोड़ रुपए तक के तमाम ठेकों और सप्लाई के करारों में आरक्षण लागू किया जाए, ताकि एससी-एसटी-ओबीसी के उद्यमियों और व्यवसायियों को राष्ट्र निर्माण में हिस्सा लेने का मौका मिल सके. इसी तरह बैंक ऋण में सामाजिक विविधता सुनिश्चित की जाने की मांग भी बहुत अहम् है.

इसके अतिरिक्त उच्च न्यायपालिका में आरक्षण लागू किया जाए और राष्ट्रीय न्यायिक सेवा आयोग का गठन किया जाए तथा साथ ही 13 पॉइंट रोस्टर खत्म करने के लिए कानून बनाया जाए, यह बात भी जोरदार तरीके से कही गयी है. ओबीसी आरक्षण से क्रीमी लेयर हटाया जाय यह मांग भी 15 सूत्रीय एजंडे में शामिल की गयी है. किसानों से कर्ज वसूली में एनपीए की वसूली के लिए समान तरीका अपनाया जाय, यह बात भी कही गयी है. लेकिन इसका बेहद क्रन्तिकारी एजेंडा है : राजनीतिक नियुक्तियों में आरक्षण लागू करने की मांग. इसके पक्ष में कहा गया है,’ सरकारी नौकरियों के अलावा देश में बड़ी संख्या में राजनीतिक नियुक्तियां होती हैं, ऐसी नियुक्तियां पीएसयू और बैंकों के बोर्ड से लेकर मंत्रालयों और कंपनियों की सलाहकार समितियों, अकादमियों से लेकर राजदूत और राज्यपाल के रूप में की जाती है. इन नियुक्तियों में आरक्षण लागू किया जाए’. सरकारी भूमि का भूमिहीन एससी-एसटी और ओबीसी में बंटवारा करने तथा शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च मौजूदा स्तर से दोगुना किया जाए, यह बात भी बेहद प्रभावित करने वाली है. यह सब बातें इस बात की सूचक हैं कि 2 अप्रैल,2019 को बहुजन एजेंडे के जरिये सामाजिक और राजनीतिक क्रान्ति का एक नया शंखनाद हो चुका है, जिसके लिए संविधान बचाओ संघर्ष समिति से जुड़े प्रो.रतनलाल, महेंद्र नारायण सिंह यादव, वामन मेश्राम, दिलीप मंडल, अनिल जयहिंद,अनिल चमडिया और इनकी टीम को साधुवाद दिया जा सकता है.

वैसे तो यह ऐतिहासिक दलित एजेंडा 2 अप्रैल,2019 को राष्ट्र के समक्ष पेश किया गया है, किन्तु इससे जुड़े बुद्धिजीवी कुछ सप्ताह पूर्व से ही विभिन्न पार्टियों से संवाद बना रहे थे. फलस्वरूप पिछले दो-तीन दिनों में गैर-भाजपा दलों के जो घोषणापत्र जारी हुए है, उनमें इसका असर देखा जा रहा है. संविधान बचाओं समिति द्वारा जारी दलित अजेंडे का मुख्य जोर नौकरियों से आगे बढ़कर उद्योग-व्यापार,राजनीतिक नियुक्तियों में आरक्षण लागू करवाने पर है और गैर-भाजपा दलों के घोषणापत्रों इसे जगह मिल रही है. अब बहाजन समाज की जिम्मेवारी बनती है कि वह बहुजनवादी दलों के घोषणापत्रों में दलित एजेंडे को शामिल करवाने के लिए आवश्यक दबाव बनाये और जो दल इसे अपने मैनीफेस्तो में जगह नहीं देते, उन्हें चुनाव में सबक सिखाये.

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छात्र ने राहुल गांधी से 72 हजार पर पूछा सवाल, राहुल ने दिया यह जवाब

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के लिए कांग्रेस पार्टी और इसके अध्यक्ष राहुल गांधी पूरा जोर लगा रहे हैं. इसके लिए राहुल देश भर में घूमकर तमाम वर्ग और उम्र के लोगों के बीच जा रहे हैं. इसी कड़ी में राहुल गांधी ने शुक्रवार 5 अप्रैल को महाराष्ट्र के पुणे में छात्रों से सीधा संवाद किया. इस दौरान कई छात्रों ने राहुल गांधी से खुलकर सवाल किए, तो राहुल गांधी ने भी उन्हें निराश नहीं किया और जवाब दिया. एक छात्र ने जब राहुल गांधी से न्याय योजना के लिए फंड कहां से आएगा, पूछा तो राहुल गांधी ने उसका भी जवाब दिया.

छात्र ने राहुल गांधी से सवाल किया था कि आपने 20 फीसदी गरीबों को 72 हजार रुपये सालाना देने का वादा किया है. इसके लिए पैसा कहां से लाएंगे. राहुल ने कहा कि हम नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या, अनिल अंबानी से पैसा लाएंगे. किसी मिडिल क्लास के लिए टैक्स नहीं बढ़ाएंगे. राहुल बोले कि हमने पूरा हिसाब लगा लिया है, पैसा कहां से आना है और कैसे बांटा जाना है. पहले पायलट प्रोजेक्ट होगा और उसके बाद पूरे देश में लागू किया जाएगा. राहुल गांधी ने रोजगार को लेकर भी बातचीत की. उन्होंने कहा कि चीन जहां रोजगार पैदा कर रहा है तो हमारे देश में हर 24 घंटे में 27 हजार नौकरियां खोई जा रही हैं. छात्रों से संवाद करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा.

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नीतीश को लेकर लालू के बयान से बिहार की राजनीति में हलचल

नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने अपनी किताब में तमाम बातें साझा की है. इसमें लालू यादव ने जो बातें लिखी है, उससे बिहार की सियासत में बवाल हो गया है. अपनी किताब में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) अध्यक्ष लालू यादव ने दावा किया है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग होने के महीने बाद ही दोबारा से महागठबंधन में शामिल होना चाहते थे. लेकिन उन्होंने नीतीश को वापस लेने से इंकार कर दिया.

लालू ने दावा किया है कि इसके लिए नीतीश के करीबी और जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने पांच बार उनसे मुलाकात की थी. हालांकि पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर ने लालू के इस दावे को खारिज कर दिया है और इन सारी बातों को बकवास कहा हैं.

राजद अध्यक्ष के दावे को बेबुनियाद बताते हुए प्रशांत किशोर ने कहा कि लालू अपने आप को चर्चा में बनाए रखने के लिए एक नाकामयाब कोशिश कर रहे है. लालू के अच्छे दिन अब पीछे रह गए हैं.हालांकि प्रशांत किशोर ने कहा, ‘हां मैंने जदयू ज्वाइन करने से पहले लालू यादव से मुलाकात की थी लेकिन ऐसी कोई बात नहीं हुई थी. अगर मुझसे ये पूछा जाए कि लालूजी से क्या-क्या बातें हुई और अगर मैंने बता दिया तो लालू जी को काफी शर्मिंदगी महसूस होगी.

बता दें कि लालू यादव ने अपनी किताब गोपालगंज टू रायसीना: माइ पॉलिटिकल जर्नी‘ में दावा किया है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोबारा से गठबंधन का हिस्सा बनना चाहते थे. लेकिन लालू ने नीतीश को वापस महागठबंधन में लेने से साफ इनकार कर दिया क्योंकि नीतीश लालू का भरोसा खो चुके थे.

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मायावती-अखिलेश से डरे योगी ने निषादों को सौंपी गोरखपुर सीट

आभार- NDTVइंडिया

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश में एक बड़ा सियासी उलटफेर हुआ है. गोरखपुर में सपा के टिकट पर और बसपा के समर्थन से योगी आदित्यनाथ के गढ़ में उन्हें मात देने वाले वर्तमान सांसद प्रवीण निषाद भाजपा में शामिल हो गए हैं. खबर है कि वो भाजपा के टिकट पर गोरखपुर से चुनाव लड़ेंगे. अभी पिछले ही दिनों निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने अखिलेश यादव के समक्ष सपा-बसपा गठबंधन में शामिल होने की घोषणा की थी, लेकिन उसके दो दिन बाद ही वह भाजपा के पीछे घूमने लगे और गठबंधन से नाता तोड़ दिया.

इसके बाद संजय निषाद ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की जिसके बाद आज चार अप्रैल को संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद भाजपा में शामिल हो गए. राजनीतिक स्वार्थ का सौदा किस तरह किया गया वह जानने के लिए इस बात को समझिए. निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के बेटे और गोरखपुर से सांसद प्रवीण निषाद ने जहां भाजपा की सदस्यता ले ली है तो वहीं उनके पिता अपनी निषाद पार्टी के साथ एनडीए गठबंधन में शामिल हैं. भाजपा के यूपी प्रभारी जे.पी. नड्डा ने प्रवीण निषाद को गोरखपुर से चुनाव लड़ाने का संकेत भी दिया है. निषाद पार्टी के इस कदम से सपा-बसपा गठबंधन को झटका लगा है, जिसके टिकट और समर्थन से ही प्रवीण निषाद उपचुनाव में गोरखपुर लोकसभा सीट से योगी आदित्यनाथ के करीबी और भाजपा प्रत्याशी उपेन्द्र शुक्ला के खिलाफ 26 हजार वोटों से जीते थे.

गोरखपुर संसदीय सीट को लेकर योगी आदित्यनाथ को गठबंधन बनने के बाद ही डर सता रहा था. इस सीट से योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा जुड़ी थी, और भाजपा और योगी किसी भी कीमत पर गोरखपुर सीट को हारना नहीं चाहते थे. इसलिए उन्होंने ऐसा रास्ता चुना की गोरखपुर में सांसद भाजपा पार्टी का ही बने. इस सीट पर निषाद पार्टी इसलिए अहम है क्योंकि गोरखपुर में निषाद करीब 3.5 लाख है जो किसी भी पार्टी की हार जीत का फैसला करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. संभव है कि योगी आदित्यनाथ और भाजपा प्रवीण निषाद को पार्टी में शामिल कर अपनी इज्जत बचाने में कामयाब हो जाएं लेकिन इसके लिए भाजपा और योगी आदित्यनाथ ने जो रास्ता चुनाव है, उसने साबित कर दिया है कि भाजपा सपा-बसपा गठबंधन को लेकर कितना डरी हुई है.

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जिग्नेश मेवाणी पर सवाल क्यों उठा रहे हैं गुजरात के लोग

उनाकांड के पीड़ित दलित परिवार धरने पर बैठे हैं। उन्हें इंसाफ नहीं मिला है। वह सरकार से विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनाकांड के कई आरोपी भी जेल से छूट गए हैं। लेकिन जिग्नेश भाई बिहार में “मां की कसम” खाकर कन्हैया कुमार के लिए वोट मांग रहे हैं। उनसे पूछिए कि ऐसे हालात में क्या उनको उना नहीं होना चाहिए। अच्छा छोड़िए जिग्नेश भाई उना कांड की पीड़ित परिवार से आपका छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है। लेकिन उस नौजवान के लिए तो आंदोलन कीजिये जो 3 साल से जेल में बंद है।

अमरेली का नौजवान दलित कार्यकर्ता कांति भाई बाला 3 साल से जेल में बंद है। उना कांड के विरोध में कांतिबाला ने आंदोलन चलाया था। जिस पर सरकार ने हजारों लोगों पर केस दर्ज करवाया था। कांतिबाला तो अपने विधायक जिग्नेश मेवानी का इंतजार है कि वह कभी उसकी रिहाई के लिए आवाज़ उठाएंगे। उसकी रिहाई के लिए कोई आंदोलन चलाएंगे। चलिए आंदोलन ना सही विधानसभा में सरकार से प्रश्न ही पूछ लेंगे। लेकिन जिग्नेश भाई को तो जगतनेता बनने का भूत सवार है। इंडिया के कोने-कोने में जाकर भाषणबाजी कर रहे हैं।

एक बात और बता रहा हूं जिग्नेश जिस बनासकांठा जिले की बडगाम सीट से विधायक हैं, वह बनासकांठा छुआछूत और अस्पृश्यता का शिकार है। लेकिन जिग्नेश भाई क्या कोई आंदोलन चला रहे हैं? क्या उनकी आवाज़ उठा रहे हैं। अभी दबंगों ने एक दलित परिवार की जमीन पर कब्जा कर लिया है, लेकिन जिग्नेश मेवानी को बेगूसराय में कन्हैया से दोस्ती निभानी हैं, बाकी जिस समाज से निकलकर आए हैं, उस समाज को ही भूल गए।

जिग्नेश ने कहा था, “हमने सरकार को आवंटित ज़मीन के अधिकार दलितों और ओबीसी को लौटाने के लिए 6 दिसंबर तक की मोहलत दी है. इसके बाद हम जबरन कब्जा ले लेंगे।” क्या जिग्नेश ने कभी किसी दलित-पिछड़े को कब्जा दिलवाया? क्या कोई आंदोलन किया?

गुजरात के एक दलित कार्यकर्ता ने मुझे कहा कि भैया जिग्नेश बिहार गया है, उसे वहीं रख लो। आधार कार्ड और राशन कार्ड बनवाकर एक घर भी दिलवा देना। गुजरात को ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है। दलित कार्यकर्ता ने बताया कि जिग्नेश ने दलितों के आंदोलन की क्रैडिबिलिटी को खत्म कर दिया है। दलित कार्यकर्ता बताते हैं कि जिग्नेश ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए दलित आंदोलन का ऐसा नुकसान किया है कि लोग सभी आंदोलनकारियों को ठग समझने लगे हैं। जिग्नेश की राजनीति आंदोलनों को कुचलने लगी है।

  • निसार सिद्दीकी  (लेखक पत्रकार हैं)

राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने पर ‘लाल’ क्यों हैं वाम दल

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नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी के अलावा केरल की वायनाड सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. राहुल आज यहां अपनी बहन और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के साथ पहुंचे, जहां उन्हें नामांकन दाखिल करना है. विपक्ष इसको लेकर राहुल गांधी पर निशाना साध रहा है, लेकिन राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने के पीछे असली कारण कुछ और है.

दरअसल राहुल गांदी वायनाड ऐसे नहीं आए हैं. बल्कि वो यहां से केरल के अलावा तमिलनाडु और कर्नाटक को साधने की कोशिश में हैं. वायनाड से गांधी परिवार के रिश्ते को देखते हुए इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता. यहां से कांग्रेस का सिर्फ राजनीतिक रिश्ता नहीं है बल्कि गांधी परिवार की कई यादें भी जुड़ी हैं. तो राहुल गांधी का यहां से भावनात्मक रिश्ता है. राहुल गांधी के पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से लेकर दादी इंदिरा गांधी तक का यहां से गहरा लगाव रहा है. इसी के नाते राहुल ने वायनाड को चुना. 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्या के बाद उनकी अस्थियों को केरल के कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री के. करुणाकरन ने वायनाड के पापनाशिनी नदी में विसर्जित किया गया था.

 राजीव गांधी की अस्थियों को विसर्जित करने के लिए पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी के साथ राहुल गांधी खुद वायनाड गए थे. उन्होंने के. करुणाकरन के साथ वायनाड की पापनाशिनी नदी में उसे विसर्जित किया था. उसी दौरान हुए 1991 के लोकसभा चुनाव में केरल की कुल 20 सीटों में से कांग्रेस को 13, मुस्लिम लीग को 2, सीपीएम को 3 और अन्य को एक सीट मिली थी. इसी तरह से 1991 के विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी वामपंथी गठबंधन को तगड़ा झटका लगा था.

यही वजह है कि वामपंथी दल राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने का तगड़ा विरोध कर रहे हैं. जाहिर है कि राहुल गांधी के यहां से चुनाव लड़ने से वो तमाम बातें और मुद्दे सामने आएंगे. राहुल के वहां होने से प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी का भी वहां दौरा होगा. ऐसे में यह सीट कांग्रेस पार्टी के तमाम अन्य दिग्गज नेताओं के भी केंद्र में रहेगा. वाम दलों को इसी से परेशानी है. उन्हें पता है कि अगर यहां कांग्रेस पार्टी को फायदा होगा तो नुकसान सिर्फ वाम दलों का होगा. जबकि राहुल गांधी की निगाह केरल, तामिलनाडु और कर्नाटक इन तीनों प्रदेशों के लोकसभा सीटों को साधने की है.

मध्यप्रदेश में बसपा ने ठोका ताल, 9 सीटों पर उम्मीदवार घोषित

भोपाल। मध्यप्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव करने वाली बहुजन समाज पार्टी ने प्रदेश के 9 लोकसभा सीटों के लिए अपनी पहली सूची जारी कर दी है. जिन सीटों की घोषणा की गई है उसमें मुरैना से डॉ. रामलखन कुशवाहा, गुना से लोकेंद्र सिंह धाकड़, सतना से अच्छेलाल कुशवाहा, रीवा से विकास पटेल, सीधी से रामलाल पनिका को टिकट दिया गया है. इसके अलावे छिंदवाड़ा से ज्ञानेश्वर गजभिये, बालाघाट से रामकुमार नगपुरे (लोधी), जबलपुर से राम राज राम और खंडवा से नंदकिशोर धांडे बतौर बसपा प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं.

 पार्टी ने प्रदेश की दो सीटें समाजवादी पार्टी के लिए छोड़ी है, जबकि एक सीट गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के हिस्से आई है. बसपा के प्रदेश प्रभारी और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी गौतम के मुताबिक बसपा प्रदेश की 3 सीटों को छोड़कर सभी सीटों से चुनाव लड़ेगी. उन्होंने बताया कि बाकी की बची 17 सीटों पर बसपा जल्दी ही अपने उम्मीदवार के नामों की घोषणा करेगी. गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली बसपा ने खजुराहो और टीकमगढ़ की सीट समाजवादी पार्टी के लिए छोड़ी है, जबकि मंडला की सीट गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के लिए छोड़ी गई है.

रवीश का ब्लॉग- कांग्रेस के घोषणा पत्र में न्याय योजना सबसे खास

2019 के चुनावों के लिए कांग्रेस का घोषणा पत्र आ गया है. इधर-उधर के बयानों से बेहतर है कि अब घोषणा पत्रों में लिखी गई बातों को पकड़ा जाए. उन्हें याद रखा जाए. उसी तरह से जैसे 2014 के चुनावों में बीजेपी के घोषणा पत्र की कई बातों को पूरे पांच साल याद रखा गया. कांग्रेस के घोषणा पत्र के कवर पर लिखा है हम निभाएंगे. पहले पन्ने पर राहुल गांधी का बयान लिखा है कि मेरा किया हुआ वादा मैंने कभी नहीं तोड़ा. प्रस्तावना में राहुल गांधी ने लिखा है कि पांच साल में जो सबसे ख़तरनाक चीज़ें हुईं हैं वह यह कि आम जनता के बीच प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के शब्दों ने अपना विश्वास खो दिया है. उन्होंने हमें केवल खोखले वादे, असफल कार्यक्रम, झूठे आंकड़े, भय और नफरत का वातारण दिया है. राहुल ने शुरुआत सवालों से की है कि 2019 का भारत कैसा होगा? वे लिखते हैं कि क्या भारत एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश होगा? क्या भारत के लोग भय से मुक्त होंगे? अपनी इच्छा अनुसार जीवन जीने, काम करने, खाने-पीने, स्वेच्छा से जीवनसाथी चुनने के लिए स्वतंत्र रहेंगे? क्या गरीबी से मुक्ति पाने के लिए अपनी आकांक्षाओं और महत्वकांक्षाओं, को परिपूर्ण करने के प्रयास के लिए स्वतंत्र होंगे? या क्या भारत उस विभाजनकारी, विध्वंसकारी विचारधारा से संचालित होगा जो लोगों के अधिकारों को, संस्थाओं को, विविधतापूर्ण सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्ववादी स्वस्थ मतभिन्नता के विचार को, जो कि भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक समाज और देश की आत्मा है, रौंदकर छिन्न-भिन्न कर देगा?

दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में घोषणा पत्र को लांच किया गया. इसमें कांग्रेस ने अपने पुराने काम जैसे आईआईटी से लेकर एम्स बनाने को गिनाया है. हरितक्रांति, श्वेतक्रांति का ज़िक्र है. 2004 से 2014 के बीच 14 करोड़ लोगों को ग़रीबी के कुचक्र से निकाला गया. 1965 के युद्ध में विजय प्राप्त की, 1971 के युद्ध में विजय प्राप्त की. पाकिस्तान को पराजित कर बांग्लादेश को मुक्त करवाया. इन बातों का ज़िक्र बता रहा है कि कांग्रेस सत्तर साल में क्या हुआ, मोदी के आरोपों का जवाब देने का प्रयास कर रही है. सत्तर साल में क्या हुआ का जवाब देने की कोशिश की गई है. कई जगहों पर दोहराया गया है कि हमने पहले भी किया है, हम इसे फिर से करेंगे.

राहुल गांधी का 5 करोड़ ग़रीब परिवारों को हर महीने 6000 देने का वादा कर रहे हैं, प्रधानमंत्री मोदी का 10 करोड़ किसानों को एक साल में 6000 देने की योजना लागू कर चुके हैं, दोनों से यह तो ज़ाहिर होता है कि निचले पायदान तक विकास ने जीवन को नहीं बदला है. किसानों की हालत खराब नहीं होती तो मोदी सरकार को 75,000 करोड़ सीधे किसानों को देने की योजना क्यों बनानी पड़ती.

अरुण जेटली ने अभिजीत बनर्जी का ज़िक्र किया वे एमआईटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं. उनका कहना है कि टैक्स बढ़ाना होगा, वेल्थ टैक्स बढ़ाने होंगे और जीसएटी भी. आप जानते हैं कि भारत में जितनी संपत्ति है उसका 73 प्रतिशत सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के पास है. निचले पायदान के पचास फीसदी आबादी के पास जितनी संपत्ति है, जिसके बराबर भारत के सिर्फ 9 लोगों के पास संपत्ति है. क्या अमीरों पर टैक्स बढ़ाना चाहिए, यह एक सवाल है जिस पर बहस अमीर लोगों के बीच तो होगी नहीं, ग़रीब लोगों के बीच करने से क्या फायदा. हमारे सहयोगी ऑनिंदो चक्रवर्ती ने सिम्पल समाचार में बताया है कि यह योजना संभव है. कुछ हिस्सा अभी दिखा रहे हैं.

5 करोड़ गरीब परिवारों को हर महीने 6000 रुपये देने की बात पर कई राय है. अब आते हैं रोज़गार पर. रोज़गार के बारे में राहुल गांधी ने लिखा है उसे ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए. पेज नंबर 12 पर लिखा है कि 1 अप्रैल 2019 के अनुसार केंद्र सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, न्यायपालिका और संसद के सभी 4 लाख रिक्त पदों को 30 मार्च 2020 तक भरा जाएगा. बाकी राज्यों को धन देते समय कहा जाएगा कि वे 20 लाख रिक्त पदों को भरें.

एक साल में केंद सरकार 4 लाख वैकेंसी भरेगी. उसके अगले साल क्या होगा. बाकी के 18 लाख पदों की जवाबदेही राज्य सरकारों पर है. राज्य सरकारों की भर्ती प्रणाली इतनी बोगस है कि एक साल में 20 लाख पदों को भरना उनके बस की बात नहीं. फिर केंद्र से धन मिलने की शर्त में यह बात होगी तो राज्य सरकारें क्या स्वीकार करेंगी. आज एक यूपी से बेरोज़गार ने मैसेज किया. यूपी अधीनस्थ लोक सेवा आयोग ने कई परीक्षाएं करा लीं हैं मगर नतीजे नहीं आ रहे हैं. लैब ऑपरेटर और ट्यूबवेल ऑपरेटर के रिजल्ट नहीं आ रहे हैं. सरकारी नौकरियां दूसरी समस्या भी झेल रही हैं. केस और कैंसिल की समस्या. महंगे फॉर्म की समस्या. कांग्रेस को यह भी कहना चाहिए था कि इन परीक्षाओं को लेकर उसकी क्या सोच है. फिर भी इन डिटेल को याद रखिए. भाषण और डिटेल में फर्क होता है. बेरोज़गारी के आंकड़े से आज भी वित्त मंत्री ने सवाल उठाए. इससे अच्छा होता कि जेटली जी संख्या बता देते कि पांच साल में कितनी नौकरी दी गई. कम से कम सरकारी नौकरियों की ही संख्या बता देते.

जेटली जी की इस कहानी से तो भारत में कोई बेरोज़गार ही नहीं है. एक बात को समझिए. ज़रूरी नहीं कि जीडीपी बढ़ जाए तो रोज़गार बढ़े ही. कई बार जॉबलेस ग्रोथ की स्थिति भी होती है. जीडीपी बढ़ती है मगर रोजगार नहीं बढ़ता है. रोज़गार पर किए जाने वाले वादों और सवालों को ध्यान से देखिए. दो करोड़ रोज़गार देने का वादा मोदी ने किया था, उस पर कोई सफाई नहीं मगर तब 2014 में मोदी पूछा करते थे कि कांग्रेस ने एक करोड़ रोज़गार देने का वादा किया है पूछो मिला क्या. अब आते हैं शिक्षा पर कांग्रेस ने क्या कहा है. इस वक्त शिक्षा पर जीडीपी का 3.3 प्रतिशत खर्च होता है. कांग्रेस ने वादा किया है कि वह शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करेगी.

बीजेपी नेता वरुण गांधी ने एक बार कहा था कि सर्व शिक्षा अभियान पर 3 लाख करोड़ से अधिक खर्च हुआ मगर उसका करीब 90 फीसदी भवन निर्माण पर हुआ. अच्छी शिक्षा और शिक्षकों के रोज़गार पर नहीं. सेंट्रल यूनिवर्सिटी बन जाती है मगर वहां शिक्षक नहीं होता. एक चुनाव से दूसरे चुनावों के बीच उनके भवन जर्जर होने लगते हैं. फिर भी यह बड़ा ऐलान है कि शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च हो. आपने प्राइम टाइम की यूनिवर्सिटी सीरीज़ में देखा होगा कि कस्बों और ज़िलों के कॉलेज जर्जर हो चुके हैं. इसकी कीमत आप दो तरह से चुकाते हैं. घटिया शिक्षा मिलने के कारण जीवन भर के लिए पीछे रह जाते हैं. फिर शहर जाते हैं पढ़ने के लिए तो वहां के भी घटिया कॉलेज में एडमिशन लेते हैं. इस पर आपका लाखों रुपया मिट्टी हो जाता है. कस्बों का नौजवान जीवन भर के लिए निम्न मध्यम वर्ग की श्रेणी में ही हाथ पांव मारता रहता है. फिर दिल्ली में बैठे नीति नियंता लेक्चर देते हैं कि भारत के नौजवानों की क्वालिटी नौकरी की ज़रूरत के लायक नहीं है. कांग्रेस ने भी अपने दस सालों में उच्च शिक्षा को नज़रअंदाज़ किया जिसकी पतन को बीजेपी की पांच साल की सरकार ने और तेज़ कर दिया. बेहतर है कि कांग्रेस को यह बात समझ आई है. इस संकट में आप क्षेत्रीय दलों को भी शामिल करें.

आज ही बिहार यूनिवर्सिटी का एक छात्र मिलने आया था. कह रहा था कि 3 साल के बीए के 5 साल हो गए मगर अभी तक 3 साल की डिग्री पूरी नहीं हुई है. इसका कारण भी पिछले दस बीस साल की नीतियां रही हैं. अब आते हैं खेती पर, हम सिर्फ कर्ज़माफी करके ही अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ेंगे, बल्कि उचित मूल्य, कृषि में कम लागत, बैंकों से ऋण सुविधा के द्वारा हम किसानों को कर्ज़ मुक्ति की तरफ ले जाने का वादा करते हैं. ऋण चुकाने में असमर्थ किसानों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही करने की अनुमति नहीं देंगे. अलग से किसान बजट पेश करेंगे. भाजपा सरकार की असफल फसल बीमा को पूरी तरह बदल देंगे, जिसने किसानों की कीमत पर बीमा कंपनियों की जेब भरी है. बीमा कंपनियों को निर्देशित करेंगे कि वे न लाभ न हानि के सिद्धांत को अपनाते हुए फसल बीमा दें और उसी आधार पर किस्त लें. कांग्रेस कृषि उपज मंडी समितियों के अधिनियम में संशोधन करेगी, जिससे कि कृषि उपज के निर्यात और अंतर्राज्यीय व्यापार पर लगे सभी प्रतिबंध समाप्त हो जाएं. किसान बाज़ार की स्थापना होगी जहां किसान बिना प्रतिबंधन के अपने उत्पाद बेच सकेंगे. प्रत्येक ब्लॉक में गोदाम और कोल्ड स्टोरेज बनेगा. इसके अलावा मनरेगा में 100 दिन की जगह 150 दिन का रोज़गार मिलेगा.

कांग्रेस ने वादा किया है कि सभी वस्तुओं और सेवाओं पर एक समान जीएसटी होगी. न्यापालिका में सुधार को लेकर कांग्रेस ने कई वादे किए हैं. न्यायपालिका में अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी, अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व काफी कम है. इसे ठीक करने का वादा किया गया है. इसके अलावा कहा गया है कि संविधान की व्याख्या करने तथा राष्ट्रीय तथा कानूनी महत्व के अन्य मामलों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट को संवैधानिक न्यायालाय बनाने के लिए संविधान में संशोधन किया जाए. उच्च न्यायालयों और आदेशों की अपील सुनने के लिए, 6 अलग-अलग स्थानों में उच्च न्यायलयों और उच्चतम न्यायालय के बीच कोर्ट ऑफ अपील की स्थापना के लिए संविधान में संशोधन किया जाएगा. कोर्ट ऑफ अपील में 3 न्यायधीशों की बेंच अपील का निपटारा करेगी. कांग्रेस कानून बनाकर एक स्वतंत्र न्यायिक शिकायत आयोग की स्थापना करेगी जो न्यायधीशों के खिलाफ कदाचार की शिकायतें देकर उपयुक्त कार्यवाही के लिए संसद को परामर्श देंगे.

सुप्रीम कोर्ट को संवैधानिक न्यायलय बनाने की बहस पुरानी है. नई बात नहीं है मगर अब नया यह है कि कांग्रेस ने ऐसा करने का वादा किया है. दुनिया के कई मुल्कों में जो सुप्रीम कोर्ट होता है वह संवैधानिक न्यायलय होता है यानी वहां उन्हीं मामलों की सुनवाई होती है, जिनमें संवैधानिक व्याख्या की ज़रूरत होती है. सुप्रीम कोर्ट का मेन काम ही है संविधान की विवेचना करना. दूसरा कोर्ट ऑफ अपील का प्रस्ताव बेहतर है. छह जगहों पर कोर्ट ऑफ अपील बनेगी तो ज़रूरी नहीं कि लखनऊ हाईकोर्ट के फैसले के बाद दिल्ली ही आना हो, हो सकता उस ज़ोन के कोर्ट ऑफ अपील में ही सुनवाई हो जाए. अभी हर अपील के लिए दिल्ली आना पड़ता है. इससे बहुत से लोग सुप्रीम कोर्ट तक नहीं आ पाते हैं. इस पर बहस होनी चाहिए कि क्या कोर्ट ऑफ अपील वक्त की ज़रूरत है या नहीं. तीसरी बात कि इस वक्त जजों पर आरोप लगते हैं तो महाभियोग से नीचे कुछ नहीं है. वो एक जटिल प्रक्रिया है. क्या इससे नीचे की कार्यवाही का प्रावधान नहीं होना चाहिए. क्या कांग्रेस इसका वादा कर रही है. यह सब तब होगा जब चुनाव मेनिफेस्टो पर होगा. वो तो हिन्दू-मुस्लिम पर हो रहा है.

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प्रधानमंत्री ने भले प्रेस कांफ्रेस नहीं की है, मगर उन्होंने एंकरों को कई इंटरव्यू दिया है. उनमें सवालों के स्तर को लेकर समीक्षकों के बीच सवाल उठते रहते हैं. अब अगर उनका प्रेस कांफ्रेंस हो भी जाएगा तो इसकी क्या गारंटी की खूब सवाल पूछे जाएंगे. चुनाव के समय ऐसे ख्यालों की फकीरी ठीक नहीं लगती है. कांग्रेस के घोषणा पत्र में प्रेस पर भी काफी कुछ कहा गया है. देशद्रोह के कानून को समाप्त कर दिया जाएगा. भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए को कांग्रेस समाप्त करने जा रही है. कांग्रेस का मानना है कि इसका दुरुपयोग हुआ है. यही नहीं, मीडिया के लिए भी काफी कुछ है. सार्वजनिक हित के मामलों को उजागर करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा की बात है. मीडिया में स्वामित्व का मामला काफी जटिल है. एक कंपनी जो माइनिंग में है वो चैनल लांच करती है और फिर चैनल के दम पर माइनिंग में विस्तार कर लेती है. इसके कारण मीडिया सरकार के अधीन होने लगता है. क्या कांग्रेस वाकई मीडिया में क्रॉस स्वामित्व को लेकर गंभीर है? वादा किया है कि कांग्रेस मीडिया में एकाधिकार रोकने के लिए कानून पारित करेगी, ताकि विभिन्न क्षेत्रों के क्रॉस स्वामित्व तथा अन्य व्यावसायिक संगठनों द्वारा मीडिया पर नियंत्र न किया जा सके. कांग्रेस भारत के प्रतिस्पर्धा आयोग को संदिग्ध एकाधिकार के मामलों की जांच के लिए कहेगी.

कांग्रेस कैसे करेगी यह काम, इस वक्त बहुत से ऐसे चैनल हैं जिनका मूल बिजनेस कुछ और है. बहुत से चैनल हैं जिन्होंने बाद में दूसरा बिजनेस खोल लिया है. क्या कांग्रेस अपने इस वादे को पूरा करने के लिए कॉरपोरेट से लोहा लेगी. मीडिया संस्थानों से टकरा पाएगी? इसलिए कहा कि मेनिफेस्टो को पढ़ना भले बोरिंग हो टीवी के लिए मगर पढ़ना चाहिए. कांग्रेस ने वादा किया है कि वह सिनेमेटोग्राफ 1927 में बदलाव करेगी. सेंसरशिप को अश्लीलता और राष्ट्रीय सुरक्षा तक सीमित करेगी. फिल्मों को प्रमाणित करने के लिए पारदर्शी तरीका अपनाया जाएगा. सारा मेनिफेस्टो तो नहीं पढ़ा जा सकता है. धीरे-धीरे इसकी चर्चा होगी या अगर चुनाव हिन्दू मुस्लिम पर ही हो गया तो फिर इसे चुनाव के बाद पढ़ा जाएगा.

  • टीवी पत्रकार रवीश कुमार के ब्लॉग से साभार