बसपा के सपा से गठबंधन तोड़ने पर भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर ने दिया बयान

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नई दिल्ली। भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर ने पहली बार सीधे तौर पर बीएसपी प्रमुख मायावती पर निशाना साधा है. चंद्रशेखर ने बुधवार को मायावती पर कांशीराम द्वारा शुरू किए गए सामाजिक न्याय आंदोलन को कमजोर करने के प्रयास का आरोप लगाया है. चंद्रशेखर ने कहा कि मायावती ने समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन तोड़कर बहुजन आंदोलन को कमजोर कर दिया है. उन्होंने कहा, ‘यह फैसला उन कमजोर वर्ग के लोगों के पक्ष में नहीं है, जिन्हें इस गठबंधन से मजबूती मिली थी’. चंद्रशेखर ने कहा कि बसपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी ताकत खो दी है. भीम आर्मी प्रमुख ने कहा, “जब उन्होंने सपा के साथ गठबंधन की घोषणा की, तो बसपा कार्यकर्ताओं ने खुद को आश्वस्त किया कि पार्टी आगे बढ़ेगी, लेकिन तभी उन्होंने गठबंधन तोड़ कर सभी को निराश कर दिया”.

भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर ने भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने और अपने भाई आनंद कुमार और भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के शीर्ष पदों पर नियुक्त करने पर भी मायावती को आड़े हाथों लिया. यह पूछे जाने पर कि क्या 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी भाग लेगी, उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर अभी तक निर्णय नहीं लिया गया है. आपको बता दें कि बसपा सुप्रिमो मायावती हमेशा चंद्रशेखर की आलोचना करती रही हैं. उन्होंने चंद्रशेखर को भाजपा की बी टीम तक कहा लेकिन, ऐसा पहली बार है जब भीम आर्मी प्रमुख ने बसपा अध्यक्ष पर हमला बोला है.

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जेल में हथियार लहराने का वीडियो वायरल, जानिए आखिर क्या हुआ था

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उन्नाव जेल मामले में बुधवार को बड़ी कार्रवाई हुई. उन्नाव जेल अधीक्षक एके सिंह की रिपोर्ट पर चार जेलकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई है. दो हेड वार्डर और दो जेल वार्डर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश जारी किए गए हैं. अब चारों जेलकर्मियों के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई की जाएगी. आपको बता दें कि यहां उम्रकैद की सजा काट रहे दो कैदियों का जेल के अंदर हथियार लहराते वीडियो वायरल हुआ था. मामले पर हड़कंप मचते ही जिलाधिकारी ने जेल अधीक्षक को कड़ी फटकार लगाते हुए रिपोर्ट तलब की थी.

उन्नाव जेल में तैनात हेड वार्डर माता प्रसाद और हेमराज के साथ जेल वार्डर सलीम और अवधेश साहू के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं. इन्हीं 4 जेलकर्मियों की मिलीभगत से बदमाशों ने हथियार लहराते वीडियो बनाया और उसे वायरल किया था. अब जेल विभाग में बदमाशों से मिलीभगत करने वाले जेलकर्मियों को भी बर्खास्त करने की तैयारी है.

घटना प्रकाश में आने के बाद बुधवार शाम जिलाधिकारी देवेंद्र कुमार पांडेय, एसपी माधव प्रसाद वर्मा, एडीएम राकेश कुमार सिंह, एएसपी विनोद कुमार पांडेय, सीओ सिटी उमेश चंद्र त्यागी समेत आधा दर्जन अधिकारी जिला जेल पहुंच कर छानबीन की. वीडियो वायरल होने से हुई बदनामी पर डीएम ने जेल अधीक्षक एके सिंह और जेलर बृजेंद्र सिंह को फटकार लगाई और मामले की फौरन तफ्तीश के लिए रिपोर्ट तलब की.

अब तक की जांच में हेड जेल वार्डर माता प्रसाद, हेमराज, जेल वार्डर अवधेश साहू और सलीम खां की मिलीभगत पाई गई है. जिला प्रशासन अब इन्हें बर्खास्त करने की तैयारी में लगा है. जांच में पाया गया कि एक साजिश के तहत हथियार लहराते वीडियो को वायरल किया गया.

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भाजपा नेता के बिगड़े विधायक बेटे के खिलाफ निगम कर्मियों ने खोला मोर्चा

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भाजपा के बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय के विधायक बेटे आकाश विजयवर्गीय द्वारा खुलेआम निगम अधिकारी से मारपीट करने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. बुधवार को इस घटना के बाद नगर निगम ने भी अपने तेवर सख्त कर दिए हैं. इंदौर नगर निगम के इस मामले में 21 कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया है. इन पर आरोप है कि इन लोगों ने बीजेपी विधायक आकाश विजयवर्गीय का साथ दिया था.

 इसके साथ ही बीजेपी विधायक आकाश विजयवर्गीय पर कार्रवाई की मांग भी जोर पकड़ने लगी है. विधायक की गुंडागर्दी के विरोध में इंदौर नगर निगम में कर्मचारियों ने काम ठप्प कर दिया है और सड़क पर उतर आए हैं. निगम के सभी विभागों के कर्मचारियों ने काली पट्टी बांधकर आकाश विजयवर्गीय के खिलाफ विरोध जताया. खास बात यह है कि इस मामले में सफाई देने और अपने बिगड़े विधायक बेटे की गलती मानने की बजाय भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय अपने बेटे का बचाव करने में जुटे हैं.

भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का विधायक बेटा सरेआम गुंडागर्दी करते हुए

गौरतलब है कि आकाश विजयवर्गीय इंदौर 3 से बीजेपी विधायक है. उसने बुधवार को गंजी कंपाउंड इलाके में नगर निगम की टीम के काम में बाधा डाला. नगर निगम की टीम एक जर्जर मकान ढहाने गयी थी. लोग इसका विरोध कर रहे थे. उसी दौरान आकाश भी अपने समर्थकों के साथ वहां पहुंच गया और कार्रवाई का विरोध करने लगा. उसने खुलेआम अधिकारियों को चेतावनी भी दी. उसकी गुंडागर्दी यहीं नहीं रुकी बल्कि उसने निगम की जेसीबी मशीन की चाभी निकाल ली. आकाश विजयवर्गीय और निगम अधिकारियों के बीच इस दौरान तीखी बहस हुई. उसके बाद आकाश ने बैट उठाया और सरेआम गुंडागर्दी दिखाते हुए नगर-निगम के अफसर को पीटना शुरू कर दिया.

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‘धार्मिक उन्माद’ पर मायावती ने बोला भाजपा पर हमला

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की मुखिया मायावती ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर हमला बोला है. नीति आयोग की रिपोर्ट में यूपी की बदहाल सेवाओं और धर्म-जाति के नाम पर हो रहे अपराधों को लेकर माया ने सरकार पर निशाना साधा. बीएसपी चीफ ने बीजेपी को डबल इंजन वाली सरकार बताया और सवाल उठाया कि जातिवादी और धार्मिक उन्मादियों को सरकार क्यों मायावती ने झारखंड के चर्चित मॉब लिचिंग मामले में ट्वीट किया,’बीजेपी सरकारें ऐसे जातिवादी व धार्मिक उन्मादी जघन्य अपराध अपने राज्यों में लगातार क्यों होने देती हैं जिससे पूरा राज्य और वहां की सरकार ही नहीं बल्कि देश की भी बदनामी होती है और पीएम (नरेंद्र मोदी) को भी शर्मिंदा होना पड़ता है. वैसे अब तो पुलिस व सरकारी कर्मचारी भी इस नई आफत के शिकार हैं.’

नीति आयोग की ओर से जारी किए गए नैशनल हेल्थ इंडेक्स में उत्तर प्रदेश का स्थान देशभर में निचले पायदान (21वीं रैंक) पर है. यूपी की खराब स्वास्थ्य सेवाओं पर मायावती ने राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया. उन्होंने लिखा, ‘नीति आयोग की रिपोर्ट सरकार को लज्जित करने वाली है कि जनस्वास्थ्य के मामले में यूपी देश का सबसे पिछड़ा राज्य है.’

मायावती नीति आयोग की रिपोर्ट को लेकर जहां सरकार पर हमलावर हुईं वहीं सरकार को डबल इंजन वाली सरकार बताया. मायावती ने खराब स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सवाल उठाया कि बीजेपी की ऐसी डबल इंजन वाली सरकार का क्या लाभ? ऐसा विकास करोड़ों जनता के किस काम का जिसमें उसका जीवन पूरी तरह से नरक बना हुआ है?

मायावती ने मॉब लिचिंग को लेकर पूरे राज्य को जिम्मेदार बताया है. हालांकि इससे पहले बुधवार को लोकसभा में पीएम ने कहा था कि झारखंड में मॉब लिंचिंग की घटना से वह आहत हैं. उन्होंने कहा कि यह कहना कि झारखंड मॉब लिंचिंग का अड्डा बन गया है, ठीक नहीं है. उन्होंने कहा कि क्या झारखंड राज्य को दोषी बता देना सही है? जो बुरा हुआ है उसे अलग करें. लेकिन सबको कठघरे में रखकर राजनीति तो कर लेंगे. पूरे झारखंड को बदनाम करने का हक हमें नहीं है. वहां भी सज्जनों की भरमार है. न्याय हो, इसके लिए कानूनी व्यवस्था है.

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145वीं जयंती पर पूरे देश ने किया शाहूजी महाराज को याद

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भारत के समस्त शोषितों, पीड़ितों और ब्राह्मणी व्यवस्था की मारी जनता के हितैषी, उद्धारक एवं आरक्षण व्यवस्था के जनक तथा समतामूलक समाज के महान पक्षधर कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहू जी महाराज की 145 वीं जयंती पूरे देश में धूमधाम से मनाई जा रही है. इस मौके पर देश के अलग-अलग राज्यों में तमाम बहुजनवादी संगठन कार्यक्रम आयोजित कर शाहूजी महाराज को श्रद्धांजलि दे रहे हैं.

गौरतलब है की शाहूजी महाराज का जन्म 26 जून 1874 को कोल्हापुर में हुआ था. वह कोल्हापुर रियासत के राजा थे. उन्हें आरक्षण का जनक भी कहा जाता है. उनके प्रशासन में ज्यादातर ब्राह्मण जाति के लोग ही थे. इस एकाधिकार को समाप्त करने के लिए उन्होंने आरक्षण का कानून बनाया और अपनी रियासत में बहुजन समाज के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की. देश में आरक्षण की यह पहली व्यवस्था मानी जाती है.

शाहूजी महाराज महात्मा जोतिबा राव फुले से प्रभावित रहें और डॉ. अम्बेडकर के मददगार थे. उन्होंने 1912 में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और मुफ्त करने का कानून बनाकर शूद्रों एवं दलितों के लिए शिक्षा का दरवाजा खोला. 1917 में पुनर्विवाह का कानून भी पास किया. 6 मई 1922 को उनका निर्वाण हुआ.

भाजपा दिग्गज कैलाश विजयवर्गीय के विधायक बेटे ने की सरेआम गुंडागर्दी

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भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का विधायक बेटा सरेआम गुंडागर्दी करते हुए

भाजपा के विवादित नेता कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय ने निगम कर्मचारियों के साथ मारपीट की है. अपने पिता की बदौलत आकाश खुद इंदौर 3 विधानसभा सीट से विधायक है, लेकिन उसने जिस तरह से बीच सड़क पर गुंडागर्दी की है, वह हैरान करने वाला है. साफ दिख रहा है कि पिता के पद के घमंड में आकाश कानून की परवाह भी नहीं करता है. कैलाश विजयवर्गीय भाजपा के महासचिव हैं.

महासच‍िव और बंगाल में बीजेपी की जीत के सूत्रधार कैलाश विजयवर्गीय के बेटे ने इंदौर के भरे बाजार में गुंडागर्दी की हदें पार कर दी. कैलाश विजयवर्गीय के विधायक बेटे आकाश विजयवर्गीय ने नगर निगम अधिकारी को क्रिकेट बैट से  सरेआम पीटा. भीड़ वहां मूकदर्शक बनी रही. पुल‍िस को भी इस हालात को कंट्रोल करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी.

जानकारी के मुताबिक, गंजी कंपाउंड क्षेत्र में एक जर्जर मकान को तोड़ने के लिए निगम की टीम पहुंची थी. इस दौरान इंदौर तीन नंबर क्षेत्र से विधायक आकाश विजयवर्गीय भी वहां पहुंच गया. उसने निगम अधिकारियों को धमकी देते हुए उन्हें पांच मिनट में वहां से चले जाने को कहा, वरना नतीजा भुगतने को तैयार करने को कहा. आकाश की धमकी की परवाह किए बिना जब निगम अधिकारी अपना काम करने लगे तो आकाश उनसे भीड़ गया और हाथ में आए बैट से निगम अध‍िकारी को पीटने लगा. इसके बाद उनके साथ मौजूद लोगों ने पोकलेन की चाबी भी निकाल ली. इसके बाद निगम के अधिकारियों और विधायक के बीच जमकर विवाद हो गया और मारपीट होने लगे. आकाश विजयवर्गीय ने पोकलेन मशीन पर पथराव कर उसे फोड़ दिया. इस घटना के बाद स‍ियासी तूफान भी मच गया है.

हालांकि तमाम अधिकार होते हुए भी मामला भाजपा विधायक और कैलाश विजयवर्गीय से जुड़े होने के कारण पुलिस हाथ बांधे खड़ी रही और तुरंत आकाश पर कोई कार्रवाई नहीं की.

44 साल पहले लगी इमरजेंसी के बारे में वो बातें जो शायद आपको न पता हों

आधी रात को की गई आपातकाल की घोषणा

आज से ठीक 44 साल पहले देश में आपातकाल यानी इमरजेंसी लगा दी गई थी. इसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का काला अध्याय भी कहा जाता है. 25 जून 1975 की आधी रात को आपातकाल की घोषणा की गई थी जो 21 मार्च 1977 तक लगी रही. आइए जानते हैं इमरजेंसी को लेकर कुछ रोचक तथ्य –

1. तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी. 26 जून को रेडियो से इंदिरा गांधी ने इसे दोहराया.

2. आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा कि जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी.

3. आपातकाल के पीछे सबसे अहम वजह 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से इंदिरा गांधी के खिलाफ दिया गया फैसला बताया जाता है. यह फैसला 12 जून 1975 को दिया गया था.

4. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को रायबरेली के चुनाव अभियान में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का दोषी पाया था. साथ ही उनके चुनाव को खारिज कर दिया था. इतना ही नहीं, इंदिरा गांधी पर छह साल तक के लिए चुनाव लड़ने या कोई पद संभालने पर भी रोक लगा दी गई थी.

5. उस वक्त जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने यह फैसला सुनाया था. हालांकि 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश बरकरार रखा, लेकिन इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दी.

6. बताया जाता है कि आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था.

7. सुप्रीम कोर्ट ने 2 जनवरी, 2011 को यह स्वीकार किया था कि देश में आपातकाल के दौरान इस कोर्ट से भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था. आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) के तहत राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी शुरू हो गई थी.

8. गिरफ्तार होने वालों में जयप्रकाश नारायण, जॉर्ज फर्नांडिस और अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे. 21 महीने तक इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू रखा इस दौरान विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया.

9. आपातकाल लागू करने के लगभग दो साल बाद विरोध की लहर तेज होती देख प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग करके आम चुनाव कराने की सिफारिश कर दी. देश के लिए वो 21 माह जेल सरीखे बीते थे.

10. कहा जाता है कि आपातकाल के दौरान संजय गांधी और उनके दोस्तों की चौकड़ी ही देश को चला रहे थे और उन्होंने इंदिरा गांधी को एक तरह से कब्‍जे में कर लिया था.

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सिर काटने वाले बयान को लेकर विवाद में फंसे भाजपा सांसद

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भाजपा के एक सांसद ने कथित तौर पर यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि अगर कोई मुस्लिम लड़का आदिवासी लड़कियों का पीछा करता है, तो उसका सिर काट दिया जाएगा. आदिलाबाद के सांसद सोयम बापू राव का एक वीडियो कथित तौर पर सोमवार को वायरल हो गया.

एक वीडियो क्लिप में वह कथित तौर पर कह रहे हैं कि मैं मुस्लिम युवाओं से कहना चाहता हूं, कि अगर तुम हमारी आदिवासी लड़कियों का पीछा करने की कोशिश करते हो, तो तुम्हारा सिर काट दिया जाएगा. मैं आदिलाबाद जिले में अल्पसंख्यक युवा भाइयों से अनुरोध कर रहा हूं, हमारी लड़कियों का पीछा न करें.

इसमें उन्होंने कहा कि तुम्हारे लिए मुश्किल हो जाएगा अगर हमने तुम्हारा पीछा करना शुरू कर दिया. अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं का एक समूह अदिलाबाद पुलिस से मिलकर भाजपा सांसद के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है.

 

झारखंड मॉब लिंचिंग: दो महीने पहले हुई थी मृतक की शादी

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तबरेज की पत्नी शाइस्ता परवीन

सराईकेला मॉब लिंचिंग मामले में मृतक शम्स तबरेज की दो महीने पहले ही शादी हुई थी. 27 अप्रैल को उसका निकाह हुआ था. परिवारवालों के मुताबिक निकाह के लिए ही तबरेज पुणे से गांव आया था. निकाह के बाद ईद पर्व मनाने के लिए वह गांव में रुक गया था.

तबरेज के सिर से माता-पिता का साया बचपन में ही उठ गया था. आठ साल की उम्र में मां दुनिया छोड़कर चली गई. बारह साल होते-होते पिता चल बसे. तबरेज और उसकी इकलौती बहन का पालन-पोषण चाचा के घर हुआ. दो साल पहले बहन की शादी हुई. बहन की शादी के बाद तबरेज पुणे काम करने चला गया. वहां वह वेल्डिंग का काम करता था.

घटना के बाद पत्नी शाइस्ता परवीन का रो-रो कर बुरा हाल है. किसी तरह खुद को संभालते हुए शाइस्ता ने न्यूज-18 से बात की. शाइस्ता ने कहा कि उसे हर हाल में इंसाफ चाहिए. पिटाई करने वालों को कड़ी-कड़ी से सजा मिलनी चाहिए. उन्‍होंने मुआवजे की भी मांग की है.

मृतक के चाचा मशरूम आलम का कहना है कि उन्हें कानून और संविधान पर पूरा भरोसा है. परिवार को न्याय मिले, इस दिशा में प्रशासन और सरकार को हर संभव कोशिश करनी चाहिए.

बता दें कि 17 जून की रात को मृतक तबरेज जमशेदपुर स्थित अपने फुआ के घर से अपने गांव कदमडीहा लौट रहा था. इसी दौरान धातकीडीह गांव में ग्रामीणों ने मोटरसाइकिल चोरी के आरोप में उसे पकड़ लिया और बांधकर रात भर पीटा. 18 जून की सुबह उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया. पुलिस ने पहले उसका इलाज सदर अस्पताल में कराया, फिर शाम को जेल भेज दिया.

22 जून की सुबह तबरेज को जेल से गंभीर हालत में सदर अस्पताल लाया गया, जहां उसकी मौत हो गयी. हालांकि मृतक के परिजनों के द्वारा उसके जिंदा होने का दावा कर उसे रेफर करने की मांग की गयी. अस्पताल प्रशासन ने उसे जमशेदपुर के टीएमएच अस्पताल रेफर कर दिया. वहां भी डॉक्टरों ने उसे मृत करार दिया. वापस सरायकेला लाकर शव का पोस्टमार्टम कराया गया.

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संसद में बोले आजम खान- तीन तलाक निजी मामला

नई दिल्ली। संसद में सोमवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा करते हुए समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान ने भी अपना मत व्यक्त किया. उन्होंने तीन तलाक बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि तीन तलाक कुरान और शरियत का आंतरिक मामला है. कुरान में हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी को नहीं है.

आजम खान ने कहा कि इसका किसी के स्वाभिमान या कानून से कोई मतलब नहीं है. तीन तलाक पर आजम ने कहा कि यह हमारा निजी मामला है और इस पर कुरान के अलावा कोई बात कुबूल नहीं की जाएगी. महिलाओं के जो हमदर्द बनते हैं वह हिन्दू महिलाओं की दिक्कतों के बारे में भी बताएं. देश खुद को शादी, निकाह, मंडप से अलग न कर ले.

आजम खान ने कहा कि देश की पहाड़ियों में हमारी लाशें दफ्न हैं. उन्होंने कहा कि 1942 में हिन्दू मुस्लिम जब एक बर्तन में खाना खा रहे थे तभी अंग्रेजों को लग गया था कि अब यहां रहना मुमकिन नहीं है. आजम खान ने कहा कि आज देश बहुत कमजोर हो रहा है, मैं किसी को कलमा पढ़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, लेकिन अगर मैं न कहूं तो आप जबदस्ती नहीं कर सकते और कर सकते हैं तो कहिए.

संविधान से चलेगा देश

आजम खान ने कहा कि संविधान से देश चलेगा, अगर संविधान हमसे कहेगा तो मैं जरूर कहूंगा और संविधान को न मानने वाले लोग देश के साथ अच्छा नहीं करेंगे. आजम खान ने कहा कि मोदी सरकार पर बहुत बोझ है जो कहा जाए वो किया जाए. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को मेरी भैंस की फिक्र रही लेकिन मेरी नहीं. आजम ने कहा कि सरकार के पैसे से बना दरवाजा गिरा दिया जाएगा, बच्चों को पढ़ाई से रोका जाएगा.

आजम खान ने कहा कि इस मुल्क की दूसरी बड़ी आबादी के साथ जैसा रवैया है वह काफी दुखद है. उन्होंने कहा कि मैं एक यूनिवरर्सिटी का संस्थापक हूं और वह यूनिवर्सिटी ऐसी है कि राष्ट्रपति भवन भी फीका नजर आए. आजम ने कहा कि वहां गरीबों के लिए विशेष और निशुल्क पढ़ाई दी जा रही है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस से हमारी खूब नाराजगी है लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि विकास सिर्फ इन्हीं 5 सालों में हुआ है.

आजम खान ने कहा कि किसी पर कटाक्ष करना बहुत आसान है लेकिन अगर मैंने अपने पूरे राजनीतिक करियर में सुई के बराबर में बेईमानी की हो तो मैं अभी इस सदन को छोड़ने के लिए तैयार हूं. आजम खान ने कहा कि अगर बेईमान होता तो देश की सबसे बड़ी अदालत में आज खड़ा नहीं होता. उन्होंने कहा कि मेरे पास पाकिस्तान जाने का हक था लेकिन हमने यही रहना मुनासिब समझा और आज हम गद्दार हो गए. आजम ने कहा कि जो वंदे मातरम नहीं कहेगा उसे भारत में रहने का हक नहीं, ऐसी बात सदन में कही गई लेकिन मैं बात दूं कि बात वंदे मातरम की नहीं है.

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SP-BSP गठबंधन टूटना BJP की साजिश: सांसद शफीक उर रहमान

समाजवादी पार्टी से बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन तोड़ने का ऐलान किया है. बीएसपी प्रमुख मायावती ने कहा कि पार्टी के हित में अब बीएसपी आगे होने वाले सभी छोटे-बड़े चुनाव अकेले अपने बूते पर ही लड़ेगी. वहीं गठबंधन टूटने को लेकर सांसद शफीक उर रहमान ने इसे भारतीय जनता पार्टी की साजिश करार दिया है.

समाजवादी पार्टी के सांसद शफीक उर रहमान बर्क ने गठबंधन टूटने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब हार हो जाती है तो बहुत सी चीजें हो जाती हैं. आपस का तालमेल टूट जाता है. उन्होंने उम्मीद जताई कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का तालमेल नहीं टूटेगा. शफीक उर रहमान ने कहा कि बसपा सुप्रीमो अगर अकेले चुनाव लडेंगी तो कोई फायदा नहीं होगा. भारतीय जनता पार्टी कोशिश कर रही है कि सपा-बसपा गठजोड़ टूट जाए.

वहीं बीजेपी नेता विनय सहस्त्रबुद्धे ने एसपी बीएसपी के गठजोड़ का टूटना अप्राकृतिक बताया. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के बीच में गठजोड़ टूटने पर बीजेपी के राज्यसभा सांसद विनय सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि हमारी पार्टी ने बहुत पहले ही कहा था कि 23 मई के बाद यह गठबंधन नहीं रहेगा. उन्होंने कहा हम कोई राजनीतिक भविष्यवाणी करने वाली पार्टी में नहीं है लेकिन हमारी पार्टी ने यकीनन बहुत पहले से ही कहा था कि 23 मई के बाद यह गठबंधन नहीं रहेगा. जो भी अप्राकृतिक है, बना बनाया है, वह इस देश की राजनीति में टिकने वाला नहीं है. जाति की राजनीति के दिन बीत चुके हैं. सबका साथ सबका विकास का मंत्र अपनाया जाए, इसी में देश का भला है.

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह का इस गठबंधन को लेकर कहना है कि अब मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही है. बीएसपी और एसपी के बीच गठजोड़ टूटने की खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए संजय सिंह ने कहा कि आज देश में विश्वास का सवाल है. अगर उन्होंने कांग्रेस को भी साथ में लिया होता तो अविश्वास नहीं होता. एसी-बीएसपी दोनों पार्टियों का आपस में अविश्वास है. अब आगे जो लड़ाई होगी वह कांग्रेसी और बीजेपी के बीच होने वाली है.

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लोक सेवाओं में लैटरल एंट्री को लेकर सरकार की नीयत पर उठते सवाल

केंद्र सरकार द्वारा संयुक्त सचिव, उप सचिव तथा निदेशक स्तर के पदों पर चरणबद्ध तरीके से भारी संख्या में निजी क्षेत्र के व्यक्तियों को रखने और इस नियुक्ति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों को किसी तरह का आरक्षण नहीं देने के निर्णय के बाद इन वर्गों में भारी रोष व्याप्त है. डीओपीटी द्वारा विस्तृत दिशानिर्देश के साथ जारी अधिसूचना के अनुसार लैटरल एंट्री के लिए आवेदक के पास सामान्य स्नातक स्तर की शिक्षा के साथ किसी सरकारी या पब्लिक सेक्टर यूनिट या यूनिवर्सिटी के अलावा किसी निजी कंपनी में 15 साल का कार्य अनुभव होना चाहिए. लेकिन इसमें आरक्षण का कोई उल्लेख नहीं है. सरकारी सेवा में कार्यरत एससी, एसटी, ओबीसी के अधिकारियों की मानें तो सरकार का यह फैसला न सिर्फ अन्यायपूर्ण, मनमाना बल्कि संविधान के भी विरुद्ध है, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए नौकरियो में आरक्षण की स्पष्ट व्यवस्था की गई है.

वहीं सरकार इन पदों को एकल पद और एक व्यक्ति तथा सरकार के मध्य करार बताकर आरक्षण के दायरे से बाहर बता रही है. यह बात और है कि स्वयं डीओपीटी के अपने नियम के अनुसार कोई भी सरकारी नौकरी सिर्फ तभी आरक्षण नीति के दायरे से बाहर हो सकती है यदि वह 45 दिनों से कम के लिए हो, जबकि यह नियुक्तियां 3 से 5 साल की अवधि के लिए हैं. ऐसे में कुछ सवाल हैं जो मन में उभरते हैं. इसमें सबसे पहला सवाल तो यह है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में सरकार को निजी क्षेत्र से लोगों को लेने की क्या जरूरत है? दूसरा, नौकरशाही नाकाम हुई है या उसे नाकाम किया गया है? तीसरा, एससी, एसटी, ओबीसी के अवसरों को छीनने की साजिश तो नहीं है लैटरल एंट्री सिस्टम? चैथा प्रश्न, सरकार को यदि आरक्षण से इतनी ही दिक्कत है तो वह इसे समाप्त ही क्यों नहीं कर देती? और सबसे आखिरी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सवाल कि सरकार ने इस तरह से निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को नौकरियों पर रखने से जुड़े समस्यात्मक पक्षों पर विचार किया है या नहीं?

सरकार को क्यों चाहिए निजी क्षेत्र के विशेषज्ञ

सरकार को लोक सेवा के लिए निजी क्षेत्र के विशेषज्ञ किस उद्देश्य से चाहिए यह बड़ा प्रश्न है. जिन पदों के लिए सरकार निजी क्षेत्र से विशेषज्ञों को ला रही है वह सीधे-सीधे नीति निर्माण से जुड़े हैं, ऐसे में जो सरकारी अधिकारी लाइन, स्टाफ और सहायक तीनों एजेंसियों में काम कर संयुक्त सचिव, उप सचिव तथा निदेशक के पदों पर पहुंचते हैं उनका व्यावहारिक अनुभव और समझ किसी भी रूप में निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों से कम नहीं है, फिर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को लाने से सरकार को क्या हासिल होने वाला है? गौरतलब है कि एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कॉलेज, हैदराबाद में लोक और निजी क्षेत्र दोनों के ही उच्च अधिकारियों को एक साथ प्रशिक्षण दिया जाता है. साथ ही सरकार समय-समय पर अपने अधिकारियों को रिफ्रेशर कोर्स और नवाचार सीखने के लिए विदेशों में भी प्रशिक्षण व अध्ययन हेतु भेजती है. फिर लोक सेवकों पर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को वरीयता देने का आधार क्या है? हालांकि सरकार की इस नयी घोषणा में सिर्फ निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को लेने की बात नहीं की गई है लेकिन सरकार के इस फैसले से निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों की बहाली का रास्ता साफ हो चुका है. जिसे लेकर सबसे अधिक आपत्ति जताई जा रही है और जो बेबुनियाद भी नहीं है.

नौकरशाही नाकाम हुई है या उसे नाकाम बना दिया गया है

सरकार लोक सेवा के उच्च पदों पर बाहरी लोगों को इस तर्क के आधार पर भी रख रही है कि नौकरशाही का प्रदर्शन समय की बदलती जरूरतों व सरकार तथा लोक अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा है. लेकिन जैसा कि विदित है लोकसेवा सदैव राजनीतिक परिवेश में कार्य करती है. ऐसे में लोक सेवकों की विफलता की जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व को भी लेनी होगी. ऐसे एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों नीतिगत फैसले हैं जो नौकरशाही पर दबाव डालकर क्रियान्वित कराए गए हैं और जब उनके अपेक्षित परिणाम नहीं निकले तब उनकी नाकामी का ठीकरा नौकरशाही के सर पर फोड़ दिया गया है. इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण नोटबंदी का फैसला है जो सरकार ने सभी विशेषज्ञों यहाँ तक कि आरबीआई गवर्नर की राय को भी नजरअंदाज कर लिया. जिससे हुई अफरा-तफरी और आर्थिक तबाही को हम सभी ने देखा. इसी तरह अभी हाल ही में दिल्ली मेट्रो समेत दिल्ली में तमाम सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को महिलाओं के लिए निःशुल्क करने का फैसला भी विशुद्ध राजनीतिक लाभ-हानि का आकलन करते हुए लिया गया है न कि इसके वित्तीय व अन्य व्यावहारिक पक्षों को ध्यान में रखकर. इसके बावजूद योजना नाकाम हुई या क्रियान्वयन संबंधी समस्याएं आयीं तो बलि का बकरा बनने के लिए नौकरशाह तो हैं हीं. हालांकि ऐसा नहीं है कि नौकरशाही हमेशा सही ही होती है हो लेकिन प्रायः यह नौकरशाही से अधिक राजनीतिक नेतृत्व की विफलता होती है कि उसे नौकरशाही से सही तरीके से काम लेना नहीं आता. इसके पीछे एक बड़ी वजह राजनीतिक सत्ता का एक व्यक्ति में केंद्रित हो जाना और गैर अनुभवी बल्कि अधिक साफगोई से कहे तो अयोग्य लोगों को मंत्री पद पर नियुक्त करना है. आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि एक सरकार के समय में बेहतर काम करने वाले नौकरशाह अचानक दूसरी सरकार के आने पर इतने अयोग्य हो जाते हैं कि सरकार को बाहर से विशेषज्ञों की भर्ती करनी पड़ती है.

एससी, एसटी, ओबीसी के अवसरों को छीनने की साजिश तो नहीं है लैटरल एंट्री सिस्टम

सरकार जिन पदों पर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को बहाल करने जा रही है उन पदों पर एससी, एसटी, ओबीसी का आरक्षण शून्य हो जाएगा और अघोषित तौर पर यह सारे पद सामान्य श्रेणी के लिए आरक्षित हो जाएंगे. ऐसे में एससी, एसटी, ओबीसी के वे अधिकारी जो नीचे से पदोन्नत होकर इन पदों पर पहुंचते उनकी संख्या (जो अभी ही बेहद कम है) लगभग नगण्य रह जाएगी. यह एक तरह से इन वर्गों के अधिकारियों के हिस्से को हड़पने जैसा कार्य है. यहां ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पदोन्नति में आरक्षण को सही ठहराया है, जिसके बाद सरकार को आरक्षित वर्गों के अधिकारियों को पदोन्नति में आरक्षण देते हुए शीर्ष पदों पर इन वर्गों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना चाहिए. लेकिन यहां उलटे सरकार तो एससी, एसटी, ओबीसी को अब तक प्राप्त अवसरों को भी छीनने में लग गई है. सरकार के इस फैसले के बाद निःसंदेह नीति निर्माण से जुड़े इन महत्वपूर्ण पदों पर आरक्षित श्रेणी के अधिकारियों की पहुंच समाप्त हो जाएगी और वहां सामाजिक विविधता की बजाय एक खास वर्ग लोगों का ही वर्चस्व स्थापित हो जाएगा.

सरकार सीधे सीधे आरक्षण खत्म क्यों नहीं कर देती

केंद्र सरकार द्वारा तमाम हथकंडे अपनाकर कभी विनिवेश तो कभी लेटरल एंट्री जैसे प्रावधानों के माध्यम से आरक्षण को निष्प्रभावी बनाने और उसे सीमित करने के अनवरत जारी प्रयासों को देखकर किसी भी व्यक्ति के मन में यह विचार स्वभाविक रूप से उभरता है कि सरकार घुमा फिरा कर काम करने की बजाय सीधे सीधे आरक्षण को समाप्त क्यों नहीं कर देती. इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं है. सरकार द्वारा ऐसा नहीं करने के पीछे अनेक कारण जिम्मेदार हैं. सबसे पहली वजह तो यह है कि सरकार के लिए आरक्षण को निष्प्रभावी बनाना आसान है बनिस्पत उसे समाप्त करने के. सरकार विज्ञापन में आरक्षण की व्यवस्था कर आरक्षित सीटों को रिक्त छोड़ दे तो अधिक समस्या नहीं होगी लेकिन यदि वह विज्ञापन में आरक्षण ही नहीं दे तो आरक्षित वर्गों के सदस्य सड़कों पर उतर जाएंगे, क्योंकि यहां उन्हें अपना अधिकार स्पष्ट रूप से खतरे में नजर आएगा. दूसरी वजह यह है कि सरकार के लिए अपने फैसले को अदालत में सही ठहराने में समस्या आ सकती है. जिस उद्देश्य से नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी वह अभी तक पूरा नहीं हुआ है. अभी भी शासन-प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर एससी, एसटी, ओबीसी के सदस्यों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी की तुलना में बेहद कम है. ऐसी स्थिति में सरकार आरक्षण समाप्त करने के लिए शायद ही कोई ठोस आधार बता सकती है. लेकिन इन सबसे बढ़कर एक अन्य वजह भी है जो आमतौर पर लोगों के सामने नहीं आती. असल में मौजूदा सरकार हो या पूर्वर्ती सरकारें भारत में अब तक शायद ही कोई सरकार एससी, एसटी, ओबीसी समुदाय के हितों को लेकर ईमानदार रही है. यह सभी सरकारें आरक्षण को दिखावे के लिए ही सही बनाए रखना चाहती हैं ताकि आरक्षित वर्गों के सदस्य लगातार समाप्ति की तरफ अग्रसर सरकारी नौकरी की मृगतृष्णा के मायाजाल से बाहर नहीं निकल सके. सरकार उन्हें उस तरफ उलझाए रखना चाहती है जिधर उनके लिए अवसर निरंतर सीमित होते जा रहे हैं.

निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को लोक प्रशासन के शीर्ष पदों पर बैठाने के हैं अपने खतरे

एक समय था जब हम नव लोक प्रशासन की अवधारणा में विश्वास करते थे और मानते थे कि लोक प्रशासन को प्रासंगिक, मूल्योन्मुख, परिवर्तनकारी तथा सामाजिक समानता का पोषक होना चाहिए. फिर हमने नव लोक प्रबंधन की अवधारणा को अपनाया और दक्षता प्रभाविता तथा कार्य कुशलता के लिए बाजार को वरीयता देते हुए कम सरकार की वकालत की और माना कि सरकार या प्रशासन की भूमिका मुख्य रूप से नियामकीय हो जो लोक तथा निजी प्रशासन दोनों को लेवल प्लेइंग फील्ड उपलब्ध कराए. आज हम नव लोक प्रबंधन से भी आगे की अवस्था में प्रवेश कर चुके हैं जहां निजी क्षेत्र के लोग ही निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के लिए नीति निर्माण व समान अवसर की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के कार्य को करेंगे. यह राज्य के पश्चबेलन की अवस्था से बढ़कर राज्य द्वारा बाजार की शक्तियों के हक में अपनी नीति निर्माण से जुड़ी जिम्मेदारियों को निजी क्षेत्र के साथ साझा करना है. ऐसा करते समय सरकार समाज के सबसे वंचित वर्गों के अधिकारों पर तो प्रहार कर ही रही है साथ ही हितों के टकराव से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष को भी नजरअंदाज कर रही है जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. सरकार निजी क्षेत्र के जिन विशेषज्ञों को नीति निर्माण से जुड़े उच्च प्रशासनिक पदों पर बैठाने जा रही है उनकी अपने औद्योगिक प्रतिष्ठानों के साथ संबद्धता को देखते हुए इस बात की संभावना हमेशा बनी रहेगी कि वह अपने अपने प्रतिष्ठानों को गलत तरीके से लाभ पहुंचाने का प्रयास करें. क्योंकि शासन के उच्च पदों पर कार्य करते हुए निजी क्षेत्र के यह विशेषज्ञ न सिर्फ सभी गोपनीय दस्तावेजों तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं बल्कि अपने अपने औद्योगिक प्रतिष्ठानों के हित में नीति निर्माण और नीतिगत बदलाव की पहल भी कर सकते हैं.

इतना ही नहीं इससे सत्ताधारी दल को डोनेशन या अन्य तरीके से लाभ पहुंचाकर अलग-अलग औद्योगिक घराने अपने अधिक से अधिक लोगों को इन पदों पर बैठाने की कोशिश कर सकते हैं जो एक तरह से श्पदों की बिक्री प्रणालीश् की पुनर्स्थापना के जैसा कदम हो सकता है. यहां यह बात विशेष रुप से ध्यान देने योग्य है कि केंद्र सरकार पिछले दरवाजे से प्रवेश (लैटरल एंट्री) के जरिए जिन मंत्रालय या विभागों में संयुक्त सचिव, उप सचिव तथा निदेशक स्तर के पद निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों से भरने जा रही है उनमें राजस्व, वित्तीय सेवा, आर्थिक मामले, किसान कल्याण, सड़क परिवहन और हाईवे के साथ-साथ जहाजरानी और पर्यावरण जैसे बेहद संवेदनशील मंत्रालय व विभाग शामिल हैं. ऐसी स्थिति में जबकि अनेक निजी कंपनियां बैंकों का हजारों करोड़ का कर्ज दबाए बैठी हैं, अनेक उद्योगपति बैंकों का अरबों खरबों लेकर विदेश भाग चुके हैं, अनेक औद्योगिक घरानों पर गलत तरीके से किसानों की जमीन हड़पने के आरोप लग रहे हैं तथा अनेक कंपनियां अपने प्लांट लगाने और खनन हेतु पहाड़ से लेकर जंगल तक को नष्ट करने पर तुली हुई हैं यह सोचकर भी डर लगता है कि वैसी कंपनियों के अधिकारियों को अब यह भी तय करने का काम मिलने वाला है कि क्या सही है और क्या गलत. क्या होना चाहिए और क्या नहीं. यह कल्पना से भी परे खतरनाक स्थिति होने वाली है. लिहाजा कोई भी गंभीर व्यक्ति जिसे सविधान, राज व्यवस्था तथा प्रशासन का थोड़ा सा भी ज्ञान और अनुभव है इस व्यवस्था की वकालत करने से पूर्व इससे जुड़े इन समस्यात्मक पहलुओं पर विचार जरूर करेगा.

उपसंहार

भारत में लोक सेवाओं में पिछले दरवाजे से नियुक्ति एक बेहद संवेदनशील मसला है. ’टैलेंटेड और मोटिवेटेड’ भारतीयों को लोक सेवा से जोड़ने के नाम पर की जा रही इस कवायद के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभावों व परिणामों पर सम्यक विचार कर ठोस तर्क के साथ ही इस तरह का कोई निर्णय लिया जाना चाहिए. अभी सरकार इस निर्णय के पीछे जो तर्क दे रही है वह बड़ी संख्या में आम लोगों, विशेषकर एससी, एसटी, ओबीसी समुदाय के लोगों व अधिकारियों के गले नहीं उतर रहा है. इससे न सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी के अधिकारियों के संविधान प्रदत अधिकारों का अतिक्रमण होता है बल्कि शासन की नैतिकता, सच्चरित्रता और साख के भी खतरे में पड़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है. अनेक लोग यह तर्क दे सकते हैं कि जो सरकार यह कदम उठा रही है उसे जनता ने चुना है लेकिन यदि सब कुछ चुनावी नतीजों से ही तय किया जा सकता तो फिर संविधान, अदालत, मीडिया, नागरिक समाज और लोकमत आदि की तो जरूरत ही समाप्त हो जानी चाहिए. कुल मिलाकर यह फैसला बेहद गंभीर खामियों से युक्त है जिसे स्वीकार करने का अर्थ भारतीय संविधान, लोकतंत्र व न्याय की मूल भावना के विरुद्ध जाना होगा जिसके दूरगामी परिणाम अत्यंत घातक होंगे.

लेखकः मनीष चन्द्रा

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7 महीने में RBI को दूसरा झटका, डिप्‍टी गवर्नर विरल आचार्य ने दिया इस्‍तीफा

नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को एक बड़ा झटका लगा है. दरअसल, केंद्रीय बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया है. यह करीब 7 महीने के भीतर दूसरी बार है जब आरबीआई के किसी उच्‍च अधिकारी ने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही अपने पद को छोड़ दिया है. इससे पहले आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने दिसंबर में निजी कारण बताते हुए अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया था.

कार्यकाल के 6 महीने पहले इस्‍तीफा

अहम बात यह है कि डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कार्यकाल पूरा होने के करीब छह महीने पहले ही अपने पद को छोड़ दिया है. विरल आचार्य आरबीआई के उन बड़े अधिकारियों में शामिल थे जिन्‍हें उर्जित पटेल की टीम का हिस्‍सा माना जाता था. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विरल आचार्य अब न्‍यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के सेटर्न स्‍कूल ऑफ बिजनेस में बतौर प्रोफेसर ज्‍वाइन करेंगे. बता दें कि आचार्य ने तीन साल के लिए आरबीआई के बतौर डिप्‍टी गवर्नर 23 जनवरी 2017 को ज्‍वाइन किया था. इस हिसाब से वह करीब 30 महीने केंद्रीय बैंक के लिए अपने पद पर कार्यरत रहे.

नए गवर्नर के फैसलों से सहमत नहीं!

बीते कुछ महीनों से डिप्‍टी गवर्नर विरल आचार्य आरबीआई के नए गवर्नर शक्‍तिकांत दास के फैसलों से अलग विचार रख रहे थे. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पिछली दो मॉनीटरिंग पॉलिसी की बैठक में महंगाई दर और ग्रोथ रेट के मुद्दों पर विरल आचार्य के विचार अलग थे. रिपोर्ट की मानें तो हाल ही की मॉनीटरिंग पॉलिसी बैठक के दौरान राजकोषीय घाटे को लेकर भी विरल आचार्य ने गवर्नर शक्‍तिकांत दास के विचारों पर सहमति नहीं जताई थी.

दिसंबर से उर्जित पटेल ने दिया था इस्‍तीफा

इससे पहले दिसंबर 2018 में उर्जित पटेल ने बतौर आरबीआई गवर्नर कार्यकाल पूरा होने से पहले अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया था. उर्जित पटेल ने अपने बयान में बताया कि वो निजी कारणों से इस्तीफा दे रहे हैं. उर्जित पटेल के इस्‍तीफे के बाद शक्‍तिकांत दास को आरबीआई का गवर्नर नियुक्‍त किया गया.

सरकार के पहले कार्यकाल में तीसरा बड़ा इस्‍तीफा

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भारतीय इकोनॉमी के लिहाज से उर्जित पटेल का तीसरा बड़ा इस्तीफा था. इससे पहले अरविंद सुब्रमण्यम ने जुलाई 2018 में व्यक्तिगत कारणों से मुख्य आर्थिक सलाहकार पद से इस्तीफा दे दिया था. वहीं अगस्‍त 2017 में नीति आयोग के उपाध्यक्ष रहे अरविंद पनगढ़िया ने पद छोड़ दिया.

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मायावती की ऐसी 6 बातें सुनकर अखिलेश यादव क्या सोच रहे होंगे

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव से पहले जब सपा और बीएसपी के गठबंधन का ऐलान हो रहा था तो उस दिन मायावती और अखिलेश यादव के हावभाव को देखकर ऐसा लग रहा था कि अब यह दोनों पार्टियां मिलकर लंबे समय तक राजनीति करेंगी. अंकगणित भी उनके पक्ष में था और गोरखपुर-फूलपुर-कैराना के उपचुनाव में मिली जीत से उत्साह चरम पर था. लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों ही नेता जमीनी हकीकत को भांप नहीं पाए और करारी हार का सामना करना पड़ गया. इस हार के साथ ही गठबंधन भी बिखर गया है. सपा को जहां 5 सीटें मिली हैं वहीं बीएसपी को 10 सीटें. एक तरह से देखा जाए तो बीएसपी को ज्यादा फायदा हुआ है क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को एक भी सीट नहीं मिली थी. दूसरी ओर सारे समीकरणों को ध्वस्त करते हुए बीजेपी 62 सीटें कामयाब हो गई. इस हार के साथ ही बीएसपी सुप्रीमो मायावती सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को निशाने पर ले लिया और कहा कि सपा अपने कोर वोट यादवों का भी समर्थन नहीं पा सकी और यही वजह है कि उनकी पत्नी चुनाव हार गईं. इतना ही नहीं मायावती ने उत्तर प्रदेश की 11 सीटों पर होने वाले विधानसभा उप चुनाव में भी अकेले लड़ने का ऐलान कर डाला. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अखिलेश यादव से उनके रिश्ते पर व्यक्तिगत तौर पर अच्छे हैं. वहीं दूसरी ओर अखिलेश यादव अभी तक पूरी तरह से सधे और रक्षात्मक बयान दे रहे हैं. लेकिन रविवार को हुई बीएसपी की एक अहम बैठक में मायावती ने रही-सही कसर भी पूरी कर डाली और उन्होंने अपने बयान से जाहिर कर दिया कि उनकी नजर में अब अखिलेश यादव की कोई अहमियत नहीं है.

बीएसपी सुप्रीमो मायावती के 6 हमले

  1. गठबंधन के चुनाव हारने के बाद अखिलेश ने मुझे फोन नहीं किया. सतीश मिश्रा ने उनसे कहा कि वे मुझे फोन कर लें, लेकिन फिर भी उन्होंने फोन नहीं किया. मैंने बड़े होने का फर्ज निभाया और काउंटिग के दिन 23 तारीख को उन्हें फोन कर उनके परिवार के हारने पर अफसोस जताया.
  2. तीन जून को जब मैंने दिल्ली की मीटिंग में गठबंधन तोड़ने की बात कही तब अखिलेश ने सतीश चंद्र मिश्रा को फोन किया, लेकिन तब भी मुझसे बात नहीं की.
  3. अखिलेश ने मिश्रा से मुझे मैसेज भिजवाया कि मैं मुसलमानों को टिकट न दूं, क्योंकि उससे और ध्रुवीकरण होगा, लेकिन मैंने उनकी बात नहीं मानी.
  4. मुझे ताज कॉरिडोर केस में फंसाने में बीजेपी के साथ मुलायम सिंह यादव का भी अहम रोल था. अखिलेश की सरकार में गैर यादव और पिछड़ों के साथ नाइंसाफी हुई, इसलिए उन्होंने वोट नहीं किया.
  5. समाजवादी पार्टी ने प्रमोशन में आरक्षण का विरोध किया था इसलिए दलितों, पिछड़ों ने उसे वोट नहीं दिया.
  6. बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष आरएस कुशवाहा को सलीमपुर सीट पर समाजवादी पार्टी के विधायक दल के नेता राम गोविंद चौधरी ने हराया. उन्होंने सपा का वोट बीजेपी को ट्रांसफर करवाया, लेकिन अखिलेश ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की.
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झारखंड: चोरी के शक पर भीड़ ने युवक को पीटा, जय श्री राम बुलवाया, मौत

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जमशेदपुर। झारखंड के जमशेदपुर में 24 साल के युवक को चोरी के शक में भीड़ ने पीट-पीटकर अधमरा कर दिया. उससे जबरन जय श्री राम और जय हनुमान भी बुलवाया गया. सरायकेला पुलिस ने एक व्यक्ति को गिरफ्तार करके 24 साल के तबरेज अंसारी की मौत की पड़ताल शुरू कर दी है. अंसारी उर्फ सोनू की मौत के आरोपी पप्पू मंडल के खिलाफ हत्या, सांप्रदायिक नफरत और भीड़ को उकसाने की धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ है.

सरायकेला एसपी कार्तिक एस ने अंसारी की मौत के बाद कहा, ‘मौत की स्पष्ट वजह पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद ही पता चल सकेगी.’ वहीं झारखंड जनाधिकार महासभा के सामाजिक कार्यकर्ता अफजल अनीस ने पुलिस की भूमिका पर सवाल किया, क्योंकि तबरेज की मौत न्यायिक हिरासत में हुई थी.

बेरहमी से पिटाई के बाद पुलिस को सौंपा यह घटना 17 जून की रात की है, जब धतकीडीह इलाके में ग्रामीणों ने अंसारी को मोटरसाइकल चोर समझ करके पकड़ लिया था. घटना से जुड़ा एक विडियो वायरल हो रहा है जिसमें ग्रामीण अंसारी को बिजली के खंभे से बांधकर पीट रहे हैं. इसके बाद उसे पुलिस को सौंप दिया गया. अंसारी की पत्नी ने अपनी शिकायत में कहा कि पुलिस ने उसके पति को फर्स्ट ऐड देने के बाद जेल में भेज दिया था.

जबकि सरायकेला सदर अस्पताल के सुपरिंटेंडेंट बी मार्डी ने कहा, ‘अंसारी को 18 जून को अस्पताल लाया गया था. हमने फिट टु ट्रैवल का सर्टिफिकेट दिया था, जिसके बाद पुलिस उसे ले गई थी.’ शनिवार को अंसारी को दोबारा सदर अस्पताल लाया गया. इस बार वह बेहोश था. अंसारी की हालत बिगड़ रही थी और उसे टाटा मेमोरियल अस्पताल भेज दिया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया.

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पर्यावरण संरक्षण की अनोखी पहल पहल

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4000+ बच्चों को करवाई सरकारी नौकरी की तैयारी, फीस के बदले करवाते हैं 18 पौधारोपण!

अक्सर हमारे यहां कोई जन्मदिन हो या फिर विवाह समारोह हो, तो अपनी साख ऊँची रखने के लिए हम महंगे से महंगा तोहफ़ा लेकर जाते हैं. किसी बड़ी शख्सियत से मिलना हो या फिर कहीं मंच पर किसी को सम्मानित करना हो तो फूलों का शानदार गुलदस्ता देना हमारी आदत है. लेकिन ये महंगे गिफ्ट्स बहुत बार सिर्फ़ शो-पीस बनकर रह जाते हैं और गुलदस्ते दो दिन में ही मुरझा जाते हैं.

इसलिए बिहार के राजेश कुमार सुमन जब भी ऐसे किसी समारोह में जाते हैं तो दिखावटी चीज़ों की जगह पौधे उपहारस्वरूप देते हैं. नीम का पौधा, आम का पौधा, अमरुद का पौधा आदि उनके द्वारा दी जाने वाली साधारण भेंटे हैं. इतना ही नहीं, जब भी उन्हें पता चलता है कि उनके आस-पास के किसी इलाके में शादी हो रही है तो वे बिन बुलाये मेहमान की तरह पहुँच जाते हैं. लेकिन कुछ खाने-पीने नहीं, बल्कि वहां पर मौजूद लोगों को मुफ़्त में पौधे बाँटने और उन्हें पर्यावरण के प्रति सजग बनाने के लिए.

31 वर्षीय राजेश कुमार सुमन जब 6 साल के थे, तब से पौधारोपण कर रहे हैं. और यह गुण उन्होंने अपने पिता से सीखा. उनके पिताजी उनसे हर जन्मदिन पर पौधारोपण करवाते थे और उन्हें हमेशा पर्यावरण को सहेजने के लिए प्रेरित करते.

समस्तीपुर जिले के रोसड़ा प्रखंड/ब्लॉक के ढरहा गाँव के रहने वाले राजेश कुमार सुमन अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सरकारी नौकरी की तैयारी में लग गये. उन्हें उनकी पहली नौकरी राजस्थान में मिली थी. पर बिहार के प्रति उनका प्रेम और आदर कुछ इस प्रकार था कि जैसे ही उन्हें मौका मिला वे बिहार वापिस आ गये.

“पर्यावरण के प्रति तो मन में प्रेम और करुणा थी ही, लेकिन एक और बात थी जो हमें खलती थी कि हमारी कोई बहन नहीं है. हम जब भी दूसरे परिवारों को अपनी बेटियों की पढ़ाई, शादी-ब्याह में खर्च करते देखते तो लगता कि हम तो इस सुख से वंचित ही हैं. इसलिए मैंने सोचा कि क्यों न समाज में गरीब तबके की बेटियों की पढ़ाई को बढ़ावा दिया जाये,”

साल 2008 में गरीब तबके के बच्चों के उत्थान के उद्देश्य से उन्होंने बिनोद स्मृति स्टडी क्लब (बी.एस.एस क्लब) की शुरुआत की. क्लब का नाम उन्होंने अपने मामाजी के नाम पर रखा. “बचपन में जब घर के आर्थिक हालात थोड़े ठीक नहीं थे, तो मामाजी ने हमारा काफ़ी सहयोग किया. लेकिन बहुत ही कम उम्र में वे दुनिया से चले गये. इसलिए जब हम समाज के लिए कुछ करना चाहते थे, तो हमने उनके नाम से ही शुरुआत करने की सोची.”

इस क्लब के अंतर्गत उन्होंने पौधरोपण और ज़रूरतमंद बच्चों को मुफ़्त में शिक्षा देने की मुहीम छेड़ी. दसवीं कक्षा पास कर चुके बच्चों को वे सरकारी नौकरियों की परीक्षा के लिए तैयार करते हैं.

अपनी इस पाठशाला को उन्होंने ग्रीन पाठशाला का नाम दिया है. महात्मा गाँधी और स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श मानने वाले राजेश कहते हैं, “मेरा उद्देश्य समाज के अंतिम तबके के अंतिम बच्चे तक शिक्षा पहुँचाना है. 11वीं-12वीं कक्षा से भी अगर ये बच्चे छोटी-मोटी सरकारी नौकरी की तैयारी करें, तो भी निजी इंस्टिट्यूट वाले लाखों में फीस ले लेते हैं. और घर की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल होने के करण बहुत से बच्चे चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते.”

पर ग्रीन पाठशाला में बिना किसी फीस के बच्चों को हर रोज़ सुबह-शाम कोचिंग दी जाती है. राजेश की टीम में उनकी पत्नी सहित 5 अन्य अध्यापक हैं, जो इस कार्य में उनका साथ देते हैं. हर सुबह 6 बजे से 8 बजे तक और शाम में 4 से 6 बजे तक कुल 100 बच्चे पढ़ने आते हैं.

“जो भी बच्चे मेरे पास आते हैं, उनसे मैं फीस की जगह 18 पौधे लगाने का संकल्प करवाता हूँ. हर एक बच्चे को अपने घर, घर के बाहर या फिर खेतों पर, जहाँ भी वे चाहें, 18 पौधे लगाने होते हैं और फिर लगातार 3-4 सालों तक उनकी देखभाल करनी होती है. इसके पीछे मेरा इरादा सिर्फ़ इतना है कि हमारा ग्रीन कवर बढ़े और किसी भी बहाने आने वाली पीढ़ी पौधारोपण का महत्व समझे.”

पूरे समस्तीपुर में और आस-पास के इलाकों में राजेश कुमार को ‘पौधे वाले गुरु जी’ के नाम से जाना जाता है. अब तक ग्रीन पाठशाला के माध्यम से वे लगभग 4, 000 बच्चों शिक्षा दे चुके हैं और इनमें से 350 से भी ज़्यादा बच्चों को अलग-अलग विभागों में सरकारी नौकरियाँ प्राप्त हुई हैं. बाकी बच्चे भी इस काबिल बनें हैं कि वे प्राइवेट संस्थानों में काम करके अपना निर्वाह कर सकें.

ग्रीन पाठशाला की छात्रा रहीं ममता कुमारी आज गवर्नमेंट रेल पुलिस में कार्यरत हैं और उनका कहना है कि अगर राजेश कुमार ने उनकी और उनके जैसे अन्य गरीब बच्चों की शिक्षा का ज़िम्मा न उठाया होता तो वे शायद यहाँ तक न पहुँच पाती. “गाँव में लोग कहते थे कि लड़की हो, क्या करोगी इतना पढ़-लिख कर. पर राजेश सर हमेशा हौसला बढाते और कहते कि किसी की बातों पर ध्यान मत दो और अपनी ज़िंदगी का फ़ैसला खुद करो. उनकी बदौलत आज बहुत से गरीब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं,” ममता ने बताया.

राजेश के नेतृत्व में युवाओं की एक टोली गाँव-गाँव जाकर भी लोगों को वृक्षारोपण के लिए प्रेरित करती है. समस्तीपुर के अलावा उनका यह नेक अभियान दरभंगा, खगड़िया और बेगुसराय जिले तक भी पहुँच चूका है. जगह-जगह लोग पेड़ लगाते हैं और अपने पेड़ के साथ सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं. पौधारोपण के साथ उनका जोर पौधों की देखभाल पर भी रहता है. इसलिए वे हर एक व्यक्ति से गुज़ारिश करते हैं कि वे अपने पौधों की लगभग 3 साल तक लगातार देखभाल करें क्योंकि 3-4 साल में कोई भी पेड़ प्राकृतिक रूप से निर्वाह करने के लायक हो जाता है.

इस पूरे अभियान में वे अपनी कमाई का लगभग 60% हिस्सा खर्च कर देते हैं. उन्हें चाहे बच्चों से वृक्षारोपण करवाना हो, कहीं समारोह में जाकर पौधे भेंट करने हो, या फिर गरीब बच्चों के लिए प्रतियोगिता की किताबों का बंदोबस्त करना हो, वे अपने वेतन से ही करते हैं. उन्होंने अपने संगठन को कोई एनजीओ या संस्था नहीं बनने दिया है, जो कि दुसरों से मिलने वाले फण्ड से चले. उन्होंने जो बीड़ा उठाया है उसकी पूरी ज़िम्मेदारी भी उन्होंने खुद पर ही ली है. अब तक वे 80, 000 से भी ज़्यादा पेड़-पौधे लगवा चुके हैं.

अपने इस कार्य में आने वाली चुनौतियों के बारे में राजेश कहते हैं कि पर्यावरण को सहेजने का काम लगातार चलने वाला काम है. इस काम के लिए आप किसी से जबरदस्ती नहीं कर सकते. जब तक लोग पर्यावरण के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझेंगें, वे इसे कभी बचा भी नहीं पायेंगें.

वे अक्सर अपने साथियों के साथ किसी भी शादी समारोह में बिन बुलाये मेहमान के तौर पर चले जाते हैं. बहुत बार वहां पर उन्हें दुत्कारा जाता है कि क्या पेड़-पेड़ लगा रखा है, शादी की रस्में रुक गयीं और ज़रूर इसमें उनका कोई फायदा होगा आदि. “लेकिन जहाँ अपमान मिलता है, वहीं समाज में ऐसे लोग हैं जो ख़ास तौर पर अपने यहाँ शादियों में, समारोह में हमें बुलाते हैं और हमारे साथ मिलकर पौधारोपण करते हैं.”

शादी के निमंत्रण पत्रों पर भी लोग पेड़ लगाने और पेड़ बचाने की गुहार करते हुए स्लोगन लिखवाते हैं, जैसी कि “सांसे हो रही हैं कम, आओं पेड़ लगायें हम.”

अंत में राजेश सिर्फ़ इतना ही कहते हैं कि पर्यावरण का संरक्षण सही मायनों में तब होगा, जब हम इसे अपने जीवन, अपनी संस्कृति का हिस्सा बनायेंगें. पेड़ों की, नदियों की पूजा से पहले पेड़ लगाना और नदियों का बचाना हमारे रिवाज़ में होना चाहिए. यदि आप चाहते हैं कि आने वाले समय में धरती पर जीवन बचे तो आपको खुद ज़िम्मेदारी लेनी होगी.

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क्या बदल जाएगी बिहार की राजनीति

देश की सियासत के दो ऐसे राज्य जिनके बारे में कहा जाता है कि यहां की राजनीति से देश की दिशा और दशा तय होती है. इस बार के लोकसभा चुनाव में इन दो राज्यों में बीजेपी और विपक्ष की सबसे बड़ी परीक्षा थी, जिसमें भाजपा पास हो गई है. यूपी में जहां सपा और बसपा मिलकर भाजपा को नहीं रोक सके तो बिहार में राजद, कांग्रेस, रालोसपा के साथ मांझी और मुकेश सहनी की पार्टियां भी मिलकर कोई कमाल नहीं कर सकीं. बिहार में बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी ने सभी समीकरण ध्वस्त कर दिए है. बिहार में एनडीए ने 40 में से 39 सीटें झटक ली. बची हुई एक सीट कांग्रेस पार्टी के हिस्से में आई है. राष्ट्रीय जनता दल एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हो सकी.

सबसे बुरी हालत तो उन तीन पार्टियों की हुई जिनका इस चुनाव में काम तमाम हो गया. बीजपी के पुराने साथी रहे उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी तो अपनी सीट भी नहीं बचा पाए, तो वहीं विकासशील पार्टी शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या बिहार की राजनीति बदल जाएगी और इसके क्षेत्रिय क्षत्रप बदली हुई राजनीति में विलीन हो जाएंगे?

कुशवाहा का क्या होगा? राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा का हाल तो सबसे बुरा है. लोकसभा चुनाव से ठीक एक महीने पहले एनडीए का दामन छोड़कर महागठबंधन से गठबंधन करना उनके लिए आत्मघाती साबित हुआ है. कहां 2014 में एनडीए के साथ उन्होंने तीन सीटें जीतीं थीं और केंद्रीय मंत्री भी बने, लेकिन इस बार अपनी सीट तक गंवा बैठे.

महागठबंधन में कुशवाहा के हिस्से पांच सीटें आईं थीं. जिसमें दो सीटों पर तो खुद ही मैदान में उतरे. काराकाट में उन्हें जेडीयू के महाबली सिंह ने हराया तो, वहीं दूसरी सीट उजियारपुर से बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने उन्हें मात दी. ये हार कुशवाहा की सियासी करियर पर बड़ी मार है. कुशवाहा को बड़ा झटका तब लगा जब बिहार में उनकी पार्टी के तीनो विधायक जदयू में शामिल हो गए.

मांझी की नैया डूबी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की नैया तो इस चुनाव में पूरी तरह डूब गई. बिहार में खुद को दलितों का सबसे बड़ा चेहरा बताने वाले मांझी अपनी सीट भी नहीं जीत सके. मांझी ने अपने लिए बिहार की गया सीट चुनी. यहां एनडीए की तरफ से जेडीयू ने विजय मांझी को उतारा. मुकाबले में विजय मांझी जीतन राम मांझी पर भारी पड़े और उन्हें डेढ़ लाख से भी ज्यादा वोटों से शिकस्त दी.

ये वही मांझी हैं जो कभी नीतीश कुमार के बेहद करीबी हुआ करते थे. 2014 में जब नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्तीफा दिया था, तब उन्होंने अपनी गद्दी मांझी को ही सौंपी, क्योंकि वो नीतीश के सबसे विश्वासपात्र थे, लेकिन मांझी के सीएम बनने के बाद दोनों के बीच ऐसी दरार आई कि मांझी की कुर्सी तो गई ही, साथ ही पार्टी तक छोड़नी पड़ी. जेडीयू से अलग होकर जीतन राम मांझी ने हिदुस्तान आवाम मोर्चा पार्टी बनाई. 1980 से लेकर अब तक जीतन राम मांझी कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू की राज्य सरकारों में मंत्री का पद संभाल चुके हैं, लेकिन ये हार उनपर काफी भारी पड़ने वाली है, जो उनके सियासी करियर पर ब्रेक लगा सकती है.

VIP पार्टी के मुकेश सहनी को लगा बड़ा झटका विकासशील इंसान पार्टी (VIP) का तो उदय होने से पहले ही पतन हो गया है. खुद को ‘सन ऑफ मल्लाह’ बताने वाले इस पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी खगड़िया सीट से बुरी तरह हार गए. मुकेश सहनी एलजेपी उम्मीदावर चौधरी महबूद अली से करीब ढ़ाई लाख वोटों से हार गए हैं. मुकेश सहनी कभी बीजेपी के काफी करीबी हुआ करते थे. 2014 में उन्होंने बीजेपी के लिए पूरे बिहार में घूम-घूमकर कैपेंनिंग भी की थी. मुकेश सहनी ने पिछले साल ही विकासशील इंसान पार्टी बनाई थी. पीएम मोदी के ‘चाय की चर्चा’ के तर्ज पर उन्होंने ‘माछ पर चर्चा’ भी की. मुकेश सहनी का कद बिहार में उसी तरह बढा, जिस तरह गुजरात की राजनीति में हार्दिक पटेल उभरकर सामने आए थे.

इस चुनाव में एनडीए से जब मन मुताबिक सीट नहीं मिली, तो वो महागठबंधन के साथ हो लिए. महागठबंधन में उन्हें तीन सीटें मिली और तीनों सीटों पर बुरी तरह हारे. मुकेश की वजह से मल्लाह वोटरों का साथ महागठबंधन को तो मिला, लेकिन मुकेश को महागठबंधन से कोई फायदा नहीं मिला. मुकेश सहनी का बॉलीवुड से भी रिश्ता रहा है, वो मशहूर सेट डिजाइनर रह चुके हैं. उन्होंने शाहरुख की फिल्म देवदास और सलमान खान की फिल्म बजरंगी भाईजान का सेट भी बनाया था. मुंबई छोड़कर मुकेश सहनी ने राजनीति में किस्मत अजमाई, लेकिन वो फेल हो गए.

हालांकि चुनावी नतीजों के बाद राष्ट्रीय जनता दल सकते में है. वह अब तक हार के इस सदमें से उबर नहीं पाया है. पार्टी में तेजस्वी यादव के खिलाफ विरोध के सुर भी उभरने लगे हैं. हालांकि उनके बड़े भाई तेज प्रताप सहित अन्य नेताओं ने तेजस्वी का बचाव किया है, लेकिन बिहार की सियासत में जो तूफान उठा है, उसका असर जल्दी खत्म होता नहीं दिख रहा. – द क्विंट से

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तेलगुदेशम के राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने पर मायावती ने कसा तंज

नई दिल्ली। चंद्रबाबू नायडू की पार्टी TDP के चार राज्यसभा सदस्यों के बीजेपी में शामिल होने पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने शुक्रवार को भाजपा पर तंज कसा. मायावती ने कहा, ‘टीडीपी के जो सदस्य बीजेपी में शामिल हुए हैं उनमें से दो को आंध्र प्रदेश का माल्या कहा जाता है लेकिन बीजेपी में आकर अब वे दूध के धुले हो गए हैं’. BSP प्रमुख मायावती ने शुक्रवार को एक ट्वीट में कहा कि ‘माननीय राष्ट्रपति सरकार की तरफ से कल देश को अनेकों प्रकार के आश्वासन दे रहे थे उसी दिन बीजेपी ने तेदेपा के चार सांसदों को तोड़ लिया. उनमें से दो को बीजेपी ‘आंध्र का माल्या’ कहती है पर अब वे बीजेपी में आकर दूध के धुले हैं. स्पष्ट है बीजेपी ब्राण्ड ऑफ पॉलिटिक्स में सब जायज है कुछ गलत नहीं’.

गौरतलब है कि तेदेपा के छह राज्यसभा सदस्यों में से चार बृहस्पतिवार को भाजपा में शामिल हो गए. उन्होंने तेदेपा संसदीय दल (राज्यसभा में) का भगवा पार्टी में विलय करने का प्रस्ताव उच्च सदन के सभापति एम वेंकैया नायडू को सौंपा था. इस तरह, राज्यसभा में भाजपा की स्थिति मजबूत होती दिख रही है. तेदेपा के राज्यसभा सदस्य वाईएस चौधरी के नेतृत्व में पार्टी के चार सदस्यों (उच्च सदन के) ने इस सिलसिले में एक प्रस्ताव पारित किया. इसके बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी. चौधरी लंबे समय से तेदेपा प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू के विश्वस्त सहयोगी माने जाते थे. सूत्रों के अनुसार राज्यसभा में तेदेपा के चार सदस्यों- वाई एस चौधरी, सी एम रमेश, जी मोहन राव, और टी जी वेंकटेश-ने अपने धड़े का भाजपा में विलय करने के अनुरोध का प्रस्ताव नायडू को सौंपा है.

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जानिये दिल्ली में दिल दहला देने वाली वारदात को क्यों दिया अंजाम

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आरोपी, उसकी पत्नी व दो बच्चे

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक दिल दहलाने वाला सामने आया है. दिल्ली के महरौली इलाके के वार्ड 2 में एक शख्स ने अपने 3 बच्चों और पत्नी की हत्या कर दी. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और मामले की जांच की जा रही है. हत्या करने वाले शख्स ने एक नोट भी लिखा है, जिसमें उसने कबूला कि उसने चारों लोगों की हत्या की है. वह पेशे से ट्युशन टीचर है और बच्चों को होम ट्यूशन देता था. इस घटना के बाद इलाके में सनसनी फैल गई है.

फिलहाल यह पता नहीं चल पाया है कि उसने इतना खौफनाक कदम क्यों उठाया. शख्स की दो बेटियां और एक बेटा है. बड़ी लड़की उम्र 7 वर्ष, लड़के की उम्र 5 साल और सबसे छोटी लड़की की उम्र डेढ़ महीने बताई जा रही है. आरोपी का नाम उपेंद्र शुक्ला है. उसने शुक्रवार देर रात 1 से 1.30 बजे के बीच सभी की हत्या कर दी.

मृतक बच्चों में एक लड़का, दो लड़कियां और पत्नी शामिल है. पूछताछ में उस उपेंद्र ने खुद को डिप्रेशन में बताया. जिस घर में चारों लोगों के कत्ल हुए, उसी घर में आरोपी की सास भी रहती है. उसने देखा कि उपेंद्र दरवाजा नहीं खोल रहा है तो उसने सुबह पड़ोसी को सूचना दी. इसके बाद पड़ोसियों ने 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने मौके पर पहुंचकर आरोपी को हिरासत में ले लिया. अब उससे पूछताछ की जा रही है.

डीसीपी विजय कुमार के मुताबिक सुबह 7 बजकर 10 मिनट पर पुलिस को कत्ल की जानकारी मिली. उपेंद्र शुक्ला ने तीन बच्चों और पत्नी का कत्ल किया है. उसकी दो बेटी और एक बेटा है. आरोपी ने देर रात चाकू से सभी कत्ल किए हैं.. उपेंद्र बिहार के चंपारण का रहने वाला है.

लाश के पास से उपेंद्र के लिखे दो नोट बरामद हुए हैं, जिसमें से एक हिंदी और एक अंग्रेजी में लिखा हुआ है. इन नोट्स में उपेंद्र ने लिखा कि ये सभी कत्ल मैंने किए हैं. मैं इसके लिए जिम्मेदार हूं. डीसीपी के मुताबिक उपेंद्र की पत्नी अर्चना डायबिटीज से पीड़ित थी और आर्थिक तंगी डिप्रेशन और कत्ल की वजह हो सकती है. उसकी सबसे बड़ी बेटी की उम्र 7 साल. दूसरी बेटी की उम्र डेढ़ महीने और बेटे की उम्र 5 साल थी.

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अमरीश पुरी की जयंती पर गूगल ने डूडल बनाकर किया याद

बॉलीवुड के दिग्गज एक्टर अमरीश पुरी की आज जयंती है. गूगल ने डूडल बनाकर उनको याद किया है. बता दें कि अमरीश पुरी भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली अभिनेताओं में से एक थे. अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को पंजाब राज्य के जालंधर में हुआ था. 1967 में उनकी पहली मराठी फिल्म ‘शंततु! कोर्ट चालू आहे’ आई थी.

बॉलीवुड में उन्‍होंने 1971 में ‘रेशमा और शेरा’ से डेब्‍यू किया था.

दर्शकों को अमरीश पुरी का निगेटिव किरदार भी बहुत भाता था. मिस्टर इंडिया, शहंशाह, करण-अर्जुन, कोयला, दिलजले, विश्वात्मा, राम-लखन, तहलका, गदर, नायक, दामिनी जैसी फिल्मों में वह निगेटिव किरदार में थे, लेकिन इन फिल्मों को सुपरहिट बनाने में अमरीश पुरी का बड़ा योगदान रहा था.

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