भारत को मिली इस विश्व कप में पहली हार

बर्मिंघम में खेले गए आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप के मुकाबले में इंग्लैंड ने टीम इंडिया को 31 रनों से हरा दिया. इस टूर्नामेंट में भारत की यह पहली हार है. टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी इंग्लैंड की टीम ने ताबड़तोड़ बैटिंग करते हुए 50 ओवर में 7 विकेट के नुकसान पर 337 रन बनाए. इंग्लैंड ने आखिरी 10 ओवरों में 92 रन बटोरे और भारत के सामने 338 रनों का विशाल लक्ष्य रखा. इंग्लैंड के लिए जॉनी बेयरस्टो ने 111 रन, जेसन रॉय ने 66 रन और बेन स्टोक्स ने 79 रनों की धमाकेदार पारी खेली. इंग्लैंड के इस पहाड़ जैसे लक्ष्य के सामने टीम इंडिया 50 ओवर में 5 विकेट पर 306 रन ही बना पाई. इस जीत से इंग्लैंड को संजीवनी मिली है और सेमीफाइनल के लिए उसकी उम्मीदें अब भी बरकरार हैं. भारत को मिली हार के बाद कई कमियां उभरकर समाने आई. यही कमियां हार की वजह भी बनी. आइये जानते हैं इन कमियों के बारे में-

धीमी शुरुआत

भारतीय टीम ने एक बार फिर धीमी शुरुआत हुई. शिखर धवन के बाहर होने के बाद टीम को एक बार फिर सही शुरुआत नहीं मिल सका. केएल राहुल बिना खाता खोले ही पवेलियन वापस चले गए. इसके बाद टीम ने शुरू के 10 ओवर में सिर्फ 29 रन ही बना सकी. जब आप 338 रनों का पीछा कर रहे हैं, तो आप प्वारप्ले को इस तरीके से बरबाद नहीं कर सकते. शिखर के बाहर जाने के बाद से दोनों ओपनर्स ने अभीतक एक भी मैच में अच्छी शुरुआत नहीं दे सके हैं. अब अगर टीम इंडिया को वापसी करना है, तो इस हिस्से पर काम करना जरूरी है.

कुलदीप यादव और युजवेंद्र चहल का फ्लॉप होना

टीम इंडिया के सबसे बड़े तुरुप के इक्के कुलदीप यादव और युजवेंद्र चहल का इस मैच में फ्लॉप होना बहुत महंगा पड़ा. युजवेंद्र चहल ने इस मैच में बिना कोई सफलता हासिल किए 10 ओवर में 88 रन लुटा दिए. वहीं कुलदीप यादव ने 10 ओवर में 72 रन लुटाए. भारत की ऐसी घटिया गेंदबाजी से इंग्लैंड के ओपनरों ने जमकर रन लुटे. चहल ने अपने 10 ओवरों के कोटे में 7 चौके और 6 छक्के खाए थे. वर्ल्ड कप 2019 में चहल ने 6 मैचों में 10 विकेट हासिल किए हैं. रनों के लिहाज से यह युजवेंद्र के वनडे करियर का सबसे खराब प्रदर्शन रहा. इससे पहले उन्होंने वनडे में इसी साल ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मार्च में मोहाली वनडे में कुल 80 रन दिए थे. इंग्लैंड ने आखिरी 10 ओवरों में 92 रन बटोरे और भारत के सामने 338 रनों का विशाल लक्ष्य रखा.

धोनी का DRS के लिए मना करना

इस मैच में टीम इंडिया का जेसन रॉय के आउट होने पर DRS नहीं लेना सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. भारत के लिए सिरदर्द बनी जेसन रॉय और जॉनी बेयरस्टो की जोड़ी को तोड़ने के लिए कप्‍तान विराट कोहली ने हार्दिक पंड्या को इंग्लैंड की पारी के 11वें ओवर में उतारा. हार्दिक पंड्या के 11वें ओवर की पांचवीं गेंद जेसन रॉय के ग्लव्स को चूमती हुई धोनी के पास चली गई. जिसके बाद पंड्या और धोनी ने विकेट के पीछे कैच की अपील की, लेकिन अंपायर ने इसे वाइड दिया. इसके बाद कोहली ने धोनी से बात की. धोनी की सलाह पर कोहली ने डीआरएस नहीं लिया.

कोहली ने उस समय धोनी की सुनी और डीआरएस का इस्तेमाल नहीं किया और बाद में रिप्ले से साफ हुआ कि गेंद जेसन रॉय के ग्लव्स को चूमती हुई गई है. जेसन रॉय उस समय 21 के निजी स्कोर पर बल्लेबाजी कर रहे थे. इसके बाद अगली दो गेंदों पर रॉय ने छक्के और चौके बरसाए. कोहली अगर रिव्यू लेते तो रॉय को पवेलियन लौटना पड़ता. इस फैसले के बाद इंग्लैंड के ओपनिंग बल्लेबाजों ने और भी तूफानी बैंटिग की. जेसन रॉय और जॉनी बेयरस्टो ने मिलकर 22.1 ओवर में ही 160 रनों की ओपनिंग पार्टनरशिप कर दी. जेसन रॉय अगर सस्ते में आउट होते तो इंग्लैंड इतने बड़े लक्ष्य तह नहीं पहुंचती.

चोट के बावजूद राहुल से ओपनिंग करवाना

इंग्लैंड के 338 रनों के लक्ष्य के जवाब में रोहित शर्मा और केएल राहुल की ओपनिंग जोड़ी मैदान पर उतरी. इंग्लैंड की पारी में फील्डिंग के दौरान केएल राहुल चोटिल हो गए थे. इंग्लैंड की पारी के 16वें ओवर में राहुल बाउंड्री पर छक्का रोकने की कोशिश में पीठ के बल गिर पड़े. जिसके बाद उन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा. चोटिल राहुल से ओपनिंग करवाने का टीम इंडिया का यह फैसला गलत साबित हुआ और वह 9 गेंदों का सामना करने के बाद शून्य के स्कोर पर पवेलियन लौट गए. भारत ने अपना पहला विकेट 8 रन के स्कोर पर ही गंवा दिया था.

जीत के जुनून का नहीं दिखना

अफगानिस्तान के खिलाफ मैच के बाद सचिन तेंदुलकर ने मिडिल ऑर्डर के बल्लेबाजी की आलोचना की थी. इस मैच में भी वही कमी फिर से सामने आया. मिडिल ऑर्डर ने ऐसा रक्षात्मक खेल दिखाया, मानों उन्हें मैच जीतना न हो. खासकर महेंद्र सिंह धौनी और केदार जाधव दोनों में मैच जीतने का जुनून नजर नहीं आया. धौनी जब बल्लेबाजी करने आए, तब टीम इंडिया को 10 रन/ ओवर के हिसाब से रन चाहिए थे. लेकिन धौनी बड़े शॉट्स मारने का प्रयास ही नहीं किया. इस रवैये की आलोचना कमेंट्री कर रहे पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने भी की.

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डॉक्टर ने खेला खूनी खेल, पत्नी व बेटा-बेटी की हत्या कर लगा ली फांसी

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गुरुग्राम। दिल्ली से सटे हरियाणा के गुरुग्राम से बुरी खबर आई है. शहर के सेक्टर-49 स्थित उप्पल साउथ एंड एस ब्लॉक के फ्लैट नंबर 299 ग्राउंड फ्लोर में रहने वाले डॉक्टर प्रकाश सिंह (55) ने पत्नी सोनू सिंह (50), अदिति (22) और आदित्य (13) का रविवार रात को कत्ले-ए-आम किया फिर कुछ देर बाद खुद भी जान दे दी.

मूलरूप से यूपी के वाराणसी के रहने वाले प्रकाश सिंह पिछले 8 साल से गुरुग्राम के सेक्टर 49 में रह रहे थे. बताया जा रहा है कि प्रकाश सिंह की पत्नी सोनू सिंह के चार प्ले स्कूल थे. खुद डॉक्टर प्रकाश सिंह भी एक फार्मेसी कंपनी से जुड़े हुए थे. गुरुग्राम पुलिस की मानें तो उनके पास से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें उऩ्होंने लिखा है- ‘मैं अपने परिवार को संभाल नहीं पा रहा था.’

वहीं, सुसाइड नोट को लेकर पड़ोसियों का कहना है कि प्रकाश सिंह का परिवार आर्थिक रूप से बहुत ही मजबूत था. पत्नी डॉक्टर सोनू सिंह हर सामाजिक कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी और कभी भी चंदा देने में पीछे नहीं हटती थीं.

ऐसे में सबसे अहम बात यह है कि आर्थिक रूप से मजबूत होने के बाद इतना बड़ा कदम क्यों उठाया? मृतक पत्नी सोनू सिंह के स्टाफ का कहना है कि उनका स्वभाव बहुत अच्छा था, साथ ही बच्चों का व्यवहार भी शांत था. बेटा आदित्य सेक्टर 49 स्थित डीएवी स्कूल में पढ़ता था, तो बेटी दिल्ली जामिया कॉलेज से पढ़ाई कर रही थी.

सोनू सिंह के स्टाफ ने यह चौंकाने वाला दावा किया है कि डॉ. प्रकाश सिंह बेहद गर्म स्वभाव के थे. वह सन फार्मा कंपनी में साइंटिस्ट थे. बताया जा रहा है कि 2 महीने पहले उनकी नौकरी छूट गई थी. पूरे परिवार के खत्म हो जाने से लगभग 35 लोगों की नौकरी के ऊपर ही संकट छा गया है.

बेटा, बेटी और पत्नी का कत्ल प्रकाश सिंह ने रात कितने बजे किया और फिर खुद कितने बजे फांसी लगाई? इसका सटीक पता तो पोस्टमार्टम के बाद ही चलेगा, लेकिन बताया जा रहा है कि डॉक्टर प्रकाश सिंह ने रविवार रात को अपने पूरे परिवार को तेजधार हथियार से मार डाला. इनमें पत्नी के अलावा, एक लड़का और एक लड़की है. इसके बाद खुद भी फांसी पर लटक गए. यह महज इत्तेफाक है कि ठीक एक साल पहले दिल्ली के बुराड़ी इलाके में 30 जून, 2018 की रात को भी खूनी खेल खेला गया था, जिसमें ललित की सनक के चलते 11 लोगों ने फांसी लगा ली, जिसमें ललित भी शामिल था.

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माब लिंचिंग की घटनाओं में राज्य और पुलिस की अपराधिक भूमिका

इधर कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जबकि किसी न किसी राज्य से माब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हिंसा) की खबर न आ रही हो. यह स्थिति देश के अन्दर अराजकता, कानून के राज्य का भाव एवं विभिन्न समुदायों में गहरा अविश्वास तथा शत्रुता का प्रतीक है. इसकी एक विशेषता यह है कि माब लिंचिंग अधिकतर अल्प संख्यक (मुसलमान), ईसाई, दलित तथा कमज़ोर तबकों के साथ हो रही है. इसमें अधिकतर हिन्दू- मुसलमान, सवर्ण-दलित वैमनस्य तथा विभिन्न समुदाय/धर्म के व्यक्तियों के बीच प्रेम सम्बन्ध आदि कारक पाए जाते हैं. इसके अतिरिक्त राजनीतिक प्रतिद्वंदिता भी इसका कारक पायी जाती है.

पूर्व में इस प्रकार की घटनाएँ बहुत कम होती थीं. यदाकदा आदिवासियों में किसी महिला को डायन करार देकर उस पर हिंसा की जाती थी. कभी कभार साम्प्रदायिक दंगों में इस प्रकार की हिंसा होना पाया जाता था. परन्तु इधर कुछ वर्षों से भीड़ द्वारा हिंसक हो कर माब लिंचिंग की घटनाओं में वृद्धि हुयी है. डाटा दर्शाता हैं कि 2012 से 2014 तक 6 मामलों की अपेक्षा 2015 से अब तक 121 घटनाएँ हो चुकी हैं. यह वृद्धि भाजपा शासित राज्यों में अधिक पायी गयी है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पाया गया है कि 2009 से लेकर अब तक माब लिंचिंग के 297 मामले हुए हैं जिनमें से 66% भाजपा शासित राज्यों में हुए हैं. इनमें अभी तक 98 लोग मर चुके हैं तथा 722 घायल हुए हैं. 2009 से 2019 तक माब लिंचिंग की घटनाओं में 59% मुसलमान थे. इनमें से 28% घटनाएँ पशु चोरी/तस्करी के सम्बन्ध में थीं. काफी घटनाएँ गोमांस लेजाने की आशंका को लेकर थीं. कुछ घटनाएँ बच्चा चोरी की आशंका को ले कर भी थीं.

माब लिंचिंग की घटनाओं में देखा गया है कि इनमें हिंदुत्व के समर्थकों की अधिक भागीदारी रही है. यह सर्वविदित है कि भाजपा/आरएसएस की हिंदुत्व की राजनीति का मुख्य आधार हिन्दू- मुस्लिम विभाजन एवं ध्रुवीकरण है. माब लिंचिंग के दौरान मुसलमानों से “जय श्रीराम” तथा “भारत माता की जय” के नारे लगवाना समाज के हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण और आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा के अंग हैं. इधर की काफी घटनाओं में इस प्रकार की हरकत दृष्टिगोचर हुयी है. काफी जगह पर लोगों के पहनावे तथा दाढ़ी-टोपी का भी उपहास उड़ाया गया है. दरअसल ऐसा व्यवहार मुसलमानों का मनोबल गिराने तथा अपमानित करने के इरादे से किया जाता है. वास्तव में माब लिंचिंग भाजपा की नफरत की राजनीति का एक महत्वपूरण अंग है. भाजपा शासित राज्यों में माब लिंचिंग के आरोपियों पर प्रभावी कार्रवाही न करना उनको प्रोत्साहन देना है.

माब लिंचिंग की घटनाओं में यह पाया गया है कि पुलिस का व्यवहार अति पक्षपातपूर्ण रहता है. बहुत सी घटनायों में पाया गया है कि मौके पर पुलिस की उपस्थिति के बावजूद घटना को रोकने की कोई कोशिश नहीं की जाती. अधिकतर मामलों में पुलिस मूक दर्शक बनी रहती है जोकि उसकी कर्तव्य की अवहेलना का प्रतीक है और एक सरकारी कर्मचारी का दंडनीय अपराधिक कृत्य है. यह एक दृष्टि से राज्य की अपने नागरिकों की जानमाल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के कर्तव्य की अवहेलना है तथा कुछ विशेष समुदायों के प्रति वैमनस्य का भी प्रतीक है. यह राज्य के फासीवादी रुझान का प्रतीक है जो अपने विरोधियों को नुकसान पहुँचाने तथा मनोबल गिराने का उपक्रम है.

इसके अतिरिक्त यह भी पाया गया है कि एक समुदाय की हिंसा को उचित ठहराने और अपराध को हल्का करने के इरादे से हिंसा के शिकार हुए लोगों के विरुद्ध झूठे/ सच्चे क्रास केस दर्ज कर दिए जाते हैं और उनको भी आरोपी बना दिया जाता है. इससे हिंसा के दोषी लोगों को बहुत लाभ पहुँचता है और केस कमज़ोर हो जाता है. इन मामलों की तफ्तीश में पुलिस की भूमिका बहुत पक्षपात पूर्ण रहती है. वह हिंसा के शिकार पक्ष के सुबूत या बयान को सही ढंग से दर्ज नहीं करती जिस कारण उनका केस कमज़ोर हो जाता है. कई मामलों में पाया गया कि भीड़ द्वारा हिंसा के शिकार लोग वैध तरीके से जानवर खरीद कर ले जा रहे थे और उनके पास खरीददारी सम्बन्धी कागजात भी थे जो गोरक्षको द्वारा छीन लिए गये और उन पर पशु तस्करी का आरोप लगा कर मारपीट की गयी. पुलिस ने भी गोरक्षको की बात मान कर पीड़ित लोगों पर ही पशु तस्करी का आरोप लगा कर चालान कर दिया जबकि पुलिस को उनकी बात का सत्यापन करना चाहिए था. परन्तु ऐसा जानबूझ कर नहीं किया जाता. पहलू खान का मामला इसका ज्वलंत उदहारण है.

जैसा कि ऊपर अंकित किया गया है कि माब लिंचिंग के मामलों में पुलिस का व्यवहार अधिकतर पक्षपातपूर्ण पाया जाता है. यह वास्तव में पीड़ित वर्गों के प्रति राज्य के व्यवहार को ही प्रदर्शित करता है. हाल में झारखण्ड में तबरेज़ की हुयी माब लिंचिंग इसका ज्वलंत उदाहरण है. 18 जून को तबरेज़ पर चोरी की आशंका में तब हमला किया गया जब वह रात में जमशेदपुर से अपनें गाँव सराइकेला जा रहा था. उसे रात भर बुरी तरह से पीटा गया. अगले दिन उसे पुलिस के सुपुर्द किया गया परन्तु पुलिस ने उसे कोई डाक्टरी सहायता नहीं दिलवाई जबकि वह बुरी तरह से घायल था. इतना ही नहीं जब उसके घर वाले उसे मिलने थाने पर गए तो उनके अनुरोध पर भी उसे इलाज हेतु नहीं भेजा गया. इसके बाद उसे चोरी के मामले में अदालत में पेश करके जेल भेज दिया गया. जहाँ पर भी उसे उचित डाक्टरी सहायता नहीं दिलाई गयी जिसके फलस्वरूप 22 जून को उसकी मौत हो गयी. यह बड़ी चिंता की बात है कि तबरेज़ के मामले में न तो पुलिस, न अदालत और न ही जेल अधिकारियों ने उसे नियमानुसार डाक्टरी सहायता दिलाने की कार्रवाही की जिसके अभाव में उसकी मौत हो गयी. राज्य/पुलिस का यह व्यवहार राज्य के कानून के शासन को जानबूझ कर लागू न करना बहुत चिंता की बात है.

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि माब लिंचिंग केवल हिन्दू-मुस्लिम, हिन्दू-दलित या हिन्दू- ईसाई समस्या नहीं है बल्कि राज्य द्वारा नागरिकों की जानमाल की सुरक्षा की गारंटी, कानून का राज एवं न्याय व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू होने देने में विफलता है. यह राज्य के जनविरोधी फासिस्ट रुझान का प्रबल प्रतीक है जिसका डट कर मुकाबला किये जाने की ज़रुरत है. इसके साथ ही यह यह भाजपा/आरएसएस की नफरत की राजनीति का दुष्परिणाम भी है जिसके विरुद्ध सभी धर्मनिरपेक्ष, जनवादी एवं लोकतान्त्रिक ताकतों को गोलबंद होना होगा.

लेखक आई.पी.एस. (से.नि.) एवं जन मंच के संयोजक हैं.

17 पिछड़ी जातियों को SC में शामिल करने पर मायावती का बड़ा बयान

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने को लेकर बड़ा बयान दिया है. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यह फैसला लेने के तीन दिन बाद मायावती ने इस संबंध में बयान दिया है. इस संबंध में बसपा प्रमुख ने लखनऊ में मीडिया को संबोधित करने के बाद जारी प्रेस नोट में अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के बाद अनुसूचित जाति का आरक्षण का कोटा बढ़ाने की मांग की है.

बसपा प्रमुख ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश बीजेपी सरकार का यह आदेश इन 17 जातियों के साथ सबसे बड़ा धोखा है क्योंकि वास्तव में अब इन जातियों के लोगों को ना तो ओ.बी.सी. का लाभ मिलेगा और ना ही अनुसूचित जाति का लाभ मिलेगा. ओ.बी.सी. का लाभ इसलिये नहीं मिलेगा, क्योंकि अब उत्तर प्रदेश सरकार इस आदेश के बाद उन्हें ओ.बी.सी. नहीं मानेगी और अनुसूचित जाति के होने का लाभ इसलिये नहीं मिलेगा क्योंकि कोई भी राज्य सरकार किसी भी जाति को अपने आदेशों से न तो अनुसूचित जाति की सूची में डाल सकती है और न ही उससे हटा सकती है. इस प्रकार योगी सरकार का यह आदेश पूरी तरह से गैर कानूनी और असंवैधानिक है.

उन्होंने योगी सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा, “ऐसा सिर्फ इन 17 जातियों के लोगों को धोखा देने की नियत से ही किया गया है क्योंकि इन जातियों को ओ.बी.सी. होने के नाते 27 प्रतिशत आरक्षण का जो लाभ मिल रहा है, वो अब इनसे छिन जायेगा और संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत ये अनुसूचित जाति के नहीं माने जा सकते हैं.”

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यंत्री ने इसी प्रकार की मांग बहुजन समाज पार्टी द्वारा कई बार की गई है और मैं एक बार फिर केंद्र सरकार से अपील करती हूं कि संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करते हुये इन 17 जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में डाला जाये, लेकिन ऐसा करते समय वर्तमान का जो अनुसूचित जाति का कोटा है उसे इसी अनुपात में बढ़ाया जाये, जिससे कि जो पूर्व में अनुसूचित जाति की सूची के लोग हैं उनको कोई नुकसान न हो और इन 17 जातियों को भी फिर आरक्षण का उचित लाभ मिल सके.

भारी बारिश से मुम्बई में तबाही

महाराष्ट्र के पुणे में शनिवार को बड़ा हादसा हो गया. कोंधवा में दीवार गिरने से 15 लोगों की मौत हो गई जबकि 2 लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं. मलबे में कई लोगों के फंसे होने की आशंका है. राहत बचाव का काम जारी है. मौके पर एनडीआरएफ की टीम भी पहुंच गई है.

खबरों के मुताबिक कोंधवा इलाके में झुग्गियों पर दीवार गिर गई. मलबे में 3 लोग फंसे हैं जिन्हें निकाला जा रहा है. कुल 15 लोगों के फंसे होने की खबर आई थी. बारी बारिश के चलते यह दर्दनाक हादस हुआ. 60 फुट लंबे चौड़े कंपाउंड की दीवार बगल में झुग्गियों पर गिर गई जिसमें सोए कई लोग दब गए. दमकल विभाग के मुताबिक मरने वालों में 4 बच्चे भी शामिल हैं. गंभीर रूप से घायल दो लोगों का अस्पताल में इलाज चल रहा है.

घटना के बारे में पुणे के जिलाधिकारी ने कहा कि ‘भारी बारिश के कारण दीवार गिरी. इस घटना के बाद शुरुआती जांच में कंस्ट्रक्शन कंपनी की गड़बड़ी सामने आ रही है. 15 लोगों की मौत छोटी घटना नहीं है. मृतकों में ज्यादातर बिहार और बंगाल के लोग हैं. पीड़ितों की हरसंभव सहायता की जा रही है.

घटना का कारण भारी बारिश बताया जा रहा है. शुक्रवार से मुंबई और पुणे से सटे इलाकों में भारी बारिश हो रही है. इसके कारण जमीन दरकने की भी खबरें आ रही हैं. मुंबई में बारिश के कारण करंट लगने से दो लोगों की मौत हो गई, जबकि कई इलाकों में पेड़ गिरने से लोग घायल हो गए. एक ऐसी ही खबर मुंबई के चेंबूर से आई जहां ऑटो रिक्शा पर एक दीवार गिर गई. घटना 2 बजे रात की है. मलबा हटा लिया गया है. इसमें किसी के हताहत होने की खबर नहीं है.

पुणे में अगले 4 दिन तक भारी बारिश की आशंका जताई गई है. मुंबई समेत अन्य कोंकण क्षेत्र में भी भारी बारिश का पूर्वानुमान है. मौसम विभाग के मुताबिक अरब सागर के ऊपर मॉनसून का दबाव बना हुआ है जो अगले कुछ दिनों में भारी से अति भारी बारिश करा सकता है. मुंबई में शुक्रवार से बारिश हो रही है. कई जगहों पर जलभराव की समस्या खड़ी हो गई है. सड़कों पर पानी भरने से लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. मुंबई में कुछ देर बारिश रुकने के बाद पिछली रात फिर बारिश शुरू हो गई. मुंबई में मौसम विभाग ने कहा है कि अगले 24 घंटे में काफी तेज बारिश होने की आशंका है.

 

उत्तर प्रदेश में अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित-जातियों की सूची में शामिल करने की राजनीति

कल योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश की 17 अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति के प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश जारी किया है जोकि पूरी तरह से असंवैधानिक एवं दलित विरोधी है. यह आदेश इलाहबाद हाई कोर्ट के अखिलेश यादव सरकार द्वारा 17 अति–पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के आदेश पर लगे स्टे के हट जाने के परिणामस्वरूप जारी किया गया है जबकि इसमें इस मामले के अंतिम निर्णय के अधीन होने की शर्त लगायी गयी है. इससे पहले अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने दिसंबर 2016 को 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने का निर्णय लिया था जिनमें निषाद, बिन्द, मल्लाह,केवट, कश्यप, भर, धीवर, बाथम, मछुआरा, प्रजापति,राजभर,कहार, कुम्हार, धीमर, मांझी, तुरहा तथा गौड़ आदि जातियां शामिल हैं. यह ज्ञातव्य है कि सरकार का यह कदम इन जातियों को कोई वास्तविक लाभ न पहुंचा कर केवल उनको भुलावा देकर वोट बटोरने की चाल थी. यह काम लगभग सभी पार्टियाँ करती रही हैं / कर रही हैं. इस सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि इस से पहले भी वर्ष 2006 में मुलायम सिंह की सरकार ने 16 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची तथा 3 अनुसूचित जातियों को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने का शासनादेश जारी किया था जिसे आंबेडकर महासभा तथा अन्य दलित संगठनों द्वारा न्यायालय में चुनौती देकर रद्द करवा दिया गया था. परन्तु सपा ने यह दुष्प्रचार किया था कि इसे मायावती ने 2007 में सत्ता में आने पर रद्द कर दिया था.

वर्ष 2007 में सत्ता में आने पर 2011 में मायावाती, जो कि अपने आप को दलितों का मसीहा घोषित करती है, ने भी इसी प्रकार से 16 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूचि में शामिल करने की संस्तुति केन्द्रीय सरकार को भेजी थी. इस पर केन्द्रीय सरकार ने इस के औचित्य के बारे में उस से सूचनाएं मांगी तो वह इस का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकी और केन्द्रीय सरकार ने उस प्रस्ताव को वापस भेज दिया था.

इस विवरण से स्पष्ट है कि समाजवादी पार्टी और बसपा तथा अब भाजपा इन अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल कराकर उन्हें अधिक आरक्षण दिलवाने का लालच देकर केवल उनका वोट प्राप्त करने की राजनीति कर रही हैं क्योंकि वे अच्छी तरह जानती हैं कि न तो उन्हें स्वयं इन जातियों को अनुसूचित जातियों की सूचि में शामिल करने का अधिकार है और न ही यह जातियां अनुसूचित जातियों के माप दंड पर पूरा ही उतरती हैं. वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार किसी भी जाति को अनुसूचित जातियो की सूची में शामिल करने अथवा इस से निकालने का अधिकार केवल पार्लियामेंट को ही है. राज्य सरकार औचित्य सहित केवल अपनी संस्तुति केन्द्रीय सरकार को भेज सकती है जो इस सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार ही रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया तथा रष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से परामर्श के बाद पार्लियामेंट के माध्यम से ही किसी जाति को सूचि में शामिल कर अथवा निकाल सकती है. संविधान की धारा 341 में राष्ट्रपति ही राज्यपाल से परामर्श करके संसद द्वारा कानून पास करवा कर इस सूचि में किसी जाति का प्रवेश अथवा निष्कासन कर सकता है. इस में राज्य सरकार को कोई भी शक्ति प्राप्त नहीं है. वास्तव में यह पार्टियाँ अपनी संस्तुति केन्द्रीय सरकार को भेज कर सारा मामला कांग्रेस की झोली में डालकर यह प्रचार करती हैं कि हम तो आप को अनुसूचित जातियों की सूचि में डलवाना चाहते हैं परन्तु केंद्र सरकार उसे नहीं कर रही है. यह अति पिछड़ी जातियों को केवल गुमराह करके वोट बटोरने की राजनीति रही है जिसे अब शायद ये जातियां भी बहुत अच्छी तरह से समझ गयी हैं. इसके पहले भाजपा सरकार ने सोनभद्र की धांगर जाति को अनुसूचित जाति की सूची से बाहर करके पिछड़ी जाति की धनगर (पाल/गडरिया) को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र जारी करने का अवैधानिक आदेश पारित किया था जिस पर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की आदिवासी वनवासी महासभा ने हाई कोर्ट से स्थगन आदेश प्राप्त कर रोक लगवा रखी है.

इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि अखिलेश यादव अथवा मायावती की बसपा एवं अब भाजपा सरकार द्वारा जिन अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूचि में डालने की जो संस्तुति पहले की गयी थी अथवा अब की गयी है वह मान्य नहीं होगी क्योंकि यह जातियां अनुसूचित जातियों की अस्पृश्यता की आवश्यक शर्त को पूरा नहीं करती हैं. यह सर्व विदित है कि अनुसूचित जातियां सवर्ण हिन्दुओं के लिए अछूत हैं जबकि सम्बंधित पिछड़ी जातियां उन के लिए सछूत हैं. इस प्रकार उनका किसी भी हालत में अनुसूचित जातियों की सूचि में शामिल किया जाना संभव नहीं है.

यदि भाजपा सरकार इन पिछड़ी जातियों को आरक्षण का वांछित लाभ वास्तव में देना चाहती है जोकि वार्तमान में उन्हें पिछड़ों में समृद्ध जातियों (यादव, कुर्मी तथा जाट आदि ) के शामिल रहने से नहीं मिल पा रहा है तो उसे इन जातियों की सूची को तीन हिस्सों में बाँट कर उनके लिए 27% के आरक्षण को उनकी आबादी के अनुपात में बाँट देना चाहिए. देश के अन्य कई राज्य बिहार, तमिलनाडु, कर्नाटक अदि में यह व्यवस्था पहले से ही लागू है. मंडल आयोग की रिपोर्ट में भी इस प्रकार की संस्तुति की गयी थी.

उत्तर प्रदेश में इस सम्बन्ध में 1975 में डॉ. छेदी लाल साथी की अध्यक्षता में सर्वाधिक पिछड़ा आयोग गठित किया गया था जिस ने अपनी रिपोर्ट 1977 में उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपी थी परन्तु उस पर आज तक कोई भी कार्रवाही नही की गयी. साथी आयोग ने पिछड़े वर्ग की जातियों को तीन श्रेणियों में निम्न प्रकार बाँटने तथा उन्हें 29.5 % आरक्षण देने की संस्तुति की थी:

“अ” श्रेणी में उन जातियों को रखा गया था जो पूर्ण रूपेण भूमिहीन, गैर-दस्तकार, अकुशल श्रमिक, घरेलू सेवक हैं और हर प्रकार से ऊँची जातियों पर निर्भर हैं. इनको 17% आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी. “ब” श्रेणी में पिछड़े वर्ग की वह जातियां, जो कृषक या दस्तकार हैं. इनको 10% आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी. “स” श्रेणी में मुस्लिम पिछड़े वर्ग की जातियां हैं जिनको 2.5 % आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी.

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण उपलब्ध है. अतः इसे डॉ. छेदी लाल साथी आयोग की संस्तुतियों के अनुरूप पिछड़ी जातियों को तीन हिस्सों में बाँट कर उपलब्ध आरक्षण को उनकी आबादी के अनुपात में बाँटना अधिक न्यायोचित होगा. इस से अति पिछड़ी जातियों को अपने हिस्से के अंतर्गत आरक्षण मिलना संभव हो सकेगा.

इन अति पिछड़ी जातियों को यह भी समझना होगा कि भाजपा सरकार इन जातियों को इस सूची से हटा कर समृद्ध जातियों यादव, कुर्मी और जाट के लिए आरक्षण बढ़ाना चाहती है और उन्हें अनुसूचित जातियों से लड़ाना चाहती है. अतः उन्हें भाजपा की इस चाल को समझाना चाहिए और उन के इस झांसे में न आ कर डॉ. छेदी लाल साथी आयोग की संस्तुतियों के अनुसार अपना आरक्षण अलग कराने की मांग उठानी चाहिए. इसी प्रकार कुछ जातियां जो वर्तमान में अनुसूचित जातियों की सूचि में हैं परन्तु उन्हें अनुसूचित जनजातियों की सूचि में पीपुल्स फ्रंट ने पैरवी करके सोनभद्र जिले की कई जनजातियों को अनुसूचित जातियों की सूची से हटवा कर अनुसूचित जनजातियों की सूची में डलवाया भी है. इतना ही नहीं सोनभद्र जिले में जनजातियों के लिए विधानसभा की दो सीटें भी 2013 में अरक्षित करवाई हैं. वर्तमान में कोल जनजाति को अनुसूचित जाति से निकलवा कर अनुसूचित जाति की सूचि में डलवाने की कार्रवाही चल रही है.

यह भी विचारणीय है कि जब निजीकरण के कारण सरकारी नौकरियां लगातार कम हो रही है तो फिर आरक्षण को बाँटने अथवा नया आरक्षण देना का क्या लाभ है. असली ज़रुरत तो रोज़गार के अवसर पैदा करने की है जो कि बढ़ने की बजाये कम हो रहे हैं. बेरोज़गारी की समस्या तभी हल होगी जब बड़ी संख्या में रोज़गार सृजन किया जाये, रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाया जाये तथा बेरोज़गारी भत्ता दिया जाये. आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट इस मांग को काफी लम्बे समय से उठाता आ रहा है.

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शूटर का कबूलनामा- ‘हां, मैंने ही दाभोलकर को मारी थीं दो गोलियां’

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मुंबई। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के एक आरोपी शरद कलस्कर ने अपने इकबालिया बयान में कबूल किया है कि उसने ही दाभोलकर की हत्या की थी. कलस्कर ने पुलिस को बताया कि उसने दाभोलकर को दो गोलियां मारी थीं, एक उनके सिर और दूसरी उनकी आंख में. उसने जंगल में पहले एयरगन चलाने की ट्रेनिंग ली और उसके बाद रेकी करके दाभोलकर की हत्या की थी.

कलस्कर डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या करने वाले 2 शूटरों में से एक है. शरद को सीबीआई ने दूसरे शूटर सचिन अंदुरे के साथ डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था. बता दें कि अंधविश्वासों के खिलाफ बोलने वाले सामाजिक कार्यकर्ता दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को पुणे के ओंकारेश्वर पुल पर सुबह को टहलते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

मिली थी ट्रेनिंग कलस्कर ने 12 अक्टूबर 2018 को शिमोंग जिले के पुलिस अधीक्षक अभिनव खरे के सामने इकबालिया बयान दिया था. कलस्कर ने पुलिस के सामने बयान में कबूल किया है कि उसे कुछ दक्षिणपंथी ग्रुप के सदस्यों ने संपर्क किया और हिंदू धर्म पर प्रवचन देने, गोहत्या, मुस्लिम कट्टरता और लव जिहाद पर विडियो दिखाए. इसके साथ ही उसे बताया गया था कि उसे मर्डर करना होगा. उसने बताया उससे यह बात वीरेंद्र तावड़े ने कही थी, जो कि मुख्य साजिशकर्ता है.

   

BSP के 2 नेताओं पर चला आलाकमान का चाबुक

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नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की गौतमबुद्ध नगर यूनिट ने पूर्व विधायक भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित और पूर्व विधायक मुकेश शर्मा को पार्टी से निष्कासित कर दिया है. दोनों को पार्टी में अनुशासनहीनता, पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने व लोकसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं के साथ अभद्र व्यवहार करने पर निकाला गया है.

यहां पर बता दें कि लोकसभा 2019 के चुनाव में फतेहपुर सीकरी से गुड्डू पंडित को पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया था. आरोप है कि इस दौरान गुड्डू पंडित व उनके भाई मुकेश पंडित ने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ अभद्र व्यवहार किया. पार्टी विरोधी गतिविधियां करने पर कई बार चेतावनी भी दी गई. इसके बाद भी शिकायतें आती रहीं. इसी के चलते दोनों को पार्टी से निकाल दिया गया.

वहीं, इस बारे में गुड्डू पंडित ने कहा कि वह पहले ही पार्टी को छोड़ चुके हैं. पार्टी की ओर से ऐसी मांग की जा रही थी जिसे पूरा नहीं किया जा सकता है. वहीं, मुकेश पंडित ने कहा कि बसपा ब्राह्मण विरोधी है.

बुलंदशहर के बसपा जिलाध्यक्ष के अनुसार दोनों भाइयों की लगातार हाईकमान तक शिकायतें पहुंच रही थी. बसपा जिलाध्यक्ष कमल राजन ने बताया कि लोकसभा चुनाव से पहले गुड्डू पंडित को पार्टी में शामिल किया गया और फतेहपुर सीकरी से पार्टी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया. लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों भाई का आचरण पार्टी की नीतियों से अलग था और कार्यकर्ताओं के साथ अभद्र व्यवहार करने की कई वीडियो भी वायरल हुई थी. इसके अलावा दोनों भाई पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं. लगातार शिकायतें मिलने पर हाईकमान पर आदेश पर दोनों भाई की गोपनीय जांच कराई गई. जांच में दोनों भाई पर लगाए गए आरोप सही मिले. इसके बाद हाईकमान ने दोनों को पार्टी से निष्कासित करने का निर्देश जारी कर दिया. उधर, बसपा से हुए निष्कासन के बाद गुड्डू पंडित ने बताया कि बसपा सुप्रीमों के निर्णय से उन्हें खुशी है. उन्होंने खुद पर लगाए गए आरोपों को भी नकार दिया.

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टीम इंडिया के मैच जीतते ही ये 3 टीम हो गईं World Cup के सेमीफाइनल की रेस से बाहर

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टीम इंडिया ने वर्ल्ड कप 2019 के 34वें मुकाबले में वेस्टइंडीज को हरा दिया. भारत की इसी जीत के साथ तीन टीम वर्ल्ड कप 2019 के सेमीफाइनल की रेस से बाहर हो गईं. वहीं, टीम इंडिया 6 मैचों में 5वीं जीत के साथ इस विश्व कप की अंकतालिका में दूसरे स्थान पर पहुंच गई और विराट आर्मी के सेमीफाइनल में पहुंचने का मौका बन गया है.

वेस्टइंडीज को भारत के हाथों हार का सामना करना पड़ा. इसी हार के साथ वेस्टइंडीज इस वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल की रेस से बाहर हो गई. वेस्टइंडीज ने वर्ल्ड कप 2019 के 9 में से 7 मुकाबले खेल लिए हैं. इस दौरान कैरेबियाई टीम को सिर्फ 1 मैच में जीत मिली है. वेस्टइंडीज की ये वर्ल्ड कप 2019 में पांचवीं हार है जबकि एक मैच बेनतीजा रहा था.

वेस्टइंडीज से पहले अफगानिस्तान और साउथ अफ्रीका भी इस वर्ल्ड कप 2019 के सेमीफाइनल की रेस से बाहर हो गई हैं. वहीं, ऑस्ट्रेलिया एकमात्र ऐसी टीम है, जिसने 12 अंक हासिल कर इस वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई कर लिया है. इस हार के बाद वेस्टइंडीज की झोली में सिर्फ 3 अंक हैं.

वर्ल्ड कप 2019 के सेमीफाइनल के लिए भारत और न्यूजीलैंड को सिर्फ एक-एक मैच जीतना है क्योंकि इन दोनों टीमों के 11-11 अंक हो गए हैं. एक और जीत के साथ टीम 13-13 अंकों के साथ विश्व कप के सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई कर जाएंगी. वहीं, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान और इंग्लैंड को अपने बाकी बचे सभी मुकाबले जीतने होंगे जो कि आसान काम नहीं है.

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मुलायम की छोटी बहू का बसपा सुप्रीमो पर करारा तंज

लोकसभा चुनाव में उम्मीद के मुताबिक नतीजे न आने के बाद से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती समाजवादी पार्टी और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर लगातार हमलावर हैं. हालांकि अखिलेश यादव अभी तक चुप्पी साधे हुए हैं. अब समाजवादी पार्टी (सपा) के संरक्षक मुलायम सिंह की छोटी बहू अपर्णा यादव ने मायावती पर करारा तंज कसा है.

अपर्णा यादव ने कहा, ‘हमने मायावती को सम्मान देने में कोई कमी नहीं रखी, लेकिन उन्होंने हमारे सम्मान की लाज नहीं रखी. वो समाजवादी पार्टी के सम्मान को पचा नहीं पाई हैं. वेदों में लिखा है कि जो सम्मान नहीं पचा पाता, वो अपमान भी नहीं पचा पाता.’ आजतक से बातचीत में अपर्णा यादव ने कहा, ‘मायावती से गठबंधन करने का फैसला पूरी तरह सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का था.’

अखिलेश यादव के फैसले से थोड़ी नाराजगी जताते हुए अपर्णा यादव ने कहा कि ‘उन्होंने (अखिलेश यादव) इस गठबंधन का फैसला किससे सलाह लेकर किया था, यह वही बता सकते हैं. हालांकि मुलायम सिंह यादव बसपा से गठबंधन के फैसले से खुश थे या नहीं, इस पर मैं कुछ नहीं बोलना चाहती हूं.’

समाजवादियों को एकजुट होने की सलाह देते हुए अपर्णा ने कहा, ‘अभी समाजवादी पार्टी के लिए बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि लोकसभा चुनाव में पार्टी की सीटें बेहद कम आई हैं. अब समाजवादियों को एकजुट होना ही होगा. साथ ही पार्टी अपनी हार को लेकर चिंतन और मंथन करे.’

अपर्णा ने कहा, ‘मैं चाहती हूं कि समाजवादी पार्टी के सभी बड़े नेताओं को एक साथ आना चाहिए और वैचारिक मंथन करना चाहिए कि क्या वजह रही कि लोकसभा चुनाव में पार्टी को इतनी बुरी हार का सामना करना पड़ा. इस पर बहुत जरूरी और बहुत जल्द निर्णय होना चाहिए. अभी बीजेपी की प्रचंड लहर है और लोग बीजेपी को पसंद कर रहे हैं, तो यह समाजवादी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है.’

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आरएसएस ने 1948 में तिरंगे को पैरों तले रौंदा था!

बीजेपी आज क्यों इतनी ज्यादा राष्ट्रप्रेम की बात करती है शायद इसलिए कि बीजेपी की मातृ संस्था आरएसएस ने आज़ादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया था. 1930 और 1940 के दशक में जब आज़ादी की लड़ाई पूरे उफान पर थी तो आरएसएस का कोई भी आदमी या सदस्य उसमें शामिल नहीं हुआ था. यहाँ तक कि जहां भी तिरंगा फहराया गया आरएसएस वालों ने कभी उसे सैल्यूट तक नहीं किया. आरएसएस ने हमेशा ही भगवा झंडे को तिरंगे से ज्यादा महत्व दिया. 30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गाँधी की हत्या कर दी गयी तो इस तरह की खबरें आई थीं कि आरएसएस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंद रहे थे. यह खबर उन दिनों के अखबारों में खूब छपी थीं. आज़ादी के संग्राम में शामिल लोगों को आरएसएस की इस हरकत से बहुत तकलीफ हुई थी. उनमें जवाहरलाल नेहरू भी एक थे. 24 फरवरी को उन्होंने अपने एक भाषण में अपनी पीड़ा को व्यक्त किया था. उन्होंने कहा कि खबरें आ रही हैं कि आरएसएस के सदस्य तिरंगे का अपमान कर रहे हैं. उन्हें मालूम होना चाहिए कि राष्ट्रीय झंडे का अपमान करके वे अपने आपको देशद्रोही साबित कर रहे हैं.

यह तिरंगा हमारी आज़ादी के लड़ाई का स्थायी साथी रहा है, जबकि आरएसएस वालों ने आज़ादी की लड़ाई में देश की जनता की भावनाओं का साथ नहीं दिया था. तिरंगे की अवधारणा पूरी तरह से कांग्रेस की देन है. तिरंगे झंडे की बात सबसे पहले आन्ध्र प्रदेश के मसुलीपट्टम के कांग्रेसी कार्यकर्ता पी वेंकय्या के दिमाग में उपजी थी. 1918 और 1921 के बीच हर कांग्रेस अधिवेशन में वे राष्ट्रीय झंडे को फहराने की बात करते थे. महात्मा गाँधी को यह विचार तो ठीक लगता था लेकिन उन्होंने वेंकय्या जी की डिजाइन में कुछ परिवर्तन सुझाए. गाँधी जी की बात को ध्यान में रखकर दिल्ली के देशभक्त लाला हंसराज ने सुझाव दिया कि बीच में चरखा लगा दिया जाए तो ज्यादा सही रहेगा. महात्मा गाँधी को लालाजी की बात अच्छी लगी और थोड़े बहुत परिवर्तन के बाद तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया गया. उसके बाद कांग्रेस के सभी कार्यक्रमों में तिरंगा फहराया जाने लगा. अगस्त 1931 में कांग्रेस की एक कमेटी बनायी गयी, जिसने झंडे में कुछ परिवर्तन का सुझाव दिया. वेंकय्या के झंडे में लाल रंग था. उसकी जगह पर भगवा पट्टी कर दी गयी. उसके बाद सफ़ेद पट्टी और सबसे नीचे हरा रंग किया गया. चरखा बीच में सफ़ेद पट्टी पर सुपर इम्पोज कर दिया गया. महात्मा गाँधी ने इस परिवर्तन को सही बताया और कहा कि राष्ट्रीय ध्वज अहिंसा और राष्ट्रीय एकता की निशानी है.

आज़ादी मिलने के बाद तिरंगे में कुछ परिवर्तन किया गया. संविधान सभा की एक कमेटी ने तय किया कि उस वक़्त तक तिरंगा कांग्रेस के हर कार्यक्रम में फहराया जाता रहा है लेकिन अब देश सब का है. उन लोगों का भी जो आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों के मित्र के रूप में जाने जाते थे. इसलिए चरखे की जगह पर अशोक चक्र को लगाने का फैसला किया गया. जब महात्मा गाँधी को इसकी जानकारी दी गयी तो उन्हें ताज्जुब हुआ. बोले कि कांग्रेस तो हमेशा से ही राष्ट्रीय रही है. इसलिए इस तरह के बदलाव की कोई ज़रुरत नहीं है, लेकिन उन्हें नयी डिजाइन के बारे में राजी कर लिया गया. इस तिरंगे की यात्रा में बीजेपी या उसकी मालिक आरएसएस का कोई योगदान नहीं है, लेकिन वह उसी के बल पर कांग्रेस को राजनीतिक रूप से घेरने में सफल होती नज़र आ रही है. अजीब बात यह है कि कांग्रेस सहित सभी राजनितिक दल अपने इतिहास की बातें तक नहीं कर रहे हैं. अगर वे अपने इतिहास का हवाला देकर काम करें तो बीजेपी और आरएसएस को बहुत आसानी से घेरा जा सकता है और तिरंगे और देश भक्ति के नाम पर राजनीति करने से रोका जा सकता है।

इंद्रजीत राय जी की पोस्ट

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तामिलनाडु में वर्षों से बहिष्‍कार झेल रहे हैं ये 30 दलित परिवार

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सांकेतिक चित्र

खबर तामिलनाडु के त्रिची की है. तमिलनाडु में मनिकंदम ब्‍लॉक के अरुवाकुडी गांव के 30 दलित परिवारों ने सोमवार को जिलाधिकारी के सामने पेश होकर एक अर्जी दी है. इसमें उन्‍होंने आरोप लगाया है कि उनके गांव प्रधानों ने पिछले 30 वर्षों से उनका बहिष्‍कार कर रखा है. इन ग्रामीणों ने अपील की कि प्रशासन इस बहिष्‍कार को खत्‍म कराए ताकि वे 7 जुलाई को शुरू होने वाले सालाना मंदिर उत्‍सव में गांव के बाकी परिवारों के साथ हिस्‍सा ले सकें. इन 30 परिवारों पर इस उत्‍सव में हिस्‍सा लेने पर पाबंदी है.

हाल ही में हुई इम मामले की सुनवाई के दौरान महिला और बच्चों समेत करीब 60 ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को अपनी परेशानी सुनाई. इनकी अगुआई करने वाले टी पलानीस्‍वामी (59) ने बताया, ’30 साल पहले तत्‍कालीन गांव प्रमुख ने गांव के 120 दलित परिवारों में से 30 परिवारों का बहिष्‍कार करने का ऐलान किया था. उनका अपराध बस इतना था कि गांव की देवी मरिअम्‍मन की पूजा के दौरान उनसे कुछ भूल हो गई थी. लेकिन 30 साल बाद भी मौजूदा गांव प्रमुख और मंदिर के ट्रस्‍टी एस शक्तिवेल और एस थवासी अपने पूर्वजों के बनाए नियम का ही पालन कर रहे हैं.’

डिक्की का डॉ. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र से समझौता

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नई दिल्ली। खबर पिछले हफ्ते की है लेकिन महत्वपूर्ण है. 20 जुलाई को आई खबर के मुताबिक दलित उद्यमिता पर अनुसंधान के माध्यम से अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के सशक्तिकरण के लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के तहत आने वाले डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र (डीएआईसी) और दलित भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (डिक्की) के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुआ है. इस समझौते को लेकर केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने संयुक्त प्रयास की सराहना की और कहा कि समझौता ज्ञापन का उद्देश्य दलित उद्यमिता पर शोध और इन समुदायों की महिलाओं और युवाओं के बीच कौशल विकास की क्षमता विकसित कर एससी और एसटी समुदायों का सशक्तिकरण करना है.


A memorandum of understanding was signed between the Dr Ambedkar International Centre (DAIC) under the Ministry of Social Justice and Empowerment and the Dalit Indian Chamber of Commerce and Industry (DICCI) for empowerment of SC and ST communities through research on Dalit entrepreneurship.

Union Minister for Social Justice and Empowerment Thaawarchand Gehlot, applauded the applauded the joint effort and said the aims of the MoU include empowerment of SC and ST communities through research on Dalit entrepreneurship, building skill development capacity among women and youth of such communities.

DICCI brings together all Dalit entrepreneurs under one umbrella, and acts as their one-stop resource centre, while promoting entrepreneurship among the youth as a solution to their socio-economic problems.

According to an official statement, “The DAIC, through this collaboration, will also try to find out how far the SC and ST communities have engaged themselves in starting and establishing their own businesses.”

“The data will be used to identify the reason why the spirit of entrepreneurship has not been infused among Dalit youth to develop business leadership for empowering them to walk in step with the world,” it said.

The main areas of collaboration will include strengthening ties between DAIC and industrial organisations in the fields of research and training, creating a knowledge bank which may be used to facilitate scholars, researchers and policy makers and exchanging academic materials and publications.

It will also include conducting lecture programmes, seminars, symposiums and other types of academic discussions and undertake joint research attachment of staff for purposes of curriculum development and review.

Both DAIC and DICCI will be having rights on intellectual property and knowledge products created through collaborative efforts. The MoU will also provide free of cost mutual access to facilities available at their campus for purpose of fundamental academic research.

7 जुलाई को सीटीईटी परीक्षा से पहले जान लें ये 5 खास बातें

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) 7 जुलाई को केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करेगा. सीटीईटी एडमिट कार्ड जारी कर दिए गए हैं. जिन अभ्‍यर्थियों ने इस परीक्षा के लिए फॉर्म भरा है वे ऑफिशियिल वेबसाइट ctet.nic.in के जरिये अपना एडमिट कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं. बोर्ड के मुताबिक CTET paper 1 के लिए 8,17,892 उम्मीदवारों ने और 4,27,897 उम्मीदवारों ने पेपर 2 के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है. 8,38,381 उम्मीदवार ऐसे हैं जिन्होंने दोनों पेपरों के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है. 1. बोर्ड ने अभ्यर्थी को परीक्षा शुरू होने के 90 मिनट पहले केंद्र पर प्रवेश कर जाने का निर्देश दिया है. परीक्षा दो पालियों में ली जायेगी. प्रथम पाली सुबह 9.30 से 12 बजे तक और दूसरी पाली दो बजे से 4.30 बजे तक आयोजित होंगी. दोनों पेपर 150-150 मार्क्स के होंगे.

2. पेपर पेन पेपर मोड में होगा. परीक्षार्थियों को OMR शीट पर अपने उत्तर देने होंगे. दोनों पेपरों में 150-150 मल्टीपल च्वॉइस प्रश्न पूछे जाएंगे.

3. पेपर-1 में चाइल्ड डेवलपमेंट एंड पेडगोजी, लेग्वेंज I, लेंग्वेज II, मैथ्स, पर्यावरण से जुड़े प्रश्न पूछे जाएंगे. प्रत्येक विषय से 30-30 प्रश्न पूछे जाएंगे. प्रत्येक सेक्शन 30-30 मार्क्स का होगा. पेपर नंबर – 2 में चाइल्ड डेवलपमेंट एंड पेडगोजी, लेग्वेंज I, लेंग्वेज II, मैथ्स एंड साइंस (मैथ्स व साइंस के टीचर के लिए), सोशल साइंस/सोशल साइंस (सोशल स्टडीज/सोशल साइंस टीचर) से प्रश्न आएंगे. चाइल्ड डेवलपमेंट एंड पेडगोजी, लेग्वेंज I, लेंग्वेज II से प्रत्येक से 30-30 (30-30 मार्क्स) और मैथ्स एंड साइंस (मैथ्स व साइंस के टीचर के लिए), सोशल साइंस/सोशल साइंस (सोशल स्टडीज/सोशल साइंस टीचर) से 60-60 प्रश्न (60-60 मार्क्स) पूछे जाएंगे.

4. उम्मीदवार परीक्षा केंद्र पर अपना ऑरिजनल एडमिट कार्ड, दो बॉल पेन (काला/नीला) जरूर लेकर जाएं. साथ ही फोटो आईडी भी लेकर जाएं.

5. मोबाइल, ईयरफोन, हाथ में बांधने वाली घड़ी, कैमरा, ब्लूटूथ, कैलकुलेटर, पेपर, स्केल जैसी चीजें प्रतिबंधित हैं.

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नदी किनारे पड़ी पिता से लिपटी मासूम की मौत की यह तस्वीर दुनिया को झकझोर रही है

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मेक्सिको सिटी। भला कौन भूल सकता है करीब 4 साल पहले एक 3 साल के सीरियाई बच्चे एलन कुर्दी के शव की उस तस्वीर को, जिसने दुनिया को झकझोर दिया था. अब एक ऐसी ही और तस्वीर सामने आई है. बस जगह बदल गई है. भूमध्य सागर की जगह दक्षिणी अमेरिका और उत्तरी मेक्सिको में बहने वाली नदी रियो ग्रैंड है. एलन कुर्दी की जगह मेक्सिको के ऑस्कर अल्बर्टो मार्टिनेज रैमिरेज (25) और उनकी 23 महीने की बेटी वलेरिया है. अमेरिका में शरण की हसरत लिए बाप अपनी बेटी को पीठ पर लाद नदी तैरकर पार कर रहा था, ताकि यूएस के टेक्सस पहुंच जाए. लेकिन दोनों डूब गए. उनका शव रियो ग्रैंड नदी के किनारे औंधे मुंह पड़ा हुआ था. 23 महीने की बेटी का सिर बाप की टी-शर्ट में है. उसका एक हाथ पिता की गर्दन के पास है. वैसे भी कहा जाता है कि एक तस्वीर हजारों शब्दों के बराबर होती है लेकिन इस तस्वीर को आखिर कोई कैसे बयां करे, अनगिनत पन्ने भर दें तब भी बयां नहीं हो सकती. इस तस्वीर ने प्रवासियों और शरणार्थियों की समस्या पर दुनियाभर में बहस छेड़ दी है.

इंसानी सरहदों की भेंट चढ़े बाप-बेटी तस्वीर किसी को भी झकझोर देगी, दहला देगी, विचलित कर देगी. पुल बंद था तो पिता ने बेटी के साथ पार करने का फैसला किया. मां भी साथ में थी लेकिन वह बीच से लौट आई. सोचिए, उस मासूम को कहां पता होगा कि सरहदें क्या हैं, दुनिया क्या है, दुनियादारी क्या है, देश क्या है, परदेस क्या है…? एक मासूम के लिए माता-पिता का साया ही सुरक्षा का अहसास होता है, इस बात की गारंटी होती है कि कोई डर नहीं है. जब वह मासूम नदी में अपने पिता की पीठ पर लदी होगी तब भी उसमें यही अहसास रहा होगा. बीच-बीच में उसने छोटे-छोटे हाथों से पानी में छपाक-छपाक भी किया होगा. पिता की पीठ पर लदी मासूम पानी से अठखेलियां भी की होगी. उसे क्या पता था कि कुछ देर बाद न वह रहेगी, न उसकी सुरक्षा का कवच पिता रहेगा. उसे तो यह भी कहां पता था कि मौत क्या है. तस्वीर देखिए, पिता अपनी टी-शर्ट में अपने जिगर के टुकड़े को छुपा लिया था, लेकिन उसे मौत से नहीं छिपा पाया, खुद भी नहीं छिप पाया. तस्वीर हिला देने वाली है लेकिन सोचिए, उस मां, उस पत्नी पर क्या गुजरी होगी जिसने अपने सामने इस मंजर को देखा था. मार्टिनेज रैमिरेज और वलेरिया इंसान के बनाए सरहदों की बलि चढ़ गए.

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भारतीय टीम की नारंगी जर्सी के ज़रिए भगवाकरण का आरोप

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भारतीय क्रिकेट टीम की विश्व कप में दूसरी जर्सी पर विवाद हो गया है. भारतीय टीम 30 जून को इंग्लैंड के ख़िलाफ़ होने वाले मैच में नारंगी रंग की जर्सी पहनेगी.

जनसत्ता में प्रकाशित समाचार के अनुसार इस जर्सी पर राजनीति शूरू हो गई है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं को इस जर्सी के पहनने के पीछे भगवाकरण का संदेह लग रहा है.

अख़बार लिखता है कि इस मामले पर मुंबई से समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आसिम आज़मी ने प्रधानमंत्री मोदी पर हर चीज़ का भगवाकरण करने के प्रयास का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा है कि मोदी पूरे देश को भगवा रंग में रंगना चाहते हैं.

कांग्रेस विधायक नसीम ख़ान ने भी आज़मी के आरोप का समर्थन किया है और भगवाकरण का आरोप लगाया है. भाजपा ने इसका मज़ाक़ बनाते हुए इसे संकुचित सोच बताया है.

वहीं अख़बार ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा के बयान को प्रकाशित किया है. आनंद शर्मा का कहना है कि टीम की ड्रेस राजनीतिक विषय नहीं है और वह विश्व विजेता बनने की कामना करते हैं.

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1 जुलाई से लागू होंगे ये 5 नए नियम, करेंगे आपको प्रभावित

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आने वाले महीने यानी 1 जुलाई से ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन और होम लोन से जुड़े नए नियम लागू होने वाले हैं. इन नए नियमों या बदलाव के बाद देश के करोड़ों ग्राहकों की लाइफ बदल जाएगी. आइए जानते हैं ऐसे ही बड़े बदलाव के बारे में.

ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन में बदलाव अगर आप ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन करते हैं तो 1 जून से आपको बड़ी राहत मिलने वाली है. दरअसल, रिजर्व बैंक ने आम आदमी को राहत देते हुए RTGS और NEFT लेनदेन पर लगाए गए शुल्क को हटा दिया है.

इसका मतलब यह हुआ कि अब रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (RTGS) और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर (NEFT) के जरिए ट्रांजेक्‍शन करने वाले लोगों को किसी भी तरह का एक्‍स्‍ट्रा चार्ज नहीं देना होगा. इसके अलावा आरबीआई ने RTGS के जरिए पैसे भेजने का समय डेढ़ घंटे बढ़ाकर शाम 6 बजे तक कर दिया है.

होम लोन में बदलाव अगर आप स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया के ग्राहक हैं तो 1 जुलाई से होम लोन से जुड़े एक बदलाव के लिए तैयार रहें. दरअसल, SBI के ग्राहकों को 1 जुलाई से रेपो रेट से जुड़े होम लोन ऑफर किए जाएंगे. इसका मतलब यह हुआ कि एसबीआई की होम लोन की ब्याज दर पूरी तरह रेपो रेट पर आधारित हो जाएगी. यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जितनी बार रेपो रेट में बदलाव करेगा उतनी बार होम लोन के ब्‍याज दरों में भी बदलाव होगा. फिलहाल, एसबीआई अपने तरीके से ब्‍याज दरों में कटौती करता है.

आने वाले महीने यानी 1 जुलाई से ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन और होम लोन से जुड़े नए नियम लागू होने वाले हैं. इन नए नियमों या बदलाव के बाद देश के करोड़ों ग्राहकों की लाइफ बदल जाएगी. आइए जानते हैं ऐसे ही बड़े बदलाव के बारे में.

ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन में बदलाव अगर आप ऑनलाइन ट्रांजेक्‍शन करते हैं तो 1 जून से आपको बड़ी राहत मिलने वाली है. दरअसल, रिजर्व बैंक ने आम आदमी को राहत देते हुए RTGS और NEFT लेनदेन पर लगाए गए शुल्क को हटा दिया है.

इसका मतलब यह हुआ कि अब रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (RTGS) और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर (NEFT) के जरिए ट्रांजेक्‍शन करने वाले लोगों को किसी भी तरह का एक्‍स्‍ट्रा चार्ज नहीं देना होगा. इसके अलावा आरबीआई ने RTGS के जरिए पैसे भेजने का समय डेढ़ घंटे बढ़ाकर शाम 6 बजे तक कर दिया है.

होम लोन में बदलाव अगर आप स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया के ग्राहक हैं तो 1 जुलाई से होम लोन से जुड़े एक बदलाव के लिए तैयार रहें. दरअसल, SBI के ग्राहकों को 1 जुलाई से रेपो रेट से जुड़े होम लोन ऑफर किए जाएंगे. इसका मतलब यह हुआ कि एसबीआई की होम लोन की ब्याज दर पूरी तरह रेपो रेट पर आधारित हो जाएगी. यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जितनी बार रेपो रेट में बदलाव करेगा उतनी बार होम लोन के ब्‍याज दरों में भी बदलाव होगा. फिलहाल, एसबीआई अपने तरीके से ब्‍याज दरों में कटौती करता है.

कार खरीदना होगा महंगा अगर आप महिंद्रा या मारुति की कार खरीदने की सोच रहे हैं तो 1 जुलाई से भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. दरअसल, ऑटोमोबाइल कंपनी महिंद्रा ने अपने पैसेंजर व्‍हीकल्‍स की कीमत में 36,000 रुपये तक का इजाफा किया है. इसी तरह मारुति सुजुकी इंडिया ने अपनी लोकप्रिय कॉम्पैक्ट सेडान कार डिजायर की कीमत में 12,690 रुपये तक की वृद्धि की है.

स्‍मॉल सेविंग स्‍कीम्‍स की ब्‍याज दर पर कैंची! अगर आप पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF), सुकन्या योजना या फिर नेशनल सेविंग स्‍कीम (NSC) के तहत निवेश करते हैं तो आपको 1 जुलाई से बड़ा झटका लग सकता है. मीडिया रिपोर्ट की मानें तो मोदी सरकार स्मॉल सेविंग्स स्कीम पर ब्‍याज दर में कटौती करने की तैयारी में है. सरकार जल्‍द ही इसको लेकर नोटिफिकेशन जारी कर सकती है. यह कटौती जुलाई-सितंबर की अवधि के लिए 0.30 फीसदी तक की हो सकती है.

BSBD अकाउंट के नियम भी बदलेंगे 1 जुलाई से बेसिक सेविंग बैंक अकाउंट (BSBD अकाउंट) को लेकर कई नियम बदलने जा रहे हैं. इसका मतलब ऐसे खातों से है, जिसे शून्य राशि से खोला जा सकता है. ऐसे बैंक खाताधारकों का कैश डिपॉजिट फ्री में होगा. इसके अलावा, ऑनलाइन बैंकिंग की मदद से पैसा भेजने और मंगाने पर किसी तरह का चार्ज नहीं लगेगा. वहीं सरकारी स्कीम का पैसा चेक से निकालना चाहते हैं तो इसके लिए कोई चार्ज नहीं भरना होगा. यही नहीं, साथ ही सरकारी रकम की चेक से निकासी और जमा पर कोई चार्ज नहीं लगेगा.

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झारखंड में मॉब लिंचिंग के शिकार तबरेज अंसारी के परिजनों के नए बयान से मामला उलझा

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रांची। झारखंड में बाइक चोरी के शक में पीट-पीटकर मार डाले गए तबरेज अंसारी के एक रिश्तेदार का दावा है कि उसे जहरीला पानी दिया गया था. तबरेज के रिश्तेदार मोहम्मद मसरूर ने बताया, ‘तबरेज के साथ मारपीट के बाद उसे ‘धतूरा’ मिला हुआ पानी दिया गया था.’ साथ ही बताया कि इस मामले में चार्जशीट तुरंत फाइल होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए.’ इस मामले में मुख्य आरोपी सहित 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और दो पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया. कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय जनता दल और लेफ्ट पार्टियों ने सीबीआई की मांग करते हुए राजभवन पर धरना प्रदर्शन किया.

वहीं, झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग की तीन सदस्यीय टीम ने मंगलवार को तबरेज अंसारी के गांव का दौरा किया. आयोग के अध्यक्ष मोहम्मद कमाल खान ने कहा, ‘हमने मृतक के गांव, कदमडीह का दौरा किया, साथ ही घटनास्थल का भी दौरा किया और मृतक के परिवार के सदस्यों से जानकारी एकत्र किया है.’ उन्होंने कहा कि पुलिस और जिला प्रशासन ने अपराधियों को पकड़ने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए सभी जरूरी उपाय किए हैं.

तबरेज की हत्या किये जाने के विरोध में सैकड़ों लोग यहां जंतर-मंतर पर जुटे और उन्होंने पिछले सप्ताह हुई इस घटना के मामले में प्रदेश के मुख्यमंत्री रघुबर दास से इस्तीफे की मांग की. प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व करते हुए, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद ने कहा कि यह ‘‘शर्मनाक” है कि विपक्ष को इस जघन्य घटना के बारे में बोलने के लिए एक सप्ताह का समय लग गया. उमर ने भीड़ द्वारा पीट पीट कर हत्या किये जाने की घटना पर अंकुश लगाने के लिए ‘‘निर्भया जैसे आंदोलन” का आह्वान भी किया.

उमर ने कहा, ‘‘लोगों को सड़कों पर उतरने की आवश्यकता है क्योंकि दोषियों को राजनीतिक संरक्षण दिया जा रहा है.’ पूर्व छात्र नेता ने कहा, ‘हमारा गुस्सा विपक्ष पर भी है. आज वे कहां हैं।’ प्रदर्शनकारी अपने हाथ में तख्तियां लिये हुए थे। उन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और दास का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा मांगा. इस प्रदर्शन में भाकपा नेता कन्हैया कुमार ने भी हिस्सा लिया.

बता दें, झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले में भीड़ ने तबरेज अंसारी को चोरी के संदेह में कथित रूप से पीट पीट कर मार डाला था. तबरेज अंसारी की 17 जून को पिटाई की गई और 22 जून को उसने दम तोड़ दिया.

मॉब लिंचिंग पर मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है कड़ा कानून

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गाय के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए मध्य प्रदेश सरकार कड़ा कानून बनाने जा रही है. इस कानून के तहत खुद को गोरक्षक बताकर हिंसा करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. सरकार ये संशोधित विधेयक विधान सभा के मानसून सत्र में पेश कर पारित कराना चाहती है. अगर विधेयक पारित होता है तो मध्य प्रदेश में इस तरह के मामलों के लिए अलग से कानून बन जाएगा.

अभी क्या है कानून

मध्य प्रदेश में अभी जो कानून लागू है, उसके तहत गोवंश की हत्या, गोमांस रखने और उसके परिवहन पर पूरी तरह रोक है. इसमें गोवंश के नाम पर हिंसा या मॉब लिंचिंग का जिक्र नहीं है.

संशोधित कानून कैसा होगा

संशोधन के बाद अब कोई व्यक्ति गोवंश का वध, गोमांस और गोवंश का परिवहन, मांस रखना या सहयोग करना या इसके अंतर्गत कोई हिंसा या क्षति नहीं करने पर पांच साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान होगा.

हिंदुस्तान बना ‘लिंचिस्तान’!

देश में कभी चोरी तो कभी गाय के नाम पर हिंसा के मामले में आए दिन मामले सामने आते रहते हैं. अभी हाल ही में झारखंड के सरायकेला खरसावां में चोरी के शक में गुस्साई भीड़ ने एक युवक को इतना पीटा की उसकी मौत हो गई. युवक की पहचान तबरेज अंसार के रूप में हुई. तबरेज की उम्र 22 साल थी और उसने इलाज के दौरान दम तोड़ा था.

झारखंड देश का इकलौता राज्य नहीं है जहां मॉब लिंचिंग की घटना हुई हो. पिछले कुछ सालों में हिंदुस्तान में कई लिंचिस्तान बन गए हैं. इनमें प्रमुख हैं – उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, गुजरात और राजस्थान. मॉब लिंचिंग में देश में जितने लोग मारे गए उनमें से 7 फीसदी महिलाएं भी हैं.

गोरक्षा के नाम पर सबसे ज्यादा मॉब लिंचिंग

देश में 2009 से 2019 तक हेट क्राइम के 287 बड़े मामले हुए हैं. इनमें 98 लोगों की मौत हुई है, जबकि 722 लोग जख्मी हुए हैं. इनमें सबसे ज्यादा 59% मुस्लिम, 14% हिंदू और 15% ईसाई हैं. सबसे ज्यादा 28% हमले गोरक्षा के नाम पर, 13% हमले दो धर्म के लोगों में प्रेम प्रसंग पर, 9% धार्मिक हिंसा और 29% हमले अन्य कारणों से हुए. गोरक्षा के नाम पर ही सबसे ज्यादा मॉब लिंचिंग मामले सामने आए हैं. 2014 से अब तक पूरे देश में 125 मामले सामने आए हैं. इन मामलों में 48 लोगों की मौत हुई. जबकि 252 लोग घायल हुए हैं. (स्रोत- सभी आंकड़े फैक्टचेकर डॉट इन और इंडियास्पेंड से.)

आखिर होती क्यों है मॉब लिंचिंग?

लोगों के चोरी, गोरक्षा, मान-सम्मान और धर्म के नाम पर भड़काया जाता है. आजकल इसका सबसे बड़ा माध्यम है सोशल मीडिया. भड़की हुई भीड़ बहुत जल्द गुस्सा हो जाती है. यही गुस्साई भीड़ हत्यारी बन जाती है. ऐसी भीड़ यह नहीं देखती कि पीड़ित किस काम से आया है. ये भीड़ तर्कहीन होती है. विवेकहीन होती है. इसीलिए असम में मछली पकड़ने गए दो युवकों को मार दिया जाता है. झारखंड में मॉब लिंचिंग की हर साल खबर आती है. दादरी कांड जहां अचानक भीड़ ने अखलाक के खुशहाल परिवार को शक के बिना पर मार डाला.

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जेल से बाहर आने की कोशिश में लगे राम रहीम का बड़ा राज आया सामने

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चंडीगढ़/सिरसा़। सुनारिया जेल में दुष्‍कर्म की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत के पैरोल में बड़ा पेंच फंस गया है. किसी तरह से जेल से बाहर आने की कोशिश में लगे गुरमीत के बारे में बड़ा खुलासा हुआ है. उसने खेती के नाम पर 42 दिनों का पैरोल मांगा है, लेकिन जांच मेंं सामने आया है कि उसके नाम पर न तो कोई खेत है और न ही वह काश्‍तकार है. इस बीच राम रहीम की पैरोल पर सीएम मनोहर लाल ने कहा कि कुछ कानूनी प्रक्रियाएं हैं. पैरोल लेने का अधिकार रखने वाला व्यक्ति इसकी तलाश कर सकता है. हम ऐसा करनेे से किसी को रोक नहींं सकते. हालांकि अभी तक राम रहीम की पैरोल पर कोई फैसला नहीं हुआ है. उधर, छत्रपति साहू के बेटे अंशुल ने कहा कि अगर राम रहीम को पैरोल दी जाती है तो वह इसके खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे.

दूसरी ओर, हरियाणा सरकार ने गुरमीत के प्रति पॉजिटिव रुख दिखाया है. ऐसे में दो साध्वियों से दुष्‍कर्म के मामले में सुनारिया जेल में सजा काट रहे डेरा सच्‍चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के पैराेल पर जेल से बाहर आने को लेकर सस्‍पेंस गहरा गया है. पूरे मामले में विपक्ष भी कुछ नहीं बोल रहा है. पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि यह तो सरकार की मर्जी है और उसे फैसला लेना है.

हरियाणा के जेल मंत्री कृष्‍णलाल पंवार ने कहा कि इस बारे में निर्णय प्रशासन लेगा, लेकिन गुरमीत पैराेल का हकदार है. जेल में उसका आचरण अच्‍छा रहा है. इसके साथ ही स्‍वास्‍थ्‍य व खेल मंत्री अनिल विज ने भी गुरमीत राम रहीम को पैराेल दिए जाने का समर्थन किया है. हरियाणा के गृह सचिव ने कहा है कि गुरमीत राम रहीम की अर्जी पर अभी विचार किया जा रहा है.

सिरसा के तहसीलदार ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि सिरसा में गुरमीत राम रहीम के नाम न तो कोई खेती योग्‍य जमीन है और न ही वह काश्‍तकार (ठेके पर खेती करने वाला) है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सिरसा में जो चल-अचल संपत्ति है, वह डेरा सच्चा सौदा के नाम दर्ज है. ऐसे में पैरोल के लिए खेती करने के मामले में पेंच फंस गया है. डेरा प्रमुख के नाम जमीन संबंधी जानकारी पुलिस ने सिरसा के तहसीलदार से मांगी थी. तहसीलदार ने अपनी रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी है. उधर, डीसी ने सिरसा एसडीएम से भी पैरोल के संबंध में रिपोर्ट मांगी है.

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