नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी से निकाले जाने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी बसपा प्रमुख का कच्चा चिट्ठा खोलने की बात कह रहे हैं, लेकिन उस हकीकत को नहीं बता रहे हैं जिसकी वजह से उन्हें निकाला गया. असल में नसीमुद्दीन सिद्दीकी को निकाले जाने की वजह उनकी अपनी करतूत थी. वह पार्टी में रहकर, पार्टी से ही छल कर रहे थे. वह बसपा प्रमुख मायावती को लगातार धोखा दे रहे थे और उनका कच्चा चिट्ठा खुल जाने के बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया.
हालांकि यह भी सच है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी को अपना पक्ष रखने के लिए बसपा प्रमुख मायावती ने खुद बुलाया था, लेकिन कल तक बहनजी के एक बुलावे पर भाग कर उनके आवास पर पहुंचने वाले सिद्दीकी इस बार नहीं पहुंचे. क्योंकि सिद्दीकी को पता लग गया था कि बहनजी उनकी करतूतों को जान गई हैं और उनके पास खुद को सही साबित करने का कोई रास्ता नहीं था.
नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बसपा से बाहर करने की जो सच्चाई पार्टी के अंदर से आ रही है, वह कुछ और कहानी बयां कर रही है. बसपा के विश्वस्त सूत्रों से जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक सिद्दीकी ने चुनाव से पहले पार्टी फंड के नाम पर पश्चीमी उत्तर प्रदेश में कई धनाढ्य लोगों से पैसे लिए थे. सिद्दीकी ने उनको आश्वासन दिया था कि जब बसपा की सरकार आएगी तो वह उनका ‘काम’ करवाएंगे. बसपा जब विधानसभा चुनाव में हार गई तो वो लोग सिद्दीकी से पैसे मांगने लगे. चूंकि वो ताकतवर लोग थे इसलिए सिद्दीकी उनकी आवाज और मांग को दबा नहीं सकें.
बात आगे बढ़ी तो मामला बहनजी तक जा पहुंचा. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इन कद्दावर लोगों ने बहनजी से मिलकर इस बाबत शिकायत की. उन्होंने नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बारे में चुनाव के दौरान की कई अन्य बातें भी बताई जो पार्टी के खिलाफ गई थी. बातचीत में सिद्दीकी का कच्चा चिट्ठा खुलने लगा. बहनजी को सिद्दीकी की सच्चाई जानकर झटका लगा, क्योंकि सिद्दीकी ने बहनजी का नाम लेकर तमाम वादें और आश्वास लोगों से किए थे, जिनकी जानकारी खुद पार्टी प्रमुख मायावती को नहीं थी. सिद्दीकी ने जिन लोगों से पार्टी फंड के नाम पर पैसे लिए थे, वो उसे भी खुद ही डकार गए और पार्टी को इसकी भनक तक नहीं लगी.
सारी सच्चाई जानने के बाद जिन मायावती ने चुनाव में हार के बाद कार्यकर्ताओं द्वारा सिद्दीकी को हटाए जाने की मांग की अनदेखी कर दी थी, वो सकते में थीं. हालांकि सिद्दीकी के पार्टी को दिए गए तीन दशक को देखते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष ने उन्हें अपनी सफाई का मौका देने के लिए बुलाया. उन्होंने सिद्दीकी को आरोप लगाने वाले लोगों के सामने आकर अपनी सफाई देने की खबर भिजवाई लेकिन सिद्दीकी इस बुलावे के बावजूद पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के घर अपना पक्ष रखने नहीं पहुंचे. इससे साफ हो गया था कि लोगों का आरोप सच है और नसीमुद्दीन लगातार पार्टी को और बसपा प्रमुख को कई मामलों में गुमराह करते रहे. लिजाहा उन्हें उनके बेटे के साथ पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया. नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बसपा से बर्खास्त करने की हकीकत
नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी से निकाले जाने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी बसपा प्रमुख का कच्चा चिट्ठा खोलने की बात कह रहे हैं, लेकिन उस हकीकत को नहीं बता रहे हैं जिसकी वजह से उन्हें निकाला गया. असल में नसीमुद्दीन सिद्दीकी को निकाले जाने की वजह उनकी अपनी करतूत थी. वह पार्टी में रहकर, पार्टी से ही छल कर रहे थे. वह बसपा प्रमुख मायावती को लगातार धोखा दे रहे थे और उनका कच्चा चिट्ठा खुल जाने के बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया.
हालांकि यह भी सच है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी को अपना पक्ष रखने के लिए बसपा प्रमुख मायावती ने खुद बुलाया था, लेकिन कल तक बहनजी के एक बुलावे पर भाग कर उनके आवास पर पहुंचने वाले सिद्दीकी इस बार नहीं पहुंचे. क्योंकि सिद्दीकी को पता लग गया था कि बहनजी उनकी करतूतों को जान गई हैं और उनके पास खुद को सही साबित करने का कोई रास्ता नहीं था.
नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बसपा से बाहर करने की जो सच्चाई पार्टी के अंदर से आ रही है, वह कुछ और कहानी बयां कर रही है. बसपा के विश्वस्त सूत्रों से जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक सिद्दीकी ने चुनाव से पहले पार्टी फंड के नाम पर पश्चीमी उत्तर प्रदेश में कई धनाढ्य लोगों से पैसे लिए थे. सिद्दीकी ने उनको आश्वासन दिया था कि जब बसपा की सरकार आएगी तो वह उनका ‘काम’ करवाएंगे. बसपा जब विधानसभा चुनाव में हार गई तो वो लोग सिद्दीकी से पैसे मांगने लगे. चूंकि वो ताकतवर लोग थे इसलिए सिद्दीकी उनकी आवाज और मांग को दबा नहीं सकें.
बात आगे बढ़ी तो मामला बहनजी तक जा पहुंचा. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इन कद्दावर लोगों ने बहनजी से मिलकर इस बाबत शिकायत की. उन्होंने नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बारे में चुनाव के दौरान की कई अन्य बातें भी बताई जो पार्टी के खिलाफ गई थी. बातचीत में सिद्दीकी का कच्चा चिट्ठा खुलने लगा. बहनजी को सिद्दीकी की सच्चाई जानकर झटका लगा, क्योंकि सिद्दीकी ने बहनजी का नाम लेकर तमाम वादें और आश्वास लोगों से किए थे, जिनकी जानकारी खुद पार्टी प्रमुख मायावती को नहीं थी. सिद्दीकी ने जिन लोगों से पार्टी फंड के नाम पर पैसे लिए थे, वो उसे भी खुद ही डकार गए और पार्टी को इसकी भनक तक नहीं लगी.
सारी सच्चाई जानने के बाद जिन मायावती ने चुनाव में हार के बाद कार्यकर्ताओं द्वारा सिद्दीकी को हटाए जाने की मांग की अनदेखी कर दी थी, वो सकते में थीं. हालांकि सिद्दीकी के पार्टी को दिए गए तीन दशक को देखते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष ने उन्हें अपनी सफाई का मौका देने के लिए बुलाया. उन्होंने सिद्दीकी को आरोप लगाने वाले लोगों के सामने आकर अपनी सफाई देने की खबर भिजवाई लेकिन सिद्दीकी इस बुलावे के बावजूद पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के घर अपना पक्ष रखने नहीं पहुंचे. इससे साफ हो गया था कि लोगों का आरोप सच है और नसीमुद्दीन लगातार पार्टी को और बसपा प्रमुख को कई मामलों में गुमराह करते रहे. लिजाहा उन्हें उनके बेटे के साथ पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया. सहारनपुर का सच (पार्ट-2) ‘मुझे सबसे ज्यादा मारा, क्योंकि मैं बाबासाहेब की मूर्ति बना रहा था’
सहारनपुर के शब्बीरपुर के रहने वाले और हमले में घायल अग्नि भास्कर को इस हमले के बाद समझ में आया कि जातिवादी सवर्ण बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर से कितनी घृणा करते हैं. दलितों के साथ छूआछूत तो आम था लेकिन एक ही साथ रहने वाले लोग सिर्फ जाति के आधार पर दलितों से कितनी नफरत करते हैं, वो उन्हें 5 मई को समझ आया.
भास्कर बताते हैं कि वो अपने परिवार के साथ खेत से तुरंत लौटकर आए थे. तभी अचानक शोर हुआ. भास्कर कुछ समझ पाते इससे पहले ही उनके पूरे परिवार पर हमला हो गया. गांव के ही ठाकुर सरिया और तलवार से भास्कर को उनके पूरे परिवार को पीटने लगे. भास्कर को सबसे ज़्यादा इसीलिए मारा गया क्योंकि वो बाबा साहेब की मूर्ति बना रहे थे.
बाबासाहेब की मूर्ति देखते ही ठाकुर भड़क गए और भास्कर पर एक साथ कई लोग टूट पड़े. अम्बेडकर से जलने की उनकी वजह यह भी है कि बाबासाहेब ही वो शख्स हैं जिन्होंने देश के बहुजनों, दलितों-पिछड़ों को संबल देने का कानून बनाया था. हमलावर यह भी कहते रहे कि अम्बेडकर की वजह से ही दलितों का मन बढ़ गया है. एक विवाह ऐसा भी
मैंने कल लखनऊ में एक भव्य शादी समारोह में शिरकत किया. समारोह स्थल पर सबसे पहले दरबानो ने स्वागत किया जैसे ही पंडाल में पहुंचे तो देखा कि दूल्हा स्टेज में लगे सोफे पर बैठे है, और बगल के स्टेज में संगीतमय प्रस्तुति हो रही है. चूंकि हम देरी से पहुंचे थे इसलिए हम तुरंत खाने की तरफ मुड गये. खाने के पंडाल में दो बड़ी स्क्रीन लगी थी उनमे वो सब दिख रहा था जो शादी के मंडप मे चल रहा था. हम लोग खाना खा ही रहे थे कि स्क्रीन में ये घोषणा हुयी कि अब दूल्हन धीरे-धीरे क़दमों से दूल्हे के पास आ रही है और एक-दूसरे को माला डालकर एक-दूजे के हो जायेंगे. तभी अचानक मित्र रामपाल और सुमन की शादी फ्लैशबैक में चलने लगी. सच में दोनों कितने अच्छे लग रहे थे. भंतेजी ने जब दोनों से कहा कि अब आप दोनों एक दुसरे के हो गये हो तो वहां मौजूद सभी बाराती-घराती ने जमकर फूलों वाली वर्षा की थी. शादी में घटित एक-एक पल याद आने लगा.
मित्र रामपाल वर्मा से मुलाकात 2013 में अर्जक संघ के एक प्रोग्राम में हुयी थी. रामपाल वर्मा उम्र में मुझसे छोटे थे, लेकिन समझदारी अच्छी थी. रामपाल ने महामना रामस्वरूप वर्मा जी के विचारो को पढ़ा, जिया और उसे अंगीकार किया. रामपाल ने ब्राह्मणवाद की बारीकियां समझी और मानववाद के विकल्प पर टिकने लगे थे. पिछले साल हम दोनों ने श्रावस्ती के जेतवन आश्रम में विपस्सना की थी. दस दिनों के शिविर से हमने काफी कुछ सीखा. रामपाल ने वहीँ दृढ निश्चय किया कि शादी ब्राह्मणी रीति-रिवाज से नहीं वरन अर्जक विधि से होगी. हालांकि अर्जक विधि से शादी कराने वाले चौधरीजी शादी में नहीं आ पा रहे थे, इसलिए शादी को बुद्धिस्ट तरीके से करने का निश्चय किया.
रामपाल ने शादी के दिन सायं 5 बजे ही भंतेजी को सुमन के घर भेज दिया था. भंते जी जैसे ही सुमन के घर पहुंचे वहां उनका सामना पहले से मौजूद शादी कराने के लिये आये दो ब्राह्मण से हुयी. भंतेजी का कोई स्वागत सत्कार नहीं हुआ. ये बात उन्होंने रामपाल को फोन से बता दिया. रामपाल बारात लेकर 9 बजे मदारगढ़ पहुचे. रामपाल रास्ते भर वधु पक्ष को मनाने का प्रयास किया कि शादी बुद्धिस्ट तरीके से ही होगी. वधु पक्ष मानने को तैयार नहीं था. काफी कोशिशो के बाद वधु पक्ष का एक व्यक्ति जनवासे में आया और कहा कि क्या बीच का रास्ता निकल सकता है यानि पहले पंडित द्वारा शादी संपन्न हो जाये फिर आप अपने पंडितजी (भंतेजी) द्वारा करवा ले.
रामपाल ने कहा कि भंतेजी आपके यहाँ सायं 5 बजे से बैठे हुये है अब शादी बुद्धिस्ट तरीके से ही होगी लेकिन सुमन के घर वाले तैयार नही हुये. रामपाल जब बारातियों के संग सुमन के घर पहुंचे तो देखा कि एक ब्राह्मण सुमन के दादाजी से द्वारचार से पूर्व के संस्कारो को संपन्न करा रहे थे. रामपाल कार से उतरे नहीं. शादी के मंडप में काफी तनाव उत्पन्न हो गया, लड़की पक्ष वाले इस बात की दुहाई दे रहे थे कि हमारे खानदान में बिना ब्राह्मण के शादी हुयी ही नहीं, इस बार यदि बिना ब्राह्मण के शादी हुयी तो भारी अपशकुन हो जायेगा.
घर की स्त्रियाँ भी नाराज हो गयी लेकिन उनके मन में कौतूहल भी था कि दोआबा में ऐसी शादी पहले तो कभी नहीं हुयी. मंडप के बाहर गाँव के प्रधान भी मौजूद थे उन्होंने भी ब्राह्मण के बिना विवाह को अनर्थ माना. जब लगा कि बात बिगड़ सकती है तो मैंने प्रधान जी और अन्य ग्रामीणों को समझाया. उनसे आग्रह किया कि शादी कम खर्चे में होगी और वर और वधु दोनों को बराबर सम्मान मिलेगा. गाँव के लोगो से काफी समय तक तर्क होता रहा. काफी कश्मकश के बाद ब्राह्मण ने अपनी जगह छोड़ दी और भंतेजी से आने का आग्रह किया. मंडप में भंतेजी के बैठ जाने के बाद रामपाल मंडप में गये और शादी के संस्कार सपन्न होना शुरू हुये. भंतेजी को लड़की पक्ष से कोई सहयोग नहीं मिल रहा था लेकिन वे मंडप में डटे रहे.
द्वारचार पूरा होने के बाद जब दुबारा बचे हुये विवाह के संस्कार के लिये भंतेजी मंडप में बैठे तो लड़की के पिता कही चले गये और लौटे ही नहीं. लेकिन कुसुम अब पूरी तरह से तैयार थी. मंडप में मौजूद नाई अजीब बर्ताव कर रहा था. चूंकि मंडप में ब्राह्मण अब मौजूद नहीं था इसलिए नाई का कोई विशेष काम नहीं रह गया था. नाई और ब्राह्मण के बीच अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है. ब्राह्मण जो विवाह में पैसा या अन्य वस्तुओं का चढ़ावा लेता है उसमे से कुछ हिस्सा नाई को भी मिलता है. भंतेजी ने नाई के मन को पढ़ा और कहा कि आपको वाजिब पैसा और चढ़ावा मिल जायेगा. भंतेजी ने विवाह के बचे हुये संस्कार पूरे करना शुरू किया. विवाह समारोह में उदासी का माहौल हो गया था. मैंने भंतेजी से आग्रह किया कि जो मन्त्र आप पालि भाषा में पढ़ रहे है उसका भावार्थ हिंदी में भी बता दीजिये ताकि सभी को समझ में आ सके.
भंतेजी ने वैसा ही किया. भंतेजी जब हिंदी में विवाह संस्कार संपन्न करने लगे तो वहां मौजूद लोगों में हलचल होना शुरू हुयी. वर और बधू पक्ष को एक समान स्तर पर बिठाया गया और समतामूलक प्रतिज्ञा करवाई गयी. सबसे बड़े आदर्श वर और वधु के माता-पिता को बताया और भगवान बुद्ध, संघ और और धम्म के प्रति समर्पित होने को कहा. मंडप में मौजूद लोगों में उत्साह का संचार हुआ और ये सुनने को मिलने लगा कि ऐसा विवाह तो बहुत अच्छा है इसमें वधु को भी बराबरी का सम्मान मिलता है. अंत में जब भंते जी ने दोनों को एक दुसरे के गले माला डालने को कहा तो मौजूद लोगो ने दिल खोलकर फूलों की वर्षा की. पूरा मंडप फूलों की खुशबू से सराबोर हो गया. सभी लोग आह्लादित थे और विवाह की इस कम खर्चीली, सरल सुगम विधि की भूरि-भूरि प्रसंशा की.
रामपाल और कुसुम के दृढ-निश्चय के चलते ये समतामूलक शादी संपन्न हुयी जिसमे ब्राह्मणी संस्कारों और रीति रिवाजो की कोई जगह नहीं है. भंतेजी ने ‘प्रतिज्ञा-पत्र’ में वर और वधु दोनों के दो-दो हस्ताक्षरयुक्त फोटो लिये और उनके हस्ताक्षर भी करवाये. प्रतिज्ञा पत्र दोनों के विवाह का वैध प्रमाण-पत्र है और उनका विवाह सरकारी विभाग में दर्ज भी हो जायेगा. मैं फ्लैशबैक में ही खोया था कि इसी बीच मेरे मित्र तरुण ने टोंका कि क्या सोच रहे हो. मैंने कहा कुछ नहीं. हालांकि मैं ये सोच रहा था कि यदि यहाँ भी ये वर-वधु दोनों बुद्धिस्ट तरीके से शादी के लिये दृढ-निश्चयी होते तो शादी बहुत कम पैसो और समतामूलक तरीके से संपन्न होती. डॉ. अम्बेडकर की राइटिंग पर सरकार का पहरा
नई दिल्ली। Sorry for the inconvenience. भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर बाबासाहेब की राइटिंग और स्पीच पढ़ने की कोशिश के दौरान ये शब्द आपको 19 बार लगातार पढ़ने को मिलेगा. और हर एक क्लिक के साथ ये खेद बाबासाहेब की राइटिंग औऱ स्पीच को पढ़ने के लिए मंत्रालय की वेबसाइट पर जाने वालों के लिए खीज पैदा कर सकता है. ऐसा कब से हो रहा है ये तो नहीं पता, लेकिन हाल ही में नागपुर के यश वासनिक (दलित दस्तक के पाठक) के जरिए यह मामला सामने आया है.
सरकार द्वारा डॉ. अम्बेडकर के विचारों पर पहरा लगाने की इस कवायद से डॉ. अम्बेडकर को पढ़ने में रुचि रखने वाले शोधार्थियों एवं अन्य लोगों को तमाम मुश्किलों का सामना करना पर रहा है. इससे सरकार की मंशा पर भी सवाल उठने लगे हैं. माना जा रहा है कि बाबासाहेब के मानवतावादी विचार हिन्दुत्व के पोषकों के खिलाफ जाता है, इसलिए सरकार नहीं चाहती है कि बाबासाहेब के विचार लोगों तक पहुंचे. बाबासाहेब की राइटिंग और स्पीच को सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी खूब पढ़ा जाता है.
बदलते वक्त में वो डॉ. अम्बेडकर ही हैं, जिन्हें आज सबसे ज्यादा खोजा और पढ़ा जा रहा है. लेकिन संघ समर्थित भारतीय जनता पार्टी की सरकार में यह सच्चाई सामने आने के बाद यह साफ माना जा रहा है कि ऐसा जानबूझ कर किया गया है, क्योंकि इस लिंक के अलावा वेबसाइट पर मौजूद तमाम लिंक आसानी से खुल रहे हैं. इसे नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का भारत रत्न डॉ. अम्बेडकर को लेकर दोहरा चरित्र भी उजागर हुआ है. क्योंकि बीते अप्रैल माह में इसी सरकार ने अम्बेडकर जयंती को धूमधाम से मनाने का खूब ढोंग रचा. जहां-जहां भाजपा की सरकार थी; वहां अम्बेडकर जयंती को लेकर खूब प्रपंच रचा गया. बाबासाहेब को हिन्दुवादी प्रतीकों से जोड़ने की भी खूब कोशिश की गई. इससे अम्बेडकरवादी संगठनों में केंद्र और भाजपा शासित राज्य सरकारों को लेकर काफी नाराजगी भी रही.
भाजपा सरकार पर इसलिए भी सवाल उठ रहा है क्योंकि वह बाबासाहेब को खुद से जोड़ने की कोशिश तो कर रही है लेकिन उनके विचारों पर प्रतिबंध लगा रही है. यही नहीं कई जगहों पर बाबासाहेब के विचारों को हिन्दुत्ववादी साफे में लपेट कर परोसने की कोशिश हो रही है और उन्हें जबरन हिन्दुत्व से जोड़ा जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि बाबासाहेब ने सालों पहले हिन्दू धर्म में मौजूद जाति व्यवस्था के खिलाफ मानवतावादी बौद्ध धम्म की शरण ले ली थी. बाबासाहेब चाहते थे कि उनके विचारों का ज्यादा से ज्यादा प्रचार हो, लेकिन यह सरकार अपना राजनैतिक हित साधने के लिए सिर्फ बाबासाहेब का नाम तो ले रही है लेकिन उनके विचारों पर पहरा लगा रही है. सामंतवाद के गढ़ में लड़ता एक निडर भीमसैनिक
दक्षिणी पश्चिमी राजस्थान के जालोर जिला मुख्यालय से महज 18 किलोमीटर दूर स्थित गाँव मांडवला के 46 वर्षीय भगवाना राम वैसे तो कमठा मजदूर है .परिवार की आर्थिक स्थिति ख़राब होने की वजह से उन्हें 1984 में आठवीं कक्षा उतीर्ण करने के बाद पढाई छोड़ कर काम करने जाना पड़ा. तब से अब तक वे मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं आजकल उन्होंने राजमिस्त्री के काम में ही छोटे मोटे ठेके लेना शुरू कर दिए है, जिससे उन्हें परिवार चलने लायक आमदनी हो जाती है. कहने का मतलब सिर्फ यह है कि भगवाना राम अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं मगर बाबा साहब के मिशन को समझ कर काम असाधारण करते हैं. सबसे खास बात यह है कि आजकल वे सामंतवाद को सीधे सीधे चुनौती दे रहे हैं.
भगवाना राम वर्ष 2005 में बसपा नेता धर्मवीर अशोक के संपर्क में आये तो बाबा साहेब के मिशन के बारे में जानने का मौका मिला, फिर उन्होंने बामसेफ के कुछ कैडर लिये. इससे उन्हें समझ में आया कि दलित समुदाय का भला डॉ. अम्बेडकर को अपनाने से ही होगा. जल्द ही उनमें बाबा साहब के विचारों को ज्यादा से ज्यादा जानने का जुनून पैदा हो गया. भगवाना राम ने बाबा साहब के सारे वोल्यूम ख़रीदे तथा उनको पढ़ कर ही माने. इतना ही नहीं बल्कि उन्हें जहाँ से भी बाबा साहब से सम्बंधित साहित्य मिला, उसे लिया और पढ़ डाला. वे बड़े ही गर्व से बताते हैं कि अब उनके पास गाँव में बाबा साहब की विचारधारा के साहित्य की एक छोटी सी लाईब्रेरी हो गई है.
वर्ष 2011 में उनकी बेटी विद्या कुमारी को 12 वीं पास करने के बाद जब गवर्नमेंट कॉलेज में एडमिशन नहीं मिल पाया तो उन्होंने उसे कम्प्युटर साईंस पढ़ने एक निजी कॉलेज में प्रवेश दिला दिया. बेटी के लिए घर पर एक कम्प्यूटर भी ले आये और इंटरनेट के लिए डाटा कार्ड भी ले आये. इस तरह इस अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि के दलित परिवार तक इंटरनेट की पंहुच हो गई. भगवाना राम सुबह शाम अपनी बेटी के साथ बैठ कर कम्प्यूटर सीखने लगे, नेट चलाने लगे. यहीं उनकी मुलाकात सोशल मीडिया के उस आभासी संसार से हुई, जहां असीम संभावनाएं व्याप्त थी. उन्हें लगा कि वे बाबा साहब के मिशन की बातें इसके जरिये फैला सकते हैं. उन्होंने ऑरकुट पर अपना खाता खोला, मगर ज्यादा लोग उधर नहीं मिल पाए. फिर वे फेसबुक पर आये, यहाँ उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली. हौंसला बढा. इतने में बेटी ग्रेजुएट हो गई. बेटी ने मांडवला गांव में ही ई-मित्र का सेंटर ले लिया.
अब तो भगवाना राम के लिए नेट पर काम करना और भी सरल हो गया. वे और अधिक सक्रिय हो गए और फिर आया व्हाट्सअप. उसमें भी ग्रुप बनाने की सुविधा. भगवाना राम तथा उनके जैसे लाखों दलित बहुजन युवाओं के लिए यह एक स्वर्णिम अवसर बन गया. वे लग गए बाबा के मिशन को आगे बढ़ाने में. बाबा साहेब की यह साईबर आर्मी आज भी देश भऱ में लगी हुयी है. ये लोग सोशल मीडिया पर मनुवादी तत्वों की तरह चुटकुले बाज़ी में अपना वक़्त जाया नहीं करते बल्कि विचारधारा की बातों को फ़ैलाने में अपना डाटा खर्चते है. इस तरह भारत में एक मौन मगर अत्यंत प्रभावी इन्टरनेट अम्बेडकरी क्रांति आकार ले रही है. भगवाना राम भी इस क्रांति का एक हिस्सा है, वे दिन भर कमठे पर कड़ी मेहनत करते हैं और शाम के वक़्त लग जाते है बुद्ध, फुले, कबीर, अम्बेडकर तथा कांशीराम के विचारों का प्रचार प्रसार करने में.
महज 8 वीं पास यह निर्माण श्रमिक आज एक ब्लोगर भी है और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट भी. लेकिन सिर्फ इन्टरनेट वीर नहीं कि एक पोस्ट डाल कर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्ति पा ली, बल्कि संघर्ष के मोर्चे पर भी खड़े रहने की कला उन्होंने अपने में विकसित की है. सोशल मीडिया से लेकर सडकों तक होने वाले संघर्ष में आगेवान की भूमिका निभाने का प्रयास भगवाना राम कर रहे हैं. उन्होंने कुछ सुधार अपने गाँव, अपने समुदाय तथा अपने घर से करने की शुरुआत की है.
हाल ही में 25 नवम्बर 2016 को उनकी बेटी विद्या की शादी के दौरान उन्होंने इस इलाके में व्याप्त सामंतवाद और पितृसत्ता को चुनौती देने का साहस किया है. उनके गाँव में दलित दुल्हे की बिन्दोली तो पहले भी निकली, मगर दलित दुल्हन की घोड़ी पर बैठ कर बिन्दोली निकालने का काम पहली बार भगवाना राम ने किया. उन्होंने शान से अपनी बिटिया को घोड़ी पर बिठाया और पूरे गाँव में बारात निकाल दी.
रात में यह किया और सुबह सोशल मीडिया पर सारे फोटो अपलोड कर दिये. आस पास के गांवों में रहने वाले सामंती तत्वों को भगवाना राम की यह हरकत बेहद नागवार गुजरी, उन्हें लगा कि यह तो उनकी सामंती सत्ता को सीधी चुनौती है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए.
सामंतशाही के गढ़ इस इलाके के समाजकंटकों ने भगवाना राम को ऑनलाइन धमकाना शुरू किया. जातिसूचक गालियां दी. मारपीट की धमकी दी. मगर जब उन्हें लगा कि यह आदमी तो डर ही नहीं रहा है, तब उन्होंने फोन करके भगवाना राम के परिवार की महिलाओं का अपहरण करने और उनको जान से ख़त्म तक कर देने की धमकियाँ दे डाली.
जो लोग यह कहते है कि इस देश से जातिवाद ख़त्म हो गया है, उनको भगवाना राम के इलाके में जा कर देखना चाहिये कि वहां आज भी पाषाणकालीन युग की मानसिकता वाले लोग बैठे हैं, जिनको दलितों के सोशल मीडिया में फोटो तक सहन नहीं हो पाते है और वो समाजविरोधी तत्व मरने मारने पर तक उतारू हो जाते हैं.
खैर, बाबा साहेब की शिक्षा नामक शेरनी का दूध पीकर निर्भीक हो चुके भीमसैनिक भगवाना राम इन गीदड़ भभकियों से डरे नहीं, वे पुलिस थाना जालोर पंहुचे और धमकी दे रहे सामंती तत्वों के विरुद्ध मुक़दमा क्रमांक 353/2016, धारा 506 भादस. धारा 67 आईटी एक्ट तथा धारा 3 (1) (यू ) (डब्ल्यू) 3(1) प, ब (2) के तहत दर्ज करवा दिया. साथ ही अपने साथ हुयी घटना से भी सोशल मीडिया के जरिये सभी को सूचना दे दी. एक ही दिन में मामला पूरे राजस्थान में फैल गया, जगह जगह से भगवाना राम के पक्ष में आवाज़े बुलंद होने लगी. कई जगहों पर ज्ञापन भी दिये गए और पुख्ता कार्यवाही की मांग की गयी.
प्रशासन पर दबाव बना, पुलिस ने भी अपेक्षा से अधिक इस मामले में पूरी सक्रियता बरती. ढंग से अनुसन्धान हुआ तथा हाल ही में 29 सामंती तत्वों के खिलाफ गिरफ्तारी के आदेश कर दिए. अब इन आरोप प्रमाणित आरोपियों की गिरफ्तारी होनी है. खबर मिली है कि सारे आरोपी अपने कायरपन का परिचय देते हुये दुम दबाकर दक्षिण भारत की तरफ भाग गये हैं, जिनको पकड़ने के लिये पुलिस कुछ टीमें गठित कर रही है. उम्मीद है कि ये वीर बहादुर सामंत शीघ्र ही सलाखों के पीछे नज़र आयेंगे.
भगवाना राम इस सफलता से उत्साहित हैं. वैसे भी वे पढ़े लिखे साधन संपन्न नौकरीपेशा पीड़ित दलितों की भांति जल्दी निराश नहीं होते है, मंचों पर जाकर रोते तो बिल्कुल भी नहीं हैं, उन्होंने बाबा साहेब की विचारधारा के आधार पर संघर्ष करने का सूत्र अपना लिया है. उनका साफ कहना है कि– “ कोई साथ दे तब भी लडूंगा, ना दे तो भी मैं लडूंगा और मुझे पक्का भरोसा है कि सामंतवाद के खिलाफ़ इस लड़ाई में मैं जीत कर रहूँगा.“
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता है तथा राजस्थान में वंचित समूहों के प्रश्नों पर कार्यरत है ,उनसे bhanwarmeghwanshi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है ) बसपा ने सौ उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की, जानिए कहां से किसको मिला टिकट
नई दिल्ली। रैली से लेकर कैंडिडेट तय करने के मामले में अन्य सभी पार्टियों से आगे रहने वाली बहुजन समाज पार्टी ने अपने 100 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है.
इसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीटें भी शामिल है. इसमें 20 लोकसभा सीटों के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटें शामिल है. विवरण इस प्रकार है.-
जनपद- सहारनपुर
बेहट- मोहम्मद इकबाल, नकुड़- श्री नवीन, सहारनपुर नगर- मुकेश दीक्षित, सहारनपुर ग्रामीण- (सामान्य से sc)- जगपाल सिंह, देवबन्द- माजिद अली, रामपुर मनिहारन (सु.)- रवीन्द्र कुमार मोल्हू, गंगोह- महिपाल सिंह
जनपद शामली
कैराना- दिवाकर देशवाल, थाना भवन- अब्दुलराव वारिस, शामली- मोहम्मद इस्लाम
जनपद मुजफ्फरनगर
बुढ़ाना- सैय्यदा बेगम, चरथावल- नूर सलीम राणा, पुरकाजी (सु.)- अनिल कुमार, मुजफ्फरनगर- राकेश कुमार शर्मा, खतौली- शिवान सिंह सैनी, मीरापुर- नवाजिस आलम खान
जनपद मेरठ
सिवालखास- नदीम अहमद, सरधना- हाफिज मोहम्मद इमरान, हस्तिनापुर (सु.)- योगेश वर्मा, किठौर- गजराज सिंह, मेरठ कैन्ट- सतेन्द्र सोलंकी, मेरठ शहर- पंकज जौली, मेरठ दक्षिण- हाजी मोहम्मद याकूब
जनपद बागपत
छपरौली- राज बाला, बड़ौत- लोकेश दीक्षित, बागपत- अहमद हमीद
जनपद गाजियाबाद
लोनी- हाजी जाकिर अली, मुरादनगर- सूदन कुमार, साहिबाबाद- अमरपाल शर्मा, गाजियाबाद- सुरेश बंसल, मोदीनगर- वहाब चौधरी
जनपद हापुड़
धौलाना- असलम अली, हापुड़ (सु.)- श्रीपाल सिंह, गढ़मुक्तेश्वर- प्रशान्त चौधरी
जनपद गौतम बुद्धनगर
नोएडा- रविकान्त मिश्रा, दादरी- सतवीर सिंह गूजर, जेवर- वेदराम भाटी
जनपद बुलन्दशहर
सिकन्दराबाद- हाजी इमरान, बुलन्दशहर- मोहम्मद अलीम खान, स्याना- दिलनवाज खान, अनूपशहर- गजेन्द्र सिंह, डिबाई- देवेन्द्र भारद्वाज, शिकारपुर- मुकुल उपाध्याय, खुर्जा (सु.)- अर्जुन सिंह
जनपद अलीगढ़
खैर (सु.)- राकेश कुमार मौर्य, बरौली- ठा. जयवीर सिंह, अतरौली- इलियास चौधरी, धर्रा- मोहम्मद सगीर, कोल- राम कुमार शर्मा, अलीगढ़- मोहम्मद आरि, इगलास (सु.)- राजेन्द्र कुमार
जनपद हाथरस
हाथरस (सु.)- बृजमोहन राही, सादाबाद- रामवीर उपाध्याय, सिकन्दरा-राऊ- बनी सिंह बघेल
जनपद कासगंज
कासगंज- अजय चतुर्वेदी, अमांपुर- देवप्रकाश, पटियाली- धीरेन्द्र बहादुर सिंह चौहान
जनपद एटा
अलीगंज- रामकिशोर यादव, एटा- गजेन्द्र सिंह चौहान, मारहरा- सलभ बाबू महेश्वरी, जलेसर (सु.)- मोहन सिंह
जनपद मथुरा
छाता- मनोज पाठक, मांट- श्याम सुंदर शर्मा, गोवर्धन- राजकुमार रावत, मथुरा- योगेश द्विवेदी, बलदेव (सु.)- प्रेमचन्द्र कर्दम
जनपद आगरा
एत्मादपुर- डॉ. धर्मपाल सिंह, आगरा कैंट (सु.)- गुटियारी लाल दुबेश, आगरा दक्षिणी- जुल्फिकार अहमद भुट्टो, आगरा उत्तरी- ज्ञानेन्द्र कुमार गौतम, आगरा देहात (सु.)- कालीचरन सुमन, फतेहपुर सीकरी- सूरजपाल सिंह, खैरागढ़- भगवान सिंह कुशवाहा, फतेहाबाद- उमेश सैथिया, बाह- मधूसूदन शर्मा
जनपद फिरोजाबाद
टूण्डला (सु.)- राकेश बाबू, जसराना- शिवराज सिंह यादव, फिरोजाबाद- खालिद नसीर, शिकोहाबाद- शैलेश कुमार यादव, सिरसागंज- राघवेन्द्र सिंह
जनपद बिजनौर
नजीबाबाद- जमील अहमद अंसारी, नगीना (सु.)- वीरेन्द्र पाल सिंह, बढ़ापुर- फहद यजदानी, धामपुर- मोहम्मद गाजी, नहटौर (सु.)- विवेक सिंह, बिजनौर- रसिद अहमद, चांदपुर- मो. इकबाल, नूरपुर- गौहर इकबाल
जनपद मुरादाबाद
कांठ- मोहम्मद नासिर, ठाकुरद्वारा- विजय यादव, मुरादाबाद देहात- पन्नालाल उर्फ बबलू सैनी, मुरादाबाद शहर- अतीक अहमद, कुन्दरकी- हाजी अकबर हुसैन, बिलारी- ऋषिपाल सिंह
जनपद सम्भल
चन्दौसी (सु.)- विरमावती, असमौली- अकीलुर्रहमान, सम्भल- रफातुल्ला, गुन्नौर- मो. इस्लाम खां
जनपद रामपुर
स्वार- नवाब काजिम अली खां उर्फ नवेद मियां, चमरऊवा- अली यूसुफ अली ”शर्मा जी” के बेटे से नहीं, कल्पित वीरवाल से सीखो
उदयपुर। राजस्थान के 17 साल के कल्पित वीरवाल ने इतिहास रच दिया है. आईआईटी जेईई के मेन्स में कल्पित ने 360 में से 360 अंक हासिल किए हैं. कल्पित ऐसा करने वाले देश के पहले छात्र हैं. जेईईमेन्स में सौ फीसदी अंक लाने वाले उदयपुर के कल्पित वीरवाल की जिंदगी बदलने लगी है. रिजल्ट आने के बाद से ही स्कूल से लेकर पड़ोसी तक के बीच उनकी हैसियत एकदम से बदल गई है और वह कई युवाओं के रोल मॉडल बनने लगे हैं. टीना डाबी के बाद कल्पित ने भी इस मिथक को भी धाराशायी कर दिया है कि आरक्षित वर्ग के छात्रों में प्रतिभा नहीं होती.
सोशल साइट्स में भी यह बहस खूब देखने को मिली. ट्विटर पर लोगों ने #KalpitVeerval पर मैसेज करते हुए शर्मा जी के लड़के को ट्रोल करना शुरू कर दिया. अक्सर माता-पिता अपने बच्चों को शर्मा जी (विशेष जाति) के बेटे से सीखने का उदाहरण देते रहते हैं. इसलिए लोगों ने ट्विटर पर शर्मा जी के बेटे पर फिरकी ली. कईयों ने शर्मा जी के लड़के के लिए दो मिनट का मौन रखा. इस शानदार उपलब्धि के बाद हर ओर कल्पित की ही चर्चा है. पिछले कुछ दिनों से उनकी जिंदगी भी बदल गई है.
– रिजल्ट निकलने के बाद शुक्रवार को प्रतापनगर स्थित एमडीएस सीनियर सैकंडरी स्कूल में कल्पित का जमकर स्वागत हुआ. कैम्पस में स्कूली छात्र कल्पित को ढोल-नगाडों के साथ अपने साथी का स्वागत किया. संस्था के निदेशक डॉ. शैलेन्द्र सोमानी, प्राचार्या डॉ. निधि माहेश्वरी और सभी अध्यापकों ने कल्पित को माला पहनाकर बधाई दी.
– जेईई के एग्जाम के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी विद्यार्थी ने फिजिक्स, कैमिस्ट्री और मैथ्स में 120 में से 120 नंबर हासिल किए हैं. फुल मार्क्स पाने वाले कल्पित सोशल मीडिया पर छा गए हैं.
– भारतीय टीम के बल्लेबाज रविंद्र जडेजा ने भी कल्पित को ट्विट कर बधाई दी है. जडेजा ने कल्पित का फोटो पोस्ट करते हुए भविष्य की शुभकामनाएं दी हैं. इस नतीजे से जडेजा उत्साहित लगे.
– कल्पित को राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी बधाई दी. उन्होंने ट्विट करते हुए लिखा कि राजस्थान को कल्पित पर गर्व है.
– राजनीतिक दलों में भी कल्पित का सम्मान करने के लिए होड़ लगी रही. कल्पित के घर लगातार नेता से लेकर अन्य लोग पहुंच रहे हैं. बधाई देने वालों का तांता अभी भी नहीं टूटा है.
– कल्पित की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि वह दलित स्टूडेंट हैं.
– कल्पित के पिता पुष्कर लाल वीरवाल उदयपुर के महाराणा भूपाल सरकारी अस्पताल में कंपाउन्डर हैं और मां राजस्थान में उदयपुर के एक सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं. बेटे की वजह से इन दोनों को इन दिनों खूब सम्मान मिल रहा है. अस्पताल में पिता की इज्जत अचानक से बढ़ गई है तो मां को भी लोग कल्पित की मां के नाम से जानने लगे हैं.
– कल्पित के दलित वर्ग से संबंध रखने के कारण भी एक नई बहस छिड़ गई है. सोशल मीडिया पर आरक्षण और काबिलियत को लेकर एक बार फिर बहस चल पड़ी है. तमाम लोगों का कहना है कि जो कहते हैं कि दलितों में मेरिट नहीं है टीना डाबी के बाद कल्पित की उपलब्धि उनके मुंह पर करारा तमाचा है. कल्पित वीरवाल सामान्य और अनुसूचित जाति में टॉप आए हैं.
– इससे पहले कल्पित इंडियन जूनियर साइंस ओलंपियाड और नेशनल टैलेंट सर्च एग्जाम में भी टॉप कर चुके हैं.
– कल्पित के बड़े भाई एम्स में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं. जब बुद्ध ने आत्मा की सच्चाई बताई
एक बार तथागत बुद्ध से एक विद्वान पंडित ने पूछा- आप सब लोगों को ये बताते हैं कि आत्मा नहीं, स्वर्ग नहीं, पुनर्जन्म नहीं. क्या यह सत्य है?
बुद्ध- आपको ये किसने बताया कि मैंने ऐसा कहा?
पंडित- नहीं ऐसा किसी ने बताया नहीं.
बुद्ध – फिर मैंने ऐसे कहा ये बताने वाले व्यक्ति को आप जानते हो?
पंडित- नहीं.
बुद्ध- मुझे ऐसा कहते हुए आपने कभी सुना है?
पंडित- नहीं तथागत, पर लोगों की चर्चा सुनकर ऐसा लगा. अगर ऐसा नहीं है तो आप क्या कहते हैं?
बुद्ध- मैं कहता हूँ कि मनुष्य को वास्तविक सत्य स्वीकारना चाहिए.
पंडित- मैं समझा नहीं, तथागत. कृपया सरलता में बताइये.
बुद्ध- मनुष्य की पांच बाह्यज्ञानेंद्रिय हैं. जिनकी मदद से वह सत्य को समझ सकता है.
1. आँखें- मनुष्य आँखों से देखता है.
2. कान- मनुष्य कानो से सुनता है.
3. नाक- मनुष्य नाक से श्वास लेता है.
4. जिव्हा- मनुष्य जिव्हा से स्वाद लेता है.
5. त्वचा- मनुष्य त्वचा से स्पर्श महसूस करता है.
इन पांच ज्ञानेन्द्रियों में से दो या तीन ज्ञानेन्द्रियों की मदद से मनुष्य सत्य जान सकता है.
पंडित- कैसे तथागत?
बुद्ध- आँखों से पानी देख सकते है, पर वह ठण्डा है या गर्म है, ये जानने के लिए त्वचा की मदद लेनी पड़ती है. वह मीठा है या नमकीन ये जानने के लिए जिव्हा की मदत लेनी पड़ती है.
पंडित- फिर भगवान है या नहीं इस सत्य को कैसे जानेंगे तथागत?
बुद्ध- आप वायु को देख सकते है?
पंडित- नहीं तथागत.
बुद्ध- इसका मतलब वायु नहीं है ऐसा होता है क्या?
पंडित- नहीं तथागत.
बुद्ध- वायु दिखती नहीं फिर भी हम उसका अस्तित्व नकार नहीं सकते, क्योंकि हम वायु को ही हम साँस के द्वारा अंदर लेते है और बाहर निकालते हैं. जब वायु का झोक़ा आता है, तब पेड़-पत्ते हिलते है, ये हम देखते हैं और महसूस करते हैं. अब आप बताओ भगवान हमें पांच ज्ञानेन्द्रियों से महसूस होता है?
पंडित- नहीं तथागत.
बुद्ध- आपके माता पिता ने देखा है, ऐसे उन्होंने आपको बताया है?
पंडित- नहीं तथागत.
बुद्ध- फिर परिवार के किसी पूर्वज ने देखा है, ऐसा आपने सुना है?
पंडित- नहीं तथागत.
बुद्ध- मैं यही कहता हूँ कि जिसे आज तक किसी ने देखा नहीं, जिसे हमारी ज्ञानेन्द्रियों से जान नहीं सकते, वह सत्य नहीं है, इसलिए उसके बारे में सोचना व्यर्थ है.
पंडित- वह ठीक है तथागत, पर हम जिन्दा हैं, इसका मतलब हमारे अंदर आत्मा है, ये आप मानते हैं या नहीं?
बुद्ध- मुझे बताइये, मनुष्य मरता है. मतलब क्या होता है?
पंडित- आत्मा शरीर के बाहर निकल जाती है, तब मनुष्य मर जाता है.
बुद्ध- मतलब आत्मा नहीं मरती है?
पंडित- नहीं तथागत, आत्मा अमर है.
बुद्ध- आप कहते है आत्मा कभी मरती नहीं, आत्मा अमर है. तो ये बताइये आत्मा शरीर छोड़ती है या शरीर आत्मा को??
पंडित- आत्मा शरीर को छोड़ती है तथागत.
बुद्ध- आत्मा शरीर क्यों छोड़ती है?
पंडित- जीवन ख़त्म होने के बाद छोड़ती है.
बुद्ध- अगर ऐसा है तो मनुष्य कभी मरना नहीं चाहिए. दुर्घटना, बीमारी, घाव लगने के बाद भी बिना उपचार के जीना चाहिए. बिना आत्मा की मर्ज़ी के मनुष्य नहीं मर सकता.
पंडित- आप सही कह रहे है तथागत. पर मनुष्य में प्राण हैं, उसे आप क्या कहेंगे?
बुद्ध- आप दीपक जलाते हैं?
पंडित- हाँ, तथागत.
बुद्ध- दीपक यानि एक छोटा दिया, उसमें तेल, तेल में बाती और उसे जलाने के लिए अग्नि चाहिए, ठीक है?
पंडित- हाँ, तथागत.
बुद्ध- फिर मुझे बताइये, बाती कब बुझती है?
पंडित- तेल ख़त्म होने के बाद दीपक बुझता है, तथागत.
बुद्ध- और?
पंडित- तेल है पर बाती ख़त्म हो जाती है, तब दीपक बुझता है, तथागत.
बुद्ध- इसके साथ तेज वायु के प्रवाह से, बाती पर पानी डालने से, या दिया टूट जाने पर भी दीपक
बुझ सकता है.
अब मनुष्य के शरीर को एक दीपक समझ लेते हैं और प्राण मतलब अग्नि यानि ऊर्जा. सजीवों का देह चार तत्वों से बना है.
1) पृथ्वी- घनरूप पदार्थ यानि मिटटी
2) जल- द्रवरूप पदार्थ यानि पानी, स्निग्ध और तेल
3) वायु- अनेक प्रकार की हवा का मिश्रण
4) तेज- ऊर्जा, ताप, उष्णता
इसमें से एक पदार्थ अलग कर देंगे ऊर्जा और ताप का निर्माण होना रुक जायेगा, मनुष्य निष्क्रिय हो जायेगा. इसे ही मनुष्य की मृत्यु कहा जाता है. इसलिये आत्मा भी भगवान की तरह अस्तित्वहीन है. यह सब चर्चा व्यर्थ है. इससे धम्म का समय व्यर्थ हो जाता है.
पंडित- जी तथागत, फिर धम्म क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
बुद्ध- धम्म अँधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्ग है. धम्म, मनुष्यों का उद्देश्य मनुष्य के जन्म के बाद मृत्यु तक कैसे जीवन जीना है, इसका मार्गदर्शन करना ही धम्म है. दलित जज कर्णन और सुप्रीम कोर्ट फिर आमने-सामने
नई दिल्ली। कोलकाता हाईकोर्ट के दलित समाज के जस्टिस सी.एस कर्णन और सुप्रीम कोर्ट के बीच शह-मात का खेल जारी है. एक बार फिर से दोनों आमने-सामने हैं. इस मामले में जस्टिस कर्णन और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बारी-बारी से एक-दूसरे के खिलाफ आदेश दे रहे हैं, जिससे मामला और पेंचीदा हो गया है. ताजा घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की संविधान पीठ ने जस्टिस कर्णन की मेडिकल जांच के लिए मेडिकल बोर्ड के गठन के आदेश दिए हैं.
कोलकाता के सरकारी अस्पताल का मेडिकल बोर्ड 4 मई को जस्टिस कर्णन की जांच करेगा. कर्णन इंकार नहीं कर सकें इसको लेकर भी पूरा बंदोबस्त किया गया है. शीर्ष कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी को मेडिकल बोर्ड की मदद के लिए पुलिस टीम बनाने के निर्देश दिए. मेडिकल बोर्ड 8 मई तक रिपोर्ट कोर्ट में सौंपेगा. 18 मई को इस मामले में सुनवाई होगी. 18 मई तक जस्टिस कर्णन जवाब नहीं देते तो माना जाएगा कि वह कुछ नहीं कहना चाहते. कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि देश की कोई भी कोर्ट या ट्रिब्यूनल 8 फरवरी के बाद जारी किए गए जस्टिस कर्णन के आदेश पर संज्ञान न ले.
सुनवाई के दौरान AG मुकुल रोहतगी ने कहा कि जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के सात जजों के खिलाफ ही आदेश जारी कर दिए हैं. वह मानसिक रूप से ठीक हैं. वह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं. कोर्ट में सात जजों की संविधान पीठ ने कोलकाता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्नण के खिलाफ अदालत की अवमानना के मामले की सुनवाई की. मनुवाद को चुनौती देते तीन महापुरूष
अप्रैल महीने का पहला पखवाड़ा स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित आधुनिक भारत का सपना देखने वाले तीन महापुरूषों की जयंती का समय हैं. 9 अप्रैल (1893) को राहुल साकृत्यायन. 11 अप्रैल (1827) को जोतिबा फुले और 14 अप्रैल (1891) को बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर. इन तीनों महापुरूषों के सपनों, दर्शन, विचारों, इतिहास दृष्टि, व्यक्तित्व और कृतित्व में बहुत कुछ साझा है, लेकिन साथ ही भिन्नता भी मौजूद है. सबसे पहले तो इन महापुरुषों के मनुवाद के बारे में विचार को देखते हैं.
हिन्दू धर्म की व्याख्या करते हुए बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने कहा था- “हिन्दू जिसे धर्म कहते हैं, वह कुछ और नहीं, आदर्शों और प्रतिबंधों की भीड़ है. हिन्दू धर्म वेदों व स्मृतियों, यज्ञ-कर्म, सामाजिक शिष्टाचार, राजनीतिक व्यवहार तथा शुद्धता के नियमों जैसे अनेक विषयों की खिचड़ी मात्र है. हिन्दुओं का धर्म बस आदेशों व निषेधों की संहिता के रूप में ही मिलता है और वास्तविक धर्म, जिसमें आध्यात्मिक सिद्धांतों का विवेचन हो, जो वास्तव में सर्वजनीन और विश्व के सभी समुदायों के लिए हर काम में उपयोगी हो, हिन्दुओं में पाया ही नहीं जाता. यदि थोड़े से सिद्धांत पाए भी जाते हैं तो हिन्दुओं के जीवन में उनकी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं पायी जाती हैं. हिन्दुओं का धर्म ‘आदेशों और निषेधों’ का ही धर्म है. यह बात वेद और स्मृतियों में ‘धर्म’ शब्द के प्रयोग तथा व्याख्याकारों द्वारा उसकी व्याख्या से स्पष्ट है.
तो क्या हिन्दू धर्म में ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है, जिसके समक्ष आपस के तमाम भेदों के बावजूद नतमस्तक होना सभी हिन्दू, अपना कर्तव्य मानते हों? मुझे लगता है, ऐसा एक सिद्धांत है और वह है जाति का सिद्धांत’. ब्राह्मणवाद के जहर ने हिन्दू समाज को बर्बाद किया है. ” हिन्दू धर्म के बारे में बाबासाहेब के ये कथन मनुवाद के अंदर की सड़ांध को सामने ले आते हैं. इसी तरह राहुल सांकृत्यायन ने भी मनुवादियों की धज्जियां उड़ाई है.
बकौल राहुल सांकृत्यायन- “मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना- इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना. अगर मजहब बैर नहीं सिखलाता तो चोटी-दाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमरा मुल्क पामाल क्यों हैं? पुराने इतिहास को छोड़ दिजिए, आज भी हिन्दुस्तान के शहरों और गांवों में एक मजहब वालों को दूसरे मजहब वालों के खून का प्यासा कौन बना रहा हैं? और कौन गाय खाने वालों को गोबर खाने वालों से लड़ा रहा है. असल बात यह है कि “ मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना. भाई को सिखाता है भाई का खून पीना”. हिन्दुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर. कौए को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता. कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता. मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है. उसका मौत को छोड़कर दूसरा इलाज नहीं हैं.’
शायद ही कोई जनपक्षधर और वैज्ञानिक भौतिकवादी विचारों से लैस व्यक्ति इस बाते से इंकार करे कि आज का भारत दो मनुष्य विरोधी संस्कृतियों के चंगुल में जकड़ा छटपटा रहा है. इसमें पहली संस्कृति का नाम हिन्दू संस्कृति है, जबकि दूसरी का नाम विश्वव्यापी पतनशील पूंजी की संस्कृति है. एक को महान भारतीय संस्कृति के नाम पर पुर्नस्थापित किया जा रहा है तो दूसरी को सबके विकास के नाम पर स्थापित किया गया है. दोनों का आपस में पूर्ण मेल हो गया है. दोनों एक दूसरे को शक्ति और समर्थन दे रहे हैं. दोनों का अस्तित्व एक दूसरे पर टिका है. दोनों ने लगभग भारतीय जीवन को पोर-पोर नियंत्रण में ले लिया है.
अब हिन्दू संस्कृति के नुमाईंदों ने भारतीय राजसत्ता पर भी लगभग पूर्ण नियंत्रण कर लिया है और राजसत्ता पर पहले काबिज पूंजी की संस्कृति के समर्थकों ने इनका जोरदार खैरमकदम किया है. दो टूक शब्दों में कहा जाए तो भारत में ब्रिटिश सत्ता के उप उत्पाद के तौर शुरू हुई और आजादी के आंदोलन के साथ जोर पकड़ने वाली, भारत के आधुनिकीकरण की परियोजना आजादी के लगभग सत्तर सालों बाद पूरी तरह असफल या पराजित हो गई है. इस पराजय या असफलता को आधुनिकीकरण के मूल तत्वों देश की संप्रभुता, जनसंप्रभुता, वर्ण-जाति व्यवस्था, जातिवादी पितृसत्ता, धर्म निरपेक्षता, उत्पादन संबंधों-संपत्ति संबंधों और नई सृजित होने वाली संपत्ति के न्यायपूर्ण बंटवारे के संदर्भ में समझा जाना चाहिए.
भारतीय पुर्नजागरण, सुधार आंदोलन और आजादी के आंदोलन के दौरान ही आधुनिकीकरण की परियोजना के बीज पड़े थे. लेकिन एक ऐसी धारा भी थी जो आधुनिकीकरण की पूरी परियोजना के ही विरोध में थी और देश को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करना चाहती थी. उस शक्ति का नाम ही राष्ट्रीय सेवक संघ (संघ) है, जिसे अब जाकर सफलता मिली है. देश में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण उसने अपना पांव पसार लिया है और उसके अनुषांगिक संगठन भाजपा ने अपार बहुमत के साथ देश की राजसत्ता पर भी कब्जा कर लिया है तथा उसके अन्य विविध आनुषांगिक संगठनों का देश की विभिन्न औपचारिक एवं अनौपचारिक संस्थाओं पर कब्जा हो गया है. आधुनिकता के विविध मूल तत्वों में से किन तत्वों का प्रतिनिधित्व जोतिबा फुले, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर और राहुल सांकृत्यायन करते थे, और आज का भारत उस संदर्भ में कहां खड़ा हैं, इसका जायजा लेने से पहले एक सरसरी नजर आधुनिकता के अन्य तत्वों और उनके हश्र डाल लेना जरूरी है.
रही बात आधुनिकता की दो मह्त्वपूर्ण परियोजनों वर्ण-जाति और जातिवादी पितृसत्ता से मुक्ति अर्थात बर्बर मध्युगीन मानसिकता से भारतीयों की मुक्ति का प्रश्न, जो फुले, अंबेडकर और राहुल सांकृत्यायन के हमले का मुख्य केंद्र था. उस पर इन नायको का संदर्भ लेते हुए हम विस्तार से बात करेंगे.
हमारे देश में बहुत सारे लोगों से यह समझने में भारी भूल हुई कि जाति और पितृसत्ता दो भिन्न श्रेणियां है और समाधान अलग –अलग तरीकों से होगा. जबकि फुले, अम्बेडकर और काफी हद तक राहुल सांकृत्यायन भी यह अच्छी तरह समझते और मानते थे कि हिन्दू संस्कृति के दो प्राण तत्व हैं- जाति और जातिवादी पितृसत्ता. इन लोगों का स्पष्ट तौर पर मानना था कि वर्णों और जातियों को तभी कायम रखा जा सकता है और उनकी पवित्रता-शुद्धता को तभी बनाए रखा जा सकता है; जब स्त्रियों की यौननिकता पर पूर्ण नियंत्रण किया जाए. हमारे तीनों नायक इस बात पर जोर देते हैं कि हिन्दुओं की मूल्य व्यवस्था, संस्कारों और सोचने के तरीके का केंद्र बिंदु जाति की रक्षा और स्त्री की योनिकता पर पूर्ण नियंत्रण है. इसी बात को लोहिया के शब्दों में कहें तो ‘ हिन्दुओं का दिमाग जाति और योनि के कटघरे में कैद है.’
जाति और पितृसत्ता के बीच क्या संबंध है. इस बात को आधुनिक युग में जिस व्यक्तित्व ने सबसे पहले समझा, वे थे– फूले दंपत्ति जोतिबा फुले और सावित्री बाई फूले. जाति/ वर्ण के साथ स्त्री की स्थिति को जोड़कर देखने का जहां बड़े इतिहासकारों ने नहीं के बराबर प्रयास किया, वहीं जाति- व्यवस्था की दलित चिंतकों-सुधारकों ने जो समझ विकसित की और जमीनी स्तर पर जो कार्य किया उसमें स्त्री की पराधीनता और जाति के बीच का गठबंधन स्पष्ट होकर सामने आया. ज्योतिबा फुले ने शूद्रों, अति-शूद्रों और स्त्रियों को ब्राह्मणों द्वारा खड़ी की गई व्यवस्था में शोषित- उत्पीड़ित की तरह देखा. फुले ने जाति और स्त्री प्रश्न को एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में देखा और दोनों को अपने संघर्ष का निशाना बनाया.
हिन्दू समाज व्यवस्था को उसकी समग्रता में समझने और बदलने की कोशिशों और जाति को भौतिक संसाधनों, ज्ञान और जेंडर-संबंधों के जटिल तानेबाने के तहत समझ विकसित करने के फुले के प्रयासों के कारण गेल ओमवेट ने उन्हें जाति का पहला ऐतिहासिक भौतिकवादी सिद्धांतकार कहा है. जाति और जातिवादी पितृसत्ता के बीच से संबंधों को रेखांकित करते हुए अम्बेडकर कहते है कि ‘जाति- व्यवस्था के लिए सजातीय विवाह और स्त्रियों की यौनिकता के नियंत्रण के लिहाज से ऊंची जातियों खासकर ब्राह्मणों में सती, बलात् विधवापन्, बाल-विवाह जैसे अस्त्र ईजाद किए गए.
जो जाति ब्राह्मणों के नजदीक हैं उन्होंने स्त्री पर ये तीनों ही कायदे लाद रखे हैं. जो उनसे तनिक दूर हैं उन्होंने विधवापन और बाल विवाह अपना रखा है; जो और भी दूर हैं उन्होंने बाल-विवाह अपना रखा है और जो सबसे दूर हैं वे जाति के नियमों में आस्था बनाए रख कर जाति- व्यवस्था के परिचालन में सहयोग करते रहे हैं.’ हिन्दू धर्म ग्रंथों, मिथकों, स्मृतियों, पुराणों आदि ने शूद्र और स्त्री को एक ही श्रेणी में रखा.
बाबासाहेब अम्बेडकर ने विस्तार से हिन्दू समाज में स्त्री की स्थिति और जाति/ वर्ण के पितृसत्ता से संबंधों को समझा और उसे तोड़ने की कोशिश की. उन्होंने अपनी किताब ‘हिन्दू नारी उत्थान और पतन’ में तथ्यों-तर्कों से यह प्रमाणित किया कि बौद्ध धर्म के अन्दर स्त्रियों को बराबरी का अधिकार प्राप्त था और स्त्रियों को पराधीनता और दोयम दर्जे की स्थिति में ब्राह्मणवाद ने डाला. राहुल सांकृत्यायन अपनी विविध किताबों में स्त्री-पुरूष के बीच पूर्ण बराबरी की हिमायत करते हैं और भोजपुरी के अपने नाटक ‘मेहररूअन की दुर्दशा’ में स्त्री पराधीनता के विविध रूपों पर कड़ा प्रहार करते हैं.
भारत की आधुनिकता की परियोजना के इन महानायकों के साझा तत्वों पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि हिन्दू संस्कृति, ब्राहमणवादी मूल्य व्यवस्था, संस्कारों, परंपराओं, वर्ण-जाति व्यवस्था, पितृसत्ता और इसका समर्थन करने वाले ईश्वरी अवतारों, धर्मग्रन्थों और इनके रचयिता ऋषियों-महाऋषियों पर निर्णायक प्रहार किया है. फुले की किताब ‘गुलामगिरी’, ‘ तृतीय रत्न’, अम्बेडकर ने अपनी किताब ‘जाति का उच्छेद’ सहित अन्य किताबों में और राहुल ने अपनी किताब ‘तुम्हारी क्षय’ में वर्ण-जाति व्यवस्था पर तीखा हमला बोला है. यह सभी एक स्वर से स्वीकार करते थे कि हिन्दुओं के धर्म, ईश्वर, मूल्यव्यवस्था में बुनियादी तौर पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जो बेहतर मानव समाज के निर्माण में मददगार हो. तीनों जातिवाद और ब्राह्मणवादी मूल्य व्यस्था के समूल उच्छेद के पक्ष में थे. इसके बरक्स किस चीज की स्थापना की जाए, इस बारे में तीनों के दृष्टिकोण में भिन्नता थी.
आज की चुनौतियों, कार्यभारों और इन व्यक्तित्वों के ऐतिहासिक योगदानों के संदर्भ में इनका मूल्यांकन करने के लिए जरूरी है कि इनके व्यक्तित्व की विशिष्टताओं और इनके बीच की भिन्नताओं को भी रेखांकित किया जाए. इसके लिए संक्षेप में ही सही इन तीनों का अलग विश्लेषण, आंकलन और मूल्यांकन किया जाए. ध्यान रहे कि तीनों इतिहास और परंपरा से बहुत कुछ ग्रहण करते हैं. विभिन्न व्यक्तियों का इनके ऊपर प्रभाव है लेकिन इस सब के बावजूद तीनों स्वतंत्रचेता व्यक्तित्व हैं. सबसे पहले जोतिबा फुले को लेते हैं.
जोतिबा फुले आधुनिक भारत के पहले व्यक्तित्व हैं जिन्होंने ब्राह्मणवाद पर निर्णायक हमला बोला और ब्राह्मणवाद की गुलामी, अवमानना, अपमान, लांक्षना, उपेक्षा और शोषण- उत्पीड़न के शिकार शूद्रों, अन्त्यजों और स्त्रियों की मुक्ति और पूर्ण बरावरी का आह्वान किया तथा उसके लिए आजीवन संघर्ष किया. फुले का जन्म शूद्र वर्ण की माली जाति में हुआ था. उनके जन्म (1827 ) के नौ वर्ष पहले (1818) ही पेशवाओं के शासन का खात्मा अंग्रेजों ने अन्त्यजों और शूद्रों के सहयोग से किया था. हम सभी जानते हैं कि पेशवाई शासन एक खुला ब्राह्मणवादी शासन था, जिसमें मनु-याज्ञवल्क्य की स्मृतियों को अक्षरशः लागू करने की कोशिश की गई थी. अंग्रेजों ने पेशवाई का तो अन्त कर दिया था, लेकिन सामाजिक, धार्मिक सांस्कृति जीवन में ब्राह्मणवादी परंपरा और मूल्य व्यवस्था कायम थी.
फुले एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे, जो आर्थिक दृष्टि से संपन्न था और अछूत नहीं माना जाता था. लेकिन उस जाति को द्विजों की बरावरी करने का अधिकार नहीं था, जिसके चलते उन्हें सामाजिक अपमान का भी सामना करना पड़ा. लेकिन अछूतों और स्त्रियों के पक्ष में निर्णायक तौर पर खड़े होने के चलते उनके परिवार ने उन्हें उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले सहित घर से बेघर कर दिया. उसके बाद का उनका पूरा जीवन अन्त्यजों, शूद्रों और स्त्रियों के लिए संघर्ष करते बीता. इस दौरान उन्हें पग-पग पर ब्राह्मणवादियों से जूझना पड़ा. जाति और किसानों के प्रश्न पर बाल गंगाधर तिलक जैसे महारथी से टकराना पड़ा. जिनके स्वराज का अर्थ द्विजों, मर्दों और उच्च वर्गों के लिए स्वराज था. तिलक अंग्रेज सरकार द्वारा किसानों के पक्ष में जमींदारों और साहूकारों के लगान और सूद में थोड़ी सी भी कटौती के पक्ष में नहीं थे, जिसकी कोशिश जोतिबा फुले ने की थी. उन्होंने अछूतों और स्त्रियों के लिए पहला स्कूल खोला यह दुनिया जानती है. ब्राह्मणी विधवाओं के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह खोला. व्यापक गरीब किसानों के दर्द को अपनी किताब ‘ किसान का कोड़ा’ में व्यक्त किया और आजीवन उनके लिए संघर्ष करते रहे.
फुले का विजन अत्यन्त व्यापक था. थापस पेन की किताब ‘राइट्स ऑफ मैन’ का उनके उपर गहरा प्रभाव था. अमेरिका में काले गोरों के संघर्ष में वे कालों का पक्ष लेते और वहां से अपने संघर्षों की प्रेरणा भी ग्रहण करते. पेशवाई की तुलना में अंग्रेजों की उदारता उन्हें आकर्षित करती थी. जो लोग इस बात के लिये उनकी आलोचना करते हैं कि वे अंग्रेजों के पक्ष में खड़े थे और 1857 के संघर्ष में भारतीयों का साथ नहीं दिया, वे लोग इस बात का जवाब नहीं देते हैं कि क्या उन्हें अन्तिम पेशवा नाना साहब की वापसी का यानी पेशवाई या ब्राह्मणशाही की पुर्नस्थापना का समर्थन करना चाहिए था या कि उसके बाद तिलक का समर्थन करना चाहिए था, जो जाति और जातिवादी पितृसत्ता का पुरजोर समर्थन करते थे और हर प्रकार के सामाजिक सुधारों के विरोधी थे.
फुले ने धर्म और ईश्वर का निषेध तो नहीं किया लेकिन उनकी ईश्वर विषयक कल्पना पूर्णतः निर्गुण, निराकार थी. ठीक कबीर जैसी. उनका मानना था कि ईश्वर ने किसी को ऊंच या नीच नहीं बनाया हैं और उसकी खोज करना भी व्यर्थ है. वे एक पूर्णमानवतावादी और समतावादी थे. वे भारतीय पुर्नजागरण की निम्म जातीय और निम्न वर्गीय परंपरा के जनक थे.
बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर एक अछूत महार जाति में 14 अप्रैल 1891 को जन्में जिन्होंने ब्राह्मणवादी हिन्दू संस्कृति को इस तरह चुनौती दिया कि हिन्दूओं के सबसे उदार रूप के समर्थक और पोषक महात्मा गांधी भी हिल गए और कह पड़े कि ‘ डॉ. अंबेडकर हिन्दुत्व के लिए सबसे बड़े चुनौती हैं.’ इतना ही नहीं उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति ‘जाति का उच्छेद’ पढ़कर उनकी टिप्पणी थी कि कोई भी समाज-सुधारक इस किताब की अनदेखी नहीं कर सकता. वे आगे कहते हैं कि भविष्य में चाहे उन्हें किसी भी विशेषण से जोड़ा जाए, परन्तु डॉ. अम्बेडकर ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो समाज द्वारा भुलाये जा सकेगें.’
गांधी की यह बात पूरी तरह से सही साबित हुई. आज बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर हजारों वर्षों से पराधीनता और अपमान की आग में झुलसते दलितों के मसीहा बन चुके हैं और उनके विचारों से नाइत्तेफाकी रखने वाले भी विविध कारणों से उनका नाम लेने और उन्हें स्वीकार करने को आतुर और विवश हैं. हिन्दुस्तान की समस्याओं की भीतरी तहों को जानने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात से इंकार नहीं कर पायेगा कि भविष्य के किसी भी खूबसूरत भारत की रचना का रास्ता अम्बेडकर से भी गुजर कर जायेगा.
कौन सी मूल चीज है जो डॉ. अम्बेडकर को महानायक बना देती हैं? बिना संदेह वह है अम्बेडकर का यह मानना कि अगर किसी एक चीज ने भारतीय समाज को एक पतनशील समाज में परिवर्तित कर दिया और उसे जिन्दा कौम की जह मुर्दा कौम में तब्दील कर दिया है तो उसका नाम है- ‘जाति व्यवस्था’. जाति की सर्वव्यापी विनाशक भूमिका के संर्दभ में बाबासाहेब अम्बेडकर लिखते हैं कि “इसमें कोई संदेह नहीं है कि जाति आधारभूत रूप से हिन्दुओं का प्राण है, लेकिन हिन्दुओं ने सारा वातावरण गंदा कर दिया है और सिख, मुस्लिम और क्रिश्चियन सभी इससे पीड़ित हैं.’’ वे मेहनतकश श्रमिकों की एकता के पुरजोर समर्थक थे, लेकिन इस बात से दुखी थे कि जाति ने श्रमिकों को विभाजित कर रखा है.
वे लिखते है कि “भारत की जाति व्यवस्था की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती, बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक दूसरे की अपेक्षा ऊंच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी अन्य समाज में नहीं पाया जाता है.’ उन्होंने वामपंथियों को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा था कि जाति एक ऐसा राक्षस है, जो आपका रास्ता काटेगा जरूर. जब तक आप इस राक्षस को नहीं मारते, तब तक आप न तो कोई राजनीतिक सुधार कर सकते हैं और न हीं कोई आर्थिक सुधार कर सकते हैं.
अम्बेडकर एक मुक्कमल चिन्तक, सामाजिक क्रान्तिकारी के साथ-साथ राजनेता भी रहे हैं. राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर वे उदारवादी लोकतंत्र के समर्थक हैं. आर्थिक व्यवस्था के तौर पर राज्य नियंत्रित पूंजीवाद के समर्थक हैं या ज्यादा से ज्यादा राजकीय समाजवाद के समर्थक हैं. वे कृषि भूमि के पूर्ण राष्ट्रीयकरण और बुनियादी एवं बड़े उद्योग धंधों के राष्ट्रीयकरण का समर्थन करते हैं. एक अनीश्वरवादी समतावादी धर्म के रूप में बौद्ध धर्म की पैरवी करते हैं.
इन दोनों के विपरीत राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893) का जन्म गाय पट्टी (काउ बेल्ट) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. वह वेदांती, आर्य समाजी होते हुए बौद्ध मतावलंबी बने. विद्रोही चेतना, न्यायबोध और जिज्ञासा वृति ने उन्हें पूरी तरह से ब्राह्मणवादी जातिवादी हिन्दू संस्कृति के खिलाफ खड़ा कर दिया. फुले और अम्बेडकर की तरह उन्हें जातिवादी अपमान का सामना तो नहीं करना पड़ा, लेकिन सनातनी हिन्दुओं की लाठियां जरूर खानी पड़ी. राहुल सांकृत्यायन अपने अपार शास्त्र ज्ञान और जीवन अनुभवों के चलते हिन्दुओं को सीधे ललकारते थे. उनकी पतनशीलता और गलाजत को उजागर करते थे. उन्होंने अपनी किताबों में विशेषकर ‘तुम्हारी क्षय’ में हिन्दुओं के समाज, धर्म, भगवान, सदाचार और जात-पांत की क्षय में हिंदुओं के अमानवीय चेहरे को बेनकाब किया है.
‘तुम्हारी जात- पांत की क्षय’ में वह लिखते है कि हमारे देश को जिन बातों पर अभिमान है, उनमें जात- पात भी एक है. …पिछले हजार बरस के अपने राजनीतिक इतिहास को यदि हम लें तो मालूम होता है कि भारतीय लोग विदेशियों से जो पददलित हुए, उसका प्रधान कारण जाति-भेद था. जाति-भेद न केवल लोगों को टुकड़ों- टुकड़ों में बांट देता है, बल्कि साथ ही यह सबके मन में ऊंच- नीच का भाव पैदा करता है. ब्राह्मण समझता है कि हम बड़े हैं; राजपूत छोटे हैं. राजपूत समझता है कि हम बड़े हैं; कहार छोटे हैं. कहार समझता है कि हम बड़े हैं; चमार छोटे हैं. चमार किसी और को छोटा समझता है और फिर वह ‘छोटा व्यक्ति’ भी किसी और को छोटा कह ही लेता है.’
राहुल सांकृत्यायन आधुनिकता की परियोजना के सभी तत्वों को अपने में समेटे हुए हैं. वे हिन्दू संस्कृति के मनुष्य विरोधी मूल्यों पर निर्णायक हमला तो करते ही हैं, वह यह भी मानते हैं कि मनुष्य को धर्म की कोई आवश्यकता नहीं हैं. इंसान वैज्ञानिक विचारों के आधार पर खूबसूरत समाज का निर्माण कर सकता है, एक बेहतर जिंदगी जी सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि वह उत्पादन संपत्ति संबंधों में क्रान्तिकारी परिवर्तन के हिमायती हैं. वह इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि भौतिक आधारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए बिना राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाया नहीं जा सकता है और जो परिवर्तन लाया जायेगा, उसे टिकाए रखना मुश्किल होगा.
जाति के संबंध में भी उनकी यही धारणा थी. वे इस यांत्रिक और जड़सूत्रवादी सोच के विरोधी थे कि आधार में परिवर्तन से अपने आप जाति व्यवस्था टूट जाएगी. इसके साथ ही हिन्दी क्षेत्र में वो अकेले व्यक्ति थे जो ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म-संस्कृति पर करारी चोट करते थे और भारत में सामंतवाद की विशिष्ट संरचना जाति को समझते थे और आधार और अधिरचना (जाति) दोनों के खिलाफ एक साथ निर्णायक संघर्ष के हिमायती थे. इस समझ को कायम करने में ब्राह्मण विरोधी बौद्ध धर्म के उनके गहन अध्ययन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनकी तीन किताबें ‘बौद्ध दर्शन’, ‘दर्शन- दिग्दर्शन’ और ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं.
जो लोग भी दो पतनशील जीवन दर्शन के नाभिनाल संबंध पर निर्मित हो रहे हैं, आज के भारत की जगह स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित भारत का निर्माण करना चाहते है, उनके लिए इन तीनों व्यक्तित्व के सपनों, विचारों और कृतित्व को व्यापक तौर पर जानना, आत्मसात करना और प्रेरणा लेना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है. छप्पर वाला अम्बेडकर स्कूल
भारत में जब हम शिक्षा के बारे में बात करते हैं तो जटिल तस्वीर बनती है. गुणवत्ता परक शिक्षा समाज के वंचित वर्गों तक पहुंचाना अभी भी दूर की कौड़ी है. सामाजिक असमानताओं की तरह ही शिक्षा तक पहुंच में भी भारी भेदभाव एवं असमानताएं विद्यमान है. डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि-“शिक्षा सभी नागरिकों को सहज रूप से उपलब्ध होनी चाहिए. समाज के वंचित वर्गों को समानता के स्तर पर लाने के लिए उनकी शिक्षा की व्यवस्था के लिए विशेष प्रावधान किए जाने चाहिए.’’ डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि अध्यापन का कार्य और विद्यार्थी उन्हें बहुत पसंद हैं. विद्यार्थियों के भविष्य पर ही राष्ट्र का भविष्य निर्भर है.
विद्यार्थी समाज का बौद्धिक हिस्सा है और वे सार्वजनिक विचार बनाने में मददगार होते हैं. उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य लोगों का समाजीकरण और नैतिक शिक्षा देना है. चरित्र निर्माण शिक्षा का महान उद्देश्य है. वंचित और जाति व्यवस्था के शोषण के शिकार जातियों को शिक्षा उपलब्ध कराकर वे जाति व्यवस्था को समाप्त करना चाहते थे और भारतीय लोकतन्त्र को मजबूत बनाना चाहते थे. शिक्षा के महत्व का विश्लेषण करते हुये उन्होंने शिक्षित हो, संघर्ष करो, संगठित हो का नारा दिया था. उनकी प्रेरणा से देश के दूर दराज के गांवों में भी डॉ. अम्बेडकर के नाम से स्कूल खुल चुके हैं. संसाधनों की बहुत परवाह न कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा की अलख जगाने वाले ऐसे ही एक स्कूल का जिक्र इस लेख में है.
डॉ. अम्बेडकर के उपर्युक्त महान विचारों एवं उद्देश्यों के प्रकाश में हम अपने गांव में स्थित डॉ. अम्बेडकर जूनियर हाई स्कूल की स्थापना व महत्व का विश्लेषण करना चाहेंगे. डॉ. अम्बेडकर जूनियर हाई स्कूल सन 2000 के आसपास एक बगीचे में एक-दो झोपड़ियां डालकर मेरे गांव के ‘दक्खिन’ तरफ खोला गया. वहीं बगल की जमीन पर परंपरागत रूप से मरे हुए जानवरों की खाल उतारने का काम किया जाता था और शेष शरीर को खुले में छोड़ दिया जाता था. उस स्थान पर हवा में इतनी दुर्गन्ध फैली रहती थी कि उधर से लोग नाक बंद कर और मुंह दूसरी तरफ कर बड़ी मुश्किल से गुजरते थे. गिद्धों और कौओं का झुण्ड वहां जमा रहता था. स्कूल खुलने के बाद मरे जानवरों का वहां फेंकना बंद हो गया. दलितों ने चमड़े उतारने का काम भी उस समय तक छोड़ दिया था. अब वहां लगभग दो सौ बच्चे पढते हैं. गिद्ध, कौआ बदबू सब कुछ उस स्कूल की वजह से वहॉ से दूर हो गए.
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि डॉ. अम्बेडकर जूनियर हाई स्कूल को शिक्षक श्री जयश्री अम्बेडकर जो अनुसूचित जाति (चमार) से आते हैं, ने शुरू किया था. इस स्कूल को खोलने के पहले वे दूसरे गांवों के कई स्कूलों में गणित पढ़ाया करते थे. संपन्न लोग अपने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के लिए जयश्री मास्टर साहब को आज भी बुलाते हैं. पूरे क्षेत्र में वे गणित के मास्टर के रूप में विख्यात हैं. उनके ही घर में रामनरेश गौतम, भगवती प्रसाद वेदकर जैसे लोग हैं, जो अंग्रेजी के शिक्षक के रूप में जाने जाते हैं और उन्होंने पूरा जीवन अध्यापन में लगा रखा है. नाम के साथ लगे उनके टाइटल्स उनकी जागरूकता के स्तर को रेखांकित करते हैं.
एक हडावर (मरे जानवरो को फेंकने का स्थान) जैसी बदबूदार जगह का सार्वजनिक स्थान में बदलना और कभी शिक्षा से सर्वथा वंचित अनुसूचति जाति के लोगों का कुशल अध्यापक बनना एवं पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र के सभी वर्गों के बच्चों को शिक्षा देना सामाजिक गतिशीलता एवं सामाजिक परिवर्तन का बेहतरीन उदाहरण है. हम दो भाईयों को भी गणित और अंग्रेजी इन्ही सम्मानित अध्यापकों ने पढ़ाया है.
मरे जानवरों को फेंकने वाले उपेक्षित व घृणित स्थान पर छप्पर में चलने वाला डा. अम्बेडकर जूनियर हाई स्कूल समाज के शोषित-वंचित ही नहीं बल्कि सभी जातियों, समुदायों के बच्चों को गुणवत्ता परक शिक्षा उपलब्ध कराकर बाबा साहेब के सपनों का राष्ट्र बनाने में अपना योगदान दे रहा है. जयश्री अम्बेडकर जैसे लोग समाज के लिए एक प्रेरणा हैं. खतरे में राजनैतिक आंदोलन
पिछले छह महीने से यूपी चुनाव की व्यस्तताओं में उलझी मायावती के सामने जब 11 मार्च को चुनावी नतीजे आए तो उनकी हैरानी का ठिकाना नहीं था. चुनाव के दौरान अपने को सत्ता से बस एक कदम दूर मानकर चल रही मायावती और बहुजन समाज पार्टी के हिस्से आई सीटें हाथों और पैरों की ऊंगलियों की गिनती से बाहर नहीं आ पाई. बसपा को महज 19 सीटें मिली. यह एक ऐसा रिजल्ट था;जिससे सिर्फ पार्टी के नेता ही नहीं, बल्कि बसपा के समर्थक भी हताश और परेशान थे. इस नतीजे के बाद देश-विदेश में फैले बहुजन विचारधारा के हितैषी अम्बेडकरवादियों की निगाहें मायावती पर टिकी थीं. सब टकटकी लगाए बैठे थे कि वह जिस नेतृत्व में विश्वास करते हैं, इस परिणाम के बाद उसकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी?
आखिरकार मायावती बाहर आईं और उन्होंने सीधे ऐसा बयान दिया, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी. उन्होंने चुनाव परिणाम के लिए ई.वी.एम (इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) को दोषी ठहरा दिया. उन्होंने कहा कि यह नतीजे चौंकाने वाले हैं और चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है. उन्होंने भाजपा पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि ई.वी.एम मशीन ने भाजपा के अलावा किसी का वोट ही नहीं लिया. आरोप गंभीर था, लेकिन उनके इस आरोप पर भाजपा ने जहां प्रतिक्रिया तक देने से इंकार कर दिया तो वहीं अन्य दल भी खुलकर सामने नहीं आए. हालांकि अखिलेश यादव ने यह जरूर कहा कि वह इस मुद्दे पर बसपा के साथ हैं और इसकी जांच होनी चाहिए लेकिन उन्होंने इसके पहले आत्मपरिक्षण करने की बात भी कही.
ई.वी.एम में गड़बड़ी के मायावती के आरोप के बाद उनके समर्थकों में ई.वी.एम की कमियां निकालने की जैसे होड़ मच गई. सोशल मीडिया खासकर व्हाट्सएप्प पर बसपा समर्थकों ने अपने नेता के आरोप को सही साबित करने के लिए जी-जान लगा दिया. इसके लिए वो तमाम तरह के तथ्य ढूंढ़ कर सामने लाएं. हालांकि विचारधारा और अम्बेडकरी मिशन के कारण बसपा को समर्थन देने वाला प्रबुद्ध वर्ग इस मुद्दे से ज्यादा संतुष्ट नहीं दिखा. वह आस लगाए बैठा था कि बाबासाहेब और मान्यवर कांशीराम के राजनैतिक मिशन का नेतृत्व कर रही बसपा प्रमुख मायावती इस कठिन वक्त में आत्मसमीक्षा की बात भी करेंगी और पार्टी के अंदर नारे और दूसरी पंक्ति के नेतृत्व के स्तर कुछ बदलाव होगा. क्योंकि वह ई.वी.एम के तर्क से खुद को बहुत ज्यादा जोर कर नहीं देख पाया. यह तबका ई.वी.एम गड़बड़ी की बात से इंकार नहीं कर रहा है, लेकिन उसका मानना था कि इससे इतर भी पार्टी के अंदर की तमाम खामियों पर भी बात होनी चाहिए.
हालांकि ई.वी.एम का तर्क कोई बहुत हल्का तर्क नहीं है. मायावती का आरोप है कि जो काम पहले कमजोर वर्ग को बूथ तक आने से रोककर दबंग करते थे, वही काम अब ई.वी.एम के जरिए तकनीकी षड्यंत्र रच कर किया जा रहा है. इस दावे को इसलिए भी खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि एक भी मुसलमान को टिकट न देने वाली और उनके प्रति अपनी घृणा को न छिपाने वाली भाजपा की पचास फीसदी से भी अधिक मुस्लिम वोटरों वाले धार्मिक रंगत के कस्बे देवबंद से जीत की कोई राजनीतिक व्याख्या कर पाना संभव नहीं है. कोई भी राजनीतिक विश्लेषक इस सीट पर भाजपा की जीत के मायने के कारण नहीं ढूंढ़ पा रहा है तो वहीं देवबंद की जनता भी हैरान-परेशान है.
मायावती के आरोपों की सच्चाई का पता तो तब चलेगा जब केंद्र की भाजपा सरकार जांच कराने को राजी होगी. लेकिन फिलहाल मायावती के लिए यह वक्त ऐसा है, जिसमें उनका नेतृत्व, उनकी पार्टी और दलित आंदोलन संकट में घिरा दिख रहा है. बसपा पर यह संकट बहुत दिनों से मंडरा रहा था लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद यह सतह पर आ गया, जब बसपा लोकसभा चुनाव में अपना खाता तक नहीं खोल पाई.
इस चुनाव में मायावती ने बड़ी तादाद में ऐसे नए धनपतियों को उम्मीदवार बनाया था जिनका न कोई राजनीतिक अतीत है, न ही उनका दलित-बहुजन आंदोलन से ही कोई लेना-देना है. जाहिर है कि बसपा की हार के बाद अब ये अपने फायदे वाली दूसरी पार्टियों का रुख करेंगे. बसपा के जमीनी समर्थकों और कार्यकर्ताओं के लिए परेशान करने वाली बात यह है कि पार्टी में मतलबपरस्त नेताओं की संख्या उन नेताओं से ज्यादा हो गई है, जिनका सरोकार बसपा, इसके जनक कांशीराम और अम्बेडकरी-बहुजन आंदोलन से था. जबकि इसके उलट कांशीराम के सहयोगी रहे दलित आंदोलन से प्रतिबद्धता वाले नेताओं की संख्या अब पार्टी में गिनी-चुनी रह गई है.
आज भी बसपा से दिल से जुड़े लोगों की परेशानी यह है कि एक ओर जहां बसपा वोटों का गठजोड़ कर चुनाव प्रबंधन करने वाली एक सत्तामुखी पार्टी में बदलती जा रही है, तो दूसरी तरफ उसका वोट आधार सिकुड़ता जा रहा है. पार्टी से जुड़े तमाम समर्थक इसकी वजह पार्टी के दो गैरदलित चेहरे और महासचिव सतीशचंद्र मिश्रा और नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मानते हैं. जमीनी स्तर पर इन दोनों नेताओं को पार्टी से बाहर करने की मांग बहुत दिनों से हो रही है. तमाम समर्थकों का मानना है कि इन दोनों के कारण पार्टी और बसपा प्रमुख मायावती की छवि लगातार खराब हुई है और गलत मैसेज जा रहा है. नसीमुद्दीन सिद्दीकी जहां पैसों के लेन-देन के आरोपों के कारण कठघरे में हैं तो वहीं ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा को कार्यकर्ता हर वक्त अपनी‘बहनजी’ के आस-पास देखना पसंद नहीं करते हैं. कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा यह भी है कि बसपा प्रमुख; मिश्रा से प्रभावित होकर बसपा की रणनीति बनाती हैं, जिससे अंततः पार्टी को नुकसान ही होता है.
पार्टी के अंदर से एक बड़ी मांग पार्टी को सर्वजन की विचारधारा से वापस बहुजन की ओर लाने की भी है. जेएनयू के प्रोफेसर और बसपा की राजनीति को करीब से देखने वाले डॉ. विवेक कुमार कहते हैं, “बसपा की यह हार अम्बेडकरवाद की हार है, क्योंकि हम इसी विचारधारा के माध्यम से लड़ रहे थे. पहले अम्बेडकरवाद को गांधीवाद ने हराया, फिर मान्यवर कांशीराम इसके लिए लड़ते रहे. अब मनुवाद ने इसे हरा दिया है. मिशन से जुड़े लोग इसे किसी व्यक्ति की हार से जोर कर नहीं देख रहे हैं. बल्कि वो विचारधारा की हार से व्यथित हैं.”
मायावती पिछले दो साल से चुनावी तैयारियों में लगी थीं और उन्होंने मुसलमान और दलितों का साथ लेकर सत्ता तक पहुँचने का इरादा जताया था. साथ ही ब्राह्मणों को भी साधने की कवायद में थी. तो क्या यह माना जाए कि बहनजी का सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला फ्लॉप हो गया है. या फिर ऐन वक्त पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन ने मुस्लिम वोटों में सेंधमारी कर दी. या फिर सर्वजन से अल्पसंख्यक के नारे को लोगों ने ठुकरा दिया.
अगर यह कहा जाए कि रणनीति के आधार पर भाजपा सफल रही तो भी गलत नहीं होगा. क्योंकि बसपा जिस तरह से मुसलमानों पर मेहरबान हुई और जिस तरह से कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का जोर भी मुस्लिम वोटों पर ही था, इसमें भाजपा ने बहुत सोच-समझ कर मुसलमानों को टिकट नहीं दिया और इस चुनाव को हिन्दू बनाम मुस्लिम बना दिया. इसी रणनीति की बदौलत भाजपा प्रचंड प्रदर्शन करते हुए 312 सीटें लाने में सफल रही है. भाजपा की इस जीत पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं, “बहुजन समाज के बुद्धीजीवी तो बदल सकते हैं, लेकिन नेता बदलने को तैयार नहीं है. बहुजन आंदोलन का नेता जब तक कांशीराम और कर्पूरी ठाकुर जैसा नहीं होगा तब तक उसका भला नहीं होगा. करप्ट बहुजन नेता बहुजनवाद को लेकर नहीं चल सकता क्योंकि वह हमेशा डर कर रहेगा. बहुजनों को संत चाहिए; जैसे कांशीराम थे.” भाजपा की प्रचंड जीत के कारणों पर उर्मिलेश कहते हैं कि उनके पास हिन्दू राष्ट्र का सपना है. वह उसे पूरा करने में जी-जान से जुटे हैं. साथ ही सवाल उठाते हैं कि बहुजनों के पास क्या सपना है.?
2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही बसपा का राजनीतिक ग्राफ़ ढलान पर है. इन चुनावों में उसके पास वापसी का आख़िरी मौका था, लेकिन मायावती चूक गईं. भारत में दलित राजनीति का इतिहास महाराष्ट्र, तमिलनाडु और अन्य राज्यों में रहा ज़रुर है लेकिन दलितों को सत्ता पहली बार यूपी में ही मिली. मायावती पहली दलित महिला नेता है जो दलितों के वोटों के कारण सत्ता में पहुंची. दलित राजनीति करने वाले नेताओं और दलितों के लिए अपनी राजनीति को पुनर्परिभाषित करने का यह आखिरी मौका है. वरना बहुजन समाज पार्टी को इतिहास में दर्ज होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. राजस्थान में सामने आई 50 बौद्ध गुफाएं
झालवाड़। भारत के कई हिस्सों में तथागत बुद्ध के अवशेष दबे हुए हैं. देश में ऐसे कई स्थान हैं जहां बौद्ध धम्म का काफी प्रभाव रहा है, लेकिन कालांतर में वह लुप्त होते गए या फिर लोगों की नजरों से दूर ही रहे. समय-समय पर ऐसे स्थलों की बात सामने आती रहती है. राजस्थान के झालावाड़ के पास ऐसा ही एक छुपा हुआ बौद्ध स्थल सामने आया है.
ये वह इलाका है, जहां आस-पास के इलाके में बौद्ध सभ्यता भी फलती-फूलती थी. ये गुफाएं करीब 2000 साल पुरानी हैं. यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित तो हैं, मगर दुनिया ही नहीं, राजस्थान के लोगों की नजरों से भी दूर हैं. कभी यहां ऐसी 50 गुफाएं थीं. समय के साथ अब मुश्किल से कुछ ही बची हैं. 50 गुफाओं में केवल एक चैत्यकक्ष है जिसके अंदर ध्यानमग्न बुद्ध की प्रतिमा स्थित है. इन गुफाओं के अलावा कोल्वी गांव से 5 किमी दूर बिनायगा में करीब 20 और इसके पास ही चिरायका में करीब 15 ऐसी गुफाएं हैं. यह स्थल झालावाड़ से 96 किलोमीटर की दूरी पर राजस्थान मध्य प्रदेश की सीमा पर है. डॉ. अम्बेडकर की टूटी ऊंगली का राज
झूठ नहीं लिखूंगा.. भले ही सच लिखने में रिस्क हो। कभी कहीं पढ़ा था कि सच लिखने की सबसे अच्छी बात यही है कि उसे याद नहीं रखना पड़ता और याद्दाश्त मेरी बहुत कमज़ोर है। एक दौर ऐसा भी था कि मैं शरीर और दिमाग दोनों से ही बच्चा था (दिमाग से तो आज भी हूं)। खैर, उन दिनों गरमी की छुट्टियों में ननिहाल जाता था। वहां आम, क्रिकेट और ट्यूबवैल में नहाना मेरे लिए परम आकर्षण थे। हमारी अपनी ट्यूबवैल में नहाने के लिए गांव से बाहर निकलना पड़ता था। वहीं रास्ते में सड़क किनारे एकदम ही सुनसान में एक आदमी की छोटी सी खंडित मूर्ति खड़ी देखी थी। पहले पहल तो नहाने के उत्साह में उसे लेकर कोई फिक्र नहीं हुई मगर बालमन कब तक ना पूछता। आखिर एक दिन विचार आया कि रात को जब अंधेरा होता होगा तो इस मूर्ति को यहां अकेले में डर नहीं लगता होगा (हंसिए मत, बचपन में मैं मान कर चलता था कि हर चीज़ जो दिख रही है सबमें जान है.. वक्त के साथ ये भरोसा मज़बूत ही हो रहा है!! फिर एक दिन अपने ममेरे भाई से पूछा कि ये किसकी मूर्ति है और इसके टूटे हाथ को जुड़वाते क्यों नहीं हो? वो हंसने लगा। बोला- हरिजनों का भगवान है।
शब्द अब ठीक से याद नहीं लेकिन यही कहा होगा। मैं चौंका हूंगा और खुद से ही बोला भी होगा- गज़ब………. कोट-पैंट वाला भगवान!!
फिर उसने ही धीमे से कहा- इसका हाथ तो पिताजी ने ही तोड़ा था। (हम नाना जी को पिता जी कहते थे)
मैंने ज़्यादा कुछ नहीं पूछा लेकिन खुद ही मान लिया कि चूंकि हमारे घर और हरिजनों की बस्ती दूर है, और क्योंकि हम लोगों का आपस में लेनादेना सिर्फ इतना है कि वो हमारे गाय-भैंसों का गोबर उठाकर ले जाते हैं तो ज़रूर अपने बीच कोई कंपटीशन टाइप है। बताने की ज़रूरत नहीं कि वो मूर्ति अंबेडकर की थी और मेरा ममेरा भाई डींग हांक कर जताना चाह रहा था कि दलित बहुल गांव में भी दलितों का भगवान हमारे मरज़ी के बिना साबुत नहीं खड़ा हो सकता। इसके बाद मैंने कई और गांव में हाथ टूटे हुए अंबेडकर देखे। धीरे-धीरे मेरे लिए नज़रअंदाज़ करना ज़रा मुश्किल होने लगा । एक सूटेड बूटेड आदमी हाथ में किताब लिए खड़ा है और लगभग हर गांव में उसका हाथ टूटा हुआ है.. आखिर माज़रा क्या है ? जिनका भगवान है वो हाथ क्यों नहीं जुड़वा रहे…. जब किसी से पूछा तो उसने कहा कि दिन में हाथ जुड़ता है तो अगली सुबह टूटा ही मिलता है.. कब तक जुड़वाएंगे…
समस्या वाकई गंभीर थी.. एक बच्चे के लिए तो और भी गंभीर। आखिर इस भगवान के हाथ में तो हथियार भी नहीं। गोल मटोल प्यारा सा दिखता है। कोट-पैंट-टाई के साथ किताब हाथ में लिए खड़ा है। खतरा जैसा तो कुछ महसूस होता नहीं फिर वो लोग जिनके घरों में सबसे ज़्यादा हथियार हैं इससे डरे हुए क्यों हैं। अब ठीक से याद नहीं लेकिन पापा से या किसी बड़े से पूछा था- ये किताब क्या है जो हाथ में लिए खड़े हैं ?
जवाब मिला- संविधान।
मैंने पूछा- वो क्या है ?
बोले- देश उससे ही चल रहा है।। नियम हैं।
मैंने फिर पूछा- हां तो ये क्यों लिए खड़े हैं।
उन्होंने कहा- इन्होंने बनाया था।
मैं रुका नहीं- इन्होंने ही सारे नियम बनाए हैं ?
उन्होंने सोचा, गलती हो गई, बोले- हां, बहुत सारे लोग थे लेकिन लास्ट में इन्होंने ही लिखा था। बहुत पढ़े-लिखे थे ना।
अब तो समस्या और गंभीर हो चली थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि जो इन्हें अपना भगवान मानते हैं ना तो उनके पास इन जैसे कपड़े हैं और ना ही पढ़े-लिखे दिखते हैं। दूसरी तरफ ये हमारे भगवान नहीं लेकिन कोट-पैंट और किताब तो हमारे ही हिस्से में हैं.. आखिर ये पहेली क्या है ? भक्त भगवान जैसा नहीं.. और दुश्मन भगवान जैसे ही हैं! ऐसा पहली बार हुआ और एक दलित जज ने किया
कोलकात्ता। कोलकात्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के सात वरिष्ठ जजों को एससी-एसटी एक्ट के तहत अपने अपमान का दोषी करार दिया है. इसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं. यह कार्रवाई उन्होंने अपने उत्पीड़न का आरोप लगाकर स्वत: संज्ञान लेते हुए की है. जस्टिस कर्णन ने सजा सुनाने की तारीख 28 अप्रैल मुकर्रर करते हुए सभी सात जजों को उस दिन हाजिर होने का आदेश सुनाया है. देश के न्यायिक इतिहास में यह पहला मौका है जब हाईकोर्ट के किसी जज ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश समेत सात जजों को ही दोषी करार दे दिया है.
जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर, दीपक मिश्रा, जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर, पिनाकी चंद्र घोष और कुरियन जोसेफ के खिलाफ 13 अप्रैल को एक आदेश पारित किया है. इसमें उन्होंने कहा कि इन सभी ने मिलकर खुली अदालत में उनका अपमान किया है. इसलिए इन सभी को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के तहत दोषी करार दिया जाता है. उन्होंने इन सातों जजों को देश से बाहर न जाने का आदेश सुनाते हुए सबको 15 दिनों के भीतर अपने पासपोर्ट दिल्ली पुलिस के पास जमा कराने का भी फैसला सुनाया. इतना ही नहीं, जस्टिस कर्णन ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के ये सातों जज उनके फैसले के खिलाफ देश की किसी भी अदालत में अपील नहीं कर सकते. हालांकि उन्होंने इन जजों को इन फैसलों को संसद में चुनौती देने की छूट दे दी है.
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के खिलाफ न्यायपालिका की अवमानना करने का मामला शुरू करने का फैसला लेते हुए उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी किया था. शीर्ष अदालत ने इसके लिए सात वरिष्ठ जजों की एक खंडपीठ गठित की है. जस्टिस कर्णन ने इस कदम को असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट पर आरोप लगाया कि दलित होने के चलते वरिष्ठ जजों द्वारा उनका उत्पीड़न किया जा रहा है. हालांकि जस्टिस कर्णन बीते 31 मार्च को इस खंडपीठ के सामने पेश हुए थे.
गौरतलब है कि यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब जस्टिस कर्णन ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जज भ्रष्टाचार में लिप्त हैं इसलिए उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच कराई जाए. उन्होंने कोर्ट के बजाय संसद से ऐसी जांच करने की मांग सरकार के समक्ष रखी थी. सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के इन आरोपों की जांच कराने की बजाय उनके खिलाफ अवमानना का मामला चलाने का फैसला लिया. केंद्र सरकार की ओर से अटॉनी जनरल ने भी उनके खिलाफ मामला चलाने की वकालत की थी. इतिहासः संसद के सेंट्रल हॉल में बाबासाहेब की तस्वीर पर खूब विरोध हुआ था
एक किस्सा सुनाता हूं, जो पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह सुनाते थे। अपने राज में जब उन्होंने संसद के सेंट्रल हॉल में संविधान निर्माता डॉक्टर अंबेडकर की तस्वीर लगानी चाही तो विरोध शुरु हो गया। ये दलील दी गई कि दीवार पर जगह नहीं है। वीपी सिंह का जवाब था कि दिल में जगह बनाओ तो दीवार में भी जगह बन जाएगी। वीपी के दिल में अंबेडकर के लिए जगह थी तो उन्होंने दीवार में भी जगह बना दी और आजादी के 43 साल बाद संसद के सेंट्रल हॉल में अंबेडकर की तस्वीर लगी। उन्हें भारत रत्न भी तभी मिला।
आज जो लोग अंबेडकर के नाम की दुहाई दे रहे हैं, जिनकी जुबान पर अंबेडकर का नाम रहता है, क्या उनके दिल में भी अंबेडकर हैं? अगर होते तो ऊना में दलितों की खाल नहीं उधेड़ दी जाती। कोई रोहित वेमुला आत्महत्या करने को विवश नहीं होता और दलितों के आरक्षण पर ही सवाल नहीं उठाया जाता, जैसा हो रहा है।
आज अंबेडकर की दीक्षा भूमि हिंदुत्व का गौरव केंद्र बन गया है, जबकि ये हम सब हिंदुओं के लिए लज्जा की बात होनी चाहिए थी कि जिसने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी, जिसने देश का संविधान बनाया, जिसने आधुनिक भारत को एक सभ्य कायदे कानून की पवित्र पुस्तक दी, वो बाबा साहेब अंबेडकर जीवन के 65वें साल में, अपनी मृत्यु से 7 महीने पहले अगर अपमान, अवज्ञा और अनादर में हिन्दू धर्म छोड़ने को मजबूर हो तो हमें बार बार अपने अंदर झांकने की जरूरत है कि कमी कहां रह गई। वो कमी आज भी है, लेकिन हमारे भाषणवीर सिर्फ बोलते हैं, कुछ करने का इरादा नहीं दिखता। अंबेडकर राजनीति के शोरूम में सजा कर रख दिए गए हैं एक दलित नेता के रूप में। अछूत अम्बेडकर कल ”पवित्र” हो जायेंगे
जयपुर में आज 13 अप्रैल 2017 को अम्बेडकर के नाम पर ””भक्ति संध्या”” होगी. दो केंद्रीय मंत्री इस अम्बेडकर विरोधी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे. अम्बेडकर जैसा तर्कवादी और भक्तिभाव जैसी मूर्खता! इससे ज्यादा बेहूदा क्या बात होगी?
भीलवाड़ा में बाबा साहब की जीवन भर विरोधी रही कांग्रेस पार्टी का एस.सी. डिपार्टमेंट दूसरी मूर्खता करेगा. 126 किलो दूध से बाबा साहेब की प्रतिमा का अभिषेक किया जायेगा. अभिषेक होगा तो पंडित भी आएंगे, मंत्रोच्चार होगा, गाय के गोबर, दूध, दही, मूत्र आदि का पंचामृत भी अभिषेक में काम में लिया ही जायेगा. अछूत अम्बेडकर कल भीलवाड़ा में पवित्र हो जायेंगे!
तीसरी वाहियात हरकत रायपुर में होगी 5100 कलश की यात्रा निकाली जाएगी. जिस औरत को अधिकार दिलाने के लिए बाबा साहब ने मंत्री पद खोया, उस औरत के सर पर कलश, घर घर से एक एक नारियल लाया जाएगा. कलश का पानी और नारियल आंबेडकर की प्रतिमा पर चढ़ाये जायेंगे. हेलिकॉप्टर से फूल बरसाए जायेंगे. जिस अम्बेडकर के समाज को आज भी नरेगा, आंगनवाड़ी और मिड डे मील का मटका छूने की आज़ादी नहीं है, उनके नाम पर कलश यात्रा! बेहद दुखद! निंदनीय!
एक और जगह से बाबा साहब की जयंती की पूर्व संध्या पर भजन सत्संग किये जाने की खबर आयी है. एक शहर में लड्डुओं का भोग ‘भगवान आंबेडकर’ को लगाया जायेगा. बाबा साहेब के अनुयायी जातियों के महाकुम्भ कर रहे है, सामुहिक भोज कर रहे है, जिनके कार्डों पर गणेशाय नमः और जय भीम साथ साथ शोभायमान है. भक्तिकालीन अम्बेडकरवादियों के ललाट पर उन्नत किस्म के तिलक आप हरेक जगह देख सकते है. जय भीम के साथ जय श्री राम बोलने वाले मौसमी मेढकों की तो बहार ही आयी हुयी है.
बड़े-बड़े अम्बेडकरवादी हाथों में तरह तरह की अंगूठियां फसाये हुए है, गले में पितर भैरू देवत भोमियाजी लटके पड़े है और हाथ कलवों के जलवों से गुलज़ार है, फिर भी ये सब अम्बेडकरवादी है. राजस्थान में बाबा साहेब की मूर्तियां दलित विरोधी बाबा रामदेव से चंदा ले के कर डोनेट की जा रही है. इन मूर्तियों को देख़ कर ही उबकाई आती है. कहीं डॉ आंबेडकर को किसी मारवाड़ी लाला की शक्ल दे दी गयी है, कहीं हाथ नीचे लटका हुआ है तो कहीं अंगुली \”सबका मालिक एक है \” की भाव भंगिमा लिए हुए है. ये बाबा साहेब है या साई बाबा ? मत लगाओ मूर्ति अगर पैसा नहीं है या समझ नही है तो.
बाबा साहेब की मूर्तियां बन रही है, लग रही है, जल्दी ही मंदिर बन जायेंगे, पूजा होगी, घंटे घड़ियाल बजेंगे, भक्तिभाव से अम्बेडकर के भजन गाये जायेंगे. भीम चालीसा रच दी गयी है, जपते रहियेगा. गुलामी का नया दौर शुरू हो चुका है. जिन जिन चीजों के बाबा साहब सख्त खिलाफ थे, वो सारे पाखण्ड किये जा रहे हैं. बाबा साहेब को अवतार कहा जा रहा है. भगवान बताया जा रहा है. यहाँ तक कि उन्हें ब्रह्मा विष्णु महेश कहा जा रहा है.
हम सब जानते है कि डॉ. अम्बेडकर गौरी, गणपति, राम कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, भय, भाग्य, भगवान् तथा आत्मा व परमात्मा जैसी चीजों के सख्त खिलाफ थे. वे व्यक्ति पूजा और भक्ति भाव के विरोधी थे. उन्होंने इन कथित महात्माओं का भी विरोध किया, उन्होंने कहा इन महात्माओं ने अछूतों की धूल ही उड़ाई है. पर आज हम क्या कर रहे हैं बाबा साहेब के नाम पर? जो कर रहे हैं वह बेहद शर्मनाक है, इससे डॉ. अम्बेडकर और हमारे महापुरुषों एवम महास्त्रियों का कारवां हजार साल पीछे चला जायेगा. इसे रोकिये.
बाबा साहेब का केवल गुणगान और मूर्तिपूजा मत कीजिये. उनके विचारों को दरकिनार करके उन्हें भगवान मत बनाइये. बाबा साहेब की हत्या मत कीजिये. आप गुलाम रहना चाहते है, बेशक रहिये, भारत का संविधान आपको यह आज़ादी देता है, पर डॉ अम्बेडकर को प्रदूषित मत कीजिये. आपका रास्ता लोकतंत्र और संविधान को खा जायेगा. फिर भेदभाव हो, जूते पड़े, आपकी महिलाएं बेइज्जत की जाये और आरक्षण खत्म हो जाये तो किसी को दोष मत दीजिये.
इन बेहूदा मूर्तियों और अपने वाहियात अम्बेडकरवाद के समक्ष सर फोड़ते रहिये. रोते रहिये और हज़ारों साल की गुलामी के रास्ते पर जाने के लिए अपनी नस्लों को धकेल दीजिये. गुलामों से इसके अलावा कोई और अपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती है. जो बाबा साहेब के सच्चे मिशनरी साथी है और इस साजिश और संभावित खतरे को समझते हैं, वो बाबा साहेब के दैवीकरण और ब्राह्मणीकरण का पुरजोर विरोध करें. मनुवाद के इस स्वरुप का खुल कर विरोध करे. अम्बेडकरवाद में भक्तिभाव के लिए कोई जगह नहीं है.
-स्वतंत्र पत्रकार एवम सामाजिक कार्यकर्ता मैंने बाबासाहेब के मूवमेंट को समझा और कूद पड़ा- कांशीराम
मैंने गौर करना शुरू किया कि बाबा साहेब का मूवमेन्ट क्या था। 1920-22 से लेकर 1956 तक के मूवमेन्ट का मैंने अध्ययन करना शुरू किया। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि बाबा साहेब अम्बेडकर का मूवमेन्ट वही था, जो 1892 से लेकर 1922 तक छत्रपति शाहू जी महाराज का मूवमेन्ट था। छत्रपति शाहू जी महाराज ने जो मूवमेन्ट चलाई, ब्राह्मणवाद/मनुवाद का विरोध किया, ब्राह्मणवाद से लोहा लिया, वही बाबा साहेब अम्बेडकर ने किया। छत्रपति शाहू जी महाराज ने भी वही किया जो 1848 से लेकर 1891 तक महात्मा फुले ने किया। अपने-अपने समय में जो महात्मा फुले ने किया, शाहू जी महाराज ने किया और वही अपने समय में बाबा साहेब अम्बेडकर ने किया।
महाराष्ट्र के ये तीन महापुरूषों की मूवमेन्ट 1848 से शुरू हुई और 1956 तक 108 साल लंबा अटूट संघर्ष हुआ, जिसमें कभी कोई तोड़-फोड़ नहीं हुई। ये जो 108 साल का लम्बा अटूट संघर्ष हुआ, उसके बारे में मैं महाराष्ट्र के बारे में सोच रहा था कि उसका रिजल्ट क्या निकला। सबसे बड़ा रिजल्ट (परिणाम) निकला कि जो महात्मा फुले ने अपना कुआँ अछूत लोगों के लिए 1866 में खोला था, जिसकी शुरूआत 1866 में महात्मा फुले ने की थी। वह 20वीं सदी के अन्त होने से पहले गंगाराम काम्बले का होटल खोलकर छत्रपति शाहू जी महाराज ने छुआछूत का अंत करने की कोशिश की थी। उसके बाद वही छुआछूत का अंत करने के लिए 1956 तक बाबा साहेब अम्बेडकर ने कोशिश की। ये सब कोशिश एक ही है। ये मूवमेन्ट एक ही है। भाजपा के अम्बेडकर प्रेम का सच
उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से चुनाव जीतने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को यह अहसास हुआ है कि इस चुनाव में उसे सबसे अधिक आरक्षित सीटें मिली हैं क्योंकि दलितों का एक बड़ा हिस्सा उसकी तरफ आ गया है. इस सफलता में उसके द्वारा पिछले कुछ वर्षों से अम्बेडकर के प्रति दिखाए गए प्रेम का भी काफी बड़ा हाथ है. दलितों को आकर्षित करने के लिए उसने दलित नेताओं को भाजपा में शामिल करने के साथ-साथ अम्बेडकर को भी हथियाने के गंभीर प्रयास किये हैं. एक तरफ जहाँ उसने इंग्लॅण्ड में डॉ. अम्बेडकर के पढ़ाई के दौरान रहने वाले मकान को खरीद कर स्मारक का रूप दिया है वहीं दूसरी तरफ बम्बई में उनके रहने के स्थान पर एक भव्य स्मारक बनाने हेतु भूमि का अधिग्रहण भी किया है. पिछले साल मोदीजी ने दिल्ली में बाबासाहेब के निवास स्थान पर एक भव्य स्मारक बनाने का शिलान्यास भी किया था.
आगामी 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती के अवसर पर भाजपा ने बाबासाहेब अम्बेडकर को हथियाने के प्रयास में पूर्व की अपेक्षा इसे बहुत बड़े स्तर पर मनाने की घोषणा की है. इसके अनुसार उस दिन बाबासाहेब के चित्र पर माल्यार्पण एवं उनका स्तुति गान करने के साथ-साथ प्रत्येक मंडल स्तर पर बृहद समुदायक सहभोज का आयोजन भी किया गया है जिसमें भाजपा के सभी नेता अधिक से अधिक संख्या में भाग लेंगे. इसके बाद वे दलितों की सेवा बस्तियों में जायेंगे और उनके साथ अपनी एकता प्रदर्शित करेंगे.
आरएसएस और भाजपा द्वारा अधिक से अधिक दलितों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जो कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं या डॉ. अम्बेडकर को हथियाने के लिए जो आयोजन किये जा रहे हैं क्या उनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि वह वास्तव में वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को समाप्त करके समतामूलक समाज की स्थापना के पक्षधर बन गए हैं. इसके साथ ही क्या यह कहा जा सकता है कि आरएसएस या भाजपा (पूर्व जनसंघ) जिसने डॉ. अम्बेडकर का उनके जीते जी इतना कड़ा विरोध किया था का हृदय परिवर्तन हो गया है और उन्होंने उन्हें पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है. इसके साथ ही वे डॉ. अम्बेडकर के हिन्दू राष्ट्र के प्रबल समर्थक और कट्टर मुस्लिम विरोधी होने की बात को भी जोर शोर से प्रचारित करते रहे हैं. अतः इस विषय का गहन विश्लेषण करने की ज़रुरत है.
अपने प्रसिद्ध लेख “राज्य और क्रांति” में लेनिन ने कहा है, “मार्क्स की शिक्षा के साथ आज वही हो रहा है, जो उत्पीड़ित वर्गों के मुक्ति-संघर्ष में उनके नेताओं और क्रन्तिकारी विचारकों की शिक्षाओं के साथ इतिहास में अक्सर हुआ है. उत्पीड़क वर्गों ने महान क्रांतिकारियों को उनके जीवन भर लगातार यातनाएं दीं, उनकी शिक्षा का अधिक से अधिक बर्बर द्वेष, अधिक से अधिक क्रोधोन्मत घृणा तथा झूठ बोलने और बदनाम करने की अधिक से अधिक अंधाधुंध मुहिम द्वारा स्वागत किया. लेकिन उन की मौत के बाद उनकी क्रन्तिकारी शिक्षा को सारहीन करके, उसकी क्रन्तिकारी धार को कुंद करके, उसे भ्रष्ट करके उत्पीड़ित वर्गों को “बहलाने” तथा धोखा देने के लिए उन्हें अहानिकर देव-प्रतिमाओं का रूप देने, या यूँ कहें, उन्हें देवत्व प्रदान करने और उनके नामों को निश्चित गौरव प्रदान करने के प्रयत्न किये जाते हैं.” क्या आज अम्बेडकर के साथ भी यही नहीं किया जा रहा है?
पिछले वर्ष हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अम्बेडकर राष्ट्रीय मेमोरियल के शिलान्यास के अवसर पर डॉ. अम्बेडकर मेमोरियल लेक्चर दिया था जिस में उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के कृत्यों की प्रशंसा करते हुए अपने आप को अम्बेडकर भक्त घोषित किया था. उनकी यह घोषणा भाजपा की हिंदुत्व की भक्ति के अनुरूप ही है क्योंकि भक्ति में आराध्य का केवल गुणगान करके काम चल जाता है और उस की शिक्षाओं पर आचरण करने की कोई ज़रुरत नहीं होती. तब मोदी जी ने भी डॉ. अम्बेडकर का केवल गुणगान किया था जबकि उन की शिक्षाओं पर आचरण करने से उन्हें कोई मतलब नहीं है. यह गुणगान भी लेनिन द्वारा उपर्युक्त रणनीति के अंतर्गत किया जा रहा है. कौन नहीं जानता कि भाजपा की हिन्दुत्ववादी विचारधारा और अम्बेडकर की समतावादी विचारधारा में छत्तीस का आंकड़ा है. आइये इस के कुछ पहलुओं का विवेचन करें-
अपने भाषण में मोदी जी ने कहा था- कि डॉ. अम्बेडकर ने जाति के विरुद्ध लडाई लड़ी थी परन्तु कौन नहीं जानता कि भाजपा का जाति और वर्ण व्यवस्था के बारे में क्या नजरिया है. डॉ. अम्बेडकर ने तो कहा था कि जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य है परन्तु भाजपा और उसकी जननी आरएसएस तो समरसता (यथास्थिति) के नाम पर जाति और वर्ण की संरक्षक है. मोदी जी का जीभ कटने पर दांत न तोड़ने का दृष्टान्त भी इसी समरसता अर्थात यथास्थिति का ही प्रतीक है.
मोदी जी ने अपने भाषण में बाबा साहेब की मजदूर वर्ग के संरक्षण के लिए श्रम कानून बनाने के लिए प्रशंसा की थी. परन्तु मोदी जी तो मेक-इन-इंडिया के नाम पर सारे श्रम कानूनों को समाप्त करने पर तुले हुए हैं. जिन जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकारें हैं वहां पर श्रम कानून समाप्त कर दिए गए हैं. पूरे देश में सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र में नियमित मजदूरों की जगह ठेकेदारी प्रथा लागू कर दी गयी है जिस से मजदूरों का भयंकर शोषण हो रहा है. बाबा साहेब तो मजदूरों की राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी के प्रबल पक्षधर थे. यह भी सर्वविदित है कि वर्तमान में मजदूरों के कल्याण सम्बन्धी जितने भी कानून हैं वे अधिकतर डॉ. अम्बेडकर द्वारा ही बनाये गए थे जिन्हें वर्तमान सरकार एक एक करके समाप्त कर रही है या कमज़ोर बना रही है.
बाबा साहेब के बहुचर्चित “शिक्षित करो, संघर्ष करो और संगठित करो” के नारे को बिगाड़ कर “शिक्षित हो, संगठित हो और संघर्ष करो” के रूप में प्रस्तुत करते हुए मोदी जी ने कहा था कि बाबा साहेब शिक्षा को बहुत महत्व देते थे और उन्होंने शिक्षित हो कर संगठित होने के लिए कहा था ताकि संघर्ष की ज़रुरत ही न पड़े. इस में भी मोदी जी का समरसता का फार्मूला ही दिखाई देता है जबकि बाबा साहेब ने तो शिक्षित हो कर संघर्ष के माध्यम से संगठित होने का सूत्र दिया था. बाबा साहेब तो समान, अनिवार्य और सार्वभौमिक शिक्षा के पैरोकार थे. इस के विपरीत वर्तमान सरकार शिक्षा के निजीकरण की पक्षधर है और शिक्षा के लिए बजट में निरंतर कटौती करके गुणवत्ता वाली शिक्षा को आम लोगों की पहुँच से बाहर कर रही है.
अपने भाषण में आरक्षण को खरोच भी न आने देने की बात पर मोदी जी ने बहुत बल दिया था. परन्तु उन्होंने वर्तमान में आरक्षण पर सब से बड़े संकट पदोन्नति में आरक्षण सम्बन्धी संविधान संशोधन का कोई उल्लेख नहीं किया था. इसके साथ ही दलितों की निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में आरक्षण की मांग को बिलकुल नज़रंदाज़ कर दिया जाता रहा है. उन्होंने यह भी नहीं बताया कि निजीकरण के कारण आरक्षण के निरंतर घट रहे दायरे के परिपेक्ष्य में दलितों को रोज़गार कैसे मिलेगा. इसके अतिरिक्त आरएसएस के अलग अलग पदाधिकारी आरक्षण की समीक्षा तथा इसका आर्थिक आधार बनाये जाने की मांग करते रहे हैं.
मोदी जी ने इस बात को भी बहुत जोर शोर से कहा था कि डॉ अम्बेडकर औद्योगीकरण के पक्षधर थे परन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि वे निजी या सरकारी किस औद्योगीकरण के पक्षधर थे. यह बात भी सही है कि भारत के औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण में जितना योगदान डॉ. अम्बेडकर का है उतना शायद ही किसी और का हो. उन्होंने यह महान कार्य 1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारिणी समिति के श्रम सदस्य के रूप में किया था परन्तु इसके लिए उन्हें कोई भी श्रेय नहीं दिया गया.. डॉ. अम्बेडकर ने ही उद्योगों के लिए सस्ती बिजली, बाढ़ नियंत्रण और कृषि सिचाई के लिए ओडिसा में दामोदर घाटी परियोजना बनाई थी. बाद में इसके अनुसरण में ही देश में बहुउद्देशीय हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स बने थे. इस के लिए उन्होंने ही सेंट्रल वाटर एंड पावर कमीशन तथा सेंट्रल वाटरवेज़ एंड नेवीगेशन कमीशन की स्थापना की थी. हमारा वर्तमान पावर सप्लाई सिस्टम भी उनकी ही देन है.
यह सर्वविदित है कि बाबासाहेब राजकीय समाजवाद के प्रबल समर्थक थे जब कि मोदी जी तो निजी क्षेत्र और न्यूनतम गवर्नेंस के सब से बड़े पैरोकार हैं. बाबासाहेब तो पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद को दलितों के सब से बड़े दुश्मन मानते थे. मोदी जी का निजीकरण और भूमंडलीकरण बाबासाहेब की समाजवादी अर्थव्यवस्था की विचारधारा के बिलकुल विपरीत है.
मोदी जी ने डॉ. अम्बेडकर की एक प्रख्यात अर्थशास्त्री के रूप में जो प्रशंसा की थी वह तो ठीक है. परन्तु बाबासाहेब का आर्थिक चिंतन तो समाजवादी और कल्याणकारी अर्थव्यस्था का था जिस के लिए नोबेल पुरूस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने उन्हें अपने अर्थशास्त्र का पितामह कहा है. इसके विपरीत मोदी जी का आर्थिक चिंतन और नीतियाँ पूंजीवादी और कार्पोरेट परस्त हैं.
अपने भाषण में मोदी जी ने कहा था कि डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल को लेकर महिलायों के हक़ में अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. यह बात तो बिलकुल सही है कि भारत के इतिहास में डॉ. अम्बेडकर ही एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने दलित मुक्ति के साथ साथ हिन्दू नारी की मुक्ति को भी अपना जीवन लक्ष्य बनाया था और उन के बलिदान से भारतीय नारी को वर्तमान कानूनी अधिकार मिल सके हैं. बाबासाहेब ने तो कहा था कि मैं किसी समाज की प्रगति का आंकलन उस समाज की महिलायों की प्रगति से करता हूँ. इस के विपरीत भाजपा सरकार की मार्ग दर्शक आरएसएस तो महिलायों को मनुस्मृति वाली व्यवस्था में रखने की पक्षधर है.
मोदी जी ने डॉ. अम्बेडकर का लन्दन वाला घर खरीदने, बम्बई में स्मारक बनाने और दिल्ली में अम्बेडकर स्मारक बनाने का श्रेय भी अपनी पार्टी को दिया था. वैसे तो मायावती ने भी स्मारकों और प्रतीकों की राजनीति की है. भाजपा की स्मारकों की राजनीति उसी राजनीति की पूरक है. शायद मोदी जी यह जानते होंगे कि बाबा साहेब तो अपने आप को बुत पूजक नहीं बुत तोड़क कहते थे और वे व्यक्ति पूजा के घोर विरोधी थे. बाबा साहेब तो पुस्तकालयों, विद्यालयों और छात्रावासों की स्थापना के पक्षधर थे. वे राजनीति में किसी व्यक्ति की भक्ति के घोर विरोधी थे और इसे सार्वजनिक जीवन की सब से बड़ी गिरावट मानते थे. परन्तु भाजपा में तो मोदी जी को एक ईश्वरीय देन मान कर पूजा जा रहा है.
अपने भाषण में मोदी जी ने दलित उद्यमियों को प्रोत्साहन देने का श्रेय भी लिया था. मोदी जी जानते होंगे कि इससे कुछ दलितों के पूंजीपति या उद्योगपति बन जाने से इतनी बड़ी दलित जनसंख्या का कोई कल्याण होने वाला नहीं है. दलितों के अंदर कुछ उद्यमी तो पहले से ही रहे हैं. दलितों का कल्याण तो तभी होगा जब सरकारी नीतियां जनपक्षीय होंगी न कि कार्पोरेटपरस्त. दलितों की बहुसंख्या आबादी भूमिहीन तथा रोज़गारविहीन है जो उनकी सब से बड़ी कमजोरी है. अतः दलितों के सशक्तिकरण के लिए भूमि-आवंटन और रोज़गार गारंटी ज़रूरी है जो कि मोदी सरकार के एजेंडे में नहीं है.
उपरोक्त संक्षिप्त विवेचन से स्पष्ट है कि अपने भाषण में मोदी जी द्वारा डॉ. अम्बेडकर का किया गया गुणगान उन्हें केवल राजनीति के लिए हथियाने का प्रयास मात्र है. उन्हें डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा अथवा शिक्षाओं से कुछ भी लेना देना नहीं है. सच तो यह है कि भाजपा और उसकी मार्ग दर्शक आरएसएस की नीतियाँ तथा विचारधारा डॉ. अम्बेडकर की समतावादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक विचारधारा के बिलकुल विपरीत है. वास्तविकता यह है कि भाजपा सहित अन्य राजनैतिक पार्टियाँ भी डॉ. अम्बेडकर को हथिया कर दलित वोट प्राप्त करने की दौड़ में लगी हुयी हैं जब कि किसी भी पार्टी का दलित उत्थान का एजेंडा नहीं है. अब यह दलितों को देखना है कि क्या वे इन पार्टियों के दलित प्रेम के झांसे में आते हैं या डॉ. अम्बेडकर से सही प्रेरणा लेकर अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाते हैं.
– लेखक राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट देश का किसान संसद के सामने नंगा हो गया, मीडिया पीएम का मेट्रो सफरनामा दिखाता रहा
जब लिख रहा हूं घटना उससे एक दिन पहले यानि बीते कल सोमवार की है. जंतर-मंतर पर पिछले 28 दिनों से धरना दे रहे तमिलनाडु के किसानों का धैर्य सरकारी धोखाधड़ी देखकर जवाब दे गया. पुलिस इन्हें पीएम से मिलवाने के लिए साउथ ब्लॉक ले आई. कहा गया कि पीएम से इनकी मुलाकात करवाई जाएगी. लेकिन पीएम को वक्त नहीं था. वह तो आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री को मेट्रो पर बिठाकर अक्षरधाम घुमाने ले गए थे. नतीजा, घर बार छोड़कर इंसाफ की आस में दिल्ली में बैठे किसानों की सब्र का बांध टूट गया.
प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात नहीं हो पाने से निराश किसानों ने साउथ ब्लॉक स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के बाहर सड़क पर ही नग्न होकर विरोध प्रदर्शन किया. किसान कर्ज माफी के साथ कावेरी नदी जल विवाद का स्थायी समाधान निकालने और फसलों की उचित मूल्य देने की मांग कर रहे थे.
लेकिन उन्हें क्या पता था कि देश का पीएम बहुत व्यस्त है. उसे दिन में कई बार मौके विशेष पर कपड़े बदलने होते हैं. कुछ सेल्फी लेनी होती है और फिर दिल्ली में एमडीसी का चुनाव भी तो है. तामिलनाडु के किसान तो उन्हें वोट दिलवाते नहीं, सो वह आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री को मेट्रों में घुमाने के बहाने बिना कहे दिल्ली एमसीडी के चुनाव में भी उतर गए. असल में देश का प्रधानमंत्री सीधे एमसीडी का चुनाव प्रचार करता तो पार्टी और उसकी बदनामी होती, सो उसने एक आसान और चालाक तरीका निकाला. और देखिए, उसके अगले दिन ही आखिरकार यह खबर आ ही गई कि भाजपा के नेता एमसीडी चुनाव के लिए मेट्रों में वोट मांगेंगे.
भारत का मीडिया भी गजब चीज है. अव्वल दर्जे का बेशर्म. जब देश के मजबूर किसान संसद के सामने नंगे होकर नाच रहे थे, वह मोदीजी का मेट्रो सफरनामा दिखा रहा था. वह ये बता रहा था कि आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने मोदीजी के साथ कितनी सेल्फी ली, मोदीजी ने ट्विटर पर क्या लिखा, ऑस्ट्रेलियाई पीएम ने भारतीय पीएम के साथ फोटो पोस्ट करते हुए क्या लिखा. शानदार पत्रकारिता का शानदार नमूना. शायद भारत की मीडिया के लिए उन किसानों की व्यथा से ज्यादा जरूरी भाजपाई पीएम और सीएम को दिखाना है. आज भारत के मीडिया समूह तो बस दिल्ली और यूपी तक सिमट कर रह गए हैं. गोया भारत में दिल्ली और उत्तर प्रदेश के अलावा कोई अन्य राज्य ही ना हो. हे मीडिया के महानुभावों भारत में 29 राज्य और 7 केंद्रशासित प्रदेश हैं. सब पर ध्यान दीजिए. सभी राज्यों की समस्याओं पर ध्यान दीजिए. 
