संवैधानिक मूल्यों के प्रति कितने सजग है हम!

किसी भी आजाद देश की जनता के गरिमापूर्ण जीवन और विकास का मूल आधार उस देश का संविधान होता है। ठीक ऐसे ही हमारे देश का संविधान है। हमारे संविधान का मूल प्रस्तावना है। प्रस्तावना इसलिए मूल है क्योंकि, इसमें स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुता जैसे वे विभिन्न मूल्य वर्णित है। जिनकी झलक संविधान के विभिन्न भागों में दिखाई देती है। मगर हकीकत में संवैधानिक मूल्यों की धरातल पर क्या स्थिति है और हम इनके प्रति कितने सजग हैं? इसका एक अनुभव हमारे साथ मध्यप्रदेश के सागर जिले के कुछ छात्र साझा करते हैं।

एलएलबी (लॉ) के छात्र दीनदयाल अपने विचार ऐसे रखते हैं, देश जब आजाद हुया, और संविधान लागू हुआ। तब बहुत विकट परिस्थितियाँ थी। शिक्षा का बहुत अभाव था। जब व्यक्ति शिक्षित नहीं हो पाएगा, तो संवैधानिक मूल्यों को कैसे समझेगा। जैसे-जैसे शिक्षण संस्थाएं मजबूत हुई। संविधान और संवैधानिक मूल्यों के प्रति थोड़ी सी समझ आयी। तब सामाजिक तानों-वानों, कुप्रथाओं से लोग उभरने लगे। लेकिन, लोगों के मन से आज भी ऊच-नीच की भावनाएं नहीं गई है। जैसे, मैंने देखा है कि, अनुसूचित जाति में आने वाली विभिन्न जातियों के लोग एक दूसरे से छुआछूत मानते हैं। गाँव में, आज भी ये हालत है कि, ऊंची जाति के लोग नीची जाती के लोगों से जबरन मजदूरी करवाते हैं। ऐसे में बंधुआ मजदूरी जैसे स्थिति सामने आती है। ऐसे में लोगों के स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक मूल्य का हनन होता है।

आगे कपिल हमें बताते हैं कि, मैने देखा और अनुभव किया है कि, शैक्षिणिक संस्थाएं बंधुता और एकता का सूत्रपात्र हैं। लेकिन, वहाँ पहुचकर भी छोटे-छोटे बच्चों के दिमाग में यह विराजा हुआ है कि, मैं ऊंची जाति का हूँ और वो नीची जाति का है, इसलिए हम नीची जाति के बच्चे के साथ अपना खाना साझा नहीं कर सकते हैं। ऐसे में यहाँ बंधुता जैसा संवैधानिक मूल्य प्रभावित होता है।

जब हम वीरू बात करते हैं, तब उनका अंदाज यूं होता है, राशन की दुकानों से लेकर बैंक तक हमें संवैधानिक मूल्यों का हनन नजर आता है।

वीरू का कहना है कि, जब हम कहीं सार्वजनिक कतारों में लगते है, तब हमें देखते हैं कि, जिसका आर्थिक दबदबा ज्यादा होता है उनकी कहानी ये होती है वो जहां से खड़े हो जाएं लाइन वहीं से शुरू हो जाती है। ऐसे में हमारे अवसर की समानता जैसा संवैधानिक मूल्य दिखाई नहीं देता है।

फिर, इसके बाद सुनील अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि, मैने अपनी मध्यप्रदेश पब्लिक सर्विस कमिशन (mppsc) की सरकारी कोचिंग के दौरान अनुभव किया कि, बारहवीं क्लास के स्तर (योग्यता से कम) का टीचर (mppsc) की कोचिंग पड़ाता था। स्टूडेंट्स द्वारा उच्च शिक्षाधिकारी को शिकायत करने पर भी टीचर का फेरबदल नहीं किया गया। ऐसे में हमें लगता है की हमारे शिक्षा के अधिकार और न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य का हनन हुआ है।

जब हमने संवैधानिक मूल्यों को लेकर सोनू से बातचीत की तब सोनू बताते है कि, ग्रामीण स्तर पर संवैधानिक मूल्यों की काफी अनदेखी नजर आती है। मेरा तजुर्बा रहा है कि, गाँव में जब कोई धार्मिक आयोजन, मंदिर निर्माण होता है, तब चंदा गाँव के सभी लोगों से बिना भेदभाव के उगाया जाता है। लेकिन जब धार्मिक आयोजनों का भंडारा होता है तब वहाँ ऊंच-नीच, छुआछूत सब दिखाई देने लगता है। इस हाल में लोगों के समानता जैसे संवैधानिक मूल्य को चोट पहुचती है। व्यक्ति की गरिमा पर भी असर पड़ता है।

वहीं, प्रेम का मानना हैं कि, संविधान पड़ाने के लिए प्राथमिक शिक्षा से ही एक टीचर स्कूलों में होना चाहिए। तब सही मायनों में संवैधानिक मूल्यों की जड़े समाज में जमीनी स्तर तक पहुंचेगी। प्रेम हमें आप बीती बताते हैं, वह कहते हैं, मैने एक प्राइवेट नौकरी के दौरान देखा कि मेरे सहपाठी मेरे साथ शारीरिक रूप से भेदभाव नहीं करते थे, लेकिन मानसिक तौर पर मेरे प्रति भेदभाव पूर्ण नजरिया रखते थे। जिससे मेरा कार्य प्रभावित होता था। ऐसे में, मुझे आखिरकार अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। क्या प्रेम की यह आप बीती न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य पर संकट की ओर इशारा नहीं करती?

संवैधानिक मूल्य वास्तव में कहा जाय तो नैतिक मूल्यों के रूप में हैं। हमारी नैतिकता जितनी मजबूत होगी, उतना ही हम अपने संवैधानिक मूल्यों को पुख्ता बना सकते हैं। इसलिए आज हमें नैतिक शिक्षा की अत्यंत दरकार भी है। इसके अलावा हम सब का दायित्व भी है कि, हम संवैधानिक मूल्यों के प्रति जनमानस जागरूकता में इजाफा करें। जब हमारे देश में संवैधानिक मूल्यों का फैलाव धरातलीय स्तर तक होगा।, तब सही मायनों में देश प्रेम की भावनाओं का संचार व्यापक होगा और हमारे भारत में एकतत्व का सूत्रपात्र होगा।

(सतीश भारतीय एक स्वतंत्र‌ पत्रकार और विकास संवाद परिषद में संविधान फैलो है।)

गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार मिलने पर कांग्रेस ने किया विरोध

कांग्रेस ने गीता प्रेस को 2021 के लिए गांधी शांति पुरस्कार प्रदान करने के लिए सरकार की आलोचना की कांग्रेस का कहना है कि यह निर्णय उपहासपूर्ण है और सावरकर और गोडसे को पुरस्कार देने जैसा है। यह बयान कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश की ओर से आया है। गांधी शांति पुरस्कार के मुद्दे पर जयराम रमेश ने सरकार की आलोचना करते हुए एक ट्वीट किया।

अपने इस ट्विट में जयराम रमेश ने कहा, “2021 के लिए गांधी शांति पुरस्कार गोरखपुर में गीता प्रेस को प्रदान किया गया है, जो इस वर्ष अपनी शताब्दी मना रहा है। अक्षय मुकुल द्वारा इस संगठन की लिखित जीवनी में उन्होंने महात्मा गांधी और उनके राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक एजेंडे पर गीता प्रेस के साथ चली लड़ाई व खराब संबंधों का खुलासा किया है। यह निर्णय वास्तव में एक उपहास और सावरकर व गोडसे को पुरस्कार देने जैसा है।”

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली समिति ने सर्व सम्मति से गीता प्रेस को इस अवार्ड के लिए नामित किया था। गीता प्रेस को पुरस्कार देते हुए एक आधिकारिक बयान में कहा गया था कि 2021 के लिए गांधी शांति पुरस्कार गीता प्रेस, गोरखपुर को अहिंसक और अन्य गांधीवादी तरीकों के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन की दिशा में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया जाएगा।

इसी बयान को लेकर जयराम रमेश ने ऐतराज जताया है। दरअसल गीता प्रेस की वेबसाइट संस्थान के बारे में जो कहती है, वह भी इस पुरस्कार के लिए उसके चयन पर सवाल उठाया है। गीता प्रेस की वेबसाइट के अनुसार, “इसका मुख्य उद्देश्य गीता, रामायण, उपनिषद, पुराण, प्रख्यात संतों के प्रवचन और अन्य चरित्र-निर्माण पुस्तकों को प्रकाशित करके सनातन धर्म के सिद्धांतों को आम जनता के बीच प्रचारित करना और फैलाना एवं कम कीमतों पर पुस्तकें उपलब्ध कराना है।”

अब सवाल यह है कि जो प्रकाशन एक धर्म के भीतर की चंद जातियों के हित की बात करती हो, जिसके प्रकाशन की किताबों में दलितों और पिछड़ों के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें नीच और छोटा बताती हो, उसे किसी के भी नाम का शांति पुरस्कार मिलना कितना जायज है?

बसपा कार्यालय से हटाई गई मा. कांशीराम और बाबा साहब की प्रतिमा

बहुजन समाज पार्टी की आज लखनऊ में बैठक हुई। इसमें यूपी के सभी मंडल व जिला कमेटी के पदाधिकारियों को बुलाया गया। बैठक में देश और प्रदेश के हालात, संगठन की मजबूती, जिलों में पार्टी की प्रगति रिपोर्ट आदि पर चर्चा हुई। बैठक में आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर भी बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी के पदाधिकारयों को तमाम निर्देश दिये। और भाजपा सहित अन्य विपक्षी दलों से निपटने की रणनीति पर भी चर्चा हुई। बैठक में बहनजी ने फिर से महंगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा और शांति व्यवस्था का मुद्दा उठाया और इसके लिए केंद्र से लेकर प्रदेश सरकार पर हमला बोला।बहनजी ने भाजपा की सांप्रदायिकता की राजनीति पर उसे आड़े हाथों लिया। यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी और इसकी सरकारें जातिवादी, सांप्रदायिक व धार्मिक विवादों को जानबूझकर पूरी छूट व शह दे रही है। इसके कारण न सिर्फ तमाम प्रदेश बल्कि देश की प्रगति भी प्रभावित हो रही है।बहनजी ने मणिपुर का मुद्दा भी उठाया और उस पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि स्वार्थ की राजनीति का परिणाम है कि मणिपुर में नफरती हिंसक वारदात की आग थमने का नाम नहीं ले रही है। उन्होंने प्रभावी कार्रवाई और गंभीरता की जरूरत बताया।

बहनजी ने भाजपा को घेरते हुए देश में दलितों के ऊपर हर रोज हो रहे अत्याचार पर भी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि सबसे साथ न्याय करने का संवैधानिक कर्तव्य निभाने के बजाय खासकर दलित व समुदाय विशेष के विरुद्ध भेदभाव एवं द्वेषपूर्ण रवैया संबंधी खबरें अखबारों में हर दिन भरी रहती है, जो कि सही नहीं है।

हालांकि इस दौरान बहनजी के निर्देशों के अलावा एक अन्य मामले की भी चर्चा पार्टी पदाधिकारियों के बीच लगातार होती रही। दरअसल बसपा के लखनऊ कार्यालय में बाबासाहेब आंबेडकर, बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम और बहनजी की आदमकद प्रतिमा लगी हुई है। सुबह जब पार्टी पदाधिकारी बैठक में हिस्सा लेने के लिए पार्टी कार्यालय पहुंचे तो वहां पर मूर्तियों को नहीं देखा। इसके बाद सवाल उठने लगा कि आखिर यहां लगी मूर्तियां कहां गई? पार्टी अधिकारियों से इस मामले में पूछताछ शुरू की गई। इसके बाद मूर्तियों को लेकर बड़ी जानकारी सामने आई। पता चला कि पार्टी कार्यालय में लगी तमाम मूर्तियों को बसपा सुप्रीमो मायावती के आवास में शिफ्ट कर दिया गया है।

अब इसको लेकर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की चिंता शुरू हो गई है। दरअसल बहनजी महापुरुषों की जयंती के मौके पर पार्टी कार्यालय पहुंच कर वहां लगी मूर्तियों पर श्रद्धासुमन समर्पित करती रही हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में देश भर से पार्टी के पदाअधिकारी और कार्यकर्ता भी पहुंचते हैं।  ऐसे में मूर्तियों को उनके घर में शिफ्ट किए जाने को लेकर सवाल उठने लगा कि कि महापुरुषों की जयंती के मौके पर भी क्या बसपा सुप्रीमो अब पार्टी दफ्तर नहीं आएंगी।

अगर ऐसा है तो यह बहुजन समाज पार्टी के साथ-साथ दुनिया के तमाम हिस्सों में अंबेडकरी आंदोलन को बढ़ाने में लगे लोगों के लिए चिंता की बात है। आने वाले दिनों में इसको लेकर बहस तेज हो सकती है।

कर्नाटक में किताबों में सावरकर-हेडगेवार बैन, डॉ. अंबेडकर और सावित्रीबाई फुले की वापसी

कर्नाटक में निजाम बदलने के साथ ही पुराने कानूनों को पलटने का काम भी शुरू हो गया है। महीना बीतते ही कांग्रेस सरकार ने पूर्व की भाजपा सरकार द्वारा लाए गए धर्मांतरण के कानून को रद्द करने की न सिर्फ पूरी योजना बना ली है बल्कि कर्नाटक कैबिनेट ने इस पर मुहर भी लगा दी है। जल्दी ही इस प्रस्ताव को विधानसभा में लाया जाएगा। इसके साथ ही कैबिनेट ने राज्य में कक्षा छह से 10 तक की पाठ्यपुस्तकों में आरएसएस के संस्थापक केबी हेडगेवार और हिंदुत्ववादी विचारक वीडी सावरकर पर चैप्टर हटाने का भी फैसला किया है।

कैबिनेट बैठक के बाद कानून एवं संसदीय मामलों के मंत्री एचके पाटिल ने संवाददाताओं को बताया कि बैठक में भाजपा के समय लाए गए धर्मांतरण विरोधी कानून पर चर्चा हुई। इसे रद्द करने के लिए सरकार विधानसभा के आगामी सत्र में बिल लाएगी। गौरतलब है कि कांग्रेस के विरोध के बीच यह विवादास्पद बिल 2022 में लागू किया गया था। इसके प्रावधानों का उल्लंघन संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है और इसमें सख्त सजा का भी प्रावधान है।

पाठ्यपुस्तकों से जुड़े फैसले के बारे में बताते हुए पाटिल ने कहा कि कन्नड और सोशल साइंस की पाठ्यपुस्तकों में हेडगेवार और सावरकार पर पाठ हटाने के अलावा भाजपा सरकार के समय के अन्य संशोधनों को भी बदला जाएगा। समाज सुधारक सावित्री बाई फुले, इंदिरा को लिखे नेहरू के पत्र और अंबेडकर पर कविता को फिर पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। हालांकि, इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया कि क्या टीपू सुल्तान पर भी चैप्टर होगा।

हर दिन पढ़नी होगी संविधान की प्रस्तावना वहीं, सरकारी और गैर-सरकारी सभी स्कूल-कॉलेजों में प्रतिदिन संविधान की प्रस्तावना पढ़ना अनिवार्य किया जाएगा। यही नहीं, राज्य के सभी सरकारी और अर्ध-सरकारी कार्यालयों में संविधान की प्रस्तावना का चित्र लगेगा। सामाजिक कल्याण मंत्री एचसी महादेवप्पा ने कहा कि इससे युवाओं में भाईचारे की भावना बढ़ेगी।

गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार, बहुजनों के लिए एक सबक

हिन्दू धर्म की किताबों को प्रकाशित कर देश भर में बहुत कम कीमतों पर अपने पाठकों को उपलब्ध कराने वाली गीता प्रेस को साल 2021 के गांधी शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली समिति ने सर्व सम्मति से गीता प्रेस को इस अवार्ड के लिए नामित किया। गीता प्रेस 1923 में स्थापित हुई थी। और अपने 100 साल के सफर में उसने 1 हजार 850 धार्मिक पुस्तकों की 93 करोड़ कॉपी बेची है। इसकी वेबसाइट के अनुसार, “इसका मुख्य उद्देश्य गीता, रामायण, उपनिषद, पुराण, प्रख्यात संतों के प्रवचन और अन्य चरित्र-निर्माण पुस्तकों को प्रकाशित करके सनातन धर्म के सिद्धांतों को आम जनता के बीच प्रचारित करना और फैलाना एवं कम कीमतों पर पुस्तकें उपलब्ध कराना है।”

गीता प्रेस साल 1926 से लगातार कल्याण नाम से एक मासिक पत्रिका भी प्रकाशित करती है। गीता प्रेस ने अब तक तुलसी दास द्वारा लिखी गई रामचरित मानस की साढ़े तीन करोड़ कॉपी बेची है, जबकि श्रीमद भगवद गीता की 16 करोड़ प्रतियां बेची है। इसकी वेबसाइट बताती है कि 14 भाषाओं में वो 41.7 करोड़ से ज्यादा किताबें छाप चुकी है।

गीता प्रेस को अवार्ड मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बदाई दी है तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी खुश हैं क्योंकि गीता प्रेस का प्रकाशन गोरखपुर से होता है। गीता प्रेस के मैनेजर लालमणि त्रिपाठी भी खुश हैं। उन्होंने मीडिया से बातचीत में बताया है कि गीता प्रेस की किताबों की जितनी डिमांड है, हम उसे पूरा नहीं कर पातें। उनका कहना है कि पिछले फाइनेंसियल ईयर में प्रेस की विभिन्न किताबों की 2 करोड़ 40 लाख प्रतियां बिकी हैं, जिनका मूल्य 111 करोड़ रुपये है। लालमणि त्रिपाठी के मुताबिक गीता प्रेस हर साल रामचरित मानस की दस लाख प्रतियां बेचती है।

लगे हाथ आपके लिए एक और जानकारी यह है कि हर साल दिये जाने वाले गांधी शांति पुरस्कार में 1 करोड़ रुपये की पुरस्कार राशि, एक प्रशस्ति पत्र, एक पट्टिका और एक पारंपरिक हस्तकला की वस्तु दी जाती है। हालांकि गीता प्रेस ने घोषणा की है कि वह पुरस्कार की राशि नहीं लेगी।

अब एक दूसरी कहानी यहां से शुरू होती है। गीता प्रेस न तो चंदा मांगती है और न ही विज्ञापन लेती है। इसका सारा खर्च समाज के लोग ही उठाते हैं। ये वो लोग और संस्थाएं हैं जो छपाई में लगने वाले सामान किफायती कीमतों में उपलब्ध करवाते हैं। प्रेस घोषित करे या न करे, यह समझा जा सकता है कि सनातन धर्म को बढ़ाने में लगे तमाम सेठ-साहूकार और नेता-मंत्री भी गीता प्रेस को सहायता जरूर करते होंगे। भाजपा-संघ के राज में गीता प्रेस को इतना बड़ा सम्मान अकारण नहीं मिला है, बल्कि इसलिए मिला है कि गीता प्रेस की पुस्तकें उस विचारधारा को सालों से बढ़ा रही है जिस पर सवार होकर भाजपा केंद्र की सत्ता में पहुंची है।

 यानी साफ है कि गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तकों ने सनातन धर्म को घर-घर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। तो उस विचारधारा की पोषक राजनीतिक दल ने उसे सम्मान देने में देरी नहीं की। लेकिन यहां चिंतित करने वाली बात यह है कि इन किताबों में जिन दलितों-पिछड़ों के बारे में तमाम अपमानजनक बातें लिखी गई हैं, वो किताबें यह समाज भी खरीदता है। चिंता की बात यह है कि जिस दलित-पिछड़े और आदिवासी समाज के घरों में संविधान, बुद्ध का धम्म और अंबेडकरी साहित्य होना चाहिए, उनके घरों में रामचरित मानस और श्रीमद भगवत गीता है।

सवाल बहुजन समाज के नेताओं, अधिकारियों और आम जनता पर भी उठता है। गीता प्रेस को इस मुकाम तक लाने में उस समाज के तमाम सेठ-साहूकारों के अलावा, आमजन से लेकर नेताओं, मंत्रियों का भी परोक्ष समर्थन रहा है। लेकिन न तो बहुजन समाज के दिग्गज नेताओं को और न ही ज्यादातर बड़े अधिकारियों को अंबेडकरवादी साहित्य की फिक्र है। अब तक किसी अंबेडकरवादी- बहुजन नेता ने अंबेडकरवादी साहित्य रचने वाले लेखकों को प्रोत्साहित करने में रुचि नहीं ली। न ही सरकार में रहते हुए उन्हें सम्मानित करना जरूरी समझा। न ही वो घर-घर संविधान पहुंचाने की मुहिम चलाते हैं और न ही अंबेडकरी साहित्य को बढ़ाने में ही रूचि लेते हैं।

 कुछ जागरूक नेता, अधिकारी जरूर इसकी जरूरत समझते हैं, लेकिन वो मुट्ठी भर हैं। बहुजन समाज का आम व्यक्ति भी अब तक सही-गलत की पहचान नहीं कर सका है। वह यह नहीं जानना चाहता कि उसके लिए कौन सी विचारधारा और साहित्य जरूरी है और कौन सा साहित्य खतरनाक। यही वजह है कि जिन धार्मिक किताबों में इस समाज के सम्मान की धज्जियां उड़ाई गई है, उन्हें अपमानित किया गया है, वह उन्हें गले लगाए घूमता है। जब तक वो अंबेडकरवादी साहित्य को नहीं अपनाता, जब तक इस समाज के नेता, अधिकारी अंबेडकरी साहित्य को बढ़ाने में मदद नहीं करते, तब तक स्थिति नहीं बदलेगी। तब तक दलितों, पिछड़ों को धार्मिक गुलामी से मुक्ति नहीं मिलेगी।

गीता प्रेस को मिले इस सम्मान के बहाने यह सवाल फिर से हमारे सामने है। दलित दस्तक समूह मासिक पत्रिका से लेकर प्रकाशन और यू-ट्यूब के जरिये बाबासाहेब की विचारधारा को घर-घर तक पहुंचाने में लगा है। हम कोशिश जारी रखेंगे। हमसे जुड़िये। हमें आर्थिक मदद करिये, ताकि हम विचारधारा की इस लड़ाई को लगातार जारी रख सकें।

जय भीम।

Bihar में 16 प्रतिशत Dalit वोटों की लड़ाई तेज, Manjhi पर भड़के Nitish

23 जून को बिहार में विपक्षी दलों की बैठक के पहले बिहार की राजनीति गरमा गई है। और इस गरमाई राजनीति के केंद्र में पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी हैं, जो महागठबंधन से अलग हो गए हैं। आपसी खिंचतान में मांझी के बेटे संतोष सुमन ने भी सरकार से इस्तीफा दे दिया था। इस इस्तीफे के बाद मांझी ने नीतीश कुमार पर कई आरोप लगाए थे, जिसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को भाजपा से मिला हुआ बता दिया है।

मांझी का आरोप है कि नीतीश कुमार ने उन्हें बैठक में नहीं बुलाकर उनका अपमान किया। साथ ही आरोप लगाया कि नीतीश कुमार उनकी पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा को जदयू में मिलाना चाहते थे,  जिस पर नीतीश कुमार ने उन्हें भाजपा का एजेंट बता दिया। नीतीश कुमार ने आरोप लगाया कि मांझी विपक्ष की बैठक में हुई चर्चा को भाजपा से बता देते, इसलिए उनसे विलय करने को कहा गया।

मांझी इस पूरे घटनाक्रम को दलित समाज के अपमान से जोड़कर इसका राजनीतिक लाभ लेने में जुट गए हैं। तो अंदरखाने खबर यह भी है कि महागठबंधन से निकलने के बाद जीतनराम मांझी एनडीए के खेमे में जाने को तैयार हैं। भाजपा को भी मांझी के रूप में एक मौका दिखने लगा है। तो इसके पीछे की वजह बिहार के 16 प्रतिशत दलित मतदाता हैं। बिहार के दलित मतदाताओं की बात करें तो प्रदेश के सबी 243 सीटों में 40-50 हजार दलित मतदाता हैं, जो किसी को भी हराने या जीताने में कामयाब हैं। इन वोटों पर भाजपा लेकर लेकर राजद, लोजपा और कांग्रेस सभी की नजरे हैं। हालांकि जीतनराम मांझी के जाने के बाद नीतीश कुमार ने उन्हीं के मुसहर समाज से रत्नेश सदा को मंत्री बनाकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश कर दी है। तो जीतनराम मांझी नई राह ढूंढ़ने में लग गए हैं। खबर है कि पटना में 18 जून को हम पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद 19 जून को मांझी अपने बेटे के साथ दिल्ली जाएंगे, जहां वह गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात करेंगे।

जानिये बृजभूषण पर कौन-कौन सी धारा लगी है, कितनी हो सकती है सजा.

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महिला खिलाड़ियों से छेड़छाड़ के मामले में भाजपा सांसद और ओलंपिक संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर आरोप तय हो गया है। दिल्ली पुलिस ने राउज एवेन्यू कोर्ट में दाखिल चार्जशीट में बृज भूषण पर 354, 354A, 354D और 506 (I) धाराएंDij लगाई है। लेकिन इस पूरे मामले में खिलाड़ियों के लिए चिंता की बात यह है कि अगर बृजभूषण सिंह को जेल हो भी जाती है तो बेल मिल जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के एक वकील डीके गर्ग का कहना है कि बृजभूषण पर लगी धाराएं ऐसी हैं, जिसमें बेल हो सकती है। और अगर बृज भूषण दोषी भी पाए जाते हैं तो ज्यादा सजा नहीं होगी।

बृजभूषण पर लगी धाराओं के मायने क्या हैं, उसे भी समझिए। धारा 354 यानी किसी महिला का शील भंग करने के इरादे से उसपर हमला, एक अन्य धारा 354 ए भी यौन उत्पीड़न से संबंधित धारा है। अन्य धाराओं में भी किसी महिला को गलत तरीके से छूने और जबरन अश्लील सामग्री दिखाने, पीछा करने,धमकाने जैसे अपराध हैं। इस सभी धाराओं में दोषी पाए जाने पर एक साल से लेकर पांच साल तक की सजा का प्रावधान है।

चार्जशीट दाखिल होने के बाद पहलवान अभी खुल कर तो कुछ नहीं बोल रहे हैं लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया पर दिये उनके बयान से साफ है कि वो इस रिपोर्ट से बहुत खुश नहीं हैं। महिला पहलवान साक्षी मलिक ने कहा है कि हम पहले देखेंगे कि जो वादे किए गए थे वो पूरे होते हैं या नहीं उसके बाद हम अगला कदम उठाएंगे। हम इंतजार कर रहे हैं। जबकि विनेश फोगाट ने एक ट्विट को रि-ट्विट किया, जिसमें उन्होंने पीएम मोदी कह रहे हैं कि बेटियों के साथ गलत करने वालों को फांसी पर लटकाया जाएगा।

साफ है कि पहलवान अभी कुछ भी बोलने से पहले सभी बातों को समझ लेना चाहते हैं। साथ ही वो अदालत की सुनवाई का भी इंतजार कर रहे हैं। पुलिस ने दो अलग-अलग  अदालतों में चार्जशीट दाखिल की है। 22 जून को चार्जशीट पर सुनवाई करेगी। जबकि पॉक्सो लगेगा या नहीं, इस पर 4 जुलाई को सुनवाई होगी।  हालांकि खिलाड़ियों ने साफ किया है कि आंदोलन को अस्थायी रूप से रोका गया है और जरुरी हुआ तो आंदोलन फिर से शुरू होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि इंसाफ नहीं मिलने पर वे एशियाई खेलों के ट्रायल में भाग नहीं लेंगे

मध्य प्रदेश में आदिवासी उद्यमियों को मिलता रोजगार

मध्य प्रदेश का बड़वानी जिला 1948 से पहले राज्य की राजधानी हुआ करता था. यह छोटा सा राज्य अपनी चट्टानी इलाकों और कम उत्पादक भूमि के चलते अंग्रेज, मुगल और मराठों के शासन से बचा रहा. यह जैन तीर्थ यात्रा का केंद्र चूलगिरि और बावनगजा के लिए मशहूर है. मध्य प्रदेश के दक्षिण पश्चिम में स्थित बड़वानी के दक्षिण में सतपुड़ा एवं उत्तर में विन्ध्याचल पर्वत शृंखला है. करीब 13 लाख की आबादी वाले बड़वानी को 25 मई 1998 को मध्यप्रदेश में जिले का दर्जा मिला. आदिवासी बाहुल्य इस जिले की साक्षरता दर करीब 50 फीसदी से कम है. अति पिछड़ा होने के कारण केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 में जिन 112 आकांक्षी जिलों का चुनाव किया था, उनमें बड़वानी भी शामिल है. लेकिन वर्ष 2014 से 2021 के बीच इस जिले ने इतनी तरक्की की, कि राज्य नीति आयोग की ग्रेडिंग में यह जिला वर्ष 2021 में प्रदेश के टॉप 10 समृद्ध ज़िलों में शामिल हो गया है. इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि यहां कृषि के साथ-साथ सूक्ष्म उद्योगों की ओर युवाओं ने हाथ आजमाना शुरू किया है.

दरअसल खुद का कारोबार शुरू करने के लिए प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत मिलने वाली राशि युवाओं के लिए बहुत उपयोगी साबित हुई है. इसी जिले के तीन आदिवासी संतोष वसुनिया, पवन और लक्ष्मी वाणी ने इस योजना के तहत लोन लेकर अपना कारोबार शुरू किया और आज वह आत्मनिर्भर बन चुके हैं. पेटलावद की 44 वर्षीय संतोष वसुनिया बताती हैं कि “जब कोरोना महामारी के दौरान लोग शहर से गांव की ओर पलायन कर रहे थे, तब मेरे मन में एक बात कौंधी कि आखिर इतने लोगों की आजीविका कैसे चलेगी? क्योंकि उस वक्त तक गांव में कृषि और मज़दूरी के अलावा रोजगार के कोई ठोस साधन नहीं थे. अक्सर रोज़गार के लिए ग्रामीण पलायन ही करते थे. असंख्य प्रवासियों को इस तरह बदहवास अपने-अपने गांव की ओर लौटते देखकर मैं विचलित हो गई. उसी वक्त मैंने ठान लिया कि निर्वाह के लिए कम वेतन वाले काम करने से बेहतर है कि सरकार से लोन लेकर छोटा व्यवसाय शुरू कर जीवन को सुरक्षित करूं.”

वह बताती हैं कि मैंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे, बहुत सारी चुनौतियों का सामना किया है, पिता झाबुआ में कृषि मजदूर थे. जब वह सिर्फ 4 साल की थी, तब उनके पिताजी गुजर गए. मां को छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर मजदूरी करने जाना पड़ता था. होनहार होते हुए भी वह 10वीं तक ही पढ़ पाई थी कि उनकी शादी हो गई और वह पति के साथ पेटलावद चली आईं. जहां दो संतान को जन्म दिया. संतोष बताती हैं कि मैं कभी नाउम्मीद नहीं हुई. आत्मनिर्भर होने की इच्छा ने कभी उनका पीछा नहीं छोड़ा. परिवार में दूर दूर तक व्यवसाय से किसी का कोई नाता नहीं था. लॉकडाउन खत्म होते ही उसने सौंदर्य प्रसाधन की दुकान खोलने का निर्णय लिया. इस बीच उनका संपर्क ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया (टीआरआई) एंटरप्रेन्योरशिप फैसिलिटेशन हब टीम से हुआ और वह उनकी मदद से व्यवसाय की दिशा में काम करने लगीं. संतोष ने अपनी बचत से एक लाख रुपए का निवेश किया और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना (पीएमईजीपी) के तहत वित्तीय सहायता के रूप में 3.75 लाख रुपए प्राप्त कर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया. अब उसका सौंदर्य प्रसाधन के साथ-साथ जलपान इत्यादि से संबंधित एक सफल दुकान भी है. जिससे आज वह न सिर्फ आत्मनिर्भर बन चुकी है बल्कि अपने परिवार को आर्थिक मदद भी कर रही है.

संतोष की तरह पवन जमरे और लक्ष्मी वानी की सफलता बताती है कि ग्रामीण भारत में कितनी मानवीय क्षमताएं मौजूद हैं. ऐसे समय में जब बेरोजगारी चरम पर है, बड़वानी के राजपुर ब्लॉक के चितावल गांव के 20 साल के पवन ने एक उद्यमी के रूप में कदम आगे बढ़ाया है. वह एक छोटे किसान परिवार से आते हैं और महज 8वीं तक पढाई की है. वह बताते हैं, कि “मैंने अपने गांव के पास के एक इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान पर एक दैनिक मजदूर के रूप में काम करना शुरू किया था और प्रतिदिन लगभग 150 से 200 रुपए कमा लेता था. टीआरआई की सुमन सोलंकी ने इलेक्ट्रॉनिक्स में मेरी दिलचस्पी को देखते हुए मुझे ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान से मोबाइल रिपेयरिंग ट्रेनिंग प्रोग्राम में भाग लेने सुझाव दिया और इसमें नामांकन कराने में मेरी मदद भी की.” अब पवन के पास अपना खुद का मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान है. जुलवानिया, बड़वानी में एंटरप्राइज फैसिलिटेशन हब ने उन्हें उनके व्यवसाय को सशक्त बनाने के लिए एक्सीलरेटेड एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम (एईडीपी) में भाग लेने में मदद की. प्रशिक्षण के दौरान पवन ने अगले 3 वर्षों के लिए अपना खुद का बिजनेस प्लान तैयार किया और लोन भी प्राप्त किया.

30 वर्षीय लक्ष्मी वानी की सफलता भी कुछ इसी तरह की कहानी कहती है. वह बड़वानी के नेवाली विकासखंड के नेवाली गांव की रहने वाली हैं और ओबीसी समुदाय से संबंध रखती हैं. जैसा कि कम आय वाले ग्रामीण परिवारों में आम है, लक्ष्मी ने सिर्फ 11वीं कक्षा तक पढ़ाई की और कम उम्र में ही उनकी शादी कर दी गई. एक दिहाड़ी मजदूर की पत्नी और तीन बच्चों की मां के रूप में, वह आय के दूसरे साधन तलाशने लगीं. वह बताती हैं, “मैं नेवाली गांव में टीआरआई इंडिया की यूथ हब टीम द्वारा आयोजित एक अभियान में शामिल हुई, जहां उद्यमिता के प्रति मेरी रुचि बढ़ी. मैं कंप्यूटर की बुनियादी बातें जानती थी और एक कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) चलाने का सपना पहले से ही देखती आ रही थी.” यूथ हब टीम ने बड़वानी में ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान के साथ मिलकर लक्ष्मी को छह दिन के आवासीय सीएससी आईडी ट्रेनिंग एंड सर्टिफिकेशन कोर्स में नामांकन करा दिया. अब वह अपना खुद का सीएससी बिजनेस चला रही हैं. इस तरह लक्ष्मी न केवल आत्मनिर्भर बन चुकी हैं बल्कि अपने गांव की अन्य महिलाओं की प्रेरणा स्रोत भी बन गई हैं.

इस संबंध में यूथ इनिशिएटिव ऑफ ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया में प्रैक्टिशनर रानू सिंह कहती हैं, “सफलता की ये कहानियां जमीनी स्तर के उन स्वयंसेवी संस्थाओं के महत्व पर जोर देती हैं, जो ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को उनका खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए  वित्तीय साक्षरता प्रदान करते हैं और साथ ही प्रशिक्षण, मार्केट रिसर्च, प्रॉडक्ट डेवलपमेंट और अन्य जरूरी कौशल उपलब्ध कराते हैं”. बहरहाल, ग्रामीण क्षेत्रों के उद्यमियों की सफलता की यह कहानी बताती है कि हौसले देश के गांव गांव तक फैले हुए हैं. ग्रामीण भारत भी देश की अर्थव्यवस्था में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. ज़रूरत है केवल उन्हें राह दिखाने की. प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना इस दिशा में अहम कड़ी साबित हो रहा है.

रूबी सरकार भोपाल, मप्र

भाजपा नेता की गुंडई से मजबूर दलितों ने घरों पर लगाया गांव से पलायन का पोस्टर

दिल्ली से सटे यूपी के बुलंदशहर में दलित समाज के लोगों ने अपने घरों पर गांव से पलायन करने का पोस्टर चिपका दिया है। वजह है भाजपा नेता और अरनिया क्षेत्र का ब्लॉक प्रमुख सुरेन्द्र सिंह। दलित समाज के लोगों ने पलायन का पोस्टर लगाने के बाद उसका वीडियो बनाकर वायरल कर दिया है, जिसके बाद हंगामा मच गया है। बुलंदशहर के शिकारपुर स्थित गांव देवराला में नौ जातिवादी गुंडों ने 14 मई को दलित परिवार के घर में घुसकर सचिन गौतम और अच्छन कुमार नाम के युवक के साथ मारपीट की, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए। इस मामले में परिवार वालों ने अररिया क्षेत्र से भाजपा से ब्लॉक प्रमुख सुरेन्द्र सिंह सहित नौ लोगों के खिलाफ हत्या के प्रयास सहित अन्य धाराओं में शिकारपुर थाने में मुकदमा दर्ज कराया है। इस मामले में पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस पर आरोप है कि वह राजनीतिक दबाव में जानबूझ कर अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी में देरी कर रही है। जिसके बाद बाकी बचे सात आरोपियों की गिरफ्तारी न होने से नाराज दलित समाज के चार परिवारों के 18-20 सदस्यों ने गांव से पलायन करने का पोस्टर चिपका दिया है। घटना के बारे में पीड़ित अच्छन कुमार के पिता विजेन्द्र सिंह का आरोप है कि अच्छन का बेटा सुरेन्द्र प्रमुख के घर के बाहर खेल रहा था, जिस पर सुरेन्द्र प्रमुख के पिता ने उसे थप्पड़ मार दिया था, जिसका विरोध करने पर सुरेन्द्र प्रमुख ने अपने गुंडों के साथ मिलकर उनके घर हमला कर दिया था। उनका कहना है कि बाकी बचे आरोपियों की गिरफ्तारी जल्द नहीं हुई तो वो गांव से पलायन कर जाएंगे। वीडियो वायरल होने के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया है और पुलिस बैकफुट पर है। लेकिन पीड़ित परिवार को अब भी इंसाफ का इंतजार है। उन्हें उम्मीद है कि मामले के तूल पकड़ने के बाद अब पुलिस को बाकी आरोपियों को गिरफ्तार करना ही पड़ेगा।

लोकतंत्र का बाभन विमर्श- बिना शर्म-हया के

‘लोकतंत्र का भविष्य’ शीर्षक से वाणी प्रकाश से एक किताब आई है। इसका संपादन अरूण कुमार त्रिपाठी ने किया है।
इसमें कुल 12 लेख हैं। संपादकीय सहित 13 लेख। संपादक सहित 13 लेखकों में 10 बाभन हैं। करीब 72 प्रतिशत लेखक ब्रह्मा के मुंह से पैदा हुआ बाभन हैं। एक जैन हैं। एक अशरफ मुसलमान भी जगह पाने में सफल हुए हैं।
संपादक-प्रकाशक भूदेवताओं के प्रति इस कदर दंडवत हैं कि उन्होंने किसी ठाकुर, लाला, भूमिहार या किसी अन्य द्विज को इस पंक्ति में खड़ा करने का अपराध नहीं किया।
यह ठीक भी है, बाभनों की पंक्ति में आखिर कौन खड़ा हो सकता है। ठाकुर, लाला और भूमिहार की भी कहां यह औकात है। लेकिन यह हो सकता है कि बाभनों की इस पंक्ति में कोई छद्म वेषी भूमिहार हो। वे क्षमा करें।
पिछड़ों-दलितों और आदिवासियों की बात तो छोड़ ही दीजिए। उनकी कहां औकात है किसी तरह के विमर्श उमर्श शामिल होंने की। वह भी उस विमर्श में जो एक बाभन के नेतृत्व में चल रहा हो। लोकतंत्र जैसे गुरु-गंभीर विषय पर।
इस किताब के संपादक को लोग लोहियावादी-गांधीवादी सोशिलिस्ट कहते हैं।
इस किताब ‘आज के प्रश्न’ श्रृंखला के तहत आई है। जिसकी शुरूआत राजकिशोर जी ने की थी। पता नहीं, उन्होंने कभी इस तरह का बाभन विमर्श कभी किया था या नहीं।
लेखकों का अनुक्रम और परिचय नीचे है-
अनुक्रम
नन्हीं सी जान दुश्मन हजार ………………………………………………………………………….रमेश दीक्षित
लोकतंत्र का पुनर्निर्माण……………   …………………………………………………………………..शंभुनाथ
लोकलुभावनवाद और तानाशाही……   ………………………………………………………….अभय कुमार दुबे
स्वप्न से अंतर्विरोधों तक……………………………. ……………………………………………..नरेश गोस्वामी
पूंजीवाद से परे जाने की जरूरत………………………………………………………………………. विजय झा
लोकतंत्र की धड़कन है आंदोलन…………………………………………………………………………सुनीलम
जनमानस में लोकतंत्र………………………………………………………………………………..गिरीश्वर मिश्र
आपातकाल का अतीत और भविष्य………………………………………………………………..जयशंकर पांडेय
न्यायपालिकाः क्या कुछ संभावना शेष है…………………………………………………………………अनिल जैन
गोदी मीडिया का स्तंभ……………………………………………………………………….अरुण कुमार त्रिपाठी
बराबरी चाहिए अल्पसंख्यकों को ……………………………………………… ……………सैयद शाहिद अशरफ
लोकतंत्र और आदिवासीः कुछ अनसुलझे सवाल…………………………………………………..कमल नयन चौबे
लेखक परिचय—-
रमेश दीक्षित—–जाने माने राजनेता और राजनीतिशास्त्री। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष। लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष।
शंभुनाथ——हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और शिक्षक। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष। संप्रतिः—भारतीय भाषा परिषद के अध्यक्ष और वागर्थ के संपादक।
अभय कुमार दुबे—-जाने माने पत्रकार और समाजशास्त्री।डा भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के अभिलेख अनुसंधान केंद्र के निदेशक।
नरेश गोस्वामी—-शोधार्थी, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता। डा भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में एकेडमिक फेलो।
विजय झा-–मार्क्सवाद, ग्राम्शी और स्त्री विषयों के विशेषज्ञ। डा भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में एकेडमिक फेलो।
सुनीलम—-पूर्व विधायक और किसान नेता। समाजवादी विचारों के लिए प्रतिबद्ध और समाजवादी आंदोलन में सतत सक्रिय।
गिरीश्वर मिश्र—–अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध मनोविज्ञानी। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति।
जयशंकर पांडेय—पूर्व विधायक और समाजवादी चिंतक मधु लिमए के सहयोगी। समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश के पदाधिकारी।
अनिल जैन—-समाजवादी आंदोलन से प्रतिबद्ध। पत्रकार और लेखक। फिलहाल नई दुनिया में वरिष्ठ सहायक संपादक।
सैयद शाहिद अशरफ—-आंबेडकर विश्वविद्यालय के अभिलेख अनुसंधान केंद्र के एकेडमिक फेलो। यूनाइटेड किंगडम की डरहम यूनिवर्सिटी के फेलो।
कमल नयन चौबेः—दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज के राजनीति शास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर। कई पुस्तकों के लेखक।
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भाजपा MLC के स्कूल में नाबालिग से रेप और हत्या का आरोप

ईको गार्डन लखनऊ में बेटी को इंसाफ दिलाने खातिर धरने पर बैठे पिता जसराम राठौरआजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद ने एक गंभीर मुद्दा उठाया है। उन्होंने योगी सरकार पर एक बड़ा आरोप लगाते हुए ट्विट किया है और इंसाफ की मांग की है। भीम आर्मी प्रमुख ने भाजपा के एक एमएलसी पर पिछड़े समाज के किसान की बेटी का रेप के बाद हत्या करने का आरोप लगाते हुए पीड़ित के लिए योगी सरकार से इंसाफ मांगा है।

आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इस बारे में ट्विट किया है। जिसमें उन्होंने लिखा है-

जालौन के एक छोटे से गांव से बड़े अरमानों के साथ पिछड़े समाज से आने वाले किसान जसराम राठौर ने अपनी 13 वर्षीय बच्ची को पढ़ने के लिए भाजपा MLC पवन चौहान के SR ग्लोबल स्कूल लखनऊ भेजा था. पिता के पास पूरे साक्ष्य हैं वहां उनकी नाबालिग बेटी के साथ रेप करने के बाद बेरहमी से हत्या कर दी गई। पिता का आरोप है कि स्कूल मुख्यमंत्री के सजातीय भाजपा MLC का है इसलिए इस हत्या को आत्महत्या बताते हुए पुलिस ने FR लगा दी। लेकिन पिता ने हार नहीं मानी और बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। पीएम से लेकर सीएम तक हर दरवाजे दस्तक दी, लेकिन, सत्ता के रसूख के आगे सब फेल। थक हारकर पिता इको गार्डन लखनऊ में धरने पर बैठे हैं लेकिन योगी पुलिस ने धमकी दी है अगर वहां बैठे तो ठीक नहीं होगा।

धरने पर बैठे पिता ने जस्टिस फॉर प्रिया का बैनर लगाया है। इसमें उनका कहना है कि लखनऊ पुलिस, हत्या को आत्महत्या न बताओ। सीबीआई जांच कर प्रिया को न्याय दिलाओ। पिता जसराम राठौर ने पूरे घटनाक्रम का जिक्र पोस्टर पर किया है। उनका आरोप है कि भाजपा एमएलसी पवन सिंह चौहान के स्कूल एसआर ग्लोबल के हॉस्टल में 8वीं क्लास की 12 वर्षीय छात्रा प्रिया राठौर की 20 जनवरी 2023 को दुष्कर्म कर के हत्या कर दी गई। भ्रमित करने के लिए शव को फेंका ऊंचाई से।

इस पोस्टर के माध्यम से प्रिया के पिता जसराम राठौर ने कई सवाल उठाए हैं। हालांकि दलित दस्तक के पास उपलब्ध पोस्टर के सामने जसराम राठौर बैठे हैं, जिससे उसमें लिखी कुछ बातें छुप गई हैं। लेकिन जो समझ में आ रहा है उसके मुताबिक जसराम राठौर ने पुलिस से लेकर स्कूल प्रशासन पर तमाम आरोप लगाया है। इसमें वार्डन द्वारा बार-बार बयान बदलने, पुलिस द्वारा आधी-अधूरी जांच रिपोर्ट देने, बेटी का फोन नहीं लौटाने और पुलिस पर मामले को रफा-दफा करने का आरोप लगाया है।

दलित महिला नेत्री वर्षा गायकवाड़ को मुंबई कांग्रेस की कमान

मुंबई कांग्रेस की अध्यक्ष वर्षा गाडकवाड़

कांग्रेस पार्टी ने मुंबई के धारावी विधानसभा सीट से चार बार की विधायक प्रोफेसर वर्षा एकनाथ गायकवाड़ को मुंबई कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया है। महाराष्ट्र सरकार में वह स्कूल एजुकेशन मिनिस्टर रह चुकी हैं। आगामी निकाय चुनाव और लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी के इस फैसले से प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई है। वर्षा पहली ऐसी महिला नेता हैं, जिसे कांग्रेस पार्टी ने यह पद दिया है।

वर्षा गायकवाड़ अंबेडकरवादी मूवमेंट से जुड़ी नेता हैं। वह सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ आर्ट्स में लेक्चरर हैं और उनके पास बीएड और मैथमेटिक्स की मास्टर डिग्री है। कांग्रेस के इस फैसले से साफ है कि कांग्रेस दलितों को पार्टी के भीतर ज्यादा तव्वजो देने की रणनीति पर काम कर रही है। मुंबई में काफी संख्या में अंबेडकरी-बुद्धिस्ट समाज के वोटर्स हैं, कांग्रेस पार्टी वर्षा के जरिये उन्हें जोड़ने का काम करेगी। वर्षा गायकवाड़ ने इसके लिए पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी को धन्यवाद दिया है। बता दें कि वर्षा के पिता एकनाथ गायकवाड़ भी साल 2017 से 2020 तक मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर भी दलित समाज की महिला को अध्यक्ष बनाने से साफ है कि कांग्रेस पार्टी तमाम राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर दलित मतदाताओं को केंद्र में रखने की रणनीति पर काम कर रही है। साथ ही वह देश भर के दलित मतदाताओं को भी मैसेज देना चाहती है कि कांग्रेस पार्टी दलित समाज के मतदाताओं को पार्टी में प्रतिनिधित्व देने के लिए तैयार हैं। वर्षा गायकवाड़ दलित वर्ग से होने के साथ-साथ एक पढ़ी-लिखी महिला भी हैं। वर्षा सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहती हैं और ट्विटर पर उनके करीब पांच लाख फॉलोवर हैं।

यानी साफ दिख रहा है कि कांग्रेस पार्टी चुनावों को लेकर अपनी रणनीति कैसे काफी सोच-समझ कर बना रही है। संभव है कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी इसी तरह का कोई फैसला लेकर सबको चौंका भी सकती है।

बृजभूषण की अकड़ निकली, जेल जाना तय!

भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर शिकंजा कस गया है। इस मामले में एक अंतरराष्ट्रीय कुश्ती रेफरी जगबीर सिंह समेत चार लोगों के बृज भूषण सिंह के खिलाफ गवाही के बाद बृजभूषण बुरी तरह घिर गए हैं। तो दूसरी ओर महिला पहलवानों के समर्थन में लगातार आम लोगों और खाप की गुटबंदी के बाद अब सरकार भी बृजभूषण के पीछे से हाथ खिंचती दिख रही है। यही वजह है कि दिल्ली पुलिस और एसआईटी ने बृजभूषण के खिलाफ जांच में तेजी कर दी है।

इस मामले में एसआईटी ने 200 से ज्यादा लोगों से सवाल-जवाब किया है। जिसमें रोज नई बातें निकल कर सामने आ रही हैं। इंटरनेशनल रेफरी जगबीर सिंह ने बृजभूषण का महिला पहलवानों के साथ गलत व्यवहार के मामले में भी गवाही दी है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि बृजभूषण ने नशे की हालत में महिला पहलवान के साथ अभद्र व्यवहार किया था। उस दिन कुछ तो गलत हुआ था। बृजभूषण और महिला पहलवान बगल में खड़े थे। वह असहज दिख रही थी। उसने धक्का भी दिया। कुछ बोली और फिर वहां से निकल गई। बृजभूषण पहलवानों को हाथ से छूकर बोल रहे थे कि इधर आ जा, यहां खड़ी हो जा।

इंटरनेशनल रेफरी जगबीर सिंह के मुताबिक, उन्होंने पहली बार 2013 में बृजभूषण को महिला खिलाड़ियों के साथ गलत व्यवहार करते देखा था।जगबीर के मुताबिक, ‘ये थाइलैंड का टूर था, जहां उन्होंने बृजभूषण को महिला के पीछे खड़े देखा। बृजभूषण ने महिला पहलवान को अभद्र तरीके से छुआ था।

जगबीर सिंह के अलावा एक राज्य स्तरीय कोच और कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक विजेता रेसलर ने भी बृजभूषण के खिलाफ बयान दिया है। इन लोगों ने तीन महिला पहलवानों के आरोपों की पुष्टि की है।

इन तमाम आरोपों के बाद दिल्ली पुलिस द्वारा क्राइम सीन रिक्रिएट करने के लिए महिला पहलवान संगीता फोगाट को लेकर भारतीय कुश्ती महासंघ के दफ्तर और बृजभूषण सिंह के घर पहुंचने की खबर है। बता दें कि बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ छह महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई है। इस मामले में पुलिस की जांच लगभग पूरी हो गई है। और 15 जून को पुलिस अपनी रिपोर्ट जारी करेगी।

देश की सामाजिक व्यवस्था कब संवैधानिक मूल्यों को स्वीकार करेगी?

किसी भी स्वतंत्र देश की आवाम के गरिमामयी जीवन और विकास का मूल आधार उस देश का संविधान होता है। संविधान में वर्णित नियमावली से एक देश का कार्यान्वयन और संचालन होता है। दुनियाँ के विभिन्न देशों की भांति हमारे देश को भी चलाने वाला दस्तावेज ‘भारत का संविधान’ है। जो भले ही 2 वर्ष 11 माह 18 दिन मे बना, लेकिन असलियत में इस संविधान की नींव तब डल गई थी, जब भारतीय समाज ने ब्रिटिश दासता और सदियों से चले आ रहे शोषण, अपराध, गुलामी की मुखालफत का आगाज किया था। वहीं, ब्रिटिश दासता की चरम सीमा ने देश की आवाम को अपने प्राकृतिक अधिकारों और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए खड़ा कर दिया। ऐसे में, 1947 का वह वक्त भी आ गया, जब राष्ट्र आजाद हो गया। इसके उपरांत एक महान देश के निर्माण के लिए संविधान निर्मित किया गया। ऐसे में, सदियों से भारतीय समाज जिन स्वतंत्रता, समानता जैसे अन्य प्राकृतिक अधिकारों की मांग करता आ रहा था। उन प्राकृतिक अधिकारों को संविधान निर्माताओं ने, संविधान की प्रस्तावना में, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुता, व्यक्ति की गरिमा जैसे अन्य संवैधानिक मूल्यों के रूप में दर्ज किया। वहीं, भारतीय संविधान जब समग्रता से एक दस्तावेज़ के रूप में आया। तब सम्पूर्ण संविधान का मूल संविधान की प्रस्तावना में नजर आया। ऐसे में, संविधान निर्माता डॉ भीमराव आंबेडकर ने प्रस्तावना के बारे में कहा कि, ‘‘यह वास्तव में जीवन का एक तरीका था, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में पहचानता है और जिसे एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है,,

वास्तव में, संविधान में दर्ज, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुता, व्यक्ति की गरिमा जैसे अन्य संवैधानिक मूल्य हमारे जीवन जीने का आधार है। लेकिन, ध्यातव्य है कि, आजाद भारत के 75 वर्ष बाद हम संवैधानिक मूल्यों को कितना स्वीकार पाए? और संवैधानिक मूल्यों के प्रति कितनी जागरूकता कर पाए? शायद! अपरिहार्यता से कम।

आज के दौर में विकास की चमक काफी गहरने के बाद भी हमें देश में, ये सुनने और देखने मिलता है कि, किसी दलित की शादी समारोह में घोड़ी पर रास नहीं फेरने दी जाती। ऐसी स्थिति में, कई बार तो तगड़ी मार-धाड़ भी हो जाती है। जिससे लोगों के न्याय और बंधुता जैसे संवैधानिक मूल्यों पर संकट पैदा होता है।

संवैधानिक मूल्यों के हनन को लेकर कुछ ऐसे ही अनुभव हमने सागर जिले के वंचित समुदाय के लोगों से जानने की कोशिश की।

तब अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले सागर के मकुंदी बंसल बताते है कि, हम आजाद जरूर हो गए है, लेकिन हमारे साथ गाँव में ऊंची जाति वाले ऐसे पेशाते की हमने लगता है की हम गुलाम की जंजीरों में जकड़े है। वह हमारे दूल्हे को घोड़े पर नहीं बैठने देते, अच्छे कपड़े पहनने पर, ऊंची जाति वालों से राम-राम ना करने पर, उनके सामने जमीन पर ना बैठने पर ऊंची जाति वाले खफा हो जाते है। सामाजिक नियमों को नहीं मानने पर हमें गालियां सुननी पड़ती है। यहाँ सोचनीय है कि, मकुंदी जैसे लोगों के व्यक्ति की गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता है?

फिर, बंडा विधानसभा क्षेत्र के बिहारी आदिवासी जो मुहजुबानी ऐसे पेश करते हैं, “अपने आप को ऊंचा समझने वाले लोगों के यहाँ, समारोह जब हम लोग कहना खाने जाते है तब हमें आदरपूर्वक खाना नहीं खिलाया जाता। हमारे साथ बंधुतापूर्ण व्योहार नहीं किया जाता।,,

वहीं, “जब बड़े लोग हमें मजदूरी पर बुलाते हैं और हमारी जाने की इच्छा नहीं होती तो हमें गालियां सुननी पड़ती है। ऐसे में, कभी-कभी तो हमें मार भी पड़ जाती है।,, क्या यहाँ सामाजिक न्याय जैसे संवैधानिक मूल्य का उल्लंघन नहीं होता?

आगे हमने अरबिन्द बंसल से बातचीत की। तब वे कहते हैं कि, सामाजिक असमानताएँ ग्रामीण अंचलों में इस तरह हावी है कि, सेन समाज का नाई अनुसूचित जाति के लोगों के सिर के बाल नहीं काटता। ऐसे हम लोग बंडा तहसील में सिर के बाल कटवाने जाते है। याकि स्वयं घर पर अपने सिर के बाल काटते है। पूछने पर अरबिन्द बताते है कि, नाई हमारे बाल इसलिए नहीं काटता, क्योंकि नाई के ऊपर ऊंची जाति के लोगों का दबाब रहता है। अनुसूचित जाति के लोगों के बाल काटने पर ऊंची समाज नाई और अनुसूचित जाति के लोगों पर सामाजिक प्रतिबंध लाद देता है। अनुसूचित जाति के लोगों के सिर के बाल ना काटने के हालात बंडा क्षेत्र के कई गाँव में बनी हुए है। अरबिन्द की मुहजुबनी यह याद दिलाती है की हम समानता जैसे संवैधानिक मूल्य का कब पालन करेंगे?

आगे हमारी मुलाकात बरा गाँव की राजकुमारी बाल्मीकि से हुयी। राजकुमारी प्रधानमंत्री आवास योजना होने बाद भी कच्चे मकान में रहने को मजबूर है। राजकुमारी हमें बताती हैं कि, “गाँव में हम नीची जाति है, इसलिए हमें कोई अच्छा रोजगार नहीं देता। आज भी हमारा रोजगार सड़क पर झाड़ू लगाना, टोकरी बनाना, छोटे-छोटे घरेलू समान बनाने तक सीमित है। यदि हम बाजार में खान-पान कि, कोई अच्छी दुकान खोलते है तब हमारा सामाजिक बहिष्कार किया जाता है।,,

आगे हम रूबरू होते हैं करेवना गाँव के शालकराम चौधरी से। वह कहते है कि, हमारे गाँव में हम नीची जाति वालों को चाय की टपरी पर चाय तक पीने नहीं देते है, ना ही बैठने देते है। आज भी आजाद भारत में समाज में बराबरी का हक नहीं है।

हमारे सामने सागर संभाग के छतरपुर जिले से एक ताज़ा घटना भी सामने आयी। यह घटना एक दलित की घोड़े से राज फेरने के दौरान ऊंची जाति के लोगों द्वारा पत्थर मारने की है। दरअसल, शादी समारोह में दलित दूल्हे की राज पुलिस की अगुआई में फेरी जा रही थी। लेकिन ऊंची जाति के लोगों को यह पसंद नहीं आया। ऐसे में उन्होंने शादी वाले पक्ष पर पथराव कर दिया, जिसमें तीन पुलिस वाले घायल हो गए। पुलिस ने मामले को अपने संज्ञान में लिया है। ऐसी घटनाएं क्या इस ओर संकेत नहीं करती कि, लोगों का स्वतंत्रता जैसा संवैधानिक मूल्य खतरे में है?

विचारणीय है कि, एक तरफ हमारे संविधान के स्वतंत्रता, समानता, न्याय जैसे विभिन्न संवैधानिक मूल्य है, जो लोगों को कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनाकर, उनके अधिकारों और‌ कर्तव्यों के संरक्षण का बोध कराते हैं। वहीं, दूसरी ओर वे सामाजिक मूल्य हैं, जो इंसान को इंसान बनने में रोड़ा उत्पन्न करते हैं। जैसे, जातिवाद, छुआछूत, सामाजिक भेदभाव, कुप्रथाएं गैर जरूरी परंम्पराएं‌ और रीतिरिवाज जैसे अन्य समाजिक मूल्य। बसुधैव कुटुबंकम की भावना का संचार करना है, तब हमें स्वतंत्रता, समानता, न्याय जैसे अन्य संवैधानिक मूल्यों की दृढ़ता बढ़ावा देना‌ होगा, तब कई मायनों में देश समाजिक, आर्थिक शैक्षणिक अन्य विकास की ओर अग्रसर हो पायेगा।

क्रिकेट की गेंद छूने पर अंगूठा काटा, अंबेडकर जयंती मनाने पर युवक की हत्या

 जून के पहले हफ्ते में महाराष्ट्र के नांदेड़ से खबर आई थी कि बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर जयंती मनाने के कारण 24 साल के दलित युवक की हत्या कर दी गई। अभी दलित समाज इस दर्द से उबरा भी नहीं था कि गुजरात के पाटन जिले में दलित समाज के एक बच्चे ने गेंद छू लिया तो उसके बाद शुरु हुए विवाद में बच्चे के परिवार के साथ न सिर्फ मारपीट की गई, बल्कि चाचा का अंगूठा काट लिया। एक मामूली बात को लेकर मारपीट और अंगूठा काटने की यह घटना रविवार 4 जून की है। दरअसल गुजरात के पाटन जिले मे कुछ युवक क्रिकेट खेल रहे थे। बाल बच्चे के पास गई तो बच्चे ने गेंद को उठा लिया। इत्तेफाक से लड़का दलित समाज से ताल्लुक रखता था। इसके बाद क्रिकेट खेल रहे जातिवादी समाज के गुंडे युवक भड़क गए और उसको गालियां देने लगे और जमकर उत्पात मचाया। बच्चे के चाचा धीरज परमार ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई तो मामला शांत हो गया। लेकिन इसके बाद क्रिकेट खेलने वाले जातिवादी युवाओं का समूह हथियारों से लैस होकर बच्चे के घर पहुंच गए और बॉल उठाने वाले बच्चे के चाचा धीरज परमार और उनके भाई कीर्ति पर हमला कर दिया। मारपीट करने के अलावा इन लोगों ने चाचा धीरज परमार का हाथ का अंगूठा काट दिया। इसके बाद दलित समाज के लोग इंसाफ के लिए सड़कों पर उतर गए।

इसके बाद आरोपियों पर आईपीसी की धारा 326 (खतरनाक हथियारों से जानबूझ कर चोट पहुंचाना), 506 (आपराधिक धमकी) और एससी-एसटी एक्ट में मामला दर्ज कर लिया गया है। लेकिन एक बड़ा सवाल यह कि इतनी छोटी घटनाओं के बाद दलित समाज पर इस तरह से अत्याचार करने की वजह क्या है? दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने ट्विटर पर इस मुद्दे को पोस्ट किया है, जिसमें उनका कहना है कि सवाल यह भी है कि दलितों पर बिना वजह या मामूली बात को लेकर अत्याचार करने वाले समाज के लोग अपने समाज के जातिवादी गुंडों की गुंडई पर शर्मिंदा होते होंगे क्या??

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सुरीनाम के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित

सूरीनाम के राष्ट्रपति से सूरीनाम का सूरीनाम का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार "ग्रैंड ऑर्डर ऑफ द चेन ऑफ द येलो स्टार" ग्रहण करती भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू

भारत देश और हर भारतीय के लिए गर्व की खबर सामने आई है। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सुरीनाम देश के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया गया है। राष्ट्रपति मुर्मू को “ग्रैंड आर्डर ऑफ द चेन ऑफ द यलो स्टार” सम्मान से सम्मानित किया गया है। इसकी जानकारी राष्ट्रपति भवन ने ट्विटर के जरिये दी। इस खबर के सामने आने के बाद हर कोई इसे गौरव का पल बता रहा है। वहीं दूसरी ओर इस सम्मान के मिलने पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि यह सम्मान सिर्फ मेरे लिए नहीं, बल्कि भारत के उन सभी 1.4 अरब लोगों के लिए भी अत्यधिक महत्व रखती है जिनका मैं प्रतिनिधित्व करता हूं। राष्ट्रपति मुर्मू ने यह सम्मान भारतीय-सूरीनाम समुदाय की आने वाली पीढ़ियों को समर्पित करते हुए कहा कि उन्होंने हमारे दोनों देशों के बीच भ्रातृत्व संबंधों को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राष्ट्रपति जी ने कहा कि सूरीनाम में भारतीय आगमन की 150वीं वर्षगांठ के ऐतिहासिक मौके पर यह सम्मान प्राप्त करना इसे और विशेष बनाता है। अगर यह सम्मान हमारे दोनों देशों में महिलाओं के सशक्तिकरण और प्रोत्साहन के प्रकाश स्तंभ के रूप में काम करता है तो यह और भी सार्थक हो जाता है। इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सूरीनाम में मामा शरणन स्मारक पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। यह स्मारक मामा सरनन, या मदर सूरीनाम का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें उनके पांच बच्चे हैं, पांच जातीयताएं जो सूरीनाम में देखभाल और स्नेह के साथ निवास करती हैं। यह स्मारक सूरीनाम में कदम रखने वाले पहले भारतीय पुरुष और महिला का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व था। इस मौके पर सूरीनाम पहुंचे 34,000 भारतीयों के बलिदान और संघर्ष को भी याद किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सूरीनाम में भारतीयों के आगमन के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में डाक टिकटों के विशेष आवरण भेंट किए गए। जबकि राष्ट्रपति की ओर से सूरीनाम के राष्ट्रपति को सांकेतिक रूप से दवाओं का डिब्बा भेंट किया। दरअसल भारत ने सूरीनाम को आपातकालीन दवाओं से मदद की है। इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उम्मीद जताई कि आने वाले दिनों में भारतीय समुदाय और सुरीनाम के बीच संबंध और बेहतर होंगे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस दौरान सुरीनाम की जनता को भारत आने और उसके विकास को देखने के लिए आमंत्रित किया।

पर्यावरण को पंगु करते कार्पोरेट निगमों की अकूत मुनाफे की लालच और उपभोक्ता जीवन शैली

फिदेल कास्त्रो ने 1992 में कहा था, “एक महत्वपूर्ण जैविक प्रजाति– मानव जाति – के सामने अपने प्राकृतिक वास-स्थान के तीव्र और क्रमशः बढ़ते विनाश के कारण विलुप्त होने का खतरा है… मानव जाति के सामने आज एक अनिश्चित भविष्य मुंह बाये खड़ा है, जिसके बारे में यदि हम समय रहते ठोस और प्रभावी कदम उठाने में असफल रहते हैं, तो धनी और विकसित देशों की जनता भी, दुनिया की गरीब जनता के साथ मिलकर एक ही जमीन पर खड़ी, अपने अस्तित्व के खतरे और अंधकारमय भविष्य से जूझ रही होगी।”
फिदेल कास्त्रो (1992)
“अगर हम ऐसा नहीं करते ( अकूत मुनाफे की लालच और उपभोक्तावादी जीवन-शैली नहीं छोड़ते) तो संसार की सबसे अद्भुत रचना मानव जाति गायब हो जाएगी…इस धरती को मानवता की समाधि न बनायें, इसमें हम समर्थ हैं।आइए इस धरती को स्वर्ग बनाएं, जीवन का, शान्ति का स्वर्ग,सम्पूर्ण मानवता के लिए, शांति और भाईचारा के लिए । इसके लिए हमें अपनी स्वार्थपरता छोड़नी पड़ेगी।”
ह्यूगो शावेज ( 2009)
 मानव सहित सभी प्रजातियों तथा स्वयं धरती का अस्तित्व खतरे में है। शायद ही कोई तथ्यों से अवगत व्यक्ति इससे इंकार करे। तमाम आनाकानी के बावजूद चीखते तथ्यों तथा भयावह प्राकृतिक आपदाओं एंव विध्वंसों ने दुनिया को तथ्य को स्वीकार करने के लिए इस कदर बाध्य कर दिया है कि वे इस हकीकत से इंकार न कर सके। इस स्थिति से निपटने के लिए, कई अंंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और संधि-समझौते हो चुके हैं। ये सम्मेलन या कार्य-योजनाएं दुनिया भर के पर्यावरणविदों तथा मनुष्य एवं धरती को प्यार करने वाले लोगों की उम्मीदों का केन्द्र रहे हैं, क्योंकि इस सम्मेलन की सफलता या असफलता पर ही मानव जाति के अस्तित्व का दारोमदार टिका हुआ था। इसी से यह तय होना था कि आने वाले वर्षों या सदियों में कौन से देश का अस्तित्व बचेगा या कौन सा देश समुद्र में समा जायेगा या किस देश का कितना हिस्सा समुद्र में डूब जायेगा, कितने देश या क्षेत्र ऐसे होगें, जिनका नामो-निशान ही नहीं बचेगा। कितनी प्रजातियां कब विलुप्त हो जाएंगी। मानव प्रजाति का अस्तित्व कितने दिनों तक कायम रहेगा। समुद्री तूफान,सुनामी या अतिशय बारिश किन क्षेत्रों को तबाह कर देगी, किस पैमाने पर जान-माल की क्षति होगी। कितने इलाके रेगिस्तान में बदल जाएंगे। बाढ़, सूखा या असमय बारिश कितने लोगों पर किस कदर कहर ढायेगी।
 हमें प्रकृति के प्रति अपने नजरिये में बदलाव लाना होगा तथा उपभोक्तावादी जीवन शैली का परित्याग करना होगा। इसी चीज को रेखांकित करते हुए कोपनहेगन सम्मेलन(2009 में ह्यूगो शावेज ने कहा था कि अगर हम ऐसा नहीं करते तो संसार की सबसे अद्भुत रचना मानव जाति गायब हो जाएगी…इस धरती को मानवता की समाधि न बनायें, इसमें हम समर्थ हैं।आइए इस धरती को स्वर्ग बनाएं, जीवन का, शान्ति का स्वर्ग,सम्पूर्ण मानवता के लिए, शांति और भाईचारा के लिए । इसके लिए हमें अपनी स्वार्थपरता छोड़नी पड़ेगी। इसी बात को वर्षों पहले फिदेल कास्त्रो ने कहा था कि स्वार्थपरता बहुत हो चुकी। दुनिया पर वर्चस्व कायम करने के मंसूबे बहुत हुए। असंवेदनशीलता, गैरजिम्मेदारी और फरेब की हद हो चुकी। जिसे हमें बहुत पहले करना चाहिए था, उसे करने के लिए बहुत देर हो चुकी है। कोचाबाम्बा मसविदा दस्तावेज से शब्द उधार लेकर कहें तो एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना बेहद जरूरी है जो प्रकृति के साथ और मानवजाति के बीच आपसी तालमेल के लिए फिर से बहस करे।

आंबेडकर ने कबीर को अपना गुरु क्यों माना

बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने तीन लोगों को अपना गुरु माना था। ये थे, गौतम बुद्ध, कबीर और जोतिराव फुले को अपना गुरु माना। ये तीनों भारत के तीन युगों की सबसे क्रांतिकारी और प्रगतिशील वैचारिकी का प्रतिनिधित्व करते हैं और उसके मूर्त रूप हैं। जिसे बहुजन-श्रमण वैचारिकी कहते हैं। गौतम बुद्ध प्राचीन भारत, कबीर मध्यकालीन भारत और जोतिराव फुले आधुनिक भारत की सबसे मानवीय और उन्नत वैचारिकी के प्रतिनिधि हैं।
इन तीनों की संवेदना और वैचारिकी में वेदों और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के लिए कोई जगह नहीं। कबीर और जोतीराव फुले ने वेदों- ब्राह्मणों की श्रेष्ठता खुली चुनौती दी है और वर्ण-व्यवस्था को खारिज किया। इनमें कोई ब्राह्मण या द्विज नहीं था। जहां कबीर और जोतिराव फुले वर्ण-व्यवस्था के क्रम में कहे जाने वाले शूद्र समुदाय में जन्म लिए हैं। वहीं गौतम बुद्ध शाक्य कबीले में पैदा हुए थे। जिसमें वर्ण-व्यवस्था नहीं थी। वे न क्षत्रिय थे, न ब्राह्मण और न ही शूद्र।
ये तीनों उत्पादक-श्रमशील समाज में पैदा हुए थे। गौतम बुद्ध, कबीर और जोतीराव फुले को तीनों युगों के प्रतिनिधि के रूप में रेखांकित करके आंबेडकर ने भारत की क्रांतिकारी-प्रगतिशील परंपरा की निरंतरता को रेखांकित किया। इन तीनों को गुरु मानकर आंबेडकर ने पुरजोर तरीके यह रेखांकित किया कि इन तीनों के विचारों और व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर ही आधुनिक भारत का निर्माण किया जा सकता है। ऐसा भारत जिसके केंद्र में समता, स्वतंत्रता, बंधुता और सबके लिए न्याय हो।
आधुनिक भारत में एक मात्र आंबेडकर थे, जिन्होंने भारत की देशज क्रांतिकारी-प्रगतिशील परंपरा की पूरी यात्रा को इन तीनों के माध्यम से रेखांकित किया। भारत का कोई दूसरा नायक या विचारक इसको ठोस और मुकम्मल रूप में रेखांकित नहीं कर पाया और न समझ पाया। भारत में पैदा हुए इतिहासकार प्रोफेशन के अर्थों में भले इतिहासकार रहें हों, लेकिन प्राचीन भारत से आधुनिक भारत की तक की यात्रा को समझने की उनके पास इतिहास दृष्टि नहीं थी।
यह इतिहास दृष्टि सिर्फ और सिर्फ आंबेडकर के पास थी। गौतम बुद्ध, कबीर और फुले को भारत के तीन युगों के प्रतिनिधि के रूप में रेखांकित करना इसी इतिहास दृष्टि का परिणाम था। जैसे मार्क्स के पहले बहुतेरे इतिहासकार दुनिया में हुए थे, लेकिन उनके पास मानव जाति की यात्रा को समझने के लिए मुकम्मल इतिहास दृष्टि नहीं थी। दुनिया को मुकम्मल इतिहास दृष्टि मार्क्स ने दी। उसी तरह आंबेडकर से पहले भारत की ऐतिहासिक यात्रा को समझने की मुकम्मल इतिहास दृष्टि से सिर्फ और सिर्फ आंबेडकर पास थी। जिसकी सबसे सूत्रवत अभिव्यक्ति उन्होंने अपनी किताब ‘ प्राचीन भारत में क्रांति औ प्रतिक्रांति’ में की है।
मार्क्स की शब्दावली का इस्तेमाल करें तो,अब तक का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास रहा है। भारत का इतिहास भी वर्ग-संघर्ष का इतिहास रहा है। यहां वर्ग ने खुद वर्ण-जाति के रूप में अभिव्यक्त किया। वर्ग-संघर्ष में हमेशा एक प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी वर्ग होता है। परजीवी और शोषक वर्ग प्रतिक्रियावादी वर्ग होता है। उत्पादक और मेहनकश वर्ग प्रगतिशील वर्ग होता है। भारत में ब्राह्मण, श्रत्रिय और वैश्य (द्विज) परजीवी और शोषक वर्ण (वर्ग) रहे हैं। जिन्हें शूद्र और अतिशूद्र कहा जाता है, वे उत्पादक और प्रगतिशील वर्ग रहे हैं।
गौतम बुद्ध, कबीर और जोतिराव फुले भारत के वर्ग-संघर्ष (वर्ण संघर्ष) के क्रांतिकारी विरासत के मूर्त रूप हैं। आंबेडकर ने इन्हें अपना गुरु मानकर इसे पुरजोर तरीके से रेखांकित किया। कबीर भारत के मध्यकाल के सबसे क्रांतिकारी-प्रगतिशील और महान व्यक्तित्व हैं। उन्हें सादर स्मरण करते हुए।

पकड़ा गया Savarkar को हीरो बनाने को लेकर रचा गया झूठ

28 मई को विनायक दामोदर सावरकर की 140वीं जयंती के मौके पर फिल्म स्वातंत्र्य वीर सावरकर का टीजर रिलीज हुआ। लेकिन इसमें जो कुछ भी कहा गया, उसको लेकर जबरदस्त विवाद शुरू हो गया है। फिल्म के टीजर में कहा गया है कि सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और खुदीराम बोस ने सावरकर से प्रेरणा ली थी। इसी बात को लेकर रणदीप हुड़्डा की जमकर आलोचना हो रही है। जिन लोगों ने भी इन तीनों महानायकों को पढ़ा है वह फिल्म मेकर्स की इस बात से खासे हैरान हैं। यहां तक की सुभाष चंद्र बोस के परिवार ने भी इसका मजबूती से विरोध किया है। नेताजी के पड़पोते चंद्र कुमार बोस ने फिल्म मेकर्स और रणदीप हुड्डा के दावे को खारिज करते हुए कहा कि, सुभाष चंद्र बोस ने पूरी जिंदगी हर जगह अपने भाषणों और लेखों में जिन दो नायकों से प्रभावित होने की बात कही, उनमें एक स्वामी विवेकानंद थे और दूसरे उनके राजनीतिक गुरु देशबंधु चितरंजन दास। यही नहीं रणदीप हुड्डा और अन्य फिल्म मेकर्स जिस सुभाष चंद्र बोस को सावरकर से प्रभावित बता रहे हैं, उन्होंने खुद अपनी एक किताब में सावरकर की पोल खोली है। नेताजी ने द इंडियन स्ट्रगल 1920-42 में लिखा है कि ‘दूसरे विश्व युद्ध से पहले मैंने जिन्ना व सावरकर से आजादी के लिए संघर्ष की बात की। जिन्ना अंग्रेजों की मदद से पाकिस्तान बनाना चाहते थे। सावरकर सोच रहे थे कि सेना में घुसकर हिन्दू कैसे सैनिक ट्रेनिंग लें। मैं नाउम्मीद हो गया।’

तो वहीं दूसरी ओर भगत सिंह को पढ़ने से साफ जाहिर होता है कि उन्होंने हमेशा सांप्रदायिक शक्तियों की निंदा की। उन्होंने हमेशा से धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों को अपने लेखों में आड़े हाथों लिया। इसी मुद्दे पर एक्ट्रेस स्वास्तिका मुखर्जी ने भी सवाल उठाया। स्वास्तिका ने खुदीराम बोस का जिक्र करते हुए ट्विटर पर सवाल उठाया कि जिस खुदीराम बोस का 18 साल की उम्र में निधन हो गया था, क्या इस उम्र के पहले भी उन्हें किसी ने स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया था?

उन्होंने सवाल उठाया कि ये प्रेरक कहानियां कहां से आ रही हैं? मैं फिल्मों की इस बिकाऊ पिच से सहमत नहीं हूं। चुने हुए लोगों को ऊंचे आसन पर बिठाना आवश्यक है। साफ है कि एक एजेंडे के तहत कुछ खास नायकों को लोगों के दिमाग में स्थापित किया जा रहा है। ऐसा कर खासकर उन युवाओं को टारगेट किया जा रहा है जिनकी उम्र 30 साल के नीचे है और जो फिलहाल किताबें पढ़ने की बजाय सोशल मीडिया और फिल्में देखकर अपनी राय कायम कर रहे हैं।

सुरक्षा घेरे में नए संसद का उद्धाटन बताता है कि सरकार डरी हुई है

जेल जाने के बाद अंग्रेजों से गिड़गिड़ा कर माफी मांगने वाले हिन्दू राष्ट्र के समर्थक विनय दामोदर सावरकर की जयंती के मौके पर सवारकर को अपना नायक मानने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता और फिलहाल 2024 तक के लिए भारत के प्रधानमंत्री का काम-काज देख रहे नरेन्द्र मोदी ने आज 28 मई को भारत के नए संसद भवन का उद्घाटन कर दिया। भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के समर्थक कई नेताओं के मुखिया नरेन्द्र मोदी ने यह काम दर्जन भर से ज्यादा हिन्दू पुरोहितों की मौजूदगी में की।

इस दौरान संसद भवन से कुछ ही फर्लांग की दूरी पर इसी भारत के लिए दुनिया के सबसे बड़े खेल महोत्सव ओलंपिक में पदक जीतकर भारत के हर एक व्यक्ति की छाती चौड़ी करने वाले खिलाड़ियों के इंसाफ के आंदोलन को कुचल दिया गया। भाजपा नेता और कुश्ती फेडरेशन के बृजभूषण सिंह पर शोषण का आरोप लगाने के बाद ये खिलाड़ी करीब महीने भर से आंदोलन कर रहे थे। न तो भारत सरकार, न ही उसकी पुलिस उन्हें न्याय दिला सकी, उल्टे जब सरकार नए संसद भवन का जश्न मना रही थी, जंतर-मंतर पर पुलिस खिलाड़ियों के टेंट उखाड़ने के बाद उनको घसीट रही थी।

दिल्ली के आस-पास से इन महिला पहलवानों के समर्थन में जंतर-मंतर पहुंचने वाले लोगों को बसों में भरकर जेलों में डाल रही थी। जो लोग सोशल मीडिया पर इसका विरोध कर रहे थे, सरकारी ट्रोलर उनके साथ गाली-गलौच कर रहे थे।

  लेकिन दूसरी ओर नए संसद के जश्न से विपक्ष का बड़ा हिस्सा गायब था। संसद के आस-पास एक भी विरोधी को पहुंचने नहीं दिया गया। राजा और उसके कारिदों की छाती फुली थी कि विरोध की हर आवाज को दबा दिया गया है। राजा, मंत्री, संतरी, और कारिंदे सब खुश थे। नए भवन को देखकर इठला रहे थे।

 लेकिन सवाल बस एक है कि जिस संसद भवन के उद्घाटन के दौरान थोड़ी दूर पर हजारों लोग सरकार का विरोध करने के लिए इकट्ठा थे। विपक्ष गायब था। उसको कैसे मुकम्मल माना जाए। जिस नए संसद भवन के उद्घाटन के वक्त उसके आस-पास उत्साहित जनता का हुजूम होना चाहिए था, वहां पुलिस का पहरा इसलिए लगाना पड़ा कि कोई विरोध का झंडा लेकर न पहुंच जाए। यह पहरा बताता है कि देश का हुक्मरान डरा हुआ है।