‘अंबेडकर मिशन पत्रिका’ के संपादक बुद्ध शरण हंस का परिनिर्वाण, देश भर के अंबेडकरवादियों ने किया याद

 देश के प्रख्यात बहुजन लेखक सामाजिक क्रांति के अग्रदूत एवं पूर्व आईएएस अधिकारी मान्यवर बुद्ध शरण हंस अब हमारे बीच नहीं रहे। बृहस्पतिवार को सायं 4:30 बजे, पटना एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। बुद्ध शरण हंस का जन्म 8 अप्रैल 1942 को बिहार के गया जिले के वजीरगंज अंचल के तिलोरा गांव में हुआ था। बुद्ध शरण हंस हिन्दी साहित्य के उन दुर्लभ लेखकों में हैं जिनके जीवन और साहित्य दोनों में कोई अंतर नजर नहीं आता। उन्होंने कहानी, कविता, जीवनी आत्मकथा संपादन और प्रकाशन की दुनिया में फुले और आंबेडकरवाद की वैचारिकी को लेकर जो काम किया है वह आमतौर पर साहित्य में बहुत कम देखने को मिलता है।

उनके अबतक चार कथा संग्रह, आत्मकथाओं के पांच संग्रह, एक कविता संग्रह, और धार्मिक यथास्थितिवाद पर चोट करती दर्जनों पुस्तिकाएं छप चुकी हैं। वे अरसे से ‘आंबेडकर मिशन’ पत्रिका का प्रकाशन करते रहे हैं और इसी नाम से प्रकाशन भी चलाते रहे हैं। वे सन् 1969 से 2000 तक बिहार प्रशासनिक सेवा में रहे। भारतीय दलित अकादमी, दिल्ली द्वारा आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार और बिहार सरकार द्वारा वर्ष 2002 में भीमराव आंबेडकर पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया गया है।

बुद्ध शरण हंस का जन्म एक महागरीब परिवार में हुआ। बड़े भाई भागीरथ पासवान पढ़े-लिखे थे। उन्होंने बुद्ध शरण हंस का नाम दलित प्रसाद रख दिया था। इस नाम के पीछे बड़े भाई की यह सोच थी कि चूंकि हम विपन्न परिवार में जन्मे थे, इसलिए यह नाम इस परिवेश को स्पष्ट करता था। जब बुद्ध शरण हंस का दाखिला आठवीं कक्षा में होने को था तो हेडमास्टर ने उनका नाम पूछा तो बद्ध शरण हंस ने अपना नाम दिलीप कुमार राय बताया तो हेडमास्टर साहब ने पूछा कि घर का नाम क्या है? तब बुद्ध शरण हंस ने दलित प्रसाद बतलाया तो हेडमास्टर साहब ने कहा कि एक नेता है भोला पासवान। आज से तुम्हारा नाम दलित पासवान हो गया। और यही नाम आगे की शैक्षिक डिग्रियों में भी चलता रहा।

उनके परिनिर्वाण के बाद देश भर के बुद्धिजीवियों ने उन्हें याद किया है। वरिष्ठ साहित्यार जयप्रकाश कर्दम ने लिखा है-

बुद्ध शरण हंस नहीं रहे। अत्यंत दुःखद सूचना है। मान्यवर बुद्धशरण हंस जी से कई दसकों का लंबा संबंध रहा। दलित साहिय के एक आयोजन में पटना में ही 1995 में उनसे पहली बार मुलाक़ात हुई जो बाद में प्रगाढ़ हुई। अनेक स्थानों पर अनेक आयोजनों में हम निरंतर मिलते रहे और एक-दूसरे के साथ अपने विचार साझा करते रहे। बौद्ध धर्म और संस्कृति के विद्वान होने के साथ-साथ वह बौद्ध धर्म के प्रचारक भी थे। उनका जीवन बौद्ध धर्म को समर्पित था। बौद्ध धर्म के प्रचार के उद्देश्य से उन्होंने छोटी छोटी बहुत सी पुस्तकें लिखीं और घर-घर पहुँचाने का काम किया।

वह अस्वस्थ थे। ठीक से चल-फिर नहीं सकते थे, लेकिन अम्बेडकर मिशन को आगे बढ़ाने का उनका उत्साह कम नहीं हुआ था। उनका नवीनतम अभियान झोला पुस्तकालय था, जिसके अंतर्गत अपनी लिखित किताबों का एक बंडल एक हज़ार रुपए लेकर लोगों को देते थे। दो माह पूर्व ही नवंबर में पटना जाना हुआ तो मित्र मुसाफ़िर बैठा और अरविंद पासवान जी के सहयोग से मराठी साहित्यकार मित्र शरण कुमार लिंबाले और कामरेड एन.के.नंदा के साथ बुद्धशरण हंस जी से मिलने उनके घर गया था। अनके झोला अभियान को अपना समर्थन देने के लिए मैंने भी पुस्तकों के दो बंडल ख़रीदने के लिए उनको दो हज़ार रुपए दिए। उनकी पुस्तकों के वह दोनों बंडल मैंने कुछ अन्य पुस्तकों के साथ दो पुस्तकालयों को भेंट किए हैं। बुद्धशरण हंस अंबेडकरवादी आंदोलन की पहचान थे तथा बिहार में अंबेडकरवादी आन्दोलन का चेहरा थे। अनेक लोगों को उन्होंने अंबेडकरवाद एवं बौद्ध धर्म के प्रति जागरूक किया और अम्बेडकर मिशन से जोड़ा. बुद्धशरण हंस जी को सादर नमन.

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सिद्धार्थ रामू ने लिखा- यह सच है कि ब्राह्मणवाद के चाख-चौबंद किले में कैद दलितों की मुक्ति का द्वार आधुनिक युग में फुले दंपत्ति ने खोला था। उस द्वार को शाहू महाराज ने और चौड़ा किया। बाबा साहेब ने उस एक विशाल हाइवे में बदल दिया। पर जिन लाखों लोगों ने फुले-शाहू जी और बाबा साहेब के दलित मुक्ति के सपने को जन-जन का सपना बनाया और उसे जमीन पर उतारने के लिए अपने को पूरी तरह समर्पित कर दिया। उसमें एक बड़ा व्यक्तित्व बुद्ध शरण हंस भी थे। बुद्ध शरण हंस जैसे लाखों मिशनरी लोगों ने यदि बाबा साहेब के मिशन को पूरा करने के लिए अपनी जिंदगी न लगाई होती तो हम आज हम जहां खड़े हैं, हमारे पास प्रतिवाद, प्रतिरोध और संघर्ष की जो शक्ति और आवाज है, वह नहीं होती।

बुद्ध शरण ने बाबा साहेब के आह्वान को स्वीकार करते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण किया। आईएएस बने। पर उन्होंने कभी इसका गुमान नहीं पाला कि वे आईएएस हैं। उनके लिए यह पद बाबा साहेब के मिशन को पूरा करने का एक साधन था। व्यक्तिगत अहंकार और पद-प्रतिष्ठा का विषय नहीं। उन्होंने इस उपलब्धि को कभी अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं माना। वे हमेशा बात-चीत में कहते थे कि यदि फुले-शाहू जी और बाबा साहेब ने संघर्ष न किया होता तो हम आज भी अपने बाप-दादों ( पुरखों की तरह) हलवाही कर रहे होते या सफाई कर्मी होते।

उनके दिल-दिमाग में स्पष्ट था कि उन्हें जो कुछ पद-प्रतिष्ठा और धन के रूप में मिला है, बाबा साहेब और अन्य नायकों के नेतृत्व में चले सामूहिक संघर्षों की देन है। यह मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। इसके चलते उन्होंने अपनी योग्यता, क्षमता और प्रतिभा और कमाई को दलित-बहुजनों की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया। जो कोई भी उनसे मिला होगा,उसे इसका अहसास होगा कि उनसे मिलकर लगता ही नहीं था कि यह व्यक्ति इतना बड़ा भारत सरकार का अधिकारी है या रहा है।

बुद्ध शरण हंस एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह मिशन के साथी थे। मैं बड़ा हूं, तू छोटा है। मैं अफसर हूं, तो चपरासी। यह कभी उनके व्यवहार में नहीं दिखता था। उनका झोला पुस्तकालय, उनकी छोटी-छोटी पुस्तिकाएं, पत्रिकाएं और उनकी किताबें किसी विद्वान की विद्ववतापूर्ण उपदेश नहीं थीं। बल्कि इस चिंता से प्रेरित थीं कि कैसे सहज-सरल और सामान्य तरीके से बाबा साहेब और उनके विचारों को लोगों तक पहुंचाए जाए। कैसे ब्राह्मणवाद से पूर्ण मुक्ति का रास्ता प्रशस्त किया जाए। ब्राह्मणवाद के चंगुल से दलित-बहुजन मुक्ति के संघर्ष में लगे हममें से बहुत सारे लोग यह शायद भूल रहे हैं कि लाखों बुद्ध शरण हंस इस देश में दलित-बहुजनों के मुक्ति के संघर्ष की नींव में खपे, तब जाकर हम आज इस स्थिति में हैं कि ब्राह्मणवाद को हर स्तर पर चुनौती दे सकते हैं। बुद्ध शरण हंस मेरे लिए मेरे परदादा की तरह थे, सिर्फ़ वैचारिक और संवेदनात्मक स्तर पर ही नहीं, व्यक्तिगत स्तर पर भी। परदादा की तरह का स्नेह, उसी तरह का ख्याल, उसी तरह की प्रेरणा देने वाले। पटना जाने पर करीब तीन-चार बार ही उनसे मिल पाया। पर उनका फोन अक्सर आ जाता था,इस विषय पर भी लिखो, उस विषय पर लिखो। तुम अच्छा लिखे हो। निजी बात यह कि वे उन लोगों में से थे, जो घर में रोटी बन रही है या नहीं। जेब में दो रूपया है या नहीं। कोई दिक्कत तो नहीं है, बताओ? बच्ची कैसी है? पुरखे बुद्ध शरण हंस को सादर नमन के साथ अंतिम अलविदा।

भागलपुर यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग के प्रोफेसर रहे बिलक्षण बौद्ध ने लिखा- बिहार में बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर और बौद्ध धम्म को बहुजन समाज में निर्भीक योद्धा बन कर जीवन भर फैलाने वाले , बहुजन समाज की मजबूत आवाज एवं सामाजिक क्रांति के लेखक पूर्व आईएएस अधिकारी मान्यवर बुद्धशरण हंस जी अब हमारे बीच नहीं रहे । आज सायं 4:30 बजे, पटना एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। यह बहुजन आंदोलन के लिए अपूरणीय क्षति है। बहुजन समाज की ओर से उनके प्रति विनम्र श्रद्धांजलि और नमन पटना और आस-पास के सभी साथियों से विनम्र अनुरोध है कि उनके निवास स्थान विष्णुपुरी, चितकोहरा, पटना पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करें।

दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने लिखा- 
जिस दौर में सामंतवाद अपने चरम पर था, उस दौर में उनका नाम दलित पासवान रखा गया। जिस दौर में दलितों का मनुवादियों से नजर मिलाना मुश्किल था, उस दौर में उन्होंने मनुवाद से आंख मिलाते हुए मनुस्मृति का दहन कर विरोध जताया था। जिस दौर में बिहार में किसी आम आदमी का बौद्ध धम्म से दूर-दूर तक नाता नहीं था, उस वक्त उन्होंने बौद्ध धम्म अपनाया। जिस दौर में बिहार के लोग अंबेडकरवाद से बहुत दूर थे, उन्हें जागरूक करने के लिए उन्होंने ‘अंबेडकर मिशन पत्रिका’ प्रकाशित किया और अपने आखिरी सांस तक चलाया। लोगों को पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित करने के लिए उन्होंने सावित्री बाई फुले झोला पुस्तकालय शुरू किया। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक टुकड़े-टुकड़े आईना एक ऐसा दस्तावेज है, जिसे जो पढ़ ले ब्राह्मणवाद के ढकोसले से दूर हो जाएगा। विचारधारा के प्रति उनका समर्पण इतना था कि भले ही कोई उनका कितना भी करीबी रहा हो और अगर कोई आयोजन बौद्ध रीति से न हो तो वह उससे दूरी बना लेते थे।
बुद्ध शरण हंस सर के ऐसे ही कितने परिचय हैं। उन्होंने अकेले बूते वो किया, जो बड़े-बड़े संगठन नहीं कर पाते। 22 जनवरी को पटना एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनसे जो मिला, उनका होकर रह गया। उन हजारों लोगों की भीड़ में एक मैं भी हूं। दिल्ली में जब ‘दलित दस्तक’ ने ‘मूकनायक के 100 साल’ पूरे होने पर भव्य आयोजन किया था, हमने उन्हें आग्रह सहित आमंत्रित किया था। तब उन्हें ‘डॉ. आंबेडकर पत्रकारिता सम्मान’ से सम्मानित किया गया था। आप याद आएंगे सर। जय भीम-नमो बुद्धाय।

झारखंड में आदिवासी संस्कृति को विश्व धरोहर बनाने की पहल

झारखंड में प्राचीन मेगालिथ

रांची। पिछले दिनों झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक ऐतिहासिक चट्टानों के साथ एक फोटो शेयर की थी। दरअसल वो कोई आम चट्टान नहीं थे, बल्कि झारखंड की धरोहर प्राचीन मेगालिथ, मोनेलिथ और जीवाश्म थे। झारखंड सरकार ने अपने इस धरोहर को संरक्षित करने और उसे यूनोस्को के विश्व धरोहर की सूची में शामिल करवाने की मुहिम शुरू कर दी है। प्रदेश के पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार एक प्रतिनिधि मंडल के साथ इसके लिए यूनाइटेड किंगडम के दौरे पर हैं।

इस यात्रा में झारखंड सरकार और उससे जुड़ी साझेदार संस्थाओं ने लंदन स्थित एक अंतरराष्ट्रीय आर्कियोलॉजी संस्थान के साथ प्रारंभिक चर्चा भी पूरी कर ली है। झारखंड के कई जिलों में फैली यह मेगालिथिक विरासत आदिवासी समाज के सामाजिक जीवन, धार्मिक विश्वास, स्मृति-परंपरा और मृतक संस्कारों से गहराई से जुड़ी हुई है। बड़े-बड़े पत्थरों से बने स्मारक, खड़े पत्थर (Menhir), पत्थर की कब्रें और अनुष्ठान स्थल आदिवासी इतिहास की हजारों साल पुरानी परंपरा को दर्शाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने में मदद मिलेगी। विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से इन स्थलों के संरक्षण, शोध, पर्यटन और स्थानीय समुदाय की आजीविका को भी मजबूती मिल सकती है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, अगले चरण में इन स्थलों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, दस्तावेजीकरण और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार मूल्यांकन किया जाएगा। इसके बाद यूनेस्को को प्रस्ताव भेजने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। इस पूरी प्रक्रिया में आदिवासी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि संरक्षण के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता बनी रहे।

झारखंड के पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार यूनाइटेड किंगडम की यात्रा के दौरान नवभारत टाईम्स को दिये अपने बयान में मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड सरकार राज्य की अमूल्य मेगालिथिक-मोनोलिथिक विरासत के संरक्षण, पुनर्स्थापन एवं सतत प्रबंधन के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि सरका इस विरासत को केवल एक पुरातात्विक धरोहर नहीं, बल्कि आदिवासी समुदायों की जीवंत सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखती है और इसके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों, सामुदायिक सहभागिता तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से ठोस और दीर्घकालिक प्रयास किए जाएंगे।

दूसरी ओर आदिवासी संगठनों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा है कि लंबे समय से झारखंड की मूलवासी संस्कृति को नजरअंदाज किया जाता रहा है। यह पहल न केवल इतिहास के साथ न्याय करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम भी करेगी।

बिहार के आदिवासी महिलाओं की मछली आचार की धूम

चंपारण/पटना। बिहार के वेस्ट चंपारण जिले में आदिवासी महिलाओं ने अपनी मेहनत और सामूहिक प्रयास से मछली अचार (फिश पिकल) का व्यवसाय शुरू कर आत्मनिर्भरता की एक नई कहानी लिखी है। यह पहल न केवल उनके लिए स्थायी स्वरोजगार का साधन बनी है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दे रही है।

स्थानीय जलस्रोतों से आसानी से उपलब्ध मछलियों का उपयोग कर महिलाएं पारंपरिक विधि से अचार तैयार कर रही हैं। स्वाद और गुणवत्ता के चलते उनके उत्पादों की मांग अब स्थानीय बाजारों से बाहर तक बढ़ने लगी है। स्वयं सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से संगठित इन महिलाओं ने कच्चे माल की खरीद, प्रसंस्करण, पैकेजिंग से लेकर बिक्री तक हर चरण को खुद संभाला है।

महिलाओं का कहना है कि पहले वे सीमित आय और अनिश्चित रोजगार पर निर्भर थीं, लेकिन इस पहल ने उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान दोनों दिया है। नियमित आय से वे अब बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और घरेलू जरूरतों पर बेहतर खर्च कर पा रही हैं। कई महिलाओं ने छोटे स्तर पर बचत भी शुरू कर दी है।

प्रशासन और स्थानीय संस्थाओं की ओर से प्रशिक्षण, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच में सहयोग मिलने से इस उद्यम को और विस्तार मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि कोल्ड-चेन, खाद्य सुरक्षा मानकों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए, तो यह मॉडल राज्य के अन्य आदिवासी इलाकों में भी दोहराया जा सकता है।

आलोचक वीरेन्द्र यादव नहीं रहें, रामू सिद्धार्थ ने किया याद

कोई व्यक्ति आपका वैचारिक साथी भी हो, स्वजन जैसा आत्मीय भी हो और साथ ही अभिवावक जैसा स्नेह-प्यार-दुलार भी देता हो, ऐसे व्यक्ति का असमय चले जाना ऐसा कुछ खो देना होता है, जिसकी भरपाई कर पाना बहुत मुश्किल होता है। मेरे लिए वीरेंद्र यादव ऐसे ही थे। एक कॉमरेड की तरह तीखी वैचारिक बहसें होती थीं, गंभीर असहमतियां सामने आती थीं, पर कभी आत्मीयता कम नहीं हुई। 16 जनवरी को अचानक उनके चले जाने की खबर आ गई।
वह एक स्वजन की तरह थे, न्याय के लिए संघर्षरत वृहत्तर परिवार के हिस्से। इससे साथ ही वे मेरे लिए अभिवावक भी थे। मिलने पर,फोन और कभी-कभी मैसेज से वे अपना प्यार, स्नेह और दुलार देते रहते थे। कभी-कभी एक अभिवावक की तरह गुस्सा भी होते थे। अक्सर प्रोत्साहित करते रहते थे।
वीरेंद्र यादव को जिस पहली बात के लिए मैं याद करता हूं, वह यह कि वे कभी गोडसेवादियों-सावरकरवादियों से सटने, मेल-मिलाप कायम करने या उनका कृपापात्र होने की कोई कोशिश करते नहीं दिखे। जैसा कि नामवर सिंह ने जीवन के अपने अंतिम समय में राजनाथ सिंह या महेश शर्मा के हाथों पुरस्कार लेकर या अन्य रूपों में किया। नामवर सिंह की तरह ही पिछले दिनों और इन दिनों कई सारे प्रगतिशील, वामपंथी, उदारवादी लोग ऐसा करते हुए दिखे और दिख रहे हैं।
वीरेंद्र यादव इस देश के जन और देश के दुश्मन गोडसेवादियों-सावरकवादियों के खिलाफ निर्णायक तरीके से वैचारिक स्टैंड लेते रहे। अभी हाल में जब विभूति नारायण राय ने ‘माओवादियों’ के खात्में के लिए मोदी सरकार की प्रशंसा करते दिखे, वीरेंद्र यादव ने मजबूती से उसके खिलाफ स्टैंड लिए। शायद उन लोगों जैसों के दबाव में ही प्रगतिशील लेखक संघ ने विभूति नारायण राय के बयान से अपने को अलग करते हुए एक प्रपत्र जारी किया और विभूति नारायण राय से अपनी असहमति जाहिर की।
इस देश में किसी व्यक्ति का सामाजिक लोकेशन (वर्ण-जाति) सबसे निर्णायक होता है। वर्चस्वशाली द्विज वर्ण-जातियों का कोई विचारक-चिंतक-लेखक चाहे किसी वैचारिकी का चोंगा ओढ़ ले, उसकी सामाजिक लोकेशन उसकी वैचारिकी का अक्सर ही ऐसी-तैसी कर देता है, अभी तक अक्सर ऐसा ही हुआ है। नहीं के बराबर अपवाद हैं। उसकी सामाजिक लोकेशन उसके औपचारिक वैचारिक स्वीकृति पर अक्सर पूरी तरह हावी हो जाता है।
हिंदू साहित्य के द्विज-सर्वण वैचारिकी, आलोचना और सौंदर्य दृष्टि को आधुनिक युग में चुनौती देने वाले लेखकों-आलोचकों-संपादकों में एक तरफ दलित समाज से आए ओमप्रकाश वाल्मीकि, कंवल भारती और तुलसी राम दिखाई देते हैं, तो दूसरी तरफ पिछड़े वर्गों (शूद्र समाज) के बीच से आए राजेंद्र यादव, चौथीराम और वीरेंद्र यादव दिखाई देते हैं। हिंदी साहित्य की दुनिया में ये लोग उस सामाजिक लोकेशन से आए थे, जो शुक्ल, द्विवेदी, सिंहों और पांडेयों की सामाजिक लोकेशन से बिलकुल भिन्न थी।
ये लोग सामूहिक तौर पर हिंदी साहित्य की द्विज सौंदर्य दृष्टि, विश्व दृष्टि और आलोचना के मानदंडों को भले ही बदल न पाए हों, लेकिन इस तरह से प्रश्नांकित कर दिया है कि अब कोई निर्वावाद भाषा में यह नहीं कह सकता कि आर्चाय रामचंद्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, रामविलास शर्मा और मैनेजर पांडेय ने आलोचना के जो मानदंड प्रस्तुत किए और उसके आधार पर सृजनात्मक कृतियों और कृतिकारों की जो समालोचना-आलोचना प्रस्तुत की वह किसी वैज्ञानिक मुक्कमल सामाजिक दृष्टि, सार्वभौमिक न्यायबोध और प्रगतिशील उन्नत मूल्यों पर आधारित थी या वर्गीय दृष्टि की सच्ची अभिव्यक्ति थी।
वीरेंद्र यादव से मेरे पहला वैचारिक परिचय तद्भव में गोदान में लिखे उनके एक विस्तृत आलेख के माध्यम से हुआ। उस लेख ने प्रेमचंद और गोदान को देखने की एक ऐसी दृष्टि दी, जो उसके पहले की आलोचना में नहीं दिखाई देती थी। चाहे वह रामविलास शर्मा (प्रेमचंद और उनका युग) या नामवर सिंह की प्रेमचंद और गोदान को देखने, समझने और विश्लेषित करने की दृष्टि ही क्यों न हो?
वीरेंद्र यादव मुख्यत: कथा आलोचक रहें हैं। उनकी आलोचना के केंद्र में आधुनिक युग का महाकाव्य कहे जाने वाला उपन्यास रहा है। उनकी आलोचना के केंद्र में मुख्य रूप से तीन उपन्यास रहे हैं- ‘गोदान’, ‘मैला आंचल’ और ‘आधा गांव’। ये तीनों उपन्यास हिंदी पट्टी की केंद्रीय ला-इलाज बीमारी वर्ण-जाति और उस पर आधारित वर्गीय-सामाजिक रिश्ते और पोर-पोर में समाई साम्प्रदायिक दृष्टि का मुकम्मल आख्यान प्रस्तुत करते हैं। इस निष्कर्ष पर ले जाते हैं कि बहुसंख्य मेहनतकश भारतीय जन (दलित, पिछड़े, आदिवासी, मुसलमान, महिलाएं) में वह ताकत है, जीवन-मूल्य और न्याय दृष्टि है, जो इस देश को एक न्यायपरक, समतामूलक और शोषण-उत्पीड़नहीन समाज बना सकती है।
वीरेंद्र यादव ने इन तीनों उपन्यासों की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत की है। वे इन उपन्यासों के माध्यम से अपने समय के ज्वलंत समस्याओं के बुनियादी कारणों और उनके समाधान भी अक्सर प्रस्तुत करते रहते थे।
वीरेंद्र यादव एक तरफ द्विज दृष्टि परस्त वामपंथ से टकराते रहे तो दूसरी जीन-जान से कोशिश करते रहे कि किसी तरह की जातिवादी दृष्टि के शिकार न बने या उन पर कोई जातिवादी होने का ठप्पा न लगा दे। इसके चलते कई बार वे जरूरी मुद्दों पर बहुजन-दलितों का पक्ष लेने से बचते दिखे या वामपंथियों के द्विजत्व के खिलाफ चुप्पी साधे रहे। पिछले कई वर्षों से उनका जद्दोदहद इसके बीच संतुलन कायम करने की रही है। वे द्विज विश्व दृष्टि की शिकार वामपंथी साहित्य जगत से आए थे। उनका प्रारंभिक साहित्यक और आलोचकीय मानस वामपंथी साहित्यिक दुनिया में निर्मित हुआ था, जहां द्विज-दृष्टि हावी रही है। वे बहुजन-दलित वैचारिकी के बुनियादी आधारों फुले दंपत्ति, शाहू जी, पेरियार, आंबेडकर, रामस्वरूप वर्मा, जगदेव प्रसाद, पेरियार ललई सिंह, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु से उनका मुकम्मल रिश्ता नहीं बन पाया। फिर भी पर वे अपने सामाजिक लोकेशन चलते और बहुजन-दलित आंदोलन की वैचारिकी से धीरे-धीरे जुड़ते जाने की वजह से हिंदी साहित्य के वर्चस्ववादी विश्वदृष्टि रूबरू होते गए और उसकी सीमाओं को समझने लगे थे। उनकी आलोचना में यह दिखाई पड़ता है।
सच तो यह है कि वीरेंद्र यादव प्रेमचंद के अध्येता के रूप में प्रेमचंद के तीसरे चरण के लेखन ( प्रतिनिधि कृति गोदान) की इस बुनियादी समझ से मुतमईन होते लग रहे थे कि भारत में किसी व्यक्ति को देखों तो उसकी सामाजिक (वर्ण-जाति) और आर्थिक लोकेशन को एक साथ देखो। भारत में वर्ग, वर्गीय रिश्ते, उस पर आर्थिक रिश्ते, समाजिक संबंध और व्यक्ति की चरित्र बिना सामाजिक-आर्थिक लोकेशन को एक साथ देखे समझा नहीं जा सकता है।
राजेंद्र यादव, ओमप्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम, चौथीराम के बाद अचानक वीरेंद्र यादव का चले जाना साहित्य और आलोचना की दुनिया में सिर्फ मुहावरे के अर्थ में नहीं, सच्चे अर्थों में एक शून्य पैदा किया है। वे कई सारी ऐसी संभावनाओं को अपने साथ लेकर चले गए, जिसकी हिंदी समाज को बहुत जरूरत है। वे आलोचना को एक सच्ची वर्गी दृष्टि (सामाजिक-आर्थिक दोनों आधारों पर निर्मित) की ओर ले जा सकते थे। इस ओर वे बढ़ते हुए दिख रहे थे। इसके लिए जरूरी अध्ययन और सशक्त आलोचकीय भाषा भी उनके पास थी। वे एक गहन अध्येता थे। अपनी बात को सटीक और सशक्ते रूप में कहने में सक्षम थे।
वीरेंद्र यादव को अंतिम सलाम! अलविदा!

मेरठ सरधना मामले में आरोपी की गिरफ्तारी के बाद खुले कई राज

मेरठ/ लखनऊ। मेरठ जिले के कपसाड़ गांव में दलित महिला की हत्या और उसकी बेटी का अपहरण करने के आरोपी पारस सोम पुलिस गिरफ्त में आ चुका है। पीड़िता रुबी भी बरामद हो गई है। अगवा की गई रूबी को रविवार 11 जनवरी की दोपहर ACJM-2 नम्रता सिंह की कोर्ट में पेश कराकर बयान दर्ज करवाया गया। खबर है कि रूबी ने पारस के खिलाफ बयान दर्ज कराया है। रूबी के बयान को लिफाफे में सील बंद कर दिया गया है।

इसके बाद कोर्ट ने रूबी को वन-स्टॉप सेंटर यानी आशा ज्योति केंद्र भेजा है। इसी दिन पारस को स्पेशल सीजेएम कोर्ट में पेश किया गया। पारस का हत्या और अपहरण की धाराओं में रिमांड बनाया गया और 14 दिन के रिमांड में जेल भेजा गया है। पारस और रूबी को पुलिस ने शनिवार 10 जनवरी को ही हरिद्वार से बरामद कर लिया था। दोनों को देर रात मेरठ लाया गया और पूछताछ की गई।

बीते दो दिनों से मीडिया और पारस के स्वजातीय लोग सारा आरोप लड़की पर लगाकर मामले को नया मोड़ देने की कोशिश में जुटे थे, लेकिन पीड़िता रूबी के बयान ने सारे झूठ का पर्दाफाश कर दिया है। जो सूचना सामने आ रही है, उसमें रूबी ने पारस के खिलाफ बयान दिए हैं और जबरन उठाकर ले जाने की बात कही है।

सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रूबी ने पुलिस के सामने बयान दिया है कि पारस ने उसका अपहरण किया था। रूबी ने पुलिस को बताया कि उसकी मां की हत्या करने के बाद उसकी भी हत्या करने की धमकी देकर पारस जबरन उसको साथ ले गया। इस बयान के बाद पारस की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

हालांकि पारस ने खुद को बचाने के लिए रूबी के साथ रिश्ते में होने और उसके मर्जी से साथ ले जाने की बात कही। पुलिस ने भी इस बात की पुष्टि नहीं की है कि पारस और रूबी में प्रेम प्रसंग था। पुलिस जांच में खुलासा हुआ है पारस की उम्र अभी 17 साल है जबकि रूबी बालिग है।

8 जनवरी को घटी इस घटना के खिलाफ अंबेडकरवादी समाज इकट्ठा हो गया था। बहुजन समाज ने जिस तरह इस मामले के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था और तमाम दलित नेताओं ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया था, उससे सरकार की मुश्किलें बढ़ गई थी और मेरठ पुलिस और यूपी पुलिस की साख दांव पर लग गई थी। देखना होगा कि इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है।

राज ठाकरे ने खोली अदानी की पोल

मुंबई/दिल्ली। महाराष्ट्र में 29 महानगरपालिकाओं के लिए चुनाव का प्रचार जोर पकड़ चुका है। इस चुनाव में ठाकरे बंधुओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के गठबंधन के लिए यह चुनाव काफी अहम है। इस बीच वह हर दांव चल रहे हैं। 11 जनवरी को मुंबई में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने अदानी पर जमकर निशाना साधा। ठाकरे ने अदानी के बढ़ते साम्राज्य पर एक ग्राफिक्स जारी कर मोदी और अदानी गठजोड़ पर हमला बोला। राज ठाकरे ने जो ग्राफिक्स जारी किया, वह चौंकाने वाला है।

दरअसल साल 2014, जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और प्रधानमंत्री बनें नरेन्द्र मोदी। नरेन्द्र मोदी का संबंध गुजरात से था, और जब मोदी दिल्ली में सत्ता के शीर्ष पर बैठे तो मोदी के नाम के साथ एक और नाम की चर्चा तेज हो गई। वह नाम जो तब तक सुर्खियों में नहीं था। वह नाम था बिजनेस मैन गौतम अदानी का।

साल 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अदानी के साम्राज्य में भी तेजी से वृद्धि हुई। अदानी तमाम तरह के नए-नए क्षेत्रों में पैर पसारने लगे और अब तो एयरपोर्ट भी अडाणी को मिल गया है। अब जंगलों पर भी अदानी समूह लगातार कब्जा कर रहा है, जिसको लेकर अदिवासी बहुल इलाकों में खासा रोष है। साल 2014 से 2024 के बीच 10 सालों में अडाणी के बढ़ते साम्राज्य की चर्चा अक्सर होती है। लेकिन राज ठाकरे ने जिस तरह अदानी को सीधे निशाने पर लिया है, उससे एक बार फिर बहस तेज हो सकती है।

इंसाफ के इंतजार में मेरठ की माँ-बेटी, अपराधी यूपी पुलिस की गिरफ्त से बाहर

मेरठ/लखनऊ। 3 जनवरी को माता सावित्री बाई फुले की जयंती पर जब देश के बड़े-बड़े नेता महिला सशक्तिकरण पर भाषण दे रहे थे, उसके चार दिन ही बीते थे कि आठ जनवरी की सुबह मेरठ के कपसाड़ गांव में मनुवादी गुंडे दलित समाज की बेटी को जबरन उठा ले गए। मां ने रोका तो उसे घायल कर दिया, जिसकी इलाज के दौरान मौत हो चुकी है।

घटना के 48 घंटे बीतने के बाद भी पुलिस खाली हाथ है और आरोपी पारस सोम को ढूंढने में नाकाम रही है। राजनीतिक और सामाजिक दबाव और मामले के जोड़ पकड़ने के बाद पुलिस ने गांव को छावनी बना दिया है। ढ़ाई किलोमीटर पहले ही गांव की बैरिकेडिंग कर दी गई है और 50 हजार से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात कर दिये गए हैं।

पुलिस, प्रशासन और स्थानीय भाजपा नेताओं द्वारा 48 घंटे के भीतर आरोपी को ढूंढ़ने का लिखित आश्वासन मिलने, 10 लाख रुपये का चेक मिलने और अन्य मांगों पर हामी भरने के बाद परिजनों और ग्रामीणों ने शुक्रवार की रात 8 बजे के करीब पीड़िता की माँ का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

इस बीच बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और असपा के नेता लगातार मोर्चा खोले हुए हैं। बसपा सुप्रीमों मायावती ने दलित माँ की हुई हत्या तथा बेटी के अपहरण की ताज़ा घटना अति-दुखद, शर्मनाक एवं चिन्तनीय बताया है।

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने प्रदेश सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि भाजपा सरकार में अगर रत्ती भर भी शर्म बची हो तो अपराधियों की तरफ़दारी छोड़कर ‘मेरठ की बेटी’ को बचाया जाए और मृतक माँ के पार्थिव शरीर को यथोचित सम्मान दिया जाए और पीड़ित परिवार को न्याय सुनिश्चित किया जाए। आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने इसे बहुजन समाज के विरुद्ध जातिगत हिंसा और महिलाओं की असुरक्षा के प्रति अपराध का भयावह उदाहरण है।

बता दें कि गुरुवार 8 जनवरी की सुबह सुनीता अपनी बेटी रुबी के साथ खेत की ओर जा रही थीं। गांव के ही पारस सोम,सुनील और उनके साथियों ने सुनीता पर फरसे से वार कर दिया और बेटी रूबी का अपहरण कर फरार हो गए थे। उपचार के दौरान मोदीपुरम के अस्पताल में सुनीता ने दम तोड़ दिया था।

इस मामले में पुलिस और भाजपा नेताओं के आश्वासन के 24 घंटे होने जा रहे हैं, लेकिन खबर लिखे जाने तक आरोपी पारस सोम और उसके साथी पुलिस गिरफ्त से बाहर हैं। और बात-बात पर चल निकलने वाला बुलडोजर खड़ा मुंह ताक रहा है कि मनुवादी गुंडों के घरों को रौंदने का आदेश माननीय मुख्यमंत्री से उसे कब मिलेगा।

झारखंड पहली बार दावोस में, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन WEF 2026 में करेंगे राज्य का प्रतिनिधित्व

रांची। झारखंड सरकार पहली बार स्विट्ज़रलैंड के दावोस में आयोजित World Economic Forum (WEF) 2026 में भाग लेने जा रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में राज्य का प्रतिनिधिमंडल इस वैश्विक मंच पर झारखंड की निवेश संभावनाओं, औद्योगिक अवसरों और सतत विकास मॉडल को दुनिया के सामने रखेगा। तय कार्यक्रम के अनुसार मुख्यमंत्री का विदेश दौरा 18 जनवरी से 26 जनवरी 2026 तक प्रस्तावित है, जिसमें 19 से 23 जनवरी के बीच दावोस में WEF की बैठकों/सत्रों में भागीदारी शामिल है।

सरकारी स्तर पर इस यात्रा को झारखंड की “ग्लोबल आउटरीच” रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। दावोस में मुख्यमंत्री और प्रतिनिधिमंडल की वैश्विक निवेशकों, उद्योग जगत के शीर्ष प्रतिनिधियों और नीति-निर्माताओं के साथ बैठकें प्रस्तावित हैं। इन बैठकों में झारखंड में निवेश, खनिज-आधारित उद्योग, मैन्युफैक्चरिंग, ऊर्जा संक्रमण, पर्यटन, स्किल डेवलपमेंट और रोजगार सृजन जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। राज्य सरकार का फोकस झारखंड को एक ऐसे निवेश गंतव्य के रूप में प्रस्तुत करने पर है जहां संसाधन, मानव-शक्ति और नीति-स्तर पर अवसर मौजूद हैं।

दावोस के बाद मुख्यमंत्री का यूनाइटेड किंगडम (UK) दौरा भी प्रस्तावित है। इस चरण में लंदन/ऑक्सफोर्ड जैसे शहरों में शैक्षणिक, नीति और निवेश से जुड़े संस्थानों के साथ संवाद और सहयोग की संभावनाओं पर बातचीत होने की उम्मीद है। सरकार के मुताबिक इस दौरे का उद्देश्य झारखंड के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, तकनीकी सहयोग और निवेश आकर्षित करने के रास्ते खोलना है।

झारखंड की यह पहली आधिकारिक भागीदारी राज्य के लिए इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि WEF जैसे मंच पर दुनिया भर के देशों और राज्यों की निवेश-नीतियों, विकास मॉडल और साझेदारी प्रस्तावों पर सीधे बातचीत का अवसर मिलता है।

पापा ने कहा, ब्राह्मण की बेटी होकर नीच से शादी कैसे की? और राहुल को गोली मार दी

तनुप्रिया झा (फोटो साभारः दैनिक भास्कर)मेरे पति राहुल क्लास में अटेंडेंस लगाकर कॉलेज के मेन गेट की ओर जा रहे थे। वहीं उनकी काली बुलेट खड़ी थी। मैं नर्सिंग डिपार्टमेंट से क्लास खत्म कर बाहर निकली ही थी, तभी कॉलेज के मेन गेट पर मुझे पापा दिखाई दिए। वे उजले रंग का मास्क और नीले रंग का कोट पहने हुए थे। कमर में कट्टा खोंसे वे बुलेट के पास खड़े हो गए।

उन्होंने आसपास खड़े छात्रों से पूछा- ‘ये काली बुलेट किसकी है?’ छात्रों ने जवाब दिया- ‘राहुल मंडल की।’ कुछ ही देर बाद जैसे ही राहुल बुलेट लेने पहुंचे, पापा ने कट्टा निकाला और उसके सीने में दो गोलियां दाग दीं। राहुल का सीना खून से सना हुआ था। उस वक्त मैं राहुल से बस कुछ कदम की दूरी पर थी। वह लड़खड़ाकर जमीन पर गिरने ही वाला था कि मैं चीखते हुए उसकी ओर भागी। बदहवासी में वह मेरे सीने से आकर लग गया।

पापा चीख-चीखकर कह रहे थे- ब्राह्मण होकर बेटी ने नीच से शादी कैसे की? मर गया, अब मैं बहुत खुश हूं। अब बेटी को भी मारूंगा।’, ये शब्द इंटरकास्ट मैरिज करने वाली बिहार की तनुप्रिया झा के हैं। जिसके पिता ने जाति की वजह से अपनी 20 साल की बेटी को विधवा बना दिया। तनुप्रिया कहती हैं कि मेरी आखिरी इच्छा है कि अपने बाप को फांसी के फंदे पर झूलते देखूं। उसके बाद खुद को खत्म कर लूंगी।

यह घटना बिहार के दरभंगा जिले की है। जहां 6 अगस्त 2025 को पिता ने बेटी के पति को इसलिए मार डाला, क्योंकि वह कथित छोटी जाति का था। हालांकि यह मामला एक बार फिर से वायरल हो रहा है।

दलित छात्रा के साथ रैगिंग और जातीय उत्पीड़न पर उठे गंभीर सवाल

धर्मशाला। एक बार फिर देश का उच्च शिक्षा तंत्र जातिगत भेदभाव और संवेदनहीनता के आरोपों के घेरे में है। धर्मशाला डिग्री कॉलेज की 19 साल की छात्रा पल्लवी की तीन महीने इलाज के बाद मौत के मामले ने तूल पकड़ लिया है। पल्लवी के परिवार का आरोप है कि कॉलेज में उसकी SC पहचान को लेकर लगातार ताने दिए जाते थे, जिससे वह मानसिक रूप से बेहद परेशान रहने लगी थी।

जब रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के 10 साल होने को है, उसके ठीक पहले पल्लवी का मामला दलित समाज के भीतर गुस्सा पैदा करने वाला है। यह गुस्सा और दर्द कोई नया नहीं है। इससे पहले भी रोहित वेमुला, पायल तड़वी जैसे नाम देश के सामने आ चुके हैं, लेकिन हर बार व्यवस्था कुछ दिनों की चर्चा के बाद खामोश हो जाती है। इस मामले में भी लीपा पोती की जा रही है। जहां पल्लवी के पिता विक्रम का आरोप है कि “मेरे बच्चे को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वह SC थी। उसकी जाति को लेकर उसे बार-बार अपमानित किया गया। वह अंदर से टूट चुकी थी।”

18 सितंबर को कॉलेज की कुछ छात्राओं ने उसके साथ मारपीट की और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दीं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कॉलेज के एक प्रोफेसर अशोक कुमार ने छात्रा का यौन उत्पीड़न किया, जिसके बाद पल्लवी गहरे सदमे और अवसाद में चली गई। परिजनों का दावा है कि लगातार बिगड़ती मानसिक स्थिति के कारण उसका इलाज अलग-अलग अस्पतालों में कराया गया, लेकिन 26 दिसंबर को लुधियाना के डीएमसी अस्पताल में अस्पताल में उसकी मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, पल्लवी के साथ रैगिंग की घटना 18 सितंबर को हुई थी। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 75, 115(2), 3(5) और हिमाचल प्रदेश शैक्षणिक संस्थान (रैगिंग निषेध) अधिनियम, 2009 की धारा 3 के तहत केस दर्ज किया गया है।

तो वहीं इस मामले में कॉलेज प्रशासन पल्ला झाड़ रहा है। कॉलेज के प्राचार्य का जो बयान सामने आया है, उसमें उसका कहना है कि- “पल्लवी हमारे कॉलेज की छात्रा नहीं थी, क्योंकि उसने केवल प्रथम वर्ष की फीस जमा की थी और दूसरे वर्ष की तकनीकी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाई।”

इस बयान को परिवार और सामाजिक कार्यकर्ता जिम्मेदारी से बचने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं। सवाल यह है कि अगर पल्लवी कैंपस से जुड़ी थी, पढ़ाई कर रही थी और वहां मौजूद थी, तो क्या प्रशासन की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? बहुजन समाज ने इस मामले में इंसाफ की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है। वह न्याय मिलने तक पीछे हटने को तैयार नहीं है। इस बीच शिक्षा संस्थानों में आत्महत्या और उत्पीड़न के मामले में संसदीय प्रश्नों और UGC को दी गई रिपोर्टों के अनुसार 2014–2023 के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित, आदिवासी और OBC छात्रों की 100 से ज्यादा आत्महत्याएँ रिपोर्ट हुईं। इनमें से बड़ी संख्या में मामलों में, जातिगत अपमान, प्रशासनिक उत्पीड़न, स्कॉलरशिप/फेलोशिप रोकना, गाइड/प्रोफेसर द्वारा भेदभाव सामने आया है। चर्चित मामलों में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला, मुंबई की पायल तड़वी के अलावा तमिलनाडु, राजस्थान, मध्य प्रदेश, यूपी के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के दर्जनों मामले दर्ज हैं।

आंकड़ों के मुताबिक UGC को हर साल औसतन 600–700 शिकायतें मिलती हैं, जिनमें, SC/ST छात्रों के साथ भेदभाव, रैगिंग, जातिगत अपमान, एडमिशन/इवैल्यूएशन में पक्षपात जैसे मामले शामिल हैं। यह सिर्फ दर्ज मामले हैं, माना जाता है कि संख्या इससे काफी ज्यादा है।

राष्ट्रीय रैगिंग विरोधी हेल्पलाइन के डेटा के अनुसार, रैगिंग की शिकायतों में 20–25% मामलों में जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़ी टिप्पणियाँ शामिल पाई गईं। यह तथ्य कई बार सामने आया है कि दलित/आदिवासी छात्र रैगिंग में असमान रूप से अधिक शिकार होते हैं। हालांकि इस मामले में पल्लवी के परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने एक प्रोफेसर और तीन छात्राओं के खिलाफ रैगिंग और यौन उत्पीड़न समेत गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज किया जा चुका है। लेकिन इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि विश्वविद्यालयों दलित छात्राओं के लिए असुरक्षित बनी हुई है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या शिक्षा संस्थान आत्ममंथन करेंगे या फिर यह मामला भी बाकी मामलों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा।

जयपाल सिंह मुंडाः वह महानायक जिन्हें आदिवासी होने पर गर्व था

 दलित समाज में जो कद बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर का है, अगर विवाद की बजाय खुले मन से स्वीकार किया जाए तो आदिवासी समाज में वही कद जयपाल सिंह मुंडा का है। जिस तरह बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने दुनिया की बेहतरीन युनिवर्सिटी से पढ़ाई की और वंचितों के हक के लिए सामने आए। कमोबेश जयपाल सिंह मुंडा का जीवन भी इसी तरह का उदाहरण है। आदिवासी समाज को आज जो भी सुविधाएं देश में मिली हैं, उनमें एक बड़ा योगदान आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा का है। यही वजह है कि कृतज्ञ आदिवासी उन्हें पूरे सम्मान के साथ ‘मारंग गोमके’ की उपाधि देते हैं।

जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 3 जनवरी 1903 को झारखंड (सन् 2000 के पूर्व बिहार) की राजधानी रांची से करीब 18 किलोमीटर दक्षिण, खूंटी जिले के टकरा पाहनटोली में हुआ था। उनके पिता का नाम अमरु पाहन व माता का नाम राधामणी था। हालांकि जयपाल सिंह मुंडा का प्रारम्भिक नाम प्रमोद पाहन था। जयपाल सिंह ने खुद अपनी जीवनी में लिखा है– “मेरा नाम किसने और कब बदला, मुझे नहीं मालूम। वह 1911 की 3 जनवरी थी, जिस दिन मेरा नाम बदल गया होगा। तब मैं 8-10 साल का रहा होउंगा। घर के लोग मुझे प्रमोद कहते थे और 3 जनवरी के पहले तक यही नाम था। लेकिन, 3 जनवरी, 1911 को जब मैं अपने बाबा (पिता) अमरू पाहन की उंगली थामे, सकुचाते हुए रांची के संत पॉल स्कूल पहुंचा तो न सिर्फ मेरी पैदाइश की तारीख बलद गयी, बल्कि मेरा नाम ही बदल गया।”

रांची के इसी संत पॉल स्कूल से उनकी शुरुआती शिक्षा हुई। वहां के प्रधानाचार्य का जयपाल मुंडा पर विशेष स्नेह था। वजह थी उनका तेज-तर्रार होना। यही वजह थी कि प्रधानाचार्य ने  जयपाल मुंडा को आगे की शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा। यहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड के सेंट जॉन्स कॉलेज से स्नातक की और वहीं से अर्थशास्त्र में एम.ए.किया। वह अर्थशास्त्र में गोल्डमेडलिस्ट भी बने।

 जयपाल सिंह मुंडा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इंग्लैंड में ऊंच शिक्षा के साथ-साथ उनकी हॉकी में भी दिलचस्पी हो गई। इसमें उन्हें बड़ी सफलता भी मिली। वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में उन्होंने ब्रिटिश भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी की। उनकी कप्तानी में टीम ने सवर्ण पदक जीता। साल 1928 में ही उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास कर ऐसा करने वाले वह पहले भारतीय आदिवासी बने। लेकिन इसी दौरान उन्हें ओलंपिक में जाना पड़ा, जिसकी वजह से वे अपना प्रशिक्षण पूरा नहीं कर पाए और उन्हें बीच में ही भारतीय सिविल सेवा को छोड़ना पड़ा। 1934 में वो घाना के गोल्ड कोस्ट (अफ्रीका) के कॉलेज में प्रिंसिंपल रहे। साल 1936 में वह बीकानेर रियासत में विदेश मंत्री भी रहे। इसके बाद 1937 में रामकुमार कॉलेज, रायपुर में  प्रिंसिंपल रहे।

 इस दौरान वह अपने आदिवासी समाज को पिछड़ेपन से निकालने के बारे में सोचने लगे। तमाम उधेड़बुन के बीच उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया और सबकुछ छोड़कर उन्होंने आदिवासी समाज के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसके लिए साल 1938 में उन्होंने बिहार (तब झारखंड नहीं बना था) में आदिवासी महासभा का गठन किया। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को मुख्य धारा में शामिल कराना था। इसके लिए जयपाल सिंह मुंडा ने सबसे पहले अलग राज्य की माँग ब्रिटिश सरकार के सामने उठाई, जिसमें बिहार, बंगाल व मध्य प्रांत के कुछ हिस्सों को मिलाकर झारखंड राज्य बनाने की मांग की गई। इस मांग को लेकर वे लगातार संघर्ष करते रहे। उनका मानना था कि आदिवासी समाज के लिए अलग राज्य बनाकर उनके जीवन को जल्द बेहतर बनाया जा सकता है।

 1946 में संविधान सभा के लिए हुए चुनाव में जयपाल सिंह मुंडा भी सदस्य चुने गए। जो काम दलितों के लिए डॉ. आंबेडकर ने संविधान में अधिकार दिलाकर किया, वही काम जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासियों के लिए किया। संविधान सभा के सदस्य के रूप में अपने पहले ही भाषण में उन्होंने साफ कहा कि- “मैं उन लाखों लोगों की ओर से बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं, जो सबसे महत्वपूर्ण लोग हैं, जो आजादी के अनजान लड़ाके हैं, जो भारत के मूल निवासी हैं, और जिनको बैकवर्ड ट्राईब्स, प्रीमिटव ट्राईब्स, क्रिमिनल ट्राईब्स और न जाने क्या-क्या कहा जाता है। परन्तु मुझे अपने जंगली (आदिवासी) होने पर गर्व है।”

 उन्होंने संविधान समिति द्वारा अनुसूचित जनजाति शब्द का इस्तेमाल करने का बार-बार विरोध किया। वे चाहते थे कि संविधान मे ‘आदिवासी’ शब्द का इस्तेमाल हो।

आदिवासियों के हितों का ध्यान रखते हुए डॉ. आंबेडकर ने भारत के संविधान में पांचवीं अनुसूची डाल दी, जिसमें आदिवासियों के हक-अधिकार शामिल थे। इस तरह डॉ. आंबेडकर और जयपाल सिंह मुंडा के सयुंक्त प्रयासों से भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए शिक्षा, नौकरी के साथ ही लोकसभा एवं विधानसभाओं मे 7.5 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी गयीं। इस तरह आदिवासियों को संविधान में विशेष अधिकार प्राप्त हुए।बहुजन नायकों की कहानियां बताती इस महत्वपूर्ण दस्तावेज को मंगवाने के लिए हमसे संपर्क कर सकते हैं। संपर्क- 9013942612

 जयपाल सिंह मुंडा ने वर्ष 1948 में आदिवासी लेबर फेडरेशन की स्थापना की। लेकिन आदिवासियों को राजनैतिक भागेदारी दिलाने के लिए 1 जनवरी 1950 को अखिल भारतीय आदिवासी सभा को उन्होंने ‘झारखंड पार्टी’ में परिवर्तित कर दिया। अपने पहले चुनाव में ही झारखंड पार्टी ने बड़ी सफलता प्राप्त कर तहलका मचा दिया। झारखंड पार्टी के टिकट पर बिहार में 4 सांसद व 32 विधायक चुने गए। इसी तरह का प्रदर्शन 1957 के चुनाव में देखने को मिला। इस चुनाव में 34 विधायक व 5 सांसद चुने गए। लेकिन 1962 के चुनाव में गिरावट देखने को मिली। इस बार 22 विधायक व 5 सांसद चुने गए। परन्तु चुनाव के बाद पार्टी में भगदड़ मच गई जिसके कारण जयपाल मुंडा ने 1963 में इस शर्त के साथ कांग्रेस पार्टी में विलय कर दिया गया कि विलय के बाद कांग्रेस पार्टी अलग झारखंड राज्य का निर्माण करेगी। इसके बाद जयपाल सिंह मुंडा बिहार के पहले आदिवासी उप मुख्यमंत्री बने और सामुदायिक विकास मंत्री बने।

लेकिन कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को धोखा दिया था, उसी तरह जयपाल मुंडा को भी धोखा दिया और अलग झारखंड बनाने का अपना वादा पूरा नहीं किया। कांग्रेस की वादाखिलाफी से नाराज जयपाल मुंडा ने एक महीने के बाद ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 1967 में जयपाल सिंह मुंडा फिर से सांसद चुने गऐ। इसके बाद कांग्रेस से उनका मनमुटाव बढ़ता ही चला गया।

 13 मार्च, 1970 को जयपाल सिंह मुंडा ने माना कि “कांग्रेस ने धोखा दिया और झारखण्ड पार्टी का विलय सबसे बड़ी भूल थी। मैं झारखण्ड पार्टी में लौटूंगा और अलग झारखण्ड राज्य के लिए आंदोलन करूंगा।” लेकिन इस घोषणा के एक सप्ताह बाद ही 20 मार्च 1970 को जयपाल सिंह मुंडा का दिल्ली में परिनिर्वाण (देहांत) हो गया।

आज तमाम लोग जयपाल मुंडा के कांग्रेस के साथ जाने को लेकर उनकी आलोचना करते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने कांग्रेस के साथ पार्टी का विलय कर बहुत बड़ी भूल की। लेकिन उन्होंने ऐसा किस मजबूरी वश  किया, यह समझना जरूरी है। सन् 1957 के चुनाव में जयपाल सिंह की झारखंड पार्टी को 34 सीटें मिली थी, जो किसी भी झारखंडी पार्टी के लिए आज भी कल्पनातीत है। लेकिन सन् 1962 के चुनाव में उनकी संख्या घट कर 22 हो गई और सांसदों की संख्या भी पांच से घट कर चार हो गई। इन 22 में से भी 12 विधायकों को कांग्रेस ने खरीद लिया। यानी, मनुवादी दल जो खेल आज खेलते हैं, वह नया नहीं है। निराशा के इन्हीं क्षणों में उन्होंने नेहरू के वादों पर भरोसा कर कांग्रेस के साथ अपनी पार्टी का विलय कर दिया। हालांकि, नेहरू के जीवन काल में ही उन वादों को सिरे से नकारा जाने लगा। 1952 और 1957 के चुनावों में बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद कांग्रेस अपनी शातिर चालें चलने लगी और वह सब किया जो आज भाजपा करती हुई दिखती है। जिन 12 विधायकों को कांग्रेस ने तोड़ा उनमें से अधिकतर झारखंड के ही गैर आदिवासी थे।  यानी यह नेहरू की वादाखिलाफी थी, ऐसे में जयपाल मुंडा को दोष देना कहां तक उचित है।

 जयपाल मुंडा एक महान शिक्षाविद्, हॉकी के शानदार खिलाड़ी, सामाजिक क्रांति के योद्धा और सफल राजनीतिज्ञ थे। वह ऐसे शख्स थे जो हॉकी के महानतम खिलाड़ियों में शामिल हैं। वह एक छोटे से आदिवासी गांव से निकल कर ऑक्सफोर्ड से अर्थशास्त्र के गोल्डमेडलिस्ट बनें। जो कांग्रेस की लोकप्रियता को चुनौती दे 1952 और 1957 के विधानसभा चुनाव में 34 सीटें जीत कर कांग्रेस का सफाया कर देता है, जो संविधान सभा के सदस्य के रूप में अपने समानांतर अंबेडकर सहित किसी अन्य नेता से कम प्रखर नहीं, उस पर आदिवासी समाज सहित पूरे देश को गौरवान्वित होना चाहिए।

सावित्राईबाई फुले के दो काव्य संग्रह, जो ब्राह्मणवाद के खिलाफ विद्रोह की अभिव्यक्ति है

अतीत के इन ब्राह्मणों के धर्मग्रंथ फेंक दो
करो ग्रहण शिक्षा, जाति की बेड़ियों को तोड़ दो
उपेक्षा, उत्पीड़न और दीनता का अन्त करो! [1]
– सावित्रीबाई फुले

सावित्रीबाई फुले आधुनिक भारत की प्रथम भारतीय महिला शिक्षिका थीं, इस तथ्य से हम सभी वाक़िफ़ हैं। लेकिन बहुत कम लोग हैं, जो इस तथ्य से परिचत होंगे कि वे आधुनिक भारत की पहली विद्रोही महिला कवयित्री और लेखिका थीं। उनकी कविताओं का पहला संग्रह, ‘काव्य फुले’ 1854 में प्रकाशित हुआ था। तब वे महज 23 वर्ष की थीं। इसका अर्थ है कि उन्होंने 19-20 वर्ष की उम्र से ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। उनका दूसरा कविता संग्रह ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ नाम से 1891 में आया।
 कविता के अलावा उनके तीन पत्र अत्यंत चर्चित हैं, जो उन्होंने पति जोतीराव फुले को लिखे थे। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर भाषण दिए। इन भाषणों में भी उनका चिंतनशील और लेखक व्यक्तित्व निखरकर सामने आता है। इसके अलावा उन्होंने छात्राओं को शिक्षित करने के लिए संगीत-नाटिका भी तैयार की। इस संगीत-नाटिका में पच्चीस छात्राओं का समूह संवाद करता था।
सावित्रीबाई फुले अपनी रचनाओं में एक ऐसे समाज और जीवन का सपना देखती हैं, जिसमें किसी तरह का कोई अन्याय न हो। हर इंसान मानवीय गरिमा के साथ जीवन व्यतीत करे। उन्होंने जान लिया कि बेहतर समाज और सबके लिए ख़ूबसूरत ज़िंदगी के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवादी-मनुवादी व्यवस्था और इसके द्वारा रची गई जाति-पाँति की घातक परम्परा तथा स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव है। उन्होंने अपनी कविताओं में सबसे ज़्यादा चोट मनुवाद, जाति-वर्ण के भेदभाव और स्त्री-पुरुष के बीच की असमानता पर की है।
‘शूद्रों का दर्द’ शीर्षक कविता में वे लिखती हैं कि शूद्रों को हज़ारों वर्षों से ब्राह्मणों ने षड्यंत्र रचकर अपने जाल में फंसा रखा है। ब्राह्मणों ने शूद्रों और अतिशूद्रों का शोषण-उत्पीड़न करने और उनके ऊपर अपना वर्चस्व क़ायम रखने के लिए यह सारा षड्यंत्र रचा है। ब्राह्मणों ने शूद्रों और स्त्रियों को ग़ुलाम बनाए रखने के लिए तमाम ग्रंथ रचे, जिसमें मनुस्मृति सबसे कुख्यात है। मनुस्मृति में साफ़तौर पर कहा गया है कि ब्रह्मा ने शूद्र के लिए सिर्फ़ एक कर्म निर्धारित किया है कि वह विनम्र होकर तीन वर्णों– ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करे–
एकम् एव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्।
एतेषां एव वर्णानां शुश्रूषां अनसूयया।। [2]
https://www.youtube.com/watch?v=8MEmoNugn8E
सावित्रीबाई फुले ब्राह्मणवादी धर्मग्रंथों के इन षड्यंत्रों को अच्छी तरह समझती थीं। उन्होंने अपनी कविता शूद्रों का दर्द में लिखा है कि–
दो हज़ार वर्ष से भी पुराना है
शूद्रों का दर्द
ब्राह्मणों के षड्यंत्रों के जाल में
फंसी रही उनकी ‘सेवा’ [3]
उनकी कविताएं इस बात की साक्षी हैं कि उन्हें इस बात का गहरा अहसास था कि शूद्रों की पराधीनता, दुर्दशा और ग़रीबी के लिए उनकी अज्ञानता, रूढ़िवादिता और परम्पराओं की बेड़ियां जिम्मेदार हैं। इस स्थिति ने उन्हें इस हालत में पहुंचा दिया है कि वे ग़रीबी के तेजाब से झुलस रहे हैं। वे लिखती हैं–
शूद्रों-अतिशूद्रों की दरिद्रता के लिए
अज्ञानता व रूढ़िवादी
रीति-रिवाज़ हैं जिम्मेदार
परम्परागत बेड़ियों में बंधे-बंधे सब
पिछड़ गए हैं सबसे देखो
जिसका यह परिणाम है कि हम
झुलस गए तेज़ाब में ग़रीबी के [4]
जोतीराव फुले, डॉ. आंबेडकर और पेरियार की तरह सावित्रीबाई फुले को भी इस बात का बहुत दुःख होता था कि शूद्रों-अतिशूद्रों को बेहतर जीवन के सारे सपने मर गए हैं। उनके भीतर जीवन जीने का उत्साह और उमंग नहीं बचा है। उन्होंने मान लिया है कि दुःख, अपमान और पराधीनता ही उनकी नियति है। उन्होंने ब्राह्मणों की इस बात को मान लिया है कि बिना किसी इच्छा के कर्म करते जाओ, चाहे तुम्हें इसका फल मिले या न मिले। वे अच्छी तरह समझती थीं कि शूद्रों-अतिशूद्रों के कर्मों का सारा फल ब्राह्मण हड़प लेते हैं और बिना फल की चिंता किए खटते रहने का उपदेश देते हैं–
शूद्रों-अतिशूद्रों की दरिद्रता के लिए
अज्ञानता व रूढ़िवादी
रीति-रिवाज़ हैं जिम्मेदार
परम्परागत बेड़ियों में बंधे-बंधे सब
पिछड़ गए हैं सबसे देखो
जिसका यह परिणाम है कि हम
झुलस गए तेज़ाब में ग़रीबी के
नहीं रहा अहसास कोई भी
सुख-सम्मान, अधिकार का
न कोई आशा और इच्छा
आत्मसात कर दु्ःखों को
समझा सुखी ही अपने को
पोंगा पंडित, साधु-संत सब
मांगें भीख बिना मेहनत कर
घूमें गली-गली, जग को दें उपदेश
बिना काम के चाहें फल यह
लालच दिखा स्वर्ग-पुण्य का
डॉ. आंबेडकर ने शूद्रों-अतिशूद्रों की पशुवत ज़िंदगी के लिए दुःख प्रकट किया है और धिक्कारा भी है। सावित्रीबाई फुले भी अज्ञानतावश पशुवत ज़िंदगी जीने के लिए शूद्रों-अतिशूद्रों को धिक्कारती हैं–
जीवन स्वीकारते पशु समान
पशुवत जीने को सुख समझें
है न यह घोर अज्ञान! [5]
महाराष्ट्र में ब्राह्मणवादी पेशवाई शासन में मनु की संहिता का कठोरतापूर्वक पालन होता था। जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले द्वारा खोले गए एक स्कूल में पढ़ने वाली एक ‘अछूत’ लड़की ने एक निबंध में लिखा कि पेशवा के शासन में ‘अछूतों’ के साथ कैसा निर्मम और क्रूर व्यवहार होता था। किस तरह पेशवा के शासन की समाप्ति और ब्रिटिश राज क़ायम होने के बाद एक हद तक मुक्ति मिली। उस ‘अछूत लड़की’ ने लिखा “इसके पूर्व (ब्रिटिश शासन से पहले) हमें इमारतों की नींव में जीवित गाड़ दिया जाता था। …हमें पढ़ने-लिखने की अनुमति नहीं थी। …ईश्वर ने अंग्रेजों के राज को दान के रूप में दिया है और हमारी शिकायतों का निवारण हुआ है। कोई भी हमें उत्पीड़ित नहीं करता। कोई भी फाँसी पर नहीं लटकाता। कोई भी हमें जीवित नहीं गाड़ता। हमारी संतान अब जीवित रह सकती है। हम कपड़े पहन सकते हैं, अपने तन को कपड़ों से ढक सकते हैं। हर एक को अपनी आय के अनुसार जीने की स्वतंत्रता है। कोई रुकावट नहीं, कोई प्रतिबंध नहीं। यहां तक कि गुलटेकाडी का बाज़ार भी हमारे लिए खुला है।”[6]
फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर का भी मानना था कि शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की दुर्दशा का कारण अज्ञानता है। डॉ. आंबेडकर शिक्षित बनो का नारा देते हैं। सावित्रीबाई फुले भी अपनी कविताओं में मनुवादी बेडि़यों को तोड़ने और शिक्षित बनने का आह्वान करती हैं। वे कहती हैं कि सदियों से शिक्षा से वंचित अज्ञानता के शिकार शूद्रों, इतिहास ने तुम्हें बड़ा अच्छा अवसर प्रदान किया है। अंग्रेजों ने ब्राह्मण पेशवाओं का अंत कर दिया है, जिन्होंने तुम्हारी शिक्षा पर प्रतिबंध लगा रखा था। वे कहती हैं, उठो पेशवाओं का अंत हो चुका है। यह अच्छा अवसर है जब तुम्हारे पास अपनी ग़ुलामी की परम्परा तोड़ने का। लेकिन इसके साथ ही वे इस बात के लिए भी चेताती हैं कि तुम मनुवादी शिक्षा मत लेना–
उठो, अरे अतिशूद्र उठो तुम
मर-मिट गए मनुवादी पेशवा
ख़बरदार अब मत अपनाना
मनु-अविद्या की…
रची ग़ुलामी-परम्परा को [7]
अंग्रजों के कारण शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं को शिक्षा का अवसर मिला था। इस शिक्षा ने इन तबकों के लिए मुक्ति का द्वार खोला था। क्योंकि, मनुवादी-ब्राह्मणवादी शिक्षा नहीं थी, जो ऊंच-नीच की शिक्षा देती है। अंग्रेजी शिक्षा समानता, तर्क और न्याय की शिक्षा देती थी। इसी शिक्षा के चलते जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे महान समाज सुधारक पैदा हुए थे। अंग्रेजी शिक्षा ने डॉ. आंबेडकर जैसे महान व्यक्तित्व का निर्माण किया था। सावित्रीबाई फुले अंग्रेजी शिक्षा के महत्व को ख़ूब अच्छी तरह समझती थीं। उन्होंने अपनी कई कविताओं में अंग्रेजी शिक्षा की तारीफ़ की है। वे अंग्रेजों को ज्ञानदाता के रूप में संबोधित करती हैं। हम सभी जानते हैं कि शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए शिक्षा का द्वार अंग्रेजों ने खोला था। अपनी एक कविता में सावित्रीबाई कहती हैं –
ज्ञानदाता अंग्रेज जो आए
अवसर पहले यह नहिं पाया
जागृत हो, अब उठो भाइयों!
उठो, तोड़ दो रूढ़ परम्परा
शिक्षा पाने उठो भाइयों!! [8]
वे धिक्कारती हुई, समझाती हुई कहती हैं–
बिना ज्ञान के व्यर्थ सभी कुछ हो जाता
बुद्धि बिना तो इंसान भी पशु कहलाता
वे अंग्रेजों द्वारा शिक्षा का द्वार सबके लिए खोलने को एक सुनहरे अवसर के रूप में देखती हैं और कहती हैं कि इस शिक्षा को ग्रहण करके अपनी दुर्दशा का अंत करो–
universityअब निठल्ले मत बैठो
जाओ, शिक्षा पाओ
पीड़ित और बहिष्कृतों की
दुर्दशा का अंत करो
सीखने का मिल गया है यह तुम्हें
अवसर सुनहरा, सीख लो
और तोड़ दो ज़ंजीरें ये
जाति-व्यवस्था की मत सुनो
फेंक डालो शीघ्र भाई
ब्राह्मणों के धर्मग्रंथों को [9]
आधुनिक अंग्रेजी ज्ञान को सावित्रीबाई फुले माता का दर्जा देती हैं। उनकी एक कविता का शीर्षक है– ‘स्नेहमयी माँ’। इसमें इसके पहले के ज्ञान को मूर्खों का ज्ञान कहती हैं। आधुनिक ज्ञान सत्य से अवगत कराता है–
अंग्रेजी माँ! अंग्रेजी माँ!!
शूद्रों का उद्धार करे तू, मनोभावना से
अंग्रेजी माँ! नहीं रहा अब मुगली शासन
न मूर्खों और पेशवाओं का भी शासन
स्नेहमयी हे अंग्रेजी माँ! देती सत्-सत् ज्ञान हमें तू
शूद्रों का भी जीवन है तू
अंग्रेजी माँ! तोड़ी तूने पशु-भावना
माँ! तू ही देती मनुष्यता
हम जैसे सब शूद्र जनों को [10]
शूद्रों-अतिशूद्रों की ग़ुलामी और दुर्दशा के साथ सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविताओं में महिला की स्थिति का अत्यन्त मार्मिक वर्णन किया है। वे लिखती हैं कि महिलाएं सुबह से शाम तक खटती हैं, जबकि बहुत सारे पुरुष मुफ़्तख़ोर की तरह बैठे रहते हैं। वे प्रकृति से उदाहरण देकर बताती हैं कि पशु-पक्षियों में भी नर-मादा मिलकर काम करते हैं, तो स्त्री-पुरुष एक साथ मिलकर काम क्यों नहीं करते? वे ऐसे निकम्मे पुरुषों को धिक्कारती हुई कहती हैं– ‘क्या इन निकम्मों को मनुष्य कहा जाए?’ शीर्षक कविता में उन्होंने इस स्थिति का इस प्रकार वर्णन किया है–
पौ फटने से गोधूलि तक, महिला करती श्रम
मुफ़्तख़ोर पुरुष जीता है उसकी मेहनत पर
पक्षी और जानवर भी सब मिलकर करते कर्म
कैसे फिर हम कहें मनुष्य, कहो निकम्मों को? [11]
स्त्री-पुरुष संबंधों और पुरुष के व्यभिचारी और धोख़ेबाज़ चरित्र को सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविता ‘भौंरा और कली’ के माध्यम से प्रस्तुत किया है। भौंरे को पुरुष के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है और स्त्री को फूल के रूप में। यह कविता ब्राह्मणवादी-सामंती मानसिकता के अधिकांश पुरुषों के चरित्र को उजागर करके रख देती है–
मसल डालता है वह निर्लज
उसका सुंदर रूप
आता है तूफां के जैसा
और टूट पड़ता है उस पर
उसके मधु को सोख-साख कर
उसके उस निष्प्राण क्लांत-से
जिस्म को ठुकरा देता है
कली कौन-सी? पूछे है फिर…
और भूल करके उसको वह
नई कली को ढूंढे है फिर
है उसका यह काम
उसकी फितरत धोखे वाली
उसकी दुनिया है स्वच्छंद
कहे सावित्री, यही देखकर
हूँ भौचक्की और दुःखी [12]
सावित्रीबाई फुले अपनी कविताओं में इतिहास की ब्राह्मणवादी व्याख्या को चुनौती देती हैं। वे कहती हैं कि शूद्र ही इस देश के मूलनिवासी और वीर योद्धा थे और यहां के शासक थे। उनका समाज अत्यन्त समृद्ध समाज था। बाद में आक्रामणकारियों ने शूद्र शब्द को अपमानजनक बना दिया। वे ‘शूद्र शब्द का अर्थ’ कविता में लिखती हैं कि–
शूद्र का असली मतलब मूलनिवासी था
लेकिन सूर विजेताओं ने
बना दिया ‘शूद्र’ को गाली
ईरानी हों या हों ब्राह्मण
ब्राह्मण हों या हों अंग्रेज
सब पर अंतिम विजय प्राप्त की
शूद्रों ने ही
क्योंकि वे ही क्रांतिकारी थे
मूलनिवासी थे, समृद्ध थे
वही ‘भारतीय’ कहलाते थे
ऐसे वीर थे अपने पूर्वज
हम हैं उन लोगों के वंशज
वे साफ़ शब्दों में कहती हैं कि यह भारत देश, यहाँ के मूल निवासियों का देश है। वही इस धरती के असली हकदार हैं–
नहीं है भारत और किसी का
न ईरानी लोगों का यह
न यूरोपीय लोगों का
न तातारों, न हूणों का
इसकी नसों में रुधिर बह रहा
मूलनिवासी शूद्रों का
अपनी कविताओं में सावित्रीबाई फुले इतिहास और मिथकों की ब्राह्मणवादी व्याख्याओं को चुनौती देती हैं। वे ‘राजा बलि की स्तुति’ शीर्षक कविता में बताती हैं कि ब्राह्मणवादी शूद्रों-अतिशूद्रों के उदार और महान् राजा बलि के साथ छल करने वाले और धोखे से उनके राज्य छीन लेने वाले वामन का गुणगान करते हैं। दलित-बहुजन परम्परा राजा बलि को महान् राजा के रूप में याद करती है। सावित्रीबाई फुले भी उनकी महानता और उदारता को याद करती हैं और बताती हैं कि उनका राज्य कितना समृद्धशाली था। उनके लिए सारी प्रजा एक समान थी। कोई अन्याय नहीं था, कोई दुःख नहीं था। राजा बलि को याद करने के साथ ही उनकी पत्नी को भी याद करती हुई कहती हैं कि पति-पत्नी दोनों एक साथ सुख से रहते थे–
बलि शासक था पुण्यात्मा
दानव-राज बलि धर्मात्मा
बली एक उदार चरित था
उसकी प्रजा ख़ुश थी सारी
किसी चीज़ की कमी नहीं थी
राज में उसके सब संतुष्ट थे
तीनों लोक उसके गुण गाते
उसका अपना स्वतंत्र देश था
विमर्श जहां वैज्ञानिक करते
पवित्र यज्ञ की ज्वाला हरदम
वहां रहा करती प्रकाशित
दान दिया जाता था सोना
रत्न जड़ित मुकुटों को पहनकर
शाही युगल दान करता था
उनकी पत्नी विन्ध्यावली भी
साथ हमेशा उनके रहतीं
आओ, हम सब याद करें मिल
उस युगल शासक को फिर से
और करें प्रशंसा, मिलकर गाएं गीत
हे पावन नेक आत्मा, राजा बलि
हरदिन करते लोग स्तुति सुनो तुम्हारी [13]
वे अपनी कविताओं में कबीर की तरह हिन्दू धर्म के ढोंग-पाखंड को भी उजागर करती हैं। वे कहती हैं कि जिस पत्थर को सिन्दूर लगाकर भगवान बना दिया गया है; वास्तव में वह पत्थर है। वे विभिन्न देवी-देवताओं पर आस्था और विश्वास को नकारती हैं। वे कबीर की तरह तर्क करती हैं कि यदि मनौती मानने से, चढ़ावा चढ़ाने से और पत्थर पूजने से बच्चे पैदा होते; तो फिर स्त्री और पुरुष को शादी करने की क्या ज़रूरत पड़ती। सावित्रीबाई पूरी तरह से वैज्ञानिक चेतना से लैस थीं। वे ऐसी किसी भी चीज़ को स्वीकार करने को तैयार न थीं, जो तर्क पर आधारित न हो और विज्ञान जिसका समर्थन न करता हो। ‘मन्नत’ शीर्षक कविता में कबीर की तरह उन्होंने ढोंग-पाखंड की धज्जियां उड़ा दीं–
पत्थर को सिन्दूर लगाकर
बना दिया है उसे देवता
वह तो वास्तव में पत्थर है
इसी कविता में वे आगे लिखती हैं–
मन्नत कर बकरा कटवाए
और चढ़ावें भेंट-चढ़ावा
पत्थर के इन देवताओं पर
करें मनौती पुत्र जन्म की
पत्थर पूजे से जो होते बच्चे
सोचो! फिर क्यों
शादी करते हैं नर-नारी? [14]
सावित्रीबाई फुले भारतीय पुनर्जागरण की कवयित्री हैं। यूरोपीय पुनर्जागरण के दार्शनिकों ने यह सवाल उठाया था कि मानवीय गरिमायुक्त जीवन किसे कहें? किस जीवन को मानवीय जीवन कहें? किसे पशुवत् जीवन कहते हैं? भारत में ब्राह्मणवाद-सामंतवाद ने अधिकांश लोगों के जीवन को पशुवत् जीवन बना दिया था। सावित्रीबाई फुले की कविताएं ‘इंसान कौन और कौन नहीं है।’ इसका विस्तृत विमर्श प्रस्तुत करती हैं। ‘उसे इंसान कहें क्यों?’ शीर्षक कविता में कौन इंसान है, कौन नहीं? किसका जीवन इंसानी है; किसका पशुवत्? इस पर प्रश्न उठाती हैं। वे कहती हैं कि जिसके पास ज्ञान नहीं है; शिक्षा नहीं है; उसका जीवन पशुवत् है। लेकिन, इसके साथ वे यह भी कहती हैं कि यदि कोई व्यक्ति ये दोनों चीज़ें प्राप्त कर लें, लेकिन उसके आधार पर अपना जीवन न जिए; तो उस व्यक्ति का भी जीवन पशुवत् है–
नहीं ज्ञान, न ही है विद्या
न इच्छा पढ़ने-लिखने की
बुद्धि होकर चले न उस पर
ऐसे बुद्धिहीन व्यक्ति को
कैसे कहो, कहें इंसान?
रविदास और कबीर की तरह सावित्रीबाई फुले भी श्रम न करने वाले व्यक्ति को इंसान मानने को तैयार नहीं थीं। वे बिना श्रम किए बैठकर खाने वाले निठल्ले व्यक्ति के जीवन की तुलना पशु से करती हैं–
जो न करता श्रम ज़रा-सा
और ज्योतिष पर करे भरोसा
स्वर्ग-नरक के चक्कर में जो
फिरे रात-दिन लिए हताशा
यूं तो करे न पशु भी कोई
फिर ऐसे आलसी जनों को
कैसे हम इंसान कहें…?
ब्राह्मणवाद-सामंतवाद-दासता और ग़ुलामी पर टिका समाज था। आधुनिक समाज का सबसे बड़ा मूल्य आज़ादी है। आधुनिक युग का इतिहास ही आज़ादी के संघर्ष का इतिहास है। हर व्यक्ति की स्वतंत्रता ही आधुनिकता का सबसे बड़ा मूल्य है। फुले, आंबेडकर और पेरियार की तरह सावित्रीबाई के लिए भी आज़ादी सबसे बड़ा मूल्य थी– शूद्रों-अतिशूद्रों की ब्राह्मणशाही से आज़ादी। स्त्रियों की पुरुषों के वर्चस्व से आज़ादी। वे बार-बार अपनी कविताओं में इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि जिस व्यक्ति को ग़ुलामी का दुःख न हो और न हो आज़ादी की चाहत, उस व्यक्ति को इंसान नहीं कहा जा सकता है–
जिसे ग़ुलामी का दुःख न हो
न ही अपनी आज़ादी के
छिन जाने का रहे मलाल
नहीं समझ आवे जिसको कुछ
इंसानियत का भी जज़्बा
उसे कहें कैसे हम बोलो जी, इंसान? [15]
सावित्रीबाई फुले की कविताएं आधुनिक चेतना से लैस हैं। आज भी जहां स्त्रियां आभूषणों-गहनों के पीछे भागती रहती हैं। उन्हें अपनी सुंदरता बढ़ाने का साधन समझती हैं। इन आभूषणों को पहनकर सुन्दर दिखना चाहती हैं। इसके उलट उनकी कविताएं स्त्री का सबसे बड़ा और सुंदर गहना शिक्षा को मानती हैं। वे कहती हैं कि स्वाभिमान की ज़िंदगी जीने के लिए एक लड़की के लिए शिक्षा सबसे आवश्यक चीज़ है। वे लड़कियों का आह्वान करती हैं कि पाठशाला जाओ और ख़ूब पढ़ो-लिखो–
स्वाभिमान से जीने हेतु
अरी बेटियों पढ़़ो-लिखो
हर दिन पाठशाला में जाकर
अपना ज्ञान बढ़ाओ सुनो
हर इंसान का सच्चा आभूषण है शिक्षा
हर स्त्री पहने शिक्षा का यह गहना
जाओ पाठशाला में ज्ञान की शिक्षा लो [16]
दुर्भाग्य है इस देश का, उनके इस आह्वान के शताधिक वर्षों बाद भी महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा निरक्षर है और ग़ुलामी की स्थिति में है। आज भी यह हिस्सा पशुवत् ज़िंदगी ही जी रहा है। उसके जीवन को किसी भी तरह से मानवीय गरिमायुक्त जीवन नहीं कहा जा सकता है।
सावित्रीबाई महिलाओं को आह्वान करती हैं कि चलो चलकर शिक्षा ग्रहण करें। शिक्षा ही अज्ञानता और ग़रीबी की ज़ंजीरों को तोड़ सकती है। सदियों के दुःख और संताप को ख़त्म कर सकती है। पिछड़ेपन को दूर कर सकती है। वे कहती हैं कि सभी लड़कियों को शिक्षा पाना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लेना चाहिए। अपनी इस बात को लड़कियों के दिलो-दिमाग़ में उतार देने के लिए वे रोज़ सामूहिक तौर पर लड़कियों से अपने द्वारा रचे गए इस गीत का गान कराती थीं–
विद्या माँ के दर पर
चलो चलें शिक्षा पाने
विद्या की देवी की वंदना
करें चलो, उनसे मांगें
शुभ आशीष ज्ञान का
और ग़रीबी-अज्ञानता की
सब ज़ंजीरें तोड़ें
जिनमें हम जकड़े हैं, मिलकर
वो ज़ंजीरें तोड़ें
सदियों से है व्याप्त यहां जो
अनपढ़ता, अज्ञान सुनो
पिछड़ेपन की चादर फेकें
और उन्नति करें चलो [17]
सावित्री बाई फुले पर नाटक-   https://www.youtube.com/watch?v=RZbr6DPBqyM
सभी आधुनिक दार्शनिकों ने कहा है कि अज्ञानता ही अंधकार है। सावित्रीबाई ‘अज्ञानता’ शीर्षक से अपनी कविता में यह प्रश्न उठाती हैं कि आख़िर इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन कौन है?
एक ही दुश्मन है हम सबका
मिलकर उसे खदेड़ दें
उससे ज़्यादा ख़तरनाक तो कोई नहीं है
खोजो, खोजो…
मन के भीतर झांको देखो
वे ख़ुद ही बताती हैं कि इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन उसकी अज्ञानता है। हम सभी जानते हैं कि ब्राह्मणों और उनके धर्मग्रंथों ने शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं को शिक्षा के अधिकार से वंचित किया था। क्योंकि, वे जानते थे कि अज्ञानी और अशिक्षित व्यक्ति को ही ग़ुलाम बनाकर रखा जा सकता है। सदियों तक उसका शोषण-उत्पीड़न किया जा सकता है। इसी कारण से सावित्रीबाई अज्ञानता को सबसे ख़तरनाक दुश्मन घोषित करती हैं–
चलो तुम्हें मैं बतलाती हूं अब पहचान
ख़तरनाक उस खल-दुश्मन की
सुनो ध्यान से उस दुश्मन का
नाम सुनो अब….
वह दुश्मन है यह ‘अज्ञान’ [18]
आधुनिक भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति का द्वार आधुनिक शिक्षा ने खोला। जोतीराव फुले, शाहूजी महाराज, डॉ. आंबेडकर और पेरियार जैसी महान् विभूतियां भी इसी आधुनिक शिक्षा की देन थीं। महाराष्ट्र में सावित्रीबाई फुले, ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई जैसी महान् विदुषी महिलाएं इसी आधुनिक शिक्षा से पैदा हुईं; जिन्होंने वर्ण-जाति व्यवस्था और महिलाओं की दासता के ख़िलाफ़ अथक संघर्ष किया। सावित्रीबाई आधुनिक शिक्षा को सूरज की रोशनी की तरह मानती थीं। उनका कहना था कि इस शिक्षा ने अछूत कहे जाने वाले महारों की ज़िंदगी में भी रोशनी ला दी। हम सभी जानते हैं कि डॉ. आंबेडकर इसी अछूत कही जाने वाली महार जाति में पैदा हुए थे। लेकिन, आधुनिक शिक्षा ने उन्हें विश्व के सर्वश्रेष्ठ महामानवों में से एक बना दिया। ‘जोतिबा से संवाद’ शीर्षक से अपनी कविता में वे शिक्षा और ज्ञान की तुलना सूरज की रोशनी से करते हुए कहती हैं–
जोतिबा! सुनिए, देखिए ज़रा
अस्त हुआ चन्द्र तो सूर्य उगा
फैल गया प्रातः का अद्भुत उजियारा
कहें जोतिबा सावित्री से
कहा सत्य तुमने है बिलकुल
पीछे हटा अंधेरा देखो
ज्ञान के इस उजियारे से
जाग गए हैं सचमुच देखो
शूद्र-अतिशूद्र, महार जगे [19]
सावित्रीबाई फुले की कविताएं आधुनिक जागरण की कविताएं हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में ब्राह्मणवाद-मनुवाद को चुनौती दी। शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति का आह्वान किया है। उनकी कविताएं इस बात की प्रमाण हैं कि वे आधुनिक भारत की प्रथम विद्रोही कवयित्री हैं।

संदर्भ
[1] सावित्रीबाई फुले, रचना समग्र, संपादक : रजनी तिलक
[2] मनुस्मृति
[3] सावित्रीबाई फुले रचना समग्र, संपादक : रजनी तिलक, पृ. 59
[4] वही, परनिर्भर शूद्र, पृ. 64
[5] वही, पृ. 65
[6] एक बिसरी समाज सुधारक, सावित्रीबाई फुले का जीवन और संघर्ष, सम्पादक : ब्रजरंजन मणि, पैमिला सरदार, गेल ओमवेट, एक अध्यापिका और अधिनायिका, पृ. 36, 37
[7] एक भूली-बिसरी समाज सुधारक, सावित्रीबाई फुले का जीवन और संघर्ष, सम्पादक : ब्रजरंजन मणि और पैमिला सरदार, पृ. 73
[8] वही
[9] वही
[10] वही, पृ. 75, 76
[11] फारवर्ड प्रेस; प्रेम, स्त्रीवाद और सामाजिक क्रांति की कवि सावित्रीबाई फुले, ललिता धारा
[12] वही
[13] सावित्रीबाई फुले रचना समग्र, संपादक : रजनी तिलक, पृ. 60
[14] वही, पृ. 57
[15] वही, पृ. 69, 70
[16] वही, पृ. 74
[17] वही, पृ. 76
[18] वही, पृ. 77
[19] वही, पृ. 79, 80

सविता कच्छप के सपनों को हेमंत सोरेन ने दी उड़ान

 IIIT से पीएचडी करने वाली सविता कच्छप के परिवार से मुलाकात करते झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन रांची। रांची की रहने वाली आदिवासी बेटी सविता कच्छप के संघर्ष और सपनों को आज एक नई पहचान मिली। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सविता और उनके पूरे परिवार से मुलाक़ात की, एक ऐसी मुलाक़ात, जो मेहनत, हौसले और उम्मीद का प्रतीक बन गई। पांच दिन पहले ही सविता कच्छप की कहानी सामने आई थी। वह कहानी, जिसमें मज़दूरी करने वाले परिवार की एक बेटी, सीमित संसाधनों के बावजूद IIIT से पीएचडी कर रही है। सविता आज देश की सबसे कम उम्र की आदिवासी बेटियों में से एक हैं, जिन्होंने यह मुक़ाम हासिल किया है।

सनी शरद द्वारा दिखाई गई उस रिपोर्ट में सविता ने बताया था कि आर्थिक तंगी के कारण वह अपने शोध कार्य के लिए एक अच्छा लैपटॉप तक नहीं खरीद पा रही हैं। यह सिर्फ एक मशीन की कमी नहीं थी, बल्कि एक सपने की राह में खड़ी बाधा थी।

30 दिसंबर को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उस बाधा को हटाते हुए सविता को दो लाख रुपये का चेक सौंपा और भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार उन्हें हर संभव सहयोग देगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि सविता जैसी बेटियाँ समाज के लिए मिसाल हैं और उनकी सफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी। इस पल में सिर्फ एक बेटी को मदद नहीं मिली, बल्कि मेहनत और प्रतिभा को सम्मान मिला।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा दी गई इस मदद की हर ओर काफी चर्चा हो रही है और इसको काफी सराहा जा रहा है मुख्यमंत्री द्वारा की गई इस मदद ने सविता के सपनों को नई उड़ान दे दी है। साफ है कि हेमंत सोरेन ने संवेदनशीलता के साथ इस संघर्ष को समझा और एक नई उम्मीद को मजबूती दी। उनकी इस मदद से सविता कच्छप आज सिर्फ एक शोधार्थी नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की उड़ान का प्रतीक बन चुकी हैं।

JSSC CGL: लंबी लड़ाई के बाद 1,910 युवाओं को मिली सरकारी नौकरी, हेमंत सोरेन ने दिया नियुक्ति पत्र

झारखंड में रांची में JSSC CGL अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र देते मुख्यमंत्री हेमंत सोरेनरांची। झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) द्वारा आयोजित संयुक्त स्नातक स्तरीय (CGL) परीक्षा के अंतर्गत चयनित 1,910 अभ्यर्थियों को मंगलवार को झारखंड की राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित एक भव्य समारोह में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा नियुक्ति पत्र प्रदान किए गया। यह आयोजन झारखंड के युवाओं के लिए न केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया का समापन था, बल्कि वर्षों के संघर्ष, अनिश्चितता और इंतजार के बाद मिली बड़ी सफलता का प्रतीक भी बना। यह नियुक्ति इसलिए खास रही क्योंकि यह बीते 10 सालों से लंबित थी।

समारोह में चयनित अभ्यर्थियों के साथ उनके परिजन, राज्य सरकार के प्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में आम नागरिक मौजूद रहे। नियुक्ति पत्र पाकर युवाओं के चेहरों पर साफ़ तौर पर संतोष और आत्मविश्वास झलक रहा था।

झारखंड की राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में नियुक्ति पत्र मिलने के बाद JSSC CGL अभ्यर्थी इस मौके पर समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि शायद अभ्यर्थियों ने यह अनुमान नहीं लगाया होगा कि इस नियुक्ति प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाने में सरकार, JSSC और प्रशासनिक अधिकारियों को कितने दबाव, विरोध और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद, आयोग और पुलिस प्रशासन ने पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ परत-दर-परत तथ्यों को साफ करते हुए न केवल राज्य की जनता के सामने बल्कि न्यायालय के समक्ष भी मजबूती से अपना पक्ष रखा। इसी का परिणाम है कि आज हजारों युवाओं को सरकारी सेवा में शामिल होने का अवसर मिला है।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि इस नियुक्ति प्रक्रिया को मुकाम तक पहुंचाना आसान नहीं था। JSSC CGL परीक्षा को लेकर बीते समय में विरोध, दबाव और कानूनी चुनौतियां सामने आईं। इसके बावजूद आयोग, राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन ने पूरी पारदर्शिता के साथ तथ्यों को क्रमबद्ध ढंग से सामने रखा—चाहे वह राज्य की जनता के समक्ष हो या न्यायालय के समक्ष। इसी प्रक्रिया का परिणाम है कि आज हजारों योग्य युवाओं को सरकारी सेवा में शामिल होने का अवसर मिला।

राज्य के विकास में निभानी होगी अहम भूमिका

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने नवनियुक्त अभ्यर्थियों से अपील किया कि वे अब केवल नौकरीपेशा कर्मचारी नहीं, बल्कि राज्य की शासन व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि अपेक्षा की गई कि वे पूरी निष्ठा और ऊर्जा के साथ झारखंड के सर्वांगीण विकास में योगदान दें, ताकि राज्य को पिछड़ेपन की छवि से बाहर निकालकर देश के अग्रणी राज्यों की पंक्ति में खड़ा किया जा सके।

झारखंड की राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में नियुक्ति पत्र मिलने के बाद JSSC CGL अभ्यर्थी विविध सामाजिक पृष्ठभूमि से आए चयनित अभ्यर्थी

समारोह के दौरान कई चयनित युवाओं ने अपनी पृष्ठभूमि साझा की। कुछ अभ्यर्थी किसान और मजदूर परिवारों से हैं, तो कुछ छोटे व्यापारियों के घर से आते हैं। कई चयनित बेटियों ने बताया कि वे इससे पहले मइया सम्मान योजना जैसी सामाजिक कल्याण योजनाओं की लाभार्थी थीं और अब सरकारी सेवा में चयनित होकर नई जिम्मेदारी निभाने जा रही हैं।अलग-अलग विषयों में शिक्षित इन युवाओं को प्रशासनिक तंत्र में एक सकारात्मक बदलाव की उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है।

पूर्व भाजपा नेता कुलदीप सेंगर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नया मोड़

नई दिल्ली। उन्नाव रेप केस में सजायाफ्ता पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए कुलदीप सेंगर को राहत देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोप गंभीर हैं। इस अपराधी को किसी भी मामले में जमानत नहीं मिलनी चाहिए।

सीजेआई ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि हमें पता है कि लोग राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। व्यवस्था को डराने-धमकाने की कोशिश ना करें। बेंच ने सेंगर के वकील को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई अब चार हफ्ते बाद होगी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने कहा, हम इस तथ्य से अवगत हैं कि जब किसी ट्रायल कोर्ट या हाई कोर्ट ने किसी दोषी या विचाराधीन अभियुक्त को ज़मानत पर रिहा किया हो, तो आम तौर पर इस अदालत को उस व्यक्ति को सुने बिना ऐसे आदेश पर रोक नहीं लगानी चाहिए.”

“लेकिन इस मामले में हालात अलग हैं, क्योंकि प्रतिवादी अभियुक्त को धारा 304-II के तहत भी सजा सुनाई गई है, जो महिला के पिता की गै़र-इरादतन हत्या से जुड़ा मामला है, और वह इस केस में हिरासत में है.”

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पीड़िता और उसका परिवार फिलहाल राहत में है। पिछले दो दिनों से पीड़िता ने अपने परिवार और वकील के साथ दिल्ली में इस मामले में मोर्चा खोल रखा था। इससे पहले  सीबीआई की ओर से तुषार मेहता ने कहा कि-

 यह केस धारा 376 और पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किया गया. ये मामला बहुत भयानक है. तुषार मेहता ने इस बात को लेकर भी चिंता जताई कि यह आगे चलकर और मामलों में भी नजीर बनेगा.

बता दें कि कुलदीप सेंगर के खिलाफ जिस लड़की ने रेप का मामला दर्ज कराया था, उस पीड़िता की उम्र घटना के वक्त 16 साल से भी कम थी। ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को निर्विवाद रूप से आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषी ठहराया था। इसमें न्यूनतम 10 वर्ष और अधिकतम सजा आजीवन कारावास है। साल 2019 में सेंगर को उम्र कैद की सजा सुनाई दी।

मामले में नया मोड़ तब आ गया जब 23 दिसंबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा निलंबित करते हुए उन्हें ज़मानत दे दी थी। कुलदीप सेंगर की सजा निलंबित होने से बवाल मच गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा रुख से यह साफ है कि न्यायपालिका ऐसे मामलों में किसी भी तरह की नरमी के पक्ष में नहीं है। लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट के सजा निलंबित करने के फैसले पर बहस अब भी जारी है।

क्योंकि यह मामला सिर्फ कुलदीप सेंगर की सजा तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी है कि:

क्या बलात्कार और पॉक्सो जैसे मामलों में दोषी प्रभाव और हैसियत के दम पर राहत पा सकते हैं?

क्या पीड़िता की सुरक्षा और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को नजरअंदाज किया जा सकता है?

बहुजन चेतना के शिल्पकार थे राम वनजी सुतार

प्रख्यात शिल्पार राम सुतार जी के साथ दलित दस्तक के संपादक अशोक दासनई दिल्ली/ नोएडा। पद्मभूषण से सम्मानित, विश्वप्रसिद्ध मूर्तिकार राम वनजी सुतार अब हमारे बीच नहीं रहे। 18 दिसंबर को नोएडा स्थित उनके आवास पर 100 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद राम सुतार को आज ज़्यादातर मीडिया स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से जोड़कर याद कर रहा है, लेकिन यह अधूरी और एकतरफ़ा तस्वीर है। सच यह है कि राम सुतार ने अपने शिल्प के ज़रिये बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर को वैश्विक पहचान देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। वे उन गिने-चुने कलाकारों में थे, जिनके लिए मूर्ति सिर्फ कला नहीं, बल्कि विचार और प्रतिरोध का औज़ार थी।

महाराष्ट्र में जन्म लेने के कारण अंबेडकरी आंदोलन को उन्होंने करीब से देखा-समझा था। उनका जन्म महाराष्ट्र के धुले जिले के गोंदूर गांव में 19 फरवरी 1925 को एक साधारण विश्वकर्मा परिवार में हुआ था। मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा लेने के बाद उन्होंने छह दशकों तक कला को सामाजिक जिम्मेदारी के साथ जिया। हालांकि उन्होंने अपनी सामाजिक पहचान पर कभी जोर नहीं दिया, लेकिन कमजोर वर्ग में जन्म लेने के कारण दूर से सही, उन्होंने अंबेडकरी आंदोलन को समझा था। ऐसे में जब उन्हें डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा को बनाने का प्रोजेक्ट मिला तो यह उनके लिए भावनात्मक क्षण था।

यूपी की मुख्यमंत्री बनने के बाद सुश्री मायावती ने उन्हें नोएडा के दलित प्रेरणा स्थल की सारी प्रतिमाओं को बनाने का आग्रह किया, जिसे राम सुतार जी ने खुशी से स्वीकार किया। इस सिलसिले में बहनजी कई बार राम सुतार जी से मिली भी, ताकि प्रतिमाएं शानदार और जीवंत बन सके।

राम सुतार कहा करते थे कि “बाबा साहब की मूर्तियां बनाना मेरे लिए सामाजिक न्याय का प्रतीक गढ़ने जैसा है।”

आज भारत ही नहीं, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जो बाबा साहब की प्रतिमाएं हमें दिखाई देती हैं, उनमें से कई राम सुतार की ही कृतियां हैं। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में स्थित 125 फीट ऊंची बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा, भारत की सबसे ऊंची अंबेडकर मूर्ति है। यह सिर्फ एक प्रतिमा नहीं, बल्कि संविधान और समानता का प्रतीक है। इसी तरह मुंबई के दादर स्थित इंदु मिल्स परिसर में बन रही 450 फीट ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वेलिटी’ राम सुतार का एक और ऐतिहासिक सपना है। पूरा होने पर यह दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची प्रतिमा होगी और डॉ. अंबेडकर को वैश्विक समानता के प्रतीक के रूप में स्थापित करेगी।

भारत से बाहर भी राम सुतार की बनाई अंबेडकर प्रतिमाएं मौजूद हैं। अमेरिका के मैरीलैंड में स्थित अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में 14 अक्टूबर 2023 को अनावरण की गई स्टैच्यू ऑफ इक्वेलिटी, उत्तर अमेरिका में बाबा साहब की पहली आदमकद और सबसे ऊंची प्रतिमा है।

राम सुतार की कला की खास बात यह थी कि उनकी बनाई अंबेडकर प्रतिमाओं में बाबा साहब खड़े हुए, संविधान थामे हुए, आत्मविश्वास से भरे हुए दिखाई देते हैं। यानी एक ऐसे नेता के रूप में जो दया नहीं, अधिकार की बात करता है। उनके कद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सहित कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें महाराष्ट्र भूषण सम्मान से सम्मानित किया था।

राम सुतार को सिर्फ एक “स्टैच्यू मेकर” नहीं, बल्कि बहुजन आंदोलन के शिल्पकार के रूप में याद किया जाए। एक ऐसा शिल्पकार, जिसने बहुजन समाज में जन्म लेकर कला की दुनिया में छा गया। उनकी बनाई मूर्तियां सिर्फ पत्थर नहीं हैं, बल्कि संविधान, संघर्ष और समानता की स्थायी गवाही हैं।

लुप्त होती भाषाओं के बीच राजबंशी भाषा पर किताब, 19 दिसंबर को दिल्ली में होगा विमोचन

AI द्वारा बनाई गई पुस्तक की सांकेतिक तस्वीर

नई दिल्ली। भारत भाषाओं का देश है, लेकिन यही भाषाई विविधता आज गंभीर संकट का सामना कर रही है। जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 121 प्रमुख भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें से केवल 22 भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं। जबकि देश में 19,569 मातृभाषाएं (Mother Tongues) प्रचलित हैं, जिनमें बोलियां, उपबोलियां और स्थानीय भाषाएं शामिल हैं। भाषा वैज्ञानिक सर्वेक्षण बताता है कि भारत में ऐतिहासिक रूप से 700–800 से अधिक भाषाएं बोली गई हैं, जिनमें से बड़ी संख्या आज लुप्तप्राय (Endangered) स्थिति में है, खासतौर पर आदिवासी और लोक भाषाएं।

इसी पृष्ठभूमि में राजबंशी भाषा, जिसे पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत की प्राचीन भाषाओं में गिना जाता है, एक बार फिर चर्चा में है। राजबंशी भाषा पर आधारित एक महत्वपूर्ण पुस्तक का विमोचन 19 दिसंबर को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में किया जा रहा है। इस पुस्तक के लेखक हैं रिटायर्ड विंग कमांडर डॉ. रंजीत कुमार मंडल, जो पहले भी भाषाई और सामाजिक विषयों पर कई किताबें और शोध पत्र लिख चुके हैं।

राजबंशी भाषा: पहचान और संघर्ष राजबंशी भाषा मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, झारखंड, नेपाल के तराई क्षेत्र और बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों में बोली जाती है। इसके बावजूद, इसे अक्सर बोली कहकर हिंदी या बंगाली के अंतर्गत समाहित कर दिया जाता है, जिससे इसकी स्वतंत्र भाषाई पहचान कमजोर पड़ती रही है।

भाषावैज्ञानिकों का मानना है कि राजबंशी भाषा की अपनी अलग संरचना, शब्दावली और लोक-साहित्य है, जो इसे एक स्वतंत्र भाषा के रूप में स्थापित करती है। लेकिन संवैधानिक मान्यता और शिक्षा व्यवस्था में स्थान न मिलने के कारण यह भाषा भी धीरे-धीरे हाशिये पर जा रही है।

पुस्तक के लेखक विंग कमांडर डॉ. रंजीत कुमार मंडल (रिटा.)पुस्तक विमोचन का महत्व डॉ. रंजीत कुमार मंडल की यह पुस्तक केवल भाषा का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह राजबंशी समाज की सांस्कृतिक स्मृति, इतिहास और भाषाई अधिकारों को दर्ज करने का प्रयास भी है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी किताबें लुप्त होती भाषाओं के संरक्षण की दिशा में दस्तावेजी साक्ष्य का काम करती हैं। पुस्तक विमोचन के मौके पर भाषा-संस्कृति से जुड़े विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजबंशी समाज के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। कार्यक्रम में मातृभाषा आधारित शिक्षा, जनगणना में भाषाओं की पहचान और भाषाई न्याय जैसे मुद्दों पर चर्चा भी होने की उम्मीद है।

भाषाई न्याय का सवाल राजबंशी भाषा का मुद्दा केवल एक भाषा का नहीं, बल्कि उस भाषाई लोकतंत्र का सवाल है, जिसमें हर समुदाय की बोली-भाषा को सम्मान और संरक्षण मिले। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते राजबंशी जैसी भाषाओं को शिक्षा, शोध और नीति में स्थान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह विरासत सिर्फ किताबों तक सीमित रह जाएगी। राजबंशी भाषा पर यह पुस्तक ऐसे समय में आ रही है, जब भारत की भाषाई विविधता को बचाने की लड़ाई और तेज़ हो गई है।

झारखंड में आदिवासी बच्चे अपनी मातृभाषा में करेंगे पढ़ाई

सांकेतिक तस्वीररांची। झारखंड से आदिवासी शिक्षा को लेकर एक बड़ी और अहम खबर है। झारखंड सरकार ने राज्य के 1080 सरकारी स्कूलों में बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत अब आदिवासी बच्चे मुंडारी, संथाली, हो, खड़िया और कुरुख जैसी अपनी मातृभाषाओं में पढ़ाई कर सकेंगे। सरकार का कहना है कि मातृभाषा में शिक्षा मिलने से बच्चों की समझने की क्षमता बढ़ेगी, स्कूल छोड़ने की दर कम होगी और बच्चे अपनी संस्कृति से जुड़े रहते हुए बेहतर शिक्षा हासिल कर पाएंगे।

इस कार्यक्रम को UNICEF और Language and Learning Foundation का सहयोग मिला है। इन संस्थाओं की मदद से शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है और स्थानीय भाषा में पढ़ाई के लिए पाठ्य सामग्री भी तैयार की गई है। शिक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, अब तक कई आदिवासी बच्चे सिर्फ इसलिए पढ़ाई छोड़ देते थे क्योंकि शुरुआती कक्षाओं में पढ़ाई की भाषा उनके लिए समझना मुश्किल होती थी। झारखंड सरकार का कहना है कि यह योजना खास तौर पर प्राथमिक कक्षाओं में लागू की गई है और अगर यह सफल रहती है तो आगे इसे और स्कूलों तक बढ़ाया जाएगा।

शिक्षा विभाग के अनुसार, यह कार्यक्रम विशेष रूप से प्राथमिक और प्रारंभिक कक्षाओं में लागू किया जा रहा है, ताकि बच्चे अपनी जानी-पहचानी भाषा में गणित, पर्यावरण अध्ययन और अन्य विषयों की बुनियादी समझ विकसित कर सकें। इसके साथ-साथ धीरे-धीरे हिंदी और अन्य भाषाओं से भी उन्हें जोड़ा जाएगा, जिससे उनकी बहुभाषी क्षमता मजबूत हो सके। सरकार का मानना है कि मातृभाषा में शिक्षा मिलने से आदिवासी बच्चों की समझने की क्षमता, आत्मविश्वास और स्कूल में बने रहने की दर में उल्लेखनीय सुधार होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम केवल शैक्षणिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति, पहचान और भाषाई अधिकारों को मान्यता देने की दिशा में भी एक बड़ा प्रयास है। लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि आदिवासी भाषाओं को केवल बोलचाल तक सीमित न रखकर शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाया जाए। झारखंड सरकार का कहना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले समय में इसे और अधिक स्कूलों तक विस्तारित किया जाएगा। यह पहल न केवल स्कूल ड्रॉपआउट दर को कम करने में मददगार साबित हो सकती है, बल्कि आदिवासी बच्चों को शिक्षा के माध्यम से समाज की मुख्यधारा से सम्मानजनक तरीके से जोड़ने का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।

यूपी सरकार ने आदिवासी कल्याण के लिए केंद्र को भेजा ₹72 करोड़ का प्रस्ताव

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने आदिवासी समुदाय के समग्र विकास के लिए केंद्र सरकार को ₹72 करोड़ से अधिक का वित्तीय प्रस्ताव भेजा है। यह प्रस्ताव वर्ष 2025–26 के लिए तैयार किया गया है, जिसमें राज्य के छह आदिवासी बहुल जिलों में शिक्षा, आवास, भूमि अधिकार और छात्र कल्याण से जुड़ी योजनाओं के लिए सहायता मांगी गई है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव में ट्राइबल पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना, आदिवासी छात्रों के लिए छात्रावासों का निर्माण, शैक्षणिक सुविधाओं का विस्तार और भूमि अधिकारों के क्रियान्वयन को प्राथमिकता दी गई है। सरकार का कहना है कि इन योजनाओं से आदिवासी छात्रों की शिक्षा में निरंतरता और सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार लाया जा सकेगा।

पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 1.5 लाख से अधिक आदिवासी छात्रों को पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति का लाभ दिया जा चुका है। इसके अलावा राज्य में एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) संचालित हैं और कई विद्यालय निर्माणाधीन भी हैं, जिनका उद्देश्य आदिवासी छात्रों को गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा उपलब्ध कराना है। भूमि अधिकार के क्षेत्र में भी सरकार ने प्रगति का दावा किया है। वनाधिकार अधिनियम के तहत अब तक 23,430 से अधिक अधिकार दावों को मान्यता दी गई है और संबंधित परिवारों को भूमि के प्रमाण पत्र सौंपे गए हैं। सरकार का मानना है कि इससे आदिवासी समुदाय की आजीविका और सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।

राज्य सरकार के अनुसार, यह प्रस्ताव केंद्र सरकार की स्वीकृति के बाद जमीन पर उतारा जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि आदिवासी विकास से जुड़ी योजनाओं को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जमीनी स्तर तक प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिया जाएगा। आदिवासी समाज से जुड़े संगठनों का मानना है कि यदि यह प्रस्ताव पूरी तरह मंजूर होकर सही तरीके से लागू होता है, तो यह उत्तर प्रदेश में आदिवासी शिक्षा, भूमि अधिकार और सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

बिहार: चुनावी लूट के चक्रव्यूह में सामाजिक न्याय

पिछले महीने बिहार विधान सभा के चुनाव पूरे हुये और नीतीश कुमार ने बीस सालों में दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाया। चूंकि ये बिहार के चुनाव थे जहाँ भात-रोटी पर बाते कम होती है और चुनावी चटनी-अचार पर चटख़ारे ज़्यादा लिये जाते है तो देश भर के सियासी उस्तादों की नज़र इन चुनावो पर थीं।

चुनाव के नतीजे नवंबर 14 को चुनाव के नतीजे आये और क्या ही नतीजे आये! लहंगे तक को रिमोट से उठा देने का दावा करने वाले बिहारी हो या चाणक्य के तथाकथित गुजराती कक्का अमित शाह हो, सब अपने-अपने पसंदानुसार आँखे फटने और बाँछे खिलने के बीच के प्रतिक्रिया स्पेक्ट्रम पर जहाँ-तहाँ बेलौस लोट गये। यहाँ तक कि मनुस्ट्रीम मीडिया में एग्जिट पोल का धंधा करने वाले लोग भी, जो आनुवंशिक कारणों से संघ-भाजपा के लिए जाति-जनित वैदिक प्रेम के बीमार होते हैं, अपने महबूब की आगामी फ़तह की भविष्यवाणी में उन्नीस रह गये। ये तो कहा कि मोदी-शाह मुशायरा लूट लेंगे, पर जाते-जाते शामियाना-दरी-गद्दे वगैरह भी उठा ले जायेंगे, ये नहीं कह पाये।

अल्पसंख्यक जातियों का चुनाव में धमाकेदार प्रदर्शन इस चुनाव की एक और ख़ास बात ये रही कि अल्पसंख्यक सवर्ण जातियों ने अपनी आबादी से कई गुना ज़्यादा सीटें जीतने में 1990 से पहले वाले वक़्त की याद दिला दी। वही वक़्त, जब वोट-चुनाव-सरकार के खेल-तमाशे इन अल्पसंख्यक जातियों की बपौती हुआ करती थी। इन चुनावों में राजपूत, बामन और बाभन (कुल जनसंख्या- 9.97%) जातियों से आने वाले उम्मीदवारों ने 72 सीटों पर जीत हासिल की जो कुल सीटों का 30% है, और इस तरह अपनी जनसंख्या से तीन गुना अधिक सीटें जीतीं। क्या बिहार की राजनीति अल्पसंख्यक सवर्णो के स्वर्ण युग की ओर लौट रही है और वंचित तबकों की सामाजिक न्याय की मुहीम पूरी तरह बिखर चुकी है, ये राज़ फ़िलहाल भविष्य के गर्भ में छुपे हैं।

चौंकाने वाले नतीजों के संभावित कारण “हम करें तो रासलीला, तुम करो तो कॅरेक्टर ढीला” नीति 2022 में नरेंद्र मोदी ने विपक्ष की राज्य सरकारो की जनकल्याण योजनाओ को ‘रेवड़ी’ और ‘विकास’ के लिये घातक बताया। दो ही साल बाद 2024 लोक सभा चुनावों में सारे देश में संघ-भाजपा को झटका लगने के साथ-साथ बनारसीयों ने पर्सनली मोदी जी को ज़ोर का झटका धीरे से दिया और 2019 के साढ़े चार लाख से ज़्यादा के जीत के अंतर को 2024 में सिर्फ़ डेढ़ लाख पर ले आये। घबराकर, मोदी जी ने अपनी आदतानुसार पलटी मारी और महाराष्ट्र से हरियाणा होते हुये दिल्ली तक चुनावी रेवड़ियों की बौछार कर दी। बिहार में भी चुनाव की तारीख़े घोषित होने से ठीक पहले नीतीश कुमार ने अपने आराध्य नरेन्द्र मोदी की “हम करें तो रासलीला, तुम करो तो कॅरेक्टर ढीला” नीति का पालन करते हुये रेवड़ियों की पूरी टोकरी ही उझल दी। बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए पेंशन ₹400 से बढ़ा कर ₹1,100, 125 यूनिट तक बिजली मुफ़्त, और सबसे धमाकेदार, चुनाव की तारीखों के ऐलान से ठीक पहले देहाती आजीविका मिशन “जीविका” के समूहों से जुड़ीं लगभग डेढ़ करोड़ औरतों के खातों में एक मुश्त ₹10,000 के भुगतान का ऐलान किया। इसके अलावा आंगनवाड़ी सहायिका, आशा कर्मियों, विकास मित्रों और टोला सेवको के लिए बढ़ी हुई योजना-भत्ता वगैरह का दाना भी डाला गया।

केंद्रीय चुनाव आयोग का धृतराष्ट्र-शकुनि डबल रोल पिछले कुछ सालों में हुये चुनावों में चुनाव आयोग की कारगुज़ारियों की वजह से उसकी साख पर जो बट्टा लगा है, बिहार चुनाव में आयोग ने उसे दुरुस्त करने का ना ही कोई प्रयास किया बल्कि इस दुर्गति को ही मानक बना दिया। चाहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर विपक्ष के शक़-सवालों की अनदेखी हो या आदर्श आचार संहिता लागू होने के ठीक पहले की गई रेवड़ी घोषणाओं को धृतराष्ट्र-रूपी चुप्पा मंज़ूरी देना हो, या चुनाव के दिन के ठीक पहले लाभार्थियों के खाते में पैसे भेजे जाने हो, आयोग ने सत्ता गठबंधन की तरफदारी में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके आगे आयोग ने शकुनि रूप में आते हुये जीविका दीदियों को महिला वोटरों को बूथ तक लाने की जिम्मेवारी दी। कई इलाक़ों में इन जीविका दीदियों पर महिला वोटरों को बहलाने -फुसलाने और यहाँ तक कि सत्ता पक्ष के लिये वोट ना करने पर ₹10,000 की वापसी पर धमकाने का आरोप भी लगा। मामूल के मुताबिक चुनाव आयोग ने इन शिकायतों पर भी कोई कारवाई नहीं की। इसके अलावा सत्ता पक्ष द्वारा बेहिसाब चुनावी खर्चे पर लगाम लगाने की या राज्य के बाहर से आने वाले संघ-भाजपा के ढिंढोरचीयों पर रोक लगाने या उनकी हरकतों की निगरानी की कोई कोशिश नहीं की गई। सोशल मीडिया पर सैंकड़ों स्थापित और हज़ारों नव-पल्लवित “इन्फ्लुएंसर्स” द्वारा सत्ता पक्ष के लिये माहौल बनाने के लिए रील्स और शॉर्ट्स के खर्चे और भुगतान का भी कोई हिसाब-किताब नहीं रखा गया।

“सामाजिक न्याय” बनाम “सामाजिक तिकड़म” बिहार की धरती पर सामाजिक न्याय के आंदोलनों का इतिहास दो हज़ार सालों से भी पुराना है, और उतना ही पुराना है शोषक जातियों द्वारा उसका विरोध- कभी बल से तो कभी छल से और अब बीसवीं-इक्कीसवीं सदी में शासकीय शक्ति और चुनावी जोड़-तोड़ से। चाहे कांग्रेस जैसे बामन-बनिया दल हों या संघ-भाजपा जैसे बनिया-बामन गिरोह, अथाह काला धन, सजातीय मीडिया-नौकरशाही और अन्य राजकीय-अराजकीय संस्थानों पर भुजंगपाश के बल पर ये पिछले 78-79 सालों से सामाजिक न्याय की हर मुहीम को कुंद करते आये हैं। मंडल आंदोलन से उभरी सामाजिक चेतना को पंगु करने के लिये शोषक तबकों ने बहुजन समुदाय से आने वाले कुछ महत्वाकांक्षी सयाने गधों को अपने पाले में किया और अब उसी सोशल इंजीनियरिंग परियोजना के तहत सबसे वंचित और हाशिये पर खड़ी जातियों को थोड़ी बहुत सशक्त हुई पिछड़ी जातियों के खिलाफ़ लामबंद कर रहे हैं। हालाँकि बहुजनवाद और सामाजिक न्याय के नाम पर ताल ठोकने वालीं पार्टियां भी इस मामले में बेऐब नहीं रहीं हैं। सामाजिक न्याय का मतलब सिर्फ़ कुछेक जातियों का सशक्तिकरण नहीं बल्कि समाज के आख़री तबके तक उस चेतना और ताक़त को पहुँचाना है। यदि बहुजन समाज से आने वाली कोई जाति या कुछेक जातियां सामाजिक न्याय के नाम पर बामन-बनिया वर्चस्व की जगह अपनी जाति-विशेष वर्चस्व को स्थापित करने की तिकड़म करेंगी तो तिकड़मों के उस्ताद सवर्णो से हमेशा मात खायेंगी।

विपक्ष की एक-आयामी रणनीति जहाँ एक ओर संघ-भाजपा और उनके लगुये-भगुये चुनाव लूटने के लिए जातिवाद-साम्प्रदायिकता-काला धन की तिकड़ी के साथ चुनाव आयोग के नाजायज़ सहयोग का चक्रव्यूह रच रहे थे, वहीं विपक्ष एक सुर में शिक्षा-नौकरी की रागिनी गा रहा था। बीच-बीच में कुछ चुनावी पर्यटक वोट-चोरी वगैरह के स्वच्छन्द छंद भी गा रहे थे। रोज़ी-रोटी-स्वास्थ-शिक्षा के मुद्दे सबसे ज़रूरी तो हैं पर दशकों के बामनवाद-बनियावाद जॉइन्ट ऑपरेशन के अंतर्गत मठ-मन्दिर-बाबा-मीडिया का ‘चेतना विनाश के हथियार’ {Weapons of Consciousness Destruction (WCDs)} के रूप में प्रयोग ने सामाजिक चेतना को कमज़ोर करने और जनता का ध्यान इहलोक के बजाय परलोक पर रखने में काफी क़ामयाबी हासिल की है। अगर ऐसा ना होता तो स्वास्थ-शिक्षा-पोषण जैसे अहम मामलों में फिसड्डी राज्य गुजरात में पिछले अट्ठाइस-उनत्तीस सालों से संघ-भाजपा निर्बाध सत्ता की मलाई ना चाट रही होती।

ऐसे झंझावात में बुनियादी मसलों के साथ-साथ सामाजिक चेतना के स्तर पर एक सैद्धांतिक मुहीम की ग़ैर-मौजूदगी ने विपक्ष के अभियान को एक-आयामी और बेअसर बनाया। ऐसे एक-आयामी नज़रिया रखने वाले राजनीतिक दल या गठबंधन खुद ही अपने अवसान की राह बना रहे होते हैं क्योंकि आख़िरकार राजनीति एक रेवड़ी प्रतियोगिता नहीं विचारों का संघर्ष है। चूँकि संघ-भाजपा और मनुस्ट्रीम मीडिया के बीच का सगोत्रगामी प्रेम अब बेहयाई की हद से भी आगे जा चुका है तो इस प्रेम को संघ-भाजपा की जीत के कारणों में जोड़ना वक़्त और टाइपिंग ज़ाया करना होगा।

नतीजों का निचोड़ इन चुनावों के नतीजों से चाहे जो भी निचोड़ निकाला जाये, ये तो बिल्कुल ही नहीं समझा जाना चाहिये कि बिहार की ज़मीन-समाज-सियासत में कोई बुनियादी बदलाव आया है। ना ही संघ-भाजपा और उनके लगुये-भगुये किसी महान चुनावी रणनीति से जीते हैं, क्योंकि ये कहना वैसा ही होगा जैसे कोई फुटबॉल टीम 22 खिलाडियों, रेफ़री और दोनों लाइन मैन को संग लिये खेल रही हो और वो 11 खिलाडियों वाली एक टीम को हरा दे और आप कहें की 22 खिलाड़ियों वाली टीम अपने रणनीति और कौशल से जीती है। संघ-भाजपा का अथाह काला धन, शासन-प्रशासन के बेजा इस्तेमाल और चुनाव आयोग के खुले पक्षपात के बाद भी अगर 37-38 फीसदी वोटरों ने महागठबंधन में अपना भरोसा जताया है तो ये बहुत बड़ी बात है। आगे की राह बहुजन विचारधारा के लिए दुरूह तो है पर जैसा की दिनकर जी ने लिखा है:

सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सुरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं। ….

बुद्ध से लेकर संत रविदास, बाबा कबीर, गुरु नानक, ज्योतिबा फुले, बाबासाहेब अंबेडकर, आसिम बिहारी, जगदेव प्रसाद, कर्पूरी ठाकुर जैसे अनेको पुरखों ने जो राह दिखाई है वो आसान तो कतई नहीं है लेकिन बेगमपुरा की ओर सिर्फ़ वही एक रास्ता जाता है।