बहुजन चेतना के शिल्पकार थे राम वनजी सुतार

प्रख्यात शिल्पार राम सुतार जी के साथ दलित दस्तक के संपादक अशोक दासनई दिल्ली/ नोएडा। पद्मभूषण से सम्मानित, विश्वप्रसिद्ध मूर्तिकार राम वनजी सुतार अब हमारे बीच नहीं रहे। 18 दिसंबर को नोएडा स्थित उनके आवास पर 100 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद राम सुतार को आज ज़्यादातर मीडिया स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से जोड़कर याद कर रहा है, लेकिन यह अधूरी और एकतरफ़ा तस्वीर है। सच यह है कि राम सुतार ने अपने शिल्प के ज़रिये बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर को वैश्विक पहचान देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। वे उन गिने-चुने कलाकारों में थे, जिनके लिए मूर्ति सिर्फ कला नहीं, बल्कि विचार और प्रतिरोध का औज़ार थी।

महाराष्ट्र में जन्म लेने के कारण अंबेडकरी आंदोलन को उन्होंने करीब से देखा-समझा था। उनका जन्म महाराष्ट्र के धुले जिले के गोंदूर गांव में 19 फरवरी 1925 को एक साधारण विश्वकर्मा परिवार में हुआ था। मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा लेने के बाद उन्होंने छह दशकों तक कला को सामाजिक जिम्मेदारी के साथ जिया। हालांकि उन्होंने अपनी सामाजिक पहचान पर कभी जोर नहीं दिया, लेकिन कमजोर वर्ग में जन्म लेने के कारण दूर से सही, उन्होंने अंबेडकरी आंदोलन को समझा था। ऐसे में जब उन्हें डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा को बनाने का प्रोजेक्ट मिला तो यह उनके लिए भावनात्मक क्षण था।

यूपी की मुख्यमंत्री बनने के बाद सुश्री मायावती ने उन्हें नोएडा के दलित प्रेरणा स्थल की सारी प्रतिमाओं को बनाने का आग्रह किया, जिसे राम सुतार जी ने खुशी से स्वीकार किया। इस सिलसिले में बहनजी कई बार राम सुतार जी से मिली भी, ताकि प्रतिमाएं शानदार और जीवंत बन सके।

राम सुतार कहा करते थे कि “बाबा साहब की मूर्तियां बनाना मेरे लिए सामाजिक न्याय का प्रतीक गढ़ने जैसा है।”

आज भारत ही नहीं, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जो बाबा साहब की प्रतिमाएं हमें दिखाई देती हैं, उनमें से कई राम सुतार की ही कृतियां हैं। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में स्थित 125 फीट ऊंची बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा, भारत की सबसे ऊंची अंबेडकर मूर्ति है। यह सिर्फ एक प्रतिमा नहीं, बल्कि संविधान और समानता का प्रतीक है। इसी तरह मुंबई के दादर स्थित इंदु मिल्स परिसर में बन रही 450 फीट ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वेलिटी’ राम सुतार का एक और ऐतिहासिक सपना है। पूरा होने पर यह दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची प्रतिमा होगी और डॉ. अंबेडकर को वैश्विक समानता के प्रतीक के रूप में स्थापित करेगी।

भारत से बाहर भी राम सुतार की बनाई अंबेडकर प्रतिमाएं मौजूद हैं। अमेरिका के मैरीलैंड में स्थित अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में 14 अक्टूबर 2023 को अनावरण की गई स्टैच्यू ऑफ इक्वेलिटी, उत्तर अमेरिका में बाबा साहब की पहली आदमकद और सबसे ऊंची प्रतिमा है।

राम सुतार की कला की खास बात यह थी कि उनकी बनाई अंबेडकर प्रतिमाओं में बाबा साहब खड़े हुए, संविधान थामे हुए, आत्मविश्वास से भरे हुए दिखाई देते हैं। यानी एक ऐसे नेता के रूप में जो दया नहीं, अधिकार की बात करता है। उनके कद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सहित कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें महाराष्ट्र भूषण सम्मान से सम्मानित किया था।

राम सुतार को सिर्फ एक “स्टैच्यू मेकर” नहीं, बल्कि बहुजन आंदोलन के शिल्पकार के रूप में याद किया जाए। एक ऐसा शिल्पकार, जिसने बहुजन समाज में जन्म लेकर कला की दुनिया में छा गया। उनकी बनाई मूर्तियां सिर्फ पत्थर नहीं हैं, बल्कि संविधान, संघर्ष और समानता की स्थायी गवाही हैं।

लुप्त होती भाषाओं के बीच राजबंशी भाषा पर किताब, 19 दिसंबर को दिल्ली में होगा विमोचन

AI द्वारा बनाई गई पुस्तक की सांकेतिक तस्वीर

नई दिल्ली। भारत भाषाओं का देश है, लेकिन यही भाषाई विविधता आज गंभीर संकट का सामना कर रही है। जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 121 प्रमुख भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें से केवल 22 भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं। जबकि देश में 19,569 मातृभाषाएं (Mother Tongues) प्रचलित हैं, जिनमें बोलियां, उपबोलियां और स्थानीय भाषाएं शामिल हैं। भाषा वैज्ञानिक सर्वेक्षण बताता है कि भारत में ऐतिहासिक रूप से 700–800 से अधिक भाषाएं बोली गई हैं, जिनमें से बड़ी संख्या आज लुप्तप्राय (Endangered) स्थिति में है, खासतौर पर आदिवासी और लोक भाषाएं।

इसी पृष्ठभूमि में राजबंशी भाषा, जिसे पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत की प्राचीन भाषाओं में गिना जाता है, एक बार फिर चर्चा में है। राजबंशी भाषा पर आधारित एक महत्वपूर्ण पुस्तक का विमोचन 19 दिसंबर को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में किया जा रहा है। इस पुस्तक के लेखक हैं रिटायर्ड विंग कमांडर डॉ. रंजीत कुमार मंडल, जो पहले भी भाषाई और सामाजिक विषयों पर कई किताबें और शोध पत्र लिख चुके हैं।

राजबंशी भाषा: पहचान और संघर्ष राजबंशी भाषा मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, झारखंड, नेपाल के तराई क्षेत्र और बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों में बोली जाती है। इसके बावजूद, इसे अक्सर बोली कहकर हिंदी या बंगाली के अंतर्गत समाहित कर दिया जाता है, जिससे इसकी स्वतंत्र भाषाई पहचान कमजोर पड़ती रही है।

भाषावैज्ञानिकों का मानना है कि राजबंशी भाषा की अपनी अलग संरचना, शब्दावली और लोक-साहित्य है, जो इसे एक स्वतंत्र भाषा के रूप में स्थापित करती है। लेकिन संवैधानिक मान्यता और शिक्षा व्यवस्था में स्थान न मिलने के कारण यह भाषा भी धीरे-धीरे हाशिये पर जा रही है।

पुस्तक के लेखक विंग कमांडर डॉ. रंजीत कुमार मंडल (रिटा.)पुस्तक विमोचन का महत्व डॉ. रंजीत कुमार मंडल की यह पुस्तक केवल भाषा का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह राजबंशी समाज की सांस्कृतिक स्मृति, इतिहास और भाषाई अधिकारों को दर्ज करने का प्रयास भी है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी किताबें लुप्त होती भाषाओं के संरक्षण की दिशा में दस्तावेजी साक्ष्य का काम करती हैं। पुस्तक विमोचन के मौके पर भाषा-संस्कृति से जुड़े विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजबंशी समाज के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। कार्यक्रम में मातृभाषा आधारित शिक्षा, जनगणना में भाषाओं की पहचान और भाषाई न्याय जैसे मुद्दों पर चर्चा भी होने की उम्मीद है।

भाषाई न्याय का सवाल राजबंशी भाषा का मुद्दा केवल एक भाषा का नहीं, बल्कि उस भाषाई लोकतंत्र का सवाल है, जिसमें हर समुदाय की बोली-भाषा को सम्मान और संरक्षण मिले। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते राजबंशी जैसी भाषाओं को शिक्षा, शोध और नीति में स्थान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह विरासत सिर्फ किताबों तक सीमित रह जाएगी। राजबंशी भाषा पर यह पुस्तक ऐसे समय में आ रही है, जब भारत की भाषाई विविधता को बचाने की लड़ाई और तेज़ हो गई है।

झारखंड में आदिवासी बच्चे अपनी मातृभाषा में करेंगे पढ़ाई

सांकेतिक तस्वीररांची। झारखंड से आदिवासी शिक्षा को लेकर एक बड़ी और अहम खबर है। झारखंड सरकार ने राज्य के 1080 सरकारी स्कूलों में बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत अब आदिवासी बच्चे मुंडारी, संथाली, हो, खड़िया और कुरुख जैसी अपनी मातृभाषाओं में पढ़ाई कर सकेंगे। सरकार का कहना है कि मातृभाषा में शिक्षा मिलने से बच्चों की समझने की क्षमता बढ़ेगी, स्कूल छोड़ने की दर कम होगी और बच्चे अपनी संस्कृति से जुड़े रहते हुए बेहतर शिक्षा हासिल कर पाएंगे।

इस कार्यक्रम को UNICEF और Language and Learning Foundation का सहयोग मिला है। इन संस्थाओं की मदद से शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है और स्थानीय भाषा में पढ़ाई के लिए पाठ्य सामग्री भी तैयार की गई है। शिक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, अब तक कई आदिवासी बच्चे सिर्फ इसलिए पढ़ाई छोड़ देते थे क्योंकि शुरुआती कक्षाओं में पढ़ाई की भाषा उनके लिए समझना मुश्किल होती थी। झारखंड सरकार का कहना है कि यह योजना खास तौर पर प्राथमिक कक्षाओं में लागू की गई है और अगर यह सफल रहती है तो आगे इसे और स्कूलों तक बढ़ाया जाएगा।

शिक्षा विभाग के अनुसार, यह कार्यक्रम विशेष रूप से प्राथमिक और प्रारंभिक कक्षाओं में लागू किया जा रहा है, ताकि बच्चे अपनी जानी-पहचानी भाषा में गणित, पर्यावरण अध्ययन और अन्य विषयों की बुनियादी समझ विकसित कर सकें। इसके साथ-साथ धीरे-धीरे हिंदी और अन्य भाषाओं से भी उन्हें जोड़ा जाएगा, जिससे उनकी बहुभाषी क्षमता मजबूत हो सके। सरकार का मानना है कि मातृभाषा में शिक्षा मिलने से आदिवासी बच्चों की समझने की क्षमता, आत्मविश्वास और स्कूल में बने रहने की दर में उल्लेखनीय सुधार होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम केवल शैक्षणिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति, पहचान और भाषाई अधिकारों को मान्यता देने की दिशा में भी एक बड़ा प्रयास है। लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि आदिवासी भाषाओं को केवल बोलचाल तक सीमित न रखकर शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाया जाए। झारखंड सरकार का कहना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले समय में इसे और अधिक स्कूलों तक विस्तारित किया जाएगा। यह पहल न केवल स्कूल ड्रॉपआउट दर को कम करने में मददगार साबित हो सकती है, बल्कि आदिवासी बच्चों को शिक्षा के माध्यम से समाज की मुख्यधारा से सम्मानजनक तरीके से जोड़ने का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।

यूपी सरकार ने आदिवासी कल्याण के लिए केंद्र को भेजा ₹72 करोड़ का प्रस्ताव

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सांकेतिक तस्वीर

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने आदिवासी समुदाय के समग्र विकास के लिए केंद्र सरकार को ₹72 करोड़ से अधिक का वित्तीय प्रस्ताव भेजा है। यह प्रस्ताव वर्ष 2025–26 के लिए तैयार किया गया है, जिसमें राज्य के छह आदिवासी बहुल जिलों में शिक्षा, आवास, भूमि अधिकार और छात्र कल्याण से जुड़ी योजनाओं के लिए सहायता मांगी गई है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव में ट्राइबल पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना, आदिवासी छात्रों के लिए छात्रावासों का निर्माण, शैक्षणिक सुविधाओं का विस्तार और भूमि अधिकारों के क्रियान्वयन को प्राथमिकता दी गई है। सरकार का कहना है कि इन योजनाओं से आदिवासी छात्रों की शिक्षा में निरंतरता और सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार लाया जा सकेगा।

पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 1.5 लाख से अधिक आदिवासी छात्रों को पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति का लाभ दिया जा चुका है। इसके अलावा राज्य में एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) संचालित हैं और कई विद्यालय निर्माणाधीन भी हैं, जिनका उद्देश्य आदिवासी छात्रों को गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा उपलब्ध कराना है। भूमि अधिकार के क्षेत्र में भी सरकार ने प्रगति का दावा किया है। वनाधिकार अधिनियम के तहत अब तक 23,430 से अधिक अधिकार दावों को मान्यता दी गई है और संबंधित परिवारों को भूमि के प्रमाण पत्र सौंपे गए हैं। सरकार का मानना है कि इससे आदिवासी समुदाय की आजीविका और सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।

राज्य सरकार के अनुसार, यह प्रस्ताव केंद्र सरकार की स्वीकृति के बाद जमीन पर उतारा जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि आदिवासी विकास से जुड़ी योजनाओं को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जमीनी स्तर तक प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिया जाएगा। आदिवासी समाज से जुड़े संगठनों का मानना है कि यदि यह प्रस्ताव पूरी तरह मंजूर होकर सही तरीके से लागू होता है, तो यह उत्तर प्रदेश में आदिवासी शिक्षा, भूमि अधिकार और सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

बिहार: चुनावी लूट के चक्रव्यूह में सामाजिक न्याय

पिछले महीने बिहार विधान सभा के चुनाव पूरे हुये और नीतीश कुमार ने बीस सालों में दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाया। चूंकि ये बिहार के चुनाव थे जहाँ भात-रोटी पर बाते कम होती है और चुनावी चटनी-अचार पर चटख़ारे ज़्यादा लिये जाते है तो देश भर के सियासी उस्तादों की नज़र इन चुनावो पर थीं।

चुनाव के नतीजे नवंबर 14 को चुनाव के नतीजे आये और क्या ही नतीजे आये! लहंगे तक को रिमोट से उठा देने का दावा करने वाले बिहारी हो या चाणक्य के तथाकथित गुजराती कक्का अमित शाह हो, सब अपने-अपने पसंदानुसार आँखे फटने और बाँछे खिलने के बीच के प्रतिक्रिया स्पेक्ट्रम पर जहाँ-तहाँ बेलौस लोट गये। यहाँ तक कि मनुस्ट्रीम मीडिया में एग्जिट पोल का धंधा करने वाले लोग भी, जो आनुवंशिक कारणों से संघ-भाजपा के लिए जाति-जनित वैदिक प्रेम के बीमार होते हैं, अपने महबूब की आगामी फ़तह की भविष्यवाणी में उन्नीस रह गये। ये तो कहा कि मोदी-शाह मुशायरा लूट लेंगे, पर जाते-जाते शामियाना-दरी-गद्दे वगैरह भी उठा ले जायेंगे, ये नहीं कह पाये।

अल्पसंख्यक जातियों का चुनाव में धमाकेदार प्रदर्शन इस चुनाव की एक और ख़ास बात ये रही कि अल्पसंख्यक सवर्ण जातियों ने अपनी आबादी से कई गुना ज़्यादा सीटें जीतने में 1990 से पहले वाले वक़्त की याद दिला दी। वही वक़्त, जब वोट-चुनाव-सरकार के खेल-तमाशे इन अल्पसंख्यक जातियों की बपौती हुआ करती थी। इन चुनावों में राजपूत, बामन और बाभन (कुल जनसंख्या- 9.97%) जातियों से आने वाले उम्मीदवारों ने 72 सीटों पर जीत हासिल की जो कुल सीटों का 30% है, और इस तरह अपनी जनसंख्या से तीन गुना अधिक सीटें जीतीं। क्या बिहार की राजनीति अल्पसंख्यक सवर्णो के स्वर्ण युग की ओर लौट रही है और वंचित तबकों की सामाजिक न्याय की मुहीम पूरी तरह बिखर चुकी है, ये राज़ फ़िलहाल भविष्य के गर्भ में छुपे हैं।

चौंकाने वाले नतीजों के संभावित कारण “हम करें तो रासलीला, तुम करो तो कॅरेक्टर ढीला” नीति 2022 में नरेंद्र मोदी ने विपक्ष की राज्य सरकारो की जनकल्याण योजनाओ को ‘रेवड़ी’ और ‘विकास’ के लिये घातक बताया। दो ही साल बाद 2024 लोक सभा चुनावों में सारे देश में संघ-भाजपा को झटका लगने के साथ-साथ बनारसीयों ने पर्सनली मोदी जी को ज़ोर का झटका धीरे से दिया और 2019 के साढ़े चार लाख से ज़्यादा के जीत के अंतर को 2024 में सिर्फ़ डेढ़ लाख पर ले आये। घबराकर, मोदी जी ने अपनी आदतानुसार पलटी मारी और महाराष्ट्र से हरियाणा होते हुये दिल्ली तक चुनावी रेवड़ियों की बौछार कर दी। बिहार में भी चुनाव की तारीख़े घोषित होने से ठीक पहले नीतीश कुमार ने अपने आराध्य नरेन्द्र मोदी की “हम करें तो रासलीला, तुम करो तो कॅरेक्टर ढीला” नीति का पालन करते हुये रेवड़ियों की पूरी टोकरी ही उझल दी। बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए पेंशन ₹400 से बढ़ा कर ₹1,100, 125 यूनिट तक बिजली मुफ़्त, और सबसे धमाकेदार, चुनाव की तारीखों के ऐलान से ठीक पहले देहाती आजीविका मिशन “जीविका” के समूहों से जुड़ीं लगभग डेढ़ करोड़ औरतों के खातों में एक मुश्त ₹10,000 के भुगतान का ऐलान किया। इसके अलावा आंगनवाड़ी सहायिका, आशा कर्मियों, विकास मित्रों और टोला सेवको के लिए बढ़ी हुई योजना-भत्ता वगैरह का दाना भी डाला गया।

केंद्रीय चुनाव आयोग का धृतराष्ट्र-शकुनि डबल रोल पिछले कुछ सालों में हुये चुनावों में चुनाव आयोग की कारगुज़ारियों की वजह से उसकी साख पर जो बट्टा लगा है, बिहार चुनाव में आयोग ने उसे दुरुस्त करने का ना ही कोई प्रयास किया बल्कि इस दुर्गति को ही मानक बना दिया। चाहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर विपक्ष के शक़-सवालों की अनदेखी हो या आदर्श आचार संहिता लागू होने के ठीक पहले की गई रेवड़ी घोषणाओं को धृतराष्ट्र-रूपी चुप्पा मंज़ूरी देना हो, या चुनाव के दिन के ठीक पहले लाभार्थियों के खाते में पैसे भेजे जाने हो, आयोग ने सत्ता गठबंधन की तरफदारी में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके आगे आयोग ने शकुनि रूप में आते हुये जीविका दीदियों को महिला वोटरों को बूथ तक लाने की जिम्मेवारी दी। कई इलाक़ों में इन जीविका दीदियों पर महिला वोटरों को बहलाने -फुसलाने और यहाँ तक कि सत्ता पक्ष के लिये वोट ना करने पर ₹10,000 की वापसी पर धमकाने का आरोप भी लगा। मामूल के मुताबिक चुनाव आयोग ने इन शिकायतों पर भी कोई कारवाई नहीं की। इसके अलावा सत्ता पक्ष द्वारा बेहिसाब चुनावी खर्चे पर लगाम लगाने की या राज्य के बाहर से आने वाले संघ-भाजपा के ढिंढोरचीयों पर रोक लगाने या उनकी हरकतों की निगरानी की कोई कोशिश नहीं की गई। सोशल मीडिया पर सैंकड़ों स्थापित और हज़ारों नव-पल्लवित “इन्फ्लुएंसर्स” द्वारा सत्ता पक्ष के लिये माहौल बनाने के लिए रील्स और शॉर्ट्स के खर्चे और भुगतान का भी कोई हिसाब-किताब नहीं रखा गया।

“सामाजिक न्याय” बनाम “सामाजिक तिकड़म” बिहार की धरती पर सामाजिक न्याय के आंदोलनों का इतिहास दो हज़ार सालों से भी पुराना है, और उतना ही पुराना है शोषक जातियों द्वारा उसका विरोध- कभी बल से तो कभी छल से और अब बीसवीं-इक्कीसवीं सदी में शासकीय शक्ति और चुनावी जोड़-तोड़ से। चाहे कांग्रेस जैसे बामन-बनिया दल हों या संघ-भाजपा जैसे बनिया-बामन गिरोह, अथाह काला धन, सजातीय मीडिया-नौकरशाही और अन्य राजकीय-अराजकीय संस्थानों पर भुजंगपाश के बल पर ये पिछले 78-79 सालों से सामाजिक न्याय की हर मुहीम को कुंद करते आये हैं। मंडल आंदोलन से उभरी सामाजिक चेतना को पंगु करने के लिये शोषक तबकों ने बहुजन समुदाय से आने वाले कुछ महत्वाकांक्षी सयाने गधों को अपने पाले में किया और अब उसी सोशल इंजीनियरिंग परियोजना के तहत सबसे वंचित और हाशिये पर खड़ी जातियों को थोड़ी बहुत सशक्त हुई पिछड़ी जातियों के खिलाफ़ लामबंद कर रहे हैं। हालाँकि बहुजनवाद और सामाजिक न्याय के नाम पर ताल ठोकने वालीं पार्टियां भी इस मामले में बेऐब नहीं रहीं हैं। सामाजिक न्याय का मतलब सिर्फ़ कुछेक जातियों का सशक्तिकरण नहीं बल्कि समाज के आख़री तबके तक उस चेतना और ताक़त को पहुँचाना है। यदि बहुजन समाज से आने वाली कोई जाति या कुछेक जातियां सामाजिक न्याय के नाम पर बामन-बनिया वर्चस्व की जगह अपनी जाति-विशेष वर्चस्व को स्थापित करने की तिकड़म करेंगी तो तिकड़मों के उस्ताद सवर्णो से हमेशा मात खायेंगी।

विपक्ष की एक-आयामी रणनीति जहाँ एक ओर संघ-भाजपा और उनके लगुये-भगुये चुनाव लूटने के लिए जातिवाद-साम्प्रदायिकता-काला धन की तिकड़ी के साथ चुनाव आयोग के नाजायज़ सहयोग का चक्रव्यूह रच रहे थे, वहीं विपक्ष एक सुर में शिक्षा-नौकरी की रागिनी गा रहा था। बीच-बीच में कुछ चुनावी पर्यटक वोट-चोरी वगैरह के स्वच्छन्द छंद भी गा रहे थे। रोज़ी-रोटी-स्वास्थ-शिक्षा के मुद्दे सबसे ज़रूरी तो हैं पर दशकों के बामनवाद-बनियावाद जॉइन्ट ऑपरेशन के अंतर्गत मठ-मन्दिर-बाबा-मीडिया का ‘चेतना विनाश के हथियार’ {Weapons of Consciousness Destruction (WCDs)} के रूप में प्रयोग ने सामाजिक चेतना को कमज़ोर करने और जनता का ध्यान इहलोक के बजाय परलोक पर रखने में काफी क़ामयाबी हासिल की है। अगर ऐसा ना होता तो स्वास्थ-शिक्षा-पोषण जैसे अहम मामलों में फिसड्डी राज्य गुजरात में पिछले अट्ठाइस-उनत्तीस सालों से संघ-भाजपा निर्बाध सत्ता की मलाई ना चाट रही होती।

ऐसे झंझावात में बुनियादी मसलों के साथ-साथ सामाजिक चेतना के स्तर पर एक सैद्धांतिक मुहीम की ग़ैर-मौजूदगी ने विपक्ष के अभियान को एक-आयामी और बेअसर बनाया। ऐसे एक-आयामी नज़रिया रखने वाले राजनीतिक दल या गठबंधन खुद ही अपने अवसान की राह बना रहे होते हैं क्योंकि आख़िरकार राजनीति एक रेवड़ी प्रतियोगिता नहीं विचारों का संघर्ष है। चूँकि संघ-भाजपा और मनुस्ट्रीम मीडिया के बीच का सगोत्रगामी प्रेम अब बेहयाई की हद से भी आगे जा चुका है तो इस प्रेम को संघ-भाजपा की जीत के कारणों में जोड़ना वक़्त और टाइपिंग ज़ाया करना होगा।

नतीजों का निचोड़ इन चुनावों के नतीजों से चाहे जो भी निचोड़ निकाला जाये, ये तो बिल्कुल ही नहीं समझा जाना चाहिये कि बिहार की ज़मीन-समाज-सियासत में कोई बुनियादी बदलाव आया है। ना ही संघ-भाजपा और उनके लगुये-भगुये किसी महान चुनावी रणनीति से जीते हैं, क्योंकि ये कहना वैसा ही होगा जैसे कोई फुटबॉल टीम 22 खिलाडियों, रेफ़री और दोनों लाइन मैन को संग लिये खेल रही हो और वो 11 खिलाडियों वाली एक टीम को हरा दे और आप कहें की 22 खिलाड़ियों वाली टीम अपने रणनीति और कौशल से जीती है। संघ-भाजपा का अथाह काला धन, शासन-प्रशासन के बेजा इस्तेमाल और चुनाव आयोग के खुले पक्षपात के बाद भी अगर 37-38 फीसदी वोटरों ने महागठबंधन में अपना भरोसा जताया है तो ये बहुत बड़ी बात है। आगे की राह बहुजन विचारधारा के लिए दुरूह तो है पर जैसा की दिनकर जी ने लिखा है:

सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सुरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं। ….

बुद्ध से लेकर संत रविदास, बाबा कबीर, गुरु नानक, ज्योतिबा फुले, बाबासाहेब अंबेडकर, आसिम बिहारी, जगदेव प्रसाद, कर्पूरी ठाकुर जैसे अनेको पुरखों ने जो राह दिखाई है वो आसान तो कतई नहीं है लेकिन बेगमपुरा की ओर सिर्फ़ वही एक रास्ता जाता है।

यूनेस्को मुख्यालय में लगी डॉ. बीआर आंबेडकर की प्रतिमा

यूनेस्को मुख्यालय पेरिस में डॉ. आम्बेडकर की प्रतिमा26 नवंबर यानी संविधान दिवस का दिन इस साल खास रहा। इस दिन पेरिस स्थित UNESCO के मुख्यालय में बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह पहली बार है जब किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के मुख्यालय में भारत के संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित की गई है। यह स्थापना डॉ. आंबेडकर के वैश्विक प्रभाव को दर्शाती है। यूनेस्को मुख्यालय में डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा को विश्व मंच पर उनके विचारों और योगदान को मिली बड़ी मान्यता के प्रतीक के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत द्वारा 1949 में भारतीय संविधान को अपनाए जाने की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर यूनेस्को जैसे संस्थान में यह प्रतिमा स्थापित होना बताता है कि बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर के द्वारा समानता, सामाजिक न्याय, मानव गरिमा की रक्षा, वंचित तबके और महिलाओं के लिए शिक्षा का अधिकार और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के विचार और इस दिशा में किये गए काम सिर्फ भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया और समाजों के लिए भी प्रेरणा बन चुके हैं। यह प्रतिष्ठान दुनिया को याद दिलाता है कि अंबेडकर आधुनिक लोकतंत्र और मानवाधिकारों के सबसे प्रासंगिक वैश्विक विचारकों में से एक हैं।

यूनेस्को मुख्यालय पेरिस में डॉ. आम्बेडकर की प्रतिमायूनेस्को के इस कदम पर खासकर भारत में खासा उत्साह है। तमाम अंबेडकवादी और न्याय पसंद लोग यूनेस्को के इस कदम की सराहना कर रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस पर खुशी जताते हुए सोशल मीडिया एक्स पर लिखायह हमारे लिए अत्यंत गर्व की बात है कि संविधान दिवस के अवसर पर, पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह डॉ. आंबेडकर और भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका को उपयुक्त श्रद्धांजलि है। उनके विचार और आदर्श आज भी हम सभी को शक्ति और आशा प्रदान करते हैं।

यूनेस्कों के इस कदम पर तमाम अन्य प्रतिक्रियाएं भी सामने आई है। क्योंकि यह महज एक प्रतिमा नहीं है, बल्कि बाबासाहेब आंबेडकर की उस विरासत का सम्मान है जिसने मानवता को सिखाया कि समाज तभी आगे बढ़ता है जब हर व्यक्ति को समान अवसर, सम्मान और न्याय मिले। UNESCO में डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा की स्थापना डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत होने का प्रमाण है।

ज्योतिबाराव फुले और डॉ. आंबेडकर के बीच समानता

ज्योतिबा फुले और बाबा साहेब अम्बेडकर का जीवन और कर्तृत्व बहुत ही बारीकी से समझे जाने योग्य है। आज जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं उनमे ये आवश्यकता और अधिक मुखर और बहुरंगी बन पड़ी है। दलित आन्दोलन या दलित अस्मिता को स्थापित करने के विचार में भी एक “क्रोनोलाजिकल” प्रवृत्ति है, समय के क्रम में उसमें एक से दूसरे पायदान तक विकसित होने का एक पैटर्न है और एक सोपान से दूसरे सोपान में प्रवेश करने के अपने कारण हैं। ये कारण सावधानी से समझे और समझाये जा सकते हैं।

 अधिक विस्तार में न जाकर ज्योतिबा फुले और डॉ. आम्बेडकर के उठाये कदमों को एक साथ रखकर देखें। दोनों में एक जैसी त्वरा और स्पष्टता है। समय और परिस्थिति के अनुकूल दलित समाज के मनोविज्ञान को पढ़ने, गढ़ने और एक सामूहिक शुभ की दिशा में उसे प्रवृत्त करने की दोनों में मजबूत तैयारी दिखती है। और चूंकि कालक्रम में उनकी स्थितियां और उनसे अपेक्षाएं भिन्न है, इसलिए एक ही ध्येय की प्राप्ति के लिए उठाये गए उनके कदमों में समानता होते हुए भी कुछ विशिष्ट अंतर भी नजर आते हैं।

ज्योतिबा के समय में जबकि शिक्षा दलितों के लिए एक दुर्लभ आकाशकुसुम था, और शोषण के हथियार के रूप में निरक्षरता और अंधविश्वास जैसे “भोले-भाले” कारणों को ही मुख्य कारण माना जा सकता था– ऐसे वातावरण में शिक्षा और कुरीति निवारण– इन दो उपायों पर पूरी ऊर्जा लगा देना आसान था। न केवल आसान था बल्कि यही संभव भी था। और यही ज्योतिबा ने अपने जीवन में किया भी। क्रान्ति-दृष्टाओं की नैदानिक दूरदृष्टि और चिकित्सा कौशल की सफलता का निर्धारण भी समय और परिस्थितियाँ ही करती हैं।

इस विवशता से इतिहास का कोई क्रांतिकारी या महापुरुष कभी नहीं बच सका है। ज्योतिबा और उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी डॉ. आम्बेडकर के कर्तृत्व में जो भेद हैं उन्हें भी इस विवशता के आलोक में देखना उपयोगी है। इसलिए नहीं कि एक बार बन चुके इतिहास में अतीत से भविष्य की ओर चुने गये मार्ग को हम इस भाँति पहचान सकेंगे, बल्कि इसलिए भी कि अभी के जाग्रत वर्तमान से भविष्य की ओर जाने वाले मार्ग के लिए पाथेय भी हमें इसी से मिलेगा।

ज्योतिबा के समय की “चुनौती” और आंबेडकर के समय के “अवसर” को तत्कालीन दलित समाज की उभर रही चेतना और समसामयिक जगत में उभर रहे अवसरों और चुनौतियों की युति से जोड़कर देखना होगा। जहां ज्योतिबा एक पगडंडी बनाते हैं उसी को आम्बेडकर एक राजमार्ग में बदलकर न केवल यात्रा की दशा बदलते हैं बल्कि गंतव्य की दिशा भी बदल देते हैं।

नए लक्ष्य के परिभाषण के लिए आम्बेडकर न केवल मार्ग और लक्ष्य की पुनर्रचना करते हैं बल्कि अतीत में खो गए अन्य मार्गों और लक्ष्यों का भी पुनरुद्धार करते चलते हैं। फूले में जो शुरुआती लहर है वो आम्बेडकर में प्रौढ़ सुनामी बनकर सामने आती है, और एक नैतिक आग्रह और सुधार से आरम्भ हुआ सिलसिला, किसी खो गए सुनहरे अतीत को भविष्य में प्रक्षेपित करने लगता है। आगे यही प्रक्षेपण अतीत में छीन लिए गए “अधिकार” को फिर से पाने की सामूहिक प्यास में बदल जाता है।

इस यात्रा में पहला हिस्सा जो शिक्षा, साक्षरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जन्माने जैसे नितांत निजी गुणों के परिष्कार में ले जाता था, वहीं दूसरा हिस्सा अधिकार, समानता और आत्मसम्मान जैसे कहीं अधिक व्यापक, इतिहास सिद्ध और वैश्विक विचारों के समर्थन में कहीं अधिक निर्णायक जन-संगठन में ले जाता है। इतना ही नहीं बल्कि इसके साधन और परिणाम स्वरूप राजनीतिक उपायों की खोज, निर्माण और पालन भी आरम्भ हो जाता है।

यह नया विकास स्वतन्त्रता पश्चात की राष्ट्रीय और स्थानीय राजनीति में बहुतेरी नयी प्रवृत्तियों को जन्म देता है। जो समाज हजारों साल से निचली जातियों को अछूत समझता आया था उसकी राजनीतिक रणनीति में जाति का समीकरण सर्वाधिक पवित्र साध्य बन गया।

ये ज्योतिबा और आम्बेडकर का किया हुआ चमत्कार है, जिसकी भारत जैसे रुढ़िवादी समाज ने कभी कल्पना भी न की थी। यहाँ न केवल एक रेखीय क्रम में अधिकारों की मांग बढ़ती जाती है बल्कि उन्हें अपने दम पर हासिल करने की क्षमता भी बढ़ती जाती है।

इसके साथ साथ इतिहास और धार्मिक ग्रंथों के अँधेरे और सडांध-भरे तलघरों में घुसकर शोषण और दमन की यांत्रिकी को बेनकाब करने का विज्ञान भी विकसित होता जाता है। ये बहुआयामी प्रवृत्तियाँ जहां एक साथ एक ही समय में इतनी दिशाओं से आक्रमण करती हैं कि शोषक और रुढ़िवादी वर्ग इससे हताश होकर “आत्मरक्षण” की आक्रामक मुद्रा में आ जाता है। एक विस्मृत और शोषित अतीत की राख से उभरकर भविष्य के लिए सम्मान और समानता का दावा करती हुयी ये दलित चेतना, इस पृष्ठभूमि में लगातार आगे बढ़ती जाती है।

सिनेमा के इस दौर में होमबॉउन्ड क्यों जरूरी है?

जुलाई की बात है, देश के कुछ युवा वर्ग सिनेमा घरों मे रोते बिलखते, खुद का शर्ट फाड़ते दिखे। ये महज़ एक फिल्म का जादू था जिसका नाम सैंयारा है, कह सकते हैं, हमें कुछ ठीक-ठीक क्रांति जैसा देखने को मिला। ऐसा इसीलिए कहा जा सकता है कि कई जगहों पे बेहोशी की भी खबर आई। युवाओं के मानसिक दबाव को इस फिल्म ने और बढ़ा दिया, शर्ट के पैसे गए सो अलग और सेहत बिगड़ी उसके लिए दवाइयों के भी पैसे लगे होंगे।

 उसी के कुछ समय पहले अप्रैल में एक और फिल्म परदे पर आई थी। ‘फुले’, महात्मा ज्योतिबा राव फुले और माता सावित्री बाई फुले के पूरी ज़िंदगी और उनके सामाजिक परिवर्तन के काम को परदे पर लाया गया, पर इस फिल्म का विरोध लगभग पूरे देश में हुआ। विरोध इसीलिए शुरू हुए क्योंकि एक समाज अपने काले इतिहास को काला नहीं मानती। मसलन इन विरोधों को सरकार की ओर से खारिज भी नहीं किया गया। रिलीज डेट आगे बढ़ा दी गई और सेंसर बोर्ड ने सीन्स कटवाए। दिल्ली में जब हवा के लिए प्रोटेस्ट करने पर पुलिस छात्रों को जमीन पे रगड़ रही है, उसी दिल्ली के लुटियन ज़ोन में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के गेट पर ब्राह्मण महासभा का बैनर, फुले फिल्म के विरोध मे पोस्टर टंगता है। जब फिल्में धर्म से जुड़ी हो तो उन सिनेमाओं को सरकार टैक्स फ्री करती है। वहीं दूसरी तरफ फुले जैसी फिल्मों के ऊपर तलवार लटकती है, उसके थिएटर रिलीज को इतना सीमित कर दिया जाता है कि वह आम जनता तक पहुंच भी नहीं पाती। तो क्या यह माना जाए कि एक वर्ग विशेष ही यह फैसला लेगा कि उसके मुताबिक क्या सही है, कौन क्या देखेगा? जो वो तय करेंगे वही जनता देखेगी, पूरा सामाजिक ढांचा कुछ चुनिंदा हाथों में बरकरार है।

इन दोनों फिल्मों का ज़िक्र इसीलिए जरूरी है ताकि हम जान सके जनता को क्या पसंद है, दूसरा ये की अगर कोई सिनेमा रेशनेलिटी और इतिहास को साथ लेकर सामने लाना चाहे तो वो मुश्किल है, क्योंकि कुछ लोग ही तय करेंगे कौन क्या देखेगा, सच, झूठ या कट्टरता।

2020 के मई महीने में पैन्डेमिक के वक्त एक तस्वीर खूब तेजी से वायरल हुई थी, तस्वीर में एक आदमी दूसरे आदमी के गोद में बदहवास लेटा है, यह तस्वीर ऐसा फैला की अमेरिका में न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार बशरत पीर इस स्टोरी को कवर करने आये और फिर इस पर न्यूयॉर्क टाइम्स में “A Friendship, a pandemic and a death besides the highway” के टाइटल से ओपीनियन प्रकाशित हुआ। हम ये बिल्कुल नहीं कह रहे की कोविड ने सबको बराबर का झटका नहीं दिया। क्या अमीर, क्या गरीब, क्या दलित, क्या पिछड़ा लॉकडाउन में सब बंद थे। इस महामारी से सबको बराबर का झटका मिला। पर यह भी समझना होगा कि सभी सूरत या हैदराबाद मीलों में कमाने नहीं जाते। जो जाते हैं उनमें से ज़्यादातर पिछड़े, दलित, गरीब होते हैं। अगर कोविड से बचना है तो अकेले रहना होगा उसके लिए घर चाहिए, पर उनके पास हज़ारों किलोमिटर दूर एक बस्ती में छोटा सा खपड़ैल का मकान है, इससे ये समझ आता है कि कोविड की मार दरकिनार कर दिए समाज के लिए एक चोट बनकर उभरा जिसने अचानक से उन्हें घाव दिया।

बीते सितंबर मे नीरज घेवान द्वारा निर्देशित फिल्म होम बॉउन्ड रिलीज हुई, जो इसी सच्ची घटना पर आधारित है। सामाजिक उत्पीड़न को दर्शाती यह फिल्म छात्र, मजदूर, महिला, दलित और मुस्लिम के ज़िंदगी के सच को यथास्थिति पेश करती है। फिल्म की कामयाबी के मायने अगर बॉक्स ऑफिस है, तो इसने उतनी कमाई नहीं की। पर बात करें तो यह फिल्म भारत की ओर से ऑस्कर के लिए चुनी गई है। कॉन्स फिल्म फेस्टिवल के प्रीमियर पर इसे 9 मिनट का स्टैन्डींग ओवैशन मिला। नेटफलिक्स पर रिलीज हुई इस फिल्म में जाह्नवी कपूर, ईशान खट्टर और विशाल जेठवा हैं। दो दोस्तों की कहानी है जो आज का सच दिखाती है। खोखले छत से गिरता पानी और उसी घर में बाबासाहब की तस्वीर, पर्स में बाबसाहब की तस्वीर, सूरत जाते मीलों में मजदूर और कोरोना। ये कहानी देश के लाखों गाँव घरों की है।

5 बरस पहले जब लॉकडाउन लगा था, हवा साफ हो गई थी। सुनी सड़कों पर अगर कोई था तो सिर्फ मजदूर। रोजगार एवं श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार कोविड के वक्त 1.06 करोड़ पलायन कामगार अपने गृह राज्य वापस लौटे। साधन नहीं थे, तो कई पैदल निकल चल दिए। जागरूकता के अभाव में बहुतों को नहीं पता चला की भला कोरोना है क्या?

नीरज धेवान की यह फिल्म इसीलिए भी जरूरी है कि लाखों बच्चे सिर्फ एक सरकारी नौकरी के लिए जीवन लगा देते हैं। रेल्वे ग्रुप डी, कांस्टेबल, आरआरबी एनटीपीसी आदि जैसे ग्रुप सी और ग्रुप डी टियर की नौकरियां उन्हें जिंदगी बदलने का एकमात्र जरिया लगती हैं। पर परीक्षा बीत जाता है और बचता है तो सिर्फ इंतज़ार या फिर पेपर लीक हो जाता है। नौकरी की इस जंग में एक ऐसा भी वक्त आता है जब नौकरी के सपने छोड़ और परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ में दबा युवा को मजदूर बनना पड़ता है।

कैसे एक परिवार में लड़कियां पढ़ना चाहती हैं पर पढ़ने का हक सिर्फ लड़कों को मिलता है। कैसे नाम के साथ ‘कुमार’ लगाना एक शर्म का भाव देता है। क्योंकि तुम्हारी जाति लोगों को पता चल जाएगी और कैसे किसी के मुसलमान होने के कारण उसपर पाकिस्तान परस्त होने का ठप्पा लग दिया जाता है। ये सारे स्टिग्मा इंसान के साथ चिपके रहते हैं; जो ताउम्र नहीं जाते।

प्रेम भी है, प्रेम में पढ़ना, प्रेम के लिए पढ़ना, और बड़ा बनने का ख्वाब। पर बड़ा बनना सबके हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। किसी को अपनी खपरैल के छत से अपने शरीर पर सिपाही का कपड़ा दिखता है तो किसी को अपने रेल्वे क्वार्टर से आईएएस बनने का ख्वाब। पर ख्वाब तो ख्वाब होते हैं, उनमें नाप तोल कैसा। पर प्रेम तो माँ का भी है जो दलित स्त्री है और बच्चों को सरकारी स्कूल में मीड डे का खाना खिलाती है, पर भला ऐसा हो सकता है कि किसी दलित के हाथ का कोई छुआ भी खा ले। उदाहरण के तौर पर कुछ महीनों पहले कर्नाटक में एक दलित महिला के हेड कुक बनने पर वहाँ के अधिकतर बच्चों ने टीसी ले लिया था।

यह दो दोस्तों की कहानी है जिन्हें बिरयानी बहुत पसंद है। बेरोज़गारी, स्त्री, मजदूरी, घर की पहली ईंट, छुआछूत, रेल की भीड़, धर्म और जाति के नाम पर भेदभाव, गरीबी ये सब सिनेमा में है। आपको अपनी नजर से देखना चाहिए, हो सकता है आपको लगे की, आप पूरे बखत बैठे-बैठे खुद को और साफ कर रहे हैं और जब फिल्म खत्म हो, तब आपको आपके किताब का पन्ना और मुलायम लगने लगे।

दिल्ली का वह बंगला, जहां बैठकर बाबासाहेब ने लिखा था भारत का संविधान

तस्वीर में पीछे दिख रहा आवास, बंगला नंबर 1, तिलक मार्ग, इंडिया गेट है। यह वही ऐतिहासिक बंगला है जहां 1947-51 तक बाबा साहेब अंबेडकर भारत के कानून मंत्री की हैसियत से रहे, लेकिन उससे भी अधिक महत्व की बात ये है कि यही वह धरोहर हैं जहां बैठ कर बाबा साहेब ने इस देश का लोकतांत्रिक समतामूलक प्रबुद्ध संविधान लिखा। पहले यह रोड़ #हार्डिंग_एवेन्यू कहलाता था, लेकिन कांग्रेस शासनकाल में शरारत पूर्ण तरीके से इस जगह को घनघोर जातिवादी तिलक के नाम पर तिलक मार्ग का नाम दे दिया गया।
1978 से यहां पर पौलैंड के राजदूत का आवास है अभी भी यह बंगला अपने मूल रूप, जैसा बाबा साहेब के समय में था बना हुआ है। दो एकड़ एरिया में फैला यह बंगला, भारत के संवैधानिक इतिहास एवं नारी मुक्ति आंदोलन की एक महान धरोहर है जिसे विदेशी सरकार को सौंप कर सरकारों ने जघन्य ऐतिहासिक अत्याचार किया है। हालांकि पोलैंड के राजदूतों ने बाबा साहेब के अध्ययन कक्ष एवं अन्य यादों को अभी भी संजोकर रखा है और वो आने वाले हर राजदूत को बताकर जाते हैं कि यह बाबा साहेब की विरासत एवं ऐतिहासिक पूंजी है लेकिन भारतीय सरकारों का रवैया निहायत की गैर जिम्मेदाराना एवं अफ़सोसजनक रहा है।
यह भी सनद रहे कि इस बंगले में रहकर ही बाबा साहेब ने भारतीय नारी मुक्ति के ऐतिहासिक दस्तावेज #हिंदू_कोड_बिल की रचना भी की थी और उसे संसद में पेश किया था लेकिन उस बिल को ब्राह्मणवादी तत्वों ने पारित नही होने दिया, और हिन्दू कोड बिल पास नहीं होने देने के विरोध में बाबा साहेब ने भारत के कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, और #हार्डिंग_एवेन्यू_बंगला_नंबर_1 खाली कर, #26_अलीपुर_रोड पर शिफ्ट हो गए और वही अपनी अंतिम सांस ली, आज वह आवास #महा_परिनिर्वाण_भूमि के नाम से जाना जाता है। इसलिए बंगला नंबर एक तिलक मार्ग, नारी मुक्ति भूमि के रूप में भी स्वीकार की जानी चाहिए।
जब कभी भी संभव हो इस बंगले की यात्रा जरुर करनी चाहिए। साथ ही प्रबुद्ध समाज को अब और इंतजार न करते हुए, और खासतौर से उन लोगों को जो बाबा साहेब के आन्दोलन के लाभार्थी हैं इस ऐतिहासिक स्थल को इसकी महानता पुनर्स्थापित करने का आन्दोलन पूरी सिद्दत से शुरू करना चाहिये।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के दयाल सिंह कॉलेज में प्रोफेसर डॉ. राजकुमार द्वारा यह तस्वीर 26 नवंबर, 2025 को 1 तिलक मार्ग, इंडिया गेट नई दिल्ली पर ली गई है।

संविधान का वह 10 महत्वपूर्ण आर्टिकल, जिसके बारे में हर भारतीय को पता होना चाहिए

26 नवंबर की तारीख भारत के इतिहास में संविधान दिवस के तौर पर दर्ज है। साल 1949 में इसी दिन भारत की संविधान सभा ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर की अध्यक्षता में लिखे गए दुनिया के सबसे बड़े लिखित संविधान को अंगीकृत किया था। संविधान न केवल देश की शासन-व्यवस्था का आधार है, बल्कि नागरिकों को अधिकार, स्वतंत्रता और सुरक्षा भी देता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या देश के हर नागरिक को संविधान की वे मूल बातें पता हैं, जो उसकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं? और जिसके बारे में उन्हें जरूर जानना चाहिए।

हम आपको यहां बता रहे हैं संविधान के 10 ऐसे ज़रूरी अनुच्छेद (Articles), जिन्हें हर भारतीय को जानना चाहिए:

  1. अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकार (Right to Equality)

भारत का हर नागरिक कानून के सामने बराबर हैं। धर्म, जाति, लिंग, भाषा या जन्मस्थान के आधार पर उससे भेदभाव नहीं किया जा सकता।

  1. अनुच्छेद 15 — भेदभाव का निषेध

राज्य किसी नागरिक के साथ धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थल के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। संविधान के अनुच्छेद 15 में ही SC/ST/OBC और महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान शामिल हैं।

  1. अनुच्छेद 17 — अस्पृश्यता का उन्मूलन

किसी के साथ जाति या धर्म के नाम पर भेदभाव अपराध है। जो भी इस तरह की अस्पृश्यता को बढ़ावा दे, या करे वह कानूनन दंडनीय है। इस अनुच्छेद को दलित और आदिवासी समाज के अधिकारों की रीढ़ भी कहा जाता है।

  1. अनुच्छेद 19 — छह मूल स्वतंत्रताएँ

यह अनुच्छेद हर नागरिक को अभिव्यक्ति, आंदोलन, संगठन, पेशा चुनने और मूल स्थान परिवर्तन करने की स्वतंत्रता देता है।

  1. अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

“जीवन का अधिकार” केवल जीवित रहने का नहीं, बल्कि इज़्ज़त के साथ जीने  का अधिकार है। यह संविधान का सबसे शक्तिशाली अनुच्छेद माना जाता है।

  1. अनुच्छेद 21A — शिक्षा का अधिकार

संविधान का यह आर्टिकल 6 से 14 साल के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है।

  1. अनुच्छेद 23 — मानव तस्करी और जबरन मजदूरी पर प्रतिबंध

बधुआ मज़दूरी, बंधक मज़दूर प्रथा और मानव तस्करी अपराध है। एससी-एसटी समाज को सालों बंधुआ मजदूर के रूप में प्रताड़ित किया जाता रहा है। SC/ST समुदाय को सुरक्षा देने में यह बहुत महत्वपूर्ण अनुच्छेद साबित हुआ है।

  1. अनुच्छेद 32 — संवैधानिक उपचार का अधिकार

संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर ने इसे “संविधान का हृदय और आत्मा” कहा था। अगर आपके अधिकारों का हनन हो तो आप इस अनुच्छेद में मिले अधिकारों के जरिये सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।

  1. अनुच्छेद 46 — कमजोर वर्गों की शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा

राज्य का दायित्व है कि वह SC/ST/OBC समुदाय के हितों की रक्षा करे और उनके लिए विशेष नीतियाँ बनाएं।

  1. अनुच्छेद 51A — नागरिकों के मूल कर्तव्य

जहां संविधान भारत के हर नागरिकों को विशेष सुविधा देता है, वैसे ही नागरिकों से कुछ उम्मीद भी करता है। जैसे—संविधान का पालन, स्त्री-सम्मान, वैज्ञानिक सोच, पर्यावरण की रक्षा, राष्ट्रीय एकता आदि।

इस तरह 26 नवंबर का दिन यानी संविधान दिवस केवल एक औपचारिक दिन नहीं, यह हमें याद दिलाता है कि हमारे अधिकार तभी सुरक्षित रहते हैं, जब नागरिक उन्हें जानते हों और उनका उपयोग करते हैं।

डॉ. सीमा माथुर ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ाया भारत का मान

दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, शोधकर्ता, महिला अधिकार कार्यकर्ता और जानी-मानी अम्बेडकरवादी डॉ. सीमा माथुर को बैंकॉक में आयोजित 6th World Environment Summit 2025 में प्रतिष्ठित ESDA Women Empowerment Award 2025 से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें Women and Dalit Empowerment श्रेणी में दिया गया।

यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 9 से 12 नवंबर तक बैंकॉक, थाईलैंड के Ambassador Hotel में आयोजित हुआ। सम्मेलन का आयोजन Environment and Social Development Association (ESDA) और University of Delhi ने मिलकर किया, जबकि कार्यक्रम का होस्ट भारत सरकार की Ministry of Environment, Forest & Climate Change रहा। सम्मेलन में Maldives के Villa College, और Nigeria की एक यूनिवर्सिटी भी भागीदार रहीं।

डॉ. सीमा माथुर वर्षों से महिलाओं के अधिकार, दलित एवं हाशिए पर खड़े समुदायों का सशक्तिकरण, मानवाधिकार, लोकतंत्र और जनभागीदारी पर काम करने के लिए जानी जाती हैं। डॉ. सीमा माथुर National Council of Women Leaders और अंबेडकरवादी लेखक संघ की सह-संस्थापक हैं। NCDHR और AIDMAM जैसी राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं से भी जुड़ी हैं।

डॉ. सीमा माथुर दिल्ली विश्वविद्यालय के कलिंदी कॉलेज में लंबे समय से राजनीतिक विज्ञान पढ़ा रही हैं। उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया से पीएचडी और दिल्ली विश्वविद्यालय से पोस्टग्रेजुएशन की डिग्री ली है। उन्हें UGC द्वारा प्रदान किया गया प्रतिष्ठित Rajiv Gandhi National Fellowship (JRF & SRF) प्राप्त हो चुका है। डॉ. सीमा अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में शोध पत्र प्रस्तुत कर चुकी हैं।  उनके 30 से अधिक शोध प्रकाशित हो चुके हैं।

डॉ. सीमा माथुर को इससे पहले भी कई पुरस्कार मिल चुके हैं, जिसमें- वीरांगना अवार्ड 2024, सावित्रीबाई फुले सम्मान 2022, नारी शक्ति एक्सिलेंस अवार्ड 2020 शामिल हैं। डॉ. माथुर को मिले ये पुरस्कार महिलाओं और दलित महिलाओं के सशक्तिकरण में उनके लगातार प्रयासों का प्रमाण है। डॉ सीमा माथुर को बैंकॉक में मिला ESDA Women Empowerment Award 2025 न केवल डॉ. सीमा माथुर की व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि भारत में महिला अधिकार आंदोलन, दलित विमर्श, अम्बेडकरवादी चिंतन को दुनिया भर में पहचान दिलाने वाला क्षण है।

सच्चिदानंद सिन्हा को जानिये, जिनके निधन को समाजवादी विचारधारा के एक युग का अंत कहा जा रहा है

वो साल था 1984 का। पंजाब आतंकवाद के कारण जल रहा था। वहां से रोज बेगुनाहों के कत्ल के समाचार आ रहे थे। पंजाब को लेकर सारा देश चिंतित था। तब पंजाब की स्थिति पर चर्चा करने के लिए समाजवादी आंदोलन से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ताओं,अध्यापकों, छात्रों वगैरह की दो दिवसीय बैठक चली। उसमें सच्चिदानंद सिन्हा और किशन पटनायक जैसे विद्वानों ने भी अपने वक्तव्य दिए। तब सच्चिदानंद सिन्हा की सलाह पर सबने तय किया कि हम लोग दिल्ली से अमृतसर तक की एक शांति मार्च निकालेंगे। यह एक बड़ा फैसला इसलिए था क्योंकि पंजाब में खून-खराबा बढ़ता जा रहा था। इसके बाद शांति मार्च की तैयारी में भाई जसवीर,सुनील जी, चेंगल रेड्डी, लिंगराज और अरविंद मोहन जैसे साथी जुट गए। अब शांति मार्च की तारीख तो याद नहीं पर इसकी शुरुआत राजघाट से हुई। उसमें सच्चिदानंद सिन्हा आगे-आगे चल रहे थे सांप्रदायिक सौहार्द और देश की एकता के नारे लगाते हुए। सच्चिदानंद सिन्हा, जिन्हें हम सब लोग सच्चिदा बाबू कहते थे, का कल बिहार में उनके गांव में निधन हो गया। सच्चिदा बाबू से पहला परिचय 1982 या 1983 में हुआ था। मुलाकात रफी मार्ग में यूएनआई बिल्डिंग के लॉन में हुई थी। उसके बाद उनसे घनिष्ठता बढ़ती गई। वहां पर उनके चाहने वाले और समाजवादी साथी मिला करते थे। हर बैठक में 20-22 साथी शामिल हो जाते थे। सच्चिदानंद सिन्हा ने अपना पूरा जीवन समाजवादी विचारों, गांधीवादी मूल्यों और वैकल्पिक राजनीति को समर्पित कर दिया। वे सादगी की मिसाल थे। उन्होंने कभी सत्ता की लालसा नहीं की, न ही कोई बड़ा पद स्वीकार किया। उनका जीवन और लेखन समाजवाद की उस शुद्ध धारा का प्रतिनिधित्व करता है जो राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और किशन पट्टनायक जैसे विचारकों से प्रेरित थी, लेकिन हमेशा आलोचनात्मक दृष्टि रखती थी।सच्चिदानंद सिन्हा का लेखन उनकी सबसे बड़ी पूंजी था। उन्होंने लगभग दो दर्जन पुस्तकें लिखीं, जिनमें राजनीति, अर्थशास्त्र, संस्कृति, पर्यावरण, दर्शन और समाजशास्त्र जैसे विविध विषय शामिल हैं। राजकमल प्रकाशन ने उनके प्रमुख लेखन को आठ खंडों में ‘सच्चिदानंद सिन्हा रचनावली’ के रूप में प्रकाशित किया है, जो उनकी वैचारिक गहराई का प्रमाण है। इस काम को अरविंद मोहन जी ने किया। दोनों गोल मार्केट में कुछ समय तक साथ भी रहा करते थे। उनका लेखन जटिल विचारों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने के लिए जाना जाता है। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘केस एंड क्रिएशन’, ‘संस्कृति विमर्श’, ‘संस्कृति और समाजवाद’, ‘मानव सभ्यता और राष्ट्र-राज्य’, ‘एडवेंचर्स ऑफ लिबर्टी’ (आजादी के अपूर्व अनुभव), ‘जिंदगी: सभ्यता के हाशिये पर’, ‘कड़वी फसल’ और ‘मार्क्सवाद और गांधीवाद’ जैसी किताबें शामिल हैं। उनकी पुस्तक ‘द इंटरनल कॉलोनी’ (1973) में उन्होंने बिहार को केंद्र की आंतरिक उपनिवेश के रूप में चित्रित किया, जो क्षेत्रीय असमानता पर पहली गंभीर चर्चाओं में से एक थी। कहते हैं कि यह किताब उस समय बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने भी गंभीरता से पढ़ी और अध्ययन के लिए अधिकारियों को निर्देश दिया था। सच्चिदानंद सिन्हा के साथ योगेन्द्र यादवसिन्हा जी का लेखन मुख्यधारा के समाजवाद से अलग था। वे लोहियावादी थे, लेकिन आज की सत्ता-केंद्रित समाजवादी राजनीति से दूर रहे। ‘सोशलिज्म एंड पावर’ (1974) में उन्होंने सत्ता और समाजवाद के अंतर्विरोध को उजागर किया। आपातकाल के दौरान ‘इमरजेंसी इन पर्सपेक्टिव’ (1977) और जनता पार्टी सरकार के बाद ‘द परमानेंट क्राइसिस’ (1978) जैसी किताबों में उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा और समाजवादी विकल्पों पर जोर दिया। उनका लेखन केवल सैद्धांतिक नहीं था; यह जीवन से जुड़ा था। 1942 में वे नौवीं कक्षा के छात्र थे जब भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े। पढ़ाई छूट गई, लेकिन ज्ञान की प्यास नहीं। वे लोहिया के संपर्क में आए। दिल्ली में रहते हुए (1969-1987) उनका घर विचारकों का अड्डा था, लेकिन 1987 के बाद वे मुजफ्फरपुर लौट आए और गांव की सादगी में वैचारिक लेखन जारी रखा। फ्रेंच और जर्मन भाषाओं का ज्ञान उन्हें वैश्विक विचारों से जोड़ता था, लेकिन उनकी जड़ें बिहार की मिट्टी में थीं। मुझे याद आ रहा है 1984 का वह काला दौर जब दिल्ली में सिखों का कत्लेआम हुआ था। सच्चिदानंद सिन्हा जी की सरपरस्ती में साथियों ने सिखों के पुनर्वास और दोषियों को सजा दिलाने के लिए एक रिपोर्ट भी तैयार की थी। सच्चिदानंद सिन्हा का निधन एक युग का अंत है। वे उस पीढ़ी के अंतिम चिंतक थे जो समाजवाद को सत्ता का साधन नहीं, मानव मुक्ति का मार्ग मानते थे।

विवेक शुक्ला के फेसबुक वॉल से
योगेन्द्र यादव ने लिखा- सच्चिदाजी नहीं रहे। 19 नवंबर 2025 को वो हमें छोड़ गए और उनके जाने के साथ ही भारतीय समाजवादी विचार परम्परा के एक युग का अवसान हो गया। मुझ जैसे ना जाने कितने युवाओं का वैचारिक प्रशिक्षण सच्चिदानंद सिन्हा को पढ़कर और सुनकर हुआ था। हिंदी और अंग्रेज़ी में दर्जनों किताबें, सैकड़ों लेख- अधिकांश बिहार के एक गाँव में बैठकर लिखे गए। अर्थव्यवस्था से लेकर कला तक, गांधी से मार्क्स और नक्सलवाद तक- हमारे युग का कोई कोना सच्चिदाजी की कलम से ना छूटा। उम्मीद है अकादमिक जगत आने वाले समय में उनके आंतरिक उपनिवेशवाद के सिद्धांत, जाति व्यवस्था की नई व्याख्या, पूंजीवाद के पतझड़ के विश्लेषण और अन्य स्थापनाओं पर गौर करेगा। अलविदा सच्चिदाजी! मेरा सौभाग्य था कि आपका सानिध्य और आशीर्वाद मिला। सुखद संयोग था कि पिछले महीने मुजफ्फरपुर में आपसे मुलाक़ात हो पायी। आपकी नई नवेली दाढ़ी के पीछे चिर परिचित निश्छल मुस्कान और खिली हँसी संजो कर रखूँगा।

नीतीश 10वीं बार बने सीएम, देखिए शपथ लेने वाले कैबिनेट की पूरी लिस्ट

बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए नीतीश कुमार, दूसरी तस्वीर में साथ में पीएम मोदीनीतीश कुमार ने 10वीं बार बिहार के मुख्यकमंत्री के तौर पर आज 20 नवंबर 2025 को शपथ ली। उनके साथ 26 अन्य ने भी मंत्री पद की शपथ ली, जिसमें सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा शामिल हैं। इस शपथ ग्रहण के साथ ही नीतीश कुमार देश में सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नेता बन गए हैं।

सीएम नीतीश कुमार की नई कैबिनेट में-: सम्राट चौधरी, विजय कुमार सिन्हा, विजय कुमार चौधरी, बिजेन्द्र प्रसाद यादव, श्रवण कुमार, मंगल पाण्डेय, डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल, अशोक चौधरी, लेशी सिंह, मदन सहनी, नितिन नवीन, राम कृपाल यादव, संतोष कुमार सुमन, सुनील कुमार, मोहम्मकद जमा खान, संजय सिंह टाईगर, अरुण शंकर प्रसाद, सुरेन्द्र मेहता, नारायण प्रसाद, रमा निषाद, लखेन्द्र कुमार रौशन, श्रेयसी सिंह, प्रमोद कुमार, संजय कुमार, संजय कुमार सिंह और दीपक प्रकाश शामिल रहे।

शपथ लेने वाले 26 मंत्रियों में भाजपा के कोटे से 14, जदयू से 08, लोजपा (रामविलास)-02, हम- 01 और राष्ट्रीय लोक मोर्चा से 01 नाम शामिल है।

इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह समेत यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और एनडीए के तमाम दिग्गऔज नेता और कई राज्यों के मुख्य मंत्री भी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार 19 साल से ज्यादा का सफ़र तय कर चुके हैं। बिहार के इतिहास में अभी तक किसी भी मुख्यमंत्री का कार्यकाल इतना लंबा नहीं रहा है। अगर नीतीश 6 साल और मुख्यमंत्री बने रहें तो वह देश में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड भी बना पाएंगे?

 

देश में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड पवन कुमार चामलिंग के नाम है. पवन चामलिंग 1994 से लेकर 2019 तक सिक्किम के मुख्यमंत्री रहे। 12 दिसंबर 1994 को पहली बार मुख्यमंत्री बने थे और 26 मई 2019 तक, लगभग 24 साल और 165 दिन तक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया।

आदिवासियों के लिए यूपी सरकार का बड़ा फैसला

लखनऊ। राज्य सरकार प्रदेश के सभी आदिवासी परिवारों को विकास योजनाओं से पूर्ण रूप से जोड़ने के लिए एक बड़े कार्यक्रम की शुरुआत करने जा रही है। सरकार का लक्ष्य है कि इस परियोजना को अगले दो वर्षों के भीतर पूरा कर लिया जाए। सामाजिक कल्याण मंत्री असीम अरुण ने बताया कि यह काम उसी तर्ज पर किया जाएगा, जैसा बक्सर जनजाति के लिए किया गया था। बक्सर समुदाय के करीब 800 परिवार बिजनौर में रहते हैं।

बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित सप्ताह-भर चले समारोह के समापन पर बुधवार 19 नवंबर को बोलते हुए अरुण ने बताया कि केंद्र और राज्य सरकारों ने ‘पीएम जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान’ नामक योजना शुरू की थी, जिसके तहत बिजनौर में रहने वाले इन 800 बक्सर परिवारों को लक्षित किया गया।
इन परिवारों को आदिवासियों में भी सबसे अधिक पिछड़ा पहचाना गया था। अब ये परिवार पेंशन, छात्रवृत्ति, ऋण, रोजगार आदि सभी सरकारी योजनाओं से संतृप्त (सैचुरेटेड) हो चुके हैं और निरंतर लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

अरुण ने कहा, “बिरसा मुंडा जयंती के सप्ताह-भर के आयोजन के दौरान हमने कई महत्वपूर्ण नीतिगत चर्चाएं कीं। उत्तर प्रदेश में लगभग 13 लाख आदिवासी व्यक्ति रहते हैं, जो सोनभद्र, चंदौली, मिर्ज़ापुर, श्रावस्ती, बलरामपुर, महाराजगंज आदि जिलों में फैले हुए हैं। यह तय किया गया है कि हम इस अभियान को एक लक्षित दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाएंगे, और बक्सर जनजाति की सफलता को एक मानक मॉडल के रूप में अपनाएँगे।”

असीम अरुण के मुताबिक योजना के तहत विभाग ने पहले ही अधिकांश आदिवासी परिवारों का मैपिंग कर लिया है। ज़ीरो पॉवर्टी स्कीम सिस्टम का उपयोग करते हुए हर परिवार को एक फैमिली आईडी दी जाएगी, जिसकी मदद से सरकार यह पहचान सकेगी कि उस परिवार के कौन-से सदस्य किस योजना के लिए पात्र हैं।

अरुण ने आगे कहा कि “हमारा उद्देश्य है कि प्रत्येक परिवार को सभी विकास योजनाओं के उनके हक के लाभ पूरी तरह मिलें। इसके अलावा, हम उन्हें सतत रोजगार में भी मदद करेंगे। उन्होंने विकास को दो हिस्सों में बांटने के लिए कहा। पहला हिस्सा सरकारी योजनाओं के माध्यम से, जो सरकार की गारंटी हैं, और दूसरा हिस्सा अतिरिक्त साधनों से, जैसे डेयरी स्थापित करने में सहायता आदि।”

बिहार चुनावः जमीन पर बहुजन एकता जरूरी, तभी चुनावी जीत संभव

बिहार के कुछ इलाकों में दस दिनों तक घूमने के बाद यह पता चल गया था कि एनडीए की स्थिति मजबूत है। दस लोगों में से 7 लोग यही कह रहे थे। मैं ज्यादातर दलित और कुछ पिछड़ी बस्तियों में गया था। वो खबरें चलानी शुरू कि तो कमेंट आने लगे कि- “आप भाजपाई हो गए हैं।” क्योंकि दलित-बहुजन समाज का बुद्धिजीवी वर्ग बस यह चाहता है कि लोग जमीन पर कुछ भी कहें, आप एक खास दल कि बुराई करते रहो। सिर्फ वही बाईट दिखाओ, जिसमें लोग उसे कोसे, गालियां दे।
दरअसल दलित बस्तियों में दलित समाज का बड़ा वर्ग मोदी जी का नाम ले रहा था। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव से ज्यादा। भाजपा ने यह जैसे भी कर दिखाया हो, यह जमीनी हकीकत दिखी।
समस्या यह है कि बुद्धिजीवी वर्ग और राजनीतिक दल अब भी पुराने सामाजिक गणित पर चलते हैं। वो मान लेते हैं कि
दलित है तो भाजपा के खिलाफ वोट देगा, यादव है तो राजद के साथ जाएगा और मुसलमानों की तो मजबूरी ही है। लेकिन जमीन पर ऐसा नहीं है। पिछड़े वर्ग में मुझे सिर्फ यादव ही राजद के साथ मजबूती से खड़े दिखे। हालांकि कुछ अन्य पत्रकार मित्रों ने सोशल मीडिया पर यह लिखा था कि यादव समाज के तमाम लोग भी भाजपा के समर्थन में हैं। दलित तो काफी बंटे थे। भाजपा ने अपने गठबंधन का गुलदस्ता भी शानदार सजाया था। इसमें समाज के हर वर्ग में समर्थन रखने वाले दल और नेता थे।
तो क्या यह माना जाए कि अब दलितों का झुकाव पिछड़ी जातियों की पार्टियों, खासकर यादव नेतृत्व वाली पार्टियों से घट रहा है? आप कह सकते हैं कि यूपी में बसपा के समर्थकों का वोट सपा को गया, लेकिन इसमें सपा की कोई अपनी सफलता नहीं है। बल्कि यह इसलिए हुआ क्योंकि यूपी में बसपा के आंदोलन के कारण वहां का वोटर ज्यादा जागरूक है। वह संविधान पर खतरे और भाजपा सरकार की चालबाजियों को बेहतर समझ रहा है।
दूसरी बात, तमाम बहुजन नायक और विचारक सामाजिक आंदोलन और सामाजिक एकता को राजनीतिक आंदोलन से अहम मानते रहे हैं। यह इसलिए कि जब दलितों-पिछड़ों के बीच सामाजिक एकता बढेगी, तभी वह राजनीतिक सफलता में बदल सकती है। अब यह नहीं हो रहा है। लालू यादव जी के साथ दलित समाज इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि तब बिहार में सामंतवाद ज्यादा था। दलित समाज पीड़ित था। लेकिन लालू यादव के सत्ता में आने के बाद यह सामंतवाद कमजोर हुआ तो उसके बदले ओबीसी समाज का एक विशेष वर्ग मजबूत हो गया और कमोबेश उसने नव सामंतवादी रूप धर लिया।
देश के तमाम हिस्सों से आने वाली खबरें बताती है कि दलितों पर अत्याचार करने के मामले में पिछड़ा वर्ग भी कम नहीं है। खासकर मजबूत ओबीसी जातियां। ऐसे में गांव का वह पीड़ित दलित समाज चुनाव के वक्त आखिर उनके नेतृत्व वाले दलों को समर्थन क्यों देगा, यह बड़ा सवाल है? तब भी जबकि भाजपा लगातार देश के तमाम राज्यों में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ी जातियों को मुख्यमंत्री बना रही है। आप उसे भले रबर स्टॉम्प कहें, लेकिन इतनी राजनीतिक समझ गांव के दलितों और आदिवासियों में कितनी है।
इसलिए अगर बिहार में राजद या फिर यूपी में सपा (बसपा की बात बाद में) को जीतना है तो गांंव-गांव में सबसे पहले तो उन्हें दलितों को अपना भाई मानकर उन्हें सम्मान देना होगा और उनपर अत्याचार बंद करना होगा। दूसरी बात, अगर सामंतवादी समाज दलितों पर अत्याचार करे तो दलितों के साथ न्याय के लिए खड़ा होना होगा। जब तब यह सामाजिक एकता नहीं बनेगी, राजनीतिक एकता और जीत संभव नहीं है।

टीना डाबी और दीपना नेत्रपाल: दो अम्बेडकरवादी महिलाओं ने रचा इतिहास

नई दिल्ली। अंबेडकरी समाज से आने वाली बाड़मेर जिले की आईएएस अधिकारी टीना डाबी ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है। बाड़मेर ज़िले ने जल संचय जन भागीदारी पुरस्कार  जीतकर पूरे देश में पहला स्थान हासिल किया है। यह उपलब्धि टीना डाबी की अगुवाई में संभव हुई, जिन्होंने जिले में हजारों पारंपरिक टांकयानी भूमिगत जल संरचनाओं को पुनर्जीवित कराया और जल संरक्षण को एक जन आंदोलन का रूप दिया।

इस पुरस्कार के तहत बाड़मेर को 2 करोड़ रुपये की राशि मिलेगी। यह सम्मान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 18 नवंबर को दिल्ली के विज्ञान भवन में दे रही हैं। ‘कैच द रेन’ अभियान के तहत पूरे देश को 10,000 से ज़्यादा जल भंडारण संरचनाएँ बनाने का लक्ष्य दिया गया था, सबसे आगे निकलते हुए बाड़मेर ने इस लक्ष्य को न सिर्फ पूरा किया, बल्कि उत्तरी क्षेत्र में टॉप पोज़िशन लेकर सबको पीछे छोड़ दिया।

विज्ञान भवन में आयोजित कार्यमक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पीछे खड़ी टीना डाबीबता दें कि टीना डाबी ने साल 2015 UPSC परीक्षा में टॉप करके नई मिसाल कायम की थी। तब से कलेक्टर के रूप में वह जिस भी जिले में गईं, वहां उनके काम के अनोखे अंदाज की चर्चा रही। और अब बाड़मेर में जल संरक्षण को लेकर उनकी पहल पूरे भारत के लिए मॉडल बन गई है।

इसी तरह की एक और शानदार खबर दक्षिण भारत से आई है, जो कि अंबेडकरी समाज के लिए गर्व की बात है। बेंगलुरु स्थित क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र और क्षमता निर्माण एवं ज्ञान केंद्र की प्रिंसिपल डायरेक्टर दीपना नेत्रपाल को राष्ट्रीय CAG पुरस्कार से नवाजा गया है। खास बात यह है कि यह सम्मान पाने वाली वह देश की पहली दलित महिला अधिकारी हैं।

जीएसटी अवार्ड के दौरान दीपना नेत्रपालदीपना नेत्रपाल को यह पुरस्कार GST ऑडिट में नई पहल और बेंगलुरु में ट्रेनिंग सिस्टम के बड़े बदलाव के लिए दिया गया है। क्षमता निर्माण, पब्लिक अकाउंटिंग और प्रशिक्षण के क्षेत्र में दीपना नेत्रपाल के प्रयासों ने पूरे ऑडिट सिस्टम को नया रूप देने में अहम भूमिका निभाई है।

जिस तरह वंचित समाज से आने वाली दोनों महिलाओं ने यह शानदार उपलब्धि हासिल की है, उसने यह दिखा गया है कि चाहे प्रशासनिक नेतृत्व हो या कोई नई पहल, महिलाएं और खासकर दलित-बहुजन समाज की महिलाएं इसमें पीछे नहीं है।

बिहार में राज उसी का, दलित वोटर जिसका

बिहार चुनाव के दूसरे चरण में सबकी निगाहें दलित और मुसलमान मतदाताओं पर है। दूसरे चरण में जिन 122 विधानसभा सीटों पर मतदान हो रहा है, उसमें लगभग 100 सीटें ऐसी है, जिस पर जीत-हार का फैसला दलित मतदाता करेंगे। यह समाज जिधर जाएगा, सत्ता उधर ही जाएगी। ऐसा इसलिए कि दूसरे चरण के मतदान में जिन सीटों पर वोटिंग हो रही है, वहां दलित समाज की आबादी 18 फीसदी है।

वहीं दूसरी ओर मुसलमान वोटरों पर भी सबकी निगाहे हैं। क्योंकि इसी चरण में सीमांचल समेत तीन दर्जन सीटों पर हार-जीत का फैसला मुस्लिम समाज करेगा। माना जा रहा है कि मुस्लिम वोट गठबंधन को मिलेगा, लेकिन मुस्लिम वोटरों को रिझाने के लिए ओवैसी की पार्टी AIMIM और प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज भी मैदान में है।

2020 चुनाव की बात करें तो एनडीए को अंग प्रदेश, तिरहुत और मिथिलांचल में जबकि राजद और महागठबंधन को मगध क्षेत्र में अच्छी बढ़त हासिल हुई थी। सीमांचल में कांटे के मुकाबले और AIMIM की मौजूदगी के कारण एनडीए को मामूली बढ़त हासिल हुई थी।

इस चरण में सबसे अहम दलित समाज है। इन क्षेत्रों में कुल 18 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले दलित समाज में 2.5 फीसदी मुसहर समाज और पांच फीसदी पासवान यानी दुसाध समाज के वोटर शामिल हैं। करीब सौ सीटें ऐसी हैं, जहां दलित मतदाताओं की आबादी 30 से 40 हजार के बीच है।

दलित वोटों की बात करें तो बहुजन समाज पार्टी भी एक बड़ा फैक्टर है। बसपा ने शुरुआत में सभी 243 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की थी, लेकिन कुछ नामांकन रद्द होने के बाद अब केवल 190 उम्मीदवार ही मैदान में हैं। रविदास समाज के बीच पार्टी को जन समर्थन हासिल है। पिछले विधानसभा चुनावों में, बसपा ने 78 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और उसे 2.37% हासिल किया था। तब बसपा ने चैनपुर सीट जीती थी, जिसके विधायक बाद में जदयू में शामिल हो गए।

हालांकि इस बार गठबंधन का गणित 2020 के मुकाबले अलग है। 2020 के चुनाव में VIP पार्टी एनडीए के साथ थी, तो चिराग पासवान ने अकेले चुनाव लड़ा था। चिराग पासवान यानी लोकजनशक्ति पार्टी रामविलास के अकेले चुनाव मैदान में होने से जनता दल यूनाइटेड को सीधे 22 सीटों का नुकसान हुआ था। इस बार चिराग एनडीए के साथ हैं तो VIP महागठबंधन के साथ, ऐसे में चुनावी नतीजे कितने प्रभावित होंगे, यह तो चुनावी नतीजों से पता चलेगा। लेकिन आंकड़ों की बात करें तो महागठबंधन ने 2020 के चुनाव में इन सीटों पर 66 में 50 सीटें जीती थीं, जबकि BJP ने 42 सीटें और JDU ने 20 सीटें जीती थीं। कुल मिलाकर इस चरण में सबकी निगाहें दलित और मुस्लिम मतदाताओं पर टिकी है। नतीजे बताएंगे कि उनका भरोसा जीतने में कौन सा राजनीतिक दल कितना कामयाब हुआ है।

एक सितारा टूट गयाः भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर नहीं रहे

यूँ भारत में “पंडित” शब्द बहुत रूढ़ अर्थों में प्रयोग किया जाता है लेकिन बौद्ध अर्थों में पांच विद्याओं से मंडित व्यक्ति को पंडित कहतें हैं: 1. शब्द विद्या 2. हेतु विद्या 3. शीलकर्म विद्या 4. चिकित्सा विद्या 5. अध्यात्म विद्या

आधुनिक शब्दावली में इसे निम्नवत कहेंगे: 1. शब्द विद्या अर्थात भाषा विज्ञान अथवा language science or linguistics 2. हेतु विद्या अर्थात तर्क शास्त्र यानी logic या reasoning 3. शीलकर्म विद्या यानी कौशल या आजीविका लायक शिल्प अर्थात हुनर यानी Skills 4. चिकित्सा विद्या यानी medical science 5. अध्यात्म विद्या अर्थात spiritual science

इन पांच विद्याओं से मंडित व्यक्ति को पंडित कहा जाता है। “पंडित” शब्द में संलग्न उपसर्ग “पं” पांच के अर्थ में है। धम्मपद में पूरा एक अध्याय है- पंडित वग्गो। यूँ प्रचलित परम्परा में भी पंडित शब्द की बड़ी उदात्त परिभाषा दी गयी है:

मातृवत परदारेषु परदृव्यं लोष्टवत। आत्मवतसर्वेषु यः जानाति सः पंडितः।।

अर्थात् परस्त्री को माँ की तरह देखने वाला, दूसरे के धन को कंकड़, पत्थर समझने वाला, दूसरों में अपना ही स्वरूप देखना, जो ऐसा जानता है वह पंडित है।

बौद्धकाल में तक्षशिला विश्वविद्यालय में उपरोक्त वर्णित पांच विद्याओं से मंडित को “पंडित” की उपाधि यानी डिग्री प्रदान की जाती थी। पंडितों के पंडित को यानी पंडित उपाधि पाए लोगों पढ़ाने वाले को महापंडित की उपाधि दी जाती थी और महापंडित के भी उपाध्याय को “अग्ग महापंडित” उपाधि प्रदान की जाती थी। पालि भाषा में “अग्ग” उपसर्ग यानी “अग्र” का अर्थ होता है- सर्वश्रेष्ठ। अग्गमहापंडित अथवा अग्रमहापंडित यानी श्रेष्ठतम पंडित।

मूलतः बर्मा अर्थात म्यान्मार के तथा कुशीनगर में प्रवासरत रहे पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर को सन् 1997 में म्यान्मार की सरकार द्वारा “अग्गमहापंडित” की उपाधि प्रदान की गयी।

“अग्ग महासद्धम्म जोतिका धजा” की उपाधि वर्ष 2005 में प्रदान की गयी, वर्ष 2016 में “अभिधम्म महासद्धम्म जोतिका धजा” से विभूषित किया गया और 04 जनवरी 2021, बर्मा के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर वहाँ की सरकार ने पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर को अपने देश के महानतम सम्मान “अभिधजा महारथ गुरू” प्रदान किया है, जैसे भारत का सर्वोच्च राजकीय “भारत रत्न” होता है, वैसे।

“अभिधजा महारथ गुरू” थेरवाद का उच्चतम सम्मान है। एक अर्थ में यह सारे विश्व में थेरवाद का गौरव है। यह सम्मान भारत में प्रवास कर रहे, भारतीय नागरिकता के साथ भारत को धन्य कर रहे पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर भारत की भूमि में ही शान्त हो गये। दिनांक 31 अक्टूबर’2025 को 90 वर्ष की आयु में लम्बी बीमारी के बाद पूज्य भदन्त ने लखनऊ के मेदान्ता अस्पताल में शरीर त्याग दिया। संघ द्वारा लिये गये निर्णय के अनुसार पूज्य का पार्थिव शरीर थाई बुद्ध विहार, कुशीनगर में 10 नवम्बर’2025 तक दर्शनार्थ पूजित होता रहेगा। अंतिम संस्कार 11 नवम्बर’2025 को होगा।

सन् 1936 में जन्मे पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर का जन्म मूलतः बर्मा का है लेकिन अपने स्वदेशीय गुरू पूज्य भदन्त चन्द्रमणि जी के साथ वे आजीवन के लिए भारत आ गये और यहीं के होकर रह गये।

पूज्य भदन्त चन्द्रमणि महाथेर के द्वारा 14 अक्टूबर’1956 को अशोक विजयदशमी के दिन नागपुर में बोधिसत्व बाबा साहेब को तथा साथ उनके लाखों अनुयायियों को बुद्ध धम्म की दीक्षा प्रदान की गयी थी। वे उस समय भारत में रह रहे थेरवाद के वरिष्ठतम भिक्खु थे। इन अर्थों में पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर बोधिसत्व बाबा साहेब के गुरुभाई थे।

27 फरवरी’2021, शनिवार, माघ पूर्णिमा उपोसथ के दिन समन्वय सेवा संस्थान भारत द्वारा पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर को “Gem of Dhamma Award” प्रदान कर आशीर्वाद लिया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अन्तरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान (संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश) के तत्वावधान में आयोजित बुद्धिस्ट कानक्लेव-2021 में भी पूज्य का मार्च 2021 में सम्मान किया गया था।

आज धम्म के आकाश से एक सितारा टूट गया। समन्वय परिवार को पूज्य का सतत आशीर्वाद मिलता रहा है। समस्त समन्वय परिवार शोकाकुल है।


बौद्ध विद्वान राजेश चंद्रा द्वारा दी गई श्रद्धांजलि साभार प्रकाशित

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान से भारत क्यों वापस आए?

1946 के संयुक्त भारत की अंतरिम सरकार के पहले कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल पूर्वी बंगाल के एक प्रमुख अनुसूचित जाति के नेता थे। वे भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य बने रहे। उन्होंने पाकिस्तान में कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया, जिनमें पाकिस्तान संविधान सभा के कार्यवाहक अध्यक्ष होने के साथ-साथ पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री और श्रम मंत्री भी बनाए गये। जिन्ना ने पाकिस्तान संविधान सभा को संबोधित करते हुए पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान बनाने और अल्पसंख्यकों को विशेष विशेषाधिकार प्रदान करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। हालाँकि, 11 सितंबर, 1948 को जिन्ना की मृत्यु  के बाद जब दलितों पर अत्याचार बढ़ गया और उसके बाद 1950 में प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने पाकिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की घोषणा की। इसके विरोधस्वरूप जोगेंद्र नाथ मंडल ने सरकार से इस्तीफा दे दिया। यह मुस्लिम लीग द्वारा उनके साथ किए गए विश्वासघात का स्पष्ट संकेत था, क्योंकि पाकिस्तान जिन्ना के शुरुआती वादों के विपरीत एक धर्मशासित राज्य बनने की ओर अग्रसर होने लगा था। पाकिस्तान के एक धर्मतंत्रीय व्यवस्था की ओर बढ़ने के बाद, जोगेंद्र नाथ मंडल ने दुखी होकर विरोधस्वरूप मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और 1950 में भारत लौट आए। उन्होंने  मुख्य रूप से पाकिस्तान के इस्लामिक राज्य बनाने के खिलाफ विरोध करने और मुस्लिम लीग द्वारा किए गए वादों को तोड़ने की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया।

  जिन्ना के धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकारों के वादों के कारण जोगेंद्र नाथ मंडल ने उनका साथ दिया था। वे पाकिस्तान में इसलिए भी रुके थे क्योंकि पूर्वी बंगाल के चटगाँव और जेसोर-खुलना जैसे कुछ जिले हिंदुओं और अछूतों के वर्चस्व वाले थे, जिनकी आबादी 54% थी। जिसमें अनुसूचित जातियों की आबादी 30% से अधिक थी। मंडल अपने गृह जिले बारिसाथ से चुने गए थे, जो इन क्षेत्रों से सटा हुआ था। उल्लेखनीय है कि भारत के विभाजन के दौरान, चटगाँव और खुलना, दोनों गैर-मुस्लिम बहुल क्षेत्र, पाकिस्तान को आवंटित किए गए, जबकि ये वे क्षेत्र थे जिन्हें विभाजन के दिशा-निर्देशों के अनुसार भारत का हिस्सा होना चाहिए था। माना जाता है कि सरदार पटेल और उनके कांग्रेस सहयोगियों ने डॉ. आंबेडकर को बॉम्बे से केंद्रीय विधान सभा में प्रवेश करने से रोकने में भूमिका निभाई थी। डॉ. आंबेडकर को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेलने के लिए चटगांव और खुलना को पाकिस्तान में स्थानांतरित करने का एक ठोस प्रयास किया गया था, जो स्वतंत्रता के बाद स्पष्ट हो गया।

भारत के बजाय पाकिस्तान में रहने का निर्णय लेने के पीछे जोगेंद्र नाथ मंडल का कारण यह था कि बंगाल में दलितों और मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति काफी हद तक समान थी। दोनों समुदाय मुख्य रूप से किसान या मछुआरे या कारीगर थे। बहुत कम लोग कुलीन थे। दलितों और मुसलमानों के हित समान थे। उनकी जनसंख्या का अनुपात लगभग एक तिहाई था। वे एक साथ मित्रतापूर्वक रह सकते थे। दूसरे, स्वतंत्र भारत में हिंदुओं का वर्चस्व होगा और दलितों का दर्जा दोयम दर्जे का होगा। उन्हें लगा कि दलितों को भारत में समान अवसर नहीं मिलेंगे और उनका दमन किया जाएगा। लेकिन पाकिस्तान में दलितों की स्थिति के बारे में जोगेंद्र नाथ मंडल का आकलन गलत साबित हुआ। पाकिस्तान दलितों के लिए वह देश नहीं बन सका जिसकी जोगेंद्र नाथ मंडल ने कल्पना की थी। लेकिन भारत के दलितों के बारे में उनका आकलन कमोबेश सही साबित हुआ। क्योंकि इन्हीं कारणों से बाबासाहेब आंबेडकर ने खुद नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। आजादी के चार साल बाद भी बाबासाहेब आंबेडकर भारत में उतने ही हताश और निराश थे, जितने जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान में थे। अपने इस्तीफे में बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान में प्रावधानों के बावजूद दलितों पर हो रहे अत्याचार और हिंदू कोड बिल के मुद्दे पर गुस्सा जाहिर किया था।

  हम जोगेंद्र नाथ मंडल के आभारी हैं, जिनकी वजह से भारत को डॉ. आंबेडकर जैसा संविधान विशेषज्ञ मिला। 1946 में जब संविधान सभा के सदस्यों के चुनाव की बात आई, तो कांग्रेस ने महाराष्ट्र में बाबा साहब आंबेडकरके लिए न केवल सभी दरवाजे और खिड़कियां बंद कर दीं, बल्कि उनके लिए कोई वेंटिलेटर भी नहीं छोड़ा। तब जोगेंद्र नाथ मंडल ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके 1946 में बाबा साहब आंबेडकर को बंगाल से संविधान सभा के लिए चुनवाया। जोगेंद्र नाथ मंडल की राजनीतिक यात्रा के संदर्भ में कहा जाता है कि डॉ. आंबेडकर ने 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल को भारत लौटने की सलाह दी थी। जिस कारण जोगेंद्र नाथ मंडल भारत वापस आए। जोगेंद्र नाथ मंडल की पाकिस्तान से वापसी को एक विद्रोह और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के साथ विश्वासघात के रूप में  अंतरराष्ट्रीय मंच पर देखा गया। भारत लौटने के बाद जोगेंद्र नाथ मंडल ने दो संसदीय चुनाव लड़े, जिनमें से दोनों में ही वे हार गए और अंततः 5 अक्टूबर, 1968 को उनका निधन हो गया।

  जोगेंद्र नाथ मंडल की भारत वापसी के आलोचकों को यह समझना चाहिए कि उनका निर्णय आत्मसम्मान की इच्छा से प्रेरित था, सत्ता की प्यास से नहीं। कई मौजूदा राजनीतिक नेताओं के विपरीत जो व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता देते हैं, मंडल की कार्रवाई गरिमा के सिद्धांत पर आधारित थी। भारत में उनकी वापसी महज एक राजनीतिक पैंतरेबाजी नहीं थी; यह जिन्ना की मृत्यु के बाद उनके साथ हुए टूटे वादों और विश्वासघात का जवाब था। उनकी वापसी स्वार्थी महत्वाकांक्षाओं के लिए नहीं बल्कि आत्मसम्मान की जरूरत से हुई थी, जो सार्वजनिक जीवन में गरिमा के महत्व को समझने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक आवश्यक मूल्य है।

  जो लोग जोगेन्द्र नाथ मंडल के भारत वापस आने की आलोचना करते हैं। इस आधार पर हिंदू मुस्लिम विभेद खड़ा करते हैं उन्हें यह जानना चाहिए कि जोगेन्द्र नाथ मंडल सत्ता को लात मार कर आने वाला स्वाभिमान था। जोगेन्द्र नाथ मंडल का पाकिस्तान में रुतबा और दर्जा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के बाद का था। जैसे ही प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने 1950 में पाकिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की घोषणा की, अपने स्वाभिमान से लबरेज जोगेन्द्र नाथ मंडल ने मंत्रीपद  जैसे सम्मानित पद को लात मार कर भारत में सामान्य जीवन व्यतीत करने आए थे।

  जोगेन्द्र नाथ मंडल चाहते तो पाकिस्तान में रह कर व्यक्तिगत रूप से मौज मजे कर सकते थे। पर उन्होंने उसका विरोध किया और त्याग पत्र देकर वापस आए। उनका वापस आना आज के नेताओं जैसा स्वयं की सत्ता के लिए समाज और देश का सौदा करने जैसा नहीं था। भारत में प्रभावशाली जातियां और उसके नेता स्वयं के सत्ता और पद पाने के लालच में कुटिल दाव पेंच करते रहते हैं, राक्षसी संघर्ष में लीन रहते हैं, अपनी पार्टी और सरकार को चूना लगाने से भी नहीं चूकते हैं।

  यहां तक कि कभी-कभी अपने दल की सरकारों को भी ज्योतिरादित्य सिंधिया, हेमंत विश्व शर्मा और अन्यो की तरह स्वार्थ पूरा नहीं होने पर पलट देते हैं। वे अपनी ही सरकारों को बेशर्मीपूर्वक ब्लैकमेल और अस्थिर करते रहते हैं। अपनी पार्टी की सरकार को भी गिरा देते हैं। अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए भारत के कई राज्यों को मनमाने और बेढंगे तरीके से विभाजित भी किया है। भारत का विभाजन भी तो हिंदू मुस्लिम के सत्ता पर वर्चस्व को लेकर ही तो हुआ।

 मेरे एक मित्र ने पूछा कि जोगेंद्र नाथ मंडल ने पाकिस्तान सरकार में अपना प्रतिष्ठित पद छोड़कर भारत लौटने का फैसला क्यों किया? और उसके बाद वे अपेक्षाकृत साधारण जीवन जी रहे थे। क्या यह जिन्ना की मृत्यु के बाद दलित-मुस्लिम विश्वास के टूटने के कारण था? यह सच है कि जिन्ना की मृत्यु के बाद, पाकिस्तान में तीव्र आंतरिक सत्ता संघर्ष हुआ, जिससे रक्तपात और राजनीतिक अराजकता फैल गई। देश को अपना संविधान बनाने में भी दो दशक से अधिक का समय लगा। हालाँकि, सत्ता, स्वाभिमान और वर्चस्व के लिए इसी तरह के संघर्ष भारत में भी देखे जा सकते हैं, न केवल दलितों और मुसलमानों के बीच, बल्कि विभिन्न प्रमुख हिंदू जातियों के बीच भी। भारत में, जाति-आधारित संघर्ष प्रचलित हैं, यहाँ तक कि ब्राह्मणों, ठाकुरों और अन्य प्रभावशाली जातियों जैसे समूहों के बीच भी, जो कभी-कभी अस्तित्व और सत्ता के लिए गठबंधन बनाते हैं, लेकिन बाद में तीखे संघर्षों में उलझ जाते हैं। ये समूह अक्सर एक-दूसरे से लड़ते झगड़ते रहते हैं, जिससे उनकी अपनी पार्टियों और संगठनों में अस्थिरता पैदा होती है। कई बार, राजनीतिक दल के कुछ लोग अपने स्वार्थी, संकीर्ण हितों के लिए अपनी सरकारों को भी गिरा देते हैं। निहित स्वार्थों से प्रेरित यह सत्ता संघर्ष किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। इसी तरह, कुछ राजनीतिक दलों ने सत्ता और प्रभुत्व हासिल करने के लिए भारत में तर्कहीन और मनमाने ढंग से राज्यों का विभाजन किया है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत का विभाजन, हिंदू और मुस्लिम समुदायों के भीतर कुछ नेताओं द्वारा खेले गए सत्ता के खेल का परिणाम था। जोगेंद्र नाथ मंडल के बलिदान के महत्व को समझने के लिए इस संदर्भ को समझना आवश्यक है।

 जो आलोचक यह दावा करते हैं कि भारत में उच्च जाति के सवर्ण हिंदू दलितों पर अत्याचार नहीं करते हैं, या वे उनके साथ सम्मान से पेश आते हैं, वे या तो अज्ञानी हैं या छलीकपटी हैं। ऐसी आलोचनाएं एक ऐसी मानसिकता को प्रकट करती हैं जो दलितों द्वारा भारत में सामना किए जाने वाले वास्तविक, प्रणालीगत भेदभाव को बहुत कम करके आंकती है। डॉ. आंबेडकर के अनुभव की तरह ही जोगेंद्र नाथ मंडल का अनुभव भी यह दर्शाता है कि सत्ता और प्रतिष्ठा के पदों पर बैठे लोगों को भी अक्सर अपना आत्म-सम्मान बनाए रखने के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। डॉ. आंबेडकर ने खुद 1951 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था, इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने सिद्धांतों और आत्म-सम्मान से समझौता करने से इनकार कर दिया था। जोगेंद्र नाथ मंडल की तरह ही आंबेडकर के कार्यों ने राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर सम्मान के महत्व को उजागर किया। विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच, जिसमें लोग एक-दूसरे के देशों में बसने के लिए सीमा पार करते थे, केवल धार्मिक या राजनीतिक कारणों से नहीं बल्कि व्यक्तिगत पसंद, सुविधा और आत्म-सम्मान की खोज से प्रेरित था। एक से दूसरे देश में बसना एक जटिल प्रक्रिया थी जो किसी साधारण हिंदू-मुस्लिम विभाजन का पालन नहीं करती थी। उदाहरण के लिए, एम.ए. जिन्ना की बेटी दीना वाडिया ने पाकिस्तान में बसने के कई प्रस्तावों के बावजूद भारत में रहना चुना। दीना वाडिया के बेटे नुस्ली वाडिया भारत में एक प्रसिद्ध उद्योगपति हैं। इसी तरह, मोहम्मदअली करीम छागला, जिन्होंने जिन्ना के साथ एक जूनियर वकील के रूप में काम किया था, ने पाकिस्तान नहीं जाने का फैसला किया। यहां तक ​​​​कि 15 अगस्त 1973 को लाहौर में पैदा हुए अदनान सामी खान (दिवंगत अरशद शमी खान के बेटे, एक पाकिस्तानी वायु सेना अधिकारी, जिन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध में लड़ाई लड़ी थी) को 2016 में भारत की नागरिकता दी गई। दीना वाडिया और अरशद सामी खान के बारे में जानकारी गूगल पर भी उपलब्ध है।

  भारत विभाजन और जिन्ना की मृत्यु के बाद, पाकिस्तान के गठन के दौरान पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में बसे कुछ मुसलमान 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भारत लौट आए। यह दर्शाता है कि कैसे व्यक्तियों और परिवारों ने धार्मिक या राष्ट्रवादी सीमाओं का पालन करने के बजाय बदलती राजनीतिक गतिशीलता, व्यक्तिगत अनुभवों और आत्म-सम्मान के अवसरों के आधार पर निर्णय लिए।

 इसे समझ कर ही जोगेन्द्र नाथ मंडल के त्याग पूर्ण कार्यो को समझा जा सकता है। जोगेन्द्र नाथ मंडल का उल्लेख करते हुए ये लोग ऐसा चित्रित करते हैं जैसे भारत में सवर्ण दलितों के साथ अत्याचार करते नहीं है बल्कि उन्हें सर आंखों पर बैठा कर रखते हैं। अपने परिवार के बड़े जैसा इज्जत देते हैं। इससे आरोप लगाने वाले की कुटिल मानसिकता का पता चलता है। जिन्ना की मृत्यु 11 सितंबर 1948 को हई, इसके बाद जोगेन्द्र नाथ मंडल के मंत्री पद से त्यागपत्र 8 अक्टूबर 1950 की प्रति को पढा जाना चाहिए। जोगेंद्र नाथ मंडल एक ऐसे संघर्षशील, गतिशील और जीवटवान राजनेता थे, जिनका जीवन, संघर्ष और सिद्धांत एक प्ररेणा है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

 

 

IPS पूरन कुमार की आत्महत्या पर महिला IAS का पोस्ट, उठाए गंभीर सवाल

*रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई* *तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई* आपको इस तरह नहीं जाना चाहिए था, सर। आपको क्या किसी को भी इस तरह नहीं जाना चाहिए। एक सक्षम, प्रतिभाशाली और प्रतिबद्ध वरिष्ठ IPS अधिकारी, Sh Y Puran Kumar जिसने अपनी अपनी ज़िंदगी के सबसे सक्रिय साल देश और समाज की सेवा में लगा दिए, उसे यूँ चले जाने देना हमारे समाज और सिस्टम दोनों के लिए बहुत बड़ा सवाल है। एक ऐसा सवाल जिन पर एक समाज के तौर पर हमें वाक़ई ठहरकर सोचने की ज़रूरत है। सिर्फ़ फ़ॉर्मल सिम्पथी के लिए नहीं, बल्कि रियल इंट्रोस्पेक्शन के लिए। हमने अपने इन्स्टिट्यूशंस के अंदर ये कैसा माहौल बना लिया है? आख़िर यह कौन सा सिस्टम है जहां उस सिस्टम के ही एक महत्वपूर्ण हिस्से को… इतना अनदेखा, अनसुना किया जाता है कि वो भीतर तक टूट जाता है और हारकर ऐसा एक्स्ट्रीम स्टेप उठाने पर मजबूर हो जाता है। Frankly, no one should ever be pushed to that edge- to feel unseen, unheard, or broken inside a system they once believed in. कहीं हम भूल तो नहीं गए कि एक अधिकारी के रूप में देश की सेवा कर रहा व्यक्ति आख़िरकार एक जीता-जागता इंसान है। ईश्वर से मेरी बस इतनी ही प्रार्थना है कि वो दिवंगत आत्मा को शांति दे , उनके परिवार को ये दुख सहने की शक्ति दे और सभ्य समाज और ऑफ़िसर्स फ़्रटर्निटी के रूप में, हमें इतना साहस दे कि कलेक्टिवली हम सिस्टम में वो बदलाव लाने का प्रयास कर पाएँ जिनकी सख़्त ज़रूरत है। ताकि आगे से हमारा कोई भी साथी, जूनियर या सीनियर, कभी भी, हमारे बीच से अचानक, यूँ ही, हमें अलविदा कहे बग़ैर न चला जाए। *जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है* *आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है* *उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया* *मेरे क़त्ल पे आप भी चुप है अगला नम्बर आपका है*