GST के दायरे में आ सकते हैं पेट्रोल और डीजल

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नई दिल्ली: केंद्र सरकार जल्द ही दे सकती है देशवासियों को राहत, पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार बढ़ोतरी को देखते हुए मंगलवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली नें पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने के संकेत दिये लेकिन साथ ही साथ ये भी कहा की जीएसटी काउंसिल के फैसले के बाद ही इस पर जीएसटी ली जा सकती है.

उन्होंने कहा, ‘ हम भी पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स को जीएसटी की व्यवस्था के तहत लाने के पक्ष में हैं और इस मामले में राज्य सरकारों से बात कर रहे हैं. हम उम्मीद करते हैं इस पर राज्यों की सहमति होगी.’  पूर्व वित्त मंत्री ने राज्य सभा में प्रश्न पूछते हुए कहा की सरकार का क्या इरादा है , इस वक़्त भाजपा की सरकार 19 राज्यों में हैं तो फिर कौन सी समस्याएँ आ रही हैं. जेटली ने कहा की पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स जीएसटी कानून का ही हिस्सा हैं मगर इसका फैसला काउंसिल की 75 फीसदी की सहमति के बाद ही लिया जाएगा और हमे इससे लागु करने के लिए किसी कानून में फेर बदल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि 115वें संवैधानिक संशोधन में पहले से ही इसकी अनुमति है.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में कमी आने के बाद भी देश में पेट्रोल और डीजल दरें कम न होने के सवाल पर वित्त मंत्री जेटली ने कहा की राज्यों में अलग अलग टैक्स दरें हैं. उदाहरण के लिए, डीजल पर मुंबई में वैट 28.51 फीसदी है और दिल्ली में यह 16.75 फीसदी है. विपक्षी पार्टियां लगातार कोशिश कर रही हैं के पेट्रोलियम पदार्थों को GST में शामिल किया जाये. बिहार के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी ने भी इस बात के संकेत दिए हैं.

गन्धर्व गुलाटी

 

कुलभूषण जाधव के परिजनों को पाकिस्तान ने दिया वीजा

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नई दिल्ली: पाकिस्तान में कैद भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव के परिजनों को उनसे मिलने का मौका मिला है. पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने यह जानकारी दी है कि जाघव की पत्नी और माँ को इस्लामाबाद आने के लिए वीजा जारी कर दिया गया है. आधिकारिक सूत्रों की माने तो पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने यह दिशा-निर्देश पिछले हफ्ते ही जारी किए हैं ताकि 25 दिसंबर को इस्लामाबाद में कुलभूषण जाधव की पत्नी और माँ उनसे मिल सकें.

पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के सूत्रों के मुताबिक जाधव के परिवार के लिए सुरक्षा की पूरी तैयारी की जा रही हैं. जाधव के परिवार से मुलाकात के दौरान भारतीय उच्चायोग के एक अधिकारी को उनके साथ आने की अनुमति भी दी जाएगी.आपको बता दें कि पाकिस्तान के सुरक्षा बलों ने पिछले साल तीन मार्च को अपने अशांत प्रांत बलूचिस्तान से जाधव उर्फ हुसैन मुबारक पटेल को ईरान से पाकिस्तानी सीमा में दाखिल होते समय गिरफ्तार किया था और उनका दावा है कि भारतीय नौसेना का कमांडर जाधव भारत की प्रमुख खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनलिसिस विंग(रॉ) के लिए काम कर रहे थे, जिसके चलते 47 साल के कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी. इस पर भारत का कहना है कि जाधव को ईरान से अगवा किया गया और भारतीय नौसेना से रिटायर होने के बाद वहां व्यापार के सिलसिले में गये थे. इस सजा के खिलाफ भारत सरकार ने मई के महीने में अंतरराष्ट्रीय अदालत में अपील की थी. इसके चलते अंतरराष्ट्रीय अदालत ने जाधव की फांसी पर रोक लगा दी थी हालांकि उस पर अंतिम फैसला आना अभी बाकी है.

पीयूष शर्मा

2 जी घोटाले पर सी बी आई की विशेष अदालत का फैसला, ए राजा समेत सभी आरोपी बरी

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नई दिल्ली:  सदी के सबसे बड़े घोटालों में से एक 2 जी सपैक्ट्रम केस पर सीबीआई की विशेष अदालत ने आज तीनों मामलों में अपना फैसला सुनाया है. 1.76 लाख करोड़ के घोटाले के मामले में सात साल से चली आ रही सुनवाई के बाद सीबीआई की विशेष अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है. अदालत ने  सीबीआई द्वारा आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत पेश न कर पाने की वजह से यह फैसला सुनाया है. कोर्ट के फैसले के बाद बचाव पक्ष के वकील हरिहरन ने कहा कि सारा मामला धारणा पर आधारित था.

आपको बता दें कि यह मामला 2008 में सामने आया था जिसमें दूरसंचार विभाग द्वारा 2 जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस आवंटन में कथित तौर पर अनियमितता हुई थी. इसका खुलासा 2010 में कैग की रिपोर्ट में हुआ था जिसके तहत लाइसेंस जारी करने की पूरी प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता का अभाव रहा”. अब कोर्ट के इस फैसले के बाद से राजनैतिक माहौल गरमा गया है. एक तरफ जहाँ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत कई कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने बीजेपी और तत्कालीन कैग प्रमुख विनोद राय पर अपने बयानों से पलटवार शुरु कर दिया है वहीं राज्यसभा सांसदसुब्रमनियन स्वामी अदि अन्य भाजपा नेता अभी इस मामले पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं.

फैसले के बाद मामले की मुख्य आरोपी, डीएमके पार्टी प्रमुख करुणानिधि की पुत्री कनिमोझी ने फैसले के बाद कहा, ‘न्याय हुआ है और मुझे इसकी खुशी है। मैं अपने समर्थकों और शुभचिंतकों की शुक्रगुजार हूं जो लगातार मेरे साथ खड़े रहे. इतना ही नहीं कांग्रेस पार्टी ने मांग की है कि पूर्व सीएजी विनोद राय जो कि इस वक्त बीसीसीआई के प्रशासक समिति (सीओए) के प्रमुख हैं, उनको देश से माफी मांगनी चाहिए.

पीयूष शर्मा

 

जिग्नेश मेवाणी को भाजपा के खिलाफ दलित चेहरा बनाएगी कांग्रेस

 

नई दिल्ली. यूं तो गुजरात में आरक्षित सीटों पर तमाम दलित और आदिवासी विधायक जीते हैं लेकिन जितनी चर्चा जिग्नेश मेवाणी की हो रही है, उतनी किसी की नहीं हो रही है. गुजरात में दलित आंदोलन से निकले युवा नेता जिग्नेश मेवाणी विधायक बन चुके हैं. कांग्रेस सहित तमाम अन्य संगठनों के समर्थन के बाद मेवाणी गुजरात के वडगांव से चुनाव जीते हैं. कहा जा रहा है कि मेवाणी गुजरात में दलितों की आवाज बनकर उभरेंगे. मेवाणी का गुजरात प्लॉन क्या होगा, यह तो वो खुद बताएंगे लेकिन फिलहाल कांग्रेस पार्टी मेवाणी की इसी जीत और प्रसिद्धी को भुनाने का प्लॉन बना रही है.

आने वाले साल 2018 में देश के आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. इनमें प्रमुख रूप से कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़  शामिल हैं. इनमें से कर्नाटक छोड़कर तीन प्रमुख राज्यों में भाजपा की सरकार है. कयास है कि कांग्रेस पार्टी इन सभी राज्यों में दलित वोटों को एकजुट करने के लिए जिग्नेश मेवाणी को चेहरा बनाकर पेश कर सकती है. इस कयास को इसलिए भी बल मिल रहा है क्योंकि जिग्नेश ने बीजेपी और मोदी के खिलाफ देश के बाकी राज्यों में अभियान चलाने का बीड़ा उठाया है. कर्नाटक में तो जिग्नेश ने मोदी के खिलाफ प्रचार का ऐलान भी कर दिया है.

कर्नाटक में करीब 23 फीसदी दलित मतदाता हैं. ऐसे में मेवाणी यहां बड़ा फैक्टर हो सकते हैं. गुजरात चुनाव में राहुल गांधी और कांग्रेस से नजदीकी के कारण जाहिर तौर पर मेवाणी कांग्रेस के लिए प्रचार करेंगे. कर्नाटक में तीन प्रमुख पार्टियां कांग्रेस, बीजेपी और जनता दल (सेक्लूयर) हैं. ऐसे में जिग्नेश का बीजेपी के खिलाफ अभियान चलाने का सीधा फायदा कांग्रेस को मिल सकता है.

 

यूपीकोका के खिलाफ मायावती ने खोला मोर्चा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री एवं बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती योगी सरकार द्वारा लाए गए यूपीकोका यानि की उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक के खिलाफ उतर आई हैं. मायावती का कहना है कि यूपीकोका का इस्तेमाल सर्व समाज के गरीबों, दलितों, पिछड़ों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ होगा. मायावती ने एक बयान में कहा कि बसपा इस नए कानून का विरोध करती है तथा जनहित में इसे वापस लेने की मांग करती है.

मायावती ने आरोप लगाया कि प्रदेश में वर्तमान भाजपा सरकार की द्वेषपूर्ण और जातिवादी नीति के कारण पूरे प्रदेश में कानून का बहुत बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल हो रहा है और खासकर निर्दोष दलितों, पिछड़ों और अन्य को झूठे मामलों में जेल भेजा जा रहा है. बसपा प्रमुख का कहना है, “भाजपा सरकार द्वारा अपराधियों और माफियाओं को चिह्नित करने का जो काम किया गया है, उसमें भी इसी प्रकार का राजनीतिक द्वेष और जातिगत भेदभाव किया गया है. इससे यह आशंका प्रबल होती है कि यूपीकोका का अनुचित और राजनीतिक इस्तेमाल अवश्य ही किया जाएगा. आज उत्तर प्रदेश में कानून का बहुत अधिक दुरुपयोग हो रहा है.”

हिमाचल में जीत के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं का दलित बस्ती पर हमला

बद्दी।बद्दी दो-दो राज्यों में मिली चुनावी जीत ने शायद भाजपा कार्यकर्ताओं का दिमाग खराब कर दिया है. जीत के बाद आपस में खुशियां मनाने की बजाय भाजपा कार्यकर्ता दूसरों को परेशान कर जश्न मना रहे हैं. हिमाचल प्रदेश में भाजपा की जीत के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं के गुंडागर्दी का मामला सामने आया है.

खबर के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में चुनाव जीतने के बाद कथित भाजपा कार्यकर्ताओं ने बद्दी की एक दलित बस्ती में घुसकर वहां जानलेवा हमला किया. इसमें कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए.

घटना सोमवार को चुनाव नतीजों के बाद की है. खबर के मुताबिक सोमवार को चुनाव नतीजे आने के बाद वहां जश्न मनाया जा रहा था. इसी दौरान नशे में धुत कुछ लोग पास की दलित बस्ती में घुस गए और डंडों, पत्थरों और तेजधार हथियारों से हमला किया. हमलवारों ने एक दर्जन से ज्यादा कारों में भी तोड़फोड़ की है.मामले में पुलिस मामला दर्ज कर जांच कर रही है.

 

न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार एनजीटी के अध्यक्ष पद से रिटायर

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नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रहे जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने जितनी सुर्खियां एनजीटी अध्यक्ष रहते बटोरी उतनी चर्चा उन्हें सुप्रीम कोर्ट के कार्यकाल के दौरान भी नहीं मिली. 20 दिसंबर 2012 को न्यायमूर्ति सवतंत्र कुमार ने एनजीटी में पद स्मभाला था.  पर्यावरण संरक्षण के लिए ‌जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने ऐसे कई कड़े फैसले लिए जिससे वह पर्यावरण प्रेमियों के चहेते बन गए.  एक दिन में 209 मामलों का निपटारा करने और 56 केस में फैसला सुनाने वाले जस्टिस स्वतंत्र कुमार एनजीटी यानि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण  से सेवानिवृत्त हो गए .

अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण आदेश और फ़ैसले लिये. हाल ही में, अमरनाथ पर जाने वाले यात्री अब पवित्र गुफा में जयकारे और मंत्रोच्चार नहीं कर पाएंगे और ना ही घंटियां बजा पाएंगे. राजधानी दिल्ली और एनसीआर में 10 साल से ज्यादा पुरानी डीजल और 15 साल से ज्यादा पुरानी पेट्रोल गाड़ियों पर बैन लगा था. इससे पहले एनजीटी तब चर्चा में आयी जब श्री श्री रवि शंकर के आर्ट ऑफ़ लिविंग पर 5 करोड़ का जुरमाना ठोका था. ये मुद्दा इसलिए भी बड़ा हैं क्योंकि इसमें प्रधानमंत्री मोदी, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी समेत तमाम बड़ी हस्तियों ने भी शिरकत की थी . 2015 में फरीदाबाद के क्यूआरजी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल पर एनजीटी नें 12 करोड़ का जुरमाना ठोक कर बाकि अस्पताल प्रंबंधनो के होश उड़ा दिए थे. यह जुरमाना तय मानक से ज़्यादा निर्माण करने पर लगाया गया था. आखिरी फैसला जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने 8 दिसंबर को वायु प्रदूषण पर सुनाया था. गन्धर्व गुलाटी

गीता पर निबंध लिखने की प्रतियोगिता में अव्वल आया मुस्लिम युवक

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जहाँ पूरे देश में राष्ट्रीयता का मुद्दा छाया हुआ है वहीं जयपुर शहर में कुछ और देखने को मिला. राजस्थान में मुस्लिमो के खिलाफ रोज़ हिंसा की खबर आती रहती हैं वहीं ३ मुस्लिम युवक-युवतियां ने गीता पर निबंध लिखने की प्रतियोगिता में अवल स्थान प्राप्त कर सबको चौंका दिया. जयपुर में गीता पर निबंध की प्रतियोगिता में मुख्य ३ स्थानों पर मुस्लिम युवक और युवतियां रहें. अक्षय पात्र फाउंडेशन की तरफ से आयोजित की गई प्रतियोगिता में 200 स्कूलों के करीब 8000 बच्चों ने भाग लिया जिसमे  सरकारी स्कूल के दसवीं कक्षा में पड़ने वाले 16 साल के नदीम खान ने अवल स्थान हासिल किया और वहीं जहीन और जोराबिया भी दूसरे और तीसरे स्थान पर रहीं. आज तीनो विद्यार्थियों को पुरुस्कार देकर सम्मानित किया जायेगा. नदीम से बातचीत में उन्होंने बताया की उन्हें संस्कृत भाषा से ख़ास लगाव है. प्रतियोगिता के जरिए उन्हें इस भाषा के लिए अपनी निष्ठा दिखाने का मौका मिला मगर उन्हें मालूम है कि इस भाषा में बातचीत का मौका उन्हें शायद ही कभी मिलेगा. नदीम की अध्यापक भी कभी उनसे संस्कृत भाषा में बात नहीं करती और उनके अनुसार पूरा फोकस संस्कृत लिखने पर रहना चाहिए बोलने पर नहीं. इसी वजह से वह स्पष्ट रूप से संस्कृत भाषा में बातचीत नहीं कर पाते. गन्धर्व गुलाटी

बेघर हुई कमल हासन की पत्नी ने इस सेलेब्रिटी से मांगी मदद

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गीत गाता चल और क्रांती जैसी सूपरहिट फिल्मों में काम कर चुकी बॉलीवुड ऐक्ट्रेस सारिका ठाकुर आज बेघर होने की कगार पर हैं. कमल हासन की एक्स वाइफ इन दिनों मुबंई में उनके जुहू स्थित फ्लैट पर चल रहे विवाद में उलझी हुई हैं. यह फ्लैट उसी बिल्डिंग में है जिसमें गोविंदा और विवेक ओबरॉय जैसे स्टार्स भी रहते हैं.

सारिका का कहना है कि यह फ्लैट उन्होने अपने पैसों से खरीदा था लेकिन उनकी माँ ने मरने से पहले उस फ्लैट के साथ-साथ अपनी सारी संपत्ति डॉक्टर विक्रम ठक्कर के नाम कर दी. खबरों के मुताबिक सारिका कमल हासन से अलग होने के बाद से ही मुंबई में एक किराए के मकान में रह रहीं थीं और अपने एक इंटरव्यू के दौरान उन्होने अकेले अपनी दोनो बेटियों (श्रुति और अक्षरा) की पर्वरिश के दौरान अपने संधर्श के बारे में बताया. ऐसे में मकान का विवाद उनके लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है.

गौरतलब है कि इस मामले में सारिका ने बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता आमिर खान से मदद की गुहार लगाई है. इस बात की सलाह उन्हें उनकी करीबी दोस्त और आमिर खान की कज़न (इमरान खान की मां) ने दी थी. सारिका का कहना है कि अमिर इस बात की गंभीरता को समझते हुए उनकी मदद ज़रूर करेंगे.

पीयूष शर्मा  

तमिलनाडु उपचुनाव से ठीक पहले लीक हुआ जयललिता का वीडियो.

तमिलनाडुl समर्थकों के बीच “अम्मा” कहलाई जाने वाली तमिलनाडू की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन को 1 साल से ज्यादा हो चुका है. लेकिन ऐसा दिख रहा है कि आज भी उनके नाम पर राज्य में सियासत की जा रही है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तमिलनाडु की आरके नगर विधानसभा सीट पर उपचुनाव से ठीक एक दिन पहले एआईएडीएमके के टीटीवी दिनाकरण धड़े ने पार्टी की पूर्व प्रमुख जे जयललिता का एक वीडियो जारी किया है. इस वीडियो में वह अस्पताल के बैड पर प्लास्टिक के एक ग्लास से जूस पीती नज़र आ रही हैं. माना ये जा रहा है कि पार्टी इस वीडियो के जरिए लोगों की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रही है. आरके नगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुकी जयललिता का पिछले साल 5 दिसंबर में सीने में दर्द के इलाज के चलते चेन्नई के अपोलो अस्पताल निधन हो गया था. जयललिता का यह वीडियो जारी करने वाले विधायक एस वेत्रिवेल का केहना है कि ‘कई लोग पूछ रहे हैं कि यह वीडियो कब शूट किया गया. यह वीडियो जयललिता को आईसीयू से शिफ्ट किए जाने के बाद शशिकला ने शूट किया था जिसे मैंने दिनकरण या शशिकला से पूछे बिना ही जारी कर दिया है.’ वजह पूछे जाने पर उन्होने बताया कि विरोधियों द्वारा जयललिता के निधन को लेकर साजिश पर उठाए गए सवालों को विराम देने के लिए यह वीडियो जारी किया गया है.

पीयूष शर्मा

इस कांग्रेसी नेता की वजह से गुजरात में 99 पर रूक गई भाजपा

नई दिल्ली. गुजरात चुनाव का नतीजा आए भले ही दो दिन हो गए हो, एक के बाद एक चुनावी आंकड़ों और रणनीतिक जोड़-तोड़ का हिसाब सामने आना जारी है. कांग्रेस जहां भाजपा को 99 पर रोक देने का जश्न मना रही है तो भाजपा जीत के बाद भी सहमी हुई सी है. यह एक ऐसे कांग्रेसी नेता की वजह से हो पाया, जिसकी चर्चा अभी हुई नहीं है.

वह नेता हैं राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और गुजरात चुनाव के प्रभारी अशोक गहलोत. गहलोत ने गुजरात में अपनी चुनावी रणनीति से ऐसा कमाल कर दिखाया, जिसने कांग्रेस को भाजपा के एकदम सामने लाकर खड़ा कर दिया. इससे पहले गुजरात में कांग्रेस का संगठन इतना कमजोर था कि बीजेपी को यकीन था कि कांग्रेस उसके लिए कोई चुनौती ही नहीं है.

अशोक गहलोत ने यहीं से काम करना शुरू किया. उन्होंने गुजरात के अलावा अपने निजी समर्थकों तक को गुजरात चुनाव में झोंक दिया. गहलोत ने राजस्थान समेत चार राज्यों से 200 से ज्यादा पर्यवेक्षक और दो हजार कार्यकर्ताओं की फौज गुजरात चुनाव में लगा दिया. इसमें सबसे ज्यादा कार्यकर्ता राजस्थान से आए थे. ये वो लोग थे जो निजी तौर पर भी गहलोत से जुड़े थे. गहलोत का राजस्थान फैक्टर तब भी दिखा जब गुजरात में राजस्थान से जुड़े 5 सीमावर्ती जिलों में 25 में से कांग्रेस ने 13 सीटें जीत ली, इससे पहले इसमें 21 सीटें बीजेपी के पास थी.

सीमावर्ती जिले की सीटों पर कांग्रेस की कामयाबी ने भाजपा को राजस्थान में भी बैचेन किया है, क्योंकि इसका असर अगले साथ राजस्थान विधनसभा चुनाव मेंआदिवासी जिलों और मेवाड़ में हो सकता है. गुजरात चुनाव में कांग्रेस के इस पर्दे के पीछे रहने वाले नायक को भी श्रेय मिलना चाहिए.

       

बिटकॉइन निवेशकों को आयकर विभाग का झटका

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नई दिल्ली। दुनियाभर में चर्चित डिजिटल करंसी बिटकॉइन में लगातार बढ़ती निवेशकों की संख्या के साथ-साथ आयकर विभाग ने भी अपनी जाँच का दायरा बढ़ा लिया है. इसके तहत देशभर में चार से पाँच लाख अति धनाढ्य व्यक्तियों (हाई नेटवर्थ इंडिविजुवल्स) को आयकर विभाग की ओर से नोटिस जारी किया जाएगा. इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य बिटकॉइन एक्सचेंज में कारोबार की आंड़ में टैक्स चोरी करने वाले कारोबारियों पर लगाम लगाना है.

आयकर विभाग की जाँच यूनिट द्वारा किए गये सर्वे के मुताबिक, इन एक्सचेंजों में अनुमानत: 20 लाख इकाइयां रजिस्टर्ड थीं, जिनमें से चार से पांच लाख ऑपरेशनल हैं और कारोबार एवं निवेश कर रही हैं. जिन कारोबारियों को यह नोटिस भेजा जाएगा उन्हें अपनी वित्तीय जानकारी देनी होगी, जिसके आधार पर तय की गई कर मांग पर पूंजीगत लाभ कर का भुगतान करना होगा. हालांकि बिटकॉइन जैसी डिजिटल करंसीज फिलहाल भारत में अवैध हैं, लेकिन आयकर विभाग ने मौजूदा प्रावधानों के तहत कार्रवाई की है. साल के शुरुआत से अब तक बिटकॉइन की कीमत में 100 प्रतिशत का उछाल देखने को मिला है, जिससे इसकी कीमत 10,000 डॉलर से बढ़कर 20,000 डॉलर तक पहुँच चुकी है. इसके साथ ही रिज़र्व बैंक ऑफ. इंडिया ने आभासी मुद्रा में निवेश करने पर चेतावनी देते हुए इसे अवैध बताया है.

पीयूष शर्मा

गुजरात चुनाव में बसपा का हाल

भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों के अलावा बहुजन समाज पार्टी देश की इकलौती ऐसी राष्ट्रीय पार्टी है जो हर प्रदेश में प्रमुखता से चुनाव लड़ती है. उत्तर प्रदेश को छोड़कर पार्टी हर बार अन्य प्रदेशों में भयंकर हार का सामना करती है, बावजूद इसके चुनाव लड़ने का उसका सिलसिला कायम रहता है. इसकी वजह बताते हुए बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती कहती रही हैं कि अगर बसपा चुनाव नहीं लड़ेगी तो इन राज्यों में रहने वाले अम्बेडकरवादी आखिर किसे वोट देंगे?

हो सकता है कि बसपा प्रमुख की सोच ठीक हो, लेकिन यूपी सहित इक्के-दुक्के राज्यों को छोड़कर बसपा कहीं भी अपना खाता तक नहीं खोल पाती है. गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी यही हुआ है. बहुजन समाज पार्टी यहां एक भी सीट नहीं जीत सकी है, जबकि गुजरात में वह 182 में से 140 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी. दूसरी ओर बसपा से छोटे क्षेत्रिय दलों नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी ने एक और भारतीय ट्रायबल पार्टी ने दो सीटें जीती है.

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर बसपा चुनाव लड़ती क्यों है?? हारने के लिए, हराने के लिए या फिर किसी को जिताने के लिए? चुनावी लड़ाई की एक वजह राष्ट्रीय पार्टी की अपनी मान्यता बरकरार रखने की हो सकती है. लेकिन फिर ऐसे में क्या पार्टी को सिर्फ इसी पहचान को बरकरार रखने के लिए संघर्ष करते रहना चाहिए या फिर इस पहचान के साथ खुद को चुनावी लड़ाई में झोंक भी देना चाहिए. जैसे कि दूसरी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां करती हैं. क्योंकि गुजरात में बसपा न तो लड़ती दिखी और न ही चुनौती देती दिखी. प्रदेश में बसपा के पिछले तीन चुनाव की बात करें तो 2007 के चुनाव में बसपा यहां 166 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. इसमें उसे 5 लाख 72 हजार 540 वोट मिले और उसका वोट प्रतिशत 2.62 रहा. 2012 के चुनाव में बसपा ने 163 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारा. इसमें उसका प्रदर्शन सुधरने की बजाय और नीचे आ गया. इस चुनाव में बसपा को सिर्फ 3 लाख 42 हजार 142 वोट मिले, जबकि वोट प्रतिशत भी कम होकर 1.25 पर पहुंच गया. जहां तक 2017 के हालिया विधानसभा चुनाव की बात है तो अबकी बार बसपा को मिले वोटों से ज्यादा गुजरात में नोटा का बटन दबाया गया हैं. एक दैनिक अखबार में प्रकाशित खबर के मुताबिक गुजरात की 1.8 प्रतिशत जनता ने नोटा का बटन दबाया है, जबकि यहां बसपा को सिर्फ 0.07 प्रतिशत वोट मिले हैं. हिमाचल का भी यही हाल है. यानि कि गुजरात के पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बसपा लगातार नीचे गई है.

सवाल है कि बसपा की लगातार हार के पीछे की वजह क्या है और उसकी रणनीति कैसी होनी चाहिए? इस सवाल के तमाम जवाब हैं. मसलन, सबसे पहले तो पार्टी को 100 और 150 सीटों पर लड़ने की बजाय 40-50 सीटों को चिन्हित कर उस पर चुनाव लड़ना होगा, ताकि वह बेहतर तरीके से और मजबूती से चुनाव लड़ सके. स्थानीय स्तर पर नेतृत्व को मजबूत करना एवं छोटे और समान विचार वाले दलों से गठबंधन करना अब बसपा के जिंदा रहने के लिए जरूरी हो गया है. इसी तरह बसपा अब तक सामाजिक आंदोलन में सक्रिय लोगों से दूर रही है, उसे उनलोगों को अपने राजनीतिक मंचों पर लाकर पार्टी के अंदर प्रतिनिधित्व देना होगा. चिंता की बात यह है कि पिछले एक दशक में बहुजन आंदोलन काफी मजबूत हुआ है, जबकि राजनैतिक आंदोलन कमजोर हुआ है. सवाल है कि आखिर बसपा बहुजन आंदोलन में सक्रिय संगठनों और लोगों को पार्टी से क्यों नहीं जोड़ पा रही है?

अब बसपा के लिए यह जरूरी हो गया है कि उसे एक के बाद एक चुनावी हार से उबरना होगा और चुनावों में जीत के लिए बेहतर रणनीति बनानी होगी. बसपा के लिए एक चिंता की बात यह भी है कि चुनाव दर चुनाव उसकी हार से वह भारतीय राजनीति में अपनी गंभीरता खोती जा रही है. इसे रोकने के लिए जरूरी हो गया है कि वह भारत के राजनीतिक मैदान में खुद को मजबूती से खड़ा करे और चुनाव लड़ने से आगे चुनाव जीतने की ओर बढ़े, तभी उसकी सार्थकता बनी रहेगी.

गुजरात और हिमाचल चुनाव में बसपा की शर्मनाक हार का दोषी कौन

नई दिल्ली। बाबासाहेब द्वारा वंचितों की मुक्ति के लिए 23 सितंबर 1917 को लिए गए संकल्प के 100 साल पूरा होने पर जब बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के वडोदरा जाने की खबर आई तो अम्बडेकरी आंदोलन से जुड़े लोगों में हलचल पैदा हो गई. वजह, इसके कुछ समय बाद ही होने वाला गुजरात चुनाव था. लगा कि बसपा अध्यक्ष गुजरात चुनाव को लेकर काफी गंभीर हैं और एक खास मौके पर वडोदरा पहुंच तक अपने समर्थकों को गोलबंद करना उनकी रणनीति का हिस्सा है.

इसी तरह गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान ओखी तूफान से डरे राहुल गांधी और अमित शाह ने जब अपनी चुनावी रैली रद्द कर दी थी, मायावती डटी रहीं और तूफान की परवाह किए बिना निश्चित कार्यक्रम के मुताबिक अपनी रैली को संबोधित किया. उस दौरान मायावती ने जो भाषण दिया, उसकी स्थानीय स्तर पर खूब सराहना हुई. इन दोनों घटनाओं ने देश भर में फैले बसपा समर्थकों को यकीन दिलाना शुरू कर दिया था कि इस साल गुजरात चुनाव में बसपा बेहतर नतीजे लेकर आएगी. लेकिन 18 दिसंबर को आए चुनावी नतीजों ने बसपा समर्थकों की उम्मीद को तोड़ दिया है.

बसपा ने गुजरात के 182 में से 144 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारा था, लेकिन वह एक भी सीट नहीं जीत सकी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक गुजरात में बसपा को सिर्फ 0.07 प्रतिशत वोट मिले हैं. वोटों की संख्या की बात है तो पार्टी ज्यादातर विधानसभा क्षेत्रों में 500 से 1000 हजार वोट ही हासिल कर पाई है. अभी तक ऐसे किसी प्रत्याशी का नाम सामने नहीं आया है, जिसे 5000 या फिर उससे ज्यादा वोट मिले हों.

हिमाचल का भी यही हाल है. यहां बीएसपी को कुल 17 हजार 335 वोट मिले, जबकि वहीं 32 हजार 656 लोगों ने नोटा का इस्‍तेमाल किया. बहुजन समाज पार्टी की इस शर्मनाक हार ने पार्टी के रणनीतिकारों पर सवाल खड़ा कर दिया है. साथ ही टिकट वितरण में लगे प्रदेश के पदाधिकारियों को भी सवालों के घेरे में ले आया है. सवाल उठ रहा है कि आखिर प्रत्याशियों को टिकट देने का आधार क्या था? सवाल यह भी है कि पार्टी की इस शर्मनाक हार का दोषी कौन है?

सलमान खान और शिल्पा शेट्टी के ‘भंगी’ कहने पर बवाल

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नई दिल्ली। एक इंटरव्यू के दौरान ‘भंगी’ शब्द का इस्तेमाल करना फिल्म अभिनेता सलमान खान और शिल्पा शेट्टी के लिए मुसीबत बन गया है. फिल्मी हस्तियों द्वारा ऐसे बयान के बाद दलित संगठनों ने दोनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. उनका कहना है कि दोनों के इस बयान से इस समाज के लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं. राष्ट्रीय वंचित लोक मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष व राजस्थान सफाई कर्मचारी आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष सचिन सर्वटे ने बोलीवूड के एक्टर सलमान खान व एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी के खिलाफ अनुसूचित जाति आयोग को शिकायत भेजी है. दरअसल Zee Bollywood ETC चैनल को दिए एक इंटरव्यू में बॉलीवुड एक्टर सलमान खान ने अपने डांस सलेक्टर द्वारा दिए गए स्टेप्स की बुराई करते हुवे कहा की इसमें तो मैं भंगी लगूंगा. इसी प्रकार UTV STARS चैनल की एक पत्रकार को उसके सवाल के जवाब में बॉलीवूड एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी द्वारा अपने आपको गन्दी दिखने के भाव को बताने के लिए यह कहा गया कि मैं भंगी की तरह लग रही थी. सर्वटे का कहना है कि दोनों बॉलीवुड कलाकारों की यह टिपण्णी इस जाति विशेष के प्रति उनकी हीन दृष्टिकोण को दर्शाता है. भले ही इस शब्द का इस्तेमाल किसी को ठेस पहुंचाने के लिए न किया गया हो लेकिन ऐसा कहना गलत है. दोनों सेलेब्रिटियों से सार्वजनिक रूप से तथा सोशल मीडिया पर पुरे समाज से माफ़ी मांगने और भविष्य में इन शब्दों का इस्तेमाल न करने के वादे की मांग की जा रही है. सर्वटे ने दुःख जताते हुए कहा कि इतने बड़े सेलेब्रिटी यह भूल जाते हैं कि जिस जाति की वे तौहीन कर रहे हैं उस जाति में भी उनके लाखों फैन होंगे.

रिपोर्ट- सचिन सर्वट

कॉमनवेल्थ में जीते 60 में से 59 मैडल का चौकाने वाला सच

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जोहानिसबर्ग| जोहानिसबर्ग में आयोजित 2017 कॉमनवेल्थ रैसलिंग चैंपियनशिप में भारतीय पहलवानों का प्रदर्शन सराहनीय रहा. इसमें कुल 60 में से 59 मैडल भारत के हिस्से में आए और जो एक भारत के हाथ से निकल गया उसकी वजह भी एक भारतीय पहलवान का बुरी तरह चोटिल होना बताया जा रहा है. भारतीय पहलवानों के इस ऐतिहासिक प्रदर्शन की पूरे विश्व में ज़ोरदार प्रशंसा हो रही है. लेकिन इस शानदार जीत के पीछे जो तथ्य सामने आए हैं, वह चौकाने वाले हैं, आइए आपको बताते हैं वह क्या कारण रहे, जिन्होने भारत की इस ऐतिहासिक सफसता में अहम भूमिका निभाई.

1. सीघे मिली फाइनल में एंट्री – हर वर्ग में 2-2 पहलवान उतारने के नियम का पालन करने के बावजूद भी महिला वर्ग के कई मुकाबलों में केवल भारतीय महिला पहलवान ही आमने सामने थीं, जिसमें 65 किग्रा वर्ग में सीधे फाईनल मुकाबला हुआ. इसमें ऋतु मलिक ने गार्गी यादव को हराकर गोल्ड मेडल जीता. 2. ज्यादातर पहलवान भारत के – चैंपियनशिप के दौरान ज़्यादातर मुकाबलों में 3 ही दावेदार थे, जिनमें से भी 2 भारत के ही थे. ऐसे में कोई एक मैडल मिलना तो पहले से ही तय हो जाता है. 3. दूसरे देशों की रुचि रही कम- अन्य अंतराष्ट्रीय चैंपियनशिप्स के मुकाबले यह टूर्नमेंट बहुत बड़ा नहीं था. इसमें केवल भारत, पाकिस्तान एवं साउथ अफ्रीका के पहलवानों ने ही हिस्सा लिया था.

हालांकि इससे भारत के प्रदर्शन पर कोई सवाल नहीं उठता है. भारत के पहलवान पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट्स में अपने शानदार प्रदर्शन का प्रमाण दे चुके हैं. इसपर रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के प्रेजिडेंट बृजभूषण शरण सिंह ने भारतीय पहलवानों की सराहना करते हुए कहा है कि ‘अगर कोई टीम नहीं आई तो इसका मतलब यह नहीं कि हम भी अपनी टीम नहीं भेजते। अगर सभी देश आते तब भी हमारे पहलवान इसी तरह मेडल जीतते.

  पीयूष शर्मा

आरएसएस की प्रयोगशाला बनेगा सामाजिक आंदोलन मैदान

ये नतीजे बता रहे हैं कि आरएसएस की प्रयोगशाला में कैसे सामाजिक आंदोलन को जगह मिलने की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं। गुजरात की मौजूदा जातीय-सामाजिक परिस्थितियों में यदि सियासी गणित पर कांग्रेस इसे जरा भी आगे-पीछे होती यानि संख्या के मामले में मजबूत विपक्ष बनकर नहीं उभरती या भाजपा की कुपोषित सरकार बनने की संभावना टाल देती तो कथित हिन्दुत्व के समीकरण बैठा चुकी आरएसएस के लिए स्थिति इतनी विकट नहीं होती।

चुनावी राजनीति में कोई एक दल जीतता है। लेकिन, गुजरात की राजनीति में इस बार नया यह है कि यह चुनावी हार-जीत से आगे ‘जाति’ दिख रही है। यहां पिछले कुछ चुनावों में भाजपा का सामना कांग्रेस जैस दल से होता रहा है, जिसे हराकर शांति से बैठा जा सकता था। लेकिन, इस बार दलीय स्थिति से उलट सामाजिक-जातीय आन्दोलनों ने उसे असली टक्कर दी है। इसलिए गुजरात की मौजूदा राजनीति में सम्भावना यह भी है कि चुनाव परिणाम मात्र छोटा-सा इंटरवल साबित हो और मुकाबले का अगला दौर इस परिणाम के एक अंतराल बाद जल्द शुरू हो।

गुजरात चुनाव में संख्या बल और लीडरशिप से भी जाहिर है कि इस बार सत्तारूढ़ भाजपा की टक्कर मजबूत विपक्ष से है जो बहुमत से आठ-नौ कदम ही पीछा रहा है।

किसी भी स्थिति में आरएसएस के लिए यह चिंता का सबब है। वजह है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद आरएसएस-भाजपा संगठन अपनी ही प्रयोगशाला में सामाजिक-जातीय उथल-पुथल नहीं रोक पाया है। आगे की स्थिति का आंकलन करें तो भले ही गुजरात की राजनीति साम्प्रदायिकता पर आधारित है, फिर भी आरएसएस-भाजपा की दिक्कत यह है कि पूरा समाज आज भी जातियों में बंटा है जो उनकी मांगों को लेकर पहले से थोड़ा संगठित और बहुत ज्यादा आक्रामक होता जा रहा है। आरएसएस-भाजपा अब तक विशेष तौर पर एसटी, एसटी और ओबीसी जातियों को मुसलमानों (9 फीसदी) के खिलाफ खड़ा करने में कामयाब होता रहा है। लेकिन, आर्थिक कमजोरी और बेकारी के कारण इन जातियों का अंतर्विरोध सड़कों पर देखा गया है और आने वाले समय में यह और ज्यादा मुखर हो सकता है।

इसलिए ये सामाजिक-जातीय आंदोलन यदि संगठित न भी हुए और एक-एक जाति कई-कई गुटों में बंट भी गई तो भी कथित हिन्दुत्त्व के नाम पर पूरी की पूरी निचली ‘जमातों’ को एकजुट रख पाने में आरएसएस-भाजपा को माइक्रो लेबल पर जूझना पड़ेगा।

दूसरी तरफ, इन जातीय (गुट) आंदोलनों के बीच यदि कोर इशू पर समन्वय की राजनीति (जैसी कि कोशिश शुरू हो चुकी है) बनती है तो आरएसएस-भाजपा को गुजरात के अंदर-बाहर लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

– शिरीष खरे

ये लेखक के अपने विचार हैं।

इस बड़े अभिनेता ने गुजरात में पीएम मोदी की जीत पर उठाया सवाल|

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गुजरात। गुजरात चुनाव का रिजल्ट आने के बाद अभिनेता प्रकाश राज ने एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर लिया है. अभिनेता ने गुजरात चुनावों में भगवा पार्टी की जीत पर उसकी तारीफ तो की लेकिन साथ ही पूछा कि पार्टी 150 से ज्यादा सीट लाने के अपने लक्ष्य को हासिल क्यों नहीं कर पाई.

प्रकाश राज ने एक ट्वीट कर भाजपा की जीत के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई दी लेकिन साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि ‘‘क्या आपको अपने विकास के साथ सूपड़ा साफ नहीं करना चाहिए था? अभिनेता ने पूछा कि 150 प्लस का क्या हुआ?’’ क्या मोदी एक पल रुककर यह सोचेंगे कि विभाजनकारी राजनीति काम नहीं आई. बकौल प्रकाश राज-

 ‘‘हमारे देश के पास पाकिस्तान, धर्म, जाति, धमकाने वाले समूहों का समर्थन करना और आपसी रंजिश निकालने की तुलना में बड़े मुद्दे हैं. हमारे पास वास्तविक ग्रामीण मुद्दे हैं.’’ अभिनेता यहीं नहीं रुके. उन्होंने कहा कि किसान, गरीब और ग्रामीण भारत की नजरअंदाज की गई आवाज और तेज हो गई है. क्या प्रधानमंत्री वह ये आवाज सुन सके? पत्रकार गौरी लंकेश के करीबी रहे अभिनेता प्रकाश राज गौरी हत्याकांड पर प्रधानमंत्री की चुप्पी के बाद से ही उनको लेकर टिप्पणी करते रहे हैं.

 असल में गुजरात चुनाव में भाजपा जीत तो गई है लेकिन पार्टी जितनी सीटें जीतने का दावा कर रही थी, वह उसे नहीं मिल पाई है. कांग्रेस भले ही भाजपा की जीत को रोक नहीं सकी है, लेकिन जो भाजपा 150 सीटें जीतने का दावा कर रही थी, कांग्रेस ने उसे 100 का आंकड़ा भी पार नहीं करने दिया है. जिसके बाद भाजपा की राजनीति से इत्तेफाक नहीं रखने वाले लोग उसे निशाने पर ले रहे हैं.

गुजरात चुनावः जीत गए जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर

अहमदाबाद। गुजरात विधानसभा में बड़े फैक्टर रहे हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर भाजपा का विजयी रथ रोकने में नाकामयाब रहे हैं. हालांकि हार्दिक पटेल अपने गढ़ में भाजपा को झटका देने में कामयाब रहे हैं. तो वहीं जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर ने भी चुनाव जीत लिया है.

वडगांव से चुनाव लड़ने वाले मेवाणी ने चुनाव जीत लिया है. मेवाणी 19 हजार 696 वोटों से चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं, तो वहीं राधनपुर से चुनाव मैदान में डटे अल्पेश ठाकोर 14 हजार 857 वोटों से जीते हैं. गुजरात में भले ही कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो सकी है लेकिन गुजरात विधानसभा में उसकी आवाज को दबाना अब संभव नहीं रह गया है. कांग्रेस हारने के बावजूद गुजरात की विधानसभा में मजबूत स्थिति में मौजूद रहेगी. जहां तक दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और अल्पोश ठाकोर की बात है तो इन दोनों के विधानसभा में पहुंचने से गुजरात में दलितों और पिछड़ों की आवाज को मजबूती मिलने की उम्मीद रहेगी.

गुजरात में 99 पर रुकी भाजपा, हिमाचल में 44, दोनों राज्यों में बहुमत

Electionनई दिल्ली। गुजरात विधानसभा की 182 सीटों और हिमाचल की 68 विधानसभा सीटों पर हुए चुनाव में बाजी भाजपा के हाथ लगी है. दोनों राज्यों में अमित शाह और नरेन्द्र मोदी का जादू फिर से चला है और भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा छू लिया है. गुजरात में भाजपा को सरकार बनाने के लिए 92 सीटों की जरूरत है जिसे वह हासिल कर चुकी है. हिमाचल में भी यही स्थिति है.

चुनावी नतीजों के बाद पीएम मोदी ने ट्वीट करके कहा कि हिमाचल प्रदेश में लहराया कमल, विकास की हुई भव्य जीत. वहीं भाजपा कार्यकर्ताओं ने अध्यक्ष अमित शाह का जमकर स्वागत किया. दिल्ली स्थित भाजपा दफ्तर में जश्न का माहौल रहा. जहां तक कांग्रेस की बात है तो हिमाचल उनके हाथ से छूट गया है, हालांकि गुजरात में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी है और उसे दर्जन भर से ज्यादा सीटों का फायदा हुआ है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के आक्रामक प्रचार की बदौलत 150 सीटें जीतने का दावा करने वाली भाजपा 100 के आंकड़े से पहले ही रूकती दिख रही है.

पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने कहा कि गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद हम इतना कह सकते हैं कि गुजरात की जनता जागरुक तो हुई है लेकिन अभी और जरूरत है. सूरत और राजकोट में ईवीएम टैंपरिंग का मुद्दा रहा है. मैं किसी पार्टी का पदाधिकारी नहीं हूं. मैं जल्द ही आंदोलन शुरू करुंगा. गुजरात में दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर भारी अंतर से अपनी-अपनी सीटें जीतने में कामयाब रहे हैं.