गीता पर निबंध लिखने की प्रतियोगिता में अव्वल आया मुस्लिम युवक

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जहाँ पूरे देश में राष्ट्रीयता का मुद्दा छाया हुआ है वहीं जयपुर शहर में कुछ और देखने को मिला. राजस्थान में मुस्लिमो के खिलाफ रोज़ हिंसा की खबर आती रहती हैं वहीं ३ मुस्लिम युवक-युवतियां ने गीता पर निबंध लिखने की प्रतियोगिता में अवल स्थान प्राप्त कर सबको चौंका दिया. जयपुर में गीता पर निबंध की प्रतियोगिता में मुख्य ३ स्थानों पर मुस्लिम युवक और युवतियां रहें. अक्षय पात्र फाउंडेशन की तरफ से आयोजित की गई प्रतियोगिता में 200 स्कूलों के करीब 8000 बच्चों ने भाग लिया जिसमे  सरकारी स्कूल के दसवीं कक्षा में पड़ने वाले 16 साल के नदीम खान ने अवल स्थान हासिल किया और वहीं जहीन और जोराबिया भी दूसरे और तीसरे स्थान पर रहीं. आज तीनो विद्यार्थियों को पुरुस्कार देकर सम्मानित किया जायेगा. नदीम से बातचीत में उन्होंने बताया की उन्हें संस्कृत भाषा से ख़ास लगाव है. प्रतियोगिता के जरिए उन्हें इस भाषा के लिए अपनी निष्ठा दिखाने का मौका मिला मगर उन्हें मालूम है कि इस भाषा में बातचीत का मौका उन्हें शायद ही कभी मिलेगा. नदीम की अध्यापक भी कभी उनसे संस्कृत भाषा में बात नहीं करती और उनके अनुसार पूरा फोकस संस्कृत लिखने पर रहना चाहिए बोलने पर नहीं. इसी वजह से वह स्पष्ट रूप से संस्कृत भाषा में बातचीत नहीं कर पाते. गन्धर्व गुलाटी

बेघर हुई कमल हासन की पत्नी ने इस सेलेब्रिटी से मांगी मदद

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गीत गाता चल और क्रांती जैसी सूपरहिट फिल्मों में काम कर चुकी बॉलीवुड ऐक्ट्रेस सारिका ठाकुर आज बेघर होने की कगार पर हैं. कमल हासन की एक्स वाइफ इन दिनों मुबंई में उनके जुहू स्थित फ्लैट पर चल रहे विवाद में उलझी हुई हैं. यह फ्लैट उसी बिल्डिंग में है जिसमें गोविंदा और विवेक ओबरॉय जैसे स्टार्स भी रहते हैं.

सारिका का कहना है कि यह फ्लैट उन्होने अपने पैसों से खरीदा था लेकिन उनकी माँ ने मरने से पहले उस फ्लैट के साथ-साथ अपनी सारी संपत्ति डॉक्टर विक्रम ठक्कर के नाम कर दी. खबरों के मुताबिक सारिका कमल हासन से अलग होने के बाद से ही मुंबई में एक किराए के मकान में रह रहीं थीं और अपने एक इंटरव्यू के दौरान उन्होने अकेले अपनी दोनो बेटियों (श्रुति और अक्षरा) की पर्वरिश के दौरान अपने संधर्श के बारे में बताया. ऐसे में मकान का विवाद उनके लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है.

गौरतलब है कि इस मामले में सारिका ने बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता आमिर खान से मदद की गुहार लगाई है. इस बात की सलाह उन्हें उनकी करीबी दोस्त और आमिर खान की कज़न (इमरान खान की मां) ने दी थी. सारिका का कहना है कि अमिर इस बात की गंभीरता को समझते हुए उनकी मदद ज़रूर करेंगे.

पीयूष शर्मा  

तमिलनाडु उपचुनाव से ठीक पहले लीक हुआ जयललिता का वीडियो.

तमिलनाडुl समर्थकों के बीच “अम्मा” कहलाई जाने वाली तमिलनाडू की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन को 1 साल से ज्यादा हो चुका है. लेकिन ऐसा दिख रहा है कि आज भी उनके नाम पर राज्य में सियासत की जा रही है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तमिलनाडु की आरके नगर विधानसभा सीट पर उपचुनाव से ठीक एक दिन पहले एआईएडीएमके के टीटीवी दिनाकरण धड़े ने पार्टी की पूर्व प्रमुख जे जयललिता का एक वीडियो जारी किया है. इस वीडियो में वह अस्पताल के बैड पर प्लास्टिक के एक ग्लास से जूस पीती नज़र आ रही हैं. माना ये जा रहा है कि पार्टी इस वीडियो के जरिए लोगों की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रही है. आरके नगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुकी जयललिता का पिछले साल 5 दिसंबर में सीने में दर्द के इलाज के चलते चेन्नई के अपोलो अस्पताल निधन हो गया था. जयललिता का यह वीडियो जारी करने वाले विधायक एस वेत्रिवेल का केहना है कि ‘कई लोग पूछ रहे हैं कि यह वीडियो कब शूट किया गया. यह वीडियो जयललिता को आईसीयू से शिफ्ट किए जाने के बाद शशिकला ने शूट किया था जिसे मैंने दिनकरण या शशिकला से पूछे बिना ही जारी कर दिया है.’ वजह पूछे जाने पर उन्होने बताया कि विरोधियों द्वारा जयललिता के निधन को लेकर साजिश पर उठाए गए सवालों को विराम देने के लिए यह वीडियो जारी किया गया है.

पीयूष शर्मा

इस कांग्रेसी नेता की वजह से गुजरात में 99 पर रूक गई भाजपा

नई दिल्ली. गुजरात चुनाव का नतीजा आए भले ही दो दिन हो गए हो, एक के बाद एक चुनावी आंकड़ों और रणनीतिक जोड़-तोड़ का हिसाब सामने आना जारी है. कांग्रेस जहां भाजपा को 99 पर रोक देने का जश्न मना रही है तो भाजपा जीत के बाद भी सहमी हुई सी है. यह एक ऐसे कांग्रेसी नेता की वजह से हो पाया, जिसकी चर्चा अभी हुई नहीं है.

वह नेता हैं राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और गुजरात चुनाव के प्रभारी अशोक गहलोत. गहलोत ने गुजरात में अपनी चुनावी रणनीति से ऐसा कमाल कर दिखाया, जिसने कांग्रेस को भाजपा के एकदम सामने लाकर खड़ा कर दिया. इससे पहले गुजरात में कांग्रेस का संगठन इतना कमजोर था कि बीजेपी को यकीन था कि कांग्रेस उसके लिए कोई चुनौती ही नहीं है.

अशोक गहलोत ने यहीं से काम करना शुरू किया. उन्होंने गुजरात के अलावा अपने निजी समर्थकों तक को गुजरात चुनाव में झोंक दिया. गहलोत ने राजस्थान समेत चार राज्यों से 200 से ज्यादा पर्यवेक्षक और दो हजार कार्यकर्ताओं की फौज गुजरात चुनाव में लगा दिया. इसमें सबसे ज्यादा कार्यकर्ता राजस्थान से आए थे. ये वो लोग थे जो निजी तौर पर भी गहलोत से जुड़े थे. गहलोत का राजस्थान फैक्टर तब भी दिखा जब गुजरात में राजस्थान से जुड़े 5 सीमावर्ती जिलों में 25 में से कांग्रेस ने 13 सीटें जीत ली, इससे पहले इसमें 21 सीटें बीजेपी के पास थी.

सीमावर्ती जिले की सीटों पर कांग्रेस की कामयाबी ने भाजपा को राजस्थान में भी बैचेन किया है, क्योंकि इसका असर अगले साथ राजस्थान विधनसभा चुनाव मेंआदिवासी जिलों और मेवाड़ में हो सकता है. गुजरात चुनाव में कांग्रेस के इस पर्दे के पीछे रहने वाले नायक को भी श्रेय मिलना चाहिए.

       

बिटकॉइन निवेशकों को आयकर विभाग का झटका

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नई दिल्ली। दुनियाभर में चर्चित डिजिटल करंसी बिटकॉइन में लगातार बढ़ती निवेशकों की संख्या के साथ-साथ आयकर विभाग ने भी अपनी जाँच का दायरा बढ़ा लिया है. इसके तहत देशभर में चार से पाँच लाख अति धनाढ्य व्यक्तियों (हाई नेटवर्थ इंडिविजुवल्स) को आयकर विभाग की ओर से नोटिस जारी किया जाएगा. इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य बिटकॉइन एक्सचेंज में कारोबार की आंड़ में टैक्स चोरी करने वाले कारोबारियों पर लगाम लगाना है.

आयकर विभाग की जाँच यूनिट द्वारा किए गये सर्वे के मुताबिक, इन एक्सचेंजों में अनुमानत: 20 लाख इकाइयां रजिस्टर्ड थीं, जिनमें से चार से पांच लाख ऑपरेशनल हैं और कारोबार एवं निवेश कर रही हैं. जिन कारोबारियों को यह नोटिस भेजा जाएगा उन्हें अपनी वित्तीय जानकारी देनी होगी, जिसके आधार पर तय की गई कर मांग पर पूंजीगत लाभ कर का भुगतान करना होगा. हालांकि बिटकॉइन जैसी डिजिटल करंसीज फिलहाल भारत में अवैध हैं, लेकिन आयकर विभाग ने मौजूदा प्रावधानों के तहत कार्रवाई की है. साल के शुरुआत से अब तक बिटकॉइन की कीमत में 100 प्रतिशत का उछाल देखने को मिला है, जिससे इसकी कीमत 10,000 डॉलर से बढ़कर 20,000 डॉलर तक पहुँच चुकी है. इसके साथ ही रिज़र्व बैंक ऑफ. इंडिया ने आभासी मुद्रा में निवेश करने पर चेतावनी देते हुए इसे अवैध बताया है.

पीयूष शर्मा

गुजरात चुनाव में बसपा का हाल

भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों के अलावा बहुजन समाज पार्टी देश की इकलौती ऐसी राष्ट्रीय पार्टी है जो हर प्रदेश में प्रमुखता से चुनाव लड़ती है. उत्तर प्रदेश को छोड़कर पार्टी हर बार अन्य प्रदेशों में भयंकर हार का सामना करती है, बावजूद इसके चुनाव लड़ने का उसका सिलसिला कायम रहता है. इसकी वजह बताते हुए बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती कहती रही हैं कि अगर बसपा चुनाव नहीं लड़ेगी तो इन राज्यों में रहने वाले अम्बेडकरवादी आखिर किसे वोट देंगे?

हो सकता है कि बसपा प्रमुख की सोच ठीक हो, लेकिन यूपी सहित इक्के-दुक्के राज्यों को छोड़कर बसपा कहीं भी अपना खाता तक नहीं खोल पाती है. गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी यही हुआ है. बहुजन समाज पार्टी यहां एक भी सीट नहीं जीत सकी है, जबकि गुजरात में वह 182 में से 140 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी. दूसरी ओर बसपा से छोटे क्षेत्रिय दलों नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी ने एक और भारतीय ट्रायबल पार्टी ने दो सीटें जीती है.

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर बसपा चुनाव लड़ती क्यों है?? हारने के लिए, हराने के लिए या फिर किसी को जिताने के लिए? चुनावी लड़ाई की एक वजह राष्ट्रीय पार्टी की अपनी मान्यता बरकरार रखने की हो सकती है. लेकिन फिर ऐसे में क्या पार्टी को सिर्फ इसी पहचान को बरकरार रखने के लिए संघर्ष करते रहना चाहिए या फिर इस पहचान के साथ खुद को चुनावी लड़ाई में झोंक भी देना चाहिए. जैसे कि दूसरी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां करती हैं. क्योंकि गुजरात में बसपा न तो लड़ती दिखी और न ही चुनौती देती दिखी. प्रदेश में बसपा के पिछले तीन चुनाव की बात करें तो 2007 के चुनाव में बसपा यहां 166 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. इसमें उसे 5 लाख 72 हजार 540 वोट मिले और उसका वोट प्रतिशत 2.62 रहा. 2012 के चुनाव में बसपा ने 163 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारा. इसमें उसका प्रदर्शन सुधरने की बजाय और नीचे आ गया. इस चुनाव में बसपा को सिर्फ 3 लाख 42 हजार 142 वोट मिले, जबकि वोट प्रतिशत भी कम होकर 1.25 पर पहुंच गया. जहां तक 2017 के हालिया विधानसभा चुनाव की बात है तो अबकी बार बसपा को मिले वोटों से ज्यादा गुजरात में नोटा का बटन दबाया गया हैं. एक दैनिक अखबार में प्रकाशित खबर के मुताबिक गुजरात की 1.8 प्रतिशत जनता ने नोटा का बटन दबाया है, जबकि यहां बसपा को सिर्फ 0.07 प्रतिशत वोट मिले हैं. हिमाचल का भी यही हाल है. यानि कि गुजरात के पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बसपा लगातार नीचे गई है.

सवाल है कि बसपा की लगातार हार के पीछे की वजह क्या है और उसकी रणनीति कैसी होनी चाहिए? इस सवाल के तमाम जवाब हैं. मसलन, सबसे पहले तो पार्टी को 100 और 150 सीटों पर लड़ने की बजाय 40-50 सीटों को चिन्हित कर उस पर चुनाव लड़ना होगा, ताकि वह बेहतर तरीके से और मजबूती से चुनाव लड़ सके. स्थानीय स्तर पर नेतृत्व को मजबूत करना एवं छोटे और समान विचार वाले दलों से गठबंधन करना अब बसपा के जिंदा रहने के लिए जरूरी हो गया है. इसी तरह बसपा अब तक सामाजिक आंदोलन में सक्रिय लोगों से दूर रही है, उसे उनलोगों को अपने राजनीतिक मंचों पर लाकर पार्टी के अंदर प्रतिनिधित्व देना होगा. चिंता की बात यह है कि पिछले एक दशक में बहुजन आंदोलन काफी मजबूत हुआ है, जबकि राजनैतिक आंदोलन कमजोर हुआ है. सवाल है कि आखिर बसपा बहुजन आंदोलन में सक्रिय संगठनों और लोगों को पार्टी से क्यों नहीं जोड़ पा रही है?

अब बसपा के लिए यह जरूरी हो गया है कि उसे एक के बाद एक चुनावी हार से उबरना होगा और चुनावों में जीत के लिए बेहतर रणनीति बनानी होगी. बसपा के लिए एक चिंता की बात यह भी है कि चुनाव दर चुनाव उसकी हार से वह भारतीय राजनीति में अपनी गंभीरता खोती जा रही है. इसे रोकने के लिए जरूरी हो गया है कि वह भारत के राजनीतिक मैदान में खुद को मजबूती से खड़ा करे और चुनाव लड़ने से आगे चुनाव जीतने की ओर बढ़े, तभी उसकी सार्थकता बनी रहेगी.

गुजरात और हिमाचल चुनाव में बसपा की शर्मनाक हार का दोषी कौन

नई दिल्ली। बाबासाहेब द्वारा वंचितों की मुक्ति के लिए 23 सितंबर 1917 को लिए गए संकल्प के 100 साल पूरा होने पर जब बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के वडोदरा जाने की खबर आई तो अम्बडेकरी आंदोलन से जुड़े लोगों में हलचल पैदा हो गई. वजह, इसके कुछ समय बाद ही होने वाला गुजरात चुनाव था. लगा कि बसपा अध्यक्ष गुजरात चुनाव को लेकर काफी गंभीर हैं और एक खास मौके पर वडोदरा पहुंच तक अपने समर्थकों को गोलबंद करना उनकी रणनीति का हिस्सा है.

इसी तरह गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान ओखी तूफान से डरे राहुल गांधी और अमित शाह ने जब अपनी चुनावी रैली रद्द कर दी थी, मायावती डटी रहीं और तूफान की परवाह किए बिना निश्चित कार्यक्रम के मुताबिक अपनी रैली को संबोधित किया. उस दौरान मायावती ने जो भाषण दिया, उसकी स्थानीय स्तर पर खूब सराहना हुई. इन दोनों घटनाओं ने देश भर में फैले बसपा समर्थकों को यकीन दिलाना शुरू कर दिया था कि इस साल गुजरात चुनाव में बसपा बेहतर नतीजे लेकर आएगी. लेकिन 18 दिसंबर को आए चुनावी नतीजों ने बसपा समर्थकों की उम्मीद को तोड़ दिया है.

बसपा ने गुजरात के 182 में से 144 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारा था, लेकिन वह एक भी सीट नहीं जीत सकी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक गुजरात में बसपा को सिर्फ 0.07 प्रतिशत वोट मिले हैं. वोटों की संख्या की बात है तो पार्टी ज्यादातर विधानसभा क्षेत्रों में 500 से 1000 हजार वोट ही हासिल कर पाई है. अभी तक ऐसे किसी प्रत्याशी का नाम सामने नहीं आया है, जिसे 5000 या फिर उससे ज्यादा वोट मिले हों.

हिमाचल का भी यही हाल है. यहां बीएसपी को कुल 17 हजार 335 वोट मिले, जबकि वहीं 32 हजार 656 लोगों ने नोटा का इस्‍तेमाल किया. बहुजन समाज पार्टी की इस शर्मनाक हार ने पार्टी के रणनीतिकारों पर सवाल खड़ा कर दिया है. साथ ही टिकट वितरण में लगे प्रदेश के पदाधिकारियों को भी सवालों के घेरे में ले आया है. सवाल उठ रहा है कि आखिर प्रत्याशियों को टिकट देने का आधार क्या था? सवाल यह भी है कि पार्टी की इस शर्मनाक हार का दोषी कौन है?

सलमान खान और शिल्पा शेट्टी के ‘भंगी’ कहने पर बवाल

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नई दिल्ली। एक इंटरव्यू के दौरान ‘भंगी’ शब्द का इस्तेमाल करना फिल्म अभिनेता सलमान खान और शिल्पा शेट्टी के लिए मुसीबत बन गया है. फिल्मी हस्तियों द्वारा ऐसे बयान के बाद दलित संगठनों ने दोनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. उनका कहना है कि दोनों के इस बयान से इस समाज के लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं. राष्ट्रीय वंचित लोक मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष व राजस्थान सफाई कर्मचारी आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष सचिन सर्वटे ने बोलीवूड के एक्टर सलमान खान व एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी के खिलाफ अनुसूचित जाति आयोग को शिकायत भेजी है. दरअसल Zee Bollywood ETC चैनल को दिए एक इंटरव्यू में बॉलीवुड एक्टर सलमान खान ने अपने डांस सलेक्टर द्वारा दिए गए स्टेप्स की बुराई करते हुवे कहा की इसमें तो मैं भंगी लगूंगा. इसी प्रकार UTV STARS चैनल की एक पत्रकार को उसके सवाल के जवाब में बॉलीवूड एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी द्वारा अपने आपको गन्दी दिखने के भाव को बताने के लिए यह कहा गया कि मैं भंगी की तरह लग रही थी. सर्वटे का कहना है कि दोनों बॉलीवुड कलाकारों की यह टिपण्णी इस जाति विशेष के प्रति उनकी हीन दृष्टिकोण को दर्शाता है. भले ही इस शब्द का इस्तेमाल किसी को ठेस पहुंचाने के लिए न किया गया हो लेकिन ऐसा कहना गलत है. दोनों सेलेब्रिटियों से सार्वजनिक रूप से तथा सोशल मीडिया पर पुरे समाज से माफ़ी मांगने और भविष्य में इन शब्दों का इस्तेमाल न करने के वादे की मांग की जा रही है. सर्वटे ने दुःख जताते हुए कहा कि इतने बड़े सेलेब्रिटी यह भूल जाते हैं कि जिस जाति की वे तौहीन कर रहे हैं उस जाति में भी उनके लाखों फैन होंगे.

रिपोर्ट- सचिन सर्वट

कॉमनवेल्थ में जीते 60 में से 59 मैडल का चौकाने वाला सच

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जोहानिसबर्ग| जोहानिसबर्ग में आयोजित 2017 कॉमनवेल्थ रैसलिंग चैंपियनशिप में भारतीय पहलवानों का प्रदर्शन सराहनीय रहा. इसमें कुल 60 में से 59 मैडल भारत के हिस्से में आए और जो एक भारत के हाथ से निकल गया उसकी वजह भी एक भारतीय पहलवान का बुरी तरह चोटिल होना बताया जा रहा है. भारतीय पहलवानों के इस ऐतिहासिक प्रदर्शन की पूरे विश्व में ज़ोरदार प्रशंसा हो रही है. लेकिन इस शानदार जीत के पीछे जो तथ्य सामने आए हैं, वह चौकाने वाले हैं, आइए आपको बताते हैं वह क्या कारण रहे, जिन्होने भारत की इस ऐतिहासिक सफसता में अहम भूमिका निभाई.

1. सीघे मिली फाइनल में एंट्री – हर वर्ग में 2-2 पहलवान उतारने के नियम का पालन करने के बावजूद भी महिला वर्ग के कई मुकाबलों में केवल भारतीय महिला पहलवान ही आमने सामने थीं, जिसमें 65 किग्रा वर्ग में सीधे फाईनल मुकाबला हुआ. इसमें ऋतु मलिक ने गार्गी यादव को हराकर गोल्ड मेडल जीता. 2. ज्यादातर पहलवान भारत के – चैंपियनशिप के दौरान ज़्यादातर मुकाबलों में 3 ही दावेदार थे, जिनमें से भी 2 भारत के ही थे. ऐसे में कोई एक मैडल मिलना तो पहले से ही तय हो जाता है. 3. दूसरे देशों की रुचि रही कम- अन्य अंतराष्ट्रीय चैंपियनशिप्स के मुकाबले यह टूर्नमेंट बहुत बड़ा नहीं था. इसमें केवल भारत, पाकिस्तान एवं साउथ अफ्रीका के पहलवानों ने ही हिस्सा लिया था.

हालांकि इससे भारत के प्रदर्शन पर कोई सवाल नहीं उठता है. भारत के पहलवान पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट्स में अपने शानदार प्रदर्शन का प्रमाण दे चुके हैं. इसपर रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के प्रेजिडेंट बृजभूषण शरण सिंह ने भारतीय पहलवानों की सराहना करते हुए कहा है कि ‘अगर कोई टीम नहीं आई तो इसका मतलब यह नहीं कि हम भी अपनी टीम नहीं भेजते। अगर सभी देश आते तब भी हमारे पहलवान इसी तरह मेडल जीतते.

  पीयूष शर्मा

आरएसएस की प्रयोगशाला बनेगा सामाजिक आंदोलन मैदान

ये नतीजे बता रहे हैं कि आरएसएस की प्रयोगशाला में कैसे सामाजिक आंदोलन को जगह मिलने की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं। गुजरात की मौजूदा जातीय-सामाजिक परिस्थितियों में यदि सियासी गणित पर कांग्रेस इसे जरा भी आगे-पीछे होती यानि संख्या के मामले में मजबूत विपक्ष बनकर नहीं उभरती या भाजपा की कुपोषित सरकार बनने की संभावना टाल देती तो कथित हिन्दुत्व के समीकरण बैठा चुकी आरएसएस के लिए स्थिति इतनी विकट नहीं होती।

चुनावी राजनीति में कोई एक दल जीतता है। लेकिन, गुजरात की राजनीति में इस बार नया यह है कि यह चुनावी हार-जीत से आगे ‘जाति’ दिख रही है। यहां पिछले कुछ चुनावों में भाजपा का सामना कांग्रेस जैस दल से होता रहा है, जिसे हराकर शांति से बैठा जा सकता था। लेकिन, इस बार दलीय स्थिति से उलट सामाजिक-जातीय आन्दोलनों ने उसे असली टक्कर दी है। इसलिए गुजरात की मौजूदा राजनीति में सम्भावना यह भी है कि चुनाव परिणाम मात्र छोटा-सा इंटरवल साबित हो और मुकाबले का अगला दौर इस परिणाम के एक अंतराल बाद जल्द शुरू हो।

गुजरात चुनाव में संख्या बल और लीडरशिप से भी जाहिर है कि इस बार सत्तारूढ़ भाजपा की टक्कर मजबूत विपक्ष से है जो बहुमत से आठ-नौ कदम ही पीछा रहा है।

किसी भी स्थिति में आरएसएस के लिए यह चिंता का सबब है। वजह है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद आरएसएस-भाजपा संगठन अपनी ही प्रयोगशाला में सामाजिक-जातीय उथल-पुथल नहीं रोक पाया है। आगे की स्थिति का आंकलन करें तो भले ही गुजरात की राजनीति साम्प्रदायिकता पर आधारित है, फिर भी आरएसएस-भाजपा की दिक्कत यह है कि पूरा समाज आज भी जातियों में बंटा है जो उनकी मांगों को लेकर पहले से थोड़ा संगठित और बहुत ज्यादा आक्रामक होता जा रहा है। आरएसएस-भाजपा अब तक विशेष तौर पर एसटी, एसटी और ओबीसी जातियों को मुसलमानों (9 फीसदी) के खिलाफ खड़ा करने में कामयाब होता रहा है। लेकिन, आर्थिक कमजोरी और बेकारी के कारण इन जातियों का अंतर्विरोध सड़कों पर देखा गया है और आने वाले समय में यह और ज्यादा मुखर हो सकता है।

इसलिए ये सामाजिक-जातीय आंदोलन यदि संगठित न भी हुए और एक-एक जाति कई-कई गुटों में बंट भी गई तो भी कथित हिन्दुत्त्व के नाम पर पूरी की पूरी निचली ‘जमातों’ को एकजुट रख पाने में आरएसएस-भाजपा को माइक्रो लेबल पर जूझना पड़ेगा।

दूसरी तरफ, इन जातीय (गुट) आंदोलनों के बीच यदि कोर इशू पर समन्वय की राजनीति (जैसी कि कोशिश शुरू हो चुकी है) बनती है तो आरएसएस-भाजपा को गुजरात के अंदर-बाहर लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

– शिरीष खरे

ये लेखक के अपने विचार हैं।

इस बड़े अभिनेता ने गुजरात में पीएम मोदी की जीत पर उठाया सवाल|

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गुजरात। गुजरात चुनाव का रिजल्ट आने के बाद अभिनेता प्रकाश राज ने एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर लिया है. अभिनेता ने गुजरात चुनावों में भगवा पार्टी की जीत पर उसकी तारीफ तो की लेकिन साथ ही पूछा कि पार्टी 150 से ज्यादा सीट लाने के अपने लक्ष्य को हासिल क्यों नहीं कर पाई.

प्रकाश राज ने एक ट्वीट कर भाजपा की जीत के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई दी लेकिन साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि ‘‘क्या आपको अपने विकास के साथ सूपड़ा साफ नहीं करना चाहिए था? अभिनेता ने पूछा कि 150 प्लस का क्या हुआ?’’ क्या मोदी एक पल रुककर यह सोचेंगे कि विभाजनकारी राजनीति काम नहीं आई. बकौल प्रकाश राज-

 ‘‘हमारे देश के पास पाकिस्तान, धर्म, जाति, धमकाने वाले समूहों का समर्थन करना और आपसी रंजिश निकालने की तुलना में बड़े मुद्दे हैं. हमारे पास वास्तविक ग्रामीण मुद्दे हैं.’’ अभिनेता यहीं नहीं रुके. उन्होंने कहा कि किसान, गरीब और ग्रामीण भारत की नजरअंदाज की गई आवाज और तेज हो गई है. क्या प्रधानमंत्री वह ये आवाज सुन सके? पत्रकार गौरी लंकेश के करीबी रहे अभिनेता प्रकाश राज गौरी हत्याकांड पर प्रधानमंत्री की चुप्पी के बाद से ही उनको लेकर टिप्पणी करते रहे हैं.

 असल में गुजरात चुनाव में भाजपा जीत तो गई है लेकिन पार्टी जितनी सीटें जीतने का दावा कर रही थी, वह उसे नहीं मिल पाई है. कांग्रेस भले ही भाजपा की जीत को रोक नहीं सकी है, लेकिन जो भाजपा 150 सीटें जीतने का दावा कर रही थी, कांग्रेस ने उसे 100 का आंकड़ा भी पार नहीं करने दिया है. जिसके बाद भाजपा की राजनीति से इत्तेफाक नहीं रखने वाले लोग उसे निशाने पर ले रहे हैं.

गुजरात चुनावः जीत गए जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर

अहमदाबाद। गुजरात विधानसभा में बड़े फैक्टर रहे हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर भाजपा का विजयी रथ रोकने में नाकामयाब रहे हैं. हालांकि हार्दिक पटेल अपने गढ़ में भाजपा को झटका देने में कामयाब रहे हैं. तो वहीं जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर ने भी चुनाव जीत लिया है.

वडगांव से चुनाव लड़ने वाले मेवाणी ने चुनाव जीत लिया है. मेवाणी 19 हजार 696 वोटों से चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं, तो वहीं राधनपुर से चुनाव मैदान में डटे अल्पेश ठाकोर 14 हजार 857 वोटों से जीते हैं. गुजरात में भले ही कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो सकी है लेकिन गुजरात विधानसभा में उसकी आवाज को दबाना अब संभव नहीं रह गया है. कांग्रेस हारने के बावजूद गुजरात की विधानसभा में मजबूत स्थिति में मौजूद रहेगी. जहां तक दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और अल्पोश ठाकोर की बात है तो इन दोनों के विधानसभा में पहुंचने से गुजरात में दलितों और पिछड़ों की आवाज को मजबूती मिलने की उम्मीद रहेगी.

गुजरात में 99 पर रुकी भाजपा, हिमाचल में 44, दोनों राज्यों में बहुमत

Electionनई दिल्ली। गुजरात विधानसभा की 182 सीटों और हिमाचल की 68 विधानसभा सीटों पर हुए चुनाव में बाजी भाजपा के हाथ लगी है. दोनों राज्यों में अमित शाह और नरेन्द्र मोदी का जादू फिर से चला है और भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा छू लिया है. गुजरात में भाजपा को सरकार बनाने के लिए 92 सीटों की जरूरत है जिसे वह हासिल कर चुकी है. हिमाचल में भी यही स्थिति है.

चुनावी नतीजों के बाद पीएम मोदी ने ट्वीट करके कहा कि हिमाचल प्रदेश में लहराया कमल, विकास की हुई भव्य जीत. वहीं भाजपा कार्यकर्ताओं ने अध्यक्ष अमित शाह का जमकर स्वागत किया. दिल्ली स्थित भाजपा दफ्तर में जश्न का माहौल रहा. जहां तक कांग्रेस की बात है तो हिमाचल उनके हाथ से छूट गया है, हालांकि गुजरात में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी है और उसे दर्जन भर से ज्यादा सीटों का फायदा हुआ है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के आक्रामक प्रचार की बदौलत 150 सीटें जीतने का दावा करने वाली भाजपा 100 के आंकड़े से पहले ही रूकती दिख रही है.

पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने कहा कि गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद हम इतना कह सकते हैं कि गुजरात की जनता जागरुक तो हुई है लेकिन अभी और जरूरत है. सूरत और राजकोट में ईवीएम टैंपरिंग का मुद्दा रहा है. मैं किसी पार्टी का पदाधिकारी नहीं हूं. मैं जल्द ही आंदोलन शुरू करुंगा. गुजरात में दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर भारी अंतर से अपनी-अपनी सीटें जीतने में कामयाब रहे हैं.

 

बाबासाहेब की धरती पर हजारों ओबीसी लेंगे बौद्ध धम्म की दीक्षा

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नागपुर। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धम्म अपना लिया था. जिसके बाद उन्होंने भारत को बौद्धमय बनाने की घोषणा की थी. लेकिन धम्मदीक्षा के कुछ समय बाद ही उनका परिनिर्वाण होने के कारण उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका. बाबासाहेब के इसी अधूरे सपने को पुरा करने के लिए अब बाबासाहेब के अनुयायियों ने अपनी कमर कस ली है. खास बात यह है कि इस धर्मांतरण आंदोलन में अब पिछड़े वर्ग के लोग भी जुड़ते जा रहे हैं. इस दिशा में काम करने के लिए प्रमुख ओबीसी नेता दिवंगत हनुमंतराव उपरे यानि काका द्वारा स्थापित ओबीसी सत्यशोधक परिषद पिछले कई वर्षों से काम कर रहा है.

वर्तमान में इसकी कमान उनके बेटे संदीप उपरे और परिषद के वर्तमान अध्यक्ष उल्हास राठोड़ के हाथ में है. 25 दिसम्बर यानी मनुस्मृति दहन दिवस के दिन इस दिशा में काम करने वाले विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर ओबीसी धम्मदीक्षा समारोह का बड़े पैमाने पर आयोजन किया गया है. खासतौर पर सत्यशोधक ओबीसी परिषद के द्वारा ओबीसी धम्म दीक्षा समारोह का प्रमुख आयोजन मुंबई के उपनगर कल्याण के वालधुनी में किया गया है. इस समारोह में हजारों की संख्या में ओबीसी समुदाय के लोग बौद्ध धम्म की दीक्षा लेंगे.

यह इकलौती जगह नहीं है जहां ओबीसी समाज के लोग बुद्ध की शरण में आएंगे, बल्कि इसी दिन नागपुर के दीक्षाभूमि में भी ओबीसी धम्मदीक्षा समारोह का आयोजन किया गया है, जिसमें ओबीसी समाज के हजारों लोग दीक्षाभूमि स्मारक समिति के अध्यक्ष भदन्त आर्य नागार्जुन सुरई ससाई द्वारा बौद्ध धम्म की दीक्षा लेंगे. आयोजन को सफल बनाने के लिए महाराष्ट्र में ओबीसी समुदाय के प्रमुख नेता तथा विचारक प्रो. जेमिनी कडू, रमेशजी राठौड़, संतोष भालदार, राष्ट्रीय ओबीसी महिला परिषद की अध्यक्ष श्रीमती सुषमा भड आदि प्रमुख रूप से सक्रिय हैं. जाहिर है कि देश के सबसे बड़े तबके पिछड़े समाज के बौद्ध धम्म की ओर आने से बाबासाहेब के भारत को बौद्धमय बनाने का सपना साकार होने में बड़ी मदद मिलेगी.

रिपोर्ट- सोनाली 

भाजपा पर लालू यादव की हैरान करने वाली प्रतिक्रिया

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पटना।  राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने भाजपा को लेकर अपने अंदाज में बयान दिया है. पटना में आयोजित शहीद जगदेव राजनैतिक जागरूकता सम्मेलन में मुख्य अतिथि बनकर पहुंचे लालू प्रसाद यादव अपने अंदाज में थे. इस दौरान उन्होंने जदयू और भाजपा पर चुटकी लेते हुए इशारों इशारों में उनकी तुलना चूहे से कर दी. इस दौरान उन्होंने भूरा बाल यानि भूमिहार और राजपूत वाली अपनी टिप्पणी को भी अलग अंदाज में रखा.

लालू ने बीजेपी और नीतीश कुमार का नाम लिए बगैर कहा कि दो तरह के चूहे होते हैं. एक चूहा हरना होता है दूसरा चूहा क्रोसना होता है. राजद अध्यक्ष ने कहा कि भूरे चूहे ने बालू पर ध्यान दिया है और बालू में बिल बनाने की कोशिश कर रहा है और दूसरा चूहा क्रोसना चूहा है जो घर में घुसा रहता है. ये दोनों मिल गए हैं क्योंकि बीजेपी क्रोसना चूहा है. उन्होंने कहा कि हम हरना चूहे के बारे में नहीं बताएंगे नहीं तो विवाद हो जाएगा.

लालू यादव ने नीतीश कुमार की शराबबंदी की नीति को चुनौती देते हुए कहा कि पटना की जीरो माइल पहाड़ी पर सुबह 4:00 बजे हरियाणा और झारखंड से शराब का ट्रक आता है और होम डिलीवरी करने वाले लोग उसे वहां से उठाकर ले जाते हैं.

पाकिस्तान को लेकर भाजपा का चेहरा बेनकाब

गुजरातl जिस गुजरात चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस और राहुल गांधी के हमलों के बाद चुनाव में पाकिस्तान का सहारा लेना पड़ा, असल में उस पाकिस्तान की हमदर्द कांग्रेस नहीं बल्कि भाजपा है. भाजपा औऱ पीएम मोदी भले ही खुद को पाकिस्तान का दुश्मन घोषित कर उसका चुनावी लाभ लेते रहे हैं, लेकिन अंदर की हकीकत कुछ और है. प्रमुख हिन्दी अखबार दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक खबर इसी ओर इशारा कर रही है.

 जैसी खबरें आती हैं, उसके मुताबिक पाकिस्तान के साथ बातचीत के सारे रास्ते बंद हैं. सीमा पर फायरिंग है. भारत के गृह मंत्रालय के मुताबिक पाकिस्तान ने इस साल 750 से ज्यादा बार संघर्ष विराम तोड़ा है. जबकि भारत सरकार पाकिस्तान से आने वाले लोगों को पैन कार्ड और आधार दे रही है. वे अब भारत के बैंकों में खाता खोल सकते हैं और यहां घर भी खरीद सकते हैं.

अखबार की खबर के मुताबिक मोदी सरकार पिछले साल से पाकिस्तान से विस्थापित होकर आने वाले हिन्दू, सिख एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को आधार औऱ पैन कार्ड की सुविधा दे रही है. 2014 से लेकर अब तक 7200 से अधिक पाकिस्तानी नागरिकों को एलटीवी यानि दीर्घकालिक वीजा मिल चुका है. पाकिस्तान से हर साल 5000 हिन्दुओं के विस्थापित होने की खबर है. साथ ही सिख और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भी विस्थापित हो रहे हैं. यानि यह साफ है कि पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार के दो पक्ष हैं. जिसमें एक वहां के धार्मिक अल्पसंख्यकों औऱ दूसरा वहां के मुसलमानों के लिए है. कहीं न कहीं ऐसे कदम उठा कर भाजपा शासित केंद्र सरकार देश में अपने वोटों को मजबूत करने में जुटी है.

भारत ने श्रीलंका को 2-1 से हरा कर एक दिवसीय श्रृंखला पर कब्जा किया

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विशाखापट्टनम।भारत ने वनडे सीरीज में श्रीलंका को 2-1 से हरा दिया. रविवार को विशाखापट्टनम में खेले गए आखिरी वनडे मैच में उसने मेहमान टीम को 8 विकेट से हराया. तीन मैचों की इस सीरीज को जीतने के साथ ही भारत ने एक साल में सबसे ज्यादा सीरीज जीतने का अपना पिछला रिकॉर्ड भी तोड़ दिया. ये इस साल भारत की 13वीं सीरीज (तीनों फॉर्मेट) जीत रही. भारत को ये जीत रोहित शर्मा की कप्तानी में मिली. आखिरी वनडे का रोमांच – वनडे सीरीज के आखिरी मैच में भारत ने टॉस जीतकर पहले फील्डिंग को चुना. 15 के स्कोर पर श्रीलंका का पहला विकेट गिर गया. दूसरे विकेट के लिए थरंगा और समरविक्रमा ने 121 रन जोड़े. – एक वक्त पर श्रीलंका का स्कोर 2 विकेट पर 160 रन था और वो बेहद मजबूत लग रही थी. लेकिन अगले 8 विकेट 55 रन के अंदर गिर गए. मेहमान टीम के लिए उपुल थरंगा ने 95 और सदीरा समरविक्रमा ने 42 रन बनाए. – टारगेट का पीछा करने उतरी टीम इंडिया की शुरुआत अच्छी नहीं रही और चौथे ओवर में 14 के स्कोर पर पहला विकेट गिर गया. रोहित शर्मा (7) को 3.4 ओवर में अकीला धनंजय ने बोल्ड कर दिया. – इसके बाद दूसरे विकेट के लिए श्रीलंकाई बॉलर्स को लंबा इंतजार करना पड़ा. दूसरी सफलता उन्हें 22.4 ओवर में मिली जब भारत का स्कोर 149 रन था. श्रेयस अय्यर आउट होने वाले दूसरे बैट्समैन रहे. – इसके बाद भारत का कोई विकेट नहीं गिरा. टीम इंडिया ने 32.1 ओवर में 2 विकेट पर 219 रन बनाकर मैच और सीरीज जीत ली.

शिखर धवन बने वनडे में 4000 रन बनाने वाले भारत के दूसरे सबसे तेज बल्‍लेबाज

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विशाखापट्टनम: श्रीलंका के खिलाफ विशाखापट्टनम में हुआ तीसरा वनडे टीम इंडिया के ओपनर शिखर धवन के लिए विशेष उपलब्धि वाला रहा. धवन ने इस मैच में वनडे क्रिकेट में अपने चार हजार रन पूरे किए. उन्होंने रविवार को वाई. एस. राजशेखर रेड्डी एसीए-वीसीए स्टेडियम में यह खास मुकाम हासिल किया. धवन ने इस मैच में 85 गेंदों में 13 चौके और दो छक्कों की मदद से 100 रन बनाते हुए अपनी टीम को मैच जिताने में भी मदद की. भारत ने श्रीलंका को तीन वनडे मैचों की सीरीज में 2-1 से मात दी और इनको मैंन ऑफ द सिरीज़ से भी नवाजा गया.

धवन ने 95 पारियों में अपने चार हजार रन पूरे किए हैं. उनसे पहले भारतीय बल्लेबाजों में सिर्फ विराट कोहली ने ही कम पारियों में चार हजार रन अपने खाते में डाले. कोहली ने चार हजार रन पूरे करने के लिए 93 पारियां खेली थीं. वहीं कुल पांच खिलाड़ियों ने धवन से कम पारियों में चार हजार रन पूरे किए हैं. उन्होंने इस प्रारूप में 12 शतक लगाए हैं. वह सबसे कम पारियों में 12 शतक लगाने वाले 5वें बल्लेबाज हैं.

 

स्त्री यौनिकता पर विभिन्न देश

स्त्री यौनिकता पर सत्र था, मौक़ा था यूरोप, एशिया और  अफ्रीका में परिवार व्यवस्था में आ रहे बदलाव पर एक कार्यशाला. यूरोप, खासकर सेन्ट्रल यूरोप में परिवार में बढ़ते आजादी के सेन्स और महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता के बीच एक सीधा संबंध है – डेवेलपमेंट स्टडीज, मनोविज्ञान और सोशियोलोजी ने यह स्थापित कर दिया है. यह एक आधुनिक लेकिन स्थापित सच्चाई है. लेकिन क्या महिलाओं की ‘यौन आजादी’ को भी परिवार में आ रहे परिवर्तन के साथ रखकर देखा जा सकता है? जैसे स्त्री की आर्थिक आजादी का परिवार-व्यवस्था और समाज में में हो रहे बदलाव से संबंध है वैसे ही क्या स्त्री की यौन आजादी से इसका कोई संबंध बन सकता है?
कुछ औपचारिक शेयरिंग्स और प्रेसेंटेशन के बाद असली मुद्दे लंच टाइम और काफी ब्रेक में निकले. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बुरुंडी, सीरिया, इथियोपिया, अल्जीरिया, बंगलादेश, भारत और श्रीलंका के रिसर्च-स्कालर्स एकसाथ भोजन पर बैठे. अफगानिस्तान से आये मित्र अपना अनुभव बता रहे थे कि काबुल में उनके अध्ययन और अनुसंधान के दौरान उन्होंने दो महत्वपूर्ण बातें नोट कीं जो स्त्री यौनिकता के बारे में पुरुषों के ख्याल और उसके सामाजिक परिणाम से जुडती हैं.
अफगान विद्वान् ने बताया कि एक अध्ययन के दौरान अफगान युवकों को पोर्न फिल्मे दिखाई गयीं और उसपर उनकी प्रतिक्रियाएं नोट की गईं. उन्होंने बताया कि आजकल के अफगान युवक ये देखकर हैरान रह जाते हैं कि सेक्स के दौरान कोई स्त्री कैसे आनंदित हो रही है? उन युवकों में आपस में ये बड़ी चर्चा का विषय बन जाता है कि ये तो पुरुष के आनन्द का विषय है स्त्री को भी इसमें आनंद होता है क्या? अफगान विद्वान् ने कहा कि ये नया बदलाव है. सत्तर के दशक में कुछ ऐसे अध्ययन हुए हैं जिनमे तत्कालीन अफगान समाज के युवक सेक्स के दौरान स्त्रीयों के आनंदित होने को आश्चर्य से नहीं देखते थे बल्कि उसे सहज स्वीकार करते थे.
इस बात पर पाकिस्तान, बुरुंडी, सीरिया, इथियोपिया से आये विद्वानों ने भी सहमती जताई कि ये बदलाव उनके समाज में भी जरुर हुआ है. अब के अफगान, पाक या सीरियाई युवकों में स्त्री की यौनिकता और यौन स्वतन्त्रता को लेकर जो विचार बदले हैं वे असल में इन समाजों के पतन की अचूक सूचना है. अब उनके समाज में स्त्री के मनोविज्ञान, उसकी भावनाओं, उसकी स्वतन्त्रता या उसके अस्तित्व मात्र पर पुरुषों के विचार बहुत नकारात्मक ढंग से बदल गये हैं.
एक अन्य उदाहरण देते हुए अफगान मित्र ने बात और साफ़ की, आजकल अफगान समाज में एक चलन बढ़ रहा है, हालाँकि अभी भी सीमित है लेकिन धीरे-धीरे बढ़ रहा है. अफगान समाज में कुछ कबीलों में कुछ पिछड़े इलाकों में अब भाई अपनी बहन की शादी में नहीं जाना चाहते. पिता या चाचा ताऊ या मामा इत्यादि बुजुर्ग लोगों को जाना अनिवार्य है लेकिन वे भी बेमन से उस समारोह में हिस्सा लेते हैं. इसका कारण बताते हुए उन्होंने एक गजब की बात बताई.
बात ये है कि बहन की शादी में दुल्हे के साथ आये हुए युवक जिस तरह से नाचते गाते और अपनी मर्दानगी या अधिकार का प्रदर्शन करते हैं वो दुल्हन के भाई या पिता के लिए बहुत अपमानजनक होता है. दूल्हे के साथ आई पूरी टोली अपने आप को दुल्हा समझती है और उनकी नजरों से, हाथों के इशारे से, चेहरे के हाव भाव से वे बस सेक्स के इशारे और सेक्स से जुड़े मजाक करते रहते हैं, जैसे कि पूरी टोली किसी सामूहिक सुहागरात के लिए आयी हो. ये सब देखना कम से कम दुल्हन के भाई के लिए बहुत अपमानजनक होता है. इसलिए आजकल कुछ कबीलों में कुछ पिछड़े इलाकों में बहन की शादी में अफगान युवकों के नदारद हो जाने का चलन बढ़ रहा है.
लेकिन मजे की बात ये है कि ये ही भाई, चाचा ताऊ और मामा लोग जब अपने परिवार या कबीले के पुरुष की शादी में जाते हैं तो वो सारी नंगाई करते हैं जिससे खुद उन्हें चिढ होती है. मतलब ये कि उनके बहन या बेटी की शादी में जो चीजें उन्हें शर्मिन्दा करती हैं वही चीजें उनके पुरुष दोस्त या पुरुष रिश्तेदार की शादी के दौरान मर्दानगी दिखाने का हथियार बन जाती हैं.
अब गौर कीजिये इन तीन घटनाओं में सीधा संबंध है. पोर्न देखते हुए अफगान युवकों का स्त्री के आनंदित होने पर आश्चर्य व्यक्त करना और अपनी बहन के विवाह में गुलच्छर्रे उड़ा रही बरात के सामने खुद को अपमानित महसूस करना और इसी तरह की बारात में कभी खुद शामिल होकर नंगाई के नाच करने में आनंद लेना –  ये मूल रूप से उनके समाज में स्त्री पुरुष संबंधों के पतन सहित स्वयं उस समाज के सभ्यतागत और नैतिक पतन का सबूत है.
सत्तर के दशक में अफगान बाड़े में सोवियत-अमेरिकी सांडों की लड़ाई के पहले और धार्मिक आतंक के भूत के प्रवेश के पहले जो अफगान समाज था वो एकदम भिन्न था. तब स्त्रीयां स्कर्ट या जींस पहनकर विश्वविद्यालयों में पढ़ती थीं या स्मोक कर सकती थीं. तब लड़कियों के म्यूजिक बैण्ड भी हुआ करते थे. समाज में प्रेम संबंध और मित्रता बहुत आसान थी. आज के अफगानिस्तान में अब लड़का लड़की आपस में बात करना तो दूर एक दुसरे की तरफ देख भी नहीं सकते. पर्दा और बुर्का लगभग औरत की चमड़ी ही बन गये हैं, उन्हें हटाना मुश्किल है. स्त्रीयां खुद अपनी गुलामी के बारे में कोई विचार बना पाने में सक्षम नहीं रह गयी हैं.
जब अफगान और पाक विद्वानों ने भारत के पिछले कुछ सालों में घटी घटनाओं पर टिप्पणी की तो उन्होंने जोर देकर कहा कि बॉस भारत का समाज भी अफघानिस्तान सीरिया होने की तरफ बढ़ रहा है. जिस तरह से स्त्रीयों को पर्दा, नैतिकता, सच्चरित्रता आदि का पाठ पढाया जा रहा है और जिस तरह से स्त्री पुरुष संबंधों और स्त्रीयों की आजादी को नियंत्रित करने का प्रयास हो रहा है, ठीक वैसा ही अफगानिस्तान पाकिस्तान में में धार्मिक आतंक के भूत के उभार के दौरान हुआ था. ख़ास तौर से जब स्त्री के चरित्र से जुड़े मुद्दे, स्त्री की यौनिकता के नियन्त्रण से जुडी रणनीति अगर आपके राष्ट्रवाद से या आदर्ष समाज की कल्पना से जुड़ने लगें तो समझ लीजिये कि आपका समाज एक गहरे खतरे की तरफ बढ़ रहा है. अगर ये अगले पांच दस सालों में नहीं रुका तो आपके समाज में भी अफगानिस्तान और सीरिया का जन्म होने वाला है.

चमड़ा उद्योग वालों के लिए बड़ी खबर

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नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चमड़ा और फुटवेयर क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा देने के लिए 2,600 करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दी है. इसके साथ ही डेबिट कार्ड, भीम यूपीआई या आधार से जुड़ी भुगतान प्रणालियों के जरिये 2,000 रुपये तक के लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट दर (एमडीआर) में भी राहत दी गई है. इसके अलावा कई विधेयकों सहित अनुबंधों के प्रवर्तन को आसान बनाने के लिए विशेष राहत कानून में संशोधन को भी मंजूरी दी गई है.

इसमें चमड़ा फुटवेयर और सहायक क्षेत्रों में कर्मचारियों की भविष्य निधि में सरकार की ओर से किया जाने वाला अंशदान भी शामिल है. सरकार इन क्षेत्रों में 15,000 रुपये मासिक वेतन वाले सभी नए कर्मचारियों के भविष्य निधि में नियोक्ता के अंशदान में 3.67 फीसदी का योगदान देगी. हालांकि यह अंशदान कर्मचारी भविष्य निधि संगठन में शामिल होने के पहले तीन साल तक ही मिलेगा.

असल में टेक्सटाइल क्षेत्र को दिए गए पैकेज की तरह ही सरकार ने चमड़ा उद्योग में भी औद्योगिक इम्प्लॉयमेंट (स्थायी आदेश) कानून, 1946 के अंतर्गत नियत अवधि के रोजगार को लागू करने का निर्णय किया है. विशेष पैकेज में श्रम कानूनों को आसान बनाने के उपायों को भी शामिल किया गया है.