बाबासाहेब की धरती पर हजारों ओबीसी लेंगे बौद्ध धम्म की दीक्षा

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नागपुर। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धम्म अपना लिया था. जिसके बाद उन्होंने भारत को बौद्धमय बनाने की घोषणा की थी. लेकिन धम्मदीक्षा के कुछ समय बाद ही उनका परिनिर्वाण होने के कारण उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका. बाबासाहेब के इसी अधूरे सपने को पुरा करने के लिए अब बाबासाहेब के अनुयायियों ने अपनी कमर कस ली है. खास बात यह है कि इस धर्मांतरण आंदोलन में अब पिछड़े वर्ग के लोग भी जुड़ते जा रहे हैं. इस दिशा में काम करने के लिए प्रमुख ओबीसी नेता दिवंगत हनुमंतराव उपरे यानि काका द्वारा स्थापित ओबीसी सत्यशोधक परिषद पिछले कई वर्षों से काम कर रहा है.

वर्तमान में इसकी कमान उनके बेटे संदीप उपरे और परिषद के वर्तमान अध्यक्ष उल्हास राठोड़ के हाथ में है. 25 दिसम्बर यानी मनुस्मृति दहन दिवस के दिन इस दिशा में काम करने वाले विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर ओबीसी धम्मदीक्षा समारोह का बड़े पैमाने पर आयोजन किया गया है. खासतौर पर सत्यशोधक ओबीसी परिषद के द्वारा ओबीसी धम्म दीक्षा समारोह का प्रमुख आयोजन मुंबई के उपनगर कल्याण के वालधुनी में किया गया है. इस समारोह में हजारों की संख्या में ओबीसी समुदाय के लोग बौद्ध धम्म की दीक्षा लेंगे.

यह इकलौती जगह नहीं है जहां ओबीसी समाज के लोग बुद्ध की शरण में आएंगे, बल्कि इसी दिन नागपुर के दीक्षाभूमि में भी ओबीसी धम्मदीक्षा समारोह का आयोजन किया गया है, जिसमें ओबीसी समाज के हजारों लोग दीक्षाभूमि स्मारक समिति के अध्यक्ष भदन्त आर्य नागार्जुन सुरई ससाई द्वारा बौद्ध धम्म की दीक्षा लेंगे. आयोजन को सफल बनाने के लिए महाराष्ट्र में ओबीसी समुदाय के प्रमुख नेता तथा विचारक प्रो. जेमिनी कडू, रमेशजी राठौड़, संतोष भालदार, राष्ट्रीय ओबीसी महिला परिषद की अध्यक्ष श्रीमती सुषमा भड आदि प्रमुख रूप से सक्रिय हैं. जाहिर है कि देश के सबसे बड़े तबके पिछड़े समाज के बौद्ध धम्म की ओर आने से बाबासाहेब के भारत को बौद्धमय बनाने का सपना साकार होने में बड़ी मदद मिलेगी.

रिपोर्ट- सोनाली 

भाजपा पर लालू यादव की हैरान करने वाली प्रतिक्रिया

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पटना।  राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने भाजपा को लेकर अपने अंदाज में बयान दिया है. पटना में आयोजित शहीद जगदेव राजनैतिक जागरूकता सम्मेलन में मुख्य अतिथि बनकर पहुंचे लालू प्रसाद यादव अपने अंदाज में थे. इस दौरान उन्होंने जदयू और भाजपा पर चुटकी लेते हुए इशारों इशारों में उनकी तुलना चूहे से कर दी. इस दौरान उन्होंने भूरा बाल यानि भूमिहार और राजपूत वाली अपनी टिप्पणी को भी अलग अंदाज में रखा.

लालू ने बीजेपी और नीतीश कुमार का नाम लिए बगैर कहा कि दो तरह के चूहे होते हैं. एक चूहा हरना होता है दूसरा चूहा क्रोसना होता है. राजद अध्यक्ष ने कहा कि भूरे चूहे ने बालू पर ध्यान दिया है और बालू में बिल बनाने की कोशिश कर रहा है और दूसरा चूहा क्रोसना चूहा है जो घर में घुसा रहता है. ये दोनों मिल गए हैं क्योंकि बीजेपी क्रोसना चूहा है. उन्होंने कहा कि हम हरना चूहे के बारे में नहीं बताएंगे नहीं तो विवाद हो जाएगा.

लालू यादव ने नीतीश कुमार की शराबबंदी की नीति को चुनौती देते हुए कहा कि पटना की जीरो माइल पहाड़ी पर सुबह 4:00 बजे हरियाणा और झारखंड से शराब का ट्रक आता है और होम डिलीवरी करने वाले लोग उसे वहां से उठाकर ले जाते हैं.

पाकिस्तान को लेकर भाजपा का चेहरा बेनकाब

गुजरातl जिस गुजरात चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस और राहुल गांधी के हमलों के बाद चुनाव में पाकिस्तान का सहारा लेना पड़ा, असल में उस पाकिस्तान की हमदर्द कांग्रेस नहीं बल्कि भाजपा है. भाजपा औऱ पीएम मोदी भले ही खुद को पाकिस्तान का दुश्मन घोषित कर उसका चुनावी लाभ लेते रहे हैं, लेकिन अंदर की हकीकत कुछ और है. प्रमुख हिन्दी अखबार दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक खबर इसी ओर इशारा कर रही है.

 जैसी खबरें आती हैं, उसके मुताबिक पाकिस्तान के साथ बातचीत के सारे रास्ते बंद हैं. सीमा पर फायरिंग है. भारत के गृह मंत्रालय के मुताबिक पाकिस्तान ने इस साल 750 से ज्यादा बार संघर्ष विराम तोड़ा है. जबकि भारत सरकार पाकिस्तान से आने वाले लोगों को पैन कार्ड और आधार दे रही है. वे अब भारत के बैंकों में खाता खोल सकते हैं और यहां घर भी खरीद सकते हैं.

अखबार की खबर के मुताबिक मोदी सरकार पिछले साल से पाकिस्तान से विस्थापित होकर आने वाले हिन्दू, सिख एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को आधार औऱ पैन कार्ड की सुविधा दे रही है. 2014 से लेकर अब तक 7200 से अधिक पाकिस्तानी नागरिकों को एलटीवी यानि दीर्घकालिक वीजा मिल चुका है. पाकिस्तान से हर साल 5000 हिन्दुओं के विस्थापित होने की खबर है. साथ ही सिख और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भी विस्थापित हो रहे हैं. यानि यह साफ है कि पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार के दो पक्ष हैं. जिसमें एक वहां के धार्मिक अल्पसंख्यकों औऱ दूसरा वहां के मुसलमानों के लिए है. कहीं न कहीं ऐसे कदम उठा कर भाजपा शासित केंद्र सरकार देश में अपने वोटों को मजबूत करने में जुटी है.

भारत ने श्रीलंका को 2-1 से हरा कर एक दिवसीय श्रृंखला पर कब्जा किया

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विशाखापट्टनम।भारत ने वनडे सीरीज में श्रीलंका को 2-1 से हरा दिया. रविवार को विशाखापट्टनम में खेले गए आखिरी वनडे मैच में उसने मेहमान टीम को 8 विकेट से हराया. तीन मैचों की इस सीरीज को जीतने के साथ ही भारत ने एक साल में सबसे ज्यादा सीरीज जीतने का अपना पिछला रिकॉर्ड भी तोड़ दिया. ये इस साल भारत की 13वीं सीरीज (तीनों फॉर्मेट) जीत रही. भारत को ये जीत रोहित शर्मा की कप्तानी में मिली. आखिरी वनडे का रोमांच – वनडे सीरीज के आखिरी मैच में भारत ने टॉस जीतकर पहले फील्डिंग को चुना. 15 के स्कोर पर श्रीलंका का पहला विकेट गिर गया. दूसरे विकेट के लिए थरंगा और समरविक्रमा ने 121 रन जोड़े. – एक वक्त पर श्रीलंका का स्कोर 2 विकेट पर 160 रन था और वो बेहद मजबूत लग रही थी. लेकिन अगले 8 विकेट 55 रन के अंदर गिर गए. मेहमान टीम के लिए उपुल थरंगा ने 95 और सदीरा समरविक्रमा ने 42 रन बनाए. – टारगेट का पीछा करने उतरी टीम इंडिया की शुरुआत अच्छी नहीं रही और चौथे ओवर में 14 के स्कोर पर पहला विकेट गिर गया. रोहित शर्मा (7) को 3.4 ओवर में अकीला धनंजय ने बोल्ड कर दिया. – इसके बाद दूसरे विकेट के लिए श्रीलंकाई बॉलर्स को लंबा इंतजार करना पड़ा. दूसरी सफलता उन्हें 22.4 ओवर में मिली जब भारत का स्कोर 149 रन था. श्रेयस अय्यर आउट होने वाले दूसरे बैट्समैन रहे. – इसके बाद भारत का कोई विकेट नहीं गिरा. टीम इंडिया ने 32.1 ओवर में 2 विकेट पर 219 रन बनाकर मैच और सीरीज जीत ली.

शिखर धवन बने वनडे में 4000 रन बनाने वाले भारत के दूसरे सबसे तेज बल्‍लेबाज

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विशाखापट्टनम: श्रीलंका के खिलाफ विशाखापट्टनम में हुआ तीसरा वनडे टीम इंडिया के ओपनर शिखर धवन के लिए विशेष उपलब्धि वाला रहा. धवन ने इस मैच में वनडे क्रिकेट में अपने चार हजार रन पूरे किए. उन्होंने रविवार को वाई. एस. राजशेखर रेड्डी एसीए-वीसीए स्टेडियम में यह खास मुकाम हासिल किया. धवन ने इस मैच में 85 गेंदों में 13 चौके और दो छक्कों की मदद से 100 रन बनाते हुए अपनी टीम को मैच जिताने में भी मदद की. भारत ने श्रीलंका को तीन वनडे मैचों की सीरीज में 2-1 से मात दी और इनको मैंन ऑफ द सिरीज़ से भी नवाजा गया.

धवन ने 95 पारियों में अपने चार हजार रन पूरे किए हैं. उनसे पहले भारतीय बल्लेबाजों में सिर्फ विराट कोहली ने ही कम पारियों में चार हजार रन अपने खाते में डाले. कोहली ने चार हजार रन पूरे करने के लिए 93 पारियां खेली थीं. वहीं कुल पांच खिलाड़ियों ने धवन से कम पारियों में चार हजार रन पूरे किए हैं. उन्होंने इस प्रारूप में 12 शतक लगाए हैं. वह सबसे कम पारियों में 12 शतक लगाने वाले 5वें बल्लेबाज हैं.

 

स्त्री यौनिकता पर विभिन्न देश

स्त्री यौनिकता पर सत्र था, मौक़ा था यूरोप, एशिया और  अफ्रीका में परिवार व्यवस्था में आ रहे बदलाव पर एक कार्यशाला. यूरोप, खासकर सेन्ट्रल यूरोप में परिवार में बढ़ते आजादी के सेन्स और महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता के बीच एक सीधा संबंध है – डेवेलपमेंट स्टडीज, मनोविज्ञान और सोशियोलोजी ने यह स्थापित कर दिया है. यह एक आधुनिक लेकिन स्थापित सच्चाई है. लेकिन क्या महिलाओं की ‘यौन आजादी’ को भी परिवार में आ रहे परिवर्तन के साथ रखकर देखा जा सकता है? जैसे स्त्री की आर्थिक आजादी का परिवार-व्यवस्था और समाज में में हो रहे बदलाव से संबंध है वैसे ही क्या स्त्री की यौन आजादी से इसका कोई संबंध बन सकता है?
कुछ औपचारिक शेयरिंग्स और प्रेसेंटेशन के बाद असली मुद्दे लंच टाइम और काफी ब्रेक में निकले. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बुरुंडी, सीरिया, इथियोपिया, अल्जीरिया, बंगलादेश, भारत और श्रीलंका के रिसर्च-स्कालर्स एकसाथ भोजन पर बैठे. अफगानिस्तान से आये मित्र अपना अनुभव बता रहे थे कि काबुल में उनके अध्ययन और अनुसंधान के दौरान उन्होंने दो महत्वपूर्ण बातें नोट कीं जो स्त्री यौनिकता के बारे में पुरुषों के ख्याल और उसके सामाजिक परिणाम से जुडती हैं.
अफगान विद्वान् ने बताया कि एक अध्ययन के दौरान अफगान युवकों को पोर्न फिल्मे दिखाई गयीं और उसपर उनकी प्रतिक्रियाएं नोट की गईं. उन्होंने बताया कि आजकल के अफगान युवक ये देखकर हैरान रह जाते हैं कि सेक्स के दौरान कोई स्त्री कैसे आनंदित हो रही है? उन युवकों में आपस में ये बड़ी चर्चा का विषय बन जाता है कि ये तो पुरुष के आनन्द का विषय है स्त्री को भी इसमें आनंद होता है क्या? अफगान विद्वान् ने कहा कि ये नया बदलाव है. सत्तर के दशक में कुछ ऐसे अध्ययन हुए हैं जिनमे तत्कालीन अफगान समाज के युवक सेक्स के दौरान स्त्रीयों के आनंदित होने को आश्चर्य से नहीं देखते थे बल्कि उसे सहज स्वीकार करते थे.
इस बात पर पाकिस्तान, बुरुंडी, सीरिया, इथियोपिया से आये विद्वानों ने भी सहमती जताई कि ये बदलाव उनके समाज में भी जरुर हुआ है. अब के अफगान, पाक या सीरियाई युवकों में स्त्री की यौनिकता और यौन स्वतन्त्रता को लेकर जो विचार बदले हैं वे असल में इन समाजों के पतन की अचूक सूचना है. अब उनके समाज में स्त्री के मनोविज्ञान, उसकी भावनाओं, उसकी स्वतन्त्रता या उसके अस्तित्व मात्र पर पुरुषों के विचार बहुत नकारात्मक ढंग से बदल गये हैं.
एक अन्य उदाहरण देते हुए अफगान मित्र ने बात और साफ़ की, आजकल अफगान समाज में एक चलन बढ़ रहा है, हालाँकि अभी भी सीमित है लेकिन धीरे-धीरे बढ़ रहा है. अफगान समाज में कुछ कबीलों में कुछ पिछड़े इलाकों में अब भाई अपनी बहन की शादी में नहीं जाना चाहते. पिता या चाचा ताऊ या मामा इत्यादि बुजुर्ग लोगों को जाना अनिवार्य है लेकिन वे भी बेमन से उस समारोह में हिस्सा लेते हैं. इसका कारण बताते हुए उन्होंने एक गजब की बात बताई.
बात ये है कि बहन की शादी में दुल्हे के साथ आये हुए युवक जिस तरह से नाचते गाते और अपनी मर्दानगी या अधिकार का प्रदर्शन करते हैं वो दुल्हन के भाई या पिता के लिए बहुत अपमानजनक होता है. दूल्हे के साथ आई पूरी टोली अपने आप को दुल्हा समझती है और उनकी नजरों से, हाथों के इशारे से, चेहरे के हाव भाव से वे बस सेक्स के इशारे और सेक्स से जुड़े मजाक करते रहते हैं, जैसे कि पूरी टोली किसी सामूहिक सुहागरात के लिए आयी हो. ये सब देखना कम से कम दुल्हन के भाई के लिए बहुत अपमानजनक होता है. इसलिए आजकल कुछ कबीलों में कुछ पिछड़े इलाकों में बहन की शादी में अफगान युवकों के नदारद हो जाने का चलन बढ़ रहा है.
लेकिन मजे की बात ये है कि ये ही भाई, चाचा ताऊ और मामा लोग जब अपने परिवार या कबीले के पुरुष की शादी में जाते हैं तो वो सारी नंगाई करते हैं जिससे खुद उन्हें चिढ होती है. मतलब ये कि उनके बहन या बेटी की शादी में जो चीजें उन्हें शर्मिन्दा करती हैं वही चीजें उनके पुरुष दोस्त या पुरुष रिश्तेदार की शादी के दौरान मर्दानगी दिखाने का हथियार बन जाती हैं.
अब गौर कीजिये इन तीन घटनाओं में सीधा संबंध है. पोर्न देखते हुए अफगान युवकों का स्त्री के आनंदित होने पर आश्चर्य व्यक्त करना और अपनी बहन के विवाह में गुलच्छर्रे उड़ा रही बरात के सामने खुद को अपमानित महसूस करना और इसी तरह की बारात में कभी खुद शामिल होकर नंगाई के नाच करने में आनंद लेना –  ये मूल रूप से उनके समाज में स्त्री पुरुष संबंधों के पतन सहित स्वयं उस समाज के सभ्यतागत और नैतिक पतन का सबूत है.
सत्तर के दशक में अफगान बाड़े में सोवियत-अमेरिकी सांडों की लड़ाई के पहले और धार्मिक आतंक के भूत के प्रवेश के पहले जो अफगान समाज था वो एकदम भिन्न था. तब स्त्रीयां स्कर्ट या जींस पहनकर विश्वविद्यालयों में पढ़ती थीं या स्मोक कर सकती थीं. तब लड़कियों के म्यूजिक बैण्ड भी हुआ करते थे. समाज में प्रेम संबंध और मित्रता बहुत आसान थी. आज के अफगानिस्तान में अब लड़का लड़की आपस में बात करना तो दूर एक दुसरे की तरफ देख भी नहीं सकते. पर्दा और बुर्का लगभग औरत की चमड़ी ही बन गये हैं, उन्हें हटाना मुश्किल है. स्त्रीयां खुद अपनी गुलामी के बारे में कोई विचार बना पाने में सक्षम नहीं रह गयी हैं.
जब अफगान और पाक विद्वानों ने भारत के पिछले कुछ सालों में घटी घटनाओं पर टिप्पणी की तो उन्होंने जोर देकर कहा कि बॉस भारत का समाज भी अफघानिस्तान सीरिया होने की तरफ बढ़ रहा है. जिस तरह से स्त्रीयों को पर्दा, नैतिकता, सच्चरित्रता आदि का पाठ पढाया जा रहा है और जिस तरह से स्त्री पुरुष संबंधों और स्त्रीयों की आजादी को नियंत्रित करने का प्रयास हो रहा है, ठीक वैसा ही अफगानिस्तान पाकिस्तान में में धार्मिक आतंक के भूत के उभार के दौरान हुआ था. ख़ास तौर से जब स्त्री के चरित्र से जुड़े मुद्दे, स्त्री की यौनिकता के नियन्त्रण से जुडी रणनीति अगर आपके राष्ट्रवाद से या आदर्ष समाज की कल्पना से जुड़ने लगें तो समझ लीजिये कि आपका समाज एक गहरे खतरे की तरफ बढ़ रहा है. अगर ये अगले पांच दस सालों में नहीं रुका तो आपके समाज में भी अफगानिस्तान और सीरिया का जन्म होने वाला है.

चमड़ा उद्योग वालों के लिए बड़ी खबर

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नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चमड़ा और फुटवेयर क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा देने के लिए 2,600 करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दी है. इसके साथ ही डेबिट कार्ड, भीम यूपीआई या आधार से जुड़ी भुगतान प्रणालियों के जरिये 2,000 रुपये तक के लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट दर (एमडीआर) में भी राहत दी गई है. इसके अलावा कई विधेयकों सहित अनुबंधों के प्रवर्तन को आसान बनाने के लिए विशेष राहत कानून में संशोधन को भी मंजूरी दी गई है.

इसमें चमड़ा फुटवेयर और सहायक क्षेत्रों में कर्मचारियों की भविष्य निधि में सरकार की ओर से किया जाने वाला अंशदान भी शामिल है. सरकार इन क्षेत्रों में 15,000 रुपये मासिक वेतन वाले सभी नए कर्मचारियों के भविष्य निधि में नियोक्ता के अंशदान में 3.67 फीसदी का योगदान देगी. हालांकि यह अंशदान कर्मचारी भविष्य निधि संगठन में शामिल होने के पहले तीन साल तक ही मिलेगा.

असल में टेक्सटाइल क्षेत्र को दिए गए पैकेज की तरह ही सरकार ने चमड़ा उद्योग में भी औद्योगिक इम्प्लॉयमेंट (स्थायी आदेश) कानून, 1946 के अंतर्गत नियत अवधि के रोजगार को लागू करने का निर्णय किया है. विशेष पैकेज में श्रम कानूनों को आसान बनाने के उपायों को भी शामिल किया गया है.

 

एक मिनट के एक करोड़ लेती हैं प्रियंका चोपड़ा

नई दिल्ली बॉलीवुड से हॉलीवुड तक पहुंच गई प्रियंका चोपड़ा काफी महंगी हो गई हैं. मीडिया में इन दिनों इस बात की चर्चा जोरों पर है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रियंका चोपड़ा सिने अवॉर्ड में हिस्सा लेने इंडिया आ रही हैं. इसमें परफार्मेंस के लिए प्रियंका ने एक मिनट के लिए 1 करोड़ रुपए मांगे हैं. इन अवार्ड शो में प्रियंका के पांच मिनट परफार्मेंस की बात कही जा रही है, जिसके लिए वो 4 से 5 करोड़ रुपए फीस लेंगी.

खबर के मुताबिक जी सिने अवार्ड में वह 19 दिसंबर को हिस्सा लेने आएंगी, इसका टीवी पर प्रसारण नए साल के मौके पर अगले महीने दिखाया जाएगा. बता दें कि प्रियंका इन दिनों हॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग में बिजी हैं. उनकी अपकमिंग हॉलीवुड फिल्म ‘Isn’t It Romantic’ और ‘A Kid Like Jake’ आने वाली है.

 

जिग्नेश मेवाणी के विधानसभा क्षेत्र में दुबारा होगी वोटिंग

jignesh mewaniगांधीनगर तकनीकी गड़बड़ी के बाद चुनाव आयोग ने गुजरात के छह केंद्रों पर फिर से मतदान करने का आदेश दिया है. इन सभी मतदान केंद्रों पर दूसरे चरण का मतदान हुआ था. इसमें युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के विधानसभा के क्षेत्र भी शामिल हैं। निर्वाचन आयोग ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए शुक्रवार रात दोबारा चुनाव कराने के आदेश दिए और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में मौजूद डेटा को हटा दिया.

जिन विधानसभा क्षेत्रों में दुबारा मतदान होना है उनमें- वाडगाम विधानसभा क्षेत्र की छानियां -1 और छानियां -2, विरमगाम विधान सभा के बूथ नंबर 27, दस्करोई विधानसभा के नवा नारोदा मतदान केंद्र, सावली क्षेत्र के नहारा -1 और सकरदा -7 में दोबारा के लिए चुनाव कराए गए आदेश दिए गए. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने वडगाम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा है.

पिता राजीव गांधी को कितना याद करते होंगे राहुल

राहुल गांधी आज औपचारिक तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाल लेंगे. राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान ऐसे वक्त में मिल रही हैं, जब पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. लोकसभा चुनाव में 50 सीटों के नीचे तो कांग्रेस 2014 में ही आ गई थी लेकिन उसके बाद एक-एक कर राज्यों से उसकी सत्ता भी चली गई जिससे पार्टी औऱ कमजोर हो गई है. आज जब राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान संभाल ली है, जाहिर सी बात है कि उनको पिता राजीव गांधी याद आते होंगे.

 दोनों की जिंदगी में काफी समानताएं हैं. राजीव गांधी राजनीति में नहीं आना चाहते थे. अगर असमय संजय गांधी की मौत न हुई होती तो राजीव शायद एक फैमिली मैन बनकर एयर इंडिया के पायलट ही बने रहते इसी तरह राहुल गांधी भी काफी ऊहापोह के बाद राजनीति में आएं. राजीव गांधी ने अपनी मां इंदिरा को असमय खो दिया और जब राजीव गांधी की मौत हुई तो राहुल बच्चा कहे जाने की उम्र से थोड़े ही बड़े थे. राजीव गांधी को पिता का प्यार नहीं मिला. ऐसे ही राहुल गांधी को भी पिता राजीव का प्यार नहीं मिल पाया. परिवार में उनके साथ सिर्फ मां सोनिया और बहन प्रियंका ही थे. इन दोनों के अलावा राहुल गांधी के सामने हथियारबंद सुरक्षाकर्मी और अनजाने चेहरों वाले नेताओं की फौज थी.

राजीव गांधी ने राजनीति अपनी मां से सीखी, उसी तरह जब राहुल गांधी राजनीति में उतरें तब उनकी भी गुरू के रूप में मां सोनिया ही मौजूद थीं. राहुल गांधी जब राजनीति में आएं तो भले ही विपक्ष वाले उनपर हंसते हों, उन्हें कमतर दिखाने के लिए उन्हें विभिन्न नामों से संबोधित करते हों, लेकिन 2004 में राजनीति में आने के बाद बीते 13 सालों में उन्होंने खुद को साबित किया है, इसमें कोई शक नहीं है. राहुल चाहते तो कब का देश का प्रधानमंत्री बन गए होते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया आप खुद से पूछिए, भारत में कितने ऐसे राजनेता हैं जो यह मौका गंवाने को तैयार होंगे.

आज जब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं तो जाहिर है कि उनके सामने ढेर सारी चुनौतियां हैं. लेकिन अध्यक्ष पद पर ताजपोशी की प्रक्रिया में सामने आए गुजरात के चुनाव में राहुल गांधी ने भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जिस तरह घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है, उससे यह साफ है कि राहुल को हल्के में नहीं लिया जा सकता. जाहिर है 2019 में केंद्र की सत्ता के लिए होने वाला संघर्ष शानदार होगा. जब राहुल पहली बार लोगों के बीच आए थे तो अखबारों में एक हेडलाइन समान थी, “यह तो बिल्कुल अपने पापा की तरह दिखता है”. कांग्रेसी चाहेंगे कि राहुल अपने पिता की तरह ही पार्टी के अध्यक्ष और फिर देश के प्रधानमंत्री बनें.

 

‘सिंह’ सरनेम पर संघर्ष को उतारू क्षत्रिय

पश्चिमी राजस्थान में दलितों और क्षत्रिय सवर्णों के मध्य सिंह शब्द के इस्तेमाल को लेकर कटुता खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है. विशेष रूप से जालोर जिले से ऐसी खबरें आ रही हैं, जहाँ पर कुछ दलित युवाओं द्वारा अपने नाम के साथ सिंह लिख देने के कारण उन्हें भयंकर अपमान और उत्पीड़न झेलना पड़ रहा है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार नपसा बौद्ध विराना, पदम सिंह मेघवाल तथा ओयाराम बोरटा को इस बात के लिए असंख्य गालियां दी गई है कि वे गैर राजपूत हो कर सिंह, ठिकाना, बना और सा जैसे शब्द क्यों इस्तेमाल कर रहे है ? इनके डी एन ए पर सवाल उठाए गए है और सोशल मीडिया पर यहां तक भी लिख कर पूछा गया है कि उन्हें पैदा करने के लिए उनकी माँ किसी क्षत्रिय के साथ सोई क्या? बात यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि उपरोक्त युवकों को मोबाईल पर जान से मारने की धमकियां भी दी गयी और उनसे माफीनामें लिखवाए गए है, गांव से बहिष्कृत किया गया है और माफी मांगते हुए वीडियो बनवा कर उन्हें वायरल किया गया है. दलित अत्याचार की ऐसी बानगी शायद राजस्थान के अलावा अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगी.

कुछ साल पहले पाली जिले के जाडन निवासी चुन्नी लाल मेघवाल को सिर्फ इस बात के लिए सामंती तत्वों ने पीट पीट कर मार डाला, क्योंकि उसने अपनी बेटी का नाम बाईसा रख लिया था, अपने पति की निर्मम हत्या का सदमा पत्नी सह नहीं पाई और वह भी चल बसी. जिस बेटी को चुन्नी लाल बाईसा के रूप में पाल-पोस कर बड़ा करना चाहता था, वह पागल हो गयी! यह तो बानगी भर है. सामंती अत्याचार की इससे भी भयानक अमानवीय उत्पीड़न की कहानियां पश्चिमी राजस्थान के गांव-गांव में बिखरी पड़ी है. दलित महिलाओं से बलात्कार, खाट पर नहीं बैठने देने, बिन्दोली में घोड़े पर नहीं चढ़ने देने, वोट नहीं डालने देने, चुनाव नहीं लड़ने देने, सार्वजनिक स्थलों का उपयोग नहीं करने देने, बात बात में निंदनीय भाषा का प्रयोग करके अपमानित करने, बेगार लेने, मारपीट करने और जान तक ले लेने के प्रकरण अक्सर दर्ज किए जाते हैं. राजस्थान दलित समुदाय के प्रति नफरत, छुआछूत, भेदभाव, शोषण तथा अन्याय और उत्पीड़न का आज भी गढ़ बना हुआ है.

यह बात कितनी शर्मनाक है कि शब्द भी कुछ जातियों ने आरक्षित कर रखें हैं, उनको लगता है कि सिंह जैसे सर नेम सिर्फ उन्हीं के लिए बनाया गया है. अगर इसका इस्तेमाल कोई दलित कर दे तो यह दण्डनीय अपराध है. शायद इसीलिए नरपत बौद्ध को नपसा लिखने, फेसबुक पर घोड़े पर सवार प्रोफ़ाइल फ़ोटो लगाने की सज़ा दी गई है.

जालोर जिले के राजपूत और दलित युवा बुरी तरह से सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर एक दूसरे से उलझे हुए हैं कि सिंह कौन लगा सकता है और कौन नहीं? ऐसी चीज़ें उनकी प्रगति में बाधक ही साबित होगी ,अपने नाम के साथ कुछ भी लिखने का अधिकार उन्हें भारत का संविधान देता है और इस पर कोई रोक नहीं लगा सकता है. राजस्थान के विगत एक सदी के इतिहास में कईं गैर राजपूत समुदायों ने स्वयं का क्षत्रियकरण किया है और अपने नामों से राम, लाल, चंद, मल हटा कर सिंह लगा लिये उससे राजपूत समुदाय का क्या नुकसान हुआ? क्या इससे उनके अस्तित्व, गरिमा अथवा मान सम्मान पर किसी प्रकार का अतिक्रमण हुआ? नहीं हुआ, समाजशास्त्री इसे संस्कृतिकरण की प्रक्रिया कहते हैं, जो सतत चलती रहती है. कईं समुदाय ब्राह्मण बने, कुछ वैश्य और कुछ क्षत्रिय तो कुछ गैर हिन्दू समुदायों से जा मिले, यह चलता रहेगा, किसी भी समुदाय को इस प्रक्रिया से भयभीत नहीं होना चाहिए, इससे किसी का अस्तित्व मिटने वाला नहीं है.

यह व्यर्थ का विवाद है, जिसमें अपनी ऊर्जा बिल्कुल भी नष्ट नहीं करनी चाहिए. दलित युवाओं के लिए किसी और समुदाय की नकल करने या मंदिरों में घुसने के आंदोलन करने का समय नहीं है. समय विकट है, दूर की सोच के साथ बड़ी चीजें करने का स्वप्न लेने का समय है. उन्हें साकार करने में जुट जाने का समय है. हम मेहनतकश समुदाय हैं, हमारी अपनी संस्कृति और सभ्यता और विचारधारा है. हमें किसी से भी कोई शब्द या पहचान उधार लेने की जरूरत नहीं है.

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता है.)

गुजरात चुनाव पर इस बड़े चुनावी विश्लेषक की राय सबसे अलग

rahul-hardikगुजरात। गुजरात चुनाव के दूसरे चरण के मतदान के बीच चुनाव में तमाम दलों की स्थिति को लेकर अनुमान सामने आने लगे हैं. चुनाव की पूर्व संध्या पर 13 दिसंबर को चुनाव विश्लेषक योगेन्द्र यादव ने गुजरात को लेकर अपना चुनावी सर्वेक्षण जारी किया है. इस सर्वेक्षण में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती की बात कही गई है. अपने सर्वेक्षण में योगेन्द्र यादव ने गुजरात में तीन स्थिति होने की बात कही है.

यादव के मुताबिक पहली स्थिति में भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर की बात कही जा रही है. इसके मुताबिक गुजरात चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों को 43 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं. हालांकि दोनों के सीटों में अंतर रहेगा. समान वोट प्रतिशत होने के बावजूद भाजपा को 86 सीटें मिलेंगी जबकि कांग्रेस उससे 6 सीट ज्यादा रहेगी. कांग्रेस के हिस्से में 92 सीट आने की संभावना जताई गई है.

 यादव के मुताबिक जो दूसरी स्थिति बन सकती है, उसमें भाजपा को 41 प्रतिशत जबकि कांग्रेस को 45 प्रतिशत वोट मिलने की संभावना है. यहां वोट प्रतिशत के साथ दोनों की सीटों में काफी परिवर्तन देखने को मिल सकता है. यह अंतर तकरीबन 50 सीटों का होने का अनुमान है. यादव के मुताबिक ऐसी स्थिति में कांग्रेस को 113 सीटें मिलेंगी, जबकि भाजपा के हिस्से में 65 सीटें आएंगी.

यादव ने जो तीसरी संभावना जताई है वह भाजपा के लिए बुरी खबर साबित हो सकती है. इसके मुताबिक गुजरात चुनाव में जिस तरह से भाजपा के खिलाफ तमाम वर्गों के लोगों में गुस्सा है, वह प्रदेश से भाजपा का सूपड़ा साफ कर सकती है. इस बात की संभावना ज्यादा है, क्योंकि गुजरात में दलित, आदिवासी, पाटीदार और व्यापारी वर्ग के भाजपा के खिलाफ होने की खबर है. हालांकि 18 दिसंबर को चुनाव के नतीजे आने के बाद साफ हो जाएगा कि यह विश्लेषण सच के कितना करीब बैठता है.

रंग लाया आंदोलन, फिर से बनेगी बाबासाहेब की प्रतिमा

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सारण। बिहार के मशरक स्थित टोटहा जगतपुर में स्थापित बाबासाहेब की प्रतिमा को तोड़ने के बाद जिले भर के अम्बेडकरवादियों द्वारा किया गया आंदोलन रंग ले आया है. सारण के डीएम हरिहर प्रसाद ने जगह की जांच कर फिर से प्रतिमा बनाए जाने का आदेश दिया है. घटना के बाद भड़के विरोध से सकते में आए जिलाधिकारी ने भवन निर्माण विभाग के इंजीनियर के साथ बैठक की. इसमें डीएम ने प्रतिमा स्थल की जांच करने औऱ कोई परेशानी आने की स्थिति में उसे दूर करते हुए फिर से प्रतिमा बनाए जाने का आदेश दिया. जिलाधिकारी ने चौराहे को विकसित करने का भी निर्देश दिया है.

जिला प्रशासन द्वारा इस तरह की सूचना आने के बाद जिले भर के अम्बेडकरवादियों में काफी उत्साह है. घटना के बाद से ही पूरे छपरा जिले में आंदोलन भड़क गया था. लोगों ने पूरे छपरा जिले में सड़क पर प्रदर्शन किया. उन्होंने रेल से लेकर रास्ता तक रोक दिया. अम्बेडकरवादियों के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था क्योंकि प्रतिमा का विखंडन सीधे तौर पर बाबासाहेब का अपमान था. मामले में इसलिए भी दबाव बन पाया क्योंकि जिले भर के अम्बेडकरवादी संगठन साथ आ गए थे.

साझा विरोध की वजह से ही एक के बाद एक लगातार अधिकारी घटनास्थल का दौरा करते रहें. मशरक के बीडीओ रंजीत कुमार सिंह ने उस स्थल का जायजा लिया और बाबा साहेब की मूर्ति बनवाने के लिए उच्चाधिकारी के पास पत्र भेजा. इसके पहले मढ़ौरा के एसडीओ ने भी मामले की जांच की. इस मामले में संगठनों द्वारा अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला भी दर्ज करवाया गया. बताते चलें कि 10 दिसंबर को सारण के कमिश्नर नर्वदेश्वर लाल ने छपरा जिले के टोटहा जगतपुर पानापुर में बाबासाहेब की प्रतिमा का अनावरण किया था, जिसे उसी रात को जातिवादी गुंडों ने तोड़ डाला था. जिसके बाद जिले भर में आंदोलन भड़क गया था.

रिपोर्ट- नागमणि

टॉपर दलित छात्रों का राष्ट्रपति से पदक लेने से इंकार

Sudhakar Pushker

लखनऊ। लखनऊ स्थित भीमराव अम्बेडकर युनिवर्सिटी के दो टॉपर दलित छात्र राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से गोल्ड मेडल नहीं लेंगे. इन छात्रों का कहना है कि देश भर में लगातार हो रहे दलित उत्पीड़न के कारण उन्होंने यह फैसला लिया है. विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह 15 दिसंबर को होना है, जिसमें मुख्य अतिथि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हैं. जिन दो छात्रों ने इंकार किया है उनके नाम रामेन्द्र नरेश और सुधाकर पुष्कर हैं.

रामेन्द्र नरेश ने 2013 से 2016 में मास्टर इन कम्प्यूटर एप्लीकेशन (एमसीएम) में टॉप किया है. इसके बाद नरेश ने 2017 में बीएड में एडमिशन लिया था. हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय के खिलाफ गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर रामेन्द्र नरेश समेत 8 छात्रों को निष्कासित कर दिया था. वहीं, 2016 के एमफिल मैनेजमेंट के पास आउट छात्र सुधाकर पुष्कर ने भी मेडल लेने से इंकार किया है.

Ramendra Naresh

इन दोनों का कहना है- “देश के साथ-साथ विश्वविद्यालय में लगातार हो रहे दलित उत्पीड़न की वजह से मेरा मन दुखी हो गया है. इस उत्पीड़न के न रुकने के कारण दलित समाज के साथ बीबीएयू में दलित छात्र व प्रोफ़ेसर दोनों परेशान हैं. मैं ऐसे मेडल को लेकर क्या करूंगा जब मेरे दलित भाईयों को हीनभावना से देखा जाता है और उनको विभिन्न ढंग से प्रताड़ित किया जाता है. हम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो आर सी सोबती के द्वारा मेडल तभी स्वीकार करेंगे जब विश्वविद्यालय के साथ-साथ संपूर्ण भारत में दलितों को सम्मान और बराबरी की दृष्टि से देखा जाएगा.”

असल में बीबीएयू के दलित छात्र दलित अत्याचार और बीबीएयू में हो रहे दलित विद्यार्थियों के साथ भेदभाव को लेकर लगातार मुखर रहते हैं. दलित उत्पीड़न के मुद्दे पर ही 2014 में दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी विरोध किया जा चुका है. तब राम करन निर्मल और उनके साथियों ने मोदी गो बैक के नारे लगाए थे. उस समय रोहित वेमुला के सुसाइड का मामला गरमाया था. उसी को लेकर छात्रों ने विरोध जताया था. इस बार दोनों छात्रों के इंकार के बाद बीबीएयू प्रशासन भी सतर्क है. दीक्षांत सामरोह में उन्हीं छात्रों को शामिल किया जाएगा जिन्हें पास मिला होगा.

फॉलोअपः मशरक में प्रतिमा तोड़ने वालों की एसआईटी जांच की मांग

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छपरा। जिले के मशरक प्रखंड के कर्णकुदरिया में बाबा साहेब के प्रतिमा तोड़े जाने के मामले में विवाद बढ़ता जा रहा है. घटना के बाद अम्बेडकरवादी संगठन लगातार सक्रिय हैं. मुख्यालय पर अम्बेडकर रविदास महासंघ के तत्वाधान में शहर के मालाखाना चौक स्थित अम्बेडकर स्मारक स्थल पर बैठक किया गया, जिसमें बाबा साहेब के प्रतिमा तोड़े जाने की निंदा की गई.

इस अवसर पर अम्बेडकरवादियों ने वरीय पुलिस पदाधिकारियों को एसआईटी गठित कर मामले की जांच की मांग की है. उन्होंने प्रतिमा तोड़ने वाले को गिरफ्तार कर जेल भेजने व उन्हें देशद्रोही घोषित करने की मांग की है.

वक्ताओं ने जिला प्रशासन से बाबासाहेब के नव स्थापित प्रतिमा स्थल पर सरकारी खर्च से नया प्रतिमा स्थापित करने की मांग की है. उन्होंने कहा कि अगर समय रहते यथाशीघ्र डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमा स्थापित नहीं की गई तो संघ चरणबद्ध आंदोलन करेंगी और इसकी पूरी जवाबदेही जिला प्रशासन की होगी. उधर डॉ. बीआर अंबेडकर परिगणित जाति कल्याण संघ की बैठक धर्मनाथ राम की अध्यक्षता में की गई. इसमें बाबासाहेब के प्रतिमा खंडित करने की घोर निंदा करते हुए असामाजिक तत्वों को चिन्हित कर यथाशीघ्र गिरफ्तार करने की मांग की गई.

बाबासाहेब के अपमान को लेकर महाराष्ट्र के भंडारा में तनातनी जारी

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भंडारा। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस के दिन महाराष्ट्र के भंडारा में कुछ ऐसा हुआ कि पूरे शहर के अम्बेडकरवादी सड़कों पर उतर आएं. दरअसल परिनिर्वाण दिवस होने की वजह से भंडारा के जवाहरनगर स्थित आयुध निर्माणी में काम करने वाले अम्बेडकरवादी कर्मचारियों ने बाबासाहेब को श्रद्धांजली देने का कार्यक्रम आयोजित किया था. जिसकी वजह से दो कर्मचारियों को अपनी सीट पर पहुंचने में जरा सी देर हो गई.

भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन आने वाले इस आयुध फैक्ट्री के अधिकारी सैन्की बग्गा ने इस पर दोनों कर्मचारियों को काफी फटकार लगाई. कर्मचारियों का आरोप है कि जब उन्होंने परिनिर्वाण दिवस का हवाला देकर देरी की वजह बताई तो इस पर ग्रुप ए कर्मचारी बग्गा और भड़क गया. उसने न सिर्फ दोनों कर्मचारियों को भला बुरा कहा, बल्कि बाबासाहेब के बारे में भी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी.

डॉ. अम्बेडकर के बारे में अभद्र टिप्पणी सुनते ही दोनों कर्मचारियों ने तुरंत बग्गा का विरोध करते हुए अन्य कर्मचारियों को सूचित किया. बात बाबासाहेब के अपमान से जुड़ी थी सो तुरंत आग की तरह फैल गई. भंडारा में मौजूद अन्य अम्बेडकरवादी संगठनों ने भी कर्मचारियों से मिलकर अधिकारी पर कार्रवाई करने की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया. इस बारे में संविधान निर्माता और भारत रत्न के अपमान को लेकर नजदीकी पुलिस थाने में शिकायत भी दर्ज कराई गई.

घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने ग्रुप ए अफसर बग्गा पर अनुसूचित जाति /जनजाति अधिनियम तथा अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिय, हालांकि अग्रिम जमानत ले लेने के कारण बग्गा की गिरफ्तारी नहीं हो सकी. लेकिन कर्मचारियों ने बग्गा को निलंबित करने की मांग लेकर मोर्चा खोल दिया है. जिसके बाद आयुध निर्माणी प्रशासन का कहना है कि उसने निलंबन के प्रस्ताव को कोलकात्ता बोर्ड को भेज दिया है. हालांकि अभी तक अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुआ है. दूसरी ओर इस पूरे मामले में जिले भर के अम्बेडकरवादी संगठन साथ आ गए हैं और मामले पर नजर बनाए हुए हैं. उनका कहना है कि अगर बाबासाहेब का अपमान करने वाले अधिकारी सैंकी बग्गा पर कार्रवाई नहीं होगी तो वो बड़ा आंदोलन करेंगे, जिसके बाद प्रशासन के हाथ पांव फूले हुए हैं.

आडवाणी को एक और झटका देने की तैयारी में मोदी

आडवाणी और मोदी

नई दिल्ली। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भले ही किसी के अच्छे दिए आए हो या न आए हो, भाजपा के पूर्व दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी के लिए बुरे दिन जरूर आ गए. मोदी ने पहले आडवाणी को सिर्फ एक सांसद तक सीमित कर दिया तो वहीं राष्ट्रपति बनकर राजनीति से गरिमापूर्ण विदाई की उनकी उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया. इसी कड़ी में मोदी आडवाणी को एक बड़ा और आखिरी झटका देने की तैयारी में हैं.

खबर है कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह जल्द ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के संयोजक बन सकते हैं. 15 दिसंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान एनडीए संसदीय दल के नेता यानि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका फैसला ले सकता है. अगर ऐसा होता है तो संसद में लालकृष्ण आडवाणी को अपना कमरा खाली करना पड़ सकता है.

संसद भवन में ग्राउंड फ्लोर पर एनडीए संयोजक के लिए एक कमरा आवंटित है. इस कमरे में फिलहाल आडवाणी बैठते हैं. चूंकि लालकृष्ण आडवाणी अभी एनडीए या भाजपा में किसी पद पर नहीं है ऐसे में अमित शाह के आने के बाद एनडीए संयोजक के लिए आवंटित कमरा उन्हें खाली करना होगा.

इससे पहले जब 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आई थी उस वक्त भी आडवाणी के कमरे के बाहर से उनकी नेम प्लेट हटा ली गई थी. ऐसे में आडवाणी भाजपा सांसदों के लिए आबंटित कमरे में ही एक कोने में सोफे पर आकर बैठ गए थे. पार्टी में काफी भीतरी घमासान के बाद तीन दिन के बाद उन्हें बैठने के लिए एनडीए अध्यक्ष का कमरा दिया गया था. अब चूंकि अमित शाह का एनडीए संयोजक बनना लगभग तय है तो आडवाणी को कमरा खाली करना पड़ेगा.

गुजरात चुनाव को कितना प्रभावित करेंगे युवा त्रिमूर्ति

hardik-jigneshअहमदाबाद गुजरात में चुनाव प्रचार थमने के बाद अब बारी मतदाताओं की है. दूसरे चरण में राज्य के 14 जिलों की 93 सीटों पर 14 दिसंबर यानि कल वोटिंग होनी है. जहां चुनाव होने हैं, उनमें मध्य गुजरात में अहमदाबाद, दाहोद, खेड़ा, आणंद, पंचमहल और वडोदरा जिले हैं. जबकि उत्तर गुजरात में गांधीनगर, बनासकांठा, साबरकांठा, अरवली, मेहसाना, छोटा उदयपुर अलवल्ली और पाटन जिले में चुनाव होना है. दूसरे दौर की 93 सीटों में से 54 सीटें ग्रामीण क्षेत्र की हैं, तो वहीं 39 सीटें शहरी है.

2012 के चुनाव की बात करे तो शहरी सीटों पर भाजपा मजबूत रही जबकि ग्रामीण सीटों पर कांग्रेस का प्रभाव रहा. लेकिन इस बार सियासी माहौल बदला हुआ है. और इसमें सबसे बड़ी भूमिका उन तीनों युवाओं की है, जो आंदोलन की राह पकड़ कर चुनावी राजनीति में उतर गए हैं.  आखिरी चरण में इन तीनों युवा नेताओं यानि की हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर की असली परीक्षा है. जहां तक ओबीसी नेता अल्पेश की बात है तो कांग्रेस में शामिल होने के बाद वह खुद अपने 7 समर्थकों के साथ चुनावी मैदान में हैं. ऐसे में अल्पेश के सामने इन सभी सीटों पर चुनाव जीतने का दबाव होगा, क्योंकि यह जीत गुजरात की राजनीति में उनके कद को नापेगी.

 वहीं दूसरी ओर दलित नेता जिग्नेश मेवाणी कांग्रेस के साथ मिलकर ही वडगाम सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन भाजपा की घेराबंदी के बाद वह चुनाव प्रचार के लिए अपनी सीट से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. उनके सामने दलित वोटों को कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद करने की चुनौती होगी. तीनों युवाओं में सबसे ज्यादा प्रभाव डालने वाले युवा तुर्क हार्दिक पटेल हैं और भाजपा सबसे ज्यादा इन्हीं से डरी हुई है. इस पाटिदार युवा नेता ने भाजपा के खिलाफ जोरदार ढंग से झंडा बुलंद किया है. इस दौर में वहीं चुनाव होने हैं, जो इलाके पटेल आरक्षण आंदोलन की गवाह बनी थी. देखना होगा कि भाजपा के रथ को रोकने में ये तीनों युवा तुर्क कितने कामयाब हो पाते है.

विराट कोहली और अनुष्का शर्मा की शादी की पूरी रिपोर्ट

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नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान और फ़िल्म अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की शादी की खबरों के बीच 11 दिसम्बर को रात 8.51 मिनट पर दोनों सेलिब्रेटिज ने एक साथ ट्वीट कर अपनी शादी की खबर पर मुहर लगा दी. इन दोनों ने शादी के लिए इटली को चुना. यहां फ्लोरेंस में दुनिया की दूसरी सबसे महंगी जगह पर दोनों ने शादी रचाई.

जिस रिसोर्ट में इन दोनों ने शादी रचाई वो आमतौर पर दिसम्बर में बंद रहता है लेकिन जाहिर सी बात है कि जब बात भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान की हो तो ताले खुल ही जाते हैं. शादी की घोषणा वाले ट्वीट को अब तक लाखों लोग लाइक कर चुके हैं तो हजारों लोगों ने इसे रि-ट्वीट भी किया है. इसी तरह विराट और अनुष्का की शादी के बाद फ़िल्म और खेल जगत की तमाम हस्तियों ने ट्वीट कर इन्हें बधाई दी है.

फ़िल्म जगत के दिग्गज नेता अमिताभ बच्चन तो वहीं क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर ने भी दोनों को नई जिंदगी की बधाई दी है. फिलहाल खबर यह है कि ये दोनों 21 दिसम्बर को दिल्ली में और 26 दिसम्बर को मुम्बई में रिसेप्शन करेंगे.

भाजपा विधायक की इसी तस्वीर पर हुआ है बवाल

मध्यप्रदेश के दलित विधायक गोपीलाल जाटव, इसी फोटो पर विवाद हुआ है

नई दिल्ली। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर घूमती एक तस्वीर ने राजनीति में भीतर तक घुसे जातिवाद का घिनौना चेहरा सामने ला दिया है. तस्वीर सामने आने के बाद भाजपा में भी हलचल मच गई है. दरअसल ये तस्वीर मध्य प्रदेश की है. इसमें मध्य प्रदेश के परिवहन मंत्री भूपेंद्र सिंह और विदिशा के जिला पंचायत अध्यक्ष तोरण सिंह स्टील की थाली में भोजन कर रहे हैं, जबकि  उन्हीं के साथ बैठे दलित विधायक गोपीलाल जाटव पत्तल में भोजन कर रहे हैं.

तस्वीर पिछले 3-4 दिनों से सोशल मीडिया में वायरल हो रही थी. मीडिया में तस्वीर सामने आने के बाद भाजपा बैकफुट पर है. बचाव के लिए उसने दलित विधायक को ही सामने कर दिया है. यानी कि पीड़ित खुद भेदभाव करने वालों के बचाव में आया है. भाजपा विधायक जाटव इस फोटो को वायरल किए जाने को ‘राजनीतिक हथकंडा’ बता रहे हैं. उनके मुताबिक, तोरण सिंह के अचानक आने पर उन्होंने अपनी स्टील की थाली उनकी ओर बढ़ा दी, क्योंकि वे अतिथि थे. उसके बाद कई लोगों ने पत्तल में ही खाना खाया.

लेकिन दलित विधायक का यह बयान गले नहीं उतर रहा है. क्योंकि बीते शुक्रवार को परिवहन मंत्री भूपेंद्र सिंह और विदिशा जिला पंचायत के अध्यक्ष तोरण सिंह के साथ अशोकनगर से विधायक गोपीलाल जाटव कार्यक्रम में साथ थे. सभी के लिए एक स्थान पर भोजन की व्यवस्था भी थी. कार्यक्रम के बाद सभी खाना खाने गए. जहां मंत्री और जिला पंचायत अध्यक्ष दोनों तो स्टील की थाली में खाना खा रहे हैं, वहीं जाटव पत्तल में खाना खाते हुए दिख रहे हैं. दलित विधायक की सफाई के बावजूद सवाल यह है कि क्या मंत्री-विधायक के कार्यक्रम में आयोजक सिर्फ दो ही थालियों का प्रबंध कर सके होंगे यह बात गले से नहीं उतरती है.

वैसे भी जिस देश में दलित सांसद ही आरक्षण का बिल संसद में फाड़ देते हों वहां वो राजनीतिक दलों के कितने बड़े “यस मैन” हैं इसको साबित करने के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं है. इस घटना ने ये भी साबित कर दिया है कि भाजपा के सवर्ण नेता अपने दलित विधायकों और सांसदों के बारे में कैसी सोच रखते हैं.