गुजरात पुलिस ने दलित युवक को जूता चाटने को मजबूर किया

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अहमदाबाद। क्या हो जब कानून के रखवाले खुद कानून को हाथ में लेकर लोगों पर अत्याचार करने लगें? क्या हो जब लोग गुंडो से ज़्यादा पुलिसवालों से डरें और क्या हो जब पुलिस हिरासत में भी लोग असुरक्षित महसूस करें. पुलिस की ऐसी ही गुंडई गुजरात के अहमदाबाद के अमराईवाड़ी में देखने को मिली जब पुलिस ने 38 साल के दलित युवक को बेवजह हिरासत में लेकर बेरहमी से पीटा. उसका गुनाह सिर्फ इतना था कि उसने बगैर वर्दी के पुलिसवाले को आम आदमी समझ कर अपने घर के बाहर हो रही घटना के बारे में पूछ लिया.

पीड़ित हर्षद जादव

पीड़ित हर्षद जादव के मुताबिक 29 दिसंबर की सुबह अपने घर के बाहर जमा भीड़ देखकर उन्होंने पास खड़े एक व्यक्ति से घटना के बारे में जानने की कोशिश की. उनके यह पूछने पर उस व्यक्ति ने हर्षद के गाल पर चांटा जड़ दिया. अपना बचाव करते हुए जब हर्षद ने उसे पीछे की तरफ धकेला तो उस व्यक्ति ने खुद को पुलिसवाला बताते हुए डंडे से उन्हें जमकर पीटा. इतना ही नहीं जब जादव की पत्नी उनका बचाव करने आई तो उनकी पत्नी को भी बुरी तरह पीटा गया. हर्षद का आरोप है कि उसे 5 घंटे तक हवालात में बंद रखने के बाद डीसीपी हिमकर सिंह ने उसे बुलाकर जाति पूछी. एक पुलिस वाले के बताने पर कि मैं दलित हूं; डीसीपी ने मुझसे उस पुलिसवाले के पैरों में गिर कर माफी मांगने को कहा. डर के मारे मैंने ऐसा किया भी. मेरे ऐसा करने के बाद डीसीपी ने मुझसे उस कॉन्सटेबल के जूते चाट कर मांफी मांगने को कहा. उसी शाम मुझे कोर्ट में पेश किया गया और बाद में ज़मानत पर रिहा कर दिया गया.

इंग्लिश लिट्रेचर में ग्रैजुएट हर्षद जादव ने जब इस पूरे मामले के बारे में अपने पिता को बताया तो उन्होंने दलित समाज के कुछ लोगों के साथ मिलकर पुलिस के खिलाफ एफआईआऱ दर्ज कराई. फिलहाल मामला जांच के लिए सीबीआई को सौंपा दिया गया है.

भीमा-कोरेगांव से परहेज है, तो फिर इंडिया गेट से क्यों नहीं?

आज़ाद भारत में अंग्रेज़ों की जीत का जश्न क्यों? इस सवाल के जरिये मनुवादी मीडिया और ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग भीमा कोरेगांव की ऐतिहासिक लड़ाई को अंग्रेज़ों की लड़ाई साबित करने की साज़िश कर रहे हैं. वो पूछ रहे हैं कि 200 साल पहले अंग्रेज़ों की जीत का जश्न मनाकर दलित देश विरोधी काम क्यों कर रहे हैं? असल में ये लोग हकीकत को बड़ी ही चालाकी से छुपा रहे हैं. क्योंकि अगर भीमा कोरेगांव जैसी ऐतिहासिक लड़ाई आपके लिए सिर्फ अंग्रेजी सेना की जीत है और उसपर गर्व करने का आपके पास कोई कारण नहीं है तो फिर सवाल है कि 42 मीटर ऊंचा इंडिया गेट आपके लिए गर्व का प्रतीक क्यों है?

इंडिया गेट प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की तरफ से लड़कर शहीद होने वाले भारतीय सैनिकों की याद में बनाया गया था. 13,000 से ज्यादा शहीदों के नाम इंडिया गेट पर उकेरे गये हैं. ये सैनिक फ्रांस, मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और अफगानिस्तान जैसे मोर्चों पर लड़े थे जिनका मकसद ना भारत को आज़ाद कराना था औऱ ना ही अंग्रेजों से विद्रोह करना, तो बताईये आप आज़ाद भारत में इंडिया गेट को कैसे देखते हैं?

आप हाइफा युद्ध को कैसे देखते हैं? 23 सिंतबर 1918 को विदेशी सरज़मीं पर लड़ी गई हाइफा की ऐतिहासिक लड़ाई में भी तो भारतीय सैनिक अंग्रेज़ों की तरफ से लड़े थे. क्या उन राजपूत जवानों की बहादुरी पर गर्व नहीं करना चाहिए? तो क्या दिल्ली के तीन मूर्ति चौक जिसे पहले हाइफा चौक कहा जाता था, वहां से गुजरते हुए हमें सम्मान और जोश की अनुभूति नहीं करनी चाहिए? क्योंकि ये सभी सैनिक तो अंग्रेज़ों के लिए लड़े थे.

सारागढ़ी की लड़ाई का क्या ? 12 सितंबर 1897 को खैबर पख्तूनख्वा में लड़ी गई सारागढ़ी की लड़ाई को क्या कोई झुठला सकता है? ब्रिटिश सेना के 21 सिख सैनिकों ने अफगान सेना के 10 हज़ार सैनिकों के छक्के छुड़ा दिये थे. क्या उस वक्त इन 21 बहादुरों का मकसद भारत की आज़ादी था? शायद नहीं, क्योंकि वो सब तो ब्रिटिश सेना की नौकरी कर रहे थे. तो क्या आप इस लड़ाई को इतिहास के पन्नों में दफना सकते हैं? क्या आपके लिए इस अदम्य साहस और वीरता की लड़ाई में गर्व की कोई बात नहीं?

एक सवाल मंगल पांडे के बारे में भी मंगल पांडे ब्रिटिश सेना के सिपाही थे. मज़े से अंग्रेज अफसरों के हुक्म का पालन कर रहे थे. जब तक उनको मातादीन भंगी ने ये ताना नहीं दिया कि ‘तु शूद्र से भेदभाव करता है लेकिन गाय के मांस का बना कारतूस मुंह से फाड़ता है’ तबतक उन्हें ब्रिटिश सिपाही होने में कोई दिक्कत थी ही नहीं. मंगल पांडे ने वैसे भी अपनी हिंदू धार्मिक भावना के आधार पर विरोध किया था ना कि भारत मां की आज़ादी के लिए, तो क्या आप मंगल पांडे पर गर्व करना छोड़ देंगे? शायद नहीं, क्योंकि विद्रोह का अपना महत्व होता है. इतिहास की हर घटना का अपना महत्व और प्रासंगिकता होती है. फिर आप भीमा कोरेगांव की लड़ाई को बदनाम करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? भीमा-कोरेगांव की लड़ाई तो फिर भी मानवता के खिलाफ खड़े लोगों से आजादी के लिए लड़ी गई थी.

1 जनवरी 1818 को पुणे के पास सिर्फ 500 महार सैनिकों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की 28 हज़ार सैनिकों की फौज को बुरी तरह धूल चटा दी थी. ब्रिटिश सेना की महार रेजिमेंट के शौर्य और अदम्य साहस जैसी मिसाल इतिहास में कहीं नहीं मिलती. पेशवा राज भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का सबसे क्रूरतम शासनकाल था. मराठों के साथ छल करके ब्राह्मण पेशवा जब सत्ता की कुर्सी पर आये तो उन्होंने शूद्रों को नरक जैसी यातनाएं देना शुरू कर दिया. पेशवा राज में शूद्रों को थूकने के लिए गले में हांडी टांगना जरूरी था. साथ ही शूद्रों को कमर पर झाड़ू बांधना जरूरी था जिससे उनके पैरों के निशान मिटते रहें. शूद्र केवल दोपहर के समय ही घर से बाहर निकल सकते थे क्योंकि उस समय शरीर की परछाई सबसे छोटी होती है, परछाई कहीं ब्राह्मणों के शरीर पर ना पड़ जाये इसलिये उनके लिए समय निर्धारित था. शूद्रों को पैरों में घुंघरू या घंटी बांधनी जरूरी थी ताकि उसकी आवाज़ सुनकर ब्राह्मण दूर से ही अलर्ट हो जाये और अपवित्र होने से बच जाये.

ऐसे समय में जब पेशवाओँ ने दलितों पर अत्यंत अमानवीय अत्याचार किये, उनका हर तरह से शोषण किया, तब उन्हें ब्रिटिश सेना में शामिल होने का मौका मिला. ब्रिटिश सेना में शामिल सवर्ण समाज के लोग शूद्रों से कोई संबंध नहीं रखते थे, इसलिये अलग महार रेजिमेंट बनाई गई. महारों के दिल में पेशवा साम्राज्य के अत्याचार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा था, इसलिये जब 1 जनवरी 1818 को भीमा कोरेगांव में पेशवा सेना के साथ उनका सामना हुआ तो वो उनपर शेरों की तरह टूट पड़े. सिर्फ 500 महार सैनिकों ने बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों को धूल चटा दी. जाहिर सी बात है, जैसे हम हाइफा और सारागढ़ी के युद्ध के वीरों की वीरता को नहीं झुठला सकते, जैसे मंगल पांडे की बहादुरी को नहीं नकार सकते, उसी तरह कोरेगांव के महार रेजिमेंट के जवानों के शौर्य को भी नहीं झुठलाया जा सकता.

1 जनवरी को इसी लड़ाई का 200वां शौर्य दिवस था जिसे मनाने देश भर के लाखों दलित भीमा कोरेगांव में जुटे थे. ये लड़ाई अन्याय, शोषण और अपमान के प्रतिरोध का प्रतीक है जिसे युगों-युगों तक याद किया जाएगा. अंग्रेजों ने वीर महारों के याद में विजय स्तंभ बनवाया जो आज लाखों दलितों के लिए प्रेरणा का प्रतीक है. आपको सवाल उन भगवाधारी गुंडों से पूछना चाहिए जो दलितों के स्वाभीमान से जीने को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे.

  • लेखक- सुमित चौहान
 

मुंबई में सरकार ने किया जिग्नेश मेवाणी का कार्यक्रम रद्द

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मुंबई। भीमा कोरेगांव मामले में जिग्नेश मेवाणी की सक्रियता को देखते हुए प्रदेश सरकार ने चार जनवरी को मुंबई में प्रस्तावित जिग्नेश मेवानी के कार्यक्रम को रद्द कर दिया है. इस कार्यक्रम में मेवाणी के अलावा जेएनयू के छात्र उमर खालिद को भी जाना था. मुंबई के भाईदास हॉल में छात्र भारती नाम के संगठन ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था.

छात्र भारती के उपाध्यक्ष सागर भालेराव ने बताया कि मुंबई पुलिस ने पिछले दो तीन दिनों की हिंसा का हवाला देकर कार्यक्रम रद्द कर दिया है. इधर जब पुलिस ने कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे लोगों को अंदर जाने से रोका था छात्र नारेबाजी करने लगे और जबरन अंदर जाने की कोशिश कर लगे. इस दौरान पुलिस और छात्रों में झड़प हुई. पुलिस ने एहतियातन कई लोगों को हिरासत में लिया है. मुंबई पुलिस का कहना है कि इन लोगों ने धारा-144 का उल्लंघन किया था इसलिए इन्हें हिरासत में लिया गया है. बता दें कि महाराष्ट्र में जातीय हिंसा को भड़काने के आरोप में पुणे पुलिस ने गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवानी और जेएनयू छात्र उमर खालिद के खिलाफ FIR दर्ज कर लिया है. इनपर भड़काऊ भाषण देने का आरोप है.

उना की तरह भीमा-कोरेगांव मामले में पीएम मोदी की चुप्पी पर उठे सवाल

नई दिल्ली। एक जनवरी को भीमा-कोरेगांव में अम्बेडकरवादियों पर हमले के विरोध में शुरू हुई हिंसा की चिंगारी देश की संसद तक पहुंच गई है. इस मामले पर तमाम दलों के नेताओं ने अपने बयान दिए हैं और इस घटना की निंदा की है. लेकिन बात-बात पर ट्विट करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी ने नई बहस को जन्म दे दिया है. इतनी बड़ी घटना पर पीएम मोदी की चुप्पी को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

तीन जनवरी को लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने भीमा-कोरेगांव में दलितों पर हिंसा के मामले को उठाया. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकसभा में बीजेपी को हिंसा के लिए जिम्मेदार बताया था. खड़गे ने कहा कि इस तरह के मुद्दों पर प्रधानमंत्री हमेशा चुप हो जाते हैं और मौनी बाबा बने हुए हैं. खड़गे ने कोरेगांव के मुद्दे पर प्रधानमंत्री से सदन में आकर जवाब देने की मांग की.

इससे पहले कोरेगांव पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी आरएसएस और बीजेपी पर निशाना साधा था. 2 जनवरी को ट्वीट कर राहुल गांधी ने कहा था कि-“भारत के लिए RSS और बीजेपी का फासीवादी दृष्टिकोण ही यही है कि दलितों को भारतीय समाज में निम्न स्तर पर ही बने रहना चाहिए.”तो वहीं गुजरात के वडगाव से एमएलए जिग्नेश मेवाणी ने भी ट्विटर पर पीएम मोदी का एक पुराना विडियो ट्वीट कर उनका मजाक उड़ाया.

दरअसल तमाम मुद्दों पर तुरंत ट्विट कर अपनी राय जाहिर करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर दलितों से जुड़े मामले में चुप्पी साध लेते हैं. गुजरात के उना में दलितों पर हुए अत्याचार और इसके खिलाफ दलितों के आंदोलन के दौरान भी इस पर देशव्यापी बहस छिड़ गई थी, लेकिन पीएम मोदी इस पर कोई भी टिप्पणी करने से लगातार बचते रहें. तो एक बार फिर जब भीमा-कोरेगांव को लेकर बहस छिड़ी है, मोदी ने चुप्पी साध रखी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या देश में दलितों पर हो रही एक के बाद एक अत्याचार की घटनाएं प्रधानमंत्री मोदी के लिए कोई मायने नहीं रखती?

पांच जनवरी को संसद घेरेंगे अम्बेडकरवादी

नई दिल्ली। भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण की रिहाई को लेकर शुरू हुआ आंदोलन जोर पकड़ने लगा है. विगत 5 दिसंबर को राष्ट्रीय दलित महासभा के संयोजन में शुरू किए गए इस अभियान के तहत अब 5 जनवरी यानि कल संसद मार्ग पर विरोध प्रदर्शन होगा. इस दौरान चंद्रशेखर रावण पर से रासुका हटाने के साथ-साथ भीमा-कोरेगांव की घटना को लेकर भी आक्रोश जाहिर किया जाएगा.

इस मसले पर मिलियन लीडर मार्च के राष्ट्रीय संयोजक और राष्ट्रीय दलित महासभा के संस्थापक अशोक भारती ने एक बयान जारी करके जहां भीमा-कोरेगांव की घटना की निंदा की है. साथ ही इसके खिलाफ पांच जनवरी को संसद मार्ग पर लोगों से इकट्ठा होने का आवाहन किया.

इस बीच भीमा-कोरेगांव का मामला गुरुवार को संसद में भी उठा. कांग्रेस सांसद रजनी पाटिल ने सदन में यह मुद्दा उठाया. इस दौरान राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल ने आरोप लगाया कि भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा सरकार के संरक्षण में हुई. फिलहाल कोरेगांव का मुद्दा थमता हुआ नहीं दिख रहा है. 5 जनवरी को अम्बेडकरवादियों के प्रदर्शन के बाद चंद्रशेखर रावण पर से रासुका हटाने और कोरेगांव का मामला और जोर पकड़ सकता है.

नकल नहीं कराने पर दलित छात्रा को बेरहमी से पीटा

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पटियाला। देश भर में राजनतिक पार्टियां जहाँ दलितों की मदद करने की और उनके हित में काम करने की बात करती हैं वहीं पंजाब के पटियाला शहर में एक दलित छात्रा को बेरहमी से पीटा गया. दलित छात्रा वीरपाल कौर की गलती सिर्फ इतनी थी के उसने परीक्षा मे नक़ल करवाने से इंकार कर दिया था. पटियाला के टोहड़ा गांव के सीनियर सेकेंडरी स्कूल की 10वीं कक्षा की दलित छात्रा ने अनुसूचित जाति आयोग को एक पत्र लिखकर अपने साथ हुए अत्याचार की आपबीती बताई.

वीरपाल कौर ने बताया की परीक्षा में स्कूल के क्लर्क ने अपने भतीजे और उसके दोस्तों को नकल करवाने का दबाव बनाया था लेकिन कौर मना कर दिया. नक़ल न करवाने की वजह से क्लर्क का भतीजा और उसके सहपाठी फेल हो गए. उसके बाद इन सब ने मिल कर छात्रा को बेरहमी से सबके सामने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, वह हाथ जोड़ती रही मगर किसी को भी उस पर तरस नहीं आया.

इसके बाद भी जब उन छात्रों के अहंकार की भूख नहीं मिटी तो उसकी फेसबुक की फेक प्रोफाइल बना कर उसे बदनाम करने की कोशिश की गयी. वीरपाल कौर के पिता को जब इस घटना का पता चला तो उन्होंने भादसों थाने में इसकी शिकायत दर्ज करवाई. इसके बाद तीनों आरोपियों ने छात्रा से न केवल माफी मांगी बल्कि पुलिस को यह भी बताया था कि फेसबुक पोस्ट स्कूल के कलर्क के कहने पर अपलोड की गई थी.

इतना ही नहीं छात्रों ने माफ़ी मांगने के बाद भी उस पर जुल्म करना नहीं छोड़ा. जाती सूचक शब्दों का प्रयोग कर उससे परेशान किया जाता रहा. इसके बावजूद वीरपाल कौर स्कूल की मेधावी छात्रा बनी रही. 10 वीं में उसके 80 फिसदी से ज्यादा अंक आए.

गन्धर्व गुलाटी

सहारनपुर दंगों में जेल गये सदस्यों को भीम आर्मी ने किया सम्मानित

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सहारनपुर। गुरु रविदास मंदिर में हर साल आयोजित होने वाले कार्यक्रम में इस साल भीम आर्मी ने उन 39 सदस्यों को सम्मानित किया गया. इसमें वो लोग शामिल थे जो मई में हुए सहारनपुर दंगो के दौरान गिरफतार किये गए थे. 1 जनवरी को आयोजित इस कार्यक्रम में लगभग 1000 दलित शामिल हुए, जिसमें ज़मानत पर रिहा किए गाए दलित कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया.

सम्मानित सदस्यों में सहारनपुर भीम आर्मी के अध्यक्ष प्रवीन गौतम, भीम आर्मी प्रवक्ता मनजीत सिहं नौटियाल, एंव जिला अध्यक्ष कमल सिहं वालिया के नाम शामिल हैं. कार्यक्रम के मुख्य प्रबंधक एंव सहारनपुर भीम आर्मी के सचिव प्रमोद कुमार पांडेय के मुताबिक सम्मानित सदस्यों को डायरी और स्मृति चिन्ह दिया गया. इसके पीछे का मकसद समाज को उनसे परिचित कराना और उनके योगदान को लोगो के सामने लाना था.

कार्यक्रम के आयोजन की अनुमत देने वाले सहारनपुर जिला एसपी प्रबल प्रताप सिहं ने कहा कि भीम आर्मी यह आयोजन हर साल करती है, इसलिए इस साल भी यह समारोह आयोजित करने की अनुमति दी गई है और उन्हे इस बात की जानकारी पहले ही थी की इसमें कई सदस्यों को सम्मानित किया जाएगा.

आपको बता दें कि पिछले साल 5 मई को शब्बीरपुर के ठाकुर, महाराना प्रताप की प्रतिमा पर फूलों का हार चढ़ाने के लिए सिमलाना गांव की तरफ जा रहे थे, इस पर आसपास रह रहे दलितों ने तेज़ आवाज़ पर चल रहे गानों पर ऐतराज़ जताया. जल्द ही लड़ाई ने हिंसक रूप ले लिया और ठाकुरों ने और लोग बुलाकर 15 से 20 दलित घरों में आग लगा दी. इसमें काफी लोग घायल हुए थे.

रिपोर्ट- पीयूष शर्मा

उत्‍तर कोरिया की धमकी पर बोले ट्रंप, मेरे पास ज्यादा बड़ा और पावरफुल न्यूक्लियर बटन है

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हाल ही में उत्‍तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन द्वारा दी गई परमाणु हथियारों की धमकी पर एक बार फिर अमेरिका ने जवाब दिया है. किम पर पलटवार करते हुए अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने ट्वीट के ज़रिए कहा है कि उनके पास भी न्‍यूक्लियर बटन है, जो कि कहीं ज्यादा बड़ा और पावरफुल है और वो काम भी करता है. इतना ही नहीं, उन्होने उत्‍तर कोरिया पर तंज कसते हुए कहा कि क्या ये बात उनके जर्जर और भुखमरी से परेशान साम्राज्य में से कोई उन्हे बताएगा? इसकी शुरुआत नए साल पर किम जोंग उन द्वारा दिए गए भाषण से हुई जिसमें अपने देश को संबोधित करते हुए किम ने कहा था कि एक न्यूक्लियर बटन हमेशा मेरी डेस्क पर होता है और पूरा अमेरिका हमारे परमाणु हथियारों के दायरे में है. अपनी बात पर ज़ोर देते हुए  किम ने यह भी कहा कि ये कोई धमकी नही है, ये सच है और देश की सुरक्षा के लिए ज़रूरत पड़ने पर हम  अपनी परमाणु ताकत का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह पहला मौका नहीं है जब उत्तर कोरिया ने अमेरिका को परमाणु बम की धमकी दी है. इससे पहले भी कई बार दोनों देशों के बीच खुलेआम ज़ुबानी जंग देखने को मिली है. जहां एक तरफ उत्‍तर कोरिया लगातार मिसाइल परीक्षण कर अमेरिका को धमकी देता रहता है वहीं अमेरिका भी हर एक धमकी का जवाब में उत्‍तर कोरिया को नष्‍ट करने की चेतावनी दे चुका है. पीयूष शर्मा

सावित्री बाई फुले के बारे में तीन अनसुनी बातेंl

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सावित्रीबाई ने समय के उस दौर में काम शुरु किया जब धार्मिक अंधविश्वास, छूआछूत, दलितों और स्त्रियों पर मानसिक और शारीरिक अत्याचार अपने चरम पर थे. बाल-विवाह, सती प्रथा, बेटियों के जन्म लेते ही मार देना, विधवा स्त्री का शोषण जैसी प्रथाएं समाज का खून चूस रही थी. ब्राह्णवाद का बोलबाला था. ऐसे में जब सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबाफुले के ऐसी व्यवस्थाओं के खिलाफ खड़े हुए तो हलचल पैदा हो गई थी.

महान शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ने ना केवल शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया, बल्कि भारतीय स्त्री की दशा सुधारने के लिए उन्होंने 1852 में “महिला मंडल” का गठन कर भारतीय महिला आंदोलन की अगुआ भी बन गई. इस महिला मंडल ने बाल विवाह और विधवा महिलाओं पर होने वाले जुल्म के खिलाफ समाज को मोर्चाबन्द कर समाजिक बदलाव के लिए संघर्ष किया.

उस दौर में हिन्दू स्त्री के विधवा होने पर उसका सिर मूंड दिया जाता था. विधवाओं के सर मूंडने जैसी कुरीतियों के खिलाफ लड़ने के लिए सावित्री बाई फूले ने एक नायाब कदम उठाया. महिलाओं के बाल नाई काटते थे. सावित्रीबाई फुले ने नाईयों को इस सामाजिक बुराई के बारे में बताते हुए उनसे विधवाओं के “बाल न काटने” का अनुरोध किया. उन्होंने इसके लिए आन्दोलन चलाया जिसमें काफी संख्या में नाईयों ने भाग लिया और विधवा स्त्रियों के बाल न काटने की प्रतिज्ञा ली. नाईयों के कई संगठन सावित्रीबाई फूले द्वारा गठित महिला मण्डल के साथ जुड़े. पूरे विश्व में ऐसा सशक्त आन्दोलन नहीं मिलता जिसमें औरतों के ऊपर होने वाले शारीरिक और मानसिक अत्याचार के खिलाफ स्त्रियों के साथ पुरूष जाति प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हो. सावित्री बाई फूले और “महिला मंडल” के साथियों ने ऐसे ही अनेक आन्दोलन चलाएं व उसमें सफल भी हुए.

इसी तरह भारत का इतिहास और धर्मग्रंथों के पढ़ने से साफ पता चलता है कि हमारे समाज में स्त्रियों की कीमत एक जानवर से भी कम थी. स्त्री के विधवा होने पर उसके परिवार के पुरूष ही उनका शारीरिक शोषण करते थे, जिसके कारण वह कई बार मां बन जाती थी. बदनामी से बचने के लिए विधवा या तो आत्महत्या कर लेती थी या फिर अपने अवैध बच्चों को मार डालती थी. इस स्थिति को रोकने के उद्देश्य से सावित्रीबाई फूले ने भारत का पहला “बाल हत्या प्रतिबंधक गृह” खोला गया तथा निराश्रित असहाय महिलाओं के लिए अनाथाश्रम खोला गया, जहां विधवा महिलाएं आराम से रह सकती थीं और अपने बच्चे को जन्म दे सकती थीं.

जो लोग बहुजन महापुरुषों पर जातिवादी होने का आरोप लगाते हैं, उनके लिए यह जानना जरूरी है कि स्वयं सावित्रीबाई फूले ने आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन अपनाते हुए आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण स्त्री काशीबाई जोकि गर्भवती थी, उसको आत्महत्या करने से रोककर उसके बच्चे का जन्म अपने घर में करवाया. उस बच्चे का नाम यशंवत रखा गया जिसे फुले दंपत्ति ने अपने दत्तक पुत्र के रुप में गोद लिया. यशवंत राव को पाल-पोसकर डॉक्टर यशवंत बनाया. इतना ही नहीं उसके बड़े होने पर उसका अंतरजातीय विवाह किया. महाराष्ट्र का यह पहला अंतरर्जातीय विवाह था.

 

कोरेगांव हिंसाः 29 दिसंबर को ही शुरू हो गई थी साजिश, जानिए पूरा सच

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भीमा-कोरेगांव। भीमा-कोरेगांवलड़ाई की 200वीं सालगिरह पर हुई हिंसा से पूरे महाराष्ट्र में तनाव का माहौल है. पुलिस की तमाम कोशिशों के बावजूद पूरे राज्य में हालात गंभीर बने हुए हैं. वहीं पुलिस ने शुरुआती जांच में इस पूरे मामले के लिए हिन्दुवादी संगठनों को जिम्मेदार माना है साथ ही दलित संगठनों को क्लिन चीट दी है. पुलिस के मुताबिक हिंसक झड़पों में भगवा झंडा लिए लोगों के शामिल होने की बात सामने आई है.

असल में विवाद 29 दिसंबर की रात से शुरू हो गया था जिसने एक जनवरी को उग्र रूप ले लिया. 29 दिसंबर को वाडेबुडरुक गांव में गणेश महार की समाधि को दक्षिणपंथी संगठनों ने तोड़ दिया. गणेश महार ने ही छत्रपति शि‍वाजी के बेटे सांभाजी का अंतिम संस्कार किया था. इससे आहत दलितों ने विरोध जताया और प्रदर्शन किया.

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस ने दलितों की भूमिका से इंकार किया है.पुलिस का कहना है कि भीमा कोरेगांव के जश्न में दलित अपने बच्चों और महिलाओं के साथ शरीक होने आए थे और उनके पास कोई हथियार नहीं थे. घटना में घायल लोगों के घाव भी इस बात के सबूत हैं कि उनकी तरफ से कोई भी घातक हथियार इस्तेमाल नहीं हुआ. वहीं शुरुआती जांच में यह पता लगा है कि भगवे झंडे के साथ भी मार्च उसी समय किया गया जब अम्बेडकरवादियों का जश्न चल रहा था. वहीं जब दोनों दल आमने सामने हुए तो पत्थरबाजी हुई और हिंसक झड़पों की शुरुआत हुई.

भीमाकोरेगांव हिंसा पर मायावती का बड़ा बयान

महाराष्ट्र। भीमा कोरेगांव में भड़की हिंसा के बीच राजनीति भी तेज हो गई है. तमाम राजनैतिक दल इसके पीछे भाजपा और आरएसएस की साजिश बता रहे हैं. महाराष्ट्र के दिग्गज नेता और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने भी इस पूरे मामले के पीछे भाजपा-आरएसएस की साजिश बताई है. पवार का कहना है कि सालों से दलित समाज के लोग भीमाकोरेगांव आते रहे हैं लेकिन आज तक हिंसा नहीं हुई थी. उन्होंने भाजपा-आरएसएस पर स्थानीय ग्रामीणों और हिन्दूवादी संगठनों को भड़काने का आरोप लगाया है.

वहीं दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने भीमा-कोरेगांव मे हुई हिंसा पर कहा है कि यह घटना रोकी जा सकती थी. सरकार को वहां सुरक्षा की उचित व्यवस्था करनी चाहिए थी. मायावती ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार है और उन्होंने वहां हिंसा करवाई. उन्होंने इसके पीछे बीजेपी, आरएसएस और जातिवादी ताकतों का हाथ होने की बात कही.

दरअसल एक जनवरी को भीमा कोरेगांव पहुंचे अम्बेडकरवादी लोगों पर पथराव किया गया था. इसमें कई लोग घायल हो गए थे, जबकि एक व्यक्ति की मौत हो गई थी. हमलावरों ने पचास से ज्यादा गाड़ियों को तोड़ दिया था. इसके बाद पूरे महाराष्ट्र में हिंसा भड़क गई है.

अम्बेडकरवादियों का मुंबई बंद, डब्बा सर्विस ठप, नहीं चलेंगी 40 हजार स्कूल बसें

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भीमा-कोरेगांव। भीमा-कोरेगांव के लड़ाई की सालगिरह पर भड़की चिंगारी पूरे महाराष्ट्र में फैल गई है. घटना के विरोध में अम्बेडकरवादी संगठनों ने आज बुधवार को बंद बुलाया है. इस बंद का असर इतना ज्यादा है कि मुंबई के मशहूर डब्बावालों ने भी अपनी सर्विस को ठप रखने का ऐलान किया है. तो वहीं बंद के कारण मुंबई में करीब 40,000 स्कूल बसें नहीं चलेंगी. पुलिस ने भी एहतियात बरतते हुए कुछ जगहों पर इंटरनेट सर्विस बंद करवा दी है.

बंद का असर सुबह से ही दिखने लगा. पालघर में बस सेवा पूरी तरह से ठप है तो पालघर रेलवे स्टेशन की कैंटीन भी बंद है. इसी तरह ठाणे के पास प्रदर्शनकारियों ने ट्रेन रोक दी. ठाणे के इलाके में चार जनवरी की रात तक धारा 144 लागू कर दी गई है. बंद के बीच मुंबई पुलिस ने हिंसा मामले में 9 लोगों के खिलाफ केस दर्ज कर 100 को हिरासत में ले लिया.

महाराष्ट्र के प्रमुख अम्बेडकरवादी नेता और बाबासाहेब के पोते प्रकाश अम्बेडकर सहित तमाम अम्बेडकरवादी संगठनों ने कोरेगांव में 1 जनवरी को अम्बेडकरवादियों पर हुए हमले के खिलाफ आज मुंबई बंद का आवाह्न किया है. घटना के खिलाफ 2 जनवरी को ही मुंबई सहित महाराष्ट्र के कई इलाकों में लोग सड़क पर उतर आए थे. गुस्साई भीड़ ने कई सरकारी बसों को भी नुकसान पहुंचाया था. एक जनवरी को दक्षिणपंथी संगठनों की हिंसा में एक व्यक्ति की मौत से अम्बेडकरवादी ज्यादा नाराज हैं. फिलहाल मुंबई औऱ महाराष्ट्र के कई हिस्सों में अम्बेडकरवादी संगठनों के सड़क पर उतर जाने से फडनवीस सरकार के हाथ-पांव फूले हुए हैं.

महज धान चुराने के लिए दलित को पीटकर मार डाला

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उत्तर प्रदेश। धान चोरी के आरोपी दलित व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या, फतेहाबाद के गांव मढ में सामने आई घटना, एसपी दीपक सहारण ने लिया घटनास्थल का जायजा, डीएसपी बोले- 3 लोगों के खिलाफ हत्या व एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया, पुलिस शिकायत में मृतक के भाई का आरोप-मेरे भाई को बंधक बनाकर पीटा गया, फिर मरने के लिए छोड़ दिया गया, पुलिस पूरी घटना की जांच मे जुटी.

फतेहाबाद के गांव मढ में चोरी के आरोपी 38 वर्षीय एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर देने का मामला सामने आया है. गांव के लोगों के मुताबिक हत्या करने वाले लोगों ने व्यक्ति को धान चोरी के आरोप में पकड़ा था और उसकी बुरी तरह पिटाई कर दी थी. घटना का पता चलने पर एसपी दीपक सहारण ने घटनास्थल का जायजा लिया और मामले में सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए. डीएसपी रविंद्र तोमर ने घटना के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि मृतक के भाई ने 3 लोगों पर उसके भाई को बंधक बनाकर पीटने का आरोप लगाया है. मृतक के भाई द्वारा दी गई पुलिस शिकायत में आरोप लगाया गया है कि बंधक बनाकर बुरी तरह पिटाई करके उसके भाई को मरने के लिए छोड़ दिया गया. डीएसपी रविंद्र तोमर ने बताया कि इस मामले में 3 लोगों के खिलाफ हत्या व 3 एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया गया है. डीएसपी ने बताया कि पुलिस द्वारा प्राथमिक जांच में गांव के लोगों से पूछताछ में पता चला है कि पिटाई का शिकार हुआ व्यक्ति रात को गांव के एक घर में धान चोरी करने के लिए घुसा था. इस दौरान कुछ लोगों ने उसे धान चोरी करते हुए पकड़ लिया और उसकी बुरी तरह पिटाई कर दी. इसके बाद पिटाई से धान चोरी करने के आरोपी व्यक्ति की मौत हो गई. इस घटना के बारे में सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और पूरे मामले की जानकारी एसपी को दी गई. घटना की गंभीरता को समझते हुए एसपी दीपक सहारण ने मौके पर पहुंचकर घटनास्थल का जायजा लिया और पुलिस अधिकारियों को पूरी गंभीरता से व्यक्ति की मौत के कारणों की जांच के निर्देश दिए. डीएसपी रविंद्र तोमर ने बताया कि मृतक के भाई की शिकायत पर तीन आरोपियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और पूरी घटना की जांच की जा रही है.

 

 भीमा कोरेगांव में हमले को लेकर मुंबई सहित कई जगहों पर आंदोलन भड़का

कोरेगांव में अम्बेडकरवादियों पर पथराव के विरोध में मुंबई में अम्बेडकरवादी सड़कों पर उतर गए

मुंबई। भीमा कोरेगांव के 200 साल पूरे होने के मौके पर जुटे लोगों पर हुई पथराव की घटना ने अब बड़ा रूप ले लिया है. सोमवार 1 जनवरी को भड़की हिंसा बढ़ गई है और इसने अब जातीय संघर्ष का रूप ले लिया है. सोमवार की घटना में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी, जबकि कई लोग घायल हो गए थे. एक जनवरी को शुरू हुई हिंसा के बाद आज भी जगह-जगह हिंसक प्रदर्शन हुए, जिसके बाद सुरक्षा बढ़ा दी गई है. इस मामले में सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं.

लोगों ने कई जगहों पर ट्रैफिक रोक दिया

पुणे में हुई जातीय हिंसा का असर महाराष्ट्र के अन्य इलाकों में भी देखा जा रहा है. मुंबई के अलावा हड़पसर व फुरसुंगी सहित तकरीबन दर्जन भर इलाकों में सरकारी और प्राइवेट बसों पर पथराव किया गया. इस हिंसा में 100 से ज्यादा महाराष्ट्र परिवहन की बसों को नुकसान पहुंचा है. हिंसा की वजह से कुछ देर के लिए औरंगाबाद और अहमदनगर के लिए बस सेवा बंद करनी पड़ी. विरोध प्रदर्शन की वजह से मुंबई के कई हिस्सों में धारा 144 लगा दी गई है. वहीं, मुंबई पुलिस के पीआरओ ने जानकारी दी है कि राज्य में विभिन्न जगहों से 100 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है. इस बीच भीमराव आंबेडकर के पोते और एक्टिविस्ट प्रकाश आंबेडकर ने बुधवार को महाराष्ट्र बंद का आह्वाहन किया है. पुलिस के आला अधिकारी विरोध खत्म करने के लिए नेताओं को मनाने में जुटे हुए हैं.

तमाम अम्बेडकरवादी संगठनों ने 3 जनवरी को बंद का ऐलान किया है

मामला इतना बढ़ गया है कि इस बारे में महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडणवीस को भी सामने आना पड़ा है. फडनवीस ने कहा कि, “भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह पर करीब तीन लाख लोग आए थे. हमने पुलिस की 6 कंपनियां तैनात की थी. कुछ लोगों ने माहौल बिगाड़ने के लिए हिंसा फैलाई. इस तरह की हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. हमने न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं. मृतक के परिवार वालों को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा.” तो वहीं शरद पवार ने इस घटना के लिए दक्षिणपंथी संगठनों को जिम्मेदार ठहराया है. पवार का कहना है कि दक्षिणपंथियों द्वारा स्थानीय गांववालों को भड़काया गया, जिसके बाद यह घटना घटी है. हालांकि पक्ष-विपक्ष की राजनीति और सरकार की तमाम दलीलों के बावजूद अम्बेडकरवादी सुनने को तैयार नहीं है.

BPO में बढ़ी हिन्दी और अन्य भाषा वालों की पूछ

नई दिल्ली। बीपीओ यानी बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिग उद्योग में अभी तक अंग्रेजी भाषी युवाओं की पूछ रही है, लेकिन जल्दी ही यह स्थित बदलने वाली है. इंडिया बीपीओ प्रमोशन स्कीम के तहत देश के 61 शहरों में खुले बीपीओ ने हिन्दी के साथ-साथ तेरह भारतीय भाषाओं में भी युवाओं के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए हैं. हिन्दी के अलावा जिन अन्य भाषाओं में रोजगार मिलने लगा है, उनमें उड़िया, तमिल, गुजराती, मराठी, तेलुगू, कन्नड़, बंगाली, मलयालम, कश्मीरी, उर्दू, राजस्थानी व पंजाबी शामिल है.

इस स्कीम के तहत पहले चार दौर की निविदा प्रक्रिया में 21 राज्यों के 61 शहरों में 18160 सीटों का आवंटन किया गया है. इनमें से 13,780 सीटों वाले बीपीओ शुरू भी हो गये हैं. इंडिया बीपीओ प्रमोशन स्कीम का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि इसकी वजह से घरेलू बीपीओ उद्योग में अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं के अतिरिक्त भारतीय भाषाओं में भी रोजगार के अवसर उपलब्ध हो रहे हैं. आज की तारीख में इन सभी बीपीओ में अंग्रेजी, स्पेनिश और अरबी के अतिरिक्त हिंदी, उड़िया, तमिल, गुजराती, मराठी, तेलुगू, कन्नड़, बंगाली, मलयालम, कश्मीरी, उर्दू, राजस्थानी और पंजाबी भाषा जानने वाले युवाओं को भी रोजगार उपलब्ध हो रहा हैं. इंडिया बीपीओ प्रमोशन स्कीम का मकसद देश के छोटे और मझोले शहरों तक बीपीओ उद्योग को लेकर जाना है.

गठबंधन की राह पर बसपा, मध्य प्रदेश में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ सकती है चुनाव

नई दिल्ली। गुजरात चुनाव में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन की चर्चा सामने आई थी. फिर खबर मिली कि बहुजन समाज पार्टी जितनी सीटें चाहती है, कांग्रेस देने को तैयार नहीं है. यही वजह है कि दोनों के बीच गठबंधन नहीं हो पाया. गुजरात के चुनाव नतीजों में यह बात साफ तौर पर देखने को मिली कि अगर कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन हुआ होता तो प्रदेश में भाजपा मुंह की बल गिरी होती और वहां कांग्रेस की सरकार होती.

 कांग्रेस पार्टी मध्यप्रदेश के चुनाव में यह गलती नहीं दोहराना चाहती है. खबर है कि 2018 में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर करने के लिए कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर मैदान चुनाव लड़ सकती है. इसके लिए संगठन से लेकर पार्टी स्तर पर नेताओं के बीच चर्चा शुरू हो गई है. दोनों दलों के बीच आपसी सहमति तब देखने को मिली जब हाल ही में भिंड और सतना के उपचुनाव में बसपा ने अपना प्रत्याशी नहीं खड़ा किया. इन दोनों सीटों पर कांग्रेस ने भाजपा को मात दे दी.

 कांग्रेस पार्टी बसपा के साथ इस दोस्ती को जारी रखना चाहती है. बसपा के हक में जो बात जाती है वह ग्वालियर-चंबल और रीवा संभाग में बसपा के प्रभाव वाली सीटे हैं. कांग्रेस और बसपा के वोट बंटने के कारण ग्वालियर, चंबल और रीवा संभाग की करीब दो दर्जन से ज्यादा विधानसभा सीटों पर दोनों पार्टियों को नुकसान झेलना पड़ता है.

 पिछले तीन विधानसभा चुनावों को देखें तो ग्वालियर, मुरैना, शिवपुरी, रीवा व सतना जिलों में दो से लेकर सात सीटों पर बसपा की जीत हुई है. तो वहीं भिंड, मुरैना, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, टीकमग़़ढ, छतरपुर, पन्ना, दमोह, रीवा, सतना की कुछ सीटों पर दूसरे स्थान पर रहकर पार्टी ने अपनी ताकत दिखाई है. मध्य प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह भी बसपा से गठबंधन की बात को लेकर सहमत हैं. अगर बातचीत परवान चढ़ी तो मध्य प्रदेश में भाजपा औऱ शिवराज सरकार की विदाई तकरीबन तय है.

न्याय के लिए आमरण अनशन पर बैठा दलित परिवार

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गोंडा। देश जब नए साल का जश्न मना रहा था, उत्तर प्रदेश के गोडा जिले के कलेक्ट्रेट में एक गरीब दलित परिवार न्याय की आस लिए आमरण अनशन पर बैठा था. परिवार का कहना है कि गांव के कुछ शैतान सामंतवादियों ने उनकी जमीन पर कब्जा कर उन्हें घर से निकाल दिया है. पीड़ित परिवार ने इस बारे में डीएम को आवेदन देकर शिकायत की है. दलित परिवार ने डीएम को दिए शिकायती पत्र में कहा है कि गांव के कुछ दबंग लोगों ने उसकी भूमि पर कब्जा कर उसे घर से बाहर निकाल दिया है. उसका परिवार इस ठंड में न्याय के लिए इधर-उधर भटक रहा है. पीड़ित ने बताया कि एक माह पहले दबंगों ने उसको बुरी तरह से मारा-पीटा और घर की महिला के साथ छेड़छाड़ कर बाहर निकाल कर ताला लगा दिया. पीड़ित जब अपनी शिकायत लेकर थाने पहुंचा तो पुलिस ने उसे डांट कर वहां से भगा दिया. इंसाफ की तलाश में यह शख्स अपने मासूम बच्चों समेत कलेक्ट्रेट में आमरण अनशन पर बैठ कर गुहार लगा रहा है. तो वहीं दलितों पर एक के एक अत्याचार से यह साफ हो गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार दबंगों पर शिकंजा कसने में नाकाम साबित हो रही है.

  • रिपोर्ट- गंधर्व गुलाटी

किन्नरों को मुफ्त शिक्षा देगा इग्नू

नई दिल्ली। पत्राचार के जरिए शिक्षा हासिल करने के सबसे बड़े केंद्र इग्नू ने एक बड़ा फैसला किया है. इग्नू ने कहा है कि वह अब किन्नरों को मुफ्त शिक्षा देगा. इग्नू के इस फैसले के बाद नाच-गाना छोड़कर आगे बढ़ने के किन्नर अब अपने जीवन में बेहतर कर सकेंगे. साल 2017 जुलाई में सुधा पहली किन्नर थी जिसने इग्नू में एडमिशन लिया था. किन्नर समुदाय के लोगों के लिए इग्नू ने सभी पाठ्यक्रमों में नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था कर दी है. इसके साथ ही इग्नू में विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिले की तिथि भी बढ़ा दी गयी है. अब विद्यार्थी 31 जनवरी 2018 तक एडमिशन ले सकते हैं, जिसकी प्रवेश परीक्षा चार मार्च 2018 को आयोजित की जाएगी.

कोरेगांव में शौर्य दिवस मनाने पहुंचे बहुजनों पर ब्राह्मणवादियों का हमला, एक की मौत

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कोरेगांव। पांच सौ महार सैनिकों द्वारा 28 हजार पेशवाओं को धूल चटाकर भारत में पेशवाई का खात्मा कर देने वाले भीमा कोरेगांव के युद्ध का जश्न मनाने पहुंचे लोगों पर हमले की खबर है. महाराष्ट्र के पुणे से 30किलोमीटर दूर भीमा कोरेगांव में हर साल एक जनवरी को दलित समुदाय के लोग शौर्य दिवस मनाने पहुंचते हैं. इस साल शौर्य दिवस के 200 साल पूरा होने के कारण देश भऱ से भारी संख्या में अम्बेडकरवादी पहुंचे थे. इस दौरान अचानक दोपहर को हिन्दुवादी संगठनों ने भीड़ पर पत्थरबाजी शुरू कर दी. इस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई.

भीड़ पर पत्थरबाजी के साथ ही हाथों में भगवा झंडा लिए एक दल ने कोरेगांव में शौर्य स्थल की तरफ जा रही गाड़ियों पर भी हमला कर दिया, जिसमें 40 से ज्यादा गाड़ियों के शीशे टूट गए. पुलिस के मुताबिक जब लोग गांव में युद्ध स्मारक की ओर बढ़ रहे थे तो दोपहर में पथराव और तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं. पुलिस के मुताबिक हिंसा तब शुरू हुई जब एक स्थानीय समूह और भीड़ के कुछ सदस्यों के बीच स्मारक की ओर जाने के दौरान किसी मुद्दे पर बहस हो गई. बहस के बाद पथराव शुरू हुआ. हालात इतने बिगड़ गए थे कि पुलिस के लिए स्थिति को संभालना काफी मुश्किल हो गया. एक व्यक्ति की मौत होने से पूरे इलाके में स्थिति तनावपूर्ण है. घटना के बाद नाराज दलित संगठनों ने 5 जनवरी को विरोध करने की घोषणा की है.

खबर यह भी है कि रविवार 31 दिसंबर को दलित और लेफ्ट संगठन के लोगों ने शनिवार वाड़ा में अम्बेडकरवादियों को संबोधित किया था. शनिवार वाड़ा पेशवाई गद्दी रही है. इसके बाद से ही स्थिति बिगड़ गई थी. पुलिस ने रविवार को ही मामला संभालने की कोशिश करते हुए इलाके में धारा 144 लगा दिया था. हालांकि शौर्य दिवस मनाने पहुंचे लोगों का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन ने स्थानीय लोगों को छूट दे दी थी, जिसके बाद हिंसा भड़की.

पुलिस की लापरवाही की बात इसलिए भी कही जा रही है क्योंकि अखिल भारतीय ब्राह्मण महासंघ ने पहले ही शनिवार वाडा में जश्न मनाए जाने को लेकर आपत्ति जताई थी. ब्राह्मण महासभा ने मांग कि थी कि दलितों को पेशवाओं की ड्योढ़ी ‘शनिवार वाडा’ में प्रदर्शन करने की अनुमति न दी जाए. बावजूद इसके पुलिस सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने में नाकाम रही. कुल मिलाकर इस घटना से अम्बेडकरवादियों की बढ़ती ताकत से बौखलाए हिन्दुवादी संगठनों की कुलबुलाहट सामने आ गई है.

 

आईसीसी U19 वर्ल्‍डकप की देन विराट, गब्बर और हिटमैन

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नई दिल्ली। आईसीसी अंडर 19 वर्ल्‍डकप इसी माह से न्‍यूजीलैंड में प्रारंभ होने जा रहा है. मुंबई के प्रतिभावान बल्‍लेबाज पृथ्‍वी शॉ के नेतृत्‍व में भारतीय टीम भी इस महत्‍वपूर्ण टूर्नामेंट में भाग लेगी. जूनियर स्‍तर के इस टूर्नामेंट के भविष्‍य के खिलाड़ी तैयार करने के लिहाज से खास माना जाता है. भारतीय जूनियर टीम वर्ष 2000, 2008 और 2012 में इस टूर्नामेंट में चैंपियन रही है जबकि दो बार वर्ष 2006 और 2016 में उसे उपविजेता रहकर संतोष करना पड़ा था. वर्ष 2016 में बांग्‍लादेश में हुए अंडर-19 वर्ल्‍डकप में टीम फाइनल तक पहुंची थी लेकिन उसे वेस्‍टइंडीज के हाथों हार का सामना करना पड़ा था. भारतीय क्रिकेट के लिहाज से बात करें तो कई खिलाड़‍ियों को इस टूर्नामेंट ने उच्‍च स्‍तर के क्रिकेट का अच्‍छा प्‍लेटफॉर्म दिया है.

दक्षिण अफ्रीका दौरे पर गई भारतीय टीम के कप्‍तान विराट कोहली सहित तीन प्रमुख प्‍लेयर्स को आईसीसी अंडर19 वर्ल्‍डकप की ही देन माना जा सकता है. विराट, रोहित शर्मा और शिखर धवन ने U19 वर्ल्‍डकप में शानदार प्रदर्शन करते हुए हर किसी का ध्‍यान खींचा और फिर सीनियर टीम में स्‍थान बनाते हुए सफलताएं अर्जित कीं. ये तीनों खिलाड़ी इस समय भारत की तीनों फॉर्मेट की टीम का हिस्‍सा हैं. विराट तो वर्ष 2008 में आईसीसी U19 वर्ल्‍डकप की चैंपियन रही भारतीय टीम के कप्‍तान थे. आइए डालते हैं, इन तीनों खिलाड़‍ियों के आईसीसी U19 वर्ल्‍डकप के प्रदर्शन पर नजर…