ख़त्म हुई आईपीएल की नीलामी, जानिये कौन सा खिलाड़ी किस टीम का हिस्सा बना…..

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नई दिल्ली। इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) 28 तारीख को दूसरे दिन की नीलामी में भी युवा खिलाड़ियों का दबदबा रहा. इनमें बाजी मारी भारत के बायें हाथ के तेज गेंदबाज जयदेव उनादकट ने, जिन्हें राजस्थान रॉयल्स ने 11 करोड़ रुपये में खरीदकर सभी को चौंका दिया. वह दो दिवसीय इस नीलामी में बेन स्टोक्स के बाद दूसरे सबसे महंगे खिलाड़ी बने. स्टोक्स को शनिवार को राजस्थान ने ही 12.5 करोड़ रुपये में खरीदा था. इस तरह इस नीलामी में दो सबसे महंगे खिलाड़ी राजस्थान का हिस्सा बने.

पहले दिन खाली हाथ लौटे वेस्टइंडीज के विस्फोटक बल्लेबाज क्रिस गेल को भी आखिरकार दूसरे दिन खरीदार मिल गया. उन्हें पंजाब ने बेस प्राइज दो करोड़ में खरीदा. आइपीएल में पहली बार नेपाल के क्रिकेटर को भी चुना गया है. नेपाल के 17 वर्षीय संदीप लेमीछान को दिल्ली की टीम ने 20 लाख रुपये में खरीदा.

आइये आपको बताते है की इन 8 टीमों में कौन – कौन किस की टीम का हिस्सा बना है-

चेन्नई सुपर किंग्स (CSK) महेंद्र सिंह धौनी, रवींद्र जडेजा, सुरेश रैना, हरभजन सिंह, मुरली विजय, सैम बिलिंग्स, मार्क वुड, फाफ डु प्लेसिस, ड्वेन ब्रावो, शेन वाटसन, केदार जाधव, अंबाती रायडू, इमरान ताहिर, लुंगी नगिदी, कर्ण शर्मा, मिशेल सेंटनर, शार्दुल ठाकुर, जगदीशन नारायण, दीपक चहर, आसिफ, कनिष्क सेठ, ध्रुव शौरी, क्षितिज शर्मा, मोनू सिंह, चेतन्य बिश्नोई.

सनराइजर्स हैदराबाद (SRH) डेविड वार्नर, भुवनेश्वर कुमार, शाकिब अल हसन, केन विलियमसन, शिखर धवन, मनीष पांडे, कार्लोस ब्रेथवेट, यूसुफ पठान, ऋद्धिमान साहा, राशिद खान, रिकी भुई, दीपक हुड्डा, सिद्धार्थ कौल, टी नटराजन, बासिल थंपी, सैयद खलील अहमद, संदीप शर्मा, सचिन बेबी, क्रिस जॉर्डन, बिली स्टैनलेक, तन्मय अग्रवाल, श्रीवत्स गोस्वामी, बिपुल शर्मा, मेहंदी हसन.

दिल्ली डेयरडेविल्स (DD) गौतम गंभीर, श्रेयस अय्यर, ऋषभ पंत, ग्लेन मैक्सवेल, जेसन रॉय, क्रिस मौरिस, कोलिन मुनरो, शमी, रबादा, अमित मिश्रा, पृथ्वी शॉ, राहुल तेवतिया, विजय शंकर, हर्षल पटेल, आवेश खान, शाहबाज नदीम, डेनियल क्रिश्चियन, जयंत यादव, गुरकीरत मान, ट्रेंट बोल्ट, मनजोत कालरा, अंकित शर्मा, अभिषेक शर्मा, संदीम लेमीछान, नमन ओझा, सयन घोष.

कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) सुनील नरेन, आंद्रे रसल, मिशेल स्टार्क, क्रिस लिन, दिनेश कार्तिक, रोबिन उथप्पा, पीयूष चावला, कुलदीप यादव, शुभमन गिल, इशांक जग्गी, कमलेश नागरकोटी, नीतिश राणा, विनय कुमार, अपूर्व वानखेड़े, रिंकू सिंह, शिवम मावी, कैमरोन डेलपोर्ट, मिशेल जॉनसन, जैवोन सिरलेस.

किंग्स इलेवन पंजाब (KXIP) आर अश्विन, युवराज सिंह, क्रिस गेल, केएल राहुल, डेविड मिलर, आरोन फिंच, मार्कस स्टोइनिस, अक्षर पटेल, करुण नायर, मयंक अग्रवाल, अंकित सिंह राजपूत, मनोज तिवारी, मोहित शर्मा, मुजीब जादरान, बरिंदर सरां, एंड्रयू टाई, अक्षदीप नाथ, बेन दवारशुइस, प्रदीप साहू, मयंक डागर, मंजूर दार.

राजस्थान रॉयल्स (RR) स्टीव स्मिथ, अजिंक्य रहाणे, बेन स्टोक्स, स्टुअर्ट बिन्नी, संजू सैमसन, बटलर, राहुल त्रिपाठी, डर्सी शार्ट, जोफ्रा आर्चर, गौतम कृष्णाप्पा, धवल कुलकर्णी, जयदेव उनादकट, अनुरीत सिंह, जहीर खान पकतीन, श्रेयस गोपाल, एमएस मिदहम, प्रशांत चोपड़ा, बेन लाफलिन, महिपाल लोमरोर, जतिन सक्सेना, आर्यमन विक्रम बिरला, दुष्मंता चमीरा.

रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (RCB) विराट कोहली, एबी डिविलियर्स, ब्रेंडन मैक्कुलम, वाशिंगटन सुंदर, पार्थिव पटेल, टीम साउथी, डि कॉक, उमेश यादव, यजुवेंद्र चहल, क्रिस वोक्स, कुल्टर नाइल, डि ग्रैंडहोम, मोइन अली, सरफराज खान, मनन वोहरा, कुलवंत खेजरोलिया, अनिकेत चौधरी, नवदीप सैनी, मुरुगन अश्विन, मंदीप सिंह, पवन नेगी, मुहम्मद सिराज, अनिरुद्ध जोशी, पवन देशपांडे.

मुंबई इंडियंस (MI) रोहित शर्मा, हार्दिक पांड्या, जसप्रीत बुमराह, किरोन पोलार्ड, मुस्ताफिजुर रहमान, पैट कमिंस, सूर्यकुमार यादव, क्रुणाल पांड्या, इशान किशन, राहुल चाहर, इविन लुइस, बेन कटिंग, प्रदीप सांगवान, जेपी डुमिनी, जेसन बेहरनडोर्फ, सौरभ तिवारी, तेजिंदर ढिल्लन, शरद लांबा, सिद्धेश लाड, आदित्य तारे, मयंक मारकंडे, अकिला धनंजय, अनुकूल रॉय, मोहसिन खान, निधिश एमडी दिनेशन.

 

नेशनल छात्रवृत्ति पोर्टल से परेशान हैं आरक्षित वर्ग के छात्र

देहरादून। विगत वर्ष उत्तराखण्ड में छात्रवृत्ति घोटाले के कारण हजारों अनुसूचित जाति जनजाति के छात्र छात्रवृत्ति पाने से वंचित रह गये. ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था उत्तराखण्ड समाज कल्याण विभाग द्धारा विगत दो वर्षों से किया जा रहा था, जिसमें छात्र/छात्राओं का पंजीकरण करने में कोई परेशानी नहीं आ रही थी. स़त्र 2017-18 के लिये नेशनल पोर्टल बनाया गया है जिसमें ऑनलाइन पंजीकरण करने में कई दिक्कतें सामने आ रही हैं. नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल दिन भर में केवल 2या 3 घंटे सुचारु रुप से कार्य करता है इस बीच दुर्गम क्षेत्र के विद्यालयों में बिजली कटौती की समस्या भी रहती है जिस कारण गरीब बच्चों के छात्रवृत्ति आवेदन पत्र पोर्टल में पंजीकृत नहीं हो पा रहे हैं. पोर्टल के संबंध में राज्य नोडल अधिकारी देहरादून से संपर्क करने पर ज्ञात हुआ कि जो टेलीफोन नंबर हेल्प लाइन के लिये दिया गया है, वह नंबर बंद है क्योंकि उस नंबर का बिल भुगतान ही नहीं किया गया है. नेशनल पोर्टल पर छात्रवृत्ति आवेदन की अंतिम तिथि 31 जनवरी 2018 है अगर पोर्टल 24 घंटे सुचारु रुप से नहीं चला तो उत्तराखण्ड के हजारों छात्र/छात्राएं इस वर्ष भी छात्रवृत्ति से वंचित रह जाएंगे. इसी संबंध में अनुसूचित जाति जनजाति शिक्षक एसोसिएशन ने उत्तराखण्ड शासन से अपील की है कि पहाड़ की विषम भौगौलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए छात्रवृत्ति आवेदन की ऑनलाइन तिथि को आगे बढ़ाया जाये तथा पोर्टल में आ रहे बार- बार के व्यवधान को दूर किया जाये. अनुसूचित जाति जनजाति शिक्षक एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता आई0 पी0 ह्यूमन द्वारा यह ज्ञापन दिया गया है जो खुद अपने विद्यालय के नोडल अधिकार हैं और छात्रवृत्ति प्रभार का कार्य विगत 4 वर्षों से देख रहे हैं.

आई0 पी0 हृयूमन प्रांतीय प्रवक्ता एससी/एसटी0 टीचर्स एसोसिएशन, उत्तराखण्ड  

पद्मावत और पीरियड फिल्मों से जुड़े सवाल

फिल्म पद्मावत ने मुझे पूरी तरह से निराश किया..एक्टिंग की बात करूँ तो सबकी एक्टिंग ठीक है, फ़िल्म देखकर एक बात तो तय है कि संजय लीला भंसाली बचपन के दिनों मे इतिहास जैसे विषय मे फेल होते रहेंगे.

इससे पहले रणबीर सिंह ने ” बाजीराव मस्तानी” में पेशवा बाजीराव का किरदार अदा किया था.वो उसमे जल्दी जल्दी बोलता है और उचककर सिंहासन पे ऐसे बैठता है जैसे कोई बच्चा. मुझे मराठा इतिहास पता है लेकिन उनके रहन सहन तौर तरीके नही पता.’इसलिए मैंने सोचा कि मराठो का ये कल्चर होगा जिसे डायरेक्टर ने बाखूबी दिखाया इसलिए मन ही मन प्रशंसा की.

दरअसल भरतीय मातृत्वादी है, जो हज़ारो साल पहले खुले मैदानों के बजाय, जंगल झाड़ियों, गुफाओं और बंद महलों के रहते आए है इसलिए उनकी आंख की पुतलियां जल्दी घूमती है, जहां आड़ पट होता है वहां आपमें हिरन की तरह चौकना, कान लगाकर सुनना और फुर्ती जैसी आदते आ जाती है. जंगल मे झुक कर चलना तो कभी पत्थर पे अचानक चढ़ के बैठ जाना. आवाज़ को दबाकर बोलना, तो कभी तेज़ बोलना, फुसफुसाना.

जबकि अरब के रहने वालों में ये गुण नही होते उन्हें दूर तक खुला मैदान दिखता है इसलिए उन्हें आहट पे चौकना या फौरन घूमने की ज़रूरत नही होती. उन्हें एक ही आवाज़ वो भी तेज़, और किसी पेड़ की झाड़ी डाल न होने की वजह से तन के चलने की आदत होती है

फ़िल्म में अलाउदीन जल्दी जल्दी बोलता है, मुस्लिम राजा कभी जल्दी नही बोलते, ठहरकर बोलना और सुस्ती से चलना उनकी आदत होती है.दूसरी बात फ़िल्म में अलाउददीन का किरदर बहुत बुरा दिखाया गया है, ये सच है उसने अपने चाचा का क़त्ल करके तख़्त हासिल किया लेकिन इतिहास ऐसे किस्सों से भरा बड़ा है.

फ़िल्म में गे एडिक्ट दिखाया है जबकि इसका एक भी जगह प्रमाण नही, कई सदी बाद बाबर ने बाबरनामा में होमोसेक्सुअलिटी पर लिखा है, उसने अपनी अज़ादपसन्द सोच को दिखाते हुए इसमें पॉजिटिविटी दिखाई है लेकिन किसी का नाम नही लिखा हैशुरू में दिखाते है कि अलाउददीन मंगोलों को हरा देता है, मंगोल का इतिहास आप जानते है इनसे खूखार कोई नही हुआ है.

भारत और चीन की 1965 की लड़ाई हुई उस वक़्त चीनी सैनिक भारत के सैनिकों पर गोलयां चलाते और जब भारत के सैनिक दम तोड़ देते तो वो पास आकर चाकू से बड़ी बेरहमी से उनका पेट मुँह और गला फाड़ देते. जब उनसे इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने जवाब दिया हाँ मुझे ये पता है कि सैनिक मर चुके है लेकिन ये तरीका हमने मंगोलों से सीखा है कि जब दुश्मन अपने सैनिकों की लाशों की ऐसी हालत देखे तो सहम जाए, उन्हें ये पता लगना चाहिए की हम कितने खूंखार है.

मंगोलो ने एक धनुष ईजाद किया था जो जानवर की दो पसलियों को जोड़कर बनता था, इस छोटे से धनुष की खासियत ये थी कि दुनियाभरके बेहतरीन धनुष से भी तीन गुना दूर उनका तीर जाता था.वो युद्ध मे कभी ऊंचे घोड़े इस्तेमाल नही करते थे, हमेशा टट्टू जिसकी गर्दन बहुत छोटी होती है, उनका मानना था ऐसा करने के पीछे कारण ये है कि बड़ी गर्दन वाले घोड़े के दोनों ओर एक बार मे तलवार चलाया नही जा सकता, आपको बार बार पोजीशन बदलना पड़ता है.

ऐसे मंगोलों को अलाउददीन बुरी तरह हराता है, मेरे ये नही समझ आता कि दुनिया भर के राजा जब कई देशों को जीतते है तो वीर पराक्रमी महान कहलाते है, फिर वो सिकंदर हो या अशोक लेकिन मुस्लिम राजा जब जीतता है तो धनलोलुप, क्रूर चरित्रहीन कहलाया जाता है. उसकी जींत में कभी उसके साहस की बात नही होती बस यही दिखाया जाता है की वो छल धोखे मक्कारी से जीता.

बाक़ी दुनिया नैतिकता से लड़ती रही.

अंग्रेज़ो के लिए भी यही कहा जाता है ख़ासकर क्लाइव के बारे में की फूट डालो राज करो कि नीति पर जीता अब क्या बताये इस देश मे फूट कब नही थी हक़ीक़त तो ये है कि जीत हिम्मत और उन्नत हथियारों से होती है, आंग्रेज़ों के पास अच्छी बंदूकें थी. बाबर भी तोप और बारूद की वजह से जीता. आज अमेरिका रूस इज़राइल मज़बूत अपने शौर्य और साहस से नही बल्कि हथियारों से है.

हमारी फ़िल्मे इस्लामोफोबिक स्टीरियोटाइप होती है. ख़िलजी मांस नोच रहा है, हद है पागलपन की. पिछले कई सालों से जितनी फ़िल्मे देखी है उसमें यही सब दिखाया गया है. बाहुबली के पहले पार्ट में कटप्पा के सामने एक मुस्लिम दिखाया और कटप्पा ने एकबार में ही उसकी तलवार काट दी. फ़िल्म मगधीरा में हरे कपड़े पहने मुस्लिमो की हज़ारो की तायदाद में फौज खड़ी होती है और हीरो अकेले सबको मार देता है. बाजीराव के सामने निज़ाम बौने हो जाते है और पूरी फ़िल्म में वो मुग़लो को चुनौती देता रहता है जबकि अपनी 27 जीतो में एक भी दिल्ली सल्तनत के करीब आकर नही जीती.

पद्मावती फ़िल्म में रतन सिंह का बार बार डायलॉग है जो ख़िलजी से बोलता है, इतिहास पन्नो पे नही लिखा जाता, सच तो ये है इतिहास पन्नो पे तो कुछ सही होता है लेकिन फ़िल्मो से इतिहास नही होता.

मेरे समझ नही आता कि करणी सेना क्यो इस फ़िल्म के विरुद्ध थी. जबकि फ़िल्म में राजपूतो का इतना महिमांडन किया गया है कि शायद ही किसी फिल्म में हो. धड़ कटे और लड़ता रहे वो है राजपूत, नाव टूट जाये और तैरकर समुदंर पर करे वो है राजपूत, मूछें नीची न हो वगैरह वगैरह, दरअसल ये चारणो भाटो की पंक्तियां है. राजपूत राजा भी आम इंसान थे. इसमे भी वीर पराक्रमी के साथ साथ डरपोक धोखेबाज़ हुए है. सभी जाति सभी धर्मो में ऐसा होता है.

याद रखिये महानता पराक्रम किसी एक जाति धर्म या लिंग की जागीर नही है, हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, दलित आदिवासी ब्राह्मण, स्त्री सबमे महान पराक्रमी भी हुए है और डरपोक गद्दार भी. कोई इंसान अगर चोरी करता है तो उसे चोर लिखिए, डकैत तब तक न लिखिए जब तक उसने डकैती न कि हो. कहने का अर्थ है किसी भी बुरे इंसान की बुराई उतनी ही करो जितने उसने बुरे काम किये हो.

ख़िलजी छल से जीता, बाबर छल से जीता, हुमायूँ, अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ औरंगज़ेब छल से जीते. फ़िल्म बनाओ तो कैरक्टर के साथ थोड़ा तो न्याय करो, संजय जी कम से कम इतिहास को एक बार ढंग से पढ़ तो लेते,

एक साल पहले फ़िल्म आई थी मोहनजोदाड़ो मुझे इस फ़िल्म को देखने की बड़ी दिलचस्पी थी. दरअसल मैं देखना चाहता था कि इस फ़िल्म में आर्यो का द्रविड़ो पर हमला दिखाएंगे, कैसे उन्होंने इस सभ्यता को तहस नहस कर दिया. कैसे उन्होंने लिखना सीखा, कौन से हथियार के साथ वो आये, लेकिन पूरी फिल्म में कहीं भी ये नही दिखा, डायरेक्टर भी सच नही दिखा सके और मनघडंत कहानी बनाकर पेश कर दी.

अंत मे एक बात कहूँगा, पीरियड फ़िल्मे बनाना है तो एनसीआरटी की किताबें और थोड़े विदेशी इतिहासकारो की लिखी किताबो को पढ़कर बना दे, अपने मन से जो कूड़ा परोसते है उसे अभिव्यक्ति की आज़ादी नही बल्कि मूर्खता का नमूना कहते है

लेखक- फैक अतीक किदवई

यूपी भाजपा में जंग, योगी और मौर्या के बीच लड़ाई तेज

उत्तर प्रदेश। में बीजेपी की सरकार को दस महीने हो गए हैं. पिछले साल 19 मार्च को योगी आदित्यनाथ ने देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. उस दिन उत्तर प्रदेश में जातिय समीकरण को साधने के लिए योगी के साथ दो उप-मुख्यमंत्री भी बनाए गए थे. लेकिन दस महीने बाद ही यह संतुलन डगमगाने लगा है. जिस केशव प्रसाद मौर्य के मेहनत और शानदार नेतृत्व में भाजपा ने यूपी में अपना 15 साल का वनवास खत्म किया था, भाजपा और योगी ने उन्हें ही किनारे कर दिया है.

खासकर सीएम योगी और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या के बीच खटपट की खबरें मीडिया और पार्टी में आम हो गई है. पिछले दस महीनों में कई बार दोनों के बीच मतभेद साफ दिखे हैं. हाल ही में यूपी दिवस के मौके पर तो यह मतभेद तब खुलकर सामने आ गए जब मौर्या 24 जनवरी को लखनऊ में आयोजित उत्तर प्रदेश दिवस के पहले समारोह में नहीं आए थे. हालांकि भाजपा नेताओं ने यह कह कर इस मामले को ढकने की कोशिश कि कि मौर्या का मुंबई में कार्यक्रम तय था लेकिन यूपी दिवस जैसे महत्वपूर्ण दिन प्रदेश के उप मुख्यमंत्री की गैर मौजूदगी सवाल खड़े करती है.

मौर्या की गैर मौजूदगी पर भाजपा नेतृत्व से नाराज उनके समर्थकों का कहना था कि यूपी दिवस के विज्ञापन में मौर्या का नाम नहीं था, जबकि उनसे जूनियर मंत्रियों के नाम मौजूद थे, इस वजह से वह शामिल नहीं हुए. उनकी बात में दम भी लगता है क्योंकि मामले के तूल पकड़ने के बाद समापन समारोह के विज्ञापन में उनका नाम डाला गया तो मौर्या पहुंचे भी. हालांकि इस दौरान मौर्या और योगी के बीच का खिंचाव साफ महसूस किया गया.

इससे पहले 20 जनवरी को वाराणसी में हुए युवा उद्घोष कार्यक्रम में भी मौर्या को नहीं बुलाया गया था. फिर 23 जनवरी को योगी की ओर से बुलाई गई मंत्रियों की मीटिंग में भी मौर्या नहीं पहुंचे थे.

तो वहीं इस महीने की शुरुआत में 4 जनवरी को भाटपार रानी और फिर 25 को देवरिया के राजकीय इण्टर कॉलेज में आयोजित सभाओं में केशव प्रसाद मौर्य ने मंच से मोदी का नाम तो लिया लेकिन योगी का एक बार भी जिक्र नहीं किया. इसी तरह गुजरात और हिमाचल प्रदेश में हुए शपथग्रहण समारोह में योगी के साथ दूसरे उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा गए, लेकिन केशव मौर्या दूसरे विमान से अलग से पहुंचे. इससे साफ पता चल गया कि मौर्या योगी के साथ दो-दो हाथ करने को तैयार हैं.

दरअसल दोनों नेताओं में खींचतान 2017 के विधानसभा चुनाव के समय से ही चल रहा है. भाजपा को सत्ता में लाने के लिए केशव प्रसाद मौर्या ने खूब मेहनत की. ओबीसी वोटों के बिना भाजपा का जितना संभव नहीं था सो मौर्या ने मौर्या समाज के अलावा कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज को बीजेपी के पक्ष में लाने के लिए खूब मेहनत की और सफल भी हुए. पार्टी के यूपी विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री के तौर पर सबसे पहले केशव प्रसाद मौर्या का नाम ही उछला. लगा कि मौर्या बस यूपी के नए सीएम बनने ही वाले हैं, लेकिन केशव मौर्या को मेहनत का लाभ नहीं मिला और जब सीएम बनाने की बारी आई तो पार्टी ने आनन-फानन में योगी आदित्यनाथ को विशेष विमान से दिल्ली बुलाकर सीएम बना दिया. मौर्या विरोध न करें इसलिए उन्हें डिप्टी सीएम तो बनाया गया लेकिन मौर्या इससे खुश नहीं थे.

सरकार गठन के बाद केशव प्रसाद मौर्या के पास सिर्फ चार जबकि योगी के पास 36 विभाग हैं. उसमें भी योगी मौर्या के विभाग पर लगातार नजर बनाए रखते हैं. मौर्या को सीएम की अपने विभाग को लेकर टोका-टोकी भी पसंद नहीं है.

यूपी सरकार के गठन के बाद एक दो तस्वीरों को लेकर भी बवाल मच चुका है. कुछ महीने पहले एक कार्यक्रम की वो तस्वीर काफी वायरल हुई थी, जिसमें मुख्यमंत्री योगी और उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा कुर्सी पर बैठे हैं जबकि वहीं केशव प्रसाद मौर्या स्टूल पर बैठे थे. तो वहीं एक दूसरी तस्वीर में कालराज मिश्र मंच पर ही मौर्या का हाथ झटकते नजर आए थे. इन दोनों तस्वीरों को जातीय असमानता से जोड़ कर देखा गया. मुख्यमंत्री योगी ठाकुर जाति के हैं और उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और कालराज मिश्र ब्राह्मण. जबकि मौर्या पिछड़ी जाति में आते हैं. यूपी के पिछड़े समाज के मतदाताओं ने इसे पिछड़ी जाति के अपमान के तौर पर देखा.

फिलहाल मौर्या और योगी के बीच का शीत युद्ध बढ़ता जा रहा है. साफ है कि सीएम योगी और भाजपा केशव प्रसाद मौर्या को उतनी तव्वजो देने को तैयार नहीं है, जितने के मौर्या हकदार हैं.

 

हिन्दुवादी संगठनों को छूट, चंद्रशेखर रावण को क्यों नहीं

एक फिल्म के विरोध को लेकर करणी सेना को आतंक मचाने की खुली छूट के बाद भाजपा शासित केंद्र और राज्य सरकारों पर सवाल उठने लगे हैं। सड़कों पर तलवार लहराते एक जाति विशेष के कुछ लोगों की तस्वीरें सामने आने के बाद बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि आखिर भाजपा की सरकार उनके आतंक की अनदेखी क्यों कर रही है और सरकार के साथ उस संगठन का क्या संबंध है.

असल में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से केंद्र और भाजपा शासित राज्य सरकार ने कुछ ख़ास तरह के गुटों और उनकी गतिविधियों को संरक्षण दिया है, जबकि दूसरे संगठनों के विरोध को कुचलने पर अमादा है. अपने विरोधी विचारधारा के लोगों के साथ भाजपा का रवैया जितना कठोर बना हुआ है, सहयोगी विचारधारा वालों को उतनी ही छूट हासिल है. करणी सेना के लोगों ने सिनेमाघरों पर हमले किए, गाड़ियों में आग लगाई, तोड़-फोड़ किया. संजय लीला भंसाली और दीपिका पादुकोण को लेकर आपत्तिजनक बयान दिए गए, लेकिन उनमें से किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. किसी पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज नहीं हुआ.

इसके उलट चंद्रशेखर रावण, जिग्नेश मेवाणी, कन्हैया कुमार और हार्दिक पटेल जैसे युवाओं को कभी न कभी जेल की हवा खानी पड़ी है. चंद्रशेखर रावण पर तो रासुका तक लगा कर उनके करियर को बर्बाद करने की कोशिश की गई है. चंद्रशेखर आज़ाद रावण की भीम आर्मी ने दलितों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ ज़रूर आवाज़ उठाई थी, आज वे कोर्ट से ज़मानत मिलने के बावजूद रासुका के कारण जेल में पड़े हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने यही कदम उन सवर्णों के ख़िलाफ़ नहीं उठाया, जिनकी वजह से चंद्रेशेखर रावण उर्फ शेखर कुमार को भीम आर्मी जैसे संगठन का गठन करना पड़ा. तमाम बातों के बीच सबसे निराशाजनक बात यह है कि देश के बुद्धिजीवियों के लगातार सवाल उठाए जाने के बाद भाजपा सरकार कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है.

जानिए कौन है पद्मश्री सम्मान लौटाने वाले गुरु सिद्धेश्वर

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नई दिल्ली। प्रसिद्ध अध्यात्मिक गुरू सिद्धेश्वर स्वामी ने पद्मश्री सम्मान लेने से मना कर दिया. उनका कहना यह था कि वह संत हैं और संतों को इन सब की जरुरत नहीं है. जाहिर सी बात है कि यह संत परंपरा और अध्यात्म का एक बढ़िया उदाहरण है.

पदमश्री सम्मान को लेकर अध्यात्मिक गुरू ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी. चिट्ठी में पीएम मोदी का आभार व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक गुरू ने लिखा, ‘प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान मुझे देने के लिए मैं भारत सरकार का आभार व्यक्त करता हूं. लेकिन मैं आपको अवगत कराना चाहता हूं कि मैं यह अवार्ड लेने का इच्छुक नहीं. संन्यासी होने के नाते मेरी इन अवार्ड्स में कोई रुचि नहीं. मुझे आशा है कि आप मेरे इस फैसले की सराहना करेंगे.’

असल में प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु सिद्धेश्वर स्वामी कर्नाटक के एक जाने-माने संत हैं. वह खासकर कर्नाटक के विजयपुर में सक्रिय हैं. बता दें कि हर साल की तरह इस बार भी गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्याव पर पद्मश्री पुरस्काकरों की घोषणा की गई थी. इस बार 85 हस्तिधयों को पद्म पुरस्का रों से सम्मारनित किया गया. इसमें 3 को पद्म विभूषण, 9 को पद्मभूषण और 73 को पद्मश्री सम्मारन दिया गया.

दलित आई.ए.एस होंगे राहुल की कोर टीम के प्रमुख

नई दिल्ली। कांग्रेस के अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रमुख के तौर पर काम करने वाले कोपुल्ला राजू अब राहुल गांधी की कोर टीम का भी हिस्सा होंगे. खबर है कि राजू राहुल गांधी की कोर टीम के प्रमुख होंगे.  कोपुल्ला राजू पूर्व आई.ए.एस अधिकारी हैं. राजू आंध्र प्रदेश से संबंध रखते हैं और आंध्र प्रदेश कैडर से ही आई.ए.एस हैं. 2013 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली थी. उसके बाद से राजू कांग्रेस के अनुसूचित जाति के प्रमुख के रूप में काम कर रहे थे.

कोर टीम के प्रमुख की जिम्मेदारी मिलने के बाद राजू अब कांग्रेस अध्यक्ष के 12 तुगलक लेन स्थित आवास से अपना काम करेंगे. राजू की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होगी और वो राहुल गांधी के आधिकारिक कार्यों को देखा करेंगे. खबर है कि राजू के आगे आने के बाद संगठन में भी आने वाले दिनों में फेरबदल किए जाएंगे. राजू के उपर भविष्य के लिए राहुल गांधी की टीम को उभारने की जिम्मेदारी रहेगी. कांग्रेस के हलकों में 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए राजू की नियुक्ति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

2019 के चुनाव के लिए भाजपा भी अपनी टीम को और बेहतर बनाने में जुटी हुई है. 2014 के चुनाव में भी भाजपा ने दो स्तरों पर काम किया था. एक ओर जहां नेता जमीनी स्तर पर जनता से संपर्क कर रहे थे तो वहीं दूसरी ओर भाजपा के दफ्तरों में बैठे उसकी टीम के लोगों के निशाने पर खासकर युवा थे. प्रचार माध्यमों के लिए भी भाजपा ने विशेष रणनीति बनाई थी. चुनाव में उसे इसका फायदा भी मिला था. अब राहुल गांधी भी अपनी कोर टीम को ज्यादा सक्रिय और ज्यादा महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने को तैयार हैं. ऐसे में राजू के सामने अहम चुनौती भी है.

फ्रांसिसी लेखक का भारत की जाति व्यवस्था पर बड़ा बयान

जयपुर। जयपुर में इन दिनों साहित्य उत्सव चल रहा है. इसमें देश-विदेश से जाने-माने साहित्यकार शिरकत करते हैं. बीते शुक्रवार को इस साहित्य उत्सव में शामिल होने के लिए जाने-माने फ्रांसीसी राजनीतिज्ञ क्रिस्टोफ जैफ्रोलोट भी पहुंचे थे. वह ‘डॉक्टर अंबेडकर और उनकी विरासत’ विषय अपना विचार रखने आए थे. क्रिस्टोफ की चर्चा यहां इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने ‘डॉक्टर अंबेडकर एंड अनटचबिलिटी’ नामक किताब लिखी है.

इस दौरान फ्रांसिसी लेखक ने दलितों को लेकर अपने विचार रखते हुए कहा कि ‘मुस्लिम होना उतना बुरा नहीं है, जितना दलित होना.’ आरक्षण नहीं होने की स्थिति में दलित कहीं नहीं पहुंचे होते. जैफ्रोलोट ने मीडिया की मिसाल देते हुए सवाल उठाया किअगर किसी तरह का आरक्षण नहीं होता तो आज दलित कहां होते? अगर आप आरक्षण हटा देते हैं तो फिर वे कहां हैं? फिर कहीं भी कोई दलित नहीं होगा, क्योंकि दलित होना अब भी एक लांछन है.

भाजपा के दलित प्रेम को बेनकाब करते हुए फ्रांसिसी लेखक ने कहा कि भाजपा ने दलितों पर अब ध्यान देना शुरू कर दिया है. यह सद्भाव की वजह से नहीं है, बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि वे उन्हें उभरते हुए वोट बैंक के तौर पर देखते हैं और ‘बांटो एवं राज करो’ की नीतियों का इस्तेमाल करते हैं.

कासगंज हिंसा पर गरजीं मायावती, भाजपा संघ को घेरा

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में जारी हिंसा पर यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने सवाल खड़े किए हैं. मायावती ने कहा है कि जिस तरह भाजपा शासित राज्यों में कानून व्यवस्था का बुरा हाल है उससे यह साफ होता है कि सत्ताधारी भाजपा का हर स्तर पर घोर अपराधिकरण हो गया है.

उत्तर प्रदेश का खासतौर पर जिक्र करते हुए मायावती ने अपने बयान में कहा कि उत्तर प्रदेश में कानून का संवैधानिक राज ना होकर जंगलराज जैसा माहौल व्याप्त है. इसका उदाहरण गणतंत्र दिवस पर कासगंज में हुई हिंसा है, जहां राज्य सरकार शांति स्थापित करने में विफल हुई है. पूर्व मुख्यमंत्री ने घटना की निंदा करते हुए दोषियों को सजा दिलाने की मांग की.

भाजपा पर निशाना साधते हुए बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने कहा कि हिंसा और अपराध के कारण अव्यवस्था कायम हो गई है. भाजपा शासन में कोर्ट कचहरी भी दोषियों को सजा देने में अपने आपको अपंग महसूस कर रही है क्योंकि सरकार सरकारी गवाहों को सुरक्षा देने में नाकाम रही है. इस दौरान मायावती ने भाजपा के अलावा संघ को भी घेरा. बसपा प्रमुख ने कहा कि एक तरफ जहां सत्ताधारी बीजेपी का घोर अपराधिकरण व सरकार का भगवाकरण हो गया है, वहीं आर.एस.एस का व्यापक राजनीतिकरण भी हो गया है. जिससे देश भर में एक विचित्र नकारात्मक स्थिति पैदा हो गई है.

फिल्म पद्मावत को लेकर देश भर में हुए बवाल पर मायावती ने कहा “माननीय सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार स्पष्ट निर्देश देने के बाद भी फिल्म पद्मावत पर बीजेपी सरकारों व आर.एस.एस का जो ढुलमुल रवैया रहा है, उससे साफ है कि भाजपा की सरकारें किसी न किसी रूप में जातिवादी व सांप्रदायिक हिंसा व हिंसक प्रवृति को बढ़ावा देते रहना चाहती हैं.” मायावती ने कहा कि ‘विकास’ व ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नाम पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व बीजेपी सरकारों का छलावा अब बेनकाब होकर लोगों के सामने आने लगा है.

असल में कासगंज में पिछले तीन दिनों से जारी हिंसा के बाद अब यूपी की जनता के बीच मायावती के शासन की चर्चा होने लगी है. उत्तर प्रदेश में जब भी बहुजन समाज पार्टी का शासन रहा है, इस तरह के हादसों पर अचानक ब्रेक लग जाता है. बसपा शासनकाल का रिकार्ड कहता है कि मायावती के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रदेश में बड़ी-बड़ी घटनाओं के बाद भी दंगा और जातीय हिंसा नहीं भड़कने दिया गया.

अंकुर

अपराध ब्यूरो ने जारी किए आंकड़े, भाजपाशासित राज्यों में दलित उत्पीड़न सबसे ज्यादा

नई दिल्ली। राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो ने हाल ही में 2016 में देश में हुए अत्याचारों की रिपोर्ट जारी कर दी है. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद एक चौंकाने वाली बात सामने आई है. पूरे साल के दौरान उन राज्यों में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार हुआ, जहां भाजपा का शासन है. वर्तमान में गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोवा तथा झारखण्ड में भाजपा का शासन हैं. इन सभी राज्यों में दलित उत्पीड़न के अपराध दूसरे राज्यों की अपेक्षा काफी अधिक दर्ज किए गए हैं. एक नजर डालते हैं पूरी रिपोर्ट पर-

साल 2016 में दलितों पर अत्याचार की कुल संख्या 40,801 दर्ज की गई, जो कि 2015 की संख्या 38,670 से 2,131 अधिक है. इस साल पिछले साल की अपेक्षा दलित उत्पीड़न के मामलों में 5.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुयी है. इसी प्रकार उसी अवधि में जनजाति वर्ग के विरुद्ध 6,568 अपराध घटित हुए जो कि 2015 की अपेक्षा 4.7 प्रतिशत अधिक रही. यही हाल महिलाओं के साथ बलात्कार के भी रहे, जिससे स्पष्ट है कि भाजपा राज में दलित महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. दलितों पर अत्याचार के मामले में मध्य प्रदेश पहले स्थान पर है. यहां 4,922 अपराध दर्ज किए गए. अपराध की दर 43.4 फीसदी रही जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से दोगुनी हैं. इसी प्रकार राजस्थान दलित अपराध में देश में दूसरे नंबर पर हैं, जहां 5,134 अपराध हुए हैं. उसकी दर 42.0 प्रतिशत रही जो कि राष्ट्रीय दर (20.3) से दोगुनी है. गोवा तीसरे स्थान पर है जहां अपराध दर 36.7 रही. गुजरात का स्थान 5वां है जहाँ अपराध दर 32.2 है जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से लगभग डेढ़ गुना है. इस अवधि में देश में दलितों की हत्या के 786 मामले दर्ज हुए. सबसे ज्यादा हत्याएं गुजरात में हुई. महिलाओं से जबरन बलात्कार की बात करें तो 2016 में पूरे देश में 2,540 यानि की ढाई हजार से ज्यादा दलित महिलाएं बलात्कार की शिकार हुयीं. बलात्कार की दर सबसे ज्यादा केरल में 4.7 रही. इसके बाद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और फिर गुजरात का जिक्र आता है. इन सभी राज्यों में भाजपा की सरकार है. जबकि दलित महिलाओं से बलात्कार के प्रयास के 3,172 मामले दर्ज किए गए. 2016 में कुल 1268 महिलाओं और लड़कियों के साथ छेड़खानी की रिपोर्ट दर्ज की गई. सामने आई इस सरकारी रिपोर्ट से स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न में दूसरे राज्यों से काफी आगे हैं. यह आंकड़े प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दलित उत्पीड़न को लेकर दिखाई गयी हमदर्दी तथा उनके “सब का साथ, सब का विकास” के नारे की भी पोल खोलती है.

फिल्म पद्मावत के विरोध से जुड़ा यह सच जानकर हैरान हो जाएंगे आप

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नई दिल्ली। फिल्म पद्मावत के विरोध में करणी सेना का हिंसक प्रदर्शन देश भर में जारी है. लेकिन मानवीयता की तमाम बातों को अनदेखा कर उपद्रवियों के हंगामे ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कथित तौर पर राजपूती शान के लिए लड़ी जाने वाली यह लड़ाई कायरता के हद तक चली आई है. बुधवार को यह तब देखने को मिला जब दिल्ली से सटे गुड़गांव में कुछ उपद्रवियों ने एक स्कूली बस पर हमला बोल दिया. जीडी गोयनका स्कूल की इस बस पर उपद्रवियों ने जब पथराव किया, तब उसमें बच्चे भी मौजूद थे.बच्चों पर हमले के इस वीडियो के सामने आने के बाद विरोध के तरीकों पर सवाल उठने लगे हैं.

जीडी गोयनका स्कूल की बस जब बच्चों को स्कूल से लेकर लौट रही थी तभी गांव घामदौज के पास कुछ उपद्रवियों ने बस पर पत्थर बरसा दिए. लेकिन बस चालक की सूझबूझ के चलते बच्चे और टीचर बाल-बाल बच गए. बस में 22 बच्चे सवार थे. सोशल मीडिया पर तमाम लोगों ने विरोध के तरीकों पर सवाल उठाया है. इसमें वो लोग भी शामिल हैं जो खुद इस समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. भोपाल में करणी सेना हिंसा फैलाने के चक्कर में इस कदर मशगूल हुई कि उन्होंने अपने ही कार्यकर्ता की गाड़ी को आग लगा दी. भोपाल के ज्योति टॉकीज पर करणी सेना के कार्यकर्ता प्रदर्शन कर रहे थे. तभी वे हिंसक हो उठे.

उन्होंने कई गाड़ियों में तोड़फोड़ कर दी और एक मारुति स्विफ्ट कार में आग लगा दी. यह कार उनके ही एक कार्यकर्ता सुरेंद्र सिंह चौहान की थी. दूसरी ओर पद्मावत फिल्म को लेकर सियासी सरगर्मियां भी तेज हो गई हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय नेता जहां इस मामले पर खामोश हैं तो वहीं बीजेपी शासित कई राज्य फिल्म को दिखाने के पक्ष में नहीं है. हिंसा की ज्यादातर खबरें उन्हीं राज्यों से आ रही है, जहां भाजपा का शासन है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पद्मावत के विरोध में हो रही हिंसा पर भाजपा को घेरा है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट करके कहा- “हरियाणा में बच्चों के खिलाफ हिंसा को किसी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता. हिंसा और नफरत कमजोर लोगों का हथियार है. बीजेपी नफरत और हिंसा का इस्तेमाल करके हमारे देश में आग लगा रही है.” तो आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट करते हुए लिखा, ‘अगर केंद्र सरकार, सारी राज्य सरकारें और सुप्रीम कोर्ट मिलकर एक फिल्म रिलीज नहीं करा सकते और सुरक्षित नहीं दिखा सकते हैं तो देश में कैसे आएगा निवेश?

ये निर्भया नहीं! आदिवासी रेप पीड़िता की कहानी है

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कोरापुत। एक खास वर्ग की नजर में शिक्षा देने वाली एक देवी की जयंती का जश्न जब पूरे राज्य भर में मनाया जा रहा था और ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को ‘आदर्श मुख्यमंत्री’ का सम्मान मिलने पर राजधानी में सत्ताधारी दल बीजेडी के कार्यकर्ता जश्न में डूबे हुए थे. इसी बीच ‘कुंदुली रेप’ पीङिता की खुदकुशी की खबर ने सारे राज्य को सन्न कर दिया.

10 अक्टूबर, 2017 की घटना है. भुवनेश्वर से करीब 500 किमी दूर आदिवासी बाहुल जिला कोरापुट के कुंदुली की नौवीं कक्षा की एक आदिवासी नाबालिग छात्रा के साथ सेना की वर्दी में कुछ जवानों ने दुष्कर्म किया. हालांकि जलालत में डूबी वह लड़की मर ना सकी लेकिन तकरीबन 100दिनों के बाद उसने अपने घर में दम तोड़ दिया. 22 जनवरी, 2018 को अचानक उसके आत्महत्या की खबर आई. घरवाले आनन-फानन में उसे अस्पताल लेकर गए लेकिन डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया.

कहा जा रहा है कि उसने आत्महत्या कर लिया है. लेकिन उसके शव का पोस्टमार्टम करने से पुलिस प्रशासन जिस तरह लगातार बचता रहा और दबाव बढ़ने पर जिस तरह श्मशान में उसका पोस्टमार्टम किया गया, वह कई सवाल उठा रहा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि सामान्यतः कोई भी आत्महत्या करे तो तुरंत जगजाहिर हो जाता है कि पीड़ित/पीङिता ने फांसी लगाकर या जहर या आग लगा कर खुदकुशी की है. लेकिन पीड़िता के मामले में किसी को कोई जानकारी नहीं दी गई. दूसरी बात यह भी है कि जब वो बलात्कार के बाद तीन महीने तक जिंदा रही फिर अचानक उसने आत्महत्या क्यों किया होगा? पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्या आएगा, यह अलग बात है लेकिन आत्महत्या का कारण फौरन उजागर ना करने का क्या मतलब रहा होगा? सुनाबेङा अनुमंडलाधिकारी नरहरि नायक ने 22 जनवरी को शाम तक आत्महत्या की पुष्टि कर दी.

सेना जवानों पर आरोप पहले तो मीडिया में खबर चली कि सेना जवानों ने रेप किया है. फिर इस बात को खारिज करते हुए ओडिशा पुलिस महानिदेशक डॉ आरपी शर्मा ने बताया कि वे सेना जवान नहीं थे. मामले में एक नया मोड़ तब आया जब पीड़िता ने बताया कि वे लोग सेना जवान थे. इस बयान के बाद फिर पुलिस की ओर से बयान आया कि वे सेना की वर्दी में थे ना कि सेना के जवान.

हालांकि 10 नवंबर को पीड़िता ने यह भी कहा था कि उसे पचास हजार रुपये देकर बयान बदलने के लिए दबाव डाला जा रहा है. पुलिस ने 16नवंबर को चार लोगों को हिरासत में लिया लेकिन अगले दिन तीन को छोड़ दिया और बाकी एक को डिटेक्शन के बाद सबूत ना मिलने के कारण 21 नवंबर को छोड़ा.

रेप नहीं हुआ है- ओएचआरसी रिपोर्ट ओएचआरसी ने जब मेडिकल रिपोर्ट में कहा कि पीड़िता के साथ रेप नहीं हुआ है. इस रिपोर्ट ने कई सवाल खड़े कर दिए. शहीद लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, कोरापुट और एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल ने भी रेप ना होने की पुष्टि की थी.

अब ऐसे में पहला सवाल है कि रेप नहीं हुआ तो पीड़िता गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती क्यों हुई थी? दुसरा, जिला अस्पताल से राज्य के सबसे बड़े अस्पताल एससीबी मेडिकल कॉलेज व अस्पताल, कटक में 19 नवंबर को क्यों लाया गया? तीसरा सवाल, जब रेप हुआ नहीं जैसा कि ओएचआरसी की रिपोर्ट में कही जा रही है तो पीड़िता को 27 नवंबर तक एससीबी मेडिकल कॉलेज में रखने की क्या जरूरत थी? चौथा सवाल, जब रेप नहीं हुआ तो मुख्यमंत्री ने जांच का आदेश क्यों दिया था?

इसी से मिलता-जुलता एक और घटना का उल्लेख करना जरूरी है. इसी जिले के टिकरी नामक जगह पर भी रेप की घटना हुई थी लेकिन इसमें उसके पीछे किसी का ध्यान नहीं गया. पर वहीं कुंदुली की अस्मिता (बदला हुआ नाम) के साथ रेप की घटना होने के बाद तमाम प्रकार से सबूतों को मिटाने, बयान बदलने व केस वापस लेने की कोशिशें की गई.

ऐसी कोशिश की आखिरकार पीड़िता ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया या फिर उसे मार डाला गया. ये दिल्ली की निर्भया नहीं, एक गरीब आदिवासी विधवा मां की लाडली थी जिसकी फिक्र किसी को नहीं थी. कोरापुट में कांग्रेस भले ही उसका शव लेकर एनएच-26 पर न्याय मांगती रही लेकिन किस लिए? 24 जनवरी को बीजेपी ने भी चक्का जाम किया लेकिन क्या इससे रेप का चक्का रूक जाएगा?

हालांकि इस मामले को भटकाने के लिए प्रेम प्रसंग से जोड़कर भी देखा जा रहा है. पुलिस ने कथित प्रेमी का वीडियो बयान रिकॉर्ड व पॉलीग्राफ टेस्ट भी की है लेकिन रिपोर्ट अभी खुलकर सामने नहीं आई है. हालांकि पॉलीग्राफ के दौरान 16 साल की उम्र के पीपुन नामक लङके से सत्तर सवाल किए गए हैं जिसके आधार पर कहा जा रहा है कि घटना के दिन पीङिता अपने प्रेमी के साथ मिली थी और बाद में शादी से मुकरने के कारण सामूहिक दुष्कर्म की कहानी बनाई. किसकी कहानी में कितना सच है रिपोर्ट बयां कर रही है. लेकिन ऐसी पुलिसिया कार्रवाई कोई नई नहीं है, जिसमें मामले की लिपापोती करने की कोशिश की जाती रही हो.

बड़ा सवाल यह है कि पीड़िता के जिंदा रहने पर न्याय ना दिला सके! उसे बचाया ना जा सका! यह उसकी नहीं समाज की हार है! उसका रेप सेना जवान ने किया हो या किसी अन्य ने क्या फर्क पड़ता है, रेप हुआ था ना! हमने तो इसे भी झूठला दिया.

रवि रनवीरा

पद्मावती हो या पद्मावत, बैन होने से इतिहास नहीं बदल सकता

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फिल्म रिलीज ना होती या रिलीज हो जाती है तो भी इतिहास न बदल पाता, बदलता भी तो सिर्फ चित्रण , घटना नहीं . यह घटना बताती है कि रजवाड़ों के दौर में औरतों की बहुत दुर्गति थी, वरना सैकड़ों औरतों का सामुहिक आत्मदाह कोई जुनून नहीं, एक लाचारी थी .

अलाउद्दीन खिलजी को कमीना कहने से मन को तसल्ली मिलती है, लेकिन #द्रोपदी_चीरहरण के पीछे कोई खिलजी नहीं था, उसके अपने ही थे, क्षत्रिय (राजपूत) ही थे. द्रोपदी को वस्तु की तरह दांव पर लगा दिया, फिर बेइज्जत किया . सीता के साथ भी कोई अच्छा सलूक नहीं हुआ .परंतु हमारे देश की कुकुरमुत्ते की तरह जितनी भी सेनाएं हैं सिर्फ अतीत पर हंगामा करने के लिए हैं .

देश में प्रतिदिन औसतन 28 गैंगरेप हो रहे हैं, लेकिन फिक्र किसे है ? भला हो #अंग्रेजों का देश में आए, हमें कानून दिया, पुलिस दी, अदालतें बनाई . आज के दिन लक्ष्मण ने सरूपनखां का नाक काटा होता तो धारा 326 लग जाती, वो दौर रजवाड़ों के लिए ठीक रहा होगा, प्रजा के लिए नहीं .

विडंबना यही है कि हमारे पास सिर्फ इतिहास है उसी में जी रहे हैं . भविष्य के लिए कोई प्लानिंग नहीं है जबकि विश्व के तमाम विकसित देश 100 साल का एडवांस प्लान लेकर चल रहे हैं, हम सिर्फ तमाशबीन हैं .

इसलिए “टाइगर” सलमान पर्दे पर आतंकियों को मारकर 300 करोड़ कमा चुका है और इधर हमारे फौजियों की विधवाओं को पेंशन के लिए भी मुकदमे लड़ने पड़ते हैं……. .

रवीश कुमार  

जाने 1990 के बाद तीसरी बार ऐसा क्या किया भारतीय क्रिकेट टीम ने.

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नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम 2012 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पर्थ टेस्ट मैच के बाद आज जोहानिसबर्ग में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ हो रहे टेस्ट मैच में बिना किसी स्पिन गेंदबाज के मैदान में उतरी है, आपको बता दें कि 1990 के बाद ये तीसरा मौका है, जब भारतीय टीम बिना किसी स्पिन गेंदबाज़ के टेस्ट मैच खेलने उतरी है.

इस मैच में विराट कोहली ने अजिंक्य रहाणे को रोहित शर्मा के स्थान पर मौका दिया, तो आर. अश्विन की जगह भुवनेश्वर कुमार को जगह दी गई. भारतीय टीम ने तो इस अहम मुकाबले में 5 तेज़ गेंदबाज़ों को मौका दिया है, वहीं द. अफ्रीका की तरफ से भी इस मैच में कोई स्पिन गेंदबाज़ नहीं खेल रहा है. जहां भारत ने अश्विन की जगह भुवनेश्वर कुमार को प्लेइंग इलेवन में शामिल किया है, तो वहीं द. अफ्रीकी टीम ने भी इस मुकाबले के लिए स्पिनर केशव महाराज की जगह तेज़ गेंदबाज़ एंदिले फेलुक्वायो को मौका दिया है.

जोहानिसबर्ग में खेले जा रहे इस मुकाबले के लिए पिच क्यूरेटर ने पिच पर से घास नहीं हटाई थी. पिच पर घास होने की से इस मुकाबले में तेज़ गेंदबाज़ों को विकेट से काफी मदद मिलेगी और यही वजह है कि दोनों टीमों ने इस मुकाबले के लिए अपनी टीमों में किसी भी स्पिन गेंदबाज़ को शामिल नहीं किया है. दक्षिण अफ्रीका के कप्तान फाफ डु प्लेसिस पिच को देखकर काफी खुश नज़र आए और विराट ने इसको लेकर कहा कि ये केपटाउन की तरह ही जीवंत पिच होगी. हालांकि, यहां पर घास उससे ज्यादा है

 

लालू को फिर सजा, तो अब जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे लालू यादव

नई दिल्ली। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को चारा घोटाले से जुड़े एक अन्य मामले में 5 साल की सजा सुनाई गई है. चारा घोटाला के देवघर कोषाघार से जुड़े केस के बाद अब लालू को चाईबासा से जुड़े एक दूसरे केस में दोषी पाया गया है. ऐसे में अब सवाल उठने लगा हैं कि क्या लालू यादव राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने की अवस्था में कभी जेल से बाहर आ सकेंगे?

चारा घोटाला से जुड़े देवघर कोषाघार केस में लालू यादव को 23 दिसंबर को रांची की विशेष सीबीआई अदालत ने दोषी माना, जिसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया. इसके बाद 6 जनवरी 2018 को कोर्ट ने उन्हें साढ़े तीन साल की सजा सुनाई और 5 लाख का जुर्माना लगाया. अब तक चारा घोटाला से जुड़े दो केस में लालू को साढ़े 8 साल जेल की सजा सुनाई जा चुकी है.

24 जनवरी को तीसरे केस में एक बार फिर 5 साल की सजा मिलने के बाद लालू यादव की पूरी सजा बढ़कर साढ़े 13 साल की हो गई है. इसमें से अब तक करीब 1 साल दो महीने लालू जेल में गुजार चुके हैं. यानी तीन केस में ही लालू को रांची विशेष सीबीआई अदालत के फैसले के तहत अभी 12 साल से ज्यादा और जेल में रहना पड़ेगा. बड़ा संकट ये है कि कुल 900 करोड़ के चारा घोटाले में लालू के खिलाफ अभी तीन और मामले लंबित हैं.

अगर, लालू को उच्च अदालत से राहत नहीं मिलती है, तो लालू प्रसाद यादव 2019 तो दूर 2024 के लोकसभा चुनाव में भी शायद ही जनता के बीच जा सकें. इन तमाम मामले में लालू यादव को बेल मिलना भी मुश्किल माना जा रहा है. खासतौर पर भाजपा के शासन में रहते तो ऐसा होता नहीं दिखता.

फिलहाल लालू यादव उम्र के उस पड़ाव में हैं जो राजनीतिक सक्रियता के लिहाज से रिटायरमेंट की तरफ बढ़ रहा है. ऐसे में 69 साल के हो चुके लालू की सक्रियता अब 2019 के लोकसभा चुनाव, 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव और उसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगी, इसकी संभावना कम ही है. ऐसे में संभव है कि लालू यादव की पिछले बिहार चुनाव के दौरान जनता के बीच में उपस्थिति उनके राजनैतिक जीवन की आखिरी याद बनकर रह जाए.

 

शासकों की विषमता मूलक प्रवृति के पीछे

लगता है अच्छे दिन का सपना दिखाकर प्रचंड बहुमत में आई मोदी सरकार के बुरे दिन शुरू हो चुके हैं. जहां कई संगठन व बुद्धिजीवी मोदी-राज से त्रस्त होकर उससे मुक्ति की परिकल्पना में निमग्न हो गए हैं, वहीँ खुद सरकार समर्थक बुद्धिजीवी तक भी उसके विकास की पोल खोलने पर आमादा हो गए हैं. ऐसे ही एक बुद्धिजीवी ने कुछ दिन पहले एक अख़बार में बड़ी निष्ठुरता से मोदी के विकास मॉडल को की पोल खोलकर रख दिया था. उन्होंने लिखा था,’ आम आदमी के आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के हमारे आजाद भारत के संकल्प को मंजिल तक पहुंचाने में अब तक की सभी सरकारें नाकाम रहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत अपेक्षाएं , लेकिन आर्थिक संतुलन स्थापित करने एवं अमीर –गरीब की खाई को पाटने की दृष्टि से उनकी एवं उनकी सरकार की नीतियां भी संदेहास्पद ही कही जाएँगी. क्योंकि उन्होंने जो दिशा पकड़ी है वह भी ऐसे विकास का प्रारूप है जिसमें अमीर अधिक अमीर ही होता जाएगा? मोदी सरकार भी अपनी जिम्मेदारी पर गरीब व्यक्ति को आर्थिक स्तर पर ऊपर उठाने की कोई योजना प्रस्तुत नहीं कर पायी है. किसी गरीब को गैस सिलेंडर दे देने से या उनके घर तक सड़क या बिजली पहुंचा देने से एक संतुलित आदर्श समाज की रचना नहीं होगी.

..आजादी के शुरुआती तीन चार दशक तक देश के शीर्ष नेतृत्त्व एवं नीति निर्माताओं में राष्ट्र के प्रति समर्पण था और भारत की संस्कृति एवं भारतीयता के प्रति निष्ठां थी, परन्तु नब्बे के दशक तक पहुँचते-पहुंचते हमने जिस बाजारमूलक अर्थव्यवस्था को अपनाना शुरू किया , उसने विकास की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया है. विदेशी निवेश के लुभावने एवं चकाचौंध भरे आह्वान में लगा कि रोजगार बढ़ेगा, गरीबी दूर होगी,और सार्वजनिक क्षेत्र की जो कम्पनियाँ घाटे में चल रही हैं वे निजी भागीदारी से मुनाफ कमाने वाली मशीनों में तब्दील हो जायेंगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. घाटे के नाम पर सरकारों ने उन सरकारी मशीनों को बंद ही कर दिया , जो आम जनता की सेवा के लिए गठित की गईं थीं. सरकारों ने विकास के नाम पर जनता पर अनचाहा भार ही नहीं लादा बल्कि अपनी लोभ की मानसिकता को भी थोपा. विकास के नाम पर पनप रहा नया नजरिया न केवल घातक है बल्कि मानव अस्तित्व पर खतरे का संकेत भी है. देश के शासक जिस रास्ते पर हमें ले जा रहे हैं वह आगे चलकर अंधी खाई की ओर मुड़ने वाली है.’ इस स्थिति पर लेखक ने सवाल पूछा है,’ आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या इस प्रवृति के बीज हमारी आजादी के लक्ष्य से जुड़े संकल्पों में रहे या यह विश्व बाजार के दबाव में हुआ?

बहरहाल लेखक ने शासकों की विषमतावादी प्रवृति के बीज जानने के क्रम में जो एकाधिक कारण गिनाएं हैं, उसमें एक बात तो तय है कि इसका सम्बन्ध आजादी के लक्ष्यों से जुड़े संकल्पों से तो बिलकुल ही नहीं रहें: आजादी के संकल्प तो बहुत उत्तम रहे. इस बात का खुलासा करते हुए विपिन चन्द्र-मृदुला मुखर्जी –आदित्य मुखर्जी ने ‘आजादी के बाद का भारत’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ में लिखा है- ‘भारत की आजादी इसकी जनता के लिए एक ऐसे युग की शुरुआत थी, जो एक नए दर्शन से अनुप्राणित था.1947 में देश ने अपने आर्थिक पिछड़ापन , भयंकर गरीबी , करीब-करीब निरक्षरता , व्यापक तौर पर फैली महामारी, भीषण सामाजिक विषमता और अन्याय के उपनिवेशवादी विरासत से उबरने के लिए लम्बी यात्रा की शुरुआत थी. 15 अगस्त पहला पड़ाव था , यह औपनिवेशिक राजनीतिक नियंत्रण में पहला विराम था: शताब्दियों के पिछड़ेपन को अब समाप्त किया जाना था, स्वतंत्रता संघर्ष के वादों को पूरा किया जाना था और जनता की आशाओं पर खरा उतरना था. भारतीय राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना तथा राष्ट्रीय राजसत्ता को विकास एवं सामाजिक रूपांतरण के रूप में विकसित एवं सुरक्षित रखना सबसे महत्वपूर्ण काम था. यह महसूस किया जा रहा था की भारतीय एकता को आँख मूंदकर मान नहीं लेना चाहिए. इसे मजबूत करने के लिए यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत में अत्यधिक क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय एवं धार्मिक विभिन्नताएं मौजूद हैं. भारत की बहुतेरी अस्मिताओं को स्वीकार करते एवं जगह देते हुए तथा देश के विभिन्न भागों और लोगों के विभिन्न तबको को भारतीय संघ में पर्याप्त स्थान देकर भारतीयता को और मजबूत किया जाना था.’

दुःख के साथ कहना पड़ता है आजाद भारत के शुरुआती तीन चार दशक तक देश के शीर्ष नेतृत्त्व एवं नीति निर्माताओं में राष्ट्र के प्रति समर्पण दिखाया: आधारभूत उद्योग-धंधे खड़ा कर देश को विकसित करने का बढ़िया प्रयास किया, किन्तु उस विकास को विविधतामय भारत के विविध समूहों के मध्य वितरित कर भारतीयता को मजबूत करने का प्रयास नहीं किया. ऐसा इसलिए कि चूँकि जाति समाज में व्यक्ति सोच स्व-जाति/ वर्ण के चेतना के मध्य घूर्णित होती रहती है और यह चेतना बड़े से बड़े साधु-संत, लेखक –कलाकार में समग्र- वर्ग की चेतना विकसित ही नहीं होने दिया ,इसलिए आजाद भारत के शासक, जो मुख्यतया सवर्ण समाज से रहे, अपनी स्व-जातीय/वर्णीय स्वार्थ के चलते ऐसी योजना न बना सके जिससे थोड़ा बहुत जो भी विकास हुआ , उसका तमाम सामाजिक समूहों के मध्य वाजिब बंटवारे का मार्ग प्रशस्त हो सके. इस स्व-जातीय/वर्णीय सोच के कारण ही वे 25 नवम्बर, 1949 को डॉ. आंबेडकर द्वारा आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे से जुड़ी दी गयी चेतावनी की अनदेखी कर गए. हाँ, उन्होंने एक काम जरुर किया कि वे एससी/एसटी को संविधान द्वारा प्रदान किये आरक्षण को, अनिच्छापूर्वक ही सही, किसी तरह झेलने की मानसिकता विकसित कर लिया . किन्तु जब 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई, भारत के परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधाभोगी वर्ग की वर्णवादी चेतना नाटकीय रूप से तुंग पर पहुँच गयी.

मंडल के खिलाफ जहां विशेषाधिकारयुक्त के युवा आत्म-दाह और राष्ट्र की संपदा दाह में प्रवृत हुए, वहीँ इस तबके की हिमायती एक पार्टी ने राम मंदिर का मुद्दा उठाकर राष्ट्र की हजारों करोड़ की संपदा और असंख्य लोगों की प्राण हानि कराने के साथ भ्रातृत्व के कंगाल भारत की थोड़ी-बहुत दिख रही एकता को भी छिन्न –भिन्न कर दिया, जो विशुद्ध रूप से देश-विरोधी कार्य था. लेकिन सबसे खतरनाक काम किया नरसिंह राव ने, जिन्होंने आरक्षण को कागजों तक सिमटने के कुत्सित इरादे से 24 जुलाई,1991 को भूमंडलीकरण की अर्थनीति अडॉप्ट कर निजीकरण, उदारीकरण, विनिवेशीकरण का सैलाब बहा दिया गया. नरसिंह राव द्वारा शुरू किये गए इस काम को आगे बढ़ाने में अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने एक दूसरे होड़ लगाया. 24 जुलाई,1991 को गृहित अर्थनीति के फलस्वरूप ही लाभजनक सरकारी उपक्रमों के औने-पौने दामों में निजी क्षेत्र के हाथों में जाने, सुरक्षा से जुड़े उपक्रमों में विदेशी निवेश ,अमीर-गरीब की खाई आश्चर्यजनक रूप से बढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ जो आज डरावना रूप अख्तियार कर चुका है. और यह सब किया गया सिर्फ और सिर्फ आरक्षण के खात्मे को ध्यान में रखकर. बहरहाल नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने आरक्षण के खात्मे को ध्यान में रखकर देश का बुनियादी आर्थिक ढांचा ध्वस्त करने और अर्थतंत्र निजीक्षेत्र के मालिकों और विदेशियों के हाथों में देने का जितना काम बीस सालों में किया, उतना नरेंद्र मोदी ने तीन सालों में कर दिखाया है. बहरहाल आज भारत नामक देश आर्थिक और सामाजिक विषमता , जो कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है, के मामले में विश्व चैम्पियन बन चुका और संघ के प्राख्यात मजदूर नेता रहे दत्तो पन्त ठेंगड़ी की भाषा में, ‘जो आर्थिक स्थितियां और परिस्थितयां बन या बनायी जा रही हैं, उसके फलस्वरूप देश का नए सिरे से विदेशियों का गुलाम बनना तय सा दिख रहा है’.नवउदारवादी नीतियों के जरिये देश को विषमता के दलदल में धकेलने और विदेशियों का गुलाम बनाने लायक शासकों की प्रवृति के खिलाफ दलित-आदिवासी –पिछड़ों के संगठन गत दो दशकों से लगातार चीत्कार किये जा रहे हैं, पर शासकों की ओर से आरक्षण के खात्मे के जूनून में निरंतर इसकी अनदेखी होती रही. उनकी इस सुनियोजित चाल की ओर संकेत करते हुए चर्चित समाज विज्ञानी रजनी कोठारी ने अपनी पुस्तक’भारत में राजनीति : कल और आज ‘ में डेढ़ दशक पहले लिख डाला था-‘ जनता अपनी तरफ से राज्य पर दबाव डाल रही है कि वह ऐसा न करे. यह दबाव जातीय और क्षेत्रीय आन्दोलनों के साथ-साथ लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चलाये जा रहे वर्ग और जाति आधारित संघर्षों के रूप में देखा जा रहा है. पर, समस्या यह है कि ठीक इसी समय राज्य की बागडोर सँभालने वालों ने तक़रीबन नियोजित रूप में अपनी पकड़ ढीली कर दी है. सामाजिक और क्षेत्रीय दायरों के प्रति उनका सरोकार कम पद गया है. एक तरफ राज्य की पुनर्संरचना होने की कोशिश हो रही है, दूसरी तरफ राज्य अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से मुंह चुरा रहा है. ‘

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

संपर्क:9654816191

बसपा नेता के समधी बनेंगे राजबब्बर, बेटे प्रतीक की सगाई हुई

राजनीति के मैदान में कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी भले ही एक-दूसरे के बहुत पास नहीं आ सकी हो, निजी जीवन में दोनों पार्टियों के दो दिग्गज नेता साथ आ गए हैं. कांग्रेस के यूपी प्रदेश अध्यक्ष व अभिनेता राजबब्बर के बेटे प्रतीक बब्बर और बहुजन समाज पार्टी के बड़े नेता पवन सागर की बेटी सान्या सागर शादी करने वाले हैं. राज बब्बर के बेटे प्रतीक बब्बर ने सोशल साइट इंस्टाग्राम पर खुद यह जानकारी दी.

22 जनवरी को एक सादे कार्यक्रम में लखनऊ के मोहनलाल गंज के एक रिसोर्ट में दोनों परिवारवालों की मौजूदगी में शादी से पहले की रोका रस्म हुई. प्रतीक बब्बर ने बीते दिसंबर में गोवा में एक संगीत कार्यक्रम में सान्या को प्रोपोज किया था. तब किसी को भी इसके बारे में जानकारी नहीं थी. यहां तक कि उसके माता-पिता भी इस रिश्ते के बारे में नहीं जानते थे.

प्रतीक ने इंस्टाग्राम अकाउंट के जरिये इस रिश्ते के बारे में बताया कि जब से वह मेरी जिंदगी में आई हैं, मैं एक बहुत ही सुरक्षित व्यक्ति हो गया हूं. प्रतीक और सान्या एक-दूसरे को पिछले आठ साल से जानते हैं. इस पूरे कार्यक्रम को काफी सादगी से किया गया. कार्यक्रम को राजनीतिक भीड़ और मीडिया से भी दूर रखा गया. दरअसल पिछले साल प्रतीक के दादाजी का निधन हो गया था. ऐसे में समारोह सादगी भरा रहा और इसलिए शादी अगले साल होगी.

प्रतीक बब्बर ने  ‘जाने तू या जाने ना ‘, ‘एक दीवाना था ‘ और ‘धोबी घाट ‘ जैसी फिल्मों में अभिनय किया है जबकि सान्या ने फिल्म मेकिंग में अपना पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया है और फिल्म मेकिंग में आने को तैयार हैं. यह डिग्री उन्होंने लंदन की गोल्डस्मिथ्स यूनिवर्सिटी से हासिल की है. जहां तक बसपा नेता पवन  सागर की बात है तो सागर बसपा प्रमुख मायावती के करीबी हैं. मायावती के मुख्यमंत्रित्वकाल में सागर ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी के रूप में उनसे अटैच थे औऱ बाद में बसपा ज्वाइन कर लिया.

जयंती विशेषः बिहार में कर्पूरी ठाकुर का कद कोई नहीं छू पाया

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महाकवि कबीर ने कहा है-‘सहज सहज सब कोई कहे, सहज न जाने कोइ।’  हालांकि जननायक कर्पूरी ठाकुर का संपूर्ण जीवन ही सहजता का पर्याय था. कर्पूरी ठाकुर का जन्म भारत में ब्रिटिश शासन काल के दौरान समस्तीपुर के एक गांव पितौंझिया में 24 जनवरी, 1924 को हुआ था. बाद में उनके सम्मान में इस गांव का नाम कर्पूरीग्राम हो गया. सामाजिक रुप से पिछड़ी किन्तु सेवा भाव के महान लक्ष्य को चरितार्थ करती नाई जाति में उनका जन्म हुआ.

कर्पूरी ठाकुर भारत के स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक, राजनीतिज्ञ तथा बिहार राज्य के मुख्यमंत्री रहे. लोकप्रियता के कारण उन्हें जन-नायक कहा जाता है. उनका पूरा जीवन संघर्ष की मिसाल रहा. तो अपने राजनीतिक जीवन को भी उन्होंने निष्कलंक और पूरी ईमानदारी के साथ जीया और हमेशा गरीबों और शोषितों की भलाई के लिए सोचते और लड़ते रहें. भारत छोड़ो आन्दोलन के समय उन्होंने 26 महीने जेल में बिताए थे.

आजादी के बाद उनके राजनीतिक जीवन को नई ऊंचाई मिली. तब सत्ता में आने पर देश भर में कांग्रेस के भीतर कई तरह की बुराइयां पैदा हो चुकी थीं, इसलिए उसे सत्ताच्युत करने के लिए सन 1967 के आम चुनाव में डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया गया. कांग्रेस पराजित हुई और बिहार में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी. कमान कर्पूरी ठाकुर को मिली.

वह 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 तथा 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 के दौरान दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. अपने शासनकाल में उन्होंने गरीबों के हक के लिए काम किया. पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने अति पिछड़ों को हक दिलाने के लिए मुंगेरी लाल आयोग का गठन किया. उनके दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर प्रदेश के शासन-प्रशासन में पिछड़े वर्ग की भागीदारी की बात उठी. तब इसमें उनकी भागीदारी नहीं थी. इसलिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग जोर-शोर से की जाने लगी.

कर्पूरी जी ने मुख्यमंत्री की हैसियत से उक्त मांग को संविधान सम्मत मानकर एक फॉर्मूला निर्धारित किया और काफी विचार-विमर्श के बाद उसे लागू भी कर दिया, जिससे पिछड़े वर्ग को आरक्षण मिलने लगा. इस पर पक्ष और विपक्ष में थोड़ा बहुत हो-हल्ला भी हुआ. अलग-अलग समूहों ने एक-दूसरे पर जातिवादी होने के आरोप भी लगाए. मगर कर्पूरी जी का व्यक्तित्व निरापद रहा. उनका कद और भी ऊंचा हो गया. अपनी नीति और नीयत की वजह से वे सर्वसमाज के नेता बन गए. अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने जिस सादगी के साथ गरीबों का उत्थान किया, वैसी मिसाल कहीं और देखने को नहीं मिली.

बौद्ध भिक्षु ने दुनिया को चौंकाया, तस्वीर वायरल

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थाईलैंड। तमाम धर्म अपने भीतर के चमत्कार को खूब प्रचारित करते हैं. कुछ धर्म तो चमत्कार की कहानियों पर ही टिके हुए हैं. बौद्ध धम्म ऐसा धम्म है, जहां चमात्कार की बजाय करुणा, प्रज्ञा, शील, शांति, बंधुत्व और सौहार्द की बात की जाती है. आम तौर पर इस धर्म और इसके धर्म गुरुओं से जुड़ी खबरें बहुत कम सामने आती है, लेकिन जब आती हैं तो दुनिया को चौंका जाती है. एक ऐसी ही खबर थाइलैंड से आई है.

थाईलैंड में बौद्ध भिक्षु के शव को एक रस्म के लिए उनकी मौत के बाद कब्र से निकालने की परंपरा रही है. पिछले दिनों जब एक बौद्ध भिक्षु के शव को उनके अनुयायियों ने रस्म के लिए कब्र से बाहर निकाला, तो वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें खुली रह गई. देखते ही देखते यह खबर दुनिया भर में फैल गई. असल में बौद्ध भिक्षु के शरीर पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा था और उनके चेहरे पर एक मुस्कान थी.

असल में बौद्ध भिक्षुओं के गुरु Luang Phor Pian की 92 साल की उम्र में 16 नवंबर को परिनिर्वाण हो गया था. परिनिर्वाण यानि मृत्यु के बाद उन्हें उसी बौद्ध परिसर में दफना दिया गया जहां वे सेवा करते थे. दो महीने बाद जब एक खास रस्म के लिए उनका शव कब्र के बाहर निकाला गया तो लुआंग के चेहरे की मुस्कान देखकर बाकी भिक्षु दंग रह गए. मानों वो खुशी से चैन की नींद में सो रहे हों.

इस तस्वीर के सामने आने के बाद एक्सपर्ट्स के लिए भी यकीन करना मुश्किल है कि 2 महीने बाद भी उनका शरीर वैसा ही है. ऐसा लग रहा है मानो इनकी मौत सिर्फ 36 घंटे पहले हुई हो. वहीं भिक्षु के अनुयायियों के मुताबिक उनके चेहरे पर मौजूद मुस्कान इस बात का इशारा है कि वे शांति की अवस्था को प्राप्त हो गए हैं. इसी तरह कुछ साल पहले एक सर्वे में दुनिया के सबसे बड़े खुशहाल व्यक्ति के रूप में एक बौद्ध भिक्षु का नाम सामने आया था.

फिलहाल रस्म के मुताबिक खास रस्म की प्रक्रिया शुरू हो गई है. भिक्षु के शव को साफ कर नए कपड़े पहना दिए गए है और प्रार्थनाओं का दौर शुरू हो चुका है. ये प्रार्थना तबतक चलेगी जबतक उनकी मौत हुए 100 दिन पूरे नहीं हो जाते. 100वें दिन एक बार फिर उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया जाएगा.

हिन्दूओं से बौद्ध स्थल को मुक्त कराने के लिए भंते का आंदोलन

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उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में स्थित संकिशा उन 84 बौद्ध स्तूपों में से एक है, जिसका निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था. बौद्ध धर्म को मानने वालों के लिए यह एक अहम स्थान है, जहां बुद्ध को मानने अक्सर जाते रहते हैं. लेकिन इस बौद्ध स्थल का हिन्दूकरण और इस स्थान पर बढ़ रहे हिन्दू धर्म के पुरोहित बौद्ध अनुयायियों को लगातार खटकते रहे हैं. संकिशा के ब्राह्मणीकरण को रोकने और इसे दूसरे धार्मिक ताकतों से आजाद करा कर फिर से एक पवित्र बौद्ध स्थल के रूप में स्थापित करने के लिए भंते धम्मकीर्ती ने एक अभियान शुरू कर दिया है.

इस अभियान के तहत संकिशा से लखनऊ तक एक पदयात्रा निकाल कर इस स्थल को ब्राह्णवादी ताकतों से मुक्त कराने का आंदोलन शुरू किया है. 10 जनवरी को संकिशा से शुरू हुई यह पद्यात्रा 25 जनवरी को लखनऊ पहुंचेगी. जहां एक सभा का आयोजन कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिया जाएगा.

संकिशा से शुरू होने के बाद यात्रा मुहंमदाबाद, फर्रुखाबाद, फतेहगढ़, गोसाइगंज, कन्नौज, उन्नाव और कानपुर होते हुए लखनऊ पहुंचेगी. जहां 24 जनवरी को डॉ. भीमराव अम्बेडकर महासभा, बापू भवन के सामने 25 को समापन कार्यक्रम होगा. समापन के मुख्य अतिथि महाबोधी सोसाइटी के जनरल सेक्रेट्री भूज्य भदंत पी. सिवली महाथेरो होंगे जो सभा को संबोधित करेंगे.

पदयात्रा पर निकले भंते धम्मकीर्ती ने यात्रा की वजह बताया कि संकिशा के बौद्ध स्थल पर चार दशक पहले ही एक पत्थर रख दिया गया है और उसे बिसारी देवी के नाम से प्रचारित किया गया है. तो वहीं हनुमानजी की मूर्ति भी स्थापित करवा दी गई है. हमारी मांग है कि यह पवित्र बौद्ध स्थल है इसलिए इसको मुक्त किया जाए. असल में तमाम बौद्ध स्थलों पर हिन्दूवादी संगठनों का कब्जा बना हुआ है. यहां तक की विश्व प्रसिद्ध और तथागत बुद्ध की ज्ञानस्थली बोधगया में भी हिन्दूकर्मकांड की घुसपैठ हो चुकी है, जिसको हटाने के लिए लगातार मांग चलती आ रही है. फिलहाल देखना होगा कि संकिशा पर उत्तर प्रदेश सरकार क्या रुख अपनाती है.