देखिए, बजट पर किस विपक्षी नेता ने क्या कहा

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नई दिल्ली। बजट के बाद एक बात लगभग तय होती है. सत्ता पक्ष जहां बजट की तारीफ करता है तो वहीं विपक्षी दल बजट की कमियां गिनाता नजर आता है. बावजूद इसके बजट के बाद कुछ विशेष नेताओं और दलों की टिप्पणियों को काफी तव्वजो दी जाती है. आइए डालते हैं ऐसी टिप्पणियों पर नजर, और देखते हैं कि किसने क्या कहा?

बजट में बिहार के लिए कुछ नहीं- तेजस्वी यादव

आरजेडी नेता और बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने कहा कि बजट में बिहार के लिए कुछ भी नहीं. बिहार को विशेष पैकेज और विशेष राज्य के दर्जे पर कुछ भी नहीं मिला. नीतीश कुमार बताए क्या यही उनके लिए डबल इंजन है? नीतीश की वजह से ही बीजेपी की केंद्र सरकार बिहार के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है. केवल अमीरों की हिमायती है सरकार- अखिलेश

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने कहा कि गरीब-किसान-मजदूर को निराशा, बेरोजगार युवाओं को हताशा. कारोबारियों, महिलाओं, नौकरीपेशा और आम लोगों के मुंह पर तमाचा. ये जनता की परेशानियों की अनदेखी करने वाली अहंकारी सरकार का विनाशकारी बजट है. आखिरी बजट में भी बीजेपी ने दिखा दिया कि वो केवल अमीरों की हिमायती है. अब जनता जवाब देगी.

गंभीर परिणाम आएंगे- चिदंबरम

पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने कहा कि 2018-19 के बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली राजकोषीय मजबूती की परीक्षा में फेल हुए हैं और इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे. उन्होंने कहा कि 2017-18 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.2% पर रखा गया था, लेकिन इसके 3.5% पर पहुंचने का अनुमान है.

 

बजट में सांसदों को मिली विशेष सहूलियत

नई दिल्ली। इस साल का बजट सांसदों के लिए खुशखबरी लेकर आया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सासंदों की मांग को स्वीकार कर लिया है. इसके बाद सांसदों का वेतन हर पांच साल में मुद्रास्फीति के अनुरूप अपने आप बढ़ जाएगा.

लोकसभा में 2018-19 का केंद्रीय बजट पेश करते हुए जेटली ने कहा कि सांसदों को मिलने वाली आय-भत्तों को लेकर सार्वजनिक स्तर पर काफी बहस हो रही है. इस कारण मैं संसद सदस्यों के वेतन, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और देय अन्य खर्च के लिए कुछ जरूरी बदलाव प्रस्तावित कर रहा हूं जो एक अप्रैल, 2018 से प्रभावी होगा.

जेटली ने कहा, “यह कानून उनके वेतन को हर पांच साल में मुद्रास्फीति के हिसाब से अपने आप बढ़ा दिया जाएगा.” लोकसभा के कुछ सांसदों ने संसद के शीतकालीन सत्र में सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन में बढ़ोत्तरी के विधेयक पर बहस के दौरान अपने वेतन में वृद्धि की मांग की थी.

 

सिर्फ 20 प्वाइंट में देखिए पूरा बजट

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नई दिल्ली। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बजट 2018 में कई घोषणाएं कीं. बजट का मुख्य फोकस किसानों पर रहा, जिससे साफ हो गया कि किसानों को केंद्र में रखकर सरकार अगामी लोकसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार कर रही है. किसानों के लिए कई योजनाओं की घोषणा की गई. ‘हवाई चप्परल’ वाले को हवाई जहाज से यात्रा करने की सोच को बल देने के लिए ‘उड़ान योजना’ का भी जिक्र किया गया. बजट की घोषणाएं कितनी पूरी होंगी ये तो आने वाला वक्त बताएगा लेकिन फिलहाल नजर डालते हैं उन घोषणाओं पर, जिनको पढ़कर आप बजट के बारे में सरकार की मंशा को समझ सकते हैं.

 बजट में गरीब परिवारों के लिए राष्ट्रय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना लॉन्च किए जाने की घोषणा की गई है. इसके         तहत देश 10 करोड़ परिवार अर्थात 50 करोड़ लोगों को 5 लाख रुपये प्रति परिवार कैशलेस मेडिकल बीमा कवर दिया     जाएगा.  वर्ष 2022 तक सरकार ने 51 लाख नये घरों का निर्माण किए जाने की घोषणा की है.  उज्जवला योजना के तहत 8 करोड़ गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शकन दिए जाने की घोषणा.  सभी वेतनभोगियों को 40 हजार का स्टैंवडर्ड डिडक्श न देने की घोषणा.  वरिष्ठग नागरिकों को जमा राशि पर मिलने वाले ब्याैज आय में 50 हजार रुपये तक की छूट की घोषणा.  ‘उड़ान योजना’ के तहत देशभर में 56 हवाई अड्डों और 31 हेलीपैडों में कनेक्टिविटी सुविधा की घोषणा.  बिटक्वाोइन जैसी करेंसी को लेकर जारी उहापोह के बीच सरकार ने साफ किया है कि भारत सरकार इसे नहीं मानेगी.  अगले वित्त वर्ष का रक्षा बजट 2.95 लाख करोड़ रुपये का होगा.  डिजिटल इंडिया प्लाइन के लिए इस बजट में 3073 करोड़ रुपये का प्रावधान.  ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट एक्सेइस के लिए 5 लाख वाईफाई हॉटस्पॉनट बनाए जाने की घोषणा.  रेलवे के लिए 1.48 लाख करोड़ रुपये का बजट आवंटित किए जाने की घोषणा.  3600 किलोमीटर रेल पटरियों के नवीनीकरण का लक्ष्य निर्धारित.  600 प्रमुख स्टेलशनों को पुन: विकसित करने का कार्य शुरू किए जाने की घोषणा.  जवाहर नवोदय विद्यालय की तर्ज पर आदिवासी बहुल ब्लॉककों में ‘एकलव्यज’ मॉडल आवासीय विद्यालय खोले         जाने की घोषण.  2022 तक शिक्षा में आधारभूत सुधार के लिए ‘राइज’ नामक पहल का प्रस्ताोव किया गया है.  शिक्षकों के लिए एकीकृत बीएड कार्यक्रम शुरू किए जाने की घोषणा एवं स्कूरलों को आधुनिक बनाए जाने की घोषणा.  स्कूघलों में ब्लैरक बोर्ड की जगह स्माषर्ट बोर्ड लगाए जाएंगे. अगले 4 सालों में एक लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाने     की घोषणा.  हर तीन लोकसभा सीटों पर एक मेडिकल कॉलेज बनाने की योजना. इस वर्ष 24 नये मेडिकल कॉलेज खोले जाने की     घोषणा.  किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में सरकार ने कई महत्ववपूर्ण घोषणाएं की. सरकार ने कहा कि वह सभी खरीफ     फसलों का मूल्यक उत्पांदन लागत से डेढ़ गुना अधिक करने का फैसला.  सौभाग्यस योजना के जरिए 4 करोड़ गरीबों को बिजली कनेक्शधन दिए जाने की घोषणा की गई है.  अगले वित्त वर्ष में 2 करोड़ शौचालय बनाए जाने की भी बात.

 

बजट में एससी/एसटी से फिर धोखाधड़ी

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नई दिल्ली। केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार को आम बजट पेश करते हुए अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति का भी जिक्र किया. जेटली ने इन दोनों समुदाय के लिए धन के आवंटन को बढ़ाकर क्रमश: 56,619 करोड़ रुपये व 39,135 करोड़ रुपये करने की बात कही गई. वित्त मंत्री जेटली ने कहा कि 2017-18 के लिए निर्धारित आवंटन अनुसूचित जातियों के लिए 52,719 करोड़ रुपये व अनुसूचित जनजातियों के लिए 32,508 करोड़ रुपये था, जिसे बढ़ा दिया गया है.

हालांकि सच्चाई यह है कि बजट में पिछले कई सालों से दलितों और आदिवासियों से छल होता रहा है. नियम के मुताबिक देश की अनुसूचित जाति और जनजाति के हित के लिए कुल बजट का एक हिस्सा इन दोनों समुदायों की जनसंख्या के हिसाब से आवंटित करने का नियम है. इसके मुताबिक अनुसूचित जाति के लिए उनकी जनसंख्या के हिसाब से कुल बजट का 16.6 प्रतिशत जबकि जनजाति के लिए 8.6 प्रतिशत बजट राशि देने का प्रावधान है. यानि कि केंद्र सरकार को केंद्रीय बजट का 25.2 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आवंटित करना चाहिए था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं है.

सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या फिर भाजपा की, पिछले कई सालों से सरकारें ऐसा करने से बचती रही हैं और पिछले बजट में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आवंटित राशि से कुछ पैसे ज्यादा देकर दलितों को बजट में ज्यादा आवंटन देने का ढिंढ़ोरा पीटा जाता है. आंकड़ों की इसी बाजीगरी के जरिए सरकार ने पिछले दो वर्षों में एसटी-एसटी के लिए आवंटित धनराशि में 2 लाख 29 हजार 622.86 करोड़ की कटौती की है. इस बजट में भी ऐसा ही हुआ है. सरकार आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर दलितों और आदिवासियों के लिए बजट में पैसे बढ़ाने का ढिंढ़ोरा पीट रही है.

 

बिहार बसपा में घमासान

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की बिहार इकाई से बड़ी खबर है. बिहार के प्रभारी तिलक चंद्र अहिरवार ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. अहिरवार बिहार और झारखंड के प्रभारी थे. हालांकि 28 जनवरी को पार्टी का कहना है कि अहिरवार को निकाल दिया गया है. अहिरवार के बाद अब बिहार में कुछ समय तक उनके जूनियर रहे लालजी मेधंकर को दुबारा बिहार प्रदेश भेज दिया गया है. मेधंकर को पिछले साल अहिरवार से मतभेद के बाद बिहार से हटा लिया गया था. कुछ दिनों तक राजनीतिक वनवास काटने के बाद मेधंकर को पार्टी ने तीन महीने पहले ही राजस्थान के उदयपुर और आस-पास की जिम्मेदारी दी थी. अब अहिरवार के पार्टी छोड़ने के बाद मेधंकर उनकी जगह लेंगे.

तिलक चंद्र अहिरवार पिछले तीन दशक से बसपा से जुड़े हुए थे. बसपा की बुंदेलखंड की राजनीति में तिलक चंद्र अहिरवार कद्दावर नाम है. पार्टी ने उन्हें विधान परिषद में भेजा था. फिर विधानसभा का चुनाव भी लड़ाया था. इसके अलावा पिछले साल उन्हें बुंदेलखंड प्रभारी भी बनाया गया था. लेकिन अप्रैल 2016 में उनसे बुंदेलखंड का प्रभार छीन लिया गया था. पांच महीने पार्टी गतिविधियों से दूर रहने के बाद सितंबर 2016 में बसपा अध्यक्ष मायावती ने एक बार फिर उनपर भरोसा जताते हुए उन्हें बुंदेलखंड व कानपुर मंडल का जोन कोआर्डिनेटर बनाया था. फिलहाल अहिरवार के पास बिहार और झारखंड के प्रभारी की जिम्मेदारी थी.

पार्टी छोड़ने के बाद बसपा की ओर से जारी बयान में अहिरवार पर आरोप लगाया गया है कि बसपा सुप्रीमो ने तिलकचन्द्र अहिरवार को बिहार-झारखंड की ज़िम्मेदारी दी थी लेकिन उन्होंने इस ज़िम्मेदारी को सही से नहीं निभाया और 2019 के लोकसभा चुनाव के लिये यूपी के जालौन-गरौठा-भोगनीपुर सीट पर चिंतित थे. पार्टी ने उनपर मेंबरशिप फीस को जमा न करने का भी आरोप लगाया है. जबकि बिहार के पार्टी कार्यकर्ताओं और बामसेफ से जुड़े लोगों से आ रही खबर के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम को बिहार में होने वाले उपचुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है.

बिहार में जल्दी ही लोकसभा की एक और विधानसभा की दो खाली सीटों पर उप चुनाव होने वाला है. इन तीनों सीटों पर दलित समाज का मत निर्णायक है. इनमें से एक भभुआ विधानसभा की सीट पर प्रदेश प्रभारी की हैसियत से शीर्ष नेतृत्व को सूचित करने के बाद अहिरवार ने पार्टी के पुराने कार्यकर्ता और प्रदेश अध्यक्ष भरत बिंद का टिकट फाइनल कर दिया था. बिंद ने चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया था लेकिन ऐन वक्त पर बिंद का टिकट काटकर बिना प्रदेश कार्यकारिणी से सलाह किए लखनऊ से ही किसी दूसरे का टिकट फाइनल कर दिया गया.

अहिरवार इससे काफी निराश थे, जिसके बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. अहिरवार के इस अचानक इस्तीफे के बाद बिहार बामसेफ के लोग भी हैरत में हैं. तो वहीं खबर यह भी आ रही है कि जल्दी ही अहिरवार के क्षेत्र बुंदेलखंड में बसपा को बड़ा झटका लग सकता है. आने वाले 15-20 दिनों में अहिरवार के समर्थन में 5000 से ज्यादा लोग बसपा छोड़ सकते हैं.

देश भर में धूमधाम से मनी रविदास जयंती

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देश भर में संत शिरोमणि रविदास जी की जयंती धूमधाम से मनाई गई. यूपी और जाब पंसहित देश के तमाम हिस्सों में लोगों ने संत रविदास को याद कर उनकी वाणी से प्रेरणा ली. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास 641वीं जयंती पर गुरु रविदास की जन्मस्थली पहुंचे. यहां आयोजित प्रमुख कार्यक्रम में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ मंदिर में करीब 30 मिनट तक रहे और प्रसाद को स्वीकार किया.

हालांकि योगी के वाराणसी जाने पर बसपा प्रमुख मायावती ने उन पर निशाना साधा है. प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि गुरु रविदास की जयंती में भाग लेने की बजाय भाजपा के नेताओ को संतों द्वारा प्रचारित नैतिकता का पालन करने की कोशिश करनी चाहिए, जिन्होंने लोगों को जातिवाद और सांप्रदायिक विचार से दूर रहने का सुझाव दिया था. उन्होंने कहा, “बेहतर होगा की यह लोग अपनी राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग ना करें और हिंसा में भागीदार ना बने , जैसा इन्होने कासगंज जिले में किया. “

इससे पहले रविदास जयंती के मौके पर दो दिन पहले से ही देश भर से लोगों का वाराणसी पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था. पंजाब से गुरु रविदास के अनुयायी विशेष ट्रेनों के माध्यम से वाराणसी पहुंचे थे. देश भर में संत शिरोमणि को मानने वाले लोगों ने अपने-अपने जिलों में कार्यक्रम आयोजित कर पूरी श्रद्धा से संत रविदास जी की जयंती मनाई.

गन्धर्व गुलाटी

 

जमीन के मुददे पर आमने-सामने आए हार्दिक-मेवाणी

गुजरात में जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर को एक तिकड़ी के रूप में देखा जाता है. गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को 99 पर रोक देने में कहीं न कहीं इन तीनों युवा नेताओं की भूमिका रही. खासकर जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल ज्यादा करीब माने जाता हैं. लेकिन हाल ही में जमीन से जुड़े एक मामले में मेवाणी और पटेल आमने-सामने दिखे.

 असल में कुछ दिनों पहले ही अहमदाबाद के गीतापुरा गांव के पांच दलित परिवारों ने आवासीय प्लॉट की मांग को लेकर देतरोज में ऑफिस के बाहर धरना शुरू कर दिया. इस दौरान जिग्नेश मेवाणी ने वहां पहुंच कर दलितों की मांग का समर्थन किया. वहीं गांव के पाटीदारों ने इसे ग्राम पंचायत की जमीन बताते हुए इसे दलितों को देने का विरोध किया और वो भी धरने पर बैठ गए.  पाटिदार समाज के लोग तहसीलदार ऑफिस पर भी धरने पर बैठे, जिसमें शामिल होने हार्दिक पटेल भी पहुंचे.

इस पूरे मामले पर जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल अलग-अलग पक्ष के साथ खड़े दिखे. तो वहीं हार्दिक पटेल ने इस मामले पर ट्वीट करते धरने पर बैठे दलितों को गुंडों द्वारा जमीन पर जबरदस्ती अतिक्रमण करार दिया. हार्दिक के इस ट्विट से दलित समाज के लोगों में काफी गुस्सा है.

हालांकि प्रशासन ने दलित परिवारों को अपने खेतों को गैर-कृषि भूमि में बदलकर घर बनाने की अनुमति देते हुए मामले को सुलझा लिया, लेकिन हार्दिक पटेल की ‘अपमानजनक टिप्पणी’ के खिलाफ वो जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपने की तैयारी में हैं. हालांकि दलितों के गुस्से को देखते हुए हार्दिक पटेल द्वारा आपत्तिजनक शब्दों के लिए माफी मांग लेने की खबर है.

यूपी में एससी/एसटी की योजनाओं में अधिकारियों का जातिवाद

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दलितों को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन का रवैया कितना जातिवादी है, यह हाल ही में तब सामने आ गया जब इस वर्ग से संबंधित एक योजना के लिए उत्तर प्रदेश प्रशासन को प्रदेश के 45 जिलों में एक भी योग्य परिवार नहीं मिला.

असल में यूपी के गांवों में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीब वर्ग के अनुसूचित जाति/जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग के परिवार को इस योजना का लाभ मिलता है. लेकिन प्रशासन की रिपोर्ट के मुताबिक यूपी के जिलों में उन्हें एक भी योग्य उम्मीदवार नहीं मिला है. प्रदेश के 45 जिलों के जिलाधिकारियों ने 2016-17 और 2017-18 में आवंटित लक्ष्य को पूरा करने से हाथ खड़ा कर दिया है.

दरअसल प्रधानमंत्री आवास योजना में 2016-17 और 2017-18 में आवंटित आवास निर्माण के लक्ष्य में से 45 जिलों ने 62,780 अनुसूचित जाति, 259 अनुसूचित जनजाति और 1229 अल्पसंख्यक वर्ग के आवास सहित कुल 64,278 आवास निर्माण का लक्ष्य विभाग को दिया गया था. इस पर जिलाधिकारियों का तर्क है कि उनके जिलों के गांवों में लक्ष्य के अनुरूप आवेदक और पात्र नहीं मिल रहे हैं.

हालांकि इस बारे में बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व कैबिनेट मंत्री राम अचल राजभर का कहना है- ‘जिलाधिकारियों द्वारा अगर इस तरह की कोई रिपोर्ट जारी की गई है तो वह चौंकाने वाली है. पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई थी कि प्रदेश के 29 जिलों में कुपोषण होने की बात कही गई थी. ऐसे में 45 जिलों में किसी गरीब दलित व्यक्ति का नहीं मिलना आश्चर्य की बात है.’

हालांकि केंद्र सरकार से आवास निर्माण की पहली किस्त की रकम जारी होने के कारण विभाग ने अब 64,278 आवास निर्माण की जिम्मेदारी 30 अन्य जिलों को दे दी है. इन जिलों में अमेठी, बागपत, बस्ती, चित्रकूट, एटा, इटावा, फैजाबाद, फर्रुखाबाद, गौतमबुद्ध नगर, हमीरपुर, सीतापुर और वाराणसी आदि जिलों को शामिल किया गया है. दूसरी ओऱ जिलाधिकारियों की रिपोर्ट और मीडिया में खबर आने के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया है. आरटीआई एक्टिविस्ट राजेश चौधरी ने इस मामले को लेकर राज्यपाल राम नाईक को चिट्ठी लिखी है. राजेश चौधरी का दावा है कि 45 जिलों के जिलाधिकारियों द्वारा जातिगत मानसिकता के कारण षड्यंत्र पूर्वक गुमराह करने वाले फर्जी आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं. इसकी वजह से अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभ से वंचित होना पड़ा है.

 

यूपी के 29 जिले कुपोषण को लेकर रेड जोन घोषित

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बरेली। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से चौंकाने वाली खबर सामने आई है. खबर बीते साल नवंबर महीने में सामने आई. असल में कुछ महिने पहले जिले में वजन दिवस कार्यक्रम चलाया गया था. वजन दिवस पर तीन चरणों में अभियान चलाया गया. इस दौरान चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई. रिपोर्ट के मुताबिक इसमें जिले में 20 हजार बच्चे अतिकुपोषित मिले. जबकि लगभग 70 हजार बच्चे आंशिक कुपोषित मिले हैं. यह हाल तब है जब पूरा महकमा इसके खिलाफ जंग में जुटे होने का दावा करता है और अधिकारी गांवों को गोद लेकर उनका जिम्मा उठा रहे हैं. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के जिलों में स्वास्थ सेवाओं की कलई भी खुल गई है.

असल में उत्तर प्रदेश के 29 जिलों को कुपोषण के मामले में रेड जोन घोषित किया गया है. खबर के मुताबिक इन जिलों में दो लाख से ज्यादा बच्चे आंशिक या गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं. विश्व बैंक ने इस मामले की तुलना ब्लैक डेथ से की है. कुपोषण के कारण ही विश्व स्वास्थ संगठन यानि WHO कि रिपोर्ट के मुताबिक भारत में टी.बी से होने वाली असमय मौत के मामले भारत में सबसे अधिक है. चिंता की बात तो यह है कि इन तमाम मामलों के सामने आने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों का रवैये में चिंता नहीं दिख रही है. केंद्र सरकार जहां हजारों करोड़ खर्च कर सरदार पटेल की मूर्तियां बनाने में व्यस्त थी. तो वहीं जिस दौरान यह खबर आई यूपी सरकार लगातार सरकारी विज्ञापनों पर पैसे खर्च करने और अयोध्या में दीवाली मनाने में व्यस्त थी. जबकि प्रदेश के कुपोषित बच्चों को लेकर आई रिपोर्ट पर सरकार की ओर से कोई चिंता नहीं दिखाई गई.

गैर हिन्दू कर्मचारियों के चर्च जाने पर मंदिर प्रशासन ने थमायी नोटिस

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आंध्र प्रदेश के तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर ने अपने 44 गैर हिंदू कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस भेजा है. इस नोटिस में इनसे ये पूछा गया है कि क्यों न इन्हें नियुक्ति नियमों का पालन न करने के चलते बर्खास्त कर दिया जाए.

दरअसल पिछले दिनों तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के एक कर्मचारी का एक वीडियो वायरल हो गया जिसमें वह चर्च जाते हुए दिख रहे थे. इसके बाद से मंदिर के गैर हिंदू कर्मचारियों को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

सभी गैर हिंदू कर्मचारियों को 11 जनवरी को नोटिस भेजा गया. नोटिस में साल 1989 में सरकारी ऑर्डर संख्या 1060 का हवाला दिया गया है कि “शिक्षण संस्थानों के मामले में किसी भी वर्ग के लिए नियुक्ति केवल उसी व्यक्ति की होगी जो हिंदू धर्म स्वीकार करता है.”

नोटिस में कहा गया है, “ सर्विस रिकॉर्ड देखने के बाद ये पता चला है कि आप ईसाई हैं. हमारे मंदिर नियमों के मुताबिक ऐसे लोगों को यहां नौकरी करने की इजाजत नहीं है. आपको तीन सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण देना होगा”.मंदिर प्रबंधन के इस नोटिस पर सवाल उठने लगे हैं.

हालांकि मंदिर के प्रबंधन ने कहा है कि अगर किसी गैर हिंदू कर्मचारी को नौकरी से हटाया जाता है तो उसे राज्य में किसी दूसरे सरकारी डिपार्टमेंट में नौकरी दे दी जाएगी.

 

अल्पसंख्यकों पर हमले को लेकर 67 नौकरशाहों ने लिखी पीएम को चिट्ठी

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उत्तर प्रदेश। यूपी के कासगंज की घटना के बाद बरेली के डीएम कैप्टन राघवेन्द्र विक्रम सिंह द्वारा फेसबुक पर लिखे गए पोस्ट ने देश के सर्वोच्च सेवा के अधिकारी का दर्द बयां कर दिया था. अपने पोस्ट में सिंह ने लिखा था कि ‘अजब रिवाज़ बन गया है. मुस्लिम मुहल्लों में जबरदस्ती जुलूस ले जाओ और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाओ. क्यों भाई वे पाकिस्तानी हैं क्या? यही यहां बरेली में खैलम में हुआ था. फिर पथराव हुआ. मुकदमे लिखे गए.’ हालांकि इस पोस्ट के वायरल होने और सरकार की ओर से दबाव बढ़ने के बाद डीएम ने अपनी पोस्ट को हटा लिया था, लेकिन इस पोस्ट से बहस का दौर शुरू हो गया.

अब भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर हो रहे हमलों के खिलाफ देश के पूर्व नौकरशाह सामने आए हैं. देश के 67 पूर्व नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हो रहे हमले पर चिंता व्यक्त की है. बीते 28 जनवरी को पीएम मोदी को लिखे गए पत्र में इन लोगों ने कई घटनाओं का जिक्र किया है, जहां अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती हुई. पत्र में अल्पसंख्यकों पर हुई पांच हिंसा की घटनाओं के साथ अलवर में हुई पहलू खान घटना का भी जिक्र किया गया है.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक इस पर दस्तखत करने वालों में पूर्व स्वास्थ्य सचिव केशव देसीराजू, सूचना प्रसारण मंत्रालय के पूर्व सचिव भास्कर घोष, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबउल्लाह के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और अरुणा रॉय भी शामिल हैं. मीडिया में आई मुसलमान समुदाय को प्रॉपर्टी न बेचने या उन्हें किरायेदार न रखने की ख़बरों का जिक्र करते हुए इन पूर्व नौकरशाहों ने कहा कि अपनी रोजाना जिंदगी में मुसलमान ऐसी बातों का सामना करते हैं, जिससे इस धार्मिक समुदाय के माहौल में गुस्सा बढ़ना तय है.

कासगंज की घटना और उसके बाद सरकार के मंत्रियों के द्वारा दिए जाने वाले उत्तेजक बयानों के बीच देश के पूर्व नौकरशाहों की यह चिट्ठी मोदी सरकार और उसके काम करने के तरीके पर बड़ा सवाल खड़ा करती है.

चंद्रशेखर रावण पर रासुका बढ़ा, आंदोलन को तैयार भीम आर्मी

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उत्तर प्रदेश। यूपी की योगी सरकार ने भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर रावण पर रासुका को फिर से बढ़ा दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार के गृह उपसचिव द्वारा 23 जनवरी को इस बारे में आदेश जारी किया गया। इसके बाद अब चंद्रशेखर को रासुका यानि की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत तीन महीने और जेल में काटना पड़ेगा। सहारनपुर की घटना के बाद गिरफ्तार किए गए रावण 2नवंबर, 2017 से रासुका के तहत जेल में हैं।

रावण पर रासुका की अवधि बढ़ने को लेकर तमाम दलित संगठनों ने विरोध किया है। भीम आर्मी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मंजीत सिंह नौटियाल ने घोषणा की है कि यदि 17 फरवरी तक चंद्रशेखर रावण पर से सभी 27 मुकदमों को वापस लेकर उन्हें रिहा नहीं किया जाएगा तो 18 फऱवरी से अनिश्चितकालीन हड़ताल की जाएगी। वहीं चंद्रशेखर रावण से मिलने पहुंचे भीम आर्मी डिफेंस कमेटी के संयोजक प्रदीप नरवाल ने कहा कि- ‘मैं चंद्रशेखर से मिला. उन्होंने मुझसे कहा है कि उनकी जान खतरे में हैं और भाजपा सरकार उनको जेल में मरवाना चाहती है. उन्होंने कहा है कि उनकी फिक्र किए बिना भीम आर्मी को पूरे देश में मजबूत किया जाए.’ वहीं रिटायर्ड आई.पी.एस अधिकारी और जनमंच के संयोजक एस.आर. दारापुरी ने चंद्रशेखर रावण पर रासुका की अवधि बढ़ाए जाने को दलित दमन का प्रतीक कहा है.

दो नवंबर, 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चंद्रशेखर उर्फ रावण को जमानत दे दी थी. लेकिन उसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने रासुका लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 के तहत किसी व्यक्ति को पहले तीन महीने के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है. फिर आवश्यकतानुसार तीन-तीन महीने के लिए गिरफ्तारी की अवधि बढ़ाई जा सकती है. एक बार में तीन महीने से अधिक की अवधि नहीं बढ़ाई जा सकती है. चंद्रशेखर रावण की भी रासुका तीन महीने बढ़ा दी गई है और यूपी सरकार चंद्रशेखर रावण के साथ जिस तरह का बर्ताव कर रही है, माना जा रहा है कि उनकी रासुका को बाद में भी बढ़ा दिया जाएगा.

 

जानिए, संतों में क्यों सर्वश्रेष्ठ थे संत रविदास

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गुरु रविदास का जन्म बनारस के नजदीक मांडुर गढ़ (महुआडीह) नामक स्थान पर हुआ था. मध्यकालीन संतों, जिसमें तुकाराम, नरसी-दादू, मेहता, गुरूनानक, कबीर, चोखा मेला,पीपादास आदि शामिल है, इन सन्तों में सदगुरू रैदास का स्थान श्रेष्ठ है. इसी कारण उनको संत शिरोमणि भी कहा जाता है. ये चमार जाति में पैदा हुए. गुरुग्रंथ साहिब में संकलित रविदास के पदों में उनकी जाति चमार होने का उल्लेख बार-बार आया है. गुरु रविदास जी के पिता का नाम संतोख दास और करमा देवी था.

चेतना, जन आन्दोलन, समतामूलक समाज की परिकल्पना, मानव सेवा आदि क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए सन्त शिरोमणि रैदास का नाम बड़े आदर तथा सम्मान के साथ लिया जाता है. रैदास सामाजिक सुधार के लिए जीवन पर्यन्त जूझते तथा रचनात्मक प्रयत्न करते रहे. सामाजिक समानता, समरसता लाने के लिए वो अपनी वाणियों के माध्यम से तत्कालीन शासकों को भी सचेत करते रहे. घृणा और सामाजिक प्रताड़नाओं के बीच सन्त रैदास ने टकराहट और भेदभाव मिटाकर प्रेम तथा एकता का संदेश दिया. उन्होंने जो उपदेश दिये दूसरों के कल्याण व भलाई के लिए दिये और उनकी चाहत एक ऐसा समाज की थी जिसमें राग, द्वेष, ईर्ष्या, दुख, कुटिलता का समावेश न हो.

संत शिरोमणि रैदास कहते हैं:-

ऐसा चाहूं राज्य मैं, जहां मिलै सबन को अन्न। छोट, बड़ों सभ सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।

वैचारिक क्रान्ति के प्रणेता सदगुरू रैदास की एक वैज्ञानिक सोच हैं, जो सभी की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता देखते हैं. स्वराज ऐसा होना चाहिए कि किसी को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट न हो, एक साम्यवादी, समाजवादी व्यवस्था का निर्धारण हो इसके प्रबल समर्थक संत रैदास जी माने जाते हैं. उनका मानना था कि देश, समाज और व्यक्ति की पराधीनता से उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है. पराधीनता से व्यक्ति की सोच संकुचित हो जाती है. संकुचित विजन रखने वाला व्यक्ति बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय की यथार्थ को व्यवहारिक रूप प्रदान नहीं कर सकता है. वह पराधीनता को हेय दृष्टि से देखते थे और उनका मानना था कि तत्कालीन समाज व लोगों को पराधीनता से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए.

सन्त रैदास के मन में समाज में व्याप्त कुरीतियों के प्रति आक्रोश था. वह सामाजिक कुरीतियों, वाह्य आडम्बर एवं रूढ़ियों के खिलाफ एक क्रान्तिकारी परिवर्तन की मांग करते थे. उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक समाज में वैज्ञानिक सोच पैदा नहीं होगी, वैचारिक विमर्श नहीं होगा. और जब तक यथार्थ की व्यवहारिक पहल नहीं होगी, तब तक इंसान पराधीनता से मुक्ति नहीं पा सकता है.

उन्होंने कर्म प्रधान संविधान को अपने जीवन में सार्थक किया. सन्त रैदास ने सामाजिक परम्परागत ढांचे को ध्वस्त करने का प्रयास किया. रैदास कहते हैं:-

रविदास ब्राह्मण मत पूजिए, जेऊ होवे गुणहीन। पूजहिं चरण चंडाल के जेऊ होवें गुण परवीन।।

इस वैज्ञानिक विचारधारा से तत्कालीन प्रभाव से समाज को मुक्ति मिली और आज भी इस विचारधारा का लाभ समाज को मिलता दिखाई दे रहा है. बल्कि 21वीं सदी में इसकी सार्थकता और भी बढ़ गयी है. समाज सुधार की आधारशिला व्यक्ति का सुधार है. सबसे पहले व्यक्ति को नैतिक दृष्टि से सीमाओं से ऊपर उठकर विवेक, बुद्धि आदि इस्तेमाल करना चाहिए, तभी समाज उन्नत हो सकेगा. व्यक्तिगत सद्चरित्रता, स्वच्छता तथा सरलता पर ध्यान देना चाहिए.

अपनी क्रान्तिकारी वैचारिक अवधारणा, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना तथा युग बोध की मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण उनका धम्म दर्शन लगभग 600 वर्ष बाद आज भी प्रासंगिक है. सन्त रैदास अपने समय से बहुत आगे थे. वह समतामूलक समाज की कल्पना करते थे और मानते थे कि यह तभी संभव है जब सभी के सुख-दुःख का ख्याल रखा जाए. अज्ञानता के कारण प्रभाव स्थापित करने में लोग विभेद करते हैं. रैदास कहते हैं कि सभी जन एक ही मिट्टी के बने हैं और सभी के लिए ज्ञान का मार्ग खुला हुआ है.

संत रविदास जी को मीरा बाई के आध्यात्मिक गुरु के रुप में भी जाना जाता है जो कि राजस्थान के राजा की पुत्री और चित्तौड़ की रानी थी. वो संत रविदास के अध्यापन से बेहद प्रभावित थी और उनकी बहुत बड़ी अनुयायी बनी. सिक्ख धर्मग्रंथ में उनके पद, भक्ति गीत और दूसरे लेखन (41 पद) आदि दिये गये थे. गुरु ग्रंथ साहिब जो कि पांचवें सिक्ख गुरु अर्जन देव द्वारा संकलित की गयी. सामान्यत: रविदास जी के अध्यापन के अनुयायी को रविदासिया कहा जाता है और रविदासिया के समूह को अध्यापन को रविदासीया पंथ कहा जाता है.

 

“साहित्य साहित्यकारों की नहीं, जनता की कमाई है”

जयपुर। में तीन साहित्यिक आयोजन हुए.जयपुर लिट् फेस्ट, पैरेलल लिट् फेस्ट और जन साहित्य पर्व यानी जनसा. इस तीसरे में शामिल होने का मौका मिला.वहां एक अजीबोग़रीब घटना हुई.

एक सत्र सिनेमा पर था. संजय जोशी और हिमांशु पांड्या इसे संचालित कर रहे थे. इसमें इकतारा कलेक्टिव की एक अद्भुत फ़िल्म तुरुप दिखाई गई.यह एक कथा फिल्म है, जिसमें अधिकतर कलाकार ग़ैरपेशेवर थे. लव ज़िहाद के झगड़े को छूती हुई गज़ब की ग्रिपिंग फ़िल्म है. कहीं रिलीज़ नहीं होगी. खोज कर देखिएगा.

फ़िल्म देखकर वहां मौज़ूद सैकड़ो लोग स्तब्ध थे. लेकिन इसके बाद जो हुआ वो कम सिनेमैटिक नहीं था. संजय जोशी ने हमारे ऑडियो विज़ुअल जमाने में प्रतिरोध और और प्रगति के माध्यम के रूप में सिनेमा के बढ़ते महत्व के बारे में बताया. लेकिन यह नया सिनेमा बॉलीवुड से नहीं, एकतारा कलेक्टिव और प्रतिरोध के सिनेमा जैसे जनसिनेमा आंदोलनों से ही आ सकता है. इनके पास नए विषय हैं, नई आग है, लेकिन पैसा नहीं है.

पैसेवाले पैसा देंगे तो पैसा पैसा वसूलेंगे भी. जनता का सिनेमा और जनता के साहित्यिक पर्व तो जनता के पैसे ही चलेंगे. फिर उन्होंने दर्शकों से पूछा, क्या आप अपनी खस्ता जेबों से इसके लिए पैसा निकालेंगे. फिर लोगों के सामने अपना गमछा फैला दिया. पांच मिनट के भीतर तीन हज़ार रुपए इकट्ठे हो गए.

पता चला कि जनसा का पूरा आयोजन ऐसे ही चंदे के बल पर हुआ. दो दिन के इस आयोजन में जसम और जलेस समेत 24 संगठन शामिल थे, लेकिन सारे आंदोलनकारी संगठन, जिनके पास कोई स्थायी फंड नहीं होता. न वे किसी फण्डदाता से पैसे लेते हैं.

जनसहयोग से आयोजन करने की जिद का लाभ यह हुआ कि किसी छीन्यूज़ के अहसान नहीं उठाने पड़े. किसी सेठ के नाम सत्र नीलाम करने नहीं पड़े. अपठनीय किताबों पर चर्चा नहीं करनी पड़ी.

हर समय दो से तीन सौ प्रतिभागियों की मौजूदगी रही.लेखकों,पाठकों,रंगकर्मियों, सिनेकर्मियों और चित्रकारों के अलावा हिमांशु कुमार, अरुणा राय, अमर राम, भंवर मेघवंशी , कविता कृष्णपल्लवी और कविता कृष्णन जैसे कर्मकर्ताओं और गांव गांव तक जन साहित्य पहुंचाने की कसम खाए जमीनी प्रकाशकों की सक्रिय भागीदारी रही. युवाओं की उत्सुक फौज़ जिस तिस को पकड़ कर अपने सवालों से उलझाती रही.

तब समझ में आया कि आयोजकों ने इसे लिट् फेस्ट का नाम क्यों नहीं दिया. यह फेस्ट नहीं पर्व था. पर्व साधना का निमित्त होता है, जश्न और मार्केटिंग का नहीं. जनसा पर्व वाले जोर देकर कहते थे कि वे किसी अन्य आयोजन के न विरोधी हैं, न समानांतर हैं.

वे तो बस इतना रेखांकित करना चाहते हैं कि साहित्य साहित्यकारों, प्रकाशकों और मार्केटमानुषों की नहीं, जनता की कमाई है.

आशुतोष कुमार    

पाकिस्तान को करारी शिकस्त दे कर, भारतीय टीम ने फाइनल में जगह बनाई

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नई दिल्ली। आईसीसी अंडर-19 वर्ल्ड कप के दूसरे सेमीफइनल में भारत ने पाकिस्तान पर धमाकेदार जीत दर्ज करते हुए अंडर-19 वर्ल्ड कप के फाइनल में जगह बना ली है और इसके साथ ही अब भारत का मुकाबला ऑस्ट्रेलिया से होगा आपको बता दें कि उस मुकाबले में भारत ने अपने आईसीसी अंडर-19 वर्ल्ड कप के विजय अभियान की शुरुआत अपने पहले ही मैच में आस्ट्रेलिया को हरा कर की थी इस मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया को धुल चटाते हुए 100 रनो की करारी शिकस्त  दी थी ऐसे में फाइनल मुकाबले के लिए अब भारतीय टीम का मनोबल और ज़्यादा बढ़ गया है.

भारतीय गेंदबाज़ो ने पाकिस्‍तान की कमर तोड़ कर रख दी. खास तौर से ईशान ने, चार विकेट लेकर उन्होंने पाकिस्तान तो संभलने तक का मौका ही नहीं दिया. शिवा सिंह, रियान की जोड़ी ने भी कमाला दिखाया. दोनों ने दो-दो विकेट अपने नाम किए. वहीं अंकुर और अभिषेक को भी एक-एक विकेट मिला. पाकिस्तान की टीम कुल 69 रन पर सिमट गई. पाकिस्तान का कोई भी बल्लेबाज 20 रन के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच पाया और आने-जाने का सिलसिला चलता रहा.पाकिस्तान की पूरी टीम सिर्फ 29.3 ओवर में ही 69 रन पर ऑल आउट हो गई. इस से पहले भारतीय टीम ने बल्लेबाजी करते हुए पाकिस्तान को 273 रनों का लक्ष्य दिया था. टीम इंडिया ने 9 विकेट खो कर 272 रन बनाए. भारत की तरफ से शुभमन गिल ने नाबाद रहते हुए शानदार 102 रनों की पारी खेली इसके अलावा पृथ्वी शॉ ने 41 रन बनाए. जबकि मनजोत कालरा ने 47 रन बनाए.

टीम इंडिया इससे पहले ये खिताब 3 बार अपने नाम कर चुकी है. आपको बता दें कि ये छठी बार है, जब भारतीय टीम अंडर-19 वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले में पहुंची है. पिछले साल भी भारतीय टीम फाइनल में पहुंची थी. भारत अब फाइनल में ऑस्ट्रेलिया से 3 फरवरी (शनिवार) को भिड़ेगा. भारतीय समयानुसार यह मैच सुबह 6.30 शुरू होगा.

   

बजट के पहले आम आदमी के मतलब से जुड़ी ये 12 बातें जानिए

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नई दिल्ली। एक फरवरी को सरकार देश का आम बजट पेश करेगी. आमतौर पर देश के मतदाताओं को बजट के मायने समझ नहीं आते. आम भाषा में कहें तो ‘सर के उपर से’ गुजर जाते हैं. बजट में सरकार ने क्या कहा, यह सिर्फ चुनिंदा बड़े लोगों, अर्थशास्त्र के जानकारों और चार्टर्ड एकाउंटेंट के ही समझ में आता है. लेकिन कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जिनका आम आदमी का समझना काफी जरूरी है. हम यहां आपको कुछ ऐसी ही चीजों को बारे में बताएंगे ताकि यह बजट आपके लिए सर के उपर से गुजरने वाली एक घटना बनकर न रह जाए.

फाइनेंसियल इयर: इसका मतलब वित्तीय साल होता है, जो कि 1 अप्रैल से शुरू होकर 31 मार्च तक चलता है.

Assessee: ऐसा व्यक्ति जो इनकम टैक्स एक्ट के तहत टैक्स भरने के लिए उत्तरदायी होता है. डायरेक्ट टैक्स: यह वह टैक्स होता है, जो किसी भी व्यक्ति व संस्थान की कमाई और उसके स्रोत पर लगता है. इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स और इनहेरिटेंस टैक्स इस कैटेगरी में आते हैं.

इन डायरेक्ट टैक्स: यह टैक्स उत्पादित वस्तुओं पर लगने वाला टैक्स होता है. इसके अलावा यह टैक्स आयात-निर्यात वाले सामान पर उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क और सेवा शुल्कट के रूप में भी लगाया जाता है.

कैपिटल असेट्स: जब कोई व्यक्ति किसी चीज में निवेश करता है या फिर खरीदारी करता है तो इस रकम से खरीदी गई प्रॉपर्टी कैपिटल एसेट कहलाती है. यह बॉन्ड, शेयर मार्केट और रॉ मैटेरियल में से कुछ भी हो सकता है.

एकजेंप्शन (Exemption): टैक्स देने वाले देश के आम लोगों की वह आमदनी जो टैक्स के दायरे में नहीं आती. यानी जिस पर कोई टैक्स नहीं लगता.

Assessment Year: यह कर निर्धारण का साल होता है, जो किसी वित्तीय साल का अगला साल होता है. जैसे 1 अप्रैल 2015 से 31 मार्च 2016 अगर वित्तीय वर्ष है तो कर निर्धारण वर्ष 1 अप्रैल 2016 से 31 मार्च 2017 तक होगा.

Finance Bill: इस विधेयक के माध्यम से ही आम बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री सरकारी आमदनी बढ़ाने के विचार से नए करों आदि का प्रस्ताव करते हैं. इसके साथ ही वित्त विधेयक में मौजूदा कर प्रणाली में किसी तरह का संशोधन आदि को प्रस्तावित किया जाता है. संसद की मंजूरी मिलने के बाद ही इसे लागू किया जाता है.

जीटीपी (GDP): इसी को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं. यह एक वित्त वर्ष के दौरान देश के भीतर कुल वस्तुओं के उत्पादन और देश में दी जाने वाली सेवाओं का टोटल होता है.

बजट डेफिसिट (Budget deficit): जब खर्चा सरकार के राजस्व से ज्यादा हो जाता है, उस स्थि‍ति को बजट घाटा कहते हैं.

एक्साइज ड्यूटी: एक्साइज ड्यूटी अथवा उत्पाद शुल्क वह शुल्क होता है, जो देश के भीतर बनने वाले उत्पादों पर लगाया जाता है. यह कस्टम ड्यूटी से अलग होता है.

कस्टम ड्यूटी: कस्टम ड्यूटी देश के बाहर से आने वाले उत्पादों पर लगाया जाता है. यह उत्पाद के प्रोडक्शन और खरीद पर लगता है.

बैलैंस बजट: जब सरकार का राजस्व मौजूदा खर्च के बराबर होता है, तो उसे बैलेंस बजट का नाम दिया जाता है. डिस इनवेसमेंट (Disinvestment): जब सरकार द्वारा संचालित किसी कंपनी या संस्थान की हिस्सेदारी बेची जाती है, तो उसे विनिवेश कहा जाता है. इसका मतलब ये है कि सरकार अपने अधिकार वाली कंपनी में से हिस्सेदारी निजी कंपनियों या व्यक्ति को बेच देती है.

गोली लगने के बाद क्या ‘हे राम’ बोले थे गांधी

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नई दिल्ली। राजघाट स्थित गांधी की समाधी पर एक शब्द लिखा हुआ है ‘हे राम’. मान जाता है कि गांधीजी ने दम तोड़ने से पहले आखिरी शब्द यही कहा था. लेकिन अब इस किवदंती को लेकर सवाल उठने लगे हैं. आज 30 जनवरी को गांधीजी की 70वीं पुण्यतिथि के दौरान भी यह बात फिर से चर्चा में आई है कि आखिर गांधीजी ने आखिरी शब्द के रूप में ‘हे राम’ बोला था या नहीं?

कहा जाता है कि गोली लगने के बाद जब बापू गिरे तो यह शब्द उनके पास चल रही उनकी पोती आभा ने सुने थे. लेकिन बापू के निजी सचिव वेंकिता कल्याणम की राय अलग है. उनका कहना है, ‘मरते वक्त गांधी ने ‘हे राम’ नहीं कहा था. वास्तव में जब नाथूराम गोडसे ने उनके सीने में गोली दागी तो उन्होंने कोई भी शब्द नहीं कहा था.’ कल्याणम का दावा है कि 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के तीन मूर्ति इलाके में महात्मा गांधी को गोली मारी गई तो उस वक्त वह उनके ठीक पीछे मौजूद थे.

एक किताब ‘महात्मा गांधी: ब्रह्मचर्य के प्रयोग’ में भी बापू के अंतिम शब्द ‘हे राम’ पर बहस की गई है. इस किताब में दावा किया कि 30 जनवरी, 1948 को जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को गोली मारी थी तो बापू के सबसे करीब मनु गांधी थीं. उन्होंने बापू का अंतिम शब्द’हे रा…’ सुनाई दिया था. इसी आधार पर यह मान लिया गया कि उनके आखिरी शब्द ‘हे राम’ ही थे.

जबकि उस दिन घटना स्थल पर मौजूद रहने वाले ऑल इंडिया रेडियो के रिपोर्टर केडी मदान की राय अलग है. गांधीजी की प्रार्थना सभा को’कवर’ करने मदान बिड़ला भवन रोज जाते थे. मदान ने कुछ साल पहले बताया था कि मैंने तो ‘हे राम’ कहते नहीं सुना था. साथ ही मदान ने यह भी कहा कि ‘पर यह एक किवदंती है और इसे किवदंती ही रहने देना चाहिए.

   

भाजपा का रास्ता रोकने अब कर्नाटक चलें मेवाणी

गुजरात चुनाव में भाजपा के खिलाफ दलित वोटरों को एकजुट करने के बाद जिग्नेश मेवाणी का अगला निशाना अब कर्नाटक चुनाव है. कांग्रेस के सहयोग से निर्दलीय विधायक चुने गए मेवाणी ने कहा है कि अब वह कर्नाटक जाएंगे जहां वह भाजपा को हराने के लिए दलित वोटरों को इकट्ठा करेंगे. कर्नाटक में 20 प्रतिशत दलित वोटर हैं.

जिग्नेश मेवाणी ने कहा है कि वह यह बात को सुनिश्चित करेंगे कि कर्नाटक में बीजेपी को 20 वोट भी न मिलें. मेवाणी का अप्रैल में दो हफ्तों के लिए कर्नाटक का दौरा करने का कार्यक्रम है. मेवाणी ने यह भ कहा कि सभी प्रमुख दलों को साथ आना चाहिए ताकि चड्ढीधारी न जीत पाएं.

हालांकि जिग्नेश मेवाणी के एक के बाद एक दौरों को लेकर सवाल उठने लगे हैं. असल में मेवाणी किसी भी पार्टी के सदस्य नहीं हैं. ऐसे में यह सवाल आम है कि आखिर एक निर्दलीय विधायक के पास इतने संसाधन कहां से आ रहे हैं कि वह एक के बाद देश भर में दौरा कर रहे हैं. मेवाणी की इस सक्रियता के पीछे कांग्रेस का हाथ माना जा रहा है. माना जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी मेवाणी को आगे कर के दलित वोटों को अपने पक्ष में एकजुट करने में जुटी है.

   

बजट सत्र शुरू, जानिए राष्ट्रपति कोविंद ने क्या कहा

नई दिल्ली। राष्ट्रिपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण के साथ ही संसद का बजट सत्र आज से शुरू हो गया. इस दौरान राष्ट्रपति ने सरकार की बातों को संसद सदस्यों औऱ देश के सामने रखा. उन्होंजने कहा कि मेरी सरकार (मोदी सरकार) कमजोर वर्गों के लिए समर्पित है. मेरी सरकार संविधान में निहित मूलभावना पर चलते हुए देश में सामाजिक न्याय तथा आर्थिक लोकतंत्र को सशक्त करने और आम नागरिक के जीवन को आसान बनाने के लिए कार्य कर रही है.

इस दौरान राष्ट्रपति ने तीन तलाक को पास करने पर विशेष बल दिया. साथ ही सरकारी योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि बेटियों के साथ भेदभाव खत्म करने के लिए मेरी सरकार ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना शुरू की थी. इस योजना के सकारात्मक परिणाम को देखते हुए अब इसका दायरा 161 जिलों से बढ़ाकर 640 जिलों तक कर दिया गया है. इसके अलावा राष्ट्रपति ने ‘जनधन योजना’, सरकार की नीतियों और किसानों की कड़ी मेहनत का ही परिणाम है कि देश में 275 मिलियन टन से ज्यादा खाद्यान्न और लगभग 300 मिलियन टन फलों-सब्जियों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है.

कुल मिलाकर राष्ट्रपति ने सरकार के अब तक के दावों को देश के सामने रखा. साथ ही सरकार की आगामी योजनाओं का भी जिक्र किया. हालांकि नेता विपक्ष और कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने इसे नई बोतल में पुरानी शराब जैसा कहा.

 

जब संसद में मनमोहन और सोनिया के बीच में आ बैठे आडवाणी

नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण के समय एक घटना ने सबका ध्यान अपनी ओर खिंच लिया. अभिभाषण सुनने के लिए सभी नेता हॉल में थे. लेकिन इस बीच एक जगह सबकी नजर ठहर गई. हुआ यूं कि सबसे आगे की पंक्ति में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच में बीजेपी दिग्गज और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी बैठे थे.

इस तस्वीर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग मोदी पर चुटकी लेने लगे हैं. हालांकि राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान पक्ष और विपक्ष की राजनीति के बीच सदन में एक साथ नेताओं का बैठना कोई नई बात नहीं है. इससे पहले भी कई दफा ऐसी तस्वीरें सामने आई हुई हैं, लेकिन यह तस्वीर इसलिए अहम हो गई क्योंकि आडवाणी औऱ मोदी के बीच मनमुटाव की बात सभी जानते हैं इसलिए यह तस्वीर रोचक हो गई.