कहीं पर निशाना, कहीं पर निगााहें

अफवाहों और सुनी-सुनाई झूठी बातों में विश्वास करना अज्ञान और अंधविश्वास में डूबे मध्यमं युगीन अशिक्षित समाज की एक आम प्रवृत्ति रही थी किंतु लगता है कि पढ़-लिखकर साक्षर हो जाने और स्माकर्टफोन जैसे आधुनिक यंत्र का इस्तेमाल करने पर भी हम वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न नहीं बन पाये हैं। रह-रहकर हम अफवाहों के शिकार होते रहते हैं। कभी हम किसी मंकी मैन की अफवाह में आ जाते हैं तो कभी चोटी कटवा की। आजकल बच्चा चोरों की अफवाहों का बाज़ार गर्म है। शरारती तत्वों  द्वारा व्हाकट्अप से फैलाई गई बच्चे उठाये जाने की अफवाहों के कारण उन्माधदी बन जाने वाली भीड़े के हाथों पिछले एक-डेढ़ महीने में 20 से भी ज्यांदा निर्दोष लोगों को पीट-पीटकर मौत के घाट उतारा जा चुका है। व्हाट्अप जैसे आधुनिक जनसंचार माध्यम का इस्तेमाल जिस प्रकार भीड़ को उत्तेजित करके लामबंद करने और अपने से अलग दिखने वाले, अपने से अलग धर्म, संस्कृति को मानने वाले लोगों के खिलाफ हिंसा को भड़काने के लिए किया जा रहा है, उससे कानून और व्यवस्था की व्यापक समस्यांएँ पैदा हो गई हैं। लोगों के अंदर एक कृत्रिम भय और आक्रोश पैदा करके उन्हें कानून हाथ में लेने के लिए उकसाने की घटनाओं में हुई इस वृद्धि से स्व‍यं केंद्र सरकार भी चिंतित है और 2 जुलाई को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्री किरण रिजिजू ने भी व्हाेट्सअप से फैलाई जा रही इन अफवाहों और झूठी खबरों को एक बड़ा संकट बताते हुये अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अफवाहें और झूठी खबरें निर्दोष लोगों के लिए खतरा बन रही हैं। उन्हों ने आधिकारिक रूप से कोई दिशा निर्देश तो नहीं दिया किंतु कहा कि इन अफवाहों और भ्रामक समाचारों के खिलाफ राज्य सरकारों और सभी सरकारी एजेंसियों को स्वयंसेवी संगठनों को साथ लेकर एकजुट होना चाहिए और जागरुकता फैलानी चाहिए। बच्चा चोरी की इन अफवाहों के खिलाफ जन जागरुकता की आवश्याकता को श्री किरण रिजिजू द्वारा रेखांकित किया जाना स्वागत योग्य है और उनकी पार्टी द्वारा शासित राज्यों उत्तरप्रदेश एवं राजस्था‍न आदि के पुलिस महकमों द्वारा इस दिशा में पहले से ही कदम उठाने के दावे भी किये गये हैं। किंतु भीड़ को हिंसा के लिए प्रेरित करने वाली अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ और हिंसा पर उतारू भीड़ के खिलाफ त्वोरित और मुक्कसमल कार्यवाही न करके अफवाहों के माध्यम मात्र के प्रति क्षोभ प्रकट करना केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता पर संदेह करने को मजबूर कर देता है। इनकी सरकार की कथनी और करनी का अंतर इस तथ्यल से भी साबित होता है कि इस सरकार के मुखिया तक भड़काऊ अफवाहें फैलाने वालों का सोशल साइटों पर अनुकरण करते हैं।इस विषय में दिनांक 18 जुलाई के विगत मंगलवार को झारखंड के पाकुड़ में भाजपा के युवा मोर्चा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं की भीड़ द्वारा अस्सी साल के बुजुर्ग सामाजिक कार्यकर्ता स्वाामी अग्निवेश पर किया गया प्राण घातक हमला भी ध्यातव्य हैं। साइबर अपराधों के विश्‍लेषण से पता चलता है कि इंटरनेट पर विभिन्नर प्रकार के प्रलोभन देते हुए किसी लिंक विशेष पर क्लिक करने को कहा जाता है और तद्विषयक वेबसाइट विशेष की तरफ लोगों को आकर्षित करने के लिए लोगों की भावनायें भड़काने वाली सच्चीे-झूठी कहानियाँ गढ़ी जाती हैं। विज्ञापनों से होने वे राजस्व का खेल लोगों की जातीय-धार्मिक भावनाओं में उबाल लाने के पीछे काम कर रहा होता है। कई बार राजनीतिक दृष्टि से किसी विचाधारा विशेष को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए भी भ्रामक खबरें फैलाई जाती हैं। संवेदनशील वीडियों, ऑडियों और चित्रों आदि को उनके संदर्भों से काटकर इतर संदर्भ में पेश करके लोगों को उन्मा दी भीड़ में तब्दीलल कर दिया जाता है। व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्वीटर आदि जनसंचार केलोकप्रिय माध्यीमों का दुरुपयोग किसप्रकार भीड़ को हिंसक बना बेकसूर लोगों की हत्यासए करवाने में हो रहा है, इसके लिए विगत एक-डेढ़ महीने के अखबारों की सुर्खियाँ आप देख सकते हैं। मई महीने में तमिलनाडु के पुलीकट में एक बेघर व्ययक्ति को अपहरकर्ता समझ पागल भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। इसी महीने में तेलंगाना के जियेपल्लीर नामक स्थान पर एक व्याक्ति को डकैत के भ्रम में भीड़ ने खत्म कर दिया। उस व्याक्ति का कसूर सिर्फ इतना था कि वह उस स्थान के वासियों के लिए अजनबी था। जून के महीने में असम के कार्बी आंगलोंग जिले में दो बाहरी व्यक्तियों को स्थानीय गाँव वालों ने बच्चा  चोर समझकर लाठियों से इतना पीटा कि दोनों के प्राण पखेरू उड़ गये। बच्चाे उठाने वाले गिरोह से होने के शक में गुजरात में भी इसी महीने एक भिखारी को उन्मा दी भीड़ का निवाला बनना पड़ा। जुलाई की शुरुआत में महाराष्ट्र  के धुले जिले में तो खानाबदोश जनजाति के पाँच लोगों तक को बच्चा़ अगुआ करने वाला गिरोह समझ पीट-पीटकर क्रूता से खत्म् कर दिया गया। और यह लेख लिखे जाने तक सबसे हाल की घटना शुक्रवार 13 जुलाई की है जब बच्चा़ चोरी की इन्ही अफवाहों ने कर्नाटक के बीदर में एक गूगल इंजीनियर के प्राण ले लिये। इस इंजीनियर के तीन साथी भी भीड़ के हत्थे  चढ़ जाने के कारण बुरी तरह घायल हो गये। वीडियों, ऑडियो और चित्रों समेत सूचनाओं और आंकड़ों आदि के त्वेरित और सुगम आदान-प्रदान के लिए बनाये गये व्‍हाट्सअप एप्लिकेशन के इस आपराधिक किस्म  के दुरुपयोग ने पुलिस-प्रशासन समेत संवेदनशील आम आदमी के होश उड़ा दिये हैं। व्हासट्सअप  के बचाव में अब यह नहीं कहा जा सकता कि तकनीक तो तकनीक होती है, उसका अच्छा -बुरा प्रयोग तो इंसान ही करता है। व्हाट्सअप, फेसबुक और ट्वीटर आदि ने हमें अभिव्ययक्ति के असीमित लोकतांत्रिक अवसर उलब्धै करा दिये हैं किंतु इनका इस्तेुमाल करने वालों के सामने उस तरह की कोई कानूनी जबावदेही अभी तक नहीं है और न स्वम नियंत्रित सेंसरशिप का प्रशिक्षण उन्हें  मिला है। चाहे कानून की खामियों के चलते सोशल साइटों पर किसी व्यतक्ति विशेष या समुदाय विशेष के विरुद्ध आग उगलने वाले लोग बच जायें किंतु भीड़ की हिंसा के लिए वे अपनी नैतिक जिम्मेहदारी से नहीं बच सकते। मोदी सरकार की ओर से अपनी नीतियों की तीखी आलोचना से परेशान हो सोशल साइटों की निगरानी रखने की जो बात पहले से उठाई जा रही थी, उसे व्हा ट्सअप से फैलाई जा रही बच्चाप चोरी की अफवाहों और इन अफवाहों से हिंसा पर उतारू हो रही भीड़ ने और ज्या दा बल प्रदान किया है। स्पमष्ट, है कि इस सारे घटनाक्रम में एक फायदा तो मोदी सरकार को होता दिख ही रहा है। साइबर कानूनों के विशेषज्ञ भी सरकार के ऊपर दबाव बनाये हुये हैं कि व्‍हाट्सअप, फेसबुक और ट्वीटर जैसी सोशल सेवा प्रदान करने वाली सोशल साइटों पर नकेल कसने की जरूरत है। आज सरकार की तीखी आलोचना की जा रही है कि उसके पास साइबर अपराधों पर लगाम लगाने की इच्छाटशक्ति नहीं है। और मजे की बात देखिए कि अपनी सरकार की आलोचना करने वालों की राष्ट्रबभक्ति पर सवाल उठाने वाली भाजपा इस बार चुप है क्योंनकि इन आलोचनाओं से उसे अभिव्यरक्ति के अधिकार पर अंकुश लगाने का बहाना जो मिल रहा है। स्तर में सोशल मीडिया से जुड़े घृणा फैलाने के कारोबार से सबसे ज्याकदा फायदा हुआ है भाजपा और संघ परिवार की सांप्रदायिक और मनुवादी राजनीति को और इसीलिए सरकार अभी तक सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर मगरमच्छीा आँसू बहाने के अलावा कुछ खास करती नहीं नज़र आईहै। घृणा और उन्माकद से संबद्ध साइबर अपराधों के प्रति सरकार की इस उदासीनता के कारण ही सोशल साइटों पर अफवाह फैलाने का धंधा करनेवाले धंधेबाजों की हिम्म्त बढ़ रही है। सरकार की इस निष्क्रियता के कारण ही भीड़ को कानून के हाथ पंगु नज़र आते हैं और वह सोशल साइटों और व्हांट्सअप पर चलने वाली अफवाहों की बिनाह पर निरपराध लोगों की  पिटाई और हत्याो बेखौफ होकर कर रही है। लेकिन क्या बच्चोंन को अगवा करने और उनके अंगों को ऊँची कीमत पर चिकित्सा  के बाज़ार में बेचे जाने की अफवाह फैलाये जाने के लिए मात्र व्हानट्सअप ही जिम्मे्दार है ॽक्या  इन अफवाहों और झूठी खबरों के कारण अपने बच्चों  की सुरक्षा को लेकर पैदा भीड़ के भय और आक्रोश के लिए मात्र सोशल साइटों को ही अपराधी माना जाना चाहिए मंत्रालय इस सच्चाअई से इनकार कर सकता है कि बकौल राष्ट्री य अपराध रिकार्ड ब्यूकरो के आंकड़ों के अनुसार अकेले साल 2016 में बच्चोंत के खिलाफ घटित 1,06,958 अपराध के मामले दर्ज़ किये गये और इनमें से 54,723 मामले अकेले अपहरण के थे। बच्चों के साथ घटित अपराध के मामलों में दूसरा बड़ा हिस्सा, यौन अपराधों का था जिसके तहत कुल 36022 मामले दर्ज़ किये गये। किंतु बच्चों  के अपहरण और उनके साथ होने वाले बलात्कािर के इन दर्ज़ मामलों की संख्या‍ बच्चोंं पर होने वाले अपराधों के वास्तुविक आंकड़ों से बहुत कम हैं। प्राय: यह देखा जाता है कि शहरों और महानगरों की अवैध कच्चीक बस्तियों में रहने वाले गरीब-दलित-पिछड़े परिवारों के बच्चोंध के अपहरण और बलात्कांर की घटनायें अपेक्षाकृत ज्याजदा घटती हैं किंतु उनके माँ-बाप की कमजोर सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थिति इन अपराधों की प्राथमिकी दर्ज़ कराने में बाधक बन जाती है। क्यात बच्चोंह के अपहरण और बलात्काँर की इस हकीकत से केंद्र का गृह मंत्रालय मुँह मोड़ सकता है ॽ क्याा बच्चोंे पर हो रहे इन वास्ततविक अपराधों के लिए भी सोशल साइटें ही जिम्मेीदार हैं। अस्तु, व्हाट्सअप और सोशल साइटों पर बच्चा चोरी की अफवाहों को आजकल जो इतना बल मिल रहा है, उसके पीछे है बच्चोंं के अपहरण और बलात्काेर की कड़वी सच्चाहइयाँ। बच्चों  की चोरी को लेकर भीड़ का भय निर्मूल नहीं है। इस भय को अफवाहों के माध्यीम से बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए केंद्र सरकार के मंत्री आदि चाहे व्हा ट्सअप को दोष देते रहें किंतु व्‍हाट्सअप आदि पर सरकारी नियंत्रण से यह समस्याा हल नहीं होने वाली। यहाँ दो-तीन चीजों को रेखांकित करना भी जरूरी है। एक तो हमें यह देखना होगा कि व्हा ट्सअप एप्लिकेशन और फेसबुक, ट्वीटर आदि सोशल साइटों पर अफवाहें फैलाने का दोषारोपण करके यथार्थ में केंद्र सरकार अभिव्य्क्ति की स्वहतंत्रता को नियंत्रित करने के अपने प्रच्छ्न्नर एजेंडे को ही लागू करना चाहती है। वास्तोव में केंद्र सरकार को सोशल साइटों और व्हातट्सअप आदि से फलाई जाने वाली अफवाहों और झूठी खबरों से उतनी समस्याव नहीं है जितनी समस्या  उसे इन पर होने वाली अपनी आलोचनाओं से है। प्रलोभन और भय के द्वारा मुख्याधारा के मीडिया को अपना क्रीतदास बना चुकी वर्तमान मोदी सरकार सोशल मीडिया पर मुखरित होते अपने विरोध को सहन नहीं कर पा रही है। बच्चा चोरी की अफवाहों और भीड़ की हिंसा ने मोदी सरकार को एक मनचाहा मौका उपलब्धल करा दिया है कि कानून-व्यरवस्थान का बहाना करके वह सोशल मीडिया पर नकेल कसकर अपने आलोचकों के हाथों से अभिव्यकक्ति का यह माध्यउम भी छीन ले। दूसरी बात, अफवाहों को रोकने और कानून अपने हाथ में लेने वाली उन्माेद में पागल हो चुकी भीड़ पर समुचित कार्यवाही करने की जिम्मेउदारी राज्य  की होती है, न कि व्हाकट्सअप एप्लिकेशन चलाने वाली किसी निजी कंपनी की। कोई भी सोशल साइट हमारे द्वारा चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार का न तो स्थाहन ले सकती है और न उसे लेना चाहिए। सरकार कैसे सोशल मीडिया से यह अपेक्षा कर सकती है कि वह एक लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेकदारी का निर्वहन करे ॽ आज समस्याा यह है कि लोकतांत्रिक वैज्ञानिक मिज़ाज विकसित करने और कानून का शासन स्था पित करने के अपने संवैधानिक दायित्वोंक का निर्वहन न करके व्येवस्था पिका और कार्यपालिका अपनी जिम्मेनदारी कॉरपोरेट जगत पर डाल देने को उतावली है। भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने वाले दोषी व्यहक्ति∕समूह ∕राजनीतिक-सांस्कृपतिक संस्थाम की पहचान करना, कानून-व्यववस्था  बनाये रखने के अपने कर्तव्यल की पालना न करने वाले सरकारी अधिकारी आदि की जबावदेही तय करना और अफवाहों के कोहरे को दूर कर सत्यि की स्थाचपना करना सरकार का कर्तव्यव है, न कि व्हा ट्सअप का। किंतु तथ्यन तो यह है कि बकौल गृह मंत्रालय केंद्र सरकार के पास भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के कोई आधिकारिक आंकड़ें तक नहीं हैं। राष्ट्रीाय अपराध रिकार्ड ब्यूहरो के पास इसप्रकार की हिंसा का लेखा-जोखा रखने की कोई योजना भी नहीं है। भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा कोई सामान्या अपराध की घटना नहीं होती है अपितु यह योजनाबद्ध ढंग से अंजाम दिया जाने वाला राजनीतिक अपराध होता है। इसके द्वारा एक बहुसंख्यंक ताकतवर समूह दूसरे अल्प संख्यकक कमजोर समूह के ऊपर अपना प्रभुत्वज स्थारपित करने की कोशिश करता है। यह अकारण नहीं है कि ज्यासदातर मामलों में उन्मा‍दी भीड़ के शिकार या तो मुसलिम हैं या दलित-आदिवासी। यहीं पर हमें बच्चाक चोरी की अफवाहों और इन अफवाहों के चलते पगलाई भीड़ की हिंसा के संदर्भ में कथितगौरक्षकों की इसीप्रकार की हिंसक परंपरा को भी नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए। भीड़ को लामबंद करके मुसलिमों और दलितों के खिलाफ हिंसा का रास्ताो दिखाने वाले सबसे पहले अपराधी ये नकली गौरक्षक ही रहे हैं और इनके सिर पर किनका हाथ है, यह भी कोई छिपी बात नहीं है। गौरक्षकों और उनके राजनीतिक आकाओं ने ही भीड़ के सामने पुलिस-प्रशासन को नपुंसकता का प्रदर्शन करना सिखाया है। यह तो आज भीड़ की हिंसा के कारण राष्ट्रीरय और अंतर्राष्ट्रीओय स्त़र पर हो रही मोदी सरकार की किरकिरी ही है, जिसके चलते केंद्रीय गृह राज्य। मंत्री को बच्चाक चोरी की अफवाहों के ऊपर चिंता व्य क्तस करनी पड़ती है। अस्तुर, स्परष्टप है कि भीड़ की हिंसा पर लगाम लगाने के लिए एक विशेष कानून की आवश्यीकता है। नागरिक समाज के कुछ संवेदनशील लोगों ने इस दिशा में पहल करते हुये ‘मानव सुरक्षा कानून’ का एक मसौदा भी तैयार किया था लेकिन केंद्र सरकार अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वाेर्थों के चलते इसप्रकार के किसी भी कानून की विरोधी रही है। किंतुविगत 17 जुलाई के अपने एक फैसले में स्वलयं सर्वोच्चर अदालत तक पृथक से एक विशेष कानून लाने का निर्देश केंद्र सरकार को दे चुकी है।सरकार को देर-सबेर यह समझना ही होगा कि व्हालट्सअप जैसे किसी सोशल मीडिया के एप्लिकेशन को अनस्टॉकल करने से भीड़ की हिंसा नहीं रुकने वाली इसके लिए तो आपको अल्प संख्यक विरोधी अपना सॉफ्टवेयर बदलना होगा। -प्रमोद मीणा Read it also- यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में गठबंधन की ताजा खबर
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यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में गठबंधन की ताजा खबर

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन की बातचीत अंतिम चरण में है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती इस मुद्दे पर लगातार संपर्क में हैं. इस बीच कुछ बातें तय हो चुकी हैं. मसलन, दोनों दल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी की लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारेंगे और इन दोनों बड़े नेताओं को समर्थन देंगे.

तो वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस गठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल और निषाद पार्टी को भी शामिल करना चाहते हैं. अखिलेश यादव की नजर ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सोलेहदेव भारतीय समाज पार्टी पर भी है. हालांकि इसको लेकर अभी बसपा की सहमति मिलनी बाकी है. अगर बसपा इन तीनों दलों के लिए सीटें छोड़ने को राजी नहीं हुई तो सपा अपने कोटे से कुछ सीटें छोड़ सकती है.

एक बड़ी खबर यह भी है कि यूपी के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव औऱ मुलायम सिंह यादव के अलावा बसपा प्रमुख मायावती के भी चुनाव मैदान में उतरने की बात तय हो गई है. 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद यह पहली बार होगा जब मायावती लोकसभा चुनाव लड़ेंगी.

दूसरी ओर राजस्थान, छत्तीसगढ़ औऱ मध्यप्रदेश में सीटों के बंटवारे को लेकर भी बसपा और कांग्रेस साकारात्मक दिशा में बढ़ रहे हैं. इन तीनों राज्यों में दोनों दलों के बीच गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है. हालांकि सीटों को लेकर खिंचतान अब भी जारी है. कांग्रेस की ओर से गठबंधन की बात महासचिव अशोक गहलोत कर रहे हैं तो वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को इसकी जिम्मेदारी दी है.

खबर के मुताबिक कांग्रेस पार्टी तीनों राज्यों में बसपा को चार से पांच सीट देने को राजी है, जबकि बसपा और ज्यादा सीटों की मांग कर रही है. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बसपा मजबूत दावेदार है. इन तीनों राज्यों के चुनाव लोकसभा के संभावित चुनावों से छह महीने पहले होने हैं. ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के लिए यह एक बड़ा चुनाव है, जिसमें कोई दल किसी भी तरह की चूक नहीं चाहता है. उम्मीद है कि आने वाले कुछ दिनों में जल्दी ही बसपा, कांग्रेस और सपा आधिकारिक रूप से गठबंधन का ऐलान कर सकते हैं.

Read it also-​दलित के यहां रोटी खाने को सभी तैयार, बेटी देने को कोई तैयार नहीं- पासवान
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​दलित के यहां रोटी खाने को सभी तैयार, बेटी देने को कोई तैयार नहीं- पासवान

नई दिल्ली। एनडीए में घटक दल लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष और पीएम नरेंद्र मोदी सरकार में उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने देश भर में दलितों राजनीति कर रहे नेताओं पर करारा हमला किया है। उन्होंने कहा कि दलितों से रोटी खाने को सब तैयार हैं परंतु बेटे देने कोई तैयार नहीं होता। उन्होंने कहा अंतरजातीय विवाह से जाति व्यवस्था खत्म हो सकती है। रोटी और बेटी की समस्या हल हो जाए तो जातिवाद खत्म हो जाएगा। बता दें कि 2014 के बाद से अब तक लगभग हर चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के दिग्गज नेता दलित और आदिवासियों के यहां जाकर रोटी खाते हैं, कभी कभी बनाते भी हैं।

इस दौरान भाजपा के खिलाफ एकजुट हो रहे विपक्ष पर हमला बोलते हुए पासवान ने कहा कि उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के खिलाफ बन रहे महागठबंधन की वही हालत होगी, जैसी इंदिरा गांधी के समय 1977 सिंडीकेट की। इनका राष्ट्रीय नेता कौन है? राहुल गांधी, चन्द्राबाबू नायडू और ममता बनर्जी को लोग नेता नहीं देख रहे हैं। यहां तो सब अपनी ढपली बजा रहे हैं। पासवान ने माना कि उत्तरप्रदेश के कैराना और फूलपुर का उपचुनाव हारना चिंता का विषय है।

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थाने में दलित को पीटकर मार डालने वाले पुलिसवालों को 10 साल की सजा

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​मिरजापुर। उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले में पुलिस कस्टडी के दौरान पिटाई से दलित की मौत के एक मामले में अदालत ने चौकी प्रभारी और कॉन्स्टेबल को 10-10 साल की सजा सुनाई है। अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश एससीएसटी भगवती प्रसाद सक्सेना की अदालत यह फैसला दिया है। अदालत ने पुलिस कस्टडी में पिटाई से दलित की हुई मौत के जुर्म में तात्कालीन चौकी प्रभारी पटेहरा उप निरीक्षक राजाराम यादव, कांस्टेबल वरीसन प्रसाद एंव ग्रामीण नेबुल कोल को 10-10 वर्ष की कड़ी कैद की सजा के साथ साढ़े छह हजार के जुर्माने से दंडित किया।

मड़िहान थाना क्षेत्र के ग्राम सभा ग्रामपुर निवासी निशा देवी ने आठ जुलाई 2013 को थानाध्यक्ष मड़िहान को इस आशय की तहरीर दिया कि उसके पति महेश कुमार कोल को गांव के ही नेबुल के इशारे पर चौकी प्रभारी पटेहरा राजाराम यादव और कांस्टेबल वरीसन प्रसाद ने इस कदर पिटा कि पुलिस कस्टडी में ही उसकी मौत हो गई। इसके आधार पर आरोपियों के खिलाफ थाना मड़िहान में रिर्पोट दर्ज कर कार्रवाई की गई। ​इस बार में अदालत ने फैसला सुनाते हुए दोषियों को दंडित किया है।

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झारखंड में आमरण अनशन पर बसपा विधायक

रांची। अपने क्षेत्र के जपला सीमेंट फैक्ट्री को फिर से चालू कराने और एससी,एसटी, ओबीसी की आरक्षण सीमा को 50 सीसदी से 73 फीसदी करने की मांग के साथ विधायक ने आमरण अनशन शुरू कर दिया है. पलामू के हुसैनाबाद के बसपा विधायक कुशवाहा शिवपूजन मेहता मंगलवार से अपनी इन दोनों मांगों के साथ आमरण अनशन पर बैठे हैं. विधायक का आरोप है कि पूर्व में उनके द्वारा जपला सीमेंट फैक्ट्री को फिर चालू कराने की मांग की गई थी. इसपर सूबे के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने सदन में उन्हें आश्वासन दिया था. यहां तक की मुंख्यमंत्री ने एक मंच से भी सीमेंट फैक्ट्री को शुरू कराने की बात कही थी. बावजूद इसके आश्वासन के एक साल बीत जाने के बाद भी कोई काम नहीं हुआ.

अपनी मांग के साथ विधायक मंगलवार को अनशन पर बैठ गए. इसके बाद सीएम रधुवर दास विधायक से मिलने अनशन स्थल पहुंचे और जपला सीमेंट फैक्ट्री को शीघ्र ही शुरू कराने का आश्वासन देते हुए अनशन तोड़ने का आग्रह किया, जिसे विधायक ने अस्वीकार कर दिया. बसपा विधायक मेहता का कहना है कि जबतक उनकी मांगों पर सरकार कार्रवाई नहीं करती तब तक उनका आमरण अनशन जारी रहेगा.

इस बीच विधायक को बुधवार को विधानसभा से एंबुलेंस में बैठाकर राजेंन्द्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेंडिकल साइंस (रिम्स) में भर्ती कराया गया. रिम्स पहुंचने के बाद भी वह एंबुलेंस में ही अनशन पर बैठे रहे. रिम्स में चिकित्सकीय जांच कराने के लिए अस्पताल के अधिकारियों व प्रशासनिक अधिकारियों ने काफी प्रयास किया, लेकिन उन्होंने अस्पताल में भर्ती होने से साफ मना कर दिया और एंबुलेंस से नीचे नहीं उतरे. हालांकि इसके बाद इमरजेंसी में उनकी जांच की गई और उन्हें 13 नंबर कॉटेज में भर्ती कर लिया गया.

गौरतलब है कि जपला सीमेंट फैक्ट्री 1990 से बंद पड़ा है. अलग राज्य के रूप में झारखंड के गठन के बाद स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि यह फैक्ट्री फिर से शुरू हो जाएगी और उन्हें रोजगार मिलेगा. लेकिन राज्य गठन के 18 साल बीत जाने के बाद भी किसी सरकार ने उस ओर ध्यान नहीं दिया.

रणजीत कुमार

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अभ्यार्थियों को रेलवे ने दिया एक मौका जाने……

नई दिल्ली। रेलवे ने उन 70 हजार अभ्यार्थियों को दूसरा मौका देने का फैसला किया है जिनकी नौकरी का आवेदन फोटो अपलोड करने में आई खामी की वजह से खारिज कर दी गई है. रेलवे ने ऐसे अभ्यार्थियों को 18 से 20 जुलाई के बीच अपनी गलतियों में सुधार का मौका दिया है. रेल मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि आवेदनों की जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि रेलवे को मिले 48 लाख आवेदनों में से 1.33 लाख आवेदन विभिन्न कारणों से योग्य नहीं है. गौरतलब है कि रेलवे ने 26,500 सहायक लोको पायलट (इंजन चालक) और तकनीशियनों के पदों के लिए आवेदन मांगे थे. रेलवे बोर्ड में सूचना एवं प्रचार के निदेशक राजेश दत्त बाजपेई ने कहा कि हमने पाया कि अयोग्य पाए गए आवेदनों में से करीब 1.27 लाख आवेदन सही फोटो नहीं लगाने की वजह से अयोग्य हो गए हैं. हमनें उन आवेदनों को फिर से देखने और उन्हें दूसरा मौका देने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि 1.27 लाख आवेदकों में से 70,000 को फोटो में बदलाव करके फिर से अपलोड करने को कहा गया है.

रेलवे ने अभ्यार्थियों को तीन दिन का तक का वक्त दिया है ताकि वे अपनी खामियों को ठीक करते हुए रेलवे भर्ती बोर्ड की साइट पर सही तस्वीर अपलोड कर दें. सूत्रों ने बताया कि अन्य 57,000 अभ्यार्थियों के आवेदनों की आंतरिक तौर पर समीक्षा और पुनर्विचार किया गया और उन आवेदनों में बदलाव की कोई जरूरत नहीं थी. जिन 70,000 अभ्यार्थियों को दूसरा मौका दिया गया है उन्हें ईमेल और संदेश भेजकर अपनी गलती सुधारने को कहा गया है.

यही प्रक्रिया रेलवे द्वारा इस साल के शुरू में अन्य पदों के लिए निकाली गई नौकरियों में भी अपनाई जाएगी. उन्हें भी दूसरा मौका दिया जाएगा. भारतीय रेलवे अगले साल मार्च-अप्रैल तक एक लाख से ज्यादा रिक्त पदों को भरेगा. रेलवे को करीब 1.10 लाख नौकरियों के लिए 2.27 करोड़ आवेदन मिले हैं. रेलवे सुरक्षा बल समेत अन्य पदों के लिए परीक्षा इस साल सितंबर, अक्तूबर और नवम्बर में होगी.

गौरतलब है कि रेलवे ने इसी साल 90 हजार से ज्यादा पदों पर भर्तियां निकाली थीं. रेलवे प्रोटेक्शन सिक्यूरिटी फोर्स (RPSF) ने खाली पदों पर भर्तियां निकाली हैं. गौरतलब है कि विभाग ने कुल 9,739 पदों पर भर्तियां निकाली हैं. इनमें से 8619 पद रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) के तहत निकाली गई हैं. इन पदों पर कांस्टेबल की भर्ती की जाएगी.

जबकि 1120 पदों पर सब इंस्पेक्टर की भर्तियां होंगी. 1120 पदों में से 819 पद पुरुषों के लिए हैं जबकि 301 पदों पर महिलाओं की भर्ती की जाएगी. इन पदों के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख 30 जून थी.(इनपुट भाषा से)

रेलवे ने उन 70 हजार अभ्यार्थियों को दूसरा मौका देने का फैसला किया है जिनकी नौकरी का आवेदन फोटो अपलोड करने में आई खामी की वजह से खारिज कर दी गई है. रेलवे ने ऐसे अभ्यार्थियों को 18 से 20 जुलाई के बीच अपनी गलतियों में सुधार का मौका दिया है. रेल मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि आवेदनों की जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि रेलवे को मिले 48 लाख आवेदनों में से 1.33 लाख आवेदन विभिन्न कारणों से योग्य नहीं है. गौरतलब है कि रेलवे ने 26,500 सहायक लोको पायलट (इंजन चालक) और तकनीशियनों के पदों के लिए आवेदन मांगे थे. रेलवे बोर्ड में सूचना एवं प्रचार के निदेशक राजेश दत्त बाजपेई ने कहा कि हमने पाया कि अयोग्य पाए गए आवेदनों में से करीब 1.27 लाख आवेदन सही फोटो नहीं लगाने की वजह से अयोग्य हो गए हैं. हमनें उन आवेदनों को फिर से देखने और उन्हें दूसरा मौका देने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि 1.27 लाख आवेदकों में से 70,000 को फोटो में बदलाव करके फिर से अपलोड करने को कहा गया है.

रेलवे ने अभ्यार्थियों को तीन दिन का तक का वक्त दिया है ताकि वे अपनी खामियों को ठीक करते हुए रेलवे भर्ती बोर्ड की साइट पर सही तस्वीर अपलोड कर दें. सूत्रों ने बताया कि अन्य 57,000 अभ्यार्थियों के आवेदनों की आंतरिक तौर पर समीक्षा और पुनर्विचार किया गया और उन आवेदनों में बदलाव की कोई जरूरत नहीं थी. जिन 70,000 अभ्यार्थियों को दूसरा मौका दिया गया है उन्हें ईमेल और संदेश भेजकर अपनी गलती सुधारने को कहा गया है.

यही प्रक्रिया रेलवे द्वारा इस साल के शुरू में अन्य पदों के लिए निकाली गई नौकरियों में भी अपनाई जाएगी. उन्हें भी दूसरा मौका दिया जाएगा. भारतीय रेलवे अगले साल मार्च-अप्रैल तक एक लाख से ज्यादा रिक्त पदों को भरेगा. रेलवे को करीब 1.10 लाख नौकरियों के लिए 2.27 करोड़ आवेदन मिले हैं. रेलवे सुरक्षा बल समेत अन्य पदों के लिए परीक्षा इस साल सितंबर, अक्तूबर और नवम्बर में होगी.

गौरतलब है कि रेलवे ने इसी साल 90 हजार से ज्यादा पदों पर भर्तियां निकाली थीं. रेलवे प्रोटेक्शन सिक्यूरिटी फोर्स (RPSF) ने खाली पदों पर भर्तियां निकाली हैं. गौरतलब है कि विभाग ने कुल 9,739 पदों पर भर्तियां निकाली हैं. इनमें से 8619 पद रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) के तहत निकाली गई हैं. इन पदों पर कांस्टेबल की भर्ती की जाएगी.जबकि 1120 पदों पर सब इंस्पेक्टर की भर्तियां होंगी. 1120 पदों में से 819 पद पुरुषों के लिए हैं जबकि 301 पदों पर महिलाओं की भर्ती की जाएगी. इन पदों के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख 30 जून थी.

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कैदियों को जेल से रिहा करेगी मोदी सरकार

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नई दिल्ली। भारत की केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला किया है. इस फैसले के मुताबिक अब जेल में बंद कैदियों को रिहा किया जाएगा. इसके लिए सरकार ने महात्‍मा गांधी की 150वीं जयंती को चुना है. कैबिनेट में भी इसको लेकर मंजूरी मिल गई है. सरकार के फैसले के मुताबिक आगामी 2 अक्टूबर को देश के विभिन्‍न जेलों से कैदियों को विशेष माफी के तहत रिहा कर दिया जाएगा. यह रिहाई तीन चरणों में होगी.

पहले चरण में कैदियों को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती 2 अक्‍टूबर, 2018 को रिहा किया जाएगा. दूसरे चरण में कैदियों को चम्पारण सत्याग्रह की वर्षगांठ पर 10 अप्रैल, 2019 को रिहा किया जाएगा. वहीं तीसरे चरण में कैदियों को 02 अक्‍टूबर, 2019 को रिहा किया जाएगा. केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए फैसले के तहत जिन कैदियों को रिहा किए जाने का प्रस्ताव है, उसमें उम्रदराज महिला कैदी, बुजुर्ग कैदी, किन्नर कैदी और दिव्यांग कैदी शामिल हैं. फैसले के तहत उन कैदियों को रिहा किया जाना है, जिन्होंने अपनी सजा का 50 फीसदी हिस्सा पूरा कर लिया है. केंद्र सरकार ने वास्‍तविक सजा की 66 फीसदी अवधि पूरी करने वाले कैदियों को भी रिहा करने का फैसला किया है.

हालांकि इस फैसले के तहत ऐसे कैदियों को विशेष माफी नहीं दी गई है, जो मृत्‍युदंड की सजा काट रहे हैं. उन कैदियों को भी इस योजना से बाहर रखा जाएगा, जिनकी मृत्‍युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया है. इसके अलावा दहेज मृत्‍यु, बलात्‍कार, मानव तस्‍करी, पोटा, यूएपीए, टाडा, एफआईसीएन, पोस्‍को एक्‍ट, धन शोधन, फेमा, एनडीपीएस, भ्रष्‍टाचार रोकथाम अधिनियम आदि के दोषियों को भी इस योजना के लाभ से बाहर रखा जाएगा. इस प्रक्रिया को देखने के लिए एक समिति गठित करने की भी बात कही जा रही है.

जाहिर सी बात है कि जिन लोगों को सरकार की इस योजना का लाभ मिलने वाला है, वो खुश होंगे. अगर सरकार का यह फैसला जेल सुधार और जेल में बंद कैदियों को एक और मौका देने की कवायद है तो यह एक अच्छी पहल है. लेकिन अगर सरकार के इस फैसले के राजनीतिक पहलू को देखें तो उसके कुछ और मायने दिख रहे हैं. संभव है कि जिन लोगों को सरकार की इस योजना का लाभ मिलेगा वो और उनके परिवार वाले सरकार के प्रति नतमस्तक होंगे और 2019 के चुनावों में सरकार को उनका वोट रूपी समर्थन जरूर मिलेगा. ऐसे में सवाल है कि क्या अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की जोड़ी आम जनता का वोट मिलने की उम्मीद खोती जा रही है और आगामी चुनाव में जीत के हथकंडे के रूप में ऐसे फैसले ले रही है?? यह सवाल तब तक कायम रहेगा, जब तक जेलों से रिहा होने वाले लोगों के आंकड़े सामने नहीं आ जाते.

करन कुमार

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समाज

समाज और देश धीरे-धीरे बदल ही रहा था कि अचानक मनु के रखवाले देश के रहनुमा बन गए! और देश फिर से गुलाम हो गया। छिनने लगी आजादी पहले खाने की, फिर पहनने ओढ़ने की, फिर शिक्षा की, फिर धर्म की, फिर कर्म की, फिर मूर्ति की, फिर रंग की देश मे असमानता, जातिवाद, आडम्बर, अवैज्ञानिकता, रूढ़िवाद, हिंसा, भ्रष्टाचार, हावी हो गए! इस तरह देश का जीवन और इंसानियत फिर से गुलाम हो गयी! जुगुल किशोर चौधरी इसे भी पढ़े-हुंकार
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हुंकार

बह रहा शोणित है तेरा फिर भी तू क्यों मौन है पूछ अपने आप से मानव है तू या कौन है जाति की जठराग्नि में हिन्दुत्व के अभिमान में हवन होते हैं  दलित जीते हैं वो अपमान में संविधान का नहीं उनको कोई अब डर रहा मनुवाद के दावानल में रोहित सरोज है मर रहा और तू बैठा हुआ चुप करता सिर्फ संताप है जुल्म को सहना भी होता बहुत ही पाप है उठ वरण कर वीरता का धनु कि तू टंकार दे घर से तू बाहर निकल और साथ में हुंकार दे। मुकेश गौरव Read it also-विकास
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विकास 

शब्द
किस तरह होते हैं
अर्थ परिवर्तन का
शिकार?
अतीत से वर्तमान तक
इसके अनेक उदाहरण हैं
जैसे दस्यु और दास
जो आदिकाल में
दो जातियां थी
कालान्तर में उसका अर्थ
लुटेरे और गुलाम
हो गया।
इसी प्रकार
पिछले कुछ वर्षों में
विकास का भी अर्थ
बदला है।
विकास अब पर्याय
हो गया है
मुस्लिम और दलितों में
भय और उत्पीड़न का।
क्योंकि
पिछले कुछ वर्षों में
विकास हुआ है
संघ की शाखाओं का
साधुओं का
जो व्यापारी से राजा तक
हो गए हैं।
हिन्दू और मुस्लिम वैमनस्य का,
असहमत बुद्धिजीवियों की
हत्याओं का!
भूख, बेरोजगारी और मंहगाई का
उधोग तथा व्यापार के विनाश का
जुमलेबाजी का
झूठ और फरेब का।
इसलिए
इन दिनों
भारत में विकास
सचमुच
पागल हो गया है
उसने
आधार के नाम पर
छीन लिया है
निवाला
गरीबों के मुख से
किसानों को
कर दिया गया है
मजबूर
ख़ुदकुशी के लिए!
अभी से यह कहना तो
कठिन है कि यह विकास
आखिर जाएगा कहाँ तक
लेकिन इतना तय है कि
जिसका वर्तमान ठीक नहीं
उसका भविष्य भी
ठीक नहीं होता!
इसलिए भविष्य के लिए
नहीं दी जा सकती
बलि वर्तमान की।
डॉ. एन. सिंह
सहारनपुर, यूपी
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विरोधाभास

हम बड़े अजीब लोग हैं
हम अधुनातन और पुरातन एक साथ हैं!
हम नयी टेक्नोलॉजी के टीवी को
घर में लाने में
परहेज कभी नहीं करते
लेकिन नयी सोच को
घर में आने से
हमेशा रोकते रहते हैं
विज्ञान के हर नये अविष्कार को
अपनाने की
हमें बड़ी तत्परता रहती है
लेकिन अवैज्ञानिक रिवाजों
हम फिर भी ढोए चले जाते हैं
हम कम्प्यूटर, इन्टरनेट, ईमेल, मोबाईल,
फेसबुक, व्हाटस्ऐप, ट्विटर का
इस्तेमाल करने लगे हैं
लेकिन बात करने वाले के
नाम से ज्यादा उसके उपनाम में
हमारी रुचि हमेशा बनी रहती है
हमें इंसान की,
उसकी इंसानियत की,
उसकी काबिलियत की,
उसकी लायकीयत की
कोई कद्र नहीं है
हम पत्थरों में भगवान देख लेते हैं
लेकिन इंसान में इंसान भी
देख नहीं पाते
हम बड़े अजीब लोग हैं
हम अधुनातन और पुरातन एक साथ हैं!
हम किसी भी नस्ल के कुत्ते को
अपने सोफे पर,
अपनी कार में बैठाने में
अपनी शोभा समझते हैं
लेकिन इंसान से
उसकी जात पूछे बिना,
उसका मजहब जाने बिना
उसे अपनी परिचय परिधि में
शामिल नहीं करते!
उसे अपने घर में
घुसने नहीं देते…
हम महापुरुषों की जयंतियां
बड़ी धूम से मनाते हैं
लेकिन उनकी बातों को मानने से
हमेशा कतराते भी रहते हैं
हमें हीर-रांझा की,
शीरी-फरहत की,
लैला-मजनूँ की,
सस्सी-पुन्नू की,
रोमियो-जूलियट की
सिर्फ कहानियाँ अच्छी लगती हैं
गर हमारे बीच
कोई हीर,
कोई रांझा हो जाए
तो वह हमें
चरित्रहीन नज़र आने लगता है
हम हाथों में बन्दूकें लेकर
प्रेम के गीत गाते हैं
हम बम के परीक्षण स्थलों पर
शान्ति के चबूतर उड़ाते हैं
हम शान्ति वार्ताएं करते हैं
और हथियारों पर
बजट भी बढ़ाए चले जाते हैं
हम बड़े अजीब लोग हैं
हम अधुनातन और पुरातन एक साथ हैं!
हम पचास साल पुराने
संविधान की
समीक्षा की समितियां गठित करते हैं
लेकिन पांच हजार साल पुरानी
किताबों की समीक्षा की गुंजाइश
हमें नज़र नहीं आती
हम पत्थरों को
दूध पिला देते हैं
और बच्चों को कुपोषण से मरने देते हैं
उन्हें पोलियो ड्राप पिलाने से भी
कतराते हैं
हम बड़े अजीब लोग हैं
हम अधुनातन और पुरातन एक साथ हैं!
राजेश चन्द्रा
संकलन- एस सी भाऊरजार
सिवनी (मध्य प्रदेश)
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बसपा नेता जयप्रकाश सिंह पर कार्रवाई के पीछे का सच

नई दिल्ली। दो महीने पहले बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने जब राजस्थान में सक्रिय पार्टी के एक युवा कार्यकर्ता को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और नेशनल कोआर्डिनेटर जैसा अहम पद दिया था तो उस फैसले ने सबको चौंकाया था. पद देने के करीब दो महीने बाद जब बसपा प्रमुख ने एक झटके में ही जयप्रकाश से दोनों पद वापस ले लिया तो भी बसपा नेता के साथ-साथ अन्य लोग भी चौंके थे. किसी को भी यह यकीन नहीं था कि बहनजी इतनी तेजी से अपने ही बनाए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पर कार्रवाई कर देंगी. लेकिन अब आनन-फानन में की गई इस कार्रवाई का सच सामने आ गया है. असल में बसपा प्रमुख मायावती ने ऐसा कर के जहां कांग्रेस पार्टी के साथ अपनी दोस्ती को और मजबूती दे दी है तो वहीं उन्होंने एक झटके में भाजपा से कांग्रेस और राहुल गांधी को घेरने का एक बड़ा मुद्दा छीन लिया. इससे पहले की भाजपा, बसपा नेता के बयान के आधार पर कांग्रेस और बसपा पर सवाल खड़े करती, मायावती ने बाजी पलट दी. इस घटना ने यह भी साफ कर दिया है कि 2014 और 2017 के चुनाव में झटका खा चुकीं मायावती अब सियासत की राह पर संभल कर कदम बढ़ा रही हैं.

असल में मायावती नहीं चाहती थी कि जयप्रकाश सिंह का बयान बसपा को घेरने का हथियार बनें. कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के साथ बहनजी के रिश्ते सभी देख चुके हैं, मायावती उसमें भी कोई दरार नहीं चाहती थी. जो सबसे बड़ी बात है कि 2019 में अगर तमाम प्रमुख पार्टियों के सत्ता का गणित गड़बड़ाता है और मायावती के नाम पर तमाम दल एकमत होते हैं तो उस समय कांग्रेस का समर्थन बहुत जरूरी होगा. मायावती उस स्थिति तक पहुंचने के रास्ते में कोई रुकावट नहीं चाहती हैं. जहां तक जयप्रकाश सिंह का सवाल है तो राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने के बाद उनके रंग-ढंग अचानक से बदल गए थे. उनके तमाम बयानों की चर्चा पार्टी के अंदर पहले से थी और पार्टी नेताओं को पहले से ही आशंका थी कि उन पर कभी भी गाज गिर सकती है. ऐसे में जब उन्होंने सीधे राहुल गांधी पर निशाना साध दिया तो सियासत में अपनी छवि को लेकर काफी सजग मायावती ने बिना देरी किए उन पर कार्रवाई कर डाला.

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किसान मार्च

पूरी पृथ्वी को बांधते हैं किसान के पांव हरियाली से पहाड़िया चढ़ते हैं उतरते हैं घाटियां एक एक कोना भर देते हैं मिट्टी का अन्न से बीजों को जगाते हैं नींद से सबका पेट भरने के लिए मगर सोए रह जाते हैं बीज उनकी आंखों के कि उनके सपनों को पोसने वाला कोई नहीं कोई नहीं जो चलाए हल बंजर होती आंखों में फसल उगाने के लिए कि सूखे चटकते खेतों में भटक रहे हैं किसान पानी की जगह सरकारी आंकड़े पी रहे हैं किसान अपना सब बेच बीज-खाद खरीद रहे हैं किसान फसलों को अपने आंसुओं से सींच रहे हैं किसान आंकड़ों की काली स्याही में तड़प रहे हैं किसान इज्जत की खातिर कुएं में कूद रहे हैं किसान नीम की बाजुओं से लिपट दम तोड़ रहे हैं किसान अपने ही खेतों में दफ्न हो रहे हैं किसान अपनी हड्डियों को खाद में बदल रहे हैं किसान मगर अब संभल रहे हैं किसान झूठे वादों की पोल खोल रहे हैं किसान अब एकजुट हो रहे हैं किसान आत्महत्याओं के बोझ को अपने सरों से उतार अधिकारों के लिए बढ़ रहे हैं किसान कि उनके कदमों को रोकना तुम्हारे बस का नहीं खेत की मिट्टी में उगे हैं उनके पांव कि सूरज ने अपने अलाव में पकाया है उन्हें वे आ रहे हैं तुम्हारे शहर की तरफ तारकोल से चिपकी सड़क पर चलते हुए अपने बुझते चूल्हों का दर्द लिए तुम्हारे कानों आंखों नाकों में भरे तारकोल को निकालने के लिए संजीव कौशल Read it also-https://www.dalitdastak.com/hate-politics/
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नफ़रत की राजनीति

ये तोड़-फोड़ की राजनीति ये नफरत की राजनीति तुम पर शोभा नहीं देती तुमने तो ठप्पा लगाया है- राष्ट्रवाद का फिर ये घिनौने, घटिया, ओछे काम क्यों? माना तुम सत्ता में आ गये हमेशा तो नहीं रहोगे कल कोई और आएगा फिर वो तोड़ेगा-फोड़ेगा तुम्हारी बनाई मूर्तियां या तुम्हारी पसंद की मूर्तियां इस तरह तो राष्ट्र का नव निर्माण न हुआ ये विनाश की शुरूआत है। माना कि तुम्हारे अंदर राष्ट्रवादी नाम का कीड़ा तुम्हें अंदर ही अंदर काट रहा है लेकिन वो कीड़ा धीरे-धीरे विषैला होता जा रहा है वो तुम्हें बहुत बड़ी हानि पहुंचायेगा और तुम्हें ही नहीं तुम्हारे चक्कर में पूरे देश को डसेगा नफ़रत की राजनीति में पूरा देश जलेगा तुम तो डूबोगे ही साथ-साथ देश को भी ले डूबोगे…| मुकेश कुमार ऋषि

गैर दलित आलोचकों का असली चेहरा

जिस जाति अथवा समाज का साहित्य नहीं होता, वह जाति मृत समान ही होती है. वैसे भी हमारे देश में पहले से ही दलितों का लिखा कोई साहित्य नहीं है. वर्ण-व्यवस्था के अनुसार भारत के दलितों को पढ़ने-लिखने का कोई अधिकार ही नहीं था. अतः हमारा कोई साहित्य भी नहीं था. समाज के उत्थान का कोई प्रेरणा-स्त्रोत होता है तो वह उसका अपना साहित्य ही होता है. दलित समाज का जो थोड़ा बहुत साहित्य था वह मौखिक साहित्य था. लिखित साहित्य के अभाव में समाज कोई प्रेरणा नहीं ले सकता. अतः समाज का अपना साहित्य होना अति आवश्यक है.
दलित समाज या कहें अछूत समाज कहे जाने वाले लोगों के समाज का साहित्य कोई गैर  दलित तो लिखने से रहा. यदि लिखेगा भी तो उसकी निष्ठा पर सवाल हमेशा बना रहेगा, क्योंकि गैर-दलित लेखकों ने हमेशा से दलित-साहित्य और इतिहास से छल-कपट ही किया है. गैर दलित लेखकों ने हमेशा से अपने गप्पी साहित्य और पराजित इतिहास के गीत ही गाए हैं. दलित समाज के साहित्यकारों, महापुरुषों व वीर और वीरांगनाओं के नामों को हम गैर दलित लेखकों व साहित्यकारों ने पुस्तकों के पन्नों से गायब ही नहीं किया बल्कि उनका चरित्र-चित्रण तक बिगाड़ कर रख दिया है. यदि उदाहरण गिनाने लग जाऊं तो कागज ही कम पड़ जाएगा.
देश की आजादी के पश्चात दलितों के मुक्तिदाता डॉ. भीमराव आम्बेडकर जी के अथक प्रयासों के बाद देश के तथाकथित निम्न जातियों को शिक्षा प्राप्ति का अवसर प्राप्त हुआ. परिणाण स्वरूप अब शिक्षित व्यक्तियों का कर्तव्य बनता है कि वे अपनी शोधपरक दृष्टि से अपने समाज के साहित्य का सृजन करें. जैसे-जैसे शोध कार्य आगे बढ़ेगा, नई-नई विषय सामग्री का समावेश होगा. अतः लेखन ही साहित्य सृजन की पहली कसौटी है.
गैर- दलित पत्र-पत्रिकाओं के साथ अब दलित समाज की पत्रिकाओं ने दलित रचनाकारों को पूरे मनोयोग के साथ प्रकाशित करना शुरू कर दिया है. अतः इन पत्रिकाओं के सम्पादकों ने अपने-अपने मंच प्रदान करके दलित-साहित्य का पूरी लगन के साथ प्रचार-प्रसार किया है. यह खुशी की बात है कि अब दलित-समाज की महत्वपूर्ण पत्रिकाएं सामने आ रही हैं और दलित लेखक उनमें खूब प्रकाशित भी हो रहे हैं. अब दलित लेखकों को गैर-दलित लेखकों का मुंह ताकने की जरूरत नहीं है. रही उनके स्तर की बात तो जब दलित पत्र-पत्रिकाओं में स्तरीय रचनाएं प्रकाशित होना शुरू हो जाएंगी तो स्तर अपने आप बन जाएगा. यह हम दलित लेखकों की कमी है कि हम में से अधिकतर लेखक यही चाहते हैं कि हमारी रचना किसी चर्चित या नामी-गिरामी पत्रिका में ही प्रकाशित हो. लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाता तो वह लेखक निराश और हताश होकर कलम उठाकर एक ओर को रख देता है. यह दलित लेखन के विकास के लिए कतई भी उचित नहीं है.
इसी प्रकार गैर-दलित आलोचकों द्वारा जब कभी दलित लेखकों के लेखन की झूठी तारीफ या प्रशंसा कर दी जाती है तो ये दलित लेखक गुब्बारे की तरह फूल जाते हैं और उनके अंदर हवा भर जाती है. वे भूल जाते हैं कि सच्ची और अच्छी आलोचना अपने ही करते हैं. दूसरे गैर-दलित आलोचक तो झूठी प्रशंसा करके अपनी साहित्यिक रोटियां सेकते रहते हैं. ऐसे गैर- दलित आलोचक कभी भी अपनी कलम की पैनी नौंक घुसेड़ कर गुब्बारे की हवा निकाल कर पल भर में ही फुस्स कर देते हैं. असली मान-सम्मान अपनों से ही मिलता है. अभी कुछ महीने पहले हिन्दी के एक गैर-दलित आलोचक ने केरल में जाकर एक कार्यक्रम में कहा कि वह ही हिन्दी दलित साहित्य का बड़ा और मुख्य लेखक है.
वह हिन्दी दलित लेखन का ‘मेन्टर’ है. उसने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए यहां तक कहा कि वह हिन्दी के दलित लेखकों की रचनाएं ठीक-ठाक करके पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाने हेतु प्रेषित करता है. हिन्दी के दलित लेखकों को तो कुछ आता ही नहीं है. वैसे कुछ हिन्दी के दलित लेखकों ने जो बेचारे छपास के भूखे हैं सचमुच में इस बामन को लेखन में अपना अधिनायक माना हुआ है. मैं इन दलित लेखकों को समझा-समझा कर थक गया हूं, लेकिन इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती. इन दलितों की कोई भी गोष्ठी उसके बिना मजाल है पूरी हो जाए. मैं समझ गया हूं कि ऐसे दलित (छपास के भूखे) लेखक अफनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे और धीरे-धीरे आदरणीय डॉ.  धर्मवीर की बात को सही साबित करके रहेंगे कि एक दिन ‘दलित लेखक संघ’ ‘गैर- दलित लेखक संघ’ बनकर रह जाएगा. हिन्दी के इस गैर-दलित आचोलक ने कुछ महीने पहले मुंबई के एक साहित्यिक कार्यक्रम में भी इसी प्रकार शोर मचाया था. उस समय इस सूचना पर मैंने ज्यादा ध्यान देना उचित नहीं समझा. लेकिन अब जो केरल में हुआ, वह तो बर्दाश्त से बाहर है. धुंआ तभी उठता है जब सचमुच में आग लगती है. कुछ दिनों बाद मुझे ज्ञात  हुआ है कि यह वही गैर-दलित आलोचक है जो कई वर्ष पहले डॉ. धर्मवीर, ओमप्रकाश वाल्मीकि और मुझे आपस में लड़वाता रहा है. मैं समय रहते उसकी चालों को समझ गया और छिटक कर उससे दूर हो गया.
इसी प्रकार 18 फरवरी, 2018 के दिन एक दलित लेखिका के पत्र-संकलन पुस्तक का लोकार्पण का कार्यक्रम दिल्ली में ही था. फोन कर कार्यक्रम में मुझे भी आने को कहा गया. मैं कार्यक्रम में गया. इस कार्यक्रम में दलित लेखकों व बुद्धिजीवियों के अलावा गैर-दलित लेखक भी आए हुए थे. कार्यक्रम में मुझसे भी दो शब्द बोलने को कहा गया. अब मैं पुस्तक पर क्या बोलता, समय रहते पुस्तक मेरे पास पहुंची ही नहीं थी. हां, मुझे भीड़ का हिस्सा बनाने के लिए बुलाया जरूर था. जबकि गैर-दलित लेखकों/आलोचकों को कई दिनों पहले पुस्तक पहुंचा दी थी.  एक कहावत है… ‘घर का जोगी जोड़गा… आन गांव का सिद्ध’. खैर… उस कार्यक्रम में अब गैर-दलित आलोचक द्वारा कही बातों पर ध्यान देने की जरूत है. पुस्तक पर तो वह कम बोले लेकिन हिन्दी के दलित-लेखन पर कही गई उसकी टिप्पणियां देखिए. उसने टिप्पणी कि की, “ऐसा जान पड़ता है कि हिन्दी के दलित लेखन में अब ठहराव आ गया है… आगे नहीं बढ़ पा रहा.”
उस गैर-दलित लेखक की बातें सुनकर मैं हैरान होकर रह गया था. आज दलित साहित्य कहां से कहां पहुंच गया है. अब देश तो छोड़ो, विदेशों में भी इसकी खूब चर्चा है. हिन्दी के दलित लेखन की एक युवा पीढ़ी पूरी तैयारी के साथ लेखन के मैदान में आ चुकी है. यदि नाम गिनाने लग जाऊं तो कई महत्वपूर्ण युवा दलित लेखकों के नाम छूट जाने का डर है. और यह चौबे जी महाराज कह रहे हैं कि हिन्दी के दलित लेखन में ठहराव आ गया है. गलती इनकी कतई नहीं है, हम दलित लेखकों व दलित संस्थाओं की है जो बिना सोचे-समझे हम इन गैर-दलित आलोचकों को अपने साहित्यिक आयोजनों में बुला लेते हैं और मुखिया बनाकर मंचों पर बैठा देते हैं, फिर ये गैर-दिलत आलोचक दलित-लेखन के विषय में इधर-उधर की हांक कर चलते बनते हैं. ये गैर-दलित आलोचक यह भूल गये हैं कि हिन्दी के दलित साहित्य पर कार्य कर के ही इनकी सहायक प्रोफेसरों के पद पर नियुक्तियां हुई है. और आझ वे पूरी तरह से प्रोफेसरों के पदों पर कार्यरत है. धन्य हैं ऐसे बजरंगी और चौबे जी जैसे हिन्दी दलित-साहित्य के आलोचक जो दलित साहित्य के बारे में ऐसा सोचते या बोलते हैं. हमारे दलित लेखकों व उनकी संस्थाओं के पदाधिकारियों को भी न जाने कब सुध आएगी और उनसे छिटक कर कब दूर होंगे?
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जातिगत भेदभाव करने वाले इस बड़े पत्रकारिता संस्थान के शिक्षक के खिलाफ छात्र ने खोला

नई दिल्ली। मीडिया में दलितों की भागेदारी को लेकर सर्वे आ चुका है. उस सर्वे में यह साफ उल्लेख था कि मीडिया में दलितों की भागेदारी एक प्रतिशत भी नहीं है. दलित पत्रकार हैं भी तो महज कुछ चुनिंदा संस्थानों में नीचे के पदों पर. इसकी वजह मीडिया में भयंकर रूप से फैला जातिवाद है, जो दलित समाज के युवाओं को मीडिया में आने से रोकता है. इसका एक ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश में देखने को मिला है, जहां पत्रकारिता के छात्र की जाति जानकर देश के बड़े पत्रकारिता संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के एक शिक्षक ने न सिर्फ उसका मजाक उड़ाया बल्कि जातिगत टिप्पणी भी की. इसके बाद अंकित पचौरी नाम के छात्र ने विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. संजीव गुप्ता के खिलाफ स्थानीय थाने और मानव संसाधन विकास मंत्री से शिकायत दर्ज कराई है. अंकित अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, कोलार में एम.ए पत्रकारिता के छात्र हैं. भोपाल के अनुसूचित जाति कल्याण थाने में दर्ज कराई गई अपनी लिखित शिकायत में छात्र ने बताया है कि माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विवि के शिक्षक डॉ. संजीव गुप्ता उसके विभाग में मौखिक परीक्षा आयोजित कराने आए थे. इस दौरान जब अंकित अपने क्लास में पहुंचे तो डॉ. संजीव को देखकर उन्होंने अपने शिक्षक के बारे में पूछा. इस दौरान बातचीत में शिक्षक अंकित से उसकी जाति और पुश्तैनी पेशे के बारे में पूछने लगे. और यह जानते ही कि अंकित दलित समुदाय के खटीक जाति से संबंध रखते हैं, उनका मजाक उड़ाने लगे. अंकित ने इस पर आपत्ति दर्ज कराया और मामले की लिखित शिकायत स्थानीय पुलिस और संबंधित मंत्रालय को लिखी. अंकित का आरोप है कि सारा वाकया अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय के एक अतिथि शिक्षक के सामने घटी थी, लेकिन मामला पुलिस में पहुंचने पर शिक्षक अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर अंकित को विश्वविद्लाय से बर्खास्त करने की धमकी दे रहे हैं. इस पूरे मामले पर भोपाल के समाचार पत्रों ने गंभीर संज्ञान लिया है. इस घटना ने पत्रकारिता संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की सोच पर भी गंभीर सवाल उठा दिया है. अब देखना है कि मंत्रालय और स्थानीय पुलिस प्रशासन अंकित को कब तक न्याय दिला पाते हैं.

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कानूनी अधिकार की वेदी पर SC–ST एक्ट की बलि

सुभाष के. महाजन बनाम महाराष्ट्रस राज्य  वाले एक मुकदमे में 20 मार्च को सर्वोच्चष अदालत ने एक फैसले में अदालत ने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्या चार निवारण) अधिनियम (एससी–एसटी एक्ट ) के तहत एफआईआर लिखने से पहले शिकायतकर्ता के आरोपों की पुलिस उप अधीक्षक स्त–र के अधिकारी द्वारा गहनता से जाँच कराने के निर्देश के साथ-साथ आरोपी की गैर जमानती गिरफ्तारी पर भी रोक लगाने का आदेश पारित कर दिया है. अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा है कि इस अधिनियम के तहत दायर प्रथम सूचना रपट (एफआईआर) के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी से पूर्व संबंधित उच्चा अधिकारी से अनुमति लेना जरूरी है. अदालत ने अपने इस निर्णय के पक्ष में अत्याचचार निवारण अधिनियम के तहत तथाकथित झूठे मुकदमों के अंबार का हवाला देते हुए आरोपियों के बचाव के लिए इन प्रावधानों को जरूरी करार दिया है. लेकिन असल में अदालत द्वारा इस अधिनियम में डाले गये ये प्रावधान इस अधिनियम की मूल आत्माा की हत्याय सरीखे हैं.
आरोपी की गैर जमानती गिरफ्तारी का प्रावधान इस अधिनियम में किया ही इसलिए गया था कि ताकतवर सवर्ण आरोपी अपने खिलाफ दर्ज़ मुकदमे को गैर कानूनी ढंग से प्रभावित न कर पाये. स्पदष्टम है कि इस निर्णय ने अदालत की विश्वनसनीयता पर सवाल खड़े कर दिये हैं क्योंजकि इस निर्णय ने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को कमजोर करने का काम किया है. और यही कारण है कि इस निर्णय के खिलाफ और सरकार की दलित विरोधी नीति के खिलाफ देश व्याापी बंद का आयोजन विभिन्नर दलित संगठनों द्वारा किया गया जिसे लगभग सभी विपक्षी राजनीतिक दलों के साथ-साथ सत्ताव पक्ष के दलित नेताओं का व्याीपक समर्थन प्राप्त हुआ. अपने निर्णय में अदालत का कहना था कि गैर अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को आपराधिक मुकदमों में गलत ढंग से फंसाने के लिए इस अधिनियम का दुरुपयोग किया जा रहा है और यह दुरुपयोग बहुत ही ज्यािदा है. अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग को लेकर अपने इस निष्कोर्ष से ही अदालत को इस अधिनियम के बेजा इस्तेोमाल के शिकार तथाकथित निर्दोषों को बचाने के लिए दिशा निर्देश जारी करने का बल मिला.
अदालत के इन दिशा निर्देशों के पीछे का तर्क साफ है कि अनुसूचित जाति-जनजाति के साथ अपवाद स्वइरूप ही भेदभाव होता है जबकि इस भेदभाव से उन्हें  बचाने के लिए बनाये गये अधिनियम का दुरुपयोग होना सामान्‍य बात है. इतना ही नहीं अदालत ने अपनी यह चिंता व्ययक्तन करना भी जरूरी समझा कि इस अधिनियम का क्रियान्वीयन जातिभेद को बढ़ावा देने के रूप में नहीं होना चाहिए. अदालत के ये तर्क अंबेडकर के भेदभाव विरोधी तर्कों को सिर के बल खड़े करने सरीखे हैं. आरक्षण जैसे सकारात्माक विभेदन के खिलाफ भी मनुवादी मानसिकता के लोग इसी प्रकार के कुतर्क देते हैं कि अनुसूचित जाति-जनजाति के मलाईदार तबके द्वारा आरक्षण का अनुचित फायदा उठाया जा रहा है.
सर्वोच्च. अदालत ने यह निर्णय महाराष्ट्र  के जिस तकनीकी शिक्षा निदेशक सुभाष के महाजन की एक अपील के संदर्भ में दिया था, उसके खिलाफ एक दलित कर्मचारी ने एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज़ कराया था. सुभाष के महाजन प्राथमिक तौर पर दलित कर्मचार के खिलाफ अत्यादचार के दोषी पाये गये थे किंतु इन्हों ने अदालत में अपील की थी कि उनके खिलाफ इस अधिनियम के तहत अभियोग न चलाया जाये. अदालत महाजन की याचिका स्वीककार करते हुए उनके खिलाफ मामला रद्द कर सकती थी किंतु अदालत ने तो अभूतपूर्व सक्रियता दिखाते हुए इस निवारण अधिनियम के तहत मामले दर्ज़ कराने के साथ कुछ शर्तें जोड़कर इस अधिनियम को नख-दंत विहीन करने की चेष्टा  की है. आरोपी महाजन ने अपने खिलाफ लगाये गये अभियोग को रद्द करने की प्रार्थना की थी, न कि अत्यामचार निवारण अधिनियम में फेर-बदल करने की मांग की थी जबकि अदालत ने इस विशेष मामले के आधार पर अधिनियम के दुरुपयोग का सामान्यीथकरण करते हुए एक त्रुटिपूर्ण फैसला दे डाला. दमनकारी सामाजिक पूर्वाग्रहों के खिलाफ असहाय दलितों और आदिवासियों को एक हद तक सुरक्षा का आश्वा सन देने वाले इस अधिनियम को निष्प्र भावी बनाने वाले इस अदालती निर्णय ने हाशिये पर पड़े हुए दलितों-आदिवासियों में व्याइपक असंतोष भर दिया है.
अदालत के इस निर्णय का एक ठोस कारण बना था सामाजिक न्यांय और सशक्तिकरण पर संसद की स्थारयी समिति की रिपोर्ट. इस रपट में सामाजिक न्यातय और सशक्तिकरण मंत्रालय द्वारा ही यह अनुशंसा दी गई थी कि इस मुकदमे के तहत झूठे मुकदमे में फंसाये जाने वाले लोगों के बचाव हेतु इस अधिनियम में कुछ अंतर्निहित प्रावधान होने चाहिए. लेकिन संसद की उस स्थाियी समिति को मंत्रालय से पूछना चाहिए था कि जो अधिनियम अनुसूचित जाति और जनजाति के मानवीय अधिकारों के संरक्षण हेतु विशेष रूप से बनाया गया था, उसमें ऐसे प्रावधान कैसे किये जा सकते हैं जिनके कारण सवर्णों के हाथों भेदभाव और उत्पी ड़न का शिकार होने वाला अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय इस अधिनियम का इस्तेवमाल करने से डरने लगेॽ
अधिनियम के बेजा इस्ते माल पर अंकुश लगाने के लिए भारतीय दंड संहिता के तहत समुचित प्रावधान हैं. अत: सामाजिक न्यांय और सशक्तिकरण मंत्रालय और अदालत ने उन प्रावधानों का संज्ञान क्यों  नहीं लिया? यहाँ अदालत को यह भी ध्याधन रखना चाहिए था कि स्वनयं संसद की स्थाययी समिति ने सामाजिक न्यानय और सशक्तिकरण मंत्रालय के उन तर्कों से किंचित असहमति दिखाई थी जिनके तहत निवारण अधिनियम के अंतर्गत झूठे मुकदमों में भोले-भाले सामान्यअ वर्ग के लोगों को फंसाये जाने के आरोप लगाये गये थे. वैसे संसद की स्थानयी समिति ने अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम के कथित दुरुपयोग पर जिस सामाजिक न्या‍य और सशक्तिकरण मंत्रालय से राय पूछी, उसके पास इस अधिनियम के तहत आपराधिक न्याजय प्रक्रिया के संचालन का क्षेत्राधिकार ही नहीं है.
समिति को गृह मंत्रालय से सवाल जवाब करना चाहिए था क्यों कि इस अधिनियम के क्रियान्व्यन पर टीका-टिप्पकणी करने का अधिकार उसी के पास है. गृह मंत्रालय ही यह ठीक-ठीक बता सकता था कि क्या  इस अधिनियम का दुरुपयोग इस सीमा तक हो रहा है कि आरोपी के बचाव के लिए इस अधिनियम में कोई विशेष प्रावधान अपेक्षित है. वास्त व में अब भी गृह मंत्रालय से यह पूछा जाना चाहिए कि क्यात उसकी नज़र में इस संदर्भ में भारतीय दंड संहिता के वर्तमान प्रावधान प्रभावी नहीं रह गये हैं? ध्या्तव्यद है कि इस मसले पर अतिरिक्त् महान्या्यविद् ने भी अदालत के समक्ष अपना मत रखते हुए इस प्रकार के प्रावधानों को नकारा था.
न्याहय के इस सामान्य  सिद्धांत से हम इंकार नहीं कर सकते कि दोषी व्याक्ति को भी अपना पक्ष रखने और अपने बचाव का समुचित कानूनी अधिकार मिलना चाहिए, किंतु भारतीय दंड संहिता में इस विषयक अपेक्षित प्रावधान पहले से ही उपलब्धख कराये गये हैं. यह भी संभव है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के कुछ प्रभावशाली लोगों ने अपने गर्हित स्वािर्थों के लिए निर्दोष लोगों के खिलाफ अधिनियम का दुरुपयोग किया हो किंतु इस प्रकार के किसी दुरुपयोग को लेकर अदालत के पास कोई व्यकवस्थित ठोस प्रमाण थे ही नहीं. यह भी ध्याोतव्य  है कि किसी भी कानून का दुरुपयोग कुछ मुट्ठीभर ताकतवर लोग ही करते पाये गये हैं. संसाधन विहीन दबे-कुचले दलित-आदिवासी भला कैसे इस निवारण अधिनियम का गलत इस्तेामाल कर सकते हैं?
अपने साथ अमानवीय भेदभाव होने पर भी बहुसंख्याक दलित-आदिवासी  और स्त्रियाँ अपराध की सूचना तक पुलिस में दर्ज़ नहीं कराती क्योंतकि अधिकार संपन्नअ अपराधी सवर्णों का भय हाशिये के लोगों में इस कदर व्याीप्तक है कि ये लोग उनके खिलाफ थाना-कचहरी के बारे में सोच तक नहीं पाते. पुलिसवालों का मनुवादी रवैया उन्हेंो अलग हतोत्साोहित करता है. अगर किसी तरह कोई दलित अस्पृाश्यनता और उत्पीहड़न की रपट लिखवाने में सफल भी हो जाता है तो आगे चलकर ब्राह्मणवादी पुलिसिया जांच में उसकी शिकायत रफा-दफा कर दी जाती है. साधन विहीन दलित-आदिवासी के लिए आरोपी सवर्ण के खिलाफ अदालत में सफलतापूर्व अभियोजन चलाना आसमान से तारे तोड़ लाने सरीखा असंभव कार्य होता है. अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याणचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपी ठहराये गये लोगों का पुलिस जाँच और अदालती मुकदमे से बेदाग बरी हो जाना एक आम बात है.
इस अधिनियम के अंतर्गत दायर मुकदमों में तथ्य  तो यह है कि ज्या‍दातर मामलों में अदालतों द्वारा मुकदमे को इस अधिनियम के प्रतिकूल घोषित करते हुए कह दिया जाता है कि आरोपी ने पीड़ित की जाति के कारण उसके साथ अस्पृकश्याता बरती ही नहीं है. खैरलांजी और झज्झिर जैसे कुख्यादत दलित उत्पीसड़न के मामलों में अदालत ने दलितों के खिलाफ मनुवादी सवर्णों की हिंसा को जातीय चश्में से देखने से इंकार कर दिया था.
अदालत ने अपने निर्णय के लिए अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम के जिस गलत इस्तेअमाल का हवाला दिया है, उस संदर्भ में अदालत भूल गई कि मुकदमे के सही या झूठे होने का निर्णय अदालत को करना होता है, न कि पुलिस को इस प्रकार का न्याणयिक अधिकार मिला हुआ है. और फिर कौन सा ऐसा कानून है जिसका अनुचित प्रयोग न होता हो? क्या  दहेज के कारण होने वाली मौतों के कारण हम विवाह पर प्रतिबंध लगा देंगेॽ अंग्रेजों के जमाने के राजद्रोह कानून का तो जमकर दुरुपयोग स्वधयं सत्तात पक्ष द्वारा किया गया है और मानवाधिकार पर काम करने वाली संस्थाओं और लोगों ने अपने विस्तृात अध्यायनों में इस बाबत ठोस साक्ष्यत भी प्रस्तुपत किये हैं तो फिर सर्वोच्चय अदालत और सरकार ने अब तक इस कानून को रद्द क्योंष नहीं किया? अदालत को उन कारणों पर भी ध्यानन देना चाहिए था जिनके कारण यह  अधिनियम लाया गया था. अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों के खिलाफ सामान्य  वर्ग के लोगों द्वारा बरते जाने वाले भयावह भेदभाव और दलितों तथा आदिवासियों के प्रति पुलिस-प्रशासन और न्याेयिक तंत्र में व्याऔप्त  जातीय-नस्लीसय पूर्वाग्रहों के कारण ही इस प्रकार के निवारक अधिनियम की जरूरत महसूस की गई थी. क्याक उच्चे न्यानयालयों और स्व्यं सर्वोच्च- न्या्यालय में न्यासय की कुर्सी पर बैठने वाले न्याचयधीशों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का समुचित प्रतिनिधित्वठ हम आज भी सुनिश्ति कर सके हैं?
क्या  यह सबसे ऊँची अदालत का पूर्वाग्रह नहीं था कि उसने इस मामले में अस्पृ्श्याता विषयक अपराधों को नितांत सामान्य  घटनाएं मानकर अनुसूचित जाति-जनजाति के मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए रखे गये विशिष्टय कानूनी संरक्षण को ठेंगा दिखाते हुए दोषियों के वैयक्तिक अधिकारों को कहीं ज्यानदा तवज्जोण दी? अदालत अत्यािचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज़ इस मामले  में एक नितांत आधारभूत चीज भूल गयी कि यहाँ विवाद दो व्यचक्तियों के बीच में नहीं है, अपितु एक पूरा मनुवादी तंत्र है जो सदियों से अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों पर अपने जातीय श्रेष्ठ्ता के सांस्कृुतिक अहंकार से संचालित हो अत्याचार करता आया है. अपने इस दृष्टि दोष के कारण ही अदालत अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के हितों की रक्षा के लिए बनाये गये विशेष संवैधानिक प्रावधानों और कानूनों का सम्माकन करने में चूक गई.
अदालत अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्या्चार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग विषयक अपने पूर्वाग्रहों से इतनी अंधी हो चुकी थी कि वह यह भी नहीं देख पाई कि उसके इस निर्णय से संविधान प्रदत्तच मूलभूत अधिकारों के उल्लंदघन का संकट पैदा होने वाला है. अपने निर्णय में उसने जिस प्रकार अस्पृदश्यकता को मिटाने वाले और अनुसूचित जाति-जनजाति के कल्याकण के लिए बनाये गये तमाम विशेष संवैधानिक प्रावधानों के मूल में स्थित अनुच्छेयद 17 प्रदत्तव समानता के जिस मौलिक अधिकार तक की अनदेखी की है, उसे फिर से संज्ञान में लिये जाना अपेक्षित है. विडंबना है कि अदालत को अनुच्छेयद 14 और 21 के तहत जमानत प्राप्ति के आरोपी के मौलिक अधिकार तो याद रहे किंतु अनुसूचित जाति-जनजाति को नागरिकता का अधिकार दिलाने वाला अनुच्छे द 17 याद न रहा! वैसे भी कानून में संशोधन करने का, कानून दुबारा लिखने का अधिकार संसद का होता है. अदालत उन्हीं  मामलों में कानून बनाने की सलाह दे सकती है जिनमें पहले से कोई कानून न हो.
इस पूरे मामले में अनुसूचित जाति-जनजाति की दुर्दशा पर व्य वस्थाधपिका और कार्यपालिका का रवैया भी बहुत निराशाजनक है. पहले भी इस अधिनियम के क्रियान्वैयन को लेकर शासन प्रतिष्ठालन अनिच्छुकक रहे थे. इस अधिनियम के बनने के 6 साल बाद 1995 में जाकर ही इसे लागू करवाया जा सका था. इसे अमलीजामा पहनाये जाने से पहले ही इसके दुरुपयोग का हौवा जरूर खड़ा कर दिया गया था. जिस प्रकार आज बड़ी संख्याह में इस अधिनियम के तहत मनुवादी उत्पीाड़कों के खिलाफ मामले दर्ज़ हो रहे हैं, वह इस अधिनियम के दुरुपयोग का सूचक नहीं ठहराया जा सकता अपितु यह पढ़ने-लिखने से दलितों और आदिवासियों में आती जागरुकता का व्यंजजक है. यह सूचक है हाशिये से ऊपर उठने के लिए संघर्षरत दलितों-आदिवासियों पर बढ़ते ब्राह्मणवादी अत्या चारों का.
आज सालाना लगभग पचास हजार मामले अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पुलिस थानों में दर्ज़ हो रहे हैं, अर्थात दलितों-आदिवासियों के खिलाफ उत्पीतड़न और अस्पृजश्यैता की कम से कम छह घटनाएं प्रति घंटे घटित हो रही हैं. किंतु इस अधिनियम के तहत आरोपित लोगों के दोषी सिद्ध होने की दर का बहुत कम (लगभग 20 प्रतिशत) होना चिंता का विषय है. 2012 से पहले तो यह दर एक अंक में ही रहती आई थी. दोष सिद्धि की इतनी कम दर इस बात की सूचक नहीं है कि अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग भोले-भाले सवर्णों को झूठ-मूठ ही इस अधिनियम के तहत फंसाते हैं ! वास्त व में इस अधिनियम के तहत आरोपी ठहराये गये बहुसंख्यतक आरोपियों का स्वदयं को दोष मुक्तध करवाने में सफल हो जाना स्वबयं इस बात का सबूत है कि भारतीय पुलिस और न्याकय व्यरवस्थाो में मनुवाद बहुत गहरे तक बैठा हुआ है. और यही कारण है कि प्रभावशाली सवर्ण आरोपियों पर अंकुश लगाने के लिए ही अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्यापचार निवारण अधिनियम) में मामला दर्ज़ होते ही आरोपियों की गैर जमानती त्विरित गिरफ्तारी का प्रावधान रखा गया था.
20 मार्च के अदालती निर्णय के बाद दलित-आदिवासी नेताओं, नागरिक संगठनों और विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा बारंबार सर्वोच्च- अदालत में समीक्षा याचिका दाखिल किये जाने की मांग के बाद भी केंद्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही. सरकार दलितों-आदिवासियों के धैर्य की परीक्षा लेती रही कि उनकी प्रतिक्रिया क्याे रहती है. यह 2 अप्रैल के व्यािपक भारत बंद से उपजी घबराहट ही थी कि सरकार को न चाहते हुए भी अदालत में आधे-अधूरे मन से ही सही किंतु समीक्षा याचिका डालनी ही पड़ी जिस पर अभी सुनवाई हो रही है. 2 अप्रैल के बंद के खिलाफ आरक्षण समाप्त  करने की प्रतिक्रियावादी मांग को लेकर मनुवादी ताकतों द्वारा किये गये भारत बंद के आह्वान से यह भी स्पोष्टव हो जाता है कि हमारे समाज में भगवा राजनीति ने दलितों और आदिवासियों के खिलाफ कितना जहर भर दिया है. यह भी नहीं भूला जा सकता कि पहले भी महाराष्ट्रज के मराठों ने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याहचार निवारण) अधिनियम को समाप्त  करने को लेकर राजनीतिक रैलियाँ निकाली थीं. स्प ष्टक है कि एक सोची-समझी साजिश के तहत अनुसूचित जाति-जनजाति के खिलाफ सड़क से लेकर अदालत तक षड्यंत्र किया जा रहा है.
डॉ. प्रमोद मीणा
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दलित सांसदों के नाम खुली चिट्ठी

सेवा में,
आदरणीय सांसद/मंत्री महोदय
जय भीम – जय भारत – जय मूलनिवासी
उपरोक्त विषयक देशहित व जनहित से जुडे महत्वपूर्ण मामलों के संबंध में मैं एक साधारण सा भारतीय नागरिक आपके समक्ष कुछ विचारणीय प्रश्न रखने का प्रयास कर रहा हूं, कृपया इन बिन्दुओं से संज्ञानित होने के लिये अपने व्यस्त समय में से कुछ वक्त प्रदान कर देंगे तो निश्चित रूप से मैं आपका जीवन भर आभारी रहूंगा.
जैसा कि आप जानते ही हैं कि देश की आजादी और संविधान लागू होने से पहले एस.सी/एस.टी वर्ग के लोग हिन्दुओं की मनुस्मिृति के आधार पर बनाई गई वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत शूद्र वर्ग के भी उपवर्ग अर्थात अछूत वर्ग की निम्न कही जाने वाली उन जातियों का हिस्सा थे जिनको ना तो पढने का अधिकार था, ना ही पक्के घर बनाने का अधिकार था, ना ही सम्पत्ति एकत्र करने का अधिकार था और ना ही गांव के अन्दर रहने का अधिकार था. गांव प्रधान, पार्षद, ब्लॉक प्रमुख, विधायक, सांसद, मंत्री बनने का तो सपना भी नहीं देख सकते थे. परन्तु बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर के लम्बे संघर्ष और पूना पैक्ट के बाद निर्मित संविधान में निहित राजनैतिक आरक्षण की व्यवस्था ने आपको मौका उपलब्ध करवाया और जिसकी वजह से आज आप सांसद हैं.
चूंकि बाबासाहब ने यह समझा था कि किसी भी समाज की आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं को हल करने की कुंजी राजनैतिक शक्ति है, इसीलिये उन्होंने भारत के संविधान में राजनिति के हर स्तर पर आरक्षण की व्यवस्था की थी जिससे कि इस समाज के सांसद और विधान सभाओं में चुने हुए नेता न केवल एस.सी/एस.टी वर्ग के लिये संविधान में प्राविधानित अधिकारों की रक्षा करेंगे बल्कि समय और परिस्थितियों के बदलाव के साथ-साथ और अधिक अधिकारों को दिलवाना भी सुनिश्चित करेंगे. बाबासाहब का यह कहना कि जिस रथ को बड़े संघर्ष के बाद मैं यहां तक लेकर आया हूं उसे यदि आगे ना बढ़ा सको तो उसे इसी हालात में छोड़ देना परन्तु किसी भी हालात में उसे पीछे नहीं जाने देना हैं. किन्तु सोचनीय विषय है कि बाबा साहेब द्वारा दिलाये गये अधिकार क्या आप के सांसद रहते धीरे-धीरे समाप्त नहीं हो रहे हैं? क्या इन अधिकारों की रक्षा करना आपकी जिम्मेदारी नहीं है?
श्री सुब्रह्मनयम स्वामी जी कहते हैं कि हम आरक्षण को उस हालत में कर देंगे जिसका होना या ना होना बराबर होगा. यह बेहद पीड़ादायक है कि स्वामी जी के बयान पर किसी भी एस.सी/एस.टी वर्ग के सांसद की ओर से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई. आने वाले वक्त में जब ये संविधान बदल देंगे या बिना बदले ही राजनैतिक आरक्षण को समाप्त कर देंगे तो अधिकारों को पुनः प्राप्त करना असम्भव सा हो जायेगा और यदि सम्भव भी हुआ तो ना जाने कितनी लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ेगी, ना जाने कितना धन, समय और मेहनत लगेगी, क्योंकि आज तो हमारे पास संसद भी है और विधान सभाएं भी हैं जिनमें रहकर विरोध करने या कुछ कहने से अपनी बात मनवाने में सक्षम हैं. यदि राजनैतिक आरक्षण एक बार हमारे हाथों से निकल गया तो अपनी बात रखने के लिये हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा और हम सैंकड़ों साल पिछड़ जाएंगे जिसके जिम्मेदार केवल आप और आप जैसे लोग होंगे, जिसके लिये आपको आने वाली पीढ़ियां कभी माफ नहीं करेंगी.
आप यह भी जानते हैं कि हमारे देश में दो तरह की राजनैतिक विचारधाराएं हैं. एक लोकतान्त्रिक विचारधारा और दूसरी साम्प्रदायिक विचारधारा. साम्प्रदायिक विचारधारा के अंतर्गत मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी है जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनैतिक इकाई है जिसका उद्देश्य भारत का नाम हिन्दुस्तान रखना, संविधान बदलना, आरक्षण समाप्त करना, मनुस्मृति को लागू करना, हिन्दु राष्ट्र घोषित करना और हिन्दु राष्ट्र बनाकर वर्ण व्यवस्था लागू करके अछूत समाज को फिर से अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी के अंधेरे में ढकेलकर मानसिक रूप से अपना गुलाम बनाकर रखना है. अभी हाल में ही आर एस एस ने मेरठ में राष्ट्रोदय नाम से एक कार्यक्रम रखा था. जिसके पोस्टरों में हिन्दू धर्म के जिन पांच वर्णों का जिक्र किया था वो थे- ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अछूत. वाल्मिकी, डॉ. आम्बेडकर और संत रविदास को अछूत लिखा था. वर्तमान व्यवस्था/समय में इस वर्ण व्यवस्था का विरोध संसद भवन में आपको करना चाहिए था परन्तु आपकी चुप्पी के कारण इन पोस्टरों का भारी विरोध एस.सी/एस.टी वर्ग के युवाओं को करना पड़ा. परिणामतः आर एस एस को इन विवादित पोस्टरों को हटाना पड़ा, परन्तु उन्होंने अपनी सोच और अपनी विचारधारा का खुलकर प्रचार तो कर ही दिया.
आपको सम्भवतः यह भी ज्ञात ही होगा कि आजकल श्री रविशंकर प्रसाद टीवी पर और अपने कार्यक्रमों में नये संविधान की प्रतिलिपि यह कहकर दिखा और प्रचारित कर रहें हैं कि देखो इस संविधान की एक प्रतिलिपि सुप्रीम कोर्ट में रखी हुई है, जिस पर भगवान राम, कृष्ण, शिव, ब्रहमा और विष्णु की फोटो लगी है और जिस पर श्री जवाहर लाल, महात्मा गांधी, पटेल और डॉ. आम्बेडकर के हस्ताक्षर हैं. यानि कि संविधान बदलने मात्र से एस0सी0/एस0टी0 वर्ग के सारे अधिकार छीन लिये जायेंगे जिसमें उनका राजनैतिक आरक्षण भी शामिल है.
सम्भवतः आपको यह भी पता ही होगा कि ये सब प्रक्रियाएं वे पूरी कैसे करेंगे कैसे? किसी भी नियम या कानून में बदलाव के लिये लोकसभा और राज्य सभा में बहुमत का होना जरूरी होता है. आर एस एस भाजपा को ढाल बनाकर अपने गणित के अनुसार 2019 के लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद सन् 2022 तक राज्यसभा में भी बहुमत में होंगा और फिर संविधान बदलने का इनका सपना पूरा हो जायेगा फिर ये हमारे देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करके मनुस्मृति लागू कर देंगे तथा एस.सी/एस.टी. वर्ग एवं अन्य पिछड़े वर्गां के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक अधिकारों को बहुत हद तक सीमित कर देंगे और बड़े दुख और पीड़ा की बात यह होगी कि इस कार्य में आपकी भागीदारी भी शामिल रहेगी. यानि यह अपने पैरों पर कुल्हाडी मारने जैसा तो होगा ही साथ ही साथ बाबा साहेब के पूरे संघर्ष पर पानी फेर कर एस.सी/एस.टी वर्ग एवं अन्य पिछड़े वर्गों की लगभग 100 करोड़ आबादी को फिर से अंधेरे गर्त में डालने का काम होगा. और ऐसा भी नहीं है कि इसमें आपकी कोई हानि नहीं होगी आपकी खुद की आने वाली पीढियां भी सम्मान और स्वाभिमान का अधिकार खो देंगी और आपको कोसेंगी. ऐसे हालात में जब एस0.सी./एस.टी. वर्ग एवं अन्य पिछड़े वर्गां पर हर प्रकार से चारों तरफ हमले और अत्याचार हो रहे हों तो आपकी चुप्पी हम सबको बहुत हैरान करती है.
यह बिन्दु भी किसी हद तक सही है कि किसी भी राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता या नेता को पार्टी के दिशा निर्देशों और नीतियों पर चलना पडता है परन्तु एस.सी/एस.टी. वर्गों की स्थिति कुछ भिन्न है, क्योंकि एस.सी/एस.टी वर्ग के सांसदों को बाबासाहब आम्बेडकर ने आरक्षण के माध्यम से दलितों के अधिकारों,सम्मान और सम्पत्ति की सुरक्षा के लिये दिया था. अतः इस वर्ग के सांसदों और विधायकों की पहली प्राथमिकता पार्टी के दिशा निर्देशों पर चलने की नहीं बल्कि इन वर्गों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करना होनी चाहिये. इसिलिये जब भी इन वर्गां पर अत्याचार होता है या उनके अधिकारों को छीना जाता है तो पूरे देश के एस.सी./एस.टी. वर्ग के लोग आपकी ओर बड़ी उम्मीदों से देखते हैं परन्तु आपकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आने से यह समाज बेहद निराश हो जाता है.
आज पूरे देश में लोकतन्त्र और भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ाकर एस.सी./एस.टी. वर्ग के लोगों की सभाओं एवं कार्यक्रमों में जानलेवा हमले किये जा रहे हैं. जातिय आतंकवाद के तहत सरेआम पिटाई की जा रही है और नौजवानों की खुलेआम हत्यायें की जा रही हैं, यहां तक कि दलित महिलाओं को खुलेआम जलाया जा रहा है. बाबासाहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर व अन्य मूलनिवासी महापुरूषों की मूर्तियां तोड़कर अपमानित किया जा रहा है. प्रमोशन में आरक्षण बिल्कुल समाप्त कर दिया गया है और योजनाबद्ध तरीके से सरकारी संस्थाओं का निजीकरण करके आरक्षण समाप्त किया जा रहा है. इस वर्ग का प्रत्येक क्षेत्र में बजट कम किया जा रहा है और अब तो हद ही हो गई है. एकमात्र एस.सी./एस.टी. एक्ट (कानून) जो इस वर्ग के सम्मान का सुरक्षा कवच था, सुप्रीम कोर्ट के एक जज द्वारा दिये गये आदेश के माध्यम से, वह भी छीन लिया गया है.
उपरोक्त दुःखद परिस्थितियों के लिये अगर मुख्य रूप से कोई जिम्मेदार हैं तो वो हैं लोकसभा और राज्यसभा में विराजमान एस.सी./एस.टी. वर्ग के सांसद. कृपया आप ईमानदारी और गम्भीरता से विचार करें और सोचें कि आप स्वयं क्या कर रहे हैं? यदि आपको लगता है कि आप चुप रहकर समाज के प्रति अपना कर्तव्य निभा रहे हैं तो कुछ भी ना करें और यदि आपका आत्मावलोकन या अंतरआत्मा कहती है कि आप अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे हैं तो शीघ्र ही निर्णय लीजिये और कांग्रेस और आर एस एस की विचारधारा को साहस के साथ छोड़कर एस.सी./एस.टी. एवं अन्य पिछड़े वर्गों की तरक्की के रास्ते प्रशस्त करने पर विचार करें.
अतः देशहित, जनहित एवं 100 करोड़ की आबादी वाले एस.सी./एस.टी. और अन्य पिछड़े वर्गों के हित में आपसे विनम्र अनुरोध है कि बचा लीजिये बाबासाहब द्वारा निर्मित भारतीय संविधान और इन वर्गों के अधिकारों को. यदि इस महान कार्य के लिये सांसद की कुर्सी छोड़ने के लिये मजबूर भी होना पड़े तो दे दीजिये यह बलिदान. इस बलिदान के लिये सदियों सदियों तक आपको याद रखा जायेगा.
यदि इस मुहिम में एस.सी./एस.टी. वर्ग के सभी सांसदों ने सामूहिक रूप से त्यागपत्र देने  का निर्णय लिया जाता है तो हमें पूरा विश्वास है कि आपकी सांसद की कुर्सी भी नहीं जायेगी और एस.सी./एस.टी. एवं अन्य पिछडे वर्गां के अधिकारों की वापसी भी हो सकेगी.
अत्यन्त सम्मान सहित।
जोगेन्द्र सिंह
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नई कांग्रेस कार्य समिति से इन दिग्गजों की हुई छुट्टी, ये नए चेहरे शामिल

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नई दिल्ली। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी की नई कार्य समिति (CWC) का गठन कर दिया है. नई टीम में राहुल गांधी ने युवा चेहरों और अनुभवी नेताओं को एक साथ लेकर चलने की कोशिश की है. हालांकि इस टीम से सालों से पार्टी में जमें तमाम दिग्गज नेताओं की छुट्टी हो गई है. पार्टी के संगठन महासचिव अशोक गहलोत ने एक बयान जारी कर बताया है कि सीडब्ल्यूसी में 23 सदस्य, 19 स्थायी आमंत्रित सदस्य और नौ आमंत्रित सदस्य शामिल किए गए हैं.

कांग्रेस कार्य समिति (CWC) के सदस्य

जिन लोगों को कार्य समिति में जगह दी गई है, उनमें पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पार्टी के कोषाध्यक्ष मोती लाल वोरा, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, एके एंटनी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी और ओमन चांडी का नाम शामिल है.

इनके अलावा असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरूण गोगोई, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा, कुमारी शैलजा, मुकुल वासनिक, अविनाश पांडे, केसी वेणुगोपाल, दीपक बाबरिया, ताम्रध्वज साहू, रघुवीर मीणा और गैखनगम के नाम भी कांग्रेस कार्य समिति में हैं. स्थायी आमंत्रित सदस्य सीडब्ल्यूसी में स्थायी आमंत्रित सदस्यों में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, ज्योतिरादित्य सिंधिया, बालासाहेब थोराट, तारिक हमीद कारा, पी सी चाको, जितेंद्र सिंह, आरपीएन सिंह, पी एल पूनिया, रणदीप सुरजेवाला, आशा कुमारी, रजनी पाटिल, रामचंद्र खूंटिया, अनुग्रह नारायण सिंह, राजीव सातव, शक्तिसिंह गोहिल, गौरव गोगोई और ए. चेल्लाकुमार शामिल हैं. विशेष आमंत्रित सदस्य

विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर कुलदीप विश्नोई, इंटक के अध्यक्ष जी संजीव रेड्डी, भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष केशव चंद यादव, केएच मुनियप्पा, अरूण यादव, दीपेंद्र हुड्डा, जितिन प्रसाद, एनएसयूआई के अध्यक्ष फिरोज खान, अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव और कांग्रेस सेवा दल के मुख्य संगठक लालजीभाई देसाई को शामिल किया गया है. कार्य समिति में जो नए नाम शामिल किए गए हैं, उनमें ओमान चांडी, तरुण गोगोई, सिद्धारमैया, हरीश रावत, कुमारी शैलजा, तमरध्वज साहू, रघुवीर मीणा, गैखंगम CWC से बाहर हुए नेता बीके हरिप्रसाद, सीपी जोशी, दिग्विजय सिंह, हेमो पूर्वा सैकिया, जनार्दन द्विवेदी, कमल नाथ, मोहन प्रकाश, सुशील कुमार शिंदे, सुशीला तिरिया, आशा कुमारी, ए चेला कुमार, कर्ण सिंह, ऑस्कर फर्नांडीज और के एच मुनियप्पा का नाम शामिल है.

करन कुमार Read it also-धर्म और जाति के सवाल पर बोले राहुल गांधी
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धर्म और जाति के सवाल पर बोले राहुल गांधी

नई दिल्ली। आगामी चुनावों के मद्देनजर धर्म और जाति को लेकर सियासत शुरू हो चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी कह कर राहुल गांधी पर निशाना साधा था. अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पलटवार किया है. उन्होंने कहा, ‘मैं पंक्ति की आखिरी लाइन में खड़े व्यक्ति के साथ खड़ा हूं. मैं शोषित, वंचित और सताए गए लोगों के साथ हूं. मेरे लिए इन लोगों के धर्म, जाति या विश्वास का मसला तुच्छ है. मैं इनके दर्द को देखता हूं और गले लगाता हूं. मैं नफरत और डर को मिटाता हूं. मैं सभी से प्यार करता हूं. मैं कांग्रेस हूं.’

वहीं, बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने राहुल के इस ट्वीट पर फिर से पलटवार किया है. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी बताने वाले बयान पर अपनी स्थिति साफ करने की बजाय कंफ्यूजन बढ़ा रहे हैं. पिछले दो दिनों से लोग सवाल पूछ रहे हैं और स्पष्टीकरण मांग रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी को सटीक जवाब नहीं दे रहे हैं. बता दें कि हाल ही में राहुल गांधी ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाकात की थी और कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी बताया था, जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रैली को संबोधित करते हुए तंज कसा था. राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा था, ‘नामदार कहते हैं कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है, तो मैं पूछता हूं कि क्या कांग्रेस सिर्फ मुस्लिम पुरुषों की पार्टी है या फिर मुस्लिम महिलाओं की पार्टी भी पार्टी है?’ दरअसल पीएम मोदी तीन तलाक के मामले पर कांग्रेस को घेर रहे थे.

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