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उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन की बातचीत अंतिम चरण में है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती इस मुद्दे पर लगातार संपर्क में हैं. इस बीच कुछ बातें तय हो चुकी हैं. मसलन, दोनों दल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी की लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारेंगे और इन दोनों बड़े नेताओं को समर्थन देंगे.
तो वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस गठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल और निषाद पार्टी को भी शामिल करना चाहते हैं. अखिलेश यादव की नजर ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सोलेहदेव भारतीय समाज पार्टी पर भी है. हालांकि इसको लेकर अभी बसपा की सहमति मिलनी बाकी है. अगर बसपा इन तीनों दलों के लिए सीटें छोड़ने को राजी नहीं हुई तो सपा अपने कोटे से कुछ सीटें छोड़ सकती है.
एक बड़ी खबर यह भी है कि यूपी के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव औऱ मुलायम सिंह यादव के अलावा बसपा प्रमुख मायावती के भी चुनाव मैदान में उतरने की बात तय हो गई है. 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद यह पहली बार होगा जब मायावती लोकसभा चुनाव लड़ेंगी.
दूसरी ओर राजस्थान, छत्तीसगढ़ औऱ मध्यप्रदेश में सीटों के बंटवारे को लेकर भी बसपा और कांग्रेस साकारात्मक दिशा में बढ़ रहे हैं. इन तीनों राज्यों में दोनों दलों के बीच गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है. हालांकि सीटों को लेकर खिंचतान अब भी जारी है. कांग्रेस की ओर से गठबंधन की बात महासचिव अशोक गहलोत कर रहे हैं तो वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को इसकी जिम्मेदारी दी है.
खबर के मुताबिक कांग्रेस पार्टी तीनों राज्यों में बसपा को चार से पांच सीट देने को राजी है, जबकि बसपा और ज्यादा सीटों की मांग कर रही है. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बसपा मजबूत दावेदार है. इन तीनों राज्यों के चुनाव लोकसभा के संभावित चुनावों से छह महीने पहले होने हैं. ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के लिए यह एक बड़ा चुनाव है, जिसमें कोई दल किसी भी तरह की चूक नहीं चाहता है. उम्मीद है कि आने वाले कुछ दिनों में जल्दी ही बसपा, कांग्रेस और सपा आधिकारिक रूप से गठबंधन का ऐलान कर सकते हैं.
Read it also-दलित के यहां रोटी खाने को सभी तैयार, बेटी देने को कोई तैयार नहीं- पासवान
नई दिल्ली। एनडीए में घटक दल लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष और पीएम नरेंद्र मोदी सरकार में उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने देश भर में दलितों राजनीति कर रहे नेताओं पर करारा हमला किया है। उन्होंने कहा कि दलितों से रोटी खाने को सब तैयार हैं परंतु बेटे देने कोई तैयार नहीं होता। उन्होंने कहा अंतरजातीय विवाह से जाति व्यवस्था खत्म हो सकती है। रोटी और बेटी की समस्या हल हो जाए तो जातिवाद खत्म हो जाएगा। बता दें कि 2014 के बाद से अब तक लगभग हर चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के दिग्गज नेता दलित और आदिवासियों के यहां जाकर रोटी खाते हैं, कभी कभी बनाते भी हैं।
इस दौरान भाजपा के खिलाफ एकजुट हो रहे विपक्ष पर हमला बोलते हुए पासवान ने कहा कि उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के खिलाफ बन रहे महागठबंधन की वही हालत होगी, जैसी इंदिरा गांधी के समय 1977 सिंडीकेट की। इनका राष्ट्रीय नेता कौन है? राहुल गांधी, चन्द्राबाबू नायडू और ममता बनर्जी को लोग नेता नहीं देख रहे हैं। यहां तो सब अपनी ढपली बजा रहे हैं। पासवान ने माना कि उत्तरप्रदेश के कैराना और फूलपुर का उपचुनाव हारना चिंता का विषय है।
Read it also-थाने में दलित को पीटकर मार डालने वाले पुलिसवालों को 10 साल की सजा
मिरजापुर। उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले में पुलिस कस्टडी के दौरान पिटाई से दलित की मौत के एक मामले में अदालत ने चौकी प्रभारी और कॉन्स्टेबल को 10-10 साल की सजा सुनाई है। अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश एससीएसटी भगवती प्रसाद सक्सेना की अदालत यह फैसला दिया है। अदालत ने पुलिस कस्टडी में पिटाई से दलित की हुई मौत के जुर्म में तात्कालीन चौकी प्रभारी पटेहरा उप निरीक्षक राजाराम यादव, कांस्टेबल वरीसन प्रसाद एंव ग्रामीण नेबुल कोल को 10-10 वर्ष की कड़ी कैद की सजा के साथ साढ़े छह हजार के जुर्माने से दंडित किया।
मड़िहान थाना क्षेत्र के ग्राम सभा ग्रामपुर निवासी निशा देवी ने आठ जुलाई 2013 को थानाध्यक्ष मड़िहान को इस आशय की तहरीर दिया कि उसके पति महेश कुमार कोल को गांव के ही नेबुल के इशारे पर चौकी प्रभारी पटेहरा राजाराम यादव और कांस्टेबल वरीसन प्रसाद ने इस कदर पिटा कि पुलिस कस्टडी में ही उसकी मौत हो गई। इसके आधार पर आरोपियों के खिलाफ थाना मड़िहान में रिर्पोट दर्ज कर कार्रवाई की गई। इस बार में अदालत ने फैसला सुनाते हुए दोषियों को दंडित किया है।
Read it also-झारखंड में आमरण अनशन पर बसपा विधायक
रांची। अपने क्षेत्र के जपला सीमेंट फैक्ट्री को फिर से चालू कराने और एससी,एसटी, ओबीसी की आरक्षण सीमा को 50 सीसदी से 73 फीसदी करने की मांग के साथ विधायक ने आमरण अनशन शुरू कर दिया है. पलामू के हुसैनाबाद के बसपा विधायक कुशवाहा शिवपूजन मेहता मंगलवार से अपनी इन दोनों मांगों के साथ आमरण अनशन पर बैठे हैं. विधायक का आरोप है कि पूर्व में उनके द्वारा जपला सीमेंट फैक्ट्री को फिर चालू कराने की मांग की गई थी. इसपर सूबे के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने सदन में उन्हें आश्वासन दिया था. यहां तक की मुंख्यमंत्री ने एक मंच से भी सीमेंट फैक्ट्री को शुरू कराने की बात कही थी. बावजूद इसके आश्वासन के एक साल बीत जाने के बाद भी कोई काम नहीं हुआ.
अपनी मांग के साथ विधायक मंगलवार को अनशन पर बैठ गए. इसके बाद सीएम रधुवर दास विधायक से मिलने अनशन स्थल पहुंचे और जपला सीमेंट फैक्ट्री को शीघ्र ही शुरू कराने का आश्वासन देते हुए अनशन तोड़ने का आग्रह किया, जिसे विधायक ने अस्वीकार कर दिया. बसपा विधायक मेहता का कहना है कि जबतक उनकी मांगों पर सरकार कार्रवाई नहीं करती तब तक उनका आमरण अनशन जारी रहेगा.
इस बीच विधायक को बुधवार को विधानसभा से एंबुलेंस में बैठाकर राजेंन्द्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेंडिकल साइंस (रिम्स) में भर्ती कराया गया. रिम्स पहुंचने के बाद भी वह एंबुलेंस में ही अनशन पर बैठे रहे. रिम्स में चिकित्सकीय जांच कराने के लिए अस्पताल के अधिकारियों व प्रशासनिक अधिकारियों ने काफी प्रयास किया, लेकिन उन्होंने अस्पताल में भर्ती होने से साफ मना कर दिया और एंबुलेंस से नीचे नहीं उतरे. हालांकि इसके बाद इमरजेंसी में उनकी जांच की गई और उन्हें 13 नंबर कॉटेज में भर्ती कर लिया गया.
गौरतलब है कि जपला सीमेंट फैक्ट्री 1990 से बंद पड़ा है. अलग राज्य के रूप में झारखंड के गठन के बाद स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि यह फैक्ट्री फिर से शुरू हो जाएगी और उन्हें रोजगार मिलेगा. लेकिन राज्य गठन के 18 साल बीत जाने के बाद भी किसी सरकार ने उस ओर ध्यान नहीं दिया.
रणजीत कुमारRead it also-झारखंडः भाजपा के कार्यकर्ताओं ने स्वामी अग्निवेश को पीटा, कपड़े फाड़े
नई दिल्ली। रेलवे ने उन 70 हजार अभ्यार्थियों को दूसरा मौका देने का फैसला किया है जिनकी नौकरी का आवेदन फोटो अपलोड करने में आई खामी की वजह से खारिज कर दी गई है. रेलवे ने ऐसे अभ्यार्थियों को 18 से 20 जुलाई के बीच अपनी गलतियों में सुधार का मौका दिया है. रेल मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि आवेदनों की जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि रेलवे को मिले 48 लाख आवेदनों में से 1.33 लाख आवेदन विभिन्न कारणों से योग्य नहीं है. गौरतलब है कि रेलवे ने 26,500 सहायक लोको पायलट (इंजन चालक) और तकनीशियनों के पदों के लिए आवेदन मांगे थे. रेलवे बोर्ड में सूचना एवं प्रचार के निदेशक राजेश दत्त बाजपेई ने कहा कि हमने पाया कि अयोग्य पाए गए आवेदनों में से करीब 1.27 लाख आवेदन सही फोटो नहीं लगाने की वजह से अयोग्य हो गए हैं. हमनें उन आवेदनों को फिर से देखने और उन्हें दूसरा मौका देने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि 1.27 लाख आवेदकों में से 70,000 को फोटो में बदलाव करके फिर से अपलोड करने को कहा गया है.
रेलवे ने अभ्यार्थियों को तीन दिन का तक का वक्त दिया है ताकि वे अपनी खामियों को ठीक करते हुए रेलवे भर्ती बोर्ड की साइट पर सही तस्वीर अपलोड कर दें. सूत्रों ने बताया कि अन्य 57,000 अभ्यार्थियों के आवेदनों की आंतरिक तौर पर समीक्षा और पुनर्विचार किया गया और उन आवेदनों में बदलाव की कोई जरूरत नहीं थी. जिन 70,000 अभ्यार्थियों को दूसरा मौका दिया गया है उन्हें ईमेल और संदेश भेजकर अपनी गलती सुधारने को कहा गया है.
यही प्रक्रिया रेलवे द्वारा इस साल के शुरू में अन्य पदों के लिए निकाली गई नौकरियों में भी अपनाई जाएगी. उन्हें भी दूसरा मौका दिया जाएगा. भारतीय रेलवे अगले साल मार्च-अप्रैल तक एक लाख से ज्यादा रिक्त पदों को भरेगा. रेलवे को करीब 1.10 लाख नौकरियों के लिए 2.27 करोड़ आवेदन मिले हैं. रेलवे सुरक्षा बल समेत अन्य पदों के लिए परीक्षा इस साल सितंबर, अक्तूबर और नवम्बर में होगी.
गौरतलब है कि रेलवे ने इसी साल 90 हजार से ज्यादा पदों पर भर्तियां निकाली थीं. रेलवे प्रोटेक्शन सिक्यूरिटी फोर्स (RPSF) ने खाली पदों पर भर्तियां निकाली हैं. गौरतलब है कि विभाग ने कुल 9,739 पदों पर भर्तियां निकाली हैं. इनमें से 8619 पद रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) के तहत निकाली गई हैं. इन पदों पर कांस्टेबल की भर्ती की जाएगी.
जबकि 1120 पदों पर सब इंस्पेक्टर की भर्तियां होंगी. 1120 पदों में से 819 पद पुरुषों के लिए हैं जबकि 301 पदों पर महिलाओं की भर्ती की जाएगी. इन पदों के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख 30 जून थी.(इनपुट भाषा से)
रेलवे ने उन 70 हजार अभ्यार्थियों को दूसरा मौका देने का फैसला किया है जिनकी नौकरी का आवेदन फोटो अपलोड करने में आई खामी की वजह से खारिज कर दी गई है. रेलवे ने ऐसे अभ्यार्थियों को 18 से 20 जुलाई के बीच अपनी गलतियों में सुधार का मौका दिया है. रेल मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि आवेदनों की जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि रेलवे को मिले 48 लाख आवेदनों में से 1.33 लाख आवेदन विभिन्न कारणों से योग्य नहीं है. गौरतलब है कि रेलवे ने 26,500 सहायक लोको पायलट (इंजन चालक) और तकनीशियनों के पदों के लिए आवेदन मांगे थे. रेलवे बोर्ड में सूचना एवं प्रचार के निदेशक राजेश दत्त बाजपेई ने कहा कि हमने पाया कि अयोग्य पाए गए आवेदनों में से करीब 1.27 लाख आवेदन सही फोटो नहीं लगाने की वजह से अयोग्य हो गए हैं. हमनें उन आवेदनों को फिर से देखने और उन्हें दूसरा मौका देने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि 1.27 लाख आवेदकों में से 70,000 को फोटो में बदलाव करके फिर से अपलोड करने को कहा गया है.
रेलवे ने अभ्यार्थियों को तीन दिन का तक का वक्त दिया है ताकि वे अपनी खामियों को ठीक करते हुए रेलवे भर्ती बोर्ड की साइट पर सही तस्वीर अपलोड कर दें. सूत्रों ने बताया कि अन्य 57,000 अभ्यार्थियों के आवेदनों की आंतरिक तौर पर समीक्षा और पुनर्विचार किया गया और उन आवेदनों में बदलाव की कोई जरूरत नहीं थी. जिन 70,000 अभ्यार्थियों को दूसरा मौका दिया गया है उन्हें ईमेल और संदेश भेजकर अपनी गलती सुधारने को कहा गया है.
यही प्रक्रिया रेलवे द्वारा इस साल के शुरू में अन्य पदों के लिए निकाली गई नौकरियों में भी अपनाई जाएगी. उन्हें भी दूसरा मौका दिया जाएगा. भारतीय रेलवे अगले साल मार्च-अप्रैल तक एक लाख से ज्यादा रिक्त पदों को भरेगा. रेलवे को करीब 1.10 लाख नौकरियों के लिए 2.27 करोड़ आवेदन मिले हैं. रेलवे सुरक्षा बल समेत अन्य पदों के लिए परीक्षा इस साल सितंबर, अक्तूबर और नवम्बर में होगी.
गौरतलब है कि रेलवे ने इसी साल 90 हजार से ज्यादा पदों पर भर्तियां निकाली थीं. रेलवे प्रोटेक्शन सिक्यूरिटी फोर्स (RPSF) ने खाली पदों पर भर्तियां निकाली हैं. गौरतलब है कि विभाग ने कुल 9,739 पदों पर भर्तियां निकाली हैं. इनमें से 8619 पद रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) के तहत निकाली गई हैं. इन पदों पर कांस्टेबल की भर्ती की जाएगी.जबकि 1120 पदों पर सब इंस्पेक्टर की भर्तियां होंगी. 1120 पदों में से 819 पद पुरुषों के लिए हैं जबकि 301 पदों पर महिलाओं की भर्ती की जाएगी. इन पदों के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख 30 जून थी.
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नई दिल्ली। भारत की केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला किया है. इस फैसले के मुताबिक अब जेल में बंद कैदियों को रिहा किया जाएगा. इसके लिए सरकार ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को चुना है. कैबिनेट में भी इसको लेकर मंजूरी मिल गई है. सरकार के फैसले के मुताबिक आगामी 2 अक्टूबर को देश के विभिन्न जेलों से कैदियों को विशेष माफी के तहत रिहा कर दिया जाएगा. यह रिहाई तीन चरणों में होगी.
पहले चरण में कैदियों को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती 2 अक्टूबर, 2018 को रिहा किया जाएगा. दूसरे चरण में कैदियों को चम्पारण सत्याग्रह की वर्षगांठ पर 10 अप्रैल, 2019 को रिहा किया जाएगा. वहीं तीसरे चरण में कैदियों को 02 अक्टूबर, 2019 को रिहा किया जाएगा. केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए फैसले के तहत जिन कैदियों को रिहा किए जाने का प्रस्ताव है, उसमें उम्रदराज महिला कैदी, बुजुर्ग कैदी, किन्नर कैदी और दिव्यांग कैदी शामिल हैं. फैसले के तहत उन कैदियों को रिहा किया जाना है, जिन्होंने अपनी सजा का 50 फीसदी हिस्सा पूरा कर लिया है. केंद्र सरकार ने वास्तविक सजा की 66 फीसदी अवधि पूरी करने वाले कैदियों को भी रिहा करने का फैसला किया है.
हालांकि इस फैसले के तहत ऐसे कैदियों को विशेष माफी नहीं दी गई है, जो मृत्युदंड की सजा काट रहे हैं. उन कैदियों को भी इस योजना से बाहर रखा जाएगा, जिनकी मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया है. इसके अलावा दहेज मृत्यु, बलात्कार, मानव तस्करी, पोटा, यूएपीए, टाडा, एफआईसीएन, पोस्को एक्ट, धन शोधन, फेमा, एनडीपीएस, भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम आदि के दोषियों को भी इस योजना के लाभ से बाहर रखा जाएगा. इस प्रक्रिया को देखने के लिए एक समिति गठित करने की भी बात कही जा रही है.
जाहिर सी बात है कि जिन लोगों को सरकार की इस योजना का लाभ मिलने वाला है, वो खुश होंगे. अगर सरकार का यह फैसला जेल सुधार और जेल में बंद कैदियों को एक और मौका देने की कवायद है तो यह एक अच्छी पहल है. लेकिन अगर सरकार के इस फैसले के राजनीतिक पहलू को देखें तो उसके कुछ और मायने दिख रहे हैं. संभव है कि जिन लोगों को सरकार की इस योजना का लाभ मिलेगा वो और उनके परिवार वाले सरकार के प्रति नतमस्तक होंगे और 2019 के चुनावों में सरकार को उनका वोट रूपी समर्थन जरूर मिलेगा. ऐसे में सवाल है कि क्या अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की जोड़ी आम जनता का वोट मिलने की उम्मीद खोती जा रही है और आगामी चुनाव में जीत के हथकंडे के रूप में ऐसे फैसले ले रही है?? यह सवाल तब तक कायम रहेगा, जब तक जेलों से रिहा होने वाले लोगों के आंकड़े सामने नहीं आ जाते.
करन कुमारRead it also-तो क्या गुजरात पहुंचे मोहन भागवत के निशाने पर मोदी थे
समाज और देश
धीरे-धीरे बदल ही रहा था
कि अचानक मनु के रखवाले
देश के रहनुमा बन गए!
और देश फिर से गुलाम हो गया।
छिनने लगी आजादी
पहले खाने की,
फिर पहनने ओढ़ने की,
फिर शिक्षा की,
फिर धर्म की,
फिर कर्म की,
फिर मूर्ति की,
फिर रंग की
देश मे असमानता, जातिवाद, आडम्बर,
अवैज्ञानिकता, रूढ़िवाद, हिंसा, भ्रष्टाचार, हावी हो गए!
इस तरह देश का जीवन
और इंसानियत फिर से गुलाम हो गयी!
जुगुल किशोर चौधरी
इसे भी पढ़े-हुंकार
बह रहा शोणित है तेरा
फिर भी तू क्यों मौन है
पूछ अपने आप से
मानव है तू या कौन है
जाति की जठराग्नि में
हिन्दुत्व के अभिमान में
हवन होते हैं दलित
जीते हैं वो अपमान में
संविधान का नहीं
उनको कोई अब डर रहा
मनुवाद के दावानल में
रोहित सरोज है मर रहा
और तू बैठा हुआ चुप
करता सिर्फ संताप है
जुल्म को सहना भी
होता बहुत ही पाप है
उठ वरण कर वीरता का
धनु कि तू टंकार दे
घर से तू बाहर निकल
और साथ में हुंकार दे।
मुकेश गौरव
Read it also-विकास
शब्द
हम बड़े अजीब लोग हैं
नई दिल्ली। दो महीने पहले बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने जब राजस्थान में सक्रिय पार्टी के एक युवा कार्यकर्ता को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और नेशनल कोआर्डिनेटर जैसा अहम पद दिया था तो उस फैसले ने सबको चौंकाया था. पद देने के करीब दो महीने बाद जब बसपा प्रमुख ने एक झटके में ही जयप्रकाश से दोनों पद वापस ले लिया तो भी बसपा नेता के साथ-साथ अन्य लोग भी चौंके थे. किसी को भी यह यकीन नहीं था कि बहनजी इतनी तेजी से अपने ही बनाए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पर कार्रवाई कर देंगी.
लेकिन अब आनन-फानन में की गई इस कार्रवाई का सच सामने आ गया है. असल में बसपा प्रमुख मायावती ने ऐसा कर के जहां कांग्रेस पार्टी के साथ अपनी दोस्ती को और मजबूती दे दी है तो वहीं उन्होंने एक झटके में भाजपा से कांग्रेस और राहुल गांधी को घेरने का एक बड़ा मुद्दा छीन लिया. इससे पहले की भाजपा, बसपा नेता के बयान के आधार पर कांग्रेस और बसपा पर सवाल खड़े करती, मायावती ने बाजी पलट दी. इस घटना ने यह भी साफ कर दिया है कि 2014 और 2017 के चुनाव में झटका खा चुकीं मायावती अब सियासत की राह पर संभल कर कदम बढ़ा रही हैं.
असल में मायावती नहीं चाहती थी कि जयप्रकाश सिंह का बयान बसपा को घेरने का हथियार बनें. कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के साथ बहनजी के रिश्ते सभी देख चुके हैं, मायावती उसमें भी कोई दरार नहीं चाहती थी. जो सबसे बड़ी बात है कि 2019 में अगर तमाम प्रमुख पार्टियों के सत्ता का गणित गड़बड़ाता है और मायावती के नाम पर तमाम दल एकमत होते हैं तो उस समय कांग्रेस का समर्थन बहुत जरूरी होगा. मायावती उस स्थिति तक पहुंचने के रास्ते में कोई रुकावट नहीं चाहती हैं. जहां तक जयप्रकाश सिंह का सवाल है तो राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने के बाद उनके रंग-ढंग अचानक से बदल गए थे. उनके तमाम बयानों की चर्चा पार्टी के अंदर पहले से थी और पार्टी नेताओं को पहले से ही आशंका थी कि उन पर कभी भी गाज गिर सकती है. ऐसे में जब उन्होंने सीधे राहुल गांधी पर निशाना साध दिया तो सियासत में अपनी छवि को लेकर काफी सजग मायावती ने बिना देरी किए उन पर कार्रवाई कर डाला.
Read it also-बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश सिंह पर गिरी गाज
पूरी पृथ्वी को बांधते हैं किसान के पांव
हरियाली से
पहाड़िया चढ़ते हैं उतरते हैं घाटियां
एक एक कोना भर देते हैं मिट्टी का
अन्न से
बीजों को जगाते हैं नींद से
सबका पेट भरने के लिए
मगर सोए रह जाते हैं बीज
उनकी आंखों के
कि उनके सपनों को पोसने वाला कोई नहीं
कोई नहीं जो चलाए हल बंजर होती आंखों में
फसल उगाने के लिए
कि सूखे चटकते खेतों में
भटक रहे हैं किसान
पानी की जगह
सरकारी आंकड़े पी रहे हैं किसान
अपना सब बेच
बीज-खाद खरीद रहे हैं किसान
फसलों को
अपने आंसुओं से सींच रहे हैं किसान
आंकड़ों की काली स्याही में
तड़प रहे हैं किसान
इज्जत की खातिर
कुएं में कूद रहे हैं किसान
नीम की बाजुओं से लिपट
दम तोड़ रहे हैं किसान
अपने ही खेतों में दफ्न हो रहे हैं किसान
अपनी हड्डियों को खाद में बदल रहे हैं किसान
मगर अब संभल रहे हैं किसान
झूठे वादों की पोल खोल रहे हैं किसान
अब एकजुट हो रहे हैं किसान
आत्महत्याओं के बोझ को अपने सरों से उतार
अधिकारों के लिए बढ़ रहे हैं किसान
कि उनके कदमों को रोकना तुम्हारे बस का नहीं
खेत की मिट्टी में उगे हैं उनके पांव
कि सूरज ने अपने अलाव में पकाया है उन्हें
वे आ रहे हैं तुम्हारे शहर की तरफ
तारकोल से चिपकी सड़क पर चलते हुए
अपने बुझते चूल्हों का दर्द लिए
तुम्हारे कानों आंखों नाकों में भरे
तारकोल को निकालने के लिए
संजीव कौशल
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ये तोड़-फोड़ की राजनीति
ये नफरत की राजनीति
तुम पर शोभा नहीं देती
तुमने तो ठप्पा लगाया है-
राष्ट्रवाद का
फिर ये घिनौने, घटिया, ओछे काम क्यों?
माना तुम सत्ता में आ गये
हमेशा तो नहीं रहोगे
कल कोई और आएगा
फिर वो तोड़ेगा-फोड़ेगा
तुम्हारी बनाई मूर्तियां
या तुम्हारी पसंद की मूर्तियां
इस तरह तो
राष्ट्र का नव निर्माण न हुआ
ये विनाश की शुरूआत है।
माना कि तुम्हारे अंदर
राष्ट्रवादी नाम का कीड़ा
तुम्हें अंदर ही अंदर काट रहा है
लेकिन वो कीड़ा धीरे-धीरे
विषैला होता जा रहा है
वो तुम्हें बहुत बड़ी हानि पहुंचायेगा
और तुम्हें ही नहीं
तुम्हारे चक्कर में
पूरे देश को डसेगा
नफ़रत की राजनीति में पूरा देश जलेगा
तुम तो डूबोगे ही साथ-साथ देश को भी ले डूबोगे…|
मुकेश कुमार ऋषि
जिस जाति अथवा समाज का साहित्य नहीं होता, वह जाति मृत समान ही होती है. वैसे भी हमारे देश में पहले से ही दलितों का लिखा कोई साहित्य नहीं है. वर्ण-व्यवस्था के अनुसार भारत के दलितों को पढ़ने-लिखने का कोई अधिकार ही नहीं था. अतः हमारा कोई साहित्य भी नहीं था. समाज के उत्थान का कोई प्रेरणा-स्त्रोत होता है तो वह उसका अपना साहित्य ही होता है. दलित समाज का जो थोड़ा बहुत साहित्य था वह मौखिक साहित्य था. लिखित साहित्य के अभाव में समाज कोई प्रेरणा नहीं ले सकता. अतः समाज का अपना साहित्य होना अति आवश्यक है.
नई दिल्ली। मीडिया में दलितों की भागेदारी को लेकर सर्वे आ चुका है. उस सर्वे में यह साफ उल्लेख था कि मीडिया में दलितों की भागेदारी एक प्रतिशत भी नहीं है. दलित पत्रकार हैं भी तो महज कुछ चुनिंदा संस्थानों में नीचे के पदों पर. इसकी वजह मीडिया में भयंकर रूप से फैला जातिवाद है, जो दलित समाज के युवाओं को मीडिया में आने से रोकता है. इसका एक ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश में देखने को मिला है, जहां पत्रकारिता के छात्र की जाति जानकर देश के बड़े पत्रकारिता संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के एक शिक्षक ने न सिर्फ उसका मजाक उड़ाया बल्कि जातिगत टिप्पणी भी की. इसके बाद अंकित पचौरी नाम के छात्र ने विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. संजीव गुप्ता के खिलाफ स्थानीय थाने और मानव संसाधन विकास मंत्री से शिकायत दर्ज कराई है.
अंकित अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, कोलार में एम.ए पत्रकारिता के छात्र हैं. भोपाल के अनुसूचित जाति कल्याण थाने में दर्ज कराई गई अपनी लिखित शिकायत में छात्र ने बताया है कि माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विवि के शिक्षक डॉ. संजीव गुप्ता उसके विभाग में मौखिक परीक्षा आयोजित कराने आए थे. इस दौरान जब अंकित अपने क्लास में पहुंचे तो डॉ. संजीव को देखकर उन्होंने अपने शिक्षक के बारे में पूछा. इस दौरान बातचीत में शिक्षक अंकित से उसकी जाति और पुश्तैनी पेशे के बारे में पूछने लगे. और यह जानते ही कि अंकित दलित समुदाय के खटीक जाति से संबंध रखते हैं, उनका मजाक उड़ाने लगे. अंकित ने इस पर आपत्ति दर्ज कराया और मामले की लिखित शिकायत स्थानीय पुलिस और संबंधित मंत्रालय को लिखी.
अंकित का आरोप है कि सारा वाकया अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय के एक अतिथि शिक्षक के सामने घटी थी, लेकिन मामला पुलिस में पहुंचने पर शिक्षक अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर अंकित को विश्वविद्लाय से बर्खास्त करने की धमकी दे रहे हैं. इस पूरे मामले पर भोपाल के समाचार पत्रों ने गंभीर संज्ञान लिया है. इस घटना ने पत्रकारिता संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की सोच पर भी गंभीर सवाल उठा दिया है. अब देखना है कि मंत्रालय और स्थानीय पुलिस प्रशासन अंकित को कब तक न्याय दिला पाते हैं.
सुभाष के. महाजन बनाम महाराष्ट्रस राज्य वाले एक मुकदमे में 20 मार्च को सर्वोच्चष अदालत ने एक फैसले में अदालत ने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्या चार निवारण) अधिनियम (एससी–एसटी एक्ट ) के तहत एफआईआर लिखने से पहले शिकायतकर्ता के आरोपों की पुलिस उप अधीक्षक स्त–र के अधिकारी द्वारा गहनता से जाँच कराने के निर्देश के साथ-साथ आरोपी की गैर जमानती गिरफ्तारी पर भी रोक लगाने का आदेश पारित कर दिया है. अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा है कि इस अधिनियम के तहत दायर प्रथम सूचना रपट (एफआईआर) के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी से पूर्व संबंधित उच्चा अधिकारी से अनुमति लेना जरूरी है. अदालत ने अपने इस निर्णय के पक्ष में अत्याचचार निवारण अधिनियम के तहत तथाकथित झूठे मुकदमों के अंबार का हवाला देते हुए आरोपियों के बचाव के लिए इन प्रावधानों को जरूरी करार दिया है. लेकिन असल में अदालत द्वारा इस अधिनियम में डाले गये ये प्रावधान इस अधिनियम की मूल आत्माा की हत्याय सरीखे हैं.
सेवा में,
नई दिल्ली। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी की नई कार्य समिति (CWC) का गठन कर दिया है. नई टीम में राहुल गांधी ने युवा चेहरों और अनुभवी नेताओं को एक साथ लेकर चलने की कोशिश की है. हालांकि इस टीम से सालों से पार्टी में जमें तमाम दिग्गज नेताओं की छुट्टी हो गई है. पार्टी के संगठन महासचिव अशोक गहलोत ने एक बयान जारी कर बताया है कि सीडब्ल्यूसी में 23 सदस्य, 19 स्थायी आमंत्रित सदस्य और नौ आमंत्रित सदस्य शामिल किए गए हैं.
कांग्रेस कार्य समिति (CWC) के सदस्य
जिन लोगों को कार्य समिति में जगह दी गई है, उनमें पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पार्टी के कोषाध्यक्ष मोती लाल वोरा, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, एके एंटनी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी और ओमन चांडी का नाम शामिल है.
इनके अलावा असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरूण गोगोई, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा, कुमारी शैलजा, मुकुल वासनिक, अविनाश पांडे, केसी वेणुगोपाल, दीपक बाबरिया, ताम्रध्वज साहू, रघुवीर मीणा और गैखनगम के नाम भी कांग्रेस कार्य समिति में हैं. स्थायी आमंत्रित सदस्य सीडब्ल्यूसी में स्थायी आमंत्रित सदस्यों में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, ज्योतिरादित्य सिंधिया, बालासाहेब थोराट, तारिक हमीद कारा, पी सी चाको, जितेंद्र सिंह, आरपीएन सिंह, पी एल पूनिया, रणदीप सुरजेवाला, आशा कुमारी, रजनी पाटिल, रामचंद्र खूंटिया, अनुग्रह नारायण सिंह, राजीव सातव, शक्तिसिंह गोहिल, गौरव गोगोई और ए. चेल्लाकुमार शामिल हैं. विशेष आमंत्रित सदस्य
विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर कुलदीप विश्नोई, इंटक के अध्यक्ष जी संजीव रेड्डी, भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष केशव चंद यादव, केएच मुनियप्पा, अरूण यादव, दीपेंद्र हुड्डा, जितिन प्रसाद, एनएसयूआई के अध्यक्ष फिरोज खान, अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव और कांग्रेस सेवा दल के मुख्य संगठक लालजीभाई देसाई को शामिल किया गया है. कार्य समिति में जो नए नाम शामिल किए गए हैं, उनमें ओमान चांडी, तरुण गोगोई, सिद्धारमैया, हरीश रावत, कुमारी शैलजा, तमरध्वज साहू, रघुवीर मीणा, गैखंगम CWC से बाहर हुए नेता बीके हरिप्रसाद, सीपी जोशी, दिग्विजय सिंह, हेमो पूर्वा सैकिया, जनार्दन द्विवेदी, कमल नाथ, मोहन प्रकाश, सुशील कुमार शिंदे, सुशीला तिरिया, आशा कुमारी, ए चेला कुमार, कर्ण सिंह, ऑस्कर फर्नांडीज और के एच मुनियप्पा का नाम शामिल है.
करन कुमार Read it also-धर्म और जाति के सवाल पर बोले राहुल गांधी
नई दिल्ली। आगामी चुनावों के मद्देनजर धर्म और जाति को लेकर सियासत शुरू हो चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी कह कर राहुल गांधी पर निशाना साधा था. अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पलटवार किया है.
उन्होंने कहा, ‘मैं पंक्ति की आखिरी लाइन में खड़े व्यक्ति के साथ खड़ा हूं. मैं शोषित, वंचित और सताए गए लोगों के साथ हूं. मेरे लिए इन लोगों के धर्म, जाति या विश्वास का मसला तुच्छ है. मैं इनके दर्द को देखता हूं और गले लगाता हूं. मैं नफरत और डर को मिटाता हूं. मैं सभी से प्यार करता हूं. मैं कांग्रेस हूं.’
वहीं, बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने राहुल के इस ट्वीट पर फिर से पलटवार किया है. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी बताने वाले बयान पर अपनी स्थिति साफ करने की बजाय कंफ्यूजन बढ़ा रहे हैं. पिछले दो दिनों से लोग सवाल पूछ रहे हैं और स्पष्टीकरण मांग रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी को सटीक जवाब नहीं दे रहे हैं. बता दें कि हाल ही में राहुल गांधी ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाकात की थी और कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी बताया था, जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रैली को संबोधित करते हुए तंज कसा था. राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा था, ‘नामदार कहते हैं कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है, तो मैं पूछता हूं कि क्या कांग्रेस सिर्फ मुस्लिम पुरुषों की पार्टी है या फिर मुस्लिम महिलाओं की पार्टी भी पार्टी है?’ दरअसल पीएम मोदी तीन तलाक के मामले पर कांग्रेस को घेर रहे थे.
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