गांव गुढ़ा में 19वें दिन भी दलित समाज के लोगों की भूख हडताल रही जारी

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बाबैन। गांव गुढ़ा की हरिजन चौपाल में अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा गुढा के द्वारा भीख नही भागेदारी, देश की हर ईट में चाहिए हिस्सेदारी कार्यक्रम के तहत एससीएसटी व ओबीसी समाज के लोगों की संविधानिक अधिकारों की रक्षा व अधिकार हासिल करने के लिए भूख हडताल लगातार 19 वें दिन जारी रही. इस भूख हडताल में अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा गुढा के प्रधान धर्मबीर सिंह, सुभाष, विकास कुमार, अंग्रेज, महिला सदस्य रीना देवी, बाला देवी, मोनिका, सुमन, कृष्णा, लाजो, रोशनी अंगुरी, सुनीता व अन्य ग्रामीण शामिल रहे. आज गांव गुढ़ा में कांग्रेस पार्टी ने दलित समाज के लोगों का भूख हड़ताल में शामिल होकर समर्थन किया. कांग्रेस पार्टी से जिला परिषद के पूर्व चेयरमैन मेवा सिंह ने समर्थन करते हुए कहा कि आप सभी अपने हकों की लड़ाई के लिए लड़ रहे है जो कोई गलत बात नही है. उन्होनें कहा कि किसी भी समाज के लोगों को अपने हकों की लड़ाई संवैधानिक तरीके से लड़ने का अधिकार है और सरकार दलित समाज के लोगों की मांगे जल्द पूरा करनी चाहिए. उन्होनें कहा कि इस संर्षष की लड़ाई में कांग्रेस पार्टी आप सभी के साथ है.

धर्मवीर सिंह ने बताया कि अनशन पर बैठने के कारण रानी देवी व लाजो देवी की हालत बहुत खराब हो चुकी है जिन्हें इलाज के लिए हस्पताल में ले जाया गया था और अब दोनों महिलाओं की सेहत में सुधार है. धर्मबीर ने कहा कि स्पेशल कम्पोनेट प्लान लागू किया जाए और एसीएसटी व ओबीसी समाज के अधिकारों की रक्षा की जाए. उन्होंने कहा कि डा. भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखित दलितों के अधिकारों को लागू किया जाए. उन्होंने कहा कि जब तक दलित सामज की मुख्य मांगों को पूरा नही किया जाएगा तब तक भूख हड़ताल लगातार जारी रहेगी. गांव के सरपंच मुकेश कुमार ने गांव में दलित समाज के लोगों को पहले ही समर्थन दिया हुआ है और उन्होंने पूरा सहयोग करने का आश्वासन दिया.

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दलित प्रेरणा स्थल घूमने आई गर्भवती को गार्डों ने पीटा

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नई दल्ली। रक्षाबंधन पर पति और बच्चों के साथ राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल घूमने आई गर्भवती से मारपीट की गई. यहां की सुरक्षा में तैनात पांच गार्डों पर ही आरोप लगा है. फोटो खींचने पर महिला का गार्डों से विवाद हो गया था. दिल्ली के पुष्प विहार निवासी अमित पटेल ने बताया कि वह रविवार दोपहर परिवार के साथ राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल घूमने आए थे. उनके साथ उनकी गर्भवती पत्नी और बच्चे थे. वह सभी का टिकट लेकर पार्क में प्रवेश किए. घूमने के दौरान पत्नी के कहने पर परिवार के साथ फोटो खींचने लगे. इसका गार्डों ने विरोध किया. इसी बात को लेकर उनके बीच विवाद हो गया और पांच गार्ड उनके साथ मारपीट करने लगे. गार्डों के धक्का देने से पत्नी गिर पड़ी और उसके हाथ में चोट आई. बीच बचाव करने आये एक अन्य परिवार के साथ भी धक्का-मुक्की की गई. महिला की शिकायत पर सेक्टर-20 कोतवाली में एक नामजद समेत पांच गार्डों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई है. सभी आरोपित फरार हैं. कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक मनोज पंत ने बताया कि महिला के साथ धक्का-मुक्की की बात सामने आई है. उसके पति ने एक नामजद समेत पांच गार्डों के खिलाफ शिकायत दी थी. पुलिस रिपोर्ट दर्ज कर आरोपितों की तलाश कर ही है.

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बीजेपी सांसद सीपी ठाकुर बोले, दलितों की सिर्फ दो पीढ़ियों को मिले आरक्षण

पटना। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वरिष्ठ नेता और सांसद सीपी ठाकुर ने कहा है कि दलितों की सिर्फ दो पीढ़ियों को नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण दिया जाना चाहिए. इसके बाद उन्हें आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए. दलित आरक्षण का विरोध करते हुए उन्होंने सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत की है.

बिहार की राजधानी पटना में बीजेपी नेता ने रविवार को कहा कि सवर्णों की हालत बहुत खराब है. अगर केंद्र सरकार ने उनके लिए तत्काल कोई कदम नहीं उठाया तो देश में नई परेशानी खड़ी हो सकती है. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रह चुके सीपी ठाकुर ने कहा, ‘दलित आईएएस अधिकारी के बेटे को नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए.’

बता दें कि यह कोई पहली बार नहीं है जब सीपी ठाकुर ने दलितों को आरक्षण देने का विरोध किया है. इससे पहले भी वह आरक्षण को खत्म करने के पक्ष में बयान दे चुके हैं.

इससे पहले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को प्रमोशन में आरक्षण से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई सवाल किए थे. शीर्ष अदालत ने पूछा था कि यदि एक आदमी रिजर्व कैटिगरी से आता है और राज्य का सेक्रटरी है, तो क्या ऐसे में यह तार्किक होगा कि उसके परिजन को रिजर्वेशन के लिए बैकवर्ड माना जाए? कोर्ट ने यह सवाल भी किया कि मान लिया जाए कि एक जाति 50 सालों से पिछड़ी है और उसमें एक वर्ग क्रीमीलेयर में आ चुका है, तो ऐसी स्थितियों में क्या किया जाना चाहिए?

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि आरक्षण का पूरा सिद्धांत उन लोगों की मदद देने के लिए है, जो सामाजिक रूप से पिछड़े हैं और सक्षम नहीं हैं. ऐसे में इस पहलू पर विचार करना बेहद जरूरी है.

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बीजेपी की ‘दलित जोड़ो’ मुहिम को पीएम मोदी ने दी धार

नई दिल्ली। बीजेपी को 2014 में देश की सियासत का सिरमौर बनाने में दिल खोलकर साथ देने वाले दलितों का 2019 में भी पार्टी ऐसा की जुड़ाव चाहती है. वेस्ट यूपी के शब्बीरपुर और दो अप्रैल की हिंसा के बाद बीजेपी से दलितों में दिख रही दूरी को पाटने के लिए बीजेपी की तरफ से छेड़ी हुई ‘दलित जोड़ो’ मुहिम को रविवार को मन की बात में पीएम ने भी धार दी. उन्होंने खुद की सरकार की तरफ से एससी-एसटी के अधिकारों को सुरक्षित करने का हवाला देकर हमदर्द साबित करने की कोशिश की. इसके साथ रक्षाबंधन पर बीजेपी की महिला वर्करों ने दलित बस्तियों में जाकर राखी बांधी और भाइयों से तोहफे के तौर पर 2019 में कमल का साथ मांगा.

बीजेपी की दलितों की नाराजगी की भनक लगने के बाद 2017 से ही उनको साधने में जुटी है. 2014 के लोकसभा चुनाव में दलितों ने खुलकर बीजेपी के पक्ष में वोट दिया था. जिसका असर यह हुआ था कि दलितों की पार्टी कही जाने वाली बीएसपी अर्श से फर्श पर आ गई थी.

अपनो (दलितों) के मुंह मोड़ लेने से तीन बार यूपी की सीएम रहने वाली मायावती की पार्टी को एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली थी. 2017 में भी वेस्ट के दलितों के दिल में बीजेपी को लेकर झुकाव दिखा. यूपी में बीजेपी के सत्ता में आने की एक वजह दलितों का बड़ा हिस्से का कमल के पक्ष में खड़ा होना माना गया था, लेकिन यूपी में बीजेपी की सरकार बनते ही जून 2017 में सहारनपुर में जातीय हिंसा हुई.

शब्बीरपुर में मकान जलाए गए. दलित समाज के युवकों की हत्या कर दी गई. उसको लेकर शब्बीरपुर देश और दुनिया में सुर्खी बना था. भीम आर्मी के चंद्रशेखर को जेल भेजने और मायावती ने हमदर्दी दिखाकर राज्यसभा की सदस्यता छोड़ने के साथ ही शब्बीरपुर पहुंचने के बाद दलित बीजेपी के खुलेआम विरोध में खड़े हो गए थे. उसके बाद वेस्ट यूपी में दो अप्रैल 2018 की हिंसा में जगह जगह मुकदमे, गिरफ्तारी की कार्रवाई होने से बीजेपी के खिलाफ दलित वेस्ट यूपी में खुलकर सामने आ गया.

मिर्चपुर का हाल: दलितों और जाटों की दूरी मिटा पाएगी मायावती-चौटाला की राखी?
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हनीप्रीत की डायरी से बड़ा खुलासा…..

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महिला भक्तों के साथ बलात्कार के आरोप में 20 साल की सज़ा काट रहे डेरा सच्चा प्रमुख बाबा राम रहीम के मामले में जांच एजेंसियों को बड़ी कामयाबी मिली है. राम रहीम की राजदार हनीप्रीत की डायरी के राज खुलने लगे हैं. हनीप्रीत की डायरी जब जांच एजेंसियों के हाथ आई थी तो उसमें कोड ही कोड थे. हनीप्रीत की डायरी के कोड अब डिकोड हो गए हैं. ईडी ने इन कोड्‍स को डिकोड किया है.

बाबा की राजदार हनीप्रीत अभी भी जेल में है. आयकर विभाग के सूत्रों के अनुसार, जब इन कोड को सुलझाया गया तो एक बड़ा खुलासा हुआ. इससे पता चला कि हनीप्रीत की डायरी में लगभग बीस करोड़ रुपए की संपत्ति और लेनदेन की बातें लिखी हुई हैं. आयकर विभाग ने जब हनीप्रीत से इस बारे में जानना चाहा तो कोई जवाब नहीं आया.

हनीप्रीत की डायरी से उसकी काली कमाई का चिट्ठा सामने आया है. हनीप्रीति के पास जो डायरी मिली है, उसमें वायानाड केरला लैंड, मशीन वेट कम करने वाली, हिमाचल की लैंड न्यू, दार्जिलिंग लैंड जैसे कोर्ड वर्ड मिले हैं. अब एजेंसियां इन कोड वर्ड्‍स की जांच कर रही है.

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गिर रहा बसपा का जनाधार, संकट में राष्ट्रीय दल की मान्यता

रायपुर। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का जनाधार लगातार गिर रहा है. छत्तीसगढ़ समेत तीन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में बसपा की साख दांव पर है. इन चुनावों में अगर बसपा का वोट प्रतिशत सम्मानजनक न रहा तो उसकी राष्ट्रीय दल की मान्यता भी खतरे में पड़ सकती है. यही वजह है कि इस बार छत्तीसगढ़ में बसपा पूरी ताकत झोंक रही है.

राष्ट्रीय दल की मान्यता बनाए रखने के लिए बसपा को छत्तीसगढ़ में कम से कम तीन सीटें जीतना और कुल छह फीसद वोट हासिल करना जरूरी है. छत्तीसगढ़ के साथ ही मध्य प्रदेश व राजस्थान में बसपा को छह फीसद वोट हासिल करना जरूरी है. ऐसा न हुआ तो हाथी चुनाव चिह्न छिन सकता है.

छत्तीसगढ़ में 2003 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 6.94 प्रतिशत वोट मिले थे, जो वर्ष 2013 के विधानसभा के चुनाव में घटकर 4.29 प्रतिशत रह गए. 1998 में बसपा के तीन विधायक थे. राज्य बनने के बाद 2003 में पार्टी दो सीटों पर जीतीं, 2008 में भी यह प्रदर्शन दोहराने में कामयाब रही, लेकिन 2013 में पार्टी का सिर्फ एक विधायक ही सदन में पहुंच पाया. इससे साफ है कि बसपा का जनाधार धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. बसपा के प्रदेश प्रभारी एमएल भारती का कहना है कि इस बार हम पूरी ताकत से मैदान में उतरेंगे.

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वेस्ट यूपी के लिए बीएसपी ने बनाया खास प्लान

नई दिल्ली। बीजेपी के वेस्ट यूपी पर फोकस करने के बाद दूसरे दलों ने भी यहां नजर गड़ा दी हैं. बीएसपी प्रमुख मायावती ने अपनी इस मजबूत सियासी जमीन पर वोटों की फसल लहलहाने के लिए अपने सिपहसालारों को एक सिंतबर से ग्राउंड रिपोर्ट लेने के लिए भेजेंगी. बीएसपी प्रदेश अध्यक्ष हर मंडल में दो दिन बिताकर पार्टी में पक्ष में मौजूदा माहौल की थाह लेंगे. साथ ही वह संगठन के लोगों से खुली चर्चा कर बीजेपी की बनाई रणनीति की काट का खाका तैयार करेंगे. बीएसपी का मसकद दलित, मुस्लिम और पिछड़ों को साधने पर रहेगा.

बीएसपी के सूत्रों के मुताबिक कुशवाहा एक और दो सितंबर को आगरा मंडल में रहेंगे. 3 और 4 को अलीगढ़ मंडल में, 6 और 7 को बरेली मंडल में, 8 और 9 को मुरादाबाद मंडल में, 13 और 14 सितंबर को सहारनपुर मंडल के मुजफ्फरनगर जिले में, 15 और 16 सितंबर को मेरठ मंडल में रहेंगे. दोनों दिन बूथ और सेक्टर स्तर तक के वर्करों के बीच रहेंगे. प्रदेश अध्यक्ष वेस्ट यूपी के बाद 17 से 29 सिंतबर तक आजमगढ़, बनारस, भदोही, झांसी, चित्रकूट, कानपुर में भी इसी तरह वर्करों से चुनावी तैयारियों की थाह लेंगे.

बीएसपी का वेस्ट यूपी से खासा लगाव है. यहां सियासी तौर पर भी वह अक्सर मजबूत साबित हुई है. खुद पार्टी प्रमुख मायावती के सियासी सफर की शुरुआत वेस्ट यूपी से ही हुई थी. उन्होंने पहला चुनाव 1984 में कैराना सीट से लड़ा था. कैराना के चुनाव में उन्हें 45 हजार वोट मिले थे और वह हार गई थीं. 1985 में बिजनौर लोकसभा सीट के उपचुनाव और 1987 में हरिद्वार (अविभाजित यूपी के रहते) से उपचुनाव लड़ा और हार गईं. मायावती 1989 में लोकसभा चुनाव में बिजनौर से सांसद बनी. 1996 और 2002 में वह सहारनपुर जिले की हरौड़ा (अब सहारनपुर देहात) सीट से एमएलए बनीं और सीएम की शपथ ली. 2007 में वेस्ट यूपी से सबसे ज्यादा विधायक बीएसपी के जीते थे. इसी के साथ मायावती का जन्मस्थल गौतमबुद्ध नगर में है और ननिहाल हापुड़ जिले में.

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मिर्चपुर का हाल: दलितों और जाटों की दूरी मिटा पाएगी मायावती-चौटाला की राखी?

बसपा सुप्रीमो मायावती ने बुधवार को जब इंडियन नेशनल लोकदल (INLD) प्रमुख ओम प्रकाश चौटाला के बेटे अभय चौटाला को राखी बांधी तो हरियाणा के मिर्चपुर कस्‍बे का जाट और दलित समुदाय हैरान नजर आया. इसके 48 घंटे बाद दिल्‍ली हाईकोर्ट ने 2010 में दलितों की हत्‍या के मामले में 20 लोगों की रिहाई के फैसले को पलट दिया. कोर्ट ने शुक्रवार को फैसले में कहा, ‘जाट समुदाय ने जानबूझकर वाल्मीकि समुदाय के लोगों पर हमला किया.’

फैसले में यह भी कहा गया, ‘कोर्ट का यह मानना है कि सबूतों से साफ है कि जिस तरह का नुकसान और तोड़फोड़ हुई वह काफी व्‍यापक स्‍तर पर थी और यह जाट युवकों के छोटे से ग्रुप ने नहीं किया जैसा कि ट्रायल कोर्ट ने समझा. इसमें कोई संदेह नहीं है कि वाल्मीकि बस्‍ती पर यह हमला वास्‍तव में भीड़ ने किया जो कि सुनियोजित और सुव्‍यवस्थित था.’

बता दें कि वाल्मीकि दलित समुदाय में उपजाति है. 2011 में सेशन कोर्ट ने 15 लोगों को सजा सुनाई थी और 82 को रिहा कर दिया था. उस घटना के बाद से गांव में कुछ नहीं बदला है.

गांव में घुसते ही जातिगत बंटवारा साफ दिखता है. कीचड़ भरा रास्‍ता और जहां गंदा पानी भरा है जाट और दलित बस्तियों को अलग करता है. इसे गांववाले ‘लक्ष्‍मण रेखा’ कहते हैं. दलितों के 40 परिवार इस गंदे रास्‍ते के दूसरी तरफ रहते हैं.

21 अप्रैल 2010 को एक कुत्‍ते के भौंकने के बाद जाटों ने दलितों के 18 घरों पर हमला किया. इसके बाद 254 दलित परिवार सुरक्षित जगह के लिए गांव छोड़ गए. कई महीनों तक बेघर रहने के बाद उनमें से कई हिसार के पास एक जमीन के टुकड़े पर बस गए. यह जमीन एक सामाजिक कार्यकर्ता ने दी थी. केवल 40 परिवार मिर्चपुर लौटे. वे भी जल्‍द से जल्‍द गांव छोड़ने की तैयारी में हैं.

इनेलो के बसपा से हाथ मिलाने को चौटाला के राज्‍य की सत्‍ता में आने के अंतिम प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. इनेलो लगभग 15 साल से हरियाणा की सत्‍ता से बाहर है और वह मायावती के साथ मिलकर दलितों को अपने साथ लेना चाहती है. अनुसूचित जाति में वाल्‍मीकि समुदाय की हिस्‍सेदारी 19 प्रतिशत है.

इनेलो नेता और ओमप्रकाश चौटाला के छोटे बेटे अभय सिंह ने पिछले महीने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, ‘राज्‍य की 90 में से 40 सीटों पर बसपा को 7-8 प्रतिशत वोट मिलते हैं. और 60 सीटें ऐसी हैं जहां इनेलो को 30 फीसदी वोट मिलते हैं. ऐसे में बसपा और इनेलो 39 से 40 प्रतिशत वोट हासिल कर सकते हैं और जिससे विधानसभा में आसानी से बहुमत मिल जाएगा.’

दोनों दलों का साथ आना राजनीतिक रूप से सटीक बैठता है क्‍योंकि इनेलो जाटों की पार्टी मानी जाती है और उसका ग्रामीण इलाकों में काफी असर है. लेकिन अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित 17 विधानसभा सीटों पर भी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा है. 2000 के विधानसभा चुनावों में उसने 13 रिजर्व सीटें जीती थीं.

2005 में उसे कुल नौ सीटें मिली थी और इनमें से छह रिजर्व थी जबकि 2009 में उसकी 31 सीटों में से नौ अनुसूचित जाति वाली सीटें थीं. अगले साल होने वाले चुनावों से पहले दोनों दलों ने वोटों को एकजुट करने के लिए प्रयास तेज कर दिए हैं.

इधर, मिर्चपुर में जाट समुदाय दलितों पर अत्‍याचार से साफ इनकार करता है. जाट समुदाय बसपा-इनेलो के गठबंधन से भी खुश नहीं है. 2010 के हमले के चलते ज्‍यादातर जाट घरों से पुरुषों को गिरफ्तार किया गया. इनमें से कई दोषी भी करार दिए गए.

पेशे से किसान और मामले में आरोपी वजीर सिंह ने बताया, ‘दलितों की सब सुनते हैं लेकिन हमारी कोई नहीं. उनके पास सत्‍ता है क्‍योंकि उनके पास जाटों से ज्‍यादा वोट है. अब इनेलो भी उनके हाथ मिला रही है. वे जीत गए तो उनकी ज्‍यादा सुनी जाएगी.’

वजीर सिंह के पड़ोसी 53 साल के चंद्र प्रकाश ने बताया, ‘चौटाला राजनीतिक लालच में फंस रहे हैं. अगर वह मायावती की सुनेंगे तो हमारी मदद कैसे करेंगे?’ चंद्र प्रकश भी दलितों पर हमले के मामले में आरोपी हैं. एससी-एसटी एक्‍ट को फिर से लागू किए जाने पर भी गुस्‍सा दिखाई देता है. प्रकाश ने आगे कहा, ‘बीजेपी इस कानून को फिर से लेकर आई और चौटाला मायावती से हाथ मिला रहे हैं. ऐसे में हमारे पास केवल एक विकल्‍प बचता है.’

मिर्चपुर के निवासी लेकिन अब अस्‍थायी घर में रह रहे ओमा भगत ने कहा, ‘हमें उम्‍मीद है कि बहनजी हमें यहां से बाहर निकालेगी. हमारे वोट बीजेपी को जाएंगे अगर वह मकान देती है और हमें बसा देती है. मुख्‍यमंत्री ने जगह का उद्घाटन कर दिया है और शिलान्‍यास भी हो चुका है.’ बता दें कि राज्‍य सरकर हिसार के पास धंदूर गांव में दीन दयाल पुरम बसाकर दलितों को वहां पर शिफ्ट करना चाहती है.

मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने सात जुलाई को इस प्रोजेक्‍ट की नींव रखी थी. यह आठ एकड़ में बनाया जाएगा. वर्तमान में 200 दलित परिवार एक सामाजिक कार्यकर्ता वेद पाल तंवर की जमीन पर रह रहे हैं. यहां बनाए गए कच्‍चे मकान बांस के सहारे टिके हुए हैं और इनकी छत प्‍लास्टिक से बनी है. पुरानी साडि़यों से घरों के दरवाजे बनाए गए हैं. भगत ने कहा, ‘इससे तो नरक में रहना बेहतर हैं.’

यदि मायावती और चौटाला के ‘राखी’ संबंधों को कोई चीज नुकसान पहुंचा सकती है तो वह है बीजेपी द्वारा नए घरों का निर्माण करना.

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उन्नाव रेप केस के चश्मदीद गवाह की मौत, राहुल गांधी का बड़ा आरोप

नई दिल्ली। बीजेपी विधायक कुलदीप सेंगर की कथित संलिप्तता वाले उन्नाव बलात्कार और हत्या मामले के प्रत्यक्षदर्शियों में से एक की मौत हो गई जिसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इसके पीछे साजिश की बू नजर आ रही है. कथित बलात्कार मामले की जांच कर रही सीबीआई ने कहा कि गवाहों की सुरक्षा राज्य पुलिस की जिम्मेदारी है और यह केंद्रीय एजेंसी के कार्यक्षेत्र में नहीं आता.

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा सीबीआई के साथ साझा की गई जानकारी के मुताबिक, यूनुस नाम का गवाह पिछले कुछ समय से कथित तौर पर बीमार चल रहा था. वह माखी गांव में एक परचून की दुकान चलाता था. पीड़िता और विधायक भी इसी गांव में रहते हैं. उन्होंने बताया कि उसे कुछ दिनों से लीवर संबंधी बीमारी थी और पिछले हफ्ते उसकी मौत हो गई थी.

जर्मनी में मौजूद राहुल गांधी ने ट्विटर पर आरोप लगाया कि मामले के मुख्य गवाह की ‘रहस्यमय परीस्थितियों में मौत हुई’ और ‘शव का पोस्टमार्टम किए बिना ही उसे जल्दबाजी में दफनाया गया.’

राहुल ने खबर को रिट्वीट करते हुए कमेंट्स में लिखा, ‘भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर की संलिप्तता वाले उन्नाव बलात्कार एवं हत्या मामले के मुख्य प्रत्यक्षदर्शी की रहस्यमय ढंग से हुई मौत और पोस्टमार्टम के बिना जल्दबाजी में दफनाए जाने से साजिश की बू आती है. क्या ‘हमारी बेटियों के लिए न्याय’ का आपका यह तरीका है, श्रीमान 56?’

यूनुस सीबीआई के उस मामले में एक गवाह था जो विधायक अतुल सिंह सेंगर के भाई और चार अन्य द्वारा बलात्कार पीड़िता के पिता की बुरी तरह पिटाई करने से जुड़ा है. इस पिटाई की वजह से पीड़िता के पिता की मौत हो गई थी.

बलात्कार पीड़िता के पिता की जेल में मौत हो गई थी जहां उसे आर्म्स एक्ट के कथित झूठे आरोपों के तहत रखा गया था. उन्नाव में सफीपुर के मंडल अधिकारी विवेक रंजन राय ने बताया कि यूनुस की मौत शनिवार को लीवर सिरोसिस की वजह से हुई थी. राय ने कहा कि उसका कानपुर, उन्नाव और लखनऊ में इलाज चल रहा था. परिवार के सदस्य पोस्टमार्टम नहीं करना चाहते थे. उन्होंने बताया था कि युनूस तीन महीने से बिस्तर पर था और उसकी मौत घर पर इलाज कराने के दौरान हुई.”

उत्तर प्रदेश पुलिस के सूत्रों ने बताया कि यूनुस के परिवार ने पुलिस को बयान दिया है कि वह 2013 से लीवर की बीमारी से ग्रस्त था और उसकी मौत बीमारी की वजह से हुई. उन्होंने बताया कि यूनुस द्वारा कराए जा रहे इलाज संबंधी दस्तावेज भी पुलिस ने बरामद कर लिए हैं. गुरुवार को बलात्कार पीड़िता के चाचा ने उन्नाव के पुलिस अधीक्षक को एक पत्र लिखकर शव के पोस्टमार्टम की मांग की थी ताकि मौत की सही वजह पता चल सके.

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केरल में भारतीयों की मदद करना चाहते हैं पाकिस्तान के पीएम इमरान खान

इस्लामाबाद। पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान ने गुरुवार को कहा कि पाकिस्तान बाढ़ प्रभावित केरल को किसी भी तरह की मानवीय सहायता मुहैया कराने के लिए तैयार है. साथ ही उन्होंने विनाशकारी बाढ़ से प्रभावित लोगों को शुभकामनाएं भेजीं.

केरल में आठ अगस्त से मूसलाधार बारिश के कारण 230 से अधिक लोग मारे गए हैं और कम से कम 10.10 लाख लोग अभी भी शिविरों में रह रहे हैं. पिछले सप्ताह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले खान ने केरल के लोगों के प्रति ट्वीटर पर अपना समर्थन व्यक्त किया है.

खान ने एक ट्वीट किया, ‘‘पाकिस्तान के लोगों की तरफ से भारत में केरल में बाढ़ के कारण तबाही झेलने वालों के प्रति प्रार्थना और शुभकामनाएं व्यक्त करता हूं. हम किसी भी तरह की मानवीय सहायता मुहैया कराने के लिए तैयार हैं.’’

कई देशों ने केरल में बाढ़ राहत अभियानों के लिए सहायता देने की घोषणा की है. संयुक्त अरब अमीरात ने करीब 700 करोड़ रुपया सहायता की पेशकश की है. इसके अलावा कतर ने करीब 35 करोड़ रुपये और मालद्वीव ने 35 लाख रुपये की सहायता देने की घोषणा की है.

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छत्तीसगढ़: BSP ने की बड़ी बैठक, कहा- बिना हमारे नहीं बनेगी सरकार

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है. मंगलवार को रायपुर में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की बैठक न्यू राजेंद्र नगर स्थित गुरु घासीदास सांस्कृतिक भवन में हुई. प्रदेश प्रभारी अशोक सिद्धार्थ ने विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर तैयारी करने के निर्देश दिए.

उन्होंने कहा कि बसपा के बिना कोई सरकार नहीं बनेगी. चुनाव में कांग्रेस सहित अन्य दलों के साथ गठबंधन के सवाल पर प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश वाजपेयी ने कहा कि पार्टी सुप्रीमो मायावती इस पर फैसला लेंगी, बसपा कार्यकर्ता 90 सीटों को लेकर तैयार हैं.

बैठक में प्रदेश प्रभारी अशोक सिद्धार्थ राज्यसभा सांसद, एमएल भारती, भीम राजभर, अजय साहू, विधायक केशव चंद्रा, पूर्व विधायक दाउराम रत्नाकर, दुजराम बौद्ध, बसपा के पर्व विधायक कामदा जोल्हे, पूर्व विधायक लाल साय खूंटे, पूर्व विधायक रामेश्वर खूंटे, सदानंद मार्कण्डेय, एमपी मधुकर, जिला अध्यक्ष, जोन प्रभारी, विधानसभा प्रभारी, संभावित टिकट के दावेदार भी पहुंचे हैं.

अशोक ने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ता ईमानदारी व निष्ठा से कार्य करेंगे. 10 से 15 विधायक जीत जाए तो मजबूर सरकार बनेगी, 15 साल में विकास नहीं, बेहाल से लोग छत्तीसगढ़ में परेशान हैं.

छत्तीसगढ़ बसपा प्रभारी राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ का कहना है कि छत्तीसगढ़ में सीटों की स्थिति का आकलन कर पूरी रिपोर्ट मायावती को देंगे. उसके बाद ही वह किसी गठबंधन पर विचार मायावती ही करेंगी. कांग्रेस के साथ या अजीत जोगी की पार्टी के साथ गठबंधन का फैसला मायावती ही करेंगी.

उन्होंने कहा, “वैसे, बसपा सभी 90 सीटों पर प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रही है. बसपा का वोटर कहीं नहीं जाता, वो बसपा को ही वोट देगा. अजीत जोगी की नई पार्टी से हमारे वोटबैंक पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. कांग्रेस कितनी सीट हमें देना चाहती है ये भी मायने नहीं रखता. बगैर बसपा के, राह मुश्किल है. कर्नाटक में क्या हुआ सबको पता है.”

सिद्धार्थ ने विपक्ष के गठबंधन को अपवित्र कहने वाली भाजपा पर तंज कसते हुए कहा कि वह पहले अपने गिरेबान पर झांककर देख ले.

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गुजरात पुलिस ने बैन की सचिवालय में दलित कार्यकर्ताओं की एंट्री!

गुजारत पुलिस पर आरोप है कि वो अनुसूचित जाति और पिछड़ी जातियों के कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर ब्लैकलिस्ट कर गांधीनगर स्थित राज्य के सचिवालय में आने-जाने से रोक रही है. जिन लोगों को सचिवालय में घुसने से रोका गया उनमें दलित अधिकारों के एक्टिविस्ट किरीट राठौर, दलित नेता जिग्नेश के सहयोगी सुबोध परमार और सफाईकर्मियों के नेता विनूभाई जापड़िया शामिल हैं.

किरीट राठौर बताते हैं, “ मैं दो दशकों से दलित अधिकारों के लिए काम करता हूं. 18 मई को मैं सचिवालय में पास बनवा कर जा रहा था. गेट पर सुरक्षाकर्मियों ने कहा कि मेरा नाम ब्लैकलिस्ट में है. मुझे झटका लगा. मैंने इसकी शिकायत सामाजिक न्याय विभाग से की.”

उनका कहना है, “एक बार फिर मेरी आरटीआई की अपील पर 12 जून को सुनवाई होनी थी. उस समय भी मुझे घुसने दिया गया. चार घंटे थाने में रोके जाने के बाद मुझे जाने दिया गया. जबकि मेरे पास अपील में आने का सरकारी कागज था. मेरे लिए कहा गया कि मैं आत्महत्या कर सकता हूं. जबकि 14 अप्रैल को मैंने अंदर जाने से रोके जाने पर आंदोलन की बात कही थी. आखिर कैसे मुझे सचिवालय में प्रवेश करने से स्थाई तौर पर रोका जा सकता है.”

किरीट को अभी तक वो लिस्ट नहीं दी गई कि किन लोगों के प्रवेश पर रोक लगाई गई है.

वडगांव से विधायक जिग्नेश मेवाणी के नजदीकी सहयोगी सुबोध परमार का नाम भी ब्लैकलिस्ट में डाल दिया गया है. सुबोध परमार ने न्यूज 18 को बताया कि दो महीने पहले जब वे सचिवालय में जा रहे थे तब उन्हें रोका गया. उन्होंने भी आईटीआई के तहत आवेदन दे कर पूछा है कि उन्हें किस नियम के तहत प्रवेश से रोका गया है.

मेवाणी का कहना है, “आखिर दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को क्यों सचिवालय में जाना पड़ता है? क्योंकि उनकी बात नहीं सुनी जाती. जब मैं विधानसभा में दलितों की आवाज उठाता हूं तो माइक की आवाज बंद की जाती है. जब वे सचिवालय में अपनी बात रखने आते हैं तो उनको ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है.”

संपर्क किए जाने पर सचिवालय, सुरक्षा शाखा के पुलिस उपाधीक्षक बीए चुड़ास्मा से संपर्क किए जाने पर उन्होंने इस तरह की किसी भी ब्लैकलिस्ट से इनकार किया.

उनका कहना है, “वैसे सचिवालय में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री कैबिनेट के मंत्री और दूसरे मंत्रियों के कार्यालय है. इनकी सुरक्षा के लिहाज से जो लोग आत्मदाह जैसी घोषणाएं करते हैं उन्हें तभी प्रवेश दिया जाता है, जब उनसे लिखवा लिया जाता है कि वे ऐसा नहीं करेंगे और जरूरत पड़ने पर उनके साथ पुलिस वालों को भी लगाया जाता है.”

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मुजफ्फरनगर में दलितों और ठाकुरों में जमकर संघर्ष

यूपी में मुजफ्फरनगर जिले के गांव मढ़करीमपुर में वैन खड़ी करने को लेकर दलित और ठाकुरों में संघर्ष हो गया. मारपीट, पथराव और फायरिंग से गांव में दहशत फैल गई. हालात को काबू करने के लिए पहुंची पुलिस पर भी पथराव किया गया. पुलिस ने लाठियां फटकार कर भीड़ को खदेड़ा. संघर्ष में महिला समेत कई लोग घायल हो गए.

पुलिस ने अपनी ओर से दोनों पक्षों से 15 लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर चार लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. इस मामले को लेकर दलित समाज के लोगों ने एसएसपी दफ्तर पर हंगामा किया और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की. एसपी सिटी ने सीओ खतौली से जांच कराने का आश्वासन देकर उनके गुस्से को शांत किया. इस घटना के बाद से गांव में तनाव व्याप्त है.

खतौली कोतवाली क्षेत्र के गांव मढ़करीमपुर में बुधवार देर रात ठाकुर बेगराज सिंह के घर पर छठी का कार्यक्रम चल रहा था. दलित सतपाल के पुत्र अमित, रवि और सुमित ने रास्ते में वैन खड़ी कर दी. रास्ते से वैन हटाने को लेकर उनसे बेगराज की कहासुनी हो गई. इस दौरान बेगराज के प्रोग्राम में शामिल होकर घर लौट रहे एक युवक का सतपाल के पुत्रों से कंधा टकराने पर विवाद हो गया. कहासुनी के बाद दोनों समाज के लोग आमने सामने आ गए. देखते ही देखते दोनों पक्षों के बीच पथराव और फायरिंग शुरू हो गई. पथराव में पड़ोसी जयभगवान के घर की सीमेंट की चादरें भी टूट गई. सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास किया. इस पर भीड़ ने पुलिस पर भी पथराव कर दिया. पुलिस ने लाठियां फटकार करके भीड़ को खदेड़ कर स्थिति को नियंत्रित किया.

इस खूनी संघर्ष में एक पक्ष से सतपाल, उसकी पत्नी रमेशो, रवि व अमित और दूसरे पक्ष से शिवकुमार व रामभूज सहित कई लोग घायल हो गए. पुलिस ने घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया. पुलिस ने दोनों पक्षों से रवि, अमित, शिवकुमार व रामभूल को हिरासत में ले लिया है. पुलिस ने अपनी ओर से दोनों पक्षों से 15 लोग शिवकुमार, लोकेश, श्रवण, राजू, रामभूल, गुल्लू, राहुल, कपिल, देवेंद्र, सतपाल, अमित, रवि, सुमित, अजीत, राहुल के विरुद्ध संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है.

खतौली इंस्पेक्टर अंबिका प्रसाद भारद्वाज ने बताया कि रास्ते में वैन खड़ी करने के विवाद में दोनों दोनों पक्षों के बीच संघर्ष हुआ. पुलिस पर भी हमला किया गया. पुलिस ने अपनी ओर से दोनों पक्षों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके चार आरोपियों को जेल भेज दिया है, बाकी की तलाश की जा रही है. गांव में फिलहाल शांति है, फिर भी एहतियातत पुलिस तैनात की गई है.

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दलित संगठनों की 25 अगस्त को महाबैठक

अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा के चेयरमैन अशोक भारती (फाइल फोटो)।

दलित संगठन एक बार फिर सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं. दलित संगठनों ने 25 अगस्त को एक बैठक का आह्वान किया है, जिसमें वे एससी-एसटी संशोधन एक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर फैसला लेंगे. मंगलवार को दो वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान की बहाली को चुनौती दी है.

अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा के चेयरमैन अशोक भारती ने कहा कि उन्होंने याचिका की कापी के लिए आवेदन किया है. साथ ही वे सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में एक कैविएट दायर करने की भी योजना बना रहे हैं, ताकि सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत इनका भी पक्ष सुन सके. भारती ने कहा कि आगामी 25 अगस्त को 25-30 दलित संगठनों की बैठक बुलाई है, जिसमें आगे की रणनीति तय की जाएगी.

भारती का कहना है कि संसद में अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निरोधक बिल पास कराने के बाद उनकी मांग पूरी हो गई थी, जिसके चलते 9 अगस्त का बंद रद्द कर दिया गया था. भारती का आरोप है कि सरकार ‘छद्म’ तरीके से यह सब करवा रही है. उनका कहना है कि सरकार एक तरफ तो खुद को दलित समर्थक पेश करना चाहती है, लेकिन दूसरी तरफ डबल गेम खेल रही है. उन्होंने बताया कि वे दोनों याचिकाकर्ताओं की ‘असलियत’ का पता लगा रहे हैं. भारती का कहना है कि वे अपनी लड़ाई सड़क, संसद और कोर्ट में लड़ने के लिए तैयार हैं.

गौरतलब है कि मानसून सत्र में एसटी संशोधन कानून 2018 को लोकसभा और राज्यसभा ने पास कर दिया था और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद इसका नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में निर्देश दिया था कि इस एक्ट के तहत दर्ज शिकायतों पर किसी को तुरंत गिरफ्तार नहीं किया जाएगा. इस बदलाव के विरोध में दलित संगठनों ने 20 मार्च 2018 को देशव्यापी प्रदर्शन किया था.

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दलित परिवारों के सामाजिक बहिष्कार के मामले ने तूल पकड़ा

बाड़मेर। सीमावर्ती बाड़मेर जिले के कालुड़ी गांव के 70 दलित परिवारों के कथित सामाजिक बहिष्कार का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. दलित समुदाय ने जहां आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किए जाने पर महापड़ाव की चेतावनी दी है. वहीं दूसरे पक्ष ने मामले को झूठा बताते हुए कहा है कि इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.

विशेष के लोगों द्वारा 70 दलित परिवारों के कथित सामाजिक बहिष्कार का है. दलित समुदाय की ओर से इस बारे में बालोतरा थाने में करीब 17 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया है. यह मामला 16 अगस्त को दर्ज कराया गया था, लेकिन अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है. गिरफ्तारी नहीं होने से नाराज दलित समाज के लोगों ने 25 अगस्त से महापड़ाव की चेतावनी दी थी. हालांकि गुरुवार को पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों के समझाने के बाद महापड़ाव को स्थगित कर दिया है.

समुदाय ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं की गई तो वे महापड़ाव करने को मजबूर होंगे. वहीं दूसरी जाति के लोग भी लामबंद हो गए हैं, जिन्होंने सोमवार को बाड़मेर जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन कर इस मामले को झूठा बताया और निष्पक्ष जांच की मांग की. प्रदर्शन में आहोर से विधायक शंकर सिंह राजपुरोहित भी शामिल हुए. दलित परिवारों का आरोप है कि जाति विशेष के लोगों द्वारा सामाजिक बहिष्कार के बाद गांव में उनका हुक्का-पानी बंद कर दिया गया है, जिससे उनका जीना दुश्वार हो गया है. इस बीच तनाव को देखते हुए पुलिस ने गांव में एक अस्थायी चौकी बनाकर पुलिस बल तैनात कर दिया है.

दोनों पक्षों के बीच तनाव का कारण वर्ग विशेष के कुछ युवाओं द्वारा दलित समुदाय पर सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी किया जाना बताया गया. पुलिस के मुताबिक सोशल साइट पर जातिगत टिप्पणी के बाद बायतु के रावताराम ने दूसरे समुदाय के दो युवकों पर एससी/एसटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज करा दिया. बालोतरा वृताधिकारी विक्रमसिंह भाटी ने बताया कि मामला दर्ज कर जांच की जा रही हैं. उन्होंने बताया कि गांव में किसी भी विवाद से बचने के लिए अस्थायी पुलिस चौकी बनाई गई है.

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वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का 95 वर्ष की उम्र में हुआ निधन,

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का निधन दिल्ली के अस्पताल में बुधवार देर रात को हो गया. नैयर 95 वर्ष के थे और आखिरी वक्त वह लेखन और पत्रकारिता से जुड़े रहे. उनका अंतिम संस्कार आज एक बजे दिल्ली के लोधी रोड स्थित श्मशान गृह में होगा. आपातकाल के दौरान नैयर को सरकार के खिलाफ लेख लिखने के कारण जेल भी जाना पड़ा था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वरिष्ठ पत्रकार के निधन पर शोक जताते हुए ट्वीट किया. पीएम ने आपातकाल में सरकार के खिलाफ मुखर आवाज उठाने के लिए नैयर के योगदान की सराहना की और उन्हें श्रद्धांजलि दी.

नैयर 1996 में संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य थे. 1990 में उन्हें ग्रेट ब्रिटेन में उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था. पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के कारण 1997 में उन्हें राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया गया था. नैयर ने देश-विदेश के मशहूर अखबारों के लिए संपादकीय और लेख लिखे.

नैयर ने कई किताबें भी लिखीं और उनकी आत्मकथा भी काफी चर्चित रही थी. उनकी आत्मकथा ‘बियांड द लाइंस’ अंग्रेजी में छपी थी. बाद में उसका हिंदी में अनुवाद, एक जिंदगी काफी नहीं नाम से प्रकाशित हुआ. उन्होंने इसके अतिरिक्त कई किताबें ‘बिटवीन द लाइं,’, ‘डिस्टेंट नेवर : ए टेल ऑफ द सब कान्टिनेंट’, ‘इंडिया आफ्टर नेहरू’, ‘वाल एट वाघा, इण्डिया पाकिस्तान रिलेशनशिप’, ‘इण्डिया हाउस’ जैसी कई किताबें भी लिखीं.

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मायावती ने चौटाला को बांधी राखी, दूसरे भाई बने बिहार के राज्यपाल

बहुजन समाज का एक हिस्सा भले ही सोशल मीडिया पर रक्षा बंधन के खिलाफ अभियान छेड़ चुका है, बसपा प्रमुख मायावती ने इंडियन नेशनल लोकदल के नेता अभय सिंह चौटाला को राखी बांध कर उन्हें अपना राखी भाई बना लिया है. इस बंधन के साथ हरियाणा में बसपा और आईएनएलडी के बीच गठबंधन और मजबूत हो गया है. अभय सिंह चौटाला ने 22 अगस्त को बसपा प्रमुख से उनके दिल्ली स्थित आवास पर मुलाकात की.

इस मुलाकात में बसपा प्रमुख मायावती ने 25 सितंबर को पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल के जन्मदिवस के अवसर पर इंडियन नैशनल लोकदल (आईएनएलडी) द्वारा गोहाना में ‘सम्मान दिवस’ समारोह में शामिल होने का न्यौता भी स्वीकार कर लिया है. बैठक को लेकर हरियाणा के नेता विपक्ष अभय सिंह चौटाला ने बताया कि बहनजी ने सहर्ष ‘सम्मान दिवस’ का न्योता स्वीकार कर लिया है और वह इस अवसर पर लोगों को संबोधित भी करेंगी. बीएसपी सुप्रीमो से मुलाकात के बाद अभय सिंह चौटाला ने कहा –

“दोनों दलों के बीच हुए गठबंधन के बाद, यह पहला मौका होगा जब दोनों दलों के नेता एक मंच से जनता को संबोधित करेंगे. इस गठबंधन से हरियाणा की सभी जातियों और समुदाय के बीच पारंपरिक एकता और सम्मान की भावना स्थापना होगी, जिसमें पिछले कुछ समय से दरार डालने के प्रयास किए जा रहे हैं.” बता दें कि हरियाणा की प्रमुख विपक्षी आईएनएलडी का कुछ समय पहले ही बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन हुआ है. दोनों दलों ने आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ लड़ने का फैसला लिया है.

तो वहीं मायावती के चौटाला को राखी बांधने की चर्चा लुटियन जोन में चल रही है. इससे पहले मायावती ने भाजपा नेता लालजी टंडन को राखी बांधी थी. तो वहीं लालजी टंडन भी बसपा प्रमुख मायावती को अपनी बहन मानते रहे हैं. मायावती ने लगातार कई सालों तक टंडन को राखी बांधी. पार्टी भले दोनों की अलग-अलग रही लेकिन दोनों के रिश्ते में कभी खटास नहीं आई.

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तो इसलिए भारत सामाजिक अन्यायमुक्त नहीं हो पाया

7 अगस्त 1990 को मंडल आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद धीरे-धीरे अगस्त ‘सामाजिक न्याय के माह’ के रूप में स्थापित होते गया है . इस माह पूरे देश में वर्ण-व्यवस्था के वंचितों द्वारा सामाजिक न्याय पर असंख्य संगोष्ठियां आयोजित होती हैं. यह चलन हर वर्ष बढ़ता ही जा रहा है. इस वर्ष भी अगस्त माह में देश के कोने- कोने में सामाजिक न्याय पर असंख्य संगोष्ठिया हुईं और आगामी 25 अगस्त को बी.पी. मंडल , जिनकी अध्यक्षता में ही 20 दिसंबर, 1978 को चार सदस्यीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन हुआ था, की जयंती के अवसर पर बड़े पैमाने पर भारी संख्या में इस मुद्दे पर संगोष्ठियाँ आयोजित होने की ख़बरें आ रही हैं. बहरहाल गत 19 अगस्त को दिल्ली के मशहूर कांस्टीट्यूशन क्लब में इस किस्म की एक बड़ी संगोष्ठी में इस लेखक को भी शिरकत करने का अवसर मिला , जिसमें हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने सामाजिक अन्याय पर एक सवाल खड़ा कर श्रोताओं को विस्मित कर दिया था.

उन्होंने अपनी बात की शुरुआत करते हुए कहा था, ‘हम सभी यहाँ सामाजिक न्याय के सिपाही बैठे हुए हैं.पर, सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते हुए हमने यह समझने का गंभीर प्रयास ही नहीं किया कि सामाजिक अन्याय था ,इसलिए उसे दूर करने के लिए हमें सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़नी पड़ रही है. सामाजिक अन्याय के उत्पत्ति के कारण को ठीक से न समझ पाने के कारण ही आज हम सामाजिक न्याय की लड़ाई लगभग हार चुके हैं : सामाजिक अन्यायकारी वर्गों का दबदबा कायम हो चुका है.यह एक नया सवाल था, जिसे सुनने की मैं अरसे से प्रतीक्षा कर रहा था. मेरा भी दृढ विश्वास रहा है कि सामाजिक अन्याय को ठीक से न समझ पाने के कारण ही देश का आरक्षित वर्ग आरक्षण बचाने, निजी क्षेत्र, न्यायपालिका, प्रमोशन में आरक्षण बढ़ाने के नाम पर सामाजिक न्याय की सिमित लड़ाई में व्यस्त रहा और आज शासको द्वारा साजिश करके सरकारी नौकरिया ख़त्म किये जाने से वह गुलाम वर्ग में तब्दील होने जा रहा है.

बहरहाल सामाजिक अन्याय को लेकर सवाल उठाने वाले विद्वान वक्ता ने इसकी उत्पत्ति का जो कारण बताया, उससे लगा ,उन्होंने खुद ही इस पर पर्याप्त चिंतन नहीं किया है .उन्होंने सामाजिक अन्याय का कारण ज्योतिबा फुले की इस कविता-विद्या बिना मति गयी,मति बिना नीति गई ;नीति बिना गति, गति बिना वित्त गया; बिना वित्त शुद, इतने अनर्थ एक अविद्या ने किया- में ढूंढते हुए ‘अविद्या’ को ही मुख्य कारण बताया. अर्थात शासकों द्वारा बहुजनों को अज्ञान बना कर ही सामाजिक अन्याय को जन्म दिया गया, जिससे निजात दिलाने के लिए बहुजन महापुरुषों ने अपने-अपने स्तर सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी. निसंदेह सामाजिक अन्याय की सृष्टि में भारत में वंचित जातियों का शिक्षा के क्षेत्र से बहिष्कार एक अन्यतम कारण रहा .लेकिन सामाजिक अन्याय तो एक वैश्विक परिघटना रही है और भारत से बाहर दुनिया में और कहीं वंचितों को शिक्षा से पूरी तरह बहिष्कृत नहीं किया गया , बावजूद इसके वहां भी सामाजिक अन्याय का अध्याय सृष्ट हुआ. ऐसे में वंचितों का शिक्षा से बहिष्कार समाजिन अन्याय का मूल कारण नहीं माना जा सकता. बहरहाल सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वालों के लिए सामाजिक अन्याय के तह में जाना जरुरी था, जो नहीं किया गया गया.

अगर भारत में सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले नेता, एक्टिविस्ट और प्रोफ़ेसर सामाजिक अन्याय के मूल को समझने का गंभीर प्रयास किये होते तो पाते कि नस्ल,लिंग,धर्म,भाषा,क्षेत्रादि के आधार पर विभाजित समाज के विभिन्न सामाजिक समूहों में से कुछेक का शासकों द्वारा शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनैतिक-शैक्षिक-धार्मिक इत्यादि) से जबरन बहिष्कार ही सामाजिक अन्याय कहलाता है.इस लिहाज से दुनिया में स्त्री के रूप में विद्यमान आधी आबादी सर्वत्र ही सामाजिक अन्याय का शिकार रही.सर्वाधिक अन्याय के शिकार समुदायों में अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत तथा भारत के बहुजन रहे. यदि मानव जाति के इतिहास के सर्वाधिक वंचित तबकों- प्राचीन रोम के प्लीबीयंस-नाइट्स-दास,यूरोप की सामंतवादी व्यवस्था के कृषक दास, अमेरिका-अफ्रीका इत्यादि के अश्वेत, मलेसिया-न्यूजीलैंड-आस्ट्रेलिया इत्यादि के मूलनिवासियों , भारत के दलित-आदिवासी –पिछड़ों इत्यादि की दुर्दशा के मूल में जाएँ तो पता चलेगा इन सभी में एक खास साम्यता रही. वह यह कि सभी को ही कमोबेश शक्ति के उपरोक्त स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी न देकर ही उन्हें सामाजिक अन्याय का शिकार बनाया गया .

सम्पूर्ण इतिहास में जिन्हें शक्ति के स्रोतों से दूर धकेल कर अशक्त बनाया गया,उनमें सर्वाधिक अभागे रहे भारत के बहुजन, विशेषकर दलित .सामाजिक अन्याय का शिकार बनाये गए दूसरे देशों के वंचितों को न तो शिक्षालयों से दूर रखा गया और न ही देवालयों से: राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियाँ भी उनके लिए पूरी तरह निषिद्ध नहीं रहीं. यह दुर्भाग्य एकमात्र दलितों के हिस्से में आया. बहरहाल पूरी दुनिया में शासकों की साजिश से अशक्त बनाये गए तबकों के पक्ष में लेखक-पत्रकार-साहित्यकार –सोशल एक्टिविस्ट और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने जो अभियान चलाया, उसका चरम लक्ष्य रहा: शक्ति के स्रोतों में उनको वाजिब हिस्सेदारी दिलाना. इस अभियान से आज की तारीख में भारत के शुद्रातिशूद्रों को छोडकर सामाजिक अन्याय का शिकार बनाये गए विश्व के बाकी समुदाओं के जीवन में चमत्कारिक बदलाव आ चुका है.इससे सर्वाधिक उपकृत होने वाले समूहों को यदि चिन्हित किया जाय तो अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के दलित अर्थात काले शीर्ष पर नजर आयेंगे है.

अमेरिका के जो अश्वेत दास-प्रथा से मुक्त होने के सौ साल बाद भी दलितों से कहीं ज्यादा बदहाली में थे,1970 के दशक में वहां आंबेडकरी आरक्षण से उधार ली हुई सर्वव्यापी आरक्षण वाली डाइवर्सिटी पालिसी ने उनके जीवन में आश्चर्यजनक बदलाव ला दिया है.आज अमेरिका में सर्वत्र उनकी हिस्सेदारी दिख रही है.वे फिल्म और टीवी के सितारे हैं,वे बड़े-बड़े उद्योगपतियों में शुमार हैं.वे बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीइओ हैं.नासा से लेकर हार्वर्ड और वालमार्ट से हॉलीवुड:जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहां उनकी प्रभावी उपस्थिति न दिख रही हो.इस बीच उनके मध्य का ही एक व्यक्ति अमेरिका का प्रेसिडेंट तक बन चुका का है.जहाँ तक दक्षिण अफ्रीका के गोरों द्वारा शासित मंडेला के लोगों का सवाल है ,1994 में रंग-भेदी सत्ता के अवसान के बाद के दो दशकों में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका प्रभुत्व स्थापित हो गया है.कभी जिन 9-10 प्रतिशत गोरों का वहां शक्ति के स्रोतों पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा हुआ करता था, आज वे तमाम क्षेत्रों में अपने सख्यानुपात पर सिमटते जाने से दुखी होकर वहां से पलायन करते जा रहे हैं. गोरो का एकमात्र कब्ज़ा कब्ज़ा बचा था भूमि पर. किन्तु फरवरी 2018 में दक्षिण अफ़्रीकी सरकार ने एक कठोर निर्णय लेते हुए, जिन 9-10 प्रतिशत गोरों की वहां की जमीन पर 72 प्रतिशत कब्ज़ा था,उसे बिना मुआवजा दिए अपने कब्जे में ले लिया है. अब वह जमीन सदियों के शोषित-वंचित बहुसंख्य कालों के मध्य बांटी जा रही है .

बहरहाल बहुत पहले संवैधानिक अधिकार मिलने के बावजूद भारत के बहुजनों की स्थिति अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के कालों के मुकाबले अत्यंत कारुणिक है: इनमें नाममात्र का ही बदलाव आया है.आज भी हजारों साल पूर्व की भांति उद्योग—व्यापार पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा वर्ण-व्यवस्था के विशेषाधिकारयुक्त तबकों का ही है.पूरे देश में आज जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हुए हैं,उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स उन्ही के हैं.पॉश कालोनियों में आज भी किसी दलित-आदिवासी-पिछड़े को वास करते देखना अचम्भे जैसा लगता है.मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग माल्स में 80-90 प्रतिशत से ज्यादा दुकानें इन्ही की हैं.चार से लेकर आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है ,उनमे प्रायः 90 प्रतिशत से ज्यादा गाड़ियाँ उन्हीं की ही होती हैं.देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल उन्हीं के हैं.फिल्म और मनोरंजन उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा उन्हीं का है .संसद-विधानसभाओं में बहुजनों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो,पर मत्रिमंडलों में 90 प्रतिशत वे ही हैं. मंत्रिमंडलों के लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले प्रायः 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं.शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार ज्ञान –उद्योग,फिल्म-मीडिया मठ -मंदिरों इत्यादि पर जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का बेहिसाब वर्चस्व आँख में अंगुली डाल कर बताता है कि भारत में हजारों वर्ष पूर्व की भांति सामाजिक अन्याय की धारा आज भी जोर-शोर से प्रवाहमान है.

अब यहाँ स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा होता है कि धरती की छाती पर एकमात्र भारत में क्यों सामाजिक अन्याय की धारा हजारों साल पूर्व की भाँति आज भी कायम है?इसके दो कारण हैं. एक तो यह कि डॉ आंबेडकर की भाषा मे यहाँ का प्रभु वर्ग न सिर्फ सामाजिक विवेक, बल्कि देश-प्रेम से भी से भी शून्य है, इस कारण इस स्वार्थी वर्ग को इस बात की रत्ती भर भी चिंता नहीं है कि इस भयावह अन्याय के के कारण देश टूट सकता है: डॉ.आंबेडकर के शब्दों में लोकतंत्र का ढांचा विस्फोटित हो सकता है. अब जहाँ तक वंचित वर्गों का सवाल है, सदियों से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत रहने के कारण इन वर्गों से फुले,शाहूजी,आंबेडकर, पेरियार, रामस्वरूप वर्मा, जगदेव प्रसाद, नामदेव ढसाल ,कांशीराम इत्यादि जैसे सर्वोच्च स्तर के चिन्तक व बहुजन मुक्तिकामियों का उदय न हो सका. मुख्यतः आंबेडकरी रिजर्वेशन का लाभ उठाकर अधिकारी-प्रोफ़ेसर-डॉक्टर बन कर कुछ मुखर बने ये आन्दोलनकारी समाज विज्ञानं के अध्ययन में अपनी उर्जा का पर्याप्त निवेश न कर सके . इसलिए सामाजिक अन्याय की उत्पत्ति और निवारण का सही सूत्र भी न समझ सके.अपने अधकचरे ज्ञान और संघर्ष के जज्बे के अभाव में सामाजिक न्याय के आन्दोलन के नाम पर आरक्षण और संविधान वचाने तथा निजी क्षेत्र-न्यायपालिका-प्रमोशन की लड़ाई में समाज का मूल्यवान समय व धन का निवेश करवाते रहे. उधर सामाजिक विवेकशून्य जन्मजात शोषक वर्ग निजीकरण-उदारीकरण और भूमंडलीकारण, विनिवेशीकरण को हथियार बनाकर आरक्षित वर्गों, विशेषकर सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले सबसे मुखर समूह दलितों को नए सिरे गुलाम बनाने का लक्ष्य पूरा कर लिया है. लेकिन आज जबकि 21वीं सदी के सभ्यतर युग में जन्मगत कारणों से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत किये गए शेष विश्व के वंचित तबके प्रायः अपना वाजिब हक़ पा चुके हैं:भारत के सामाजिक न्यायवादी नेताओं-एक्टिविस्टों और बुद्धिजीवियों ने उनसे सबक लेते हुए शक्ति के सभी स्रोतों में हिस्सेदारी की लड़ाई ही नहीं लड़ा . वे आज भी कागजों की शोभा बन चुके आरक्षण को बचाने अर्थात नौकरियों में बहुजनों को हिस्सेदारी दिलाने में उलझाये हुए हैं.इस कारण ही भारत सामाजिक अन्याय की धारा आज भी सदियों की भाँति प्रवाहमान है.

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रजवार विद्रोह के नायकों को सम्मान दिलाने आए वंशज

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प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के 160 साल और देश की आजादी के 70 साल बाद भी आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले कई नायक पीछे छूट गए. न ही उनके नाम पर कोई मूर्ति स्थापित की जा सकी और न ही उनके परिजनों की खोज खबर ली गई. जबकि भारत के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन में नवादा के जवाहिर रजवार, एतवा रजवार औऱ फतेह रजवार की उल्लेखनीय भूमिका रही है. ऐसे गुमनाम नायकों की भूमिका का जिक्र ब्रिटिश दस्तावेजो में भी उपलब्ध है. ऐसे गुमनाम नायकों को पहचान दिलाने का काम बिंबिसार फाउंडेशन कर रही है. संस्था मेसकौर प्रखंड के सीतामढ़ी के राजवंशी ठाकुरबाड़ी परिसर में गुमनाम नायकों की मूर्ति स्थापित करने की दिशा में काम कर रही है. फाउंडेशन की पहल पर जल्द ही तीनों नायकों की सांकेतिक मूर्ति स्थापित होने वाली है. अगर इन नायकों की बात करें तो जवाहिर रजवार नारदीगंज प्रखंड के पसई गांव के रहनेवाले थे, जबकि एतवा रजवार गोविंदपुर के कर्णपुर के रहने वाले थे. वहीं फतेह रजवार भी नवादा से जुड़े थे. इनके संघर्ष की कहानी का जिक्र ब्रिटिश दस्तावेजों के अलावा बिहार-झारखंड के स्वतंत्रता संग्राम पुस्तक, पटना केपी जायसवाल शोध संस्थान से प्रकाशित प्रज्ञा भारती जैसे किताबों में मिलती है. इन नायकों ने भारत पर अंग्रेजी शासन के दौरान उन्हें खूब परेशान किया था. सरकारी कचहरी, बंगले, जमींदार और उसके कारिंदे की संपत्ति विद्रोहियों के निशाने पर थी. विद्रोहियों को जब भी अंग्रेजों के खिलाफ मौका मिलता वो घटना को अंजाम देने से नहीं चूकते थे. तब अंग्रेज अधिकारियों ने विद्रोह पर काबू पाने के लिए विद्रोहियों को चोर औऱ डकैत जैसा नाम देना शुरू कर दिया ताकि आम जनता विद्रोहियों को समर्थन देना बंद कर दे. अंग्रेज इनके विद्रोह से खासे परेशान हो गए. आखिरकार अंग्रेजों ने इनको पकड़ने की मुहिम शुरू कर दी. 27 सितंबर 1957 को जब जवाहिर रजवार अपने करीब 300 अन्य साथियों के साथ विद्रोह की रणनीति बना रहे थे, तभी अंग्रेज सैनिकों ने उन पर हमला कर दिया. इस हमले में जवाहिर रजवार के चाचा फागू रजवार की मौत हो गई और कई अन्य विद्रोहियों के साथ जवाहिर भी जख्मी हो गए. बाद में जख्मी जवाहिर की मौत हो गई. इसके पहले 12 सितंबर 1957 को एतवा की गिरफ्तारी के लिए अंग्रेज और जमींदारों की सेना की एतवा और विद्रोहियों से मुठभेड़ हो गई. इस लड़ाई में एतवा तो बच निकले लेकिन उनके 10-12 साथी शहीद हो गए. थके अंग्रेजों ने एतवा की गिरफ्तारी के लिए 200 रुपये का इनाम घोषित कर दिया. 9 अप्रैल 1963 को करीब दस हजार पुलिस मिलिट्री और जमींदार की फौज ने एतवा रजवार को गिरफ्तार करने के लिए अभियान चलाया, लेकिन एतवा बच निकले. इसके बाद वीर नायक एतवा रजवार के नेतृत्व में 10 सालों तक छिटपुट विद्रोह चलता रहा. बिंबिसार फाउंडेशन इन नायकों को और उनके शानदार इतिहास को सहेजने की कोशिश में जुटा है.

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बीबीएयू के छात्रों ने पीएच.डी.हिन्दी के रिजल्ट में धांधली का लगाया आरोप

हिंदी विभाग, बी.बी.ए.यु. लखनऊ में पीएच.डी. चयन का फाइनल रिजल्ट घोषित किया गया, जिसमें साक्षात्कार के स्तर पर एस.टी./एस. सी./ओ.बी.सी. छात्रों के साथ भेद-भाव करते हुए बड़े पैमाने पर धांधली की गई. ज्ञात हो कि विश्वविद्यालय द्वारा पीएच.डी. में चयन के लिए लिखित परीक्षा के बाद साक्षात्कार लिया गया था. लिखित परीक्षा में पहले दूसरे और तीसरे स्थान पर सामान्य वर्ग के विद्यार्थी थे, जिनमें 2 का चयन कर लिया गया. उसके बाद चौथे से नौवें स्थान तक सभी ओ.बी.सी. अभ्यर्थी थे.जिसमें किसी का चयन नहीं किया गया, सीधे 10वें स्थान के सामान्य विद्यार्थी का चयन किया गया. पुनः 11वें स्थान से 17 स्थान तक के ओ.बी.सी./एस.सी./एस.टी. अभ्यर्थियों को छोड़कर केवल 3 सामान्य अभ्यर्थियों में 2 का चयन कर लिया गया. इससे साफ़ पता चलता है कि साक्षात्कार में पूर्वाग्र से ग्रसित होकर चयन समिति ने चुन-चुनकर सामान्य अभ्यर्थियों को ज्यादा अंक दिए हैं. सूत्रों से पता चला है कि हिंदी विभाग के अध्यक्ष सहित साक्षात्कार समिति के सभी सदस्य जो नंबर दे रहे थे वे सवर्ण थे.

महोदय जैसा कि आप जानते हैं विश्वविद्यालय में 100 नम्बर का इंट्रेन्स टेस्ट होता है . छात्र के प्राप्तांक का 80% रिटेन का अंक, Net&JRF है तो 5 अंक, UG प्रथम श्रेणी में है तो 2 नम्बर, द्वितीय श्रेणी में है तो 1 अंक मिलता है . इसी तरह PG प्रथम श्रेणी में है तो 3 नम्बर, द्वितीय श्रेणी में है तो 2 अंक मिलता है . साक्षात्कार 10 नम्बर का है . जिसमें रिसर्चर प्रपोजल का 5 नम्बर और मौखिक अभिव्यक्ति हेतु 5 अंक निर्धारित किया गया है . इस 10 नम्बर के साक्षात्कार में अनारक्षित मेरिट में आने वाले ST,SC,OBC, छात्रों को अधिकतर 1 नंबर दिया . उन सवर्ण छात्रों को जिनका एडमिशन पीएच.डी.में नहीं लेना था अधिकतम 3 अंक दिया गया है . इसका परिणाम यह हुआ कि रैंक नम्बर 4 से रैंक नम्बर 16 तक आने वाले SC,ST,OBC छात्र अंतिम मेरिट से बाहर हो गए हैं . कुलपति महोदय यह व्यवहार अन्यायपूर्ण है.हमारी मांग है कि इस रिजल्ट को तत्काल रद्द कर पुन: साक्षात्कार कराया जाय और एक पारदर्शी परिणाम घोषित किया जाए.

धर्मवीर यादव गगन

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