मध्य प्रदेश में फिर से दहाड़ने को तैयार मायावती

मायावती (फाइल फोटो)

नई दिल्ली। तीन राज्यों में चुनाव प्रचार में जुटीं बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती एक बार फिर मध्य प्रदेश में होंगी. लखनऊ कार्यालय से इस बारे में जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक बसपा अध्यक्ष सुश्री मायावती मध्य प्रदेश राज्य में अपनी पार्टी के चार दिवसीय चुनावी प्रचार अभियान के तहत 20 नवम्बर को पहले दिन दो चुनावी जनसभाओं को सम्बोधित करेंगी.

अपने पहले दिन के चुनावी कार्यक्रम के तहत सुश्री मायावती मध्य प्रदेश खजुराहो से हवाई यात्रा द्वारा बालाघाट ज़िला पहुँचेगी और वहाँ वारसियोनी स्थित रानी अवन्ती बाई स्टेडियम (सिविल क्लब) में आयोजित पार्टी की पहली चुनावी जनसभा को सम्बोधित करेंगी, जबकि इनकी दूसरी चुनावी जनसभा प्रदेश की राजधानी भोपाल में दशहरा मैदान बी.एच.ई.एल. (भेल) गोविन्दपुरा में होगी. उल्लेखनीय है कि बसपा 230 सदस्यीय मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में अकेले ही अपने बल पर लगभग सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं.

Read it also-लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारी में बसपा मुखिया मायावती

दो धड़ों में बंटी भीम आर्मी

0

सहारनपुर हिंसा के बाद जब भीम आर्मी को देश भर में जाना-पहचाना जाने लगा तो इस संगठन और इसके संस्थापक चंद्रशेखर आजाद को अचानक दलित युवाओं की आवाज कहा जाने लगा. चंद्रशेखऱ की रिहाई को लेकर कई आंदोलन हुए और कई सामाजिक कार्यकर्ता इस आंदोलन से जुड़ने लगे. बावजूद इसके बहुजन बुद्धिजीवियों का एक तबका ऐसा भी था जो इस पूरे घटनाक्रम को दूर से देख रहा था. वह यह आशंका जाहिर कर रहा था कि आखिर विचारधारा के स्तर पर आंदोलन के नए खिलाड़ी अनुभवहीन नेतृत्व के बिना कितने दिन तक चल सकेंगे. आखिरकार वही हुआ. खबर आई है कि भीम आर्मी आपसी झगड़ों में उलझकर दो धड़ों में बंट गई है. चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में अविश्वास जताते हुए संगठन के एक धड़े ने अलग होकर भीम आर्मी-2 बना लिया है.

नई बनी भीम आर्मी-2’ के संस्थापक बने हैं शिवजी गौतम, जिन्होंने लोकेश कटारिया को इसका अध्यक्ष बनाया है. इस गुट ने चंद्रशेखर पर बीजेपी से साठ-गांठ करने का आरोप लगाया है. नए गुट ने यह भी आरोप लगाया है कि चंद्रशेखर आजाद साठ-गांठ के कारण भारत बंद के दौरान जेल में बंद निर्दोष दलित नेताओं और कार्यकर्ताओं की रिहाई के प्रयास नहीं कर रहे हैं.’ नए गुट ने जेल में बंद अपने निर्दोष साथियों की रिहाई के लिए अभी हाल ही में जिलाधिकारी को ज्ञापन दिया गया है और कहा है कि जल्द ही बड़ा आंदोलन किया जाएगा.’

नए गुट के आरोप पर चंद्रशेखर के करीबी योगेश गौतम ने हालांकि अपना पक्ष रखते हुए साफ किया है कि ‘चंद्रशेखर की भीम आर्मी मनुवादी सोच वालों से कभी समझौता नहीं करेगी, वह अपना संघर्ष पहले की तरह जारी रखेगी.’ उन्होंने शिवजी गौतम और लोकेश कटारिया पर पलटवार करते हुए कहा, ‘दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान हुई कथित हिंसा में जेल भेजे गए निर्दोष साथियों की रिहाई के लिए भीम आर्मी काफी पहले छह दिसंबर से देशव्यापी आंदोलन करने का ऐलान कर चुकी है. उन्होंने भीम आर्मी-2 पर सत्तारूढ़ दल के बहकावे में आकर समानांतर संगठन खड़ा करने का आरोप लगाया.

सच चाहे जो हो, इस टकराव और टूट ने एक तेजी से उभरते संगठन की साख पर सवालिया निशान तो लगा ही दिया है.

इसे भी पढ़ें-भीमा-कोरेगांव: फैक्ट-फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट में दावा- ‘सुनियोजित थी हिंसा, भिड़े-एकबोटे ने पैदा की स्थिति’

बीजेपी और कांग्रेस एक ‘सांपनाथ’ और एक ‘नागनाथ’ : मायावती

रायपुर। छत्तीसगढ़ में अजित जोगी की अगुवाई वाली जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ रही बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की अध्यक्ष मायावती ने चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिलने का दावा किया है. बीजेपी और कांग्रेस को ‘सांपनाथ’ और ‘नागनाथ’बताते हुए मायावती ने कहा कि उनका गठबंधन इन दोनों पार्टियों से कतई गठबंधन नहीं करेगा.

मायावती ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में बीएसपी और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलेगा. ऐसे में सरकार बनाने के लिए किसी अन्य दल से समर्थन लेने की कल्पना नहीं की जा सकती. उन्होंने कहा, ‘हमें और अजित जोगी को (पूर्ण बहुमत मिलने का) पूरा भरोसा है लेकिन जहां तक बीजेपी और कांग्रेस से गठबंधन की बात है तो ऐसा करने के बजाय हम विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे.’

मालूम हो कि जेसीसी-बीएसपी गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार जोगी ने गुरुवार को कहा था, ‘राजनीति में किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता इसलिए कुछ भी हो सकता है लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसी कोई स्थिति नहीं बनेगी.’ उनसे पूछा गया था कि अगर जेसीसी-बीएसपी गठबंधन छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर पाता है तो क्या वह बीजेपी का साथ लेंगे. जोगी के इसी बयान पर मायावती ने शुक्रवार को प्रतिक्रिया दी है.

बीएसपी प्रमुख ने कहा, ‘बीएसपी-जेसीसी गरीबों, किसानों, मजदूरों, दलितों और पिछड़ों को मजबूत करने के लिए काम कर रही हैं जबकि बीजेपी और कांग्रेस इन तबकों की हितैषी कतई नहीं हैं. इन वर्गों के मामले में ये दोनों पार्टियां ‘सांपनाथ’ और ‘नागनाथ’ हैं. इनका साथ लेने का सवाल ही नहीं है.’ गौरतलब है कि बीएसपी और जेसीसी ने पिछले सितंबर में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में गठबंधन करके लड़ने का ऐलान किया था. प्रदेश की 90 में से 55 सीटों पर जेसीसी और 35 सीटों पर बीएसपी ने अपने प्रत्याशी खड़े किए हैं. गठबंधन के तहत यह भी ऐलान किया गया है कि अगर बहुमत मिला तो जोगी मुख्यमंत्री होंगे.

Read it also-प्रतियोगी परीक्षा में जाति के सवाल के मायने

दलित दंपती पर जानलेवा हमला

0

गुड़गांव। फिरोजपुर झिरका के कोलगांव में दलित दंपती पर जानलेवा हमला और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने का मामला सामने आया है. हमले में दलित दंपती गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. उन्हें अल-आफिया अस्पताल में भर्ती कराया गया है. पुलिस ने एक ही परिवार के 5 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है.

पुलिस के मुताबिक, कोलगांव निवासी टेकचंद कपास चुनने पंजाब गए थे. जब वह लौटे तो घर पर टीवी नहीं था. उनके बेटे ने बताया कि टीवी गांव का जैकम ले गया है. आरोप है कि वह जैकम से टीवी लेने गए तो वह तैश में आ गया और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर जान से मारने की धमकी देने लगा. इस पर वह घर लौट गए.

कुछ देर बाद जैकम, उसकी बीवी मैमूना, बेटा जमशेद, बेटी आबिदा व आलिदा लाठी-डंडे लेकर आए और उन पर जानलेवा हमला बोल दिया. इसमें टेकचंद और उनकी पत्नी बिमला गंभीर रूप से घायल हो गईं. फिरोजपुर झिरका थाने के जांच अधिकारी अतर सिंह ने बताया कि पांचों आरोपितों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है. उन्हें जल्द ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

इसे भी पढ़ें-असली ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान की कहानी

परेशान कर्मचारी ने लगाई पीएम मोदी से गुहार

2

To

The Hon’ble Prime Minister of India Shri Narendra Modi Ji New Delhi Sub: Regarding the malicious transfer by General Manager SECL Kusmunda Area. Ref: Transfer Ref No.SECL/GM/KA/PER/18/10070 Date 27/07/2018. Respected sir,

I am an employee, working as a clerk in South Eastern Coalfields Limited Kusmunda area Chhattisgarh. I have been working as an employee of this company for almost 25 years. I am 53 years old.I have never received any kind of punishment letter, misbehaviour, warning letter, charge sheet from the Secl Kusmunda Project. I have also got the Best Worker Award. My bad day starts with a transfer letter issued by an officer Sri UK Singh, General Manager SECL Kusumunda Area through the Area Personnel Manager. I have never been absent from my entire job since the beginning of the service. My family has now reached the starvation conditions. My salary will not be paid due to being absent for a long time. My life has been destroyed. My health is getting worse, and I have reached a stage of mental depression. My whole family is forced to undergo unexpected phobia and mental torture. Who is responsible for that? All this happened due to a transfer. I am in a condition of illness due to the transfer, and I am unable to perform my duties. There is no other way other than famine or death in front of my life and the entire family today. My children’s education and their future dreams are starting to be ruined. I am not solely responsible for the absence of my duty and the eradication of my innocent family.

I am transferred to the Area Finance Department Kusmunda. The interesting thing is that I am not the Clerk of the Account Cadre. I was pushed into that Job or department, that work I do not understand at all. I do not even have a slight knowledge of accountancy. I do not have any knowledge about the main discipline of the Accounting Department such as making, processing and passing the bills of various sections. In the beginning, I wanted to tell the Area General Manager that I am inappropriate for the finance department. Nobody has tried to understand my problem. Reluctantly, due to excessive pressure, I had to work for 15 days in the Finance Department. See my helplessness or impact of terror, that without the knowledge of accounting, I was compelled to pass the bill of Crore of rupees.

As soon as it came to know that I have been transferred for a special motive. Someone told me that this transfer was done based on a party (contractor, suppliers) complaint. I did not know that the complaint was against me, or against the account cadre clerk (Shri Ramsharan Choubey), who had been transferred to the Project in my place. The purpose of this transfer was soon exposed. They framed me for their selfish ambition. So that he could set his favourite employee in the Project Kusmunda. The process of transfer was just a Drama. Why was I targeted only? I have not been able to know anything yet. But it was very important to find out who was behind it. Finally, I decided to meet the Area General Manager of Kusumunda personally to describe my problem. I requested the General Manager to reconsider my transfer. Because I was having difficulty working in the finance department. I wanted to say a lot about my trouble. When the General Manager agreed to reconsider the transfer, I became silent. The General Manager had said that the matter of transfer would be reviewed after one month. He said that my selection was done on merit basis. Now it had been clear that my transfer was caused on the instructions of the General Manager Area kusmunda.

There were many reasons for destroying my determination and moral power. As a result, I had a bad effect on my mental state and I got sick. My duty closed completely from date of 03/09/2018. I did not absent in the entire Service period. However, the absence is continuing to go on.

I informed the concerned department that I got sick on the date 10/09/2018 through a registered letter. I am not capable to work in the Finance Department. During my absence, my work was changed (Letter No SECL/AFM/KA/Job Assignment/Estb/00/18-19/1624 Dated 12/09/2018). According to which I had to do a different type of work in the same department. But my request was not considered. I saw, the general manager’s refusal to send me back the project, So I requested that Please make me a posting in any department other than the Finance Department forever through the Registered letter on dates 17/09/2018. Because I am not suitable for this department.

I again sent a registered letter to the General Manager, Area kusmunda to review the transfer on date 22/09/2018. Till now, I have been waiting for their decision. I am not habitually “Absentee”.

But their intention was to disturb (mental torture)to me. So they transferred me to the EXCAVATION DEPARTMENT (with the conditions of “After release”) of the Area Letter No/SECL/GM/Kusmunda Area/Personnel /2018/691/Dated 11/10/2018 (Which I had received on date 15/10/2018). But I did not send the PROJECT kusmunda, from where I was evicted, in the name of normal transfer. It is noteworthy that the Area finance department is not in favour of Release.

According to the General Manager’s statement, so far, more than a month has passed. I have not seen any ray of hope yet. What will happen to my family without pay? Nobody is worried about it. The attitude of management seems to be that my transfer has been done by being motivated by malice. Therefore, after being disturbed, I have to be forced to resign from the job.

Sir, I have presented all the matter and circumstances before you. The General Manager, kusmunda Area (Sri U.K.SINGH) has made this transfer the subject of its reputation. They do not worry about the troubles that occur to my family and me. In such a situation, I may have to be compelling to take drastic measures.

Sir, I am expecting justice from you. I would urge you to consider my past performances. I should be transferred to the kusmunda project from the Area Finance Department kusmunda/recently transferredExcavation section Area, where I can execute the related jobs with full efficiency and confidence. I hope you will take a favourable view of this request.

Thanking you.

Yours Faithfully BP.Shriwas Clerk I Neis No: 21494927 SECL Kusmunda Area

Copy to as above Ø Hon’ble Minister of Coal and Railways of India. Ø CMD SECL Bilaspur CG. Ø DIRECTOR (PERSONNEL) SECL Bilaspur CG. Ø National Human Rights Commission, New Delhi. Ø Central Vigilance Commission, New Delhi.

Read it also-इस हिन्दू राष्ट्र में दलितों की यही नियति है!

दलित आंदोलन बनाम सवर्ण आंदोलन

भारत देश में पद्मावती विवाद जैसे फ़िज़ूल मुद्दे आंदोलन का रूख अख्तियार कर लेते हैं, परंतु दलितों का विरोध प्रदर्शन कभी राष्ट्रव्यापी आंदोलन नहीं बन पाता.

जबकि भारत में दलितों की जनसंख्या, पद्मावती विवाद को लेकर तोड़-फोड़ करके राष्ट्र का नुकसान करने वाले जाति वर्ग की जनसंख्या से कई गुना अधिक है. कारण क्या है? आइए समझते हैं…

मीडिया की भूमिका

आंदोलन अचानक नहीं खड़ा होता है… आंदोलन को खड़ा करना पड़ता है… पहली क्रिया को देखकर ही दूसरी प्रतिक्रिया होती है. पहले चिंगारी निकलती है, फिर धीरे-धीरे वह आग बनती है. पहले एक आवाज़ उठती है, फ़िर उस आवाज़ को सुनकर ही उसके समर्थन में दूसरी आवाज़ उठती है.

पद्मावती मामले में मीडिया की भूमिका को आपको ठीक से समझना चाहिए. मीडिया ने शुरू से ही इस विवाद में काफ़ी दिलचस्पी दिखाई है, और पद्मावती का विरोध कर रहे जाति समुदाय को खूब प्रचार दिया है. पद्मावती के विरोध की हर घटना को टी०वी० ने सभी जगह दिखाया है. और यही सब देख-देखकर ही यह विरोध प्रदर्शन अपने पैर पसारता गया. धीरे-धीरे इस विरोध में हर राज्य से संबंधित जाति समुदाय के लोग जुड़ते गए.और यह बड़ा बनता गया. हम यह कह सकते हैं कि मीडिया ने ही इस विरोध प्रदर्शन को अपने कैमरे के जरिए घर-घर तक पहुँचा दिया.

अब ज़रा दलितों के विरोध प्रदर्शन पर आइए…

जो मीडिया का कैमरा अन्य जगह बहुत तीव्र गति से घूमता है, वही कैमरा दलित आंदोलन पर न जाने कहाँ खो जाता है. उदाहरण-

गुजरात के उना में दलितों को महिन्द्रा ज़ायलो गाड़ी से बाँधकर निर्ममता से लोहे की बेंते मारी गई. जिसके बाद गुजरात भर में दलितों ने संवैधानिक व शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया जिसमें उन्होने मरी हुई गायों को उठाकर उसकी खाल उतारने की जगह उन मरी हुई गायों को हर जिले के कलेक्ट्रेट कार्यालय में फेंक आए और कहा ‘तुम्हारी माँ, तुम ही सँभालो’. काफ़ी दिनों तक यह विरोध प्रदर्शन चला…परंतु किसी न्यूज़ चैनल नें इस विरोध प्रदर्शन में तनिक भी दिलचस्पी नहीं ली. समाचार पत्रों में भी यह विरोध प्रदर्शन जगह नहीं बना पाया. जिसके कारण यह बड़ा आंदोलन बनने से पहले ही दब गया.

अगर इसे मीडिया ने दिखाया होता, तो निश्चित रूप से गुजरात के विरोध प्रदर्शन का असर इतर राज्यों में भी दिखाई पड़ता, परंतु गुजरात के दलित आंदोलन कि सवर्ण आधिपात्य वाली गोदी मीडिया ने कोख में ही भ्रूण हत्या कर दी.

दूसरा उदाहरण लीजिए-

कुछ दिनो पूर्व भीमा कोरेगाँव में दलित समुदाय अपने महार सैनिकों की जीत का जश्न मनाने एकत्रित हुए. जिन पर अचानक भगवा झंडा लिए हथियारबंद हिंदूवादियों ने हमला कर दिया, व दलितों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा व उनकी गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए. इस हमले के विरोध में महाराष्ट्र में दलित समुदाय के लोगों ने बहुत भारी विरोध प्रदर्शन किया. परंतु भीमा कोरेगाँव में हुए दलित उत्पीड़न की खबर किसी चैनल (सिवाय एन०डी०टी०वी० के) ने नहीं दिखाई. इसलिए वह विरोध प्रदर्शन भी महाराष्ट्र में ही दबकर रह गया.

यह तो रही मीडिया की भूमिका जो बहुत ज़रूरी होती है. परंतु मीडिया में हद से ज्यादा सवर्ण वर्ग के आधिपात्य के चलते मीडिया बहुजनों के मुद्दों को निगल जाता है, और डकार भी नहीं लेता. (अमेरिका में मीडिया हाउसेज़ अपने न्यूज़ चैनल में अश्वेतों की नियुक्तियों पर खासा ध्यान रखते हैं)

समाज की भूमिका

जब जब दलित अपने हक के लिए खड़ा होगा! तुरंत ही कुछ ऐंटीना धारियों को डर लगने लगता है कि जिस फर्जी हिंदुत्व के नाम पर उन्होने विराट हिंदू एकता स्थापित कर अपना राज स्थापित किया है, वह विराट हिंदू एकता टूट रही है. अब वह आपको वापस अपने फर्जी विराट हिंदू एकता में शामिल करने के लिए जुगत भिड़ाने लगते हैं. इसके तहत तुरंत ही वो किसी एक मुसलमान को उन दलितों के विरूद्ध खड़ा कर देते हैं… ताकि दलितों के सवर्णों के खिलाफ़ उबल रहे गुस्से को हिंदू-मुसलमान ऐंगल देकर अपनी रोटी सेंकी जाए. और दुर्भाग्यवश ऐसा हो भी जाता है. दलित आंदोलन अपने मूल मुद्दे से भटककर हिंदू-मुसलमान विवाद बन जाता है. जिसमें लाठियाँ तो दलित खाता है, परंतु बाद में राज सवर्ण करते हैं. (वे आप पर राज इसलिए नहीं कर रहे हैं, क्योंकी वे बुद्धिमान है ! बल्कि इसलिए कर रहें हैं क्योंकी आप बेवकूफ़ है)

राजनीति की भूमिका

दलितों को हमेशा कोर वोट बैंक माना गया है, क्योंकी दलित केवल झंडा और निशान देखकर वोट करता है. जिसका फ़ायदा सभी पार्टियाँ उठाती हैं. जिस पार्टी को दलितों का वोट मिलता आया है, वे इसलिए कुछ नहीं बोलती क्योंकी उन्हे तो दलितों का समर्थन है ही! और जिस पार्टी को दलितों का वोट नहीं मिलता है, वे खुलकर दलितों के मुद्दों को दरकिनार कर दूसरी जातियों को अपनी ओर खींचती है. परंतु सवर्ण वोटर बहुत चालाकी से हर चुनाव में अपना पाला बदलते रहते हैं. वे कभी कांग्रेस में रहे…फिर एक वर्ग सतीश मिश्रा के कारण बसपा में गया, और दूसरा वर्ग रघुराज प्रताप सिंह के कारण सपा में आया! आजकल वे सभी भाजपा में हैं. वे कभी किसी एक के नहीं रहे, और इस बात का उन्हे लाभ भी खूब मिला. वे किसी के कोर वोटर नहीं बनते, जिसके कारण हर पार्टी उन्हे अपनी तरफ़ खींचने की जुगत में रहती है. इसी कारण पार्टियाँ दलित मुद्दों पर ध्यान नहीं देती क्योंकी उन्हे पता है कि दलितों का वोट तो वहीं जाएगा, जहाँ हमेशा से जाता रहा है. इसी कारण दलितों के आंदोलनों को राजनैतिक साथ भी नहीं मिल पाता. इन्ही सब सम्मिलित कारणों से दलितों का आंदोलन कभी राष्ट्रव्यापी नहीं बन पाता.

बहुत लंबा झोल-झाल है… हर किसी को समझना चाहिए.

प्रतीक सत्यार्थ Read it also-लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारी में बसपा मुखिया मायावती

फेक न्यूज’ से रहें सचेत

प्रेस लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है. लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों-विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका की भाँति प्रेस की भी अपनी महत्ता है. शासन-प्रशासन एवं विधि के निर्माण में प्रेस सीधे तौर पर तो अपनी भूमिका नहीं निभाता, पर सत्ता(हाथी) जब अपनी मार्ग भटकता है तब प्रेस (वाच डाग) उसे सचेत करता है. इसलिए राज्य-समाज में पत्रकारों/प्रेस प्रतिनिधियों की बड़ी भूमिका होती है. लोगों तक सही सूचनाएं पहुँचाने की बहुत बड़ी जिम्मेवारी पत्रकारों की है.

पत्रकारों को अपने दायित्वों के ठीक तरह से निर्वहन के लिए भारत में 4जुलाई, 1966 को प्रेस परिषद की स्थापना की गई. 16 नवम्बर, 1966 से यह कार्य करना शुरू किया. तब से प्रत्येक 16 नवम्बर को ‘राष्ट्रीय प्रेस दिवस’ के रूप में मनाया जाता है.

किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि स्थापना के पाँच दशक बाद आज प्रेस परिषद के लिए ‘फेक न्यूज’ एक चुनौती बन कर उभरा है. कई मीडिया संगठन व्यसायिक व राजनैतिक लाभ के लिए झूठी खबरें प्रकाशित-प्रसारित कर रहेंं हैं. ऐसी खबरों पर नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं बन पाई है. सूचना क्रांति के इस दौर में लोगों को सही व निष्पक्ष खबरों का चुनाव करना मुश्किल हो गया है.

‘फेक न्यूज’ से बचने के लिए लोगों को थोड़ा जागरूक होना जरूरी है. सोशल मीडिया और परंपरागत टीवी-वेब चैनलों पर चलने वाली खबरों की वास्तविकता पहचानना वैसे तो जरा मुश्किल है , पर विश्वसनीय समाचार माध्यमों का चुनाव कर हम झूठी खबरों से बच सकते हैं.हम ऐसी मीडिया संगठन, जो झूठी खबरें परोसते हैं , उनकी खबरों को न देखें , न लाइक करें और न शेयर करें. सोशल मीडिया पर मौजूद ‘फेक न्यूज’ वाले वेब पोर्टलों को अनसब्सक्राइब भी कर सकते हैं.

रामकृष्ण यादव

Read it also-इस हिन्दू राष्ट्र में दलितों की यही नियति है!

बौद्ध रीति रिवाजों से शादी करेगें दलित

0
प्रतिकात्मक चित्र

हिसार। सामाजिक बहिष्कार जैसे जातीय विवादों के लिए चर्चित हरियाणा के जिला हिसार के गांव भाटला में 20 अगस्त को दलित परिवारों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए गांव के गुरु रविदास मंदिर में एकत्र होकर करीबन 300 परिवारों में बौद्ध धर्म ग्रहण किया था. अब गांव के दलितों ने एक कदम आगे बढ़ते हुए अपने पुराने हिंदू रीति-रिवाजों को त्याग कर अपने शादी-ब्याह भी बौद्ध रीति-रिवाजों से करने का फैसला किया है.

गांव की दलित महिला जर्मिला देवी ने अपनी पुत्री का विवाह बौद्ध रीति-रिवाजों से करने का फैसला किया है. इस बारे में जो शादी का आमंत्रण पत्र छपवाया गया है, उस पर भी पारंपरिक तौर पर हिंदू देवी देवताओं की जगह डॉ. बीआर आंबेडकर, गुरु रविदास तथा भगवान बुद्ध की तस्वीरों को स्थान दिया गया है. अब भाटला गांव की दलित महिला जर्मिला ने पुलिस को शिकायत देकर 15 नवंबर को बौद्ध रीति रिवाजों से होने वाली पुत्री की शादी में सुरक्षा प्रदान करने की मांग की है.

अपनी शिकायत में दलित महिला जर्मिला देवी ने कहा है कि गांव में सामाजिक बहिष्कार के चलते गांव के दलितों व सवर्णो में बेहद तनातनी का माहौल है. गांव की भाईचारा कमिटी उससे रंजिश रखती है. उसकी पुत्री की बौद्ध रीति रिवाज से होने वाली शादी के दौरान भाईचारा कमिटी के सदस्य या उनकी शह पर कुछ अपराधी तत्व उनकी बेटी की शादी में किसी अप्रिय घटना को अंजाम दे सकते हैं. इसलिए इस शादी के दौरान उसको पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाए और विशेष रूप से महिला पुलिस कर्मियों को भी तैनात किया जाए.

इस बारे में भाटला दलित संघर्ष समिति के प्रधान बलवान सिंह का कहना है कि यह बहुत खुशी का विषय है कि गांव में बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद अब लोग इसे पूरी तरह अपना रहे हैं तथा शादी ब्याह भी बौद्ध रीति रिवाजों से करा रहे हैं. गांव में शादी के दौरान किसी अप्रिय घटना होने का दलित संघर्ष समिति के प्रधान ने भी अंदेशा जताते हुए कहा कि दलित महिला जर्मिला देवी की शिकायत पर कार्रवाई होनी चाहिए तथा शादी के दौरान पुख्ता पुलिस इंतजाम होने चाहिए.

Read it also-छत्तीसगढ़ में त्रिकोणीय संघर्ष से गठबंधन की सरकार बनने के आसार

बुद्ध की मूर्तियों की दर्दनाक दास्तान!

1

बिहार के जिला मुंगेर, प्रखंड असरगंज के गाँव लगमा से सोमनाथ आर्य की यह रिपोर्टिंग इसी साल 2018 की है. द इंडियन सन के रिपोर्टर लगमा गाँव में दाखिल हुए तो एक मंडप में काले ग्रेनाइट की भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध की मूर्ति थी. मगर गाँव के लोग मुरकटवा बाबा कहते हैं और शराब चढ़ाते हैं. मुरकटवा का मतलब, वह जिसका सिर कटा हुआ हो.

लगमा गाँव के बाहर तीन प्रतिमाएँ गड़ी हुई हैं. स्थानीय लोग इन्हें ” लतखोरवा ” गोसाईं कहते हैं. लतखोरवा गोसाईं का मतलब हुआ, वह देवता जो लात (पैर) मारने से खुश रहे. अजूबा बात थी. भला कोई देवता पैर से ठोकर मारने और चप्पल से पीटे जाने पर क्यों खुश होंगे. आखिर कौन है लतखोरवा गोसाईं?

तस्वीरें यूनिवर्सिटी आॅफ मुंबई भेजी गई. पालि विभाग के राहुल राव ने बताया कि तीनों मूर्तियाँ बुद्ध की हैं. ऐसा जान पड़ता है कि लगमा का क्षेत्र कभी बौद्ध – स्थल था. निकट की ढोल पहाड़ी पर बुद्ध के चित्र उकेरे गए हैं. कालांतर में कभी यह स्थल बौद्ध विरोधियों के कब्जे में आया तो वे इसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिए. कारण कि तीन में से एक मूर्ति को बारूद से उड़ाया गया है.

कभी बौद्ध विरोधियों ने बुद्ध की मूर्तियों को लात – जूता से पीटने की परंपरा चालू की होगी और यह परंपरा बाद में भी जाने – अनजाने में लोगों ने जारी रखी.

खैर, खबर बौद्ध संस्था हयूनेंग फाउंडेशन को मिल चुकी है. यह राहत की बात है.

राजेन्द्र प्रसाद सिंह के फेसबुक वॉल से

Read it also-आदिवासियों के विनाश का साक्षी है ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’

विश्व कवि ढसाल का एक यादगार पत्र: दुसाध के नाम!

8 दिसंबर ,2011 मेरे जिंदगी का एक बेहद खास दिन था, इसकी उपलब्धि एक अन्तराल के बाद किया. उस दिन मेरी मुलाकात विश्व विख्यात कवि नामदेव लक्ष्मण ढसाल से हुई थी. 1999 से ही प्राय हर साल मेरा मुंबई और नागपुर का दौरा होता रहा है . इन दौरों में अक्सर किसी न किसी से ढसाल साहब का जिक्र सुनता. उनका नाम सुनते-सुनते उनसे मिलने की इच्छा भी धीरे-धेरे जाग्रत होने लगी. तब 6 दिसंबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में किताबों की प्रदर्शनी लगाने के दौरान कई बार उनसे मिलवाने के लिए वहां के मित्रों हल्का-फुल्का अनुरोध किया. हर बार पता चलता चला कि या तो वे बीमार हैं या पूना गए हुए हैं. ऐसा ही एक अवसर 6 दिसंबर, 2011 को फिर आया. उस दिन शिवाजी पार्क में मेरे स्टाल पर काफी भीड़ थी. वैसे जहां कहीं भी स्टाल लगाताता हूँ, विविध कारणों से लोगों की भीड़ मेरे स्टाल पर औरों से कुछ ज्यादे ही रहती है. बहरहाल उस दिन स्टाल पर जुटी भीड़ में से फिर किसी ने ढसाल साहब का जिक्र छेड़ दिया. मैंने बिना किसी खास व्यक्ति की ओर मुखातिब हुए यूं ही कह दिया कि काफी दिनों से उनसे मिलने की तमन्ना है, पर मिलने का असवर अबतक नहीं मिला.

अचानक मेरी किताबों को उलटने पलटने में व्यस्त एक व्यक्ति ने मेरी आँखों में आँखे डाल सवाल किया, ’आप उनसे मिलना चाहते हैं?’ .जी हाँ, क्या कोई उपाय है आपके पास उनसे मिलवाने का!,मेरा जवाब था. हाँ, वह आजकल मुंबई में ही हैं, मैं मिलवा दूंगा,जवाब था उस व्यक्ति का, जो शिवाजी पार्क में स्टाल लगाने पर हर बार ,मेरे स्टाल पर आते और घंटों किताबों को न सिर्फ उलटने पलटने में व्यस्त रहेते, बल्कि जाते-जाते हजार-पांच सौ की किताबें भी जरुर ले लेते. हर बार वहां जाने पर मुझे उनका इन्तजार भी रहता था,किन्तु कभी विस्तार से उनका परिचय जानने का प्रयास नहीं किया. उस दिन किया तो पता चला वे दलित पैंथर के पदाधिकारी और ढसाल साहब के अत्यंत विश्वासपात्र सुरेश केदारे हैं. उन्होंने मिलने का दिन पूछा तो मैने बता दिया :8 दिसंबर! केदारे जी ने उनका लैंड लाइन नंबर और पता लिखकर देते हुए देते हुए कहा,’मैं, उन्हें बता दूंगा, आप चले जाईयेगा.’

और मैं 8 दिसंबर को फोन करके पहुंच गया लोखंडवाला काम्प्लेक्स के निकट अँधेरी वेस्ट वाले उनके अपार्टमेंट: फ्लोराइड में. दूसरे तल अवस्थित पर उनके फ़्लैट का कॉल बेल बजाते ही मुस्कुराते हुए एक भद्र महिला ने दरवाजा खोला, बाद में जाना वह खुद उनकी अर्द्धांगिनी मल्लिका नामदेव ढसाल थीं. ऐसा लगा वे मेरे आने की प्रतीक्षा कर रही थीं.अन्दर कदम रखते ही मैंने खुद को उनके ड्राइंग रुम में पाया. मुझे बैठने का अनुरोध कर वह अन्दर कमरे में चली गयीं और मैं कुछ हद तक धडकते दिल से ढसाल साहब की प्रतीक्षा करने लगा. उनका ड्राइंग रूम आकार में बहुत विशाल तो नहीं था, किन्तु सुरुचिपूर्ण तरीके से सजा हुआ था. लग रहा था किसी लेखक के ड्राइंग रूम जैसे. उसमें हर सभ्य दलित परिवारों की भांति बाबा साहेब की तस्वीर तो थी ही, साथ ही एक और व्यक्ति की विभिन्न मुद्राओं में एकाधिक तस्वीरें भी टंगी थीं:ज्यादातर तस्वीरें ब्लैक एंड व्हाईट में थी. मैंने अनुमान लगा लिया कि वही होंगे ढसाल साहब. इन तस्वीरों के आधार पर उनके व्यक्तित्व की कल्पना करने लगा. ज्यादा नहीं, बमुश्किल तीन-चार मिनट प्रतीक्षा के बाद ही भव्य व्यक्तित्व के स्वामी ढसाल साहब को चेहरे पर भव्य मुस्कान लिए बड़ी मुश्किलों से, लगभग लंगड़ाते हुए अपनी ओर आते देखा. उन्हें देखकर मैं खड़ा हो गया. वे आये और मुझसे हाथ मिलाने के बाद बैठने का संकेत करते हुए धम्म से व्हील चेयर पर बैठ गए. मैं लगभग चालीस मिनट उनके पास बैठा रहा. उनके लिए काफी किताबें लेकर आया था. वे किताबें पलटते हुए वर्तमान हालात पर विचार विनिमय करते रहे. हमारी चर्चा मुख्यतः केजरी-हजारे द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन पर केन्द्रित रही. उनके पास से हटने का तो मन नहीं कर रहा था, किन्तु उनके स्वास्थ्य को देखते हुए और ज्यादा ठहरना उचित नहीं लगा. मैंने लगभग चालीस मिनट बाद उनसे चलने की इजाजत मांगी. जब चलने लगा, उन्होंने मना करने के बावजूद मेरी जेब में कुछ रूपये ठूस दिए. बाहर आकर गिना तो पाया 2,500 रूपये थे. उनके और हमारे बीच परवर्तीकाल में चिरकाल के लिए सेतु बने भाई सुरेश केदारे ने कहा था,’दादा दिल से राजा हैं.’ उनके घर के हालात देखर मुझे ऐसा लगा था वे आर्थिक प्राचुर्य नहीं, अभावों में ही जी रहे हैं. वावजूद इसके उन्होंने उतने रूपये मेरी जेब डाल दिया. ऐसा कोई राजा दिल व्यक्ति ही कर सकता था. बाद में तो उनसे हमारे सम्बन्ध बहुत प्रगाढ़ हुए और कई मुलाकातें हुईं: हर मुलाकात में उनकी शाही दिली का सबूत मिलता रहा . दिसंबर 8 की उस मुलाकात के शायद एक माह बाद ही अचानक एक दिन फोन आया. उन्होंने कहा ,’दुसाध जी अन्ना आन्दोलन के खिलाफ हमलोग तीन दिन बाद एक बड़ा प्रतिवाद सभा करने जा रहे हैं, आपको हर हाल में आना है.’ ‘सर, मैं बनारस में हूँ,’इतनी जल्दी ट्रेन का टिकट कंफर्म होना मुमकिन नहीं दीखता, अतः …’इससे आगे मैं कुछ कहता मेरी बात को काटते हुए उन्होंने कहा,’डोंट वोर्री’!मैं जहाज का टिकट भेजता हूँ.’ और उन्होंने भेजा तथा मैं दादर, चैत्यभूमि के पास आयोजित उस सभा में पहुंचा भी, किन्तु देर से. मौसम ख़राब होने के कारण फ्लाईट कुछ देर से पहुंची थी. जब सभा स्थल पर पहुंचा, उस समय वह ज्ञापन देने के लिए राज्यपाल हाउस जाने की तैयारियों में व्यस्त दिखे. हमलोग दर्जन से अधिक गाड़ियों के काफिले के साथ गवर्नर हॉउस पहुँच कर ज्ञापन दिए.

दरअसल पहली मुलाकात में मैंने जो उन्हें कई किताबें भेंट की थी, उनमें मेरी दो किताबें अन्ना-केजरी के ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आन्दोलन पर थीं, जिनमें मैंने उन्हें बुरी तरह एक्सपोज कर दिया था. उस समय तक इनके खिलाफ कम से कम हिंदी में कोई किताब नहीं आई थी. इसलिए ही उन्होंने एक स्पेश्लिस्ट के तौर पर उस सभा को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया था.उस दौरे में दो दिन मुंबई में रहा. इस बीच हमने एकाधिक बार लम्बा वार्तालाप किया. एक दिन उन्होंने इस बात के लिए अफ़सोस जताया कि हिंदी पट्टी में बाबा साहेब पर इतना काम हो रहा है, पर वहां के लेखकों से मिलने का अवसर नहीं निकाल पाया. बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने हिदी पट्टी के लेखकों से मिलवाने की जिम्मेवारी मुझ पर डाल दी. उन दिनों मैं 15 मार्च को आयोजित होने वाले ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ के स्थापना दिवस की तैयारियों में व्यस्त था. मैंने एक पंथ दो काज के तहत मौका-माहौल देखकर उन्हें आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने सहजता से स्वीकार कर लिया. तय यह हुआ कि 15 मार्च को वे स्थापना दिवस में शामिल होंगे और अगले दिन शाम को दिल्ली के दलित लेखकों के साथ डिनर करेंगे.

उसके बाद दिल्ली आकर अतिरिक्त उत्साह के साथ स्थापना दिवस की तैयारियों में जुट गया. आयोजन स्थल के लिए हमने चयन किया, दिल्ली के जेएनयू को. इस बीच कई लेखक मित्रों को डिनर के लिए तैयार भी कर लिया था. किन्तु प्रोग्राम के तीन-चार दिन पहले से ही उनके स्वास्थ्य में और गिरावट की खबरें आने लगीं. और शेष में स्थिति ऐसी हो गयी कि वे आने की हालात में नहीं रहे. ऐसी स्थित में उन्होंने 14 मार्च,2012 को यह पत्र फैक्स के जरिये भेजा और अनुरोध किया कि इसे उपस्थिति श्रोताओं के मध्य पढ़कर, न आ पाने के लिए मेरी और से खेद प्रकट कर दीजियेगा और मैंने वैसा किया भी. उनका वह दुर्लभ पत्र कहीं खो गया था,जो 7 नवम्बर, 2018 को लैपटॉप पर कुछ पुरानी सामग्री ढूंढते-ढूंढते अचानक मिल गया, जिसे मैंने 8 नवम्बर को फेसबुक पर डाल दिया. फेसबुक पर प्राख्यात लेखक प्रो. चौथीराम यादव, डॉ. लाल रत्नाकर, कर्मेंदु शिशिर, सुदेश तनवर, चंद्रभूषण सिंह यादव सहित अन्य कई लोगों ने उनके इस पत्र को एक स्वर में ‘ऐतिहासिक दस्तावेज’ करार दिया. बहरहाल यह पत्र एकाधिक कारणों से मेरे लिए बेहद महत्त्वपूर्ण था. पहला तो यह कि इस पत्र में उनकी लिखावट मुझे विस्मित की थी. मैं ही क्यों, कोई भी उनकी लिखावट देखकर मेरी तरह ही विस्मित हो सकता है. बहुतों को पता नहीं है कि उन्होंने ‘फाइन आर्ट’ में ग्रेजुएशन किया था. इस कारण उनकी लिखावट बेहद खूबसूरत हुआ करती थी, जिसका साक्ष्य है यह पह . उनकी विरल लिखावट के अतिरिक्त इसके महत्वपूर्ण होने का दूसरा कारण यह रहा है कि उनकी जैसी ऐतिहासिक शख्सियत ने मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति के साथ मिलकर बाबा साहेब के मिशन को आगे बढाने का आह्वान किया था. ढसाल साहब बहुत ही डॉमिनेटिंग:सरल भाषा में कुछ हद तक खौफनाक व्यक्तित्व के स्वामी रहे, जिनके सामने आने पर बड़े से बड़े लोगों का भी निष्तेज हो जाना तय था. किन्तु एक खास बात यह थी कि उनके चेहरे पर सब समय एक ऐसी मुस्कान खेलती रहती थी जिसके नीचे एवरेस्ट सरीखा बुलंद आत्म विश्वास और करुणा का अपार सागर हिलोरे मारते रहता था. इस मुस्कान का पहली बार साक्षात् मैंने 8 दिसंबर, 20011 को उनके फ्लोरिडा अपार्टमेंट में किया था. 2013 के 8 दिसंबर को जब मरीन लाइन के बॉम्बे हॉस्पिटल में उन्हें आखरी बार जिंदगी और मौत से जूझते देखा, तब भी वह खास मुस्कान उनके चेहरे से जुदा नहीं हुई थी.15 फरवरी,1949 को अपने जन्म से दलित भारत को धन्य करने वाले ग्रेट पैंथर उसी हॉस्पिटल में लगभग सवा महीने जिदगी और मौत से आँख मिचौनी करते हुए 15 जनवरी, 2014 को आखरी साँस लिए थे. 2013 के 6 दिसम्बर को शिवाजी पार्क के लिए रवाना होने के सप्ताह पूर्व ही हमारे मध्य सेतु रहे सुरेश केदारे भाई से पता चल चुका था कि पैन्थरों के ‘दादा’ अर्थात हमारे ढसाल बहुत ही गंभीर हालात में बॉम्बे हॉस्पिटल में एडमिट किये गए हैं. ऐसे में 6 दिसंबर को शिवाजी पार्क में किताबों का स्टाल लगाने के बाद अगले ही दिन हॉस्पिटल पहुँच गया. किन्तु उनकी हालत इतनी गंभीर थी कि डॉक्टर ने मिलने की इजाजत ही नहीं दी. ऐसा लगा उनसे बिना मिले ही वापस आ जाना पड़ेगा. किन्तु उनके प्रति मेरी अपार श्रद्धा को देखते हुए खुद मल्लिका मैडम सहित उनके सहयोगियों ने बहुत रिक्वेस्ट कर डॉक्टर से मेरे लिए इजाजत मांगी और 2011 के 8 दिसंबर की पहली मुलाकात के बाद फिर एक और 8 दिसम्बर को उनसे मिल सका,जो आखरी मुलाकात साबित हुई.

भारी सावधानी के बीच आईसीयू में पड़े ढसाल साहब के पास पहुंचा.वह ऑंखें बंद किये बेड पर पड़े हुए थे.’सर!मैं आया हूँ’, यह सुनते उन्होंने धीरे से आँखे खोला और फ़ैल गयी उनके चेहरे पर उनकी चिरपरिचित स्वाभाविक मुस्कान. उन्होंने मद्धिम आवाज में पूछा,’सब ठीक है न’! मैं स्तब्ध था.सर हिलाकर हामी भरा. वह और कुछ कहना चाहते थे.मैंने डॉक्टर की हिदायत को ध्यान में रखते हुए चुप रहने का संकेत किया. वे मुस्कुराकर खामोश हो गए. फिर धीरे से कहे ‘डाइवर्सिटी रुकना नहीं चाहिए’. यह सुनकर मेरी ऑंखें छलछला आयीं, किन्तु मैं खुद को सामान्य बनाये रखा. लगभग डेढ़-दो मिनटों तक स्तब्ध होकर निहारते रहने के बाद इजाजत लेकर आईसीयू से बाहर आ गया. मन बहुत उदास था. ऐसा लगा ग्रेट पैंथर को दुबारा दहाड़ते हुए नहीं देख पाऊंगा. और जिसकी आशंका थी, वह खबर आ ही गयी.

14 जनवरी को कोलकाता से दिल्ली के लिए चला था. भयंकर ठंडी में रात में कम्बल में दुबक सो रहा था. अचानक मोबाइल घनघना उठा. देखा सुबह के तीन बजे हैं और उधर से भाई सुरेश केदारे की कॉल आ रही थी. मैं समझ गया, ग्रेट पैंथर जन अरण्य का परित्याग कर चुका है. कॉल को रेस्पोंस किया तो उधर से आवाज आई,’दादा नहीं रहे’! अब जहां तक ढसाल साहब की महानता का सवाल है, उस पर बहुत कुछ लिखा गया है: देश-विदेश के ढेरों मनीषियों ने उनका आंकलन किया है. किन्तु मेरा मानना है कि जितना हुआ है, वह पर्याप्त नहीं है. डॉ.आंबेडकर के बाद दलित साईक को बदलने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले इस पैंथर का सम्पूर्ण आंकलन अभी भी बाकी है. वह विश्व इतिहास के पहले कवि रहे जिन्होंने दलित पैंथर जैसा एक मिलिटेंट(उग्र)संगठन स्थापित कर देश और महाराष्ट्र की राजनीति में बवंडर पैदा कर दिया. अधिकांश लेखक-कवि-शिल्पी समाज परिवर्तन के लिए पहले से स्थापित सामाजिक/राजनीतिक संगठनों में योगदान किये, किन्तु स्वतंत्र रूप में, खासकर लेखक नहीं, किसी कवि ने दलित पैंथर जैसा आक्रामक संगठन कही नहीं बनाया. विष्णु खरे के शब्दों में वह कवि के रूप में रवीन्द्रनाथ टैगोर से बड़े ऐसे कवि थे,जिन्होंने देश और महाराष्ट्र की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया. अंतरराष्ट्रीय कविता जगत में भारतीय कविता के विजिटिंग कार्ड रहे ढसाल साहब ने भारत में कविता को परम्परा से मुक्त एवं उसके आभिजात्यपन को ध्वस्त करने के साथ दलित साहित्य को जो तेवर दिया,उससे मुख्यधारा का साहित्य करुणा का विषय बन कर रह गया, यह सब बातें मैंने अपनी दो प्रकाशित पुस्तकों,सितम्बर 2012 में ‘टैगोर बनाम ढसाल’ तथा उनके मरणोपरांत मार्च,2014 में प्रकाशित ‘महाप्राण नामदेव ढसाल’ के जरिये काफी हद तक प्रमाणित कर दिया है. लेकिन पद्मश्री ढसाल एक कवि, संगठनकर्ता और राजनेता से भी बहुत आगे की चीज थे.

वह विश्व के इकलौते कवि-लेखक थे,जिनके समक्ष साहित्य और राजनीति ही नहीं अंडरवर्ल्ड की हस्तियाँ भी झुकती थीं. उन्होंने जिस तरह अपार प्रतिकूलताओं को जय करते हुए विविध क्षेत्रों में विश्वस्तरीय छाप छोड़ी, उसके आधार पर वे सिकंदर और नेपोलियन जैसे योद्धाओं की पंक्ति में स्थान पाने के हकदार थे, यह बात सिद्ध करने के लिए उन पर मैंने 2015 में एक खास किताब लिखने की परिकल्पना किया. इसके लिए काफी हद तक जरुरी सामग्री भी जुटा लिया था. किन्तु 2014 के बाद जिस तरह देश के हालात बद से बदतर होने लगे, मुझे उस लम्बी परियोजना से विरत होना पड़ा. यदि 2019 के बाद बहुजन भारत विशेषाधिकारयुक्त तबकों, जिनके खिलाफ संग्राम चलाने के लिए ही ढसाल साहब ने खुद को साधारण से अति-असाधारण में परिणत किया था, के हाथ से मुक्त सका तो फिर विश्व इतिहास की सबसे अनूठी शख्सियत से जुड़े अधूरे काम को पूरा करने में खुद को झोंक दूंगा, यह मेरी ग्रेट पैंथर के गुणानुरागियों के समक्ष प्रतिश्रुति है.

Read it also-भरतपुर में कांग्रेस के लिए चुनौती बनी बसपा, 15 साल से बिगाड़ रही जीत का समीकरण

लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारी में बसपा मुखिया मायावती

0

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी को 2019 के लोकसभा चुनाव में शिकस्त देने की तैयारी में विपक्ष की योजना को बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती भी धार देने में लगी हैं. मायावती करीब 15 वर्ष के बाद लोकसभा के चुनावी मैदान में उतरने के मूड में हैं.

लोकसभा के बाद राज्यसभा से शीर्ष सदन में जगह बना चुकीं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को अब लोकसभा सीट तय करनी है. उत्तर प्रदेश में लोकसभा के उपचुनाव में समाजवादी पार्टी को दो सीट दिलाने में मदद करने वाली मायावती का संकेत है कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश की आधी से अधिक सीट यानी करीब 50 पर बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी उतारेगी. बसपा सुप्रीमों मायावती 2019 के लोकसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही हैं. इसके लिए उन्होंने लोकसभा सीट की तलाश शुरू कर दी है.

मायावती को पता है कि केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर जाता है. भाजपा को 2019 में सत्ता में आने से रोकने के लिए मायावती और अखिलेश यादव के एक साथ आने की उम्मीद है. अखिलेश के साथ गठबंधन में मायावती खुद किस सीट से चुनाव लड़ेंगी, यह उनको तय करना है. इससे पहले 2004 में मायावती अकबरपुर सीट से लोकसभा चुनाव जीती थीं.

बसपा का यह पुराना गढ़ है लेकिन यह सीट समान्य हो गई. इसी कारण वह अपने गृह जिले गौतम बुद्ध नगर से चुनाव मैदान में उतर सकती हैं. वह अभी तक राज्यसभा और विधानपरिषद के रास्ते सदन तक पहुंचीं हैं. अब डेढ़ दशक बाद उनके एक बार फिर से ताल ठोंकने की तैयारी है. अगर गठबंधन के तहत मायावती चुनाव लड़ती है तो निश्चित तौर पर बसपा को जमीनी स्तर पर काफी फायदा होगा. इसके अलावा गठबंधन के तहत अखिलेश यादव भी मायावती के लिए प्रचार करते नजर आ सकते हैं.

Read it also-दलित बस्ती में घुसकर 5 हुड़दंगियों ने की मारपीट, खुखरी और तलवारें लहराईं

दलित परिवार के साथ मारपीट, चार दिन बाद भी पुलिस हरकत में नहीं

0

नूंह। खंड के खेड़ा-खलीलपुर गांव में दबंग परिवार द्वारा दलित परिवार के साथ मारपीट करने का मामला प्रकाश में आया है. वारदात को चार दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस ने इस मामले में किसी को गिरफ्तार नहीं किया है. जिससे पीड़ित दलित परिवार में भय का माहौल है. मारपीट के दौरान दलित परिवार के लोगों को गंभीर चोटें आई हैं और उनमें से एक महिला को दिल्ली रेफर कर दिया गया है. पुलिस ने दया, कृष्ण, खजान, रमेश, नेपाल, राजू, विजयपाल सहित कई लोगों खिलाफ मामला दर्ज किया है. पीड़ित पक्ष का आरोप है कि गांव के दया ने अपने घर का रैंप गली में बनाया हुआ है. कोई भी वाहन वहां से निकलता है तो उसके मकान की दीवार को रगड़ा मारता है, जिससे मकान गिरने का डर रहता है. उन्होंने अपने घर को बचाने की नीयत से दीवार के साथ एक पत्थर डाल दिया जिससे वाहन बचकर निकल जाए. इसका दया व उनके परिजनों ने विरोध किया. इसी बात को लेकर उक्त लोगों उनके साथ मारपीट की. पीड़ित परिजनों का आरोप है कि इससे पहले भी उनके साथ साथ मारपीट की जा चुकी है. झगड़े में बिश्बंर, भरतसिंह, शकुंतला, लीला को चोटें आई है. शकुंतला के सिर में अधिक चोट होने के कारण उसे मेडिकल कॉलेज नलहड़ से दिल्ली के लिए रेफर कर दिया गया है. वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि उन पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं. ये लोग आए दिन गलती करते हैं और दूसरों को दोषी ठहराते हैं. डीएसपी सुखबीर सिंह का कहना मामले की जांच चल रही है जल्द ही आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

Read it also-औरंगज़ेब के विरुद्ध हिन्दू विरोधी होने के झूठे आरोप को झुठलाते ऐतहासिक तथ्य

बहुजनों को गुलामी से बचाने का एक ही रास्ता है डाइवर्सिटी:एच.एल.दुसाध

0

मऊ। ‘कार्ल मार्क्स ने कहा है कि दुनिया का लिखित इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है.समाज में सदैव ही विरोधी आर्थिक वर्गों का अस्तित्व रहा है. एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व रहा और दूसरा वह जो केवल शारीरिक श्रम करता है. मार्क्स का बताया वर्ग संघर्ष का वह इतिहास भारत में आरक्षण पर संघर्ष के रूप में क्रियाशील रहा. क्योंकि जिस वर्ण-व्यवस्था के द्वारा भारत समाज सदियों से परचालित होता रहा, वह बुनियादी तौर पर आरक्षण की व्यवस्था रही, जिसमें उत्पादन के सभी साधन ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों के लिए आरक्षित रहे. इस हिन्दू आरक्षण में ही अपनी हिस्सेदारी के लिए वंचित बहुजन सदियों से सघर्षरत रहा. आरक्षण पर इस संघर्ष में 7 अगस्त,1990 को तब एक नया ऐतिहासिक मोड़ आया, जब पिछड़ों को मंडल रिपोर्ट के जरिये नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण मिला. तब इस आरक्षण के खात्मे लिए वर्ण-व्यवस्था का सुविधाभोगी वर्ग नए सिरे से उठ खड़ा हुआ.उसने आरक्षण के खात्मे के लिए तरह –तरह के उपाय किये,जिसमें सबसे कारगर रही 24 जुलाई ,1991 से लागू नवउदारवादी अर्थनीति. और आज इस अर्थनीति को हथियार बनाकर वह आरक्षण को लगभग पूरी तरह कागजों की शोभा बनाने के बाद मंडल उत्तरकाल में संगठित वर्ग-संघर्ष में अपनी विजय का पताका फहरा चुका है.’ यह बातें आज पालिका कम्युनिटी हॉल,मऊ में आयोजित तेरहवें ‘डाइवर्सिटी डे’ समारोह में बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एच.एल.दुसाध ने विषय प्रवर्तन करते हुए कही.

उन्होंने आगे कहा कि जब शासक वर्गों ने नवउदारवादी अर्थनीति को हथियार बनाकर तेजी से आरक्षण का खात्मा करना शुरू किया, तब 12-13 जनवरी ,2002 को भोपाल में आयोजित ऐतिहासिक कांफ्रेंस से डाइवर्सिटी समर्थक दलित बुद्धिजीवियों ने नौकरियों में आरक्षण से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, फिल्म-मीडिया इत्यादि अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में हिस्सेदारी की लड़ाई के लिए आरक्षित वर्गों के बुद्धिजीवी, एक्टिविस्टों और नेताओं को आह्वान किया पर, वे उसकी लगातार अनदेखी करते रहे.वे आज भी ‘आरक्षण बचाओ’की लड़ाई में समाज को उलझाये हुए हैं.फलस्वरूप उनकी नाक के नीचे से शासक वर्गों ने आरक्षण को धीरे-धीरे ख़त्म सा कर दिया है .किन्तु डाइवर्सिटी समर्थक बुद्धिजीवी अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में हिस्सेदारी की वैचारिक लड़ाई लगातार लड़ते रहे. उनके प्रयासों से कई राज्यों में ठेकों,सप्लाई,डीलरशिप, आउट सोर्सिंग जॉब में आरक्षण लागू हुआ. आज जबकि शासक वर्गों ने बहुजनों को नये सिरे से गुलामी की ओर ठेल दिया है, जरुरत है कि पूरा आरक्षित वर्ग सर्वशक्ति से सर्वव्यापी आरक्षण की लड़ाई में उसी तरह कूद पड़े, जैसे अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में सारे भारतीय कूद पड़े थे. आज बहुजनों के समक्ष भारत के स्वाधीनता संग्राम की भांति संपदा-संसाधनों में अपनी हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं रह गया है.’

तेरहवें डाइवर्सिटी डे के अवसर पर सबसे पहले मुख्य अतिथि विद्या गौतम ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत किया. उसके बाद गढ़वा, समस्तीपुर, पटना, देवरिया, गोरखपुर, गाजीपुर, भागलपुर,बनारस इत्यादि सहित देश के विभिन अंचलों से आये अतिथियों ने बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर और महापंडित राहुल सांकृत्यायन की तस्वीरों पर माल्यार्पण कर उनके प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किया. बाद में एक-एक करके सभागार में उपस्थित लोगों ने पुष्प अर्पित कर श्रद्धा व्यक्त किया.पुष्पार्पण के बाद मंच संचालक डॉ. रामबिलास भारती ने डाइवर्सिटी डे के अवसर पर किताबों के विमोचन की घोषणा की. इस अवसर पर ‘डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ इंडिया’ के रूप में विख्यात बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एच.एल.दुसाध की डाइवर्सिटी इयर बुक:2018-19 , हकमार वर्ग(विशेष सन्दर्भ:आरक्षण का वर्गीकरण), धन के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए सर्वव्यापी आरक्षण की जरुरत (विशेष सन्दर्भ: अमेरिकी और दक्षिण अफ़्रीकी आरक्षण) तथा 21वीं सदी में कोरेगांव जैसी चार किताबों का विमोचन हुआ. पुस्तक विमोचन के बाद डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ द इयर की घोषणा की गयी. इस सम्मान के लिए सुपर्सिद्ध पत्रकार-लेखक महेंद्र नारायण सिंह यादव, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार डॉ.लाल रत्नाकर तथा वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र प्रताप सिंह के नामों की घोषणा हुई.इनमें सिर्फ सत्येन्द्र प्रताप सिंह ही सशरीर उपस्थित होकर सम्मान ग्रहण कर सके.

चर्चा के लिए निर्दिष्ट विषय ‘धन-दौलत के न्यायपूर्ण बंटवारे की रणनीति’ पर विचार रखने का क्रम पथरदेवा पीजी कॉलेज के डॉ. कौलेश्वर प्रियदर्शी से शुरू हुआ.उन्होंने जोर देकर कहा कि नौकरियों में आरक्षण से आगे बढ़कर सम्पूर्ण भागीदारी का सवाल खड़ा करना आज की सबसे बड़ी जरुरत है और यह काम पूरे देश में ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ ही कर रहा है. इस संगठन द्वारा सुझाये जा रहे उपाय के तहत यदि समस्त क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विवधता लागू हो जाय तो देश और बहुजन समाज की सारी समस्यायों का हल स्वतः हो जायेगा. तमाम क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू होने से सर्वसमाज का समवेत विकास और सुदृढ़ीकारण हो जायेगा,जो देश को विभेदीकरण से मुक्तकर देश की अखंडता को चिरकाल के लिए मजबूती प्रदान कर देगा.समस्तीपुर से आये सोशल एक्टिविस्ट मन्नू पासवान ने कहा कि देश का बहुजन बहुत ही संकट ही संकट से जूझ रहा है. शासकों ने नवउदारवादी नीति को हथियार बनाकर हमारा सब कुछ ख़त्म कर दिया है. राहत की बात है कि इस संकट में बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के बाद सबसे बड़े लेखक-चिन्तक के रूप में उभरे एच.एल.दुसाध हमारे बीच हैं. दुसाध जी ने इस संकट की घड़ी में डाइवर्सिटी का एजेंडा सामने लाकर हमें इस हालात से उबरने का रास्ता सुझा दिया है. जरुरत इस बात है की है कि हम डाइवर्सिटी को जनांदोलन का रूप दें. सिवान से आये युवा लेखक राजवंशी जे.ए.आंबेडकर ने धन के न्यायपूर्ण बंटवारे की रणनीति पर आलोकपात करते हुए कहा कि बहुजन डाइवर्सिटी मिशन ने सही समय पर धन-दौलत के न्यायपूर्ण बंटवारे का अभियान छेड़ा है. शासकों ने जिस तरह आरक्षण को कागजों की शोभा बनाकर बहुजनों को गुलामी की ओर ठेल दिया है, इस किस्म के आन्दोलन की निहायत ही जरुरत थी.लेकिन इस लड़ाई को लड़ते हुए हमें कुछ ऐसी योजना बनाना पड़ेगा, जिससे इसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे.

बलिया के प्रखर वक्ता आर.के .यादव ने धन के न्यायपूर्ण बंटवारे का आन्दोलन चलाने के लिए बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एच. दुसाध को साधुवाद देते हुए कहा कि आज धन का न्यायपूर्ण बंटवारा सबसे बड़ा सवाल है. इसके लिए दलित, आदिवासी,पिछड़े और धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों को नए सिरे से संगठित होने की जरुरत है. अगर नहीं संगठित हुए तो विदेशी मूल का शासक वर्ग हमारा बचा-खुचा भी ख़त्म कर देगा. इसलिए धन के न्यायपूर्ण बंटवारे के आन्दोलन को कामयाब बनाने के लिए मूलनिवासियों की एकता पर पहले से कहीं ज्यादा जोर देना पड़ेगा. देवरिया से आये शिक्षा अधिकारी शिवचन्द्र राम ने धन के न्यायपूर्ण बंटवारे की बहुत जोरदार शब्दों में हिमायत की. उन्होंने कहा आरक्षण बचाने की लड़ाई अब बेमानी हो चुकी है. अब जरुरत नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों इत्यादि अर्थोपार्जन की ए टू जेड समस्त गतिविधियों में ही आरक्षण बढ़ाने की लड़ाई लड़ने की है. इतिहास की पुकार है कि बहुजन समाज पूरी ताकत से सर्वव्यापी आरक्षण की लड़ाई के लिए कमर कसे. कानपुर से आये प्राख्यात बहुजन लेखक के. नाथ ने कहा कि आज बड़ी जरुरत अपने आन्दोलनों की आत्म-समीक्षा करने की है. बाबा साहब के जाने के बाद उनका मिशन पूरा करने के लिए मैदान में उतरे आधिकांश संगठन ब्राह्मणवाद के खात्मे को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया पर, क्या हम इस दिशा में अपेक्षित कामयाबी हासिल कर पाए? नहीं! बाद में मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जब शासक दल निजीकरण, उदारीकरण,विनिवेशीकरण की दिशा में जोर-शोर से आगे, हमारे कई संगठन और नेता आरक्षण बचाने की लड़ाई में कूद पड़े . आज भी हमारे तमाम संगठन आरक्षण बचाने तथा निजीक्षेत्र में आरक्षण बढ़ाने में मशगूल हैं. पर क्या हम कुछ कामयाब भी हुए? आज आंकडे बताते हैं कि 10% टॉप की आबादी का 90% से अधिक धन-संपदा पर कब्ज़ा हो चुका है और नीचे की 60% आबादी सिर्फ 4% से थोड़े से अधिक धन पर गुजर–बसर करने के लिए मजबूर है . जो आरक्षण दलितों की उन्नति और बचे रहने का आधार था, आज वह लगभग नहीं के बराबर रह गया है . इसलिए अतीत के अनुभवों से सबक लेते हुए ज़रूरी है कि हम बाकी चीजें भूलकर संपदा-संसाधनों में भागीदारी के लिए ताकत लगायें. इसके लिए बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का दस सूत्रीय एजेंडा हमारे काम आ सकता है. यदि इस एजेंडे को लागू करव्वाने में हम कामयाब हो गए तो दलित,आदिवासी ,पिछड़े और अल्पसंख्यक न सिर्फ खुद को गुलाम होने से बचा सकते हैं, बल्कि संपदा-संसाधनों में उचित हिस्सेदारी हासिल कर अपनी भावी पीढ़ी का भविष्य भी सुरक्षित कर सकते हैं. अगर स्वाधीनता संग्राम की भांति अर्थोपार्जन के तमाम क्षेत्रों अपने शेयर की लड़ाई न लड़कर, सिर्फ आरक्षण बचाने में जुटे रहे तो हमारा बचा-खुचा शेष होना बिलकुल तय है.

अंत में मुख्य अतिथि विद्या गौतम,जिन्होंने देश की हर ईंट में भागीदारी के लिए 46 दिनों तक भूख हड़ताल करके एक इतिहास रचा है, ने जोरदार शब्दों में आह्वान किया कि आरक्षण बचाने की लड़ाई धोखा साबित हुई है.ऐसे लोगों के कारण ही बाबा साहेब का दिया हुआ आरक्षण दम तोड़ने जा रहा है. आज जरुरत इस बात की है कि बहुजनों का बच्चा- बूढा-जवान, औरत-मर्द उसी शिद्दत के साथ डाइवर्सिटी की लड़ाई लड़ें जैसे अंग्रेजों के खिलाफ राजनीतिक आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी. उन्होंने आंकड़ों के सहारे बताया कि नौकरी में हमारी हिस्सेदारी मात्र 3.95% है .आज भी 1.8% एससी/एसटी के लोग उच्च शिक्षा में हैं. 2018 में दलित बेरोजगारों की तादाद 8 करोड़ है. 54.71% दलितों के एक गज भी जमीन नहीं है. कैसे करेंगे आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी का खात्मा; कैसे होगा समाज का विकास ?इसलिए हमारे सामने मात्र एक विकल्प रह गया है, और वह है आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी.इसके लिए शक्ति के सभी स्रोतों में न्यायपूर्ण बंटवारा ही एक मात्र विकल्प है,जिसमें मुख्य रूप से सभी सरकारी टेंडर में हमारी हिस्सेदारी हो.मूलनिवासी दलित ,आदिवासी ,पिछड़े तभी प्रगति कर सकेंगे, जब प्रगति के सभी रास्तों में हिस्सेदारी हो. इसका यही रास्ता है कि उद्योगपति,सप्लायर, डीलर,ठेकेदार,पत्रकार,फिल्मकार इत्यादि बनने की चाह हमारे लोगों में पैदा हो. हमें इस मुद्दे को पोलिटिकल पार्टियों को चुनावी मुद्दों में शामिल करवाने के लिए विशेष रूप से संघर्ष चलाना होगा. आदरणीय दुसाध साहब की किताबें हम सबके लिए एक रास्ता हैं मंजिल तक पहुँचने के लिए.मैं साधुवाद दूंगी दुसाध साहब को जिन्होंने आपनी किताब डाइवर्सिटी इयर बुक:2018-19 में हमारे संघर्षों को महत्वपूर्ण स्थान दिया है.

शेष में गढ़वा से आये अशर्फीलाल बौद्ध ने सभी अतिथियों तथा बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के इस वार्षिक आयोजन को सफल बनाने में अपेक्षित सहयोग के लिए बहुजन कल्याण परिषद्/महाबोधि समाज सेवा समिति एवं भारतीय एकता परिषद्, डॉ.सी.पी.आर्य, लालचंद राम को धन्यवाद दिया. अंत में उन्होंने उपस्थित लोगों से निवेदन किया कि एच.एल.दुसाध ने धन के न्यायपूर्ण बंटवारे का जो अभियान छेड़ा है, उसे पूरा करने के लिए हमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम की भांति संघर्ष चलाना होगा. यहाँ से संकल्प लेकर जाइए कि आप अपने-अपने इलाके में लोगों बहुजनों की आजादी की इस नयी लड़ाई से जोड़ेंगे. हम लोग 18 आदमी गढ़वा से चलकर आये हैं. इनकी ओर से मैं आश्वस्त करता हूँ कि झारखण्ड में लड़ाई को हमलोग आगे बढ़ाने के लिए मान्यवर एच.एल. दुसाध और विद्या गौतम को शीघ्र ही अपने इलाके में बुलाएँगे.

तेरहवें डाइवर्सिटी डे आयोजन में देश के विभिन्न अंचलों से आये डाईवर्सिटी समर्थक लेखक, छात्र-गुरुजन और एक्टिविस्टों ने शिरकत किया, जिनमें अतिथि वक्ताओं के अतिरिक्त दयानाथ निगम, चंद्रभूषण सिंह यादव , केसी भारती,हरिवंश प्रसाद,डॉ.राहुल राज, इकबाल अंसारी, वसीम अख्तर,लालचंद राम,राजीव रंजन, मुंद्रिका बौद्ध इत्यादि प्रमख रहे.मंच का सफल संचालन डॉ.राम बिलास भारती के नाम रहा.

डॉ.कविश कुमार

Read it also-मंदिर और मूर्तियों में रुचि रखने वाले शूद्रों(पिछड़ों) और आम महिलाओं से एक विनम्र सवाल!

इटली के इस आलीशान रिज़ॉर्ट में हो रही है, दीपिका-रणवीर की शादी

0

नई दिल्ली। बॉलिवुड की सबसे रोमांटिक जोड़ी दीपिका-रणवीर 14 नवंबर को शादी के बंधन में बंधने जा रही है. इटली के जिस विला में इनकी शादी हो रही है, उसकी कीमत 8 से 10 लाख रुपये पर नाइट है. बताते हैं कि बॉलिवुड ही नहीं हॉलिवुड सिलेब्रिटीज के बीच भी यह हॉट डेस्टिनेशन है. आइए देखते हैं क्‍या है इस डेस्टिनेशन की खास बातें और इटली में कहां स्थित है यह डेस्टिनेशन…

दीपिका-रणवीर ने अपनी शादी के लिए इटली के लेक कोमो को चुना है. यहां के विला देल बालिबियानेलो को उनकी डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए चुना है और इसे खूबसूरती से सजाया जा रहा है.

लेक कोमो में कई विला हैं, जो अपनी खूबसूरती के लिए बहुत मशहूर हैं. मगर विला देल बालिबियानेलो को इटेलियन आर्किटेक्‍चर के बेहतरीन नमूने के तौर पर जाना जाता है. सिलेब्रिटीज की चहल-पहल के कारण इस लोकेशन की कड़ी सुरक्षा रहती है.

खूबसूरती की बात करें, तो इस विला में लेक कोमो के इतिहास, ग्लैमर और प्राकृतिक सुंदरता का बहुत ही सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है.

यह विला चारों ओर से पानी से घिरा है जिसकी वजह से यह आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन जाता है. इस विला में पहुंचने के लिए ढाई किलोमीटर लंबा घुमावदार रास्ता तय करना पड़ता है.

विला देल बालिबियानेलो में कई रिज़ॉर्ट हैं. यह आपके ऊपर निर्भर है कि आप कौन सा सिलेक्‍ट करते हैं. इनकी कीमत 8000 से 10000 यूरो के बीच है. जो भारतीय करंसी में करीब 6. 59 lakh to Rs 8.29 lakh पड़ती है.

केवल बॉलिवुड सिलेब्रिटीज के बीच ही नहीं हॉलिवुड सिलेब्रिटीज का भी यह फेवरिट डेस्टिनेशन है. जॉर्ज क्‍लूनी और किम करदाशियां जैसी सिलेब्रिटीज के लिए यह हॉलिडे होम के जैसा है.

लेक कोमो अपनी खूबसूरत लोकेशंस और यहां के साल भर रहने वाले सुहावने मौसम के कारण सिलेब्रिटीज के बीच हॉट डेस्टिनेशन बन चुका है.

मुकेश अंबानी की बेटी ईशा अंबानी की सगाई भी लेक कोमो के ही एक रिजॉर्ट में की गई थी.

Read it also-नक्सलियों के गढ़ में वोटिंग के लिए लगी लंबी कतारें

औरंगज़ेब के विरुद्ध हिन्दू विरोधी होने के झूठे आरोप को झुठलाते ऐतहासिक तथ्य

1

जब मैं इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 से 1953 तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया, जो सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद को लेकर था.. मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे.. एक ने कुछ ऐसे दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे.. इनमें मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे..बादशाह ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था.. मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जैसा क्रूर शासक, जो मन्दिरों को तोडने के लिए कुख्यात है, उसने एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दी कि यह पूजा और भोग के लिए दी जा रही है.. वो बुतपरस्ती के साथ कैसे अपने को शरीक कर सकता था..

मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा, जो अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे.. मैंने दस्तावेज़ उनके सामने पेश कर दिए.. उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं. इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाड़ी शिव मन्दिर की फाइल लाने को कहा, जिसका मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था.. जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी..

इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर मेरे सामने पेश की, उससे मैं आश्चर्य में पड़ गया..डाक्टर सप्रू की सलाह पर मैंने भारत के विभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतो के पास पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के प्रदान किये वो फ़रमान हों, जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गई हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कापियां मेरे पास भेज दें..

अब मेरे सामने आश्चर्य का जखीरा खड़ा था.. क्योंकि मुझे उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नक़लें प्राप्त हुईं..

यह फ़रमान 1065 हि. से 1091 हि., अर्थात 1659 से 1685 ई. के बीच जारी किए गए थे.. इन दस्तावेजों से प्रमाण्ति हो जाता है कि इतिहासकारों ने औरंगज़ेब के सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है और इससे उसकी तस्वीर का गलत रुख सामने लाया गया है.

औरंगज़ेब के फरमानों की जांच-पड़ताल के सिलसिले में मेरा सम्पर्क श्री ज्ञानचंद और पटना म्यूजियम के भूतपूर्व क्यूरेटर डा. पी एल. गुप्ता से हुआ..ये दोनों महानुभाव औरंगज़ेब के विषय में अति महत्वपूर्ण रिसर्च कर रहे थे.. मुझे खुशी हुई कि कुछ अन्य अनुसन्धानकर्ता भी सच्चाई को तलाश करने में व्यस्त हैं और बुरी तरह बदनाम औरंगज़ेब की तस्वीर का सच्चा पक्ष सामने ला रहे हैं..

औरंगज़ेब पर हिन्दू दुश्मनी के आरोप के सम्बन्ध में जिस फरमान को बहुत उछाला गया है, वह ‘फ़रमाने-बनारस’ के नाम से प्रसिद्ध है, जो बनारस के मुहल्ला गौरी के एक ब्राहमण परिवार से संबंधित है.. 1905 ई. में इसे गोपी उपाघ्याय के नवासे मंगल पाण्डेय ने सिटी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया था.. इसे पहली बार ‘एशियाटिक सोसाइटी’ नामके बंगाल के जर्नल (पत्रिका) ने 1911 ई. में प्रकाशित किया था..फलस्वरूप रिसर्च करनेवालों का ध्यान इधर गया..तब से इतिहासकार प्रायः इसका हवाला देते आ रहे हैं और वे इसके आधार पर औरंगज़ेब पर आरोप लगाते हैं कि उसने हिन्दू मन्दिरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि इस फ़रमान का वास्तविक महत्व उनकी निगाहों से ओझल रह जाता है..

यह लिखित फ़रमान औरंगज़ेब ने 15 जुमादुल-अव्वल 1065 हि. (10 मार्च 1659 ई.) को बनारस के स्थानीय अधिकारी के नाम भेजा था, जो एक ब्राहमण की शिकायत के सिलसिले में जारी किया गया था.. वह ब्राहमण एक मन्दिर का महंत था और कुछ लोग उसे परेशान कर रहे थे.. फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘अबुल हसन को हमारी शाही उदारता का क़ायल रहते हुए यह जानना चाहिए कि हमारी स्वाभाविक दयालुता और प्राकृतिक न्याय के अनुसार हमारा सारा अनथक संघर्ष और न्यायप्रिय इरादों का उद्देश्य जन-कल्याण को बढ़ावा देना है और प्रत्येक उच्च एवं निम्न वर्गों के हालात को बेहतर बनाना है. अपने पवित्र कानून के अनुसार हमने फैसला किया है कि प्राचीन मन्दिरों को तबाह और बरबाद नहीं किया जाय, अलबत्ता नए मन्दिर ना बनाए जाएँ.

हमारे इस न्याय पर आधारित काल में हमारे प्रतिष्ठित एवं पवित्र दरबार में यह सूचना पहुंची है कि कुछ लोग बनारस शहर और उसके आस-पास के हिन्दू नागरिकों और मन्दिरों के ब्राहमणों-पुरोहितों को परेशान कर रहे हैं तथा उनके मामलों में दख़ल दे रहे हैं, जबकि ये प्राचीन मन्दिर उन्हीं की देख-रेख में हैं. इसके अतिरिक्त वे चाहते हैं कि इन ब्राहमणों को इनके पुराने पदों से हटा दें. यह दखलंदाज़ी इस समुदाय के लिए परेशानी का कारण है. इसलिए यह हमारा फ़रमान है कि हमारा शाही हुक्म पहुंचते ही तुम हिदायत जारी कर दो कि कोई भी व्यक्ति ग़ैर-कानूनी रूप से दखलंदाजी ना करे और ना उन स्थानों के ब्राहमणों एवं अन्य हिन्दु नागरिकों को परेशान करे. ताकि पहले की तरह उनका क़ब्ज़ा बरक़रार रहे और पूरे मनोयोग से वे हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के लिए प्रार्थना करते रहें. इस हुक्म को तुरन्त लागू किया जाये.’’

इस फरमान से बिल्कुल स्पष्ट हैं कि औरंगज़ेब ने नए मन्दिरों के निर्माण के विरुद्ध कोई नया हुक्म जारी नहीं किया, बल्कि उसने केवल पहले से चली आ रही परम्परा का हवाला दिया और उस परम्परा की पाबन्दी पर ज़ोर दिया. पहले से मौजूद मन्दिरों को ध्वस्त करने का उसने कठोरता से विरोध किया. इस फ़रमान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू प्रजा को सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर देने का इच्छुक था.

यह अपने जैसा केवल एक ही फरमान नहीं है. बनारस में ही एक और फरमान मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब वास्तव में चाहता था कि हिन्दू सुख-शान्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सकें.

यह फरमान इस प्रकार हैः ‘‘रामनगर (बनारस) के महाराजाधिराज राजा रामसिंह ने हमारे दरबार में अर्ज़ी पेश की है कि उनके पिता ने गंगा नदी के किनारे अपने धार्मिक गुरू भगवत गोसाईं के निवास के लिए एक मकान बनवाया था. अब कुछ लोग गोसाईं को परेशान कर रहे हैं. अतः यह शाही फ़रमान जारी किया जाता है कि इस फरमान के पहुंचते ही सभी वर्तमान एवं आने वाले अधिकारी इस बात का पूरा ध्यान रखें कि कोई भी व्यक्ति गोसाईं को परेशान एवं डरा-धमका ना सके, और ना उनके मामले में हस्तक्षेप करे, ताकि वे पूरे मनोयोग के साथ हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए प्रार्थना करते रहें. इस फरमान पर तुरंत अमल किया जाए.’’

(तारीख-17 रबी उस्सानी 1091 हिजरी) जंगमबाड़ी मठ के महंत के पास मौजूद कुछ फरमानों से पता चलता है कि औरंगज़ैब कभी यह सहन नहीं करता था कि उसकी प्रजा के अधिकार किसी प्रकार से भी छीने जाएँ, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान. वह अपराधियों के साथ सख़्ती से पेश आता था.

इन फरमानों में एक जंगम लोगों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) की ओर से सामने आया, जिस पर शाही हुक्म दिया गया था कि बनारस सूबा इलाहाबाद के अफ़सरों को सूचित किया जाता है कि पुराना बनारस के नागरिकों अर्जुनमल और जंगमियों ने शिकायत की है कि बनारस के एक नागरिक नज़ीर बेग ने क़स्बा बनारस में उनकी पांच हवेलियों पर क़ब्जा कर लिया है. उन्हें हुक्म दिया जाता है कि यदि शिकायत सच्ची पाई जाए और जायदाद की मिल्कियत का अधिकार प्रमाणित हो जाए तो नज़ीर बेग को उन हवेलियों में दाखि़ल ना होने दया जाए, ताकि जंगमियों को भविष्य में अपनी शिकायत दूर करवाने के लिए हमारे दरबार में ना आना पडे.

इस फ़रमान पर 11 शाबान, 13 जुलूस (1672 ई.) की तारीख़ दर्ज है. इसी मठ के पास मौजूद एक-दूसरे फ़रमान में जिस पर पहली रबीउल अव्वल 1078 हि. की तारीख दर्ज़ है, यह उल्लेख है कि ज़मीन का क़ब्ज़ा जंगमियों को दिया गया. फ़रमान में है- ‘‘परगना हवेली बनारस के सभी वर्तमान और भावी जागीरदारों एवं करोडियों को सूचित किया जाता है कि शहंशाह के हुक्म से 178 बीघा ज़मीन जंगमियों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) को दी गई.

पुराने अफसरों ने इसकी पुष्टि की थी और उस समय के परगना के मालिक की मुहर के साथ यह सबूत पेश किया है कि ज़मीन पर उन्हीं का हक़ है. अतः शहंशाह की जान के सदक़े के रूप में यह ज़मीन उन्हें दे दी गई. ख़रीफ की फसल के प्रारम्भ से ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा बहाल किया जाय और फिर किसी प्रकार की दखलंदाज़ी ना होने दी जाए, ताकि जंगमी लोग (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) उसकी आमदनी से अपनी देख-रेख कर सकें.’’

इस फ़रमान से केवल यही पता नहीं चलता कि औरंगज़ेब स्वभाव से न्यायप्रिय था, बल्कि यह भी साफ़ नज़र आता है कि वह इस तरह की जायदादों के बंटवारे में हिन्दू धार्मिक सेवकों के साथ कोई भेदभाभ नहीं बरता था. जंगमियों को 178 बीघा ज़मीन संभवतः स्वयं औरंगज़ेब ही ने प्रदान की थी, क्योंकि एक दूसरे फ़रमान (तिथि 5 रमज़ान, 1071 हि.) में इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि यह ज़मीन मालगुज़ारी मुक्त है.

औरंगज़ेब ने एक दूसरे फरमान (1098 हि.) के द्वारा एक दूसरी हिन्दू धार्मिक संस्था को भी जागीर प्रदान की. फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘बनारस में गंगा नदी के किनारे बेनी माधो घाट पर दो प्लाट खाली हैं. एक मर्क़जी मस्जिद के किनारे रामजीवन गोसाईं के घर के सामने और दूसरा उससे पहले. ये प्लाट बैतुल-माल की मिल्कियत है. हमने यह प्लाट रामजीवन गोसाईं और उनके लड़के को ‘‘इनाम’ के रूप में प्रदान किया, ताकि उक्त प्लाटों पर बाहमणों एवं फ़क़ीरों के लिए रिहायशी मकान बनाने के बाद वे खुदा की इबादत और हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए दूआ और प्रार्थना करने में लग जाएं.

हमारे बेटों, वज़ीरों, अमीरों, उच्च पदाधिकारियों, दरोग़ा और वर्तमान एवं भावी कोतवालों को अनिवार्य है कि वे इस आदेश के पालन का ध्यान रखें और उक्त प्लाट, उपर्युक्त व्यक्ति और उसके वारिसों के क़ब्ज़े ही मे रहने दें और उनसे न कोई मालगुज़ारी या टैक्स लिया जाए और ना उनसे हर साल नई सनद मांगी जाए.’’ लगता है औरंगज़ेब को अपनी प्रजा की धार्मिक भावनाओं के सम्मान का बहुत अधिक ध्यान रहता था. असम का उमानन्द मंदिर..

हमारे पास औरंगज़ेब का एक फ़रमान (2 सफ़र, 9 जुलूस) है, जो असम के शह गोहाटी के उमानन्द मन्दिर के पुजारी सुदामन ब्राहमण नाम है. असम के हिन्दू राजाओं की ओर से इस मन्दिर और उसके पुजारी को ज़मीन का एक टुकड़ा और कुछ जंगलों की आमदनी जागीर के रूप में दी गई थी, ताकि भोग का खर्च पूरा किया जा सके और पुजारी की आजीविका चल सके. जब यह प्रांत औरंगजेब के शासन-क्षेत्र में आया, तो उसने तुरंत ही एक फरमान के द्वारा इस जागीर को यथावत रखने का आदेश दिया.

उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर..

हिन्दुओं और उनके धर्म के साथ औरंगज़ेब की सहिष्णुता और उदारता का एक और सबूत उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर के पुजारियों से मिलता है. यह शिवजी के प्रमुख मन्दिरों में से एक है, जहां दिन-रात दीप प्रज्वलित रहता है. इसके लिए काफ़ी दिनों से प्रतिदिन चार सेर घी वहां की सरकार की ओर से उपलब्ध कराया जाता था और पुजारी कहते हैं कि यह सिलसिला मुगल काल में भी जारी रहा. औरंगजेब ने भी इस परम्परा का सम्मान किया.

इस सिलसिले में पुजारियों के पास दुर्भाग्य से कोई फ़रमान तो उपलब्ध नहीं है, परन्तु एक आदेश की नक़ल ज़रूर है, जो औरंगज़ब के काल में शहज़ादा मुराद बख़्श की तरफ से जारी किया गया था. (5 शव्वाल 1061 हि. को यह आदेश शहंशाह की ओर से शहज़ादा ने मन्दिर के पुजारी देव नारायण के एक आवेदन पर जारी किया था. वास्तविकता की पुष्टि के बाद इस आदेश में कहा गया है कि मन्दिर के दीप के लिए चबूतरा कोतवाल के तहसीलदार चार सेर (अकबरी घी प्रतिदिन के हिसाब से उपल्ब्ध कराएँ. इसकी नक़ल मूल आदेश के जारी होने के 93 साल बाद (1153 हिजरी) में

मुहम्मद सअदुल्लाह ने पुनः जारी की.

साधारण्तः इतिहासकार इसका बहुत उल्लेख करते हैं कि अहमदाबाद में नागर सेठ के बनवाए हुए चिन्तामणि मन्दिर को ध्वस्त किया गया, परन्तु इस वास्तविकता पर पर्दा डाल देते हैं कि उसी औरंगज़ेब ने उसी नागर सेठ के बनवाए हुए शत्रुन्जया और आबू मन्दिरों को काफ़ी बड़ी जागीरें प्रदान कीं.

काशी विश्वनाथ का मन्दिर क्यों तोड़ना पड़ा..

निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाण्ति होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था. विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि वहाँ क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा नदी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ जी के मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी. औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडाव से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया. रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बड़ी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका. जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा. आखिर में उन अफ़सरों ने देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है. उन्होंने मूर्ति हटवा कर देखा तो तहखाने की सीढ़ी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी. उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे. यह तहखाना विश्वनाथ जी की मूर्ति के ठीक नीचे था.

राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोघ प्रकट किया. चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की मांग की. उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है. अतः विश्वनाथ जी की मूर्ति को कहीं और ले जाकर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाए और महंत को गिरफतार कर लिया जाए.

डाक्टर पट्ठाभि सीतारमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है. पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डा.पी.एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुस्टि की है.

मस्ज़िद तोड़ने की घटना…

गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा, जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालुगज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे. कुछ ही वर्ष में यह रक़म करोड़ों की हो गई. तानाशाह ने यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में गाड़ कर उस पर मस्जिद बनवा दी. जब औरंगज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दे दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए. अतः गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों में ख़र्च किया गया.

ये दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था. ‘‘दुर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा, और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढंत बातों में अन्तर करते हैं. आज भी साम्प्रदायिक एवं स्वार्थी तत्व इतिहास को तोड़ने-मरोडने और उसे ग़लत रंग देने में लगे हुए हैं.

स्रोत-पुस्तेक का नाम: भारतीय संस्कृति और मुग़ल साम्राज्य • लेखक: प्रो. बी. एन पाण्डेय Read it also-मंदिर और मूर्तियों में रुचि रखने वाले शूद्रों(पिछड़ों) और आम महिलाओं से एक विनम्र सवाल!

बसपा ने जारी की 42 नामों की तीसरी सूची

जयपुर। बसपा ने सोमवार रात 42 प्रत्याशियों की तीसरी सूची जारी की. इससे पहले 19 उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं. ऐसे में बसपा ने कुल 61 प्रत्याशियों घोषित किए हैं. इस सूची में जातीय समीकरणों व सोशल इंजीनियरिंग का प्रयास किया गया है, ताकि बसपा का प्रत्याशी बीजेपी-कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे सकें.

उधर, ये सूची जारी करने वाले बसपा प्रदेश अध्यक्ष सीताराम मेघवाल ने कहा कि किसी भी दूसरे दल के साथ गठबंधन को तैयार नहीं है. इसकी ऑफिशियल घोषणा मंगलवार को कर दी जाएगी. गौरतलब है कि हनुमान बेनीवाल लगातार ये दावा कर रहे थे कि उनके द्वारा गठित तीसरे मोर्चे में बसपा भी शामिल होगी. इसके लिए यूपी में अंतिम दौर में वार्ता की जा रही हैं.
बसपा के घोषित उम्मीदवार
विधानसभा सीट     प्रत्याशी
सूरतगढ़ डूंगरराम गेदर
बीकानेर पश्चिम नारायण हरि लेगा
लूणकरणसर पवन कुमार ओझा
सुजानगढ़ सीताराम नायक
झुंझुनूं राजेश सैनी
मंडावा अनवर खां
गढ़ी चेतनलाल मइडा
बांसवाड़ा शांति देवी
बागीदोरा गणेशलाल कटारा
कुशलगढ़ छगनलाल पारगी
डूंगरपुर अमृतलाल आहारी
चौरासी विजयपाल रोत
सागवाड़ा दलजीत
चित्तौडगढ़ अल्लाउद्दीन खान
माण्डल शिवलाल गुर्जर
भीलवाड़ा शंकरलाल सैन
डीग- कुम्हेर प्रताप सिंह महरावर
नदबई जोगेंद्र सिंह अवाना
नगर वाजिब अली
वैर अतर सिंह पगारिया
बांदीकुई भागचंद सैनी
मालपुरा नरेंद्र सिंह आमली
करौली लाखन सिंह मीना
सपोटरा इंजीनियर हंसराम मीना
सवाई माधोपुर हंसराज मीना
सिकराय फैलीराम बैरवा
टोंक मोहम्मद अली
धौलपुर पं. किशनचंद शर्मा
बाड़ी रामहेत कुशवाह
अलवर रामगढ़ लक्ष्मण चौधरी
बयाना सुनील कुमार जाटव
झालरापाटन श्रीगयास अहमद
भरतपुर जसवीर सिंह
दौसा गोपाल मीना
निवाई बनवारी लाल बैरवा
बसेड़ी उदयवीर सिंह
अलवर ग्रामीण रिंकी शर्मा
तिजारा होशियार सिंह यादव
गंगापुर आर.के. मीना
चाकसू गजानंद खटीक
  Read it also-छत्तीसगढ़ चुनाव में कहां खड़ी है बसप  

शहरों/ नगरों /सड़कों के  नाम बदलने की राजनीति नई तो नहीं है किंतु ….

आज के दौर में हम केवल भारतीय नहीं रह गए हैं. वैसे पहले भी हम कभी भारतीय नहीं रहे. भारतीय समान को जातियों में विभाजित कर देना इस देश की जनता के सिर सबसे बड़ा कलंक है. देश आजाद हुआ तो देश की जनता राजनीतिक खैमों में विभाजित हो गई. कोई कांग्रेसी तो कोई भाजपाई, कोई सपाई तो कोई कुछ…..होता चला गया और आज सद्विचारों की सहमति के बजाय खैमेंबाजी से सहमति का दौर चल रहा है. दरअसल हम स्वस्थ विचारधारा के नहीं, अपितु राजनीतिक मानसिकता के गुलाम होकर रह गए हैं. हम सोचते हैं कि वो राजनीतिक दल जिससे हम मानसिक रूप से जुड़े हुए हैं, वो जो भी कुछ अच्छा-बुरा करता है, अपने चहेतों के लिए ठीक ही करता है. और आपके पसंदीदा राजनेता आपकी निजी रुचि के विषय धर्म, जाति, समाज को राजनैतिक मुद्दा बनाकर सत्ता सुख की सीढ़ियों पर चढ़ जाते हैं. इन राजनीतिक दलों को इस बात से कुछ लेना-देना नहीं कि किसी भी शहर/नगर/सड़क का नाम बदलने में सरकारी खजाने से भारी रकम खर्च होती है और लाखों- करोडो के ठेके नेताओ के अपने सगे-संबंधियों, रिश्तेदारों, अनुयाइयों में बांट दिए जाते हैं. नाम बदलने का सिलसिला भी राजनीति के रोजगार का जरिया बन गया है.

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि सरकार केवल मदारी की भूमिका में होती है, उसे कटोरा थामना पड़े या कटोरा छिनना पड़े, हर हाल  पैसे कमाने से मतलब है…., वो ऐसा खेल ही दिखायेगी जिससे जनता पैसे के साथ साथ ताली भी बजाए… और हम वही कर रहे हैं…

शहरों/नगरों/सड़कों के  नाम बदलने की राजनीति के चलते, गए दिनों में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के चलते हुए तीन बड़े नाम बदले गए हैं| मुगल सराय स्टेशन का नाम पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रखा गया तो इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रखा गया| (2018) दीवाली के एक दिन पहले ही सीएम योगी आदित्याथ ने फैजाबाद जिले का नाम अयोध्या कर दिया है. पता नहीं … अब अयोध्या का क्या नाम होगा? इस तरह अब महाराष्ट्र के शहर उस्मानाबाद और औरंगाबाद के नाम बदलने की भी मांग की जा रही है. अब हैदराबाद का नाम बदलने की बात सामने आई है तो कल अहमदाबाद का नाम बदलने की बात होगी, इसमें शंका की कोई जगह नहीं है. बताते चलें कि ताजा खबर है…भाजपा द्वारा शहरों/नगरों/सड़कों के नाम बदलने की प्रक्रिया को विश्वभर में तिरछी निगाह से देखा जा रहा है. लेकिन भाजपा, खासकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके सिपहसालार आए रोज इस बारे में कोई न कोई बयान देते ही जा रहे हैं और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आँख और मुंह दोनों बन्द किए हुए है. विदित हो कि अब मुज्जफरनगर, आगरा, आजमगढ़, अलीगढ़ आदि अन्य शहरों के नाम बदलने की बात सामने आई है. अब इसमें योगी आदित्यनाथ का कोई दोष थोड़े ही है… वो तो हैं ही योगी. भला एक योगी को शासन-प्रशासन चलाने की कला से क्या लेना-देना? जो कर सकते हैं, कर रहे हैं.

शहरों/नगरों/सड़कों का नाम बदलने का राजनीतिक इतिहास कोई नया नहीं है. सिद्धार्थ झा के अनुसार विलियम शेक्सपियर ने एक बार कहा था- ‘नाम में क्या रखा है?  किसी चीज का नाम बदल देने से भी चीज वही रहेगी. गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो, गुलाब ही रहेगा.’ कम से कम मैं तो शेक्सपीयर की बात से इसलिए सहमत हूँ कि यदि भारत का नाम बदलकर ‘अमेरिका’ रख दिया जाए तो क्या भारत अमेरिका हो जाएगा? … नहीं…कतई नहीं.

लेकिन आज की भाजपा सरकार को नाम प्रासंगिक हो उठा है, इसलिए भाजपा की केंद्र सरकार द्वारा उत्तरप्रदेश की बहुत ही ख्यातिप्राप्त चिर-परिचित जगह का नया नामकरण किया गया है. मुगलसराय एक ऐसा ही नाम है जिससे देशी ही नहीं, विदेशी भी भली-भांति परिचित हैं, क्योंकि यहां से न सिर्फ उनके लिए काशी का रास्ता जाता है बल्कि सारनाथ की ख्याति इसे दूर-दूर तक लोकप्रिय करती है. इसका नाम अब ‘दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन’ कर दिया गया है. मुगलसराय स्टेशन का नाम संस्कृति, इतिहास और सभ्यता को दर्शाता है. ये काशी का अहम हिस्सा है. मुगलसराय के इतिहास में अगर हम झांकें तो इसमें हमारे अतीत की खुशबू महकती है जिसको भारत से अलग करना कठिन है. भले ही राष्ट्रवाद के दौर में हम सांस्कृतिक पुनरुत्थान के नाम पर मुगलिया इतिहास की अनदेखी करें लेकिन नाम बदलने से जज्बात नहीं बदला करते… यह हरेक को जान लेने की बात है.

अतीत के झरोखों में झांकें तो मुगलसराय कभी भी सिर्फ एक स्टेशन भर नहीं रहा. मुगल साम्राज्य के दौर में अक्सर लोग पश्चिम-दक्षिण से उत्तर-पूरब जाते वक्त शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित ग्रांड ट्रंक रोड का इस्तेमाल करते थे. दिल्ली, हरियाणा व पंजाब में जीटी रोड पर दूरी को दर्शाने वाली कोस-मीनारें अब भी मौजूद हैं, जो दिशा और किलोमीटर बताती थीं. ये सड़क बेहद अहम थी व ढाका से पेशावर, कोलकाता-दिल्ली व अम्बाला-अमृतसर को जोड़ती थीं….तो क्या ये भाजपा सरकार जी. टी. रोड का नाम बदलेगी या इसे नेस्तोनाबूद करके नई सड़क बनाने का काम करेगी. … यह भी तो शेरशाह सूरी ने ही द्वारा बनवाई गई थी.

अब बात करते हैं कि मुगलसराय स्टेशन का नाम राष्ट्रवादी चिंतक और जनसंघ नेता के नाम पर क्यों रखा गया है? साल 1968 में इसी स्टेशन पर दीनदयाल उपाध्याय की लाश लावारिस हालत में मिली थी. जेब में 5 रुपए का मुड़ा-तुड़ा नोट और एक टिकट था और इसके अलावा कोई पहचान नहीं थी. स्टाफ लावारिस लाश समझकर अंतिम संस्कार करने जा रहा था लेकिन तभी किसी ने पहचान लिया और फिर अटलजी और सर संघसंचालक गोवलकर जी आए और दिल्ली ले जाकर इनका अंतिम संस्कार किया गया. उनकी मृत्यु एक राज ही रही…. क्यों, कैसे हुई? इस पर से पर्दा आज तक भी नहीं उठ पाया है. भाजपा इस वर्ष (2018) को दीनदयाल शताब्दी वर्ष मना रही है और उनको सम्मान देने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र को ये सुझाव दिया जिसको केन्द्र सरकार द्वारा मान लिया गया. अब क्योंकि राजनीति की सेहत कमजोर पड़ती जा रहा है, सो विभाजनकारी राजनीति अपने चरम पर है….विभाजनकारी राजनीति ही भाजपा की शक्ति है. किंतु आज लोगों में इस विभाजनकारी राजनीति के प्रति काफी रोष तो है किंतु विपक्ष का एकजुट होना अति-आवश्यक है. किंतु भाजपा सरकार और भाजपा के विभाजनकारी नेता इस नाम बदलाव की प्रक्रिया को अति महत्त्वपूर्ण समझ रहे हैं, शायद यह उनकी सबसे बड़ी भूल होकर उभरेगी, इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है.

ऐसा भी नहीं है कि पहली बार किसी शहर/नगर/सड़क का नाम बदला गया हो. नाम बदलने का लंबा इतिहास है. कभी राज्यों, कभी शहरों तो कभी सड़कों का…नाम बदलने का काम हमेशा होता ही रहा है. सड़क-मुहल्लों की गिनती नहीं कर पा रहा नगर निगम का जो भी आका होता है, वो मनमानी करता रहता है. आसपास नजर दौड़ाएंगे तो तमाम पार्षदों के मां-बाप, रिश्तेदारों के नाम पर सड़कें मिल जाएंगी. राज्यों या शहरों का नाम बदलने के लिए केंद्र की स्वीकृति लेनी होती है. किंतु आज की तारीख में ऐसा कतई भी देखने को नहीं मिल रहा. विगत में नाम बदलने की प्रक्रिया किसी न किसी प्रकार पारदर्शी होती थी और साम्प्रदायिक मसलों के आधार पर तो कतई नहीं होती थी, किंतु आज का सत्य ये है कि शहरों/नगरों/सड़कों के नाम बदलने की प्रक्रिया एक खास द्वेश के कारण की जा रही है और वह है ‘हिन्दू…मुसलमान’ का द्वेश-राग.

उल्लेखनीय है कि स्वतंत्र भारत में साल 1950 में सबसे पहले ‘पूर्वी पंजाब’ का नाम ‘पंजाब’ रखा गया. 1956 में ‘हैदराबाद’ से ‘आंध्रप्रदेश’, 1959 में ‘मध्यभारत’ से ‘मध्यप्रदेश’ नामकरण हुआ. सिलसिला यहीं नहीं खत्म हुआ… 1969 में ‘मद्रास’ से ‘तमिलनाडु’, 1973 में ‘मैसूर’ से ‘कर्नाटक’, इसके बाद ‘पुडुचेरी’, ‘उत्तरांचल’ से ‘उत्तराखंड’,  2011 में ‘उड़ीसा से ओडिशा’ नाम किया गया. लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती. मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, शिमला, कानपुर, जबलपुर लगभग 15 शहरों के नाम बदले गए. सिर्फ इतना ही नहीं, जुलाई 2016 में मद्रास, बंबई और कलकत्ता उच्च न्यायालय का नाम भी बदल दिया गया. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इससे मिलते-जुलते नामों से बदलाव किया गया है. अब तक शहरों का नाम नेताओं के नामों पर करने की कवायद नहीं की गई थी… हां! कांग्रेस और अन्य दलों की सरकारों ने नए प्रतिष्ठानों के नाम जरूर नेताओं के नाम पर रखे किंतु किसी भी पुराने शहर/नगर/सड़क के नाम नेताओं को श्रेय देने के नाम पर नहीं बदले. संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है. एयरपोर्टस/ रेलवे स्टेशंस के नाम महापुरुषों के नाम पर रखे गए हैं. हैरत की बात तो ये है कि  मुगलसराय में स्टेशन के साथ-साथ नगर निगम का नाम भी बदल दिया गया.

विदित हो कि शहरों/नगरों/सड़कों के नामों में जो भी परिवर्तन किए जाते है, ज्यादातर बदलाव राजनीतिक कारणों से किए जाते हैं…. लेकिन कुतर्क ऐतिहासिक भूल को दुरुस्त करने की दीए जाते हैं …और कुछ नहीं. नाम बदलने से सरकारों को फायदा ये होता है कि उन्हें कम समय में सुर्खियां बटोरने को मिल जाती हैं, दूसरा गंभीर विषयों से जनता का ध्यान भटकाना होता है…. 2019 के आम चुनावों के मद्देनजर भाजपा का यह हथकंडा कितना काम आएगा यह तो समय ही बताएगा … किंतु भाजपा की कोशिश तो यही है कि शहरों/नगरों/सड़कों के नामों में परिवर्तन के जाल में फंसाकर जनता को अपनी असफलता के मुद्दे से भटकाकर अपना राजनीतिक उल्लू साध लिया जाए.

यूँ तो कांग्रेस की सरकार ने भी कुछ ऐसे काम किए थे. आपको याद होगा कि यूपीए सरकार के समय में ‘कनाट प्लेस’ और ‘कनाट सर्कस’ का नाम बदलकर ‘राजीव चौक’ और ‘इंदिरा चौक’ कर दिया गया था. किंतु हुआ क्या…. इस बात को दो दशक से भी ज्यादा हो चुका है लेकिन आज भी लोग ‘कनाट प्लेस’ को ‘कनाट प्लेस’ ही कहते हैं. अगर ‘कनाट प्लेस’ का नाम बदल जाने से कांग्रेस को फायदा होना होता तो वो आज हाशिये पर नहीं आई होती. भाजपा को इस प्रकरण से कुछ न कुछ तो सीख लेनी चाहिए ही कि नहीं? क्यों न शहरों/ नगरों/ सड़कों/ गलियों के नाम बदलने के लिए भी एक आयोग का गठन कर देना चाहिए? आखिर नाम बदलने के पीछे कोई तर्क-वितर्क तो होना ही चाहिए कि नहीं?

मै ये मानता हूँ कि हिन्दू और मुसलमान भारत की विरासत का अटूट हिस्सा हैं. नाम बदलने की इस प्रक्रिया के चलते समाज में फूट डालने की कोशिश, मुझे तो लगता है कि भाजपा के राजनीति को ही भारी पड़ेगी. अब आप कहेंगे कि मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए कई जिलों के नाम बदले थे, हाँ! मैं मानता  उस पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं? स्मरण रहे कि मायावती ने किसी भी शहरों/नगरों/सड़कों के नाम तो कतई नहीं बदले थे, अपितु समाज को एक करने वाले महानायकों के नाम पर केवल और केवल नए नामों से जिले भर ही बनाए थे. जबकि भाजपा भारतीय समाज में विभाजनकारी संदेश पहुँचाने वाले लोगों के नाम पर शहरों/नगरों/सड़कों के नामों में परिवर्तन का काम करने पर उतारू है. यह प्रक्रिया देश के लिए हितकारी नहीं है, सो शहरों/नगरों/सड़कों के नए सिरे से  नामकरण की राजनीति बंद होनी चाहिए.

Read it also-दलित दस्तक मैग्जीन का नवम्बर 2018 अंक ऑन लाइन पढ़िए

नक्सलियों के गढ़ में वोटिंग के लिए लगी लंबी कतारें

रायपुर। छत्तीसगढ़ में पहले चरण के विधानसभा चुनावों के तहत 18 सीटों के लिए मतदान जारी है. दोपहर एक बजे तक 25.15 फीसदी वोटिंग हो चुकी है. नक्सलियों की धमकी का लोगों पर कोई असर नहीं है और मतदान केंद्रों के बाहर लोगों की लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई हैं. सोमवार सुबह 7 बजे से शुरु हुई वोटिंग शाम तीन बजे तक होगी जबकि कुछ केंद्रों पर यह शाम पांच बजे तक चलेगी. नक्सली धमकियों और हमलों के बीच हो रहे मतदान में सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए हैं.

आठ नक्सल-प्रभावित जिलों की जिन 18 सीटों पर वोटिंग हो रही हैं उनमें बस्तर, दंतेवाड़ा और मुख्यमंत्री की सीट राजनांदगांव जैसे इलाके शामिल हैं. इन इलाकों से पिछले 10 दिनों के अंदर 300 आईईडी बरामद हो चुकी हैं. राजनांदगांव जिले के मोहला-मानपुर, कांकेर जिले के अंतागढ़, भानुप्रतापपुर और कांकेर, कोंडागांव जिले के केशकाल और कोंडागांव, नारायणपुर जिले के नारायणपुर, दंतेवाड़ा जिले के दंतेवाड़ा, बीजापुर जिले के बीजापुर तथा सुकमा जिले के कोंटा विधानसभा में सुबह सात बजे से दोपहर तीन बजे तक वोट डाले जाएंगे.

Read it also-गांधी को गोद लेने वाले व्यवसायी

केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार का 59 की उम्र में निधन

0

बेंगलुरु। केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार का सोमवार तड़के चार बजे यहां निधन हो गया. वे 59 साल के थे. कुछ महीनों से फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित थे. अक्टूबर में न्यूयॉर्क से इलाज कराकर लौटे थे. दोबारा तबीयत बिगड़ने पर उन्हें बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में भर्ती किया गया था. उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था. उनकी पार्थिव देह बेंगलुरु स्थित घर पर अंतिम दर्शन के लिए रखी गई है. वे 1996 से 2014 के बीच बेंगलुरु दक्षिण सीट से छह बार लोकसभा सदस्य चुने गए थे. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वे सबसे युवा मंत्री थे. अनंत कुमार के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत कई नेताओं ने शोक जताया. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा- “अनंत कुमार के निधन की खबर सुनकर बेहद दुख हुआ. उन्होंने भाजपा की लंबे अरसे तक सेवा की. बेंगलुरु उनके दिल और दिमाग में हमेशा रहा. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को साहस दे.”

आज राष्ट्रध्वज आधा झुका रहेगा

केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, अनंत कुमार के निधन पर सोमवार को देशभर में राष्ट्रध्वज आधा झुका रहेगा. वहीं, कर्नाटक सरकार ने राज्य में तीन दिन का शोक और सोमवार का अवकाश घोषित किया है. उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा. अनंत के पास दो विभागों का प्रभार था

मोदी सरकार में कुमार के पास दो मंत्रालय की जिम्मेदारी थी. वे 2014 से रसायन एवं उर्वरक मंत्री थे. इसके अलावा उन्हें जुलाई 2016 में संसदीय मामलों की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी. अनंत कुमार वाजपेयी सरकार में मार्च 1998 से अक्टूबर 1999 तक नागरिक उड्डयन मंत्री भी रहे. उनका जन्म 22 जुलाई 1959 को बेंगलुरु में हुआ था. उन्होंने केएस ऑर्ट कॉलेज हुबली से बीए किया था. इसके बाद जेएसएस लॉ कॉलेज से एलएलबी की थी. उनके परिवार में पत्नी तेजस्विनी, दो बेटियां ऐश्वर्या और विजेता हैं.

Read it also-हरियाणा कर्मचारी आंदोलन दशा और दिशा

अल्पसंख्यक शोधार्थी से मारपीट करने एवं जान से मारने की धमकी की शिकायत

0
मैं आबिद रेजा पीएचडी जनसंचार सत्र: 2018-19 का महात्मा गा.अं.हि.विश्वविद्यालय, वर्धा का शोधार्थी हूँ. मैं कक्ष सं. 67 में रहता हूँ. दिनांक 07/11/2018 को तक़रीबन 12:45 बजे. जैसे ही मैं गोरख पाण्डेय छात्रावास में प्रवेश कर अपने कक्ष स. 67 की ओर जानी वाली सीढीओं पर कुछ सीढी ही चढा था. जब तक कि राम सुंदर कुमार(पीएचडी शोधार्थी, सत्र: 2018-19) ने मेस से निकलते हुए आवाज़ देना शुरू कर दिया. तुम्हारे यहाँ पैसा बकाया है क्यों नहीं दे रहे हो. उसके आवाज़ देने और मेरे सीढी चलने की गति इतनी थी जब तक मैं सामने कुछ सीढीयों पर चढ़ चुका था और राम सुंदर कुमार भी पीछे की सीढ़ी पर चढ़ते हुए कहने लगा कि तुमने मेस का पैसा नहीं दिया है. मैंने कहा कि मैंने पाँच सौ रुपए दिये हैं और तक़रीबन 300 सौ के आस-पास जो भी होगा दे देता हूँ. उसने कहा कि नहीं तुम अभी दो फिर मैंने कहा कि मैं कमरे में जा रहा हूँ और पैसा लाकर देता हूँ और अभी मैंने खाना भी नहीं खाया है. जब तक पैसे के लिए उसने मेरी शर्ट की कालर पकड़ ली और जबर्दस्ती करने लगा और अशोभनीय और अभद्रता करने लगा जबकि मैंने उसे छुड़ाने की कोशिश की तो उसने धका देते हुए मुझे मेरे सर के बायां माथे पर घुसा मारकर ख़ून बहा दिया और लात घुसा चलाने लगा. फूटे हुए माथे का विडियो और तस्वीर मेरे पास मौजूद है. इस घटना की आवाज़ सुनते ही तमाम लोग इस घटना शरीक होकर बीच-बचाव करा दिए. इसके पूर्व में भी कहा था देखों मेरा संबंध असामाजिक तत्वों के साथ भी है जब चाहूँ तुम्हें कुछ अनहोनी करा सकता हूँ. और इस घटना के दूसरे दिन यानि आठ तारीख को कहा कि पाकिस्तान है तू और पाकिस्तान क्यों नहीं जा रहे हो. गाय के नाम पर तुम्हें मारना पड़ेगा. अगर तुमने कहीं शिकायत की तो देखना मैं क्या करता हूँ. इस भय से और उसके गुंडा प्रवृति के कारण मैं इस घटना के बाद और डरा हुआ हूँ. मानसिक रूप से परेशान हूँ और मुझे ऐसा लगता है धार्मिक उन्माद के नाम पर मेरी जान ली जा सकती है. मेरी दिनचर्या भी प्रभावित है. मैं  विश्वविद्यालय प्रशासन से निवेदन किया है मेरी सुरक्षा दी जाए. क्योंकि मैं असुरक्षित महसूस कर रहा हूँ. जिससे मेरी शिक्षण व्यवस्था सुचारु रूप से व्यवस्थित हो सके.
आबिद रेज़ा