साहित्य-धर्म

कविताः मुझे बदलाव चाहिए, सुधार नहीं

सदियों से तुम्हारे शास्त्रों, शस्त्रों और बहियों का बोझ मेरी जर्जर देह ने ही उठाया है बैलगाड़ी में जुते बीमार बैल की तरह मैं ही वाहक रहा हूँ तुम्हारी सब कामनाओं का अब तुम्हारा बैल मर ही न जाए गिर कर चूर ही न हो जाए इसलिए तुम देते आये हो...

पेंगुइन ने प्रकाशित की रामविलास पासवान की जीवनी

रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद अचानक से हर कोई उनके बारे में ज्यादा जानने की चाह रखने लगा। उन पर किताबें ढूंढ़ी जाने लगी। इसी बीच पेंगुइन रैंडम हाउस ने हाल ही में देश के कद्दावर नेता और राष्ट्रीय दलित राजनीति के प्रमुख...

विपिन भारतीय को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान

नई दिल्ली। सोशल एक्टिविस्ट, गायक और ओएनजीसी के मेहसाना युनिट में एग्जिक्यूटिव इंजीनियर के पद पर कार्यकरत यूपी के सहारनपुर निवासी विपिन कुमार भारतीय को बड़ा सम्मान मिला है. थाईलैंड की Nakhon Pathom Rajghat University द्वारा आयोजित 9th International Conference on Art & Culture...

दिल्ली में 3-4 फरवरी को दलित साहित्य महोत्सव, लगेगा दिग्गज साहित्यकारों का जमावड़ा

नई दिल्ली। दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज में ‘दलित साहित्य महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है. यह महोत्सव 3 और चार जनवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में आयोजित होगा. कार्यक्रम का समय सुबह 9.30 से शाम 6.30 तक होगा. इस तरह...

‘तूफाँ की ज़द में’ (ग़ज़ल संग्रह) : एक दृष्टि

युवा लेखक, कवि व कहानीकार शिवनाथ शीलबोधि का कहना है कि ग़ज़ल के अर्थ को यदि एक शब्द में रूढ़ करना हो तो मैं ये कहूंगा कि गजल दिल और दिमाग में मचलती वो विचारधारा है जो अव्यक्त से व्यक्त होने को बेताब होती...

‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ या आदिवासियों की कब्र

मेरे देशवासियों! जश्न के अवसर पर रोना वाला मनहूस होता है मैं भी उन मनहूस लोगों में से एक हूं जब पूरा देश 31 अक्टूबर के जश्न में डूबने के लिए उतावला है तो मैं मनहूस 31 अक्टबूर के लिए शोकगीत लिख रहा हूं मेरे लिए तो यह खुशी का दिन होना चाहिए मेरे...

“मैं गुजरात आया हूँ”

न्यू इंडिया की भयावह तस्वीर देखने आया हूँ, उत्तर भारतीयों के लिए बन रहा दूसरा कश्मीर देखने आया हूँ, मैं गुजरात आया हूँ... सुना है मराठियों के बाद, गुजरातियों ने भी स्वतंत्र भारत के एक स्वतंत्र राज्य पर अपना दावा ठोंक दिया है, मैं तुम्हारी वही कथित जागीर...

एक दैत्य अथवा महान उदार द्रविड़ शासक, जिसने अपने लोगों की लुटेरे-हत्यारे आर्यो से रक्षा की

  महिषासुर ऐसे व्यक्तित्व का नाम है, जो सहज ही अपनी ओर लोगों को खींच लेता है. उन्हीं के नाम पर मैसूर नाम पड़ा है. यद्यपि कि हिंदू मिथक उन्हें दैत्य के रूप में चित्रित करते हैं, चामुंड़ी द्वारा उनकी हत्या को जायज ठहराते हैं,...

मुसहर

मामाजी वो कौन था ? गांव का था। दाल,चावल, आंटा,सब्जी, तेल मसाला और रूपए भी मामीजी ने क्यों दिए ? नेग दिए हैं भांजे । नेग क्यों ? तुम्हारे भाई की शादी है । भाई की शादी मे भीखारी को इतना नेग ? तुम नहीं समझोगे शहर मे रहते हो भांजे...

गोपालदास नीरज, जिनकी कविता में शराब से ज़्यादा नशा था

''इस द्वार क्यों न जाऊं, उस द्वार क्यों न जाऊं घर पा गया तुम्हारा मैं घर बदल-बदल के हर घाट जल पिया है, गागर बदल बदल के'' तब फ्लाईओवरों की दिल्ली अपनी प्रक्रिया में थी. साल 2008 था शायद, जब राजधानी के व्यस्त ट्रैफिक में फंसी एक...

समाज

समाज और देश धीरे-धीरे बदल ही रहा था कि अचानक मनु के रखवाले देश के रहनुमा बन गए! और देश फिर से गुलाम हो गया। छिनने लगी आजादी पहले खाने की, फिर पहनने ओढ़ने की, फिर शिक्षा की, फिर धर्म की, फिर कर्म की, फिर मूर्ति की, फिर रंग की देश मे असमानता, जातिवाद, आडम्बर, अवैज्ञानिकता, रूढ़िवाद, हिंसा,...

हुंकार

बह रहा शोणित है तेरा फिर भी तू क्यों मौन है पूछ अपने आप से मानव है तू या कौन है जाति की जठराग्नि में हिन्दुत्व के अभिमान में हवन होते हैं  दलित जीते हैं वो अपमान में संविधान का नहीं उनको कोई अब डर रहा मनुवाद के दावानल में रोहित सरोज है मर रहा और...

विकास 

शब्द किस तरह होते हैं अर्थ परिवर्तन का शिकार? अतीत से वर्तमान तक इसके अनेक उदाहरण हैं जैसे दस्यु और दास जो आदिकाल में दो जातियां थी कालान्तर में उसका अर्थ लुटेरे और गुलाम हो गया। इसी प्रकार पिछले कुछ वर्षों में विकास का भी अर्थ बदला है। विकास अब पर्याय हो गया है मुस्लिम और दलितों में भय और उत्पीड़न का। क्योंकि पिछले कुछ...

विरोधाभास

हम बड़े अजीब लोग हैं हम अधुनातन और पुरातन एक साथ हैं! हम नयी टेक्नोलॉजी के टीवी को घर में लाने में परहेज कभी नहीं करते लेकिन नयी सोच को घर में आने से हमेशा रोकते रहते हैं विज्ञान के हर नये अविष्कार को अपनाने की हमें बड़ी तत्परता रहती है लेकिन अवैज्ञानिक रिवाजों हम फिर...

किसान मार्च

पूरी पृथ्वी को बांधते हैं किसान के पांव हरियाली से पहाड़िया चढ़ते हैं उतरते हैं घाटियां एक एक कोना भर देते हैं मिट्टी का अन्न से बीजों को जगाते हैं नींद से सबका पेट भरने के लिए मगर सोए रह जाते हैं बीज उनकी आंखों के कि उनके सपनों को पोसने वाला कोई...

नफ़रत की राजनीति

ये तोड़-फोड़ की राजनीति ये नफरत की राजनीति तुम पर शोभा नहीं देती तुमने तो ठप्पा लगाया है- राष्ट्रवाद का फिर ये घिनौने, घटिया, ओछे काम क्यों? माना तुम सत्ता में आ गये हमेशा तो नहीं रहोगे कल कोई और आएगा फिर वो तोड़ेगा-फोड़ेगा तुम्हारी बनाई मूर्तियां या तुम्हारी पसंद की मूर्तियां इस तरह तो राष्ट्र का...

गैर दलित आलोचकों का असली चेहरा

जिस जाति अथवा समाज का साहित्य नहीं होता, वह जाति मृत समान ही होती है. वैसे भी हमारे देश में पहले से ही दलितों का लिखा कोई साहित्य नहीं है. वर्ण-व्यवस्था के अनुसार भारत के दलितों को पढ़ने-लिखने का कोई अधिकार ही नहीं था....

बच्चियां अब बच्ची नहीं रह गई

आज से बमुश्किल दस साल पहले तक जब लड़कियां दस-बारह साल की हो जाती थी तो उन्हें एक लड़की के तौर पर देखा जाता था. उनके कपड़े और हावभाव को समाज बतौर लड़की देखने लगता था. लेकिन इन कुछ सालों में सब कुछ बदल...
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कास्ट मैटर्स

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ओपीनियन

January 26 and Ambedkar: The Unfinished Promise of the Indian Republic

Every year on January 26, India commemorates the adoption of its Constitution with ceremonial grandeur parades, patriotic speeches, and ritual invocations of nationalism. Yet,...

राजनीति

राज ठाकरे ने खोली अदानी की पोल

मुंबई/दिल्ली। महाराष्ट्र में 29 महानगरपालिकाओं के लिए चुनाव का प्रचार जोर पकड़ चुका है। इस चुनाव में ठाकरे बंधुओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी...
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