Thursday, February 12, 2026
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बिहार में जातिवाद का गजब मामला, पूरे गांव के ब्राह्मणों पर एफआईआर

ब्राह्मण समाज के स्थानीय लोगों का तर्क है कि एफआईआर में नामजद अधिकतर ब्राह्मण दिल्ली मुंबई में मजदूरी और अपने परिवार का पेट पालन हेतु नौकरी कर रहे हैं। फिर सबको दोषी कैसे ठहराया जा सकता है। अगर यह तर्क सही है तो यहां सबसे बड़ा सवाल पुलिस की जांच पर उठता है। और अगर गांव का हर ब्राह्मण दोषी है तो यह जातिवाद का गंभीर मामला है।

दरभंगा। बिहार के दरभंगा जिले से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां एक गांव में सभी ब्राह्मणों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई है। मामला कुशेश्वरस्थान थाना क्षेत्र के हरिनगर गांव का है। गांव के 70 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज हुई है। ये सभी ब्राह्मण जाति से हैं, जिसके बाद बहस शुरू हो गई है।

FIR की कॉपी के अनुसार, हरिनगर गांव के निवासी अशर्फी पासवान ने कुशेश्वरस्थान थाने में आवेदन दिया , जिसके आधार पर यह केस हुआ है। आरोप में पांच साल पुराना मजदूरी का 2.50 लाख रुपये मांगने पर ब्राह्मण समाज द्वारा जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल और मारपीट का आरोप लगाया गया है। इस संबंध में जो वीडियो सामने आया है, उसमें ब्राह्मण समाज के लोगों द्वारा पासवान समाज के टोले पर हमला करने का वीडियो साफ दिख रहा है।

इस बारे में 30 जनवरी 2026 को एक पंचायत हुई थी। इसी दौरान हंगामा शुरू हो गया। आरोप है कि इसके दूसरे दिन 31 जनवरी की सुबह जब अशर्फी पासवान का बेटा विक्रम घर की ओर आ रहा था तो हेमंत झा, ओमप्रकाश झा आदि ने मिलकर लाठी-डंडे, लोहे की रॉड से हमला कर दिया और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया।

https://x.com/i/status/2019124998729003182

एफआईआर में पहला आरोपी हेमंत झा को बनाया गया है। और साथ में करीब 70 लोगों का नाम एफआईआर में है। तो 150 अज्ञात लोगों के नाम हैं। इस पूरे मामले में स्थानीय SDPO प्रभाकर तिवारी का कहना है कि घटना में 10 से अधिक लोग घायल हो गए थे। 12 लोगों को हिरासत में लिया गया है। पुराने विवाद में मारपीट हुई है।

हालांकि अपनी तरह की इस अनोखी घटना के सामने आने के बाद बहस छिड़ गई है। कहा जा रहा है कि गांव का पूरा ब्राह्मण समाज दोषी कैसे हो सकता है? कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ब्राह्मण समाज के स्थानीय लोगों का तर्क है कि एफआईआर में नामजद अधिकतर ब्राह्मण दिल्ली मुंबई में मजदूरी और अपने परिवार का पेट पालन हेतु नौकरी कर रहे हैं। फिर सबको दोषी कैसे ठहराया जा सकता है।

अगर यह तर्क सही है तो यहां सबसे बड़ा सवाल पुलिस की जांच पर उठता है कि जब एफआईआर में दर्ज नाम वाले ब्राह्मण समाज के लोग दिल्ली और मुंबई में नौकरी करते हैं तो आखिर उनके नाम एफआईआर में क्यों है? और अगर गांव का हर ब्राह्मण दोषी है तो यह जातिवाद का गंभीर मामला है। क्योंकि वैसे भी पहले दलितों को बंधुआ मजदूर बनाकर रखना, फिर बाद के दिनों में उनसे बेगारी करने का एक लंबा इतिहास तो मिलता ही है।

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