जान लीजिए, गठबंधन क्यों नहीं करना चाहती हैं बहनजी?

बसपा सुप्रीमों मायावती ने 15 जनवरी को अपने जन्मदिन पर ऐलान किया कि वह फिलहाल चुनावी गठबंधन नहीं करेंगी। 2023 में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनावों में वह किसी भी दल से किसी भी तरह का कोई गठबंधन नहीं करेंगी। 2024 के लोकसभा चुनावों पर भी बहनजी ने रुख साफ कर दिया है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि आखिर जब सभी दल गठबंधन को तव्वजो दे रहे हैं और फिलहाल देश के सबसे मजबूत राजनीतिक दल भाजपा भी मजबूत स्थिति में होने के बावजूद विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव तक में गठबंधन करने को तैयार रहती है, बसपा सुप्रीमों मायावती को गठबंधन से इंकार क्यों है?

लेकिन पहले बात बहनजी की इस घोषणा के बाद मनुवादी मीडिया के दुष्प्रचार की। बहनजी के गठबंधन न करने की घोषणा के बाद मनुवादी मीडिया यह कह रही है कि चूंकि बसपा बहुत कमजोर स्थिति में है और उसके पास बार्गेनिंग पावर नहीं है, इसलिए वह गठबंधन से इंकार कर रही है। साफ है कि यह मजह एक सतही और तुरंत किया गया आंकलन है। क्योंकि बसपा के बारे में ऐसा दुष्प्रचार कर मनुवादी मीडिया उसे शुरुआत में ही लड़ाई से बाहर दिखाने में जुटी रहती है। लेकिन जिस बसपा को तमाम मुश्किलों और सपा और भाजपा की सीधी लड़ाई के बावजूद यूपी में एक करोड़ 18 लाख, 73 हजार 137 वोट मिले थे, वह लड़ाई से बाहर कैसे हो सकती है? अपने सबसे मुश्किल वक्त में भी एक करोड़ का जनाधार रखने वाली पार्टी को कमजोर ठहराना सीधे तौर पर मीडिया की चाल है।

 साल 2020 के यूपी विधानसभा चुनाव का हवाला देकर हाथी की चाहे जितनी हवा निकालने की कोशिश की जाए, एक बात साफ हो गई है कि भाजपा से सीधी लड़ाई, मुस्लिमों के ध्रुवीकरण और तमाम दलों से गठबंधन के बावजूद समाजवादी पार्टी भाजपा को हरा नहीं पाई। यानी कि जिस पिछड़े वोटों को समाजवादी पार्टी अपना बताती है, वही उसके साथ पूरी तरह नहीं आया। यानी साफ है कि मुस्लिमों को अगर भाजपा को रोकना है तो सिर्फ बसपा ही ऐसा कर सकती है। क्योंकि बसपा के कैडर दलित वोट बैंक हर परिस्थिति में बसपा के साथ रहते हैं और मुस्लिम वोटों के इसमें जुड़ते ही एक पल में करिश्मा हो सकता है।

यूपी में यह स्थिति दिख भी रही है। यहां मुस्लिम समाज का रुझान अब बसपा की तरफ दिखने लगा है तो बसपा भी मुस्लिम समाज को अपने साथ जोड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। तीन महीने पहले वेस्ट यूपी के प्रमुख मुस्लिम चेहरे इमरान मसूद ने जब समाजवादी पार्टी को छोड़कर बहुजन समाज पार्टी का दामन थामा था, उसने अचानक से प्रदेश का सियासी पारा बढ़ा दिया। और अब संभल से सपा के सांसद डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क ने जिस तरह बहनजी की तारीफ की है, उसके भी सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। यह कब समीकरण बदल दे, कोई नहीं जानता।

कुल मिलाकर यह बात दर्ज हो चुकी है कि बसपा चाहे जिससे गठबंधन कर ले, उसका फायदा बसपा को नहीं मिलता है। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के बाद बसपा 10 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही तो इसके पीछे दलित-मुस्लिम गठबंधन का जादू था। क्योंकि चाहे सवर्ण समाज का प्रत्याशी हो या फिर मजबूत पिछड़े समाज का प्रत्याशी इन दोनों समाज के मतदाता बसपा को वोट देने से परहेज करते हैं। हां, अति पिछड़ा समाज जरूर लंबे वक्त तक बसपा के साथ खड़ा रहा है। इन समीकरणों को बहनजी खूब समझती हैं, यही वजह है कि वह गठबंधन को लेकर किसी भी जल्दबाजी में नहीं हैं। बाकी सियासत है, वक्त और जरूरत के हिसाब से नेताओं के बयान बदलते रहते हैं।

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