सरकारी कर्मचारी से जूते पहनते कैमरे में कैद हुए योगी के मंत्री

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लखनऊ। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर उत्तर प्रदेश के मंत्री लक्ष्मी नारायण एक सरकारी कर्मचारी से जूते पहनते हुए कैमरे में कैद हो गए. यूपी के शाहजहांपुर में शुक्रवार को योग दिवस पर आयोजित एक समारोह का एक वीडियो न्यूज एजेंसी एएनआई ने जारी किया है. वीडियो में लक्ष्मी नारायण को एक सरकारी कर्मचारी द्वारा जूते पहनाते हुए साफ देखा जा सकता है. जो कर्मचारी मंत्री को जूते पहना रहा है, वह शख्स भी स्पॉर्ट्स ड्रेस पहने हुए है. वहीं मंत्री ने पास में खड़े दो लोगों के हाथ पकड़ रखे हैं और सरकारी कर्मचारी उन्हें जूते पहना रहा है.

वीडियो सामने आने के बाद मंत्री लक्ष्मी नारायण ने कहा, ‘अगर कोई भैया, भतीजा या परिवार का सदस्य हमें जूते पहना दे तो ये तो हमारा वो देश है, जहां भगवान राम के खड़ाऊ रख कर भरतजी ने 14 साल राज किया था. आपको तो इस बात की तारीफ करनी चाहिए.’

बता दें, उत्तर प्रदेश में शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया. मुख्य कार्यक्रम राजधानी स्थित राजभवन में हुआ, जिसमें राज्यपाल राम नाईक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शामिल हुए. पांचवे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर राजभवन प्रांगण में उत्तर प्रदेश के आयुष विभाग द्वारा आयोजित योगाभ्यास कार्यक्रम में राज्यपाल नाईक, मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, आयुष राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्म सिंह सैनी, मंत्रिमण्डल के सदस्यगण, महापौर संयुक्ता भाटिया, मुख्य सचिव अनूप चन्द्र पाण्डेय, पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह सहित बड़ी संख्या में योग साधकों ने योगाभ्यास किया.

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तीन तलाक पर ओवैसी का सवाल

केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक से निजात दिलाने के लिए तीन तलाक बिल को शुक्रवार को लोकसभा के पटल पर रखा. इसके बाद सदन में कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने हंगामा शुरू कर दिया. तीन तलाक बिल का विरोध करते हुए हैदराबाद से सांसद और AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि यह संविधान विरोधी व आर्टिकल 14 और 15 का उल्लंघन है. मोदी सरकार को मुस्लिम महिलाओं से हमदर्दी है तो केरल की हिंदू महिलाओं से मोहब्बत क्यों नहीं? आखिर सबरीमाला पर आपका रुख क्या है?

सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने तीन तलाक विधेयक पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि अगर किसी गैर मुस्लिम को केस में डाला जाए तो उसे 1 साल की सजा और मुसलमान को 3 साल की सजा. क्या यह आर्टिकल 14 और 15 का उल्लंघन नहीं है? इस बिल से सिर्फ मुस्लिम पुरुषों को सजा मिलेगी. आप मुस्लिम महिलाओं के हित में नहीं हैं बल्कि आप उन पर बोझ डाल रहे हैं.

ओवैसी ने कहा कि तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ है कि अगर कोई शख्स एक समय में तीन तलाक देता है तो शादी नहीं टूटेगी. ऐसे में बिल में जो प्रवाधान है, उससे पति जेल चला जाएगा और उसे 3 साल जेल में रहना होगा. ऐसे में मुस्लिम महिला को गुजारा-भत्ता कौन देगा? आप (सरकार) देंगे?

ओवैसी ने कहा कि आपको मुस्लिम महिलाओं से इतनी मोहब्बत है. केरल की हिंदू महिलाओं से मोहब्बत क्यों नहीं है. क्यों आप सबरीमाला के फैसले के खिलाफ हैं? यह गलत हो रहा है.

असदुद्दीन ओवैसी ने आजतक से बातचीत करते हुए कहा कि इस बिल से कोई फायदा नहीं होगा बल्कि मुस्लिम महिलाओं को नुकसान होगा. यह विधेयक पहले तो हमारे संविधान के मूल अधिकारों के खिलाफ है. ओवैसी ने कहा कि अगर आप कोई कानून बना रहे हैं तो उसके तहत रीजनेबल क्लासिफिकेशन होनी चाहिए. मौजूदा समय में दूसरे कई कानून हैं जिसमें घरेलू हिंसा कानून जो की काफी पॉवरफुल है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, जिसमें तीन तलाक को रद्द कर दिया गया. ऐसे में अगर कोई तलाक देता है तो शादी नहीं टूटेगी. ऐसे आप उसका अपराधीकरण कर रहे हैं.

ओवैसी ने कहा कि अगर कोई गैर मुस्लिम अपनी पत्नी को छोड़ता है तो उसे 1 साल की सजा और मुस्लिम को 3 साल की सजा, जो सामान अधिकार के खिलाफ है. आपको बहुमत मिला है तो संविधान के खिलाफ कानून थोड़े बना देंगे. यह मेरा अधिकार है कि सरकार कोई बिल लाती है और मुझे लगता है कि यह सही नहीं है तो हम विरोध कर सकते हैं.

ओवैसी से पहले कांग्रेस नेता शशि थरूर ने सदन में कहा कि मैं इस बिल के पेश किए जाने का विरोध करता हूं. उन्होंने कहा कि मैं तीन तलाक का समर्थन नहीं करता, लेकिन इस बिल के विरोध में हूं. थरूर ने कहा, यह बिल संविधान के खिलाफ है, इसमें सिविल और क्रिमिनल कानून को मिला दिया गया है.

उन्होंने कहा कि अगर सरकार की नजर में तलाक देकर पत्नी को छोड़ देना गुनाह है, तो ये सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक ही सीमित क्यों है. उन्होंने कहा कि क्यों न इस कानून को सभी समुदाय के लिए लागू किया जाना चाहिए. कांग्रेस की ओर से कहा गया कि सरकार इस बिल के जरिए मुस्लिम महिलाओं को फायदा नहीं पहुंचा रही है बल्कि सिर्फ मुस्लिम पुरुषों को ही सजा दी रही है.

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कांग्रेस के लिए सबक की लिखी-लिखाई स्क्रिप्ट हैं जगन मोहन रेड्डी

बार-बार जीतने वाले को ‘नरेंद्र’ कहते हैं, तो हारकर जीतने वाले को ‘जगन’ कहते हैं.

जी हां, जगन मोहन रेड्डी आंध्र प्रदेश के नए मुख्यमंत्री हैं. चुनाव 2019 में जगन के ‘पंखे’ ने हवा नहीं, वो आंधी बरसाई, जिसमें चंद्रबाबू नायडू और कांग्रेस पार्टी सूखे पत्तों की तरह उड़ गए. जगन की पार्टी YSRCP ने विधानसभा की 175 में से 151 और लोकसभा की 25 में से 22 सीटें जीतकर इतिहास बना दिया.

कहा जा रहा है कि करारी हार के कारणों पर कसरत कर रही कांग्रेस पार्टी को फिर कोई ‘एंटनी कमेटी’ बनाने के बजाए जगन मोहन से सीखना चाहिए. जगन का पिछले 10 साल का सफर कांग्रेस के लिए सबक की लिखी-लिखाई स्क्रिप्ट है. जगन ने पदयात्रा को अपना हथियार बनाया. हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा से उन्होंने सूबे का चप्पा-चप्पा छान मारा और लोगों के दिलो-दिमाग पर छा गए.

जगन का सियासी सफर सितंबर 2009. आंध्र प्रदेश के कुरनूल में नल्लामल्ला की पहाड़ियों के ऊपर से गुजरता एक हेलिकॉप्टर अचानक गायब हो गया. अगले दिन उस हेलिकॉप्टर के टुकड़े जंगल में मिले. क्रैश हुए उसी हेलिकॉप्टर में थे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और जगन मोहन रेड्डी के पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी. वाइएसआर की लोकप्रियता का आलम ये था कि उनकी मौत पर कई लोगों ने खुदकुशी तक कर ली. जगन ने ऐसे लोगों से घर-घर जाकर मिलने के लिए यात्रा शुरू की. इस यात्रा को नाम दिया गया ‘ओदारपू’. ‘ओदारपू’ का हिंदी में मतलब है ‘शोक’ और अंग्रेजी में ‘Condolence’.

वाईएसआर उस वक्त आंध्र प्रदेश के सीएम और साउथ की सियासत के हीरो थे, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी को दरकिनार कर दिया. पहले के. रोसैया को सीएम बनाया और उनसे पार्टी नहीं संभली, तो साल 2010 में किरण कुमार रेड्डी को सीएम बना दिया. हालांकि कांग्रेस को इसकी कीमत सत्ता गंवाकर चुकानी पड़ी. इस वक्त तक जगन और कांग्रेस पार्टी के बीच का तनाव अपनी हदें पार कर चुका था.

चुनी कांग्रेस से अलग राह

29 नवंबर 2010 को जगन कांग्रेस से अलग हो गए. उस वक्त वो कांग्रेस के लोकसभा सांसद थे. उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया. उनकी मां वाई विजयलक्ष्मी ने भी पुलिवेंदुला विधायक पद से इस्तीफा दे दिया. मार्च 2011 में जगन ने पहले से बनी YSR कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व संभाल लिया. 2011 के उपचुनाव में कडप्पा से पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ा और रिकॉर्ड 543,053 वोट से जीते.

उन दिनों रेड्डी एक कामयाब बिजनेसमैन थे. लेकिन उन पर कानूनी शिकंजा कसा जाने लगा. आय से अधिक संपत्ति के मामले दर्ज हुए और जगन ने 18 महीने जेल में काटे. सत्ता ने तो पिता की विरासत नहीं सौंपी, लेकिन जनता का फैसला अभी बाकी था. 2014 के चुनाव में तो वो चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी पर पार नहीं पा सके. लेकिन इसके बाद जनता-जनार्दन का आशीर्वाद लेने के लिए जगन ने पूरे आंध्र प्रदेश को पैदल नाप डाला. करीब 3,600 किलोमीटर की पदयात्रा की और लोग उनमें उनके पिता वाइएसआर रेड्डी की छवि ढूंढने लगे. इसके बाद साल 2019 के चुनाव ने सियासत के पन्नों पर नतीजों की वो इबारत लिखी कि जगन मोहन रेड्डी एक हीरो बनकर उभरे. 46 साल के जगन मोहन रेड्डी ने आंध्र प्रदेश में कमाल कर डाला. हालांकि प्रचंड जीत मिलने के बाद भी उनके पैर जमीन पर हैं. उन्होंने आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया तो हैदराबाद जाकर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव से भी मिले और उन्हें आमंत्रित किया.

कांग्रेस के लिए सबक चुनाव 2014, कांग्रेस पार्टी का सबसे खराब चुनाव था. 139 साल पुरानी पार्टी लोकसभा में महज 44 सीटों पर सिमट गई. इसके बाद पार्टी ने सड़क पर जान झोंकने की बजाए एक कमेटी बनाई- ‘एंटनी कमेटी’. कुछ महीनों की मशक्कत के बाद कमेटी ने कुछ वजहें बताईं. पार्टी ने उन वजहों पर काम किया, लेकिन पांच साल बाद नतीजा वही- निल बटे सन्नाटा. सीटों की संख्या 44 से बढ़कर बामुश्किल पहुंची 52 पर.

कांग्रेस पार्टी को जगन से सबक लेते हुए आम लोगों से सीधे संवाद का अभियान शुरू करना चाहिए. चुनाव नतीजों के आइने में उभरी अपनी धुंधली छवि के मद्देनजर कांग्रेस पार्टी को समझना होगा कि रैलियों में गूंजते ‘चौकदार चोर है’ के नारे और रोड-शो में उमड़ी भीड़ का शोर मृगतृष्णा के सिवा कुछ नहीं था.

साभारः द क्विंट से

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राजनीति को समाज की चिंता क्यों नहीं

लोक सभा चुनाव के बाद श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने फिर सरकार बना ली है. यह चुनाव भाजपा की भारी जीत के साथ- साथ बेहद महंगे चुनाव अभियान के कारण भी चर्चा में रहा. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि चुनाव खर्च कम कर देश के नागरिकों की मूलभूत आश्यकताओं के लिए बजट बढ़ाया जाए, ताकि उनका जीवन स्तर सुधरे? क्या जल संकट, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा की उपलब्धता और गुणवत्ता में सुधार करना सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है? दूसरी चिंताजनक खबर हजारों ईवीएम मशीनों के गायब होने की है. जो निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाती है.

जहां तक सामाजिक सौहार्द का प्रश्न है चुनाव परिणाम आने के एक दिन पूर्व 22 मई को सोशल मीडिया पर डॉ. पायल तडवी की आत्महत्या का मामला प्रकाश में आया. मुंबई के एक अस्पताल में एमडी कर रही 26 वर्षीय पायल को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने वालों में सीनियर महिला डाक्टरों के नाम प्रकाश में आए हैं. अल्का वर्मा की पोस्ट के मुताबिक ये नाम हैं डॉ. हेमा आहूजा, डॉ. भक्ति और डॉ. अंकिता खण्डेलवाल. इन्होंने पायल के लिए व्हाटसअप पर लिखा था ‘तुम आदिवासी लोग जंगली होते हो, तुमको अक्ल नहीं होती … तू आरक्षण के कारण यहां आई है, तेरी औकात है क्या, हम ब्राह्मणों से बराबरी करने की?.. तुम किसी भी मरीज को हाथ मत लगाया कर मरीज अपवित्र हो जाएंगे, तू आदिवासी नीच जाति की लड़की मरीजों को भी अपवित्र कर देगी ….”

यह आत्महत्या हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला और मुथू कृष्णन, सर्वानन जैसों की याद दिलाता है. जतिघृणा के हमलावर जाति सूचक शब्दावाण सीधे सीने पर लग रहे हैं. एक वीडियो बीच चुनाव आया, जिसमें एक युवती अपने सहकर्मियों के बीच बैठी चमार जाति के लोगों को गालियां दे रही है. वो कहती है “यार साला चमार पैदा होना चाहिए था गवर्मेंट जॉब तो मिल जाती एटलिस्ट. चमारों को सिर पर बिठा लिया जनरल वालों को नीचे कर दिया. चमार चमार होते हैं, उनकी कोई औकात नहीं होती है.”

जब यह वीडियो वायरल हुआ तो भारी प्रतिक्रिया हुई. एससी एसटी मुकदमा दायर किया गया. मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने ट्विट किया ‘यह कौन बुरी औरत बोल रही है? क्या इसे अभी गिरफ्तार नहीं किया क्या?

जब चारो ओर से दबाव बढ़ा तो वह महिला फिर से सामने आई. डॉ. अम्बेडकर, गांधी और शहीद भगतसिंह के चित्रों के सामने बैठ कर बोली मैं और मेरे साथी एससी/एसटी और ओबीसी से ताल्लुक रखते हैं इसलिए मुझे माफ कर दिया जाए.

हाल ही में बदायूं से राधेश्याम जी का फोन आया बोले- ‘बेचैन जी एक समस्या आ गई है. पुत्रवधू सिविल की तैयारी के लिए आपकी यूनिवर्सिटी के पास कोचिंग ले रही है. वहां गैरकौम की लड़कियां उसे परेशान कर रही हैं. वे उसके बाथरुम में स्कैच से लिख देती हैं कि ‘यह तो चमारी है. बहू ने फोटो खींच कर भेजा है. मैंने कहा मेरे पास भिजवा दो. मैंने एक वकील से बात की तो उसने कहा इसे तो एससी/एसटी एक्ट में केस दर्ज करा दो. क्या हमें भूल जाना चाहिए कि झारखण्ड के सिमडेगा जिले की 11 वर्षीय संतोष की मौत भूख के कारण हुई थी. उसने भात मांगते-मांगते दम तोड़ा था. राजनेताओं के अंधाधुंध खर्चे स्वतंत्रता सेनानियों की सादगी की परवाह नहीं कर रहे.

दलित उत्पीड़न की घटनाएं सामाजिक सौहार्द समाप्त कर रही हैं. ताजा वाकया राजस्थान के अलवर जिले का है. जहां एक युवक के सामने ही उसकी पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया. ऐसे अत्याचार तो अमेरिकी अफ्रीकी गोरे भी अश्वेत दासों के साथ नहीं करते थे. बल्कि कालांतर में पचास फीसद गोरे ही कालों की गुलामी के विरोध में खड़े हो गए और दासप्रथा को समाप्त कर दिया. दलितों के प्रति सवर्ण हिन्दुओं की बढ़ती जाति अनुदारता काबिले फिक्र होती जा रही हैं. यह संविधान प्रदत्त लोकतांत्रिक कायदे कानून को धता बता कर जातिभेदी परंपराओं से संचालित हो रही हैं. अब इससे बड़ी क्रूरता और क्या होगी कि ऊंची जाति के लोगों के सामने खाना खाने पर दलित को पीट कर मार डाला गया.’ देहरादून से आई खबर ने जाति मानस का कैसा खुलासा किया?

27 साल का यह दलित युवक अपने रिश्तेदार की शादी में गया था. वहां सवर्ण खाना खा रहे थे. पास ही कुर्सी पर बैठ कर वह दलित भी खाना खाने लगा. इसे एक सवर्ण ने दलित द्वारा बराबरी करना माना उसने दलित को जाति सूचक गालियां देते हुए तुरंत कुर्सी से नीचे उतरने के लिए कहा. उतरने में बिलम्ब देख कर दलित पर हमला कर दिया. उस समय उपस्थित लोगों ने उसे बचा दिया परन्तु जब वह वापस अपने घर लौटा तो उसे रास्ते में घेर कर मारा पीटा जिससे उसे गम्भीर चोटें आईं और अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. यह घटना बताती है कि भारतीय समाज में जाति अनुदारता अमानवीय हद तक उग्र हो चुकी है. भारत में अस्पृश्यता अमरीका अफ्रीका की गुलाम प्रथा से अधिक अमानवीय है.

हमारे देश को आजाद हुए सात दशक से अधिक हो गया, पर दलित दमन और बढ़ गया. अस्पृश्यता रूप बदल कर आज भी जारी है. हम उन देशों से भी प्रेरणा नहीं लेते, जिन्होंने जातिभेद की तरह नस्लभेद और रंगभेद को समाप्त कर दिया. हमारे यहां संविधान सम्मत व्यवहार नहीं हो रहा. जबकि आवश्यकता इस बात की है कि लोगों की सामाजिक शिक्षा सकारात्मक और संविधान सम्मत हो. छात्रों को संविधान की मूलभूत शिक्षा अवश्य पढ़ाई जानी चाहिए. समता भाव जगाने वाली फिल्मों, कविताओं, कहानियों, चित्रकला, गीत, संगीत, नृत्य आदि को विशेष प्रोत्साहन देना चाहिए. दलित आदिवासियों के साहित्य इस दिशा में काफी सहायक सिद्ध हो सकते हैं.

अध्ययन बताता है कि दास प्रथा केवल दासों के प्रयासों से समाप्त नहीं हुई. उसमें स्वामी वर्ग का भी योगदान था. दरअसल गोरे स्वामियों का एक बड़ा हिस्सा दास प्रथा के विरोध में खड़ा हो गया था. पचास फीसदी गोरे लोग कालों की गुलामी के विरोध में खड़े हो गए और दास प्रथा को उन्होंने समाप्त कर दिया. यही नहीं, अमेरिका ने उसके बाद कला, मीडिया, उद्योग, शिक्षा, साहित्य जैसे सभी क्षेत्रों में अफर्मेटिव एक्शन के तहत दलितों की भागीदारी सुनिश्चित कर और काम करने के अवसर देकर अपने देश को महाशक्ति बना दिया.

दूसरी ओर, हमारे देश में दलितों और आदिवासियों को सेवाओं से बाहर रखने के लिए ही नए-नए तरीके अपनाए गए, जिससे देश को उनकी सेवाओं का लाभ नहीं मिल सकता. हमारे नेता केवल राजनीति में ही रुचि लेते हैं, समाज सुधार की चिंता उन्हें नहीं होती. चूंकि समाज में, साहित्य में, शिक्षा में उच्च मानवीय आदर्श नहीं हैं, इसलिए ऐसे वर्णभेदी समाज से निकला नेता भी लोकतांत्रित समता भाव का विकास नहीं करना चाहता, वह समाज में मौजूद भेदभाव का केवल राजनीतिक लाभ लेना चाहता है.

  • श्यौराज सिंह बेचैन
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Most AES Victims in Bihar Are Dalits, EBCs and Muslims

Muzaffarpur। Chedi Manjhi, Ravinder Manjhi, Raj Kishor Ram, Haran Paswan, Anup Manjhi, all are Dalits. They have one more thing in common—all of them are fathers of children who have died due to AES in Bihar’s Muzaffarpur in the last fortnight.

Chedi Manjhi’s eight-year-old son Aditya Kumar reportedly died due to AES in the state-run Sri Krishna Medical College and Hospital (SKMCH) in Muzaffarpur. “My son died after suffering from Chamki bukhar [local name for AES] in the first week of June. We are poor, fighting to earn our daily bread, but God is killing our children. I am not alone; there are many like me in different Dalit hamlets,” said Chedi Manjhi, a resident of Dih Jiwar.

“Chamki bukhar is a curse for poor people like us, who are working hard to earn our livelihood. Our children are dying year after year, but there is no serious move to control it,” said Paswan, a resident of Ahiyapur in Muzaffarpur.

Paswan’s 10-year-old son Vikram Kumar died after he was admitted for treatment in SKMCH.

Several Dalits including Jogendar Ram of Sariya in Muzaffarpur, Shankar Ram of Sheogar district, Raj Kumar Manjhi of Bochahan in Muzaffarpur, and Ranjeet Ram of Maniyari in Muzaffarpur have lost their children due to AES in the last two weeks.

More than over two decades after AES first struck Muzaffarpur as an epidemic, the disease not only persists but also continues to spread among the poorer sections. Estimates say that more than 75% of the victims belong to the socially marginalised section – comprising mostly Dalits along with Extremely Backward Classes (EBC) and Muslims. There is hardly any case in which the AES-affected child belongs to a rich and well-off family.

This disease is estimated to have killed more than 400 children in last seven to eight years, while the number stands at 113 this month.

“If we look at the list of the names of victims of AES prepared by SKMCH, their surnames are like Manjhi, Ram and Paswan. Besides, there are victims whose fathers carry surnames like Sahni, Mahto and Yadav; all are either from backward castes or are poor Muslims,” a senior official of Muzaffarpur health department said. (The list of the names of the victims is also in possession of NewsClick.)

According to health officials in Muzaffarpur, AES cases are mostly coming from Mushahar, Ravidas and Paswan communities due to “their poor living conditions”.

Ranjeev, an environmentalist, said that Dalit children are malnourished and are more prone to consumption of contaminated water, which makes them an easy target of AES.

Doctors and experts, who have investigated to find the cause of deaths of children from AES, point to malnutrition as one of the main factors behind children’s vulnerability to the disease. This was iterated by the latest National Family Health Survey (NHFS 2015-16) that pointed out high rates of malnutrition among children under five years of age in Bihar.

Health officials, who have been closely monitoring AES for several years, said malnutrition among Dalit children is common due to prevalence of poverty.

After Chief Minister Nitish Kumar visited Muzaffarpur on Tuesday, the government has commissioned a survey in blocks or villages where death toll reported is high. The survey will study socio-economic profiles of people, particularly affected families and the environment they live in.

“For the first time, such a survey will be conducted. This would help in understanding ground reality,” another health official told NewsClick.

Principal secretary, Health Department, Sanjay Kumar said that of the 113 deaths, 91have died in the state-run Sri Krishna Medical College and Hospital (SKMCH), 16 in private Kejriwal Hospital in Muzaffarpur, two in Nakanda Medical College and Hospital in Patna, and four in other districts.

Doctors and health officials have different views on the reason behind AES and cause of the deaths. It has further complicated the process to combat or control the seasonal outbreak of AES. The central and state governments have failed in saving the children in the affected areas of North Bihar, where it has become an annual epidemic year after year.

Chief Secretary Deepak Kumar publicly admitted that even the government is unclear about what exactly was causing the AES outbreak, which has been recorded in Muzaffarpur since 1995.”We are still not aware if the disease is caused due to some virus, bacteria, toxin effect or due to consumption of litchi, malnourishment or due to environmental conditions such as high temperature and humidity. Several researches have been done, including by a team of experts from the Centre for Disease Control, Atlanta, but the finding is inconclusive,” said Kumar.

Courtesy:News Click

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Most AES Victims in Bihar Are Dalits, EBCs and Muslims

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Muzaffarpur। Chedi Manjhi, Ravinder Manjhi, Raj Kishor Ram, Haran Paswan, Anup Manjhi, all are Dalits. They have one more thing in common—all of them are fathers of children who have died due to AES in Bihar’s Muzaffarpur in the last fortnight.

Chedi Manjhi’s eight-year-old son Aditya Kumar reportedly died due to AES in the state-run Sri Krishna Medical College and Hospital (SKMCH) in Muzaffarpur. “My son died after suffering from Chamki bukhar [local name for AES] in the first week of June. We are poor, fighting to earn our daily bread, but God is killing our children. I am not alone; there are many like me in different Dalit hamlets,” said Chedi Manjhi, a resident of Dih Jiwar.

“Chamki bukhar is a curse for poor people like us, who are working hard to earn our livelihood. Our children are dying year after year, but there is no serious move to control it,” said Paswan, a resident of Ahiyapur in Muzaffarpur.

Paswan’s 10-year-old son Vikram Kumar died after he was admitted for treatment in SKMCH.

Several Dalits including Jogendar Ram of Sariya in Muzaffarpur, Shankar Ram of Sheogar district, Raj Kumar Manjhi of Bochahan in Muzaffarpur, and Ranjeet Ram of Maniyari in Muzaffarpur have lost their children due to AES in the last two weeks.

More than over two decades after AES first struck Muzaffarpur as an epidemic, the disease not only persists but also continues to spread among the poorer sections. Estimates say that more than 75% of the victims belong to the socially marginalised section – comprising mostly Dalits along with Extremely Backward Classes (EBC) and Muslims. There is hardly any case in which the AES-affected child belongs to a rich and well-off family.

This disease is estimated to have killed more than 400 children in last seven to eight years, while the number stands at 113 this month.

“If we look at the list of the names of victims of AES prepared by SKMCH, their surnames are like Manjhi, Ram and Paswan. Besides, there are victims whose fathers carry surnames like Sahni, Mahto and Yadav; all are either from backward castes or are poor Muslims,” a senior official of Muzaffarpur health department said. (The list of the names of the victims is also in possession of NewsClick.)

According to health officials in Muzaffarpur, AES cases are mostly coming from Mushahar, Ravidas and Paswan communities due to “their poor living conditions”.

Ranjeev, an environmentalist, said that Dalit children are malnourished and are more prone to consumption of contaminated water, which makes them an easy target of AES.

Doctors and experts, who have investigated to find the cause of deaths of children from AES, point to malnutrition as one of the main factors behind children’s vulnerability to the disease. This was iterated by the latest National Family Health Survey (NHFS 2015-16) that pointed out high rates of malnutrition among children under five years of age in Bihar.

Health officials, who have been closely monitoring AES for several years, said malnutrition among Dalit children is common due to prevalence of poverty.

After Chief Minister Nitish Kumar visited Muzaffarpur on Tuesday, the government has commissioned a survey in blocks or villages where death toll reported is high. The survey will study socio-economic profiles of people, particularly affected families and the environment they live in.

“For the first time, such a survey will be conducted. This would help in understanding ground reality,” another health official told NewsClick.

Principal secretary, Health Department, Sanjay Kumar said that of the 113 deaths, 91have died in the state-run Sri Krishna Medical College and Hospital (SKMCH), 16 in private Kejriwal Hospital in Muzaffarpur, two in Nakanda Medical College and Hospital in Patna, and four in other districts.

Doctors and health officials have different views on the reason behind AES and cause of the deaths. It has further complicated the process to combat or control the seasonal outbreak of AES. The central and state governments have failed in saving the children in the affected areas of North Bihar, where it has become an annual epidemic year after year.

Chief Secretary Deepak Kumar publicly admitted that even the government is unclear about what exactly was causing the AES outbreak, which has been recorded in Muzaffarpur since 1995.”We are still not aware if the disease is caused due to some virus, bacteria, toxin effect or due to consumption of litchi, malnourishment or due to environmental conditions such as high temperature and humidity. Several researches have been done, including by a team of experts from the Centre for Disease Control, Atlanta, but the finding is inconclusive,” said Kumar.

Courtesy:News Click

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स्कूली शिक्षा के राष्ट्रीयकरण के बिना नई शिक्षा नीति अधूूरी

नई शिक्षा नीति में “राष्ट्रीय समग्र विकास संघ” द्वारा सुझाये गए कई समतामूलक उपायों को सम्मलित करना स्वागत योग्य कदम है. जैसे यूनिफॉर्म शिक्षा हेतु त्रिभाषा फार्मूला तथा गणित, विज्ञान और सामाजिक विषयों की जानकारी प्राथमिक स्तर से सभी बच्चों को देना नई सरकार शिक्षा नीति में शामिल किया गया है. नर्सरी कक्षा से उच्चतर माध्यमिक कक्षा तक यानी 18 साल तक के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देना नई शिक्षा नीति की प्राथमिकता दर्शाई गई है. वर्तमान सरकार से नई शिक्षा नीति में आंशिक परिवर्तन करने हेतु ‘राष्ट्रीय समग्र विकास संघ’ अपील करना चाहता है कि नई शिक्षा नीति अच्छी होने के बावजूद भी “स्कूली शिक्षा के राष्ट्रीयकरण के बिना अधूरी है.” प्राइवेट स्कूलों में महंगी शिक्षा होने के कारण 60% अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लाभ से वंचित रह जाएंगे. जिसके कारण नई शिक्षा नीति के अच्छे परिणाम आनेेे की जगह अमीर और गरीब की एक बड़ी खाई उपस्थित हो जाएगी. जिससे गरीब के बच्चे निम्न श्रेणी की नौकरियों में तथा अमीरों के बच्चे कंपनियों और बड़ी नौकरियों के मालिक बन जाएंगे.

उपरोक्त बिंदुओं पर चिंता व्यक्त करते हुए “राष्ट्रीय समग्र विकास संघ” ने गत वर्षो में सेमिनार और अपने प्रपत्रों के माध्यम से सरकार से अपील की गई है. नई शिक्षा नीति को समग्र भारत की शिक्षा नीति के रूप में प्रस्तुत किया जाए. इस लेख के अग्र भाग में आवश्यक बिंदुओं को शामिल करने हेतु संघ ने सरकार से आग्रह किया था जिसका विवरण प्रस्तुत है.

आज सबको चाहिए शिक्षा और शिक्षित होने पर चाहिए सबको सरकारी नौकरी या समुचित रोजगार. परन्तु सरकार ने सरकारी नौकरियों के अवसर बहुत ही सीमित कर दिए हैं. चौथे पे-कमीशन की रिपोर्ट के बाद हर साल रिटायर होने वाले पदों में 5 प्रतिशत की कटौती कर दी जाती है. चतुर्थ श्रेणी के पदों को समाप्त प्रायः कर दिया है, तृतीय श्रेणी के पदों में भी भारी कटौती की गई है, इसके बाबजूद डायरेक्टर एवं उसके ऊपर के पदों को बढ़ाया गया है. इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए यह कटौती जरुरी थी. लेकिन साथ ही लोग यह भी कहते हैं की सरकारी कर्मचारी निकम्मे हैं जो काम नहीं करते हैं, तो उनका काम आउटसोर्स से कराया जा सकता है तथा काम की गुणवत्ता भी सुधारी जा सकती है. आज बड़ी संख्या में नौकरी के अधिकतर पद रिक्त पड़े हैं, फिर भी डेली वेज और कंसल्टेंट के माध्यम से सरकार का काम चलाया जा रहा है. समस्या तो जटिल है, सरकार का खजाना और कर्मचारियों की अकर्मण्यता का बहाना बना कर सरकारी नौकरियों के अवसर कम कर दिए हैं.

ओबीसी और अनुसूचित जातियों के उत्थान का युग (1989-2001)

1984 में कांशीराम द्वारा शुरू की बहुजन समाज पार्टी (बसपा), दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य पिछड़े वर्गों के गठजोड़ को बनाने के लक्ष्य में पूरी तरह से कामयाब थी. 1990 में मंडल आयोग को लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश राज्य का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल गया. 1993 में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के गठबंधन को राज्य विधानसभा में भारी चुनावी सफलता मिली जिसमें ऊंची जातियों के विधायकों की तुलना में ओबीसी विधायक अपेक्षाकृत अधिक संख्या में निर्वाचित हुए यह अब तक के इतिहास का एक रिकार्ड था. इसके बाद प्रदेश में चाहे जिसकी भी सत्ता रही हो पर ओबीसी विधायकों की संख्या का स्तर हमेशा ऊँचा बना रहा. 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद से सत्ता में पिछड़े वर्गो की हिस्सेदारी का युग शुरू हुआ. 1993 में सपा और बसपा ने मिलकर उत्तर प्रदेश की राज्य विधानसभा में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के विधायकों की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक थी जिसने नए राजनीतिक नेताओं के बनाने की शुरूआत करने में मुख्य भूमिका अदा की. 1993 के चुनाव में दोनों दलों सपा और बसपा के पक्ष में विशिष्ट राजनीतिक रुझान दिखा. सपा और बसपा दोनों ने क्रमश: अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के अधिक उम्मीदवार जिताये. यहां तक कि बसपा की ब्राह्मण-विरोधी रणनीति के कारण उच्च जाति का एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका. लेकिन सपा ने 10 फीसदी ऊंची जाति के विधायकों को जितने में योगदान दिया तथा 35 फीसदी विधायक केवल यादव समाज से जीत कर आए. इसके बाद पुरे देश में पिछड़े वर्ग की राजनीति शुरू हुई और देखते ही देखते हरेक जाति पिछड़ी जाति में शामिल होने के लिए आंदोलन करने लग गई.

कांग्रेस की ब्राह्मण और राजबाड़ा परस्त राजनीति के कारण पिछड़ा समाज हाशिए पर चला गया. जिसका परिणाम है कि जाट, मराठा, कापू और पटेल आरक्षण का मुद्दा गर्म हो रहा है. उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों की आज सबको जरूरत है क्योंकि जमीन छोटी पड़ती जा रही हैं किसान लोग कर्ज के बोझ से दब रहे हैं. पिछड़ी जातियों का नेतृत्व करने के लिए आज की जरूरत के मुताबिक मोदी द्वारा अपनी जाति को 2002 में चुपके से OBC घोषित करके एक बड़े समुदाय का नेता घोषित कर दिया. जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें भारत के प्रधान मंत्री का पद भी हासिल हो गया. गुजरात की राजनीति, व्यापर और ज़मीन में पाटीदार बड़ा दखल रखते हैं, वे भी मोदी के पिछड़े समुदाय में शामिल होकर उच्च वर्णीय जातियों को गुजरात और देश की राजनीति से हमेशा के लिए विदा कर देना चाहते हैं. इसी राजनीति का परिणाम है की 1990 के मंडल युग के बाद ब्राह्मण समाज जो राजनीति में 40% की हिस्सेदारी के साथ ड्राइवर सीट पर रहा है वह आज राजनीति की पिछली सीट पर बैठने को मजबूर है. पिछड़े समाज के नेताओं को ड्राइवर की सीट देना उनकी मजबूरी बन गई है. जिसका परिणाम मोदी और अमित शाह के रूप में आपको दिखाई दे रहा है. नई शिक्षा नीति के माध्यम से आज सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक समानता के लिए ब्राह्मणों और “राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ” को सामने आकर एक नई पहल करनी होगी.

शिक्षा पर इलाहबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

भारतीय संविधान में लगभग कक्षा आठवीं तक, यानी 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा को बच्चों के एक मौलिक अधिकार के रूप में सम्मलित किया. बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर ने संविधान बनाते समय इस अधिकार को राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल किया था. उस समय हमारे देश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इस लिए उन्होंने कहा था की जैसे ही आर्थिक स्थिति ठीक होती जाएगी वैसे-वैसे इस शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकारों में सम्मलित करना जरुरी होगा. यह काम 2009 में डा. मनमोहन सिंह की यू.पी.ए. सरकार ने आर.टी.ई.एक्ट बना कर किया. सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से सभी बच्चों को अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य हासिल करने के लिए राज्य सरकारों के लिए बजट आबंटित किया गया. परिणाम बड़े ही चोंकाने वाले मिले यथा:

मिड-डे मील में घपले, कक्षा आठ तक बिना किसी परीक्षा के बच्चों को पास करने के कारण कक्षा पांच के बच्चों द्वारा कक्षा दो की किताब को न पड़ पाना;

प्राइमरी से आगे की पढ़ाई को 90 प्रतिशत बच्चों द्वारा स्कूल छोड़ देना;

इन स्कूलों में शिक्षा मुक्त एवं मुफ्त होना चाहिए था, लेकिन लगता है कि वे हर बात में फेल है;

बुनियादी सुविधाओं का पूर्ण अभाव इन स्कूलों में हर जगह देखा जा सकता है;

आजादी के 65 से अधिक वर्षों के बाद भी इन स्कूलों में अभी भी अधिकतर कक्षाओं की इमारतें अत्यंत जर्जर और बुरी स्थिति में हैं. शौचालयों एवं पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए इन स्कूलों में अभी भी संघर्ष जारी हैं;

कई स्थानों पर कक्षाएं खुले आसमान के नीचे चलाई जा रही हैं. यदि कोई संरचना है भी तो वह जीर्ण-शीर्ण हालत में है;

हांलाकि सरकार द्वारा गरीब लोगों के बच्चों को बुनियादी शिक्षा के कल्याण के नाम पर हर साल भारी मात्रा में पैसा खर्च किया जाता है, परन्तु इन स्कूलों की स्थिति में कुछ भी सुधार नजर नहीं आता है;

यह समझना मुश्किल नहीं है कि सरकार इस दिशा में समुचित ध्यान क्यों नहीं दे रही है, कारण काफी स्पष्ट है;

इन स्कूलों के साथ प्रशासन की कोई वास्तविक भागीदारी और जवावदेही नहीं है;

कुछ लोग जो क्षमतावान और पर्याप्त धनवान है ऐसे व्यक्ति अपने बच्चों को कुलीन और अर्ध कुलीन प्राइमरी स्कूलों में भेजते हैं.

आम आदमी के स्कूलों के सम्बन्ध में माननीय न्यायमूर्ति श्री कृष्णा अय्यर ने एक बार यह कहा था कि लगता है ये स्कूल शिक्षा की जरुरत को पूरा करने की जगह गरीब बच्चों की दो जून के भोजन की मुश्किल को दूर करने के लिए बनाये गए हैं.

बेसिक शिक्षा मंडल द्वारा चलाए जा रहे ये संस्थान, दुर्विनियोजन, कुशासन और बड़े पैमाने पर उच्चतम स्तर के भ्रष्टाचार के शिकार हो रहे है;

शिक्षण के मानक पूरी तरह से हताहत है. कोई भी ट्यूटोरियल स्टाफ के मानको में सुधार करने के लिए परवाह नहीं करता है;

बिना किसी प्रतियोगी परीक्षा के अयोग्य और अनपढ़ लोगों को नियुक्त करके प्रतिबद्ध मतदाता बनाने के एक स्रोत के रूप में प्राथमिक स्कूलों राजनीतिक कारणों से न्युक्तियां हो रही है. लेकिन वे वास्तव में प्राइमरी स्कूल में बच्चों को पढने में सक्षम नहीं हैं;

बेसिक शिक्षा बोर्ड के अधिनियम, 1972 के तहत उत्तर प्रदेश द्वारा सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त बुनियादी विद्यालयों को बनाए रखने के लिए वार्षिक बजट का एक बड़ा हिस्सा इस मद पर खर्च होता है;

प्रदेश में प्राथमिक विद्यालयों की कुल संख्या, अर्थात जूनियर प्राइमरी स्कूल और सीनियर प्राइमरी स्कूलों को मिलाकर एक लाख चालीस हजार है. शिक्षण स्टाफ और हेड मास्टरों की संख्या भी इसलिए लाखों में है;

शिव कुमार पाठक एवं अन्य लोग बनाम यूपी राज्य के फैसले में न्यायिक खंडपीठ के द्वारा यह देखा गया है कि बोर्ड द्वारा संचालित प्राथमिक स्कूलों में सहायक अध्यापकों के 2.70 लाख पद खाली पड़े हुए हैं;

शिक्षकों की भर्ती में भारी अनियमितता, जवाबदेही और विश्वसनीयता की कमी के कारण प्रबंधन भारी मुकदमेबाजी में फंस गया है, जिसके लिए अधिकारियों की बेखबरी, गैरईमानदारी और आकस्मिक दृष्टिकोण पूरी तरह से जिम्मेदार है.

उत्तर प्रदेश में इस समय छोटे बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए चल रहे प्राथमिक विद्यालयों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

1. अभिजात्य वर्ग के बच्चों के स्कूल:

प्रदेश में कुछ पब्लिक स्कूल ब्रांडेड हैं, जो अभिजात वर्ग और अत्यधिक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोगों द्वारा संचालित हैं. ऐसे प्राथमिक स्कूलों की संख्या बहुत कम हैं. ऐसे स्कूलों में गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए उपलब्धता लगभग नगण्य है, जिसमें कुछ अंग्रेजी / कॉन्वेंट स्कूल ईसाई अल्पसंख्यक मिशनरियों द्वारा चलाए जा रहे हैं. इस श्रेणी के स्कूल मूल रूप से अत्यधिक अमीर लोगों, उच्च वर्ग के नौकरशाहों, मंत्रियों, जन प्रतिनिधियों, जैसे, संसद सदस्य, विधान सभा सदस्यों तथा उच्च मध्यम वर्ग के लोगों की जरूरत को पूरा करते हैं. अभिजात वर्ग समाज की एक सीमित इकाई है जिसके बच्चे ही उसमें शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं. सामान्य लोग तो इन स्कूलों में ली जाने वाली फीस के वित्तीय मानकों को भी पूरा नहीं कर सकते हैं. बहुत सख्त प्रवेश मानकों एवं उच्च संसाधनों की वजह से ज्यादातर सीटें अभिजात्य वर्ग के लिए ही उपलब्ध हैं. इन स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्टर्स, ट्यूटोरियल कर्मचारियों और अन्य सभी सुविधायें सबसे अच्छे प्रकार की है. इन स्कूलों को ‘एलीट’ स्कूलों के रूप में लिया जा सकता है.

2. निम्न मध्यम वर्ग के स्कूल:

दूसरी श्रेणी के प्राथमिक विद्यालय जो निम्न मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए सामान्य रूप से कुछ निजी संस्थाओं या व्यक्तियों द्वारा चलाए जा रहे हैं. इन स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर इतना परिष्कृत और कुलीन स्कूलों के तरह अति आधुनिक नहीं है, लेकिन सरकारी स्कूलों से काफी बेहतर है और तुलनात्मक रूप से भी ट्यूटोरियल स्टाफ भी अच्छा है. इन स्कूलों को ‘अर्ध-कुलीन वर्ग के स्कूलों’ के रूप में भी पहिचाना जा सकता है.

3. सामान्य वर्ग के बच्चों के स्कूल:

प्रदेश के यह बोर्ड द्वारा संचालित स्कूल ही अत्यधिक बच्चों की जरूरत को पूरा कर रहे है जिनकी स्थिति बहुत ही दयनीय है. लगभग सभी ऐसे प्राथमिक विद्यालय जो सरकारी प्रशासन के तहत बोर्ड द्वारा प्रबंधित और संचालित हैं, तृतीय श्रेणी में आते हैं. इनको ‘आम-आदमी के स्कूलों के रूप में जाना जा सकता है. ऐसे स्कूल ग्रामीण वर्ग, अर्ध-शहरी वर्ग के बच्चों की पढाई की जरुरत को पूरी करते हैं, ये ऐसे लोगों के लिए हैं जो अन्य दो श्रेणियों के अंतर्गत आने वाले स्कूलों का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं. राज्य में छोटे बच्चों की लगभग 90 फीसदी आबादी इन स्कूलों में पढ़ने के लिए विवश है.

वे कोन लोग हैं जो शिक्षा की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं? उनके बच्चों को भी इन स्कूलों में अनिवार्य रूप से पढने के लिए विवश करना चाहिए, तो शिक्षा का स्तर अवश्य ही सुधरेगा.

सभी लोग समझ सकते हैं कि जब जिले के कलेक्टर और एसपी तथा अन्य अधिकारीयों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ना आरम्भ कर देंगे, तो उन स्कूल में शिक्षा का स्तर क्या होगा और शिक्षक किस तरह की पढ़ाई वहां करवाएंगे.

यह सुझाव तो 100 टके का है, लेकिन इसे मानव संसाधन विकास मंत्री तो क्या बल्कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लागू नहीं कर सकते.

कोर्ट का यह फैसला जिसे छह महीनों में लागू करना है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज श्री सुधीर अग्रवाल ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला उत्तर प्रदेश के प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक बेसिक स्कूलों की दुर्दशा को सुधारने के लिए दिया है.

कोर्ट ने इस फैसले को लागू कराने के लिए मुख्य सचिव को छह माह का समय दिया है. इस फैसले से जुड़े मुख्य बिंदु निम्न लिखित हैं :

अगर सरकारी अधिकारियों सहित जनप्रतिनिधि, जज अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाते हैं तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही सरकार करे;

इसलिए, मुख्य सचिव, यूपी सरकार को इस संबंध में इलाहबाद हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि जिम्मेदार अन्य अधिकारियों के साथ परामर्श करके इस मामले में उचित कार्रवाई सुनिश्चित करके छः माह के अंदर कोर्ट को सूचित करें;

सरकारी कर्मचारियों, अर्द्ध सरकारी कर्मचारियों, स्थानीय निकायों, न्यायपालिका और ऐसे सभी व्यक्तियों के आलावा सभी जन प्रतिनिधि जो सार्वजनिक कोष से किसी भी तरह का लाभ या वेतन आदि प्राप्त करते हैं, वे अपने बच्चे / बच्चों / वार्डों को सरकारी स्कूलों में ही भेजें;

इस शर्त का उल्लंघन करने वाले लोगों के लिए दंडात्मक प्रावधान सुनिश्चित किये गए हैं;

यदि कोई भी सरकारी कोष का लाभार्थी अपने बच्चे को सरकारी स्कूल की जगह पब्लिक स्कूल में भेजेगा तो उसे हर महीना निजी स्कूल में भुगतान किये शुल्क के बराबर धन राशि, हर महीने सरकार के कोष में जमा करनी पड़ेगी;

यह राशि बोर्ड के स्कूलों की गुणबत्ता सुधारने पर उपयोग की जाएगी;

जो सरकारी अधिकारी सहित अन्य लाभ के पद पर अधिकारी हैं, अगर वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाते हैं तो उनकी वेतन वृद्धि/ प्रोन्नति रोक दी जायेगी;

स्कूलों की दशा को सुधारने में कोताही बरतने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जायेगी. (उपरोक्त फैसला आज तक उत्तर प्रदेश में और देश के अन्य भागों में क्यों लागू नहीं हुआ? इसके राजनीतिक कारण कुछ भी हो सकते हैं परंतु आम जनता के सामने यह आज भी सरकारों को गैर जवाब देह साबित करने के लिए काफी है.)

समस्या का कारण और समाधान

उक्त फैसले पर स्टे लेना दुर्भाग्यपूर्ण है. इसका अर्थ है कि सभी बच्चों को सरकार के खर्चे पर एक-समान स्कूल स्तर तक शिक्षा मिले सभी चाहते हैं परन्तु उतनी गंभीरता सत्ताधारी लोगों के कृत्यों में नजर नहीं आती. यह बड़ा ही गंभीर विषय है यदि इस पर आम जनता ने अपना फैसला नहीं लिया तो हमारा देश विकास की दौड़ में काफी पिछड़ जायेगा. कम से कम इस मुद्दे पर राजनीति न करके संवैधानिक भावना की कद्र करनी होगी.

आरक्षित वर्ग में आने वाले बुद्धिजीवी लोगों का कहना है की जब से मंडल कमीशन लागू हुआ है तब से एक विशेष वर्ग का सरकारी नौकरियों से एकाधिकार समाप्त हो गया है इस लिए प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसमें कुछ लोग भाजपा सरकार को कोस रहे हैं पर इससे ज्यादा कांग्रेस भी दोषी है.

वास्तव में देश की व्यवस्था आजादी के बाद एक विशेष समुदाय के हाथों में आ गई जिसके मुखिया पंडित जवाहर लाल नेहरू थे. अब नेहरू माडल की नकल सारी सरकारें करती हैं. नौकरियों में आजादी से पहले 3.5 फीसदी जनसँख्या वाले ब्राह्मण समुदाय की नौकरशाही और शिक्षा में हिस्सेदारी मात्र 3 फीसदी थी जो 1989 में लगभग 75 फीसदी हो गई. वहीँ कायस्थों का जनसँख्या में मात्र डेढ़ फीसदी हिस्सेदारी है उनकी 1935 में नौकरशाही में 40 फीसदी की हिस्सेदारी थी थी जो 1989 में घट कर मात्र 3 फीसदी ही रह गई. स्वामी विवेकानन्द, जयप्रकाश नारायण, डा राजेंद्र प्रसाद, महेश योगी, शत्रुघ्न सिन्हा और अमिताभ बच्चन आदि महानुभाव इसी समुदाय से आते हैं. सरकारी नौकरियों में पिछड़ने के कारण इन्होने भी जनता सरकार के समय अपने को चमार घोषित करके अनुसूचित जातियों की श्रेणी में आने के लिए कोर्ट के द्वारा सफलता हासिल करने की कोशिश की थी.

आज अनिवार्य और मुफ्त स्कूली शिक्षा, सरकारी नौकरियों में सभी सामाजिक वर्गो को आनुपातिक प्रतिनिधित्व (आरक्षण) का सवाल बहुत बड़ी समस्या बनता जा रह है. जिन वर्गो ने अपनी संख्या से ज्यादा हासिल कर लिया है वह छोड़ना नहीं चाहते. और जिन वर्गों का हिस्सा कम है वह अपना हिस्सा पाने के लिए जागरूक हो रहे हैं. जिसकी परिणति में अनेकों नए जातीय आंदोलन जातीय राजनीति के रूप में पैर पसार रहे हैं.

शिक्षा लेना और देना एक विशेष समुदाय ने ही अपनी संम्पत्ति समझ रखा था, वह भी उनके हाथ से निकलती नजर आ रही है. इस दिशा में न्यामूर्ति सुधीर अग्रवाल का निर्णय एक उचित कदम है. प्राइमरी शिक्षा का राष्ट्रीयकरण तथा जनसँख्या के अनुपात में सभी चारों वर्गों को नौकरियों और राजनीति में हिस्सेदारी ही उचित समाधान होगा, अन्यथा देश के युवा गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं. जहाँ तक आरक्षण के समाप्त करने का सवाल है, उसे समाप्त करना या उसको कम करना पूर्णत: असंभव है.

आज जनता की आवाज है, जनसंख्या के अनुपात में समाज के सभी वर्गों को शिक्षा, सरकारी सेवाओं और राजनीति में प्रतिनिधित्व हासिल करना. जब मोदी (घाँची-मोद ) पिछड़ा बन सकते हैं तो हार्दिक पटेल पिछड़े वर्ग के अन्तर्गत आरक्षण क्यों नहीं ले सकते. याद रहे हार्दिक पटेल के समाज से आने वाले छत्रपति शाहू महाराज ने सबसे पहले 26 जुलाई 1902 में शूद्र-अतिशूद्र जातियों को शिक्षा में 50% आरक्षण कोल्हापुर स्टेट में दिया था. जैसा कि विदित है इस देश में सर्वप्रथम तथागत बुद्ध ने ‘बुद्धम शरणम गच्छामि’ का उपदेश देकर के समग्र समाज को शिक्षा ग्रहण करने की जरूरत महसूस की. इसी तरह से 1848 में महात्मा फुले ने स्त्री और पुरुषों तथा समग्र समाज को ब्राह्मणों की तरह शिक्षा ग्रहण करने की जरूरत महसूस की. उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर अंबेडकर ने भारतीय संविधान में 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की. उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति का उत्तम मार्ग माना जो भारत में वंचित वर्ग के लिए वहीं क्रांति सेेे कम नहीं है. नई शिक्षा नीति आज लागू होने जा रही है उसमें उपरोक्त महापुरुषों की भावनाओं को मध्य में रखते हुए समाज को समतामूलक बनाना जरूरी है. जिसके लिए स्कूली शिक्षा का राष्ट्रीयकरण सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है.

के सी पिप्पल

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फिल्म ‘आर्टिकल 15’ पर बोले आयुष्मान खुराना

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ऐक्टर आयुष्मान खुराना का कहना है कि उनकी आने वाली फिल्म ‘आर्टिकल 15’ किसी का भी पक्ष नहीं ले रही है और न ही इसमें किसी समुदाय के बारे में कुछ गलत दिखाने का इसका इरादा है. आयुष्मान खुराना ने कहा, ‘मैंने नोटिस किया कि फिल्म ‘आर्टिकल 15′ को लेकर चारों ओर कई विवाद हैं. मैं उन सभी से आग्रह करना चाहूंगा जो विरोध कर रहे हैं और यह दावा कर रहे हैं कि यह फिल्म ब्राह्मण विरोधी है, कृपया इस फिल्म को देखे. सेंसर बोर्ड के द्वारा इस फिल्म का निरीक्षण किया जा चुका है.’

आयुष्मान खुराना ने कहा, ‘हमारी फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित है और यह किसी एक विशेष घटना पर आधारित नहीं है. यह हमारे देश में हो रही घटनाओं का एक संयोजन है. हां, यह आपको असहज महसूस कराएगी, लेकिन यह सच्ची घटनाओं से प्रेरित फिल्म है. मैं सभी से इस फिल्म को देखने का और निर्देशक के दृष्टिकोण और इरादे पर कोई धारणा न बनाने का आग्रह करता हूं.’

मई में रिलीज हुए फिल्म के ट्रेलर में दिखाया गया है कि कैसे मजदूरी करने वाली लड़कियों को सिर्फ 3 रुपये दिहाड़ी बढ़ाने कि मांग के बदले उनके साथ गैंगरेप कर हत्या कर दी जाती है और बॉडी को पेड़ से लटका दिया जाता है, क्योंकि वह दलित हैं. इसके बाद फिल्म में पुलिस अधिकारी बने आयुष्मान खुराना इस केस में जांच करते हुए नजर आते हैं.

फिल्म की कहानी को मरोड़कर दिखाए जाने को लेकर फिल्म के निर्देशक अनुभव सिन्हा को उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय के गुस्से का सामना करना पड़ा. चूंकि फिल्म में आरोपी व्यक्ति ब्राह्मण समुदाय से हैं, इस वजह से लोगों को लगता है कि इससे उनके समुदाय की बदनामी होगी. इस फिल्म के माध्यम से दिखाया गया कि किस तरह से क्षेत्र में जातिगत असमानता प्रचलित है.

फिल्म में आयुष्मान के अलावा ईशा तलवार, सयानी गुप्ता, कुमुद मिश्रा, एम.नास्सर, आशीष वर्मा, सुशील पांडेय, शुभ्रज्योति भारत, रोन्जिनी चक्रवर्ती और जीशान अयूब जैसे कलाकार भी हैं. यह फिल्म 28 जून को रिलीज होगी.

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संसद में राष्ट्रपति के संबोधन के बाद बोले राहुल गांधी- मेरा रुख आज भी वही, राफेल सौदे में चोरी हुई

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को कहा कि आज भी उनका वही रुख है कि राफेल विमान सौदे में चोरी हुई है. संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद, बाहर आते हुए गांधी ने संसद भवन में यह टिप्पणी की. अभिभाषण के बारे में पूछे जाने पर गांधी ने कहा, ‘मेरा रुख आज भी वही है कि राफेल विमान सौदे में चोरी हुई है.’ बता दें, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गुरुवार को संसद के दोनों सदनों को संयुक्त सत्र में संबोधित किया. सेना एवं सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण का काम तेजी से आगे बढ़ने की ओर ध्यान दिलाते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि भारत को पहला राफेल लड़ाकू विमान और ‘अपाचे’ हेलीकॉप्टर निकट भविष्य में मिलने जा रहे हैं.

संसद के ऐतिहासिक कक्ष में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए कोविंद ने कहा कि सरकार द्वारा ‘मेक इन इंडिया’ के तहत आधुनिक अस्त्र-शस्त्र बनाने पर विशेष बल दिया जा रहा है. उन्होंने कहा कि भारत को पहला राफेल लड़ाकू विमान और ‘अपाचे’ हेलीकॉप्टर निकट भविष्य में मिलने जा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि आधुनिक राइफल से लेकर तोप, टैंक और लड़ाकू जहाज तक भारत में बनाने की नीति को सफलता के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है. उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बन रहे रक्षा गलियारा इस मिशन को और मजबूती प्रदान करेंगे. अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करते हुए रक्षा उपकरणों के निर्यात को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.

राष्ट्रपति ने कहा कि सैनिकों और शहीदों का सम्मान करने से सैनिकों में आत्म-गौरव और उत्साह बढ़ता है तथा हमारी सैन्य क्षमता मजबूत होती है. इसीलिए सैनिकों और उनके परिवार-जनों का ध्यान रखने की हर संभव कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि ‘वन रैंक वन पेंशन’के माध्यम से पूर्व सैनिकों की पेंशन में बढ़ोतरी करके तथा उनकी स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करके, उनके जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है.

राष्ट्रपति ने कहा, ‘आजादी के सात दशक के बाद, मेरी सरकार द्वारा दिल्ली में इंडिया गेट के समीप बनाया गया ‘नेशनल वॉर मेमोरियल’ शहीदों के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र की विनम्र श्रद्धांजलि है. इसी तरह देश की सुरक्षा में शहीद होने वाले हमारे पुलिस बल के जवानों की स्मृति में, मेरी सरकार ने ‘नेशनल पुलिस मेमोरियल’ का निर्माण किया है.’

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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: PM मोदी ने रांची में 40 हजार लोगों के साथ किया योग

पांचवें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2019 के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को झारखंड के रांची में योग किया. पीएम मोदी के साथ तकरीबन 40 हजार लोगों ने भी योग किया. इसके अलावा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हरियाणा के रोहतक में राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ योग किया.

योग दिवस पर पीएम मोदी ने कहा कि योग को लोकप्रिय बनाने के लिये आधारभूत ढांचा मजबूत किया जाना चाहिए. हमें समाज के हर वर्ग तक योग को ले जाना चाहिए. शांति और सौहार्द्र योग से जुड़े हैं. विश्वभर में लोगों को अनिवार्य रूप से योग करना चाहिए. उन्होंने कहा कि योग दिवस पर रांची में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि योग हमेशा से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है, इसके प्रसार के लिये हमें साथ आना चाहिए.

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज योग ड्राइंग रूम से बोर्डरूम तक, शहरों के पार्क से लेकर स्पोट्र्स कंपलेक्स तक पहुंच गया है. आज गली-कूचे से वेलनेस सेंटर्स तक चारों तरफ योग को अनुभव किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि आज के बदलते हुए समय में बीमारी से बचाव के साथ-साथ वेलनेस पर हमारा फोकस होना जरूरी है. यही शक्ति हमें योग से मिलती है. यही भावना योग और पुरातन भारतीय दर्शन की है.

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SSC GD Result 2019, यहां से सीधे देखिए

नई दिल्ली। SSC GD Result 2019: स्टाफ सेलेक्शन कमीशन ने कॉन्सटेबल जीडी भर्ती परीक्षा का रिजल्ट जारी कर दिया है. उम्मीदवारों के रिजल्ट (SSC GD Constable Result 2019) का इंतजार खत्म हो गया है. उम्मीदवार अपना रिजल्ट (SSC GD 2019 Result) ssc.nic.in पर जाकर चेक कर सकते हैं. स्टाफ सेलेक्शन कमीशन ने पिछले साल कॉन्सटेबल (जनरल ड्यूटी) के 54, 953 पदों पर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया था. इन पदों पर 52 लाख 20 हजार 335 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया था. कॉन्सटेबल भर्ती परीक्षा 11 फरवरी 2019 से 11 मार्च 2019 तक आयोजित की गई थी. भर्ती परीक्षा में 30 लाख 41 हजार 284 उम्मीदवारों ने भाग लिया था. आपको बता दें कि 54, 953 पदों में से सबसे ज्यादा 21,566 पद CRPF में हैं. इसके बाद BSF में 16,984 पद, एसएसबी में 8,546 पद, आईटीबीपी में 4,126 पद और असम राइफल्स में 3,076 पद हैं. बचे हुए अन्य पद सीआईएसएफ और अन्य सीएपीएफ में हैं.

SSC GD Result 2019 यूं कर पाएंगे चेक

स्टेप 1: उम्मीदवार वेबसाइट ssc.nic.in पर जाएं. स्टेप 2: वेबसाइट पर दिए गए रिजल्ट के लिंक पर क्लिक करें. स्टेप 3: मांगी गई जानकारी भरकर सबमिट करें. स्टेप 4: आपका रिजल्ट स्क्रीन पर आ जाएगा. स्टेप 5: आप रिजल्ट का प्रिंट ऑउट भी ले सकते हैं.

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डिक्की, डीएआईसी ने दलित उद्यमिता पर शोध के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए

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नयी दिल्ली। दलित उद्यमिता पर अनुसंधान के माध्यम से अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के सशक्तीकरण के लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के तहत आने वाले डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र (डीएआईसी) और दलित भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (डिक्की) के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया. केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने संयुक्त प्रयास की सराहना की और कहा कि समझौता ज्ञापन का उद्देश्य दलित उद्यमिता पर शोध और इन समुदायों की महिलाओं और युवाओं के बीच कौशल विकास की क्षमता विकसित कर एससी और एसटी समुदायों का सशक्तिकरण करना है. डिक्की सभी दलित उद्यमियों को एक साथ लाता है, और उनकी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए युवाओं के बीच उद्यमशीलता को बढ़ावा देकर उनके लिए वन-स्टॉप संसाधन केंद्र के रूप में कार्य करता है.

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Dear society, I have question’sfor you!

My dear society, do you know that I heard the word ‘society’ for the first time when I was in 11th standard when one of the teachers who loved me a lot taught us one day the valuable words ofMaclver and Page, “Society is the web of Relationships.’ During that time I haven’t had the lens to think on it critically but when today I go through the same definition I realize that if society is the web of relations, then the relations with whom? And I arrived at the answer that society is web of the relation and the interconnected relationswith all living beings,animals as well as human beings. But today I see people don’t live with people in a healthy manner let alone animals. It may be that they are showing care about animals but they don’t care about people.We people are not honest and truthful with our relations. In the relationships with our mother,father, sister, brother, teacher, friend or stranger, we are either honest with it or we play with them diplomatically.

Before that I heard about the word, ‘society’, I used to confuse it with ‘people’. My father used to talk about it, they said, what people say, what people think,etc.Actually, what he was trying to tell me indirectly was about people who arein society or the society where people lived. If society is the web of humans’ interrelations with each other then, their relation with each other should be ideal, loving and caring. At that time I felt how beautiful and kind the society is but today when I grew up, I developed a dilemma about it. At this very young age and the very beginning of life, I felt like the society is so ridiculous. May be its because at only 22 years of age, I have undergone much and tried to overcome it. The society where I was born at that time, it wanted to kill me in my mother’s womb because I was a girl child. The society lovesa boy child more than a girl child. Because of this partial society and its system of patriarchy, people’s minds are like that. Till this day, we are denied gender equality and are living under a masculine attitude and manner.

When I grew up this society tells me till now not to speak more, not to smile loudly because you are a girl. Iwas always told that the society has different values and norms for girls and boys. The society discriminates between girls and boys from their childhood when it tells us not to play with boys and now it tells me men are only like this. Who made the society like this?The men or women or both of them shapethe society. Who is the responsible to construct society like this? We make the society or society makes us? If we made society so why did we make it like this? Why the absence of humanity and mankind and no freedom?I have seen in the street if two people love each other publicly, people beat them, shame them but on the same street, if people fight each other, no one goes and stops it. They think it is their personal affairs but when they love each other, it becomes public affairs. We have the right to express our emotions but if we express it, allegations are thrown against us. We have right to think out of the box or we ever think to break the glass ceiling. Do we ever think why caste is so rigid and whether we really need the long history attached to it, or do we have any profit out of patriarchy?

However, the society where I live is theIndian society and is the bitter truth of this. For me this society and his system like patriarchy is very close to link to class, to caste,and to heteronormativity, as a Indian Dalit middle class women where we aredivided in the name of caste,class and gender. It is very basic system which is present. Others many more like religion, language, culture, education,disability,etc.are present and may be other women and men are also suffering through it. Many people are victims of this various intersections which are not good enough.For it, now the big term is intersectionality. The number of intersections in our society makes our mind exclusive and we follow the socio-cultural norms of society. For some it is good and the same is bad for someone else. People treat everyone differently. Why they are not able to equally treat all of them? Why marriage is mandatory? Marriage is everyone’s personal choice. Who makes the rule after marriage only people live together, why not before? It is like they are taking permission or grant of society (who is this society this people who never cooperate them.is they fear of society if they beat us, boycott us) tofulfil their sexual desire or they both are not enough trust to each other so they restrict their self on the name of marriage. It is the same with having children that we really need only biological child.

Why we can’t adopt make his/her life happy. Why a woman need one man always exist her life on the name of father, brother or a husband? Why she is not capable to live single? And who makesthe culture? Or does culture make society or society make culture? As per my lens,cultures don’t make human beings,human being make cultures. Culture need to change with time and today our culture, our religious practices should change according to Indian constitution, which says all human beings are equal whatever their caste, class, sex or religion. We live for society orsociety lives for us?Today in our society there is so much hatred, jealousy, ignorance, inequality, exclusion, injustice, slavery,etc.and many more negative bunch of dialogue has been enhanced. Which are all against the constitution? Which tells us justice,liberty,equality and fraternity but we against the constitution, may not follow it and we accept the society which taught us violence and discrimination. Can we live without society? I don’t feel so. If there were no socirty, where do we communicate, where we make our relations and make it sustain.

We need a societywho never harmed us physically and emotionally too. Do you feel weneed to change society? Do you as readers feel we can change it? If yes, then firstly we need to carefully listen to our inner voices. If then we find negative traits we need to change our minds firstly then others and one day we will meet a prosperous,equal, free society.That day we will be born again with emancipated minds and that will be a perfect thing for Humanity. I recall here Ambedkar as he said, ours is a battle not for wealth or for power. It is a battle for freedom. It is a battle for the reclamation of human personality.

I put here the composed verse of mine, which is requesting society for its betterment.

Dear society, you are the bunch of rules and norms.. I mould myself for you but yet you judge me.. Dear society, why you divided us on the name and fame of degraded systems..We need equality and sovereign in our spaces.. Dear society, why you make us betray us and why you reach out us to a point of committing suicide? How we enjoy this society where too much pain, misery and various burden and restrictions in all domain.We don’t able to tolerate anymore.

Dear society, why I have fear of you, you are evil or what I want to live fearless and without danger. Dear society, why you put yourself and us in box, just free us and break the glass ceiling..

I want you convert rigid society to become chainless and ideal society.. Dear society, please, try to understand that I am here to call all change in a positive way and save us all towards fresh, free days…

Shivani TISS,Mumbai.

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हुक्का पार्टी पर सानिया मिर्जा के समर्थन में उतरे शोएब अख्तर

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शोएब मलिक का अगर प्रदर्शन अच्छा नहीं है तो उसे पाकिस्तान क्रिकेट टीम से बाहर कर दो लेकिन सानिया को बेवजह बीच में मत घसीटो’ पूर्व पाक तेज गेंदबाज शोएब अख्तर ने भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा को सपोर्ट करते हुए ये बात कही है. शोएब अख्तर ने अपने यूट्यूब वीडियो में सानिया मिर्जा को सपोर्ट किया है. अख्तर ने सानिया मिर्जा का साथ देते हुए कहा कि क्यों सानिया को बार- बार ट्रोल किया जाता है. बता दें कि भारत-पाक मैच से पहले रेस्टोरेंट में खाना क्या खाया लोग ट्रोल करने लगे. मुझे उनके लिए बुरा लगता है.
शोएब अख्तर के साथ यूट्यूब चैनल पर शामिल वीरेंद्र सहवाग ने कहा कि अगर पाकिस्तान टीम ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो किसी को खिलाड़ियों के निजी जीवन के बारे में बात करने का अधिकार नहीं है. वीरेंद्र सहवाग ने कहा कि, ‘मुझे नहीं लगता कि आप निजी जीवन को खिलाड़ियों के पेशेवर करियर से जोड़ सकते हैं. मैंने इससे पहले भी विराट कोहली के आउट होने और अनुष्का शर्मा के मैच को देखने पर ऐसा कहा था. मैंने कहा कि आप किसी के परिवार पर टिप्पणी नहीं कर सकते. कोई बात नहीं. आप अपनी टीम और अपने खिलाड़ियों को लेकर कितने भावुक हैं लेकिन आप उनके निजी जीवन में नहीं जा सकते.’
हालांकि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड और मलिक ने यह साफ स्पष्ट किया कि यह वीडियो 15 जून की नही बल्कि 13 जून की है, लेकिन फैंस कहा किसी की सुनने वाले थे. सानिया ने बाद में अपनी गोपनीयता का उल्लंघन करते हुए तस्वीर लेने के लिए प्रशंसकों को लताड़ लगाई थी.

जानिए, राष्ट्रपति के अभिभाषण की 25 प्रमुख बातें

नई दिल्ली। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गुरुवार को संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया. उन्होंने अपने संबोधन में मोदी सरकार 2.0 के एजेंडे को देश के सामने रखा और सरकार किस तरह न्यू इंडिया की नींव रख रही है इसे भी बताया. इस दौरान सदन में लोकसभा, राज्यसभा के सभी सांसद मौजूद रहे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने राष्ट्रपति का स्वागत किया. राष्ट्रपति ने अपने भाषण में विकास, नीति समेत कई बड़े मुद्दों का जिक्र किया. इसी के साथ उन्होंने नई सरकार को भी बधाई दी. अपने अभिभाषण में राष्ट्रपति ने किन मुद्दों का जिक्र किया पढ़ें…

1. 61 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने लोकतंत्र का सम्मान किया है, गर्मी में भी वोट दिया और महिलाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. लोकसभा के नए स्पीकर को उनके चयन, चुनाव आयोग को सफलतापूर्वक चुनाव कराने के लिए बधाई.

2. इस लोकसभा में लगभग आधे सांसद पहली बार निर्वाचित हुए हैं. लोकसभा के इतिहास में सबसे बड़ी संख्या में 78 महिला सांसदों का चुना जाना नए भारत की तस्वीर प्रस्तुत करता है. सदन में इस बार हर प्रोफेशन के लोग आए हैं.

3. मेरी सरकार बिना किसी भेदभाव के विकास कार्यों को आगे बढ़ा रही है. देश के लोगों ने लंबे समय तक मूलभूत सुविधाओं के लिए इंतजार किया लेकिन अब स्थिति बदली है. 2014 से पहले देश में निराशा का माहौल था, लेकिन अब हमारी सरकार ने राष्ट्रनिर्माण के लिए कदम बढ़ाएं हैं. मेरी सरकार सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास की नीति के साथ आगे बढ़ रही है.

4. मेरी सरकार 30 मई को शपथ लेने के तुरंत बाद नए भारत के निर्माण में जुट गई है. ऐसे भारत में युवाओं के सपने पूरे होंगे, उद्योग को ऊंचाईयां मिलेंगी, 21वीं सदी के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा. 21 दिन के कार्यकाल में ही मेरी सरकार ने किसान, जवान के लिए बड़े फैसले किए हैं.

5. किसान हमारे देश का अन्नदाता है, पीएम किसान योजना के तहत अब देश के हर किसान को मदद की जाएगी. साथ ही किसानों के लिए पेंशन योजना भी लागू की जा रही है. पहली बार किसी सरकार ने छोटे दुकानदारों के लिए पेंशन की योजना शुरू की गई है. इससे 3 करोड़ दुकानदारों को लाभ मिलेगा.

6. देश की सुरक्षा में जुटे जवानों के लिए भी मेरी सरकार लगातार फैसले ले रही है. मेरी सरकार ने जवानों के बच्चों को मिलने वाली स्कॉलरशिप में बढ़ोतरी की गई है. पहली बार राज्य पुलिस के जवानों के बेटे-बेटियों को भी शामिल किया गया है.

7. जल संकट को देखते हुए पहली बार भारत सरकार ने जल शक्ति मंत्रालय का निर्माण किया है. क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वार्मिंग को देखते हुए देश में स्वच्छ भारत की तरह ही जल संरक्षण के लिए आंदोलन चलाया जाएगा.

8. मेरी सरकार का लक्ष्य है कि 2022 तक सभी किसानों की आय दोगुनी की जाए. इसके लिए हम दशकों से रुकी हुई सिचाईं योजना को पूरा कर रहे हैं, मतस्य पालन को बढ़ा रहे हैं. किसानों को आधुनिक खेती को लेकर शिक्षित कर रहे हैं, हम ब्लू क्रांति लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

9. ग्रामीण भारत को मजबूत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया गया है. कृषि क्षेत्र की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए, आने वाले वर्षों में 25 लाख करोड़ रुपए का और निवेश किया जाएगा. अभी तक किसानों के पास मदद के तौर पर 12 हजार करोड़ रुपये की राशि पहुंचाई जा चुकी है.

10. मेरी सरकार जन धन योजना को आगे बढ़ा रही है, अब हर गरीब के घर तक बैंक को पहुंचाया जा रहा है. हमारा लक्ष्य है कि डाकियों को ही अब चलता फिरता बैंक बनाया जाए.

11. इलाज के खर्च से गरीब परिवारों को बचाने के लिए 50 करोड़ गरीबों के लिए आयुष्मान भारत योजना लागू की गई है. इसके तहत अभी तक 26 लाख गरीब मरीजों का इलाज कराया जा चुका है. देश में 5 हजार से अधिक जन औषधि केंद्र खोले जा चुके हैं, यहां गरीबों के लिए सस्ती दवाई उपलब्ध हैं.

12. सरकार के द्वारा सामान्य वर्ग के गरीब युवाओं के लिए 10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई है. इस दौरान पहले से जारी SC/ST आरक्षण में छेड़छाड़ नहीं की गई है.

13. महिला सशक्तिकरण, मेरी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है. नारी का सबल होना तथा समाज और अर्थ-व्यवस्था में उनकी प्रभावी भागीदारी, एक विकसित समाज की कसौटी होती है. सरकार की यह सोच है कि न केवल महिलाओं का विकास हो, बल्कि महिलाओं के नेतृत्व में विकास हो.

14. मेरी सरकार मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. इसी के लिए तीन तलाक जैसी प्रथा को खत्म किया जा रहा है, इसके लिए कानून बनाने की तैयारी है. आप सभी इस कदम में सरकार का साथ दें. तीन तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं का खत्म होना जरूरी है.

15. मुद्रा योजना के तहत अभी तक 19 करोड़ लोन दिए जा चुके हैं, नई सरकार का लक्ष्य 30 करोड़ लोगों को लोन देने का है. ताकि रोजगार बढ़ाया जा सके.

16. भारत विश्व की सबसे देश बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है. महंगाई कम है, जीडीपी बढ़ रही है, विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ रहा है. हमारा लक्ष्य 2024 तक भारत पांच ट्रिलियन की इकॉनोमी बने. जल्द ही नई औद्योगिक नीति का ऐलान भी किया जाएगा.

17. जीएसटी लागू होने से देश में व्यापार जगत को काफी फायदा होगा. इसके तहत छोटे कारोबारियों को फायदा हो रहा है, राज्य सरकारों के साथ मिलकर नियमों को और भी आसान बनाया जा रहा है.

18. Ease of Doing Business’ की रैंकिंग में वर्ष 2014 में भारत 142वें स्थान पर था. पिछले 5 वर्षों में 65 रैंक ऊपर आकर हम 77वें स्थान पर पहुंच गए हैं. अब विश्व के शीर्ष 50 देशों की सूची में आना हमारा लक्ष्य है.

19. काले धन के खिलाफ शुरू की गई मुहिम को और तेज गति से आगे बढ़ाया जाएगा. पिछले 2 वर्ष में, 4 लाख 25 हजार निदेशकों को अयोग्य घोषित किया गया है और 3 लाख 50 हजार संदिग्ध कंपनियों का रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा चुका है.

20. मेरी सरकार का लक्ष्य ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना है, इसके लिए शहरों में मेट्रो को बल दिया जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक वाहनों को बढ़ाया जा रहा है. साथ ही CNG-PNG के वाहनों की संख्या को भी बढ़ाया जा रहा है.

21. मेरी सरकार गंगा की अविरलता कायम रखने के लिए तैयार है. पिछले कुछ समय में गंगा सफाई की तस्वीरों की विश्व में चर्चा हुई है, इतना ही नहीं अर्ध कुंभ के दौरान हर किसी ने सफाई की तारीफ की है. गंगा के साथ-साथ अन्य नदियों को भी प्रदूषण से मुक्त किया जा रहा है.

22. हमारे वैज्ञानिक मिशन चंद्रयान 2 और गगनयान को सफल बनाने में जुटे हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान मिशन शक्ति भी सफल तरीके से लॉन्च हुआ.

23. नए भारत की विश्व में अलग पहचान बनी है. भारत 2022 में G-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा. 21 जून को संयुक्त राष्ट्र ने योग दिवस घोषित किया, जिसकी पहल भारत ने ही की थी.

24. आतंकवाद के खिलाफ मेरी सरकार कड़े कदम उठा रही है. आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया भारत के साथ खड़ी है, यही कारण है कि आतंकी आका मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र ने भी ग्लोबल आतंकी घोषित किया है. सीमा के पार पहले सर्जिकल स्ट्राइक, फिर एयरस्ट्राइक करके भारत ने अपने इरादों को दर्शा दिया है. भविष्य में ऐसे ही कदम उठाए जाएंगे.

25. मेरी सरकार आधुनिक हथियार बनाने पर बल दे रही है, इसके लिए मेक इन इंडिया पर तेजी से काम चल रहा है. जल्द ही भारत सरकार को राफेल लड़ाकू विमान भी मिलने वाला है. सरकार जवानों के परिवार का ध्यान रख रही है, पूर्व सैनिकों की पेंशन में भी बढ़ोतरी की जा रही है.

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17वीं लोस में सबसे कम उम्र की सांसद हैं आदिवासी समाज की चंद्राणी मुर्मू

लोकसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को लेकर कई बार बहस होती रहती है लेकिन आजतक संसद में यह बिल पास नहीं हो पाया है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने इस बार अपने मैनिफेस्टो में कहा था कि अगर वो सत्ता में आती है तो महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखेगी. महिलाओं के लिए लोकसभा में 33 प्रतिशत सीट आरक्षण को लेकर सभी पार्टियां बात तो करती हैं लेकिन असलियत में इस आरक्षण को लेकर गंभीर नज़र नहीं आती हैं. इस बार एनडीए को बहुमत मिला है और बीजेपी के पास एक मौका है कि अपने वादे को निभाये. अक्सर तमाम दल महिलाओं को 33 फीसदी टिकट देने की बात करते हैं लेकिन वक्त आने पर मुकर जाते हैं. लेकिन 17वीं लोकसभा के चुनाव में एक ऐसी पार्टी जिसने 33 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिया था वो है बीजू जनता दल.

17वीं लोकसभा में सबसे ज्यादा 78 महिलाएं संसद पहुंची हैं, जो अपने आप में एक रिकार्ड है. इनमें से सात सांसद ओडिशा से भी हैं. जिनमें से 5 सांसद बीजू जनता दल यानि (BJD) से हैं जबकि दो महिला सांसद भाजपा से. बीजेडी की इन सांसदों में अब तक की सबसे कम उम्र की सांसद चंद्राणी मुर्मू भी शामिल हैं. मुर्मू की उम्र अभी केवल 25 साल और 11 महीने है. मुर्मू ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की हैं. आदिवासी समाज से ताल्लुक रखने वाली मुर्मू ने ओडिशा की केन्झार लोकसभा सीट से जीत दर्ज की है. ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने चुनाव से पहले कहा था कि इस बार के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी 33 प्रतिशत सीट महिलाओं को देगी. उन्होंने अपना वादा निभाया और 21 सीटों में से 7 सीटों पर महिला उम्मीदवारों को लड़ाया. इन सात में से पांच उम्मीदवारों ने जीत भी हासिल की. बीजेपी ने छह महिलाओं को उम्मीदवार बनाया था.

जीतने वाली इन सांसदों में प्रमिला बिसोयी (आसका, बीजद), मंजुलता मंडल (भद्रक, बीजद), राजश्री मलिक (जगतसिंहपुर, बीजद), शर्मिष्ठा सेठी (जाजपुर, बीजद) चंद्राणी मुर्मू (क्योंझर, बीजद), अपराजिता सडांगी (भुवनेश्वर, बीजेपी) और संगीता कुमारी सिंहदेव (बलंगिरी, बीजेपी) शामिल हैं. इन चुनावों में पूरे देश से सिर्फ 14 प्रतिशत के करीब महिला उम्मीदवार जीतकर संसद पहुंच रही हैं, वहीं ओडिशा से 33 प्रतिशत महिलाओं ने जीत हासिल की है. ओडिशा के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है जब इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं एक साथ लोकसभा पहुंच रही हैं. जीती सांसदों में केवल प्रमिला बिसोयी को छोड़कर सभी पढ़ी लिखी हैं. कोई ग्रेजुएट है तो कोई पोस्ट ग्रेजुएट. इसके अलावा किसी भी सांसद के खिलाफ कोई क्रिमिनल केस नहीं है.

केन्झार से जीती मुर्मू ओडिशा की सबसे कम उम्र की सांसद होने के साथ-साथ देश की भी सबसे कम्र उम्र की सांसद हैं. राजनीति में चंद्राणी का ज्यादा अनुभव नहीं है. 2017 में चंद्राणी ने भुवनेश्वर से अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की. डिग्री मिलने के बाद जब चंद्राणी नौकरी ढूंढ रही थी तभी उन्हें बीजद की ओर से टिकट की पेशकश कर दी गयी. चंद्राणी इस मौके को गंवाना नहीं चाहती थीं. उन्होंने पार्टी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और चुनाव मैदान में उतर गईं. उन्होंने जीत हासिल की और सबसे कम उम्र की सांसद बन गईं.

चंद्राणी के परिवार से कोई भी राजनीति में नहीं है. चंद्राणी के माता-पिता सरकारी नौकरी करते हैं. चंद्राणी ने चुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार अनंत नायक को करीब 66200 मतों के अंतर से हराया है. अनंत नायक बीजेपी के टिकट से क्योंझर से दो बार सांसद रह चुके हैं. सबसे पहले उन्होंने 1999 में जीत हासिल की थी. फिर 2004 में भी जीत हासिल कर वह लोकसभा पहुंचे थे. इसके बाद 2009 और 2014 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

चंद्राणी की बात करें तो उनके पास न खुद की गाड़ी है, न घर और न ही ज्यादा बैंक बैलेंस. चुनावी हलफ़नामे में बताई संपत्ति के अनुसार चंद्राणी मुर्मू के पास सिर्फ 20000 कैश है. उनके पास दो बैंक अकाउंट है. उनमें से एक में 287 रुपए हैं और दूसरे में 293 रुपए हैं. चंद्राणी का किसी कंपनी में कोई शेयर नहीं है, और न ही कोई सेविंग्स. चंद्राणी के पास कोई लाइफ इंश्योकरेंस पॉलिसी भी नहीं है. चंद्राणी के पास 100 ग्राम के करीब गोल्ड है जो उनके माता पिता ने उन्हें दिया है. चंद्राणी के पास चुनाव का अनुभव भी नहीं है. चंद्राणी ने अपने चुनाव कैंपेन के बारे में कहा, ‘इस कैंपेन के दौरान लोगों से बहुत सारा प्यार मिला. जीत के बाद अब मैं अपने क्षेत्र के लोगों के लिए खूब काम करुंगी. उनकी समस्याओं का समाधान करने की पूरी कोशिश करुंगी.

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क्या ‘जय श्री राम’ की राजनीति का उत्तर ‘जय भीम’ का नारा है?

भारतीय जनमानस पर कथित धर्म और उनके आदर्शोने निसंशय रूप से अपनी अमिट छाप छोड़ी है. केवल किसी एक व्यक्ति, संस्था, समाज एवं प्रदेश ही नहीं बल्कि भारत के समस्त लोकजीवन को बदलने वाली राजनीति धर्माधिष्ठित है. सन नब्बे के दशक में देश में उभरे राम मंदिर आन्दोलन से देश में निर्मित वातावरण को समकालीन वास्तविकता में भी महसूस किया जा सकता है. क्या राम नाम की राजनीति ही इस देश का भवितव्य है ? नि:संशय भारत जैसे बहुलतावादी देश में कोई भी एक धर्मीय राजनीति सर्वांगीन कटुता को जन्म देने में कारीगर साबित होगी. मात्र, क्या धर्मवादी राजनीति का कोई पर्याय हो सकता है? अर्थात जरुर हो सकता है.

खैर, मूलतः देखे तो केवल हमारे देश में कानूनी तौर पर तो जाती-धर्म के नाम पर ‘वोट’ नहीं मांगे जा सकते. लेकिन हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव को देखे तो अनेक पार्टीयों के नेताओं को इसका धड़ल्ले से उलंघन करता पाया गया. यही नहीं बल्कि लोकसभा चुनाव के पश्चात सांसदों के शपथग्रहण समारोह में भी इस तरिके की नारेबाजी जोर शोर से चलती रही. इसी बिच देखने को मिले एक वाकिये ने सबका ध्यान अपनी और आकर्षित किया है. जो की निश्चित ही अधोरेखित करने लायक है. किस्सा यह था की, देश में मुस्लिम अल्पसंख्यांक समाज की राजनीति का चेहरा समझे जाने वाले ‘मजलिस-ऐ-इत्तिहादुल मुसल्लमिन’ के नेता असदुद्दीन ओवेसी, जैसे ही संसद में शपथ ग्रहण के लिए उठे वैसे ही कुछ सांसदों ने ‘वन्दे मातरम्’ और ‘जय श्री राम’ के नारे लगाना शुरू किया. इसी बिच ओवेसी जी उपरोधकता से इशारों में ही ज़रा और जोर से नारे लगाने को कहते रहे. नारे चलते रहे और शपथ भी. मात्र, अपने शपथग्रहण समाप्ति के उपरांत ओवेसी जी ने जो ‘जय भीम’ का नारा बुलंद किया वह भी उल्लेखनीय है. किन्तु क्या केवल सर्वसामान्य दृष्टिकोण से इस घटना को देखा जा सकता है ? और क्या देखा जाना चाहिए ?

मूलतः भारतीय संविधान के अनुच्छेद ९९ में ‘संसद के प्रत्येक सदन का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूप के अनुसार शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर हस्ताक्षर करेगा’ यह नवनिर्वाचित सांसदों के शपथ ग्रहण के लिए निर्देशित है. संविधान का संबंधित अनुच्छेद तथा तीसरी अनुसूची में निर्देशित शपथ का प्रारूप अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया को अधोरेखित करता है.

सामान्यतः, संसदीय मर्यादा तथा गांभीर्य का पालन करते हुवे निसंशय सांसदों को आपने विवेक को उजागर रखना चाहिए. मात्र लोकतंत्र का सर्वोच्य अधिष्ठान कहे जाने वाले संसद सभागार में अगर ‘जय श्री राम’ की नारे लगने लगे तो मूलतः सामजिक विकास और स्तरीय ढाचे में सबसे निचे नरंतर वंचितता और पिछड़ेपन के साथ ही नकार और वृथा संशय का शिकार होता दलित, बहुजन, आदिवासी, मुस्लिम तथा अन्य अल्पसंख्यांक समाज किस जगह अपनी गुहार लगाए ? और कोनसी शासकीय प्रणाली पर अपना विशवास रखे ? भारतीय राज्यघटना जहा ऐसे दबे-कुचले समुदाय को स्वातंत्र्य, समता, न्याय और बंधुता का अधिकार देती हो वही धर्म विशेष की थोती राजनीति उन्ही संविधानिक मूल्यों को ध्वस्त करने में साबित ना हो.

निसंशय, संसद में गूंजे ‘जय श्री राम’ के नारे जहा देश भर के दलित, बहुजन, आदिवासी और अल्पसंख्यांक तबके में नकारात्मकता का भाव पैदा करेंगे वहि उसी वक्त ‘जय भीम’ का नारा संविधान के मार्ग पर चलने को प्रोत्साहित करता रहेगा. लेकिन नारों के बदले नारों की राजनीति जबतक सकल समाज के विकास की कांक्षा में नहीं बदलती तब तक देश के संविधानकर्ताओं का सपना साकार हुवा ऐसा हमें नहीं मानना चाहिए.

अर्थात जब भी आप और हम ‘जय भीम’ का नारा लागाते है, तब आत्यंतिक नैसर्गिक रूप से शोषणाधिष्टित धर्म और उसका थोता तत्वज्ञान और उसके द्वारा बनाई हुई अनैसर्गिक समाजरचना के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर उजागर करते है. अर्थात इस नारे के बाद हमें अन्य किसी नारे तथा घोषणापत्र देने की जरुरत नहीं. लेकिन नि:संशय नारे भी जहा हमारी राजनीति है वहि राजनीति केवल नारों तक सिमित न रहे.

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4 दिन की बच्ची को एक विंग से दूसरे विंग भेजते रहे डॉक्टर, सीढ़ियों पर तोड़ा दम

बरेली। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली के सरकारी अस्पताल के दो विंगों में तीन घंटे तक उलझे रहने पर चार दिन के एक शिशु की मौत हो गई. उत्तर प्रदेश सरकार ने अस्पताल के एक विंग के पीठासीन डॉक्टर को निलंबित कर दिया है, जबकि दूसरे विंग के प्रभारी अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी है. उर्वशी नाम की इस बच्ची का जन्म 15 जून को एक प्राइवेट अस्पताल में हुआ था. बुधवार सुबह उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी, जिसके बाद उसे बरेली शहर के सरकारी अस्पताल में ले जाया गया. सरकारी अस्पताल में पुरुष विंग में ले जाने पर ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों ने बच्चे की जांच करने से इनकार कर दिया और बच्ची को उसी परिसर में स्थित महिला विंग में ले जाने के लिए कहा. परिजन बच्ची को लेकर महिला विंग पहुंचे तो वहां डॉक्टरों ने बताया कि यहां बेड कम हैं. इसे वापस पुरुष विंग लेकर जाइए. बच्ची की दादी कुसमा देवी ने बताया, ‘हम लोग तीन घंटे तक इधर-उधर घूमते रहे. क्योंकि उन्होंने एडमिट करने से मना कर दिया. आखिरकार हम लोगों ने उसे घर वापस ले जाने का फैसला किया. लेकिन उसने अस्पताल की सीढ़ियों पर ही दम तोड़ दिया.’

परिसर में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में माता-पिता को निर्देश देने के रिकॉर्ड बच्चे की मेडिकल पर्ची में दर्ज किए गए हैं. वहीं बच्ची की मौत के बाद दोनों विंगों के डॉक्टरों की बीच बहस भी हुई. स्थानीय लोग और पत्रकारों द्वारा शूट किए गए वीडियो में पुरुष विंग के इंचार्ज डॉ. कमलेंद्र स्वरूप और महिला विंग की इंचार्ज डॉ. अलका शर्मा बच्चे की मौत का आरोप एक दूसरे पर लगाते रहे. दोनों ने इसकी जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया.

इसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार रात को ट्वीट किया, ‘ड्यूटी पर लापरवाही बरतने पर बरेली अस्पताल के पुरुष विंग के चीफ मेडिकल सुपरिटेंडेंट को निलंबित करने का आदेश दिया है और महिला विंग की सुपरिटेंडेंट के खिलाफ विभागीय कार्यवाही के आदेश दिए गए हैं. नए उत्तर प्रदेश में अधिकारियों की कोई असंवेदनशीलता सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी.’

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फिल्म ‘धड़क’ की तर्ज पर साले ने दलित समाज के जीजा को मार डाला

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प्रतीकात्मक चित्र

भोपाल। हिन्दी फिल्म ‘धड़क’ (मराठी फिल्म- सैराट) की तर्ज पर तीन अप्रैल, 2019 को पंजाब के लुधियाना जिले में एक दलित राजमिस्त्री राजकुमार अहिरवार की हत्या कर दी गई. हत्या के आरोप में राजकुमार के साले और उसके दोस्त को गिरफ्तार किया गया है. ककरदा गांव के मूल निवासी 24 साल के अंकित सिंह और 23 साल के भूपेंद्र सिंह को लुधियाना पुलिस की टीम ने छतरपुर पुलिस की मदद से गिरफ्तार किया. पुलिस के मुताबिक 2011 में राजकुमार ने अपने गांव की दीपा से शादी की. दीपा के परिजन ठाकुर हैं. बाद में परिवार के डर से दोनों अपने गांव से भागकर दिल्ली आ गए और बाद में लुधियाना में बस गए जहां राजकुमार राजमिस्त्री का काम करने लगे. कुछ महीनों पहले अंकित ने अपनी बहन का पता लगाया और उससे कहा कि वह चाहता है कि उनके रिश्ते फिर से पहले जैसे हो जाएं. अप्रैल 2019 में अंकित भूपेंद्र के साथ लुधियाना गया और राजकुमार के घर पर कुछ दिनों के लिए रहा. तीन अप्रैल को अंकित और उसके दोस्त ने लुधियाना के घंटाघर इलाके से चाकू खरीदे और फिर राजकुमार को अपनी बाइक पर उन्हें रेलवे स्टेशन छोड़ने के लिए कहा.

अपने साले के प्लान से बेख़बर राजकुमार साहनेवाल शहर में एक नहर पर पहुंचा, तो अंकित ने राजकुमार का गला पीछे से काट दिया. इसके बाद वह जमीन पर गिर गया. अंकित और उसके दोस्त दोनों ने बाद में राजकुमार को कई बार चाकू से गोद दिया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उसकी मौत हो गई है. हत्या के बाद अंकित ने राजकुमार के फोन का इस्तेमाल किया और दीपा को सूचित किया कि उसने राजकुमार को परिवार और ठाकुरों की इज्ज़त के लिए मार दिया है.

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दलित सरपंच के पति की पीट-पीटकर हत्या

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नई दिल्ली। एक दलित सरपंच के पति की छह लोगों ने लाठियों और पाइपों से कथित तौर पर पीट-पीट कर बुधवार को हत्या कर दी. यह घटना उस समय हुई जब पीड़ित अपनी मोटरसाइकिल से रणपुर-बरवाला सड़क से गुजर रहे थे. पुलिस ने यह जानकारी दी.

घायल होने की वजह से आखिरी सांस लेने से पहले पीड़ित मांजीभाई सोलंकी ने अपने एक संबंधी को फोन पर दिए गए बयान में दावा किया कि पहले उनकी बाइक में एक कार ने टक्कर मार दी और इसके बाद उस कार में सवार पांच से छह लोगों ने उनकी पिटाई की.

सोलंकी का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें वह लगभग बेहोशी की स्थिति में हैं. इसी दौरान यह भी प्रकाश में आया है कि पीड़ित और उनकी पत्नी ने पिछले साल पुलिस से सुरक्षा मांगी थी.

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