17 जून को भारतीय राजनीति में एक ऐसी घटना घटी जो किसी प्रहसन से कम नहीं. भारतीय जनता पार्टी में जगत प्रकाश नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. कार्यकारी अध्यक्ष ? इससे पहले तो कार्यकारी अध्यक्ष नहीं बनाए जाते रहे हैं फिर अचानक पार्टी के संविधान और चलन के विपरीत क्यों कदम उठाया गया है ? इससे पहले भी तो कई अध्यक्ष रहे हैं जो पार्टी और सरकार के कई ओहदों पर आज भी काम कर रहे हैं, लेकिन अमित शाह में ऐसा क्या है कि पार्टी उनको अध्यक्ष बनाए रखना चाहती है अथवा वे अध्यक्ष बने रहना चाहते हैं. असल में जगत प्रकाश नड्डा की ताजपोशी ये बताती है कि भारतीय जनता पार्टी की संसदीय बोर्ड नाम की संस्था कमजोर हुई है. इस बोर्ड में कोई भी ऐसा सदस्य नहीं है जो ये कह सके कि न तो भाजपा अध्यक्ष का पद पार्ट टाम जॉब के रूप में संभाला जा सकता और न ही गृह मंत्रालय. ये बेहद चौंकाने वाली स्थिति है, जबकि इसमें मातृ संस्था संघ को भी दखल देना चाहिए था. दूसरा चौंकाने वाला पहलू ये है कि मीडिया की तरफ से भी इस तरह का कोई सवाल खड़ा नहीं किया गया. बड़े-बड़े राजनीतिक समीक्षक चुप्पी साधे बैठे हैं. जब भी कोई इस तरह का गैर पारंपरिक कदम उठाया जाता है उसके परिणाम-दुष्परिणाम दूरगामी होते हैं.
अभी के राजनीतिक परिदृश्य में यदि देखा जाए तो बाकी पार्टियों से अधिक लोकतंत्र है. बाकी पार्टियों में उनके प्रमुख परिवार से ही बनते आ रहे हैं, चाहे वह देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ही क्यों न हो. पार्टियों में लोकतंत्रात्मक दायरा बढ़ाने के लिए इस तरह के घटनाक्रम का भारत की सिविल सोसायटी, मीडिया, राजनीति के जानकारों की ओर से सवाल उठाए जाने चाहिए. जगत प्रकाश नड्डा की कार्यकारी अध्यक्ष पद पर ताजपोशी से ऐसा संदेश गया है कि अमित शाह की ओर से भाजपा के ऊपर एक तरह से एहसान किया गया है अगर वे चाहते तो गृहमंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों बने रह सकते थे, क्योंकि उनका कद अब इतना बढ़ गया है कि उनसे कोई सवाल करने की किसी हिम्मत नहीं है, जबकि स्थिति इसके उलट भी हो सकती है. भारतीय राजनीति में इस तरह के कुछ ताजा घटनाक्रमों का अवलोकन किया जा सकता है कि उनका क्या असर हुआ.
वर्ष 2003 में जब मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की हार हुई और उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं. इसके बाद तिरंगा यात्रा निकालने की वजह से उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और अपने सबसे भरोसेमंद सिपहसालार बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया. जब तिरंगा यात्रा खत्म हुई तो उमा भारती ने गौर से कुर्सी खाली करने के लिए कहा, लेकिन गौर ने गच्चा दे दिया. उसके बाद क्या-क्या हुआ किसी से छिपा नहीं. एक बार नीतिश कुमार ने जीतनराम मांझी के लिए कुर्सी खाली की, बाद में नीतिश कुमार को बिना सीएम कुर्सी के बेचैनी होने लगी तो रोज नई-नई नौटंकियां सामने आने लगीं. हालात अगर भाजपा में भी इस तरह के बनने लगें तो चौंकिएगा नहीं. सबसे अच्छा तरीका ये होता कि अमित शाह भी लालकृष्ण आडवाणी, वैंकेया नायडू, नितिन गड़करी, राजनाथ सिंह की तरह अध्यक्षी छोड़कर गृहमंत्रालय संभालते. पार्टी किसी और को पूरी तरह से अध्यक्ष बनाती और स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका देती. इसके बाद सरकार और पार्टी प्रमुखों का दायित्व होता कि वे आपस में तालमेल बनाकर रखें.
अमित शाह का पद छोडऩा क्यों जरूरी?
ये बहुत पहले से तय था कि और लोग समझ भी रहे थे कि यदि केंद्र में मोदी सरकार की वापसी होती है तो अमित शाह ही गृहमंत्री होंगे. गृहमंत्री होने का मतलब है कि लगभग डेढ़ अरब आबादी की आंतरिक चुनौतियों से सुरक्षा का जिम्मा. ये कोई छोटी जिम्मेदारी नहीं है. जब देश में आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर एक नहीं कई चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं ऐसी स्थिति में अमित शाह आधी अध्यक्षी कैसे संभाल सकते हैं. अमित शाह से भारत की जानता को दो बड़े मोर्चों पर निर्णायक कदम उठाने की उम्मीद है और जनता ये भी जानती है कि अमित शाह इसमें सक्षम भी हैं. ये दो बड़ी चुनौतियां हैं कश्मीर में आतंकवाद और देश में कई हिस्सों में फैला नक्सलवाद. आंतरिक सुरक्षा के मोर्च पर राजनाथ सिंह ने अपने कार्यकाल में बेहतर काम किया लेकिन जनता इस पर निर्णायक प्रहार चाह रही है. यह तभी संभव है जब अमित शाह पूरी तरह से गृहमंत्रालय संभालेंगे और संगठन के काम से मुक्त कर दिए जाएंगे. इन दो बड़े कामों के अलावा इस देश में कानून व्यवस्थाओं से जुड़े कई मामले है. इसके अलावा उम्मीद की जा रही है कि मोदी सरकार दूसरे कार्यकाल में पुलिस सुधार पर कुछ कदम उठाएगी. भारतीय पुलिस के कामकाज में गुणात्मक सुधार लाने के लिए इस पर बहुत मेहनत करने की आवश्यकता है. अंडर परफार्मर हैं जेपी नड्डा
एक तो जेपी नड्डा को पूरी तरह से अध्यक्षी नहीं दी गई है, यानि वे अमित शाह के मार्गदर्शन में काम करेंगे. स्वंय से कोई निर्णय नहीं ले पाएंगे, यानि अमित शाह से उनकी मुलाकात तभी हो पाएगी जब वे गृहमंत्रालय के कामों से फुरसत पाएंगे. ऐसी स्थिति में पार्टी के कामों में लेतलतीफी होगी जिससे स्वाभाविक है कि जेपी नड्डा का संगठन के मोर्चे पर प्रदर्शन प्रभावित होगा. दूसरी स्थिति ये बनेगी कि संगठन जो भी उपलब्धि हासिल करेगा वह अमित शाह के खाते में जाएगी और विफलताएं जेपी नड्डा के खाते में इसके पार्टी में खींचतान बढ़ेगी. जेपी नड्डा वैसे भी अंडर परफार्मर हैं. नड्डा पांच साल तक देश के स्वास्थ्य मंत्री रहे लेकिन उन्होंने उस मोर्चे पर कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया. जबकि मोदी सरकार के ही कई मंत्रियों ने अपने कामकाज से रिकार्ड कायम किए हैं. इनमें नितिन गड़करी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमण के नाम उल्लेखनीय हैं. संगठन में सत्ता के दो बिंदु होने से पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी भ्रमित रहेंगे. ऐसी स्थिति में केंद्र में भले ही अनुशासनहीनता के मामले सामने न आएं लेकिन राज्य इकाइयों में अनुशासनहीता और निष्क्रियता बढ़ेगी. ऐसी स्थिति में भारतीय राजनीति में अस्थिरता का दौर शुरू हो सकता है, जिससे फिलहाल भारतीय राजनीति उबरती हुई लग रही है.
शिव मंगल सिंह
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