न तो अध्यक्षी पार्ट टाइम है और न ही गृहमंत्रालय

17 जून को भारतीय राजनीति में एक ऐसी घटना घटी जो किसी प्रहसन से कम नहीं. भारतीय जनता पार्टी में जगत प्रकाश नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. कार्यकारी अध्यक्ष ? इससे पहले तो कार्यकारी अध्यक्ष नहीं बनाए जाते रहे हैं फिर अचानक पार्टी के संविधान और चलन के विपरीत क्यों कदम उठाया गया है ? इससे पहले भी तो कई अध्यक्ष रहे हैं जो पार्टी और सरकार के कई ओहदों पर आज भी काम कर रहे हैं, लेकिन अमित शाह में ऐसा क्या है कि पार्टी उनको अध्यक्ष बनाए रखना चाहती है अथवा वे अध्यक्ष बने रहना चाहते हैं. असल में जगत प्रकाश नड्डा की ताजपोशी ये बताती है कि भारतीय जनता पार्टी की संसदीय बोर्ड नाम की संस्था कमजोर हुई है. इस बोर्ड में कोई भी ऐसा सदस्य नहीं है जो ये कह सके कि न तो भाजपा अध्यक्ष का पद पार्ट टाम जॉब के रूप में संभाला जा सकता और न ही गृह मंत्रालय. ये बेहद चौंकाने वाली स्थिति है, जबकि इसमें मातृ संस्था संघ को भी दखल देना चाहिए था. दूसरा चौंकाने वाला पहलू ये है कि मीडिया की तरफ से भी इस तरह का कोई सवाल खड़ा नहीं किया गया. बड़े-बड़े राजनीतिक समीक्षक चुप्पी साधे बैठे हैं. जब भी कोई इस तरह का गैर पारंपरिक कदम उठाया जाता है उसके परिणाम-दुष्परिणाम दूरगामी होते हैं.

अभी के राजनीतिक परिदृश्य में यदि देखा जाए तो बाकी पार्टियों से अधिक लोकतंत्र है. बाकी पार्टियों में उनके प्रमुख परिवार से ही बनते आ रहे हैं, चाहे वह देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ही क्यों न हो. पार्टियों में लोकतंत्रात्मक दायरा बढ़ाने के लिए इस तरह के घटनाक्रम का भारत की सिविल सोसायटी, मीडिया, राजनीति के जानकारों की ओर से सवाल उठाए जाने चाहिए. जगत प्रकाश नड्डा की कार्यकारी अध्यक्ष पद पर ताजपोशी से ऐसा संदेश गया है कि अमित शाह की ओर से भाजपा के ऊपर एक तरह से एहसान किया गया है अगर वे चाहते तो गृहमंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों बने रह सकते थे, क्योंकि उनका कद अब इतना बढ़ गया है कि उनसे कोई सवाल करने की किसी हिम्मत नहीं है, जबकि स्थिति इसके उलट भी हो सकती है. भारतीय राजनीति में इस तरह के कुछ ताजा घटनाक्रमों का अवलोकन किया जा सकता है कि उनका क्या असर हुआ.

वर्ष 2003 में जब मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की हार हुई और उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं. इसके बाद तिरंगा यात्रा निकालने की वजह से उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और अपने सबसे भरोसेमंद सिपहसालार बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया. जब तिरंगा यात्रा खत्म हुई तो उमा भारती ने गौर से कुर्सी खाली करने के लिए कहा, लेकिन गौर ने गच्चा दे दिया. उसके बाद क्या-क्या हुआ किसी से छिपा नहीं. एक बार नीतिश कुमार ने जीतनराम मांझी के लिए कुर्सी खाली की, बाद में नीतिश कुमार को बिना सीएम कुर्सी के बेचैनी होने लगी तो रोज नई-नई नौटंकियां सामने आने लगीं. हालात अगर भाजपा में भी इस तरह के बनने लगें तो चौंकिएगा नहीं. सबसे अच्छा तरीका ये होता कि अमित शाह भी लालकृष्ण आडवाणी, वैंकेया नायडू, नितिन गड़करी, राजनाथ सिंह की तरह अध्यक्षी छोड़कर गृहमंत्रालय संभालते. पार्टी किसी और को पूरी तरह से अध्यक्ष बनाती और स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका देती. इसके बाद सरकार और पार्टी प्रमुखों का दायित्व होता कि वे आपस में तालमेल बनाकर रखें.

अमित शाह का पद छोडऩा क्यों जरूरी?

ये बहुत पहले से तय था कि और लोग समझ भी रहे थे कि यदि केंद्र में मोदी सरकार की वापसी होती है तो अमित शाह ही गृहमंत्री होंगे. गृहमंत्री होने का मतलब है कि लगभग डेढ़ अरब आबादी की आंतरिक चुनौतियों से सुरक्षा का जिम्मा. ये कोई छोटी जिम्मेदारी नहीं है. जब देश में आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर एक नहीं कई चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं ऐसी स्थिति में अमित शाह आधी अध्यक्षी कैसे संभाल सकते हैं. अमित शाह से भारत की जानता को दो बड़े मोर्चों पर निर्णायक कदम उठाने की उम्मीद है और जनता ये भी जानती है कि अमित शाह इसमें सक्षम भी हैं. ये दो बड़ी चुनौतियां हैं कश्मीर में आतंकवाद और देश में कई हिस्सों में फैला नक्सलवाद. आंतरिक सुरक्षा के मोर्च पर राजनाथ सिंह ने अपने कार्यकाल में बेहतर काम किया लेकिन जनता इस पर निर्णायक प्रहार चाह रही है. यह तभी संभव है जब अमित शाह पूरी तरह से गृहमंत्रालय संभालेंगे और संगठन के काम से मुक्त कर दिए जाएंगे. इन दो बड़े कामों के अलावा इस देश में कानून व्यवस्थाओं से जुड़े कई मामले है. इसके अलावा उम्मीद की जा रही है कि मोदी सरकार दूसरे कार्यकाल में पुलिस सुधार पर कुछ कदम उठाएगी. भारतीय पुलिस के कामकाज में गुणात्मक सुधार लाने के लिए इस पर बहुत मेहनत करने की आवश्यकता है. अंडर परफार्मर हैं जेपी नड्डा

एक तो जेपी नड्डा को पूरी तरह से अध्यक्षी नहीं दी गई है, यानि वे अमित शाह के मार्गदर्शन में काम करेंगे. स्वंय से कोई निर्णय नहीं ले पाएंगे, यानि अमित शाह से उनकी मुलाकात तभी हो पाएगी जब वे गृहमंत्रालय के कामों से फुरसत पाएंगे. ऐसी स्थिति में पार्टी के कामों में लेतलतीफी होगी जिससे स्वाभाविक है कि जेपी नड्डा का संगठन के मोर्चे पर प्रदर्शन प्रभावित होगा. दूसरी स्थिति ये बनेगी कि संगठन जो भी उपलब्धि हासिल करेगा वह अमित शाह के खाते में जाएगी और विफलताएं जेपी नड्डा के खाते में इसके पार्टी में खींचतान बढ़ेगी. जेपी नड्डा वैसे भी अंडर परफार्मर हैं. नड्डा पांच साल तक देश के स्वास्थ्य मंत्री रहे लेकिन उन्होंने उस मोर्चे पर कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया. जबकि मोदी सरकार के ही कई मंत्रियों ने अपने कामकाज से रिकार्ड कायम किए हैं. इनमें नितिन गड़करी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमण के नाम उल्लेखनीय हैं. संगठन में सत्ता के दो बिंदु होने से पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी भ्रमित रहेंगे. ऐसी स्थिति में केंद्र में भले ही अनुशासनहीनता के मामले सामने न आएं लेकिन राज्य इकाइयों में अनुशासनहीता और निष्क्रियता बढ़ेगी. ऐसी स्थिति में भारतीय राजनीति में अस्थिरता का दौर शुरू हो सकता है, जिससे फिलहाल भारतीय राजनीति उबरती हुई लग रही है.

शिव मंगल सिंह

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विवादों में फिल्म ‘आर्टिकल 15’, फिल्म निर्माता को कानूनी नोटिस

नई दिल्ली। फिल्म ‘आर्टिकल 15’ विवादों में घिरती नजर आ रही है. अखिल भारतीय ब्राह्मण एकता परिषद ने फिल्म को जाति के आधार पर समाज को बांटने वाला और ब्राह्मणों का अपमान करने वाली बताते हुए आपत्ति उठाई है. अखिल भारतीय ब्राह्मण एकता परिषद ने फिल्म के निर्माता निर्देशक को कानूनी नोटिस जारी कर फिल्म से आपत्तिजनक हिस्सा हटाने की मांग की है. इस फिल्म का ट्रेलर 30 मई को रिलीज हुआ था और 28 जून को फिल्म रिलीज होने वाली है.

 

आपत्ति की वजह- फिल्म के ट्रेलर के मुताबिक फिल्म में ऊंची जाति के अभियुक्तों द्वारा नीची जाति से दुष्कर्म और हत्या का अपराध करने का जिक्र है साथ ही जाति आधारित संवाद और टिप्पणियां हैं. संस्था की ओर से वकील सुनील कुमार तिवारी ने कानूनी नोटिस भेज कर नोटिस मिलने के 24 घंटे के भीतर फिल्म के जारी ट्रेलर की वीडियो क्लिप से आपत्तिजनक भाग हटाने की मांग की है.

फिल्‍म निर्माता को कानूनी नोटिस- नोटिस में कहा गया है कि अगर तय समय में यू-ट्यूब, सोशल मीडिया आदि पर जारी वीडियो क्लिप से आपत्तिजनक हिस्सा नहीं हटाया गया तो संस्था आपराधिक व दीवानी कानूनी कार्यवाही करेगी. नोटिस में कहा गया है कि गत 30 मई को यूट्यूब ऑनलाइन चैनल और सोशल मीडिया पर जारी फिल्म ‘आर्टिकल 15 के ट्रेलर से हिंदू ब्राह्मणों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं. यह सिनेमेटोग्राफी एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन है. इसके अलावा फिल्म संविधान की भावना और प्रावधानों का भी उल्लंघन करती है. इस फिल्म में ब्राह्मणों और अन्य हिंदू जातियों की प्रतिष्ठा खराब करने की कोशिश हुई है जो कि अपराध है.

नोटिस में यह भी उल्‍लेख किया गया है कि संविधान मौलिक अधिकारों के हनन की इजाजत नहीं देता. किसी को भी आम जनता की निगाह में किसी व्यक्ति, समूह और उसकी परंपराओँ, उसकी जाति या धर्म को कमतर करने का अधिकार नहीं है. यह फिल्म ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा को हानि पहुंचा सकती है जो कि आइपीसी की धारा 499 में दंडनीय अपराध है.

कानूनी नोटिस में वकील ने कहा है कि एक समूह विशेष हिंदू ब्राह्मण से ताल्लुक रखने वाले उनके क्लाइंट को अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान पूर्वक जीवन जीने का मौलिक अधिकार है. सेंसर बोर्ड ऑफ इंडिया नागरिकों के मानवीय, मौलिक और प्राकृतिक अधिकारों का संरक्षक है. इसलिए सेंसर बोर्ड प्रमाणपत्र की आड़ में लोगों की प्रतिष्ठा और सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली कोई भी ऑडियो वीडियो फिल्म जारी नहीं की जा सकती. अगर ऐसी कोई गैर कानूनी इजाजत दी गई है तो उसे तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए.

समाज में शांति भंग हो सकती है- इस फिल्म से समाज में विभिन्न जातियों और धर्मों का आपसी सौहार्द बिगड़ सकता है. शांति भंग हो सकती है. इतना ही नहीं फिल्म का जारी किया गया ट्रेलर अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के आत्मसम्मान के खिलाफ है. उसमें उन्हें दुष्कर्म और हत्या जैसे जघन्य अपराध का पीड़ित दिखाया गया है. आरोप लगाया गया है कि इस फिल्म में जानबूझकर ब्राह्मणों की भावनाओं को आहत करने और अन्य समुदायों के धार्मिक विश्वास को अपमानित करने की कोशिश की गई है. जो कि दंडनीय अपराध है.

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जानलेवा बीमारियों से निपटने के लिए ठोस उपाय क्यों नहीं करती सरकार

आप इसे चमकी बीमारी का नाम दे सकते हैं. डिजीटल युग में थोड़ा हैपनिंग और नया भी लगता है. लेकिन मुद्दे पर मेरी अपनी समझ कहती है कि ये दिमागी बुखार (एक्यूट एंसेफिलाइटिस सिंड्रोम) ही है. 100 नवजातों से ज्यादा दम तोड़ चुके हैं, जनता को गुस्सा तो आएगा ही – ये सोशल मीडिया में नीतीश कुमार और मोदी सरकार को पानी पी – पीकर कोसने और गाली देने से कुछ नहीं होगा. हर साल, इसी मौसम में आपको गुस्सा क्यों नहीं आता? ये बीमारी मुजफ्फरपुर में कोई नई नहीं है. सालाना 100 से ज्यादा नवजातों का यहां मर जाना नया तो नहीं है. हर साल इससे भी ज्यादा बच्चे स बीमारी से मरते हैं. आम लोग इसे चमकी बीमारी कह रहे हैं, डॉक्टर इसे एंसेफिलाइटिस का नाम देते हैं. कई साइंटिस्टों ने यहां तक कहा है कि लीची बागानों के आसपास रहने वाले बच्चे इस संक्रमण से मरते हैं.

क्या मेरे सोशल मीडिया में चीखने या वहां जाकर लोगो की मदद करने से समस्या हल होगी? नहीं, मेरा मानना है कि फिलहाल वहां जाकर कोई मदद भी मददगार नहीं हो सकती. दरअसल, अस्पताल पूरी समस्या के आखिरी पड़ाव पर आता है. बच्चे आखिरकार अस्पतालों में जाकर ही दम तोड़ते हैं इसीलिए स्वास्थ्य विभाग या स्वास्थ्य मंत्रालय पर नाकामी का ठीकरा फोड़ना आसान है. जबकि हकीकत ये है कि मुजफ्फरपुर में कुपोषण, साफ पीने का पानी और मच्छरों का संक्रमण सबसे बड़ी चुनौती है. खबरों में बच्चों के चमकी बीमारी से मरने की खबर तो आ रही है लेकिन कोई भी इस जिले में अति-कुपोषित और कुपोषित बच्चों को लेकर कोई बात नहीं कर रहा. बिहार के ‘सुशासन’ में बच्चों के भूखे रहने की बात कोई करता ही नहीं है. दूसरा इस क्षेत्र में मच्छरों का प्रकोप अन्य जिलों से ज्यादा है. ये एक खास किस्म के मच्छर हैं जो इस बीमारी को बच्चों में पहुंचाने का काम करते हैं.

कमाल की बात यह है कि गोरखपुर में इसी बीमारी से लड़ने के लिए 4000 करोड़ रुपए खर्च करके रिसर्च सेंटर बनाया गया, अस्पतालों में खास विभाग बनाए गए. मच्छरों से निबटने के लिए राज्य और केंद्र सरकार पैसा देती रही है. यहां कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी काम कर रही है. लेकिन इसके उलट मुजफ्फरपुर में सिर्फ केंद्र सरकार की एक टीम हर साल पहुंचती है और अपनी वाहियात सी रिपोर्ट बनाती और सरकार को सौंप देती है. इससे आगे कुछ नहीं.

जरुरत है कि मुजफ्फरपुर में भी कम से कम दो रिसर्च सेंटर बने. कुपोषण से लड़ने के लिए राज्य व केंद्र सरकार परिवारों को अनाज दें. मच्छरों की समस्या से निबटने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय साथ मिलकर काम करे और इन्हें पनपने से रोकें. साफ पीने के पानी का बंदोबस्त किया जाए. बिना इन ठोस कदमों के इस समस्या का निदान नहीं हो सकता.

PS: आमिर खान और प्रसून जोशी को “कुपोषण भारत छोड़ो” ऐड पर 400 करोड़ रुपए लूटा दिया गया. अच्छा होता अगर यही पैसा इन गरीबों को राशन देने में लगा देते.

लेखक- प्रदीप सुरीन वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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पश्चिम बंगाल : दलित प्रोफेसरों के अपमान को लेकर विभागीय प्रमुखों व अध्यक्षों का इस्तीफा

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पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित रबींद्र भारतीय विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति (एससी) के चार प्रोफेसरों का कथित रूप से जाति के आधार पर अपमान किए जाने की घटना सामने आई है. मामला तब और बढ़ गया जब इसके विरोध में विश्वविद्यालय के चार विभागों के प्रमुखों और तीन अध्यक्षों (डीन) ने अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी को मंगलवार को विश्वविद्यायल का दौरान करना पड़ा.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक कक्षा में अनुपस्थिति को लेकर (दलित) शिक्षकों की कुछ छात्रों के समूह से बहस हो गई थी. उसी दौरान उनका अपमान किया गया. विश्वविद्यालय के कई छात्र और स्टाफ इस घटना के लिए सतारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. उनका कहना है कि टीएमसी की यूनियनों ने ही प्रोफेसरों का अपमान किया है. इस बीच, विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर (वीसी) बासु राय चौधरी ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं.

साभार- हिंदुस्तान टाइम्स Read it also- यूपी: हार पर कांग्रेस का मंथन, कई द‍िग्‍गज नदारद

‘एक देश, एक चुनाव’ को मायावती ने बताया छलावा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को ‘एक देश, एक चुनाव’ पर सभी राजनीतिक पार्टियों की बैठक बुलाई है. बैठक में बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती शामिल नहीं होंगी. मायावती ने पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि ये राष्ट्रीय समस्याओं से ध्यान बांटने का प्रयास व छलावा मात्र है. ईवीएम पर बैठक होती तो मैं जरूर शामिल होती.

मायावती ने ट्विटर पर लिखा, ‘किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव कभी कोई समस्या नहीं हो सकती है और न ही चुनाव को कभी धन के व्यय-अपव्यय से तौलना उचित है. देश में ‘एक देश, एक चुनाव’ की बात वास्तव में गरीबी, महंगाई, बेरोजबारी, बढ़ती हिंसा जैसी ज्वलन्त राष्ट्रीय समस्याओं से ध्यान बांटने का प्रयास व छलावा मात्र है.’

बसपा अध्यक्ष मायावती ने कहा, ‘बैलेट पेपर के बजाए ईवीएम के माध्यम से चुनाव की सरकारी जिद से देश के लोकतंत्र व संविधान को असली खतरे का सामना है. ईवीएम के प्रति जनता का विश्वास चिन्ताजनक स्तर तक घट गया है. ऐसे में इस घातक समस्या पर विचार करने हेतु अगर आज की बैठक बुलाई गई होती तो मैं अवश्य ही उसमें शामिल होती.’ देश में पिछले काफी समय से एक साथ विधानसभा और लोकसभा चुनाव कराने को लेकर चर्चा छिड़ी है. इसी बहस को आगे बढ़ाने के लिए आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राजनीतिक दलों के प्रमुखों की बैठक बुलाई है. इस बैठक में राष्ट्रीय पार्टियों, क्षेत्रीय पार्टियों के अध्यक्ष को शामिल होना है. ये बैठक बुधवार दोपहर 3 बजे संसद भवन की लाइब्रेरी में होगी. तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस बैठक में आने से इनकार कर दिया है.

इस बैठक में वन नेशन वन पोल के अलावा भी कई मुद्दों पर बात होगी. 2022 में भारत अपनी आजादी के 75 साल पूरा कर लेगा, इसे मोदी सरकार बड़े रूप में मनाना चाहती है, जिस पर सभी दलों से बात हो सकती है. साथ ही महात्मा गांधी की 150वीं जयंती का जश्न और सदन में कामकाज के सुचारू रूप से चलने को लेकर बैठक में प्रधानमंत्री बात करेंगे.

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अब बसपा ने प्रत्याशी चयन पर लगाई निगाहें

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लखनऊ। बसपा सुप्रीमो मायावती मंगलवार दोपहर राजधानी लखनऊ पहुंचीं और पदाधिकारियों से फोन पर बात की. इस बातचीत के आधार पर ही उपचुनाव में प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया शुरू हो गई है. मायावती ने उपचुनाव के संबंध में 23 जून को एक बैठक बुलाई है, जिसमें वह उपचुनाव वाले जिलों के को-ऑर्डिनेटरों और प्रदेश पदाधिकारियों के साथ बातचीत करेंगी.

सपा और बसपा ने मिलकर इस बार लोकसभा चुनाव लड़ा था. हालांकि, अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद मायावती ने पहली बार उपचुनाव लड़ने का फैसला किया है. इस उपचुनाव में सपा से अलग होकर बसपा लड़ेगी. लिहाजा, अभी से मायावती ने इसकी तैयारियां शुरू कर दी हैं. सूत्र बताते हैं कि मायावती ने दिल्ली में समीक्षा करने के बाद लखनऊ पहुंचते ही पदाधिकारियों से फोन पर बात की. उन्होंने पदाधिकारियों से चुनाव बाद के हालात और पार्टी की स्थिति का जायजा लिया. माना जा रहा है कि यह फीडबैक ही प्रत्याशी चयन के लिए आधार बनेगा. कुछ पदाधिकारियों ने संभावित प्रत्याशियों के नाम पर भी मायावती से चर्चा की. इसके बाद उन्होंने 23 जून को बैठक बुलाई है, जिसमें वह विस्तृत बातचीत करेंगी.

सूत्र बताते हैं कि मायावती की निगाहें उपचुनाव पर बेहद संजीदगी से लगी हैं. 12 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें मायावती अपने खाते में चाहती हैं, ताकि विधानसभा में वह खुद को और मजबूत कर सकें. ऐसी स्थिति में और सपा के साथ तालमेल बेहतर रहते हुए विधान परिषद और राज्यसभा की सीटों की संभावना को भी जिंदा रखा जा सकता है. 2017 में बसपा को 19 सीटें मिली थीं. लोकसभा चुनाव में बसपा के एक विधायक के सांसद बनने की वजह से विधायकों की संख्या 18 रह गई है.

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चमकी बुखारः लापरवाही की वजह मरीजों की पृष्ठभूमि तो नहीं

बिहार के मुजफ्फरपुर में जिस तरह एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) यानी चमकी बुखार की वजह से अभी तक 108 बच्चे अपनी जान गंवा चुके हैं, वह कोई आम खबर नहीं है. जिस देश में चार सैनिकों के मारे जाने पर हर जिले में लोग कैंडल मार्च निकालने लगते हैं, उसी देश में 100 से ज्यादा मां-बाप के आंखों के सामने उनके बच्चों की जान चले जाना और उस पर शासन, सरकार और व्यवस्था की कमान संभाले अधिकारियों और नेताओं-मंत्रियों की चुप्पी गंभीर सवाल उठाती है.

हद तो यह है कि मरने वाले बच्चों की संख्या 100 पार कर जाने के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हाल जानने मुजफ्फरपुर पहुंचे. यह तब है जब मुजफ्फरपुर जिला पटना से महज डेढ़ से दो घंटे की दूरी पर है. नीतीश के पहुंचने पर मृतक के परिवार वालों और इस घटना से भड़के लोगों ने जिस तरह ‘गो बैक’ के नारे लगाएं वह भी अचंभित करने वाला नहीं था. लोग परेशान है. खबर है कि अभी भी अस्पतालों में भर्ती बीमार बच्चों की संख्या 414 हो गई है. चमकी बुखार से पीड़ित ज्यादातर मरीज मुजफ्फरपुर के सरकारी श्रीकृष्णा मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल (एसकेएमसीएच) और केजरीवाल अस्पताल में एडमिट हैं.

अब तक एसकेएमसीएच हॉस्पिटल में 89 और केजरीवाल अस्पताल में 19 बच्चों की मौत हो गई है. जिन बच्चों की मौत हुई है, तकरीबन सारे के सारे बच्चे गरीब परिवार के और दलित-पिछड़े समाज के बच्चे हैं. ऐसे में क्या यह सवाल गलत होगा कि इन बच्चों को इसलिए मरने के लिए छोड़ दिया गया क्योंकि ये सब गरीब थे. खुदा न करे कि इस बुखार की चपेट में अब एक भी बच्चा आए. सिर्फ मुजफ्फरपुर ही नहीं, बल्कि देश के हर कोने के बच्चे सुरक्षित रहें. लेकिन क्या इस बुखार की चपेट में सभ्य समाज के लोगों के बच्चों के आने के बाद भी सरकार इसी तरह सोई रहती, जाहिर है नहीं. अफसोस के साथ यह सवाल इसलिए पूछना पर रहा है क्योंकि भारत में हर वक्त ऐसा ही होता है. यहां हर किसी की हैसियत अमीरी और गरीबी के साथ उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से तय होती है. चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों के इलाज को लेकर सरकार और प्रशासन ने जिस तरह से लापरवाही बरती है, उसका प्रायश्चित यही है कि अब इस बुखार से किसी भी बच्चे की जान न जाए, किसी भी मां की गोद सूनी न हो.

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करप्शन पर मोदी सरकार का दूसरा बड़ा वार, फिर 15 अफसरों को जबरन किया रिटायर

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नरेंद्र मोदी सरकार 2.0 में सरकारी विभागों की सफाई यानी नाकारा अफसरों को निकालने का सिलसिला लगातार जारी है. मंगलवार, 18 जून को फिर सरकार ने वित्त मंत्रालय के 15 सीनियर अफसरों को जबरन रिटायर करने का निर्णय लिया. इनमें मुख्य आयुक्त, आयुक्त और अतिरिक्त आयुक्त स्तर के अधिकारी शामिल हैं. इनमें से ज्यादातर के ख‍िलाफ भ्रष्टाचार, घूसखोरी के आरोप हैं.

मंगलवार, 18 जून को केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और कस्टम (Central Board of Indirect Taxes and Customs) विभाग के जबरन रिटायर किए गए अफसरों का पद और नाम इस प्रकार है- प्रिंसिपल कमिश्नर डॉ. अनूप श्रीवास्तव, कमिश्नर अतुल दीक्ष‍ित, कमिश्नर संसार चंद, कमिश्नर हर्षा, कमिश्नर विनय व्रिज सिंह, अडिशनल कमिश्नर अशोक महिदा, अडिशनल कमिश्नर वीरेंद्र अग्रवाल, डिप्टी कमिश्नर अमरेश जैन, ज्वाइंट कमिश्नर नलिन कुमार, असिस्टेंट कमिश्नर एसएस पाब्ना, असिस्टेंट कमिश्नर एसएस बिष्ट, असिस्टेंट कमिश्नर विनोद सांगा, अडिशनल कमिश्नर राजू सेकर डिप्टी कमिश्नर अशोक कुमार असवाल और असिस्टेंट कमिश्नर मोहम्मद अल्ताफ.

इसके पहले भी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभालते ही सख्त फैसला लिया था. पिछले हफ्ते टैक्स विभाग के ही 12 वरिष्ठ अफसरों को जबरन रिटायर (Compulsory Retirement) कर दिया गया था. डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल ऐंड एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स के नियम 56 के तहत वित्त मंत्रालय के इन अफसरों को सरकार समय से पहले ही रिटायरमेंट दे रही है. इस तरह अब तक कुल 27 अफसरों को जबरन रिटायर कर दिया गया है.

पिछले हफ्ते नियम 56 के तहत रिटायर किए गए सभी अधिकारी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में चीफ कमिश्नर, प्रिंसिपल कमिश्नर्स और कमिश्नर जैसे पदों पर तैनात थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक इनमें से कई अफसरों पर कथित तौर पर भ्रष्टाचार, अवैध और बेहिसाब संपत्ति के अलावा यौन शोषण जैसे गंभीर आरोप थे.

क्या है नियम 56?

दरअसल, रूल 56 का इस्तेमाल ऐसे अधिकारियों पर किया जा सकता है जो 50 से 55 साल की उम्र के हों और 30 साल का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं. सरकार के जरिए ऐसे अधिकारियों को अनिर्वाय रिटायरमेंट दिया जा सकता है. ऐसा करने के पीछे सरकार का मकसद नॉन-फॉर्मिंग सरकारी सेवक को रिटायर करना होता है. सरकार के जरिए अधिकारियों को अनिवार्य रिटायरमेंट दिए जाने का नियम काफी पहले से ही प्रभावी है.

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मायावती ने लगाया सरकार पर दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ने का आरोप

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बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती ने लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ने का आरोप लगाते हुए मंगलवार को कहा कि सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए. मायावती ने ट्वीट कर कहा, “उप्र के प्रतापगढ़ में दलित किसान की जलाकर कथित हत्या, डॉक्टरों की कल हड़ताल के दौरान लोहिया अस्पताल में उत्पात वास्तव में ज्यादती की उस श्रृंखला की ताजा कड़ी है जो लोकसभा चुनाव के बाद दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों पर हो रहे हैं.”

बसपा प्रमुख ने इसकी निंदा करते हुए कहा कि ये घटनाएं अति-दुःखद और निन्दनीय हैं. उन्होंने सरकार से इस पर ध्यान देने की मांग की. मायावती ने एक अन्य ट्वीट में पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों की हड़ताल के बारे में कहा, “प. बंगाल सरकार झुकी और डॉक्टरों की एक दिन की अखिल भारतीय हड़ताल सोमवार की शाम को समाप्त हो गई. परन्तु इस दौरान दिल्ली और उत्तर प्रदेश सहित देश भर में करोड़ों मरीजों का जो बुरा हाल हुआ और अनेकों मासूम जानें गई, उनकी खबरों से आज के अखबार भरे पड़े हैं. लेकिन इन बेगुनाह लोगों की परवाह सरकार तथा कोई और क्यों करे?”

मायावती लोकसभा चुनाव के बाद से केंद्र सरकार पर अपने ट्विटर अकाउंट के जरिए लगातार निशाना साध रही हैं. पिछले दिनों उन्होंने बढ़ती बेरोजगारी को राष्ट्रीय समस्या करार देते हुए इसके लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया था. मायावती ने बेरोजगारी पर सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के हवाले से ट्वीट कर कहा था कि ‘देश में बेरोजगारी ज्वलन्त राष्ट्रीय समस्या है. सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि पिछले सालों में गांवों के युवाओं में बेरोजगारी की दर तीन गुना बढ़ गई है जो इस धारणा के विपरीत है कि शहरों की तुलना में गांवों में बेरोजगारी कम रहती है’. उन्होंने पूछा ‘क्या सरकारी नीतियां इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं?’

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एनआईटी हमीरपुर के छात्र को उत्तर भारत में सबसे बड़ा पैकेज

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) हमीरपुर के एक प्रशिक्षु को उत्तर भारत के अब तक के सबसे बड़े सवा करोड़ के सालाना पैकेज पर नौकरी मिली है. अमेरिका की नामी मल्टी नेशनल कंपनी ने साफ्टवेयर इंजीनियर परम सिंह को 1.20 करोड़ सालाना पैकेज का ऑफर लेटर दिया है.

इस प्रशिक्षु ने पांच साल के भीतर कंप्यूटर साइंस में एक साथ बीटेक और एमटेक की दोहरी डिग्री हासिल की है. आमतौर पर बीटेक के लिए चार वर्ष और एमटेक के लिए अतिरिक्त दो वर्ष का डिग्री कोर्स होता है.

चयनित प्रशिक्षु इंजीनियर उत्तरप्रदेश का रहने वाला है. इस छात्र की कंप्यूटर भाषाओं और कोडिंग में स्पेशलाइजेशन है. विषय पर उसकी पकड़ को देख उसे पढ़ाने वाले प्राध्यापक भी कई बार हैरान रह जाते थे. पिछले साल एनआईटी का सर्वाधिक पैकेज 75 लाख रुपये सालाना था.

लेकिन इस बार करीब सवा करोड़ के इस पैकेज को उत्तर भारत का अब तक का रिकॉर्ड माना जा रहा है. उत्तर भारत में एनआईटी दिल्ली, एनआईटी जालंधर, श्रीनगर, कुरुक्षेत्र और हमीरपुर आते हैं. एनआईटी हमीरपुर ने उत्तर भारत के सभी आधा दर्जन एनआईटी को पछाड़ते हुए यह उपलब्धि हासिल की है.

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पाकिस्तान के आगाह करने के 48 घंटे बाद ही घाटी में 3 आतंकी हमले

प्रतीकात्मक चित्र

नई दिल्ली। पाकिस्तान द्वारा भारत को आतंकी हमले को लेकर सूचना दिए जाने के 48 घंटे बाद ही घाटी में सोमवार को सुरक्षाबलों पर तीन आतंकी हमले हुए. इसमें से अनंतनाग में हुई मुठभेड़ के दौरान मेजर शहीद हो गए. वहीं दो अन्य हमलो में सुरक्षाबल जख्मी हुए.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान की ओर से भारत को आगाह किया गया था कि कुछ दिन पहले मारे गए अंसार गजावत उल हिंद के कमांडर जाकिर मूसा की मौत का बदला लेने के लिए आतंकी हमले की योजना बना रहे हैं. इस सूचना को पाक ने अमेरिका से भी साझा किया था, जिसके बाद यूएस की ओर से भी भारत को इसके इनपुट दिए गए थे.

24 घंटों में तीन हमले

पहला हमला अनंतनाग जिले के अचबल में सुरक्षाबलों को आतंकियों के छिपे होने की सूचना मिली थी. इसके बाद इलाके में तलाशी अभियान चलाया गया. आतंकियों की इसकी भनक लगी और उन्होंने सुरक्षाबलों पर हमला करना शुरू कर दिया. इस हमले में एक मेजर की मौत हुई वहीं एक अन्य अधिकारी और दो जवान घायल हो गए. मुठभेड़ के दौरान एक आतंकी को भी ढेर कर दिया गया, जिससे हथियार और गोला बारूद भी बरामद किया गया है.

दूसरा हमला पुलवामा के अरिहल गांव में सेना की राष्ट्रीय राइफल्स के एक वाहन पर आईईडी के जरिए हमला किया गया. एक अधिकारी ने बताया जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले में सोमवार को आतंकवादियों ने सेना के एक गश्ती काफिले को निशाना बनाते हुए एक वाहन से बंधे आईईडी में विस्फोट कर दिया, जिसमें नौ जवान और दो नागरिक घायल हो गए. उन्होंने बताया दक्षिण कश्मीर के इस जिले में अरिहाल-लस्सीपोरा सड़क पर आतंकवादियों ने ईदगाह अरिहाल के पास 44 राष्ट्रीय रायफल्स के कई वाहनों वाले गश्ती दल को निशाना बनाया. हमला होते ही सेना के जवान तुरंत हरकत में आ गए और इलाके को घेर लिया और किसी दूसरे हमले को टालने के लिए हवा में गोलियां चलाईं.

तीसरा हमला सेना के वाहन पर हमले के बाद त्राल में सीआरपीएफ की 180वीं बटैलियन के मुख्यालय पर ग्रेनेड फेंककर हमला किया गया. अज्ञात हमलावरों ने मुख्यालय में मौजूद जवानों को निशाना बनाने की साजिश रची, हालांकि यह ग्रेनेड कैंप के बाहर की गिरकर फट गया. इस हमले में किसी के भी हताहत होने की सूचना नहीं है.

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बीजेपी सांसद ओम बिड़ला होंगे लोकसभा के नए स्पीकर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार चौंकाया है. राजस्थान के कोटा से बीजेपी सांसद ओम बिड़ला लोकसभा के नए स्पीकर होंगे. लोकसभा अध्यक्ष का नाम घोषित किए जाने के साथ ही पीएम मोदी ने एक बार फिर अपने फैसले से सबको चौंका दिया है.

ओम बिड़ला की पत्नी अमिता बिड़ला ने कहा कि यह हमारे लिए बहुत गर्व और खुशी का क्षण है. हम उन्हें (ओम बिड़ला को) चुनने के लिए कैबिनेट के बहुत आभारी हैं.

लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव आज होना है. लिहाजा लोकसभा स्पीकर के पद को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं. बीजेपी से जीतकर आए वरिष्ठ नेताओं के नाम पर मंथन चल रहा था.

लोकसभा अध्यक्ष बनने की रेस में पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी, राधामोहन सिंह, रमापति राम त्रिपाठी, एसएस अहलुवालिया और डॉ. वीरेंद्र कुमार जैसे कई दिग्गज नेताओं के नाम शामिल बताए जा रहे थे. मोदी सरकार के 2.0 में लोकसभा अध्यक्ष के पद पर कौन विराजमान होगा, इसका फैसला अब हो गया.

बहरहाल, राजस्थान के कोटा से बीजेपी सांसद ओम बिड़ला लोकसभा के नए स्पीकर होंगे. ओम बिड़ला आज ही अपना नामांकन दाखिल करेंगे, जिसके बाद बुधवार को सदन में इसपर मतदान होगा. क्योंकि NDA के पास लोकसभा में बहुमत है, ऐसे में उनका ही लोकसभा स्पीकर बनना तय माना जा रहा है.

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विराट, रोहित व राहुल ने रचा इतिहास,

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विराट कोहली को मौजूदा दौर में दुनिया का सबसे खतरनाक बल्लेबाज माना जाता है. उनका बल्ला लगातार रन उगल रहा है. पाकिस्तान के खिलाफ भी ICC World Cup 2019 के मुकाबले में उन्होंने 77 रन की शानदार पारी खेली. हालांकि, रोहित शर्मा की 140 रन की पारी के आगे कोहली की यह 51वां अर्द्धशतक कहीं गुम हो गया. इस दौरान कोहली ने सबसे तेज 11 हजार रन बनाने का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया. विराट कोहली ने अब तक 230 वनडे मैच खेले हैं. इनमें से आठ पारियों में उन्हें बल्लेबाजी का मौका नहीं मिला, बाकी बची कुल 222 पारियों में उन्होंने 11020 हजार रनों का आंकड़ा छुआ है. महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने 11 हजार रनों के आंकड़े तक पहुंचने के लिए 276 पारियां खेली थीं.

मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड मैदान पर पाकिस्तान के खिलाफ विश्व कप में पहली बार ओपनिंग करने उतरी रोहित शर्मा और केएल राहुल की जोड़ी ने इतिहास रच दिया. दोनों ने मिलकर रविवार को कई शानदार रिकॉर्ड्स बनाए. पहले विकेट के लिए हुई इस शतकीय साझेदारी के दौरान एक के बाद एक कई रिकॉर्ड्स धराशाई होते गए.

इस मैच से पहले पाकिस्तान के खिलाफ पहले विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी का रिकॉर्ड सचिन और सिद्धू के नाम था. दोनों ने 1996 के विश्व कप में पाकिस्तान के खिलाफ पारी की शुरुआत करते हुए 90 रन बनाए थे. अब सबसे बड़ी ओपनिंग जोड़ी का रिकॉर्ड रोहित-राहुल के नाम हो गया. दोनों ने पहले विकेट के लिए 136 रन जोड़े. रोहित 113 गेंदों में 140 रन बानकर पवेलियन लौटें, जबकि राहुल ने 57 रन की सधी हुई पारी खेलकर आउट हुए

रोहित शर्मा और केएल रोहित ने 136 रन की साझेदारी के साथ ही पाकिस्तान के खिलाफ विश्व कप में किसी भी विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी का रिकॉर्ड बना दिया. इसके पहले शिखर धवन और विराट कोहली ने 2015 विश्व कप में दूसरे विकेट के लिए एडिलेड में 129 रन जोड़े थे.

रोहित शर्मा ने इंग्लैंड में सबसे अधिक छक्के लगाने के सौरव गांगुली (17) के रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया. वह अब भारत की ओर से इंग्लैंड की जमीन पर सबसे ज्यादा छक्के लगाने वाले बल्लेबाज बन चुके हैं.

राहुल और रोहित की इस मैच में शतकीय साझेदारी से पहले वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के खिलाफ अब तक दो शतकीय साझेदारी हुई है. 2003 में मोहम्मद कैफ और सचिन तेंदुलकर के बीच शतकीय साझेदारी हुई थी और दूसरी 2015 के विश्व कप में विराट और शिखर धवन ने पाकिस्तान के खिलाफ शतकीय साझेदारी की थी.

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गर्मी से सहमे प्रशासन ने जिले में लगाई धारा 144

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देशभर में भीषण गर्मी ने लोगों की हालत पस्त कर दी है, लेकिन बिहार में हीट वेव का कहर इस क़दर बढ़ गया कि प्रशासन को इलाके में धारा 144 लगानी पड़ गई. ऐसा पहली बार हो रहा है जब किसी राज्य में गर्मी ने हालात इतने खराब कर दिए हों कि प्रशासन धारा 144 लगाने पर मजबूर हो जाए. आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक, बिहार में अब तक 78 लोगों की मौत लू लगने से हो गई हैं. हालांकि गैर सरकारी आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है.

गर्मी से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में गया, नवादा और औरंगाबाद हैं. हालांकि लू की वजह से मौत की खबरें पटना के ग्रामीण इलाकों के अलावा शेखपुरा और मुंगेर से भी मिल रही हैं. सरकार ने लू से बचने के लिए एडवाजरी जारी करते हुए लोगों से कहा है कि जब बहुत जरूरी हो तभी वो घर से निकले. लू से सबसे ज्यादा मौतें 50 से ज्यादा उम्र के लोगों की हुई हैं. इसके लिए गया प्रशासन ने मौसम सामान्य होने तक जिले में धारा 144 लागू कर दी हैं.

गया के जिलाधिकारी अभिषेक सिंह ने भीषण गर्मी और लू को देखते हुए निर्देश जारी करते हुए कहा है कि मौसम सामान्य होने तक धारा 144 लागू कर दी गई हैं. यानि इस दौरान कोई भी सार्वजनिक कार्यक्रम, राजनैतिक कार्यक्रम, धरना प्रदर्शन और लोगों के एक जगह जमा रहने पर रोक रहेगी. यानि खुले स्थानों पर कार्यक्रम के लिए ये निषेधाज्ञा लागू रहेगी. यह पहला मौका है कि जब मौसम को लेकर धारा 144 लागू कर दी गई हैं.

सुबह 11 बजे के बाद नहीं होगा निर्माण कार्य

डीएम ने अपने निर्देश में यह भी कहा कि मनरेगा की कोई योजना सुबह 10.30 बजे के बाद से नहीं चलेगी. कोई भी निर्माण कार्य 11 बजे सुबह से शाम 4 बजे तक नहीं किया जाएगा. प्रशासन का मानना है कि निर्माण कार्यों में लगे मजदूर इसके शिकार हो रहें हैं. इस दौरान बाजार बंद रखने का निर्दश जारी किया गया हैं. यानी 11 बजे से शाम 4 बजे तक सभी दुकानें बंद रखने का निर्देश हैं. प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि इस दौरान वो घर में ही रहें और बहुत जरूरी काम पर ही निकले. दोपहर में घर से ना निकले और अधिक मात्रा में पानी का सेवन करें.

मगध प्रमंडल के आयुक्त पंकज पाल लू के चपेट आए मरीजों की हालत देखने एनएमसीएच गए और हालात का जायजा लिया. इस दौरान उन्होंने इमरजेंसी वार्ड में भर्ती मरीजों से हाल चाल जाना और व्यवस्थाओं की पूरी जानकारी अस्पताल प्रशासक के अधिकारियों से ली. उन्होंने अस्पताल प्रशासक को कई अतिआवश्यक निर्देश भी दिए. उन्होंने कहा कि इस भीषण गर्मी में काफी संख्या में लू के चपेट में आने से मौत हुई है. जो बिहार के लिए शॉक है. उन्होंने कहा कि जो आंकड़े मगध के मिल रहे है, वो लगभग 106 मरीज हमारे पास आए है. सभी अभी खतरे से बाहर बताए जा रहे है. इस दुःख की घड़ी में सरकार पूरी तरह उन परिजनों के साथ खड़ी है जिनकी मृत्यु हुई.

उन्होंने आगे कहा कि हमने जो अस्पताल की व्यवस्था देखी है, यहां प्राप्त मात्रा में दवा, बेड और स्पेशल चिकित्सक तैनात हैं. किसी प्रकार की कमी नहीं है. उन्होंने इस प्राकृतिक आपदा में लोगों से अपील की है कि लू से बचाव पूरी तरह करें.

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आरक्षण खत्म किया जा रहा है और सरकार कह रही है आरक्षण जिंदाबाद!

केंद्रीय नौकरशाही के उच्च पदों पर एससी-एसटी-ओबीसी के अफसर पहले से ही कम हैं.ऐसे में बिना आरक्षण के हो रही लैटरल एंट्री से उनका प्रतिनिधित्व और घट जाएगा.

करीब दो साल पर पहले जोधपुर में एक अखबार के कार्यक्रम में बीजेपी सांसद सुब्रह्मण्यन स्वामी ने कहा था कि ‘हमारी सरकार आरक्षण को पूरी तरह खत्म नहीं करेगी.ऐसा करना पागलपन होगा.लेकिन हमारी सरकार आरक्षण को उस स्तर पर पहुंचा देगी, जहां उसका होना या नहीं होना बराबर होगा.यानी आरक्षण निरर्थक हो जाएगा.’

आज आप चाहें तो सुब्रह्मण्यन स्वामी को बधाई दे सकते हैं कि आने वाले वक्त को उन्होंने बिल्कुल सही पढ़ लिया था और सही भविष्यवाणी की थी.

भर्तियों में लागू हो गई है लैटरल एंट्री

केंद्र सरकार ने नौकरशाही में बाहर के क्षेत्रों से जानकारों को लाने की एक नई प्रणाली लागू की है.जिसमें कैंडिडेट से कोई परीक्षा नहीं ली जाएगी और उनकी निय़ुक्तियों में कोई आरक्षण भी लागू नहीं होगा.यानी जिस तरह से अभी यूपीएसससी की सिविल सर्विस परीक्षा में कम से कम 50 प्रतिशत अफसर एससी-एसटी-ओबीसी कटेगरी से आते हैं, वैसा इन नियुक्तियों में नहीं होगा.इसे लैटरल एंट्री नाम दिया गया है. इस तरीके से 9 अफसर आ चुके हैं, जिन्हें ज्वायंट सेक्रेटरी के स्तर पर विभिन्न मंत्रालयों में ज्वाइन करना है.ज्वायंट सेक्रेटरी लेवल के अफसर सरकार के लिए नीतियां बनाते हैं.इसके अलावा 40 और अफसर भी डायरेक्टर और डिप्टी सेक्रेटरी स्तर पर लिए जाएंगे.

1. नौकरशाही में लैटरल एंट्री: भारत में नौकरशाही के लिए अफसरों के चयन की एक संविधान प्रदत्त प्रणाली है.इसके लिए यूपीएससी और राज्यों के पब्लिक सर्विस कमीशन का संविधान में प्रावधान है.संविधान में अनुच्छेद 315 से लेकर 323 तक में इस बात का जिक्र है कि नौकरशाही के लिए चयन का पूरा सिस्टम कैसा होगा पब्लिक सर्विस कमीशन से बाहर से इक्के-दुक्के लोगों को पहले भी सरकारें नौकरशाही में लाती रही हैं.लेकिन ये कभी उस स्तर पर नहीं हुआ, जो मोदी सरकार के समय में हो रहा है.जब केंद्र सरकार ने लोकसभा चुनाव के मतदान के बीच में ही नौ ज्वायंट सेक्रेटरी की नियुक्ति की घोषणा की तो मीडिया ने उसे अब तक की सबसे बड़ी ऐसी नियुक्ति करार दिया.

लेकिन इन बयानों से परे नरेंद्र मोदी शासन में तीन ऐसी चीजें हो रही है, जिससे आरक्षण का प्रावधान काफी कमजोर हो जाएगा और सुब्रह्मण्यन स्वामी के शब्दों में ‘निरर्थक’ हो जाएगा.

लैटरल एंट्री में रिजर्वेशन के संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने की व्यवस्था नहीं है इंडियन एक्सप्रेस के श्यामलाल यादव ने जब कार्मिक और प्रशिक्षण मंत्रालय से सूचना के अधिकार के तहत ये पूछा कि लैटरल एंट्री में रिजर्वेशन है या नहीं, तो मंत्रालय ने जवाब में कहा कि ‘इस योजना के तहत जो पद भरे जाने हैं, वे एकल पद हैं और चूंकि एकल पद में रिजर्वेशन लागू नहीं होता, इसलिए इन नियुक्तियों में रिजर्वेशन नहीं दिया गया है.’

लैटरल एंट्री के तहत पहली खेप में चुने गए नौ कैंडिडेट के नाम हैं – अम्बर दुबे, राजीव सक्सेना, सुजीत कुमार वाजपेयी, सौरभ मिश्रा, दयानंद जगदले, काकोली घोष, भूषण कुमार, अरुण गोयल और सुमन प्रसाद सिंह.श्यामलाल यादव को आरटीआई के जवाब में बताया गया कि चूंकि इन कैंडिडेट का चयन रिजर्वेशन के आधार पर नहीं हुआ है, इसलिए इनकी कटेगरी नहीं बताई जा सकती.इनमें से कोई भी कैंडिडेट एससी, एसटी, ओबीसी का नहीं है, जिसके आधार पर दलित आइएएस अफसर इस स्कीम को गैर-कानूनी करार दे रहे हैं.

ऐसा माना जा रहा है कि बगैर आरक्षण दिए जिस तरह से नौ नियुक्तियां हुई हैं, उसी तरह आगे भी और नियुक्तियां होंगी.नीति आयोग ने ऐसे 54 पदों की पहचान कर ली है, जिन्हें लैटरल एंट्री से भरा जा सकता है.अगर आगे ये चलन जारी रहा, तो कहने को तो संविधान में रिजर्वेशन के प्रावधान बने रहेंगे, लेकिन वास्तविक अर्थों में रिजर्वेशन काफी हद तक खत्म हो जाएगा.

सरकारी नौकरियों में कटौती: यूपीएससी से सेंट्रल सिविल सर्विस के लिए हो रहे सलेक्शन की संख्या लगातर गिरती जा रही है.दिप्रिंट की सान्या ढींगरा ने खबर दी थी कि ‘2014 में यूपीएससी ने 1,236 अफसरों के नाम नियुक्तियों के लिए सरकार के पास भेजे थे.2018 में ये संख्या घटकर 759 रह गई.’ कम नियुक्तियों का मतलब है कोटा से कम कैंडिडेट का आना चूंकि आरक्षण सिर्फ सरकारी नौकरियों में है, इसलिए सरकारी नौकरियों में कटौती का मतलब आरक्षण का कमजोर होना भी है.

सरकारी कंपनियों का निजीकरण और सिंकुड़ता आरक्षण: सेना को छोड़ दें तो देश में लगभग डेढ़ करोड़ सरकारी कर्मचारी हैं. इनमें से 11.30 लाख कर्मचारी और अफसर केंद्र सरकार के उपक्रमों यानी सेंट्रल पीएसयू में हैं.केंद्र सरकार नीति आयोग की सलाह पर 42 पीएसयू को बेचने या उन्हें बंद करने पर विचार कर रही है.हालांकि पीएसयू की खासकर वित्तीय बदइंतजामी और उनका घाटे में होना एक वाजिब समस्या है और इसका समाधान खोजा जाना चाहिए.लेकिन साथ में इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि वे देश में नौकरियों के प्रमुख स्रोत भी हैं.

पीएसयू की नौकरियों में आरक्षण लागू है.लेकिन, निजी हाथ में बिकते ही पीएसयू का मालिकाना चरित्र बदल जाता है और वहां आरक्षण बंद हो जाता है.क्या सरकार ऐसा कोई बंदोबस्त कर रही है कि किसी कंपनी के बिक जाने पर भी वहां नियुक्तियों में रिजर्वेशन लागू रहे? इस बारे में कभी कोई चर्चा भी नहीं हुई है.और फिर भारत न अमेरिका है और न ही फ्रांस, ब्रिटेन या कनाडा कि निजी क्षेत्र खुद ही डायवर्सिटी का ख्याल रिक्रूटमेंट के दौरान रखे.

प्रोफेसर सुखदेव थोराट और पॉल अटवेल ने भारत में निजी क्षेत्र की नौकरियों में भेदभाव के चरित्र को समझने के लिए एक अध्ययन किया था.इसके तहत अखबारों में निजी कंपनियों के जो विज्ञापन आए थे, उनके जवाब में एक ही जैसे बायोडाटा अलग-अलग जातिसूचक, धर्मसूचक नाम के साथ कंपनियों को भेजे गए.ये पाया गया कि अगर आवेदक का नाम/सरनेम हिंदू सवर्णों वाला है तो उसे इंटरव्यू के लिए बुलाए जाने के चांस ज्यादा हैं.एक जैसे बायोडाटा भेजने पर, 100 सवर्ण हिंदुओं के मुकाबले सिर्फ 60 दलितों और 30 मुसलमानों को ही इंटरव्यू के लिए बुलाया गया.इससे पता चलता है कि नौकरियां देने के मामले में सामाजिक पृष्ठभूमि की भूमिका होती है.बेशक कॉरपोरेट सेक्टर कहता रहे कि वे तो सिर्फ मेरिट देख कर नौकरियां देते हैं.

इसे देखते हुए यूपीए सरकार के समय में निजी क्षेत्र में आरक्षण का प्रस्ताव आया था.लेकिन उद्योग और कारोबार संगठनों ने इसका विरोध किया और सरकार को प्रस्ताव दिया कि वंचित तबकों को हुनर सिखाने और शिक्षित करने में वे भी सहयोग करेंगे.कहना मुश्किल है कि निजी कंपनियों ने इस दिशा में कितना काम किया है.निजी क्षेत्र में आरक्षण के बारे में पिछली एनडीए सरकार का ये कहना था कि इस बारे में संबंधित पक्षों की आम सहमति नहीं बन पाई है.

संविधान में आरक्षण का प्रावधान

आने वाले समय में ऐसा हो सकता है कि चौतरफा हमलों के बीच आरक्षण खत्म हो जाए या कमजोर पड़ जाए.ऐसे में ये जानना उपयोगी होगा कि संविधान आरक्षण को लेकर क्या कहता है.

अनुच्छेद15 (4) – इस अनुच्छेद (15) की या अनुच्छेद 29 के खण्ड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिये या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबन्ध करने से नहीं रोकेगी.

अनुच्छेद16 (4) – इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से नहीं रोकेगी.

अनुच्छेद 46– राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के खासकर,अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से आगे बढ़ाएगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उसकी रक्षा करेगा.

अनुच्छेद 335 – संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं और पदों के लिए नियुक्तियाँ करने में, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के दावों का प्रशासन की दक्षता बनाए रखने की संगति के अनुसार ध्यान रखा जाएगा.

इनमें से अनुच्छेद 15 और 16 को संशोधित करके अब तक अनारक्षित रहे गए सामाजिक समूह के गरीबों यानी सवर्ण ईडबल्यूएस को आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है.इसके लिए गरीबी की एक परिभाषा बनाई गई है.इस संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और मामला वहां लंबित है.

कुल मिलाकर देखा जाए तो भारतीय संविधान समानता के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए भी यह मानता है कि जाति, लिंग, धर्म आदि के आधार पर हर व्यक्ति समान नहीं है और इस भेदभाव को स्वीकार करते हुए वंचित समूहों को लिए अलग से प्रावधान किए गए हैं.आरक्षण का अधार यही सिद्धांत है कि समूहों के सदस्य के तौर पर हर व्यक्ति समान नहीं हैं.सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज पी.बी. सावंत इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि ‘अगर समाज के हर तबके के पास समानता की स्थिति का फायदा उठाने की क्षमता और संसाधन न हो तो समानता का अधिकार वंचित तबकों के लिए क्रूर मजाक बन जाएगा.संविधान में जो विशेष प्रावधान है, उनका मकसद राज्य को इस बात के लिए सक्षम बनाना है कि वह वंचितों को इन फायदों का लाभ उठाने के काबिल बनाए, जो अन्यथा इनका लाभ नहीं उठा पाते.’

मौजूदा स्थितियों में आरक्षण

अगर हम नौकरियों की घटती संख्या, सरकारी क्षेत्र के निजीकरण और नौकरशाही में हो रही लैटरल एंट्री में आरक्षण की अनदेखी को मिलाकर देखें तो ये कहा जा सकता है कि वास्तव में आरक्षण ऐसी स्थिति में पहुंच रहा है, जहां इसके होने या नहीं होने में खास अंतर नहीं रह जाएगा.ये इसलिए भी ज्यादा चिंताजनक है.क्योंकि सरकार खुद भी मानती है कि नौकरशाही के उच्च पदों पर वंचित समूहों के लोग काफी कम हैं.मिसाल के तौर पर पिछली सरकार में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के मंत्री जितेंद्र सिंह ने 2017 में सूचना दी थी कि केंद्र सरकार में डायरेक्टर से और उससे ऊपर के कुल 747 पदों में से एससी अफसर सिर्फ 60 और एसटी अफसर सिर्फ 24 हैं.

ऐसे में सरकार ने वंचित तबकों को सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के अपने संवैधानिक दायित्व (अनुच्छेद 16-4) को पूरा करने की जगह एक ऐसी नीति पर चलने का फैसला किया है, जिससे उनका प्रतिनिधित्व और कम हो जाएगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार ” Dilip Mandal” हैं और लेख उनके निजी विचार हैं)

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पति को पेड़ से बांधकर महिला से सामूहिक दुष्कर्म, वीडियो बना कर दिया वायरल

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उत्तर प्रदेश में रामपुर के मिलक थाना क्षेत्र में महिला के साथ गैंगरेप के बाद वीडियो वायरल करने की शर्मनाक घटना सामने आई है. दरिंदगी की शिकार महिला पति के साथ दवा लेने जा रही थी. रास्ते में चार लोगों ने दंपति को रोककर उनके साथ बदसलूकी करते हुए गाली-गलौच की. इसके बाद चारों ने पति को पेड़ से बांधकर महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर डाला. यही नहीं आरोपियों ने घटना का वीडियो बना लिया. बाद में अश्लील क्लीपिंग भी वायरल कर दी. एसपी के आदेश पर चार अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके पुलिस मामले की जांच कर रही है.

दरिंदगी की यह घटना बीते 11 जून की है. लोकलाज के डर से पीड़ित दंपति शर्मसार करने वाली घटना के बाद चुप बैठा था. आरोपियों ने घटना का वीडियो वायरल कर दिया. इसके बाद शनिवार को पति ने अपने घरवालों के साथ एसपी से शिकायत की. मामले की गम्भीरता को देखते हुए एसपी ने तत्काल मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए. एसपी के आदेश पर मिलक पुलिस ने चार अज्ञात लोगों के खिलाफ देर रात गैंगरेप का मुकदमा दर्ज कर लिया है. पुलिस ने वायरल किए गए वीडियो में दिख रहे चार आरोपियों में से तीन की शिनाख्त कर ली है. आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए एसपी ने चार टीमें भी गठित की हैं. पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी को उनके संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही है.

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आज से शुरू होगा संसद का सत्र, होगी कई मुद्दों पर चर्चा

नव निर्वाचित लोकसभा के पहले सत्र से एक दिन पहले 16 जून को सर्वदलीय बैठक हुई. सरकार इस सत्र में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए विपक्ष का सहयोग मांगा. इन विधेयकों में तीन तलाक विधेयक भी है, जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले बुधवार को मंजूरी दी. बैठक लिए संसद पहुंच चुके हैं. उनके केंद्रीय मंत्रिमंडल के अन्य सदस्य भी मौजूद रहे.

इससे पहले, संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी और कई मंत्रियों ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और गुलाम नबी आजाद (कांग्रेस) सहित विपक्षी नेताओं से मुलाकात कर संसद के सुचारु संचालन में उनका सहयोग मांगा था.

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास 545 सीटों वाली लोकसभा में 353 सदस्य हैं, लेकिन 245 सीटों वाली राज्यसभा में सिर्फ 102 सदस्य हैं.

इसके साथ ही बीजेपी संसदीय दल की नवगठित कार्यकारी समिति 16 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनी रणनीति तैयार करने के लिए बैठक करेगी. यह सत्र 26 जुलाई को समाप्त होगा.

एनडीए सदस्यों के भी मुलाकात करने और इस सत्र के लिए रणनीति को अंतिम रूप देने की उम्मीद है. तीन तलाक के अलावा सदन में पेश किए जाने वाले विधेयकों में केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (शिक्षक संवर्ग में आरक्षण) विधेयक, 2019 और आधार और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक 2019 शामिल हैं.

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को दंडनीय अपराध बनाता है. इस विधेयक को लेकर विपक्षी दलों की आपत्तियों का सामना करना पड़ा था. लोकसभा का पहला सत्र 17 जून से शुरू हो रहा है. आर्थिक सर्वेक्षण 4 जुलाई और बजट 5 जुलाई को पेश किया जाएगा.

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आनंद के ‘सुपर 30’ का कमाल, जानिये कितने लड़के हुए पास

ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (जेईई ) एडवांस में इस साल भी आनंद कुमार के सुपर-30 के स्टूडेंट्स ने कमाल कर दिखाया. जहां इस बार परीक्षा में 30 स्टूडेंट्स में से 18 स्टूडेंट्स ने सफलता हासिल की है.

बता दें, 2008, 2009, 2010 और 2017 में, सुपर 30 के सभी 30 स्टूडेंट्स ने जेईई-एडवांस परीक्षा में सफलता हासिल की थी. जिसके बाद उनके संस्थान की चर्चा देश-विदेश में होने लगी. इस साल सफल उम्मीदवारों की संख्या पिछले साल की तुलना में कम थी. इस पर आनंद ने कहा कि संख्या उनके लिए कोई मायने नहीं रखती. वहीं पिछले साल 30 स्टूडेंट्स में 26 स्टूडेंट्स ने जेईई एडवांस परीक्षा में सफलता हासिल की थी.

आपको बता दें, इन सुपर-30 बच्चों को फ्री कोचिंग के अलावा, उनके रहने और खाने की व्यवस्था भी होती है. बच्चों के लिए आनंद कुमार की मां जयंती देवी खाना बनाती हैं.

इस साल इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) रुड़की ने जेईई एडवांस परीक्षा का आयोजन किया था जिसमें मुंबई के कार्तिकेय गुप्ता ने पहला स्थान हासिल किया था. वह कोटा के एलेन करियर इंस्टीट्यूट के स्टूडेंट हैं. उन्होंने 360 में से 337 अंक प्राप्त किए हैं.

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JEE Advanced टॉपर कार्तिकेय गुप्ता ने बताया अपनी सफलता का राज

आईआईटी रुड़की ने शुक्रवार को जेईई एडवांस 2019 का रिजल्ट जारी कर दिया. देश की 23 आईआईटी में एंट्री दिलाने वाली इस परीक्षा में महाराष्ट्र के चंद्रपुर के रहने वाले कार्तिकेय गुप्ता चंद्रेश ने टॉप किया है. कार्तिकेय ने JEE Main 2019 में 100 NTA स्कोर प्राप्त किया था. JEE Mains exam में उनकी रैंक 18 थी. परीक्षा में भाग लेने वाले परीक्षार्थी जेईई की वेबसाइट jeeadv.ac.in पर जाकर रिजल्ट चेक कर सकते हैं.

कार्तिकेय ने बताया कि वह हमेशा अपने डाउट क्लियर करने पर जोर देते रहे. जब तक सारे डाउट क्लियर नहीं होते थे, उन्हें नींद नहीं आती थी. वह हमेशा रिलेक्स माइंड से पढ़े.

कार्तिकेय ने कहा, ‘भरोसा था की मुझे आईआईटी मुंबई में सीएस ब्रांच मिल जाएगी लेकिन टॉप करने की नहीं सोची थी. मैं रेगुलर क्लासेस के अलावा रोजाना 6-7 घंटे सेल्फ स्टडी करता था. मैंने लगातार वीकली टेस्ट दिए. इससे मुझे मेरी तैयारी का स्टेट पता लगता रहा.’

उन्होंने कहा, ‘स्टूडेंट्स को बिना किसी तनाव और दबाव के पढ़ाई करनी चाहिए. सेल्फ कंपीटीशन लक्ष्य तक पहुंचने में अहम भूमिका अदा करता है. तैयारी के दौरान मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से रिलेक्स रहना जरूरी है. लंबे समय तक लगातार नहीं पढ़ना चाहिए. दो-दो घंटे की पढ़ाई के बाद ब्रेक लेने चाहिए.

कार्तिकेय अपना आदर्श महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को मानते हैं. 2017 और 2018 में KVPY क्वालिफाई किया था.

कार्तिकेय ने INPHO, INCHO, INAO और INJSO क्वालिफाई किया हुआ है.

17 साल के कार्तिकेय ने 360 में से 337 अंक प्राप्त किए हैं. वह महाराष्ट्र के चंद्रपुर क्षेत्र के हैं और उनके पिता चंद्रेश गुप्ता पेपर इंडस्ट्री में मैनेजर हैं, जबकि मां पूनम गुप्ता हाउस वाइफ हैं. परीक्षा में दूसरा स्थान इलाहाबाद के हिमांशु सिंह और तीसरा स्थान नई दिल्ली के अर्चित बुबना ने हासिल किया है.

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बजट सत्र से पहले मनमोहन सिंह का कार्यकाल खत्म, असम से 28 साल सांसद रहे

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नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का शुक्रवार को राज्यसभा में कार्यकाल खत्म हो गया. वे 28 साल तक राज्यसभा सांसद रहे. वे पहली बार 1991 में असम से राज्यसभा सांसद चुने गए थे. 1991 के बाद से यह पहला मौका है जब मनमोहन संसद से बाहर रहेंगे. मनमोहन पिछली बार असम से 2013 में राज्यसभा के सदस्य बने थे. नई सरकार बजट सत्र 17 जून से शुरू होने वाला है.

असम में राज्यसभा की सात में से दो सीट खाली हुई थीं. ये सीटें मनमोहन सिंह और एस कुजूर की थींं. दोनों का कार्यकाल 14 जून को खत्म हो गया. मई में इन सीटों पर चुनाव हुए. एक सीट भाजपा और दूसरी सीट असम गण परिषद (एजीपी) के हिस्से में गई. भाजपा के कामाख्या प्रसाद तासा और एजीपी के बिरेंदर प्रसाद ने निर्विरोध जीत दर्ज की.

खाली हुई दोनों राज्यसभा सीटों पर कांग्रेस और एआईयूडीएफ पार्टी ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था, क्योंकि उसके पास विधानसभा में सदस्यों की संख्या बहुत कम है. असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के पास 26 और एआईयूडीएफ के 13 विधायक हैं, जबकि भाजपा के 60 विधायक हैं.

असम में अब भी कांग्रेस के चार राज्यसभा सांसद हैं. इनमें से भुबनेश्वर कलिता और डॉ. संजय सिन्ह का कार्यकाल 4 अप्रैल 2020 को खत्म होगा. इस दिन बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट पार्टी के बिश्वजीत डैमेरी का कार्यकाल भी खत्म हो रहा है. विधानसभा में सदस्यता को देखते संभावना है कि कांग्रेस के पास से यह सीटें जा छिन सकती हैं.

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