संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम पर विविध प्रतिक्रयाएं सामने आईं हैं, जिनमें से कई नकारात्मक हैं. एक ओर जहाँ उत्तरपूर्व में इस नए कानून का भारी विरोध हो रहा है, जिसमें कई लोगों की जानें जा चुकीं है, वहीं इससे संविधान में आस्था रखने वालों और मुसलमानों में गंभीर चिंता व्याप्त हो गयी है. यह कानून पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के ऐसे हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन और ईसाई रहवासियों को भारत की नागरिकता प्राप्त करने का अधिकार देता है, जिन्हें उनके देशों में प्रताड़ित किया जा रहा है. इस सूची में इस्लाम धर्म का पालन करने वालों का नाम नहीं है. म्यांमार जैसे देशों में मुसलमानों पर भीषण अत्याचार हो रहे हैं परन्तु वे इस सूची में शामिल नहीं है. इस कानून में जिन तीन देशों का उल्लेख किया गया है, वहां भी मुसलमानों के कई पंथों के सदस्यों को प्रताड़ित किया जा रहा है परन्तु उनके लिए इस कानून में कोई स्थान नहीं है.
इस कानून के खिलाफ बहुत कुछ लिखा जा रहा है. यह कहा जा रहा है कि यह बहुलतावादी भारत को एक हिन्दू राष्ट्र में बदलने का षडयंत्र है. यह भी चिंता का विषय है कि इस कानून का बचाव करते हुए यह आरोप लगाया जा रहा है कि धर्म के आधार पर देश के विभाजन के लिए कांग्रेस दोषी है. यह एक सफ़ेद झूठ है. राज्यसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आक्रामक तेवर अपनाते हुए कहा कि, “इस देश का विभाजन अगर धर्म के आधार पर कांग्रेस ने न किया होता, तो इस बिल का काम नहीं होता.” इसके जवाब में कांग्रेस के शशि थरूर ने कहा की शायद श्री शाह उनके स्कूल में इतिहास के पीरियड में जो पढ़ाया जाता था, उस पर ध्यान नहीं देते थे.
शाह आरएसएस के कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने बाद में संघ की विद्यार्थी शाखा एबीवीपी की सदस्यता ले ली थी. शशि थरूर का यह कहना सही है कि शाह ने स्कूल में इतिहास की पढ़ाई ठीक से नहीं की. परन्तु इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने आरएसएस की शाखाओं में पढ़ाये जाने वाले इतिहास को न केवल ग्रहण किया है बल्कि उसे आत्मसात भी किया है. हम सब जानते हैं कि महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का भी मानना था कि भारत के विभाजन के लिए कांग्रेस के शीर्षतम नेता गांधीजी ज़िम्मेदार थे. अधिकांश हिन्दू राष्ट्रवादी भी यही मानते हैं. राष्ट्र का आधार धर्म है, यह बात सबसे पहले सावरकर और उनके बाद जिन्ना ने कही थी. परन्तु धर्म को राष्ट्र की आधार मानने के विचार की नींव रखने वाले थे हमारे औपनिवेशिक शासक जिन्होने एक ओर मुस्लिम लीग तो दूसरी ओर हिन्दू महासभा-आरएसएस को हर तरह से बढ़ावा दिया.
अंग्रेजों को लगता था कि ये दोनों संगठन ‘बांटो और राज करो’ की उनकी नीति को लागू करने में सहायक होंगे. सन 1942 में जब राष्ट्रीय आन्दोलन अपने चरम पर था, तब अंग्रेजों का ध्यान एक अन्य कारक पर भी गया. और वह था तत्कालीन विश्व की भौगोलिक-राजनैतिक परिस्थितियां. उस समय, सोवियत संघ एक महाशक्ति बन चुका था और ब्रिटेन-अमरीका की विश्व पर दादागिरी को चुनौती दे रहा था. सोवियत संघ दुनिया भर के औपनिवेशिकता-विरोधी आंदोलनों का प्रेरणास्त्रोत भी था. स्वाधीनता आन्दोलन के कई नेता समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे. यह सब देखकर ब्रिटेन को लगा कि अगर उसे दुनिया के इस हिस्से में अपना वर्चस्व बनाये रखना है तो उसे भारत को विभाजित करना ही होगा.
धर्म-आधारित राष्ट्रवाद, ज़मींदारों और राजाओं के घटते प्रभाव की प्रतिक्रिया में उभरा. औद्योगिकीकरण, संचार के बढ़ते साधनों और आधुनिक शिक्षा के प्रसार के चलते, भारत एक धर्मनिरपेक्ष-प्रजातान्त्रिक राष्ट्र के रूप में उभर रहा था. मद्रास महाजन सभा, पुणे सार्वजनिक सभा और बॉम्बे एसोसिएशन जैसे समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों और सामाजिक परिवर्तनों की लहर ने सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जन्म दिया. ज़मींदारों और राजाओं के अस्त होता वर्ग, समानता का सन्देश देने वाली सामाजिक शक्तियों के बढ़ते प्रभाव से घबरा गया. उसे लगने लगा कि जन्म-आधारित ऊंच-नीच की अवधारणा पर खड़ा उनके वर्चस्व का किला दरक रहा है.
लगभग इसी समय, मुसलमानों का एक वर्ग कहने लगा कि भारत में इस्लाम खतरे में हैं. हिन्दुओं के एक वर्ग ने, हिन्दू धर्म के खतरे में होने का राग अलापना शुरू कर दिया. राष्ट्रीय संगठनों और अन्यों ने दलितों और महिलाओं को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया. सामंती वर्ग को लगा कि यह धर्म पर आधारित असमानता पर हमला है. उनके संगठनों में प्रारंभ में केवल ज़मींदार और राजा थे. परन्तु बाद में, उन्होंने देश के कुलीन वर्ग और तत्पश्चात आम लोगों के एक तबके को भी अपने साथ लेने में सफलता हासिल कर ली. यहीं से हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवाद की नींव पड़ी. इस प्रकार, एक ओर था भारतीय राष्ट्रवाद, जिसके प्रतिनिधि गाँधी, अम्बेडकर और भगत सिंह जैसे नेता थे तो दूसरी ओर था धार्मिक राष्ट्रवाद जिसके चेहरे थे मुस्लिम लीग, जिसका गठन 1906 में हुआ और हिन्दू महासभा और आरएसएस, जो क्रमशः 1915 और 1925 में अस्तित्व में आये. जहाँ भारतीय राष्ट्रवादी, देश में व्याप्त असमानता के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे वहीं धार्मिक राष्ट्रवादी अपने-अपने प्राचीन गौरव का गुणगान कर रहे थे.
सावरकर, हिन्दुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे का विरोधी मानते थे. मुस्लिम लीग को लगता था कि हिन्दू बहुसंख्यक देश में मुसलमानों को समान अधिकार नहीं देंगे. हिन्दू राष्ट्रवादियों ने मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाना शुरू कर दिया, जिसकी परिणीति सांप्रदायिक दंगों के रूप में सामने आई.
देश में सांप्रदायिक हिंसा के दावानल ने कांग्रेस को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वह माउंटबैटन के देश के विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार कर ले. कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकार करते हुए अपने प्रस्ताव में कहा कि यद्यपि वह द्विराष्ट्र सिद्धांत (जिसके समर्थक सावरकर, जिन्ना, गोलवलकर, मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और आरएसएस थे) को स्वीकार नहीं करती, तथापि देश में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा की तुलना में वह विभाजन को देश के लिए कम बुरा मानती है. विभाजन की रूपरेखा बनाने वाले वीपी मेनन के अनुसार, “पटेल ने दिसंबर 1946 में ही देश के विभाजन को स्वीकार कर लिया था परन्तु नेहरु इसके लिए छह माह बाद राजी हुए”.
मौलाना आजाद और गांधीजी ने द्विराष्ट्र सिद्धांत और देश के विभाजन को कभी स्वीकार नहीं किया परन्तु देश में साम्प्रदायिकता के नंगे नाच को देखते हुए, उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा. अमित शाह और आरएसएस का यह दावा एकदम गलत है कि कांग्रेस ने धर्म को राष्ट्र के आधार के रूप में स्वीकृति दी.
लेखकः राम पुनियानी(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)


दूसरी बात आपने संगठित होने की कही थी तो यहां बड़ी दिक्कत है। मुझे यह बताते हुए अच्छा नहीं लग रहा है कि आपका समाज संगठित नहीं है। एक शहर में अगर समाज के 10 हजार लोग हैं तो महज 200-300 लोग ही संगठित हैं। बाकी हम आपस में खूब लड़ते हैं। एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं। आपस में ही जातिवाद भी करते हैं। आपने इतनी मेहनत और खोज से जो किताबें लिखी थी, जिसमें आपने हमारा इतिहास बताया था, उसे बहुत कम लोगों ने पढ़ा है। जिन्होंने पढ़ा है, वो थोड़ा सुधरे हैं, बाकियों को ये सब बेकार लगता है।
हालांकि आपके जाने के बाद 90 के दशक में एक बड़ा काम यह हुआ कि कांशीराम नाम के एक व्यक्ति ने आपसे प्रेरणा लेकर सत्ता की मास्टर चाभी को हासिल कर लिया। वह आपके परम अनुयायी थे। बड़ी मेहनत से उन्होंने वंचित समाज को एकजुट किया और एक बड़े प्रदेश में सत्ता को हासिल किया। लगा कि अब वक्त बहुजनों का है। वंचितों को न्याय मिलेगा। लेकिन उनके जाने के एक दशक बाद चीजें फिर खराब होने लगी। उस दौरान पैदा हुए नेता सत्ता के मोह में ऐसे फंसे कि समाज पीछे छूटने लगा। तमाम नेता अपने लिए सुविधाओं का पहाड़ खड़ा करने में जुट गए और इस कोशिश में कुछ ऐसे काम कर गए कि वह केंद्र के दबाव में रहने लगे। बाकी के जिन अन्य नेताओं से उम्मीद थी, उन्होंने किसी न किसी बड़ी पार्टी का दामन थाम कर समझौता कर लिया और उनका नारा बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय की जगह स्वजन हिताय – स्वजन सुखाय हो गया है।
“Jai Bhim! Jai Martin Luther King!” So began Professor Kancha Ilaiah Shepherd’s address to a packed audience at the Michigan League on Saturday, October 12. Invoking Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar and Dr. Martin Luther King—two stalwarts in the global struggle against racism and casteism—Professor Shepherd kicked off a full-day of presentations and discussions for the symposium “Dismantling Casteism & Racism: Continuing the Unfinished Legacy of Dr. B.R. Ambedkar.” The event was a first-ever collaboration between the Ambedkar Association of North America (AANA) and University of Michigan’s Program in Asian/Pacific Islander American (A/PIA) Studies. Aimed at building solidarity and examining issues that pertain to the Dalit community in South Asia, the symposium explored the politics of dignity and equal rights for marginalized communities in a global context with an emphasis on intersections with issues of gender, race, and religion. As the organizers put it, “We seek to strengthen conversations between scholars, activists, and practitioners in analyzing caste-based discrimination and violence in South Asia and beyond.”
तीसरी बात, हिन्दू नहीं होने और बौद्ध होने के द्वंद में फंसे समाज के लिए यह कितना आसान है कि वह ऐसा त्यौहार नहीं मनाए जो उसी के घर-परिवार में 99 फीसदी लोग मना रहे होते हैं। मुस्लिम कोई हिन्दू और अन्य धर्मों का त्यौहार नहीं मनाते, क्रिश्चियन भी किसी अन्य धर्म का त्यौहार नहीं मनाते। और उनके लिए ऐसा करना आसान होता है, क्योंकि उनका हिन्दू धर्म से वास्ता नहीं होता। उनके नाते-रिश्तेदार सभी उसी धर्म के लोग होते हैं। उनके हक में जो बात सबसे ज्यादा होती है कि वह अपने ही समाज के लोगों के बीच रहते हैं। एक मुसलमान का या फिर एक क्रिश्चियन का पड़ोसी और नाते-रिश्तेदार भी इसी समाज का होता है। जबकि अम्बेडकरी समाज की दिक्कत यह है कि इस समाज का तकरीबन 95 फीसदी आदमी जो आज अम्बेडकरवादी बुद्धिस्ट होने की राह में है, कल तक उसके परिवार के लोगों का संबंध उसी धर्म से था, जिससे आज वो दूर भागना चाहता है। जिनकी पिछली पीढ़ी अम्बेडकरवादी या बुद्धिस्ट नहीं है, ऐसे लोगों की बात करे तो अम्बेडकरवाद को समझने और बुद्धिज्म को अपनाने के वक्त तक उनकी तकरीबन आधी जिंदगी निकल चुकी होती है। यह खुद को अपने उस पुराने धर्म से तभी बेहतर तरीके से और जल्दी काट पाएगा जब वो उन लोगों के बीच रहे जिनसे उनकी सांस्कृतिक एकरूपता है। यानि वह भी मुसलिम, क्रिश्चियन और सिख समाज की तरह एक साथ एकजुट रहे।
आखिरी बात, दीपावली और दीपदानोत्सव के द्वंद के बीच बेहतर यह होगा कि बौद्ध समाज के विद्वान जिनमें विद्वान भंतेगण, पुराने बुद्धिस्ट और बौद्धाचार्य शामिल हैं, उनको एक साथ बैठकर धम्म सम्मेलन करना चाहिए। दीपदानोत्सव होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए, इस विषय पर सबका पक्ष सामने आने के बाद आपसी सहमति से एक फैसला ले लें, जिसे पूरा अम्बेडकरी समाज और बौद्ध समाज माने। ध्यान रहे, मैंने अम्बेडकरी और बौद्ध समाज कहा। बाकी जो लोग खुद को इस दायरे से अलग रखना चाहते हैं और दीवाली मनाना चाहते हैं तो यह उनकी स्वतंत्रता होगी। उन्हें हमको बुद्धिज्म की तरफ लाने की कोशिश करते रहना चाहिए। हां, लेकिन फिर वो खुद को बौद्ध समाज या अम्बेडकरी समाज का हिस्सा मानने का दावा करना छोड़ दे। अब अम्बेडकरी-बुद्धिस्ट समाज को हर साल होने वाली इस थकाऊ और परेशान करने वाली बहस से छुटकारा मिलना चाहिए। और इसका दायित्व अम्बेडकरी-बुद्धिस्ट समाज के बुद्धीजिवियों के ऊपर है।
14 अक्टूबर 2011. नोएडा के सेक्टर 18 के पास एक भव्य स्थल दुल्हन की तरह सजा हुआ था. सबके स्वागत को तैयार. तभी उसके प्रांगण में गड़गड़ाता हुआ एक हेलिकॉप्टर उतरा, और उसमें से उतरीं उत्तर प्रदेश की तत्कालिन मुख्यमंत्री मायावती. दरअसल मायावती उस भव्य स्थल का उद्घाटन करने आई थीं, जिसका नाम ‘राष्ट्रीय दलित स्मारक’ था और जिसे दलित प्रेरणा स्थल भी कहा जाता है. इसके जरिए बहनजी ने 14 अक्टूबर के महत्वपूर्ण दिवस पर धम्मचक्र को गतिमान करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया था.


लेखक- लक्ष्मण यादव
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यक्ष पद को लेकर मामला बहुत पेचीदा हो चुका है. हिन्दी विभाग डीयू ही नहीं, देशभर के सबसे बड़े विभागों में एक है. इसलिए यहाँ राजनीति भी बड़े लेवल की होती रही है. पहले प्रोफ़ेसर का क़द मंत्रियों से कई गुना बड़ा हुआ करता था, तब सियासत विभाग में आकर कमजोर हो जाती या अमूमन दम तोड़ देती थी. अब प्रोफ़ेसर नेताओं के तलवे सहलाकर पद के लिए भीख मांगने लग रहे हैं. वक़्त कितना बदल गया. इस बात को ऐसे समझें कि यहाँ पीएचडी में एडमिशन से लेकर नियुक्तियों तक में प्रोफ़ेसर की चलती थी, आज सब कुछ में कैबिनेट लेवल के मंत्रियों का दखल होता है. इसलिए आज एक प्रोफ़ेसर जब नियमों की धज्जी उड़ाने में सफल हो रहा है, तो ये सामान्य बात है.
संत गाडगे ने कुष्ठ रोगियों के लिए भी काम किया. इसके लिए गांधी की तारीफ की जाती है लेकिन गाडगे बाबा को याद नहीं किया जाता. गाडगे बाबा ने मरीजों के लिए अस्पतालों तथा कुष्ठ रोगियों के लिए कुष्ठ आश्रमों का निर्माण करवाया. उन्होंने जीव रक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण काम किए. जिन धार्मिक स्थलों पर बकरे, मुर्गे, भैसे कटते थे, गाडगे बाबा ने जीवदया नामक संस्थाओं की स्थापना की शुरुआत की.
गांधी रूढ़िवादी हिन्दू थे
अशोक दास
लेखक फारवर्ड प्रेस से जुड़े हैं।

शैलेन्द्र सिन्हा