शरद यादव (1 जुलाई 1947 – 12 जनवरी 2023) नहीं रहे। उनका आकस्मिक निधन बहुत दुखद और स्तब्धकारी है। अपनी लंबी अस्वस्थता से उबरकर वह धीरे-धीरे स्वस्थ और सक्रिय हो रहे थे। पिछले साल, मार्च में उन्होंने अपने दल-लोकतांत्रिक जनता दल (LJD) का राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में विलय भी किया। जनता दल (यू) से अलग होने के बाद उन्होंने 2018 में इस दल का गठन किया था। लेकिन यह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी खास पहचान नहीं बना सका। शायद इस नये दल को शरद जी की अगुवाई में ठीक से काम करने का वक्त भी नहीं मिला। अपनी अस्वस्थता के चलते वह पहले की तरह सक्रिय भी नहीं हो सकते थे।
उनके निकटस्थ लोगों के मुताबिक इधर कुुछ समय से वह अपेक्षाकृत स्वस्थ और बेहतर महसूूस कर रहे थे। अपने मित्रों और निकटस्थ सहकर्मियों से उनका मिलना-जुलना भी जारी था। इसी बीच, बीती रात (12 जनवरी की रात) उनके निधन की दुखद खबर आयी। उनकी बेटी सुभाषिनी की एक फेसबुक पोस्ट से यह सूचना मिली।
शरद जी का जन्म तो मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में हुआ था लेकिन उनकी वास्तविक कर्मभूमि बिहार और दिल्ली रही। पहला चुनाव उन्होंने सन् 1974 में मध्य प्रदेश के जबलपुर से लड़ा और जीता। तब वह इंजीनियरिंग कॉलेज से निकले एक युवा छात्र नेता थे।। ‘जेपी के प्रत्याशी’ के तौर पर उप-चुनाव लडा और कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर लोकसभा में पहली बार प्रवेश किया। इमर्जेंसी में वह लगातार जेल में रहे। शरद जी ने अपने राजनीतिक जीवन में सबसे अधिक वक्त दिल्ली, बिहार औ यूपी में बिताया। सन् 1989 में यूूपी के बदायूं से वह सांसद भी बने। इसके बाद अगले कई चुनावों में वह बिहार के मधेपुरा से सांसद रहे। सन् 1999 के मधेपुरा संसदीय चुनाव में तो लालू प्रसाद यादव और शरद यादव आमने-सामने हो गये। कांंटे की टक्कर में शरद जी ने लालू जी को हरा दिया।
अपने अनेक मित्रों और समकालीन नेताओं की तरह शरद जी भी जेपी आंदोलन से ही उभरे नेता थे। सत्तर-अस्सी के दशक में इस आंदोलन से उभरे नेताओं में सोशलिस्ट-जनता दली धारा से जुड़े चार नेता नब्बे के दशक में राष्ट्रीय राजनीति के नये सितारे बनकर उभरे। इनमें तीन ठेठ बिहारी थे तो एक मध्य प्रदेश मूल के। यह चार नेता थे- शरद यादव, रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार। सन् 1988 के फरवरी महीने में कर्पूरी ठाकुर का निधन हो चुका था। सन् 1990 में बिहार विधान सभा के चुनाव में कांग्रेस हार गयी। सरकार जनता दल की बननी थी। उधर, केंद्र में जनता दल की अगुवाई वाली वीपी सिंह की सरकार 1989 में बन चुकी थी। वीपी सिंह चाहते थे कि बिहार के मुख्य मंत्री रामसुंदर दास बनें। लेकिन देवीलाल और शरद यादव सहित अन्य नेता लालू प्रसाद जैसे अपेक्षाकृत युवा नेता को नेतृत्व सौपने के पक्ष में थे। अंतत: लालू यादव ही नेता बने और 10 मार्च, 1990 को उन्होंने पहली बार बिहार के मुख्य मंत्री पद की शपथ ली। लालू यादव को मुख्यमंत्री बनवाने में देवीलाल और शरद यादव जैेसे नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गयी। हालांकि प्रकारांतर से चंद्रशेखर जी की भी इसमें बहुत अहम भूमिका थी। विधायक दल के नेता पद के चुनाव में वीपी सिंह समर्थित रामसुंदर दास को परास्त करने में अंतत: चंद्रशेखर समर्थित-रघुनाथ झा की उम्मीदवारी महत्वपूर्ण साबित हुई।
लालू यादव की सरकार बनने के बाद बिहार की सत्ता में तीन सर्वशक्तिमान नेताओं की तिकड़ी उभरी: लालू-शरद-नीतीश! इसी दौर में वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की 40 सिफारिशों में सिर्फ एक, पिछडों (OBC) के आरक्षण को अमलीजामा पहनाने का फैसला किया। इसके लिए शरद, पासवान, लालू, नीतीश सहित अनेक नेताओं ने वीपी सिंह को हर तरह से समर्थन दिया। उधर, बसपा प्रमुख कांशीराम का भी इस मुद्दे पर वीपी सिंह को समर्थन मिला। उसी दौर में शरद-लालू जैसे नेता देवीलाल का साथ छोड़कर वीपी सिंह से जुड़ गये। पार्टी का अंदरूनी समीकरण बिल्कुल बदल गया। मंडल आयोग की एक सिफारिश के लागू होने के ऐलान से बदली राजनीति पर आर एस एस-भाजपा की तीखी नजर थी। उन्होंने मंडल के खिलाफ ‘कमंडल’ का अस्त्र चलाया और सन् 1992 में भगवा ब्रिगेड की अगुवाई में अयोध्या की पुरानी बाबरी मस्जिद ध्वस्त कर दी गयी।।
कुछ ही समय बाद ‘जनता दल परिवार’ का बिखराव और बढ़ गया। मुलायम सिंह यादव तो सन् 1992 में ही समाजवादी पार्टी बनाकर जनता दल से अलग हो चुके थे। सन् 1994 में जार्ज और नीतीश ने मिलकर समता पार्टी बना ली। बाद में शरद भी नीतीश कुुमार के साथ आ गये और जनता दल-यू बड़ा मंच बन गया। लंबे समय तक शरद और नीतीश साथ रहे। फिर उनका साथ भी छूटा। समाजवादी धारा के जनता-दलियों की टूटने-बिखरने-जुडने और फिर बिखरने की दिलचस्प कहानी है। इसमें जितना रोमांच और रहस्य है, उससे ज्यादा निजी महत्वाकांक्षाओं का टकराव और वैचारिक-सतहीपन! कांग्रेस के पतन और जनतादलियों के बिखराव के बाद हिंदी-भाषी क्षेत्र में भाजपा के सामाजिक आधार और असर, दोनों में इजाफा होता रहा। अपनी गलतियों के चलते लगातार हारती कांग्रेस के हिन्दू-उच्चवर्णीय आधार में भाजपा ने अपनी जगह बनाना शुरू किया। कांग्रेस का दामन छोड़कर मुस्लिम समुदाय बिहार में लालू प्रसाद यादव के साथ और यूपी में मुलायम सिंह यादव के साथ जाने लगा। इस तरह कांग्रेस के पतन से रिक्त हुई जगह पर भाजपा ने अपने हिन्दुत्व-आधार का भवन बनाना तेज किया।
लंबे समय तक शरद यादव, नीतीश कुुमार और जार्ज फर्नांडिस भाजपा के प्रबल सहयोगी और अटलबिहारी वाजपेयी व लालकृष्ण आडवाणी के दौर वाले एनडीए की केंद्र सरकार मे वरिष्ठ मंत्री भी रहे। बाद में शरद और नीतीश का भाजपा के गठबंधन से मोहभंग हुआ। फिर शरद और नीतीश भी अलग-अलग हो गये। वक्त गुजरने के साथ गंगा-यमुना में बहुत सारा पानी बहा। सियासत का अंदाज बदल गया। भाजपा आज बहुत बडी ताकत है। सेक्युलर-लोकतांत्रिक राजनीति के लिए यह बुरा दौर है।
वामपंथियों का मोर्चा कमजोर हो चुका है और सामाजिक न्याय के आंदोलनकारियों का कुनबा भी खूब बिखरा है। इनके बिखराव का फायदा भाजपा को ही सबसे अधिक मिला है।
शरद जी तकरीबन चार दशक के इस लंबे राजनीतिक दौर के महत्वपूर्ण किरदार और गवाह भी रहे हैं। काश, उन्होंने अपनी कोई सुसंगत आत्मकथा लिखी होती! उससे राजनीति की नयी पीढी, खासकर समता, सेक्युलरिज्म और सामाजिक न्याय के लिए लड़ रहे आज के युवाओं को काफी कुछ मिलता कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए! शायद, शरद जी अपनी आत्मकथा में आत्मालोचना का भी कोई अध्याय जोड़ते कि उनसे क्या-क्या राजनीतिक गलतियां हुईं? एक प्रखर समाजवादी ने हिंदुत्व की शक्तियों से हाथ क्यों मिलाया? इस मामले में समाजवादी रुझान के जनतादलियों में लालू प्रसाद यादव संभवत: एकमात्र अपवाद रहे जो भाजपा के साथ नहीं गये!
एक दौर में शरद जी से संसद भवन में मेरी मुलाकात होती रहती थी। सेंट्रल हाॅल में साथ बैठकर कभी-कभी गपबाजी भी हो जाती थी। उनके बंगले पर भी यदा-कदा जाना हुआ। संयुक्त मोर्चा के दौर में कई बार उनके दफ़्तर या घर पर मिलना हुआ। पर उनके साथ कभी मेरा नियमित तौर पर मिलना-जुलना या संवाद नहीं रहा। इसलिए उनको ज्यादा जानने-समझने का दावा नहीं कर सकता। पर जितना मैने दैखा-समझा, वह राजनीति में विचार और संगठन, दोनों को महत्वपूर्ण मानते थे। हाल के कुछ वर्षों में वह अस्वस्थ रहे। अस्वस्थता और ढलती उम्र के चलते शायद ईमानदार आत्ममंथन, अफसोस और नयी पीढ़ी को जरूरी संदेश देने के अलावा वह ज्यादा कुछ नहीं कर सकते थे। पर राजनीतिक परिदृश्य पर उन जैसे अनुभवी नेता की उपस्थिति महत्वपूर्ण होती।
संयोग देखिये, पिछले साल मार्च में ही शरद यादव ने अपनी पार्टी का विलय राष्ट्रीय जनता दल में किया। दूसरी तरफ, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी उसके कुछ ही महीने बाद भाजपा का साथ छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल से मिलकर बिहार में महा-गठबंधन (जद-यू, राजद और कांग्रेस आदि) की सरकार बनाई, जिसमें लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव उप-मुख्यमंत्री हैं। यानी, जे. पी. आंदोलन से उभरे तीनों पुराने दोस्त लंबे अंतराल के बाद फिर एक साझा मंच की तरफ बढ़े। बड़ी घटना थी। इसलिए अभी शरद यादव का होना जरूरी था। पर वह बीती रात चले गये।
शरद जी को हमारी सादर श्रद्धांजलि। रेखा जी, सुभाषिनी, शांतनु और पूरे परिवार के प्रति शोक संवेदना।


बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर निशाने पर हैं। वजह यह है कि उन्होंने रामचरित मानस और मनुस्मृति को नफरत फैलाने वाला और वंचितों से उनका हक छिनने वाला कह दिया। इसके बाद कोई उनकी चीभ काटने की बात कह रहा है तो कोई कह रहा है कि शिक्षा मंत्री को खुद शिक्षा लेने की जरूरत है। लेकिन कोई मनुस्मृति और रामचरित मानस में लिखे हुए पर बात नहीं कर रहा है। मसलन शिक्षा मंत्री ने 11 जनवरी को पटना के जिस कार्यक्रम में यह बातें कही, उस दौरान उन्होंने रामचरित मानस के उस दोहे का भी जिक्र किया, जिसमें लिखा है कि- अधम जाति में विद्या पाए, भयहु यथा अहि दूध पिलाए … यानी कि नीच जाति के लोग शिक्षा ग्रहण कर के जहरीले हो जाते हैं, जैसे कि सांप दूध पीने के बाद हो जाता है।
बीते साल के आखिर में 16 दिसंबर, 2022 को जम्मू के रजौरी स्थित फलियाना गांव में एक सैन्य शिविर के बाहर दो लोगों की हत्या कर दी गई थी। सेना ने इन मौतों के लिए उग्रवादियों को जिम्मेदार ठहराया। मृतक के परिवार को पहले एक लाख की मदद देने की घोषणा हुई, लेकिन फिर एलजी मनोज सिन्हा ने इसमें 5 लाख और जोड़ कर राशि को छह लाख कर दिया। उपायुक्त ने मृतकों के परिवार को नौकरी भी देने की घोषणा की।

भारत और श्रीलंका के बीच 7 जनवरी, 2023 को खेेले टी-20 सीरीज के तीसरे और आखिरी मैच में जब सूर्य कुमार यादव ने 360 डिग्री घूम कर छक्का लगाया तो अचानक मुझे हिन्दी के एक मशहूर ‘क्रिकेट-प्रेमी’ संपादक की याद आयी. वह जीवित होते तो सूर्य कुमार यादव के इस चमत्कारी शतकीय-पारी पर क्या लिखते!
जी 20 की अध्यक्षता करने की बारी इस बार भारत को मिली है। 20 देशों के इस समूह में भारत भी एक है लेकिन डंका ऐसा पीटा जा रहा कि न तो भूतकाल में कभी ऐसा हुआ और न ही कभी भविष्य में होने वाला होगा। कहा जा रहा है कि यह सब मोदी जी के प्रताप से हो रहा है। मीडिया में खूब जगह मिल रही है और प्रचार-प्रसार में अभी से खर्च बढ़ गया है। मिलेगा क्या, जानना मुश्किल नहीं है। जितना स्थान मीडिया और भाषणों में जी 20 की मेजबानी के लिए मिल रहा है उतना किसान, मजदूर और भ्रष्टाचार पर रोक आदि समस्याओं को मिलता तो हम कहां से कहां पहुंचते? किसान के जो आलू और टमाटर कौड़ियों के भाव बिक रहे हैं , मीडिया ऐसे मुद्दे को जगह दे तो उपभोक्ता को भी लाभ और किसान का तो होगा ही। अधिकारी काम नहीं करते और रिश्वत लेते हों परंतु ऐसी बातों के लिए कहां जगह है? युवाओं को रोजगार नहीं है और महंगाई आसमान पर , ऐसी समस्याओं की बात नदारद है। जी 20 की अध्यक्षता मिली देश के लिए गर्व की बात है। वैसे 19 और देश हैं जिन्हे ऐसा अवसर मिला या मिलेगा। इस मेजबानी का लाभ उठाया जा सकता है अगर कतर जैसे कट्टर देश से भी सीख लें। भले ही फीफा और जी 20 के उद्देश्य अलग हों लेकिन निवेश और पर्यटन दोनों इनसे प्रभावित होते हैं।
फुटबाल विश्व कप का जश्न अपने शबाब पर है, ऐसे में यह विश्व कप भारत, नेपाल, बाग्लादेश और पाकिस्तान के जिन 7 हजार मजदूरों की कब्रों पर हो रहा है, उसकी चर्चा करना रंगे-पुते चेहरे के पीछे के घिनौने चेहरे को उघाड़ कर रख देने जैसा है, जो किसी को अच्छा नहीं लगता। वैसे मजदूरों के बारे में, यहां तक की उनकी मौत के बारे में बातें करना बीते जमाने की बात ठहरा दी गई है। इसे बैकवर्डनेस मान लिया गया है।
सवर्ण आरक्षण पर हिंदू जजों के अन्यायपूर्ण फैसले से ढेरों बहुजन बुद्धिजीवी आहत व विस्मित हैं,पर मैं नहीं! यही नहीं सदियों से आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक इत्यादि, विविध क्षेत्रों में हिंदुओं अर्थात् सवर्णों ने शुद्रातिशुद्रो और महिलाओं के खिलाफ एक से बढ़कर एक अन्याय का जो अध्याय रचा है,उससे भी विस्मित नहीं होता। क्योंकि मैं इनकी समस्त गतिविधियों को मार्क्स के वर्ग संघर्ष के नजरिए से देखता हूं। वास्तव में मानव ही नहीं, प्राणी मात्र में जो सतत संघर्ष चलते रहा है,उसे यदि मार्क्स के वर्ग संघर्ष के नजरिए से देखें तो जानवरों द्वारा जानवरों का भक्षण, मानव जाति द्वारा उपभोग के साधनों पर कब्जे के लिए किये गए हर कृत्य में मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत की क्रियाशीलत नजर आएगी। वर्ग संघर्ष की व्याख्या के क्रम में मार्क्स द्वारा कही गई यह बात हर पढ़े लिखे व्यक्ति के जेहन में होगी कि दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है: एक वर्ग वह है जिसका उत्पादन के साधनों ( दुसाध के शब्दों शक्ति के स्रोतों ) पर कब्जा है, दूसरा वह है जो इससे वंचित व बहिष्कृत exclude है। इन दोनों में दुनिया में सर्वत्र ही सतत संघर्ष चलते रहता है। प्रभुत्वशाली वर्ग अपने प्रभुत्व dominance को बनाए रखने के लिए राज्य का इस्तेमाल करता है”।
As an integral part of India’s continued modernity, caste is not merely a phenomenon restricted to rural areas or in extreme cases manifested in caste-related violence. It is a part of everyday affairs in modern institutions, public spaces and community life, where it represents a contingent element in social relations.
दिनांक 10.10.2022 को बिहार लोक सेवा आयोग, पटना द्वारा 31वीं बिहार न्यायिक सेवा प्रतियोगिता परीक्षा का परिणाम जारी किया गया, जिसमें कुल 214 अभ्यर्थियों का चयन हुआ। उसमें एक नाम दिवाकर राम का भी है, जिसे कैमूर के बहुजन युवा कैमूर का कांशीराम कहते हैं। जज बनने के बाद से दिवाकर राम को बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। गाँव के हर लोगों को लग रहा है कि अपना बेटा जज बना है। आखिर कौन है दिवाकर राम, आइए जानते हैं-
यह सर्वविदित है कि आरएसएस हमेशा से आदिवासियों को आदिवासी न कह कर वनवासी कहता है। इसके पीछे बहुत बड़ी चाल है जिसे समझने की ज़रूरत है। हमें उस चाल को समझना होगा। यह आलेख उसी चाल को समझाने के लिए लिखा जा रहा है। इसके बारे में हम कुछ बिंदुओं के जरिये बात करेंगे-
“वर्ण और जाति को त्याग देना चाहिए। हमारे पूर्वजों ने गलतियाँ की हैं, और उन गलतियों को स्वीकार करने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए,” संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत ने पिछले सप्ताह नागपुर में कहा था। यह पहली बार नहीं है जब डॉ. भागवत ने ऐसी घोषणाएं की हैं।
NRI Ambedkarites from USA, Canada, UK, Germany, France, Nederland, Ireland, Spain, Sweden, Japan, Korea, Singapore, New Zealand, Belgium, Hungary, Australia, UAE, Oman, Qatar, Saudi Arabia, Bahrain and Malaysia condemn the manner in which Delhi’s Social Welfare minister Rajendra Pal Gautam had to resign from his post due to his presence at an event embracing Buddhism in Delhi on Wednesday October 5th 2022.Rajendra Pal Gautam attended the Ashoka Vijaya Dashami celebrations at Ambedkar Bhawan in Jhandewalan, where over 10,000 people from various religions embraced Buddhism. We condemn the manner in which mainstream Indian media villainized Mr Gautam, tried to defame him by taking some vows out of context, mischaracterizing them and attempting to divide the society.