शिक्षा मंत्री के बयान पर हंगाामा, रामचरित मानस के दोहे और मनुस्मृति के जहर पर क्यों नहीं?

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बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर निशाने पर हैं। वजह यह है कि उन्होंने रामचरित मानस और मनुस्मृति को नफरत फैलाने वाला और वंचितों से उनका हक छिनने वाला कह दिया। इसके बाद कोई उनकी चीभ काटने की बात कह रहा है तो कोई कह रहा है कि शिक्षा मंत्री को खुद शिक्षा लेने की जरूरत है। लेकिन कोई मनुस्मृति और रामचरित मानस में लिखे हुए पर बात नहीं कर रहा है। मसलन शिक्षा मंत्री ने 11 जनवरी को पटना के जिस कार्यक्रम में यह बातें कही, उस दौरान उन्होंने रामचरित मानस के उस दोहे का भी जिक्र किया, जिसमें लिखा है कि- अधम जाति में विद्या पाए, भयहु यथा अहि दूध पिलाए … यानी कि नीच जाति के लोग शिक्षा ग्रहण कर के जहरीले हो जाते हैं, जैसे कि सांप दूध पीने के बाद हो जाता है।

ऐसे में मनुवादी व्यवस्था जिन्हें अधम और नीच कहती है, वो लोग विरोध क्यों न दर्ज कराएं? देश के एक बड़े वर्ग को नीच कहने वाले इस दोहे पर न किसी धार्मिक गुरु ने, न ही रामायण की बात कर लाखों कमाने वालों ने और न ही चैनलों ने कुछ कहा। बस विरोध शुरू कर दिया गया। अयोध्या के एक कथित संत जगद्गुरू परमहंस आाचार्य ने मंत्री चंद्रशेखर को उनके पद से बर्खास्त करे की मांग की है। उनसे माफी मांगने की बात की है और माफी नहीं मांगने पर शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर की जीभ काटने वालों को 10 करोड़ रुपये का इनाम देने का ऐलान भी कर दिया है।

बात तो इस पर भी होनी चाहिए कि खुद को संत कहने वाले के पास 10 करोड़ कहां से आएंगे। और क्या पुलिस को उस संत पर इसके लिए मुकदमा नहीं दर्ज करना चाहिए कि वह लोगों को किसी व्यक्ति को मारने के लिए, उसकी चीभ काटने के लिए उकसा रहा है। कोई मुस्लिम धर्मगुरु इस तरह की बातें कर दे तो देश में हंगामा मच जाए, ये मीडिया वाले उसके पीछे पर जाएं। लेकिन यहां तो सब सही है।

बिहार के शिक्षामंत्री के खिलाफ एक और वीर सामने आए हैं। पहले युवाओं को प्रणय पाठ पढ़ाने वाले और अब लाखों रुपये लेकर राम प्रेम में डूबे रामकथा कहने वाले कवि कुमार विश्वास कह रहे हैं कि बिहार के शिक्षा मंत्री को खुद शिक्षा लेने की जरूरत है। ये वही कुमार विश्वास हैं जिन्होंने कुछ दिन पहले एक वीडियो डाला था, जिसका शीर्षक था- किसके गुलाम हैं राम। इसमें कुमार विश्वास ने कहा था कि- भगवान राम अपनी एक जाँघ पर सीता को और दूसरी जाँघ पर शबरी को लिटाकर बेर खिला रहे हैं जबकि न तो वाल्मीकि रामायण और न ही तुलसीदास रचित रामायण में शबरी और सीता को जाँघ पर सुलाने का प्रसंग है। और रामायण की कहानी के मुताबिक शबरी और राम सीता हरण के बाद मिलते हैं। ऐसे में क्या कुमार विश्वास को रामकथा विशेषज्ञ बनने से पहले खुद पढ़ने की जरूरत नहीं है? कुमार विश्वास की इस भ्रामक बातों पर साधु-संन्यासियों और हिन्दु धर्म के रक्षकों की त्यौरियां क्यों नहीं चढ़ी।

बिहार के शिक्षा मंत्री ने जिस मनुस्मृति को देश के वंचितों का हक छिनने की बात कहने वाला ग्रंथ बताया है, उससे आखिर किसको इंकार हो सकता है। मनुस्मृति सहित हिन्दुओं के कई धार्मिक ग्रंथों में देश के वंचित समाज और महिलाओं को लेकर जिस तरह की भेदभाव पूर्ण बातें कही गई है, उसके खिलाफ बोलने में सवर्ण समाज के कथित क्रांतिकारी से लेकर कथित संतों तक की जुबान गूंगी हो जाती है, लेकिन जब कोई व्यक्ति उन बातों को मंच से कह देता है तो उनके भीतर धर्म के प्रति भरा प्रेम कुलाचे मारने लगता है। वह चीभ और गर्दन काटने की बात करने लगते हैं। इसकी सीख उन्हें कौन देता है?? क्या वही ग्रंथ??

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