समाजवादी पार्टी का झगड़ा जिसे मैं रगड़ा कह रहा हूं, लखनऊ से दिल्ली पहुंच गया है. दिल्ली में चुनाव आयोग से मिलने के बाद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अखिलेश मेरा बेटा है उससे मतभेद दूर कर लेंगे. असल में मुलायम सिंह ने बाप-बेटे के रिश्ते की दुहाई देकर जो विश्वास जताया है वह विश्वास कभी टूटा ही नहीं था. आप पिछले तकरीबन तीन महीने जबसे समाजवादी पार्टी के परिवार का झगड़ा चल रहा है, कि मीडिया रिपोर्ट पर ध्यान दीजिए. इस बीच कभी भी न तो समाजवादी पार्टी के गुंडई की बात हुई न ही भ्रष्टाचार की, और न ही परिवारवाद की. बस बाप-बेटे और परिवार के बीच इमोशन झगड़े की चर्चा ही होती रही.
इस बीच चुनाव की तारीख घोषित होने तक यह ड्रामारूपी झगड़ा अपने चरम पर पहुंच गया. जब आर-पार की तयशुदा लड़ाई सामने आई तो एक चीज चौंकाने वाली यह थी कि 80 फीसदी लोग अखिलेश यादव के साथ खड़े नजर आए, जबकि जिस मुलायम सिंह ने इस पार्टी की नींव रखी और उसे अपने खून-पसीने से सींचा उनके साथ बस गिने-चुने लोग ही नजर आए. एक और बात ध्यान खिंचने वाली रही. युवा नेता अखिलेश यादव के पक्ष में खड़े युवा नेता तो समझ में आते हैं लेकिन जब रेवती रमन सरीखे दर्जन भर पुराने नेता मुलायम सिंह को छोड़कर अखिलेश के पीछे चलते दिखते हैं तो यह बात समझ से परे है, क्योंकि ये वो लोग हैं, जिसे मुलायम सिंह ने आम ‘इंसान’ से ‘नेता’ बनाया. और ऐसे में जब मुलायम सिंह यादव पिता-पुत्र प्रेम और बेटे को समझा लेने की बात करते हैं तो सारा परिदृश्य साफ हो जाता है. यह साफ हो जाता है कि पटकथा रची हुई है जिसके पटाक्षेप का वक्त आ गया है.
यूपी चुनाव को लेकर एक और बात साफ है. इस चुनाव में बसपा को छोड़ कर अभी तक किसी के पास चुनाव का कोई मुद्दा नहीं है. सपा इन पांच सालों में अपने ”लोगों” को फायदा पहुंचाने और गुंडागर्दी के अलावा कुछ नहीं किया. जबकि भाजपा के पास यूपी चुनाव के लिए न तो कोई चाल है, न चरित्र, न कोई चेहरा और न ही कोई मुद्दा. बाप-बेटे के बीच झगड़ा नहीं रगड़ा हो रहा है जो चुनाव से ऐन पहले सुलझ जाएगा
समाजवादी पार्टी का झगड़ा जिसे मैं रगड़ा कह रहा हूं, लखनऊ से दिल्ली पहुंच गया है. दिल्ली में चुनाव आयोग से मिलने के बाद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अखिलेश मेरा बेटा है उससे मतभेद दूर कर लेंगे. असल में मुलायम सिंह ने बाप-बेटे के रिश्ते की दुहाई देकर जो विश्वास जताया है वह विश्वास कभी टूटा ही नहीं था. आप पिछले तकरीबन तीन महीने जबसे समाजवादी पार्टी के परिवार का झगड़ा चल रहा है, कि मीडिया रिपोर्ट पर ध्यान दीजिए. इस बीच कभी भी न तो समाजवादी पार्टी के गुंडई की बात हुई न ही भ्रष्टाचार की, और न ही परिवारवाद की. बस बाप-बेटे और परिवार के बीच इमोशन झगड़े की चर्चा ही होती रही.
इस बीच चुनाव की तारीख घोषित होने तक यह ड्रामारूपी झगड़ा अपने चरम पर पहुंच गया. जब आर-पार की तयशुदा लड़ाई सामने आई तो एक चीज चौंकाने वाली यह थी कि 80 फीसदी लोग अखिलेश यादव के साथ खड़े नजर आए, जबकि जिस मुलायम सिंह ने इस पार्टी की नींव रखी और उसे अपने खून-पसीने से सींचा उनके साथ बस गिने-चुने लोग ही नजर आए. एक और बात ध्यान खिंचने वाली रही. युवा नेता अखिलेश यादव के पक्ष में खड़े युवा नेता तो समझ में आते हैं लेकिन जब रेवती रमन सरीखे दर्जन भर पुराने नेता मुलायम सिंह को छोड़कर अखिलेश के पीछे चलते दिखते हैं तो यह बात समझ से परे है, क्योंकि ये वो लोग हैं, जिसे मुलायम सिंह ने आम ‘इंसान’ से ‘नेता’ बनाया. और ऐसे में जब मुलायम सिंह यादव पिता-पुत्र प्रेम और बेटे को समझा लेने की बात करते हैं तो सारा परिदृश्य साफ हो जाता है. यह साफ हो जाता है कि पटकथा रची हुई है जिसके पटाक्षेप का वक्त आ गया है.
यूपी चुनाव को लेकर एक और बात साफ है. इस चुनाव में बसपा को छोड़ कर अभी तक किसी के पास चुनाव का कोई मुद्दा नहीं है. सपा इन पांच सालों में अपने ”लोगों” को फायदा पहुंचाने और गुंडागर्दी के अलावा कुछ नहीं किया. जबकि भाजपा के पास यूपी चुनाव के लिए न तो कोई चाल है, न चरित्र, न कोई चेहरा और न ही कोई मुद्दा. ”चुप रहता है पर चौंकाता है मायावती का वोटर”
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने शनिवार को पार्टी उम्मीदवारों की तीसरी लिस्ट जारी की और दावा किया कि वो प्रदेश में ”अकेले दम पर सरकार” बनाएंगी. विरोधियों ने उनके दावे पर प्रश्नचिन्ह लगाने में देर नहीं की लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों को उनके बयानों में ”गंभीरता” नज़र आती है.
अख़बार जदीद ख़बर के संपादक मासूम मुरादाबादी कहते हैं, ”मायावती की पार्टी चुनाव के लिए तैयार है. बाक़ी दलों में टिकट बंटवारों का मुहुर्त नहीं आया है. समाजवादी पार्टी में सिर फुटव्वल हो रहा है. इसका समाजवादी पार्टी को नुक़सान पहुंचने का अंदेशा है.” हालांकि, भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और बाकी नेता लगातार कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में मुख्य मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच है. सपा का अखिलेश यादव धड़ा भी दावा कर रहा है कि मुख्यमंत्री अखिलेश के विकास कार्यों के दम पर पार्टी दोबारा सत्ता में आएगी. ये दोनों दल विभिन्न चुनाव सर्वेक्षणों का भी हवाला देते हैं तो मायावती बीजेपी और सपा के बीच ”गठजोड़” का आरोप लगाती हैं.
इस पर वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह कहते हैं, ”आज़ादी के बाद ये उत्तर प्रदेश का पहला चुनाव है जिसे त्रिकोणीय कहा जा सकता है. फ़िलहाल ये कहना जोखिम भरा होगा कि सपा, बीएसपी और बीजेपी में से कौन जीत सकता है?” रामकृपाल सिंह की राय है कि मायावती की पार्टी के पास तैयारी के लिहाज़ से बढ़त है. और, उनका वोट बैंक भी स्थिर है.
वो कहते हैं, ”कई बार मायावती का वोट बैंक बहुत चौंकाता है. वजह ये है कि वो चुप रहता है. यही हाल अल्पसंख्यकों का भी है. अगर सपा पुराने स्वरुप में लड़ती तो भी एडवांटेज मायावती के पास था. वो ये भी कहते हैं कि जो मिडिल क्लास का जो तबक़ा क़ानून-व्यवस्था को अहमियत देता है, वो भी मायावती का समर्थन कर सकता है.”
समाजशास्त्री प्रोफेसर बद्री नारायण भी बीएसपी की चुनाव पूर्व तैयारी को उसके लिए बढ़त की वजह बताते हैं. वो कहते हैं, ”मायावती की प्लानिंग बहुत सॉलिड है. मीडिया उसे देख नहीं पाती है. मायावती अनौपचारिक तौर पर बहुत पहले से अपने उम्मीदवार घोषित कर चुकी थीं. उनके उम्मीदवारों को काफ़ी समय मिला है.”
बीएसपी के उम्मीदवारों के चयन में जातिगत के साथ-साथ सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश साफ़ नज़र आती है. मायावती के मुताबिक़ उनकी पार्टी ने अनुसूचित जाति के 87, मुस्लिम समुदाय के 97, अन्य पिछड़ा वर्ग के 106 और 113 स्वर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं.
मायावती का ख़ास ज़ोर मुस्लिम-दलित समीकरण को साधने पर है. वो कहती हैं, ”मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में अकेले मुस्लिम और दलित वोट के साथ आने से बीएसपी उम्मीदवार चुनाव जीत जाएंगे.” सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश को लेकर विरोधी मायावती के ऐसे बयानों पर सवालिया निशान लगाते हैं लेकिन वो इस आपत्ति को नज़रअंदाज़ करती हैं, और वोटरों को आगाह करती हैं, ”अल्पसंख्यक वोटर सपा के दोनों धड़ों और कांग्रेस को देकर बांटे नहीं.”
लेकिन क्या अल्पसंख्यक वोटर मायावती का साथ देंगे, इस सवाल पर रामकृपाल सिंह कहते हैं, ”वर्तमान में ऐसा लगता है कि अल्पसंख्यक बीजेपी को हराने के लिए वोट देते हैं. उसके सामने जब ये तस्वीर साफ़ होती है कि बीजेपी को कौन हरा सकता है, वो उसकी तरफ़ चला जाता है, चाहे वो बीएसपी हो या फिर सपा.”
वो कहते हैं कि सपा में जारी तकरार का फ़ायदा बीएसपी को मिल सकता है. रामकृपाल सिंह की राय है, ”मायावती के यहां परिवार में कोई झगड़ा नहीं है. मायावती को ये देखना नहीं है कि बीजेपी की लिस्ट आ जाए तब हम जारी करें. लगातार वो ये संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि मैं ही हूं जो बीजेपी को हरा सकती हूं.”
हालांकि मासूम मुरादाबादी की राय अलग है. उनका आंकलन है कि उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने अभी तक अपना मन नहीं बनाया है. वो कहते हैं, ”अगर सपा बंटी तो मुसलमानों का बड़ा हिस्सा अखिलेश के साथ जा सकता है. लेकिन फ़ायदा मायावती को भी मिलेगा.”
मासूम मुरादाबादी ये भी कहते हैं, ”मायावती ने मुसलमानों को बड़ी संख्या में टिकट दिए हैं लेकिन इससे वोट मिलने की गारंटी नहीं मिलती क्योंकि वो मुसलमानों के साथ सत्ता बांटने की बात नहीं करती हैं.”
सवाल नोटबंदी का भी है. मायावती नोटबंदी को लेकर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ लगातार आक्रामक रुख़ अपनाए हुए हैं. बीजेपी का दावा है कि नोटबंदी के बाद सबसे ज्यादा मुश्किल में मायावती की पार्टी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लखनऊ की रैली में इस मुद्दे को लेकर मायावती पर ”हमला” कर चुके हैं. लेकिन बद्री नारायण की राय है कि नोटबंदी से परेशान हुए लोग बीएसपी का समर्थन कर सकते हैं. रामकृपाल सिंह कहते हैं, “मायावती के वोट बैंक का दृष्टिकोण बड़ा सा़फ है. जो 18 फ़ीसदी दलित हैं, उन्हें नोटबंदी और विकास से ज्यादा लेना देना नहीं है.” वो ये भी कहते हैं कि जो मिडिल क्लास का जो तबक़ा क़ानून-व्यवस्था को अहमियत देता है, वो भी मायावती का समर्थन कर सकता है.
रामकृपाल सिंह की राय है, ”क़ानून व्यवस्था के मामले में मध्यवर्ग का बड़ा तबक़ा मायावती को मानता है. लेकिन उनके शासन में भ्रष्टाचार बढ़ना मायवती का माइनस प्वाइंट है.” वहीं बद्री नारायण की राय में मायावती के ख़िलाफ़ जो बात जाती है, वो ये है कि वो अखिलेश यादव या फिर बीजेपी की तरह मध्य वर्ग तक अपनी ख़ास छवि नहीं गढ़ पाती हैं. उन्हें किसी पार्टी से गठबंधन नहीं कर पाने का नुक़सान भी हो सकता है.
वहीं, मायावती के विरोधी ये भी याद दिलाते हैं कि उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में कोई सीट नहीं जीत सकी थी. इसे लेकर मासूम मुरादाबादी कहते हैं, ”लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच बहुत अंतर होता है. मुद्दे अलग होते हैं और नतीजे भी अलग होते हैं.” वो कहते हैं कि मायावती को भले ही कमतर करके आंका जा रहा हो लेकिन वो बढ़त बना सकती हैं.
– बीबीसी हिन्दी से साभार गुजरात के चुनाव एवं आदिवासी समस्याएं
गुजरात में विधानसभा चुनाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दल सक्रिय हो गये हैं. ये चुनाव जहां भारतीय जनता पार्टी के लिए एक चुनौती बनते जा रहे हैं वहीं दूसरों दलों को भाजपा को हराने की सकारात्मक संभावनाएं दिखाई दे रही है. पिछले तीन चुनावों से शानदार जीत का सेहरा बांधने वाली भाजपा के लिए आखिर ये चुनाव चुनौती क्यों बन रहे हैं? एक अहम प्रश्न है जिसका उत्तर तलाशना जरूरी है. इस बार गुजरात के इन चुनावों में आदिवासी लोगों की महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका हो सकती है. मैं पिछले चार चुनावों से गुजरात के बड़ौदा एवं छोटा उदयपुर से जुड़े आदिवासी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता रहा हूं. आगामी चुनाव की पृष्ठभूमि में मैं आदिवासी समस्याओं और उनके समाधान में सकारात्मक वातावरण को निर्मित करने की आवश्यकता महसूस करता हूं.
आजादी के सात दशक बाद भी गुजरात के आदिवासी उपेक्षित, शोषित और पीड़ित नजर आते हैं. राजनीतिक पार्टियां और नेता आदिवासियों के उत्थान की बात करते हैं, लेकिन उस पर अमल नहीं करते. आज इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार एवं विकास का जो वातावरण निर्मित होना चाहिए, वैसा नहीं हो पा रहा है, इस पर चिंतन अपेक्षित है. अक्सर आदिवासियों की अनदेखी कर तात्कालिक राजनीतिक लाभ लेने वाली बातों को हवा देना एक परम्परा बन गयी है. इस परम्परा को बदले बिना देश को वास्तविक उन्नति की ओर अग्रसर नहीं किया जा सकता. देश के विकास में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस भूमिका को सही अर्थां में स्वीकार करना वर्तमान की बड़ी जरूरत है और इसके लिए चुनाव का समय निर्णायक होता है.
गुजरात में अभी भी आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवनयापन कर रहे हैं. नक्सलवाद हो या अलगाववाद, पहले शिकार आदिवासी ही होते हैं. नक्सलवाद की समस्या आतंकवाद से कहीं बड़ी है. आतंकवाद आयातित है, जबकि नक्सलवाद देश की आंतरिक समस्या है. यह समस्या देश को अंदर ही अंदर घुन की तरह खोखला करती जा रही है. नक्सली अत्याधुनिक विदेशी हथियारों और विस्फोटकों से लैस होते जा रहे हैं. नक्सली सरकारों को मजबूती के साथ आंख भी दिखा रहे हैं. राजनीतिक पार्टियों को बाहरी ताकतों से लड़ने की बातें छोड़कर पहले देश की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास और रणनीति बनाना चाहिए. उनके वादे देश को आंतरिक रूप से मजबूत करने के होने चाहिए. केंद्र सरकार आदिवासियों के नाम पर हर साल हजारों करोड़ रुपए का प्रावधान बजट में करती है. इसके बाद भी 7 दशक में उनकी आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं आया है. स्वास्थ्य सुविधाएं, पीने का साफ पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं आदि मूलभूत सुविधाओं के लिए वे आज भी तरस रहे हैं.
गुजरात को हम भले ही समृद्ध एवं विकसित राज्य की श्रेणी में शामिल कर लें, लेकिन यहां आदिवासी अब भी समाज की मुख्य धारा से कटे नजर आते हैं. इसका फायदा उठाकर मध्यप्रदेश से सटे नक्सली उन्हें अपने से जोड़ लेते हैं. सरकार आदिवासियों को लाभ पहुँचाने के लिए उनकी संस्कृति और जीवन शैली को समझे बिना ही योजना बना लेती हैं. ऐसी योजनाओं का आदिवासियों को लाभ नहीं होता, अलबत्ता योजना बनाने वाले जरूर फायदे में रहते हैं. महंगाई के चलते आज आदिवासी दैनिक उपयोग की वस्तुएं भी नहीं खरीद पा रहे हैं. वे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं. अतः गुजरात की बहुसंख्य आबादी आदिवासियों पर विशेष ध्यान देना होगा.
अब जबकि आदिवासी क्षेत्र में भी शिक्षा को लेकर जागृति का माहौल बना है और कुछ शिक्षा के अधिकार का कानून भी आ गया है और यह अपने क्रियान्वयन की तरफ अग्रसर है तो यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि आदिवासी बच्चों की स्थिति में इससे क्या बदलाव आता है. जो पिछले 70 सालों में नहीं आ पाया. आदिवासी समुदाय में बालिका शिक्षा की स्थिति काफी बुरी है. आदिवासी समुदाय में शिक्षा की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुल आबादी का 10 प्रतिशत से भी कम प्राथमिक से आगे की पढ़ाई कर पाए हैं. सरकार के साथ-साथ गैर सरकारी संगठनों को इस दिशा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका बनानी चाहिए. जैसाकि मेरे संसदीय क्षेत्र छोटा उदयपुर में सुखी परिवार फाउंडेशन के द्वारा गणि राजेन्द्र विजयजी के नेतृत्व में बालिका शिक्षा एवं शिक्षा की दृष्टि से एक अभिनव क्रांति घटित हुई है. लेकिन आदिवासी समुदाय की शिक्षा राज्य एवं केन्द्र सरकार के लिए एक चुनौती का प्रश्न है. आदिवासी समुदाय में शिक्षा के स्तर को बढ़ाना एवं इसे सुनिश्चित करना जरूरी है. यह एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान हमें समग्रता से हल ढूंढना होगा, इसके लिए जरूरी है कि पहले हम उन समस्याओं को सुलझाएं जिनके कारण आदिवासी बच्चों का स्कूलों में ठहराव नहीं हो पा रहा है, उनका नामांकन नहीं हो पा रहा, पाठशाला से बाहर होने की दर, खासकर लड़कियों में लगातार बढ़ती जा रही है. बच्चे घरों में, होटलों या ढाबों पर या खेतों के काम कर रहे हैं. कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका हल हमें समस्या की जड़ तक ले जाएगा. इससे निपटने के लिए समाज, राज्य एवं केन्द्र को सघन प्रयास करने होंगे.
हमें यह समझना होगा कि एक मात्र शिक्षा की जागृति से ही आदिवासियों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा. बदलाव के लिए जरूरत है उनकी कुछ मूल समस्याओं के हल ढूंढना. कोई परिवार ये नहीं चाहता कि उसके बच्चे स्कूल जाने के बजाये काम करें. ऐसे समुदाय जिन्हें विकास की सीमाओं पर छोड़ दिया गया है वो सारा दिन अपनी पूरी ताकत से सिर्फ इसलिए काम करते हैं कि वो दो वक्त का भोजन जुटा सकें पर कई बार इसमें भी सफल नहीं हो पाते हैं. अशिक्षा की समस्या एक ऐसा प्रश्न है जिसकी जड़ काफी गहरी जमीं हुई है. नीतियों ओर कानून बना देने से ही ये समस्या हल हो जाएगी ये एक बचकानी सोच है. इसके लिए पहले हमें उन कारणों को समझना होगा जिनकी वजह से बच्चों को अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए काम करना पड़ता है. इसकी जड़ में वो व्यवस्था है जो व्यक्ति एवं समुदायों को आम और खास में बांटता है. अब इस व्यवस्था के परिवर्तन की बात होनी चाहिए.
आदिवासियों की खुदकी एक अपनी सभ्यता और संस्कृति है जिसमे वह जीते हैं. उनका एक तौर तरीका है, उनका रहन सहन खुद का है, भाषा है, बोली है, संस्कृति है तथा अपना एक अलग तरीका है जीवन को जीने तथा समझने का, वो जिस हालत में हैं, वो खुश हैं उनके अपने स्कूल या शिक्षा तंत्र हैं, उनके खुद के खेल या प्रथाएं हैं, खुद के ही देवी देवता हैं तथा खुद की ही परंपरा और सभ्यता है. इसी तरह सदियों से जंगल में रहते हुए उन्होंने खुद का ही एक स्वास्थ्य का या उपचार करने का तंत्र भी है जिससे वे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं तथाकथित विकसित स्वास्थ्य सेवाओं से वे आज भी वंचित हैं. आज भी उनके बच्चों का जन्म परम्परागत तरीकों से ही दाई ही करती है. बुखार या ऐसी ही छोटी-मोटी बीमारियों के लिए डॉक्टरों की शरण नहीं लेते. इस तरह सरकार द्वारा उनके लिए जो सुविधाएं एवं सेवाएं सुलभ करायी जा रही हैं उनका वे लाभ नहीं ले पा रहे हैं. तकलीफ और परेशानी में जीना उनकी आदत सी है. ऐसी स्थितियों से उन्हें मुक्ति दिलाना वर्तमान समय की बहुत अपेक्षा है.
भारत के जंगल समृद्ध हैं, आर्थिक रूप से और पर्यावरण की दृष्टि से भी. देश के जंगलों की कीमत खरबों रुपये आंकी गई है. ये भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद से तो कम है लेकिन कनाडा, मेक्सिको और रूस जैसे देशों के सकल उत्पाद से ज्यादा है. इसके बावजूद यहां रहने वाले आदिवासियों के जीवन में आर्थिक दुश्वारियां मुंह बाये खड़ी रहती हैं. आदिवासियों की विडंबना यह है कि जंगलों के औद्योगिक इस्तेमाल से सरकार का खजाना तो भरता है लेकिन इस आमदनी के इस्तेमाल में स्थानीय आदिवासी समुदायों की भागीदारी को लेकर कोई प्रावधान नहीं है. जंगलों के बढ़ते औद्योगिक उपयोग ने आदिवासियों को जंगलों से दूर किया है. आर्थिक जरूरतों की वजह से आदिवासी जनजातियों के एक वर्ग को शहरों का रुख करना पड़ा है. विस्थापन और पलायन ने आदिवासी संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज और संस्कार को बहुत हद तक प्रभावित किया है. गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी के चलते आज का विस्थापित आदिवासी समाज, खासतौर पर उसकी नई पीढ़ी, अपनी संस्कृति से लगातार दूर होती जा रही है. आधुनिक शहरी संस्कृति के संपर्क ने आदिवासी युवाओं को एक ऐसे दोराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां वे न तो अपनी संस्कृति बचा पा रहे हैं और न ही पूरी तरह मुख्यधारा में ही शामिल हो पा रहे हैं. प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आदिवासी कॉर्निवल में आदिवासी उत्थान और उन्नयन की चर्चाएं की और वे इस समुदाय के विकास के लिए तत्पर भी हैं.
आदिवासियों का हित केवल आदिवासी समुदाय का हित नहीं है प्रत्युतः सम्पूर्ण देश व समाज के कल्याण का मुद्दा है जिस पर व्यवस्था से जुड़े तथा स्वतन्त्र नागरिकों को बहुत गम्भीरता से सोचना चाहिए. और इस बार के गुजरात चुनाव इसकी एक सार्थक पहल बनकर प्रस्तुत हो, यह अपेक्षित है.
– लेखक गुजरात से लोकसभा सांसद हैं. शहीद उधम सिंह के परपोते को एक अदद नौकरी की तलाश
यह खबर मुझे एक चैनल के वेबसाइट पर पढ़ने को मिली. हेडिंग थी- ‘जनरल डायर को मारने वाले शहीद उधम सिंह के परपोते को नहीं मिल रही चपरासी की नौकरी’ खबर पढकर मुझे लगा कि एक वीर शहीद के परिवार के साथ अन्याय हो रहा है। हो सकता है कि खबर लिखने वाले पत्रकार की ऐसी मंशा ना हो और उसने अपनी खबर को सनसनी बनाने के लिए यह हेडिंग दी हो, लेकिन चूंकि मैं क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह के बलिदान के बारे में जानता हूं इसलिए मुझे यह खबर अखर गई. लेकिन पहले उधम सिंह के परपोते जग्गा सिंह के बारे में जानते हैं. फिर दूसरी बात.
शहीद उधम सिंह के परपोते पंजाब सरकार में नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. नौकरी के नाम पर वह दस साल से पंजाब सरकार द्वारा छले जा रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने 10 साल पहले उन्हें नौकरी देने का वादा किया था. वह इंतजार करते रहे, लेकिन पंजाब की कांग्रेस सरकार द्वारा किया वादा; वादा ही रह गया. क्योंकि कांग्रेस तुरंत सत्ता से बाहर हो गई थी और उसके बाद की भाजपा-अकाली सरकार ने इसका संज्ञान नहीं लिया. उधम सिंह की बड़ी बहन आस कौर के प्रपौत्र जग्गा सिंह द्वारा शिरोमणि अकाली दल और भाजपा सरकार से बार-बार अपील किए जाने का अभी कोई परिणाम नहीं निकला है. यह साफ हो गया है कि भाजपा की सरकार का ‘राष्ट्रवाद’ शायद कुछ ‘खास योग्यता’ वाले लोगों के लिए ही है.
फिलहाल जग्गा सिंह एक दुकान में मजदूरी का काम करते हैं, जहां से उन्हें हर महीने मात्र 2500 रुपये मिलते हैं. इसी पैसे से वह अपने परिवार के छह सदस्यों के साथ बेहद गरीबी में जीवन गुजार रहे हैं. इसके अलावा उन्हें 60 वर्षीय पिता जीत सिंह की देखभाल भी करनी पड़ती है.
अब दूसरी बात, जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है. जिन सरकारों ने उधम सिंह को उनके बलिदान के मुताबिक इज्जत नहीं दी, उनसे इस बात की उम्मीद लगाना कि वह उनके परपोते को नौकरी देगी, इसकी उम्मीद करना बेमानी है. और यह सरकार की दया है कि वह किसी को नौकरी देना चाहती है या नहीं. क्योंकि सिर्फ किसी का परपोता होने से कोई सरकारी नौकरी के योग्य नहीं हो जाता. लेकिन हां, जिस पंजाब से खबर आई है, मुझे वहां के लोगों से बात करनी है. मैंने सुना है कि पंजाब के लोग धनवान हैं. उनकी बड़ी-बड़ी कोठियां देखने लायक होती है. उस पंजाब के लखपति और करोड़पतियों से मेरा सवाल है कि क्या वो एक क्रांतिकारी के परिवार के लिए एक बेहतर जिंदगी का इंतजाम नहीं कर सकते ?. क्या वह उन्हें 15-20 हजार रुपये महीने की नौकरी नहीं दे सकते ?
अगर पंजाब के लोग नहीं कर सकते तो क्या दिल्ली, नोएडा, महाराष्ट्र के लोग ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं? क्या समाज के समर्थ लोगों की यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वह एक क्रांतिकारी शहीद के नाम का मान रखते हुए उसके परिवार को मदद करे? अगर यह खबर पढ़ने के बाद किसी के दिमाग में यह सवाल आए कि उधम सिंह कौन थे तो उसके लिए बस इतना जानना काफी है कि उधम सिंह वह शेर थे, जिन्होंने अमृतसर के जलियावाला बाग में सैकड़ों लोगों को गोली मारने का आदेश देने वाले माइकल ओ डायर को लंदन में जाकर गोली मार दी थी और अपनी माटी के अपमान का बदला लिया था. इससे ज्यादा जानना हो तो गूगल है ही.
क्या आप उस युद्ध के बारे में जानते हैं, जिसमें 500 अछूतों ने 28 हजार की पेशवा सेना को धूल चटा दी थी
1 जनवरी सन् 1818 के दिन एक ऐसी ही घटना घटी थी, जिसने दलित समाज के शौर्य को दुनिया भर में स्थापित किया था. मुख्यधारा की मीडिया और दलित समाज के विरोधी हमेशा से इस घटना का जिक्र करने से कतराते रहे हैं. क्योंकि यह घटना जहां दलितों की शौर्यगाथा है तो वहीं मनुवादियों के मुंह पर कालिख. बहुजन समाज के लोगों का इस घटना को जानना बहुत जरूरी है. इस महान गाथा में 500 नायकों ने हिस्सा लिया था. ये सारे लोग बहुजन समाज के नायक हैं. इस ऐतिहासिक दिन को याद करते हुए डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर प्रतिवर्ष 1 जनवरी को उस महान स्थान पर जाकर उन वीर दलितों का नमन किया करते थे.
यह दिन कोरेगांव के संघर्ष के विजय का दिन है, जिसमें महारों ने ब्राह्मणवादी पेशवाओं को धूल चटा दी थी. भारत में अंग्रेज़ी राज़ की स्थापना के विषय में सामान्यतः लोग यह मानते हैं कि अंग्रेज़ों के पास आधुनिक हथियार और सेना थी इसलिए उन्होंने आसानी से भारत पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया. लेकिन सच्चाई यह है कि अंग्रेजों ने भारत के राजाओं-महाराजाओं को अंग्रेज़ी सेना से नहीं बल्कि भारतीय सैनिकों की मदद से परास्त किया था. अंग्रेजों की सेना में बड़ी संख्या में भर्ती होने वाले ये सैनिक कोई और नहीं बल्कि इस देश के ‘अछूत’ कहलाने वाले लोग थे. जानवरों सा जीवन जीने को विवश अछूतों को जब अंग्रेजी सेना में नौकरी मिली तो बेहतर जीवन और इज्जत के लिए ये अंग्रेजी सेना में शामिल हो गए. इसके परिणाम स्वरूप जो संघर्ष हुआ वह देश के इतिहास में दर्ज है.
1 जनवरी 1818 को कोरेगांव के युद्ध में महार सैनिकों ने ब्राह्मणवादी पेशवाओं को धूल चटा दी थी. डॉ. अम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस (अंग्रेज़ी) के खंड 12 में ‘द अनटचेबल्स एंड द पेक्स ब्रिटेनिका’ में इस तथ्य का वर्णन किया है. यह कोरेगांव की लड़ाई थी, जिसके माध्यम से अंग्रेजों ने मराठा साम्राज्य को ध्वस्त कर भारत में ब्रिटिश राज स्थापित किया. यहां 500 महार सैनिकों ने पेशवा राव के 28 हजार सैनिकों (घुड़सवारों एवं पैदल) की फौज को हराकर देश से पेशवाई का अंत किया.
कोरेगांव भीमा नदी के तट पर महाराष्ट्र के पुणे के पास स्थित है. 01 जनवरी 1818 को सर्द मौसम में एक ओर कुल 28 हजार सैनिकों जिनमें 20000 हजार घुड़सवार और 8000 पैदल सैनिक थे, जिनकी अगुवाई ‘पेशवा बाजीराव-II कर रहे थे तो दूसरी ओर ‘बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फेंट्री’ के 500 ‘महार’ सैनिक, जिसमें महज 250 घुड़सवार सैनिक ही थे. आप कल्पना कर सकते हैं कि सिर्फ 500 महार सैनिकों ने किस जज्बे से लड़ाई की होगी कि उन्होंने 28 हजार पेशवाओं को धूल चटा दिया. दूसरे शब्दों में कहें तो एक ओर ‘ब्राह्मण राज’ बचाने की फिराक में ‘पेशवा’ थे तो दूसरी ओर ‘पेशवाओं’ के पशुवत ‘अत्याचारों’ से ‘बदला’ चुकाने की ‘फिराक’ में गुस्से से तमतमाए ‘महार’. आखिरकार इस घमासान युद्ध में ‘ब्रह्मा के मुख से पैदा’ हुए पेशवा की शर्मनाक पराजय हुई. 500 लड़ाकों की छोटी सी सेना ने हजारों सैनिकों के साथ 12 घंटे तक वीरतापूर्वक लड़ाई लड़ी. भेदभाव से पीड़ित अछूतों की इस युद्ध के प्रति दृढ़ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महार रेजिमेंट के ज्यादातर सिपाही बिना पेट भर खाने और पानी के लड़ाई के पहले की रात 43 किलोमीटर पैदल चलकर युद्ध स्थल तक पहुंचे. यह वीरता की मिसाल है. इस युद्ध में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक चौकोर मीनार बनाया गया है, जिसे कोरेगांव स्तंभ के नाम से जाना जाता है. यह महार रेजिमेंट के साहस का प्रतीक है. इस मीनार पर उन शहीदों के नाम खुदे हुए हैं, जो इस लड़ाई में मारे गए थे. 1851 में इन्हें मेडल देकर सम्मानित किया गया.
दलित-आदिवासी समाज को अपने पूर्वज उन 500 महार सैनिकों को नमन करना चाहिए क्योंकि इस युद्ध में पेशवा की हार के बाद ‘पेशवाई’ खतम हो गयी थी और ‘अंग्रेजों’ को इस भारत देश की ‘सत्ता’ मिली. इसके फलस्वरूप ‘अंग्रेजों’ ने इस भारत देश में ‘शिक्षण’ का प्रचार किया, जो हजारों सालों से बहुजन समाज के लिए बंद था. जिस तरह बाबासाहेब आम्बेडकर प्रतिवर्ष 1 जनवरी को कोरेगांव जाकर उन वीर दलितों का नमन किया करते थे, हमें भी उन वीरों के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करनी चाहिए और अपने पूर्वजों के शौर्य को याद कर गौरवान्वित होना चाहिए. शिक्षा और ज्ञान से डरता है धार्मिक भारत
भारत के ग्रामीण या शहरी बच्चों से बात करके देखिये, वे बहुत कुछ जानना चाहते हैं. जैसी जिज्ञासा यूरोप के सभ्य समाज के बच्चे करते हैं वैसी ही जिज्ञासा भारत के बच्चे भी करते हैं. जीवन, मन, शरीर, प्रकृति, मशीनें, समाज व्यवस्था और संबंधों पर उनकी जिज्ञासाएं इतनी रंग बिरंगी होती हैं कि उनको उत्तर देना कठिन हो जाता है. उनकी जिज्ञासाओं का उत्तर देने के लिए अक्सर जिन लोगों को समाज द्वारा “अधिकृत” किया गया है उन्होंने इन जिज्ञासाओं की बहुत बारीकी से ह्त्या की है. उनकी जिज्ञासाओं को उत्तर देकर नयी जिज्ञासाओं और नये प्रश्नों की तरफ बढ़ाने का अर्थ होता है पुराने सामाजिक ताने बाने और धर्म से आगे बढना. लेकिन अगर आपका समाज किसी आखिरी किताब, आखिरी मसीहा या अपौरुषेय किताबों या विश्वगुरु होने के अहंकार से पीड़ित है तो इस अहंकार की ठीक बगल में एक भयानक डर से भी वह लगातार पीडित रहेगा. यही पूरे इस्लामिक जगत और भारत की कहानी है.
आसमानी या अपौरुषेय किताबों का या विश्वगुरु के अहंकार का आभामंडल इतना असुरक्षित और डरपोक होता है कि वो बच्चों और स्त्रियों के प्रश्नों से सबसे अधिक डरता है. इसीलिये ऐसे समाज के लोग पठन-पाठन का अधिकार अपनी बड़ी जनसंख्या को और स्त्रियों को नहीं देना चाहते. भारतीय होशियारों ने इस विषय में महारथ हासिल कर ली थी. उन्होंने इस काम लिये वर्ण और जाति व्यवस्था ही बना डाली थी और वर्णाश्रम को ही धर्म बना डाला था, और ये व्यव्वस्था उनके आधिपत्य को बनाये रखने के लिए यह बहुत हद तक सफल भी रही. अलबरूनी ने अपने यात्रा संस्मरणों में लिखा है कि काश भारत जैसी जाति व्यवस्था हमारे पास होती तो हम भी करोड़ों लोगों को सैकड़ों हजारों साल गुलाम रखकर निष्कंटक राज करते और दबी कुचली कौमें कोई आवाज भी न उठा पातीं. अलबरूनी की भारत से ये इर्ष्या बहुत महत्वपूर्ण है. वह स्वयं जिस समाज से आ रहे हैं वहां कभी ज्ञान के फूल खिले थे लेकिन बाद में सब रेगिस्तान हो गया.
भारत में भी श्रमणों (बौद्धों, जैनों), लोकायतों, आजीवकों के युग में ज्ञान विज्ञान की बहुत खोज हुई थी और आज गिनाई जाने वाली सारी सफलताएं उसी दौर की हैं. शून्य, रेखागणित, अंकशास्त्र, खगोल, व्याकरण, भेषज, धातुविज्ञान, आयुर्वेद, योग और मनोविज्ञान (जो कि अध्यात्म में पतित हुआ) की खोज श्रमणों अर्थात बौद्धों और जैनों ने की थी. तांत्रिक अनुशासन के साथ लोकायतों ने भारी काम किया था. लेकिन वेद वेदान्त के प्रसार के साथ ज्ञान विज्ञान की ये प्रेरणाएं समाप्त होने लगीं और खगोलशास्त्र ज्योतिष बन गया, रसायन और भेषज जादूगरी और राजगुरुओं की गोपनीय विद्या बन गयी और एक वर्ण विशेष के लोगों के रोजगार की चिंता ने समूचे दक्षिण एशिया की ज्ञान की परम्पराओं का नाश कर डाला. राजसत्ता और व्यापरसत्ता को लग्न, मुहूर्त, ज्योतिष और कर्मकांड से डराकर गुलाम बनाया गया और शेष समाज को अंधविश्वास के दलदल में ऐसा डुबोया कि वो आज तक बाहर नहीं निकल सका है. खगोल के ज्योतिष में पतन पर अलबरूनी ने विस्तार से चर्चा करते हुए गजब की टिप्पणियाँ की हैं, वे पढ़ने योग्य हैं.
भौतिक या प्राकृतिक विज्ञानों की बात एक तरफ रखते हुए हम अगर समाज विज्ञानों जैसे कला, भाषा, साहित्य, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, इतिहास और इतिहास लेखन सहित राजनीति, शासन प्रशासन की भी बातें करें तो हम देखते हैं कि इन विषयों का और अधिक बुरा हाल किया गया है. आज के बच्चे समाजशास्त्र, साहित्य, भाषा, मनोविज्ञान इतिहास या राजनीतिशास्त्र नहीं पढ़ना चाहते. जो बच्चे ये सब पढ़ते हैं उन्हें दयनीय, कमजोर और पिछड़ा समझा जाता है. विषयों की भी जातियां हैं भारत में. विज्ञान, तकनीक, मेनेजमेंट, मेडिसिन आदि सवर्ण विषय हैं और मानविकी,आर्ट्स आदि अछूत विषय हैं. इसी का स्वाभाविक परिणाम ये है कि हमारे स्कूल कैसे हों, राजनीतिक व्यवस्था कैसी हो, शासन प्रशासन का ढंग कैसा हो, पत्रकारिता, सामाजिक विमर्ष, नारीवाद, सबाल्टर्न विमर्श सहित संस्कृति और दर्शन का विमर्श कैसा हो-ये सब हमें यूरोप के सभ्य देशों से सीखना होता है.
याद कीजिये, डॉ. अम्बेडकर ने जो संविधान रचा वो पश्चिमी लोकतंत्र और समाजवाद से प्रेरणा लेता है. भारत के अतीत में भविष्य के समाज को दिशा देने लायक बातें लगभग न के बराबर हैं. आज की संसदीय प्रणाली से लेकर कानून, प्रशासन, चुनाव आदि सभी बातें यूरोप ने विकसित कीं और भारत के गुलामी के दौर में यूरोप अमेरिका में पढ़ने गये वकीलों ने इस देश को यूरोपीय सभ्यता के आदर्शों पर खड़ा किया. इसीलिये हम थोड़ा सा बदलाव, सामाजिक सुधार और विकास भारत में देख पाते हैं.
लेकिन भारत के स्वतंत्र होते ही और आत्मनिर्णय का अधिकार मिलते ही विश्वगुरु का जिन्न फिर से जाग गया. भूमि सुधारों और दलित आंदोलनों के दबाव से पुराने शोषक तिलमिला उठे और उन्होंने फिर से गुरुकुल स्टाइल मूर्खताओं की तारीफ़ शुरू कर दी और बहुत गहरे षड्यंत्र के तहत दलितों, शूद्रों (ओबीसी), आदिवासियों और स्त्रियों को ज्ञान से वंचित करने का काम आरंभ कर दिया. राष्ट्र निर्माण के लिए जितना जरुरी था उतना भर विज्ञान और तकनीक सीखने सिखाने का इन्तेजाम कर लिया. देश को प्रबंधन और तकनीक के बड़े बड़े संस्थान दिए गये लेकिन जनमानस में विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना के प्रसार को रोकने के लिए गुप्त रूप से कहीं अधिक शक्ति लगाईं गयी.
आईआईटी और आईआईएम को देखिये. आईआईटी असल में तकनीक के संस्थान हैं. यहां विज्ञान के बाबू पैदा होते हैं जो विज्ञान और मशीनरी के प्रश्नों के उत्तर जानते हैं. विज्ञान वे कितना जानते हैं इसका उत्तर इन संस्थानों के विद्यार्थियों को अब तक मिले नोबेल पुरस्कारों की संख्या से अंदाजा लगता है. लेकिन इतनी प्रशंसा उनकी की जा सकती है कि उनके यूरोपीय या अमेरीकी शिक्षक जब कुछ खोज लेते हैं तो वे उसका सस्ता संस्करण तैयार कर देते हैं. इतनी प्रतिभा उनमे जरुर है. ऐसे ही हमारे चिकित्सक और मैनेजर हैं. वे नया कुछ नहीं खोज सकते लेकिन एक बार ह्रदय का किडनी का मस्तिष्क के काम करने के विज्ञान को कोई यूरोपीय या अमेरिकन खोज ले तो उसके बाद हमारे डाक्टर आँख, नाक, ह्रदय के आपरेशन का या नसबंदी का विश्वरिकार्ड बना लेते हैं. इस बात के लिए उनकी प्रशंसा हो सकती है.
क्या समाज विज्ञान, मानविकी में भारत कुछ बेहतर कर रहा है? उत्तर है कि समाज विज्ञानों को समझने की भारत की तैयारी ही नहीं है. हजारों साल के विविधतापूर्ण सामाजिक इतिहास में समाजशास्त्र और समाज मनोविज्ञान को जन्म दे सकने वाले धार्मिक-सामाजिक बदलाव, आक्रमण, युद्ध, राजनीतिक परिवर्तन आदि घटनाएँ घटती रहीं लेकिन यहाँ समाज विज्ञान का जन्म ही नहीं हुआ. यूरोप में पुनर्जागरण के बाद औद्योगीकरण और नगरीकरण की छाया में समाजशास्त्र का जन्म हुआ लेकिन भारत में ऐसा बहुत कुछ हो चुकने के बाद भी समाज विज्ञान की कोई प्रेरणा नहीं हुई. ये एक चमत्कार है. भारत के धर्म और अध्यात्म ने नये ज्ञान की संभावना और नए समाज की प्रेरणा को बहुत खूबसूरती से और कुशलता से नष्ट किया है. देश के मानव संसाधन को कैसे नष्ट किया जाता है ये कोई भारत से सीखे. आज मानविकी विषयो में भारत की मौलिक रिसर्च बहुत ही कम है. हां, भारत के समाज, राजनीति और संस्कृति के संबंध में भारतीय लोग लिखते लिखाते रहते हैं लेकिन उनका ये लेखन या शोध विश्व स्तर पर ज्ञान को बढ़ाने में कोई ख़ास योगदान नहीं देता है.
आधुनिक युग के सभी बड़े सिद्धांतकार यूरोपीय हैं. राजनीति, समाजशास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान, लोकतंत्र, शासन, प्रशासन, पत्रकारिता, व्यापार प्रबंधन, बैंकिंग, मीडिया, शिक्षा व्यवस्था, रिसर्च और यहां तक कि अब वैज्ञानिक अध्यात्म विद्या और कांशियसनेस स्टडीज जैसे एकदम नये विषय भी यूरोप से ही आ रहे हैं. और मजा ये कि भारतीय समाज उसपर भी अपना “सनातन अधिकार” जमाते हुए यह कह रहा है कि ये सब तो हमारे शास्त्रों में न जाने कब से लिखा हुआ है.
भारत में शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों को गौर से देखिये वे इन प्रश्नों पर ज़रा भी जागरूक नहीं हैं. उपर उपर से लगता है कि वे अनजान हैं. लेकिन थोड़ा कुरेदो तो पता चलेगा कि वे एक बहुत बड़े और प्राचीनतम षड्यंत्र के पुर्जे हैं. उन्हें पता है शिक्षा और ज्ञान को कैसे बर्बाद करना है और शोषक धर्म की सत्ता को कैसे बनाये रखना है. बच्चों को पढ़ाने वाले स्कूल कालेज के लोगों से बात कीजिये आपको लगेगा कि ये किस जमाने के जीवाश्म हैं जो अभी भी जीये जा रहे हैं. ग्रामीण बच्चों की तकदीर जिन लोगों के हाथ में है उन लोगों के स्तर की तो बात ही करना व्यर्थ है. ऊपर से धर्म और राष्ट्रवाद की जहरीली खिचड़ी ने उन्हें एकदम पागल बना दिया है. सिर्फ कैशलेस ही नहीं ”कास्ट लेस” इंडिया भी जरूरी
आज जब देश में चारों तरफ नोटबंदी ही चर्चा का विषय बना है तो इस पर एक फिल्म के गाने के कुछ बोल फिट प्रतीत होते हैं “सोने चांदी के महलों में दर्द ज्यादा है चैन थोडा़ है. इस जमाने में पैसे वालों ने प्यार छीना है, दिल को तोड़ा है.”
एक जमाना था जब रोटी कपडा़ और मकान ही लोगों की आवश्यकता हुआ करती थी. इस पर कई फिल्में भी बनीं. आज बदलते युग में दाल और आटा जितना जरूरी है उतना डाटा भी जरूरी बन चुका है. कन्दराओं और गुफाओं से निकला मानव आज चांद और मंगल ग्रह में आशियाना तलासने लगा है. गुफाओं से लेकर मंगल की यात्रा कई हजार सालों के सफर के बाद तय हो पाया है. महीनों में मिलने वाले संदेश आज पल भर में पहुंच जाते हैं. हफ्तों-महीनों का सफर चंद घंटों में तय हो जाता है.
विकास के इस दौर में कई चीजें इतिहास बन कर रह गयीं हैं. आवश्यकताओं ने मनुष्य को आविष्कारक बना डाला है और ये भूख अभी थमी नहीं है. भारत परंपराओं और मान्यताओं का देश रहा है. यहां मंत्रों पर ज्यादा आस्था रही है, और हमने पूरी शक्ति लाखों मंत्रों और टोटकों को खेाजने में लगा दी यही कारण रहा कि देश साहित्य और शास्त्रों में तो आगे रहा मगर साइंस और टेक्नोलॉजी में पिछड़ गया.
यहां तक कि गांधीजी भी चरखे और कुटीर उद्योगों से ही देश को आगे ले जाने के पक्षधर थे. नेहरू जी ने देश में साइंस और टेक्नोलॉजी को पहली प्राथमिकता में रखा. आजादी के बाद स्वतंत्र भारत की पहली सरकार ने “विज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों” का एक पृथक मंत्रालय बनाया जिसको नेहरू जी ने अपने पास ही रखा. राजीव गांधी देश को कृषि प्रधान के साथ-साथ कंप्यूटर प्रधान बनाना चाहते थे. देश में सूचना क्रांति का उनको जनक कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. मगर उस वक्त भी देश में कंप्यूटर का ऐसा ही विरोध हुआ था जैसा आजकल डीमोनीटाइजेशन का हो रहा है. जो लोग उस वक्त कंप्यूटर के घोर विरोधी थे वही कंप्यूटर उनकी राजनीति के लिए एक बेहतर लुभावना चुनावी जीत का मंत्र बना.
सूचना क्रांति ने कई ऐसी चीजों को इतिहास बना डाला है जो कभी लोगों के जीवन का अभिन्न अंग हुआ करते थे यथा चिट्टी पत्री, अंतरदेशीय पत्र, पोस्टकार्ड, आदि. धीरे-धीरे इनके विकल्प मौजूद हो गये तो ये चलन से बाहर हो गये. इसके लिए कभी मैंने ऐसा नहीं सुना कि लैटरलेस हो जाओ, पोस्टकार्डलेस हो जाओ, या मनीआर्डरलैस हो जाओ. और आगे भी बदलाव होता रहा है एसएमएस, ईमेल, मोबाइल फोन आदि की दस्तक ने 165 वर्ष पुरानी टेलीग्राम सेवा को 14 जुलाई 2013 को प्रचलन से पूर्णतः बंद कर दिया. मगर डाकघरों पर अभी भी निर्भरता बनी हुई है. विकसित भारत और डिजिटल भारत विज्ञान और तकनीक की राह पर चलकर ही संभव हो पायेगा इसमें संदेह की गुंजाइस नहीं है. मगर पल भर में अप्रत्याशित परिणामों की आशा करना जल्दबाजी होगी. हमारा समाज अतीत से पुराने विचारों और रूढ़ियों से जकड़ा हुआ है, इसलिए भारत में रूस, फ्रांस, इंग्लैंड जैसी क्रांतियां नहीं हो सकी. हम या तो धर्म गुरूओं, साधु संतों के इशारे पर चलने के आदि हो चुके हैं या नेताओं और पार्टियों के डोपिंग का शिकार बनते जा रहे हैं.
नोटबंदी का असली मकसद क्या है? ये दिन प्रतिदिन पहेली बनती जा रही है. 8 नवंबर को जब इसका ऐलान हुआ था तब देश में कालेधन की निकासी और 500 और 1000 के नोटों का पाकिस्तान द्धारा जाली नोट बनाकर आतंकियों को दिया जाना था, के खात्मे के लिए तथा देश से कालेधन की सफाई के लिए नोटबंदी करना अति आवश्यक बताया गया था. 50 दिनों के इस सफर में इसके साथ कई और अध्याय जुड़ते जा रहे हैं यानि कि एक तीर से हजार निशाने साधने की कोशिश हो रही है. कैशलैस योजना में डिजिटल खरीददारी और लेन-देन पर अब इनामी लाटरी भी शामिल की गयी है जो इस योजना को अवश्य ही प्रोत्साहन देने का काम करेगी मगर इसमें 25 दिसंबर अटल बिहारी बाजपेयी के जन्म दिवस और 14 अप्रैल 2017 को बाबासाहेब डा. अंबेडकर की जयंती से जोड़ना क्या विशुद्ध रूप से घूमफिर कर फिर वही दलित वोटों की राजनीति पर आकर नहीं टिक गयी है? जिनके सहारे कांग्रेस पार्टी सत्ता का सुख भोगती रही. दिलचस्प बात ये होगी कि 14 अप्रैल 2017 को कितने गरीबों और दलितों का मेगा शो निकलता है जिससे इनकी वास्तविक स्थिति का पता चल जायेगा. तमाम ऐसी योजनायें स्वतंत्रता के बाद देश में लागू की गयी गरीबों और दलितों के उत्थान के लिए मगर कोई भी योजना न तो पूर्ण हो सकी न ही अपना उदेदेश्य पूर्ण कर सकी. क्योंकि इनका असली मकसद गरीब और दलितों के हित नहीं मगर इनके वोट रहे है.
70 प्रतिशत गांवों में बसा भारत जो अब भी अपने पैरों पर खड़ा होना सीख रहा है, अंगूठा टेक से दस्तखत की ओर 100 प्रतिशत नहीं बढ़ पाया है और टेक्नोलॅाजी की ओर धीरे-धीरे चलना सीख रहा है. ऐसे में उसको एकदम 100 मीटर की रेस में जापान और चीन की बुलेट ट्रेन के साथ कंप्टीशन में खड़ा करना न्यायसंगत नहीं लगता है. कैशलैस ट्रांजेक्शन असंभव नहीं है. इसके लिए सर्वप्रथम देश को डिजिटल लिटरेट करने की जरूरत है. इस ओर डिजिटल इंडिया महत्वकांक्षी योजना साबित हो सकती थी. डिजिटल इंडिया के मिशन को पूर्ण कर ही डिजिटल ट्रांजेक्शन का रास्ता स्वतः ही निकल सकता था. देश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक बेहतर स्पीड वाली इंटरनेट सेवा को पहुंचाने के साथ ही हर हाथ में एक स्मार्ट मोबाइल फोन का होना भी आवश्यक होगा. बिजली सभी उपकरणों की जननी है इसकी आपूर्ति भी निर्बाध रूप से देश के हर कोने तक पहुंचाने की चुनौती भी हमारे सामने है.
नोटबंदी ने आज राजनीति के शेयर मार्केट में कई पुराने शेयरों को बंद कर दिया है. जिन शेयरों के सहारे भाजपा ने देश की राजनीति में कदम रखा था उनमें सर्व प्रथम राममंदिर तथा हिंदुत्व का मुद्दा प्रमुख था. 2014 में महंगाई का मुद्दा, एक सिर के बदले दस सिर लाने का वायदा, खातों में लाखों रूपया जमा करने का वायदा, महंगाई को कम करने का वायदा, बेरोजगारी को खत्म करने का वायदा आदि-आदि. हैरानी नहीं चिप की दुनिया है एक छोटी सिलिकॉन चिप ने साइंस और तकनीक की दुनिया में क्रांति ला दी. कभी देश और कलाई की धड़कन समझी जाने वाली एचएमटी घड़ियों को 7 फरवरी 2016 को बंद कर दिया. इसी प्रकार नोटबंदी ने भी कई ज्वलंत मुद्दों को इस वक्त बंद कर दिया है. आज आतंकवाद पर कोई डिबेट नहीं होती, आज गाय और दलित पर बहस नहीं होती, आज महंगाई पर बहस बंद है, आज देशभक्ति और वीर शहीदों पर चर्चा नहीं होती है.
अभी कैशलैस होने मात्र से देश का कायापलट होने वाला नहीं है. कई क्षेत्रों में अभी हमको कड़ी मेहनत और ईमानदारी से काम करने की शख्त जरूरत है. अभी देश को हैंगरलेस, अनटचब्लेटीलेस, अनइम्पलामेन्टईलेस, रेपलेस, क्रप्सनलेस और कास्टलेस भारत बनाना है. अब नोटबंदी भी जाति और मजहब के नाम पर बंटने लगी है, और इसमें भी गरीबों, दलितों, अल्पसंख्यकों को मोहरा बनाकर फिर वही तुष्टीकरण की राजनीति होने लगी है. तो एक कदम कैशलेस लेन-देन के साथ-साथ कास्टलेस खानपान और मान-सम्मान का माहौल भी देश में बन जाये तो अवश्य ही डिजिटल इंडिया और स्किल इंडिया का सही मकसद हासिल किया जा सकता है. सिर्फ अंबेडकर को पूज कर वंचित समाज की दशा बदलने वाली नहीं है. 14 अप्रैल 2017 को मोदी मेगा इनाम की घोषणा अगर पांच सौ और दो हजार के नोटों पर बाबा साहेब डा अम्बेडकर की तस्वीर के साथ करेंगे तो तब सही अर्थ में उनका अम्बेडकर प्रेम प्रदर्शित होगा. वरना देश का दलित वर्ग हमेशा राजनीतिक डोपिंग का शिकार ही होता रहा है.
5 हजार ओबीसी ने अपनाया बौद्ध धर्म
नागपुर। सत्यशोधक ओबीसी परिषद के नेतृत्व में अन्य पिछड़ा वर्ग के 5 हजार लोगों ने मनुस्मृति दहन दिवस ( 25 दिसंबर) पर धम्म दीक्षा ली. इस दिन दीक्षाभूमि पर देशभर से दलित, ओबीसी और मुस्लिम समाज के लोग एकत्रित हुए. पहले संविधान चौक से दीक्षा भूमि तक धम्म रैली निकाली गई. उसके बाद 5 हजार ओबीसी दलित ने बौद्ध धर्म को अपनाया.
महाराष्ट्र की सत्यशोधक ओबीसी परिषद पिछले पांच साल से इस योजना को बना रही थी. अंततः 25 दिसंबर को दीक्षाभूमि पर इस कार्यक्रम को आयोजित किया गया. परिषद ने इस कार्यक्रम का आयोजन अम्बेडकर के धर्मांतरण दिवस पर नागपुर में करने के बारे में सोचा था लेकिन इस दिन दीक्षाभूमि पर होने वाली भीड़ को देखते हुए इसे स्थगित करना पड़ा.
परिषद के एक कार्यकर्ता धानाजी गौरव ने कहा कि हमने तीन कारणों से इस दिन को चुना. इस दिन सावित्री बाई फुले ने पहला महिला स्कूल खोला था, आज के दिन क्रिसमस होता है और आज ही के दिन 1927 में बाबासाहेब ने मनुस्मृति को जलाया था. इस दिन को हम लोग मनुस्मृति दहन दिवस के रूप में मनाते है. उन्होंने कहा की इस मुक्ति दिवस में महिलाओं के समूह भी शामिल है.
धानाजी गौरव ने बताया कि परिषद ने 2011 से ओबीसी लोगों को भर्ती करने का अभियान शुरू किया. परिषद ने ओबीसी को “नागवंशी” के रूप में बताया और उनके इतिहास को जानने पर बल दिया. “नागवंशी” मध्ययुगीन काल में बौद्ध थे. उन्होंने कहा कि अब उनकी सच्ची घर वापसी हो रही है, वह अपने घर आ रहे हैं.
गौरव ने कहा की महाराष्ट्र से सबसे अधिक लोगों ने धर्मांतरण किया. उन्होंने कहा कि पूरे भारत के राज्य से 10-12 संयोजक भी इस अवसर पर उपस्थित रहे. परिषद को उम्मीद है कि पूरे देश में धर्मांतरण की गतिविधियों को बढ़ाया जाएगा. और जिन्होंने 25 दिसंबर को धर्मांतरण किया है उन्हें धार्मिक शिक्षा की क्लास दी जाएगी. दलित-पिछड़ा एकता में बाधक है सामंतवादी सोच
इसमें कोई शक नहीं कि दलितों और पिछड़ों में दूरियां बढ़ी हैं. हालांकि अतिपिछड़ा वर्ग दलितों के थोड़ा करीब दिखता है. लेकिन यह भी सोचना होगा कि जिस गंभीरता से इस विषय पर दलित बुद्धिजीवी सोचते हैं उतनी गंभीरता से पिछड़ों में चर्चा नहीं होती. आज भी पिछड़े अपने को सवर्णों के ज्यादा करीब दिखाने की कोशिश करते हैं. दलित तो शुरू से पिछड़ों को साथ लेकर चलने के हिमायती रहे हैं. चाहे बाबासाहेब का सामाजिक आंदोलन हो, चाहे बिहार में सामाजिक अधिकार की लड़ाई हो या कांशीराम साहब का उत्तर प्रदेश में 85-15 का नारा हो. सर्वदा दलितों ने पिछड़ों को साथ लेकर चलने की कोशिश की.
1927 में साइमन कमीशन के भारत आगमन के बाद जो परिस्थितियां उत्पन्न हुई उसमें बाबासाहेब चाहते थे कि पिछड़ा उनका साथ दे और दलित पिछड़ा मिलकर असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़े लेकिन पिछड़ों को अपने को दलित कहलाना मंजूर नहीं था. बाध्य होकर बाबासाहेब को यह लड़ाई दलितों को साथ लेकर अकेले लड़नी पड़ी. मंडल कमीशन के विरोध के चलते जब मुलायम सिंह हाशिये पर आ गए थे, उन्होंने जब अपने निजी स्वार्थवश वीपी सिंह की सरकार गिराकर चंद्रशेखर को पीएम बनाने में मदद की उस समय पिछड़ा उनसे काफी हद तक दूर हो गया था. तब उन्होंने अपनी राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए मान्यवर कांशीराम से समझौता किया. मुलायम सिंह अपने मकसद में कामयाब तो हो गए लेकिन लेकिन उनके अंदर की सामंतवादी सोच इस एकता में बाधक साबित हुई. नतीजा सपा बसपा का गठबंधन टूट गया.
एक बात यहां स्पष्ट करनी होगी कि उत्तर भारत में जब भी मनुवाद और सामंतवाद की लड़ाई की बात होती है, दलित बढ़-चढ़ कर पिछड़ों का साथ देते हैं लेकिन पिछड़े वर्ग के नेता दलितों को उसी मानसिकता से देखते हैं जैसे सवर्ण देखते हैं. बिहार और यूपी में सत्ता प्राप्ति के बाद से दलितों के अधिकार का जिस तरह से नव सामंतवादी सरकारों ने हनन किया है वैसा तो ब्राह्मणवादी सरकारों ने भी नहीं किया है.
बिहार में जिस प्रकार मनुवादी भाजपा के खिलाफ दलित पिछड़ा और अल्पसंख्यक एकजुट होकर लालू-नीतीश का साथ दिया, सत्ता में आने के बाद वही लालू और नीतीश ने दलितों पर अत्याचार की एक शृंखला प्रारम्भ कर दी है. जिस प्रकार अपने छात्रवृत्ति की मांग करने वाले दलित छात्रों पर पुलिसिया कार्रवाई की गई, जिस प्रकार अपनी भूमि को जातिवादी गुंडों से वापस कराने के लिए आन्दोलनरत दलित महिलाओं पर बिहार पुलिस ने नंगा करके लाठी डंडा बरसाया है, वह अप्रत्याशित है.
यूपी में जिस प्रकार दलितों के बल पर पूर्ण बहुमत की अखिलेश सरकार ने अपने पूरे पांच साल के कार्यकाल में दलित विरोधी आदेशों की श्रृंखला को अंजाम दिया. क्या वह दलित पिछड़ा एकता के लिए अच्छा कदम कहा जा सकता है? पूरे पांच साल दलितों पर अत्याचार होते रहे, गुंडागर्दी होती रही और अखिलेश सरकार मूकदर्शक बनी रही. अगर थानों पर लिखी गई दलित उत्पीड़न की केस की जांच कराई जाय तो उसमें अबतक की सबसे कम संख्या दिखेगी.
ऐसे में कोई यह कहे कि दलित पिछड़ा एकता को भंग करने में सवर्ण का हाथ है, वह वास्तविकता से मुंह चुरानेवाली बात होगी. वास्तव में इस एकता में बाधक कुछ नवसामंती मानसिकता वाले पिछड़े हैं. और जबतक वे अपनी सोच नहीं बदलते, यह एकता संभव नहीं है. अब तो एक ही रास्ता बचा है और वह यह कि दलितों को अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होगी. मोटिवेशन कैरियर और बुद्ध की अनत्ता
गौर कीजिए इन शब्दों पर. अक्सर ही हम सोचते हैं कि बुद्ध सिर्फ ध्यान समाधि और निर्वाण जैसी बातों के लिए ही हैं. लेकिन ये बिलकुल गलत बात है. बुद्ध के लिए परलोक या परीलोक का कोई अर्थ नहीं है. वे खालिस इस लोक और इस जीवन के लिए हैं.
एक ख़ास मुद्दे के संदर्भ में इसे देखेंगे तो आसानी से समझ में आयेगा. क्या मोटिवेशन और जीवन में सुधार को अनत्ता से जोड़कर देखा जा सकता है? क्या वेदांत और ब्राह्मणी आत्मा के सिद्धांत और मोटिवेशन या व्यक्तित्व विकास या जीवन के सुधार में आपस में कोई संबन्ध है?
इसका उत्तर है कि वेदांती आत्मा के सिद्धांत से मोटिवेशन या व्यक्तित्व विकास का सीधा संबन्ध नहीं है. बुद्ध की अनत्ता या अनात्मा से न सिर्फ मोटिवेशन का बल्कि जीवन और जगत के सभी सुधारों की संभावना का सीधा संबन्ध है. सनातन आत्मा का सिद्धांत एक भयानक गुलामी और अकर्मण्यता का सिद्धांत है. सनातन आत्मा का सीधा अर्थ पुनर्जन्म से है और हजारों जन्मों के बाद आपका यह जन्म उन अनन्त संस्कारों के सामने तिनके के बराबर है. ओशो रजनीश और आसाराम जैसे वेदांती पंडित प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण कर्मों की जो व्याख्या करते हैं उसमे भी इस जन्म में करने योग्य या बदलने योग्य अवसर न के बराबर हैं. ये पोंगा पंडित समझाते हैं कि अनन्त जन्मों के अनन्त संस्कार हैं जिनसे आपकी आत्मा बंधी हुई है, उसी से आपका मन या बुद्धि बनी है आपके रुझान और आपकी क्षमताएं या कमजोरियां बनी हैं. इस जन्म में उस प्राचीन ढेर को मिटाना लगभग असंभव है इसलिए आप भाग्य के प्रारब्ध के गुलाम हैं. ये मान्यता जहर की तरह भारतीयों के खून ने घुस गई है.
इसका अर्थ ये हुआ कि आप जीवन, जगत, मन, शरीर, समाज, व्यवस्था आदि को बदलने के लिए कुछ ज़्यादा नहीं कर सकते क्योंकि करने वाला क्रियानन्द ही प्रारब्ध से बंधा है, मतलब पूरा समाज और राष्ट्र ही एक सामूहिक प्रारब्ध से बंधा है अब उसके अनन्त प्रारब्ध या संचित कर्म को कैसे काटें? एक इंसान के संचित कर्मों के भंडार को जलाना ही जन्मों की तपस्या या साधना से संभव है, इस बीच इन जन्मों में किये पाप और नई कर्म श्रृंखला बनाते हैं. इस प्रकार व्यक्तिगत मुक्ति या बदलाव सहित सामूहिक या समाज का बदलाव आत्मा के सिद्धांत के साथ असंभव है. इसीलिये भारत सड़ता रहा है. गुलाम गरीब और अंधविश्वासी होता रहा है.
लेकिन सनातन आत्मा की जगह बुद्ध की अनत्ता को रखकर देखिये. तस्वीर एकदम बदल जाती है.
बुद्ध के अनुसार शरीर बाहर से मिलता है, पहला अणु माँ बाप से फिर बाद में सब कुछ भोजन से निर्मित हुआ, आपका अपना कुछ नहीं. जैसा भोजन मिला वैसा शरीर और स्वास्थ्य बना. भोजन आप रोज करते हैं सही भोजन से स्वस्थ रहेंगे गलत भोजन से बीमार होंगे. गलत भोजन को बंद करके सही भोजन लेने लगेंगे तो शरीर और स्वास्थ्य सुधरने लगेगा. अब इस बात को ओशो रजनीश, जग्गी वासुदेव, आसाराम जैसे वेदांती पंडित भी मानते हैं. लेकिन वे इससे आगे जाने में घबराते हैं.
बुद्ध एक कदम और उठाते हैं और कहते हैं कि शरीर तो बाहर से आया है ही, ये तथाकथित आत्मा या स्व भी बाहर से ही आता है. जैसे शरीर भोजन का ढेर है वैसे ही स्व या व्यक्तित्व या मन या तथाकथित आत्मा भी विचारों, सपनों, स्मृतियों, संस्कारों, शिक्षा, कंडीशनिंग आदि का ढेर मात्र है. आपको गलत समाज, परिवार या संगति मिली है तो आपका स्व या मन गलत ढंग से काम करेगा, खुद के लिए और दूसरों के लिए दुःख पैदा करेगा. इस गलत कंडीशनिंग को सही कंडीशनिंग या विचारों या शिक्षाओं से बदला जा सकता है. और व्यक्ति और समाज को बदला जा सकता है.
चूँकि स्व या व्यक्तित्व भी क़तरा क़तरा बाहरी वातावरण से इकट्ठा करके बनाया जाता है इसलिए नये और अच्छे विचारों, संस्कारों के टुकड़ों को चुनकर मन में सजाते जाने से मन और व्यक्तित्व (जो कि अस्थाई हैं, सनातन नहीं) में बदलाव किया जा सकता है. तो जैसे गलत भोजन बन्द करके सही भोजन से कुछ महीनों में शरीर बदलने लगता है वैसे ही सही विचारों और शिक्षण से मन या व्यक्तित्व भी बदलने लगता है.
लेकिन अगर स्व या व्यक्तित्व या आत्मा सनातन है तो उसमें कोई बदलाव संभव नहीं. इसे ऐसे समझिये, अगर कोई कहे कि आपका शरीर सनातन है, उसने लाखों साल तक जो भोजन किया है उसके कारण कोई बीमारी बनी है. तो इसका अर्थ हुआ कि अब उस लाखों साल के अतीत का परिणाम जब तक मिटाया न जाए तब तक इस शरीर की बीमारी नहीं मिटाई जा सकती. लेकिन सच्चाई ये है कि शरीर ठीक भोजन और औषधि से कुछ दिनीं या महीनों में बदलने लगता है. इसका मतलब है कि शरीर सनातन नहीं है.
अब मन या स्व पर आइये. हम देखते हैं कि कुछ महीनों में कोई नई भाषा, नई तकनीक, नया हुनर या व्यवहार सीखा जा सकता है. व्यक्तित्व का ढंग ढोल बदला जा सकता है. शिक्षण प्रशिक्षण और मोटिवेशन सहित सेल्फ इम्प्रूवमेंट या समाज के देश के डेवेलपमेंट का सारा ढांचा ही स्व या मन के अस्थाई और परिवर्तनशील होने की संभावना पर खड़ा है. अगर मन या स्व या आत्मा सनातन हुई तो उसमें कोई बदलाव संभव ही नहीं है.
अब ओशो जैसे पोंगा पंडितों की सनातन आत्मा और बुद्ध की अनात्मा के सिद्धांत को जीवन, जगत समाज राष्ट्र और दुनिया के संदर्भ में रखकर देखिये. साफ़ नजर आता है कि अगर सनातन आत्मा और अनन्त संचित कर्म का सिद्धांत माना जाए तो जीवन सिर्फ अतीत और भाग्य की गुलामी बनकर रह जाएगा. और यही भारत का जीवन बन गया है. इसके विपरीत अगर हर जीवन को नया और एकमात्र जीवन माना जाए तो बदलाव सुधार और विकास तेजी से होता है. जैसे यूरोप में हुआ है.
इस तरह जीवन का एक बहुत प्रेक्टिकल आयाम जो आजकल की युवा पीढ़ी के लिए जरूरी है, मोटिवेशन या सेल्फ इंप्रूवमेंट- उसे बुद्ध की अनत्ता को समझकर और प्रयोग करके आसानी से हासिल किया जा सकता है. अनत्ता यही सिखाती है कि सबकुछ क्षणिक और अस्थाई है. सब कुछ स्वयं ही बदल रहा है आप चाहें तो ये बदलाव सही दिशा में भी जा सकता है. या फिर सभी बदलावों को चुपचाप देखते हुए आप शून्य भी हो सकते है. सेल्फ या स्व को क्षणिक मानना न केवल अतीत से मुक्त कर देता है बल्कि भविष्य का नियंत्रण भी आपके हाथ में दे देता है. वाया बीबीसी कौशल पंवार की कहानी
वर्जीनिया वुल्फ की किताब ”A Room of One””s Own” का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निज को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है. अपने कमरे को हासिल करने की इसी छटपटाहट को कौशल पंवार ने बीबीसी से साझा किया, जिसे साभार यहां प्रकाशित किया जा रहा है.
मेरा भी घर मे एक कोना होता, उसमें एक टेबल और कुर्सी होती, मै हमेशा इसके लिए तरसती थी. पर मेरे लिए वह कोना सुनिश्चित होना घर के एक हिस्से को घेरे रखने के बराबर होता.
इसमें मेरे मां- बाप की कोई ग़लती नहीं थी, उन्होंने भी तो सारी उम्र घर की इसी कोठरी में बिता दी थी. यह घर ही इसलिए कहलाया गया था क्योंकि इसी घर में सब मिलकर रहते थे, चाहे वह बकरी हो, मुर्गे हों या फ़िर एक कोने में रखा चूल्हा ही क्यों न हो, उसी के साथ सटे रहते थे एल्मुनियम के कुछ बर्तन.
उसी कोठरी में एक कोने में पीने के पानी के लिए एक मटका रखा रहता था, और एक कोने में अनाज को रखने का एक खुटला (एक तरह से मिट्टी की बनी अनाज को संग्रहित करने की टंकी) तो ये थी हमारी कोठरी, जो अन्दर और बाहर से थी जिसका हर एक कोना निश्चित था, इसलिए मेरे लिए उस कोठरी में एक कोना स्थाई रूप से बनना ही बहुत मुश्किल था.
उस समय का ये मेरा सबसे बड़ा सपना बन गया था कि मुर्गे और बकरी की तरह ही सही मेरा भी एक कोना बना रहे, जो हर दिन मुझे बदलना न पड़े पर नहीं बन सका था. उसी कमरे में मां, दादी और मेरे लिए भी एक कोना नहाने का बन जाता था, जिससे नहाने के बाद साफ़ कर दिया जाता था और उसी में चूल्हे पर खाना भी बनता था.
मैं अपने पढने के लिए खाट पर बैठकर घुटनों को मोड़कर ही उस पर किताब रख कर पढ़ लिया करती थी.
पढ़ने का जुनून बचपन से ही मैने पाल लिया था. घर में बाहर से कोई सामान कागज में लपेट कर भी आता था तो मैं उस मुड़े-तुड़े कागज को पढने में लग जाती थी.
मेरे चाचा ( मेरे पिता को मैं चाचा ही कहती थी) मेरी इस लगन से बहुत प्रभावित थे. जब भी उनके आगे मैं बैठकर घुटना मोड़कर कभी इधर, कभी उधर करती और किताब लिए घूमना पड़ता तो उनको देखकर अच्छा नहीं लगता था.
एक दिन चाचा ने पूछा कि मुझे क्या चाहिए, मैंने मना कर दिया कि मुझे तो किसी चीज की कोई ज़रूरत नहीं है. वे उठकर बाहर चले गये. कैसे उनको बताती कि मुझे एक कुर्सी और मेज चाहिए जिस पर मैं बैठकर कुछ लिख सकूं और पढ़ सकूं. घर के हालात ऐसे थे नहीं कि मैं उन्हें कह पाती.
यह घर के लिए भी अनावश्यक चीज थी, जिसे रखने के लिए जगह निश्चित करना भी मुश्किल था. चाचा शाम को घर लौटे तो उनके हाथ में छोटा सा स्टूल था और छोटी सी प्लास्टिक की कुर्सी. मुझे देखकर बहुत हंसी आई. मैं पेट पकड़कर हंसती रही.
चाचा चुपचाप मेरी ओर देखते रहे. जब मैं चुप हुई तो उन्होंने कहा ये लो इस पर पढ़ा करो. ज़मीन पर रखकर बाहर चले गये थे. मैं हंसने के बाद रोने लगी थी, मुझे अजीब सी ग्लानि हुई थी उस वक़्त. जब घर में खाने तक के लाले पड़े थे तो चाचा ये सब मेरे लिए कर रहे थे.
सोचती रही थी कि कही मेरे हंसने से चाचा को बुरा न लगा हो. पर फिर भी मैं बहुत खुश हुई थी, अब मेरा कोना घर में निश्चित हो गया था. हांलाकि स्टूल और कुर्सी का साइज़ छोटा था और मैं अब बड़ी हो चुकी थी, पर चाचा के लिए मैं आज भी छोटी ही थी.
मां ने कहा भी कि अब ये छोटी नहीं रही इस स्टूल में से पैर बाहर निकल रहे हैं और कुर्सी पर धंस कर बैठी है. चाचा हंसी का कारण समझ गये थे और खुद भी मुस्कराने लगे थे. पर मैं बहुत खुश थी, मेरे मन की मुराद पूरी हुई थी.
इस तरह मेरा कमरा, यानी वह प्लास्टिक की कुर्सी और छोटा स्टूल , बन गया था पर \मल्टी परपज\ भी बना साथ मे ही. जब भी कोई मेहमान आता था मेरी किताबों को वहां से उतारकर उस पर चाय रखने के लिए दे दी जाती, जिससे मुझे बड़ा खराब लगता था. चाय पी लेने के बाद फ़िर वह मेरा ही बन जाता.
समय गुजरता चला गया और मैं दसवीं में आ गयी थी, पर पढ़ाई के साथ – साथ में अब जो भी आस-पास घट रहा होता, मेरे घर परिवार में जो भी हो रहा होता मैं उसे अब कागजों पर उतारने लगी थी.
जब अपने गुस्से को शांत कर जाती, यूं कहे कि वो पल गुजर जाते, जो मन को बहुत विचलित करते थे, तो उन्हीं कागजों को फ़ाड़ देती थी. मेरे हम उम्र सब जानते थे कि मैं कुछ न कुछ पढ़ाई के अलावा लिखती भी रहती हूं, कभी-कभार वे पढ़ते और मुझे कहते कि अगर किसी ने पढ़ लिया तो बहुत मारेंगे तुझे, स्कूल से निकाल लेंगे और मैं ओर भी डर जाती और फ़ाड़ देती.
अपने मन की बात कहने और घर के आए दिन झगड़ों से परेशान होकर अपने मन की भड़ास मैं इन कागज के टुकड़ों पर ही निकालती और इसके अलावा अपने भाई सुभाष, जो मुझे दूर रहता था उसे चिट्ठी लिखती रहती. उसमें सब का ज़िक्र होता.
उससे पिछली बार मिलने के बाद की सारी आस -पास घटी घटनाओं को बहुत विस्तार से वर्णन होता, और जब भी वह मिलता तो मैं उसे दे देती थी. ऐसे ही वह भी करता. हमारा एक दूसरे को लिखे पत्र-व्यवहार आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं.
मैं और मेरा वह स्टूल और कुर्सी, जो अब केवल किताबें रखने के काम आता था, एक ज़रूर और आवश्यक अंग बन गए थे घर का. पर जिसे एक जगह से दूसरी जगह रख दिया जाता था, ठीक उसी तरह जैसे मैं भी अब उसे छोड़कर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पीछे बनी झुग्गी में रहने के लिए आ गयी थी. पर पूरे परिवार में वह स्टूल मेरे नाम से ही जाना गया था.
मैं अब गांव में नहीं थी, पर मेरा स्टूल, मेरा वह कोना, दोनों मैं अपनी विरासत के रूप में अपनी पहचान के रूप में छोड़कर चली आयी थी. विश्वविद्यालय के छात्रावास की फ़ीस बहुत ज्यादा थी, जो मेरे और चाचा के बूते की बात नहीं ही थी.
एमए करना ही था तो पहले कुछ महीने राजौंद और कुरुक्षेत्र के बीच में पड़ने वाले फ़रल, पुंडरी में नानकों के घर पर बिताए जहां पर नानी दूसरों के घरों में काम करके अपनी ज़िन्दगी बिता रही थी.
मुझे भी नानी के साथ बहुत बार सफ़ाई और मैला उठाने के लिए जाना पड़ता था. हम दोनों के लिए रोटी और आचार या कभी कभी सब्जी भी उस गंध को अपने सिर पर ढोकर ले जाने के बदले मिल जाती थी. इस पर विस्तार से कभी फिर लिखूंगी.
ऐसे में मेरी पढ़ाई को नुकसान हो रहा था, तो मैंने चाचा के साथ बात करके वहीं विश्वविद्यालय के छात्रावास के पीछे पड़ने वाली झुग्गी में रहकर पढ़ने की बात की. घर से राशन पानी और छोटा स्टोव और एक थाली, चम्मच, गिलास आदि ये सब लेकर गई.
जितने कम से कम खर्च हो पाए इसकी मेरी कोशिश रही. मां और चाचा की आर्थिक स्थिति क्या है, मैं जानती थी. सबने मना किया था आगे पढ़ने के लिए, बहुत सारे कारणों के साथ एक कारण यह भी तो था कि विश्वविद्यालय की पढ़ाई का खर्चा पूरा नहीं होगा, यह बात मैं और चाचा दोनों ही जानते थे, पर दोनों को ही दृढ़ विश्वास था कि कम से कम खर्च में मैं अपनी आगे की पढ़ाई पूरी कर सकती हूँ.
किताबों पर खर्च करने के अलावा ऐसा कोई खर्च था भी नहीं जो झेला न जा सके. ना कभी अपने आपको सुन्दर दिखाने के लिए प्रयोग होने वाले क्रीम आदि का मुझे शौक था न किसी और चीज का ही शौक़ था, और न ही तन ढकने के अलावा कपड़ों का ही शौक़ था, इसलिए चाचा की सहमति से मैं आ गई थी इस झुग्गी बस्ती में जो चूहड़ों की बस्ती के नाम से भी जानी जाती थी.
पूरी बस्ती का एक ही टायलेट था और एक ही नल, सुबह के समय बहुत परेशानी होती थी. इन सब का सामना करते हुए मैं अपने बारे में बहुत कुछ लिखती थी. कई डायरियां भर दी. जब कभी सुभाष आता तो उसे दे देती पढ़ने के लिए, जिसमें हर दिन गुजरने वाली पीड़ा, दुःख -तकलीफ़ अभाव भरा हुआ था.
कुछ मन की कोमल भावनाएं होतीं और वह अगली बार मिलता तो खूब रो लेता और अपनी असमर्थता जता जाता, हौसला देता, अपने सपने पूरे करने की कसमें दे जाता, चाचा के खून-पसीने से निकलने और मेरे लिए उंचाई पर पंहुचने के उनके अरमानों को पूरा करने की दुहाई दे जाता. बस अब यही उद्देश्य बन चुका था.
अब मेरा कमरा था मेरे पास, मेरी वह चालीस रुपये में किराये पर ली झुग्गी, जिसे मैं वहीं आस-पास के छात्रों को ट्यूशन पढ़ाकर दे दिया करती थी, उन छात्रों के हालत भी मेरे जैसे ही रहती थी, इसलिए कई बार इस कमरे का किराया भी नहीं दे पाती थी. जिसके कारण बहुत कुछ सुनना भी पड़ता था.
एमए के इस कठिन दौर में मेरे सुख-दुख का साथी, मेरा भाई, मुझे छोड़कर चला गया- टूट गया था, बहुत कुछ अंदर से, कदम भी लड़खड़ा गये थे, पर उसका वह वाक्य कि ”अपनी पढ़ाई को बीच में नहीं छोड़ना, कुछ बनना है, सपनों को पूरा करना है चाहे कुछ भी हो जाए, थकना नहीं, हारना नहीं.”
बहुत कुछ लिखा इस दौरान, मेरे पाठयक्रम की पढ़ाई के अलावा मैं और भी बहुत कुछ करती, यूपीएससी की तैयारी के साथ कविता, कहानियां बल्कि यूं कहूं कि अपना दर्द कागजों पर उतारने लगी थी. पर इनको सहेजने का ख्याल न मुझे पहले आया था, और न इस दौरान, बस अगर इधर-उधर कॉपियों पर लिखा रह गया था थोड़ा बहुत.
अभी समय को एक और झटका देना बाकी था. एमए का पहला साल पास कर लिया था, फ़ाइनल में प्रवेश ले लिया था. मेरे इस झुग्गी वाले कमरे के हर कोने में कुछ साहित्यक पत्र पत्रिकाएं जमा होने लगी थीं. नेट की तैयारी दिन रात कर रही थी.
लाइब्रेरी खुलते ही दूसरे तले के कोने की कुर्सी पर जाकर बैठ जाती थी और बन्द होने तक वहीं रहती थी. साथ ही साथ यूपीएससी, जो मेरे अपना -सपना था, उसकी भी तैयारी चल रही थी.
चाचा स्कूल में मैडम और सबसे बड़ी डिग्री लेने का सपना देख रहे थे, सुभाष कॉलेज के लेक्चर स्टैंड पर लेक्चर देते हुए देखना चाहते थे और नीचे पटरी रखकर उस पर चढकर भाषण देने का सपना देखते थे- मेरी हाइट छोटी थी, इसलिए पटरी का साहरा लेकर लेक्चर देने का बिम्ब रचते. और मैं- मेरा सपना था यूपीएससी पास करना और बड़ी अधिकारी बनना, जिसके लिए मुफ़्त में चलने वाली कोचिंग भी मैंने चाचा को बिना बताये शुरु कर रखी थी.
और एक दिन वह भी अपने सपने के साथ इस सफ़र में साथ छोड़कर चले गये अनजान दुनिया में, कभी वापिस न आने के लिए.
बस अब मैं और मेरा कमरा ही रह गये थे, मतलब वह किराये की झुग्गी. अब कुछ भी करने का मतलब नहीं रह गया था, न अब सुभाष का साथ था और न चाचा. बाकी जितने भी रिश्ते थे, वे खून के रिश्ते जरूर थे पर उनसे कभी अपनेपन के दो शब्द नहीं मिले.
अगर कुछ भी मिला था तो वह शक करने वाली निगाहें थीं, जो मेरे गांव आने पर मानो एक ही सवाल पूछती थी कि मैं …मेरे अन्दर लड़की होने का शेष कुछ बचा भी है या …सब. और मैं मानो तसल्ली देने के लिए उनसे अपनी सफ़ाई देती कि मैं पढ़ रही हूं और बहुत मेहनत कर रही हूँ- हर बार कि अग्नि परीक्षा, जो मेरे हौसले को तोड़ने के लिए काफ़ी होती थी.
पर अब क्या? सब कुछ ख़त्म… तीन महीने लगे मुझे इस सदमे से बाहर आने के लिए. पर सबने जैसे अब मेरा साथ देने का मन भी बना लिया था, और सबसे ज्यादा मां मेरे साथ पूरी तरह से जुट गई थी, मानो चाचा ने मां को अब उनकी जगह लेने की कसम दे दी हो, दोनों भाई भी अब मेरे फ़ैसले के साथ थे.
और इस सफ़र में हमसफ़र बनकर आया मेरी जिन्दगी में मुकेश, जिसने मेरे अन्दर के खालीपन को भर दिया, उन्होंने चाचा और भाई का प्यार तो नहीं दिया पर कमी जरूर पूरी कर दी थी, उस मंजिल और सपने को पूरा करने में मेरा साथ दिया.
फिर चाचा के सपने को ज़िन्दगी का मकसद बना लिया और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. हारना मानो मैंने बिसरा ही दिया. चाचा का एक एक शब्द अब मेरे जीने के लिए काफ़ी था.
झुग्गी अब छूट गयी थी, एमए के बाद अब बीएड करने करनाल आ गयी थी. यहां पर भी किराये का अपना कमरा ले लिया था, जब भी मकान मालिक को पता चलता कि मैं ”चूहड़े” समाज की हूं, कमरा छोड़ना पडता. इसी दौरान हमसफ़र को ताउम्र हमसफ़र बनाने का निर्णय लिया और हमने शादी कर ली. शादी के दूसरे दिन ही वापिस उसी कमरे में लौटना हुआ. बीएड करने के बाद एम फ़िल रोहतक से किया और फिर जेएनयू तक का सफ़र. अपना कमरा न होते हुए भी इन्हीं कमरों में लेखन कार्य चलता रहा.
अब मैं एक अध्यापिका बन गई थी, वो भी चंडीगढ़ जैसे बडे शहर में. पर यहां भी अपना कमरा तो था, लेकिन किराये का. कभी रामदरबार का कमरा तो कभी डड्डूमाजरा का कमरा.
इन सब को पार करते हुए पंहुच गयी थी दिल्ली विश्वविद्यालय में. पर यहां भी कमरा तो मिला पर अपना नहीं, और इसी दौरान जाति व्यवस्था से जूझते हुए अपना घर, अपना कमरा लेने के लिए मजबूर होना पड़ा-पर अटल निश्चय था और सामने मंज़िल.
मैंने सहूलियत न होते हुए भी अपना घर और उस घर में मेरा कमरा हो, ऐसा ठान लिया था. और आज मेरे पास अपना कमरा है, उस कमरे में अपनी पसंद की कुर्सी और टेबल है, पूरा कमरा ही मेरी लाइब्रेरी है, जिसमें पूरे घर के सामान को मिलाकर सबसे ज्यादा जो बनता है, वह पुस्तकें ही हैं. अब मेरे पास मेरा कमरा है, और उसके साथ चाचा की यादे हैं, जो मुझे निरन्तर आगे बढ़ने को प्रेरित करती हैं.
– बीबीसी हिन्दी की वेबसाइट से साभार हमारे यहां सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक आंदोलन चलाने वालों का आपसी तालमेल नहीं है- एड. सुरेश राव
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के हेमपुर गांव के ग्रांट नंबर-18 में 1969 के मई महीने में एक बच्चे का जन्म होता है. लेकिन उसकी बदनसीबी ऐसी होती है कि उसके जन्म के दो महीने पहले ही उसके पिता गुजर जाते हैं. जन्म के बाद मां की दूसरी शादी हो जाती है और उस बच्चे को उसके दादा-दादी पालते हैं. जब वह अबोध 11 साल का होता है तो उसके दादा चल बसते हैं और 18 साल का होते-होते उसकी दादी भी साथ छोड़ जाती हैं. और वह अठारह साल का नवयुवा अपने जीवन में अकेला रह जाता है. कहानी थोड़ी फिल्मी है, लेकिन सच है.
आप कल्पना करिए कि कोई आम नवयुवक होता तो ऐसे में क्या करता? शायद वह जिंदगी से निराश हो जाता. ज्यादा संभावना थी कि वह गलत संगत में पर जाता. अगर ये न भी होता तो वह इस दुनिया की भीड़ में तो जरूर खो गया होता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्योंकि इन तमाम नाकारात्मक घटनाओं में एक अच्छी घटना यह हुई कि वह बालक बचपन में ही प्रभुदयाल नामक एक अम्बेडकरवादी व्यक्ति के संपर्क में आ गया. असल में उस बच्चे के पिता एक जागरुक व्यक्ति थे और किसानी के साथ-साथ सामाजिक गतिविधियों में भी हिस्सा लेते रहते थे. उनके पिता के घनिष्ट मित्र थे- प्रभुदयाल, जो कासगंज के कट्टर अम्बेडकरवादी बाबूलाल बौद्ध की संगत में थे. चूंकि प्रभुदयाल और उस बालक के पिता अच्छे मित्र थे, सो अम्बेडकरवाद और आंदोलन की बात उन दोनों से होते हुए उस बालक तक भी पहुंचने लगी.
आखिरकार जीवन में तमाम झटके खाने के बावजूद भटकने की बजाय इस युवा ने अम्बेडकरवाद की राह चुनी और उसी में रम गया. आगे चलकर उसने ‘भारतीय बहुजन महासभा’ (BBM) नाम के एक संगठन की नींव रखी. जी हां, हम जो हकीकत बयां कर रहे हैं वह भारतीय बहुजन महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट सुरेश राव की है, जिन्होंने भारत भर में अम्बेडकरवाद की मशाल को जला रखा है और मान्यवर कांशीराम के सपने को साकार करने में जुटे हैं. 28 नवंबर 2016 को इस संगठन के पांच साल पूरे हो रहे हैं. इस मौके पर जब ‘दलित दस्तक’ ने एड. राव के संघर्ष के बारे में जानने की कोशिश की तो उनके सामाजिक और आंदोलन के जीवन के साथ-साथ उनके जीवन का जो व्यक्तिगत पक्ष निकल कर सामने आया, उसने एक बार झकझोर कर रख दिया. उनका जीवन कईयों के लिए एक प्रेरणा स्रोत हो सकता है, इसलिए उनके व्यक्तिगत जीवन का जिक्र करना भी जरूरी था.
राव कहते हैं, “प्रभुदयाल मेरे ताऊ जैसे थे. पिताजी के गुजर जाने के बाद उनका भी पारिवारिक जीवन से मोहभंग हो गया और वह अकेले ही रहे. जब मैं 10-12 साल का था तभी से उनके साथ सभा-सम्मेलनों में जाने लगा. वो अनपढ़ थे, लेकिन मिशन को लेकर समर्पित थे. उन्हें बहुजन आंदोलन और महापुरुषों के बारे में जानने का बहुत शौक था. वह किताबें खरीद कर लातें और हमें पैसे देते कि पढ़कर सुनाओ. उन्होंने अपनी जमीनें बेंच दी और बहुजन आंदोलन की किताबें खरीदकर लोगों में बांटने लगे. उनका यह समर्पण देखकर मेरे जीवन में काफी प्रभाव पड़ा. मैंने सोचा कि जब वो अनपढ़ होकर इतना सब कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं?”
राव बताते हैं, “मैंने लखीमपुर से ग्रेजुएशन किया. 1993 में लखनऊ से वकालत की पढ़ाई पूरी की. मैंने बी.एड भी किया और सोशल वर्क में एम.ए भी किया. इस बीच 1990 में ही मैं बामसेफ से जुड़ चुका था. 1990 से लेकर 2005 तक मैं बामसेफ में बहुत सक्रिय रहा. 2005 में बामसेफ में काफी गुटबाजी दिखने लगी. 2006 में जब साहब का परिनिर्वाण हुआ तो एक बार सोचा कि अब क्या करना चाहिए.” राव कहते हैं कि मुझे साहब के सोशल इंजीनियरिंग वाली बात ज्यादा समझ में आती थी. क्योंकि अगर मैं धार्मिक आंदोलन को चुनता तो फिर मुसलमान भाईयों से कैसे जुड़ता? सन् 1963-83 तक साहब ने बंद कमरे में लोगों के बीच कैडर कैंप के जरिए काफी काम किया. मैंने भी वही शुरु किया और ज्योतिबा फुले के परिनिर्वाण दिवस पर 28 नवंबर 2011 को लखनऊ में प्रेस क्लब में ‘भारतीय बहुजन महासभा’ की घोषणा की और यह घोषणा किया कि मान्यवर कांशीराम ने 20 सालों तक जो काम किया, उसी को आगे बढ़ाऊंगा.
राव के काम करने का तरीका भी निराला है. उनकी क्लास (कैडर) पांच घंटे की होती है. वह लोगों को इकट्ठा करते हैं और उन्हें पांच घंटे के लिए एक बंद कमरे में बैठा लेते हैं, फिर शुरू होती है उनकी क्लास और वह ज्यों-ज्यों भारतीय सामाजिक व्यवस्था की परतों को उधेरते जाते हैं, उनके कैडर में मौजूद लोगों के आंखों के सामने से अंधविश्वास का परदा दरकने लगता है. हालांकि एक ही बार में लोग बदल नहीं जाते लेकिन राव सामने वाले के मन में वर्तमान सामाजिक व्यवस्था, बहुजन समाज का इतिहास और मनगढ़ंत धारणाओं और परंपराओं को लेकर कई सवाल छोड़ जाते हैं. फिर दो-तीन मीटिंग के बाद कैडर लेने वाला व्यक्ति अंधविश्वास और मानसिक गुलामी से बाहर निकल चुका होता है.
बहुजन महापुरुषों का जिक्र करते हुए राव कहते हैं कि जितने भी बहुजन नायक हैं, उनके आंदोलन का उद्देश्य मनुवादी व्यवस्था को खतम करके मानवतावादी व्यवस्था की स्थापना करना और उसे बनाए रखना था, क्योंकि इसमें किसी का अहित नहीं था. मैंने भी उसी उद्देश्य को लेकर काम करना शुरु किया. बहुजन समाज की समस्या क्या है?, पूछने पर राव कहते हैं, “असल में मनुवाद की जड़ अंधविश्वास है. यहां लोगों को खुद से ज्यादा भरोसा पत्थर और पेड़ में है. हम इसी उद्देश्य को लेकर काम कर रहे हैं.”
भारतीय इतिहासकारों की साजिशों को लेकर भी राव काफी गुस्से में दिखते हैं. बाबासाहेब का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि बाबासाहेब का कहना था कि भारत का इतिहास ब्राह्मणों और बौद्धों के बीच हुए संघर्ष का इतिहास है. हमारे इतिहासकार लिखते हैं कि ‘गुप्तकाल’ सवर्ण काल था, मेरा सवाल है कि जिस काल में देश की बहुत बड़ी आबादी अभाव और भुखमरी में जी रहे थी, वह सवर्ण काल कैसे हो सकता है? इतिहासकार मौर्य काल को सवर्णिम काल क्यों नहीं कहते जब इस देश में नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय थे.
भारतीय बहुजन महासभा (BBM) का उद्देश्य क्या है, पूछने पर राव कहते हैं, “बहुजन समाज के लोगों को अंधविश्वास से बाहर निकालना, उनको उनका इतिहास बताना, बहुजन महापुरुषों के संघर्ष और संघर्ष के इतिहास को बताना है. बहुजन समाज को इकट्ठा करना उद्देश्य है क्योंकि सारे बहुजन 2200 साल पहले बौद्ध थे. बाद में वो विभिन्न जातियों में बंट गए. पांच साल काम करने के बाद बहुजन समाज की स्थिति को वह कैसे आंकते हैं? इस सवाल के जवाब में राव कहते हैं कि बाबासाहेब के तीन मुख्य आंदोलन थे. (1) सामाजिक (2) राजनैतिक और (3) धार्मिक. ज्योतिबा फुले, बाबासाहेब और शाहूजी महाराज ने इस पर काफी काम किया. लेकिन सामाजिक आंदोलन बहुत बड़ा है. देश के 85 फीसदी लोगों को इकट्ठा करना और उन्हें मानसिक गुलामी से बाहर निकालना है. असल में लोग बाबासाहेब को भी मान रहे हैं और हिन्दू धर्म को भी मानते हैं. लोग बीच में हैं; इस वजह से सांस्कृतिक क्रांति नहीं हो पा रही है. वंचितों-बहुजनों की गरीबी का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा है. उन्हें यह समझना होगा कि जिस बजट में वे सालों भर तीर्थ करते हैं, उस बजट में वो बच्चों को पढ़ा सकते हैं.
इन पांच सालों में कितनी सफलता मिली, पूछने पर राव कहते है कि लोग अंधविश्वास और परंपराओं से बाहर आ रहे हैं. असल में दिक्कत यह है कि मेहनत व्यक्ति करता है और क्रेडिट धागा और पत्थर ले जाता है. हम इसी से निपटने के लिए काम कर रहे हैं. संगठन कहां-कहां सक्रिय है के जवाब में बताते हैं कि संगठन 15 राज्यों में है और हमारा संगठन फिलहाल उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, झारखंड, छत्तीसगढ़, जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड और मणिपुर में ज्यादा सक्रिय है. आने वाले पांच सालों में वह अपने नेटवर्क को 20-25 राज्यों तक पहुंचाने की बात करते हैं.
बीबीएम राजनैतिक तौर पर बहुजन समाज पार्टी के करीब है लेकिन राव का मानना है कि बहुजन राजनीति में ट्रेंड लोगों की कमी है. इसकी वजह सोशल मूवमेंट का कम होना है. अम्बेडकरवाद और ब्राह्मणवाद के संघर्ष में राव बहुजन आंदोलन में एक और कमी की ओर इशारा करते हैं. कहते हैं, “हमारे यहां सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक आंदोलन चलाने वालों का आपसी तालमेल नहीं है, जबकि हमारे विरोधी पक्ष का अंदरखाने गहरा तालमेल है. मनुवाद और ब्राह्मणवाद से संघर्ष में अम्बेडकरवादियों को बहुत सी बातें सीखने की जरूरत है. मनुवादी आंदोलन में सोशल मूवमेंट श्रेष्ठ है और राजनीतिक मूवमेंट दूसरे नंबर पर है, जबकि हमारे यहां उल्टा है, यह बड़ी दिक्कत है.”
हालांकि राव अपने संगठन के जरिए अपनी पूरी ताकत से ब्राह्मणवादी व्यवस्था का प्रतिकार और बहुजन समाज के लोगों को जगाने में जुटे हैं. इस मुहिम में उनकी पत्नी इंदिरा राव और संगठन के सभी सहयोगी राव की ताकत हैं. राव कहते हैं, “अंतिम उद्देश्य बहुजन समाज को शासक बनाना है. या यूं कहें कि अंतिम उद्देश्य सम्राट अशोक जैसा भारत बनाने का है, क्योंकि वह हमारा स्वर्णिम काल था. सत्ता इसका माध्यम है.” मैं अस्थायी बदलाव नहीं चाहता- कांशीराम
आज जब देश में राष्ट्रवाद पर बहस छिड़ी हुई है, कांशीराम जी द्वारा दिए गए राष्ट्रवाद की परिभाषा गौर करने लायक है. मान्यवर कांशीराम दो राष्ट्रवाद के सिद्धान्त की बात कहते थे. एक वो जो सताए जाते हैं उनका राष्ट्रवाद और दूसरे जो सताते हैं, उनका राष्ट्रवाद. उनका मानना था कि अत्याचार करने और सताने वाले के लिए राष्ट्रवाद की परिभाषा सामंतवाद है, जबकि मेरे लिए राष्ट्रवाद भारत की जनता है. 8 मार्च, 1987 को कांशीराम जी द्वारा इलस्ट्रेटिड वीकली के संवाददाता निखिल लक्ष्मण को दिए साक्षात्कार के जरिए हम मान्यवर को आपके सामने रखने की कोशिश कर रहे हैं. तकरीबन तीन दशक बाद भी वह इंटरव्यू बहुजन समाज को दिशा देने में सक्षम है.
प्रश्न- आप सभी राजनीतिक दलों के प्रति इतने विरोधी क्यों हैं, विशेषकर कम्युनिस्टों के?
उत्तर- मेरे विचार में सभी पार्टियां यथास्थिति की पोषक हैं. हमारे लिए राजनीति है बदलाव की राजनीति. मौजूदा पार्टियां यथास्थिति को बने रहने का कारण है. यही कारण है कि पिछड़ी जातियों को आगे बढ़ाने का काम नहीं हुआ है. कम्युनिस्ट पार्टियां इस मामले में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हुई हैं. वे परिवर्तन की बात करती हैं लेकिन काम यथास्थिति के लिए करती हैं. बीजेपी बेहतर है कम-से-कम यह बदलाव की बात कभी नहीं करते, इसलिए लोग धोखे में नहीं रहते. कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां गरीबी दूर करने की बात करती हैं लेकिन काम गरीबी बनाये रखने का करती हैं. यदि गरीब, गरीब नहीं रहेगा तो ये लोग (यथास्थितिवादी) गद्दी पर नहीं बैठ पाएंगे.
प्रश्न- आपका कैडर महात्मा गांधी का इतना विरोधी क्यों है?
उत्तर- गांधी सभी बुराइयों की जड़ हैं। मैं बदलाव चाहता हूं। डॉ. अम्बेडकर बदलाव चाहते थे लेकिन गांधी यथास्थिति के रखवाले थे. वह शूद्रों को हमेशा शूद्र बनाए रखना चाहते थे. गांधी ने राष्ट्र को बांटने का काम किया लेकिन हम राष्ट्र को संगठित करने का कार्य कर रहे हैं, हम सभी बनावटी बंटवारों को मिटा देंगे।
प्रश्न- आप जातिवादी संगठन खड़ा करके जातिवाद को कैसे मिटा सकते हैं?
उत्तर- बीएसपी जातिवादी पार्टी नहीं है. यदि हम 6000 जातियों को जोड़ रहे हैं तो हम जातिवादी कैसे हो सकते हैं?
प्रश्न- मुझे लगता है कि उच्च जातियों के लिए आपकी पार्टी के दरवाजे बन्द हैं?
उत्तर- उच्च जातियां कहती हैं कि आप हमें शामिल क्यों नहीं करते. मैं कहता हूं कि आप सभी पार्टियों का नेतृत्व कर रहे हैं. यदि आप हमारी पार्टी में शामिल होंगे तो आप यहां भी बदलाव रोक दोगे. उच्च जातियां हमारी पार्टी में शामिल हो सकती हैं लेकिन वे इसके नेता नहीं हो सकते. नेतृत्व पिछड़ी जातियों के हाथों में ही रहेगा. मुझे डर है कि जब उच्च जातियों के लोग हमारी पार्टी में आएंगे तो वे बदलाव की प्रक्रिया को रोकेंगे. जब यह डर समाप्त हो जाएगा तो वे हमारी पार्टी में शामिल हो सकते हैं.
प्रश्न- जिन राजनीतिज्ञों से हमने दिल्ली में बात की वे कहते हैं कि यदि बीएसपी ने अपना ज्यादा लड़ाकूपन दिखाया तो वे राजनीति में खत्म कर देंगे।
उत्तर- हम उनको खत्म कर देंगे. क्योंकि जब इन्दिरा एक चमार के द्वारा खत्म की जा सकती है तब ये क्या बच सकते हैं. जब हम सशस्त्र सेनाओं में 90 फीसदी हैं, बीएसएफ में 70 फीसदी हैं, 50 फीसदी सीआरपीएफ और पुलिस में हैं तो हमारे साथ कौन अन्याय कर सकता है. एक जनरल के लिए जवानों की तुलना में कम गोलियां चाहिए. उनके पास जनरल हो सकते हैं, जवान नहीं.
प्रश्न- इसका अर्थ है आप हिंसा का प्रचार कर रहे हैं?
उत्तर- मैं शक्ति का प्रचार कर रहा हूं। हिंसा को रोकने के लिए मेरे पास शक्ति होनी चाहिए. उदाहरण के लिए, मेरे अलावा शिवसेना को कोई नहीं पछाड़ सकता, जब कभी मैं महाराष्ट्र आऊंगा मैं उनको खत्म कर दूंगा. शिवसेना की हिंसा खत्म हो जाएगी.
प्रश्न- आप ऐसा किस प्रकार करेंगे?
उत्तर- शिवसेना में कौन लोग हैं जो आग लगाते हैं और तोड़-फोड़ करते हैं. वे चार जातियां हैं-; अगाड़ी, भण्डारी, कोली और चमार. ये अनुसूचित जाति, जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्ग के लोग हैं. जब मैं महाराष्ट्र आऊंगा ये लोग मेरे पास आ जाएंगे.
प्रश्न- आप कैसे मानते हैं कि यूपी में बीएसपी का हश्र आरपीआई की शासक पार्टियों के साथ सौदेबाजी की ताकत की तरह खात्मा नहीं होगा?
उत्तर- आरपीआई ने कभी सौदेबाजी नहीं की. यह तो मांगने वाली पार्टी थी. यह सौदेबाजी करने के स्तर तक कभी नहीं पहुंची. मुझे याद है 1971 के आम चुनावों में 521 सीटों के लिए चुनावी समझौता हुआ, जिसमें 520 सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ी तथा बाकी एक पर आरपीआई. मुझे आरपीआई प्यारी है लेकिन इससे तुलना करने में मुझे घृणा है. यह एक ऐसी वेश्या है जो कौड़ियों में बिकती है. जब तक मैं जिन्दा हूं ऐसा बीएसपी के साथ कभी नहीं होगा.
हम बदलाव चाहते हैं. हम यथास्थिति वाली ताकतों से गठजोड़ नहीं चाहते. यदि सरकार हमारे सहयोग के बगैर नहीं बन सकती तो बदलाव की हमारी अपनी शर्तें होंगी. हम आधारभूत तथा ढांचागत बदलाव चाहते हैं बनावटी नहीं.
प्रश्न- आपके फंड के स्रोत के पीछे कुछ रहस्य है?
उत्तर- मेरे पास फंड विभिन्न स्रोतों से आते हैं जो कभी खत्म नहीं होंगे. मेरा फंड ऐसे लोगों से आता है जो दौलत पैदा करते हैं. बहुजन समाज दौलत पैदा करता है. मैं उन्हीं से पैसा लेता हूं. लाखों लोग त्योहारों जैसे कुम्भ मेला इत्यादि पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, केवल अगला जन्म संवारने के लिए. कांशीराम उनको बताता है कि मैं अगले जन्म के बारे में कुछ नहीं जानता लेकिन मैं वर्तमान जीवन का विशेषज्ञ हूं. मैं कहता हूं जिनको अगला जन्म संवारना है वे गंगा के किनारे ब्राह्मणों के पास जाओ, जिनको वर्तमान जीवन सुधारने में रुचि है वे मेरे पास आएं. इसलिए वे मेरी मीटिंगों के लिए दौड़ते हैं.
प्रश्न- वे कहते हैं कि आपने लखनऊ रैली पर बहुत पैसा खर्च किया है।
उत्तर- केवल बसों को किराये पर लेने के लिए ही 22 लाख रुपये खर्च किये गये. लेकिन मैं नाराज हूं. ये 22 करोड़ होने चाहिए थे. एक समय आएगा जब मेरे आह्वान पर 22 करोड़ तक लोग खर्च करेंगे. मेरे लिए पैसों की कोई कमी नहीं है. यदि खजाने से पैसा आता तो ये खाली हो जाता, मैं लगातार चलने वाले स्रोत से पैसा ले रहा हूं. मुझे सभी 542 लोकसभा की सीटों को जीतने के लिए केवल 1 करोड़ रुपया चाहिए. एक दिन वोटर कांशीराम को पैसा देने के लिए लाइन में खड़े होंगे, अगले दिन वे कांशीराम को वोट देने के लिए लाइन लगाएंगे.
प्रश्न- आपकी पार्टी से कुछ लोग पार्टी छोड़कर चले गए?
उत्तर- आप सभी लोगों को एक साथ नहीं रख सकते। कुछ लोग थक सकते हैं. कुछ को खरीदा जा सकता है. कुछ डर सकते हैं ऐसा लगातार चलता रहेगा. इससे हम हतोत्साहित नहीं होंगे. मैंने एक ऐसा तरीका ईजाद (ढूंढा) किया है कि यदि किसी समय पर 10 आदमी छोड़कर जाते हैं तो हम उसी स्तर के 110 लोग तैयार कर लेंगे. जिनको हमने ‘डेडवुड’ (मृतकाठ) करके अलग किया है, उसी ‘मृत काठ’ को दूसरे जलाकर कुछ आग पैदा कर रहे हैं. वे उनको हमारे विरुद्ध प्रयोग करने की कोशिश कर रहे हैं.
प्रश्न- आप किस प्रकार के बदलाव की ओर देख रहे हैं?
उत्तर- मैं अस्थायी बदलाव नहीं चाहता. मैं ऐसा कुछ नहीं चाहता जो टिकाऊ न हो. हम जो कर सकते हैं करेंगे लेकिन ये बरकरार रहना चाहिए और स्थायी बदलाव के द्वारा बरकरार रहना चाहिए.
अनुवाद- बिजेन्द्र सिंह विक्रम वाल्मीकि ने राम को कठघरे में खड़ा किया- दर्शन रत्न ‘रावण’
आमतौर पर ‘वाल्मीकि’ को लेकर दलित समाज दो धड़ों में बंटा नजर आता है. सफाई कर्मचारियों का एक तबका वाल्मीकि को ‘भगवान’ का दर्जा देता है तो वहीं अन्य तबका यह सवाल उठाता नजर आता है कि वाल्मीकि दलित नहीं थे. दर्शन रत्न ‘रावण’ का मानना है कि लोगों ने वाल्मीकि को ठीक से समझा ही नहीं. वह वाल्मीकि को रामायण के जरिए राम की बखिया उधेड़ने वाले के तौर पर देखते हैं. 20 साल की उम्र से सफाई कर्मचारी वर्ग के बीच काम करने वाले ‘रावण’ आधस नाम के संगठन के जरिए इस समाज में फैली अशिक्षा और गंदगी दूर करने निकले हैं. साथ ही वाल्मीकि और अंबेडकर को एक मंच पर स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. फिलवक्त जब देश भर में ‘रामलीला’ की धूम मची है, रावण के जरिए वाल्मीकि के संदर्भ में राम को समझना जरूरी है. पिछले दिनों दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने दर्शन रत्न रावण से उनके दिल्ली प्रवास के दौरान विस्तार से चर्चा की.
आप क्या कर रहे हैं, कब से कर रहे हैं और क्यूं कर रहे हैं?
– हम देश में सफाई मजदूर जातियों; जिन्हें उत्तरी भारत में वाल्मीकी कहते हैं, उनके लिए काम कर रहे हैं. और इसलिए कर रहे हैं क्योंकि दलित समाज और इससे पहले लेफ्ट फ्रंट के मूवमेंट से जुड़े लोगों ने वाल्मीकी समाज की एक
नाकारात्मक छवि बना ली कि यह समाज नहीं बदल सकता. उन्होंने इसका प्रचार किया और इतना किया कि वह दुष्प्रचार हो गया. लेकिन जब मैं उन्हीं लोगों से यह पूछता हूं कि उन्होंने धरातल पर क्या किया, तो उधर से कोई जवाब नहीं मिलता. उन्होंने केवल भाषण दिए हैं. वो बड़ी बड़ी बातें करते हैं, अपनी जीवनियां लिखते हैं, उसमें मां-बाप, दादा-दादी और खुद के दुख भोगने की बात लिखते हैं. मैं कहता हूं कि दुख तो सभी दलितों ने भोगे हैं. मुसहर समाज को ही देखिए, वो आज भी चूहा खा रहा है.
वाल्मीकि समाज को लेकर एक आम धारणा है कि वह बाबासाहेब से दूर रहा है. आखिर यह स्थिति क्यों हो गई है और क्या आपने इसे पाटने की कोशिश की है?
– अब यह स्थिति नहीं है. हमने जहां जहां काम किया है आप वहां चलिए. हमारे काम करने के बाद वाल्मीकि समाज में बाबासाहेब के प्रति सोच बदली है. हमलोगों ने डॉ. अम्बेडकर को वाल्मीकि समाज के साथ लाने का काम किया है. मैंने 1989 में पहली बार 14 अप्रैल का कार्यक्रम रखा. आप आज पंजाब चले जाएं, हरियाणा में चले जाएं, उत्तर प्रदेश की वाल्मीकि बस्तियों में चले जाएं वहां अब स्थिति बदली है. वहां आपको बाबासाहेब और वाल्मीकि का चित्र एक साथ मिलेगा. आप जो बाबासाहेब से वाल्मीकि समाज के दूर होने की बात कर रहे हैं तो वाल्मीकि समाज को बाबासाहेब से दूर
करने वाले भगवान दास जैसे लोग थे, आर. सी संदर जैसे लोग थे जो जीवन में कभी कामयाब नहीं हुए. दिल्ली में रहते हुए किसी एक बस्ती को टारगेट कर के इन्होंने काम किया हो तो बताएं. मैं कभी कभी जब इनकी जीवनियां पढ़ता हूं कि मां के सर पर गंदगी की टोकरी थी तो मुझे लगता है कि मां के दुख को बेच रहे हैं. ठीक है कि मां के सर पर टोकरी थी लेकिन आने वाली बेटी के भविष्य के लिए इन्होंने क्या किया, ये बताएं? जरूरी यह था कि किसी बेटी के सर पर वो टोकरी ना आए इसके लिए काम किया जाए. वो ज्यादा जरूरी था लेकिन यह काम नहीं हुआ. 6 दिसंबर को आप लोग परिनिर्वाण दिवस कहते हो मैं बलिदान दिवस कहता हूं. हम इसका पोस्टर भी निकालते हैं हर साल.
वाल्मीकि समाज के लिए तमाम लोग काम कर रहे हैं. आप उनसे कितने जुड़े हुए हैं?
– बेजवाड़ा विल्सन के साथ हमारी यहीं (पंजाब भवन) बात हुई थी. हमने उनसे कहा कि आप कहते हो कि सर पर मैले की टोकरी नहीं होनी चाहिए, हमने कहा कि ठीक बात है, नहीं होनी चाहिए. ये तो हर दलित कहेगा. इस पर काम करो. लेकिन इसके आगे क्या होना चाहिए? केवल सरकार की स्कीम का पैसा एक परिवार को दिला दें उससे काम नहीं होने वाला. उससे आगे सामाजिक परिवर्तन कैसे आएगा इस पर सोचना होगा. मैंने कहा कि लोगों को बाबासाहेब के उन चार बच्चों के नाम याद दिलाओ जो आंदोलन की भेंट चढ़ गए. विल्सन के साथ पॉल दिवाकर भी आए थे. लेकिन उस दिन बात करने के बाद दोनों ने मेरा फोन लेना बंद कर दिया. हालांकि विल्सन ने समाज के लिए काफी काम किया है. बाकी ज्यादातर लोग मंच के लोग हैं. वो सिर्फ भाषण दे रहे हैं.
वाल्मीकि समाज और दलित समाज का जो अन्य तबका है, इनको आपस में जोड़ने के लिए आपने क्या काम किया है?
– हम वाल्मीकि समाज को यह बताने में कामयाब हो रहे हैं कि गांधी की वजह से आपको पैंट कमीज नहीं मिली है. गांधी की वजह से आपको वोट या पंच बनने का अधिकार नहीं मिला है, बल्कि ये अधिकार बाबासाहेब की वजह से मिला है. हम लोगों तक यह बात पहुंचाने में सफल रहे हैं. हम महात्मा रावण को लेकर कार्यक्रम कर रहे हैं. मैंने फेसबुक पर देखा कि कुछ लोग महिषासुर की बात कर रहे हैं. मुझे लगता है कि महिषासुर अभी आम लोगों से जुड़े नहीं हैं. पहले रावण पर काम करना चाहिए था, उसमें बाद में महिषासुर आ जाते. हम अपने हर मंच से वाल्मीकि और बाबासाहेब की बात एक साथ करते हैं. मेरा मानना है कि बिना रूके लगातार काम करते रहने से नतीजे निकलते हैं. लोगों में सकारात्मक बदलाव आ रहा है.
‘भगवान वाल्मीकि’ को लेकर अक्सर दलित समाज के तमाम लोगों के बीच एक द्वंद की बात सामने आती है. सवाल यह भी उठता है कि वाल्मीकि दलित समाज से थे या नहीं थे. दूसरा सवाल यह भी उठता है कि जब वाल्मीकि ने उस वक्त में रामायण लिखा तो फिर उनके वंशजों के हाथ में कलम की जगह झाड़ू कैसे आ गया?
– वंशज तो हम एकलव्य के भी हैं; तब भी हमारे हाथ में झाड़ू है. वंशज हम बाबा जीवन सिंह के भी हैं; तब भी हमारे हाथ में झाड़ू है. ये उससे कंपेयर नहीं होता. मेरा मानना है कि वाल्मीकि को पेरियार से लेकर बाद के अन्य किसी ने भी स्टडी किया ही नहीं है. इनलोगों ने वाल्मीकि को ऊपर ऊपर से समझा है. मोटे-मोटे संदर्भ उठा लिए हैं जिनको इस्तेमाल किया जा सके. अब पेरियार क्या कहते हैं? पेरियार लिखते हैं कि रामायण मिथक है. फिर लिखते हैं कि रावण हमारा बड़ा योद्धा था. दोनों बातें एक साथ कैसे संभव हो सकती है? पेरियार की किताब को ललई सिंह यादव ट्रांसलेट करते हैं और जब इलाहाबाद हाई कोर्ट में उस पर स्टे आ जाता है तो फिर वहां वाल्मीकि रामायण पेश करते हैं. मैं कहता हूं कि जब दलितों का एक बड़ा हिस्सा यह समझता है कि उसे वाल्मीकि को नहीं मानना है तो फिर वाल्मीकि की किताब को सबूत के तौर पर क्यों इस्तेमाल करते हो? उसकी कोई भी चीज क्यों इस्तेमाल करते हो?
कानपुर देहात में रावण मेला होता है. मुझे वहां दो बार बुलाया जा चुका है. मैंने वहां कहा कि एक तरफ आप सारा दलित साहित्य रख लिजिए जिसमें आप महामुनि शंबूक भी बात करते हैं, राम के उनके कातिल होने की बात करते हैं और दूसरी तरफ एक कागज पर वाल्मीकी नाम लिख कर के उसे कैंसिल कर दीजिए. आपका सारा साहित्य कूड़ा हो जाएगा क्योंकि फिर राम द्वारा शूंबूक के मारे जाने की बात का कोई एविडेंस ही नहीं बचता. एविडेंस वाल्मीकी से ले रहे हो और उन्हीं को काट रहे हो. ये एक बड़ी साजिश है, जिसका हम शिकार हैं. वो साजिश यह है कि दलित दलित इकट्ठा नहीं होनी चाहिए. हो सकता है कि यह साजिश गांधी ने डाली हो और एक तबके को खड़ा किया हो कि आप वाल्मीकी के खिलाफ बोलो. यह ध्यान देना होगा कि गांधी ने बाबासाहेब को सपोर्ट नहीं किया बल्कि जगजीवन राम को किया. हो सकता है कि उन्होंने
जगजीवन राम या फिर किसी और के माध्यम से यह बात फैलाई हो. मगर मैं जिस रूप में देखता हूं और अन्य दलित साहित्यकार लिखते हैं, रामायण का पहला हिस्सा है बाल कांड. बाल कांड में ही दलित साहित्यकार यह बात उठाते हैं कि राम दशरथ की औलाद नहीं है. मगर यह मूल तो वाल्मीकि का लिखा हुआ है. और जो व्यक्ति यह लिखे कि राम अपने पिता की औलाद नहीं है यह बताइए कि वह उसकी एडवोकेसी कर रहा है या फिर उसे नंगा कर रहा है. थोड़ा सा और आगे बढ़ते हैं. राम जब वनवास जाते हैं तो अपनी तीनों माताओं से मिलने के बाद सीता से भी बात करते हैं. वह सीता से कहता है कि यह महल और सुख सुविधाएं भरत और शत्रुध्न के हिस्से में चले गए हैं. मुझे वनवास मिला है. और अगर तुझे इन सब चीजों की जरूरत है तो तू उनकी शरण में चली जा. सीता वहां जो कहती है उसको दलित सहित्यकार खूब इस्तेमाल करते हैं. सीता कहती है कि “मेरे पिता को अगर पता होता कि तू पुरुष के भेष में नारी है तो मेरे पिता कभी मेरे हाथ में तुम्हारा हाथ न देते.” अब ये वाल्मीकि रामायण में है. वाल्मीकि रामायण कहती है कि महामुनि शंबूक को उल्टा लटका कर कत्ल किया गया. तो वाल्मीकि तो ये सारी बातें लिखकर हमें बता रहे हैं. तो फिर वाल्मीकी दोषी कैसे होते हैं.
वाल्मीकि जी की एक और किताब है ‘योग विशिष्ट’. इस किताब में वो ब्राह्मणवाद के खिलाफ खूब लिखते हैं. इसकी एक लाइन है- तप, दान और तीरथ से भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, मोक्ष की प्राप्ति केवल ज्ञान से होती है. अब ये एक लाइन कितनी बड़ी है. अब आप देखिए कि सारा ब्राह्मणवाद तप, दान और तीरथ को ही महत्व देता है और उसी को मोक्ष का उपाय मानता है लेकिन वाल्मीकि इसकी खिलाफत करते हैं. तो वह ब्राह्मणवाद के समर्थन में कहां लिख रहे हैं? श्राद्ध के बारे में वाल्मीकि लिखते हैं कि अगर श्राद्ध करने से परलोक गए लोगों तक खाना पहुंचता है तो फिर यात्रा पर गए लोगों का भी श्राद्ध कर दिया करो.
अब ब्राह्मण वाल्मीकि के साथ कहां खड़ा है, इस पर भी किसी का अध्ययन नहीं है. दिल्ली के चुनाव में एक साध्वी ने रामजादे की बात कही. उस पर रवीश कुमार ने अपने चैनल पर डिबेट किया. मैंने उन्हें फोन किया. मैंने कहा कि डिबेट अधूरा था. मैंने कहा कि आप मुझे राम का कोई भी मंदिर दिखा दो जहां राम परिवार है और उसके साथ उसके बच्चे भी हैं. बिना बच्चों के परिवार कैसे हो सकता है? और पहले रामजादे तो लव और कुश हैं. कौन सा ब्राह्मण, कौन सा ठाकुर, कौन सा बनिया उन दोनों को मानता है? यानि ब्राह्मण वाल्मीकि से इतना दूर है कि वह राम के बच्चों को इसलिए स्वीकार नहीं करता क्योंकि वह वाल्मीकि आश्रम में, वाल्मीकि की शिक्षा में, उनके सानिध्य में पले.
दर्शन रत्न ‘रावण’ का साक्षात्कार लेते हुए ””””दलित दस्तक”””” पत्रिका के संपादक अशोक दास.
बुद्ध को आप कैसे देखते हैं?
– बुद्ध को हम बहुत अच्छे रूप में देखते थे, जब पढ़ते थे. जहां बुद्ध यह कहते हैं कि किसी शास्त्र को इसलिए ना मानों क्योंकि वह बहुत पुराने हैं. बहुत शानदार विचार थे. इसको हमने अपनी डायरी में नोट किया था. लेकिन जब दलित बुद्ध को लेकर हमारे पास आएं तो उन्होंने हमें बुद्ध से दूर कर दिया. बुद्ध तर्क को प्रधानता देते हैं लेकिन यह बात अनपढ़ लोगों को नहीं समझाया जा सकता. तो पहले उनको उस लेवल पर लेकर आना पड़ता है फिर ज्ञान की बात बतानी पड़ती है. जो बुद्ध वाले लोग वाल्मीकि बस्तियों में आएं उनके पास अन्य धर्मों की आलोचना के सिवा कुछ नहीं था. इनका बुद्ध तर्क और विचार वाला बुद्ध नहीं था. इनका बुद्ध गाली वाला बुद्ध था. इससे लोग उन्हें दुर से देखकर ही चिढ़ने लगे. और इस तरह उन्होंने बाबासाहेब को भी अपना विरोधी मान लिया.
बुद्ध को नाम पर वो दीवाली करते हैं क्या ये ब्रह्मणीकरण नहीं है. बुद्ध के चार सत्यों को आर्य सत्य कहते हैं. उसको मानवीय सत्य क्यों नहीं कहते, आर्य सत्य ही क्यों कहते हैं? हां, बाबासाहेब जिस बुद्धिज्म को ग्रहण करते हैं उसको मैं दूसरे रूप में देखता हूं. बाबासाहेब बुद्धिज्म को अध्यात्मिक रूप में लेते ही नहीं है, मेरा मानना है कि बाबासाहेब बुद्धिज्म को राजनैतिक तौर पर ले रहे हैं कि हमें सिर्फ हिन्दू से अलग होना है. हिन्दू से अलग होने की तो जरूरत ही नहीं है क्योंकि जब बाबासाहेब यह लिखते हैं कि ‘अछूत कौन और कैसे’? वहीं साबित हो जाता है कि हम हिन्दू से अलग हैं. कहीं भी हम हिन्दू हैं ही नहीं फिर अलग होने की बात ही बेमानी है. हिन्दू से अलग होने की बात संस्कारों में आती है कि हमारा बच्चा हो तो हम पंडित से नाम ना निकलवाएं. हम पंडित से कोई अन्य काम ना करवाएं वो बात आती है. लेकिन जब बाबासाहेब 22 प्रतिज्ञाओं की बात करते हैं वहां बुद्धिज्म कहीं नहीं आता. वहां बुद्ध का शील नहीं आता. मैं हिन्दू-हिन्दू करता रहूं इसका मतलब मैं उसका प्रचार ही कर रहा हूं. तो पढ़ाई के दौरान हमने जिस बुद्ध को समझा और माना था, आलोचना वालों ने उस बुद्ध को हमसे दूर कर दिया.
लेकिन आप जिस बुद्ध से दूर हैं उसे तो आपके पास लोग लेकर आए ना, बुद्ध तो वही हैं. फिर बुद्ध को कैसे खारिज किया जा सकता है?
– मैं खारिज नहीं कर रहा हूं. मैं बस इतना कह रहा हूं कि एक जो हमने पढ़ते हुए बुद्ध को समझा और दूसरा जो हमारे पास बुद्ध को जिस रूप में लेकर आया तो हम पहले जिस बुद्ध को मानते थे, हमें उससे भी दूर हटना पड़ा. दूसरी बात, मैं सोचता हूं कि हमें ना बुद्ध बनने की जरूरत है और न ही जैन बनने की जरूरत है. बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के सामने यह मजबूरी थी, और यह वाजिब और जरूरी मजबूरी थी. क्योंकि मेरा मानना है कि इतना बड़ा विद्वान गलती नहीं कर सकता. एक दूसरे तरह कि मजबूरी थी. एक वर्ष से ज्यादा हो गए जब राजेन्द्र यादव की मृत्यु हुई. सारी उमर वह ब्राह्मणवाद को कोसते रहे. मरे तो सारे संस्कार ब्राह्मण ने किए. इंदिरा गांधी की मृत्यु हुई. उसका लड़का विदेश में पढ़ा. विदेशी औरत से शादी की लेकिन जब पंडित ने कहा कि कमीज उतारो और जनेऊ पहनों तो उसने जनेऊ पहन लिया. मैं सोचता हूं कि यही मजबूरी बाबासाहेब के सामने थी और यह जायज मजबूरी थी. उन्होंने शायद धर्म परिवर्तन यह सोच कर किया कि मेरे अंतिम संस्कार पर कोई ब्राह्मण ना आ जाए. क्योंकि अगर वो ना करते तो हम सब तब ब्राह्मणवाद की ओर चले जाते.
मगर जिसे हम आदि संस्कृति कहते हैं वो इन सबमें कहां आती है? मुझे इसमें वो नहीं दिखता. इसमें शंबूक बुद्ध से बड़े नहीं होते. और जब मैं चैत्य भूमि जाता हूं जो कि बाबासाहेब की याद में है तो वहां देखता हूं कि बाबासाहेब की प्रतिमा काले रंग में नीचे पड़ी है और बुद्ध की प्रतिमा सवर्ण रंग में ऊपर है. हम कहीं न कहीं वहीं खड़े हैं. इसमें हम अपना क्या पैदा कर पाएं? सिक्खों के ग्रंथ में चार हजार बार राम का नाम आया है लेकिन आप किसी गुरुद्वारे में राम का नाम ऊपर ढ़ूंढ़ कर बता दो. किसी ने यह हिमाकत नहीं कि लेकिन हमारे यहां यह हो रहा है. अगर बुद्ध हैं भी तो उनकी बात तमाम अन्य दलित महापुरुषों जिनकी बात बाबासाहेब अछूत कौन और कैसे में करते हैं उनके बाद होनी चाहिए. लेकिन आज देखा यह जा रहा है कि दलितों का एक बड़ा तबका सिर्फ बुद्ध को स्थापित करने में लगा है, बल्कि बाबासाहेब भी उससे कहीं पीछे छूट गए हैं.
आधस की परिकल्पना कैसे की. कब आपको लगा कि आपको वाल्मीकि समाज के बीच काम करना है?
– ऐसा नहीं था कि हमें बचपन से ही जातिवाद झेलना पड़ा. शहर में जन्म हुआ, पब्लिक स्कूल में पढ़े तो भेदभाव जैसा कुछ नहीं हुआ. कॉलेज में आने पर बातें समझ में आने लगी और वो भी खबरों को पढ़कर. लेनिन और मार्क्स को पढ़कर आग लगना शुरु हो गया. जब दलित साहित्य को पढ़ा तो लगा कि यहां काम करने की जरूरत है. जब बाबासाहेब को पढ़ा तो उनकी एक लाइन से यह साफ हो गया कि कम्यूनिज्म भारत के लिए नहीं है. कम्यूनिज्म वहां के लिए हैं, जहां क्लास (वर्ग) है, भारत में कॉस्ट (जाति) है. 24 सितंबर, 1994 में आदि धर्म समाज (आधस) की स्थापना तब की जब हमने मान लिया कि हमें हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, जैन इन सबसे हटकर आदि धर्म की कल्पना करनी है, इसके लिए काम करना है. सिक्खों के दस गुरू हैं उनका इतिहास छोटा है. हमारा इतिहास बहुत बड़ा है, हम अपने सौ गुरुओं की श्रृंखला बनाकर आदि धर्म बनाएंगे.
इस श्रृंखला में कौन-कौन है?
– पहले वाल्मीकि, दूसरे शुक्राचार्य फिर रावण, महामुनि शंबूक, महामुनि मतंग, मां शबरी, मां कैकसी (रावण की माता) और ऐसे ही हम रविदास और कबीर तक आते हैं.
इन सबके पीछे आपका उद्देश्य क्या है?
– उद्देश्य यही है कि दलित समाज की अपनी पहचान होनी चाहिए. हम भले ही नारा देते रहें कि जातियां तोड़ो, यह नहीं टूटने वाली. राजनैतिक दलों से तो बिल्कुल नहीं टूटने वाली. जब हम आदिधर्म की परिकल्पना करेंगे और जब वाल्मीकि, रविदास और कबीर को एक ही स्थान देंगे तो जातियां अपने आप टूटने लगेगी. ये कल्पना है हमारी.
स्वामी प्रसाद मौर्य ने बसपा के साथ-साथ मौर्य समाज से भी घात किया है- पारसनाथ मौर्य
स्वामी प्रसाद मौर्य के बहुजन समाज पार्टी से अलग होने के बाद मौर्या समाज को बसपा में जोड़े रखने की जिम्मेदारी फिर से पूर्व मंत्री पारसनाथ मौर्या पर आ गई है. स्वामी प्रसाद मौर्य के जाने के बाद बसपा के भीतर और मौर्य समाज में क्या प्रभाव पड़ा है, इसको जानने के लिए पारसनाथ मौर्या से बात की सतनाम सिंह ने.
स्वामी प्रसाद मौर्य के बहुजन समाज पार्टी छोड़ने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
– उसने पार्टी साथ के भी घात किया है और अपने साथ भी घात किया है. उसने साथ ही साथ अपने मौर्य समाज के साथ भी घात किया है. इसलिए की मानववादी महापुरुषों के विचारों को जमीन पर उतारने का कार्य यदि किसी ने किया है तो वह बहन मायावती जी ने किया है. बहन जी ने मान्यवर कांशीराम जी के संघर्ष को आगे बढ़ाया. बाबासाहेब के मिशन को आगे बढ़ाया. इसके लिए बहन जी का बहुत बड़ा संघर्ष है. इसके लिए कहीं भी वो थकी नहीं, झुकी नहीं. आगे बढ़ती ही गईं. नोएडा से लेकर कुशीनगर तक स्मारकों की दुनिया बसाने का काम बहन जी ने किया, जिससे हमको बहुत प्रेरणा मिली है. काश स्वामी प्रसाद मौर्य भी उनसे प्रेरणा ले पाते.
मौर्य समाज में इसको लेकर क्या प्रतिक्रिया है?
– मौर्य समाज इस घटना से रत्ती भर विचलित नहीं हुआ है. देखिए जब तक जाति के नाम पर सोच है. तब तक तो भावावेश में कुछ लोग उनका नाम ले सकते हैं. सेंटिमेंट में आपत्ति कर सकते हैं, लेकिन जब इसके बारे में गंभीरता से सोचेंगे तो यह तय है कि शाक्य, मौर्य, कुशवाहा, सैनी, समाज का कोई भी व्यक्ति इधर-उधर जाने के बारे में नहीं सोचेगा. इस समाज का व्यक्ति बहन कुमारी मायावती जी और उनके नेतृत्व को समर्थन देगा. हर जगह संगठन के लोग भी बहन कुमारी मायावती के साथ हैं. पूरा मौर्य समजा बसपा से जुड़ा हुआ है. स्वामी प्रसाद मौर्य के चले जाने से बहुजन समाज पार्टी के वोट बैंक पर कोई असर नहीं पड़ेगा, बल्कि आम जनता में पार्टी की साख बढ़ी है कि बसपा किसी भी कीमत पर परिवारवाद को तरजीह नहीं देती.
स्वामी प्रसाद मौर्य ने मायावती जी को दौलत की बेटी कहा था, इस पर आप क्या कहेंगे?
– कोई कहने के लिए कुछ भी कह ले लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य ने यह सब अभी तक क्यों नहीं कहा था? ठीक उसी दिन ही क्यों कहा? अभी तक दूसरों के लिए क्यों नहीं सिफारिश किया. दूसरे तमाम सीनियर लोग थे. तमाम एक से एक मिशनरी थे. लेकिन उनके लिए भी वे कभी नहीं बोले. जब तक उनकी शर्तें मानी जाती रहीं तब तक तो मायावती जी दलित की बेटी थी जब उनकी शर्तें नहीं मानी गईं तब वही बहन मायावती उनके लिए दौलत की बेटी हो गईं.
स्वामी जी ने आरोप यह भी लगाया था कि बसपा में पैसे लेकर टिकट दिया जाता है?
– यह उन्होंने क्यों नहीं सोचा की बड़ी पार्टियां बड़े उद्योगपति घरानों से पैसा लेती हैं. समाचारों में स्पष्ट आया की केवल बसपा ही एक मात्र पार्टी ऐसी है जो किसी भी उद्योगपति से एक भी पैसा नहीं लेती. तो इस पर स्वामी प्रसाद मौर्य ने क्यों नहीं सोचा. पार्टी फण्ड के लिए चन्दा कौन पार्टी नहीं लेती. फिर यह आरोप भी उन्होंने पहले कभी क्यों नहीं लगाया? अभी ही क्यों लगाया?
क्या स्वामी प्रसाद मौर्य जी सच में अपने बेटे-बेटी को टिकट दिलाने के लिए अड़े हुए थे?
– अड़े हुए तो थे ही. यह तो जगजाहिर है. वे पहले से ही लड़ रहे थे. मुख्य बात यह है कि वे अपने लिए भी वो सीट मांग रहे थे जो बहन जी उन्हें नहीं देना चाहती थीं. जब मना कर दिया तो आपको मानना चाहिए अपने नेता की बात. जब 1999 में बहन जी ने हमें पार्लियामेंट्री सीट से लड़ने के लिए कहा जहां हमारे खिलाफ सोनिया गांधी आ गईं तो उसके लिए तो स्वामी प्रसाद ने हमें राय दिया की आप मना मत कीजिए स्वीकार कर लीजिए तो आपने अब अपनी सीट के लिए स्वीकार क्यों नहीं किया? जो राय हमें दी थी वो अपने लिए क्यों नहीं मानी. जब हमें अमेठी लड़ाया तो हमारे लिए राय दे दिया और खुद अब बहन जी की बात नहीं मान करके सीधे मुकर गए. ये तो दोहरी बात हो गई.
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य हैं. वह मौर्य समाज को भाजपा से कितना जोड़ पाएंगे?
– उसका तो मैं नाम ही नहीं लूंगा. उसका कोई नाम ही नहीं है. कोई जिक्र नहीं है. कोई आधार नहीं है. उसे कोई नहीं जानता. उसे तो जबरन थोपा गया है. जिसका समाज के बीच कोई वजूद ही नहीं है उसकी बात क्या करें?
ऐसे खबरें आ रही है कि स्वामी प्रसाद भाजपा के संपर्क में थे?
– अभी हम इसे नहीं बता सकते कि कौन किसके साथ मिल रहा है. मैं इस बारे में नहीं बता सकता कि पहले से ही वह भाजपा के संपर्क में था या नहीं.
जब स्वामी प्रसाद ने पार्टी छोड़ने के लिए प्रेस कांफ्रेंस की तब तो आप भी उनके साथ ही बैठे थे?
– उन्होंने मुझसे घात किया. बसपा का विधानमण्डल दल का कार्यालय था. अब कार्यालय में जाकर बैठेंगे तो मालूम होगा कि बहन जी का कोई संदेश हो उसी मुद्दे पर बात करेंगे शायद. इसलिए हम लोग तमाम लोग बैठ गए थे. एक मैं ही नहीं. यह सुनने के लिए की बहन जी ने क्या कहा है तमाम लोग बैठ गए थे और इन्होंने घात करके अपनी पार्टी के कार्यालय में ही नैतिकता का सत्यनाश कर दिया. बताइए इनका नैतिक दायित्व कहां गया? ये समाज में जाकर कैसे बात करने लायक हैं.
इस बार बहुजन समाज पार्टी विधानसभा चुनावों में कितनी सीटें जीत पाएगी, क्या अनुमान है?
– देखिए ऐसा है मैं काउंट करके नहीं बता सकता. न मैं ज्योतिषाचार्य हूं और न ज्योतिष में विश्वास करता हूं. न तो मैं अटकलों पर ही यकीन करता हूं. मैं विश्वास करता हूं अपनी मेहनत पर. कितना हम दौड़ सकते हैं, कितना हम कर सकते हैं. कितने लोगों को हम सम्यक रीति से अपना बना सकते हैं. जब हम यह बात करने के लिए आगे चल रहे हैं. हमारा विचार बढ़ता जा रहा है. मैं तो इतना जानता हूं कि बसपा की सरकार बनेगी और इसको कोई रोक नहीं पाएगा. इसलिए की हमेशा परिवर्तन होता रहता है. परिवर्तन जब-जब होगा तब-तब उपेक्षितों का भला होगा. सरकार हमारी ही बनेगी. बहुमत आएगा ही. सीट कितनी मिलेगी यह आप प्रेस के लोग सोचिए.
भाजपा वाले कह रहे हैं कि हम 60 प्रतिशत सीटें जीतेंगे?
– उनका तो यही धंधा है. गणित लगाना. गलत-सलत प्रचार करना. ये खाली प्रचार-तंत्र बनाते हैं; प्रजातंत्र नहीं बनाते. इनके यहां कोई विचार है ही नहीं और न ही प्रजातंत्र है बस प्रचार-तंत्र है. ये झूठा ढोल पीट रहे हैं.
आप कांशीराम जी के साथ रहे हैं, क्या मायावती जी साहब कांशीराम जी की विचारधारा को आगे बढ़ा रही हैं?
– हमारी नेता बहन कुमारी मायावती जी मान्यवर की विचारधारा को लेकर बखूबी आगे बढ़ रही हैं. यह जानने के लिए मूल बात यह है कि बहुजन जाग रहा है कि नहीं. बहुजन बढ़ रहा है कि नहीं. आज बहन मायावती जी अपने गुरु साहब कांशीराम जी के आंदोलन को बहुत ही कुशलता से आगे बढ़ा रही हैं.
लोग ऐसा आरोप लगाते हैं कि बहन जी ने साहब कांशीराम जी के समय के सभी सीनियर लोगों को किनारे कर दिया है?
– देखिए, ये रणनीति होती है कि कैसे हम असली लोगों को बचाते रहें और जो नकली लोग हैं उनको निकालना ही पड़ता है. तथा जो काबिल लोग हैं उन्हें सत्ता का आश्रय देकर आगे लाना ही पड़ता है. जो ज्ञानी हैं वो ज्ञान की ही बात करेगा जो अज्ञानी है वह अज्ञान की ही बात करेगा. गहराई में डुबकी लगाकर कोई ज्ञानी ही जानता है कि किस सकारात्मक रणनीति के तहत बसपा में फेर बदल किए गए हैं. बहन जी बखूबी जानती हैं कि समाज हित में उन्हें क्या करना है और वे जो भी फेर बदल करती हैं सब बसपा के हित में करती हैं. बहुजन समाज के हित में करती हैं. पूरे प्रजातांत्रिक तरीके से ही निर्णय लेती हैं.
जैसे की आपने बताया की आप बसपा बनने से पहले से ही साहब कांशीराम के संपर्क में थे तो क्या आप बसपा में अपनी स्थिति से संतुष्ट हैं?
– मैं तो संतुष्ट हूं ही इसलिए कि मैं तो केवल विचार को ही देख रहा हूं कि विचार आगे बढ़ रहा है. हर पल दिन और रात बहुजन समाज का निर्माण हो रहा है. विस्तार हो रहा है क्षण-क्षण हो रहा है. इसलिए मैं संतुष्ट हूं. मैं गदगद हूं. पार्टी की विचारधारा की उन्नति से. मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूं बसपा में अपनी स्थिति से.
यदि चुनाव में कांग्रेस प्रियंका गांधी को आगे कर देती है तो क्या बसपा पर इसका असर पड़ेगा?
– बड़ी-बड़ी ऊख में लवाही (कहावत). लवाही किसे कहते हैं जो जला हुआ है. मरा हुआ है. यह बड़ी-बड़ी ऊख में लवाही वाली बात है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का क्या वजूद है? कौन जानता है उसे? प्रियंका का कोई असर नहीं होने वाला. भाई ने दलितों के घरों में रहकर देख लिया कोई असर नहीं हुआ. अब बहन भी आगे आकर देख लें, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. यू.पी. में बहन कुमारी मायावती के कद का कोई चेहरा ही नहीं है. सभी बौने हैं.
बुद्ध ने सिखाई आत्मनियंत्रण की कला
एक लड़का अत्यंत जिज्ञासु था. जहां भी उसे कोई नई चीज सीखने को मिलती, वह उसे सीखने के लिए तत्पर हो जाता. उसने एक तीर बनाने वाले से तीर बनाना सीखा, नाव बनाने वाले से नाव बनाना सीखा, मकान बनाने वाले से मकान बनाना सीखा, बांसुरी वाले से बांसुरी बनाना सीखा. इस प्रकार वह अनेक कलाओं में प्रवीण हो गया. लेकिन उसमें थोड़ा अहंकार आ गया. वह अपने परिजनों व मित्रों से कहता- ‘इस पूरी दुनिया में मुझ जैसा प्रतिभा का धनी कोई नहीं होगा.’
एक बार शहर में तथागत बुद्ध का आगमन हुआ. उन्होंने जब उस लड़के की कला और अहंकार दोनों के विषय में सुना, तो मन में सोचा कि इस लड़के को एक ऐसी कला सिखानी चाहिए, जो अब तक की सीखी कलाओं से बड़ी हो. वे भिक्षा का पात्र लेकर उसके पास गए.
लड़के ने पूछा- ‘आप कौन हैं?’ बुद्ध बोले- ‘मैं अपने शरीर को नियंत्रण में रखने वाला एक आदमी हूं’ लड़के ने उन्हें अपनी बात स्पष्ट करने के लिए कहा. तब उन्होंने कहा- ‘जो तीर चलाना जानता है, वह तीर चलाता है. जो नाव चलाना जानता है, वह नाव चलाता है, जो मकान बनाना जानता है, वह मकान बनाता है, मगर जो ज्ञानी है, वह स्वयं पर शासन करता है.’
लड़के ने पूछा- ‘वह कैसे?’ बुद्ध ने उत्तर दिया- ‘यदि कोई उसकी प्रशंसा करता है, तो वह अभिमान से फूलकर खुश नहीं हो जाता और यदि कोई उसकी निंदा करता है, तो भी वह शांत बना रहता है और ऐसा व्यक्ति ही सदैव आनंद में रहता है.’ लड़का जान गया कि सबसे बड़ी कला स्वयं को वश में रखना है. कथा का सार यह है कि आत्मनियंत्रण जब सध जाता है, तो सम्भाव आता है और यही सम्भाव अनुकूल-प्रतिकूल दोनों स्थितियों में हमें प्रसन्न रखता है.
क्रिसमस पर विशेषः सलीब पर टंगी भारतीय दलित ईसाईयों की जिंदगी
कैथलिक चर्च ने अपने ‘पॉलिसी ऑफ दलित इम्पावरन्मेंट इन द कैथलिक चर्च इन इंडिया’रिपोर्ट में यह मान लिया है कि चर्च में दलितों से छुआछूत और भेदभाव बड़े पैमाने पर मौजूद है इसे जल्द से जल्द खत्म किए जाने की जरूरत है.’ हालांकि इसकी यह स्वीकारोक्ति नई बोतल में पुरानी शराब भरने जैसी ही है. फिर भी दलित ईसाइयों को उम्मीद है कि भारत के कैथलिक चर्च की स्वीकारोक्ति के बाद वेटिकन और संयुक्त राष्ट्र में उनकी आवाज़ सुनी जाएगी.
आज क्रिसमस सबसे बड़ा ग्लोबल त्योहार बन गया है. क्या यह भी अब एक खोखला आयोजन बन कर नहीं रह गया है? ईसा मसीह ने दुनिया को शांति का संदेश दिया था. लेकिन गरीब ईसाइयों के जीवन में अंधेरा कम नहीं हो रहा. अगर समुदाय में शांति होती तो आज दलित-आदिवासी ईसाई की स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती.
आज झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम के आदिवासी अन्य जाति-समुदायों से काफी पिछड़े और उपेक्षित हैं. लाखों की संख्या में आदिवासी युवक-युवतियां दिल्ली और मुंबई में घरेलू नौकर-नौकरानी अथवा आया का काम कर रही हैं. केवल दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में ही आया का काम करने वालों में 92 प्रतिशत महिलाएं- युवतियां ईसाई हैं, जबकि गैर ईसाई आदिवासी यानी सरना महिलाओं की संख्या मात्र 2 प्रतिशत है इसका मतलब यह है कि ईसाई चर्च/ मंडली की व्यवस्था व प्रणाली से आदिवासियों को पूरी तरह आर्थिक एवं शैक्षणिक लाभ नहीं मिल रहा है जिसके कारण उन्हें शहरों की ओर जाना पड़ रहा है.
अगर छोटानागपुर क्षेत्र में आदिवासियों के लिए रोजगार नहीं है और वे सुविधाविहीन हैं तो इसके लिए केवल सरकार और राजनेताओं को दोष नहीं दिया जा सकता. ईसाई धर्म विशेषकर कैथलिक चर्च के अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती थी कि वे अपने धर्म के सदस्यों के लिए आर्थिक सुविधाओं के साथ मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था करते, लेकिन यह जिम्मेदारी उन्होंने ढंग से नहीं निभाई. सच कहा जाए तो दलित – आदिवासियों को विकास की राह पर लाने में चर्च के अधिकारी पूरी तरह असफल रहे हैं. चर्च का उद्देश्य सिर्फ ईसाइयों की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए.
भारत में सदियों से ऊंच-नीच, असमानता और भेदभाव का शिकार रहे करोडों दलितों आदिवासियों और सामाजिक हाशिए पर खड़े लोगों ने चर्च / क्रूस को चुना है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि चर्च उनके जीवन स्तर को सुधारने की जगह अपने साम्राज्यवाद के विस्तार में व्यस्त है. विशाल संसाधनों से लैस चर्च अपने अनुयायियों की स्थिति से पल्ला झाड़ते हुए उन्हें सरकार की दया पर छोडना चाहता है. दरअसल चर्च का इरादा एक तीर से दो शिकार करने का है. कुल ईसाइयों की आबादी का आधे से ज्यादा अपने अनुयायियों को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में रखवा कर वह इनके विकास की जिम्मेदारी सरकार पर डालते हुए देश की कुल आबादी के पाचवें हिस्से हिन्दू दलितों को ईसाइयत का जाम पिलाने का ताना-बाना बुनने में लगा है. यीशु के सिद्धांत कहीं पीछे छूट गए हैं. चर्च आज साम्राज्यवादी मानसिकता का प्रतीक बन गया है आैर आज उनका जीवन क्रूस पर टंगा हुआ है.
आज भारत में कैथोलिक चर्च के 6 कार्डिनल है पर कोई दलित नहीं, 30 आर्च बिशप में कोई दलित नहीं, 175 बिशप में केवल 9 दलित है. 822 मेजर सुपिरयर में 12 दलित है, 25000 कैथोलिक पादरियों में 1130 दलित ईसाई है. इतिहास में पहली बार भारत के कैथलिक चर्च ने यह स्वीकार किया है कि जिस छुआछूत और जातिभेद के दंश से बचने को दलितों ने हिंदू धर्म को त्यागा था, वे आज भी उसके शिकार हैं. वह भी उस धर्म में जहां कथित तौर पर उनको वैश्विक ईसाईयत में समानता के दर्जे और सम्मान के वादे के साथ शामिल कराया गया था. कैथलिक चर्च ने अपने ‘पॉलिसी ऑफ दलित इम्पावरन्मेंट इन द कैथलिक चर्च इन इंडिया’ रिपोर्ट में यह मान लिया है कि चर्च में दलितों से छुआछूत और भेदभाव बड़े पैमाने पर मौजूद है इसे जल्द से जल्द खत्म किए जाने की जरूरत है.’ हालांकि इसकी यह स्वीकारोक्ति नई बोतल में पुरानी शराब भरने जैसी ही है. फिर भी दलित ईसाइयों को उम्मीद है कि भारत के कैथलिक चर्च की स्वीकारोक्ति के बाद वेटिकन और संयुक्त राष्ट्र में उनकी आवाज़ सुनी जाएगी.
कुछ समय पहले दलित ईसाइयों के एक प्रतिनिधिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून के नाम एक ज्ञापन देकर आरोप लगाया कि कैथोलिक चर्च और वेटिकन दलित ईसाइयों का उत्पीड़न कर रहे है. जातिवाद के नाम पर चर्च संस्थानों में दलित ईसाइयों के साथ लगातार भेदभाव किया जा रहा है. कैथोलिक बिशप कांफ्रेस ऑफ इंडिया और वेटिकन को बार बार दुहाई देने के बाद भी चर्च उनके अधिकार देने को तैयार नहीं है. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को दिए ज्ञापन में मांग की कि वह चर्च को अपने ढांचे में जातिवाद के नाम पर उनका उत्पीड़न करने से रोके और अगर चर्च ऐसा नही करता तो संयुक्त राष्ट्र में वेटिकन को मिले स्थाई अबर्जवर के दर्जें को समाप्त कर दिया जाना चाहिए.
अब चर्च के लिए आत्ममंथन का समय आ गया है. चर्च को भारत में अपने मिशन को पुनर्परिभाषित करना होगा. भारत में चर्च को जितनी सुविधाएं प्राप्त है, उतनी तो उन्हें यूरोप तथा अमेरिका में भी नहीं मिलतीं. विशेष अधिकार से शिक्षण संस्थान चलाने, सरकार से अनुदान पाने आदि वे सहूलियतों शामिल हैं. आज देश की तीस प्रतिशत शिक्षा एवं बाईस प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर चर्च का अधिकार है. भारत सरकार के बाद चर्च के पास भूमि है और वह भी देश के पाश इलाकों में. सरकार के बाद चर्च रोजगार उपलब्ध करवाने वाला सबसे बड़ा संस्थान है इसके बावजूद उसके अनुयायियों की स्थिति दयनीय बनी हुई है.
ईसाइयों को धर्म और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति एक स्पष्ट समझ बनाने की आवश्यकता है. ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, गुजरात, बिहार, झारखंड़,कर्नाटक,आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पूर्वी राज्य या यो कहे कि पूरे भारत में ईसाइयों के रिश्ते दूसरे धर्मों से सहज नहीं रहे हैं. धर्मांतरण को लेकर अधिकतर राज्यों में दोनों वर्गों के बीच तनाव पनप रहा है और चर्च का एक वर्ग इन झंझावतों को समाप्त करने के स्थान पर इन्हें विदेशों में हवा देकर अपने हित साध रहा है. शांति के पर्व क्रिसमस पर ईसाइयों को अब इस बात पर आत्ममंथन करने की जरुरत है कि उनके रिश्ते दूसरे धर्मों से सहज कैसे बने रह सकते हैं और भारत में वे अपने अनुयायियों के जीवन स्तर को कैसे सुधार सकते हैं.
संसाधनों के बल पर चर्च ने भले ही सफलता पा ली हो, लेकिन ईसा मसीह के सिद्धांतों से वह दूर हो गया है. आज चर्च की सफलता और ईसा के सिद्धांत दोनों अलग-अलग कैसे हो गये हैं. यह ठीक उसी प्रकार से जैसे कि भले समारितान की कथा में प्राथमिकता में आये पुरोहित ‘पादरी’ ने डाकूओं से लूटे-पीटे गये घायल व्यक्ति यहूदी भाई को नजर अंदाज कर दिया था. यीशु ने मनुष्य को जगत की ज्योति बताया है. उन्होंने कहा कि कोई दीया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं बल्कि दीवार पर रखते है ताकि सबको प्रकाश मिले. इसका अर्थ है कि हम अपनों को नजरअंदाज न करें. आज चर्च में भले ही विश्वव्यापी सफलता पा ली हो, पर वह अपने ही घर में वंचितों की सुध लेने में असफल रहा है, क्योंकि वह अपने व्यापार में व्यस्त है.
लेखक पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट के अध्यक्ष हैं. विश्व पुस्तक मेला में लगेगा ”दलित दस्तक” का स्टॉल
नई दिल्ली। दिल्ली में 7 जनवरी 2017 से विश्व पुस्तक मेले की शुरूआत होगी. इस विश्व पुस्तक मेले में “दलित दस्तक” पत्रिका का स्टॉल भी लगाया जाएगा. यह पुस्तक मेला 15 जनवरी तक चलेगा.
दलित दस्तक पत्रिका का स्टॉल हाल नंबर 12A में लगेगा जिसका स्टॉल नंबर 83 है. दलित दस्तक के स्टॉल से आप लोग पुस्तकें और पत्रिका खरीद सकते हैं. दलित दस्तक के स्टॉल से आप दलित मुद्दों से जुड़ी किताबें और बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर पर आधारित पुस्तकें खरीद सकते हैं.
दलित दस्तक के “दास पब्लिकेशन” द्वारा प्रकाशित कई पुस्तके हैं जिनमें मुख्य रूप से “राष्ट्र निर्माता बाबासाहेब अम्बेडकर”, “दलित एजेंडा 2050”, “एक मुलाकात दिग्गजों के साथ” और “50 बहुजन नायक” उपलब्ध रहेगी. इसके अतिरिक्त दलित दस्तक पत्रिका भी स्टॉल से खरीदी जा सकती है. मिड डे मील बनाने वाली दलित महिला ने कहा, गांव गई तो मार देंगे ऊंची जाति के लोग
सागर। मध्यप्रदेश के सागर जिले में मानवता को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है. एक दलित महिला को उच्च जाति के लोगों ने बेरहमी से पीट डाला, महिला का कसूर सिर्फ इतना था कि वो दलित समुदाय की है और स्कूल में मध्यांन भोजन बनाती है. जोकि उच्च जाति के लोगों को पसंद नहीं. पीड़ित महिला ने इसकी शिकायत थाने में की तो उच्च जाति के लोगों ने एक बार फिर उसके साथ मारपीट कर दी. पीड़िता ने न्याय की गुहार लगाई है जिसके बाद एसपी ने मामले में कार्रवाई के निर्देश दिया है.
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिला मुख्यालय से 42 किलोमीटर दूर स्थित राहतगढ़ थाना के गुमरिया गांव में पीड़ित रामवती अहिरवार की इसी गांव के उच्च जाति के लोगों ने बेरहमी से पिटाई कर दी. महिला का कसूर सिर्फ इतना था कि वो मिड डे मील का खाना बनाने स्कूल जाती थी. इसलिए छुआछूत के चलते उच्च जाति के लोगों ने पहले पीड़ित को खाना बनाने से रोका.
जब महिला ने उनकी बात की अनसुनी की तो राकेश यादव, ह्रदेश यादव, अखिलेश यादव और रीना यादव ने उसके साथ मारपीट किया. पीड़िता ने इस बात की शिकायत राहतगढ़ थाने में दर्ज करवाई, तो आरोपियों ने महिला को फिर बेरहमी से मारा-पीटा और गांव से निकल जाने का फरमान सुना दिया.
डरी सहमी पीड़िता दो दिन से अपने पति के साथ अपने बच्चों को छोड़कर सागर में है, उसका कहना है कि अगर वह गांव गई तो आरोपी उसे जान से मार देंगे. उसने इस मामले की शिकायत एसपी से कर न्याय की गुहार लगाई है. फिलहाल एसपी सचिन अतुलकर ने स्थानीय थाने को निर्देश दिया है कि वह आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार करें. 
